बुद्ध और उनका दर्शन: एक व्यापक परिचय (भाग 1)
इस वीडियो में, हम बौद्ध दर्शन की गहराइयों में उतरने से पहले, बुद्ध के जीवन और उस समय की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को समझेंगे। यह सीरीज आम दर्शक से लेकर यूपीएससी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वालों के लिए समान रूप से उपयोगी है।
बुद्ध की कहानी क्यों और कैसे?
- उद्देश्य: बुद्ध की जीवन यात्रा से उनके दर्शन के मूल सिद्धांतों (जैसे अनित्यता, दुख, निर्वाण) को जोड़ना।
- दर्शन का विस्तार: बुद्ध के मूल उपदेशों (चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग) के साथ-साथ बाद में विकसित हुई शाखाओं का परिचय:
- थेरवाद (हीनयान): बुद्ध के मूल उपदेशों पर आधारित, व्यक्तिगत मोक्ष पर जोर।
- महायान: बुद्ध-प्रकृति और बोधिसत्व के आदर्श पर केंद्रित, जिसमें सभी प्राणियों की मुक्ति का लक्ष्य है। इसकी प्रमुख शाखाएं:
- माध्यमिक (शून्यवाद)
- योगाचार (विज्ञानवाद)
- वज्रयान (मंत्रयान/तंत्रयान): तिब्बत और जापान (जैन बौद्ध धर्म) में लोकप्रिय, अनुष्ठानों और मंत्रों पर जोर।
- नवयान: डॉ. अंबेडकर द्वारा स्थापित, जिसने बौद्ध धर्म को सामाजिक न्याय से जोड़ा।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: बौद्ध धर्म का उदय क्यों हुआ?
बुद्ध का समय (छठी शताब्दी ईसा पूर्व) बड़े बदलावों का दौर था:
- आर्थिक: लोहे के उपयोग से कृषि उत्पादन बढ़ा, जिससे शहरीकरण (द्वितीय नगरीकरण) और मुद्रा अर्थव्यवस्था का विकास हुआ। इस व्यापक आर्थिक बदलाव को समझने के लिए आप अर्थशास्त्र का परिचय: मूल अवधारणाएँ, परिभाषाएँ और आर्थिक प्रणालियाँ पढ़ सकते हैं।
- राजनीतिक: 16 महाजनपदों का उदय हुआ, जिसमें राजाओं की शक्ति बढ़ी और राज्यों के बीच संघर्ष बढ़ा।
- सामाजिक-धार्मिक:
- वर्ण व्यवस्था: क्षत्रियों और वैश्यों की बढ़ती आर्थिक-राजनीतिक शक्ति का ब्राह्मणों के धार्मिक वर्चस्व से टकराव।
- यज्ञ और पशुबलि: कृषि के लिए पशुधन की आवश्यकता बढ़ने पर बलि प्रथा विरोधी विचारधारा को बढ़ावा मिला।
- श्रमण परंपरा: वैदिक धर्म की जटिलताओं से मुक्ति चाहने वाले 62 से अधिक आंदोलनों का उदय, जिनमें बौद्ध और जैन प्रमुख थे। इस संदर्भ में जैन धर्म के विकास के बारे में और अधिक जानकारी के लिए मौर्य साम्राज्य और जैन धर्म: पूरा इतिहास एक ही क्लास में देखें।
बौद्ध धर्म की परंपराएं और प्रमुख पात्र
- मुख्य स्रोत: बुद्ध के उपदेश त्रिपिटक (विनय, सुत्त, अभिधम्म) में संग्रहित हैं। उनकी कहानी अश्वघोष के 'बुद्धचरित' और ललितविस्तर सूत्र जैसे ग्रंथों में मिलती है।
- डॉ. अंबेडकर का विशेष दृष्टिकोण: उनकी पुस्तक 'बुद्ध और उनका धम्म' पारंपरिक बौद्ध कथाओं पर सवाल उठाती है:
- चार दृश्य: क्या 29 साल के राजकुमार ने पहले कभी बूढ़ा या बीमार नहीं देखा था?
- सर्वं दुखम: क्या बुद्ध जानते नहीं थे कि संसार में सुख भी है?
- कर्म और अनात्मवाद: बिना आत्मा के कर्म और पुनर्जन्म का फल कैसे संभव है?
- भिक्षु संघ की उपयोगिता: क्या केवल ध्यान करने वाला संघ समाज के लिए उत्पादक था? अंबेडकर ने इन 'विरोधाभासों' को हल करते हुए एक नई, तर्कसंगत व्याख्या 'नवयान' के रूप में प्रस्तुत की।
- प्रमुख समकालीन दार्शनिक:
- निगंठ नाथ पुत्र (महावीर): जैन धर्म के प्रवर्तक।
- मक्खली गोशाल: नियतिवाद (नियति) के प्रवर्तक।
बुद्ध के जीवन की भूगोल
बुद्ध का अधिकांश जीवन उत्तर भारत के पांच प्रमुख क्षेत्रों में बीता:
- मगध: राजगीर और बोधगया (जहां उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ)।
- कोशल: श्रावस्ती (जहां उन्होंने कई वर्ष बिताए)।
- वज्जि संघ: वैशाली (गणतंत्र)।
- मल्ल: कुशीनगर (जहां उनका महापरिनिर्वाण हुआ)।
- काशी: सारनाथ (जहां उन्होंने पहला उपदेश दिया)।
अनात्मवाद और 'अप्प दीपो भव'
बुद्ध का अंतिम उपदेश 'अप्प दीपो भव' (अपना दीपक स्वयं बनो) उनके दर्शन का सार है। उन्होंने कभी खुद को परम अधिकार नहीं माना। उनका सिद्धांत अनात्मवाद (ना आत्मा) बताता है कि व्यक्ति (अहंकार) एक सतत परिवर्तनशील प्रक्रिया है, कोई स्थायी तत्व नहीं। यह मानवीय चेतना और नैतिकता का अत्यंत वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।
समाज में धन का सम्मान: अनाथपिंडक की कहानी
सेठ अनाथपिंडक ने बुद्ध से पूछा कि क्या उन्हें भिक्षु बन जाना चाहिए? बुद्ध ने कहा कि जो अपनी संपत्ति का उपयोग समाज के कल्याण के लिए करता है, वह भिक्षु से कम नहीं है। यह दर्शन धन कमाने और सामाजिक उत्थान को नैतिक बनाता है, जो उस समय के उभरते व्यापारी वर्ग के अनुकूल था। जीवन के विभिन्न संस्कारों और उनके महत्व को समझने के लिए आप भारतीय संस्कार और सूरदास के भजन: जीवन के 16 संस्कार भी पढ़ सकते हैं। इसके अलावा, तार्किक और विश्लेषणात्मक सोच को विकसित करने के लिए Analytical Reasoning Full Lecture: Past Papers, English, Pedagogy & GK उपयोगी हो सकता है।
बहुत-बहुत नमस्कार। आप सबका फिर से स्वागत है इस क्या कहना चाहिए? बेसुख अवस्था में पड़े हुए चैनल पर जिसमें एक डेढ़ साल में
एक वीडियो आता है और मैं हर बार वायदा करता हूं कि जल्दी ही फिर से फिलॉसफी वीडियो बनाऊंगा। फिलॉसफर्स ऐसे भी सुस्त
होते हैं। आपको पता है आलसी लोग होते हैं तो मैं भेगनी की कैटेगरी में आता हूं। डेढ़ साल पहले मैंने घोषणा की थी कि
बुद्धिज्म पर वीडियो आने ही वाला है। यहां तक कि YouTube पे हमने एक वो क्या होता है? कम्युनिटी उस पे लिखा कि अगर आपका कोई
सवाल है तो पूछ लीजिए। तो ऑडियंस ने क्या किया? सवाल भेजे इतने जिनकी संख्या थी 8000।
तो मेरी टीम को एक महीना लगा 8000 सवाल को पढ़ के क्लासिफाई करने में। क्लासिफाई करके उन लोगों ने मुझे सवाल दिए करीब वो
100 के आसपास बना के दिए। उन 100 में से 2030 सवाल ऐसे थे जो मुझे भी नहीं आते थे। क्योंकि उस तरह से मैंने पढ़ा ही नहीं था।
जैसे वह पूछ रहे हैं कि आप यह बताएं कि श्रोता पन्न क्या होता है और अरहंत से कैसे अलग होता है? बुद्ध ने
आत्मा को नहीं माना तो बुद्ध ने निर्माण को। हालांकि ये तो आसान सवाल है। फिर कहा कि यह बताएं कि मंत्रयान, तंत्रयान और
जिसको वज्रयान कहते हैं वो क्या है? तिब्बत के वज्रयान और भूटान के वज्रयान में क्या अंतर है? यह सब सवाल पढ़ के मुझे
बुद्ध का पहला आर्य सत्य याद आया। [हंसी] सब कुछ दुखमय है। तो और कई लोगों ने बुद्ध
के जीवन के बारे में पूछा। कईयों ने डॉ. अंबेडकर ने 1956 में बौद्ध धर्म क्यों अपनाया? अपनाया तो उसमें क्या बदलाव किए?
यह पूछा। तो मुझे पहली बात यह समझ में आ गई कि बौद्ध धर्म को इतने साल तक पढ़ने पढ़ाने
के बाद भी बहुत कुछ ऐसा है जो यूपीएससी के पाठ्यक्रम में नहीं था और मेरी नजर में कभी आया नहीं। तो आलस्य तो एक कारण था ही।
फिर एक कारण यह भी था कि मैं उन सारे प्रश्नों को आधार बना के और पढ़ने लगा। और पढ़ते-पढ़ते सवा साल निकल गया। तीन चार
दिन पहले मुझे आत्मविश्वास आ गया कि हां अब मैं बुद्ध पर बुद्ध के दर्शन पर लगभग 2025 घंटे बाद कर सकता हूं तो यह भी हुआ
कि इसको एक दिन में तो नहीं करेंगे चार पांच छ सात दिन में करेंगे अलग-अलग समय में करेंगे
तो मैंने सोचा क्योंकि इस चैनल का उद्देश्य दरअसल यह है कि देश का आम आदमी जिसका यूनिवर्सिटी से कोई संबंध नहीं है
उसको भी वो सब चीजें मिल जाए जो लगता है कि केवल विश्वविद्यालयों में और दर्शन हमारी परंपरा हमारे समाज ने क्या सोचा
अतीत में कितना गहरा सोचा दुनिया के बाकी धर्मों से दर्शनों से कितना मिलताजुलता कितना गहरा कितना बेहतर सोचा ये जानने का
हक तो सबको है हर व्यक्ति को है तो मेरे लिए आईएस की क्लास लेना बहुत आसान काम है पर YouTube के लिए कुछ करना बड़ा मुश्किल
है। तो उसमें हर व्यक्ति लेंस लगा के देखता है आक्रमण करने के लिए। फिर एक भी गलत स्टेटमेंट निकल जाए तो उस 500
टिप्पणियां आती हैं। यह कैसे बोल दिया? तो भाई भी रहता है। और यह भी कि जो आम दर्शक की जरूरत है ना कि विश्वविद्यालय या सिविल
सेवा की तैयारी करने वाले दर्शक की जरूरत है। उसका अंतर भी मैं समझ सकूं। तो ये तय किया कि हम शुरुआत करेंगे बुद्ध के जीवन
यात्रा से। बुद्ध की कहानी से। उसी कहानी में से बहुत सारे लिंक निकलेंगे उनके दर्शन के जो मैं बीच में हिंट करूंगा आप
लोगों को और आप लोग क्योंकि इसकी परीक्षा भी देंगे और निबंध में आपको बुद्ध की कहानी से बहुत
चीजें मिल सकती हैं। बुद्ध के दर्शन से निबंध के लिए बहुत कुछ मिल सकता है। आर्ट एंड कल्चर के लिए इतिहास के लिए भी बुद्ध
की कहानी और दर्शन से कई चीजें मेरा ख्याल है कि मिल सकती हैं। लेकिन निबंध इंटरव्यू और एथिक्स के पेपर के लिए तो निसंदेह बहुत
सारी चीजें आपको मिलनी चाहिए। जहां आपके मन में सवाल है तो आप यही से पूछ लीजिएगा और हम लोग कोशिश करेंगे कि जितने सवाल हो
सकते हैं वो करें। तो टॉपिक का नाम लिखा है बुद्ध और उनका दर्शन लेकिन आज हम जो शुरुआत करेंगे वो करेंगे बुद्ध की कहानी
से। बुद्ध के दर्शन का बेसिक मतलब समझ लीजिए कि जब बुद्ध ने अपना दर्शन दिया तो एक तो बुद्ध का अपना दर्शन था
जो समझने में हमें थोड़ा समय देना पड़ेगा। चार आर्य सत्य आपने सुने होंगे है ना अनित्यवाद सुना होगा अनात्मवाद निरात्मवाद
सुना होगा कि वो आत्मा को नहीं मानते थे निर्माण को मानते थे परिनिर्वाण महापरिनिर्वाण को मानते थे ये सब चीजें
क्या थी एक तो बुद्ध का दर्शन हुआ बुद्ध के जाने के बाद आपने सुना होगा कि एक परंपरा थी थेरवाद
जिसको स्थविरवाद भी कहते थे थेरवाद की परंपरा से थोड़ा घूमतेघूमते एक परंपरा बन गई जिसको हम बोलते हैं अगर आपने शब्द सुना
कहो हीनयान तो कुछ लोग मानते हैं कि थेरवाद ही आगे चलकर हीनयान में कन्वर्ट हो गया। कुछ लोग
यह भी कहते हैं कि थेरवाद कहो, हीनयान कहो, स्थविरवाद कहो या एक शब्द चलता है सर्वाद।
इन चारों का एक ही मतलब है। लेकिन सच बात ये है कि सर्वास्वाद और हीनयान पूरी तरह से एक बात नहीं है। बहुत बारीक अंतर है।
इन अंतरों को हम समझेंगे बुद्ध की कहानी समझने के बाद और उसमें से लिंकेजेस निकालेंगे। फिर जब बुद्ध को गए हुए
ठीक-ठाक समय हो गया था तो एक नई परंपरा शुरू हो गई जिसका नाम महायान है। मोटे तौर पर महासाघिक एक शब्द आपने सुना होगा उसी
से निकलता है। किंतु महासांघिक और महायान एकदम एक बात नहीं है। उनमें भी अंतर होता है। तो थोड़ा सा समझेंगे महासांघिक क्या
होता है? महायान से इसमें क्या अंतर है? और फिर महायान में कई शाखाएं निकली। जैसे हीनयान में आपने शायद सुना हो कि एक शाखा
को वैभाषिक बाह्य प्रत्यक्षवाद कहते हैं और एक शाखा को सौत्रांतिक बाह्य अनुमयवाद कहते हैं। ये दो प्रमुख शाखाएं किनयान की
हैं। इसी तरह से महायान में दो प्रमुख और एक बाद में प्रमुख बनने वाली जो शाखाएं थी वो निकल गई और इन सब ने बुद्ध की व्याख्या
अपने अपने हिसाब से की। जैसे महायान की एक शाखा आपने सुना होगा माध्यमिक शून्यवाद कहते हैं या केवल शून्यवाद शायद आपने सुना
होगा। और शून्यवाद का संबंध गणित वाले शून्य से बिल्कुल नहीं है। मुझे एक मैथमेटिशियन फ्रेंड कुछ दिन पहले मिले।
बोले कि मैं बहुत खुश हूं इस बात से कि फिलोसफी में भी शून्य की बात होती है। मैंने कहा नहीं नहीं होती है। वो शून्य
अलग है या शून्य अलग है। दोनों एकदम अलग-अलग है। फिर इसी में एक दर्शन बना जिसका नाम था योगाचार्य विज्ञानवाद या
केवल विज्ञानवाद अभी कह लीजिए। जब विस्तार में समझेंगे तो हम उसको पूरा जड़ तक समझेंगे कि इन्होंने क्या कहने का प्रयास
किया और कैसे बौद्ध दर्शन और भारतीय परंपरा के अन्य दर्शन दुनिया के किसी भी दर्शन से कई मामलों में बेहतर खूबसूरत
साबित होते हैं यह समझना हमारा मूल उद्देश्य है। आगे चलके एक दर्शन बना जिसका नाम था वज्रयान और वज्रयान
को ही कुछ लोग बोलते हैं मंत्रयान। इसी को कुछ लोग बोल देते हैं तंत्रयान। जापान में इसका नाम थोड़ा अलग है। है ना?
चाइना में थोड़ा सा अलग नाम है। इनहीं में से एक शाखा जापान में जैन बुद्धिज्म हो गई। इसी को चीन में चांद बुद्धिज्म कहा
गया। ये सब शाखाएं महायान के ही ऑफशूट्स थे। महायान की परंपरा से निकलते गए। और इस सब के बाद 20थ सेंचुरी में एक नई
शाखा बनी जिसका नाम है नवयान। आपने सुना होगा डॉ. अंबेडकर ने अपने जीवन के अंतिम दौर में बौद्ध धर्म को अपना लिया था। बहुत
रोचक बात है। डॉ. अंबेडकर ने 1935 में 13 अक्टूबर के दिन येवला नाम के स्थान में महाराष्ट्र में एक घोषणा की। आपको पता है
कि उस समय कालाराम मंदिर में एक आंदोलन चल रहा था। मंदिर प्रवेश आंदोलन चल रहा था। वो सफल हो नहीं पाया। करीब पांच छ साल
आंदोलन चला। उस आंदोलन की विफलता से वो काफी क्षुब्ध थे। उसी बीच में गोलमेब सम्मेलन भी हो रहे थे।
1935 में उनको लग गया कि पूरी कोशिश करने के बाद भी मुझे अपने धर्म में मानवीय सम्मान नहीं मिल पा रहा है। तो उन्होंने
एक दिन घोषणा कर दी कि मेरा जन्म हिंदू के रूप में हुआ जो मेरे बस में नहीं था। पर मैं हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं क्योंकि
यह मेरे बस में है। इस बात से बड़ा हड़कंप मचा। यह बात उनके दिमाग में 1927 से ही चल रही
थी। 1928 29 में कहीं-कहीं उन्होंने जो अपनी अखबार था बहिष् भारत जैसा था ना उसमें भी एक आध टिप्पणी की थी। यहां तक
लिखा था कि अगर आपको धर्म बदलना ही है तो मुसलमान बन जाओ। तो लोगों को लगता था कि जब 1935 में घोषणा की तो शायद वो इस्लाम
चुनेंगे। लेकिन 35 के एकदम बाद उनका रुझान सिख धर्म की ओर काफी बढ़ता हुआ दिखा। उनका बेटा
अमृतसर गया भी कुछ महीने रहा भी समझने के लिए। वह खुद भी अमृतसर गए एक कार्यक्रम के लिए। तो लोगों के मन में था कि या तो वह
इस्लाम को चुनेंगे या ईसाइयत को शायद ईसाईयत पर सब कम संभावना थी या सिख धर्म को चुनेंगे। क्योंकि उनकी जो एप्रोच थी
उसके हिसाब से इन तीन का विकल्प ज्यादा मजबूत था। लेकिन सरप्राइजिंग बात यह है कि 13 अक्टूबर 1935 की घोषणा के 21 साल एक
दिन बाद 14 अक्टूबर 1956 को अपने मृत्यु से केवल डेढ़ महीना पहले उन्होंने धर्म बदला और जब धर्म बदला तो कौन सा धर्म था?
बौद्ध धर्म। और 1940 के बाद जनरली 45 के बाद बहुत शिद्दत के साथ वो बौद्ध धर्म का अध्ययन
करने लगे। और उनकी इच्छा हुई कि मैं बौद्ध धर्म पर एक ऐसी किताब लिख के जाऊं जो भारत के बौद्धों की बाइबल बन जाए। जैसे बाइबल
होता है ना कि एक किताब पढ़ ली तो आपको ईसाइयों को पता है कि भाई ये है या कुरान शरीफ पढ़ ली तो मुसलमानों को पता है कि ये
हमारी किताब है। ऐसे ही बौद्धों की भी तो एक किताब हो क्योंकि बौद्धों में एक किताब नहीं बहुत बिखराव है। अभी मैं आपको
समझाऊंगा क्या बिखराव है। उन्होंने अपने जीवन के आखिरी दौर में किताब लिखी जिसका नाम था बुद्ध और उनका धम्म। बुद्ध एंड ह
धम्म। ये किताब छपी उनकी मृत्यु के एक साल बाद 1957 में। उनकी मृत्यु छप्प में हुई। पर वो लिख चुके थे। प्रूफ रीडिंग कर चुके
थे। रेफरेंसिंग कम कर पाए थे जो रेफरेंसिंग बाद के लोगों ने की जब उसका हिंदी अनुवाद भी आया 1961 में रेफरेंसिंग
बाद में हुई रेफरेंसिंग का मतलब उसमें जहांजहां कोई उहरण था तो वो कहां से लिया गया उसके रेफरेंसेस बाद में जोड़े गए
लेकिन हां वो लिख चुके थे और उन्होंने कहा कि मेरे वाला जो बौद्ध धर्म है ना तो वो मूल बौद्ध धर्म है ना वो हीनयान है ना वो
महायान है मैं इसको नया नाम दूंगा नवयान ये नवयान है इसलिए अगर कहे के कहे कि मुझे बौद्ध धर्म को समझना बौद्ध दर्शन को समझना
है आधे घंटे में समझा दीजिए तो मैं हाथ जोड़ लेता हूं कि ना यह तो नहीं हो पाएगा। इन सारी चीजों को ठीक से समझने की शर्त है
कि हम कम से कम 15 20 घंटे के प्रोसेस में रहे और तब हम यह मुकम्मल तरीके से कह सकते हैं कि हां अब मैं बौद्ध दर्शन पे बौद्ध
परंपरा पे बौद्ध धर्म पे लगभग किसी भी सवाल का जवाब देने की स्थिति में हूं। यह वक्त आने में इतनी मेहनत करनी पड़ती है।
मैं जानता हूं कि आप घबरा गए होंगे। पहला आर्य सत्य याद आना शुरू हो गया होगा आप लोगों को। सर्वम दुखम दुखम ये सब कुछ
दुखमय है। [हंसी] लेकिन ठीक है। दूसरा तीसरा भी याद आएगा समय के साथ। कोई चिंता की बात नहीं है। तो मैंने थोड़ा सा
संक्षेप में फिर से बता दूं कि ये जो हमारी सीरीज है फिलॉसफी वाली मैं क्यों करता हूं। दो तीन बातें हैं। एक बात तो जो
मेरे मन में बार-बार आती है। मैं अक्सर एक कविता का जिक्र करता हूं जो हिंदी साहित्य में हम पढ़ते हैं। उसका नाम है ब्रह्म
राक्षस। एक कवि थे गजानन माधव मुक्तिबोध। यह कविता यह कहती है बट कहती नहीं है। इस
कविता में इस प्रतीक का इस्तेमाल किया गया है। वह यह है कि अगर आपने जीवन में कोई ज्ञान हासिल किया थोड़ा भी किया हो कितना
भी किया हो और यदि आप वो समाज के साथ शेयर किए बिना मर गए तो प्रेत योनि में भटकना पड़ता है। और उस
प्रेत योनि का नाम है ब्रह्म राक्षस। हालांकि मुझे आस्था नहीं है इन सब बातों में। मैं तो अज्ञेयवादी किस्म का आदमी हूं
और मुझे जब से कविता पढ़ी है ना मुझे लगता है कि नहीं जो जो आता है सब बता देना है और हमारे समय में सौभाग्य ये है कि बताने
के लिए एक मंच ऐसा मिल गया है YouTube कि आप अपनी लंबी लंबी स्पीच भी छोटी बात तो आप TikTok पे भी कर सकते हैं inा पे भी कर
सकते हैं रील वगैरह में पर बड़ी बात सीरियस बात करने के लिए YouTube जैसे मंच हैं तो मैं यह नहीं बनना चाहता हूं मैं
नहीं चाहता कि मैं प्रेत बन के भटकूं बाद में इसलिए जो जो मैं जानता हूं मैं चाहता हूं सब बता के मरूं। अभी मरने में टाइम है
थोड़ा सा लेकिन जितना भी है तब तक सब बता दूं जो भी है। दूसरी बात मेरा मानना है कि जो हिंदी का समाज है या सिर्फ हिंदी नहीं
भारतीय भाषाओं का जो समाज है उसका दुर्भाग्य कहें या क्या कहें उसके पास पढ़ने लिखने की चीजें बहुत प्रचुर मात्रा
में नहीं है। हां, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आने के बाद चीजें थोड़ी सी आसान हो रही है और बहुत जल्दी हो भी जाएंगी। लेकिन मुझे
लगता है कि जो इन समाजों के लोग हैं, गैर अंग्रेजी भाषी लोग हैं, उनकी एक जिम्मेदारी और बनती है कि
क्योंकि अंततः लोकतंत्र चलता है इस बात से कि लोगों में बहस किन मुद्दों पर होती है और बहस का स्तर क्या है? और मेरा मानना है
कि अगर आप अपने समाज में बहस का स्तर थोड़ा उठा सके तो इससे बड़ा योगदान नहीं हो सकता। मुझे नहीं पता इससे उठेगा ही
नहीं। पर मेरी इंटेंशन यह है कि लोग थोड़ा और बेहतर जाने चीजों को रहस्य सर उठेगा और योजना यह है कि पहले हम भारत दर्शन पूरा
करेंगे जैसे बौद्ध दर्शन के बाद वेद उपनिषद करेंगे गीता पर शायद एक या दो बड़े वीडियो बनाएंगे शंकराचार्य को समझे बिना
भारत दर्शन पूरा नहीं हो सकता है फिर वैष्णव वेदांत पे आएंगे सांख्य पे योग पे न्याय पे वैशेषिक पे मीमांसा पे आएंगे फिर
पश्चिम पे आएंगे सुकरात से लेकर आज तक का दर्शन सब दार्शनिकों ने क्या-क्या योगदान दिया आपने डे कार्ड का नाम सुना होगा,
सार्थ का सुना होगा, हीगल का सुना होगा। इन सब पर बात करेंगे। फिर मेरी इच्छा है कि दुनिया के सभी धर्मों पर बातचीत हो।
धर्म दर्शन का मतलब ये होता है कि आपने एक समस्या को ली जैसे ईश्वर है या नहीं? ये बड़ा भारी सवाल है। इस पर दुनिया के सारे
धर्मों का स्टैंड क्या है? सारे दार्शनिकों का स्टैंड क्या है? सारे वैज्ञानिकों का स्टैंड क्या है? उन सबको
जोड़ के समझना कि आज तक की हमारे ज्ञान की स्थिति कहां पहुंची है? इसको बोलते हैं धर्म दर्शन। यह उसके बाद करेंगे और सोशल
पॉलिटिकल फिलोसफी चौथा हिस्सा है जो हम साथ साथ करेंगे जैसे समानता स्वतंत्रता न्याय यह सब उसके हिस्से समानता और न्याय
में आरक्षण जैसी एक समस्या मानी जाती है तो एक पूरी सीरीज उस पर है कि भारत में जब हमने पॉलिसीज बनाई वो कितनी सूटेबल है तो
ये सब करना है और जितना भी समय बचा हुआ है तो बौद्ध दर्शन को समझने की चुनौतियों में पहली चुनौती ये कि बुद्ध ने बहुत
स्पष्ट प्रश्न उत्तर बहुत सारे मामलों में दिए नहीं। एक शब्द है अव्याकृत जिसको हम अगली क्लास में विस्तार में समझेंगे। इसका
मतलब ये है 10, 12 या 14 ऐसे प्रश्न हैं। जो सबसे बुनियादी सवाल है और बुद्ध से जब उनका
जवाब पूछा गया, बुद्ध ने कहा कि इन पर कुछ नहीं कहा जा सकता। इन पर चुप रहना ही ठीक है। क्यों चुप रहना ठीक है? क्या उनको
जवाब नहीं आता था? तो बौद्ध लोग यह मानते हैं कि उनको जवाब आता था। लेकिन यह ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर सामान्य भाषा में
व्याकरण की भाषा में दिया जाना संभव नहीं है। अव्याकृत यानी व्याकरण की भाषा में इनका जवाब देना संभव नहीं है। अब अगर
बुद्ध ने बहुत बुनियादी कुछ सवालों के जवाब दिए ही नहीं तो सीधी सी बात है कि आपको बौद्ध दर्शन पढ़ने में समझने में
दुविधा तो होगी ही और बाकी लोगों को भी दिक्कत होगी। फिर जब बुद्ध जाने वाले थे जब बुद्ध 80
साल के हुए उनके पास जाने का समय आया उनका जो निकटतम दोस्त था या सहचर था या सचिव था उसका नाम था आनंद आनंद ने उनसे एक बार
नहीं कई बार कहा कि अब आपका जाने का समय है तो बेहतर है कि जाने से पहले कुछ स्पष्ट निर्देश देकर जाए कि बाद के लोगों
को क्या करूं। तो बुद्ध ने साफसाफ कहा कि मैं कोई निर्देश देकर नहीं जाऊंगा और मैं चाहूंगा
मतलब मैं पैगंबर नहीं बनना चाहता हूं कि जो मैंने कह दिया फाइनल है। मैं उस रास्ते पर जाना ही नहीं चाहता। कोई निर्देश नहीं।
एक ही निर्देश है और वो है धम्म। धम्म को अपने मन में धारण करो और उसके आधार पर जो उत्तर तुम्हें सूझे उस उत्तर को मानो।
ना पुस्तकों को सम्मान देना है, ना मुझे सम्मान देना है, उस विचार को सम्मान देना है। और यह बात कितनी गहरी है अगर आपको दो
उदाहरण से मैं समझाऊं। कुछ दिन पहले मैंने एक पोस्ट पढ़ी Facebook पर जो एक ऑस्ट्रेलिया के बौद्ध भिक्षु के बारे में
थी। एक पत्रकार ने उससे कहा अगर मैं आपके त्रिपिटक को त्रिपिटक
बौद्धों की धार्मिक किताब का नाम है। अगर मैं आपके त्रिपिटक को का मोड में डालकर फ्लश कर दूं
तो आप क्या करेंगे? उकसा रहा था उसको तो अब क्या करेंगे? उसने कहा कुछ नहीं मैं प्लंबर को फोन
करूंगा और कहूंगा कि फ्लश चोक ना हो जाए आप ठीक कर दीजिए।
पत्रकार बोला और तिबिटक के लिए क्या करेंगे? बोले कुछ नहीं। बोले आपके पास तो बुद्ध की मूर्ति है। अगर
मैं इस मूर्ति को पटक के गिरा दूं, तोड़ दूं तो आप क्या करेंगे? बोला कुछ नहीं है। मैं झाड़ू ला के सफाई
कर दूंगा। ताकि मेरे कमरे में धूल ना रहे, कंकड़ ना रहे, किसी के पैर में चुभ ना जाए।
बोला यार तुम्हारे बुद्ध भगवान की मूर्ति को मैं तोड़ने की बात कर रहा हूं। अब गुस्सा ही नहीं आ रहा। बोले नहीं बुद्ध तो
खुद ही कहे गए हैं। जैन बुद्धिज्म में एक बात कही जाती है। अगर तुम्हें बुद्ध बनना है तो बुद्ध को
मार दो। अगर बुद्ध तुम्हें मिल भी जाए तो बुद्ध को मार दो।
बुद्ध को फॉलो नहीं करना है। बुद्ध होना है। ना बुद्ध की जरूरत है, ना मूर्ति की जरूरत
है, ना किताब की जरूरत है। और उसने यही कहा आप किताब डालेंगे कमोड़ में किताब नहीं छप के आ जाएगी। आप मूर्ति तोड़ेंगे
मूर्ति नहीं बन जाएगी। लेकिन अगर इन चीजों के चक्कर में मैं क्रोधित होने लगा तो धम्म का मूल भाव नष्ट
हो जाएगा। और धम्म तो भाव है। और यही बात महात्मा बुद्ध कह के गए थे कि मैं जाऊंगा ना कोई पैगंबर चाहिए ना कोई
किताब चाहिए ना कुछ और चाहिए अपनी चेतना से पूछना और जब जब दुविधा हो एक काम करना सारे के सारे लोग बैठ जाना
बहुमत से आपसी समझदारी से तय कर लेना अंत में मरतेमरते कुछ लोगों ने कहा कुछ तो बता के जाइए
तो बोले अप दीपो भव अपने दीपक स्वयं बनो। यह उनके अंतिम उपदेशों में से एक है। अपने दीपक खुद बनो।
मैं क्यों बनूंगा भाई? जहां दुनिया के बाकी धर्मों में एक व्यक्ति हुआ था जो सारा ज्ञान देके गया। उसके बाद से किसी की
हिम्मत नहीं कि चू भी कर सके। उस दुनिया में एक आदमी कहरे जाने से पहले कि अपदीप भव मैं क्यों तुम्हें कुछ ज्ञान
दूं? अपने आप देखो। इतना डेमोक्रेटिक तरीके का जो चिंतन का तरीका है, इतना यूनिक तरीका है। पर इस सब का परिणाम यह
हुआ कि जब बुद्ध चले गए तो बुद्ध के दर्शन में बहुत सारे विवाद पैदा होने लगे थे। बुद्ध के जीते जी कोई किताब लिखी ही नहीं
गई थी। एक भी किताब नहीं सब मौखिक। आपने इतिहास से पढ़ा होगा कि पहली बौद्ध संगीति हुई, दूसरी हुई, तीसरी हुई, चौथी हुई।
चौथी बौद्ध संगीति वह भी हीनयान वालों की थेरिया थेरबाद वालों की जब श्रीलंका में हुई 29 ईसा पूर्व में तब जाकर पहली बार
डॉक्यूमेंट किया गया ताड़ के पद पर लिखा गया कि बुद्ध ने क्या कहा और यह बात बुद्ध की मृत्यु के लगभग 450
साल बाद की बात है। कुछ लिखा हुआ नहीं था। पहली संगीति उनकी मौत के एकदम बाद हुई। 483 ईसा पूर्व में उसमें सिर्फ मौखिक रूप
में कुछ कुछ बातें हुई कि यही बातें नोट कर लें याद रखेंगे दोहराते रहेंगे बच्चों को बताते रहेंगे ताकि जैसे वेद लंबे समय
तक श्रुति परंपरा में चले वैसे चलाएंगे इस तरीके से उन लोगों ने काम किया तो अभी हम शुरू करते हैं थोड़ा सा बुद्ध
का जीवन समझते हैं और बुद्ध के जीवन से आगे चलकर निकालेंगे बुद्ध के दर्शन की बहुत सारी बातें बुद्ध के जीवन को हम भाग
एक इसलिए कह रहे हैं कि यहां से केवल शुरुआत हो रही है भाग दो में बुद्ध के दर्शन भाग तीन में हीयन, भाग चार में
महायायन, भाग पांच में नवयान। इस तरह से पांच भागों में उसको कर लेंगे। सबसे पहला सवाल ये कि बुद्ध की कथा हमें
मिलती कहां से है और वो क्या बहुत प्रामाणिक कथा है भी या नहीं? इसको हम कैसे डिसाइड करें?
त्रिपिटक आपने शब्द जरूर सुना होगा। सुना है? त्रिपिटक का मतलब होता है तीन टोकरी। त्रि
यानी तीन। पिटक यानी टोकरी। जब बुद्ध की मृत्यु हुई 483 ईसा पूर्व में तो उनकी मृत्यु के एकदम बाद उस समय अजात
शत्रु मगध साम्राज्य का शासक था। साम्राज्य कहे महाजनपद कहे जो भी उस समय तो महाजनपद वाली हालत ज्यादा थी। उसको लगा
कि भाई बुद्ध ने जो कहा इकट्ठा करना बहुत जरूरी है वरना बिखर जाएगा। उसने तुरंत किया कि प्रथम बौद्ध संगीति या
फर्स्ट बुद्धिस्ट काउंसिल बुलाई जिसको हम हिंदी में बोलते हैं बौद्ध संगीति। बौद्ध संगीति का मतलब है जहां पर संगीत आदि की
मदद से पाठ होगा चीजों का चीजों को इकट्ठा भी करेंगे और पहली बौद्ध संगीति में यह हुआ कि
क्या-क्या बुद्ध ने कहा था नोट करो तो दो पुस्तकें उस समय इकट्ठी की गई लिखी नहीं गई बोली गई
विनय पिटक को जिस व्यक्ति ने बोला वो एक नाई समुदाय का व्यक्ति था उसका नाम था उपाली आज इस कहानी में उपाली का जिक्र
आएगा कि उसका महत्व क्या है ध्यान रखना रचना है। उपाली एक नाई था और उसका इतना सम्मान इस संघ में धीरे-धीरे
हुआ कि उसने विनय पिटक की रचना की। दूसरी रचना थी सूतपिटक। सूतपिटक की रचना करने वाले व्यक्ति का नाम
था आनंद जो बुद्ध का फर्स्ट कजिन था। आप कह सकते हैं। चाचा का बेटा था और उनका निजी सहयोगी भी था। लंबे समय तक सचिव रहा,
सहचर रहा। और जीवन के आखरी क्षण में जो व्यक्ति उनके साथ खड़ा हुआ था वह था आनंद। सूत्र पिटक में क्या है कि सूत्र
क्या-क्या बुद्ध ने दिए? विनय पिटक में क्या है कि बौद्ध संघ में भिक्षुओं के लिए भिक्षुणियों के लिए क्या-क्या नियम है?
विनय के नियम है। सूत्र में सूत्र हैं। क्या-क्या सूत्र दिए? और इस सूत्र पिटक के बहुत सारे हिस्से बनाए गए। आपने एक दीघ
निकाय का नाम सुना होगा। एक मध्यम या मध्यम निकाय का नाम सुना होगा। और किसका एक संयुक्त निकाय इसमें आता है।
इसका भी जिक्र खूब चलता है। हमारे भी काम विशेष में जाने वाली है। तो पांच निकाय इसके अंतर्गत बनाए गए। दीघ निकाय, मध्यम
निकाय, नैत निकाय और एक को बोलते हैं अंगुत्तर निकाय। हां। अंगुत्तर। और पांचवा कौन सा है?
एक और है। पांचवें का नाम चलिए याद तो बताऊंगा। इसमें से दीघनिकाय जो है दीघनिकाय में एक
रचना है जिसको बोलते हैं महा परिनिर्वाण सूत्र और यह बौद्ध परंपरा की बहुत प्रसिद्ध
रचनाओं में से एक है महा परिनिर्माण सूत्र ये जो पांचवा निकाय है इसको बोलते हैं खुदक निकाय
खुदक और ये ध्यान से समझ लीजिए हो सकता है आपके कभी परीक्षा में भी आ जाए आपने एक शब्द सुना जातक कथा
कितनी कितनी जातक कथाएं हैं लगभग जातक कथाएं अगर मैं ठीक याद कर रहा हूं तो लगभग 547 के आसपास है। जातक कथाएं जहां
संकलित है उस पुस्तक का नाम है खुदक निकाय। तो खुदक निकाय में से बुद्ध की बहुत सारी
कहानियां मिलती है। महा परिनिर्माण सूत्र जो कि दीघ निकाय का हिस्सा है। यहां से थोड़ी सी कहानियां मिलती है। अभी धम्मपिटक
में बुद्ध की फिलॉसफी है। जैसे आप देखते हैं कि वेद और उपनिषद में जो अंतर है। उपनिषद में क्या चीज है? फिलोसफी गहरी
फिलोसफी है। तो जो हिस्सा हमारे यहां वेदों में हिंदू धर्म माना गया। अभिधम्म पिटक की भूमिका वही है जिसमें डीप फिलॉसफी
बुद्धिज्म की है और यह लिखा गया था बाद में तीसरी बौद्ध संगीति जो अशोक ने बुलाई थी 250 ईसा पूर्व में यह उसमें लिखा गया
पर हमें सबसे ज्यादा मतलब नहीं आपने बचपन में बुद्ध की कहानी जरूर सुनी होगी आपके स्कूल में बताई गई होगी और
उसमें बताया गया होगा कि बुद्ध ने चार दृश्य देखे थे उसके बाद बुद्ध का हृदय परिवर्तन हो गया था एक देखा था बूढ़ा आदमी
एक देखा था बीमार आदमी एक देखा था शव यात्रा का दृश्य और एक देख लिया लिया था भिखारी
भिखारी भिखारी वो सन्यासी भी था उसका जिक्र आएगा थोड़ी देर में है ना इन चारों को देखा और उनको लगा कि जीवन में कुछ नहीं
रखा है ये जो कहानी आपने सुनी है वो कहानी जिस पुस्तक से ली गई है वो पुस्तक है अश्वघोष
की बुद्ध चरित अश्वघोष बहुत ही रोचक किस्म के आदमी थे और कालिदास के बाद अगर संस्कृत साहित्य में
किसी का सम्मान है तो वो अश्वघोष का बुद्ध चरित्र की एक रचना है सौंदरानंद दूसरी रचना है।
इनका नाम कैसे पड़ा? ये इतने बड़े विद्वान थे कि एक बार जब कुषाण राजा कनिष्क के सामने एक चैलेंज हुआ
तो इनको बौद्ध दर्शन की व्याख्या करने के लिए खड़ा किया गया। इन्होंने बौद्ध दर्शन की ऐसी व्याख्या की
कि जो घोड़े पांच छ दिन से भूखे थे और बेकरार थे कि रस्सियां तोड़ के हम चले जाएंगे मतलब तूफान मचा देंगे
वो घोड़े भी चुप होकर सुनने लग गए बुद्ध की फिलॉसफी इनके मुंह से और तब इनका नाम पड़ गया अश्वघोष
अश्व भी जिनका घोष सुनते हैं जिनकी घोषणाएं सुनते हैं जिनकी बातें सुनते हैं इतने बड़े विद्वान थे लेकिन
अश्वघोष का संबंध है महायान परंपरा से। अब मैं आपको एक मोटा सा अर्थ बता रहा हूं ताकि आप जब भी मैं हीन महायान बोलूं
हल्का-हल्का जिक्र हो जाएगा कि आप समझ जाए। हीनयान का मतलब है जो बुद्ध ने कहा था उसके नजदीक लगभग वैसा ही और बुद्ध
भगवान को आत्मा को परलोक को आमतौर पर नहीं मानते थे। केवल निर्वाण की बात मानते थे। वो कैसे मानते थे हम समझेंगे। निर्वाण और
पुनर्जन्म दो चीजें मानते हैं। वो हम समझेंगे कैसे मानते थे। महायान आते आते लोगों को लगा कि भाई मजा नहीं आता उसके
बिना कुछ तो होना चाहिए उधर भी तो महायान का मोटा मोटा मतलब है जिन्होंने बुद्ध की परंपरा में परिवर्तन करके भगवान देवता वो
सब थोड़ा ज्यादा करना शुरू कर दिया और अश्वघोष महायान की परंपरा के हैं तो अश्वघोष की रचना में बहुत ये लौकिक बातें
होंगी या पारलौकिक बातें भी ठीक-ठाक होंगी खूब होंगी और अश्वघोष की कहानी इतनी प्रसिद्ध हुई।
इसमें कुल मिला के 28 चैप्टर्स थे। जिनमें से 14 चैप्टर ही मिलते हैं। बाकी 14 गायब हो गए हैं। 15 से 28 तक। पर मजे की बात
है। इस पुस्तक का अनुवाद चीन में हुआ। इस पुस्तक का अनुवाद बहुत सारे देशों में म्यांमार में हुआ, चीन में हुआ, तिब्बत
में हुआ। उनमें पूरे 28 चैप्टर्स हैं। तो बाद में उनके चैप्टर्स के अनुवाद वापस करके हमने देखा कि अश्वघोष ने क्या लिखा
था। और अश्वघोष को पढ़ने का बेसिक मतलब है महायान की निगाह से बुद्ध के जीवन को
समझना। और ध्यान रखना है अश्वघोष ने बुद्ध को अपने सामने देखा नहीं था। अश्वघोष का समय सेकंड सेंचुरी एडी का है। फर्स्ट और
सेकंड सेंचुरी एडी का है। बुद्ध की मृत्यु के लगभग 550 साल के बाद अश्वघोष लिख रहे थे। और 550 साल में कहानियां कैसे बदलती
जाती हैं पीढ़ियों के साथ? ऐसा होता ना लोग अपने हिसाब से थोड़ा बहुत उसको बदलते हैं। सम्मान में थोड़ा बदल दिया। कुछ
चीजें खराब थी उनको हटा दिया। बदलते बदलते कहानी पहुंची अश्वघोष के पास और उसने हम सबके लिए लिख के छोड़ दी। एक किताब ललित
बिस्तर सूत्र है। यह भी महायान की है। यह अश्वघोष से भी थोड़ा आगे है कल्पनाएं करने में।
इनके हर बात में देवता आते ही जाते हैं। जबकि बुद्ध कह रहे हैं कि देवता नहीं होते।
और बुद्ध की जीवनी में आप इन दोनों पुस्तकों को पढ़ेंगे हर जगह आपको देवता ही देवता नजर आते हैं। जातक कथा मैंने पहले
आपसे कह दिया कि वो खुदक निकाय का हिस्सा है तो हमने उसको जिक्र कर दिया। तो मोटी मोटी बात एक कहानी बनती है त्रिपिटक से जो
थोड़ा सा रीज़नेबल कहानी मानी जाती है। एक कहानी बनती है बुद्ध चरित्र सूत्र से। लेकिन इसमें जो सबसे बड़ा चेंज आया वो
यहां से आया। और मैंने आपको थोड़ी देर पहले बताया कि 1956 में डॉक्टर अंबेडकर ने किताब लिखी। क्या नाम था उसका? बुद्ध और
उसका धम्म। बुद्ध और उनका धम्म। ये किताब ऐसी है कि इसने बौद्ध परंपरा में तूफान मचा दिया। एकदम तूफान मचा दिया।
और इंटरेस्टिंग बात है कि आज के समय भारत में जो बौद्ध समुदाय है जब डॉ. अंबेडकर बौद्ध बने। उस समय भारत में बौद्ध लोग
बहुत कम था। संख्या बहुत ही कम। आज जो भारत में बौद्ध समुदाय है मेरे ख्याल से उसमें से 80 90% वह बौद्ध हैं जो
डॉक्टर अंबेडकर के बाद बौद्ध बने नव्यान परंपरा के बौद्ध और उनको अश्वघोष की बुद्ध चरित्र में
विश्वास नहीं है उनको ज्यादा विश्वास डॉक्टर अंबेडकर की पुस्तक बुद्ध और उनका धम्म में
लेकिन जो ट्रेडिशनल बुद्धिस्ट थे हीन माया के लोग वो इससे बड़े नाराज हो गए उन्होंने कहा कि इस किताब का नाम होना चाहिए
अंबेडकर और उनका धम्म यह बुद्ध का धम्म नहीं है। पर अंबेडकर की अपनी अप्रोच थी। क्या अप्रोच थी? अंबेडकर ने कई सवाल खड़े
किए। आप बताइए वो सवाल जायज है या गलत सवाल है? अभी-अभी आपने बताया कि बुद्ध ने चार दृश्य देखे थे। उसके बाद बुद्ध का
हृदय परिवर्तन हुआ। वो सन्यासी हो गए, भिक्षुक हो गए। जब बुद्ध ने वो चार दृश्य देखे थे। बुद्ध की उम्र 28 29 वर्ष की थी।
डॉक्टर अंबेडकर ने अपनी किताब की भूमिका में लिखा मैं यह मान नहीं सकता कि 28 29 साल का युवक उसने कभी कोई बूढ़ा ना देखा
हो। अपने पिता को देखते ही होंगे कम से कम। ये कैसे संभव है कि 28 29 साल के व्यक्ति
ने किसी बूढ़े को देखा ही नहीं। किसी बीमार को नहीं देखा। शव यात्रा एक सेकंड को मान लेते हैं कि
उनके सामने ना पड़ी हो कभी। बूढ़े को नहीं देखा, बीमार को नहीं देखा, सन्यासी या भिक्षु को नहीं देखा। यह कैसे हो सकता है?
और इसलिए मैं हरगिज़ मानने को तैयार नहीं हूं कि बुद्ध चरित के ये वर्णन सही है। बुद्ध को उनके असली व्यक्तित्व से काट के
दिखाया गया है। ये उनका कहना है। फिर वो दूसरी बात क्या कह रहे हैं? कि मैं मान नहीं सकता कि बुद्ध जैसा
साइंटिफिक दिमाग का आदमी यह कहे पहले आर्य सत्य में कि संसार में केवल दुख है। सर्वम दुखम दुखम।
कोई भी व्यक्ति समझता है कि संसार में दुख भी है और सुख भी है। बुद्ध जैसा वैज्ञानिक बुद्धि का आदमी इतना गहरा व्यक्ति ऐसा
कैसे कह देगा कि केवल दुख है। और यदि ऐसा है तो फिर हमारे पास रास्ता क्या बचता है?
फिर तीसरी बात बुद्ध ने आत्मा को नहीं माना। यह बात बहुत ही तारीफ की बात है डॉक्टर अंबेडकर के हिसाब से। लेकिन कर्म
सिद्धांत को मान लिया, पुनर्जन्म को मान लिया और निर्वाण या मोक्ष को मान लिया। यह कंट्राडिक्शन कैसे हो सकती है? बुद्ध जैसा
वैज्ञानिक बुद्धि का आदमी कंट्राडिक्शन क्यों करेगा? मैं स्पष्ट कर दूं। कंट्राडिक्शन है नहीं। बुद्ध ने समझाया
इसको। और डॉक्टर अंबेडकर की निगाह में कंट्राडिक्शन है। क्यों कंट्राडिक्शन करेगा? और चौथी बात
कि बुद्ध ने क्या किया? बहुत सारे लोगों को सन्यासी बनाया। भिक्षुक बनाया। आपने सुना होगा भिक्षुक संघ था। बाद में
भिक्षुणी संघ भी बन गया था। जिसमें उनकी जो मौसी थी महाप्रजापति वो भी थी। यशोधरा भी आ रही थी। आपने आम्रपाली का नाम सुना
होगा। अम्रपाली का नाम वो भी उसमें थी और बहुत सारी महिलाएं थी। उनमें से 73 महिलाओं ने एक किताब लिखी थरी गाथा जो
दुनिया की सबसे मतलब बहुत रोचक पुस्तकों में से एक मानी जाती है जिस पर आपका कभी कोई प्रश्न आ भी जाए परीक्षा में तो बड़ी
बात नहीं चौथा सवाल यह है कि बुद्ध ने जो भिक्षु संघ बनाए उनकी सामाजिक उपयोगिता क्या थी?
आप एक शहर में गए आपने एक अच्छी स्पीच दी। 10,000 युवाओं ने कहा कि हमको बौद्ध बनना है। आपने कहा अब उनको ले गए।
वहां रहते खेती करते, पढ़ाई करते, रिसर्च करते, युद्ध करते, कुछ तो करते, उत्पादक काम करते, बाजार में जाते, दुकान चलाते,
कुछ तो करते। आप उनको संघ में ले गए। संघ में वो क्या करते हैं? संघ में वो धर्म चर्चा करते
हैं। धार्मिक जीवन जीते हैं। पर उससे सामाजिक उत्पादकता क्या होती है उसकी? और अंबेडकर ने कहा कि मैं यह मान नहीं
सकता कि बुद्ध जैसा वैज्ञानिक बुद्धि का आदमी ऐसे संघ की स्थापना करेगा जिसमें भिक्षुओं की सामाजिक उपाध्यता ना बनती हो
और इसलिए इन चार चीजों और एक पांचवी चीज का जिक्र वो बीच-बीच में करते भूमिका में इन चार का जिक्र किया कि जो बुद्ध परलोक
को प्रायः खारिज करते थे उनकी जीवनी में इतनी सारी पारलौकिक बातें मैं नहीं मान सकता कि बुद्ध के बारे में
सही है और इसलिए मैं इन सब अंतर्विरोधों को यथासंभव दूर करके जितना मेरे पास समय है
जितना मेरी क्षमता है बुद्ध चरित्र को ही बेस ले चल रहा हूं पर जहांजहां मुझे लग रहा है कि चीजें बहुत गलत हो रही है मैं
उनको अपनी तार्किक दृष्टि से ठीक करूंगा बदलूूंगा और एक ऐसी किताब लिखूंगा जो भारत के बौद्ध
लोगों के लिए क्या काम करेगी बाइबल का काम करेगी तो बौद्ध बाइबल बनाने की मेरी इच्छा है और नहीं भी बना पाऊंगा तो कम से कम कुछ
प्रश्न खड़े कर दूंगा ताकि बौद्ध समुदाय उन प्रश्नों पर सोचे कि इनका क्या सही उत्तर हो सकता है ये मेन सोर्सर्सेस है
कुछ और किताबें आपने सुनी होंगी बहुत प्रसिद्ध है नील आर्मस्ट्रांग आप जानते हैं चांद पे गए थे उनकी बेटी थी कैरन
आर्मस्ट्रांग उसने किताब लिखी बुद्ध बहुत अच्छी किताब मानी जाती है द लाइट ऑफ एशिया एक बहुत प्रसिद्ध किताब है जो एडवर्ड ऑर्ड
की लिखी हुई है। उसको भी लोग यूज़ करते हैं। हरमन है की एक किताब सिद्धार्थ है। ये सब किताबें हैं जो बुद्ध के बारे में
बड़ी प्रामाणिक है। इन सबके बेस पर बुद्ध की कहानी दुनिया भर में समझी जाती है। तो हम इन्हीं सबको दिमाग में रखकर बुद्ध की
कहानी की बात करने वाले हैं। चलिए देखिए फिलॉसफी का एक सूत्र है। मेरा अपना सूत्र तो ये है।
आपको किसी भी समय के किसी भी फिलॉसफर को समझना हो उस समय की परिस्थितियां थोड़ा समझ लीजिए। आप पाएंगे वो फिलॉसफर वही
बोलेगा जो उसकी परिस्थितियां उसे बुलवा रही होगी। इतना ही नहीं अगर आपकी परिस्थितियां किसी को पूरी ज्ञात हो तो आप
लगभग वही बोलेंगे जो कोई समझदार व्यक्ति कल्पना कर सकता है कि इन परिस्थितियों में कोई क्या बोलेगा।
तो बुध के काल में बुध का समय आपको पता है सिक्स्थ सेंचुरी बीसी का था तो उस समय कौन सी ऐसी परिस्थितियां थी आपने हिस्ट्री में
खूब पढ़ा हुआ है। हल्का सा रिवाइज कर लेते हैं। मोटी-मोटी तीन चार बातें ताकि आपको ध्यान रहे। सिक्स्थ सेंचुरी बीसी में
आर्थिक परिस्थितियों में आपको पता है कि कृषि कार्य में पहली बार लोहे का प्रयोग बड़े पैमाने पर होना शुरू हुआ था।
और लोहे का प्रयोग होने से सबसे पहले एक दो परिणाम क्या हुए थे? एक तो खेती की जमीन बढ़ गई थी। क्योंकि अब काट सकते हैं
जंगलों को। है ना? और दूसरा लोहे का फल यूज़ करने लगे तो उससे जमीन की उत्पादकता बढ़ गई थी। तो जमीन भी बढ़ गई। जमीन की
उत्पादकता भी बढ़ गई। गंगा यमुना के आसपास सब सारा काम कर रहे हैं। पानी है ही जमीन में सिंचाई होती ही है। और इसलिए कुल मिला
के जो उत्पादन है कृषि का बहुत ज्यादा बढ़ गया है। कृषि जैसे किसी समाज में शुरू होती है ना
पहली बार परमानेंट सेटलमेंट होना शुरू होता है। वरना लोग तो खाना बदोश होते हैं। अब कृषि है तो लोग स्थाई रूप से रहने लग
जाते हैं। वही बस जाते हैं। घर बनाने लगते हैं, गांव बनाने लगते हैं। अब यह सब हमारे देश में उत्तर भारत के क्षेत्र में शुरू
हो गया था। अब उत्पादन जब बढ़ा तो सीधी सी बात है उत्पादन बढ़ेगा तो
सरप्लस बचेगा यानी कि अधिशेष बचेगा। अधिशेष का मतलब यह है कि जो हमने कंज्यूम किया उसके बाद बहुत
सारा बच गया है। जब बहुत सारा बच गया है। इस किसान के पास चावल बचा है। उस किसान के पास मान लीजिए गेहूं बच गया है। उसके पास
बाजरा बच गया है। उसके पास कपास बच गया है। तो ये क्या करेंगे? या तो बॉर्डर करेंगे या चाहेंगे ऐसे सेंटर्स बने जहां
पर खरीद बेच हो सके। वह सेंटर्स जो बनेंगे उसको हम क्या बोलते हैं? अर्बन सेंटर्स बोलते हैं। तो जिसको हम भारत के इतिहास का
सेकंड अर्बनाइजेशन कहते हैं वह इस समय होना शुरू हुआ और शहर बनने शुरू हो गए। उन शहरों में बाजार बनने शुरू हो गए। उन
बाजारों में लेनदेन होना शुरू हुआ। खरीद फरोख्त होनी शुरू हुई, बेचना शुरू हुआ। और जब खरीदना बेचना होगा एक समय तक बार
सिस्टम या विनिमय पद्धति से काम चल जाता है पर एक समय के बाद नहीं चलता है। भाई आप चावल ले घूम रहे हैं और जो बेच रहे हैं वो
भी चावल ले घूम रहा है। सब चावल ले घूम रहे हैं। तो कैसे व्यापार होगा? तो अंत में फिर होता है कि कोई एक ऐसा सांकेतिक
वस्तु हमारे पास हो जिसकी मदद से हम व्यापार कर सके और इसको बोलते हैं मुद्रा और इसी समय मौद्रिक अर्थव्यवस्था की
शुरुआत भारतीय इतिहास में होनी शुरू हुई तो बुद्ध का समय इकोनॉमिक्स की दृष्टि से बहुत ही तूफानी समय था। पहली बार सरप्लस
पहली बार अमीरी बड़े-बड़े शहर शहरों में रंगशालाएं नृत्यशालाएं ये वो बहुत सारे पब वो सब बनने शुरू हो गए थे। युवा लोग एकदम
मस्त हुए पड़ रहे थे कि शहर में जो बात है वो बात गांव में थोड़ी ना होती है और मुद्रा भी आ गई थी लोग मुद्राएं ले ले घूम
रहे हैं और यह एक नया माहौल था जैसे कोई नया शहर डेवलप होता है ना सिंगापुर जैसे डेवलप हुआ 30 40 साल में दुबई हुआ 20 30
साल में तो वहां के जो लोग शुरू में थे और 30 साल बाद जब वो देखते होंगे अंतर क्या है कुछ कुछ वैसा अंतर यहां के समाज को उस
समय दिख रहा होगा अभी मान सकते हैं राजनीतिक परिस्थितियां ये थी कि आपने एक शब्द सुना होगा महाजनपद पद
ऋग्वेद के जमाने में छोटा इलाका था तो उज्ज था। लेटर वैदिक में थोड़ा बड़ा हुआ तो उसका नाम जनपद हो गया। अब जनपद को और
बड़ा करना था तो वो क्या हो गया? महाजनपद हो गया। जनपद का मतलब जिला होता है। आजकल बोलते हैं उत्तर प्रदेश में कि इस जनपद
में [गला साफ़ करने की आवाज़] एसपी साहब बन गए हैं। उस जनपद में डीएम साहब बने हैं। तो जनपद तो आज भी होता है। महाजनपद
का मोटा-मोटा मत समझ रेंज या कमिश्नरी समझ लीजिए कि जैसे इलाहाबाद एक कमिश्नरेट है उसके आसपास तीन चार जिले मिला के हो जाएगा
महाजनपद हो जाएगा तो महाजनपद का मतलब आजकल का डीआईजी जो होता है ना डीआईजी के पास जितना इलाका है तीन या चार जिले उसको
बोलते हैं महाजनपद लगभग कुछ वैसा तो करीब 16 महाजनपद उस समय बन चुके थे और महाजनपद क्यों बन रहे थे कैसे बन रहे थे
बहुत सिंपल सी बात है इनमें से अधिकांश में राजतंत्र था कहीं-कहीं इनमें गणतंत्र की व्यवस्था भी थी। जहां पर थोड़ा सा
सिस्टम डेमोक्रेटिक हो गया था। राजाओं की शक्तियां बढ़ रही थी। क्यों बढ़ रही थी? सिंपल सी बात है। आमतौर पर इकोनॉमिक्स से
ही चीजें डिसाइड होती है काफी हद तक। यहां भी दिख रहा था। जब अधिशेष उत्पादन हुआ, खूब खरीद बेच होने लगा, नगर बनने लगे। जब
आर्थिक क्रियाएं बहुत ज्यादा होंगी तो उससे क्या होगा? कर मिलेगा। कर आएगा तो राजस्व बढ़ेगा। राजस्व बढ़ेगा तो जो राज का
कोष है वह बढ़ेगा। कोष बढ़ेगा तो राजा कहां खर्च करेगा? सेना पर खर्च कर सकता है। वो हथियारों पर खर्च कर सकता है। आयुष पर
खर्च कर सकता है। और जैसे-जैसे सेना और हथियार बढ़ेंगे वैसे-वैसे वो क्या बन जाएगा? डोनाल्ड ट्रंप बन जाएगा। कि सारी
दुनिया का मालिक मैं हूं। बादशाह मैं हूं। जिसको मन करेगा मार दूंगा। भाई ऐसी ताकत बढ़ती है ना। जनपद से महाजनपद बनना और
अमेरिका का यह कहना कि ग्रीनलैंड भी हमारा है, वेनेजुएला भी हमारा है, ईरान भी हमारा है। इसमें कोई अंतर थोड़ी ना है। सत्ता
जितनी बड़ी होती जाती है और सत्ता के पास जितने संसाधन इकट्ठे होते हैं, सत्ता चाहती है और बढ़ जाऊं मैं। आज से 100 साल
बाद मंगल ग्रह पर युद्ध होंगे कि मंगल का यह इलाका मेरा है, यह इलाका तेरा है। क्योंकि भूख कहां खत्म होती है और उस तरह
से उस समय राजा बड़े हो रहे हैं, ताकतवर हो रहे हैं और उनके बीच में संघर्ष दिख रहा है। और महाजनपद के समय में एक नया सा
ट्रेंड है हमारे पॉलिटिकल सिस्टम का जिसका असर यहां दिखेगा। यह महाजनपदों का छोटा सा एक नक्शा है। आप लोग तो जानते ही हैं।
कहने की बात नहीं है। यह जो है हमारा उत्तर भारत है। उत्तर भारत में मोटे तौर पर जिन जगहों पर बुद्ध का संबंध रहा। अगर
मैं उनकी बात करूं यह मगध है। मगध में कौन था राजा? उस समय बिमसार था। है ना? जिसका बेटा अजात शत्रु होगा जो अपने बाप को ही
मार देगा। है ना? यह जो वजी है वजी की राजधानी थी वैशाली अगर आप पटना से जाएंगे थोड़ा सा
हाजीपुर की तरफ बढ़ेंगे आगे तो वैशाली आज भी आता है वो वैशाली है वो वजी जो था गणतंत्र उसका इलाका था मल्य का मतलब आज का
हो गया गोरखपुर तो जो कुशीनगर है जहां बुद्ध की मृत्यु हुई वो मल इलाके में आता था लेकिन आजकल जो गोरखपुर के आसपास का
इलाका है उसको आप कह सकते हैं कि मल महाजनपद था। कौशल महाजनपद का मतलब कौशल तो कौशल्या का इलाका अयोध्या। अयोध्या उसे
केंद्र में है। लेकिन उस समय जो कौशल था उसकी राजधानी कौन सा शहर था? श्रावस्ती थी। तो श्रावस्ती या सावथी बोलते थे वाली
भाषा में। तो जब भी मैं श्रावस्ती या कौशल बोलूं आप इसका ध्यान रख लीजिएगा। और कौशल के उस समय जो राजा थे उनका नाम था
प्रसेनजीत। इनका जिक्र बहुत ज्यादा आएगा क्योंकि बुद्ध के जीवन पर इनका बहुत प्रभाव है
प्रसनजीत का तो ध्यान रखना कौशल मतलब प्रसजीत का इलाका श्रावस्ती उनकी राजधानी है प्रसनजीत का एक बेटा भी है जिसका नाम
है जेत उसका नाम भी आएगा जेतवन सुना है कभी आप लोगों ने तो जेतवन किसका था बेसिकली जेत का था यहां
से बना है तो प्रसन्न जेत का बेटा जेत जिसका जिक्र कहानी के दूसरे हिस्से में आएगा
इधर काशी तो समझ ले कि यहां पर एक जगह थी सारनाथ। वाराणसी तो है ही। सारनाथ ऐसी जगह जहां पर इनका लिंक रहा। मगध साम्राज्य के
दो इलाके बड़े महत्वपूर्ण है। एक है राजगीर और एक इलाका है गया। वही गया जिसका नाम बाद में हो गया। बोधगया क्योंकि वहां
बोध ही मिली। तो गया और राजगीर ये थे मगध में। बदजी में वैशाली हो गया। वैशाली में जो समुदाय काम करता था उसको लिच्छवी कहते
थे। तो लच्छवियों का शासन तंत्र यहां पर चलता था। कुशीनगर में मल्लों का ही था। तो आज
का गोरखपुर इसे ध्यान रखिए। ये पांच छह है। हालांकि उनकी यात्रा तो और भी हुई आगे वही कुर तक भी हुई लेकिन मुख्य रूप से
बुद्ध के पूरे जीवन का संबंध इन पांच छह जगहों से रहा। तो इनहीं को हम मुख्य रूप से ध्यान रखेंगे।
अब यह है कि उस समय धर्म की दुनिया में ऐसा क्या हुआ कि अचानक इतने बड़े परिवर्तन हो गए। सारा खेल इकोनॉमिक्स का है,
पॉलिटिक्स का है। सब वहीं से पैदा हो रहा है? कैसे पैदा हो रहा है? आपको पता है कि उस समय हमारे देश में जो
वैदिक व्यवस्था थी जैसे कुछ लोग बोलते हैं ब्राह्मणवादी व्यवस्था। क्योंकि हिंदू शब्द तो बहुत बात का है।
उसके पहले उसको वैदिक धर्म या ब्राह्मण धर्म कहने का रिवाज था। उस वैदिक या ब्राह्मणवादी व्यवस्था में
क्या था? एक तो वर्ण व्यवस्था का चलन था और वर्ण व्यवस्था का मतलब क्या है कि मोटे तौर पर चार वर्ण थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य, शूद्र उसी क्रम में समाज में सोपान क्रम में थे। एडजस्टेड थे। तो सीधी सी बात है कि जब भी तीन चार लाइनें बनेंग ऐसी तो
जो नंबर दो, तीन या चार पे होगा उसका मन तो करता ही कि थोड़ा और आगे निकल जाऊं। तो मन करेगा ही करेगा।
दूसरा यह है कि वहां पर उस समय बहुत सारा कर्मकांड का प्रचलन था और कर्मकांड में एक कर्मकांड होता है बलि प्रथा।
तो बलि प्रथा भी खूब चलती थी। इस बात को लेकर कई लोग खुश भी रहते थे कि बलि के नाम पे खाने को मिल जाता है। लेकिन कई लोगों
को उससे नुकसान होता था। नुकसान किसको था भी समझते हैं इस चीज को। चौथी एक चीज आपने पता नहीं कभी गौर की है
या नहीं की है। आपने ये सुना कि कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट का झगड़ा हुआ था यूरोप के इतिहास में। सुना है? जिन मुद्दों को लेकर
झगड़ा हुआ था उनमें से एक मुद्दा यह था। कि कैथोलिक लोग मानते थे कि पैसा ब्याज पर देना एक पाप है
और पैसा कमाना भी अपने आप में एक पाप ही है क्योंकि आपको जीवन मिला है केवल धार्मिक काम करने के लिए चुपचाप धार्मिक
काम करते रहो ज्यादा से ज्यादा छुट्टियां रखो होली यानी कि हॉलिडे छुट्टी के दिन यानी पवित्र दिन भगवान की पूजा करते रहो
जिंदा रहने भर के कमाते रहो ज्यादा इस चक्कर में नहीं पड़ना है यह असली जीवन नहीं असली जीवन वहां है लौटना है वहां
भगवान के पास। प्रोटेस्टेंट लोगों ने कहा ना भाई ना हम तो कमाएंगे व्यापार भी करेंगे।
उसके पहले हालत ये थी कि जो लोग व्यापार करते थे उनका समाज में इतना अपमान होता था। जो धनी होते थे उनका इतना अपमान होता
था कि धन कमाने की अमीर बनने की समाज के आर्थिक योगदान में भूमिका निभाने की प्रेरणा खत्म हो जाती थी। प्रोटेस्टेंट्स
ने कहा हम तो प्रोटेस्ट करेंगे। हमें यह सब समझ में नहीं आता है। हम तो मानते हैं कि अगर भगवान ने आपको अमीर बनाने की योजना
बनाई है तो आपके पास पैसा आएगा। कॉलिंग बोलते हैं इसको। एक केल्विन थे जॉन केल्विन उनका कांसेप्ट है। कोई अमीर है तो
समझ लो कि भगवान ने इसको विशेष आशीर्वाद दिए हैं और अमीर होने में निहित है कि आशीर्वाद का मतलब यह भी है कि शायद मरने
के बाद भी आशीर्वाद मिलने वाला है। तो जो यहां जितना अमीर है उतनी ही संभावना है कि स्वर्ग मिलेगा उसको। यह कहती मामला उल्टा
हो गया। अब लोग अमीर होने के लिए प्रयास करने लगे। यहां से पूंजीवाद का विकास हो गया।
पारंपरिक व्यवस्था जो हमारे देश में थी उसमें यह था कि ब्राह्मण और क्षत्रिय ऊपर थे। यानी ज्ञान सबसे ऊपर है। जो सैनिक
वाली प्रवृत्ति है, क्षत्रिय प्रवृत्ति है, क्षत्र धर्म है, वह नंबर दो पर है। जो वणिक वृत्त है, धन कमाने की वृत्ति है, वो
नंबर तीन पे है। केवल शूद्र से ऊपर है। क्योंकि शूद्र तो बहुत बुरी स्थिति में है। और इसका मतलब यह हुआ कि जो धन कमाने
वाला व्यक्ति है, उसका बहुत ही अपमान था। धन का अपमान बहुत ज्यादा था। इस बात से कुछ लोग परेशान थे। और जो लोग
परेशान थे उनमें से एक का नाम शायद आपने सुना हो। कभी इतिहास में नाम सुना है अनाथ पिंडक नाम के एक आदमी का नहीं सुना कोई
बात नहीं अब सुनाते हैं आपको नाम अभी तो सुन ही लिया है ना तो अभी बहुत इंटरेस्टिंग व्यक्ति था उसी कहानी थोड़ी
देर में आपके सामने आठ 10 ऐसे इंटरेस्टिंग कररेक्टर्स आएंगे जिन्होंने बुद्ध के जीवन को काफी प्रभावित किया उनमें से एक
व्यक्ति ये भी था अब इस नई व्यवस्था में क्या हो रहा था नई व्यवस्था में अचानक क्या हुआ जब कृषि बढ़ी व्यापार बढ़ा तो जब
व्यापार बहुत ज्यादा बढ़ा तो व्यापार बढ़ने के मामले में कौन से वर्ग को ज्यादा फायदा हो रहा था? वैश्य वर्ग को वो अमीर
हो रहे थे। क्योंकि पैसा कमाने के मामले में उनकी जो परंपरा थी वो महारत हासिल थी उसके पास। फिर जब राजा के पास खूब पैसा
आने लगा, सेना बड़ी होने लगी, हथियार बढ़ने लगे। तो सेना के बढ़ने से किस वर्ग को फायदा होने लगा? क्षत्रिय वर्ग को
फायदा होने लगा। और जब क्षत्रिय और वैश्य दोनों वर्गों को फायदा हुआ तो इनको लगने लगा कि भाई जब हम
इतना कुछ कर रहे हैं समाज के लिए तो हमारा सम्मान ज्यादा क्यों नहीं होता है? धर्म की दुनिया में हमारी भूमिका क्यों
नहीं है? और यह यूं ही नहीं हो रहा कि उस समय के सबसे महत्वपूर्ण दो धर्म जैन और बौद्ध
दोनों के प्रवर्तक क्षत्रिय वर्ग से आते हैं। और इसका मतलब यह है कि शायद इन वर्गों में
यह प्रेरणा थी कि अब हमें धर्म की दुनिया में भी सम्मान ये दुनिया भर में कांसेप्ट है। इसको बोलते हैं स्टेटस इनकंसिस्टेंसी
से स्टेटस कंसिस्टेंसी की ओर जाना। अगर आप अमीर हैं, ताकत राजनीति में ज्यादा है पर समाज में सम्मान नहीं है। आप इतना बेचैन
रहेंगे समाज में सम्मान हासिल करने के लिए कि सारी ताकत व छोड़ देंगे अपनी ताकि तीनों स्टेटस बराबर हो जाए।
अब इनको लग रहा है कि पैसा है, ताकत है पर धर्म की दुनिया में सम्मान नहीं है। और इसलिए वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध एक माहौल
बन रहा है और आप देखेंगे कि उस दौर में एक परंपरा शुरू हुई जिस परंपरा को बोलते हैं श्रमण परंपरा। ये नाम तो सुना होगा आप
लोगों ने। है ना? अब इसका जिक्र करेंगे। श्रमण परंपरा का बेसिक मतलब है जिन्होंने श्रम के माध्यम से धर्म की दुनिया में नया
प्रयास किया। वह श्रमण कहलाता है। श्रमण परंपरा पहली कोशिश कर रही है वर्ण व्यवस्था को कमजोर करने की क्योंकि वर्ण
व्यवस्था की वजह से इन वर्गों को बहुत मौका नहीं मिल पा रहा। दूसरा क्या कर रही है? बलि प्रथा।
मैंने कहीं पढ़ा कि उस समय जो बड़े यज्ञ होते थे छोटे में तो नहीं होता होगा लेकिन कोई बड़ा यज्ञ है। और बहुत बड़े यज्ञ में
राजा को या किसी अमीर वाली को बहुत ज्यादा पुण्य चाहिए। बहुत पुण्य चाहिए तो क्या करना पड़ेगा? 1000 या 10,000 बैल काटने
पड़ेंगे। जितने बैल काटोगे उतना पुण्य मिलेगा। अब दिक्कत है कि जो खेती करने वाले लोग हैं
उनको बहुत टेंशन होती है। जैसे ही कोई बैल जाता है उनको लगता है अरे भाई मर गए। उनको बैलों से मोहब्बत है। ऐसा नहीं है। उनको
हल जोतने के लिए बैल चाहिए। अमेरिका में अगर आपने अब्राहम लिंकन का इतिहास पढ़ा हो अमेरिकी क्रांति का।
उनको दासों की मुक्ति से इमोशनल मतलब कितना था हमें नहीं पता। पर उत्तर अमेरिका में दासों की जरूरत थी और दक्षिण अमेरिका
के लोग जो खेती प्रधान थे वो दास छोड़ने को तैयार नहीं थे। उत्तर अमेरिका को मजदूर चाहिए थे और मजदूर कहां से आएंगे? दास
प्रथा खत्म होगी तो दास लोग मजदूर बनके वहां जाएंगे। दास प्रथा खत्म ना हो। यह दक्षिण अमेरिका पूरी ताकत लगा रहा था। इस
चक्कर में अमेरिका के सात राज्य एक अलग देश बनाते हैं। गृह युद्ध चलता है पांच छ साल तक। उसके बाद जाकर फिर अमेरिका वापस
एक देश बनता है। ऐसे यहां भी चल रहा है। तो कृषि के लिए चाहिए कि पशु बलि खत्म हो। इसलिए आप देखेंगे कि चाहे बौद्ध धर्म हो,
चाहे जैन धर्म हो ये सारे अचानक अहिंसा की बात कर रहे हैं। अहिंसा केवल इसलिए नहीं है कि उनके अंदर
बहुत दया, करुणा है। वो तो एक पक्ष है ही। उस समय की इकॉनमी की जरूरत है कि अहिंसा हो ताकि कृषि के विकास में पशुओं की शक्ति
का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जा सके। और अंतिम समस्या यह कि धन कमाना अपने आप में क्या निम्न कर्म है या उसको अच्छा
कर्म माना जा सकता है। आप देखेंगे कि इन नए धर्मों ने अगर मैं जैन धर्म की बात करूं। जैन धर्म
ने एक ऐसी बात बोली कि जैन धर्म की संख्या भारत में लगभग सबसे कम है। 4050 लाख लोग हैं सिर्फ जैन धर्म को मानने वाले। एक
करोड़ भी नहीं है। 40 से 50 लाख दुनिया भर में 80 लाख है। लगभग और उन 50 लाख की आर्थिक स्थिति देखेंगे ना
तो वो 50 करोड़ पे भारी पड़ते हैं। इतना समृद्ध धर्म है। इतना समृद्ध समुदाय है।
किसी का सरनेम जैन हो तो आप अस्यूम कर सकते हैं आमतौर पे कि अमीर ही होगा। क्योंकि उन्होंने इतना इतने लंबे समय में
ऐसी परंपरा डेवलप कर रखी। कैसे हुआ? एक तो वह वैश्य समुदाय से जुड़े हुए थे। इसलिए आज भी आप देखेंगे कि जैनों में, अग्रवालों
में, गुप्ता में आप शादियां खूब होती है क्योंकि वो एक ही परंपरा से जुड़े हैं। यह बात सब मानते हैं। दूसरा
महावीर ने ये कहा कि देखो भाई हिंसा बहुत बुरी बात है। बुद्ध ने हिंसा को उतना बुरा नहीं बताया। महावीर ने ज्यादा बुरा बताया।
लोगों ने पूछा कि जब खेती करते हैं उसमें भी कीड़े-मकोड़े मरते हैं। स्पष्ट रूप से घोषणा तो नहीं की गई लेकिन
एक संकेत मिलता है कि जैन धर्म ने कहा कि भाई खेती में हिंसा होती है। ज्यादा अच्छा है कि व्यवसाय करो, व्यापार करो, खेती मत
करो। आपको जैन धर्म में खेती करने वाले लोग बहुत कम मिलेंगे। मिलेंगे भी तो एग्रीटेक
वाले मिल सकते हैं। आज की दुनिया में स्टार्टअप किया है एग्रीकल्चर का वो अलग चीज है। किसान नहीं मिलेंगे, उद्यमी
मिलेंगे, व्यापारी मिलेंगे और इस वजह से व्यापार व्यवसाय इतना समृद्ध हुआ कि जैन परिवारों में आर्थिक समृद्धि
बहुत ज्यादा आ गई। अब इनको चाहिए कि समाज का ऐसा ढांचा चाहिए जो पैसा कमाने को बुरा ना कहता हो, नीच
कर्म ना कहता हो। बुद्ध ने क्या किया? बुद्ध से लोगों ने पूछा। बुद्ध ने कहा देखो भाई सम्यक
आजीविका होनी चाहिए और सम्यक आजीविका में कुछ भी हो सकता है। आप जो भी काम करते हैं बस सम्यक तरीके से उचित तरीके से करवाते।
अष्टांगिक मार्ग में एक आता है सम्यक आजीविका। एक सम्यक कर्मांतक भी आता है। है ना?
अब ये बात समझाने का तरीका क्या है? एक व्यक्ति का नाम लेता हूं जिसका नाम है अनाथ पिंडक। मैंने अभी इसका जिक्र किया
था। आगे इसकी कहानी आएगी ही। ठीक तरीके से पर यह उन लोगों में है जो बुद्ध के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अगर 101 लोग ढूंढ रहे
हैं उनमें से एक व्यक्ति अनास पिंडक थे अनास पिंडक का अस नाम सुदत्त था सुदत्त और ये बहुत बड़े सेठ थे बहुत ही बड़ा कहां के
श्रावस्ती के श्रावस्ती का मतलब कौन सा कौशल है ना कौशल गणराज्य में या महाजनपद में
समझ लीजिए कि नगर के सबसे बड़े सेठ थे और जब पहली बार यह बुद्ध से मिले इन्होंने पता है क्या सवाल पूछा?
इन्होंने कहा कि हे महात्मा मैं जानता हूं कि जीवन में सबसे अच्छा काम है प्रवृज धारण करके सन्यासी हो जाना।
मैं जानता हूं कि जितना सुख आपको मिलता होगा सन्यासी होने से उतना सुख किसी और को नहीं मिलता होगा। मेरे जैसे लोगों को तो
नहीं मिल सकता। पर दुविधा यह है कि मेरे अधीन कई 100 लोग नौकरी करते हैं।
उनका और उनके परिवारों का जीवन मुझ पर टिका हुआ है। मेरे पास बहुत ज्यादा संपत्ति है। वो
संपत्ति गलत हाथ में चली गई। उसका दुरुपयोग भी हो सकता है। मैं तो बहुत मदद करता हूं समाज की तो चला रहा हूं।
मेरी दुविधा ये है कि क्या मैं ये सब छोड़ के भिक्षुक बन जाऊं? आपके पास आ जाऊं। और बुद्ध ने कहा नहीं
आपको दुविधा इसलिए है क्योंकि आपके मन में बैठा हुआ है कि धनी होना बुरा होना बुरा धनी होना नहीं
बुरा धन को अपनी चेतना पर हावी होने देना है। सबसे अच्छे लोग वो हैं जिनके पास धन है,
संपदा है किंतु उनकी चेतना पर हावी नहीं है। और वह अपनी संपत्ति को, अपनी संपदा को
समाज के हित में इस्तेमाल करते हैं। इसलिए आपके लिए भिक्षुक बनने से ज्यादा अच्छा है और समाज के लिए भी अच्छा है कि
आप व्यापारी ही रहें, सेठ ही रहें और अपने पैसे का इस्तेमाल समाज के हित में करते रहे। ठीक वही विचार जो आगे चलकर महात्मा
गांधी ने ट्रस्टीशिप के नाम से दिया। और महात्मा गांधी कहते भी हैं कि मेरे विचारों पर जैन धर्म की बड़ी भूमिका है।
मतलब जैनों की बौद्धों की एक और अंग्रेजी विचारक थे इस वाले मामले में जॉन रस्किन अंटोदास नाम से किताब थी उसकी भूमिका भी
इसने तो जो नए धर्म उभर रहे हैं इसलिए उभर रहे हैं क्योंकि समाज बदल रहा है। समाज को इन
चीजों से बचने के लिए नई परंपराएं चाहिए और इसलिए वर्ण व्यवस्था को कमजोर करने वाले यज्ञ में पशु बलि को कमजोर करने वाले
धनी व्यक्ति को सम्मान देने वाले इस तरह के धार्मिक जो मार्ग हैं उनकी डिमांड उस समय समाज में है और उस समय समाज में आपको
शायद अंदाजा होगा कि 62 ऐसे आंदोलनों का जिक्र मिलता है जो श्रमण आंदोलन थे 62 परंपराएं
उन 62 परंपराओं में सात प्रसिद्ध हुए। उन सात में से एक खुद बुद्ध ही थे। उनका जिक्र तो हम नहीं करेंगे अलग से। तो सात
में से अगर बुद्ध को छोड़ दे तो कितने बचे? छह। छह ऐसी परंपराएं हैं जो बुद्ध के समानांतर महत्वपूर्ण चल रही थी। जिनका नाम
आपको पता होना चाहिए और हो सकता है कभी इन पर कोई सवाल आपसे पूछ भी ले कि कौन थे? एक तो थे निगंठ नाथ पुत्र और निगंठनाथ
पुत्र का मतलब कुछ नहीं है। यह दूसरा नाम है वर्धमान महावीर के लिए। वर्धमान महावीर का ही दूसरा नाम क्या था? निगंठ
नाथ पुत्र। निगंठ का मतलब निरग्रंथ। जिसने अपनी ग्रंथियां खोल दी हो, जिसने गांठे खोल दी हो तो निरग्रंथ शब्द से बनता है
निगंठ नाथ पुत्र। नाथ पुत्र। तो जैन धर्म आप जानते हैं क्या-क्या मानते। जैन धर्म का मूल सिद्धांत क्या था?
एक तो अहिंसा है ही। आपने एक शब्द सुना है स्यादवाद। तो कभी अगर पूछ ले परीक्षा में कि
स्यादवाद क्या होता है? तो जैन धर्म से जुड़ा होता है। ठीक है? एक इनका सिद्धांत है अनेकांतवाद।
यह भी आपने सुना ही होगा। सुना ही होगा। पता तो नहीं होगा। अनेकांतवाद जानते हैं अनेकांतवाद का बेसिक
मतलब है कि दुनिया में बहुत तरह की वस्तुएं सबका अस्तित्व है। स्यादवाद का मतलब है कि कुछ भी कहो तो इस तरह से कहो
कि हां मेरी राय में सच है। मैं गलत भी हो सकता हूं। इस विनम्रता के साथ बात करेंगे तो स्यादवा होगा। एक आपने शब्द सुना कि
परषण पर्व पे माफी मांगने का रिवाज है। साल में एक बार मिच्छामि दुक्कड़म। यह मिच्छामी जो क्रम हमारे आज की कल्चर में
जिस तरह से महत्वपूर्ण हो रहा है आईएस की परीक्षा में सवाल आ जाए तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा।
मिच्छामि दुकणम मिथ्या में दुष्कृतम संस्कृत में यह था उसको जब प्राकृत में किया गया तो बन गया मिथ्याम दुखम इसका
मतलब अगर मुझसे पिछले एक साल में मतलब इसमें एक साल की बात नहीं है सामान्य बात है अगर मुझसे मन वचन कर्म से कोई गलती हुई
है आपके प्रति तो मैं उसके लिए माफी चाहता हूं तो मैं अपनी गलतियों के लिए क्षमा चाहता हूं इसको बोलते हैं मिच्छामि दुकणम
एक पर्व होता है जैनों का पर्युषण पर्व के भीतर एक विशेष दिन सारे सारे जैन लोग एक दूसरे को ये मैसेज भेजते हैं या कहते हैं
कि भाई माफ कर देना। नॉन जैन को भी कहते हैं माफ कर देना ताकि जो भी गलतफहमियां है दूर हो जाए। एक व्यक्ति था मक्खली गोशाल।
इसका जिक्र आपने इतिहास में जरूर पढ़ा होगा। मखली गोशाल छ साल तक
महावीर के साथ ही तपस्या कर रहा था। उसी रास्ते पर चल रहा था। दोनों का रास्ता समान था। महावीर बहुत ज्यादा वैराग्य वाले
व्यक्ति थे कि वासना, सुख, इच्छा, लेश मात्र भी अगर हमारे मन में आती है तो हम साधना के रास्ते से हट जाते हैं।
मखली गोसाई को दो बातों पर दिक्कत हुई। एक तो ये कि बीच में ऐसा हुआ कि एक स्त्री के प्रति इनके मन में आसक्ति आ गई।
और जैसे स्त्री के प्रति आसक्ति आई महावीर ने कहा भाग यहां से। भाई ये कोई बात हुई जब आप एक ऐसे रास्ते
पर चल रहे हैं जिसमें ये सब अलाउड नहीं है और आपके मन में आसक्ति का भाव आ रहा है तो आज की पीढ़ी तो मखली गोशाल बनने के मूड
में ज्यादा रहेगी सीधी सी बात है बहुत मुश्किल है उस रास्ते पर चलना जिस पर महावीर चले पर इस बात पे डिस्प्यूट हुआ और
मखली गोशाल अच्छा मखली गोशाल को भगा दिया गया है वो खुद छोड़ के चले गए दोनों परंपराओं के लोग अपने हिसाब से बोलते हैं
मखली गोशाल की एक और बात थी इनका संप्रदाय था अधिवकवाद और इनका विचार था नियतिवाद। नियतिवाद को अंग्रेजी में बोलते हैं
डिटरर्मिनिज्म। डिटरमिनिज्म वो है जो व्यक्ति निराश होने के बाद फॉलो करने लगता है। जैसे आप अगर
सफल हो जाएंगे, आईएएस बन जाएंगे तो आप कहेंगे कि मुझ में ऐसी बात थी ही और यूपीएससी के
बारे में क्या कहेंगे? हीरे की पहचान जोहरी को ही होती है। ढूंढ के हीरा निकाल लिया है। अगर सफल हो गए तो अगर पूरी
तैयारी के बाद भी नहीं हुए और आपके साथ बैठने वाला जो आपके नोट्स लेके पढ़ रहा था हर तरह से आपसे पीछे था वो सिलेक्ट हो
गया। तो फिर आप जिस रास्ते पे जाएंगे उसको बोलते नियति।
आप कहेंगे अरे भाई माथे पे लिखा है तो होगा। माथे पे नहीं लिखा है तो नहीं होगा। कितना
भी पढ़ लो पढ़ पढ़ के मर जाओगे तो भी नहीं होगा। होगा वही हो सोई जो राम रच राखा होगा वही जो लिखा
हुआ है। ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता है। जब ऐसा वाक्य आपकी भाषा में बार-बार आने लग जाए तो आप कौन से वादी
हो गए हैं? नियतिवादी हो गए। तो ये आदमी ये मानता था। और जैन धर्म क्या मानता था? जैन धर्म कर्म सिद्धांत मानता है। कर्म
सिद्धांत मानने का सिंपल सा मतलब है हम जैसा कर्म करेंगे वैसा फल मिलेगा। अगर मेरे कर्म के अनुसार फल मिलेगा तो मैं
नियतिवादी नहीं हो सकता हूं। यदि मैं नियतिवादी हूं तो कर्म सिद्धांत को नहीं मान सकता हूं। हम लोग तो दोनों मान लेते
हैं साथसा कोई दिक्कत नहीं है। सुबह कर्म सिद्धांत मानने शाम को नियतिवादी हो गए। हमारा तो ऐसे चलता रहता है। लेकिन दर्शन
की दुनिया में अगर आप नियतिवादी हैं तो कर्म सिद्धांत नहीं मान सकते। कर्म सिद्धांत को मानेंगे तो नीतिवादी नहीं हो
सकते हैं। तो इस बात पर कंट्राडिक्शन दोनों में ठीक-ठाक था। तो भाई साहब अलग हो गए। गौशाल इसलिए कहते हैं गौशाला में इनकी
परवरिश हुई थी। इसलिए इनका नाम गोशाल पड़ गया था। इस समय का सबसे खतरनाक विचारक जिसका बुद्ध
से बड़ा गहरा संबंध बनने वाला है आगे चलके उसका नाम है संजय बेल्टी पोप या बिलटठी पोत।
ये मानता था ये बात को। अच्छा पश्चिम की दुनिया से अगर कंपैरिजन करना हो ना पश्चिम में एक दार्शनिक हुआ स्पिनोजा
स्पिनोजा पश्चिम का सबसे बड़ा नियतिवादी आदमी है और मखली गौशाल का नियतिवाद स्पिनोजा से कम से कम 2000 साल पहले का है
जो लोग कह दें कि सार दर्शन तो पश्चिम में हुआ है समझ लें नियतिवाद पश्चिम में व्यवस्थित रूप में पहली बार दिखता है हमें
17 18 सेंचुरी में स्पिनोजा में और भी कहीं-कहीं पर उतना स्पष्ट रूप में नहीं और भारत में छठी शताब्दी ईसा पूर्व 22 2300
साल पहले नियतिवाद स्पष्ट रूप में दिख रहा है। अज्ञेयवाद
पश्चिम की दुनिया में अज्ञेयवाद पहली बार ठीक से दिखा है कांट में 18थ सेंचुरी जर्मनी
एक संदेहवाद होता है स्टेप्टिसिज्म वो भी पश्चिम में हालांकि एक पायरो नाम का आदमी था जो ग्रीक फिलॉसफी में इनके आसपास
की बात है लेकिन अदरवाइज ह्यूम वो भी 18 सेंचुरी का आदमी है भारत में बड़े स्पष्ट रूप में हमें
अज्ञेयवाद और संदेहवाद इनके दोनों दर्शन है। संदेहवाद भी है, अज्ञयवाद भी है। अज्ञयवाद यानी एग्नोस्टिसिज्म, संदेहवाद
यानी स्केप्टिसिज्म। अज्ञयवाद का मतलब है कि हम जान ही नहीं सकते। संदेहवाद का मतलब है कितना भी जान लो
संदेह बचा रहता है। पक्का नहीं पता लगता। इनसे कुछ भी पूछ लो। ईश्वर है पता नहीं। आत्मा है पता नहीं। पुनर्जन्म होगा पता
नहीं। कह नहीं सकते। नहीं होगा यह भी नहीं कह सकते और स्वर्ग पता नहीं कह नहीं सकते हर चीज
पर पता नहीं कह नहीं सकते हालांकि दर्शन में सबसे ईमानदार जवाब यही है क्योंकि पता किसी को नहीं है जो कह रहे हैं उनको भी
नहीं पता है वो हाक रहे हैं ये ईमानदारी से कह रहे नहीं पता पर इससे कई लोग बुरा मान जाते हैं कि यार तुमसे पूछने आए थे
तुम भी कह रहे हो पता नहीं तो पता नहीं तो हम भी थे तो फिर हम में और तुम में अंतर क्या हुआ तुम फिलोसफर और हम आम आदमी तब भी
दोनों का उत्तर एक जैसा ही है। तो वो समझाना चाह रहे हैं कि तुम्हें कुछ भी नहीं पता। मुझे यह पता है कि दुनिया में
किस-किस ने क्या-क्या कहा है और उसके बाद कह रहा हूं कि अंततः किसी को कुछ नहीं पता। तो मुझे तुमसे बहुत ज्यादा पता है पर
अंततः मुझे भी नहीं पता है। अंतर है दोनों में। पर वो आम आदमी ना फाइनल बताओ है कि नहीं है। आप बताएंगे हां भगवान है। हां अब
बात हुई ना? तो संजय विठी पुत्र का संबंध बुद्ध से ज्यादा क्यों बनता है? क्योंकि दो ऐसे व्यक्ति थे बुद्ध के शिष्यों में
सबसे महत्वपूर्ण जो शिष्य था उसका नाम था सारी पुत्र इनका नाम कभी आया आपके सामने आया कभी
हां सारी पुत्र सारी पुत्र संजय विलठी पुत्र का शिष्य था और वहां से बुद्ध के पास आया था और संजय
बिलठी पुत्र बिल्कुल नहीं चाहते थे लेकिन उसके बाद भी सारी पुत्र आए और जब देवदत्त नाम के एक व्यक्ति ने जो कि
बुद्ध का फुफेरा भाई था उसने साजिश की बुद्धि के खिलाफ तब भी सारी पुत्र ने ही बौद्ध संघ को उस साजिश से बचाया था। सारी
पुत्र का जो बेस्ट फ्रेंड था उसका नाम था मोगल्यायन। अगर आपने सारी पुत्र का नाम सुना है तो
इसका नाम भी सुना होगा क्योंकि ये दोनों जय और वीरू जैसे थे। जय वीरू कौन है? पर दो ऐसे दोस्त जो हमेशा साथ-साथ पाए
जाएंगे। अलग होंगे ही नहीं। उस तरह के दोस्त थे। तो सारी पुत्र और मुगल लयन यह दोनों संजय विठी पुत्र के शिष्य थे और
दोनों एक साथ बुद्ध के पास आए थे। दोनों की मृत्यु भी लगभग एक साथ हुई एक ही साल में लेकिन अलग कारणों से मुगल इनकी हत्या
हो गई थी। सारे पुत्र ने अपनी इच्छा से परिनिर्वाण लिया था। बुद्ध की अनुमति लेने के बाद भी। ये तीन और है जिनका बहुत महत्व
नहीं है। केवल नाम आप ध्यान रख लीजिए कि कौन है। एक पूर्ण कश्यप साहब थे। यह अक्रिय बात का मतलब है कर्म सिद्धांत
को नहीं मानते थे और इनका मानना था कर्म सिद्धांत कुछ नहीं होता है। पाप करो, पुण्य करो सब बेगाड़ की
बातें हैं। कुछ भी करते रहो कोई फलवल नहीं मिलता है। चोरी करो मौज में रहो। कौन देख रहा है? तो कर्म सिद्धांत को पूरी तरह से
खारिज करने वाला जो व्यक्ति था वह पूर्ण कसब था और इससे बुद्ध बहुत नाराज रहते थे क्योंकि इससे समाज में अनैतिकता फैलने का
खतरा होता था। इस वजह से एक अजित केश कंबली केश कंबली शब्द जब भी आए ध्यान में रखना है जो व्यक्ति केशों से
बना हुआ कंबल पहनता हो केश किसके इंसान के या पशु पक्षियों के किसी के भी हो सकते हैं और केश कंबल पहनने का एक खास मतलब
होता है ऐसा कहते हैं कि केशों के कंबल से गर्मियों में गर्मी बढ़ जाती है। सर्दियों में ठंड बढ़ जाती है। सर्दियों में
ओढ़ेंगे तो और सर्दी लगेगी। गर्मियों में ओढ़ेंगे तो और गर्मी लगेगी। तो यह कंबल इसलिए नहीं होता जिसलिए हम कंबल का
इस्तेमाल करते हैं आम तौर पर यह इसलिए होता है कि हम अपनी क्षमताएं बढ़ा सके। गर्मी सर्दी झेलने की ताकत बढ़ा सके और
गर्मी सर्दी झेलने की ताकत को भारत दर्शक बोलते हैं तितक्षा। ततीक्षा बढ़ा सके। उसके लिए केश कंबल का इस्तेमाल किया जाता
है। अजित केश कंबली मोटे तौर पर आपने एक शब्द सुना होगा चारबाग दर्शन। तो चारवाग दर्शन या लोकायत दर्शन के उस
समय के जो सबसे प्रसिद्ध आचार्य थे वो अजित देश कंपनी थे। यह भारत का पहला संप्रदाय था जो सीधे सीधे
भौतिकवाद की बात करता है और भौतिकवाद का मतलब है देखिए बुद्ध उतने भौतिकवादी नहीं हो पाए हैं। बुद्ध थोड़ा पहले रुक गए हैं।
यह तो एक्सट्रीम पे है और पश्चिम में भी इसके लगभग 100 साल बाद हमें पहला भौतिकवादी
या लगभग सामान्य मान लीजिए जैसे डेमोक्रेटस लुसिफस दिखते हैं फिफ्थ सेंचुरी बीसी के आसपास लेकिन लगभग आप उस
समय कह सकते हैं कि वहां भी हमें कुछ कुछ ऐसे दिख रहे हैं। भौतिकवाद का मतलब है ना आत्मा है ना स्वर्ग है ना नरक है ना मोक्ष
है ना पुनर्जन्म है ना कर्म सिद्धांत है इस जगत के परे कुछ है ही नहीं इस जगत में भी आत्मा नाम की कोई चीज नहीं है इसको
बोलते हैं भौतिकवाद यह पूरा सिद्धांतिकेश कंपनी का था अंतिम आदमी पकुत कक्षायन पकुत कक्षायन का जो सिद्धांत थोड़ा सा अलग टाइप
का था सप्त तत्ववाद कहते हैं अगर आपने पश्चिम में एक आदमी का नाम सुना हो कभी उसका नाम था एनेग्जा गोरस
ग्रीक फिलोसफी में था और यह पकुत कच्चा के लगभग 100 साल बाद हुआ। और खुद हुए सिक्स्थ सेंचुरी बीसी में यह हुआ फिफ्थ सेंचुरी
बीसी में। दोनों का सिद्धांत लगभग सेम है। ये मानते हैं कि संसार में सात चीजें हैं। सात क्या है? पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि।
भौतिकवाद ये मानते थे कि यही चार चीजें हैं। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि। आकाश नहीं मानते, ना यह मानते, ना यह मानते। यह
मानते थे कि इनके अलावा तीन चीज़ें और हैं। एक को बोलते हैं सुख, एक को बोलते हैं दुख, एक को बोलते हैं जीव।
तो ये इनका सिद्धांत था, प्रचलित था। इनका एक प्रसिद्ध वाक्य था। अगर आप तलवार से किसी को काट भी दोगे तो भी कुछ नहीं होगा।
क्योंकि जो सात चीजें हैं वैसी की वैसी रहेंगी। जो मरा है वो तो केवल उन सात चीजों का एक
संयोजन था। अलग हो गया। जैसे टेबल है। आप टेबल काट भी दोगे तो क्या होगा? लकड़ी अलग हो जाएगी। शीशा अलग हो जाएगा। है तो वही
सदा सा। अब ये सुन के काट मत देना किसी को तलवार से कह कि पकत कच्चा ने कहा था तो लेकिन
पकत कच्चा ने एक वाक्य ऐसा बोला बहुत विवादास्पद वाक्य था। लेकिन था कि अगर तलवार से काट भी देंगे तो भी कुछ नहीं
होगा। इन सब की तुलना में चल रहा था। एक वैदिक परंपरा वाला जिसे मैंने कहा कि कुछ कर्मकांड वगैरह चल रहे थे। लेकिन इन
कर्मकांडों के समानांतर अगर आपने फिलोसफी का नाम सुना हो एक शब्द सुना है षट दर्शन जो
भारतीय आस्तिक परंपरा के दर्शन है उनको बोलते हैं षट दर्शन छह दर्शन थे पर उस समय तक छह दर्शन प्रचलित नहीं हुए थे उस समय
उपनिषदों पर काम चल ही रहा था तो उस समय जो दो दर्शन बहुत प्रचलित चल रहे थे उनमें से एक का नाम था सांख्य और एक का नाम था
योग और सांख्य और योग को आमतौर पे जुड़े हुए दर्शन कहते हैं। एसोसिएटेड फिलोसफीस हैं। न्याय वैशेषिक हमें उस समय नजर नहीं
आ रहा है। मीमांसा वेदांत हमें उस समय नजर नहीं आ रहा है। हालांकि वेद है। कुछ उपनिषद भी आ चुके हैं। लेकिन उस समय तक
बहुत बड़े पैमाने पर उस दर्शन का प्रभुत्व दर्शन की दुनिया में नहीं है। पर सांख्य योग चल रहा है। और सांख्य की दुनिया में
और योग की दुनिया में भी कह सकते हैं कि उस समय सबसे बड़ा एक आचार्य हुआ। उस आचार्य से बुद्ध मिले भी थे। उसका नाम था
आलार कलाम। यह नाम कभी सुना है? तो आलार कलाम उस समय का सबसे बड़ा आचार्य
है सांख्य और योग की दुनिया में। आलार कलाम का एक विद्यार्थी था। उसका नाम था भारद्वाज और वो रहता था कपिलवस्तु में ही
जहां बुद्ध जन्म तो लेकिन जहां बुद्ध रहते थे कपिल वस्तु में वहां। तो आचार्य भारद्वाज का
जिक्र आएगा। आलार कलाम का जिक्र आएगा। तो आप समझ जाना कि सांख्य परंपरा की बात चल रही है। सांख्य परंपरा क्या होती है? हम
उस समय थोड़ी समझेंगे। अभी मोटा-मोटा सिर्फ इतना समझ लीजिए और यूं ही चलते-चलते एक बात समझ ले कि जो छठी सेंचुरी बीसी है
इसको दुनिया के इतिहास से बोलते हैं एक्सियल एज वर्ल्ड फिलॉसफी के इतिहास में। दुनिया भर में जितने धर्म जितने दर्शन एक
साथ इस समय पैदा हुए उतने कभी पैदा नहीं हुए। एक झटके में ऐसा लगता है कि पागलपन उस समय दुनिया में आ गया।
अगर आप भारत की बात करें तो मैंने आपसे पहले ही कहा कि भारत में श्रमण आंदोलन चल रहा था और श्रमण आंदोलन में 62 धर्म थे
जिनमें से कम से कम दो तो बहुत ही महत्वपूर्ण आप जानते हैं बौद्ध धर्म और जैन धर्म
अगर आप भारत के पड़ोस में जाएं और चीन की बात करें तो चीन में दो धर्म एक को बोलते हैं कन्फशियस धर्म
और एक को बोलते हैं आपने ताऊ बात सुना ताऊज्म लासे नाम का आदमी
लाजे बोलते हैं। ये दोनों धर्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व में ही विकसित हुए। ठीक उस समय
अगर इसी समय आप चले जाते हैं ग्रीक एरिया में यूनान की तरफ। आपने एक बहुत बड़े दर्शक का नाम सुना होगा
पाइथागोरस। गणित में सुना होगा ना? हां। वो फिलॉसफर भी था। पाइथागोरस ग्रीक
फिलोसफी का लगभग पहला फिलोसफर है। पहला तो नहीं सुक्रा मानते थे। हां वो तो सुकरात से पहले का है। पहले ही मान लीजिए
पाइथागोरस सुकरात से पहले है। और पाइथागोरस ने पुनर्जन्म के सिद्धांत को स्वीकार किया।
वो केवल गणितज्ञ नहीं है कि a² + b² = c² वो वो तो एक चीज है। उसके अलावा भी है भाई वो बहुत दार्शनिक भी था और दार्शनिक के
तौर पे उसने पुनर्जन्म का सिद्धांत पश्चिम की दुनिया के सामने पेश किया और काम किए। पाइथागोरस के अलावा हेरलाइटस आपने अगर
सुना हो अगर आपने एक वाक्य सुना है जो बुद्ध के नाम से प्रचलित है पर बेसिकली था वो हेक्कालाइटस का वाक्य आप एक नदी में दो
बार नहीं नहा सकते सुना है वाक्यस यह वाक्य जिस व्यक्ति का उसका नाम है हेरकलाइटस
ठीक उस समय ग्रीस में हुआ है ठीक यही बात उसने वहां कही ठीक यही बात बुद्ध ने यहां कही इसका चेला हुआ कैटलस वो कुछ दिन बोला
आप एक नदी में एक बार भी नहीं नहा दो बार छोड़ो वो थोड़ा और आगे बढ़ गया और बढ़िया तरीके
से उसने इस बात को एक्सप्लेन भी किया। फेराइटस है एच है ये। ठीक? और जो पूरी वेस्टर्न फिलॉसफी का पहला
फिलॉसफर थालेस या थेल्स बोलते हैं। वो भी सिक्स्थ सेंचुरी बीसी में ही हुआ। आपने अगर पारसी धर्म का नाम सुना हो
परर्शियन रिलजन उसके जो पैगंबर वाली भूमिका में रहे वो थे
जथोस्त्र जस्ट सुना है जस्टनिज्म सुना होगा जिसको फॉलो करते हैं अब तो ईरान के लोग मुसलमान हो गए हैं
लेकिन जो मूल रशिया था टाटा का जो परिवार है वो जिसको फॉलो करता है या साइरस मिस्त्री का जो परिवार है वो जिसको फॉलो
करता है ये कौन है जस्त है जस्त कब हुए विवाद है लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि यह भी छठी शताब्दी से पूर्व में इसी दौर में
हुआ कुछ लोग मानते हैं कि नहीं यह 7 आठ साल पहले हो गए थे लेकिन इसमें डिस्प्यूट है पर बाकी सबके बारे में डिस्प्यूट नहीं
अब यहां से शुरू हो रहा है सीधे-सीधे महात्मा बुद्ध का जीवन यहां तक कि सारी बैकग्राउंड थी तो आप लोग सर्वम दुखम दुखम
सुखम सुखम थोड़ा सुखम थोड़ा दुखम [हंसी] ज्यादा
ठीक बात है। कपिलवस्तु क्या है? 16 महाजनपद आपने अभी थोड़ी देर पहले देखे कहां है?
जो कपिलवस्तु है इन 16 महाजनपदों में शामिल नहीं है। कपिलवस्तु का स्टेटस समझ लीजिए क्या है? कपिलवस्तु महाजनपद नहीं
है। मतलब 16 महाजनपदों में शामिल नहीं है। स्थिति क्या है? अगर आपको नक्शे पे देख के समझना हो तो स्थिति यह है कि
यह जो कौशल जनपद आप देखेंगे नेपाल साथ-साथ चल रहा है। ये नेपाल है। है ना? इसको आप मान लीजिए कि नेपाल का इलाका है। कौशल
जनपद के एकदम साथ में यह जो इलाका है यह है कपिल वस्तु। कौशल से एकदम जुड़ा हुआ।
कौशल बहुत ताकतवर राज्य है। प्रसंजीत वाला। तो उसकी स्थिति ऐसी है कि समझ नहीं आता कि
वह स्वतंत्र है या परतंत्र है। है तो स्वतंत्र जैसे पाकिस्तान भी स्वतंत्र देश है।
ये अलग बात है कि कटोरा साथ में लेके चलता है। है तो स्वतंत्र है। ही कई बार पता नहीं लगता ना कि हम स्वतंत्र है कि नहीं
है। ऐसे ही कई देश होते हैं जिनको बोलते हैं संरक्षित राज्य। प्रोटेक्टेट बोलते हैं।
जैसे भारत और भूटान का संबंध लंबे समय तक यह रहा। अमेरिका जापान का संबंध यह रहा कि आप स्वतंत्र देश हैं। जब भी आप पर हमला
होगा आपकी रक्षा करने की जिम्मेदारी हमारी है। तो हम इस चीज को देखेंगे। तो संरक्षित राज्य बोल देते हैं उसको। तो कपिलवस्तु था
तो स्वतंत्र जैसा राज्य लेकिन कपिलवस्तु कौशल राज्य के संरक्षित राज्य के रूप में काम करता था।
और इसका मतलब है कि जो कौशल नरेश था प्रसेजीत उसका वहां पर ठीक-ठाक दबदबा रहता था।
ये बैकग्राउंड ध्यान रखेंगे ना तो है तो स्वतंत्र राज्य पर कौशल नरेश का दबाव ज्यादा रहता था। ये कुछ भी और पढ़ा
करेंगे। कौशल से पूछना पड़ेगा पहले। अरे उसके बिना चल नहीं सकते आगे। अब इस कपिल वस्तु में सिस्टम कैसा था? तो
कुछ लोग मानते हैं कि यह गणराज्य था। गणराज्य का मतलब होता है कि एक व्यक्ति का शासन नहीं होता है। यह राजतंत्र नहीं था।
राजतंत्र में तो क्या होता है कि एक राजा के पास सारी शक्ति है। जैसे यहां पर कौशल नरेश के पास सारी शक्ति है। मगध में सारी
शक्ति किसके पास है? बिंबिसार के पास है। पर कपिल वस्तु में सारी शक्ति एक व्यक्ति के पास नहीं है। कई परिवारों के पास मिलके
है। बटी हुई शक्ति है। समझ लीजिए कि एक फेडरल सिस्टम जैसा कुछ है या समझ लीजिए कि कार्यपालिका अलग है, न्यायपालिका अलग है,
विधायिका अलग है। ऐसे काम चलता है। और उसमें जो व्यक्ति उस समय कार्यपालिका का प्रमुख है, जो राजा जैसी भूमिका में है,
उसका नाम है शुद्धोधन। ध्यान रखना है शुद्धोधन की पावर अबब्सोल्यूट नहीं है। पर हां जो
कार्यपालिका का प्रमुख है उस भूमिका में शुद्धोधन है। लेकिन वहां पर परिषदे हैं। परिषदों में फैसले होते हैं। परिषदों के
फैसलों को मानने की बाध्यता राजा की भी होती है। शुद्धोधन की भी होती है। तो शुद्धोधन है वहां का राजा और शुद्धोधन के
घर में एक पुत्र होने वाला है। जिस पुत्र की कहानी अभी हम विस्तार में समझने वाले हैं। अब इस परिवार के बारे में कुछ लोगों
का नाम देख लीजिए। कौन-कौन थे? एक व्यक्ति था सिंह हुन और एक स्त्री थी कचाना।
कात्यायनी से बना होगा कक्षाचाना। है ना? यह पतिप्नी थी। अगर दो लोगों के बीच में बराबर का निशान लगा दिया जाए इसका मतलब
होता है इनकी शादी हो गई। सोशियोलॉजी में एंथ्रोपोलॉजी पता है क्या होता है कि x
y इसका मतलब क्या हुआ x और y की हुई शादी इनके बच्चे हुए दो एक
बेटी बेटा बताओ बेटी त्रिभुज है कि गोल है क्यों बेटियां गोल होती है क्या [हंसी] बेटे त्रिभुज होते हैं नुकीले होते हैं
बेटे अब जो भी वजह है लेकिन एंथ्रोपोलॉजी में माना ये जाता है कि जो नुकीला है वो बेटा होगा और
जो गोल है वो बेटी होगी। तो इस तरह से परिवार का ढांचा दिखाया जाता है। तो सिंह हुन और कचाना की शादी के बाद क्या हुआ?
इनके पांच बेटे हुए और दो बेटियां हुई। उस जमाने के हिसाब से संख्या ज्यादा है या कम है। तब तो हिसाब से कम ही है। ये भी हो
सकता है कि ज्यादा हो। इतने बचे हो क्योंकि बचपन में कई बच्चों की मृत्यु हो जाती थी उस जमाने में। तो जो दो बेटियां
थी उनका नाम था अमिता और प्रमिता। इनमें से जिसको आपको याद रखना है वह है अमिता। अमिता के साथ एक लिंक बनेगा आगे। जो बेटे
हुए वो पांच थे। एक तो शुद्धोधन ही था सबसे बड़े वाला। एक अमितोधन है। इसको भी याद रखना है। एक शुक्लोदन है। यहां तक याद
रखना है। इन दो को भूल सकते हैं। शाक्योदन को और धतोधन को। क्योंकि इन सबके बच्चों का संबंध बुद्ध के
साथ अलग-अलग तरीके से काम करने वाला है। आगे आएगा पर मैं आपको हिंट यही पर कर देता हूं।
अमिता का एक पुत्र है जिसका नाम है देवदत्त जो इस कहानी का खलनायक है। तो कोई आपसे पूछे बुद्ध की कहानी में
खलनायक अगर एक ढूंढना हो तो कौन है? उसका नाम है देवदत्त नाम देव है लेकिन कामदैत्य वाला है। देवदत्त
एक इसी तरह से जो शुद्धोधन है उसके दो बेटे हैं।
एक तो है सिद्धार्थ। आप जानते ही हैं सिद्धार्थ कौन है? कौन है सिद्धार्थ? गौतम बुद्ध। गौतम बुद्ध है ना?
दूसरा है नंद। नंद की बात थोड़ी आगे हम करेंगे कि ये कैसे लिंक है इनके साथ। अमितोदन का एक बेटा है आनंद।
और अगर आपसे कोई पूछे कि बुद्ध के जीवन में कोई एक व्यक्ति जो उनके सबसे नजदीक माना जा सकता है वो कौन है?
वो है आनंद। तो आनंद कौन है? अमितोदन चाचा का बेटा है। सचेसेरा भाई और दुश्मन कौन है? फुफेरा भाई
है या बुवेरा भाई है? मेरा बुआ का बेटा है। आम तौर पे पुरुष के नाम से चलता तो फुफेरा बोल देते हैं। है तो बुआ का बेटा
तो भूवेरा भी तो कह सकते हैं। कहने को फुफेरा बेटा है। शुक्लोदन के दो बेटे हैं। एक का नाम है महानाम।
एक का नाम है अनुरुद्ध। तो यह भी कहीं-कहीं छोटी भूमिका में आएंगे दोनों। एक जगह महानाम आएगा, एक जगह
अनुरुद्ध आएगा। तो यह चार पांच नाम आपके सामने आने वाले हैं। तो मैंने यहां लिखवा दिए। आगे भी इनका नाम आएगा जब जिक्र
करेंगे तब नाम के साथ करेंगे। तो कुल मिला के ये बताइए सिंह हुन और कचाना के कुल कितने बच्चे हुए?
सात। बेटे कितने? पांच। बेटियां कितनी?
दो। बेटियां कौन-कौन है? अमिता और प्रमिता। और बेटे कौन-कौन है? शुद्धोधन, अमितोधन,
शुक्लोदन, धोतोधन, शायोदन पांच बेटे हैं। ठीक। अब यहां से परिवार इनका बढ़ा आगे। शुद्धोधन साहब जो थे शुद्धोधन की हुई
शादी। शादी किससे हुई? तो महामाया से हुई। महामाया आपने नाम सुना होगा। उत्तर प्रदेश
में महामाया पार्क देखा होगा। यह महामाया कौन है? यह महामाया शुद्धोधन की पत्नी का नाम है।
शुद्धोधन इतने महान राजा हुए। उन्होंने इतने युद्ध जीते, इतना अच्छा प्रशासन किया कि वहां की परिषद ने उनको एक विशेष उपहार
दिया, पुरस्कार दिया और कहा पुरस्कार यह है कि आप एक और शादी कर सकते हैं।
पुरुषों के पुरस्कार यही सब होते हैं। तो उनसे पूछा गया कि आप किससे विवाह करना चाहेंगे? तो उन्होंने बहुत सोच के कहा कि
मैं महा प्रजापति से विवाह करना चाहूंगा और महा प्रजापति कौन है? महामाया की बड़ी बहन है।
और बड़ी बहन ये हैं। ये छोटी बहन है। तो उनको महामाया से लगाव था। उस परिवार से लगाव था। महाप्रजापति बहुत उनको ठीक लगती
थी। तो उनका कि अगर शादी करनी ही है तो मैं उन्हीं से करूंगा। और उनकी शादी हो गई। तो शुद्धोदन और
महामाया इनके पुत्र का नाम है सिद्धार्थ। सिद्धार्थ गौतम पूरा नाम था जो आगे चलके गौतम बुद्ध हो गए।
और शुद्धोधन और महाप्रजापति इनका जो बायोलॉजिकल बच्चा है उसका नाम है नंद। मैं बायोलॉजिकल इसलिए बोल रहा हूं कि
सिद्धार्थ गौतम की परवरिश भी दर्शन महाप्रजापति ने ही किए। पर हां जो बायोलॉजिकल चाइल्ड इनका था
जैविक पुत्र था उसका नाम था नंद। तो शुद्धोधन के दो पुत्र हुए। एक हो गया सिद्धार्थ एक हो गया नंद। सिद्धार्थ और
नंद क्या हुआ? हाफ ब्रदर्स हुए। अर्धभ्राता दोनों के पिता समान है। माताएं अलग-अलग है। जैसे योगाचार्य विज्ञानवाद
में दो बहुत महान आचार्य हुए। असंग और वसुबंधु इनका नाम सुने कभी आपने? असंग वसुबंधु भी हाफ ब्रदर्स हैं। दोनों
के पिता समान है। माताएं अलग-अलग। तो ऐसे कुछ होते हैं जैसे परिवार तो अब इस परिवार में अब कहानी शुरू हो रही
है बुद्ध के जन्म की। अब यहां से देखिए कि मैं आपको जिक्र करूंगा कि अंबेडकर जी ने व्याख्या कैसे की है और बुद्ध चरित्र में
कैसे है ताकि आपको दोनों वर्जन समझ में आ जाए कंफ्यूजन ना रहे। और ये बुद्ध चरित ने बड़ा विस्तार में एक एक घटना का जिक्र
किया। मैंने उन्हीं घटनाओं के हेडिंग्स यहां बना के रख दिए हैं। अंबेडकर जी ने भी ये सारी घटनाएं लिखी है। तो मैंने उन
घटनाओं के हेडिंग वैसे के वैसे लगभग रख दिए। तो एक त्यौहार होता था जिसको बोलते थे आषाढ़ का त्यौहार वहां एक महोत्सव होता
था लोग खूब रंग नृत्य संगीत ये सब चलता था सात दिनों का उत्सव था तो सात दिनों का उत्सव हुआ
और सब लोग बहुत खुश थे अंबेडकर साहब क्या करते हैं कि बहुत लॉजिकल रैशन और यहौकिक किस्म की व्याख्याएं करते हैं जो समझ में
आती हो और पारंपरिक पुस्तकों में क्या होता है कि वो कुछ ना कुछ दय किए बिना मानते नहीं है। देखिए क्या होता है। हर
धर्म की दिक्कत है। हर धर्म में जिसको ईश्वर का सम्मान मिलता है। जैसे जीसस क्राइस्ट से मानिए भारत में भगवान राम है।
अब ये सुन के अजीब सा लगता है कि इनके पिता ये थे। इनकी माता यह थी। जीसस क्राइस्ट के बारे में क्या कहानी
चलती है कि जीसस क्राइस्ट के पिता भगवान थे। जोसेफ कौन था? मरियम कौन थी?
तो ईश्वर ने मरियम की कोख में जीसस को स्थापित किया है। बिना जैविक प्रक्रिया के किया। और कहीं-कहीं तो बोलते हैं कि उनकी
हथेली के माध्यम से स्थापित किया। तो जोसेफ कौन है? जोसेफ ईश्वर के पुत्र का रखवाला है। मरियम कौन है? वह ईश्वर के
मतलब उस पुत्र की मां नहीं है। बायोलॉजिकल मदर उस तरह से नहीं है। बस वो वाहिका है कि उसके माध्यम से जीसस का जन्म हुआ। ऐसा
क्यों करते हैं सारे धर्मों के लोग? ताकि उनके धर्म के जो प्रमुख लोग हैं ना वो मनुष्यों से बड़े देखें। अगर ये दिखाएंगे
सामान्य मनुष्य के रूप में जन्म हुआ तो लगता है कि हम भी ऐसे ही हैं। ये भी ऐसे ही हैं। क्या अंतर हुआ भाई? कुछ खास
दिखाने के लिए। आज के समय में तो सवाल उठ जाते हैं। साइंस का जमाना है। उस जमाने में तो क्या था ना कि ऐसी बातेंगी तो
भरोसा बढ़ेगा। चमत्कार की बात होगी तो उससे और विश्वास बढ़ता था। तो चमत्कारों की बातें लाने के लिए इसलिए बुद्ध चरित्र
में आपको चमत्कारों की बातें खूब मिलेगी। ललित बिस्तर तोड़ के दम निकल जाता है। तो अगर मैं बुद्ध चरित्र की कहानी के
हिसाब से लिखूं तो बुद्ध चरित्र में बड़ा सरल सा है और सरल सा यह है कि देवताओं के लोक में ये तय
हुआ कि अब बुद्ध बनने का समय आ गया है। एक बोधिसत्व है। बोधिसत्व कौन होता है? तो
महायान की परंपरा में बौद्ध सत वह व्यक्ति है जो बुद्ध बनेगा लेकिन बुद्ध बनने में लगभग 10 जन्म लग जाते हैं और हर जन्म में
एक भूमि पार करनी होती है जैसे एक भूमि होती है उनकी धर्म मेधा है एक साधुमती है प्रमुदिता है या
ऐसी 10 भूमियों का जिक्र एक विमला भूमि है नंबर दो पे शायद तो बोधिसत्व वो है जो बार-बार जन्म ले रहा है ताकि अंततः बुद्ध
बन जाए आम तौर पर 10 जन्म के बनता है तो एक बोधि सत्व है जिसका दवा जन्म आने वाला है अंतिम जन्म आने वाला है उसको बुद्ध
बनना है और बौद्ध धर्म में बुद्ध से बड़ी कोई बात नहीं और ये बोध सत्व वाली कल्पना महायान में है हीन के लोग ऐसे भी नहीं
मानते तो एक बोधिसत्व स्वयं महामाया के गर्भ में आए ये कल्पना है
कुछ कुछ ऐसी ही कल्पना ललित स्तर में वहां तो और बड़ी बात है कि बुद्ध खुद जो थे तुषिता स्वर्ग में थे। बौद्ध परंपरा में
तुषिता स्वर्ग एक बड़ी ऊंची कल्पना मानी जाती है। उन्होंने खुद चुना कि अब मेरा समय आ गया
है बुद्ध के रूप में अंतिम जन्म लेने का। तो मैं कहां जाऊंगा? तो उन्होंने खुद चुना कि मैं शुद्धोधन की पत्नी महामाया के गर्भ
में जाऊंगा और वो खुद वहां पर आए। अंबेडकर साहब ने कहा यार ये सब नहीं है। आप थोड़ा रैशन बात करो। तो उन्होंने ये
कहा कि सात दिन का उत्सव था। सातव दिन जो पतिप थे उन पति पत्नी के बीच में प्रेम का संबंध कायम हुआ जिसकी वजह से महामाया
गर्भवती हुई। इतना सही एक वाक्य लिख के उन्होंने छोड़ दिया क्योंकि आप धार्मिक लोगों के बारे में ज्यादा ऐसा लिखें तो
चुभता है लोगों को तो वो ज्यादा लिखना भी नहीं चाहिए केवल एक सांकेतिक सा वाक्य लिख के उन्होंने छोड़ दिया कि उसके बाद इनके
बीच में संयोग हुआ। इस तरह से बुद्ध गर्भ में आए। जिस दिन ऐसा हुआ उस दिन महामाया ने एक सपना देखा और यह स्वप्न का जिक्र सब
लोग करते हैं। स्वप्न यह देखा उन्होंने कि वो जब सोई हुई हैं बहुत सारे देवता आके उनके जो पलंग है उसको उठा के ले गए हैं
हिमालय पर्वत के पास बांध सरोवर के पास और वो देवता बहुत खुश हैं। फिर बहुत सारी
अप्सराएं आई हैं। उन अप्सराओं ने उनको स्नान करवाया मानसरोवर में और कहा कि एक बहुत बड़ी भूमिका निभाने के लिए आप संसार
आपका इंतजार कर रहा है और उन्होंने सपना देखा और यह भी उनको कुछ समझ में आने लग गया था
कि शायद उनका पुत्र ऐसा होने वाला है। यह बात उनको समझ में आ गई। सुबह उठी महामाया ने शुद्धोधन से कहा कि देखिए जी एक सपना
देखा है। और सपने में ऐसा ऐसा देखा शुद्धोधन ने कहा मैं तो क्या ही समझ पाऊंगा तो ऐसा करते
हैं जो स्वप्न की व्याख्या करने के एक्सपर्ट्स हैं उनको बुलाते हैं। ड्रीम इंटरप्रिटेशन तो आज तक दुविधा का मामला है
ना कि कोई सपना आया तो क्यों आया उससे क्या निष्कर्ष निकलता है। सिगमन फ्रॉयड ने अपनी आधी जिंदगी खर्च कर दी इसी मामले
में। इंटरप्रिटेशन ऑफ ड्रीम सांस किताब लिखी और कई लोगों ने लिखी है। आज तक भी 100% तय नहीं हो पाया कि किसी सपने का
क्या मतलब निकलता है। इतना जरूर है कि आजकल ये मानते हैं कि जब हम नींद में होते हैं तो नींद में एक स्लीप का नाम है आर
इएम। रैपिड आई मूवमेंट बोलते हैं उसको। जब आप सो रहे हैं और आपकी आंखों के जो अंडे हैं वो तेजी से ऐसे से हिल रहे हैं। गहरी
नींद होती है। वो डीप स्लीप से थोड़ी सी कम लेकिन इतनी गहरी कि हिल नहीं सकते उस समय। हमें जब भी सपना आता है हम उस समय
आरएम में होते हैं। रैपिड आई मूवमेंट वाली स्थिति में होते हैं। और सपने इसलिए आते हैं कि दिन भर जो जो घटनाएं घटी उन
मेमोरीज को परमानेंट मेमोरी में कन्वर्ट करने के लिए सपने आते हैं। सपने उसको रिवाइज करवा रहे होते हैं सांकेतिक तरीके
से। आजकल न्यूरो साइंस ऐसा मानती है। पर उस समय न्यूरो साइंस नहीं थी। उस समय तो लोग व्याख्या करते थे धार्मिक तरीके से।
तो आठ आचार्य बुलाए गए जो सपनों की व्याख्या करने में उस्ताद थे। रोचक बात है कि आठ में से एक का नाम राम
था, एक का नाम लक्ष्मण था। वो राम लक्ष्मण नहीं। इससे पता लगता है कि विभिन्न धार्मिक परंपराएं आपस में कैसे
कनेक्टेड होती है। इसमें राम का नाम भी आ रहा है, लक्ष्मण का नाम भी आ रहा है और यह आचार्य बन के आए
हैं। लेकिन ये वो राम लक्ष्मण नहीं है। ये कपिलवस्तु के आचार्य हैं। और इनको बताना है कि इस सपने की व्याख्या
क्या है? तो आठों ने विचार विमर्श करके बताया कि राजन इस सपने का मतलब बहुत ही खास है।
इसका मतलब यह कि आपके यहां एक बहुत ही महान पुत्र होने वाला है। और वह महान पुत्र या तो बनेगा चक्रवर्ती
सम्राट और अगर नहीं बना चक्रवर्ती सम्राट तो बनेगा बहुत बड़ा साधु सन्यासी
और अगर बना बहुत बड़ा साधु सन्यासी तो वो बुद्ध बनके पूरे संसार का कल्याण करेगा। अच्छा लोग चाहते हैं कि संसार का कल्याण
करने वाला पड़ोसी घर में पैदा हो। हमारे घर में तो राजा ही पैदा हो जाए। राजा बेटा बोलते हैं। सन्यासी बेटा कोई नहीं बोलता
अपने बच्चों को। बोलते हैं राजा बेटा पैदा हुआ। तो शुद्धोधन थोड़ी टेंशन होनी शुरू हो गई।
यार ये सेकंड वाला क्यों बोल दिया? पहले वाला ठीक था। सम्राट शुद्धोधन एकदम खाटी बाप जैसे होते हैं ना वैसा आदमी है। उसकी
पूरी जिंदगी इसी में खर्च हो गई कि बेटा सन्यासी ना बने मेरा और बेटा बन ही गया। उसने जिंदगी भर एक ही काम किया कि बेटा
सन्यासी ना बने। होई सोई जो राम रच वो तो जो होना था होना था। इस वाक्य से कौन सा दर्शन निकलता है?
नियतिवाद डिटरर्मिनिज्म होगा वही जो लिखा है वही होगा और कुछ नहीं होगा। तो ये घोषणा हो गई। लोग बहुत खुश हो गए। लोगों
ने सेकंड सेंटेंस पे कम ध्यान दिया। पहले भी ज्यादा ध्यान दिया। नगाड़े बजने लग गए। अरे वाह वाह वाह। चक्रवर्ती बेटा पैदा
हुआ। अब तो बड़ा कमाल होगा। सब खुश है। शुद्ध होते। टेंशन हो रही है थोड़ी-थोड़ी। खैर
उसने सोचा कि चलो अब मैं देख लूंगा कुछ ऐसा माहौल बनाऊंगा कि वो सन्यासी ना ही बन पाए। आदमी सोचता तो है ही ना। उसने भी
सोचा। तो 10 महीने के बाद आमतौर पर गर्भ 9 महीने को उस दिन का होता
है। लेकिन यहां पर 10 महीने का जिक्र है। कई बार ऐसा होता है। कुछ बच्चे थोड़ा जल्दी कुछ थोड़ा लेट आते ही हैं। अब
महामाया को लगा कि अब समय आ गया है प्रसव का तो मैं अपने मायके जाना चाहती हूं। आपको पता है आज तक यह परंपरा है कि जब
प्रसव होता है तो लड़कियां अपने मायके चली जाती हैं। ससुराल में वैसे बड़ा दबाव रहता है।
पानी भी मांगना हो किससे मांगे तो माय के भैया आराम है मां मां होती है सास सास होती है ऐसा होता है कि नहीं होता है जब
शादी होगी ना तुम भी अपनी सास से देखना पानी मांग के तो समझ में आएगा लड़के लोग भी सास के पास जाके टेंशन में रहते हैं
भाई मां तो मां ही होती है चाहे लड़की की हो चाहे लड़की की हो तो यह परंपरा आज भी है कि जब बेटियां मां बनती है तो अपनी मां
के पास जाती है मां के पास बहन के पास जहां कंफर्टेबल रहे तो महामाया अपने मायके जा रही थी। जो
मायका है उसका नाम है देवदह। और देवदह जाते-जाते रास्ते में एक बड़ा सुंदर सा वन आता है। उसका नाम है लुंबिनी।
अगर आप कभी नेपाल जाएं सिद्धार्थ अगर आप यूपी गार्डर में बन जाए आईएस आईपीएस तो सिद्धार्थ नगर एक जगह है। सिद्धार्थ नगर
से बाहर निकलते ही आप लुंबिनी पहुंच जाते हैं। 10 कि.मी. भी नहीं है मुश्किल इतना पास बहुत सुंदर उद्यान है। आज भी उतना ही
सुंदर उद्यान है। आज तो बल्कि और सुंदर हो गया क्योंकि उसका बड़ा रखरखाव होता है। तो रास्ते में सुंदर उद्यान आया। बड़े-बड़े
पेड़ ठंडी हवा चल रही थी। सुगंधित हवा चल रही थी। थोड़ा सा आराम कर लेते हैं। तो लुंबिनी में वो थोड़ा सा आराम करने के भाव
से अपनी पालकी से पालकी थी। भाई रानी है तो कई कहार पूरी सेना सब पूरा मतलब साज सज्जा के साथ पूरी व्यवस्था चल रही थी। तो
वह उतनी कि आराम कर लेती हूं और जब वह आराम कर रही है तो लोग थोड़ा दूर रहते हैं उस समय ताकि वह डिस्टर्ब ना हो तो वो एक
साल के वृक्ष के पास खड़ी होके हवा और पक्षियों का कलर उसका आरंभ दे रही थी। उसी समय प्रसव पीड़ा उनको हुई और तुरंत इतनी
तेजी से सब कुछ हुआ कि जिक्र है बुद्ध चरित्र वगैरह में कि उनको लेटने का मौका भी नहीं मिला और खड़े रहते हुए ही प्रसव
हुआ और बुद्ध का जन्म हुआ। अभी एक सामान्य बात है प्रसव हुआ और आज से कुछ साल पहले तक ऐसे ही होता था। महिलाएं
अपने प्रसव को खुद ही मैनेज कर लेती थी। आज भी पशु पक्षियों में किसी गाय को प्रसव होगा तो ऐसा थोड़ी ना है कि कोई डॉक्टर
नहीं गाय आएगी उसको देखने के लिए। अपने आप ही होता है। मनुष्य में 100 200 साल अगर छोड़ दें तो पहले ऐसा ही होता था। गरीब
घरों में आज भी ऐसा होता है। तो बुद्ध का जन्म यहां हुआ। लेकिन बुद्ध चरित जैसी रचनाओं में जब तक
थोड़ा सा उसमें वो ना डालें आध्यात्मिक टच ना करें तो कैसे बात बनेगी?
तो उसमें लिखा है कि इस प्रसव की खास बात ये थी कि इसमें बिल्कुल भी पीड़ा नहीं हुई।
चलो यहां तक भी मान लीजिए ऐसा हो सकता है। कोई बड़ी बात नहीं। है ना? ललित बिस्तर वाला उसका लेखक कौन है पता नहीं। अज्ञात
है। वो और आगे बढ़ गया। उसने कहा कि जैसे बुद्ध का जन्म हुआ वह सात कदम चले तो सात कदम चले। सात कदम चलने
का मतलब क्या है? यह संकेत किया कि यह मेरा आखिरी जन्म है। ये ललित विस्तर में है। ललित विस्तर सूत्र
पूरा नाम है रचना का। और जो सामान्य वर्णन मिलता है डॉ. अंबेडकर के वो ये है कि जन्म ऐसे ऐसे हुआ। इस
पोजीशन में हुआ। पीड़ा नहीं हुई। यहां तक ठीक है। यह बात आपको मिलती है बुद्ध चरित्र में।
इसके बाद शुद्धोधन जी की टेंशन शुरू होती है बढ़िया से। हिमालय में एक आचार्य थे। आचार्य असत
बड़े आचार्य थे। उन्होंने देखा कि देवता लोग बड़े खुश दिख रहे हैं।
पता नहीं क्या हो गया है। तो पता लगा कि धरती पर कुछ हुआ है। तो धरती पर निगाह फिराई तो जंबू द्वीप में
उनको एक घर में खुशियां दिखी। पुरानी कथाओं में ऐसे लिखा था ना जंबू द्वीप में उनको एक घर में खुशियां देखी।
वो घर किसका था? कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के घर में खुशियां थी और देवता लोग पुष्प बरसा रहे थे। उनको जिज्ञासा हुई
जानने की। उन्होंने पता किया कि ऐसी घोषणा हुई है कि एक बालक का जन्म हुआ है और भविष्यवाणी यह है कि या तो यह बच्चा बनेगा
चक्रवर्ती राजा या यह बनेगा बुद्ध और संसार का कल्याण करेगा। तो जिज्ञासा में यह पहुंच गए कपिलवस्तु
कि मैं भी देखूं जरा देवता लोग बहुत दिन बाद इतने प्रसन्न दिख रहे हैं। कुछ तो खास बात हुई है।
जैसे ही पता लगा राजा को कि भाई आचार्य असित आए हैं। आचार्य असित बहुत बड़ी बात हो गई। ये वैसे ही है कि आपके घर में कोई
नौकरी की ओशो रजनीश आए मिलने के लिए। तो क्या हाल होगा आपका उस समय? कुछ कुछ वैसा स्टेटस था उनका। तो वो सब बड़े खुश हुए।
बच्चे को दिखाया। उन्होंने बच्चे को गोदी में उठाया, उसका हाथ देखा और उनको रियलाइज हो गया कि जो घोषणा की गई
है झूठ की गई है। क्योंकि यह बच्चा चक्रवर्ती सम्राट नहीं बनेगा।
इसके अंदर महापुरुष बनने के 32 लक्षण हैं। और उनकी व्याख्या के हिसाब से 32 लक्षण जब होते हैं तो सम्राट सम्राट तो छोटी चीज
है। ये उससे बड़ी चीज है। और वो समझ गए कि घोषणा का दूसरा हिस्सा ही सही है कि यह बनेगा बहुत बड़ा साधु
सन्यासी। यह बनेगा बुद्ध। और जैसे ही उनको ये रियलाइज हुआ वो फूट-फूट कर रोने लगे।
आप सोचेंगे ये क्या बात हुई? ये तो खुश होने की बात थी। फूट-फूट कर रोने लगे। शिव दो दिन घबरा गए
कि मुझसे कोई गलती तो नहीं हो गई? कहा जी क्या हुआ? पानी वानी पिलाया। क्या हुआ? बोले नहीं नहीं आपने कुछ नहीं किया। मुझे
दुख यह है यह बच्चा इतना महान है। कई 100 साल में इतना महान बच्चा पैदा होता है। दुख यह है कि मेरे पास जीवन बहुत कम बचा
है। मैं देख नहीं पाऊंगा जब ये दुनिया में अपना आध्यात्मिक साम्राज्य स्थापित करेगा।
जब दुनिया इसके कदमों को चूमेगी, वो दृश्य देखने के लिए मैं जिंदा नहीं रहूंगा। मैं इस बात से दुखी होकर रो रहा हूं। कोई
दूसरी बात नहीं। सब बड़े खुश हुए। एक आदमी टेंशन में आ गया।
कौन टेंशन में आ गया? भाई उसको लगा नहीं यार इससे तो आईएएस बनाना है, कलेक्टर बनाना है या राजा बनाना है। भाई उस समय का
राजा आज का कलेक्टर एक ही बात तो हुई। वो भी जरा संभालता था। आप भी जरा संभालते हैं। जनपद ही तो
आप शुरू में जनपद संभालेंगे। म शुरू में जन संभालेंगे। सात आठ साल में जनपद संभालने लगेंगे। 14
साल बाद महाजनपद संभालेंगे। उसके बाद आर्यवत संभालेंगे। अब कम छोड़ना।
खैर अब बच्चा हो गया है। पता लग गया है। पांचव दिन जन्मोत्सव हुआ। इनका नाम रचना था तो नाम निकला सिद्धार्थ।
गौत था गौतम। तो पूरा नाम क्या बन गया? सिद्धार्थ गौतम। और इंटरेस्टिंग बात है। बुद्ध चरित्र के
हिसाब से इस बालक का नाम सिद्धार्थ गौतम नहीं था। क्या था? सर्वार्थ सिद्ध
जो सभी के हितों को सिद्ध करने वाला हो वहां सर्वार्थ सिद्ध नाम इसका है। कभी भूले भटके कोई आपसे सवाल पूछ ले कि भारतीय
परंपरा में सर्वार्थ सिद्ध किसे कहते हैं? सिद्धार्थ गौतम का नाम जो बुद्ध चरित्र मिलता है वह यह नाम है। लेकिन बाकी सभी
सोर्सेस में सिद्धार्थ गौतम नाम उसका पड़ा और सब ने सिद्धार्थ कहना शुरू किया। बहुत जम के उत्सव हुआ। पूरा कपिल वस्तु नाचनाच
के परेशान हो गया। ऐसा उत्सव किया गया। और उसके ठीक दो दिन बाद उनकी मां की मृत्यु हो गई।
बच्चे के जन्म के सातव दिन पांचवे दिन उत्सव हुआ। वो उत्सव में शामिल है, खुश हैं। अचानक तबीयत बिगड़ी, इतनी
बिगड़ी कि उनको सातव दिन रियलाइज हुआ कि आज मेरे जीवन का आखिरी दिन है। और उन्होंने क्या किया? अपने पति शुद्धोधन और
महाप्रजापति यानी कि कौन? अपनी बड़ी बहन इन दोनों को बुलाया और कहा कि देखो मैं वह दिन देखने के लिए
जिंदा नहीं रहूंगी जब मेरा बेटा इतना महान बनेगा। मुझे बहुत दुख है पर मेरी स्थिति ऐसी है नहीं। तो महाप्रजापति मैं जानती
हूं कि तुम मेरे बच्चों को मुझसे ज्यादा प्रेम करती हो और यह मैं जिम्मेदारी तुम्हें सौंप के जा रही हूं कि आप दोनों
इसका ध्यान रखना और यह कह कि उसकी मृत्यु हो गई। बुद्ध चरित्र में थोड़ा सा इसको अलग तरीके
से देखा गया है। उसमें कहते हैं कि मेरा बेटा इतना महान है। इस हर्ष को वो संभाल नहीं पाई। उस हर्षा की रेख में उसका
स्वास्थ्य ऐसा बिगड़ा कि जीवन लीला समाप्त हो गई। जो भी वजह रही पर सभी ग्रंथों में एक सहमति है कि सातव दिन महामाया की
मृत्यु हुई और यह बच्चा सातवें ही दिन एक सेंस में अनाथ हो गया है। उसकी मां उसके पास नहीं। ठीक है। उसकी मां की बहन है,
मौसी है जो कि उसकी सेकंड मदर भी लेकिन हां जिस मां ने जन्म लिया उस मां की मृत्यु सातवें दिन हो गई।
अभी बच्चा थोड़ा बड़ा हुआ है। खेलने कूदने लगा है। तो इसके जो बेस्ट फ्रेंड्स हैं, यह बेस्ट फ्रेंड्स के नाम लिखे हुए हैं।
इन सबका नाम पहले बता चुका हूं मैं आपको। अब आपको इनके पापाओं का नाम बताना है या मम्मीियों का नाम बताना है। तो बताओ नंद
के पेरेंट्स कौन है? शुद्धोधन और महाप्रजापति। ये इनका पुत्र है। नंद। आनंद
कौन है? अमितोधन का पुत्र है। वही पेज निकालो जहां लिखा था।
और जब मैं पूछूं तब नजर ऊपर रखो। उसके पहले पढ़ लो। तो शुद्धोधन के छोटे भाई अमितोधन के पुत्र
का नाम क्या था? आनंद। खलनायक कौन है? देवदत्त है। खलनायक। किसका पुत्र है?
अमिता का पुत्र है। और अमिता कौन है? शुद्धोधन की छोटी बहन है तो बुद्ध का बुवेरा भाई या फुफेरा भाई जो है वही
खलनायक है देवदत्त महानाम और अनुरुद्ध एक दूसरे के क्या लगते हैं भाई मतलब एक ही घर के बच्चे हैं इन दोनों के पापा का एक ही
नाम है मम्मी का भी एक ही नाम है वो नाम क्या है शुक्लोदन तो बुद्ध के बचपन के जो संगी साथी हैं वो
ये सब लोग देवदत्त भी शुरू में अच्छा दोस्त है इससे झगड़ा होने वाला है अभी पास मिनट के बाद झगड़ा होने वाला है और वो
झगड़ा 72 की उम्र तक चलने वाला है। आठ नौ की उम्र में शुरू होगा। 72 की उम्र में खत्म होगा। खत्म तो उसके बाद भी नहीं
होगा। देवदत्त ही खत्म हो जाएगा। उसके बाद झगड़ा खत्म नहीं हुआ। देवदत्त खत्म होगा। अब इसके बाद यह हुआ कि भाई बच्चा पढ़ेगा
भी तो सही। तो 8 साल की उम्र में इसकी पढ़ाई शुरू हुई। आपको ईर्ष्या हो सकती है कि हमें तो तीन में ही धकेल दिया था स्कूल
में। और ये आठ साल तक मौज करता रहे घर के अंदर। आपको तीन में धकेल दिया होगा स्कूल में।
आजकल दिल्ली में दो में धकेल देते हैं कि जाओ प्ले स्कूल में जाओ। तो इनका आठ साल में अध्ययन शुरू हुआ। अध्ययन शुरू कैसे
हुआ? सबसे पहले वही आठ आचार्य बुलाए गए। जिन्होंने घोषणा की थी। इनमें से दो नाम कौन-कौन से थे?
और भी थे। एक का नाम ही मंत्री था। [हंसी] एक का नाम था मंत्री। जैसे मैं एक बार
गांव में गया पता लगा एक बच्चे का नाम है कलेक्टर। तो मैंने कहा बेटा क्या बनना है? बोले
बनना क्या है? हम तो कलेक्टर हैं ही। ये भी सही है। कलेक्टर बनना है तो नाम ही रख दो कलेक्टर। और अब जो भी जिंदगी में
बोलेगा उसको बोलेगा अरे कलेक्टर साहब आ रहे हैं। इतना अच्छा लगता है। तो खैर आठ आचार्य इनको कहा कि अब बेसिक एजुकेशन जो
मोटी मोटी बातें हैं वो सिखा दो। जब उस लेवल से आगे बढ़ा तो एक आचार्य को बुलाया गया जिनका नाम था आचार्य सबमित्र
यानी कि सर्वमित्र से पाली में हो गया सबमित्र उदित देश से इनको बुलाया गया बड़े प्रकांड
आदमी थे सबमित्र जैसे कहा कि आप इनको भाषा का ज्ञान दीजिए व्याकरण का ज्ञान दीजिए
इसके अलावा वेद का वेदांग का और उपनिषद का ज्ञान दीजिए तो यह बच्चा बहुत कम उम्र में इन सब चीजों
का एक्सपर्ट हो चुका है। उसको भाषा, व्याकरण, वेद, वेदांग, उपनिषद सब। अच्छा उस समय के लोग बोलते थे कंठस्थ कर लिया।
कंठस्थ कोई अच्छी बात थोड़ी ना है। याद कर लिया समझना चाहिए ना। तो जहां तक इनके बारे में हम सोचते हैं इनको समझ में भी सब
चीजें आ चुकी थी। बहुत कम उम्र में। फिर उसके बाद हुआ टीचर नंबर तीन। तब इनके पिता ने कहा कि अब थोड़ा और
एक्सपर्टीज से काम करवाते हैं। तो उन्होंने आचार्य भारद्वाज से निवेदन किया। अब अगर मैं आपसे पूछूं ये
कौन है? आचार्य भारद्वाज हैं आलार कलाम के शिष्य और सांख्य दर्शन के आचार्य। जो कपिल वस्तु में ही रहते थे।
आचार्य भारद्वाज ने गौतम बुद्ध को जो सिखाया या सिद्धार्थ गौतम बुद्ध सिखाया वह सिखाया सांख्य और योग
और इसमें मुख्य रूप से ध्यान करना सिखाया समाधि करने सिखाई आसन करना सिखाया जिसको हम अष्टांग योग कहते हैं उसके
हिस्से सिखाए दर्शन कम सिखाया ज्यादा सिखाया कि ध्यान कैसे करते हैं समाधि कैसे करते हैं चित्त को एकाग्र कैसे करते हैं
वो सब सिखाया अब यह बच्चा बचपन में चित्र को एकाग्र भी कर लेता है। मेडिटेशन भी कर लेता है। वेद उपनिषद पढ़े हुए हैं।
फिर बाप को याद आया कि पहले सन्यासी की घोषणा है। सारा सन्यास वाले चल रहा है तो मामला।
तो शुद्ध ने कहा हटाओ इन सब चीजें। चलो चलो सैनिक स्कूल जाओ। तो फिर सैन्य विद्या के लिए भेजा गया और सैन्य विद्या में जो
जो एक क्षत्रिय बच्चे के लिए या सैन्य परिवार के बच्चे के लिए जरूरी था। तलवार चढ़ाना, भाला चढ़ाना, तीर का मान चढ़ाना
वह सब सिखाया गया। और इस बच्चे ने सैन्य विद्या में भी जबरदस्त महारत हासिल कर ली। बहुत कम समय में। ऐसा जिक्र मिलता है सारी
किताबों में। सोच के देखो कैसा बच्चा रहा होगा। 12 15 की उम्र में तीर चलवा लो, तलवार चलवा लो, भाला चलवा लो, त्रिशूल
चलवा लो। फिर आप उपनिषद की बात करो तो गहरी बात कर रहा है। आप ध्यान करो। ध्यान में डूब गया। एक घंटे तक मेडिटेशन में चला
गया है। ऐसा बच्चा भाषा पूरी आती है। व्याकरण पूरा आता है। संधि समास पूछो वो भी सारे आते
हैं। सोच के देखिए। पर वो ऐसा होता है। कुछ परिवारों में बच्चों की शिक्षा पे बड़ी
मेहनत की जाती है। पर शुद्धोधन की चिंता क्या है? इस बच्चे का स्वभाव ऐसा है। करुणा से भरा हुआ।
इतना कारुणिक स्वभाव है। इतना करुणा या कंपैशन से भरा हुआ है कि कई घटनाएं ऐसी घट रही है जिनसे संकेत मिल रहा है कि आगे
क्या होने वाला है। जैसे क्या संकेत मिल रहा है भाई? क्षत्रिय बच्चा है। बाकी क्षत्रिय
बच्चे क्या बोलते हैं? आज हम शिकार पे चलेंगे। तीर कमान तलवार ले रहे भाई। सब शिकार पे चलेंगे। चलो चलो चलो चलो। इसे कह
चलो गौतम चलो। तुम लोग जाओ। वो कह अरे तुम यहां डरपोक हो क्या? शेर चीते से घबराहट होती है तुमको।
बुद्ध कह रहे तुमने कितने शेर मारे? मैंने देखे होंगे हैं। तुम शेर चीता मारूंगा ये बोल के जब जाते हो हमेशा खरगोश मार के आते
हो या हिरण मार के आते हो। तो मुझे रुचि है नहीं इन सब चीजों में। इन सब हिंसाओं में रुचि नहीं है। तो वो कहते अरे ठीक है
तुम मत मारना। दोस्तों का निशाना तो देखो। बोलते थे कि मुझे निरीह प्राणियों की हत्या का गवाह बनने में कोई रुचि नहीं।
तुम्हें हत्याएं अच्छी लगती है। हत्याएं करो। मुझे रुचि नहीं है इसकी। ये शुद्ध सुनता था। टेंशन में होता था कि
अरे भाई क्षत्रिय के बच्चे हो। थोड़ा प्रैक्टिस तो करके आओ। एक दिन उसकी मां ने यानी कि मौसी ने यानी
कि महाप्रजापति ने अपने पुत्र से कहा सिद्धार्थ से कहा कि देखो तुम क्षत्रिय वंश के व्यक्ति हो। राजसी परिवार से हो।
कल को तुम्हें सत्ता संभालनी होगी। युद्ध करना होगा तो युद्ध में ज्ञान काम नहीं आता है। युद्ध में हिंसा ही करनी होती है।
और क्योंकि मनुष्यों पर हिंसा नहीं कर सकते तो प्रैक्टिस के लिए शिकार करना पड़ता है। ट्रेनिंग कहां से मिलेगी?
तो शिकार पे जाना चाहिए। हिंसा करनी चाहिए। इसने कहा क्षत्रिय को हिंसा करनी चाहिए।
ऐसा नियम क्यों है? अरे जब युद्ध होगा तो कैसे संभालोगे? बोला अरे युद्ध होगा ही क्यों?
बोली भाई दूसरा राज्य है अगर युद्ध करने पर आमादा हो जाए तो क्या करेंगे? क्षत्रिय लोग तो बचाएंगे ना। उसने कहा क्षत्रिय लोग
यह क्यों नहीं कर सकते कि उस राज्य के क्षत्रियों से बात करके समाधान निकाल ले समस्या का।
दुनिया में कौन सी प्रॉब्लम का समाधान बातचीत से नहीं होता है? एक दिन इसका झगड़ा हो गया खलनायक से
और इसी दिन से यह बना खलनायक। आप में से जो बच्चे बाय चांस हिंदी साहित्य के हैं। उन्होंने एक नाटक पढ़ा
होगा आषाढ़ का एक दिन। आषाढ़ का एक दिन लिखा मोहन राकेश ने। मोहन राकेश ने ही लिखा लहरों के राजहंस।
लहरों के राजहंस जिस पर आधारित है वह अश्वघोष का ही दूसरा नाटक है सौंदरानंद इसलिए उसमें भी आनंद और सुंदरी सौंदर्य
उसकी पत्नी का नाम था यहां सुंदरी हो गया है वो नाम था मोहन राकेश अश्वघोष से ठीक-ठाक प्रभावित थे
आषाढ़ का एक दिन में सीधे-सीधे तो नहीं लिए क्योंकि वो कालिदास की कहानी है। यह बुद्ध की कहानी है। सीधे कैसे आएगी? पर
संकेत देखिए कैसा है। मैं कुछ बताऊंगा नहीं। आप बताना कौन सी कहानी आ रही है। ठीक है?
तो सिद्धार्थ बाबू बैठे हुए हैं एक पेड़ के नीचे। बाकी लोग शिकार कर रहे हैं। अपना ध्यान कर
रहे हैं आराम से। इतने में क्या हुआ? एक पक्षी तड़पता हुआ इनकी गोदी में गिरा। उसे लगा हुआ था तीर।
और जैसे ही सिद्धार्थ की गोदी में पक्षी गिरा, तड़पता हुआ उसने तीर निकाला, मरहम लगाई। दवा लगाई उसे पानी पिलाया उसे
प्रेम करने लगा अपनी गोदी में रख के सुलाने लगा इतने में दूर से एक आदमी तीर कमान हाथ में
ले आया देवदत्त उसने कहा मैंने एक पक्षी का शिकार किया था यहीं कहीं गिरा है तुमने देखा है क्या
उसने कहा हां देखा है ये रहा मेरे हाथ के अंदर दोनों हाथ के अंदर था ये रहा मेरे हाथ के अंदर
तो देवदत्त ने कहा कानून के अनुसार यह मेरी संपत्ति है क्योंकि मैंने शिकार किया है।
तो इसने कहा संपत्ति मारने वाले की नहीं होती बचाने वाले की होती है।
मैंने बचाया है। संपत्ति मेरी है। चाहो तो पक्षी से ही पूछ लो किसके पास जाना चाहता है।
उसने कहा ऐसे नहीं होगा। तुम्हें देना पड़ेगा। उसने कहा दम है तो ले लो। बोले मेरा हिंसा में यकीन नहीं है पर मुझे
हिंसा आती है और मैं उसमें भी सबसे आगे था परीक्षाओं में आती है इस पर नहीं करूंगा तुम पर कर
सकता हूं तो दम है तो ले लो तो मामला चला गया कोर्ट में
अदालत में जीत हुई किसकी बचाने वाले की और उस दिन से देवदत्त ने गांठ बांध ली कि
छोडूंगा नहीं इसको मैं कभी कभी ना कभी इसने मेरा हक मारा है। इसने मेरी चिड़िया मारी है।
4 लाख लोग बोलते थे वर मध्य कपत नशो मयूर आज जो कबूतर हाथ आया है तुरंत निपटाओ। कल मोर मिलेगा इस चक्कर में आज कबूतर मत
छोड़ो। जमाना वो चल रहा था। और बुद्ध अपने अलग तरीके से चल रहे थे। कहानी समझ पा रहे कौन सी कहानी है?
कालिदास और दंतुल। दंतुल कौन सी भूमिका में है? देवदत्त की भूमिका में है। कालिदास कौन सी भूमिका में? बुद्ध की
भूमिका में। पक्षी की जगह कौन है? हिरण है। और ठीक वही कहानी एज इट इज वहां पर रखी गई है। तो देवदत्त की इस घटना के बाद
से तो झगड़ा इनके बीच में बढ़ गया और यह समझ में आ गया कि इसका स्वभाव बहुत ही कारण है। स्वभाव के अन्य पहलुओं में यह है
कि यह अक्सर ध्यान में डूबा रहता था। जो कृषक थे, मजदूर थे, अक्सर उनकी मदद करता
रहता था। अगर कोई क्रिश बेचारा परेशान है उसकी मदद कर देना कोई फिजिकल वर्क है फिजिकल लेबर है उसमें हाथ बटाना और जितने
भी गरीब मजदूर किसान काम करते थे उन सबके साथ बहुत ही इसका मैत्री वाला भाव रहता था मौका मिलते ध्यान में डूब जाता था कई कई
घंटे ध्यान में डूबा रहता था तो बाकी बच्चों के साथ होते हुए भी बाकी बच्चों से स्वभाव में बहुत अलग था और यह बात एक
व्यक्ति को लगातार खाए जा रही थी कौन था वो शुद्धोधन तो शुद्धोधन ने वही सोचता है जो हर बाप
सोचता है। उसको लगता है कम उम्र में कर दो इसका ब्याह। शादी के बाद क्या होगा? एक तो अगर
पत्नी बहुत ही सुंदर हुई तो इसका ध्यान कहीं भटकेगा ही नहीं। बाप लोग सोचते हैं ऐसा।
दूसरा अगर एक आध साल में बाप बन गया तो फिर इसकी पूरी जिंदगी बच्चे की खातिरदारी में ही खर्च हो जाएगी कि बच्चा ठीक से पढ़
ले, लिख ले, यह कर ले, वह कर ले। बंध जाएगा। भागने का ख्याल इसके मन से निकल जाएगा।
तो बाप ने सोचा 20 साल का हो गया। तुरंत बांधो इसको। 20 में सोची आजकल तो 21 इंच अलाउड नहीं
है। उस समय 2020 में हो जाता था। और 20 साल की उम्र में शादी हुई। अब इस पर जो वर्णन मिलता है एक वर्णन मिलता है जो
आमतौर पर बुद्ध चरित्र वगैरह में है। वो यह कि शुद्धोधन ने खुद ढूंढी अपनी बहू। और मुनादी पिटवा दी। दुनिया की सबसे सुंदर
कन्या चाहिए मेरे पुत्र के लिए। सन्यासी बनने से रोकना है। तो पता लगा कि भाई एक लड़की यशोधरा है।
उसी कपिल वस्तु में रहती है। और उसने पता किया देखा उसको खुद भी लगा कि वो अरिन्य सुंदरी है। यशोधरा के पिताजी से उसने बात
की। पिताजी थोड़ा नानक कर दे लेकिन समझा दिया। राजा मान रहा था कैसे बना। फाइनली सहमति बन गई और इनका विवाह हो गया और
शुद्धोधन को लगा कि अब देखता हूं हाथ की रेखाएं ज्यादा मजबूत है या मेरी योजना ज्यादा मजबूत है। शुद्धोधन को ऐसा लग रहा
है। लेकिन बाकी रचनाओं में जिक्र मिलता है। जैसे डॉक्टर अंबेडकर ने जो जिक्र किया
उसमें विवाह का जिक्र ऐसा नहीं है। डॉक्टर अंबेडकर क्या कर रहे हैं कि महिलाओं का सम्मान जहांजहां बढ़ सकता है बढ़ा रहे
हैं। यशोधरा के सम्मान को लेकर तो बहुत डिबेट रही है हमारी कल्चरल हिस्ट्री में जो
मैथिश गुप्त कर रहे थे अपने स्तर पर और गुप्त जी के 20 30 साल बाद अंबेडकर हैं उनकी भी जिम्मेदारी बनती है कि परंपरा को
इस तरह से रिडफाइन करें कि सम्मान महिलाओं का बढ़े तो उसमें क्या है कि यशोधरा जब हो गई 16
वर्ष की वो बहुत निष्नात थी कला में संगीत में सुंदर थी तो उनके पिता को चिंता होनी शुरू हुई तो पिता का नाम था दंडपाणी
तो दंडपाणी को जब चिंता हुई विवाह की तो उसने कहा कि मेरी बेटी की विवाह के लिए स्वयंवर होगा।
देखिए स्वयंवर का मतलब तो ये है कि बेटी स्वयं अपना वर चुनेगी। कितना सिंपल है और हर परंपरा में ऐसा ही होना चाहिए। बेटे के
लिए स्वयं वधू हो। बेटी के लिए स्वयंबर हो। बेटा अपनी वधू खुद चुन ले। बेटी अपना वर खुद चुन ले। है ना? और जो स्वयंवर होते
थे उनमें कहीं-क व्यावहारिक रूप से ऐसा होता नहीं था। नाम स्वयंवर था। जैसे यहां हुआ तो उसने सबको इनवाइट किया। जो जो युवक
उसको पता लगा कपिल वस्तु में है इस समय शादी की उम्र में सबको इनवाइट किया। सिद्धार्थ को भी इनवाइट किया।
तो सिद्धार्थ का बहुत मन था नहीं पर पेरेंट्स ने कहा अरे बेटा इनविटेशन आया है। चले जाओ थोड़ा
लोगों की नजर में रहोगे तो कोई ना कोई ऑप्शन बनेगा जाना चाहिए। जैसे आप देखेंगे शादी ब्याह में दुल्हन से ज्यादा सी
सहेलियां तैयार रहती हैं। तो इसका कांसेप्ट ये है कि इसका तो हो गया। हमें ल्च होना है अभी।
तो [हंसी] नहीं नहीं ये बात केवल दुल्हन की सहेलियों पर नहीं लड़के के दोस्तों पे भी लागू होती
है। वो भी उतना ही सज के आते हैं। क्योंकि उन सबको पता है कि यही लॉन्चिंग पैड है। यही हमारी पिच पिच यही हमें करना है तो
कहीं एक से बात निकलेगी दूसरी शादी होगी। दूसरी में फिर बाकी सबके लिए बनेगा। यही होता है ना कड़ी सी कड़ी जुड़ती है। तो
पेरेंट्स ने समझाया कि बेटा चले जाओ। क्या दिक्कत है सर? अरे बहुत होगा तो नहीं होगी तुमसे शादी। जाने में क्या दिक्कत है?
अटेमप्ट तो लो मतलब आपकी भाषा में अटेमप्ट है भाई अटेमप्ट है तो एग्जाम तो दो कम से कम एग्जाम क्यों नहीं दोगे तो खैर
सिद्धार्थ वहां गया बहुत मन से नहीं है लेकिन हां गया अब सिद्धार्थ देखने में इतना सुंदर था इतना स्मार्ट ज्ञान के
मामले में सैन्य विद्या के मामले में हर चीज में इतना एक्सपर्ट कि जैसे ही वो गया यशोधरा ने कहा फाइनल है मैं सिद्धार्थ से
ही यशोधरा ने तुरंत कहा कि मैं सिद्धार्थ से शादी करूंगी बात खत्म।
अब बाकी सब जो आए थे उनको अपमान महसूस हुआ कि हम बुलाया क्यों था मेरे भाई? ये तो मैच फिक्सिंग है। पहले से हमने तय कर रखा
था। जब पहले से तय था तो हमें बुलाया क्यों आपने? अच्छा दंडपाणी भी नाराज था इस बात पे। दंडपाणी ने बेटी को सिखाया देख
बेटी जितना मैं इस लड़के को जानता हूं ये ठीक नहीं है। ये खाली ध्यान करता रहता है। किस दिन साधु
बनके भाग जाए। इसको भाला वाला चलाना आता है। चलाता नहीं है। लेकिन यह तुम्हारे लिए मुर्गा भी नहीं मार सकता
है। यह बड़ा सात्विक प्रवृत्ति का है। किस दिन साधु बनके भाग जाएगा भरोसा नहीं है। मेरी
बात मानो पुनर्विचार करो। तो बेटी अड़ गई। बेटी ने हठ कर लिया कि भ साधु प्रवृत्ति का है तो उसमें बुरी बात क्या है? रहना
मुझे है तो आपको क्यों टेंशन हो रही है? मुझे साधु प्रवृत्ति से कोई दिक्कत नहीं है। तो दंड पानी चुप हो गया। इतने में
बाकी जो उम्मीदवार आए थे युवक आए थे उन्होंने विद्रोह कर दिया कि भाई बुलाया है कुछ तो सम्मान हमारा भी होना चाहिए कोई
परीक्षा तो लो कम से कम तो इसने कहा जब मुझे पसंद सिद्धार्थ है परीक्षा किस बात की बोले नहीं परीक्षा लेने का रिवाज है तो
अंत में हुआ कि ठीक है परीक्षा लेंगे भाई तो परीक्षा में कुछ परीक्षाएं तय की कही गई भाई ये तीर चलाना है वो निशाना लगाना
है ये सब जो होती है परीक्षाएं उन परीक्षाओं में कौन जीतेगा क्योंकि सबसे बड़ा एक्सपर्ट वही था उसकी शायद ने विद्या
पढ़ी कुशाल विद्या थी तो परीक्षा में ही अंत में सिद्धार्थ ही जीता और बाकी लोग मुंह लटका के वापस चले गए क्योंकि दाल इस
तरह से भी नहीं गल पाई दंडपाणी भी छोटा चेहरा लेके मजबूर हो गया और अंत में यशोधरा और सिद्धार्थ का विवाह
हुआ सिद्धार्थ की उम्र थी 20 साल यशोधरा की उम्र थी 16 साल क्योंकि बाद में इनकी उम्र का अंतर दो साल
रह जाता है तो मुझे थोड़ा सा डाउट होता है कि लिखने में कहीं कहीं कुछ मिस्टेक है क्योंकि उस समय 16 और 20 का जिक्र आता है।
जब मृत्यु हुई है तो उस साल 78 और 80 का जिक्र आता है और मृत्यु एक ही साल में हुई। कहीं-कहीं ऐसा जिक्र आता है।
कहीं-कहीं तो यह है कि यशोधरा बुद्ध के बाद मृत्यु हुई। अंबेडकर जी के हिसाब से दोनों की मृत्यु एक ही साल में हुई और
यशोधरा ने बुद्ध को आगे बताया कि आज मेरे जीवन का आखिरी दिन है। जिसके एक दो महीने बाद बुद्ध की मृत्यु हुई। तो वो एक दो साल
का अंतर रहता है। लेकिन मोटे तौर पे आप 16 20 मान के चलिए। इनकी शादी हो गई। शुद्ध को लगा था बस शादी हो गई है बच्चा बंध गया
बस एक इसका इसका बच्चा और हो जाए तो जिंदगी भर हिलेगा नहीं पर इनका जो पुत्र हुआ वो हुआ जब सिद्धार्थ
की उम्र थी 28 साल आठ साल बाद और 28 की उम्र में जो पुत्र हुआ उसका नाम था राहुल इतना लंबा गैप क्यों हुआ होगा इसके पीछे
बहुत ठोस व्याख्याएं नहीं मिलती है लेकिन कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि शायद बुद्ध का असमंजस
यह असमंजस कि मैं परिवार वाले जीवन के लिए उपयुक्त हूं भी या नहीं उस रास्ते पे आगे बढ़ना ठीक होगा भी या नहीं जो
जिम्मेदारियां हैं मैं उन्हीं में असहज महसूस करता हूं जिम्मेदारियों को और बढ़ा लूं क्योंकि कल को बच्चा होगा मेरी
जिम्मेदारी उसके प्रति बन जाएगी तो यह जो गृहस्थ से बाहर निकलने का भाव आता है, सन्यास का भाव आता है मेरे लिए और मुश्किल
हो जाएगा। तो कुछ लोग मानते हैं कि शायद इसके पीछे कारण रहा हो कि थोड़ा सा उनके मन में भय था कि क्या करें। अब 20 से 28
के बीच में शुद्धोधन की चिंता खत्म नहीं हो रही है। बच्चा तो हुआ नहीं है। पत्नी सुंदर है साथ में है। वो सब ठीक है। लेकिन
ऐसा होता है कि एक समय तक साथ रहने के बाद वो जिज्ञासा, वो उत्सुकता, वो प्रेम, वो लगाव आमतौर पर नहीं रहता है। तो बाप को
चिंता ये है कहीं सन्यास ना ले ले। तो बाप हर तरह के सुकर्म कुकर्म कर रहा है कि बच्चा मेरा सन्यास ना ले।
उसने अपने प्रधानमंत्री से कहा प्रधानमंत्री या राजपुरोहित उसका नाम कहीं-कहीं उदाई कहीं-कहीं उदयन आता है।
कहीं इसको पुरोहित बोलते हैं, कहीं राजपुरोहित बोलते हैं, कहीं मंत्री बोलते हैं, कहीं प्रधानमंत्री बोलते हैं। तो इस
तरह से नाम चलता रहता है। उदाई से विमर्श किया कि भाई सन्यास से रोको। इसको कैसे रोके?
तो दोनों ने मिलकर क्या किया? तीन महल बनवा दिए सिद्धार्थ के लिए।
एक महल गर्मियों के लिए, एक सर्दियों के लिए और एक वर्षा ऋतु के लिए। अब बताओ किसी का आध्यात्मिक मनो उसको ये सब आप देंगे।
उससे रुकेगा वो। साधु टाइप का आदमी है। आप कह रहे कि हम तुम्हारे लिए केल्विन पीन की जींस लाए
हैं। और कहेगा उसको आग लगा दो यार। उसे क्या उस सब में सुख मिलेगा भाई उसको ये सब नहीं
अच्छा लगता सामान्य जीवन अच्छा लगता है तो ये कुछ कुछ वैसा हो रहा है तो तीन महल बनवा दिए तीनों महल में दुनिया
भर का तामझाम ये वाले पर्दे वो वाली ठंडक वो वाला इत्र वो वाला हवा ये सब करवा दिया है और बच्चे का मुंह वैसा का वैसा खुशी
नहीं आ रही चेहरे पर फिर बाप को लगा कि अंत में एक ही उपाय होता है
एक अंतःपुर बनवाया। अंतःपुर का मतलब होता है राजाओं के घरों में वह इलाका जहां बहुत सारी सुंदरियां
रखी जाती हैं ताकि राजा जी का मन लगा रहे। सन्यासी ना हो जाए। और
पूरे कपिलवस्तु में जो सबसे सुंदर युवतियां थी उन सबको नौकरी पे लाया गया यहां पर। और उदाई ने उन सबको ट्रेनिंग दी
है। ठीक से समझाया है। लेक्चर दिया है कि देखो आप सब इतने सुंदर हैं कि आप जब चलती हैं
तो लोग रुक रुक के देखते हैं। मैं जानता हूं। ट्रैफिक जाम हो जाता है। मैं जानता हूं।
किसी सामान्य व्यक्ति को प्रभावित कर लेना छोटी मोटी बात है। आपकी असली परीक्षा तब होगी जब आप किसी
बड़े व्यक्ति को प्रभावित कर सकें, बांध सकें। वो आपके मोहपाश में बंध जाए, आपके आकर्षण में बंध जाए। और इस समय जो सबसे
बड़ी चुनौती है आपके लिए वह सिद्धार्थ है। दम है तो उसको बांध के दिखाओ। ऐसे प्रेरित कर रहे मोटिवेट कर रहे हैं उनको। और उनके
चेहरे पर ये भाव आ रहा है। अरे बहुत देखी हमने भेजो ना। उनके चेहरे पर ऐसा भाव है कि [हंसी] अरे ठीक है। हम तो जहां जाते
हैं लाइन वहीं से शुरू होती है। ये क्या बात है? आप भेजो। तो फिर उसने कहा कि अब तो मंतपुर में रहो।
वो कभी-कभी यहां से गुजरेगा तो आपका काम है उसको रोकना संभालना। प्रेरित करना। अब गौतम बुद्ध वहां से निकले। सबने पूरी
अदाएं बिखेरी अपनी। उसने फूटी आंख से देखा तक नहीं। और सीधे निकल गया। कोई सामने ही आके चेहरा दिखा दिया। उसने यूं देखा।
विष्णा के भाव से चेहरा फेर के आगे चला गया। कि क्या कौन हो यार तुम कहां से आ जाते हो।
कितना अपमान है सोचिए किसी का। कोई अपने पूरी सुंदरता की ताकत से आपके सामने आके नृत्य करने लगे।
और आप उसको देख के यू करें क्या है? चलो कहां से आ गए? इतनी बेरुखी उनके व्यवहार में थी। तो ये
सब भी तनाव नहीं कि भाई ये तो हम कुछ भी नहीं कर पा रहे। फिर उदाई ने क्या किया? शुद्ध ने बोला भाई
देखो मेरा बेटा है। मैं तो कैसे ये सब समझाऊंगा? तुम उससे दोस्त बनकर समझाओ।
उदाई उसके पास गया। बोले तुम्हारे पिताजी ने मुझे तुम्हारे सुहृद पद पर नियुक्त किया। सुहृद का मतलब होता है दोस्त मित्र।
ये एक पद होता है। चाणक्य के थरी में भी सुहृद एक पद का नाम है। और मेरा काम है आपको वो सब सलाह देना जो
एक मित्र के रूप में दी जाती है भावी राजा को। तो मैं आपसे कहना चाह रहा हूं आप यह मत सोचिए कि आपका विवाह हो गया है। किसी
और स्त्री के साथ आप होंगे तो अनैतिक होगा। ये सब राजाओं पर लागू नहीं होता है और वैसे भी आपको जितना तनाव जीवन में
झेलना है राजा बनने के बाद उसके लिए बहुत जरूरी है कि आपके जीवन में इतना रोमांच हो आनंद हो तो इसको अनैतिक नैतिक मत समझिए।
तो गौतम बुद्ध ने कहा आपको क्यों लगा कि मैं ये सोच रहा हूं। बोले मैं आपसे कह रहा हूं कि आप मैत्री भाव से उनसे दोस्ती
कीजिए। संकोच खत्म होता है। कल को आपको अंतरराष्ट्रीय वार्ताएं करनीगी। तो यह सब चीजें होने से संकोच कम होगा। आप किसी से
बात कर पाएंगे। उसने कहा आप नहीं समझ रहे। जो सुंदरता आप दिखा रहे हैं मुझे उस
सुंदरता में अनित्यता नजर आती है कि यह दो दिन की सुंदरता है। इस दो दिन की सुंदरता के मोह में पड़कर
मैं अपना जीवन खराब करूं। मेरे अंदर से भाव ही नहीं आता है। ऐसा नहीं है कि मैं उनका अपमान कर रहा हूं। मेरे अंदर से वह
आकर्षण का भाव ही नहीं आता जो आपको लगता है कि बहुत नेचुरल है। आना ही चाहिए। तो आप ऐसे कितने भी उपाय कर लेंगे मुझ पर रति
भर फर्क नहीं पड़ेगा। आप इस बात को मान लीजिए। तो उदाई भी बेचारा छोटा सा चेहरा लेके चला
गया शुद्धोधन के पास कि जी हमें भी समझ में नहीं आ रहा है। बहुत कोशिश की यही संवाद वाली बात यही थी बात।
अब माहौल बन गया है महा धनिष्क्रमण का एक्सोडस अब सिद्धार्थ को जाना है और यहां आके
डॉक्टर अंबेडकर ने एक ऐसी नई धारा पकड़ी है यह मुझे भी बहुत आईडिया था नहीं दो साल पहले तक दो साल पहले मैंने किसी वीडियो
में जिक्र किया कि भाई चार दृश्य देखे थे गौतम ने उसके बाद चले गए तो एक किसी ने कमेंट किया कि सर डॉक्टर अंबेडकर ने जो इस
बात की सही व्याख्या की है। प्रामाणिक व्याख्या की है कि आपने वो नहीं पढ़ी। मुझे लगा इसकी भी कोई नई व्याख्या है। तो
मैंने उनकी किताब मंगवाई बुद्ध और उनका धम्म पूरी किताब पढ़ी और मैं पढ़ के चौंक गया कि फिर मुझे और बेचैनी हो गई कि ये
व्याख्या आई कहां से? तो उन्होंने क्या-क्या पढ़ा था वो किताबें मंगवा के पढ़ी।
और तब जाकर समझ में आए कि व्याख्याएं इतिहास में धर्म के इतिहास में कैसे होती है। आपको बड़ा आनंद आएगा समझने में कि एक
ही बात को देखने के दो नजरिए क्या हो सकते हैं। और मैं जानबूझ के सारी बुक्स के नाम ले आया हूं ताकि जो लोग हमला करेंगे उनको
पहले बुक का नाम दिख जाए। पहले बुक पढ़ना फिर हमला करना और बुक पढ़ते ही नहीं हमला करने वाले तो फिर हमला भी नहीं करते।
तो महाभिनिष्क्रमण का मतलब बुद्ध का अपना घर छोड़ के जाना। जो बुद्ध चरित वाली परंपरा है या ललित
बिस्तर वाली परंपरा है जो महायान की सामान्य परंपरा है उसमें एक सामान्य मानसिकता है। एक तो यह
है कि वो अपनी पत्नी को बिना बताए रात को सोता हुआ छोड़ के भाग गए थे। एक तो इस बात पे बहुत लोगों को ऑब्जेक्शन है कि भाई बता
के जाना चाहिए था। बिना बताए नहीं जाना चाहिए था। इस पर एक कविता भी बहुत अच्छी आपने सुनी होगी नहीं तो जिक्र करेंगे बीच
में उसका। ठीक? दूसरा यह कि ऐसा हुआ क्यों? क्योंकि सोहा तो था ही वैसा। मन में तो उसके आता ही था।
एक दिन गौतम ने अपने पिताजी से निवेदन किया कि पिताजी मैं थोड़ा बाहर शहर में और जंगलों में घूम के आना चाहता
हूं। 28 29 साल का बच्चा अपने पापा से निवेदन कर रहा है जो खुद एक साल के बच्चे का बाप
है और जिसकी शादी को 89 साल हो चुके हैं। अगर आपको कोई बाजार घूम के आना हो तो पापा से ऐसे पूछते हैं कि पापा क्या मैं बाजार
घूम के आ सकता हूं? अंबेडकर जी को इसी बात से आश्चर्य होता है। बाप की बिल्कुल इच्छा नहीं थी कि बेटा
घूमने जाए। पर अनमने भाव से बाप ने कहा ठीक है। बाप को चिंता थी कि कुछ गड़बड़ ना हो जाए।
तो जैसे ही बेटे के जाने की बात हुई तो गौतम का जो सारथी था उसका नाम था छन और जो उसका घोड़ा था उसका नाम था कंथक
इनका नाम बार-बार आता है छन्न और कंथक ये उसके बहुत नजदीकी मित्र हैं दोनों कंथक घोड़ा है छन्न सारथी है छंदक नाम संस्कृत
में है लेकिन वो पाली में छन्न हो जाता है तो गौतम ने छन्न से कहा कि कंथक को तैयार करो चलते हैं बाबूजी जी ने परमिशन दे दी
और बाबू जी ने इसी बीच में अपने सारे लोगों को तैनात कर दिया कि भैया ये जहां-जहां जाएगा रास्ता साफ करवा देना।
कोई भिखारी मुर्दा बीमार बूढ़ा गलती से भी सामने नहीं आना चाहिए। सुंदर-सुंदर लोगों को भर दो सड़कों के ऊपर
ताकि इसको लगे दुनिया सुंदर ही होती है। पूरे इलाके में खबर करवा दी कि बुद्ध निकल रहे हैं बाहर। मतलब अभी बुद्ध बने नहीं
है। हम वैसे बुद्ध कह रहे हैं। सिद्धार्थ बाहर निकल रहा है। पूरा शहर सड़क पे उमड़ गया अपने राजकुमार को देखने के लिए और
सबसे कहा कि तैयार हो के निकलना सब लोग। सब सुंदर सुंदर बन के शहर पे खड़े हो गए सड़कों पे। वो निकल रहे सब पुष्प की बरसात
कर रहे हैं। और ये देख रहे हैं कितना अच्छा अच्छा सब कुछ है। लेकिन जो देवता बैठे थे ऊपर
महायान की व्याख्या है। महायान में देवता जरूर आएंगे। देवताओं को लगा कि अब देर हो रही है।
अब तो सन्यास का टाइम आ गया है। तो देवताओं ने एक युक्ति रची और रास्ते में अचानक एक बूढ़े आदमी को खड़ा कर दिया।
वृद्ध व्यक्ति को खड़ा कर दिया। छन्न को भी बता रखा था कि कुछ ऐसा वैसा दिखे रास्ता मोड़ लेना। चुपचाप वहां से।
कुछ पूछे तो गोलमोल जवाब दे देना। सच मत बोलना। देवताओं ने छन के दिमाग को भी कंट्रोल कर
लिया। बूढ़ा ला दिया। छन का दिमाग कंट्रोल कर लिया।
सिद्धार्थ ने अचानक देखा कि एक बूढ़ा बाकी उसको जवान दिख रहे थे। बच्चे हैं, सुंदर-सुंदर युवक हैं, युवती हैं। सुंदर
कपड़े पहने हुए, नृत्य कर रहे हैं। घूम रहे हैं। उस समझ आ रहा है। अचानक एक बूढ़ा दिख गया। बूढ़ा भी ऐसा कि हाथ पैर ऐसे
कांप रहे हैं उस बेचारे के। और कमर टेढ़ी हो चुकी है। तो सिद्धार्थ ने पूछा कि छन यह कौन है?
छन्न का दिमाग तो फिर गया है। सॉफ्टवेयर ऊपर से कंट्रोल हो गया है। वो भूल गया कि क्या बोलना था? कह रहा है
सिद्धार्थ ये बुढ़ापा है। सबको आता है। तुमको भी आएगा। हर बच्चे की पहली टेंशन क्या होती है? जिस
दिन बच्चे को पता लगता है कि लोग मरते हैं, बच्चे की पहले टेंशन है कि मैं मरूंगा कि नहीं मरूंगा। हर बच्चा पेरेंट्स
से पूछता है सब मरते हैं क्या? पेरेंट्स बोलते हैं हां मैं भी मरूंगा। तो पेरेंट्स परेशान हो जाते हैं। कैसे समझाएं इस छोटे
से बच्चे को कि तुम्हारी मौत भी होगी। तो गोलमटोल बात है। अरे मरते थोड़ा है। फिर पैदा होते हैं। आना जाना लगा रहता है। ये
तो आत्मा तो जिंदा है। शरीर गया है। तो ये सब कह के थोड़ा दिलासा मिल जाता है। वापसी होती है कि नहीं होती किसी को नहीं पता।
मुझे भी नहीं पता। है ना? अज्ञवत नहीं पता लेकिन दिलासा देने के लिए बहुत जरूरी है
कि आप ऐसी बातें कहें कि देखो बेटा मरता कोई नहीं है नैन छिनती शस्त्राण नैन दति पावक आत्मा को कोई काट सकता है गला सकता
है सुखा सकता है भिगा सकता है अरे कपड़ा ही तो है शरीर वस्त्र है वस्त्र बदलने के लिए आत्मा जाती है इससे क्या होता है
बच्चे अच्छा अच्छा कपड़े ही बदल ले कोई बात नहीं ठीक है बड़ा होता है वो समझ जाता है मुझे बेवकूफ बना दिया इन लोगों ने। मैं
भी मरूंगा। फिर वो अपने बच्चों को बेवकूफ बनाता है। ना ना जब पता उसको भी है। [हंसी] सबको पता है। लेकिन इसी तरह से
दुनिया चलती है क्योंकि हर सच हर उम्र में झेला नहीं जाता। तो क्षण ने कहा कि ये बुढ़ापा है। इस उम्र
तक आते-आते हाथ पैर काम करना बंद कर देते हैं। आंखों से दिखना बंद हो जाता है। दिमाग काम नहीं करता है। बोलने में
दिक्कतें आती हैं। और याददाश्त चली जाती है कई बार। तो हाथ पैर कांपते रहते हैं। तो सिद्धार्थ ने पूछा ये इसी को हुआ है कि
औरों को भी होता है? बोले सबको होता है। आपको भी होगा। सीधे असली क्वेश्चन पे आ रहा हूं। आपको भी होगा।
सिद्धार्थ बोला भाई वापस चलो। मोड़ो यहीं से मोड़ो। यू टर्न लो। रथ मोड़ा वापस आ गए। शुद्धोधन ने पूछा
क्या हुआ? बोले जी बूढ़ा दिख गया था। मेरा दिमाग खिसक गया था। मैंने ऐसे-ऐसे बोल दिया। मुझे भी समझ में नहीं आया कि क्या
हुआ था। शुद्धोदय बहुत चिंतित थे। खैर फिर संभाला अंतःपुर की महिलाओं से कहा कि थोड़ा ध्यान
रखो भाई। पर वो भी क्या ध्यान रखें ये किसी को देखता तक नहीं है। कुछ दिन बाद सिद्धार्थ ने फिर कहा कि
बाबूजी एक बार फिर से घूम के आना चाहता हूं। बाबूजी ने कहा ठीक है भाई जाओ क्या कर
सकता हूं मैं? जाओ। फिर बाबूजी ने अरेंजमेंट्स करवा दिए सारे। सारी सड़कों पर सब सुंदर लोग घूम गया। कोई
खराब ना दिखे। देवता फिर एक्टिव हो गए। इस बार देवताओं ने एक बीमार व्यक्ति को वहां पर उपस्थित कर दिया।
बहुत ही बीमार। वर्णन से लगता है कि उसको कैंसर हुआ होगा। उस समय लोग कैंसर समझते नहीं थे। पर उस
वर्णन को आज की भाषा में अप्लाई। जैसे पेट बहुत फूल जाना। अधिकांश कैंसर में आखिरी अवस्था में ऐसा होता है।
पेट बहुत फूल गया। हाथ पैर एकदम दुबले टंगे हुए से लग रहे हैं। पूरा शरीर कांप रहा है। कमजोरी ऐसी है। सड़क पर बेचारा
पड़ा हुआ है। तो सिद्धार्थ ने फिर पूछा इसका सॉफ्टवेयर फिर हैक कर लिया देवताओं ने।
देवताओं के कंट्रोल में है। अब जो सिखाया था सिद्धोधन ने। सारा भूल गया बेचारा। उसने पूछा कि भाई यह क्या है?
तो कहा जी यह बीमार व्यक्ति है। बुढ़ापे तक आते आते हर व्यक्ति बीमार हो ही जाता है। अगला पूछा यही हुआ है कि बाकी भी होते
हैं। ये सब होते हैं आप भी होंगे। सिद्धार्थ ने कहा वापस चलो। तो
फिर वापस चले गए। अब सिद्धार्थ की तो हिम्मत पड़ गई थी बाहर निकलने की। कुछ दिन बाद शुद्धोधन को लगा
यह घर में बैठे-बैठे सोचते सोचते पगला जाएगा और सन्यास ना ले ले तो शुद्धोधन ने जंगल में एक व्यवस्था की
कि वहां एक उत्सव करवाओ जिसमें नृत्य हो संगीत हो गान हो ये हो भोजन भोजन हो अप्सराएं तो होनी ही है शुद्धोधन के
प्रोग्राम में वो भी हो ताकि मेरा बेटा सन्यास ना ले और बाप ने बेटे से कहा बेटा कुछ दिनों के लिए वन में जाओ मंत्री
मंत्री साथ में जाएंगे वहां एक उत्सव है उत्सव में थोड़ा रहो अच्छा लगेगा तुम्हें भी बोला ठीक है बाऊजी चले जाते हैं और
शुद्धोधन ने छन से कहा इस बार उस रास्ते से मत जाना भाई तुम इस रास्ते से जाना रास्ता बदलवा दिया और देवताओं को तो सारे
रास्ते एक्सेसिबल है देवताओं को इससे क्या फर्क पड़ता है कि रास्ता ये लेना है कि वो लेना है उनके पास भी तो नेविगेशन सिस्टम
है ही अपना तो गौतम छन कंछक निकले रास्ता बदल के निकले
और इस बार देवताओं ने क्या किया अच्छा शुरू में कुछ ने किया। पहले वो जा रहा था वहां पर थोड़ा सा पहुंचा। जब उस उत्सव के
नजदीक था वहां पर अचानक एक शव यात्रा दिखा दी। बहुत सारे लोग जा रहे हैं। एक मुर्दा पड़ा
हुआ है अर्थी पे। चार ने कंधा लगा रखा है। बाकी लोग साथ में जो होता है धार्मिक कथन राम नाम सत्य जैसे वो बोलते हुए जा रहे
थे। सिद्धार्थ ने पूछा यह सोया क्यों हुआ है? उसे क्या पता कि मरना क्या होता है भाई जब
तक पता ही नहीं मरना क्या होता है आदमी सोया हुआ है और खुद क्यों नहीं चल के जा रहा
तो इसका फिर वही हुआ को फिर से देवताओं ने हैक कर लिया और ये कह रहा है कि ये मर गया है जी तो
सिद्धार्थ ने पूछा मर गया मतलब बोले ये तो अंत में सबको मरना ही होता है और और जब मर जाते हैं तो उसके बाद हमारा शरीर तो लकड़ी
जैसा हो जाता है। घास जैसा समझ लीजिए। अब इसमें आग लगा देंगे। जैसे लकड़ी जलाते हैं, घास जलाते हैं। इसको जला देंगे। जब
तक जीवन है जीवन है उसके बाद तो घास और लकड़ी जैसे ही है। फिर उसने पूछा यही मरा है कि सब मरते हैं। उसने कहा सब मरते हैं।
आप भी मरे हैं। अब सिद्धार्थ को लगा भाई कहां फंस गया मैं तो?
पर वन में उत्सव था। अब मना कैसे करें? बाप का आदेश है। खैर वन में गए और वन में इस बेचारे का मन नहीं लग रहा है। अन्य मास
का एकदम शांत बैठा हुआ है। गुपचुप बैठा हुआ पेड़ के नीचे। उधर नृत्य संगीत चल रहा है। सब सुंदर-सुंदर लोग बनके कोई सुरापान
कर रहा है। कोई कुछ कर रहा है। इसको कह रहे आप भी आइए। कह रहे हो तुम जाओ यहां से। यहां मौत सामने दिख रही है और तुम
ऐसीऐसी बात कर रहे हो यार। तो एकद दिन के बाद बुद्ध वहां से थोड़ा पैदल
निकले। मैंने ऊपर लिखा है। अच्छा इसमें दो व्याख्या है ना। अच्छा यह अगले स्लाइड
वाला है। चार पांच दृश्य मैंने लिखा हुआ था। आ तौर पर चार मानते हैं। मैं पांच का जिक्र कर रहा हूं।
अब इसके एक दो दिन के बाद वो एक खेत की ओर निकला। उसी वन वाले इलाके में वही रह रहा था।
और खेती होते हुए देख रहा था। अचानक नजर पड़ेगी। जब हल चलता है तो बहुत सारे कीड़े मकोड़े उसमें आकर मर जाते हैं।
लहूलुहान होते हैं। तड़पते हैं। कई बार तड़प-तड़ के दो चार कदम चलना चाह रहे हैं। नहीं चल पा रहे हैं। अचानक किसी का पैर
पड़ा पैर से दब के मर गए। और उसको ऐसा लगने लगा कि जैसे ये सब मेरे भाई बंधु हैं, रिश्तेदार हैं। मेरे ही
जैसे लोग हैं और कितनी गंदी मौत मरते हैं। सिर्फ इसलिए कि हम भोजन कर सके। इससे उसका मन और विरक्त होने लगा।
उसी शाम को एक पेड़ के नीचे ध्यान की मुद्रा में बैठा हुआ था। सब लोग कह रहे हैं कि आओ ना चलो ना थोड़ा पार्टी कर लो
हमारे साथ। नहीं आप लोग जाइए। ऐसा होता है 810 दोस्त पार्टी कर रहे हैं। वहां तेज म्यूजिक चल रहा है। डम डम डम डम चल रहा
है। सबके हाथ में गिलास है। एक फिलॉसफर पहुंच गया वहां। सब कह रहे हैं 4:00 बज गए हैं लेकिन
पार्टी अभी बाकी है। तो वो कह रहा नहीं जीवन ही बाकी नहीं। तो माहौल कितना अलग हो जाता है ना तो
दार्शिक किस्म का आदमी है ध्यान में बैठा हुआ है इतने में इसके सामने एक आया भिखारी या परिवराजक कह लीजिए भिक्षुक
क्योंकि सन्यासी भिक्षुक उस समय एक ही बात है जो भी सन्यास लेगा भिक्षा लेगा और भिक्षा भी क्यों लेगा उस समय क्योंकि
उत्पादन बढ़ गया था लोगों के पास फसल ज्यादा थी इसलिए भिक्षुकों का जीवन आसान हो गया था भिक्षा मिल जाती थी गरीब भी
इलाके भिक्षा थोड़ी ना मिलती है। भिक्षा अगर किसी समाज में खूब मिल रही है इसका मतलब ही है कि वहां की अर्थव्यवस्था बेहतर
हो गई है। और इसलिए इतने सारे सेक्ट और सारे श्रमण भिक्षा पे क्या क्यों हुआ? भिक्षावृत्ति पे टके हुए क्योंकि उस समाज
की परचेसिंग पावर या सेविंग्स उसके पास पर्याप्त है। और ये भिक्षा का मौसम भी कौन सा होता है? जब फसल कटती है वो वाला समय
होता है। उस समय भिक्षुक जाते हैं। और इतनी भिक्षा कि पूरे साला काम चल जाए। लेके अपने संग में रख के फिर पूरा साल
चलाते हैं अपना। यही तरीका था उस समय। भिखारी आया तो सिद्धार्थ ने आंख खोली। कहा कि मुझसे क्या चाहते हो?
मैं तो खुद ही समझ नहीं पा रहा हूं जीवन को। भिखारी बोला मुझे तुमसे कोई भौतिक चीज
नहीं चाहिए। वह सब तो मिल ही जाती है। जीवन का असली सुख यह जो असली भिक्षा
मांगने की है ना वो भौतिक सुख नहीं है। वो आध्यात्मिक सुख है। इन अनित्य चीजों में कुछ नहीं रखा है। जो
नित्य सुख है, आध्यात्मिक सुख है। इन भौतिक चीजों से परे का सुख है। असली सुख वो होता है।
और ये कहते ही अचानक उड़ के गायब हो गया। देवता था। डायरेक्ट एंट्री इस बार
एक देवता ही भिखारी के वेश में आया हुआ था। आखिरी कील ठोकने के लिए आया था कि माहौल
बना हुआ है। बस थोड़ा और हमला कर रहा है। आखिरी कील ठोकी। अरे इसमें क्या है? ये तो भौतिक सुख है। असली आध्यात्मिक सुख है। और
ये कह के उड़ गया। और दिखते हुए उड़ा। ये नहीं कि पेड़ के पीछे जाके उड़ के चला जाए। और बुद्ध ने देखा कि अरे ये तो देवता
था। तब बुद्ध को लगा अरे सब निरर्थक है। अब तो इन सुखों से बाहर निकलना होगा। यह वही चार पांच घटनाएं जो लिखी है जिनका
जिक्र मैंने [गला साफ़ करने की आवाज़] आपके सामने किया। अब बुद्ध ने ठान लिया कि बस अब तो सन्यास
होके रहेगा। दुख इस बात का था कि सात आठ साल के इंतजार के बाद अंततः वो पिता बन गया था और अब उसके सामने एक दुविधा यह भी
थी कि मेरा बेटा भी है। बहुत छोटा बच्चा था। अभी एक साल का भी नहीं हुआ था। दुविधा तो थी ही।
खैर सिद्धार्थ सिंह ने पिता से कहा कि पिताजी मैं सन्यास लेना चाहता हूं।
पिताजी 29 साल से यही वाक्य ना सुनना पड़े इस चिंता में ग्रस्त थे। 29 साल से रोज सपना देखते थे कि यह वाक्य ना बोल दे मेरे
सामने। और वो तब से इस में था कि कब बोल पाऊंगा। कई बार पूरी जिंदगी निकल जाती है। हम बोल ही नहीं पाते असली बात और कुछ लोग
बोल पाते हैं, कुछ लेट बोल पाते हैं। इनको 29वा साल लग गया बोलने में। पिताजी बोले बेटा कुछ तो सोचो।
तुम्हारे कितने सारे कर्तव्य हैं। बेटा वो तो सोचो। तुम्हारा कर्तव्य तुम्हारी पत्नी के प्रति है। तुम्हारे पुत्र के प्रति है।
तुम्हारी मां के प्रति है। मेरे प्रति ना भी मानो। है तो मेरे प्रति भी लेकिन मेरे प्रति ना भी मानो तो समाज के
प्रति है प्रजा के प्रति है। इतने सारे कर्तव्य हैं। तुम इन सारे कर्तव्यों को कैसे ठुकरा सकते हो?
तो सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि ऐसा बाबूजी मुझे तीन चीजों की गारंटी दे दीजिए। मैं नहीं जाऊंगा।
पर गारंटी देनी होगी। बोले बेटा तुम जो मांगोगे मैं दूंगा। तुम बस बोल दो। उसने कहा पहली गारंटी मेरी मौत नहीं होगी।
अब वो हिलने लगा यह क्या बात हुई यार तुम ठीक सी बात मांगते बोला बस तीन गारंटी दे दीजिए एक तो मेरी मौत नहीं होगी दूसरा
मुझे बुढ़ापा नहीं आएगा और तीसरा मुझे रोग कभी नहीं आएगा अगर आप तीन चीजों की गारंटी दे देंगे तो
मैं अनित्यता की चिंता से मुक्त होके इस जीवन का सामान्य व्यक्ति की तरह आस्वादन करूंगा। मुझे कहीं कोई समस्या नहीं है। बस
यह तीन गारंटी मिल नहीं रही है। और मैं जब जब बाहर जाता हूं एक और परेशानी ले आ जाता हूं। और अब मैं परेशानी के चरम बिंदु पर
हूं। अब मैं नहीं संभाल पा रहा हूं। यह अनित्य जीवन ये अनित्य संबंध ये अनित्य सुख मुझे सुहाते नहीं है।
इसलिए मैं चाहता हूं कि आप मुझे अनुमति दें। शुद्धोधन ने कहा मैं तो नहीं दूंगा अनुमति।
शुद्धोदय ने क्या किया? कपिल वस्तु के जो बाहर निकलने के दरवाजे थे और मजबूत बनवा दिए। बड़ी-बड़ी कुंडी बहुत बड़े-बड़े तारे
लगवा दिए उस पे। सारे प्रहरियों को बोल दिया कि ये बाहर नहीं निकलना चाहिए कपिल वस्तु से। सब ध्यान रखना। 24ों घंटे
ड्यूटी देनी है। बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं होना चाहिए। और बुद्ध परेशान है। उदाई से बात हुई।
उदाई ने कहा कि एकाक्षी टेप लेते हैं। अंतःपुर में सबको बोला भाई आज कुछ ऐसी व्यवस्था करो कि यह बच्चा रुक जाए। इसके
मन में आज भागने का विचार चल रहा है। आज रोको संगीत नृत्य जो करना है करो लेकिन उसको रोको किसी तरह से। अच्छा इनमें से
कोई यशोधरा से नहीं कह रहा कि उससे बात करो रोकने के लिए। अप्सराएं संगीत सूरा पता नहीं क्या-क्या। पर ठीक है। यह भी हो
सकता है कि सही बातें वर्णन तो वही है ना जो लिखे हुए मिले हैं। एक्सक्टली क्या हुआ पता नहीं।
अब शाम के समय बुद्ध की बेचैनी है चरम स्तर पर और
इधर से बहुत सारी अप्सराओं को ड्यूटी दे दी गई है कि याद संभालना है तो वो भी मुस्तैद है एकदम
और बुद्ध के आसपास के पूरे क्षेत्र में फैली हुई हैं। जैसे फिल्मों में नहीं होता पार्टी का सीन
है कि सब बहुत सारे लड़के लड़कियां पार्टी वाले ड्रेस में आए हुए हैं। यह लड़का एक ही है।
सब उस तरह से है और माहौल एकदम वैसा बना रखा है जैसे स्वर्ग का हो। बुद्ध को देखते बुद्ध को फूटी आंख नहीं
सुहाते ये लोग। मतलब कभी-कभी ऐसा होता है। आपको पता नहीं ऐसा हुआ है या नहीं। कभी कोई आपके सामने इस भाव से आए कि बहुत
सुंदर दिख रहा है और आपके मन में विष्णा का भाव आ रहा है। एक तो होता है कि आपको आकर्षण का भाव आ रहा है। एक होता है
आकर्षण नहीं आ रहा पर बुरा भी नहीं लग रहा। ठीक है। एक होता है बुरा लग रहा है कि यार नहीं ऐसे मत रहा करो। तुम थोड़ा
ठीक से रहा करो। चौथा आता है वितृष्णा का भाव कि तुम सामने आते ही क्यों हो यार। ऐसी बेरुखी का भाव। वि तृष्णा नफरत का भाव
बुद्ध को वैसा भाव आता है। देवताओं को लगा कि एक आखिरी बार हमें हस्तक्षेप करना ही होगा।
तो देवताओं ने हस्तक्षेप किया। देवताओं ने क्या किया? सबसे पहले वह जितनी अप्सराएं थी
उन सबको बेहोश कर दिया। और बेहोश भी ऐसे किया कि वह दिखने में विद्रूप लगने लगी। खराब लगने लगी कि कोई
बेहोश पड़ा है और इस तरह से पड़ा है कि उसे देख के नफरत सी हो रही है आपको। उत्सुकता तक नहीं।
गौतम बुद्ध समझ गए कि सही समय है। आज ही निकलना चाहिए। छन्न से कहा कि भैया तैयार हो जाओ। कंथक
को तैयार करो। आज हमें यह शहर छोड़ना है। छन को तो पहले ही हैक कर लेते हैं हर बार। छन कह रहे जी चलिए [हंसी]
छन को पता है। पर छन के मन में ये है कि जाएंगे कैसे? हर तरफ तो पहरी लगे हुए हैं। रास्तों पे अंधेरा है। रोशनी व है जहां
पहरी है। इतने मोटे-मोटे दरवाजे हैं साम्राज्य के। निकलेंगे कैसे? ये कह तो रहे हैं और कंथक के पैर में घुंघरू बंधे
हुए जब चलता है सड़क पे आवाज आती है पूरे शहर को पता लगता है कंथक निकला है राजकुमार निकला है
पर देवताएं देवताओं ने सब व्यवस्था कर रखी है जैसे ही वह चले तो कंथक के पैरों से आवाज
आने बंद हो गए जैसे वो हवा में चल रहा हो ऐसा वर्णन है उस पुस्तक में अंधेरे रास्ते अपने आप प्रकाशित हो गए
ताकि रास्ता ढूंढने में दिक्कत ना हो। सारे के सारे टहरी बेहोश हो गए। सब गहरी नींद में चले गए।
और सबसे बड़ी बात इतने मोटे-मोटे भारी-भारी दरवाजे अपने यहां खुल गए। और छन्न भी परेशान है कि ये सब क्या हो
रहा है? मैं नशे में तो नहीं हूं। वो तो है और उसको लग रहा है मैं नशे में तो नहीं
हूं। और यह सब हुआ और उसके बाद आधी रात को अपने सफेद घोड़े पर सवार
सिद्धार्थ और छन कपिलवस्तु के बाहर निकले मतलब महल के बाहर निकले और सुबह होते वो पहुंच गए वन वाले क्षेत्र में जंगल वाले
क्षेत्र में और सुबह जैसे हुई सिद्धार्थ ने पीछे देखा कपिलवस्तु को और शेर की तरह दहाड़ा
यह वाक्य मुझे अटपटा सा लगता है। दहाड़ने की क्या जरूरत है? कहना काफी है। पर उसमें लिखा है शेर की तरह दहाड़ा
पूरी तरह मुक्त होने के बाद ही लौटूंगा। उससे पहले नहीं। तो बुद्ध चरित्र में इतना हुआ। सुबह
होते-होते पूरे राज्य में हड़कम मच गया। बाबूजी को पता लग गया कि फाइनली 29 साल से जो हमने रोका हुआ था वो कल हो ही गया है।
बेटा भाग गया है। सबको लाइन हाजिर कर दिया कि तुम क्या कर रहे थे। पता नहीं हम तो बेहोश हो गए थे। हम तो सो गए थे। दरवाजे
कैसे खुले समझने ही नहीं अपने खुल गए। प्रकाश अपने आप हो गया। तो फिर उदाई ने से जो उनका मंत्री था उसने कहा कि देखिए
आप बहुत परेशान हो रहे हैं। लेकिन सच बात यह है कि आपने जितने प्रयास किए हमने जितने प्रयास किए वो अपनी जगह है।
पर आप आचार्य असत की भविष्यवाणी को अगर याद कर पा रहे हो तो यह होना तो था ही। आपने 29 साल रोक लिया। यह बड़ी बात है। यह
तो होना ही था। जब देवता ही शामिल हो जाएंगे, पूरी नियत ही शामिल हो जाएगी तो कौन रोक सकता है? तो हो गया। अब इसे
स्वीकार करना चाहिए। शुद्धोधन ने कहा ना स्वीकार नहीं करूंगा। तुम भागो तुरंत घोड़ा ले उसके पीछे। और
उसको समझाओ। तो उदाई और कुछ लोग गए उसे पीछे। वहां जाकर उसे ढूंढ लिया। उस बीच में छन कंसक
वहां से निकल गए हैं। अभी मैं उसका जिक्र करूंगा। फिर समझाने का प्रयास किया। गौतम ने कहा
भाई कितनी बार समझाओगे यार। आपको लगता है कि आपके समझाने से मुझ पर असर पड़ता है कुछ। बिना बात के बार-बार आ जाते हो। अरे
पिताजी को समझा दो। वो मोह में फंसे हुए हैं। लोभ में फंसे हुए हैं। हर संबंध अनित्य है। अगर मैं मर जाऊंगा तो भी तो
ऐसा ही होगा ना। बिछड़ना पड़ेगा। कल को उनकी मृत्यु होगी। बिछड़ना पड़ेगा। दुनिया में कौन सा संबंध है जो नित्य रहता है? और
अनित्य संबंध के लिए इतना मोह क्यों? अब छन्न और कंथक वहां तो आ गए थे। अब जब बुद्ध उतर गए
बुद्ध ने कहा कि अब आप लोग वापस जाइए। कहां कहा? तो एक अनोमा नदी है। अगर आप नक्शा देखेंगे मैं थोड़ी देर में दिखाऊंगा
नक्शा। तो वहां तक आ गया। वो समझ लीजिए कि कपिल वस्तु से राजगीर के रास्ते में पड़ती है। अनुमा के तट पे आकर बोले कि अब आप
जाइए आगे मैं अकेला जाऊंगा। तो छन्न रोने लगा कि अरे मैं कैसे छोड़ सकता हूं आपको? बुद्ध ने कहा देखिए जितने मेरे संबंधी इस
जगत में हैं उन सबसे महान संबंध आपके साथ मेरा है। मेरे पिता से भी नहीं, मेरी पत्नी से भी नहीं, मेरे पुत्र से भी नहीं।
आपका संबंध उन सबसे ऊपर है। आपने जितना मेरा साथ दिया है, उसकी तो कोई तुलना ही नहीं है। फिर भी आगे की यात्रा मुझे अकेले
ही करनी है। कंथक की भी आंख से आंसू आने लग गए। रामचरितमानस में राम के घोड़े रो रहे हैं।
राम के जाने के बाद। यहां भी घोड़ा रो रहा है कि सिद्धार्थ दूर होना पड़ रहा है। खैर, ये वापस लौटे। वापसी का रास्ता एक
दिन का था। पर वापस लौटे हैं आठ दिन में। इतना धीरे-धीरे इतने थके हुए चलने का मन नहीं कर रहा। बहुत उदास हैं।
सारा कपिल वस्तु वेट कर रहा है कि हुआ क्या? ना छन्न मिल रहा है ना कंथक मिल रहा है ना सिद्धार्थ मिल रहा है। उदाई उसके
बाद क्या है? आठवें दिन ये पहुंचे हैं और जब कंथक पहुंचा अपने अस्तबल में
बहुत व्यथित होके नाराज होके उसने जोर से अपना सिर ऐसे किया। आवाज आई घुंघरों की। लोगों को लगा कि लगता है कि सिद्धार्थ
कंथक पे बैठ के वापस आ गया है। लोग भागे-भागे अस्तबल में गए। खुश हो गए। शुद्धोधन भी महाप्रजापति भी यशोधरा भी सब
पहुंचे। वहां जाके देखा वो तो खाली है। और तब छन ने पूरी कहानी बताई और सब फिर विलाप करने लगे। रोने लगे जोर-जोर से।
उसके बाद फिर उदय को भेजा कि तुम एक कोशिश करो। लेकिन उसका कोई खास मतलब था नहीं। यह एक व्याख्या है। चार दृश्य देखे,
परेशान हुआ, सन्यास लिया, चला गया। अब इसकी दूसरी व्याख्या देखिए क्या हो सकती है? हो सकती है ना क्या हुई है?
बुद्ध और उनका धम्म नाम के पुस्तक में डॉ. अंबेडकर ने इसकी व्याख्या कैसे की? नवयान के लोग इसको मानते हैं। मतलब हीनयान के
लोग कम आध्यात्मिक मानते हैं। महायान के लोग दैवीय खूब मानते हैं। नवयान के लोग इस व्याख्या को मानते हैं। यह क्या व्याख्या
है? अंबेडकर ने नई व्याख्या क्यों की? क्योंकि उनके मन में दो बातें खटक रही थी।
पहली बात यह कि 29 साल के व्यक्ति ने किसी बूढ़े को ना देखा हो, मृत को ना देखा हो, बीमार को ना देखा हो। ये मानने वाली बात
नहीं है। वो इस चीज से बचना चाहते थे। दूसरी बात वह यह चाहते थे कि बिना बात के अलौकिकता इन घटनाओं में जो देवताओं का
हस्तक्षेप इतना ज्यादा है वो नहीं होना चाहिए। क्यों होना चाहिए? तीसरी बात जो लिखी नहीं है पर उनके समर्थक
ऐसा मानते हैं कि यशोधरा को लेकर भी एक उनके मन में भाव रहा होगा कि उसकी भूमिका भी सकारात्मक होनी चाहिए। उससे छिप के चले
गए। गौतम बुद्ध ऐसा क्यों करना है मिलके जाए बात करके जाए और चौथी बात इतना महान व्यक्ति इतना बड़ा
कदम जब भी उठाएगा केवल अपनी आध्यात्मिक भूख के लिए नहीं उठाएगा कोई ना कोई सामाजिक भूमिका इस चीज के पीछे होनी चाहिए
और वो कहते हैं कि मोक्ष का विचार मैं नहीं मानता हूं बुद्ध वाला मोक्ष का मतलब है इस दुनिया को इतना अच्छा
बनाओ कि हर व्यक्ति के लिए जिंदगी मोक्ष जैसी हो जाए। मोक्ष को अहलौकिक ही होना चाहिए। ये डॉक्टर अंबेडकर ने खुल के लिखा
है। नवयान महात्मा बुद्ध को पूरा नहीं मानता है। नवयान कई चीजें नए तरीके से एक्सप्लेन करता है। जिसमें एक ये भी है
मोक्ष धारणा भी है। इन वजहों से उनको लगा कि मैं एक नई तरीके से इस कहानी को कहूंगा और मैं ये स्पष्ट
कर दूं कहानी में नयापन डॉ. अंबेडकर का अपनी ओर से बिल्कुल नहीं है। उन्होंने कहीं-कहीं से लिया है।
जनरली बुद्ध चरित्र को फॉलो किया है। इस प्रसंग में और एककाधर प्रसंग में उन्होंने बाकी परंपराओं की चीजों को स्वीकार कर
लिया। क्या पृष्ठभूमि है? अब देखिए एकदम नई कहानी। कहानी यह है कि शाक्यों का संघ था। आपको
पता ही है। कपिलवस्तु शाक्यों का इलाका है तो वो उसमें रहते थे। शाक्यों का जो भूगोल है तो समझ लीजिए कि
शाक्य हैं बीच में एक नदी है और नदी के इधर रहते हैं कोलिया। इस नदी का नाम है रोहिणी।
ठीक? शाक्यों और कोलियों के भौगोलिक क्षेत्र के बीच में बहती है एक नदी रोहिणी।
रोहिणी नदी के पानी का इस्तेमाल शाक्य भी करते हैं, कोलिय भी करते हैं। उसको लेकर समझौते हैं कि आप कितना पानी इस्तेमाल
करेंगे, हम कितना पानी इस्तेमाल करेंगे। ये समझौते हैं। ये बैकग्राउंड है। शाक्य गणराज्य में एक नियम है कि जब कोई
युवक 20 साल का होता है तो उसको परिषद का हिस्सा बनाते हैं। तो जब सिद्धार्थ 20 साल का हुआ परिषद की मीटिंग हुई और कहा गया कि
परिषद में जो नए युवक आने के लिए योग्य हैं उनमें सिद्धार्थ हैं। क्या किसी को आपत्ति है? किसी ने आपत्ति नहीं की तो संघ
का हिस्सा बन गया। प्रतिज्ञा ली थी कि मैं शाक्य संघ के हित में सब संभव काम करूंगा और कोई ऐसा राजद्रोह या देशद्रोह नहीं
करूंगा जो शाक्य संघ के खिलाफ होगा। 20 के थे शादी हुई थी। संघ में शामिल हुए। अब आइए 28 साल की उम्र में।
28 की उम्र तक क्या है कि सिद्धार्थ एकदम ठीक चल रहे हैं। मन में भाव आता है सन्यास लेने का पर जीवन जी रहे हैं। पेरेंट्स के
साथ, पत्नी के साथ बच्चा भी हो गया। वो सब निभा रहे हैं। और 28 की उम्र में अचानक क्या हुआ कि
शाक्यों और कोलियों के बीच रोहिणी नदी के जल के बंटवारे को लेकर एक झगड़ा हो गया। झगड़ा थोड़ा सा बढ़ गया। तू तू में हो गई,
हाथापाई हो गई कुछ लोगों में। जैसे आजकल भी होता है सिंधु जल समझौता देखिए भारत पाकिस्तान अब एकदम कब किस दिन
क्या करेंगे समझ में नहीं आता है राज्यों में देखिए दिल्ली या उत्तर हरियाणा ये दिल्ली के बीच में जब झगड़ा होता है पानी
को लेकर ये भी झगड़ा होता है ये कावेरी वाटर डिस्प्यूट देख लीजिए अंतर राज्यय जल न्यायाधिकरण जो हम बनाते हैं संविधान के
तहत वो देख लीजिए वही समस्या वैसी समस्या तो हो गई एक छोटी सी झड़प। अब क्या होता है कि कुछ लोगों के लिए
युद्ध होती है रोजीरोटी। युद्ध होता रहे तो सत्ता ठीक चलती रहती है। उनकी
सरहदों पर तनाव है। पता करो क्या देश में चुनाव है। तो लोकतंत्र में युद्ध आमतौर पे इसलिए भी
होते हैं कि चुनाव आने वाला है। हमेशा इससे नहीं होते। लेकिन हां एक बड़ी वजह ये हो सकती है क्योंकि युद्ध के समय लोगों के
इमोशंस बहुत बढ़ जाते हैं। वो देश की सरकार या राज्य की सरकार को सपोर्ट करने के मूड में ज्यादा आ जाते हैं। उसी माहौल
में वोटिंग हो जाए तो इलेक्शन 5 साल के लिए या चार साल के लिए जीत जाते हैं। ऐसा होता है अक्सर होता है ऐसा। और युद्ध शुरू
होते ही सबसे बड़ी बात क्या है? इमरजेंसी लग जाती है। इलेक्शन पोस्टपोन हो जाते हैं। अगर सरकार 4 साल की है मान लीजिए
किसी देश में और 3 साल 11 महीने बाद युद्ध शुरू हो गया। इमरजेंसी लग गई और उसमें क्या घोषणा हुई? युद्ध खत्म होने तक
यथास्थिति चलेगी। अब राजा चाहेगा युद्ध खत्म हो, चलता ही रहे। चलता रहे। उसी में रोजीरोटी है उसकी चलता रहे। और सेनापति
लोगों को कई बार क्या होता है जैसे पाकिस्तान की सेना है। पाकिस्तान की सेना को जब तक युद्ध ना हो उनका अस्तित्व खतरे
में आ जाता है। तो कहीं ना कहीं कुछ होते रहना चाहिए ताकि सेना जरूरी है। यह भाव बना रहे। और ये हमेशा से है। यहां भी था।
तो सेनापति ने एक मीटिंग बुलाई। कौन से सेनापति ने? शाक्यों के सेनापति ने मीटिंग बुलाई।
मीटिंग में सब लोग गए। सिद्धार्थ भी गया और मीटिंग में उसने कहा देखो भाई ऐसा है। ये कोरिए लोग संभल नहीं रहे हैं। इन्होंने
फिर मारपिटाई की है। अब समय आ गया है कि हम इनके खिलाफ एक बड़ा युद्ध करें और एक ही बार में मामला सुलझा दें।
सबसे पूछा आपकी राय क्या है? सब चुप। बुरे लोग दुनिया का खतरा नहीं है। शरीफों की चुप भी खतरनाक है। शरीफ लोग चुप रह
जाते हैं। सब चुप। तो सिद्धार्थ उठा। उसने कहा मैं युद्ध का विरोध करता हूं।
सबको लगा चलो एक तो है। सेनापति ने पूछा क्यों? उसने कहा मुझे यह पता लगा है कि पानी
विवाद की झगड़े की शुरुआत हमारे सैनिकों ने की थी। हम यह कैसे मान ले कि विवाद की शुरुआत
कोलियों ने ही की है और हमें उनको दंड देना ही चाहिए। यह बात आज कहना आसान है कि हमारे सैनिकों ने शुरुआत की थी। बड़ा
मुश्किल काम है। किसी भी देश को बड़ा मुश्किल काम है। पर सिद्धार्थ ने कहा सेनापति ने कहा यह बात ठीक है कि शुरुआत
हमारे सैनिकों ने ही की थी। पर पानी पर पहला हक भी तो हमारा बनता है और कोहली यह बार-बार परेशान भी तो करते हैं।
सिद्धार्थ ने कहा नहीं ठीक है तो उसका दूसरा तरीका भी तो है। उसका तरीका यह है कि हम यहां से दो
व्यक्तियों को तैनात कर देते हैं। उनसे कहते हैं कि वह भी दो व्यक्तियों को भेज दें। और यह चार व्यक्ति मिलके किसी एक को
और जोड़ ले और यह पांच लोगों का न्यायाधिकरण या पंचायत बना दीजिए। वह मिलकर फैसला कर लेंगे। इसमें युद्ध की
क्या जरूरत है? पानी का बंटवारा ही तो करना है। युद्ध से क्या होगा? युद्ध से पहले खून बटेगा। पानी कैसे
बटेगा? पानी जब भी बटेगा बातचीत से ही बटेगा। सेनापति को लगा कि ये तो बात भारी पड़ गई
है। जनता समर्थन करने लगी सिद्धार्थ का। बोल के नहीं चुपचाप। सेनापति से कौन पढ़ना बोल लेगा? मन ही मन में।
सेनापति बोला तुम सत्य क्षत्रिय नहीं हो। उसने कहा मैं क्षत्रिय होने का मतलब बिना बात के हिंसा करना नहीं समझता हूं।
सच्चा क्षत्रिय वह है जो तब तक युद्ध नहीं करता जब तक जरूरी ना हो। और जब जरूरी हो तो युद्ध से पीछे नहीं हटता है।
गैर जरूरी युद्ध करना क्षत्रिय होने की निशानी नहीं है और मैं इसे गैर जरूरी युद्ध मानता हूं।
तो उसने उठ के तीन चार बड़ी-बड़ी बातें बोली। अरे ये तो कायर आदमी है। अरे ये देशद्रोही है। ये है वो है। जो जिंदा है
वो नहीं ऐसा कर सकता। खोलियों को मारना होगा। बताओ कौन हमारे साथ में है? वोटिंग करवा दी। इमोशनल पहले ही कर दिया था। तो
वोटिंग में सेनापति जी जीत गए। तो तय हुआ कि युद्ध तो होगा। फिर अगली मीटिंग बुलाई गई अगले ही दिन।
इस मीटिंग में डिसाइड करना था कि क्या अनिवार्य सैनिक सेवा लागू की जाए और सेनापति का प्रस्ताव था कि
20 साल से 50 साल तक के प्रत्येक पुरुष के लिए अनिवार्य सैनिक सेवा का प्रस्ताव पारित
करेंगे और सारे के सारे युवकों को युद्ध में जाना पड़ेगा हथियार लेके। कल जिन्होंने हां किया था नारे लगाए थे आज
उनकी हालत खराब थी। कल तक तो यह था कि यह लोग जाएंगे लड़ने के लिए मजा आएगा। आज तक यह जाना है। युद्ध में कोई दूसरा जाए आपको
टीवी पर देखना हो तो क्या दिक्कत है? टीवी पे YouTube पे देख रहे हैं। अरे क्या बात है ईरान पे क्या हमला किया? वाह वाह वाह
वाह वाह। अरे राष्ट्रपति मार दिया। क्या बात है। इसको मार दिया। उसको मार दिया। अरे तेल का टैंकर जला दिया। वाह क्या हमला
किया है। इनका पूरा पोत मार दिया। 120 सैनिक डूब गए। अरे वाह। वीडियो देखने में मजा आ रहा है। खुद पोत पे बैठो।
स्टेट ऑफ हॉर्मस में जाओ जरा। एक बार फिर बताओ कि युद्ध में कितना मजा आता है। तब लगता है कि ना भाई जरूरी हो तो युद्ध
करेंगे। गैर जरूरी जीवन में भी नहीं करना चाहिए। बिना बात के युद्ध करना। जरूरी है तो कीजिए। बिना बात के क्यों करना है
युद्ध? वो जाहिर वाली बात है। जंग तो खुद एक मसला है। जंग क्या मसलों को हल करेगी? जंग से
क्या समाधान होगा? अब यह हुआ। सब लोग बैठे हैं। सेनापति ने कहा मैं प्रस्ताव करता हूं कि 20 से 50
साल के सभी युवकों को अनिवार्य सैनिक सेवा के लिए बाध्य किया जाए। सब चुप। सिद्धार्थ ने कहा मैं विरोध करता हूं। मैं युद्ध में
भाग नहीं लूंगा। सेनापति ने कहा डरपोक हो। बुद्ध ने मेरे ख्याल से कहा होगा अकेले
में आकर देख लो एक बार। भाई सैन्य विद्या तो सही है उनके पास। ऐसेसे पांच सेनापति संभाल लेंगे। पर बात
यही है ना कि ताकत है तो इस्तेमाल कर ही देना। इसका क्या मतलब है? ताकत संभाल के रखनी है। ताकत का इस्तेमाल बहुत विवेक के
साथ होना चाहिए। सबसे अच्छे आईपीएस वो हैं जो जिंदगी भर एक डंडा तक किसी को नहीं मारते। और तब भी
शानदार काम करते हैं। ताकत है इस एहसास से ही काम हो जाते हैं। ताकत के दुरुपयोग की जरूरत नहीं पड़ती।
बात बात पर ठाई ठाईए करने वाले वह समझदार लोग नहीं होते हैं। ताकत है अच्छी बात है। ताकत का दुरुपयोग क्यों करना है?
तो सेनापति ने कहा आपको पता है कि ऐसा करने पर हम आपको दंड दे सकते हैं और आपने शाक्य गणतंत्र के
पक्ष में जीवन जीने की शपथ ली थी। सिद्धार्थ ने कहा मैं तो शाक्य गणतंत्र के पक्ष में ही बात कर रहा हूं। विरोध में तो
आप बात कर रहे हैं। मैं तो पक्ष में ही हूं। शपथ भी मुझे ध्यान है और मैं युद्ध को शाक के गणतंत्र के पक्ष में मानता ही
नहीं। इसलिए मैं इसका समर्थन नहीं करूंगा। तो उसने कहा हम आपको दंड देंगे और आप
ध्यान रखिए। हम आपको देश से निकाल भी सकते हैं। मृत्युदंड भी दे सकते हैं। राजद्रोह के आरोप में। सिद्धार्थ ने कहा कि आपकी
इन्हीं हरकतों की वजह से कौशल नरेश का हम पर प्रभुत्व बढ़ता जा रहा है। क्योंकि जैसे ही उनको पता लगता है कि इस
राज्य के भीतर इतने झगड़े हैं उनकी शक्ति हम पर और हावी हो जाती है। कौशल नरेश समझ पा रहे हैं ना? प्रसंजित
सेनापति कह रहे हैं कि आप कौशल नरेश के नाम से हमको डरा रहे हैं। अरे मैं डरा नहीं रहा हूं। वस्तु स्थिति
बता रहा हूं। और रही बात मुझे मृत्युदंड देने की तो मैं उसके लिए हंसकर तैयार हूं। मैं युद्ध में
भाग नहीं लूंगा। आप मुझे मृत्युदंड देना चाहे आज ही दे दीजिए। मुझे बिल्कुल दिक्कत नहीं है।
देश निकाला देना देश निकाला दे दीजिए। मुझे कोई दिक्कत नहीं है। पर मैं युद्ध में शामिल नहीं हऊंगा।
उसने कहा हम आपके परिवार का सार्वजनिक अपमान भी कर सकते हैं। अब बुद्ध थोड़ा परेशान हो गए कि मुझे
मारना है मार लो भाई। देश से निकाला निकाल लो। परिवार को बीच में मत लो। अब बुद्ध के पास तीन ऑप्शन थे।
एक ऑप्शन था कि मृत्युदंड या देश निकाला स्वीकार कर लें। एक था कि युद्ध में भाग लें और लड़े।
और एक था कि परिवार का अपमान। सार्वजनिक अपमान होने के लिए यहां करें। तो बुद्ध ने कहा मैं युद्ध तो लडूंगा
नहीं। मैं यह भी नहीं चाहूंगा कि मेरे परिवार का अपमान हो। मेरा निवेदन है कि मुझे मृत्युदंड या देश निकाला जो भी सब
उचित समझे फैसला करें। मैं दोनों के लिए तैयार हूं। तो किसी ने कहा कि अगर हमने इसको देश
निकाला दिया, मृत्युदंड दिया तो प्रथजीत को पता लग जाएगा। युद्ध भी उसको पता ही होगा। वह समझ जाएगा
कि युद्ध करने के लिए इसको मारा गया है तो वह हमें नहीं छोड़ेगा। तो गौतम ने कहा एक काम करते हैं इसका समाधान मैं ही निकालता
हूं। मैं ऐसा करता हूं मैं सन्यास ले लेता हूं। प्रवृज धारण करता हूं और कपिल वस्तु छोड़ के चला जाता हूं।
अब क्योंकि मैं सन्यास लूंगा। ना आपने मुझे देश निकाला दिया। ना आपने मुझे मृत्युदंड दिया। सन्यास स्वेच्छा से लिया
है तो इस बात से किसी को क्यों फर्क पड़ेगा कि मैं यहां हूं या नहीं हूं। सेनापति और उसके जो समर्थक लोचन लगा हां
ये आईडिया ठीक लग रहा है। तो उसने कहा लेकिन सन्यास लेने के लिए माता-पिता की अनुमति चाहिए। बोला वो आप छोड़ दीजिए। वो
मेरी जिम्मेदारी है। मैं वायदा कर रहा हूं तो मैं लूंगा सन्यास। सहमति बन गई कि गौतम बुद्ध सन्यास लेंगे।
और तभी एक तरुण सा युवा सा लड़का उठा। उसने कहा हुजूर एक बात और बताइए यह लेंगे सन्यास।
दो दिन बाद आप युद्ध कर देंगे। प्रसेनजीत को पता लगेगा। इतनी कॉमन सेंस तो किसी में भी होती है कि युद्ध के दो दिन पहले
सन्यास लिया है तो जरूर इन दोनों बातों में कोई संबंध रहा होगा। तो सभा में एक निष्कर्ष और निकाला
कि बुद्ध के सन्यास लेने के कुछ अंतराल के बाद हम युद्ध शुरू करेंगे ताकि कौशल नरेश को प्रसेनजीत को यह ना लगे
कि बुद्ध को इस वजह से जाना पड़ा कि वो युद्ध का विरोध कर रहे हैं। इस बिंदु पर सभा समाप्त हुई। गौतम बुद्ध
का महा विनिष्क्रमण इसलिए नहीं था कि एक मुर्दा देख लिया, एक बूढ़ा देख लिया, एक बीमार देख लिया। इसलिए था कि अपने समाज
को, अपने राज्य को एक अवांछित युद्ध से बचाने के लिए उन्होंने अपनी ओर से बेस्ट एफर्ट किया। वो एफर्ट चला नहीं चला अलग
बात है। और यह बात ध्यान में रखना है। ये डॉ. अंबेडकर की व्याख्या है। कई और लोगों की व्याख्या है। यह बुद्ध चरित्र की
व्याख्या नहीं है। तो इस पे ऐसा नहीं है कि हमें सहमत होना जरूरी है। लेकिन हां एक इंटरप्रिटेशन उन्होंने की है।
अब यशोधरा का महत्व देखिए। अब बुद्ध पहुंचे अपने घर। अच्छा ऐसी खबरें पहले पहुंचती है कि बुद्ध के पहुंचने के
बाद पहुंचेंग। खबरें पहले पहुंच जाती हैं। सारी खबरें पहले पहुंच गई हैं। बुद्ध घर गए हुए हैं और घर में शुद्ध होन बाबू।
एकदम श्मशान घाट जैसा माहौल बना रखा है घर के अंदर। जैसे ही घर पहुंचे शुद्धोधन और
महाप्रजापति उनके तरफ गए कि यह क्या कर दिया बेटा तुमने? बोले क्या कर दिया? सेनापति युद्ध के लिए लोगों को भड़का
भड़का के जब एक तरफ कर सकता है और लोग इतने भी विवेकशील नहीं है कि युद्ध नहीं करना चाहिए तो कोई तो बोलेगा। मैंने अपनी
जिम्मेदारी निभाई सही बात की। और आपका अपमान होने दूं। इससे लाख गुना अच्छा है कि मैं मृत्युदंड स्वीकार करूं।
मृत्युदंड से समाज का नुकसान हो रहा है कि प्रसंजित आ जाएगा यहां पर। तो इन सब में सबसे अच्छा क्या था कि मैं अकेला निकल
जाता हूं यहां से। कम से कम कपिल वस्तु समृद्ध रहे, शांत रहे, ठीक रहे। तो मां-बाप बोले कि बेटा हम भी तुम्हारे
साथ चलते हैं। उसने कहा कैसी बात करते हो? राहुल की उम्र अभी एक साल भी नहीं। नंद अभी छोटा है। इन बच्चों को अपना बचपन जीने
दो। कहां जंगलों में फिरोगे मेरे साथ? और जंगल में परिवार ही लेके जाऊंगा तो सन्यास किस बात का हुआ? ये कैसा सन्यास है कि
फैमिली ट्रिप पे चले गए। सन्यास थोड़ी ना होता है वो। फिर बोले कि अच्छा एक काम करते हैं। तुम
सन्यास छोड़ो। कौशल में चल के रह लेते हैं श्रावस्ती में। वहां हम कपिल वस्तु के लोगों से बचे रहेंगे और निश्चिंत होकर
रहेंगे। उससे कहा यह तो सच्चा देशद्रोह होगा। जिस राजा से मेरे समाज को मेरे राज्य को
खतरा होता है मैं उसी राज्य में जाकर रहना शुरू कर दूं। कोई भारत की नागरिकता छोड़ के पाकिस्तान ही रह दे।
कि मैं बच गया। दाऊद को ही शोभा देता है ना। किसी को क्यों शोभा देगा समझदार आदमी को? नहीं होना चाहिए। मैंने यूक्रेन की
नागरिकता छोड़ के रूस की ले ली। अमेरिका छोड़ के ईरान की नागरिकता ले ली। कोई ऐसा क्यों करेगा?
तो देशद्रोह तो यह हो ही जाएगा अगर मैं वहां जाऊंगा तो। बोले बात तो सही है। फिर बेटा
क्या कर सकते हैं? एक काम करो ना। युद्ध तो स्थगित हो ही गया है। तो कुछ दिन मत जाओ।
बोले माता जी युद्ध इसीलिए स्थगित हुआ है कि अंतराल दिखे। मेरे जाने और युद्ध होने के बीच में मैं
रुक ही जाऊंगा तो युद्ध और अंतराल हो जाएगा तो यह लोग फिर मुझे मृत्यु दंड देंगे या देश निकाला देंगे ये आपका अपमान
करेंगे सबको समझाया ऐसे नहीं करते समझा करो बात को सोच समझ के बोल के आया हूं जाना होगा
और जाने की तैयारी फिर शुरू हो गई तो यशोधरा अपने कमरे में थी राहुल के साथ बुद्ध चरित्र में तो बुद्ध बिना बताए भाग
लिए। बहुत नाराज है यशोधरा मुझसे। उनकी बुद्ध चरित्र वाली।
लेकिन यहां जो व्याख्या हुई उसमें ये कि इसके बाद बुद्ध गए यशोधरा के पास। देखिए 1920 के आसपास महषण गुप्त ने एक
किताब लिखी थी यशोधरा। उसमें यशोधरा को बहुत ही महान तरीके से पेश किया।
कैसे पेश किया? एक तो यशोधरा इस बात से बहुत नाराज है कि मुझसे बिना बताए चले गए। एक कविता बहुत
प्रसिद्ध है। सखी वे मुझसे कह कर जाते। मतलब सिद्धि हेतु स्वामी गए। यह गौरव की बात पर चोरी चोरी गए। यही बड़ा व्याघात।
सखी वह मुझसे कह कर जाते। कह तो क्या वे मुझको अपनी पथ बाधा ही बातें। अरे कह देते मुझसे
स्वयं सुसज्जित करके क्षण में प्रियतम को प्राणों के प्रण में हम ही भेज देती हैं रण में क्षात्र धर्म के नाते सखी वो मुझसे
कह कर जाते अरे हम तो युद्ध होता है अपने पति को खुद तिलक लगा के भेजते हैं कि युद्ध में जीत के आना हम क्यों पीछे हटते
अगर ऐसी बात होती जावे सिद्धि पावे वे सुख से दुखी ना हो इस जन के दुख से उपालंब दूं मैं किस मुख से आज अधिक वो वो भाते सखी वो
मुझसे कह कर जाते हैं। कितना दुख है उसको इतने साल का साथ है। अचानक चले गए। अरे बात कर ली होती बाहर तो छोड़ के आते हम
विदा करके आते। पर यहां कहानी दूसरी है। और उसके बाद भी उस यशोधरा ने क्या किया? मैसेजगुप्त के
यहां उसका जिक्र थोड़ी देर के बाद आएगा। अब बुद्ध पहुंचे यशोधरा के पास। चुपचाप जाकर बैठ गए।
यशोधरा कह रही है कि सभा में जो कुछ भी हुआ मुझे उसकी जानकारी मिल चुकी है। बुद्ध कह रहे हैं कि तुम्हें मेरा निर्णय
कैसा लगा? यशोधरा कह रही है कि उसमें कैसा लगने की क्या बात है? आपकी जगह मैं होती तो मैं भी
यही करती। कोई भी समझदार व्यक्ति यही निर्णय करता। और मुझे खुशी है कि आपने एक अच्छा निर्णय
किया। इच्छा तो मेरी यह है कि मैं भी आपके साथ चलूं।
जैसे सीता वाला प्रसंग है कि राम गए तो सीता भी साथ में। इच्छा तो मेरी यह है कि मैं भी साथ चलूं। लेकिन राहुल इतना छोटा
है कि शायद इस समय इसको ले जाना संभव नहीं होगा। तो मैं आपको यह विश्वास दिलाती हूं कि
राहुल की ओर से अपने पिता, माता और नंद की ओर से अपने निश्चित रहें। उन सबका ध्यान रखने की मेरी जिम्मेदारी है। आप उस चीज से
एकदम निश्चिंत होकर अपने रास्ते पर जाए। और तीसरी बात अब आप जा ही रहे हैं तो कोई ऐसा मार्ग ढूंढ लिए। आपके मन में
बड़ा आध्यात्मिक भाव रहता भी है। यह तो एक तात्कालिक कारण है जाने का। जा ही रहे हैं तो कुछ ऐसा रास्ता ढूंढ लिए जिससे पूरे
समाज का कल्याण हो सके। पूरी मानवता का कल्याण हो सके और मुझे भी इस बात का गर्व हो कि मेरे पति ने समाज के लिए कुछ बड़ा
काम किया है। अब ये सुनकर बुद्ध को कैसा लगा होगा? सीधी सी बात है। आंखों से आंसू आ गए होंगे।
उनके मन में यशोधरा के लिए सम्मान इतना बढ़ गया। उन्होंने सोचा नहीं था कि ऐसा रिस्पांस मिलने वाला है।
और तब वहां से बुद्ध निकले हैं यशोधरा से पूरी सहमति लेकर। यह होता है एक परंपरा को डेमोक्रेटिक
तरीके से रिडफाइन करना। फिर अंबेडकर वहां से सॉरी मतलब अंबेडकर की किताब में फिर बुद्ध वहां से गए हैं और जब
गए हैं तो वो चाह रहे थे किसी को पता ना था अरे चुपचाप चला जाऊं। केवल एक अपने कजिन से कहा महा नाम से अब बताओ कौन है
महाना? किसी का तो बेटा है और जिसका बेटा है उसके नाम के अंत में धन
आता है क्योंकि सबके नाम में आता है शुद्धोधन अमितोधन शुक्लोदन शाक्योधन धतोधन सब धन
वाले ही है कौन शुक्लोदन हां तो महानाम जो है चचेरा भाई है शुक्लोदन का पुत्र है गौतम ने इनसे कहा
कि भैया महानाम वो जो वस्त्र होते हैं सन्यासियों वाले वो ले पहुंच जाना भारद्वाज ऋषि के आश्रम में
वहीं जाके मैं सन्यासी बनूंगा और किसी को बताना पर ऐसी बातें कहां छुपती है जब वो वहां पहुंचे तो मां-बाप वही खड़े हुए थे
पहले से जनता वही खड़ी हुई थी पूरी की पूरी तो भारद्वाज ऋषि के आश्रम में पहुंचे और उन्होंने
वो सब क्रियाएं करके उन्हें सन्यासी का वेश दिया महम को उन्होंने अपने कपड़े और गहने दिए कि इसको तुम लेके जाओ। अब जब वो
चलने लगे पूरी जनता पीछे पीछे चल रही थी। चलते-चलते पहुंच गए अनोमा नदी के निकट। बुद्ध चरित्र में अनुमा नदी के निकट
कौन-कौन पहुंचे हैं? बुद्ध के साथ छन और कंथक है सिर्फ। यहां पूरी जनता पहुंच गई है पीछे पीछे। अब सामने नदी है। नदी पार
करनी है। अब बुद्ध ने घूम के सबको नमस्ते किया और कहा देखो कहीं से तो जाना ही होगा वापस।
तो यहीं से क्यों नहीं? लोग रो रहे थे। उन्होंने कहा देखो मेरा जाना तो छोटी सी बात है।
मैं तो कोशिश करके भी युद्ध नहीं रुकवा सका। पर अगर आप लोग चाहेंगे कोशिश करेंगे तो युद्ध रुक जाएगा और आप सबके घरों में
किसी ना किसी का खून जो बह सकता है वो बच जाएगा। इसलिए कोशिश करो कि युद्ध ना हो। मेरा
जाना छोटी सी बात है। लेकिन अगर मेरे जाने की कीमत पर भी युद्ध रुक सकता हो तो इससे बड़ी कोई बात नहीं।
और इसके बाद जनता लौट गई। बुद्ध अपने रास्ते पर आगे बढ़े और आपके मन में सवाल आ सकता है कि बुद्ध ने जो ऐसी व्याख्या की
यह कहां से ली व्याख्या? क्या इसके पीछे कोई सोर्स है या हवा में इस बात को मान लिया है?
चार प्रेरणाएं थी बुद्ध के इनके डॉक्टर अंबेडकर के सामने। आपने कृष्णा जी अर्जुन केष्कर का नाम पता
नहीं सुना कि नहीं सुना। यह वह व्यक्ति हैं जिनका असर अंबेडकर के जीवन पर सबसे ज्यादा था।
जब डॉक्टर अंबेडकर ने दसवीं क्लास पास की तो वो दलित समाज में दसवीं क्लास पास करने वाले पहले व्यक्ति थे। वो चौथी से ही पहले
व्यक्ति हो गए थे। जब चौथी क्लास पास की बहुत बड़ा उत्सव हुआ कि हमारे समाज में पहली बार चौथी क्लास जिसने की है। दसवीं
की तो बहुत बड़ी बात हो गई। वही एक समाज सुधारक थे कृष्णा जी अर्जुन केस्कर
आपने सुना होगा ज्योतिबा फुले नाम के व्यक्ति लगभग उसी समय लगभग उसी इलाके में वो पुणे में थे और पुणे में उनका एक समाज
था सत्यशोधक समाज सत्यशोधक समाज के मेंबर थे कृष्ण जी अर्जुन केलुस्कर तो समाज सुधारक थे जब पता लगा कि दसवीं क्लास में
इस बच्चे ने अच्छे नंबर लिए हैं और इनके पिताजी डॉ अंबेडकर के पिताजी रामजी सकवाल नाम था उनका। वो इनके मित्र थे केस्कर।
तो केुस्कर साहब ने डॉ. अंबेडकर को तब वो डॉक्टर में थे। बालक अंबेडकर को एक किताब दी। अपनी ही लिखी हुई किताब दी। उस किताब
का नाम था गौतम बुद्धाचित चरित्र। मराठी की किताब थी। 1898 में छपी थी। और यह किताब उन किताबों में है जिनमें
गौतम बुद्ध को एक दैय व्यक्ति के रूप में दिखाने के बजाय एक सामाजिक क्रांतिकारी व्यक्ति के रूप में दिखाया गया था। तो
ध्यान रखना है कि डॉ. अंबेडकर ने पहली बार जिस बुद्ध को पढ़ा वो यह वाले बुद्ध थे। और इस किताब में भी रोहिणी नदी का जिक्र
आता है। तो अंबेडकर साहब के लिए यह वाली कहानी उतनी ही स्वाभाविक थी जितनी हमारे लिए चार
घटनाओं वाली कहानी है। उन्होंने वही सुनी होगी। 1895 में एबी कोवेल ने जातक कथाओं का
इंग्लिश ट्रांसलेशन करवाया और ऐसा माना जाता है कि इन कथाओं के अनुवाद का प्रयोग संभवत केष्कर जी ने भी किया होगा और बाकी
लोगों ने भी किया होगा। जातक कथाओं में से एक कथा है जिसको बोलते हैं कुणाल जातक। कुछ और कथाएं हैं। एक जातक अठ कथा है।
कुछ जातक कथाओं में रोहिणी नदी के विवाद का प्रसंग आता है। कुणाल जातक में विशेष रूप से आता है।
तो कुणाल जातक अंग्रेजी भाषा की वजह से उस समय बुद्धिजीवियों के बीच में पहली बार फैलने लगी थी।
आपने एक बहुत बड़े इतिहासकार का नाम सुना होगा डीडी कौशांबी। डीडी कौशांबी दो हुए हैं। एक का नाम है
दामोदर धर्मानंद कौशांबी। दूसरे का है धर्मानंद दामोदर कौशांबी। जो पिता हैं उनके नाम में धर्मानंद पहले
आता है और जो बेटा है उसके नाम में दामोदर पहले आता है। तो जो दामोदर हैं वो तो मार्क्सिस्ट हैं। बहुत प्रचलित हैं। उनके
पिता धर्मानंद दामोदर कौशांबी जो थे वो महात्मा बुद्ध के बहुत बड़े एक्सपर्ट माने जाते थे। उन्होंने पूरी जिंदगी में बुद्ध
पे ही रिसर्च की। उन्होंने एक किताब 1940 में लिखी भगवान बुद्ध नाम से।
1949 में एक नाटक लिखा बोधिसत्व नाम से। इन दोनों में भी रोहिणी नदी के विवाद को लेकर यह प्रसंग आता है। और इंटरेस्टिंग
बात है कि जो बोधिसत्व नाटक है 1949 का उस नाटक में सेनापति और गौतम बुद्ध के डायलॉग्स ठीक वैसे हैं जैसे डॉ. अंबेडकर
की पुस्तक में है। ऐसा लगता है कि वहां से एग्जैक्टली उन्होंने प्रेरणा लेके लिखे हैं। तो इनके पास ये सोर्सेस थे और पूछे
कि इन सोर्सेस के पीछे कौन से प्रमाण थे? तो जो मैंने आपसे जिक्र किया कुणाल जातक है एक रुक धर्म जातक है जातक अकथा मैंने
जिक्र किया अत दंड सूक्त है महासचक सूत्र है पबजाज्जा है ये सारे के सारे रेफरेंसेस इस्तेमाल किए हैं डीडी कौशांबी ने और
इस्तेमाल किए हैं केष्कर जी ने और जिन भी लोगों ने इस कहानी को प्रस्तुत किया उनके पीछे यह बात थी आपको भूल के भी यह बात
अपनी परीक्षा में नहीं लिखनी है। मैं सिर्फ बता रहा हूं कि क्या-क्या पर्सपेक्टिव्स हैं। आपको वही लिखना है जो
एनसीआरटी में है या सामान्य पुस्तकों में है। आपको वही मान के चलना है फिलहाल। पर हां कभी इस पर विषय पर विचार करना हो, बात
करनी हो तो अंतिम सवाल है कि क्या यह प्रमाण पर्याप्त है? जो प्रमाण दिए जा रहे हैं तो इसका उत्तर है कि प्रमाण पर्याप्त
नहीं है। क्यों प्रमाण पर्याप्त नहीं है? [गला साफ़ करने की आवाज़]
पहली बात जातक कथाओं को मिथकीय दृष्टि की से आप बेशक बहुत महत्व दें, बहुत सम्मान दें।
लेकिन माइथोलॉजी की पुस्तकों को आप इतिहास में प्रमाण नहीं मान सकते। एक तो यह समस्या है।
एक समस्या और है। दूसरी समस्या यह है कि जातक कथाओं में आमतौर पर जब रोहिणी नदी के विवाद का जिक्र
आया भी है। वो जिक्र बुद्ध के सन्यासी बनने के बाद आया है।
जबकि इन दो तीन पुस्तकों में इंक्लूडिंग डॉ. अंबेडकर की पुस्तक में सन्यासी बनने के कारण के रूप में आया है। तो जो लोग इस
व्याख्या का विरोध करते हैं उनका कहना यह है कि यह विवाद हुआ होगा इस पर बहुत आपत्ति नहीं है। पर यह विवाद उनके प्रवजजा
या सन्यास का कारण था। यह मानने में आपत्ति है। ऐसा लगता है कि घटनाओं का क्रम आगे पीछे किया गया है। इसलिए बहुत ही
व्याख्या की बात है। नवयान के लोग ये मानते हैं कि ऐसा ही हुआ था। हीनयान और मयान के लोग मानते हैं कि यह बेकार की बात
है। ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ था। लेकिन इतिहास ऐसे ही आगे बढ़ता है। इतिहास में नई व्याख्या होती रहती हैं।
[गला साफ़ करने की आवाज़] अभी तक हम यह समझ चुके हैं कि दोनों तरह की कहानियों में चाहे बुद्ध चरित की कहानी
हो चाहे डॉ. अंबेडकर वाली कहानी हो। दोनों में बुद्ध ने अपना घर छोड़ा। छोड़ने की प्रक्रिया अलग थी। कारण अलग थे।
अकेले गए थे। पहली कहानी में केवल अपने घोड़े और सारथी के साथ अनुमा नदी के पास। दूसरी कहानी में पूरा समाज अनोमा नदी के
पास पहुंचा है। अनोमा नदी को क्रॉस करके बुद्ध अकेले हो गए दोनों कहानियों में। अब वहां से हम कहानी शुरू कर रहे हैं। तो
अनोमा नदी जब क्रॉस हुई अगर आप थोड़ा नक्शे में देखना चाहे उस चीज को तो यह है उसका पूरा नक्शा।
उससे आपको अंदाजा शायद थोड़ा ठीक से हो पाएगा। देखिए यह वह इलाके हैं जहां बुद्ध का संबंध रहा ज्यादा।
लुंबिनी में उनका जन्म हुआ था। यह वह जगह है। कपिलवस्तु में वह रहे हैं। यह दरअसल ये कपिलवस्तु है। श्रावस्ती के
बहुत पास है क्योंकि श्रावस्ती का प्रभाव भी वहां पर है। श्रावस्ती का मतलब कौशल है ना? कौशल का प्रभाव है क्योंकि उसके बहुत
नजदीक है। अब यहां से जब वो निकले हैं कपिलवस्तु से तो ये है गया। ये है वैशाली। यह पावापुर
जहां पर महावीर की मृत्यु हुई थी। इनकी मृत्यु भी लगभग इसके आसपास ही होगी। यहीं से वह गुजरेंगे उस समय। अब वो कपिलवस्तु
से निकले हैं। और यह वाली जो है जगह यह है अनोमा नदी। यह जो नदी आप देख रहे हैं छोटी सी।
तो कपिलवस्तु से यहां तक का रास्ता उन्होंने अपने घोड़े पे या समाज से पार कर लिया है। अब यहां से उनको डिसाइड करना है
कि अब मैं आगे जाऊं तो कहां जाऊं। यहां से जाने के जो रास्ते उनके पास है। एक रास्ता है सारनाथ। बहुत पास है यहां
से। यह सारनाथ है। यह यह राजगीर है। यह गया है। यह कुशीनगर है। यह वैशाली है। और यह पाटलिपुत्र है। वैशाली सॉरी ये होना
चाहिए। तो बुद्ध ने यह तय किया कि मैं शुरुआत करता हूं राजगीर से। तो बुद्ध निकले हैं
राजगीर की तरह। समझ में आया लक्ष्य आपको? तो बुद्ध ने अनोमा नदी से बाहर निकलने पर जो तय किया वह यह कि मैं राजगीर चलता हूं।
राजगीर क्यों चलता हूं? क्योंकि उन्होंने सुना था कि राजगीर में हर तरह के तपस्वी रहते हैं। बहुत तरह के साधु सन्यासी रहते
हैं। उनका मन था कि मैं कम से कम टटोल लूं कि कौन-कौन सी परंपराएं हैं? कैसी परंपराएं हैं। फिर उन्हीं के बेस पर
डिसाइड कर लूंगा अपना। तो जब वो राजगीर गए तो राजगीर वहां से दूर था। करीब 400 मील के आसपास था। इतना
रास्ता पैदल चलते हुए गए। थे बहुत ही सुंदर बहुत योग्य तो वो पूरे रास्ते में जहां भी चल रहे थे लोगों को
भरोसा नहीं होता था कि इतना सुंदर व्यक्ति सन्यासी कैसे हो सकता है? तो भीड़ पीछे चलते थे। लोग हलचल पूछते रहते थे। जब
राजगीर पहुंचे तो राजगीर घिरा हुआ था पांच पहाड़ियों से। आज भी अगर आप राजगीर जाएंगे तो वहां आपको
पहाड़ियां दिखाते हैं कि बुद्ध कहां रुके थे और सब दर्शनीय स्थल वैसे के वैसे मैंने लगभग सारे स्थान देखे मुझे बहुत रुचि थी
कि एक बार मैं बुद्ध पे बात करने से पहले देख तो लूं कहां-कहां कैसा कैसा था तो मैं पिछले महीने वैशाली भी होके आ गया था वो
छूटा हुआ था तो मैंने वो पूरा देखा स्थान इन पांच पहाड़ियों में एक थी पांडव पहाड़ी तो पांडव पहाड़ी पहाड़ी के पास उन्होंने
बनाई अपनी एक कुटिया और वहां आराम से रहना शुरू कर दिया और क्योंकि साधक थे भिक्षु थे उनका काम क्या था कि दिन भर सुबह जाकर
भिक्षा मांगना उस भिक्षा से अपना काम चलाना और दिन भर साधना करना और तपस्या करना ताकि अंतिम सत्य मिल सके जिस सत्य की
खोज में घर से बाहर निकले थे। अब हुआ यह है कि राजगीर में उस समय जो क्योंकि भगत साम्राज्य का हिस्सा है।
राजगीर में उस समय जो राजा था बिंबिसार था। तो जैसे ही बिंबिसार को पता लगा और पता क्यों लगा? जब ये भिक्षा मांगने के
लिए निकलते थे तो भीड़ इकट्ठी हो जाती थी। और जब बिंबिसार ने देखा उसके महल के बाहर बहुत भीड़ हो गई है तो बिंबिसार ने पूछा
यह क्या है? तब किसी ने बताया कि साहब आपको याद होगा आज से 25 30 साल पहले एक घटना हुई थी। एक
बच्चे का जन्म हुआ था शाक्य जनपद में कपिलवस्तु में लुंबेने में और आचार्य असित ने कहा था कि यह बच्चा बड़ा होके बहुत
बड़ा स्वामी बनेगा। बुद्ध बनेगा। वही बच्चा सन्यास ले निकल गया है और यहां आकर कुटिया में रहता है।
तो बिंबिसर को बड़ी जिज्ञासा हुई तो बिंबिसर उससे पहुंचने के लिए चला गया उसके पास तो कुटिया में चला गया है बिंबेसर और
सोची कि राजा जी गए हैं उससे मिलने के लिए। उसको देख के बिंबेसर का माथा ठनक गया कि ये तो 29 30 साल का इतना सुंदर युवक
है। कहां इससे चक्कर पड़ गया? वि सर ने समझाया कि देखो भाई तुम मेरे छोटे भाई हो। यह उम्र इन चीजों के लिए
नहीं होती है। युवाओं के लिए पुरुषार्थ होता है जीवन को ठीक से जीना। इच्छाएं पूरी करना। सुख
समृद्धि सब में रहना। जो लालसाएं हैं, वासनाएं हैं उनको संतुष्ट करना।
जब मध्य वस्क होते हैं तो जीवन का पर्पस होता है खूब पैसा, धन, संपदा, सम्मान ये कमाना। और जीवन के उत्तरार्ध में शोभा
देता है सन्यास या वानप्रस्थ इन चीजों को छोड़ देना। अभी तो तुम्हारी भोग की उम्र है। जीवन जीने की उम्र है। तुम अभी से ये
सब कर रहे हो। मेरी बात मानो लौट जाओ। और अगर बहुत मन है तो पूजा पाठ कर लो। धर्मकांड कर लो। ये सब सन्यास बदलो। असर
नहीं पड़ा। फिर बोला छह काम करते हैं। मैं तुमसे इतना प्रभावित हूं। तुम एक काम करो। मेरे राज्य का आधा हिस्सा ले लो। आधे पे
तुम राज करो। आधे पर मैं करता हूं। तुम्हें अपना आधा राज्य देकर भी मुझे खुशी होगी।
फिर बुद्ध चुप रहे। अरुचि दिखाई। फिर वो बोला अच्छा मैं समझ गया। तुम्हें कपिलवस्तु के लोगों ने परेशान किया है। एक
काम करो मेरी सेना लेके जाओ। रद दो उन सबको और कपिलवस्तु पर राज करो। मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूं।
फिर बुद्ध का चेहरा वैसा ही था बेरुखी वाला। जो अप्सराओं को देख के होता था। तो उसने कहा आपको मेरी बात अच्छी नहीं लग
रही है। उसने कहा नहीं एकदम नहीं। बोले मैं जिन चीजों को छोड़ के आया हूं जिनसे मुक्त हुआ हूं आप मुझे फिर से उसमें
उलझाने में लगे हुए हैं। बोले आप राजा हैं। आपका सम्मान है। आपने मेरे बुरे लगने वाले समय में मेरा साथ
देने की बात करें। पर मेरा बुरा समय नहीं है। मेरा अच्छा समय चल रहा है। आप मेरा साथ दे रहे हैं। मैं आपका सम्मान करता
हूं। लेकिन राजा की जिंदगी क्या होती है? 24 घंटे का तनाव। राजा वह खूंटी है जिसके ऊपर हर कोई अपने
कपड़े टांग देता है। कोई चिंता हुई राजा को दे दी। राजा की चिंता हो गई। आपकी जिंदगी मुझसे अच्छी कैसे है?
आप ऐसी बात कर रहे हैं जैसे कोई व्यक्ति देख पा रहा हो बड़ी मुश्किल से और आप उससे कहें कि देखो वो व्यक्ति देख नहीं पा रहा।
वो तुमसे अच्छी स्थिति में है। मैं चल पा रहा हूं। कोई नहीं चल पा रहा। आप कह रहे हैं कि उससे जैसे बनो। अरे भाई इतनी
मुश्किल से बंधनों से मुक्त होकर जीवन को सही निगाह से देख पाया हूं और आप कह रहे हैं कि फिर से अपनी दृष्टि खराब कर लूं और
वैसा हो जाऊं। तो मैं बहुत खुश होके सन्यास के मार्ग पे आया हूं। आप यह ना समझे कि मैं मजबूरी में आया हूं।
बिंबेसर चुप हो गया। फिर ब्बे सर ने इतना ही कहा कि अच्छा ठीक है मैं आपसे बस एक वायदा चाहता हूं कि जब कभी आपको ज्ञान की
प्राप्ति हो जो आप चाह रहे हैं तो उसके बाद एक बार राजगीर में या मगध में गया में कहीं भी आना जरूर और मैं आपका स्वागत करना
चाहूंगा सम्मान करना चाहूंगा और मैं चाहूंगा कि आपके ज्ञान का लाभ राजगीर के समाज को या मगध के समाज को भी मिले। बुद्ध
ने कहा हां ठीक है मैं जरूर आऊंगा। आपने मेरा इतना साथ दिया तो मैं क्यों ऐसा नहीं करूंगा?
इसके बाद एक घटना घटी। जब भी आप बुद्ध की जीवनी पढ़ेंगे उसमें आपको यह पांच नाम दिखेंगे। बहुत रोचक तरीके से दिखेंगे।
बुद्ध वहां पर अपनी कुटि में थे। अचानक सात की कुटिया में पांच लोग आ गए। और वो पांचों तपस्वी थे। उनमें से एक था कंडन्य।
इसका नाम एक जगह महत्वपूर्ण होगा। एक जगह अश्वजीत का नाम महत्वपूर्ण होगा। बाकी का नाम बहुत महत्वपूर्ण नहीं होगा आपके लिए।
तो कडिन्य अश्वजीत को अस्ताजी बोलते थे। अस्ताजी भी नाम कहीं आएगा तो इसी का नाम है। एक भद्रिक है, एक बाष्प है, एक महाना
है। ये पांच लोग पांचों उसी उम्र के लोग साधना करने पहुंचे। अब देखिए बहुत इंपॉर्टेंट प्रसंग है।
बुद्ध चरित्र में इन पांचों से बुद्ध की मुलाकात यहां नहीं हुई है। बोधगया में हुई है।
डॉ. अंबेडकर की पुस्तक में इन पांचों से मुलाकात यहां हुई है। क्यों हुई है? अब समझिए कहानी का मूड दूसरा क्या आ रहा है।
ये पांचों पूछा बुद्ध से अरे आप बड़े युवा हैं। आप कौन है? क्या करते हैं? कहां से आए हैं? तो उन्होंने बताया कि मैं
कपिलवस्तु से आया हूं। वहां का राजकुमार कह सकते हैं और मैंने सन्यास लिया है। और वहां रोहिणी नदी के पानी के विवाद को ले
थोड़ा सा ऐसा प्रसंग हुआ तो मैंने सन्यास लेना उचित समझा। बोले अच्छा अच्छा आप ही है वो। बुद्ध बोले
हां मैं ही हूं। क्या हुआ? बोले अरे आपको पता नहीं आपके जाने के बाद क्या हुआ। जब आप वहां से चले गए
तो कपिल वस्तु की जनता ने विद्रोह कर दिया और जनता ने शासक वर्ग से कहा कि शाक्य और कोहली ये भाई भाई हैं। हमें खूनखराबा नहीं
चाहिए पानी के नाम। और आपकी परिषद में जो भी फैसला हुआ हो जनता के फैसले से बड़ा फैसला वो नहीं हो
सकता। इतना विरोध किया कि सैन्य परिषद को पीछे हटना पड़ा।
अंत में कपिलवस्तु के प्रशासन ने पांच व्यक्तियों की नियुक्ति की जो इनकी तरफ से रोहिणी नदी के जल बटंटवारे पर बात करेंगे
कोलियों के साथ। जब कोलियों ने यह बात सुनी बड़े खुश हो गए। उन्होंने पांच व्यक्तियों की नियुक्ति
कर दी। और इन पांच और पांच 10 व्यक्तियों के लिए एक स्थाई प्राधिकरण या स्थाई पंचायत बना
दी गई है। जिसका काम है मुख्य रूप से रोहिणी नदी के विवाद को लेकर और विस्तारित रूप में इन दोनों राज्यों के बीच में कोई
भी विवाद होगा तो ये 10 लोग मिलकर समाधान करेंगे युद्ध नहीं होगा। और बोले कि ये आपकी वजह से ही हुआ है। आप
ही ने जब अनुमान जी के पास उनसे यह कहा कि मैं तो नहीं कर पाया। आप कोशिश कीजिए उसके बाद उन्होंने ये किया और ये हो गया
तो फिर वो पांच बोले लेकिन एक बात बताओ अब आप करोगे क्या आप तो जो चाह रहे थे वो हो गया अब आप
सन्यासी बन के बाहर निकल गए पर अब क्या करोगे वापस जाओ बोलो सन्यास में मजा नहीं आ रहा मुझे क्या दिक्कत है इसमें
तो बुद्ध भी दुविधा में पड़ गए भाई कि जिस चीज की वजह से निकला था वो तो खत्म हो गई तो फिर सन्यास का मतलब क्या है?
तो बुद्ध का एक आध दिन उसके बाद थोड़ा सा दुविधा में गुजरा और नई दुविधा क्या थी कि क्या मैं इस सन्यास पर कायम रहूं या
मैं वापस लौट जाऊं। तो बुद्ध ने बहुत बेसिक लेवल्स पे सोचा कि मैं दरअसल क्यों निकला था?
क्या मेरे निकलने की वजह केवल रोहिणी का जल विवाद था या रोहिणी का जल विवाद केवल एक तात्कालिक कारण था? वो तात्कालिक कारण
था। मूल कारण तो यह था कि मैं बहुत खुश शुरू से ही नहीं हूं। मैं हमेशा से चाहता था कि सन्यास लूं, उस जीवन से बाहर
निकलूं। अनित्य सुखों से बाहर निकलूं। कुछ नित्य सुख ढूंढूं अपने लिए। तो मैं जिस समस्या की वजह से निकला था वो
मूल समस्या क्या है? वो मूल समस्या रोहिणी का विवाद थोड़ी ना हूं। वह तो उस समय एक विशेष रूप में मेरे सामने आ गई थी।
मूल समस्या तो यह है कि समाज में इतना दुख क्यों है? समाज का हर व्यक्ति इतना दुखी क्यों है?
समाज में इतने सारे संघर्ष क्यों है? समाज में इतनी सारी हिंसा क्यों है? समाज में इतनी सारी विषमता या गैर बराबरी क्यों है?
और क्या ऐसा हो सकता है समाधान कि समाज के सभी व्यक्ति एक बेहतर जीवन जी सकें? असली उद्देश्य तो उसका मार्ग ढूंढना है। रोहिणी
तो बहुत छोटा सा प्रसंग था। और तब बुद्ध ने तय किया कि ना वापस नहीं जाऊंगा।
अब तो मैं इन बुनियादी प्रश्नों का उत्तर खोज के ही मानूंगा। तब तक वो पांचों आए। पांचों बोले कि देखिए
हम कठोर तपस्या करने के लिए जा रहे हैं। उरुवेला। उवेला नाम ध्यान रखिएगा। गया के पास की जगह है।
आप चाहे तो आप भी चलिए हमारे साथ। बुद्ध ने करना। मैं तो सारे मार्गों की परीक्षा करूंगा। फिर तय करूंगा कौन सा मार्ग ठीक
है। मैं पहले से मान के नहीं चल रहा कि आपका मार्ग ठीक है। तो आप अपने रास्ते पर जाइए। कभी होगा तो हमारा फिर से मिलना हो
जाएगा। अभी मैं इस चीज में इंटरेस्टेड नहीं। बुद्ध ने सोचा कि मैं ऐसा करता हूं।
मैं सबसे पहले जाता हूं वैशाली की तरफ। क्योंकि वहां पर बहुत सारे ऐसे ज्ञानी लोग मिल जाएंगे।
अभी वैशाली की ओर जा रहे थे कि रास्ते में उनको एक आश्रम दिखा जिसका नाम था भृगु आश्रम।
और भृगु आश्रम का बेसिक मतलब है एक ऐसा आश्रम जहां के सन्यासी बहुत ही कठोर किस्म की तपस्या करते थे। बहुत कठोर तपस्या।
उन्होंने सुना हुआ था। उनको लगा देख लेते हैं कैसी तपस्या करते हैं लोग।
तो वहां जाकर अनुमति मांगी कि क्या मैं देख सकता हूं। तो उनका परिचय जानने के बाद आचार्य भृगु ने खुद ही कहा कि हां आप जरूर
आइए। आप देखिए हम कैसे तपस्या करते हैं। सारी तपस्या के प्रकार बताए। उनमें से कुछ तपस्वी थे जो पक्षी बनकर तपस्या कर रहे
थे। पक्षी बनने का मतलब क्या होता है? जैसे पक्षी दाना चुगता है। दिन भर में गेहूं के चार दाने चुग लिए। यही भोजन है
उनका। इतना ही भोजन करना है बस दिन भर में। और बाकी तपस्या करनी है।
कुछ थे जो हिरण बनकर तपस्या कर रहे थे। हिरण का मतलब है केवल घास खानी है और जितनी घास हिरण खाते हैं उतनी ही खानी है।
दिन भर में मुश्किल से 202 घास के तिन के खा लिए हो गया। कुछ मछली बनके तपस्या कर रहे थे। और इसका
मतलब है अपने शरीर का ज्यादातर हिस्सा पानी के अंदर रखना। और बुद्ध ने देखा कि उनके शरीर पर कछुए उनको नोच रहे थे। उनके
पैरों पर, हाथों पर। और परीक्षा यह है कि कछुआ नोचेगा, मछलियां नोचेंगे, हिलना नहीं है। उसको सहन करना
है। और उसी के माध्यम से तपस्या पूरी करनी है। यह सब बुद्ध ने देखा। भृगु ने कहा कि क्या आप तपस्या करना
चाहेंगे? बुद्ध ने कहा कि मुझे कोई दिक्कत नहीं है। पर मुझे इसमें रुचि इसलिए नहीं आ रही
क्योंकि मेरे सामने मूल प्रश्न यह है कि दुनिया के दुख कैसे दूर करूं? इससे मुझे दुनिया के दुख दूर होने का संबंध दिख नहीं
रहा। तो भगु खुद बोले हां आप ठीक कह रहे हैं। आपके लिए ज्यादा अच्छा यह रहेगा कि आप आचार्य आलार कलाम के पास जाए। आचार्य
आलार कलाम जो हैं वह सांख्य के बहुत बड़े निशनाथ हैं और वही आपको बता पाएंगे कि दुखों से
मुक्ति का सही तरीका क्या हो सकता है तो बुद्ध ने कहा ठीक है आलार कालाम के पास जाते हैं तो बुद्ध पहुंच गए आलार का के
आश्रम में आलार का से मिले उनको बताया कि ऐसेसे मैं हूं आलारम बोले मैं आपके बारे में जानता
हूं मेरे यहां साधना करने की शर्त होती है एक परीक्षा होती है पर आपके केस में परीक्षा नहीं लेंगे क्योंकि मैं आपकी
योग्यताओं से वाकिफ हूं। आलार कालाम ने सांख्य दर्शन का ज्ञान उनको दिया। सांख्य का थोड़ा सा योग का कह
दीजिए। अगर आपने सुना हो तो सांख्य दर्शन भारत के उन दर्शनों में है। एक तरह से अकेला दर्शन
है जो द्वैतवाद को मानता है। और द्वैतवाद का मतलब है कि वो मानता है कि एक है पुरुष और एक है प्रकृति। पुरुष का मतलब है चेतना
आत्मा। प्रकृति का मतलब है जड़ पदार्थ सारे के सारे। पुरुष और प्रकृति के संयोग से कैसे सृष्टि
बनती है? इनके अयोग से कैसे सृष्टि खत्म होती है, प्रलय होती है। वह सारा सिद्धांत समझाया। बुद्ध ने समझ लिया। सांख्य योग
मानता है कि जीवन में तीन प्रकार के दुख होते हैं और यह जो पूरा संसार है तीन तरह के दुखों से
व्यस्त है, न्यस्त है। तो जब बुद्ध कहते हैं कि सर्वम दुखम दुखम ध्यान रखना। सांख्य उसके पहले ही बोलता सर्वम दुखम
दुखम केवल बुद्ध नहीं कह रहे सांख्य बोलता है जीवन में केवल दुख है। तीन प्रकार के दुख हैं। एक होता है आध्यात्मिक,
एक होता है आधिदैविक, एक होता है आदि भौतिक। और आचार्य
कलाम ने अलार कलाम ने इन तीनों दुखों का ये तीनों दुख क्यों होते हैं? इन तीनों दुखों से मुक्ति के तरीके क्या हैं? वो सब
भी बताया। फिर बताया कि मनुष्य की जो प्रकृति होती है उसमें प्रकृति के तीन तत्व सत्व रजस
तमस काम करते हैं और कैसे हम सारे मनुष्यों को सारे जीव जंतुओं को भौतिक वस्तुओं को सत रजस तमस के स्तर पर डिफाइन
कर सकते हैं समझ सकते हैं। ये तीनों सिद्धांत भारतीय दर्शन में सांख्य परंपरा के हैं। इसी सांख्य परंपरा में फिर एक
तरीका होता है कि योग के रास्ते पर हम आगे चलेंगे और योग के रास्ते पर आगे चलकर अंततः एक ज्ञान प्राप्त होता है। जिस
ज्ञान में समझ में आता है कि पुरुष को यह समझ में आता है कि मैं और प्रकृति भिन्न-भिन्न है। वहां से मोक्ष की
प्राप्ति होती है। कैवल्य की प्राप्ति होती है। यह सब समझा दिया। बुद्ध ने कहा कि जिसको आप मोक्ष कह रहे हैं उसकी
प्राप्ति कैसे होगी? तो अलार कलाम ने कहा कि देखिए मैंने एक योग की विधि तैयार की है जिसमें सात चरण होते हैं और मेरा मानना
है कि उसके सातवें चरण को पार करने के बाद मुक्ति प्राप्त हो जाती है। आप सीख सकते हैं। तो बुद्ध ने सीखा। पर बहुत ही कम
दिनों में बुद्ध योग के उस सातवें स्तर तक पहुंच गए। सातवें स्तर तक पहुंच के उनको अच्छा लगा,
आनंद मिला। लेकिन जब वापस आए तो उनको ये लगा कि वो स्थाई मुक्ति नहीं है और इससे मेरा दुख भले दूर हो जाए इससे संसार का
दुख दूर नहीं होने वाला। ये तो बहुत ही इंडिविजुअल किस्म की मुक्ति है। तो बुद्ध ने उनसे कहा कि क्या आपके पास कुछ और
सिखाने के लिए है। तो बोले और तो नहीं। तो बुद्ध ने कहा राम राम अब मैं जा रहा हूं। फिर बुद्ध जिनके पास गए उनका नाम था उद्धक
रामपुत्र। पता लगा था कि उद्ध रामपुत्र ने एक ऐसी विधि बनाई है जिसमें आठवीं सीढ़ी भी है। ध्यान की सात सीढ़ियां वहां पर थी।
एक आठवीं सीढ़ी भी है। इसको अज्ञेय योग कुछ लोग बोलते थे। कुछ लोग बोलते थे न
संज्ञा मतलब न असंज्ञा दो शब्द चलते हैं। न संज्ञा न असंज्ञा।
बहुत मुश्किल में नहीं जाना है। एक शब्द केवल ध्यान अगर रख सके तो वह शब्द होता है असंप्रज्ञात समाधि जो योग
दर्शन में समाधि का अंतिम स्तर माना जाता है। कुछ-कुछ ये वही चीज है। बस समझ ले कि समाधि का वो बिंदु जिसके
एकदम बाद मुक्ति मिल जाती है। उसको बोलते हैं असंप्रज्ञात समाधि। लगभग उसी को न संज्ञा न असज्ञ के नाम से यहां पर अभ्यास
किया जा रहा था। तो बुद्ध को रुचि आई। बुद्ध ने कहा मैं सीखना चाहूंगा। कहा सिखाते हैं। बहुत ही कम समय में बुद्ध ने
इसको भी सीख लिया। इसको सीखने के बाद उनको महसूस हुआ कि मुक्ति जैसा भाव तो आता है और कुछ समय के लिए आता है और इंडिविजुअल
किस्म का है। तो इससे मेरा काम नहीं चलेगा। तो उनसे पूछा क्या कुछ और आप सिखा सकते हैं? उन्होंने कहा नहीं मुझे तो इतना
ही आता है। तो इसके बाद फिर बुद्ध वहां से चले गए। पता लगा ध्यान मार्ग के दो-तीन लोग वहां पर और अब राजगीर में आ गए हैं।
वहां पर दो तीन लोग हैं। उन सब से मिलके देखा। एक ने श्वास विधि पर ध्यान करना सिखाया। सांस रोक के ध्यान करना सिखाया।
बुद्ध को बड़ा मुश्किल लगा। उनको लगता था जैसे कोई चाकू से उनकी गर्दन काट रहा हो। इतना पेनफुल था। पर वो भी सीख लिया कुछ
दिनों में और उसके बाद पाया कि उसमें भी कोई ऐसी मुक्ति का भाव मन में नहीं आता है। तो बुद्ध ने कहा कि इसमें भी बात
बनेगी नहीं। जो मैं चाहता हूं वो अभी तक आया नहीं है। फिर बुद्ध को लगा लगता है कि उस कठिन
रास्ते पर ही जाना पड़ेगा जिसका जिक्र वो पांच लोग कर रहे थे। तपस्या कठोर तपस्या। अब बुद्ध पहुंच गए उरुवेला
और उवेला लगभग जिसको आजकल हम बोधगया कहते हैं। पहले गया कहते थे। उसके पास में एक जगह है। वहां एक नदी है जिसको निरंजरा नदी
कहते हैं। एक उपनदी है निरंजरा। निरंजरा बोलते हैं वहां के लोग। तो निरंजरा नदी के तट पर उवेला में बहुत सारे
आश्रम थे। वह वहां गए और वहां देखा बहुत सारे आश्रम है। वहां बात करके एक जगह उन्होंने अपने स्थान फिक्स कर लिया कि मैं
यहां रह के तपस्या करूंगा। अभी वो तपस्या शुरू ही करने वाले थे। वो पांच लोग उनको फिर से मिल गए। कौन-कौन थे? कौडिन्य,
महानाम, अश्वजीत, बाष्प और भद्रिक। है ना? ये पांच लोक थे। इन पांचों ने पूछा क्या-क्या हुआ? बुद्ध
ने बताया कि ऐसे ऐसे सब कुछ हुआ है। यह सब करके देख चुका हूं। कुछ मिला नहीं। अब मैं इसी रास्ते पर आगे बढ़ना चाहता हूं। तो
पांचों बोले अगर आप बुरा ना माने तो हम भी आपके साथ ही कर लें। बुद्ध ने कहा कर लो। मुझे क्या फर्क पड़ता है? आप भी साथ में
कर लो भाई। और बुद्ध ने कहा सोच लेना बहुत मुश्किल रास्ता है। बोले हां हां हम आपके साथ
मिलकर कर लेंगे। यह जो तपस्या थी यह चली छ साल तक। इसी तपस्या के लिए कहते हैं कि इतनी
मुश्किल तपस्या शायद ही कोई कर पाएगा छ साल तक। कैसी तपस्या थी? सबसे पहली शर्त क्या थी कि इसमें भोजन
नहीं के बराबर होना है। तो कैसे शुरू किया? सुबह भिक्षा मांगने जाते थे। दो-तीन घरों में बहुत हुआ। पांच घरों में एक
कटोरी चावल मिल गया या सरसों मिल गया। लेके आ गए। बात तो पहले क्या था? एक दिन में एक कटोरी
भोजन कर लिया। कुछ दिन के बाद दो दिन में एक कटोरी, 7 दिन में एक कटोरी, 15 दिनों में एक कटोरी भोजन।
हर ढाई घंटे में समोसा नहीं। [हंसी] 15
मैं मुझे लगा बस एक बार तुलना करके बता दूं ताकि याद रहे। [हंसी] जिसकी बात कर रहे हैं और जिससे बात कर रहे हैं पता रहे
कि अपना-अपना सर क्या है। 15 दिनों में एक बार खाना है एक कटोरी चावल खाना है।
उसके बाद बात बढ़ते-बढ़ते हो गई। एक दिन में एक दाना वो जैसे पक्षी नहीं थे वहां वाले वो
एक दिन में एक दाना। एक दाना किसका? चावल का सरसों का। ये भोजन है। पूरे दिन में एक दाना मिलेगा। मिलेगा मतलब लेना है। कोई
रोक थोड़ी ना रहा है आपको। लेना है उतना। पर आप समझ सकते हैं कि छ साल तक कोई ये करेगा तो उसकी हेल्थ कैसी होगी? पेट और
पीठ का अंतर खत्म हो जाता है। साहित्य में ना कई कवियों ने इसका जिक्र किया है। तो कुछ-कुछ ऐसा ही इनके साथ हो रहा था कि पेट
पर हाथ रखते थे। पीठ में दर्द होता था। ऐसी हालत हो गई थी। फिर कपड़े कैसे पहनने हैं? तो कपड़े पहनने
का नियम क्या था कि जो होता है ना जहां सारा गंदगी इकट्ठा होती है शहर की वहां बहुत सारे गंदे कपड़े पड़े होते हैं।
किसी ने फेंक दी यूज़ करके तो लोगों द्वारा फेंके गए कपड़ों से चीवर बना के फेंके गए कपड़े।
उसमें यह नहीं है कि आज मैं नई ड्रेस लेके आऊंगी। यह आज मैं नया ड्रेस ले आऊंगा।
जो कपड़े कूड़े के ढेर में पड़े हुए हैं, उन बिखरे-बिखरे कपड़ों को आपस में जोड़ के कपड़े बना के पहनना है।
ओढ़ना क्या है? तो कंबल ओढ़ना है। कौन सा कंबल जो केशों से बना होगा। जो सर्दियों में और ठंडा हो जाएगा।
गर्मियों में और गर्म हो जाएगा। कैसे मौसम में रहना है? तो नियम यह है कि सर्दियों में खुले में रहना है।
अगर सर्दी है तो एकदम खुले में रहना है। कोई कवर नहीं किसी तरह का। और गर्मी है, जून का महीना है तो एकदम सूरज के नीचे
धूप में रहना है। यह तपस्या के नियम है। नींद कहां पूरी करनी है? तो सोने के लिए श्मशान घाट में जाना है
और हड्डियों का तकिया बनाना है। कई लोग इसलिए नहीं सो पाते कि मेरा तकिया थोड़ा मोटा है। मेरा तकिया थोड़ा पतला है।
हड्डियों का तकिया श्मशान घाट के अंदर। और उसके बाद भी जब जब लगे कि परीक्षा ठीक से नहीं हो पा रही है
तो एक और काम करना है। अपने सिर और अपनी दाढ़ी के बाल नोचने हैं। और यह काम रोज करना है छ साल तक।
यह बुद्ध ने किया है छ साल। 29 की उम्र से 35 की उम्र तक यह काम किया है। रोज
पर चिंता की बात यह है कि छ साल बाद भी हाथ कुछ लगा नहीं। कुछ मिल ही नहीं रहा कि जिस ज्ञान की तलाश
में लगे हुए हैं वो ज्ञान नहीं मिल रहा। और छ साल होते बुद्ध को संशय होने लगा कि ऐसा तो नहीं कि मेरा रास्ता गलत हो।
संदेह हो गया। संदेह नहीं हुआ। रियलाइजेशन हुआ, अनुभूति हुई।
और अनुभूति यह हुई कि ऐसा रास्ता जो जिंदा ही ना रहने दे उस रास्ते पर चलकर ज्ञान कैसे मिलेगा?
क्या अपने शरीर की जरूरतों के प्रति इतनी बेरुखी के साथ कोई व्यक्ति ज्ञान प्राप्त कर सकता है? और ऐसा ज्ञान प्राप्त हो तो
किस काम का है? और बुद्ध को रियलाइज हुआ नहीं यह रास्ता ठीक नहीं।
ठीक इसी बिंदु पर एक मार्ग का जन्म हुआ। तो उसको बोलते हैं मध्यम मार्ग और मध्यम मार्ग मुकम्मल हुआ उसके अगले ही
दिन आपने एक महिला का नाम सुना होगा सुजाता। ये तो मैंने आपको बता ही दिया कठोर साधना
का मार्ग फिर सुजाता का प्रसंग आ गया। तो बुद्ध को जैसे ही रियलाइज हुआ कि इस रास्ते पर चलकर कोई बहुत आनंद नहीं आ रहा
है या हासिल नहीं हो रहा कुछ तो फिर बुद्ध ने मन में विचार किया कि मध्य मार्ग बेहतर होगा और अगले ही दिन क्या हुआ? एक घटना
घटी। ये घटना अलग-अलग रचनाओं में अलग-अलग है। जैसे बुद्ध चरित्र में इस लड़की का नाम
सुजाता है ही नहीं। वहां इसका नाम नंदबाला है। लेकिन बाकी सब रचनाओं में इसका नाम सुजाता है। सुजाता कौन है? एक सेनानी नाम
का आदमी है। उवेला में रहता है। उसकी बेटी है। सेनानी की बेटी का मतलब सेनानी सैनिक नहीं नाम इसका सेनानी है। उसकी बेटी है।
इसने एक मन्नत मांगी थी कि अगर मेरा बेटा हुआ तो मैं एक प्रसाद चढ़ाऊंगी। मन्नत पूरी हो गई। बेटा हो गया। तो आज इसको
प्रसाद चढ़ाना है। इसने अपनी दासी से कहा कि बाहर जाओ। एक पेड़ है पीपल का अच्छा सा। उस पेड़ को थोड़ा ठीक से धो के अच्छे
से तैयार कर लो। वहां मैं आज खीर चढ़ाना चाहती हूं। दासी बाहर गई। बुद्ध उसके नीचे बैठे हुए थे। दासी चकरा गई। दासी को लगा
वृक्ष देवता स्वयं साकार हुए हैं। दासी ने आके मालकिन को बताया कि मालकिन वृक्ष देवता स्वयं साकार हो गए हैं। तो सुजाता
बहुत खुशी-खुशी में एकदम नहा धो के सुंदर कपड़े पहन के स्वर्ण पात्र में खीर लेकर आई और उसने महात्मा बुद्ध को खीर अर्पित
की। भेंट की। बुद्ध ने खीर रिसीव कर ली। बर्तन अपने पास रख दिया। कुछ समय के बाद उठे निरंजना नदी
में गए। स्नान किया, वापस आया और खीर खाई। यह जो खीर खाने का प्रसंग है, महायान में माना जाता है कि हर बोधि सतत्व बुद्ध बनने
से एकदम पहले उसे कोई ना कोई गणी खीर भेंट करती है। और खीर भेंट होने का मतलब है कि अब वो बिंदु आने वाला है जहां तपस्या सफल
होने वाली है। पर यह महायन की बात है। महायन बुद्ध के बहुत 100 साल बाद पैदा हुआ था। तो बुद्ध को ही नहीं पता था। यह बाद
की कहानी है। बुद्ध ने खीर का आस्वादन किया और खीर का आस्वादन करके उनको रियलाइज हुआ कि शरीर की
बुनियादी जरूरतों को पूरा करना कितना जरूरी है और तपस्या करने की शर्त है कि हमारा शरीर कम से कम स्वस्थ तो रहे।
अब बुद्ध ने सोचा कि अब तपस्या का अंतिम चरण करना है और उस दिन बुद्ध को एक स्वप्न आया बल्कि पांच स्वप्न आए और उन पांच
स्वप्नों से एक बात बुद्ध को बार-बार समझ में आई कि अब बहुत नजदीक हूं मैं अंतिम ज्ञान प्राप्त करने केवल एक आखिरी जो होता
है ना बुझने से पहले जो बत्ती जलती है जोर से कुछ वो स्थिति रह गई है। अगले दिन बुद्ध ने क्या किया? वहां से उठे स्थान
बदला और चले गए। गया में ढूंढा एक पीपल का पेड़ पीपल के पेड़ के नीचे पूर्व मुख दिशा की ओर मुख
करके पद्मासन में बैठे पद्मासन समझते हैं चौकड़ी पे चौकड़ी है ना उसमें बैठे 40 दिन का भोजन अपने साथ में रखा भोजन का मतलब
क्या एक कटोरी चावल एक दिन का उतना ही हमारा एक दिन का उनका 40 दिन का बराबर ही होता है 40 दिन का भोजन साथ में रखा और यह
कसम खाई चाहे मेरी हड्डियां गल जाए, चाहे मेरा खून सूख जाए, चाहे मेरी मांसपेशियां खत्म हो जाए। उठूंगा नहीं।
मर जाऊंगा और बिना ज्ञान प्राप्ति के उठूंगा नहीं। और तब वो बैठे तपस्या में
28वें दिन यानी चार सप्ताह पूरे होते ही 28वें दिन उनका प्रबोधन हुआ। जिसको हम बोलते हैं
एनलाइटनमेंट वह प्रबोधन उनका 28व दिन हुआ। 28व दिन कुछ ऐसा हुआ कि बुद्ध को उन सारे प्रश्नों का उत्तर मिल गया जिन प्रश्नों
की तलाश में वो था। क्या प्रश्न थे? दो ही प्रश्न थे। एक प्रश्न यह था कि दुख क्यों है?
और एक प्रश्न यह था कि दुनिया में जो दुख है उसका समाधान क्या है? और बुद्ध को इसका जवाब मिला चार आर्य
सत्यों के रूप में। उम्मीद है कि आपको चारों आर्य सत्य पता ही होंगे।
पहला आर्य सत्य है सर्वम दुखम दुखम यानी के सब कुछ दुखमय है। दुख ही दुख है। जब दर्शन पढ़ेंगे इसकी व्याख्या विस्तारित
करेंगे। दूसरे को बोलते हैं दुख समुदय। इसका मतलब है दुख का कारण है। और दुख के कारण की बात करते हुए उन्होंने एक
सिद्धांत दिया प्रतीत समुत्पाद। जैसे जब भी कोई कहता है कि बुद्ध के दर्शन का एक शब्द में क्या मतलब है वो है प्रतीत
समुत्पाद। तो दुख के कारण की खोज करने के लिए जो सिद्धांत है प्रतित समुत्पाद है। उसी के
अंतर्गत द्वादशांक चक्र का जिक्र आता है जिसके माध्यम से उन्होंने अंतिम कारण की खोज की कि सारा दुख क्यों होता है?
तीसरा है कि दुख का निरोध हो सकता है यानी दुख समाप्त हो सकता है। दुख निरोध का बेसिक मतलब है निर्वाण।
निर्वाण का मतलब होता है आग का बुझ जाना। आग का शांत हो जाना। तो दुख का निरोध है वो निर्वाण है। और
चौथी बात दुख निरोध मार्ग। कि जितने भी दुख हैं उन दुखों के निरोध का मार्ग भी है। और दुख निरोध मार्ग को ही
बोलते हैं अष्टांगिक मार्ग। उन 28 दिनों की तपस्या में यह सारी की सारी बातें बुद्ध को दिमाग में क्लियर
होती गई। और जब बुद्ध अंदर ही अंदर अपनी उधेड़बन में लगे हुए जब आखिरी प्रश्न का उत्तर भी मिल गया तब उन्हें एहसास हुआ कि
अब उनके पास कुछ ऐसा है जो इस संसार के जीवन को बेहतर बना सकता है, आसान बना सकता है और तब वो उठे और जब उठे तो फिर एक
दुविधा आ गई और ये दुविधा दो दिन की दुविधा नहीं थी। 49 दिनों की दुविधा थी। 49 दिन इस दुविधा में रहे। सात सप्ताह इस
दुविधा में रहे कि उपदेश दूं या ना दूं। क्यों दुविधा थी? क्या इसका कारण यह था कि जितना सुख मिला मैं अकेले भोग लूं? नहीं।
दुविधा यह थी कि जो आम आदमी है आम आदमी को जब तक ईश्वर ना बोलो उसका मन नहीं मानता। जब तक आत्मा ना बोलो उसका मन नहीं मानता।
तो आम आदमी को ईश्वर आत्मा और परलोक की बहुत सारी सत्ताएं स्वर्ग नरक यह सब इतना विश्वास उसमें है और उससे तसल्ली इतनी
ज्यादा मिलती है कि जब तक मैं वो नहीं बोलूंगा लोग बहुत कंफर्टेबल होंगे नहीं और मैंने जो सत्य खोजा है प्रतीत समुत्पाद
उसमें ना ईश्वर है उसमें ना आत्मा है ना वैसा परलोक है मतलब परलोक के नाम पर निर्वाण है लेकिन वह वैसा परलोक नहीं है
जैसा बाकी धर्मों की दुनिया में लोग मानते तो ऐसा ना हो कि मैं लंबे समय तक लोगों को समझाने का प्रयास करता रहूं और लोग मेरी
बात को समझ ही ना पाए और यदि नहीं समझेंगे तो मेरा भी प्रयास व्यर्थ होगा। उनको भी तनाव होगा। वो अपना आनंद में है तो आनंद
में रहे। क्या परेशानी है? तो बुद्ध ने मन बनाया कि छोड़ो मैंने सीख लिया। अपना जीवन इस रास्ते पर गुजार लूंगा। किसी को उपदेश
देने की जरूरत क्या है? किंतु ऐसा होना था कि साक्षात ब्रह्म प्रकट हुए।
यह बात किसने लिखी होगी? महायान ने हीन ने? महायान ने। पहले देवता लोग आ रहे थे।
ब्रह्म जी आ रहे हैं सीधे खुद ही। साक्षात ब्रह्म प्रकट हुए और बोले कि देखिए बुद्ध
पहले आप बोध सत्व थे। पहले आप सन्यासी थे। अब आप तथागत बुद्ध हैं। अब आप मुक्त हो चुके हैं
और तथागत बुद्ध सदियों में एक होता है और बुद्ध होने का एक ही पर्पस है, एक ही उद्देश्य होता है कि सारे संसार को अब
अपने ज्ञान से आलोकित करें। अगर आप खुद पीछे हट जाएंगे तो इस ज्ञान का फायदा क्या होगा? और इससे बुद्ध को समझ
में आया कि उनकी जिम्मेदारी क्या बनती है। उन्होंने तय किया कि वह उपदेश देंगे। अब उधर थे कि मैं उपदेश किसको दूं?
तो पहले उन्होंने सोचा कि मैं ऐसा करता हूं आलार का आलाम के पास जाता हूं जो सांख्य दर्शन का आचार्य है। उसने मुझे
सांख्य सिखाया था। मैं उससे अपना रास्ता सिखाता हूं। पर आलार कलाम का पता किया तो पता लगा कि उनकी मृत्यु हो चुकी है।
देहांत हो चुका है। फिर सोचा कि ऐसा करता हूं कि जो उद्धक रामपुत्र हैं जिन्होंने उनको आठवां चरण
समझाया था। याद है इनका नाम? सात चरण सिखाए थे इन्होंने। आठवां इन्होंने सिखाया था कि उद्धक रामपुत्र के
पास जाता हूं। उनको ये कहानी मतलब जो ज्ञान है वो समझाता हूं। पर पता लगा कि उनका भी देहांत हो चुका है। फिर सोचा अब
किसको उपदेश दूं भाई? फिर सोचा जो मेरे पांच साथी हैं उनको उपदेश देता हूं।
उनके बारे में एक बात जो पीछे मैं बताना भूल गया वह यह है। जिस दिन सुजाता ने खीर दी और बुद्ध ने खीर
खाई वो पांचों भड़क गए। इस बात से नहीं कि हमें क्यों नहीं दी?
इस बात से कि बुद्ध अपने रास्ते से भटक गए हैं। कठोर तपस्या के मार्ग से भटक गए हैं। बुद्ध कहना चाह रहे थे कि मैं खीर देख के
मैं नहीं भटका हूं। मैं एक दिन पहले रियलाइजेशन कर चुका था कि वह रास्ता ठीक नहीं है। उसके बाद मैंने खीर का सेवन
किया। पर पांचों क्रुद्ध होकर नाराज होकर वहां से चले गए और यह कह गए कि तुमसे बात नहीं करेंगे।
बुद्ध को लगा उन्हीं से मिलता हूं। पता कि ये कहां है। तो वो पांचों आजकल सारनाथ में थे।
पांचों साथ ही जाते हैं हमेशा। सारनाथ में थे तो बुद्ध ने गया से यानी कि बोधग गया से सारनाथ की ओर चलना शुरू किया।
बोला गया से सार सारनाथ का मतलब हो गया पैदल जाएंगे तो शायद दो दिन का रास्ता होगा। तो बुद्ध ने चलना शुरू किया उस
रास्ते पर। और सारनाथ के पास उनको देखा कि सामने पांचों बैठे हुए हैं। उन पांचों ने बुद्ध को देखा।
तो पांचों बात करने लगे। कहां से आ गया? क्यों आ गया? हम तो धक्का देकर भाग आए थे। फिर पीछे आ गया हमारे। पानी भी नहीं
पिलाएंगे इसको। हाल भी नहीं पूछेंगे इसका। फिर एक बोला बैठेगा तो अरे आसन रख दो। बैठना चाहेगा तो बैठ जाएगा। हम बात नहीं
करेंगे। इस तरह से बात कर रहे हैं। एक आसन रखा हुआ है। बैठना चाहेगा तो बैठ जाएगा। हम बात
नहीं करेंगे। ना पानी पूछेंगे ना कुछ करेंगे। और बुद्ध आते जा रहे हैं पास में मुस्कुराते हुए।
और जो ज्ञान प्राप्त हुआ है तो बुद्ध के चेहरे की आभा ऐसी हो गई है कि जैसे जैसे बुद्ध पास आ रहे इनकी ऐसी की तैसी होती जा
रही है पांचों की बात नहीं करेंगे बात नहीं करेंगे और बात करने को मरे जा रहे हैं अंदर से
उसके बाद क्योंकि बुद्ध का ऐसा रूप है ज्ञान प्राप्ति के बाद और जैसे ही बुद्ध पास आए बिना कुछ बोले एक ने उठ के उनका
कमंडल ले लिया एक ने उठ के उनका चीवर ले लिया संभाल लिया किया। एक नया आसन दिया। बैठिए। एक पानी
लेके आया। एक पानी से उनके पैर धोने लगा। बिना कुछ कहे। इनकी सिटी पिट्टी गुम हो गई है।
और फिर ये बैठ गए हैं आसपास कि अब कुछ बताएंगे बढ़िया सा। तो बुद्ध ने कहा मैं जानता हूं आप मुझसे
नाराज हैं। लेकिन मैंने पिछले 28 दिनों की यात्रा में जो हासिल किया है वह पिछले छ साल की यात्रा में नहीं किया था।
यह उत्सुक हो गए। ज्ञान की खोज में बचपन से ही घूम रहे हैं। मिल ही नहीं रहा इन लोगों को। तो बोले हम जानना चाहते हैं
आपने क्या हासिल किया है। तब बुद्ध ने बताया चार आर्य सत्य क्या है? तब बुद्ध ने बताया प्रतीत्य समुतपात क्या है? तब बुद्ध
ने बताया मध्यम मार्ग क्या है? तब बुद्ध ने बताया अष्टांगिक मार्ग क्या है? और कुल मिला के बताया धम्म क्या है?
धम्म और इन लोगों की आंखें खुली की खुली रह गई। बोले हमने जीवन में पहली बार कोई ऐसा धम्म
सुना है जिसमें ना कोई अलौकिक सत्ता है। बाकी तो शुरू ही वहां से होते हैं।
हमने पहली बार ऐसा धम्म सुना है जिसमें कोई पैगंबर भी नहीं है। कोई पैगंबर नहीं।
कोई एक निश्चित किताब नहीं है। जिसमें कोई भी आ सकता है। किसी के आने जाने पर रोकटोक भी नहीं है
और जिसमें दुनिया की हर घटना की व्याख्या प्रतीत समुत्पाद यानी सांसारिक नियमों से ही हो रही है। कोई चमत्कार की बात नहीं
है। कोई कर्मकांड की बात नहीं है। और ऐसा धम्म ऐसा रास्ता हमने कभी सुना ही नहीं।
तो पांचों भावुक होकर बोले कि हे बुद्ध हमें अपनी शरण में लीजिए। तो बुद्ध ने पाली में कहा ए भिक्षवे इसका
मतलब क्या होता है अव भिक्षु याद रखना ए ही भिक्षवे ए भिक्षवे कहते ही वह पांचों आ गए बुद्ध
के धर्म मार्ग में और इन पांचों व्यक्तियों के बुद्ध के धर्म मार्ग में आते ही यानी ए भिक्षवे बोलते ही
जो घटना घटी उसको बोलते हैं कहां चला गया? धर्म चक्र प्रवर्तन। अरे
यह घटना कहलाती है धर्म चक्र प्रवर्तन। क्या बोला था बुद्ध ने? ए ही भिखवे। याद कर लो। बीच-बीच में इसका
जिक्र आएगा। आपको बोलना पड़ेगा बीच-बीच में यही यही भिखवे। ठीक है? [हंसी]
तो यह वाक्य बोला वह पांचों आए और इसके साथ ही धर्म चक्र प्रवर्तन यानी धर्म का चक्र चल पड़ा। पहिया चल पड़ा। इसको बोलते
हैं पहिया घूमना शुरू हो गया। यह घटना घटी सारनाथ में। अब छह लोग हो गए हैं धम्म में। अब संख्या
बढ़ानी है क्योंकि बहुत सारे सेट चल रहे हैं। 62 है। कंपटीशन भी है। और यदि बुद्ध के रास्ते में दम है तो उसमें ज्यादा लोग
आने ही चाहिए। सीधी सी बात है। अभी तक बुद्ध के रास्ते पर कोई भी गृहस्थ नहीं आया है। केवल साधु लोग हैं। एक वो पांच ये
अगली ही सुबह एक बड़ी अच्छी घटना घटी। एक बहुत ही बिगड़ा हुआ लड़का था यश समझ लीजिए। उसका नाम था बनारस का। एकदम रईस
ज्यादा जो होता है ना बिगड़ा हुआ अमीरजादा पैसा। बाप के पास बहुत पैसा था। खूब मौज करता था। रोज क्लब में जाता था। मतलब उस
समय के क्लब सोच लीजिए जैसे होते होंगे। है ना? हर हर जमाने में कुछ तो होता ही है वैसा तो उसमें जाता था। पत्नियां बहुत
सारी थी। एक तो और उसके बाद भी बाहर भी रहता था। रोज सुरापान करना। चार पांच दोस्त ऐसे पाले हुए थे। हमेशा इस द में
उसके बाद भी जीवन से परेशान था। बुद्ध उन चीजों को पहले ही समझ गए थे। यह उन सब चीजों में डूबने के लंबे समय के बाद
समझ पा रहे थे कि सब बकवास चीजें हैं। और एक दिन ये अपने गुस्से में घर छोड़ के चला गया कि मैं मेरा जीवन बहुत निरर्थक
है। मैं समझ नहीं पा रहा कि जीवन कैसे जीूं। तो बड़बड़ाता वो घर से निकल गया था। रात
भर घूमता रहा। सुबह-सुबह बुद्ध सैर कर रहे थे। सामने दिख गया और कह रहा है जीवन निरर्थक है। जीवन में यह नहीं जीवन नहीं।
बुद्ध बोले इधर आ जाओ। अच्छा बुद्ध में क्या मैग्नेटिक पावर रही है कि बुद्ध जिससे 10 मिनट बात कर ली
अगला वाक्य तो एक ही होता था ए ही भवे ऐसा चमत्कार था बुद्ध के अंदर तो इससे बात की 101 मिनट इसकी तो सिटी पिट्टी गुम हो
गई कि भैया ऐसा भी हो सकता है ज्ञान और उसने तुरंत कहा कि हे प्रभु मुझे अपनी शरण में ले लो तो बुद्ध ने क्या कहा
यही देख तो छठा हो गया वहां सातवां और पहला ऐसा जो गृहस्थ है अब इसके पिताजी जब रात भर नहीं आया लड़का
ये वैसे भी कमी आता था लेकिन उस दिन पिताजी को लगा कि आज थोड़ा ज्यादा हो गया है तो पिताजी घूमने निकले ढूंढने निकले
उसको सुबह-सुबह बुद्ध खड़े थे तब तक यह भिखू बन चुका था भिक्षु बनने का मतलब है कि
बाल कट चुके थे और चीवर और वो भिक्षु वाले वेश में आ चुका था। अब बाप बुद्ध के पास आए कि जी हमारा बेटा
मिल नहीं रहा। आपने देखा है बेटा साथ में खड़ा हुआ है। वो पहचान में नहीं आ रहा। तो बुद्ध कह रहे कि हां आपका बेटा मुझे देखा
था। जीवन से बहुत परेशान था। उसको मैंने धम्म के रास्ते पर लाने का प्रयास किया। बोले जी बहुत अच्छा आपने किया। बहुत
बिगड़ा हुआ लड़का है। दुनिया के सारे कुकर्म करता है। अभी कहां मिलेगा? बोले यही है। [हंसी]
यही है तुम्हारा बेटा। और तब बाप ने कहा अरे तुम हो पर बाप खुश हो गया। बोले मुझे चिंता थी किसी गलत
रास्ते पर ना चला जाए। ये तो अच्छे रास्ते पे गया है। पर बुद्ध जी इसकी मां और इसकी पत्नी बहुत
परेशान है। पत्नी या पत्नी या जो भी बोला होगा बहुत परेशान है। उन्हें मैं क्या कहूं? आप एक बार अगर इसके साथ घर आ
जाएंगे, भोजन कर लेंगे, उनको समझा देंगे तो राहत मिल जाएगी। हमें कोई दिक्कत नहीं है इसके साधु बनने से। बुद्ध ने कहा ठीक
है हम आज रात को भोजन पे आते हैं। रात को भोजन पे गए उसको साथ में ले गए। यश को भिक्षु यश को साथ में ले गए। अब भिक्षु यश
की मां भिक्षु यश की पत्नी बैठी है। उनको पता लग गया था पहले ही कि मेरा पति भिक्षु हो चुका है या बेटा भिक्षु हो चुका है।
अच्छा मां और पत्नी को भी अच्छा ही लगा। बोले जैसा ये काम करता था उससे तो बहुत अच्छा है कि भिक्षु ही बनके रहे। कम से कम
थोड़ा तो इंसान बनके रहेगा। और मां और पत्नी ने कहा कि हमें भी अपनी शरण में ले लीजिए। बुध बोले ना ना ना
उनको बड़ी चिंता थी कि अगर भिक्षु संघ में महिलाएं आ गई तो भिक्षु संघ की ऐसी की तैसी हो जाएगी। अच्छा ये चिंता क्यों थी?
हम इस पर आगे बात करेंगे। इस पर बहुत डिबेट है। लोग कहते हैं कि बुद्ध महिलाओं के खिलाफ थे। पर मुझे लगता है कि जैसे लोग
भिक्षु बन रहे थे। [हंसी] अगर महिलाएं भी होती तो आप समझ समझ रहे मैं क्या कहना चाह रहा हूं कि बुद्ध को
बड़ी चिंता थी कि भाई व्याहारिक समस्याएं हैं। इनको दूर ही रखो तो बेहतर है। बहरहाल यहां तक आते-आते बुद्ध ने कहा कि नहीं मैं
आपको भिक्षु नहीं बना सकता हूं। भिक्षुण नहीं बना सकता हूं। लेकिन हां आप वैसे बौद्ध परंपरा का सम्मान करना चाहे करें।
तो यह दोनों उपासिकाएं बन गई कि हम गृहस्थ जीवन में रहते हुए ही उपासक वाले जीवन से जिएंगे। इनके पिता भी, यश के पिता भी,
पत्नी भी और मां भी। फिर जब बाहर निकले यश के चार दोस्त जो छटे हुए दोस्त घूम रहे थे जो रोज शाम को घूमते हैं वो दिख गए। यश को
देखा ये क्या हो गया भाई? ठीक हो तुम? उसने कहा आधा घंटा इनसे बात करो पहले। [हंसी]
तो चार दोस्तों ने आधा घंटा बात की। उसके बाद बुद्ध ने क्या कहा? ए भिक्ष है। ये चारों भी आ गए। होते 60
लोग हो गए। आप समझ रहे हो प्रभाव बुद्ध का कि जिससे बात की वो होना ही है भिक्षु उसके बाद। 60
लोग हो गए। तो बुद्ध ने कहा देखो ऐसा है। अब इन 60ों को ट्रेनिंग दी कि अब अब से आप भी किसी को भिकु बना सकते हैं। और मैं
किसी बड़े मिशन पर जाना चाहता हूं। आप यहां का मोर्चा संभालिए। मैं जा रहा हूं बड़े मिशन पर। कंडन ने वगैरह से कहा तुम
लोग थोड़ा ज्यादा ध्यान रखना तुम्हारा अनुभव ज्यादा लंबा है और किसी गलत व्यक्ति को मत लाना और बुद्ध बोले अब मैं जा रहा
हूं उवेला उन्होंने कहा उवेला से तो आए थे वहां क्यों जा रहे हो बोले बाद में बताऊंगा कुछ खास बात है उवेला में कुछ
करना है और बुद्ध बुद्ध थे रास्ते में भी 30 40 को बना लिया बनते रास्ते में जा रहे थे एक बेचारी महिला जा रही थी गणिका थी
गणिका मतलब वेश्या थी 15 20 लड़के उसको परेशान कर रहे थे। बुद्ध ने वही उनको ज्ञान दिया आधे घंटे
में। यही भिक्ष हो गया। अब सोचो इन सबके भिक्षु संघ में अगर भिक्षुणियां भी होंगी तो
बुद्ध को व्यावहारिक समस्या समझ में आ रही थी। इसलिए उनको लग रहा था कि उससे ऐसा एक तो कोई महिला समाज से आएगी। उसका पति उसका
परिवार नाराज होगा। दूसरा संघ में क्या स्थितियां बनेगी। तो बुद्ध को एक प्रैक्टिकल विज़डम ये थी कि इस चीज से बचना
चाहिए। लेकिन बाद में वह समझे उन्होंने परिवर्तन किया क्या परिवर्तन किया थोड़ी देर के बाद समझेंगे ही बुद्ध उवेला क्यों
गए क्योंकि बुद्ध के दिमाग में एक उद्देश्य था क्या उद्देश्य था यह बुद्ध के जीवन की
सबसे बड़ी चुनौती है बाकी तो आधे घंटे में यही भवे हो जाता था यह मामला बड़ा मुश्किल तीन भाई थे कश्यप बंधु या कश्यप बंधु
वाराणसी के थे और वाराणसी के तीन भाइयों में से सबसे बड़े भाई ने सन्यास लिया। चला गया उवेला।
बाकी दोनों बोले आप जा रहे भैया तो हम भी जाएंगे तो वो दोनों भी आ गए। तो तीनों वहां जाकर सन्यासी हो गए। जो बूढ़े वाला
था उसका नाम था उरुवेल कश्यप या उरुवेल कश्यप। उरुवेला में था नाम था उरुवेल कश्यप।
जो दूसरे वाला था उसका नाम था नदी कश्यप और तीसरे वाले का था गया कश्यप। गया में उवेला उरुवेला में नदी ऐसे याद कर
लो तो उरुवेला में उरुवेल कश्यप नदी कश्यप गया कश्यप इनके ओरिजिनल नाम नहीं है ये सन्यास के बाद के नाम है
बड़ा प्रभाव था इनका बड़े वाले के पास 500 शिष्य थे दूसरे के पास 300 थे छोटे के पास 200 थे 1000 शिष्य थे तीनों के पास
ये अग्निहोत्री परंपरा से आते थे अग्निहोत्री का मतलब है जो अग्नि की पूजा करते हैं या पूजा पाठ आठ में अग्नि का
इस्तेमाल करते हैं और इनको जटिल कहते हैं। जटिल का मतलब दर्शन में होता है जो जटाधारी लोग होते
हैं जो बहुत जटाएं रखते हैं। जटिल कॉम्प्लेक्स कहां से आया? कोई बहुत लंबे बाल रखे उस टाइम थोड़ी ना शैंपू कंडीशनर
होता था। बहुत लंबे बाल हैं। उलझे हुए हैं। वो ऐसे बन जाते थे कि उनको अलग करना ही चैलेंज अपने आप में है। तो वो जटिल
कॉम्प्लेक्स वहां से वो शब्द आया कि जटिलताएं कैसे आती हैं। तो जटिल अग्निहोत्री थी। अब समझ में आ रहा है कि
जटाएं रखते अग्निहोते थे। अग्नि की पूजा करते थे। बुद्ध को पता लगा था कि उरुवेल कश्यप जो
सबसे बड़ा वाला भाई है, सबसे बड़ा आक्रामक व्यक्ति वही है। और बुद्ध का रात दिन मजाक बनाता है। सबको कहता है कि वो तो पागल
आदमी है। उसको क्या आता है। वो अरहत हो ही नहीं सकता। उसे तो ज्ञान ही नहीं है। इस तरह से उनके खिलाफ काफी बोलता था। तो
बुद्ध का मन था कि सामने बैठ के शास्त्रार्थ हो ही जाए। क्या दिक्कत है? यहां आधा घंटा नहीं आठ घंटे लग जाएंगे
क्या हो जाएगा पर यही भिकवे करके मानूंगा मैं तो बुद्ध एक दिन सीधे पहुंचे इनके आश्रम में और बुद्ध ने कहा कि मैं आपके
साथ बातचीत करना चाहता हूं यह बोले क्या बातचीत करोगे छोड़ो बुद्ध ने कहा अच्छा एक काम कीजिए मुझे रहने के लिए
अपने आश्रम में स्थान दे दीजिए थोड़ा सा आज की रात गुजार लूं उवेल कश्यप बोला कि देखिए मैं आपको दे तो
दूंगा लेकिन एक व्यक्ति है जिसका नाम है मुचलिंद और यह एक नागराजा है।
तो यह एक ऐसा दैत्य है जिसका यहां पर बहुत आतंक है। हम यहां दिन में पूजा पाठ करते हैं। पूरे हजार लोग साथ में रहते हैं। यह
रात के समय आता है और जो जो लोग अग्निहोत्री हैं उन सबके आश्रम को नष्ट कर देता है और कोई व्यक्ति मिल जाए तो उसको
आग में ही जला देता है। इतना बड़ा आक्रांता है। अब शाम का समय है। हम सब जा रहे हैं। अगर आप रात को रुके तो
वह आएगा और आपको आग में भस्म कर देगा। मैं नहीं चाहता कि मेरे वजह से आपका जीवन जाए तो मेरी सलाह है कि आप यहां मत रुकिए।
बुद्ध ने कहा कोई बात नहीं मैं रुक जाता हूं। आप बस अनुमति दे दीजिए। अगर सुबह तक जिंदा रहा तो हम बात करेंगे।
उसने कहा आपकी मर्जी है। मेरा काम था आपको चेतावनी देना। अगर आपने तय कर ही लिया है कि अग्नि में भस्म होना जीते जी तो आप रह
लीजिए। रात को आया मुचिलिंद नागराज और यह बात उवेल को पता ही नहीं थी कि
मुचिलिंद नागराज पहले ही यही भिखवे हो चुका है। उसका पहले ही बुद्धम शरणम गच्छामी हो चुका
था। वो आया रात को मारकाट मचाने के लिए देखा बुद्ध को। अरे प्रणाम आप कैसे आ गए? पैर
छूने लगा। बुद्ध तुम यही सब करते हो शरारत। ऐसे नहीं करते। ठीक से रहा हूं। बोला जी आगे से ऐसे नहीं करेंगे। एक सब
ठीक से रहेंगे। सुबह उर्वेल कश्यप आए देखा कि बुद्ध के सामने मुंद बैठा है कान पकड़ के।
उसको कान पकड़ के बैठा नहीं था। मैं थोड़ा समझाने के लिए कह रहा हूं। उसकी तो आश्चर्य से आया। अब ये क्या कर
दिया आपने? बुद्ध ने कहा नहीं ये सब तुम करते रहते हो। कोई खास बात नहीं है। मैं आपके साथ बात करना चाहता हूं। शास्त्रार्थ
करना चाहता हूं। अब वो बेचारा टाल रहा था बार-बार। उसका मन था कि बुद्ध रहे यही ताकि इससे बचा रहूं मैं मुस्लिम से पर बात
करने का उसका ज्यादा मन नहीं था। तो बुद्ध भी तीन चार दिन वेट करते रहे। मौका ढूंढते रहे। अंत में मौका ढूंढ के बोले कि मेरी
बड़ी गहरी इच्छा है कि मैं अरहत शब्द की व्याख्या आपकी सुनू और आपसे सीखूं। सीखूं से उसको कॉन्फिडेंस आ गया कि इसका मतलब
मुझसे सीखना चाहता है। फिर बात हुई। बात हुई तो फिर होना ही था। आधा घंटा एक घंटा दो घंटे बातें हुई। अरहत शब्द को लेकर
अरहंत शब्द को लेकर जितने विवाद हो सकते थे सब डिस्कस हुए और अंत में बुद्ध ने उसके सारे के सारे प्रश्नों का उत्तर दे
दिया और जब सारे प्रश्नों का उत्तर दे दिया तो उर्वेल कश्यप ने क्या कहा नहीं वो तो बुद्ध कहेंगे [हंसी]
उवेल कश्यप ने कहा शरणम देह शरण दीजिए मुझे और बुद्ध ने कहा
यही देख और जैसे ही आए बालाल मुंडाए कपड़े उनके बदलवाए और श्रमण वेश में आ गए। अब जैसे ही
यह श्रमण वेश में आए इन्होंने क्या किया? अपने आश्रम में जितना भी अग्निहोत्र परंपरा का सामान था सारा नदी में बहा
दिया। नदी पड़ोस में बह रही थी। नदी का बहाव जहां था उसके बाद उनके दोनों छोटे भाइयों का आश्रम था। उन्होंने नदी में
देखा कि सारे बर्तन हमारे ही आ रहे हैं। वो घबरा गए कि ये क्या हो गया? भागे-भागे गए। वह भागे-भागे गए तो उनके सारे शिष्य
500 वो भी भागे भागे गए। इधर उवेल ने जब श्रवण वेश धारण किया बाकी 500 बोले हम क्या करेंगे? हम भी कर लेते हैं। तो 500
हो चुके थे। 500 पीछे से भागे भागे आ रहे हैं। नदी और गया कश्यप आए। उन्होंने आकर देखा अरे ये क्या हो गया है? तो गया और
नदी ने पूछा। मतलब नदी कश्यप और गया कश्यप ने उर्वेल कश्यप से पूछा कि बड़े भैया यह क्या हुआ? आप तो बहुत विरोधी थे। उवेल ने
बताया कि मैंने आज इनसे जो बात की है कुछ घंटे तो मुझे लगा कि जितनी स्पष्टता इनको है उतनी स्पष्टता हमें नहीं है और ज्ञान
का यही तरीका है कि कोई आपको अपने से बेहतर मिले तो आप उसको फॉलो करें तो मैंने बहुत होशो हवास में सोच समझ के फैसला किया
है कि मैं इनकी परंपरा का श्रवण बन के रहूंगा। तो दोनों छोटे भाई बोले भैया हम तो आपके पीछे चलने वाले हैं। आप वहां
जाएंगे तो हम भी वहीं जाएंगे। हम वही सेम ऑप्शनल सब्जेक्ट लेंगे जो आप लेते हैं भैया हम तो वही तैयारी करेंगे वही
प्रैक्टिस करेंगे सारी तो बुद्ध के पास हो गए कि शरणम देह बुद्ध ने क्या कहा
ए भवे और एक ही दिन में बुद्ध ने हजार लोगों को अपना शिष्य बना लिया और वह भी किसको उवेल कश्यप को अभी राजगीर में रोके
हुए हैं मतलब वहां से राजगीर में आ गए और जैसे ही राजगीर में आए इनका वायदा था कि राजगीर जब भी आऊंगा तो बिंबिसार को
वायदा किया था ना कि जब ज्ञान प्राप्त होगा तो मुझसे मिलना तो राजगीर पहुंचे बिंबिसार को खबर मिली बिंबिसार भागा भागा
आया वहां पर और यह खबर मिली कि बहुत बड़े ज्ञानी हो गए हैं और बहुत सारे इनके भक्त बनते जा रहे हैं। पूरे शहर में खबर फैल गई
और 12 लाख लोग साथ में गए। जैसे ही बिंबिसर और 12 लाख लोग आए। उन्होंने देखा कि बहुत सारे भिक्षु बैठे
हैं साथ में। उनमें से एक पर निगाह पड़ गई। उसका नाम है उवेल कश्यप। उवेल कश्यप का खौफ यहां तक था।
लोग आपस में खुसुरफुसर करने लगे कि ये क्या हो गया भाई? लोगों ने कहा कि ये बुद्ध का फॉलोअ बने कि
बुद्ध इसके बने हैं। वो इतना प्रकांड और इतना कट्टर किस्म का आदमी था। पहले तो लोगों को ये मन में आया।
बुद्ध ने देखा लोग बहुत दुविधा में बुद्ध ने उवेल को इशारा किया उवेल उठा उसने सबको बताया कि देखिए मैं पहले अग्निहोत्र
परंपरा में था ऐसा वैसा लेकिन अब मैं बुद्ध के रास्ते पर चलता हूं और मैं बहुत प्रसन्न हूं कि मैं श्रवण मार्ग पे आ गया
हूं। लोगों की आंखें खुली की खुली रह गई कि भैया इसको मैनेज कर लिया अगर तो बुद्ध सच
में कुछ अलग ही मामला है। फिर उन्होंने कहा बुद्ध जी थोड़ा सा उपदेश हमें भी दीजिए। तो बुद्ध ने थोड़ी बहुत
बातें बताई अपने धम्म के बारे में और थोड़ा सा बताने के बाद क्या हुआ कि 12 लाख में से 1 लाख ने
तुरंत धम्म स्वीकार कर लिया सुबह हजार शाम को 1 लाख
और बौद्ध धर्म इस गति से फैलना शुरू हुआ राजगीर यानी मगध के इलाके में और आसपास के इलाके में कि वो
लोगों को भरोसा नहीं होता था। और इसके बाद बुद्ध के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण जो दो व्यक्ति आए उवेल कश्यप
सबसे महत्वपूर्ण नहीं था। सबसे मुश्किल व्यक्ति था। सबसे महत्वपूर्ण
वह यह व्यक्ति है। मैंने आपको शुरू में जिक्र किया था कि एक उस समय के विद्वान थे संजय बेलट्ठी पुत्र या बेलठी पुत्र
जो अज्ञयवाद और संशयवाद को मानते थे एग्नोस्टिसिज्म और स्केप्टिसिज्म। ये दो दोस्त थे बचपन के सारे पुत्र और
मुगल। मैंने कहा था कि जय और वीरू जैसी दोस्ती इनकी थी। जय वीरू शोले फिल्म के दो चरित्र हैं धर्मेंद्र अमिताभ बच्चन जो
एकदम साथ में रहते हैं। तो सारी पुत्र और मुगल लयन ये दोनों कहां के थे? यह मगध के लोग थे और बचपन से ही
बहुत जिज्ञासु थे यह जानने के लिए कि अंतिम सत्य क्या है? तो घर से निकल गए थे कम उम्र में। यहां भटके वहां भटके अंत में
जाके संजय बिलठी पुत्र के पास जाके इनको थोड़ा सा संतोष मिला पर पूरा संतोष नहीं मिला।
थे उनके साथ और इनके साथ करीब 250 मेंबर्स थे जिनमें से दो यह भी थे। अब एक दिन क्या हुआ? सारी पुत्र उस समय ये
लोग राजगीर में ही थे। राजगीर में ही बुद्ध भी थे। राजगीर में ही सारा इनका पूरा ग्रुप था। सारे पुत्र निकले भिक्षा
लेने के लिए। सॉरी सारे पुत्र नहीं भिक्षा लेने के लिए। मतलब इन्होंने तो देखा यह तो अभी अभी इनका यही भवे हुआ नहीं है ना।
आप याद कीजिए कि जो पांच लोग थे कौडिन्य वगैरह उनमें से मैंने कहा था कि एक का नाम याद रखना बाद में काम आएगा अाजी
या अश्वजीत यह निकले भिक्षा लेने के लिए और जब भिक्षा लेने के लिए निकले तो सारी
पुत्र ने अचानक इनको देखा और सारी पुत्र ने महसूस किया कि यह बहुत ही पवित्र किस्म का व्यक्ति बहुत ही मैच्योर
किस्म का व्यक्ति है। पीछे पीछे चलने लगे देखने के लिए। वो पूरा भिक्षा लेते लेते उसके बाद अपने
कुटी की तरफ जाने लगा। तो सारी पुत्र ने रोका और कहा कि देखिए भिक्षु मैं बहुत देर से आपको देख रहा हूं और मैं बहुत प्रभावित
हूं। मैं जानना चाहता हूं कि आप किस परंपरा से हैं। क्या आपका दर्शन है? उसने कहा देखिए मैं तो बुद्ध की परंपरा का
आदमी हूं। धम्म की परंपरा का आदमी हूं। लेकिन मैं भी नया हूं। मैं धम्म ठीक से समझा नहीं पाऊंगा आपको। समझा तो बुद्ध ही
पाएंगे। सारे पुत्र ने कहा नहीं मेरी समझने की क्षमता ठीक-ठाक है। थोड़ा भी समझाएंगे तो
मैं ठीक से समझ लूंगा। तो उसने कहा ठीक है मैं कोशिश करता हूं। तो अच ने कोशिश की और कोशिश ठीक कर दी। और
सारी पुत्र को समझ में आ गया। और समझ में आते ही यह भी समझ में आ गया कि मैं गलत रास्ते पर चल रहा था अब तक।
सारे पुत्र बोले मेरा मन है कि मैं आपकी परंपरा में दीक्षित हो जाऊं। उन्होंने कहा उसके लिए आपको बुद्ध से मिलना होगा। वह
मैं नहीं कर सकता हूं। सारी पुत्र गया मुगलयन के पास क्योंकि इनके बीच में एक सहमति थी कि जब भी किसी को कोई अच्छा
रास्ता मिलेगा एक दूसरे से शेयर करेंगे और दोनों मिलके उस रास्ते पर चलेंगे। मुगल लयन को बताया मुगलन ने सुना। बोला
क्या बात है यार कभी इतना गहरा सुना ही नहीं हमने। तो यह दोनों निकलने लगे कि हम बुद्ध के
रास्ते पर जाएंगे। बाकी 250 बैठे थे। बोले कहां जा रहे हो? बताया ऐसे बोले फिर हमें भी ले चलो ना।
तो ये 250 के 250 लोग सारी पुत्र और मौगल्यान सब पहुंच गए बुद्ध के पास जहां बुद्ध थे। बुद्ध कहां थे? एक जगह का नाम
सुना होगा आपने वेलुवन। या वेणुवन जब बिंबिसार मिला उनसे कुछ दिन पहले तो
बिंबिसार ने उनको और उनके भिक्षुओं को रहने के लिए एक बहुत अच्छा उद्यान गिफ्ट किया राजगीर में है। आज भी जाएंगे तो
देखिएगा बड़ा सुंदर उद्यान है। और वो पहली ऐसी भेंट थी जो आगे चल के नज़र बनी। उस वेणुवन में बुद्ध और बुद्ध के बहुत सारे
शिष्य रुके हुए थे। और यह 250 लोग सारे पुत्र मुगल पहुंचे और बुद्ध ने दूर से देख के ही अपने सहयोगियों
से कहा कि यह जो दो लोग आ रहे हैं यह धम्म को आगे बढ़ाने में सबसे महत्वपूर्ण साबित होंगे।
और तब सारी पुत्र और मुगल मिले। उन्होंने कहा शरणम देह तो बुद्ध ने क्या कहा?
बुद्ध ने कहा ए भवे और बुद्ध के संघ में अब ऐसे लोग आने शुरू हो गए हैं
जिनके आने से पूरी चीजें चेंज होंगी और यह एक तरह से अंतिम व्यक्ति है जिसका आना धम्म के लिए बहुत क्रांतिकारी साबित हुआ।
मैंने इसका जिक्र किया था अनाथ पिंडक इसकी कहानी बहुत इंटरेस्टिंग है। एक कहानी आम्रपाली की आएगी आगे। बाकी उसके पहले एक
ये कहानी यह दो ही कहानी अब इंटरेस्टिंग बची है। अनाथ पिंडक का असली नाम था सुदत्त।
यह था क्या? यह रहता था श्रावस्ती में। श्रावस्ती यानी कौन सा महाजनपद? कौशल महाजनपद में था। और यह वहां का
श्रेष्ठी था। श्रेष्ठी से बनता है सेठी। सेठी से बनता है सेठ। यानी कि वहां का
बहुत बड़ा सेठ था। बहुत बड़ा सेठ। बहुत पैसे वाला आदमी। पर पैसे वाला आदमी ऐसा नहीं था कि सारा
पैसा दबा के बैठ जाए। खूब खर्च करता था समाज के ऊपर और इसलिए उसका नाम पड़ गया था अनाथ पिंडक क्योंकि अनाथ लोगों की मदद
करने में जितनी बड़ी भूमिका यह निभाता था उतनी बड़ी भूमिका कोई नहीं निभाता था। इसका नाम ही पड़ गया अनाथ पिंडक।
अनाथ पिंडक शावस्ती से किसी काम से राजगीर आया हुआ था। क्यों आया हुआ था? तो राजगीर में उसका काम
था और राजगीर में उसका साला जो था जिसका वो जीजा था वो राजगीर का श्रेष्ठी था बहुत बड़ा उसके घर पर रुका हुआ था तो उसने देखा
कि उसके जो साले साहब हैं बड़ी मेहनत से काम कर रहे हैं। बहुत बड़े सम्मान की तैयारी करवा रहे हैं। समारोह की तैयारी
करवा रहे हैं। हजारों व्यक्तियों का भोजन बन रहा है। तो उसने पूछा ये सब क्या हो रहा है भाई? उसने कहा अरे जानते नहीं हो
आज रात को बुद्ध का भोजन है और मुझे जिम्मेदारी मिली है। उसने कहा बुद्ध कौन है? बोले अरे बुद्ध को नहीं जानते। बुद्ध
हो तुम तो बहुत बड़े ज्ञानी हैं। बहुत बड़े तपस्वी हैं। धम्म का रास्ता है। ये बोला प्लीज
मुझे मिलवा दो उनसे एक बार। बोला बहुत मुश्किल है। कोशिश करूंगा। तो फिर इसने क्या होगा? मैं तुम्हारा जीजा
हूं। ध्यान रखना। मिलवा देना। खैर जो भी है। तो रात को उसने कोशिश करके बुद्ध से थोड़ा समय दिलवा के भेंट करवाई सुदत्त की
यानी कि अनाथ पिंडक की अनाथ पिंडक उनसे मिलने गया। उसे बताया कि ऐसेसे मैं श्रावस्ती में रहता हूं।
और तो बुद्ध ने बताया कि देखिए ज्यादा आसान रास्ता तो यह है कि आप भगवान को, आत्मा
को, स्वर्ग को ये सब मानते रहिए। मेरा कहना यह है कि जिन चीजों का प्रमाण नहीं है उनको क्यों मानना है? इससे बेहतर है कि
हम जगत को जगत के रूप में ही समझे। उसने कहा ठीक है पर मेरे मन में एक दुविधा है। तो क्या दुविधा है? जो मैंने आपको
शुरू में बताया था। मैं बहुत पैसे वाला आदमी हूं। मेरे पास सैकड़ों लोग काम करते हैं। उनके परिवार चलते हैं। मैं हजारों
व्यक्तियों की चिंता करता हूं। बहुत सारे अनाथों की जिंदगी को संभालता हूं। पर मेरा मन इस सब में लगता नहीं है। मेरा मन करता
है कि मैं सब छोड़कर तपस्वी बन जाऊं और आप जैसा जीवन जिंू। आप क्या कहते हैं? और तब बुद्ध ने कहा कि बाकी कोई कुछ भी
कहता हो मैं कहूंगा तपस्वी आपको नहीं बनना है। क्योंकि अगर आर्थिक जगत में ऐसे लोग नहीं
होंगे जो तपस्या के भाव से जीवन जिएंगे तो समाज चलेगा नहीं। आपको धन कमाना है। बस धन
[गला साफ़ करने की आवाज़] का इस्तेमाल इस भाव से करना है कि वह समाज का है। अहंकार से नहीं करना है। वासना के भाव से नहीं
करना है। सम्यक भाव से करना है। सम्यक आजीविका के भाव से करना है। इस दो मिनट के डायलॉग ने अनास पिंडक का
पूरा दृष्टिकोण बदल दिया। और अनास पिंडक ने कहा शरणम देह और वहां से क्या आया? ए भवे
और यह वह आदमी है जिसको सीधे बनाया गया श्रोतापन्न। एक शब्द होता है श्रोतापन्न।
श्रोतापन्न का मतलब बौद्ध परंपरा में है कि आप स्रोत में आ गए हैं। बहाव में आ गए हैं। मुक्ति के रास्ते पर चल पड़े हैं। पर
श्रोतापन्न का बेसिक मतलब है कि आपको लगभग सात जीवन अभी भी लेने होंगे मनुष्य के रूप में मुक्ति मिलने से पहले। शुरुआत हो गई
है आपकी। इसमें जो अंतिम अवस्था आती है चौथी उसको बोलते हैं अरहंत। कुछ लोग उसी को अरहंत
बोल देते हैं। जैन लोग इसको अरिहंत बोलते हैं। यहां अरहंत चलता है। इसका मतलब है कि आपको मोक्ष जीते जी मिल गया है। इसके बाद
आपको कोई फिर से नहीं आना पड़ेगा। इसके बीच के दो चरण हैं। एक को बोलते हैं सकदामी
और एक को बोलते हैं अनागामी। सकलागामी का मतलब है कि एक जीवन और लेना होगा।
अनागामी का मतलब है फिर से नहीं आना होगा। फिर से नहीं आना होगा। मतलब आपको इस संसार में नहीं आना होगा। लेकिन जो आध्यात्मिक
लोक है परलोक है वहां कुछ समय गुजारना पड़ सकता है। मोक्ष मिलने से पहले और सबसे ऊपर होता है अरहंत। जिसको जीते जी मोक्ष मिल
चुका है और मृत्यु के बाद फिर से लौट के नहीं आना है। कहीं भी नहीं आना है। स्थाई मुक्ति में रहना है। यह बौद्ध परंपरा के
चार बड़े प्रसिद्ध शब्द हैं। बुद्ध ने इनका बहुत इस्तेमाल किया है। तो सीधे श्रोतापन्न बनाना बड़ी बात होती है। लेकिन
बुद्ध ने अनाथ पिंडक को सीधे श्रोतापन्न का दर्जा दिया और अनाथ पिंडक ने एक वायदा किया। वायदा क्या किया? अपनी ओर से
कमिटमेंट की कि मैं आपके लिए जैसे राजगीर में महाराजा बिंबिसार ने आपको और आपके भिक्षु साथियों के लिए वेलू वन बनाया है।
मैं श्रावस्ती में आपके लिए एक ऐसा ही वन बनवाऊंगा। वन का मतलब एक ऐसा स्थान बनवाऊंगा जहां आप और आपके शिष्य अपना समय
गुजार सकें और धार्मिक कार्य कर सकें। यह कह के अनाज पंडक वहां से निकला और ठीक इस समय बुद्ध के पास एक टेलीग्राम आया।
टेलीग्राम का मतलब कोई व्यक्ति आया। बुद्ध को धम्म प्रचार करते हुए एक साल हो चुका था लगभग।
और बुद्ध राजगीर में ही थे। अचानक शुद्धोधन को लगा कि भाई पूरे दुनिया को ज्ञान दे रहा है बेटा थोड़ा हमें भी दे
दे। तो ज्ञान पे थोड़ा हक तो हमारा भी बनता है। तो शुद्धोधन ने एक आदमी से कहा कि सुनो दूत बनके जाओ। वह मिलेगा उसको
बोलना। तुम्हारे पापा कह रहे हैं कि पापा की जिंदगी कब खत्म हो जाएगी पता नहीं। और एक बार उनके मरने से पहले देख तो लो
उनका मुंह और लगे हाथ जो ज्ञान प्राप्त किया है थोड़ा दे भी दो उनको। ऐसे ही जाके बोलना तब आएगा वरना नहीं आएगा।
तो वो आदमी गया संदेशवाहक एक व्यक्ति था वो गया। इससे पहले कि बुद्ध को कुछ समझाता उसका यही भिखवे हो गया।
वो भूल ही गया कि मैं क्यों आया था। फिर शुद्धोधन ने कहा अरे अजीब हाल है। दूसरे को भेजा
उसका भी वही हुआ। करते करते नौ हो गए। जो जाता था बुद्धम शरणम गच्छामि भूल जाता
था कि मैं क्यों आया हूं। अब दव नंबर पर बुद्ध शुद्धोधन ने अपने एक दोस्त के बेटे से कहा उसका नाम था
कालूदाई। मुझे पता नहीं कल्चर में किस लेवल तक के सवाल आजकल पूछे जा रहे हैं। इनमें से दो
चार तो आपको मिल जाएंगे नाम जो परीक्षा में आ सकते हैं आपके सामने। कालू दायन या कालू दाई दोनों नाम चलते
हैं। उससे कहा देख बेटा मैं जानता हूं कि तुम लौट के नहीं आओगे। मत आना।
पर जाते ही प्रभावित होने से पहले उसको बोल देना कि पापा याद कर रहे हैं और पापा मरने वाले हैं। एक बार उनसे मिल लो थोड़ा
ज्ञान दे दो उनको। बोला जी मैं ऐसे ही करूंगा। जाते बोल दिया पापा मरने वाले जल्दी जाके उनसे मिल लो इससे पहले कि मेरा
भी हो जाए। बुद्ध ने कहा अरे यार ये नौ इन्होंने बताया नहीं कम भक्तों ने आ रहे थे। इसलिए
आ रहे थे ये लोग। मुझे कपिल वस्तु से बहुत लोग आ रहे हैं आजकल। बुद्ध ने कहा अरे पिताजी का आदेश है तो
जाना ही होगा। तुरंत बुद्ध ने कहा कि मैं कपिल वस्तु की यात्रा पर जाऊंगा और कपिल वस्तु की यात्रा शुरू हुई। कालूदाई को
बोले तुम जल्दी से भाग के उनको बताओ कि तुम्हारे कहने पर आ रहे हैं ताकि तुम्हारा सामान भी बढ़ जाए। कालूदाई भाग के गया।
शुद्धधन को बताया कि आ रहे हैं। मैंने कह दिया था और पिता बहुत खुश हो गए। अब बुद्ध पहुंचे अपने शिष्यों के साथ कपिलवस्तु।
कपिलवस्तु के बाहर एक उद्यान है। उस उद्यान का नाम है निग्रोधा उद्यान। उस उद्यान में उनके भिक्षुओं के रहने की
व्यवस्था की गई तो वो वहां पर रहे और वहीं पेरेंट्स मिलने आ गए। शुद्धोधन आए। महा महाप्रजापति गौतम यहा
यशोधरा यही लेकिन पेरेंट्स दोनों आए और वो बुद्ध को देख के इतना खुश कि एकदम ज्ञान जैसे चेहरे से बरस रहा हो। औदात्य सौंदर्य
गदगद हो गए। उससे बात की थोड़ी देर और गदगद हो गए कि कितना मतलब भाई अपने बच्चे को इतना ऊपर देखना किसको अच्छा नहीं
लगेगा। उसके बाद तय हुआ कि मैं कल सुबह महल में आऊंगा और सब लोगों से मिलूंगा।
शुद्ध बहुत खुशी कल मेरा बेटा मेरे महल में मेरे घर में आएगा। इतने दिन से मैं बाट जोह रहा था इंतजार कर रहा था। सुबह
हुई सुबह-सुबह बुद्ध उठे और अपने ही शहर के घरों में जाकर भीख मांगने लग गए। भिक्षाम देही
अब जिससे भीख मांगे उसकी ऐसी तैसी हो जाए कि मैं क्या दूंगा इनको। इधर से दो दिन खबर मिली कि बेटा भीख मांग
रहा है। बाप राजा है बेटा अपने ही इलाके में भीख मांग रहा है। तो बाप भागा भागा गया तो पकड़ा। बोले क्या कर रहे हो? बोले
आप क्या कर रहे हो यहां? यहां आप क्यों आ गए? मैं तो आऊंगा ही घर पे। बोले बेटा हमारे इतने बुरे दिन नहीं आए
हैं कि भीख मांगनी पड़े। बोला आप कहां मांग रहे हैं? [हंसी] मांग तो मैं रहा हूं।
तो बुद्ध ने कहा हमारी वंश परंपरा है पिताजी। बोले कौन से वंश की परंपरा है? बोले बुद्ध वंश की बात कर रहा हूं। आपके
वंश की बात नहीं कर रहा हूं। हमारे बुद्ध वंश की परंपरा है कि व्यक्ति किसी भी स्तर पर हो उसको भिक्षा मांग के जीवन जीना होता
है। शुद्धोधन बोले जीवन भर मांग लेना। आज तो मत मांगो। मेरा सम्मान तो रखो। बोले मैं
आपको इसी झूठे सम्मान के भाव से मुक्त करना चाहता हूं। यह भाव कि बेटा भीख मांगेगा तो मेरा
सम्मान खत्म हो जाएगा। यही बंधन का कारण है। जब तक इन मिथ्या चीजों को दिल से बाहर
नहीं निकालोगे आपको मुक्ति नहीं मिलेगी। तब बाप को समझ में आया कि बेटा है तो ज्ञानी कुछ भी कहो। तो कहा अरे भाई मैं
तुम्हारे तरह कब सोच पाऊंगा। तो बुद्ध ने कहा अभी तो आप जाइए। मैं थोड़ी देर में आता हूं महल में और हमारी दिनचर्या है यह
पूरी करके आता हूं। उसके बाद बुद्ध पहुंचे महल में। महल में सब मिले। बहुत मन से मिले।
लेकिन यशोधरा नहीं आई। कैसे आएगी? कोई सेल्फ रिस्पेक्ट नाम की चीज होती है कि नहीं होती है? भाई छोड़ के
तुम भागे मिल आएंगे। ये कोई बात हुई ध्यान रखना है। यह बुद्ध चरित्र की बात चल रही है। अभी बुद्ध चरित्र में बुद्ध बिना बताए
चले गए थे। अंबेडकर जी की हम बात करके गए हैं। है ना? तो बुद्ध चरित्र के बेस से बात चल रही है। यशोधरा नहीं है। तो बुद्ध
ने पूछा यशोधरा कहां है? मैसेज भिजवाया गया तो वहां से जवाब आया किसी को मिलने की जरूरत हो तो मुझसे मिलने के लिए आ सकता
है। अब इसको बोलते हैं उपालंभ उलाहना। अरे हमें हम कौन है तुम्हारे लिए? अरे बड़े
लोग बड़ी बातें। जब ऐसी बात लोग करते हैं ना प्यार में मीठी छुरियां जब चलाते हैं तब ऐसा करते हैं। जैसे किसी को 5:00 बजे
का टाइम दिया पहुंचे 8:00 बजे घूमते हुए और सामने वाला घड़ी देख रहा है आपको दिखा दिखा के आप कह रहे सॉरी वो कह रहे नहीं हम
तो छोटे लोग हैं। आप बड़े लोग हैं भाई। कि आप आ गए यही गनीमत है। आप आए हम इसी में जन्नत महसूस
करते हैं। आपने हमारे कुटिया को आज पवित्र कर दिया आ के। वो कह रहा है अरे माफ कर दो। नहीं नहीं माफ किया। अरे सात पीढ़ियों
तक याद रखेंगे कि आप आए थे हमारे। ये जो खेल है इसको बोलते हैं उपालंभ या उलाना। [हंसी]
मीठी चोट। चाकू नहीं मारना है। गाली नहीं देनी है। लेकिन मीठी-मीठी चोट करते रहना ताकि थोड़ा गुस्सा तो निकले किसी तरह से।
शांति तो मिले तो कह जिसको मिलना आ जाए हमें कौन पूछता है तो बुद्ध समझ गए कि अभी वो काफी परेशान है
तो बुद्ध गए और बुद्ध ने कहा सारी पुत्र और मुगल तुम साथ में चलो भाई मतलब ये नहीं था कि अकेले जाओगे तो पिटाई
हो जाएगी ऐसा भाव नहीं था उनके मन में उनके मन में भाव ये था कि वो बहुत परेशान है अपसेट होगी तो हो सकता है कि बहुत रोए।
तो अगर वह मुझे छू भी ले रोते समय तो आप परेशान क्योंकि बौद्ध परंपरा में भिक्षुओं के लिए वर्जित है। छू नहीं सकते किसी कोई
पुरुष किसी महिला को तो अगर वो छू भी ले तो आप परेशान मत होना क्योंकि उसको बहुत सालों का क्रोध और परेशानी है। वो निकलने
में समय लगेगा। खैर बुद्ध गए जैसा स्वाभाविक था वैसा ही हुआ। वो उसके बुद्ध के पैर पकड़ के रोने
लगे जोर-जोर से। बहुत गुस्से में कि कहां चले गए थे? क्यों चले गए बताया क्यों नहीं ये सब बातें हुई और रोते-रोते अचानक उसे
देखा कि दो लोग और खड़े हुए हैं। ऐसे टाइम पे किसी को लेके जाना अच्छी बात थोड़ा है। लेकिन पर बुद्ध को भी लगा होगा कि ठीक है
थोड़ा जल्दी गुस्सा कंट्रोल हो जाएगा। वरना पता नहीं गुस्सा कहां तक जाए। तो देखा कि वो
दोनों साथ में ससुर भी खड़े हुए हैं। शोधन भी आ गए थे पीछे पीछे। अब ससुर के सामने तो फिर खट से उठ के पल्लूवल्लू किया उसने
कैसे रोन के सामने। तो बुद्ध ने कृतज्ञता व्यक्त की, माफी भी मांगी कि मैं आपको बता नहीं पाया। उस तरह
की बातें हुई। उसके बाद बुद्ध सीढ़ियों से नीचे उतरे। और जब सीढ़ियों से नीचे उतरे
तो यशोधरा से भेंट हो गई। अब राहुल से भेंट करवाएंगे। बुद्ध सीढ़ियों से जब नीचे उतरे तो राहुल को यशोधरा ने तैयार किया।
या राहुल आप समझ लीजिए सात आठ साल का बच्चा है। सुंदर से तैयार किया। अच्छे से तैयार किया।
और नीचे दिखाया कि वह जो देख रहे हो ना साधु अंकल वो तुम्हारे पापा हैं। मतलब वो जो साधु हैं श्रवण है वो तुम्हारे
पापा हैं। तो उसने कहा लेकिन मेरे पापा तो शुद्धोधन है। बोले नहीं वो तुम्हारे बाबा हैं। दादाजी हैं।
क्योंकि तुमने कभी पापा को देखा ही नहीं होश संभालने के बाद तो तुम्हें लगता है कि वह तुम्हारे पापा हैं। नहीं वो बाबा हैं।
दादाजी हैं। यह तुम्हारे पिताजी हैं। और यह बहुत बड़े व्यक्ति हैं। तुम इनके पास जाओ। अपना हक मांगो इनसे। अपना
उत्तराधिकार मांगो। अपना हिस्सा मांगो। नेगेटिव सेंस में नहीं कह रही है। अच्छी सेंस में कह रही है।
तो राहुल नीचे आ गया। और राहुल पापा के पीछे पीछे घूमे। जहां पापा जाए। बुद्ध ने देखा तो बुद्ध ने पीछे
को काटी एक आध बार। प्रेम किया और राहुल पीछे पीछे चलता जा रहा है। अब जब सब कुछ हो गया बुद्ध बाहर जाने लगे।
वह बोला मेरी बात तो सुनो। बुद्ध बोले हां बताओ। बोले मेरा उत्तरालाधिकार [हंसी] मेरा
उत्तराधिकार भी तो दो। मैं तुम्हारा बेटा हूं। मेरा उत्तराधिकार दो जो मेरा हक बनता है। बुद्ध ने दो-तीन बार टालने की कोशिश
की कि बेटा अरे जाओ बेटा छोटे हो जाओ ये सब बातें बाद में करेंगे। बड़े तो हो जाओ। नहीं नहीं मेरा उत्तराधिकार दो।
तो अंत में फिर बुद्ध ने कहा देख बेटा ऐसा है। उसे बुलाया अपने पास और कहा कि देखो बेटा ऐसा है। मेरे पास जो संपत्ति थी
धन संपदा सोना चांदी घर भवन वह सब तो मैं पहले ही त्याग चुका हूं। वह तुम्हारे दादा जी के पास ही हैं। तुम्हारी
मां के पास ही हैं। वह तुम्हें मिल ही जाएंगे उनसे। है ना? अगर मेरी संपत्ति चाहिए तो मेरे पास
संपत्ति के नाम पर केवल आध्यात्मिक संपत्ति है। और वो आध्यात्मिक संपत्ति केवल एक है वह
है धम्म। और मेरा उत्तराधिकार तो सिर्फ यह हो सकता है कि तुम भी मेरे रास्ते पर चलकर धम्म के
पथिक हो जाओ। क्या तुम धम्म के रास्ते पर चलना चाहोगे? बोला हां
यही भिखारी। आ जाओ भाई। तुम भी आ जाओ। लेकिन उसमें एक नियम यह था कि 20 साल से पहले किसी को
भिक्षु बना नहीं सकते हैं। तो वैसे में यह होता है कि रजामंदी हो जाती है। लेकिन जब बच्चा 20 साल का हो जाएगा तब संघ में
आएगा। और यह ऊपर से यशोधरा ने देखा खुश हुई। एक और व्यक्ति ने देखा सिर पीट लिया अपना।
शुद्धोधन उसको लगा मूल के साथ ब्याज भी हाथ से निकल गया। भाई [हंसी] पहले
मूल चला गया था। इसको बुलाया घर पर ब्याज भी ले चला गया। ये कैसा है? लेकिन यशोधरा के इस प्रसंग की थोड़ी सी
मौलिक व्याख्या जो हमें मिलती है वह मिलती है मैथिली शरण गुप्त के यहां। इनका नाम सुना है आपने?
यस सर। इनको राष्ट्र कवि कहते हैं और इन्होंने बहुत सारी कविताएं लिखी। भारत भारती सबसे
प्रसिद्ध कविता है। यशोधरा भी इनकी एक बहुत प्रसिद्ध कविता है और बहुत सारी कविताएं हैं। तो मैथिलीशरण गुप्त ने
यशोधरा में मुख्य रूप से जो कहानी ली है। भाई उस समय तक डॉ. अंबेडकर वाली व्याख्या तो थी नहीं। है ना? कुणाल जातक वगैरह का
उनको आईडिया रहा नहीं होगा। डीडी कौशांबी की व्याख्याएं भी उस समय तक नहीं आई थी। तो उस समय तक बुद्ध की कहानी का एक ही
मतलब था बुद्ध चरित्र वाली कहानी कि बुद्ध ने चार दृश्य देखे। बुद्ध तपस्वी हो गए। यह वाली कहानी और बुद्ध बिना पत्नी और
बेटे को बताए चले गए आधी रात को। यह वाली कहानी। तो इसी पर गुप्त जी ने यशोधरा में नाराजगी जाहिर की। पहले तो कि मुझे बता के
क्यों नहीं गए? वही जो मैंने बताया था सिद्धि हेतु स्वामी गए। यह गौरव की बात पर चोरी चोरी गए यही बड़ा ब्याघर सखी वह
मुझसे कह कर जाते कह तो क्या वे मुझको अपनी पथ बाधा ही पाते यह दुख उनका व्यक्त हुआ है
और उस दुख से बड़ी बात हुई है इस प्रसंग में बुद्ध ज्ञान प्राप्त करने के कुछ वर्षों
के बाद छ सात वर्ष के बाद नहीं ज्ञान प्राप्त करने के एक वर्ष के बाद जाने के सात साल के बाद लगभग जब शुद्धोधन के
बुरावे पर आए तो यशोधरा से मिलने के लिए उसके कमरे में गए
और मैथिशरण गुप्त के यहां बुद्ध अकेले गए हैं। उसमें सारी पुत्र या मुगल को साथ ले नहीं गए।
बहुत ही इंटरेस्टिंग सीन है। 7 साल के बाद एक आदमी जो बिना बताए चला गया था ज्ञान प्राप्त करने के लिए। आज लौट
के आया है अपनी उसी पत्नी और अपने बेटे से मिलने के लिए। बेटा भी साथ में ही उस समय अंदर। राहुल साथ में ही है।
अब सारी दुनिया सोच रही है कि क्या बात होगी कौन बात शुरू करेगा क्या बात करेंगे और यहां बुद्ध ने क्या कमाल किया यशोधरा
के पास जाकर बोले भिक्षाम देह जो सुबह-सुबह किया था और शुद्ध परेशान हो गए थे अब यहां जाके अपनी पत्नी को बोल रहे
है भिक्षाम दे वो समझ नहीं पा रही कि मैं क्या करूं गुस्सा करूं नाराज हूं। क्या करूं?
थोड़ी देर सोचती रही। फिर क्या किया? राहुल का हाथ लेके बाप के हाथ में दे दिया। लो यह तुम्हारी भेक्षा
है। और मैथिशरण गुप्त इस बात से इतने प्रभावित थे कि उस महयसी महिला ने
यहां पर भी अपनी गरिमा का इतना ऊंचा प्रदर्शन किया जिसका भारतीय इतिहास ने कभी ध्यान दिया
नहीं। इतिहास तो बुद्ध को मानता है। यशोधरा का सम्मान कहां इतना हुआ? और इन्होंने जो सम्मान किया मेरे ख्याल से
इसका परिणाम मतलब कई चीजों में से एक पक्ष ये भी रहा होगा कि जब डॉक्टर अंबेडकर और अन्य लोग लिख रहे थे तो यह पर्सपेक्टिव आ
चुका था कि आप यशोधरा के त्याग का भी सम्मान जरूर करें। यह भाई साहब अभी लगे हुए हैं।
इसको लग रहा है कि एक बार और कोशिश कर लेता हूं। और खुद भी और अपने सेवकों से भी कहा समझाओ
बुद्ध को। तो बुद्ध को बोले आपने बहुत बढ़िया काम किया है। जबरदस्त ज्ञान प्राप्त किया है। संसार का कल्याण कर दिया
है। अब भाई साहब यहां का भी कर दो कल्याण। यह सब छोड़ो। मोक्ष पता नहीं मिलता है कि नहीं मिलता है। पुनर्जन्म होगा नहीं होगा।
किसी को नहीं पता है। राजकात संभाल लूं यहां पर ज्यादा अच्छा रहेगा। तो बुद्ध को बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह आदमी
हरता क्यों नहीं? कितनी बार समझा चुका हूं। फिर एक बार बुद्ध ने रिवीजन करवाई अपने उस विचार की
और फिर थोड़ी देर में से दो दिन बोले क्षमा चाहता हूं। आज के बाद आपसे नहीं कहूंगा। आप आराम से अपने रास्ते पर जाएं
और मैं बहुत खुश हूं कि आप यहां मुझसे मिलने तो आए। अब बुद्ध वहां से जा रहे हैं और जब जा रहे
हैं तो बहुत सारे शाक्य युवक शाक्य युवकों में दो तरह के लोग थे। एक वो जो बुद्ध को बहुत पसंद करते थे एक वो जो नफरत करते थे।
नफरत करने वालों को बुद्ध ने थोड़े चमत्कार दिखाए। फिर वो भी कंट्रोल में आ गए। लेकिन चमत्कारों की बात यहां ज्यादा
करने का मतलब है नहीं। जितने लोग समर्थक थे सब ने अपने घर से एक-एक बच्चा दिया कि यह संघ में जाके
दीक्षित होगा। बुद्ध का सही था। जहां गए वहां से दो तीन हजार को लेकर ही आते थे।
और उस शाक्य कुल में क्या हुआ? उनके परिवार के बहुत सारे बच्चे बोले हम भी जाएंगे। जैसे एक बोला नंद। बताओ नंद कौन
है? भाई हाफ ब्रदर शुद्धोधन और महाप्रजापति का बेटा। शुद्धोधन सोच रहा है
कि एक तो गया ही था। [गला साफ़ करने की आवाज़] ये भी गया और सूद पहले ले जा चुका है। कोई छोड़ेगा ही
नहीं। हमारे लिए तो भाई लगता है। फिर दूसरा बोला आनंद की मैं भी जाऊंगा। आनंद कौन है?
अमितोधन का पुत्र भाई का पुत्र मला चचेरा भाई। सबसे इंटरेस्टिंग बात देवदत्त बोला मैं भी
जाऊंगा। बुद्ध ने भी कहा ये काहे जाना चाह रहा है? लेकिन बोला नहीं मैं जाऊंगा। तो मुझे साधक
बनना है, साधु बनना है। ठीक है भाई चलने तो चलो। ये शुक्लोदन का बेटा था।
और जो चौथे थे देवदत्त सुरविता का था। शुक्लोदन के जो दो बच्चे थे एक था महानाम और एक था अनुरुद्ध।
अनुरुद्ध ने कहा कि मैं भी जाऊंगा। बाकी सब की मम्मी तो मान गई। अनुरुद्ध की मम्मी नहीं मान रही थी। बाकी सब की मम्मी
ने कहा ठीक है क्या? क्या कर सकते हैं? जाओ। अनुरुद्ध की मम्मी ने कहा एक काम करो बेटा
एक कंडीशन है। अच्छा अनुरुद्ध का बेस्ट फ्रेंड कौन था? जयवी टाइप का दोस्त कौन था उसका?
उसका नाम था भद्रय। भद्रिक से बना होगा भदय। और भद्रय कौन था? तो भद्रय उस समय कपिल
वस्तु का राजा था। उस समय चेंज होते रहते थे ना राजा। वहां पर गणराज्य था।
तो कपिलवस्तु का राजा भद्र इसका बहुत ही अच्छा दोस्त था। बेस्ट फ्रेंड था तो अनुरुद्ध की मां बोली कि देख बेटा ऐसा
है अगर जाने तो एक शर्त है भद्दी को साथ में लेके जा भिक्षु बना के तो परमिशन दूंगी। उसने कहा क्या बोलती हो? मैं राजा
को कैसे लेके जाऊंगा? बोले फिर मत जा। तो भद्दी के पास गया। खानावाना खाया। फिर भद्दी को बोला दोस्त एक काम था तुमसे।
बोला बताओ यार तुम्हारे लिए हर चीज करेंगे। [गला साफ़ करने की आवाज़] बोला राज का छोड़ना होगा। बोले अरे यार
ऐसे मत बोलो ठीक-ठाक बोलो। काम ऐसा बोलो कि सुनने में अच्छा भी लगे। बोला कि मुझे बनना है साधु और मेरी मां ने कहा कि भद्दी
बनेगा तो ही बन सकते हो। उसके बिना नहीं। बोला अरे यार तूने धर्म संकट में डाल दिया। एक तरफ राज्य एक तरफ दोस्त। थोड़ा
सोच के बोलता है कि बीच का रास्ता निकाल लेते हैं। ऐसा करो 7 साल का टाइम मांग लो। 7 साल में गद्दी
छोड़ दूंगा। फिर चलेंगे सन्यास लेने के लिए। बोला नहीं मुझे तो अभी जाना है। अभी सब
भाई जा रहे हैं। मेरे मैं अकेला क्या करूंगा यहां रह के? तू भी चल रहा है। क्या करेगा यहां?
तो फिर भिए ने बारगेनिंग होते अंतिम हुआ। अच्छा सात दिन तो दे दो भाई। तो ठीक है सात दिन ले लो तो भद्दी ने सात
दिन में इस्तीफा इस्तीफा देकर पोटली बांधी बाल कटवाए बुद्धम शरणम गच्छामि
तो ये सारे के सारे दोस्त उनके साथ चले गए अब ये क्या हो रहा है ये सारे के सारे जा रहे हैं इनको छोड़ने के लिए कई लोग जा रहे
हैं तो इन सब ने कहा देखो भाई बाल कटवाने होंगे शहर के बीच में अच्छा नहीं लगता हमें ऐसे से नदी के पास जाके कटवाएंगे।
किसी को चेहरा नहीं दिखाएंगे। अच्छा नहीं लगता ना सुंदर सा आदमी है। बाल कटवाइए कैसा लगेगा? तो उपाली से बोले उपाली भाई
उपाली वहां का एक नाई था। बोले उपाली भाई आप भी वहीं चलो। वहीं मुंड देना हमारा सिर। यहां ठीक नहीं लगेगा।
और वहीं से हम निकल जाएंगे। उपाली बोला ठीक है। तो उपाली को वही ले गए। सबने अपना सिर मुंडवाया वहां पर।
वस्त्र पहन लिए और उपाली को बोले जितने गहने वने थे जितने अपने महंगे कपड़े सारे उपाली को दिए उपाली यह तुम रखो बाकी पूरी
जिंदगी तुम्हें काम करने की जरूरत नहीं है इतना गहना इसमें है और जाओ अपनी बढ़िया जिंदगी जियो तुमने हमारी बहुत मदद की है
हम कभी नहीं भूलेंगे वो पाली को लगा मजे हो गए मेरे तो इतने सारे गहने लेके लौटने लगा और इतने में
उसके दिमाग में ये बात आई कि जब मैं इतने गहने लेके जाऊंगा कपिल वस्तु में और वहां अगर किसी को लगा कि मैंने इन सबको मार के
गहने चुरा लिए इनके तो मेरी बात सुनेंगे बाद में पहले मेरी हत्या कर देंगे सब लोग मिलके जान से ही
मार देंगे मुझे तो इन गहनों के चक्कर में जान चली जाएगी मेरी तो उसने गहनों की बनाई पोटली एक पेड़ के ऊपर टांग दी और भगवान से
कहा कि भाई जिसने अच्छे कर्म किए उसको दे देना आप ये गहने और खुद भागा वापस उन्हीं की तरफ पांचों की
तरफ उन पांचों ने देखा पीछे से भागा हुआ बोले क्या हो बोले भाई साहब मेरा मन भी ना वहां जाने का
नहीं कर रहा। यहीं चलता हूं मैं भी। तो बोले चलो। और फिर वो सारे पहुंचे बुद्ध के पास।
बुद्ध ने देखा कि भाई सब लोग आए हैं। उपाले भी आया है। तो नंद आनंद वगैरह ने कहा कि देखिए बड़े भ्राता आपसे एक निवेदन
है उपाली हम सबसे वरिष्ठ है। हम सबसे ज्यादा अनुभवी हैं। उन्होंने हमारी सेवा बहुत की है। तो हम चाहते हैं कि पहले आप
उनको दीक्षा दें ताकि वह संघ में हमसे वरिष्ठ रहे। हमसे कनिष्ठ ना रहे। बुद्ध ने कहा कितनी सुंदर बात कही है। फिर बुद्ध ने
उपाली से क्या कहा? ए भवे फिर इन सब से कहा और उसके साथ ही यह सब बुद्ध के संग में शामिल हो गए और ध्यान
रखना यह उपाली वह व्यक्ति है जिसने आगे चलकर पहली बौद्ध संगीति में विनय पिटक की रचना की थी।
मैंने पहले भी जिक्र किया था तो विनय पिटक अगर कभी कोई पूछे उसकी रचना किसने की है तो उपाली नाई पूरा नाम या सिर्फ उपाली नाम
से हो सकता है। अनाथ पिंडक आपको ध्यान है कौन था? यस सर। अनाथ पिंडक ने एक वायदा किया था कि
मैं जब कौशल जाऊंगा राजगीर में मिला था बुद्ध से वहीं बुद्धि की शरण में गया था और
वायदा किया था कि जब मैं श्रावस्ती जाऊंगा तो श्रावस्ती में आपके लिए जरूर एक अच्छा सा क्या मतलब विहार का प्रबंध करूंगा जहां
आप और आपके भिक्षु रह सकेंगे। अपने पैसे खर्च कर रहे हैं इसको। इसने वहां जाकर जमीन ढूंढनी शुरू की। एक
जमीन एक बड़ा अच्छा सा उद्यान था। आम्र उद्यान। जितने भी उद्यान है सारे आम के उद्यान है जिसकी चर्चा चल रही है। उसको
बड़ा अच्छा लग गया। एकदम शहर से हल्का सा दूर बहुत दूर नहीं। बहुत मनोरम दृश्य अच्छा पानी, अच्छी हवा, अच्छी सुगंध सब
बढ़िया। उसने कहा ये जमीन खरीदेंगे। तो पता किया किसकी जमीन है भाई?
तो पता लगा उस जमीन का मालिक है जेत और जेत का मतलब राजकुमार जेत और राजकुमार जेत का मतलब हुआ प्रसेनजीत का
बेटा तो ठीक है ये भी पैसे वाला आदमी वो सत्ता वाला आदमी
पैसे वाले आदमी ने सत्ता वाले आदमी से पूछा कि मैं ये जमीन खरीदना चाहता हूं कितने की दोगे
तो जेत ने कहा दूंगा ही नहीं। तो उसने कहा अरे जरूरी है एक बड़ा उद्देश्य मेरे मन में
है। दे सकेंगे तो अच्छा रहेगा। सोच लीजिए निवेदन है ऐसी जमीन दूसरे मिल नहीं पा रही है। किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए चाहिए।
आग्रह ही कर सकता हूं। अब जेत करो पीछे पड़ गए आदमी। तो उसे टालने के भाव से कहा अच्छा एक काम
करो जितनी जमीन है पूरी जमीन पर एक एक इंच पर स्वर्ण मुद्राएं बिछा दो तो जितना पैसा आएगा उतने में दे दूंगा
ये कहने का भाव ये था कि ये सुनते भाग जाएगा ये तो बहुत ज्यादा दाम मांग लिया ना मतलब
सैकड़ों गुना दाम मांग लिया कोई क्यों देगा इतना दाम नाथ पिंडक ने कहा ठीक है अनाथ पिंडक ने
बैलगाड़ियां भर के स्वर्ण मुद्राएं मंगवा ली। बैलगाड़ियां आनी शुरू हो गई। स्वर्ण
मुद्राएं बिछानी शुरू कर दी उस जमीन पे। तो जेत की ऐसी की तैसी हो गई कि ये मामला उल्टा पड़ गया। और जमीन बेचने का मन था
नहीं उसका। भागा भागा बोले ये क्या कर रहे हो? बोले आपने ये तो कहा कि स्वर्ण मुद्राएं बिछानी है। बिछा रहा हूं। बोले
अरे मुझे जमीन बेचनी थोड़ी ना तो वैसे ही बोल दिया था। बोले नहीं अब आप अपनी जुबान से पीछे हट रहे हैं और यह राजसी वर्ग के
व्यक्ति के लिए शोभा नहीं देता है। जबान दी है तो जबान दी मैंने आपसे कोई बारगेनिंग नहीं की। मैं जानता हूं कि आप
कीमत बहुत ज्यादा मांग रहे हैं। मैंने तो कुछ नहीं कहा आपसे। मैं स्वर्ण मुद्राएं ढूंढ रहा हूं। नहीं भी होगी तो उधार मांग
के लूंगा लेकिन आपको दूंगा। तब उसने पूछा आप क्यों ऐसा कर रहे हैं? उसने कहा भाई महात्मा बुद्ध के लिए एक
विहार बनाना चाहता हूं कि वहां वह और उनके साथी उनके जो भिक्षु हैं साधना करते थे। बोला अरे आप इतना नेक काम करने के लिए ऐसा
कर रहे हैं और मुझे इसमें दोषी बना रहे हैं तो आप ऐसा कीजिए जमीन मेरी ओर से उपहार ले लीजिए।
और यह कहे कि जेत ने अपनी जमीन दे दी उपहार में। बस यह कहा कि जो वृक्ष हैं उन पर मालिकाना हक मेरा रहेगा। आगे चलकर वह
भी जीती है। उस जगह का नाम जेत के नाम से था जेतवन पहले। अब अनाथ पिंडक भी आ गया। तो अब इसका
नाम हो गया अनाथ पिंडक का। जेतवाराम। संक्षेप में जेतवन या जेतवन विहार कहते
हैं। पूरा नाम अनाथ पिंडक का जेतवाराम था। तो कभी जेतवन को ले प्रश्न आए तो श्रावस्ती प्रसन्नजीत का बेटा जेत उसकी
जमीन अनाथ पिंडक यानी सुदत्त ने कैसे खरीदी? कैसे गिफ्ट ली और ये करके दी। और यह जो बना जेतवाराम या जेतवन विहार यह
बुद्ध का सबसे प्रिय स्थान था। बुद्ध ने अपने जीवन के ध्यान रखिएगा। इस समय तक बुद्ध की आयु 35 36 साल के आसपास हो चुकी
है। 80 में उनकी मृत्यु हुई है। कुल 44 साल बचे हुए हैं। उन 44 साल में से 25 वर्ष वो यहां रहे। उन 25 वर्ष में से 19
वर्षों तक जो वर्षावास होता है। इन साधुओं का वर्षावास चार महीने का होता है। जहां वो एक स्थान पर टिके रहते हैं। 19 वर्ष तक
वर्षावास उन्होंने जेतवन आराम में किया। तो जेतवन अगर बुद्ध के इतिहास को टटोलना हो और अगर आपको सिर्फ एक जगह देखनी हो तो
जेतवन देखना चाहिए। महाराज प्रसेजित को पता लगा कि मेरे बेटे के माध्यम से इस जमीन पे बुद्ध आए हैं तो बुद्ध से मिलने
के लिए पहुंचे और प्रसजीत बुद्ध का बड़ा सम्मान करते थे और बुद्ध से लंबी चौड़ी बात हुई। लेकिन वो बुद्ध के भिक्षु नहीं
बने। वह बुद्ध के उपासक थे और उपासक रूप में यानी सम्मान के भाव से उपासना के भाव से हमेशा रहे। लेकिन ना भिक्षु बनने की
बात इनकी ओर से थी ना उनकी ओर से थी। लेकिन हां प्रसंजित बहुत सम्मान करते थे। यह बात हमेशा से मानी जाती है। अब ये भाई
साहब फाइनली गए। इतना निवेदन कर करके खूब बेटे को समझाया बेटा आ जाओ बेटा आ जाओ बेटा पापा मर जाएंगे। बेटा आ जाओ। और यह
अंतिम रूप से दुख का दिन आ ही गया। बुद्ध को धम्म का प्रचार करते हुए 5 वर्ष हुए थे। यानी कि बुद्ध की उम्र लगभग 40
वर्ष के आसपास की थी। और तब खबर मिली कि शुद्धोधन का देहांत हो गया है। अब बुद्ध इस भाव से नहीं गए कि
मेरे पिताजी मर गए। बुद्ध इस भाव से गए कि हां मेरे एक परिचित की मृत्यु हुई है। मैं तो बुद्ध वंश का हूं और अनित्य संबंध है
तो इसमें बहुत ज्यादा हायौबा नहीं बचानी है। पर गए क्योंकि उनके पिता तो थे ही और निग्रोधा उद्यान जो कि कपिलवस्तु के बाहर
है उसमें कुछ दिनों तक रहे। जो वहां पर सारी चीजें हुई उसका हिस्सा बने। बहुत लीन होकर हिस्सा नहीं बने। लेकिन हां उपस्थिति
दर्ज कराई कि मेरे पिता की मृत्यु हुई है तो मुझे वहां पर होना चाहिए। लेकिन यहां पर आकर एक नया प्रसंग छिड़ गया उनके
सामने। वो निग्रोधा उद्यान में थे तो एक दिन क्या हुआ? महाप्रजापति गौतमी जिन्होंने इनको पाला था बचपन से।
वो आई। अच्छा अभी तक तो क्या था कि शुद्धोधन थे तो उनकी पत्नी थी साथ में थी। अब समझ नहीं
आ रहा। नंद था वह भी चला गया। पति वहां चला गया। अब यह अकेली क्या करें? यशोधरा है अपना बेटा पाल रही हैं। पर बेटा
भी अब 12 साल का हो गया है। कुछ साल के बाद उसको भी संघ में जाना ही जाना है। राजकाज में रुचि है नहीं। वो भी क्या
करें? तो महाप्रजापति गौतमी प्लस 500 स्त्रियां पहुंची बुद्ध के पास निग्रोधा उद्यान में
और कहा क्या बोलती होंगी? बेटा तो नहीं बोल पाती होंगी। बेटा इतना बड़ा हो गया तो कैसे बोलेंगे?
तो बोली होंगी तथागत [नाक से की जाने वाली आवाज़] मैं चाहती हूं और मेरे जैसी 500 स्त्रियां
चाहती हैं कि हमें भी भिक्षु संघ में अनुमति मिले या भिक्षुणी संघ हमारे लिए बनाया जाए।
अच्छा बुद्ध को अच्छे से पता था कि मैं हां बोल दूंगा। बड़ी बात तो हो जाएगी पर उसके बाद जो जो होगा
लोग समझ नहीं पा रहे। आप अब समझ पा रहे हैं ना कि माहौल उस समय कैसा रहा होगा। एक तो महिलाओं को उस समय घर से निकलना। अब
क्या होगा कि कुछ महिलाएं घर से भाग के आ जाएंगी। अगर आपने रख लिया तो उनके परिवार वाले तलवार लेके आएंगे। लाठी भरा लेके आ
जाएंगे। हर समय यही होता रहेगा। अच्छा कोई पत्नी अपने परिवार से अनुमति लेके भिक्षुणी बन जाए। संभावना बहुत कम है इस
बात की। अगर बन गई तो उस माहौल में चीजें ठीक रहेंगी या नहीं? वो तो ठीक है व्यक्ति। और जो बाकी लोग हमने इकट्ठे किए
हुए हैं यहां वहां से उन सब की गारंटी कैसे ले तो बुद्ध को प्रैक्टिकली बहुत लगता था कि ये चीज बहुत मुश्किल हो जाएगी
तो बुद्ध इस पर चुप रहे अच्छा बुद्ध का तरीका क्या था जो प्रश्न का जवाब नहीं देना है बस मुस्कुरा के चुप हो जाते थे
कुछ पूछ लो उनसे मुस्कुराएंगे चुप अब सामने वाला खुद को देख रहे ऐसेसे देख रहे कि मैंने ऐसा क्या किया है भाई पूछा ही तो
था तो बुद्ध की मौन मुस्कुराहट दर्शन में बहुत प्रसिद्ध है जब हम दर्शन पे आएंगे तो उसमें उनकी मुस्कुराहट का मतलब समझेंगे।
अब महाप्रजापति गौतमी ने कहा कि बुद्ध हम आना चाहते हैं। बुद्ध ने कहा नहीं। एक शब्द बोल के निकल गए।
वो दूसरी बार फिर आई बुद्ध के पास कि बुद्ध हमारी बात को समझो। हमारे पास जीवन का उद्देश्य नहीं है। हमें आना है। बुद्ध
ने कहा नहीं। तीसरी बार फिर आई। फिर बुद्ध से कहा देखो तुम मेरे बेटे हो। तुम्हें मैंने पालपस के
बड़ा किया है। मैंने दूध पिलाया है। बहुत हक से तुमसे बात कह रही हूं कि हमारे लिए भी कुछ व्यवस्था करो अपने बौद्ध संघ में।
बुद्ध ने कहा नहीं। यह कह के बुद्ध वहां से चले गए। वैशाली चले गए।
ये बेचारी रो रही है। इनका चेहरा ऐसा हो गया। दुखी हो गई कि इतनी छोटी सी चीज मांगी थी। इतनी निष्ठुरता के साथ जवाब
दिया। अब दो ही रास्ते या तो हार मान लें या एक और प्रयास कर लें। तो उन्होंने प्रयास किया। कैसे प्रयास
किया? महाप्रजापति गौतमी प्लस 500 इन्होंने क्या किया? इन सब ने
अपना सिर मुंडवा लिया। मुंड मुड़ाए हरि मिले। तो मैं पूजूं पहाड़। कबीर दास से कहा
इन्होंने सिर मुंडवा लिया। वेशभूषा धारण कर ली बौद्ध भिक्षुओं वाली चीवर धारण कर लिया हाथ में कमंडल
यह ले कपिल वस्तु से यात्रा शुरू की वैशाली तक पैदल पूरे रास्ते भर में हंगामा हो गया कि भाई
ऐसा दृश्य पहली बार देखा है भिक्षु तो बहुत देखे झुंड में जाते हुए भिक्षु यहां पहली बार देख रहे किसी परंपरा में नहीं
होता ऐसा तो पूरा हल्ला मच गया और वहां बुद्ध के पास पहुंच गए बुद्ध के पास गई महाप्रजापति
इनको लगा अब तू मान जाएगा। फिर महाप्रजापति ने कहा कि हे बुद्ध देखो हम सब पूरी तैयारी के साथ आए हैं। पूरा मन
बना के आए हैं। आपसे निवेदन है कि हमें स्वीकार कर लीजिए। बुद्ध ने कहा नहीं।
इनको बार-बार था कि हमें भी बोल दो। क्या बोल दो? ए भवे भई ही बोल दो जो भी होगा भवे तो पुलिंग होता है पर ए भिख ही
बोल ही नहीं रहे हैं नहीं बोल रहे नहीं भिखई बोल रहे हैं अभी ये बहुत रुआ हो गई और रुआ होके जैसे
ही बाहर निकली वहां खड़ा था आनंद आनंद अब तक बुद्ध के सबसे नजदीक आ चुका था बुद्ध का निजी सचिव बना तो नहीं था कुछ
साल के बाद बना लेकिन हां लगभग उस स्थिति में आ चुका था उन्होंने बताया कि देखिए तीन बार वहां प्रयास किया इस बार तो हम
पूरा व्यवस्था के साथ हार गए। 500 महिलाएं आई हैं। लेकिन बुद्ध मान नहीं रहे हैं। आनंद बुद्ध के पास गए। आनंद बुद्ध से बोले
कि बुद्ध क्या दिक्कत है? क्या समस्या है? बुद्ध बोले चुप रहो। व्यावहारिक दिक्कतें हैं।
चुप रहो। आनंद बोले क्या आपको लगता है कि यह महिलाएं श्रोता पन्न नहीं बन सकती हैं?
या सकदागामी नहीं बन सकती हैं या अनागामी नहीं बन सकती हैं या अरहंत नहीं बन सकती हैं। क्या इस रास्ते पर चलना इन महिलाओं
के बस की बात नहीं है? बुद्ध ने कहा नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। चल सकती है। वो कोई समस्या नहीं।
मतलब फिर आप क्यों इनको मना कर रहे हैं? कि आपको लगता है कि यह धम्म के नियम नहीं
मान पाएंगे। टूट जाएंगे। बुद्ध बोले भाई साहब समझा करो व्यावहारिक दिक्कत है। यह सब दिक्कत नहीं है। व्याहारिक दिक्कत है।
अगर कोई ऊंचनीच हो गई तो लोग क्या कहेंगे? झगड़े होंगे, परेशानियां होंगी। किस-किस को जवाब देंगे?
आनंद ने कहा और इतिहास को क्या जवाब देंगे? लोगों को तो फिर भी दे देंगे। पर इतिहास
तो यह प्रश्न पूछेगा ना कि जिस बुद्ध के मार्ग पर उपाली नाई आ सकता था। सुनीत नाम का पुरुष निम्न जाति से आ सकता था।
सुपाक और सुपिय नाम के दो ऐसे बच्चे जो डोम जाति से थे जो श्मशान घाट में चिताएं जलाते हैं। वो आ सकते थे।
उस बुद्ध के धर्म में महिलाएं नहीं आ सकती थी। आपने पुरुषों के लिए हर जाति वर्ग का भेद
खत्म कर दिया। सबको बुला लिया और महिलाएं आपके धर्म में नहीं आएंगी। तो इतिहास क्या कहेगा आपके बारे में?
अब बुद्ध परेशान है। इतिहास संभालू कि वर्तमान संभालूं। अंत में बुद्ध ने कहा ऐसा है भाई।
एक बार बात कर लो ठीक से। आठ नियम अतिरिक्त मानने पड़ेंगे जो भिक्षु मानते हैं उनके अलावा
अगर महाप्रजापति यह गारंटी लेती हैं कि वह मानेंगी और सबसे मनवाएंगी भी तो इस रास्ते पर बढ़ सकते हैं। तो आठ नियम
क्या होंगे? उनमें से एक नियम यह है कि स्त्री भिक्षु कितने भी सीनियर हो पुरुष भिक्षु की
जूनियर ही मानी जाएगी। तो भिक्षु जो होगा वह हमेशा वरिष्ठ माना जाएगा। भिक्षुणी की तुलना में।
कोई भी भिक्षुणी किसी भी स्थिति में किसी भिक्षु पर आरोप नहीं लगा सकेगी। ऐसे ऐसे आठ नियम ये थोड़े ज्यादा चुभने वाले दो
नियम बताए। बाकी चुभने वाले नहीं है। लेकिन हां आठ नियम है। है तो खराब नियम। लेकिन उस समय की परिस्थितियों के हिसाब से
हो सकता है कि व्याहारिकता में कोई रास्ता ना बचता हो। तो आनंद ने महाप्रजापति गौतमी से कहा कि
देखो जी आठ एक्स्ट्रा नियम है यह अगर आप मान लो और बाकी उसे बनवा दो तो रास्ता बन सकता है। वो बोली हां हां क्यों नहीं मान
लेंगे बड़ी खुशी से मान लेंगे और ये हो गया तो फिर बुद्ध ने अपनी माता को महाप्रजापति गौतमी को दीक्षा दी और
आनंद और बाकी लोगों ने बाकी 500 महिलाओं को दीक्षा दी और यहीं से बौद्ध धर्म में भिक्षुणी संघ की स्थापना हुई।
मुझे नहीं पता आपको इस बात का अंदाजा है या नहीं। एक किताब है भारतीय संस्कृति के सबसे महान पुस्तकों में से उसका नाम है
थेरी गाथा। थेरी गाथा में 73 भिक्षुणियों की कहानियां हैं जो इस भिक्षुणी संघ में शामिल थी।
और इससे पता लगता है कि बौद्ध परंपरा में स्त्रियों को जब घर से निकलने की परमिशन मिली, आने की परमिशन मिली तो उनकी
जिंदगियां कैसी थी? कितनी खराब खराब जिंदगी थी। कैसे उन्होंने धर्म के रास्ते पर जीवन को ठीक किया। और इस भिक्षुणी संघ
में जो महिलाएं थी महा प्रजापति गौतमी तो थी ही इन 500 महिलाओं में एक महिला यशोधरा भी थी
और यहां आकर यशोधरा का नाम हो गया भद्रा यानी भद्रा कच्चाना कात्यायना भद्रा कच्चाना नाम मिला यशोधरा को जब वो
भिक्षुणी बन गई इसी परंपरा में एक महिला जो आगे चल के आएगी उसका नाम है अंबपाली यानी कि
आम्रपाली इनका नाम सुना है आपने कभी इसी परंपरा में एक और महिला थी जिसका नाम
बोलते हैं किस गौतमी कहीं-कहीं किसी गौतमी मिलता है कहीं-कहीं किस गौतमी मिलता है इसकी भी बहुत रोचक
कहानी थी और बाद में एक निम्न वर्ण की महिला बहुत प्रसिद्ध हुई जिसका नाम था प्रकृति चांडालिका
चांडाल समाज की लड़की थी और उसको भी भिक्षुणी संघ में स्थान दिया और यहां के एक सेंस में कह सकते हैं कि बौद्ध धर्म
अपने समय के बाकी धर्मों से बहुत ज्यादा प्रोग्रेसिव बना और इसमें मुख्य भूमिका आनंद की है ना
कि मुख्य भूमिका महात्मा बुद्ध की है। और यहां एक सवाल उठता है कि बौद्ध परंपरा में लिंग समानता है या नहीं है? तो जो लोग
कहते हैं हां वह कहते हैं कि भिक्षुणी संघ बाकी किसी धर्म में उस तरह से स्थापित नहीं था यहां था। महिलाओं को मोक्ष का
अधिकारी माना गया। जबकि बाकी परंपराओं में ऐसा आमतौर पर नहीं था। यहां तक कि जैन धर्म में जो दिगंबर परंपरा है उसको लेकर
यह आरोप लगता है कि वहां पर महिलाओं को सीधे-सीधे मोक्ष का अधिकारी नहीं माना जाता है। तो यह वहां भी आक्षेप आता है।
फिर थेरी गाथा जैसी किताबें भी इस बात का प्रमाण है कि महिलाओं को बहुत अच्छी भूमिका वहां पर मिली थी। जो लोग बोलते हैं
नहीं नहीं पहली बात तो बुद्ध की जो हिचकिचाहट लंबे समय तक रही उसका जिक्र करते हैं। फिर जो आठ नियम अलग से बनाए थे
कि महिलाएं कितनी भी वरिष्ठ हो वो पुरुषों की तुलना में कनिष्ठ ही रहेंगी। इसको लेकर लोग थोड़ा सा नाराज होते हैं। और एक अंतिम
बात जो बुद्ध ने आनंद से कथन कहा था और जब भिक्षुणी संघ बन गया तो बुद्ध ने आनंद से कहा कि भैया तुमने बनवा तो लिया
जबरदस्ती करके। अगर धम्म वैसे चलता 1000 साल तो अब चलेगा 500 साल।
अब कई बौद्ध कहते हैं कि यह कथन प्रामाणिक नहीं है। झूठा कथन है लेकिन यह कथन मिलता है। यानी कि महिलाओं के संघ में शामिल
होने से धर्म की आयु आधी रह गई है। यह वो कहना चाह रहे थे। और ऐसे कथनों को लेकर आक्षेप लगता है कि बुद्ध शायद महिलाओं के
लिए बहुत बराबरी की बात नहीं करते थे। अब बुद्ध की मृत्यु का समय आने वाला है और उसके पहले एक दो घटनाएं हैं।
[नाक से की जाने वाली आवाज़] डाकुरी अंगुली माल तो आपने सुना ही होगा बहुत पुरानी घटना है।
बहुत इंटरेस्टिंग घटना है वाली। अंगुली माल कहां पर था? तो कौशल राज्य में था। कौशल राज्य का मतलब राजधानी कौन सी थी
वहां? श्रावस्ती। और वहां राजा कौन था?
प्रसंजित। प्रशंजित बहुत परेशान था। क्यों परेशान था? एक डाकू था अंगुली माल। अजीब पागल
टाइप का डाकू था। जो मिलता मार देता था और उसकी उंगली काट लेता था। उंगली काट के माला में टांग देता
था। उसे शौक था उंगलियों की माला पहनने का। और यह नहीं कि एक आदमी की 10 काट ले या पैर की मिला के 20 काट लेना। एक से एक
काटेगा। उसका सपना था कि मेरी माला में हजार उंगलियां हो। बाकी लोगों का क्या सपना
होता है? मेरी माला में हीरा हो, मोती हो, सोना हो। उसका सपना था मेरी माला में हजार उंगलियां हो। कहते हैं कि 999 हो चुकी थी।
एक बची हुई थी। ये कहानी कहीं और आती है। ये बुद्ध चरित्र में इस तरह से नहीं आती। अब ऐसा खौफ कि पूरे-पूरे मोहल्ले
पूरे-पूरे गांव घोस्ट टाउंस बन गए थे। सब खाली। कोई रहता ही नहीं कि उंगली मला आ जाएगा। जैसे गब्बर सिंह नहीं था कि बेटा
सो जा वरना गब्बर आ जाएगा। ऐसा उंगली माल का ऐसा खौफ था। अब लोग प्रसंजित के दरबार में कि हुजूर
देखिए हमारा बच्चा गया था। बच्चा भी नहीं मिल रहा। उंगली भी नहीं मिल रही। प्रसित कह चिंता मत कीजिए। मैं प्रयास
करता हूं। सर प्रयास तो दो साल से कर रहे हैं। कहां कुछ हो रहा है। राजा परेशान ढूंढ-ढूंढ के मर गया। मिलता
ही नहीं कहां पर है अंगुली मार। और वह ऐसा दुर्दांत डाकू कि 30 40 का जत्था भी आए सबको मार देता था। एक दो का मामला नहीं
था। 30 40 भी आ रहे तो खत्म सब इस तरह से काम करता था। और लोगों को अंदाजा था कि 999 हो गए हैं
कि एक और इसको चाहिए उसके बाद शायद शांत हो जाएगा। कोई जा ही नहीं रहा उस रास्ते पे। पूरा इलाका खाली पड़ा हुआ है।
प्रेमजीत कह रहा है मैं समझ नहीं पा रहा कि इस चुनौती का सामना कैसा करूं। बुद्ध ने कहा नहीं आप तो कर ही लेंगे कोई बात
नहीं। बुद्ध ने मन में सोचा कि इसको हम ठीक करते हैं। बुद्ध ने अपने आसपास के लोगों से पूछा कहां रहता है?
बोले बुद्ध अभी निर्वाण की उम्र नहीं हुई है आपकी। साक्षात परिनिर्वाण प्राप्त होता है वहां जाने से। बुद्ध ने कहा नहीं कोई
बात नहीं जाएंगे। रास्ता वास्ता पूछा। बुद्ध वहां चले गए। अच्छा बुद्ध को युद्ध का शौक नहीं था पर
आता तो था ही ना। सैन्य कौशल तो था ही उनके अंदर। तो बुद्ध अकेले गए। उन्हें क्यों 40 लोग
चाहिए? अकेले गए। वो 999 मार के ढूंढ रहा है और उसको कोई मिलने और तभी उसके मन में आया कि मेरी मां तो है ही।
टारगेट पूरा कर लेते हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] अपनी मां को मारने वाला था।
और बुद्ध को इस बात की टेलीपैथी या इस बात का दूरस्थ ज्ञान हुआ कि अपनी मां की हत्या कर सकता है। यह एग्जैक्टली बुद्ध चरित की
बात नहीं कर रहा हूं मैं। कई सोर्सेस में से एक सोर्स में ऐसी कहानी आती है। तो बुद्ध चाह रहे थे कि कम से कम इतना नीच
काम ना करे अपनी मां को मारने का। तो मैं सामने जाता हूं। बुद्ध सामने है तो उसको भी लगा अरे चलो मिल गया। मां को छोड़ देते
हैं। इसी को मार लेते हैं। बुद्ध भी यही चाह रहे थे। तो बुद्ध की ओर बढ़ा। बुद्ध दूसरी तरफ
चलना शुरू हो गए। दौड़ा बुद्ध के पीछे। बुद्ध ने खूब बढ़िया दौड़ लगवाई। उसे पूरा ट्रेडमिल मैराथन करवा दी।
क्रॉस कंट्री से शुरू हुआ। बोला पहले 100 मीटर फिर 200 मीटर 800 मीटर हाफ मैराथन करवाया। पूरा मैराथन करवा दिया। वो हाफ के
अधोरा हो गया। बोला भाई रुक तो जाओ। [हंसी] सोचो डाकू कह रहा है रुक तो जाओ। आराम से मारने दो यार।
तो बुद्ध भी बैठे बोले मैं तो रुक गया तू कब रुकेगा उसको लगा भाई ये तो कुछ अलग ही आदमी लग
रहा है [गला साफ़ करने की आवाज़] ऐसी बात कोई नहीं बोलता है फिर बुद्ध को पता था थका हुआ हाफा हुआ भी कुछ नहीं करेगा उसको
वहां से थोड़ा समझाया आधा घंटा चाहिए था बुद्ध को आधा घंटा मिल गया जैसे ही आधा घंटा मिल गया तो
उसने क्या कहा होगा शरणम देह इन्होंने कहा यही दिक्कत है बस थोड़ा आराम कर लो फिर चलेंगे
थकान ज्यादा हो गई लेकिन चलते हैं और उसको लेके आ गए बाल-बाल कटवा दिए कोई पहचान नहीं रहा था चीवर पहना दिया कोई नहीं
पहचान रहा संघ में भी कोई नहीं पहचान रहा कि यही वो दुर्दंत डाकू है जिससे पूरा शहर थरथर कांपता है वो भिक्षु
बन के बैठा हुआ है तो प्रसंजित कुछ दिन के बाद बुद्ध से मिलने आया।
आके बैठा बुद्ध के साथ। उस कमरे में प्रसंजित है। बुद्ध है और बुद्ध के साथ एक दो जो सेवक हैं वो है।
बुद्ध ने कहा बहुत परेशान दिख रहे हैं। बोले क्या करूं बुद्ध? अंगुली माल पकड़ में नहीं आ रहा। उसे बड़ा
परेशान कर दिया है। लोग इतना डरते हैं। पूरा इलाका खाली हो गया है। ना खेती हो रही है, ना उद्योग हो रहा है, ना व्यापार
हो रहा है। एक आदमी ने इतना परेशान कर दिया पूरे साम्राज्य को समझ नहीं आ रहा क्या करूं। तो ने कहा अच्छा यह बताओ मान
लो कि वो सही रास्ते पर आ जाए धर्म के रास्ते पर चलने लगे अपनी गलतियां कबूल कर ले माफी मांग ले साधु का जीवन जीने लगे तो
आपकी न्याय व्यवस्था क्या कहती है उसके लिए बोले मजाक मत करो आप ऐसा थोड़ी ना होता है
फिर बोले नहीं मतलब ऐसा होगा तो नहीं लेकिन हां ऐसा होगा तो माफ कर देंगे। जब गलती
मान लेगा तो क्या कर सकते हैं? तो बुद्ध ने कहा कि आपके साइड में जो खड़ा है वो अंगुली माल ही है।
अब इसको तो कांटो तो खून नहीं कि हजारवा मैं ही तो नहीं हूं। [हंसी] का ऊपर खौफ के मारे। तो बुद्ध ने कहा डरिए
मत। डर की कोई वजह नहीं। यह बहुत पवित्र भिक्षु हैं और पिछले कुछ दिनों से यहां पर
हैं। अपने पुराने कर्मों पर प्रायश्चित करना चाहते हैं और सही समय की प्रतीक्षा में थे कि आपके सामने मैं कैसे ये बात
कहूं तो क्या आप इन्हें माफ करेंगे? अब उसको तो लग रहा था कि ये माफ करेगा कि नहीं करेगा मुझे कहीं ऊपर से मार दिया
हथोड़ा सिर के ऊपर। खैर प्रस जीतने का अंगुली माफ किया जाता है। बुद्ध से बोले बाबा आप
अलग ही टाइप के आदमी हो भाई। क्या-क्या कर देते हो यार इसको ढूंढने के लिए पूरी पुलिस पूरी सेना पूरे खुशिया तंत्र सब लगा
हुआ था। पकड़ के लाए इसको यहां पर और भिक्षुक बना के खड़ा कर रखा है यहां पर। तो इस तरह से और बाद में ये बन गया बड़ा
भिक्षुक अरहंत बना। और जब समाज में सबको पता लग गया कि यह आ गया है भिक्षु बनके अब बेचारा भीख मांगने जाता था
डाकुल अंगुली माल बर्तन लेके भिक्षाम देही और [हंसी] जिससे मांग रहा है उसी घर में दो कर रखी है पहले उसने
अब सामने वाले गुस्सा झापड़ मारा कस के उसके ऊपर कई लोगों ने पत्थर मार रखी है इसी से खून निकल गया माथे से
उसने बुद्ध से कहा बुद्ध देखिए मेरे मन में तो क्या-क्या आता है कि मैं क्या कहूं क्योंकि जो मुझे मार रहे होते मुझे एक
मिनट चाहिए। [गला साफ़ करने की आवाज़] सिर्फ मेरी संख्या पूरी हो जाएगी। बस आपकी वजह से मैं चुप रह जाता हूं।
बुद्ध ने कहा यही परीक्षा है। अरहंत होना है अरहंत। अरहंत का मतलब है जिससे कोई शत्रु ना हो। जिसके मन में किसी को लेकर
शत्रु का भाव ना हो। कोई पत्थर मारे, ईंट मारे, गालियां दे। इन सबको परीक्षा समझो। और उसने परीक्षा समझा और सबसे महान साधकों
में शामिल हुआ और उसके बाद अरहंत बना। अब बुद्ध की उम्र हो गई है 72 साल। आठ साल बचे हैं।
देवदत्त आठ साल की उम्र से खुंदक में है। 64 साल से खुंदक में है। देवदत्त की कहानी यह है कि एक बार उसने पक्षी वाले प्रसंग
में युद्ध किया था। एक कहानी और भी है। जब बुद्ध चले गए सन्यास ले तो उसने यशोधरा के पास जाकर एक
गलत किस्म का निवेदन भी किया था और यशोधरा ने उसको धिक्कार के भगाया था वहां से।
तीसरा प्रसंग यह है कि अब वो आ गया है भिक्षु संघ में और भिक्षु संघ में उसके पास पावर नहीं है। वह चाहता है कि पावर
उसके पास हो। और उसने खुद एक बार भरी सभा में बुद्ध के सामने खड़े होकर कहा हे बुद्ध अब आप वृद्ध
हो गए हैं। यह उचित नहीं है कि सारे फैसले आप करें। संघ की सारी शक्तियां आप रखें। अच्छा यह है कि संघ की शक्तियां अब आप कुछ
लोगों को बांटें और मैं अपना आवेदन प्रस्तुत करता हूं कि मैं संघ का प्रमुख बनके कार्य संचालन करूं।
बुद्ध तो बड़ी मीठी बात करते उस दिन थोड़ा गुस्से में आ रहे जैसे महात्मा गांधी भी लाठी रखते थे साथ में
[गला साफ़ करने की आवाज़] कभी तो काम आएगी ही तो बुद्ध ने कहा कि जो दायित्व मैं सारी
पुत्र और मुगलयन को देने की बात नहीं सोच पा रहा हूं तुम जैसी भटकती हुई चेतना को कैसे दे सकता हूं
इस बात से वो रुष्ट हो गया और भरी सभा से निकल गया इस भाव से कि छोडूंगा नहीं छोडूंगा नहीं तो आठ साल से सोच रहा है
कुछ कर नहीं पा रहा अलग बात है। अब उसको एक रास्ता समझ में आया और वह रास्ता यह था।
वो गया अजात शत्रु के पास। अजात शत्रु कौन है? बिंबिसार का बेटा राजकुमार।
उसने कहा देखो यार यह दो बूढ़े मिलकर हमारा रास्ता रोक रहे हैं। तुम्हारा पिता बहुत बूढ़ा हो गया है।
तुम्हें सत्ता ही नहीं दे रहा है। हमारे बुद्ध बहुत बूढ़े हैं। हालांकि मैं भी 40 साल छोटा हूं लेकिन फिर भी चार साल
छोटा तो हूं। हमें सत्ता नहीं मिल रही है। अगर हम दोनों मिल जाए तो कुछ बड़ा कर सकते हैं। अजात शत्रु ने कहा क्या कर सकते हैं?
बताओ। बोले कुछ नहीं। तुम अपने पिता की हत्या कर दो और तुम बन जाओगे राजा।
जब तुम राजा बन जाओगे सेना तुम्हारी हो जाएगी। तुम्हारी सेना के साथ मिलके मैं बुद्ध की हत्या करवा दूंगा।
भाई हार मेरा हो जाएगा। जब सत्ता और धर्म दोनों हमारे होंगे तो हमसे बड़ा कौन होगा?
अजात शत्रु था तो मोटी बुद्धि का। पर ये बात समझ में आ गई उसको। ये बात तो ठीक कह रहे हो।
तो मैं ऐसा करता हूं। मैं अपने पिताजी की हत्या करता हूं। तो वह अपने पिताजी की हत्या करने के लिए
रात को जब उसके पिताजी सो रहे थे यानी कि बिंबिसार सो रहा था उनके शिविर में हथियार ले घुसा मारने के लिए। उसको पता नहीं था
कि राजा राजा होते हैं। उनके सोने के भी तरीके होते हैं। जब राजा सोता है ना उसके बहुत विश्वसनीय लोग आसपास रहते हैं हथियार
ले हमेशा 24 घंटे और जैसे ही वो हमला करने पहुंचा उसको वहां पर लोगों ने पकड़ लिया अरेस्ट कर लिया
और बिंबिसार के सामने अजात शत्रु पेश हुआ है कि राजा की हत्या करने के अभियोग में
मुकदमा चलेगा। अब ऐसे में कोई भी राजा होता आम तौर पर बेटे को मार देता खत्म करता। राजा लोग तो
ऐसा करते ही हैं। कौन सी बड़ी बात है कि जो चाकू तुम लाए थे मेरे लिए वही तुम पर चलाए जाते हैं। एक मिनट तो लगता है।
पर बिंबिसार जो था वो था बुद्ध का शिष्य। और उसने हिंसा करनी सीखी नहीं थी। तो बिंबिसार ने कहा कि बेटा अगर तुम्हें राजा
बनने का इतना ही शौक था। मुझसे वैसे ही कह देते यह राज का ऐसी कौन सी चीज है जिसके लिए हत्या करने की जरूरत
है? बिंबिसार ने घोषणा कर दी कि मैं राजपद से सन्यास ले रहा हूं। अजात शत्रु राजा होगा।
बोले लो तुम राजा बन जाओ। इसके लिए हत्या क्या करनी है? और मैं तुम्हें मार दूंगा इस सत्ता के लिए।
तुम मेरे बेटे हो। सत्ता वैसे भी मिलनी है। अभी नहीं तो दो साल में मिल जाती। चार साल में मिल जाती। मर ही जाता। अभी नहीं
तो सत्ता। क्या दिक्कत है? अजात शत्रु को बना दिया राजा और अजात शत्रु ने अपने बाप को गिरफ्तार
किया और भूख प्यास से तड़पा तड़पा के मार डाला तो बाप इतने भोले मत बनना कि बिंबिसार हो जाओ
और बेटा बेटी इतने गंदे मत बनना कि अजात शत्रु हो जाओ जो बाप आराम से मार सकता था उसको उसे
सत्ता दी कि चलो तुम संभालो सत्ता और इस तरह से सत्ता चली गई आजा अजात शत्रु के हाथ में और जब अजात शत्रु के हाथ में
सत्ता चली गई तो देवदत्त ने उससे कहा कि भाई टारगेट वन तो पूरा हो गया है। अब टारगेट टू पे आते
हैं। अजात शत्रु ने कहा चलो ठीक है आते हैं। पर अजात शत्रु को अंदर ही अंदर थोड़ा गिल्ट भी होने लगा था। अपराध भावना आने लग
गई थी कि मैंने इस मूर्ख के चक्कर में कर तो दिया ये सब। लेकिन गिल्ट अभी मैच्योर नहीं हुआ था।
हल्का सा था। तभी उसकी हेल्प कर रहा था। उसने अपने प्रशिक्षित सैनिक दिए बुद्ध की हत्या के लिए।
तीन चार सैनिक प्रशिक्षित एकदम वेल ट्रेंड कमांडोज़। कहा कि देवदत्त जो कहेगा वो करण देवदत्त
ने कहा कि वहां जाना बुद्ध है उनको मार देना। वो चार कमांडो गए मारने के लिए। बुद्ध को
देखा। बुद्ध को देख के ही आदमी इतना सुंदर, इतना उदात्त, इतना गरिमापूर्ण व्यक्ति आपके सामने आ जाए। आप उसको
मारेंगे। खुद को बचा ले। कुछ बड़ी बात है। वो चारों जड़बत खड़े हो गए ऐसे करके। बुद्ध ने पूछा क्या हुआ?
बुद्ध निकल गए वहां से। तो ये कह रहे पीछे से क्या हुआ? मारा क्यों नहीं? कह रहे पागल आदमी हो। इनको
मारेंगे हम। हम तुझे मार देंगे इससे अच्छा। तो राजा के पास बोला जी हम नहीं मार
पाएंगे इनको। अजात शत्रु भी समझ गया कि बुद्ध बहुत पहुंचे हुए व्यक्ति हैं। उसने कहा कि मैं तो बुद्ध के उसमें नहीं आऊंगा।
इसको बोला कि मैं तुम्हारे साथ नहीं हूं। गिल्ट फीलिंग में फंस गया बेचारा बहुत ज्यादा। और तब अजात शत्रु ने एक व्यक्ति
की सहायता ली जिसका नाम है जीवक। यह नाम बहुत प्रसिद्ध है। जीवक एक अनाथ बच्चा था। और जीवक की परवरिश की थी
राजकुमार ने। तो जीवक का मार बच्चे कहते हैं इसको और जीवक बना वहां का सबसे बड़ा वैद्य। इतना बड़ा वैद्य
कि यह बिंबिसार का भी वैद्य था, अजात शत्रु का वैद्य भी था और बुद्ध का वैद्य भी था।
सर्जरीज के बहुत सारे एग्जांपल मिलते हैं। जो सर्जरीज हम सोच नहीं सकते उस समय होती होंगी। मुझे नहीं पता ये बात कितनी
प्रामाणिक है पर इन ग्रंथों में इसका जिक्र मिलता है। ऐसी कई सर्जरीज ब्रेन सर्जरी जैसी सर्जरीज जो उस समय हम सोच
नहीं सकते। वो यह करता था। ऐसे वर्णन मिलते हैं और जीवक से कहा अजात शत्रु ने कि मैं
गिल्ट फीलिंग से मरा जा रहा हूं। एक तो मैंने अपने पिता की हत्या कर दी। दूसरा बुद्ध की हत्या के प्रयास में भागीदार
हुआ। तब जीवक अजात शत्रु को लेके गया बुद्ध से मिलवाने के लिए। बुद्ध ने उसको माफ किया। उसके बाद जाके वो थोड़ा सा
बेहतर इंसान बनना शुरू हुआ। और देवदत्त तो देवदत्त है। जब सैनिकों ने मना कर दिया
तो देवदत्त ने दो बार खुद हत्या का प्रयास किया। एक बार बुद्ध एक पहाड़ी के नीचे के हिस्से
में खड़े थे। पहाड़ के ऊपर से बड़ा सा पत्थर लुढ़का दिया उनकी तरफ। संयोग से पत्थर थोड़ा सा दूसरी साइड में
जाकर टकराया और टूट के बुद्ध को लगा बुद्ध के पैर से खून आया पर जान बच गई। दूसरी बात एक हाथी था पागल हाथी। उस पागल
हाथी को छुड़वा दिया बुद्ध के सामने। पर संयोग से शायद हाथी को भी बुद्ध को देखकर लगा हो कि यह ऐसा व्यक्ति नहीं कि
इसको मारना। भाई पशुओं में तो चेतना होती है। समझदारी होती है ना किस पे हमला करना है, किस पे नहीं करना है। उसने भी हमला
नहीं किया बुद्ध पर। और यह बात सबको पता लग गई। अब ना राजा उसके साथ है अजात शत्रु ना बुद्ध उसके साथ
हैं। उसने एक दो बार सोचा कि मैं कौशल नरेश पसेजीत से मिलूं पर मुलाकात नहीं हुई। एक दो बार सोचा कि मिलकर माफी मांगू
पर मुलाकात नहीं हुई और अंत में उसकी मौत हो गई। मुलाकात हुई नहीं और इस तरह से बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से उसकी
मृत्यु हो गई। अब यह बुद्ध का लगभग 80वा साल आ गया है। इस साल बुद्ध की मौत होगी और कई लोगों की
मौत लाइन से होने वाली है। सारी पुत्र सारी पुत्र को बुद्ध बोलते थे कि वो धम्म के सेनापति हैं। कभी आपसे कोई पूछ ले कि
धम्म का सेनापति किसको कहा जाता है? तो वह सारी पुत्र का नाम है क्योंकि यह तर्क इतने अच्छे देते थे कि अगर किसी के सामने
धम्म को इन्होंने एक्सप्लेन कर दिया तो धम्म नहीं मानने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इतने अच्छे तर्क देते थे। सारे
पुत्र खुद इनके पास आए जब बुद्ध श्रावस्ती में थे। और कहा कि मैं आपसे अंतिम भेंट के लिए आया
हूं। साथ में 4500 उनके शिष्य थे। बुद्ध ने कहा क्या हुआ? बोले मुझे यह बात समझ में आ गई है कि मेरा
परिनिर्वाण का परिनिर्वाण का मतलब बौद्ध परंपरा में होता है जब देह खत्म होती है। निर्वाण जीते जी मिल सकता है। लेकिन जब
शरीर खत्म होता है उस निर्वाण को बोलते हैं परिनिर्वाण और केवल बुद्ध के लिए उसको बोलते हैं महापरिनिर्वाण। केवल बुद्ध के
लिए बाकी सबके लिए परिनिर्वाण होता है। तो इन्होंने कहा कि मेरा परिनिवाण का वक्त आ गया है। तो बुद्ध ने कहा कि क्या कोई
स्थान चुना है आपने? बोले देखिए मैं मगध में पैदा हुआ था। मगध में जो मेरा गांव था उसमें जो घर था वह घर आज भी वैसा का वैसा
है। मेरी दिल इच्छा है कि मैं उस घर में ही अपने प्राण त्याग दूं। बुद्ध से कहा कितनी अच्छी बात है। बुद्ध ने शुभकामनाएं
दी। सारी पुत्र ने कहा यह आपकी और मेरी अंतिम भेंट है क्योंकि आपका और मेरा पुनर्जन्म होना ही नहीं है। हम दोनों
अरहंत हैं। तो यह इस पूरे संसार के चक्र में हमारी आपकी अंतिम भेंट है। आशीर्वाद लिया। बुद्ध
ने कृतज्ञता ज्ञापित की। वो मुड़ा और बिना पीछे देखे सीधा आगे बढ़ा। क्योंकि मुड़ के देखने से फिर हौसला कमजोर हो जाता है। कई
बार बुद्ध ने भिक्षुओं से कहा कि आप इनके साथ जाएं और इनका ध्यान रखें। वो सब गए मगध में से
गांव में। कुछ दिन वहां रह के सारी पुत्र ने अपना जीवन त्याग किया। बुद्ध को खबर मिली।
ठीक उसी समय खबर मिली कि मुगल लयन की हत्या कर दी गई है। और मुगल लयन की हत्या भी मगध में ही हुई।
और यह जो हत्या हुई इसलिए हुई कि बुद्ध की जो हत्या नहीं कर पा रहे थे उन्होंने मुगलयन को मार दिया। तो बुद्ध को इस बात
का एहसास था कि मुगलयन ने अपना जीवन देके मेरे जीवन को बचाया है। उसके कुछ दिन के बाद वो श्रावस्ती में थे।
महाप्रजापति गौतमी मिलने आई। और महाप्रजापति ने कहा कि मेरा जीवन लगभग पूरा हो गया है। निर्माण
का समय आ गया है। पर निर्वाण का समय आ गया है। अंतिम भेंट के लिए आपसे मिलना चाहती हूं। तो उन्होंने आशीर्वाद लिया कि आप
मेरी मां है। आपने मुझे जीवन दिया वो सब किया है। और साथ में यशोधरा भी आई थी। यशोधरा ने कहा कि मेरी उम्र 78 साल हो गई
है। यह वाला जिक्र डॉक्टर अंबेडकर की पुस्तक में है। उसमें नहीं है। बुद्ध चरित में नहीं है। 78 साल वाला क्योंकि बाकी
परंपरा मानती है कि यशोधरा बाद में उनकी मृत्यु हुई थी। तो बुद्ध ने कहा कि कैसा स्वास्थ्य है
आपका? तो यशोदा बोली कि आज ही मेरी मृत्यु होने वाली है। आज ही रात्रि में मेरी मृत्यु या मेरा
परिनिर्वाण होने वाला है। आखिरी भेंट के लिए आई हूं। कोई दुख, कोई शिकायत कुछ नहीं है। केवल
कृतज्ञता है कि आप जैसा पति ना मिलता तो शायद संसार को इतने गहन रूप में देख ना पाती, जी ना पाती और कृतज्ञता ज्ञापित
करने के लिए आई हूं। तो बुद्ध ने भी हाथ जोड़े और उसके बाद महाप्रजापति कुछ दिनों के बाद और यशोधरा
उसी दिन उनकी मृत्यु हो गई। अब बुद्ध यहां से निकले हैं और उनका मन है कि अब मैं पावापुरी की तरफ या कुशीनारा की ओर बढूंगा
वैशाली के रास्ते होते हुए। अब वह वैशाली गए हैं। वैशाली पटना से थोड़ा सा आगे है। अगर आप कभी जाएंगे तो वैशाली गए तो वैशाली
की एक बहुत प्रसिद्ध नगरवधू या गणिका थी आम्रपाली। आम्रपाली की कहानी दो तरह की है। यहां तो
छोटी सी बात है कि आम्रपाली एक नगरवधू। नगरवधू का मतलब क्या होता है कि कैसे समझाएं इस चीज को? नगरवधू का मतलब हुआ कि
पूरे नगर ने एक बहुत अच्छी नर्तकी और गायिका को चुना है, सम्मान दिया है जो पूरे जिले के या पूरे
जनपद के मनोरंजन के काम की प्रमुख है। वो नृत्य करती है सबके सामने। उसके अपने बहुत सारे चेले हैं। बहुत सारे विद्यार्थी हैं।
कंडीशन यह है कि वो शादी नहीं कर सकती। विवाह करना निषिद्ध है। प्रेम कर सकती है। कई लोगों से कर सकती है। कई लोग उससे
प्रेम कर सकते हैं। क्योंकि वो एक तरह का गणिका या वेश्या वाला जीवन भी है। लेकिन वेश्या उस अर्थ में नहीं दहिक अर्थ में
नहीं कला वाले अर्थ में ज्यादा है। लेकिन दूसरी संभावना भी रहती है। उसमें तो ये वहां की नगरवधु थी। नगरवधु बहुत
सम्मान का पद था उस समय। अब जब बुद्ध वहां आए तो ये बहुत व्यथित उसका मन था बुद्ध से मिलने का और पता लगा
कि आम्रपाली के उद्यान में ही बुद्ध और बुद्ध का दल ठहरा है। आम्रवन था एक। आम्रपाली अपनी पूरी समूह के साथ कई रस
लेके वहां पहुंची कि बुद्ध से मिलना है। वो जैसे बुद्ध से मिली उनके पैर छुए और कहा कि मेरी दिली ख्वाहिश है कि आप कल
भोजन पर मेरे घर आए। बुद्ध का सामान्य नियम था कि कोई इनवाइट करे तो मना नहीं करते थे कि चुप रह के कि
बुद्ध चुप है इसका मतलब हां हो गया तो बुद्ध ने मौन रहकर सहमति दी आम्रपाणी इतनी खुश वहां से बाहर निकल रही थी इतने में
वैशाली के जो लिच्छवी थे लिच्छवी वंश था ना वहां शासक वर्ग के कई लोग वहां पर आ रहे थे ये जा रही थी रथ लगभग टकरा गए
उन्होंने पूछा तुम इतने खुश क्यों हो बोली बुद्ध ने कल का मेरा भोजन का निवेदन स्वीकार कर लिया
बोली हम तो वही निवेदन के लिए आए थे बुद्ध के पास कि कल हमारे राज परिवार में भोजन करें।
अब तो बुद्ध नहीं मानेंगे। एक बार हां बोल दिया तो सवाल ही पैदा नहीं होता। तो हे अम्रपाली तुम चाहो तो लच्छवी वंश का
राजकाज अपने हाथ में ले लो पर बुद्ध को भोजन करवाने का अवसर कल हमें दे दो। आम्रपा ने कहा मेरी सारी संपत्ति ले
लीजिए। झूले ले लीजिए। मैं यह अवसर नहीं छोडूंगी। और बुद्ध अगले दिन उसके घर गए। जब घर गए
भोजन वोजन किया उसके बाद आम्रपा ने कहा कि मैं अपनी सारी संपत्ति यह आम्रवन आपको नाम संबोधित और समर्पित करना चाहती हूं। और
मैं भिक्षुणी बनना चाहती हूं। और जैसे उसने कहा मैं भिक्षुणी बनना चाहती हूं। ए भवे
लेकिन आम्रपाली की कहानी में एक पेच और भी है जो बुद्ध चरित्र नजर नहीं आता है। आम्रपाली की कहानी में एक पेच ये है कि
आम्रपाली एक अनाथ परिवार से थी। अनाथ थी मतलब अनाथ परिवार से क्या होता है? अनाथ थी। एक
परिवार ने उसको पाला पोसा था। जब वो बड़ी हुई तो बहुत सुंदर थी। कला में बहुत पारंगित तो पूरे जनपद में प्रसिद्ध
हो गई। फिर उसको नगर वधू बना दिया गया। बहुत बड़े सम्मान की बात थी। बहुत धन, बहुत सत्ता सब कुछ। पर नगर वधू होने की
शर्त यह थी कि विवाह नहीं कर सकती है। इसका मतलब वो किसी से प्रेम नहीं कर सकती। दैहिक संबंध रख सकती है। कईयों के साथ रख
सकती है। लेकिन किसी एक व्यक्ति के साथ जो सच्चा प्रेम होता है वह करने की आजादी इसको नहीं थी।
व्यथित भी रहती थी कि कैसा जीवन है। सारा सुख समृद्धि सब कुछ है पर प्रेम नहीं है जीवन में।
इतनी देर में उसको प्रेम प्रस्ताव आया अजात शत्रु से जो कि मगध का राजा बन गया था। अजात शत्रु
से प्रेम भी हुआ। दो तरफ प्रेम था। पर अजात शत्रु की नियत ज्यादा इस पर नहीं थी कि उससे प्रेम हो।
उसके माध्यम से लिच्छवी गणराज्य को या वज्र गणराज्य पर कब्जा करने की थी। तो लच्छवी गणराज्य पर कब्जा करने की जो
कोशिश थी वो ज्यादा थी। ये तो गलत लिख दिया मैंने। तो लच्छवी गणराज्य पर
कब्जा करने की इच्छा ज्यादा थी। उसको माध्यम बना रखा था। अब इसके मन में दुविधा
कि देश का साथ दूं या प्रेमी का साथ दूं। यह बड़ी खतरनाक दुविधा होती है। भारत की किसी लड़की की शादी किसी
पाकिस्तानी से हो जाए और मैच चल रहा भारत पाकिस्तान का। आप समझ रहे हैं माहौल कैसा रहता होगा? या
इसका उल्टा कर लीजिए। पाकिस्तान की लड़की भारत के लड़के शादी हो गई और मैच चल रहा है
और मैच तो मैच है। अगर युद्ध चल रहा हो तो बहुत दुविधा हो जाती है। तो दुविधा यह कि मैं अपने राज्य का साथ
दूं या अपने प्रेमी का साथ दूं और अंत में प्रेमी ने छल प्रपंच का सहारा लेके लच्छवी गणराज्य को अपने कब्जे में कर ही लिया।
और इसको बहुत लोगों ने देशद्रोही कहना शुरू कर दिया। वो जो तंज था देशद्रोह वाला
उसने इसको काफी हद तक तोड़ दिया। और ये उन सारी चिंताओं से परेशानियों से इतनी परेशान थी कि उसको बुद्ध में ही मुक्ति का
रास्ता मिला। पर दिक्कत क्या थी कि यह वेश्या या गणिका
समुदाय से थी और भिक्षुणी संघ में इसे परमिशन मिलेगी या नहीं इस पर संदेह था।
लेकिन बुद्ध की बहुत बड़ी बातों में से एक यह है कि बुद्ध ने उसको स्वतंत्र नारी का दर्जा देकर भिक्षुणी संघ में स्थान दिया।
और इसलिए एक उपन्यास बहुत प्रसिद्ध है। जैसी कहानी में सुना रहा हूं। आचार्य चतुरसेन शास्त्री नाम के एक लेखक है। उनका
उपन्यास है। वैशाली के नगर वधू। यह जो कहानी मैंने आपको सुनाई है यह उपन्यास की कहानी है। वहां से ये कहानी आ रही है।
बस अब महापरिनिर्वाण की तैयारी चल रही है। महापरिनिर्वाण किसका है? बुद्ध का। बाकियों का क्या होता है? परिनिर्वाण।
बुद्ध का होता है महापरिनिर्वाण। अब बुद्ध को रियलाइज हो गया है कि अगले दो-ती महीने में मुझे जाना है। और बुद्ध
ने कहा कि भाई अब वैशाली से चला जाए। और कहां चले? तो आनंद अब उनका सचिव बन गया
था। कहा कि मुझे पावा की ओर ले चलो। पावापुरी पावापुरी वो जगह है जहां 44 साल पहले
महावीर वर्धमान महावीर की मृत्यु हुई थी। 44 साल इस बात को हुए थे। पावा में ही मृत्यु हुई थी। तो आनंद ने कहा ठीक है। और
यह भी कहा आनंद से कि देखो वैशाली को ध्यान से देख लो। पर्वत के ऊपर से यह आखिरी बार वैशाली को तुम देख रहे हो। हम
इसके बाद नहीं देख पाएंगे। पावा पहुंचे। पावा में एक व्यक्ति रहता था। चुंद उसका नाम था। वो एक सुनार था।
और वो पुराना सहयोगी था आनंद का भी और वैसे बुद्ध का भी। तो यह तय हुआ कि भोजन चुंद के घर करेंगे। तो चुंद के घर गए भोजन
के लिए। उसके पहले आनंद ने दो-तीन बार बुद्ध से कहा कि देखिए बुद्ध आप बार-बार कहते हैं
कि मेरा महापरिनिर्वाण का या परिनिर्वाण का समय आ गया है। आपके जाने के बाद संघ कैसे चलेगा? कुछ नियम तो बता दीजिए।
वो चुप रहते थे कि नियम का क्या करना है? मैं कोई पैगंबर थोड़ी ना हूं कि मैं बता के जाऊंगा सबको। बाद के लोग तय करेंगे।
धम्म से तय करेंगे। धम्म तो चेतना में है। जो धम्म के अनुसार ठीक होगा सब लोगों का हम कर लेंगे। अलग से बताने की क्या जरूरत
है? आनंद ने कहा नहीं ऐसे काम नहीं चलेगा। चुंद ने भी कहा कि 44 साल पहले हमारे शहर
में पावापुरी में जब महावीर जी की मृत्यु हुई उसके बाद उनके अनुयायियों में बहुत विवाद होने लगे थे। अगर क्लियर कट
इंस्ट्रक्शंस होती तो शायद विवाद ना होते। इसलिए बेहतर है कि आप इंस्ट्रक्शन साफ-साफ देके जाए।
और बुद्ध की रुचि एकदम नहीं थी। बुद्ध का सिंपल था अप दीपो भव अपय प्रकाश खुद बनो। मैं बहुत ज्यादा नियम बनाकर नहीं जाऊंगा।
बहरहाल चुंद के घर भोजन पर गए आनंद और गौतम बुद्ध और उस दिन भोजन में कुछ खास बात थी।
उस भोजन में बहुत सारे डिशेस बनी हुई थी। जिनमें से एक डिश का नाम था सुकर मददव। ये नोट कर लीजिए। ऐसा माना जाता है कि इसी
भोजन को खाकर बुद्ध की मृत्यु हुई थी। सुकर मददव सुकरमव क्या होता है? बहुत डिबेट है। किसी
को नहीं पता लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि सूअर के मांस से बनने वाला कुछ ऐसा था जो उससे लिंक था। और बौद्ध परंपरा नॉनवेज को
उतना बुरा नहीं मानती है। हीनयाम में और बुद्ध के समय में एक ही नियम था कि पशु को मारना नहीं है। अगर पशु स्वाभाविक मृत्यु
मरा है तो उसका भोजन किया जा सकता है। जैन परंपरा में ये था कि ना तो मारना है ना खाना है। बौद्ध परंपरा में हीनयान में ये
है कि स्वाभाविक मौत मरा है तो खा सकते हैं। महायान में यह है कि किसी भी हालत में नहीं खाना है। तो हर परंपरा का
अलग-अलग तरीका है। तो इससे ऐसा माना जाता है कि बुद्ध भी क्योंकि बुद्ध भी हीनियन के नजदीक माने जाते हैं ना शुरुआती बुद्ध
के समय के लोग तो इसको मानते रहे होंगे। जैसे ही बुद्ध ने वो खाया उनको रियलाइज हो गया और उन्होंने टेस्ट करते ही कहा सब लोग
ध्यान से सुन लें कि सारा का सारा मैं खाऊंगा। इतना स्वादिष्ट बना है कि कोई और नहीं
खाएगा। वो सारा खा नहीं पाए। फिर क्या बोले? जो बचा है उसे जमीन के अंदर गाड़ो।
कोई खाएगा नहीं। इन दोनों बातों से निष्कर्ष ही गलत है कि बुद्ध को अंदाजा हो गया था। इसका मतलब यह
बिल्कुल नहीं है कि चुंद ने जहर मिला दिया था। इसका मतलब फूड पोइजनिंग भी हो सकता है। कुछ भी हो सकता है। तबीयत तो वैसे भी
खराब थे। इन दिनों बुद्ध काफी अस्वस्थ चल भी रहे थे। 80 साल के हो भी गए बुद्ध को लग गया था कि यह भोजन मेरा आखिरी भोजन है।
यह खाने के बाद बातें होती रही। अंत में बुद्ध बोले आनंद से आनंद अब चलो कुशीनारा कुशीनारा जिसको आजकल हम बोलते हैं कुशीनगर
कुशीनारा चलो। आनंद को लगा कि आज ही आराम कर रहे थे। बुध नहीं अभी चलते हैं। चलने का समय आ गया है।
तो आनंद चल पड़ा। थोड़ा आगे गए। बुद्ध को अतिसार हुआ। अतिसार का मतलब खून की उल्टियां आने लगी।
बहुत कमजोरी, बहुत पेट में दर्द, उल्टियां ही उल्टियां वो भी खून की। तो बुद्ध एक पेड़ के नीचे बैठ गए और फिर चीवर बिछा के
उस लेट गए। आनंद ने कहा कि पड़ोस में एक नदी है। कुकुठा नाम की नदी है। अगर आप चल सके तो वहां चलकर स्नान कर लीजिए। पानी पी
लीजिए। बुद्ध की हिम्मत थी नहीं हिलने की भी तो वह गए वहां से पानी ले आया उन्होंने पानी पिया थोड़े तरोताजा हुए फिर नदी में
गए भी और तब उसको बोले कि आनंद आज रात के तीसरे प्रहर में मेरा परिनिवाण
होगा तो दो बातें गांठ बांध के समझ लो। पहली बात
यह कभी किसी को ना पता लगे कि चुंद के घर हमने सूकर मददव खाया और उसमें कोई ऐसी चीज हो सकती है ताकि कोई यह ना सोचे कि चुंद
ने जानबूझ के ऐसा किया है और वो मानते भी नहीं थे कि ऐसा जानबूझ के हुआ
और उनको ये अच्छे से पता था कि उस भोजन से ही हुआ है। दूसरी बात जो कुशीनारा के मल्ल हैं
कुशीनारा मल साम्राज्य का हिस्सा था ना उनको सूचना भिजवा दो कि आज मेरा यही अंतिम दिन है परिनिर्वाण है ताकि उनको बाद में
यह ना दुख हो कि इतनी महत्वपूर्ण बातें उनको बताई क्यों नहीं गई उन्हें तुरंत सूचना भिजवा दो
और मैं यहीं आराम करूंगा यहीं दम तोडूंगा इसके बाद क्या हुआ कि सारे भिक्षुओं को बुलाया गया
और उसी समय एक व्यक्ति वहां से गुजर रहा था और वो बहुत दिनों से परेशान था। अगर मैं ठीक याद कर पा रहा हूं उसका नाम
सुभद्र था। बड़ा परेशान था कि मैं कौन से मार्ग पर चलूं। उसे पता लगा बुद्ध यहां है और आज ही
परिनिर्माण होना है। उनके पास आया। बोले मैं आपका आखिरी शिष्य बनना चाहता हूं। तो आनंद ने एक आंख दिखाई कि भैया बीमार
हैं। बुद्ध ने कहा [गला साफ़ करने की आवाज़] कोई बात नहीं कोई बात नहीं आओ बैठो पूछो।
उसने कहा जी देखो इतने सारे श्रमण आंदोलन चल रहे हैं। छह सात तो महत्वपूर्ण है ही। मैं किसको फॉलो करूं या मैं आपको ही क्यों
फॉलो करूं? मैं कैसे मान लूं कि आपका रास्ता सबसे अच्छा है। तो बुद्ध की आवाज बहुत कम थी। लेकिन टूटी फूटी आवाज में
धम्म का अर्थ समझाया और आधे घंटे बाद क्या हुआ होगा? ए भिक्षवे ए अंतिम भिक्षवे तो आखरी जो
भिक्षु था वह बना सुभद्र सबसे पहला कौन था यश मतलब गहस्तिक में और बिना गहस्तिक के वो पांच कुछ लोग कहते हैं
कि उन पांच में भी अगर आप देखेंगे तो पहला कौडिन्य था कुछ लोग मानते हैं ऐसा कि कौडिन्य पहला था बाकी बाद में कुछ लोग
मानते हैं साथसा जो भी मानना हो सारे भिक्षु आ गए घेर के बैठ गए बुद्ध ने कहा देखो मैं जा रहा हूं। जितना मुझे बताना था
बता चुका हूं। धम्म आप जानते हैं। प्रतित समुत्पाद आप जानते हैं। अनित्यवाद आप जानते हैं। संसार में कुछ भी नित्य नहीं
है। सब कुछ कारण कार्य नियम से होता है। कारण कार्य नियम को प्रतित समुत्पादात कहते हैं। आप सब जानते हैं।
कोई ऐसी दुविधा हो जिसके समाधान से बाद में आसानी होगी तो पूछ लीजिए मुझसे। किसी ने कुछ नहीं पूछा।
फिर बुद्ध ने कहा मैं फिर अवसर दे रहा हूं कि जो भी मन में दुविधा हो सवाल हो पूछ सकते हैं। आनंद तुम भी पूछ सकते हो। कोई
सवाल नहीं। फिर कहा तीसरी बार अंतिम बार पुनः निवेदन कर रहा हूं। कोई भी सवाल हो जिससे लगता हो कि भविष्य में दिक्कत कम हो
सकती है तो पूछ लीजिए। किसी ने एक भी सवाल नहीं पूछा। और तब सब ने कहा कि हे बुद्ध आप अंतिम रूप
से क्या कहना चाहते हैं? बुद्ध ने कहा अप दीपो भव धम्म के रास्ते पर चलना है। धम्म को मन
में रखना है। अपना प्रकाश खुद बनना है। किसी की बातों में नहीं आना है। अपने विवेक का इस्तेमाल करना है। और जब जब
दुविधा हो एक व्यक्ति फैसला ना करें। मिलकर फैसला करें। रात होते मल्य लोग वहां पर आ गए थे और
मल्य लोगों ने कहा कि भाई हमें अंतिम दर्शन करने हैं। लाखों लोग आ गए। आनंद ने कहा भाई एक एक परिवार एक साथ बोला कि करवा
लो। ऐसे बहुत समय गुजर जाएगा। तो मल्लों ने बड़ा सहयोग किया। सब मल्लों ने उनका अंतिम दर्शन किया। फिर मल जो शासक लोग थे
वो आए आनंद के पास कि इनका जो अंतिम संस्कार है कैसे करना है? आनंद ने कहा कि अंतिम संस्कार वैसे ही करना जैसे राजा का
होता है। बोले राजा का कैसे होता है? बोले शव को एक कपड़े में लपेटो। फिर एक रुई में लपेटो।
फिर एक कपड़े में फिर एक रुई में ऐसे 50 बार करना है। जब इतना हो जाए तो तेल से भरे हुए बहुत
बड़े कड़ाहे में उस शव को रखना है। उतने ही बड़े एक कड़ाहे से उसको कवर करना है। यह तब तक जब तक दाह संस्कार नहीं हो रहा
ताकि शव सुरक्षित रहे। उन्होंने कहा कि देखिए यह सब हम करेंगे। बहुत उत्साह से करेंगे। बस हमें एक दिन का टाइम दे दीजिए।
उसने कहा आप ले लीजिए एक दिन का टाइम। एक दिन का टाइम मांगा। अगले दिन बोले एक और दिन दे दीजिए।
अगले दिन बोले बस एक बस और बस एक और दे दीजिए। करते करते अंततः सातवें दिन जाकर बुद्ध का अंतिम संस्कार
हुआ क्योंकि वो तैयारियां करने में इतने डूब गए थे। उनका मन था कि इतना भव्य तरीके से संस्कार करें। क्योंकि बहुत बड़ी बात
थी ना कि बुद्ध उनकी जमीन पर मृत्यु हुई है। सातवें दिन बुद्ध का अंतिम संस्कार हुआ।
फिर उनकी राख और अस्थियों को संभाला गया और जैसे संभाला उस भवन के बाहर बहुत सारे हथियार बंद सैनिक खड़े हो गए कि कहीं कोई
चोरी ना कर ले। जैसे ही बाकी लोगों को पता लगा अजात शत्रु को पता लगा अजात शत्रु ने मैसेज भेजा कि
मुझे बुद्ध की अस्थियों और राख में से कुछ हिस्सा चाहिए। कपिलवस्तु के लोगों ने कहा कि हमारा तो बच्चा था ही तो हमें तो दोगे
ही। हम ना होते तो कैसे यह सब होता तो हमें तो दो वैशाली के लोगों ने कहा हमें भी दो और
ऐसे करते-करते जितने भी महाजनपद थे जहांजहां बुद्ध का आना जाना होता था उन सब ने मांग लिया और मल्य बोल रहे हैं क्यों
दो सारा काम तो हमने किया बुद्ध हमारे यहां हमारे हैं हम रखेंगे सब कुछ झगड़ा हो गया तो उस झगड़े को सुलझाने के लिए वहीं
पर एक व्यक्ति था जिसका नाम था द्रोण द्रोणाचार्य नहीं है द्रोण है एक ब्राह्मण व्यक्ति था द्रोण था।
उसने कहा सोच के देखिए जो व्यक्ति जिंदगी भर समझाता रहा कि झगड़ा मत करो उसकी राख के लिए आप झगड़ा कर रहे हैं।
कैसा लगेगा उसे? कहा हां बात तो आप ठीक कह रहे हैं। ऐसा तो नहीं करना चाहिए। आप ही बताइए क्या करें?
दौड़ने का बांट लो। तो तय हुआ कि आठ हिस्सों में बुद्ध के अवशेषों को बांटा जाएगा। रेलिक्स बोलते
हैं उनको बांटा जाएगा। कौन बांटेगा? कौन बांटेगा? सब ने कहा भाई आप ही बांट दो। आप ही समझदार लग रहे हो हमें। तो द्रोण ने
क्या किया? आठ हिस्सों में बुद्ध के अवशेषों को बराबर मात्रा में बांटा और फिर उसने कहा सबसे आपसे एक निवेदन है। जिस
बर्तन में ये सारे अवशेष रखे हुए थे जिससे मैंने निकाल के बांटा है वो बर्तन मुझे दे दो। मैं भी एक स्तूप बनवा लूंगा। स्तूप
बनाते हैं बहुत परंपरा में बुद्ध के रेलिक्स को लेके अवशेषों को लेके। तो सब ने राजी खुशी कहा हां हां आपने इतना काम
किया तो आपको भी मिलना चाहिए। तो वो वाला एक बर्तन मिल गया उसको। अब सवाल है कि बुद्ध ने उत्तराधिकारी की
नियुक्ति क्यों नहीं की? इसका जवाब पहले मिल चुका है। बुद्ध ने साफ-साफ कहा था कि धम्म ही रास्ता है और जबजब
ऐसी दिक्कत आएगी, सामूहिक निर्णय होगा। हम पैगंबर जैसा धर्म बनाने के मूड में एकदम नहीं है कि एक व्यक्ति ने जो कहा अंतिम
रूप से वही माना जाए। धम्म की चेतना से, अपीव भव से और सामूहिक निर्णय की परंपरा से ही आगे बढ़ा जाएगा। अन्य घटनाएं मैं
पहले ही आपको बता चुका हूं। जैसे एक सुनीत नाम का व्यक्ति था जो जाति से था उसको धर्म में लाए थे। एक सुपाक और सुपी
नाम के दो बच्चे जो श्मशान घाट में काम करने वाले डोम जाति के थे उनको लाए थे। एक प्रकृति चांडालिका थी उसको लाए थे। यह
बताने के लिए था कि समाज के हर वर्ग के लोगों को कैसे बौद्ध धर्म में बुद्ध के समय में सम्मान दिया गया और उसके बाद ये
अंतिम स्लाइड है। बुद्ध के बाद बौद्ध धर्म जो हम आज नहीं पढ़ेंगे। बुद्ध के बाद बौद्ध धर्म का मतलब चार चीजें जो इसके बाद
हमें पढ़ना है। एक होगा बुद्ध का अपना दर्शन क्या था 3 घंटे लगभग उसके बाद होगा थेरवाद स्थविरवाद
हीनयान और जिसको बोलते हैं क्या शब्द था सर्व अस्थिवाद सर्वस्तिवाद
और उसमें दो शाखाएं जिसको हम बोलते हैं स्त्रांतिक बाह्य अनुमयवाद वै भाषिक बाह्य प्रत्यक्षवाद एक में ये हो जाएगा चार घंटे
में फिर होगा महायान और महायान का मतलब शून्यवाद विज्ञानवाद और वज्रयान, तंत्रयान, मंत्रयान।
उसके बाद होगा नवयान। और नवयान में फिलॉसफी कम। डॉ. अंबेडकर की उधेड़ब समझाना चाहूंगा कि 1927 से 1956 तक क्या-क्या
कैसे-कैसे हुआ। क्या ऐसा हुआ कि वह इस्लाम, ईसाइयत, सिख छोड़ के बौद्ध धर्म में आए और बौद्ध धर्म में आने से पहले और
आने के बाद उन्होंने क्या-क्या उसमें बदलाव किया। यह अपने आप में एक बहुत इंटरेस्टिंग हिस्टोरिकल डिस्कशन ज्यादा
है। फिलॉसोफिकल कम है। आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने बहुत ही धैर्य के साथ सुना है और शुक्रिया। जल्दी फिर से मिलेंगे।
नमस्कार।
थेरवाद बुद्ध के मूल उपदेशों पर केंद्रित है और व्यक्तिगत मोक्ष पर जोर देता है। महायान में बोधिसत्व का आदर्श है, जो सभी प्राणियों की मुक्ति के लिए कार्य करता है, और इसमें माध्यमिक व योगाचार जैसी शाखाएं हैं। वज्रयान अनुष्ठानों और मंत्रों पर बल देता है, जबकि नवयान डॉ. अंबेडकर द्वारा स्थापित है और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता देता है।
अंबेडकर ने चार दृश्यों (बूढ़ा, बीमार, मृत, संन्यासी) की यथार्थता, 'सर्वं दुखम' की अवधारणा, बिना आत्मा के कर्म-पुनर्जन्म के सिद्धांत, और भिक्षु संघ की सामाजिक उपयोगिता पर प्रश्न उठाए। उन्होंने इन विरोधाभासों को तर्कसंगत ढंग से हल करते हुए, बौद्ध धर्म को एक सामाजिक सुधार आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया, जिसे 'नवयान' कहा जाता है।
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में, लोहे के उपयोग से कृषि उत्पादन बढ़ा, जिससे शहरीकरण और मुद्रा अर्थव्यवस्था का विकास हुआ। राजनीतिक रूप से, 16 महाजनपदों का उदय हुआ और राज्यों के बीच संघर्ष बढ़ा। सामाजिक-धार्मिक रूप से, क्षत्रियों और वैश्यों की बढ़ती शक्ति का ब्राह्मणों के धार्मिक वर्चस्व से टकराव हुआ, और यज्ञों में पशुबलि का विरोध बढ़ा, जिससे श्रमण परंपरा (जैसे बौद्ध और जैन) को बल मिला।
अनात्मवाद के अनुसार, व्यक्ति (अहंकार) एक सतत परिवर्तनशील प्रक्रिया है, कोई स्थायी, अपरिवर्तनीय आत्मा (आत्मन) नहीं है। यह मानवीय चेतना और नैतिकता का एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, जो हिंदू धर्म जैसी परंपराओं में मानी जाने वाली शाश्वत आत्मा की अवधारणा का विरोध करता है। बुद्ध का अंतिम उपदेश 'अप्प दीपो भव' (अपना दीपक स्वयं बनो) इसी दर्शन का सार है।
बुद्ध का जीवन मुख्यतः पांच क्षेत्रों में बीता: मगध (राजगीर और बोधगया, जहाँ उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ), कोशल (श्रावस्ती, जहाँ उन्होंने कई वर्ष बिताए), वज्जि संघ (वैशाली, एक गणतंत्र), मल्ल (कुशीनगर, जहाँ उनका महापरिनिर्वाण हुआ), और काशी (सारनाथ, जहाँ उन्होंने पहला उपदेश दिया)।
जब अनाथपिंडक ने पूछा कि क्या उन्हें भिक्षु बन जाना चाहिए, तो बुद्ध ने कहा कि जो अपनी संपत्ति का उपयोग समाज के कल्याण के लिए करता है, वह भिक्षु से कम नहीं है। इससे पता चलता है कि बौद्ध दर्शन धन कमाने और सामाजिक उत्थान को नैतिक मानता है, जो उस समय के उभरते व्यापारी वर्ग के अनुकूल था।
बुद्ध के उपदेशों का मुख्य स्रोत त्रिपिटक है, जिसमें विनय पिटक (भिक्षु संहिता), सुत्त पिटक (उपदेश), और अभिधम्म पिटक (दार्शनिक विश्लेषण) शामिल हैं। उनकी जीवन कथा अश्वघोष के 'बुद्धचरित' और ललितविस्तर सूत्र जैसे ग्रंथों में मिलती है।
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