अर्थशास्त्र का परिचय: मूल अवधारणाएँ, परिभाषाएँ और आर्थिक प्रणालियाँ
अर्थशास्त्र का परिचय: बुनियादी अवधारणाएँ और सिद्धांत
यह व्याख्यान अर्थशास्त्र की नींव रखता है, जिसमें इसकी उत्पत्ति, प्रमुख विचारकों की परिभाषाएँ और बुनियादी अवधारणाओं को शामिल किया गया है।
अर्थशास्त्र की उत्पत्ति और महत्वपूर्ण अर्थशास्त्री
- अर्थशास्त्र (Economics) शब्द प्राचीन ग्रीक शब्द 'ओइकोस' (घर) और 'नेमिन' (प्रबंधन) से बना है, जिसका अर्थ है 'गृह-प्रबंधन'।
- पिता की अवधारणाएँ:
- एडम स्मिथ (Adam Smith): अर्थशास्त्र के जनक और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के जनक। प्रसिद्ध पुस्तक: 'An Inquiry into the Nature and Causes of the Wealth of Nations' (1776)। मुख्य अवधारणाएँ: श्रम विभाजन (Division of Labour), अदृश्य हाथ (Invisible Hand), और मुक्त बाज़ार (Free Market)।
- अल्फ्रेड मार्शल (Alfred Marshall): सूक्ष्मअर्थशास्त्र (Microeconomics) के जनक। इन्होंने 'अर्थशास्त्र के सिद्धांत' (Principles of Economics, 1890) पुस्तक लिखी। इनकी परिभाषा कल्याण-परिभाषा (Welfare Definition) कहलाती है।
- जॉन मेनार्ड कीन्स (John Maynard Keynes): समष्टिअर्थशास्त्र (Macroeconomics) के जनक। प्रसिद्ध पुस्तक: 'The General Theory of Employment, Interest and Money' (1936)।
अर्थशास्त्र की प्रमुख परिभाषाएँ
- एडम स्मिथ (धन-परिभाषा / Wealth Definition): अर्थशास्त्र धन का विज्ञान है। यह धन के उत्पादन, विनिमय और वितरण का अध्ययन करता है।
- अल्फ्रेड मार्शल (कल्याण-परिभाषा / Welfare Definition): अर्थशास्त्र मानव कल्याण का अध्ययन है। लोग कमाई और खर्च इसलिए करते हैं ताकि मानव कल्याण में सुधार हो सके।
- लायनल रॉबिंस (अभाव-परिभाषा / Scarcity Definition): अर्थशास्त्र मानव व्यवहार का वह विज्ञान है जो सीमित साधनों और असीमित आवश्यकताओं के बीच संबंधों का अध्ययन करता है। प्रसिद्ध पुस्तक: 'An Essay on the Nature and Significance of Economic Science' (1932)।
- पॉल सैमुअलसन (विकास-परिभाषा / Growth Definition): अर्थशास्त्र इस बात का अध्ययन है कि लोग और समाज दुर्लभ संसाधनों का उपयोग समय के साथ विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन और वितरण के लिए कैसे करते हैं।
आर्थिक अवधारणाएँ: वस्तु, सेवा और उपयोगिता
- वस्तु (Goods): कोई भी चीज़ जो मानवीय आवश्यकता (Want) को संतुष्ट करती है। यह मूर्त (जैसे भोजन, कार) या अमूर्त (सेवाएँ) हो सकती है।
- निःशुल्क वस्तुएँ (Free Goods): प्रकृति द्वारा बिना मूल्य के प्रदान की जाती हैं (जैसे धूप, हवा)।
- आर्थिक वस्तुएँ (Economic Goods): दुर्लभ होती हैं, जिन्हें पाने के लिए मूल्य चुकाना पड़ता है (जैसे भोजन, कपड़े)।
- उपभोक्ता वस्तुएँ (Consumer Goods): प्रत्यक्ष रूप से आवश्यकताओं की संतुष्टि करती हैं (जैसे टीवी, फर्नीचर)।
- पूँजीगत वस्तुएँ (Capital Goods): उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में सहायक होती हैं (जैसे मशीनरी)।
- सेवा (Service): वे क्रियाएँ जो मानवीय आवश्यकताओं को संतुष्ट करती हैं लेकिन मूर्त नहीं होतीं (जैसे बैंकिंग, शिक्षण)।
- उपयोगिता (Utility): किसी वस्तु या सेवा में आवश्यकता संतुष्ट करने की शक्ति। यह एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा है जो व्यक्ति-विशेष और परिस्थिति पर निर्भर करती है।
- क्रमिक ह्रास नियम (Law of Diminishing Marginal Utility): जैसे-जैसे हम किसी वस्तु का अधिक उपभोग करते हैं, उसकी अतिरिक्त इकाई से मिलने वाली संतुष्टि (सीमांत उपयोगिता) घटती जाती है।
सकारात्मक और मानक अर्थशास्त्र
- सकारात्मक अर्थशास्त्र (Positive Economics): यह 'क्या है' (What is) का अध्ययन है। यह तथ्यों और कारण-प्रभाव संबंधों पर आधारित होता है। इसके कथनों की जाँच की जा सकती है (जैसे "जम्मू-कश्मीर में 8% बेरोज़गारी है")।
- मानक अर्थशास्त्र (Normative Economics): यह 'क्या होना चाहिए' (What ought to be) का अध्ययन है। इसमें मूल्य निर्णय (Value Judgement) और राय शामिल होती है (जैसे "बेरोज़गारी कम होनी चाहिए")।
आर्थिक समस्या और विधियाँ
- आर्थिक समस्या के तीन मूल प्रश्न:
- क्या उत्पादन करें? (What to produce?)
- कैसे उत्पादन करें? (How to produce?)
- किसके लिए उत्पादन करें? (For whom to produce?)
- आर्थिक समस्या का मूल कारण अभाव (Scarcity) और चयन (Choice) है।
- निगमन विधि (Deductive Method): सामान्य से विशिष्ट की ओर जाना। एक सामान्य सिद्धांत लेकर उसे किसी विशिष्ट मामले पर लागू करना।
- आगमन विधि (Inductive Method): विशिष्ट से सामान्य की ओर जाना। विशिष्ट अवलोकनों के आधार पर एक सामान्य सिद्धांत बनाना।
सूक्ष्मअर्थशास्त्र (Microeconomics) बनाम समष्टिअर्थशास्त्र (Macroeconomics)
| विशेषता | सूक्ष्मअर्थशास्त्र (Micro) | समष्टिअर्थशास्त्र (Macro) | | :--- | :--- | :--- | | अर्थ | ग्रीक शब्द 'माइक्रो' (छोटा) | ग्रीक शब्द 'मैक्रो' (बड़ा) | | अध्ययन का क्षेत्र | व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयाँ (जैसे उपभोक्ता, फर्म) | संपूर्ण अर्थव्यवस्था (समग्र) | | केंद्र बिंदु | कीमत निर्धारण (Price Determination) | राष्ट्रीय आय, रोज़गार, सामान्य मूल्य स्तर | | लक्ष्य | उपभोक्ता की संतुष्टि और उत्पादक का लाभ अधिकतम करना | संपूर्ण अर्थव्यवस्था का अनुकूलन (Optimization) | | उदाहरण | एक वस्तु की माँग, एक फर्म का उत्पादन | कुल माँग, राष्ट्रीय आय, बेरोज़गारी | | उपनाम | मूल्य सिद्धांत (Price Theory) | आय सिद्धांत (Income Theory) |
अर्थव्यवस्था और उसके प्रकार
अर्थव्यवस्था (Economy): एक ऐसी प्रणाली जहाँ लोग अपनी आवश्यकताओं और चाहतों को पूरा करने के लिए धन कमाते और खर्च करते हैं। इसमें उत्पादन, उपभोग और वितरण शामिल हैं। अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए, [क्लास 12th मनी एंड बैंकिंग: मनी, बैंकिंग और क्रेडिट क्रिएशन का पूरा गाइड] (/summary/12th) जैसे विषयों को समझना भी एक मजबूत आधार बनाता है।
- सरल अर्थव्यवस्था (Simple Economy): कम जनसंख्या, सीमित आर्थिक गतिविधियाँ, वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System) पर आधारित, आत्मनिर्भर (जैसे गाँव की अर्थव्यवस्था)।
- जटिल अर्थव्यवस्था (Complex Economy): अधिक जनसंख्या, उन्नत तकनीक, मुद्रा का उपयोग, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर निर्भर (जैसे भारत, अमेरिका) ।
आर्थिक प्रणालियों के प्रकार
- नियंत्रित या केन्द्रीय नियोजित अर्थव्यवस्था (Controlled/Centrally Planned Economy):
- नियंत्रण: सरकार (Government) ।
- उद्देश्य: सामाजिक कल्याण (Social Welfare) ।
- संसाधन: अधिकांश संसाधनों पर सरकार का स्वामित्व।
- उदाहरण: पुराना चीन, रूस।
- मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था (Free Market Economy / Laissez-Faire):
- नियंत्रण: बाज़ार की शक्तियाँ (माँग और पूर्ति) ।
- उद्देश्य: लाभ अधिकतमीकरण (Profit Maximization) ।
- संसाधन: निजी व्यक्तियों के पास।
- उदाहरण: अमेरिका (काफी हद तक) ।
- मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy):
- नियंत्रण: मुक्त बाज़ार शक्तियाँ और सरकारी नियमन (Regulation) दोनों।
- उद्देश्य: लाभ अधिकतमीकरण और सामाजिक कल्याण दोनों।
- संसाधन: सरकार और निजी क्षेत्र दोनों के पास।
- उदाहरण: भारत।
हेलो एंड वेलकम यू ऑल डियर स्टूडेंट्स। फाइनली आज से हम अपना सिलेबस स्टार्ट कर रहे हैं। इकोनॉमिक्स हम सबसे पहले पढ़ेंगे
और पहला ही चैप्टर हमारे पास है इंट्रोडक्शन ऑफ इकोनॉमिक्स, बेसिक कांसेप्ट्स एंड प्रिंसिपल। इसमें हम बेसिक
ऑफ इकोनॉमिक्स पढ़ने वाले हैं। अगर आप मेरे कंप्लीट वीडियो लेक्चर्स देखना चाहते हो इकोनॉमिक्स पे, स्टैटिस्टिक्स पे,
मैथमेटिक्स पे, डिस्क्रिप्शन के अंदर आपको लिंक्स मिलेंगी। जहां पे आपको कंप्लीट प्लेलिस्ट मिलेगी सिलेबस की। बिल्कुल हम
जीरो लेवल से पढ़ेंगे, एडवांस लेवल तक जाएंगे, एमसीक्यूस करेंगे। मेरा यहां पर सिर्फ एक ही काम है। यह जो इकोनॉमिक
सब्जेक्ट है ना, यह आपका फेवरेट बनना चाहिए। बिकॉज़ लैंग्वेज मैं बहुत ही सिंपल इस्तेमाल करने वाला हूं। आपको एक-एक
कांसेप्ट बिल्कुल अच्छे से समझ आने वाला है। अब यह हमारा पहला ही लेक्चर है। आपने एक काम करना है। एक रिक्वेस्ट है। बाकी जो
फ्यूचर लेक्चर्स आएंगे उनके अंदर इस तरह की रिक्वेस्ट आपको मैं नहीं करूंगा। इस वीडियो को आपने सबसे पहले लाइक करना है।
फिर आपने कमेंट करना है कैसा आपको यह लेक्चर लगा। एंड इस वीडियो को आपने शेयर भी जरूर करना है। अगर आपको एग्जामिनेशन के
रिलेटेड बाकी नोटिफिकेशन के रिलेटेड, जॉब्स के रिलेटेड कोई भी इंफॉर्मेशन चाहिए तो tlegram पे जाओ। वहां पे आपको सर्च
करना है मलिक ट्यूटोरियल ऑफिशियल। इसको जॉइ करो। वहां पर आपको सारी अपडेट्स मिल जाएंगी और पीडीएफ के रिलेटेड जो भी आपकी
क्वेरी होगी वह आपने WhatsApp पे इस नंबर पर आपने पूछना है। सो लेट अस स्टार्ट। सबसे पहले हम देखेंगे यह जो इकोनॉमिक्स है
ना इसका मतलब है क्या? द टर्म इकोनॉमिक्स कम्स फ्रॉम द एंशिएंट ग्रीक वर्ड। अब यह जो टर्म इकोनॉमिक्स है ना यह आए हैं
एंशिएंट ग्रीक वर्ड ओइकोस से। अब ओकोस मींस हाउसहोल्ड एंड नेमिन मींस मैनेजमेंट। एक्चुअल में यह जो इकोनॉमिक्स है ना इसका
मतलब है मैनेजमेंट ऑफ हाउसहोल्ड। यानी इकोनॉमिक्स स्टडी अबाउट दी मैनेजमेंट ऑफ हाउसहोल्ड। अब आप कहोगे सर सिर्फ
मैनेजमेंट ऑफ हाउसहोल्ड। अगर आप एक मेजर लेवल पर देखोगे ना तो हमारे पास पूरा जो वर्ल्ड है ना यह हाउस होल्ड ही है। जो एक
हाउसहल्ड के अंदर होता है वही एक कंट्री लेवल पर होता है। डिस्ट्रिक्ट लेवल पर होता है। वर्ल्ड लेवल पर होता है। अब देखो
हमारे घर में एक हेड होता है। इसी तरह से एक कंट्री के अंदर भी हेड होता है। हम अर्निंग करते हैं। हमारे पास रिसोर्सेज
होते हैं। हम उन रिसोर्सेज को मैनेज करते हैं। कौन सा कहां पे खर्च करना है, कैसे करना है, वह सब चीजें हम मैनेज करते हैं
एक घर के अंदर। इसी तरह से अगर हम मेजर लेवल पर देखेंगे कंट्री के अंदर एक हेड होता है। वहां पर रिसोर्सेज होते हैं।
वहां पर इकोनॉमिक एक्टिविटीज होती हैं। तो जो हमारे पास हाउसहोल्ड पे है वही एक मेजर लेवल पर कंट्री पे, दुनिया में,
डिस्ट्रिक्ट में, स्टेट में वगैरह वगैरह। तो सो इकोनॉमिक्स मींस मैनेजमेंट ऑफ हाउसहोल्ड।
अब यहां पर अगर हम देखेंगे ना 19th सेंचुरी से पहले जो इकोनॉमिक्स था ना इसको हम कहते थे पॉलिटिकल इकोनमी। लेकिन जब
अल्फ्रेड मार्शल ने अपनी एक बुक लिखी उसके अंदर इसने नाम नेम इसको रखा इकोनॉमिक्स। पहले इसको क्या कहते थे? पॉलिटिकल इकोनमी।
लेकिन नाम किसने चेंज किया? अल्फ्रेड मार्शल ने। क्या रखा? इकोनॉमिक्स। इसीलिए जो अल्फ्रेड मार्शल है इसको हम कहते हैं
फादर ऑफ माइक्रो इकोनॉमिक्स। अगर आपसे कोई पूछेगा फादर ऑफ माइक्रोइकोनॉमिक्स कौन है? तो वो है अल्फ्रेड मार्शल। अब आप सोचोगे
इसको फादर क्यों कहते हैं? हर चीज के पीछे एक वजह जरूर होती है। क्योंकि माइक्रोइकोनॉमिक्स में जो इंपॉर्टेंट
कांसेप्ट है ना वो इसी ने डेवलप किए हैं। जैसे डिमांड एंड सप्लाई हो गया। इलास्टिसिटी ऑफ़ डिमांड है, मार्जिनल
यूटिलिटी है, कंज्यूमर सरप्लस है, इक्विलिब्रियम प्राइस है। ये सारे कांसेप्ट अल्फ्रेड मार्शल ने डेवलप किए
हैं। इसी वजह से इसको हम कहते हैं फादर ऑफ माइक्रोइकोनॉमिक्स। और इसने एक फेमस बुक लिखी थी प्रिंसिपल ऑफ
इकोनॉमिक्स 1890 में जिसमें इसने फाउंडेशन डाली थी मॉडर्न माइक्रोइकोनॉमिक थ्योरी की। नाउ बहुत सारे बच्चे कंफ्यूज
होते हैं। वो सोचते हैं कि जो एडम स्मिथ है इसको भी तो फादर ऑफ इकोनॉमिक्स कहा जाता है। अब ये अल्फ्रेड मार्शल कहां से आ
गया? हां। जो मार्शल है ना वो है फादर ऑफ माइक्रोइकोनॉमिक्स और जो एडमम स्मिथ है यह है फादर ऑफ इकोनॉमिक्स यानी एक जनरल है
फादर ऑफ मॉडर्न इकोनॉमिक्स इसकी एक बहुत ही इंपॉर्टेंट एंड फेमस बुक है द वेल्थ ऑफ नेशन जिसमें एडम स्मिथ ने फाउंडेशन डाली
मॉडर्न इकोनॉमिक्स थॉट की जिस बुक के अंदर इसने कांसेप्ट को डिफाइन किया डिवीजन ऑफ लेबर, इनविज़िबल हैंड, फ्री मार्केट एंड
लेस फेयर इकॉनमीज़। अब यह जो एडम स्मिथ था इसने यह जो बुक है लिखी थी ड्यूरिंग द इंडस्ट्रियलाइजेशन। जब
इंग्लैंड के अंदर इंडस्ट्रियलाइजेशन आया था। उस टाइम पे एडम स्मिथ ने कांसेप्ट दिया था डिवीजन ऑफ लेबर का। अब डिवीजन ऑफ
लेबर का मतलब क्या है? कि एक आदमी एक ही काम करेगा। अब फॉर एग्जांपल आपको कपड़े बनाने हैं। अब उससे पहले क्या होता था? एक
इंसान एक कपड़ा पूरा बनाता था। जो भी उसके अंदर प्रोसेस होता था जैसे स्टिचिंग हो गया, बटन लगाना हो गया, पैकिंग हो गया वो
सारे वो करता था। लेकिन एडम स्मिथ ने डिवीजन ऑफ लेबर का कांसेप्ट दिया जिसमें उसने कहा एक आदमी एक ही काम करेगा फिर वो
उसके अंदर क्या हो जाएगा? स्पेशलाइज हो जाएगा तो वह जल्दी करेगा। जैसे एक आदमी स्टिचिंग करेगा। एक आदमी का काम है सिर्फ
बटन लगाना। एक आदमी का काम है सिर्फ पैकिंग करना। इस वजह से क्या हो जाएंगे? ये एक्सपर्ट इस चीज के अंदर हो जाएंगे।
फिर उसने कहा इनविज़िबल हैंड। जब एक इंसान अपने इंटरेस्ट के लिए, अपने प्रॉफिट के लिए कोई काम करता है ना तो उसके अंदर एक
इनविज़िबल हैंड है। अब इनविज़िबल हैंड का मतलब क्या है? उसके अंदर एक क्यूरोसिटी होती है। अपनापन है। जैसे फॉर एग्जांपल आप
कोई कंपनी खोलोगे और दूसरी कोई कंपनी है। जिस तरह से आप जिस लगन से आप अपनी कंपनी में काम करोगे, क्या उसी लगन से आप दूसरी
कंपनी में काम करोगे? नहीं। यानी अपनी कंपनी के अंदर जो लगन है ना जो आपको शौक है उसी को एडम स्मिथ ने कहा इनविज़िबल
हैंड। ठीक है? ये आपको कांसेप्ट के लिए जरूरी है। एग्जामिनेशन के लिए उतना जरूरी नहीं है। आपको थोड़ा सा पता होना चाहिए।
उसके बाद फ्री मार्केट इकॉनमी। इसको हम आगे पढ़ेंगे। उसके बाद हम पढ़ने वाले हैं डेफिनेशंस गिवन बाय डिफरेंट इकोनॉमिस्ट।
अब अलग-अलग इकोनॉमिस्ट ने इकोनॉमिक्स की डिफरेंट डेफिनेशनंस दी। कभी कबभार एग्जामिनेशन में डायरेक्ट डेफिनेशन से
क्वेश्चन पूछा जाता है। जैसे आपसे एग्जामिनेशन में पूछा जाएगा वेल्थ डेफिनेशन किसने दी? तो आपने कहना है एडम
स्मिथ। एडम स्मिथ डिफाइन इकोनॉमिक्स एस साइंस ऑफ़ वेल्थ। तो, यह थोड़ा सा आपको पता होना चाहिए। और इसकी जो बुक है, वह कौन सी
है? एन इंक्वायरी इनू नेचर एंड कॉज ऑफ वेल्थ ऑफ नेशन। ठीक है? फिर हमारे पास अल्फ्रेड मार्शल ने अल्फ्रेड मार्शल ने
कौन सी डेफिनेशन दी? इसने वेलफेयर डेफिनेशन दी। ठीक है? तो इसकी बुक है प्रिंसिपल ऑफ इकोनॉमिक्स। उसके बाद लायनल
रॉबिंस। अब लाइन लायनल रॉबिंस ने कौन सी डेफिनेशन दी? इसने दी स्कैस्टी डेफिनेशन। ठीक है? कौन सी बुक में? एन एस्स ऑन द
नेचर एंड सिग्निफिकेंस ऑफ इकोनॉमिक साइंस। उसके बाद सैमुलसन की कौन सी डेफिनेशन है? इसकी है ग्रोथ डेफिनेशन। कौन सी बुक में
दी? एन इंट्रोडक्टरी एनालिसिस। अब थोड़ा सा हम इन डेफिनेशन को एक्सप्लेन करेंगे। एडमम स्मिथ की सबसे पहले जो वेल्थ
डेफिनेशन उसने दी उसके अंदर हम बात करेंगे। ही सेड दैट एवरी पर्सन वर्क्स फॉर सेल्फ इंटरेस्ट। एडमम स्मिथ ने क्या कहा?
इसने कहा कि हर एक आदमी अपने इंटरेस्ट के लिए काम करता है। इसीलिए एक चीज आपको याद रखना है जो एडम स्मिथ है ना इसको फादर ऑफ
कैपिटलिस्ट इकॉनमी भी कहा जाता है। क्योंकि इसी ने यह कांसेप्ट दिया था। व्हाइल डूइंग दिस। अब जब एक इंसान अपने
सेल्फ इंटरेस्ट के लिए अपने प्रॉफिट के लिए काम करता है तो उसके पीछे क्या होते हैं? इनविज़िबल हैंड जो कि मैंने अभी आपको
समझाया। यानी जो क्यूरोसिटी उसके अंदर होती है वो उसको बैक करते हैं। और एडम स्मिथ ने किसको सपोर्ट किया? डिवीजन ऑफ़
लेबर। क्योंकि यह क्या करता है? प्रोडक्शन को इनक्रीस करता है। जब एक इंसान बार-बार एक ही काम करेगा तो ऑब्वियस सी बात है उस
टाइम पे जो कांसेप्ट था उस टाइम पे उतनी ज्यादा मशीनरीज नहीं थी। तो प्रोडक्शन इसी तरह से इनक्रीस हो रही थी। फिर हमारे पास
अल्फ्रेड मार्शल एडम स्मिथ का जस्ट अपोजिट अल्फ्रेड मार्शल ने डेफिनेशन दी। इसने डेफिनेशन दी वेलफेयर इकोनॉमिक्स की।
इकोनॉमिक्स इज अ स्टडी ऑफ़ मैनकाइंड। अब अल्फ्रेड ने क्या बोला? जो इकोनॉमिक्स है, यह स्टडी ऑफ़ मैनकाइंड है। क्या मतलब इसका?
इसका मतलब यह है कि लोग कमाई करते हैं, इनकम अर्न करते हैं, फिर इसको स्पेंड करते हैं। लेकिन जितनी भी चीजें हैं, जितनी भी
इकोनॉमिक्स एक्टिविटीज है, यह किसके लिए है? इन ऑर्डर टू इंप्रूव द ह्यूमन वेलफेयर। यह सिर्फ और सिर्फ ह्यूमन
वेलफेयर को इनक्रीस करने के लिए। यहां पर प्राइवेटाइजेशन का कांसेप्ट नहीं है। यहां पर ह्यूमन वेलफेयर है। सोसाइटी का वेलफेयर
है। उसकी बात हो रही है। हियर वेल्थ इजेंट। वेल्थ बहुत जरूरी है। क्यों? इन ऑर्डर टू हेल्प ह्यूमन वेल बीइंग। यानी
ह्यूमन का जो वेल बीइंग है, सोसाइटी की जो इंप्रूवमेंट है, इसके लिए जरूरी है। नॉट फॉर ओन से ना कि अपने लिए। आपको जो चीजें
अच्छी लगती है उससे कोई मैटर नहीं है। सिर्फ ह्यूमंस का वेलफेयर होना चाहिए। यह किसने डेफिनेशन दी? अल्फ्रेड मार्शल।
नेक्स्ट हमारे पास है लयनल रबिंस। अब लयनल रॉबिंस ने स्कस की डेफिनेशन दी। उसका क्या मतलब? वी हैव अनलिमिटेड वांट्स। लयनल
रबिंस का ये कहना है जो इंसान है ना इंसान की जो चाहते हैं इनकी जो वांट्स है ना ये अनलिमिटेड है। जैसे मैं आपकी एग्जांपल
देता हूं। जरा मुझे आप बताओ आप क्या-क्या सोचते हो? आप सोचते हो मेरे पास गाड़ी होनी चाहिए। मेरे पास हेलीकॉप्टर होना
चाहिए। मेरे पास दिल्ली के अंदर जमीन होनी चाहिए। लंदन के अंदर होनी चाहिए। और बहुत सारी जगह पे मेरा घर होना चाहिए। पता नहीं
क्या-क्या होना चाहिए। लेकिन जो रिसोर्सेज है ना यह लिमिटेड है। हमारे पास अनलिमिटेड रिसोर्सेज नहीं है। हमारे पास रिसोर्सेज
क्या है? लिमिटेड है। अब एक और चीज़ उन रिसोर्सेज के अल्टरनेटिव यूज़ भी है। जैसे फॉर एग्जांपल मनी
अगर पैसे से सिर्फ गाड़ी खरीदी जाती फिर तो तब भी हमारे पास उतनी टेंशन नहीं थी। लेकिन इसी पैसे से आप कपड़े भी खरीदते हो।
इसी पैसे से आप खाना भी खरीदते हो, गाड़ी भी खरीदते हो, घर भी खरीदते हो। बहुत सारी चीजें खरीदते हो। यानी रिसोर्सेज हैव
अल्टरनेटिव यूज। एक रिसोर्सेज के बहुत सारे यूज़ हैं। जैसे आपके पास जमीन है। उस जमीन के अंदर आप मेज उगा सकते हो, वीट उगा
सकते हो, राइस उगा सकते हो। ठीक है? अब जब अल्टरनेटिव यूज़ है, स्केसिटी है तो आपके पास जो नेक्स्ट जो प्रॉब्लम आती है वो फिर
आती है चॉइस की। अगर आपके पास अनलिमिटेड पैसा होता फिर अगर आपको फॉर एग्जांपल मैं कहता आप घर खरीदोगे या कार खरीदोगे। फिर
आप कहोगे दोनों मुझे चाहिए। अगर आपके पास पैसे कम है फिर आप एक ही खरीदोगे। यानी एक चीज आपको छोड़नी पड़ेगी। एक ही चीज आपको
सेलेक्ट करनी पड़ेगी। तो यह जो स्कैस्टी डेफिनेशन है यह किसने दी? लायनल रबिंस ने। उसके बाद पाउल सैमुलसन। सैमुलसन ने कौन सी
डेफिनेशन दी? ग्रोथ डेफिनेशन। इकोनॉमिक्स स्टडीज हाउ पीपल एंड सोसाइटी यूज केयर रिसोर्सेज। इसने भी स्केसिटी का कांसेप्ट
इस्तेमाल किया। लेकिन इसने क्या कहा कि इकोनॉमिक्स जो है यह स्टडी करती है किस तरह से लोग और सोसाइटी इन स्केयर
रिसोर्सेज को इस्तेमाल करते हैं। अल्टरनेटिव यूज भी इनके हैं टू प्रोड्यूस गुड्स ओवर टाइम एंड डिस्ट्रीब्यूट देम।
फिर वो क्या करते हैं? प्रोडक्शन ऑफ गुड्स करते हैं। फॉर एग्जांपल आपके पास एक फैक्ट्री है। आपने गुड्स प्रोड्यूस किए।
फिर आपने उनको डिस्ट्रीब्यूट किया। यानी बेचा प्रेजेंट में भी और पास्ट में भी। यानी ओवरऑल जो सैमुलसन है यह ग्रोथ की बात
कर रहा है। तो ये कुछ इंपॉर्टेंट इकोनॉमिस्ट थे। उनकी डेफिनेशंस थी। डायरेक्ट ये एग्जामिनेशन में पूछी जाती
है। नाउ जितने भी हमने इकोनॉमिस्ट की डेफिनेशंस पढ़ी। वहां से हमने क्या आईडिया लिया कि इकोनॉमिक्स किसको कहते हैं?
इकोनॉमिक्स किस चीज की स्टडी करती है? तो हमने देखा अगर हम ओवरऑल समरी मैं आपको यहां पर बताऊं इकोनॉमिक स्टडीज द वे इन वि
पीपल यूज द अवेलेबल रिसोर्सेज। इकोनॉमिक स्टडी करती है किस तरह से लोग अपने अवेलेबल रिसोर्सेज को इस्तेमाल करते हैं
और उनकी जो अनलिमिटेड मल्टीपल वांट्स हैं उनको वो सेटिस्फाई करते हैं। उसके बाद हमने पढ़ा स्केसिटी। स्केसिटी के बारे में
हमने क्या जाना? स्के इज द गैप बिटवीन पीपल वांट एंड व्हाट दे आर एबल टू गेट। स्केसिटी क्या है? स्केसिटी इज द गैप
बिटवीन व्हाट पीपल वांट। यानी आपकी क्या ख्वाहिशात हैं? आपकी क्या चॉइससेस हैं? और जो आपको मिलता है इन दोनों के बीच में
डिफरेंस है। आप बहुत कुछ चाहते हो लेकिन सारी चीजें आपको नहीं मिलती है। जो गैप रहता है ना जितने आपके पास रिसोर्सेज हैं
और जितनी वांट्स आपको सेटिस्फाई हो रही हैं जो वांट्स आपको सेटिस्फाई नहीं हो रही है वही हमारे पास स्केरसिटी है। स्केसिटी
की वजह से हमारे पास चॉइस आती है। कमी है। आपके पास सिर्फ ₹1 लाख है। तो अब आपको चॉइस है। आप यह गाड़ी खरीदोगे या यह गाड़ी
खरीदोगे? अगर आपके पास करोड़ों रुपया होता फिर आप दोनों खरीदते फिर चॉइस की कोई बात नहीं होती लेकिन स्केसिटी कमी की वजह से
चॉइस आती है चॉइस की वजह से हम डिसीजन फिर हमें लेना पड़ता है अगर आपके पास अनलिमिटेड रिसोर्सेज होते फिर मैं आपको
नहीं कहता कि डिसीजन करो आपको यह लेना है या यह लेना है फिर आप दोनों ले लेते फिर आप सब कुछ ले लेते लेकिन जब हमें चॉइस का
कांसेप्ट आता है तो चॉइस का मतलब डिसीजन मेकिंग अब डिसीजन हम किस तरह से लेते हैं? डिसीजन हमें इस तरह से लेना है जो
कंज्यूमर है वो अपनी वांट को मैक्सिमम सेटिस्फाई करे। जो कंज्यूमर है ना उसका एक ही गोल है अपनी वांट्स को
मैक्सिमम सेटिस्फाई करें। यानी आपके पास जो लिमिटेड रिसोर्सेज है ना उससे आप ज्यादा से ज्यादा अपनी सेटिस्फेक्शन
सेटिस्फेक्शन अटेन करो। ठीक है? और प्रोड्यूसर का काम है प्रोड्यूसर का मेन गोल होता है प्रॉफिट को मैक्सिमाइज करें।
किस तरह से? वो हर वो तरीका हर वो रास्ता ढूंढता है जिससे वो अपने प्रॉफिट को मैक्सिमाइज करे। और अगर हम सोसाइटी की बात
करें तो सोसाइटी का गोल क्या होता है? तो मैक्सिमाइज इट्स सोशल वेलफेयर। वो अपने सोशल वेलफेयर को मैक्सिमाइज करें।
नेक्स्ट हमारे पास है पॉजिटिव इकोनॉमिक्स एंड नॉर्मेटिव इकोनॉमिक्स। नाउ पॉजिटिव इकोनॉमिक्स किसको कहते हैं? नॉर्मेटिव
इकोनॉमिक्स किसको कहते हैं? जब हम कहते हैं व्हाट इज हैपनिंग इन द इकॉनमी? इकॉनमी में क्या हो रहा है? आज जो है जम्मू
कश्मीर के अंदर 8% अनइंप्लॉयमेंट है। 15% पावर्टी है। जो हम फैक्ट्स बताते हैं। दिस इज पॉजिटिव इकोनॉमिक्स।
लेकिन अगर हम कहेंगे यार अनइंप्लॉयमेंट नहीं होनी चाहिए, गरीबी नहीं होनी चाहिए। यानी हम अपनी ओपिनियंस दे रहे हैं। हमारी
एक सजेशन है। तो जो ये सजेशन है ना इसको कौन स्टडी करता है? नॉर्मेटिव इकोनॉमिक्स। पॉजिटिव इकोनॉमिक्स में फैक्ट होते हैं।
अब जरूरी नहीं कि वो करेक्ट हो या रॉन्ग हो। और सही भी हो सकता है, गलत भी हो सकता है। जैसे मैं कहूंगा जम्मू एंड कश्मीर के
अंदर 21% अनइंप्लॉयमेंट है। हो सकता है यह डाटा सही भी हो, गलत भी हो लेकिन है यह पॉजिटिव इकोनॉमिक्स। लेकिन नॉर्मेटिव
इकोनॉमिक्स में मैं क्या कहूंगा यार अनइंप्लॉयमेंट नहीं होनी चाहिए। अब अनइंप्लॉयमेंट नहीं होनी चाहिए। यह सही है
या गलत है? यह फैक्ट है या गलत है? तो यह इसके लिए आप नहीं बता सकते हो। ठीक है? हां, आप कहोगे कि मैं आपकी स्टेटमेंट से
एग्री नहीं करता हूं। आप उसके उलट कोई और स्टेटमेंट दोगे। यह हो सकता है। यानी मेरी स्टेटमेंट ठीक है, गलत है। आपको अच्छी
लगी, बुरी लगी। इसके बाद इसके बारे में हम बात कर सकते हैं। लेकिन फैक्ट के बारे में यहां पे आप बात नहीं कर सकते हो कि आपकी
जो स्टेटमेंट है वो फक्चुअली गलत है। ना फैक्ट किसके अंदर हम बात करेंगे? वो हम बात करेंगे पॉजिटिव इकोनॉमिक्स की। ठीक
है? यहां पे नो वैल्यू जजमेंट क्योंकि यहां पे फैक्ट है। यस और नो मैंने बोला 8% अनइंप्लॉयमेंट है। हो भी सकती है नहीं भी
हो सकती है। लेकिन यहां पे वैल्यू जजमेंट है। आपकी स्टेट में ठीक है, गलत है। क्या होना चाहिए? हमारी हमारी स्टेट के अंदर ये
ये चीजें होनी चाहिए। ये चीजें नहीं होनी चाहिए। गुड, बैड एंड सो ऑन। ठीक है? नेक्स्ट अब हम कुछ बेसिक कांसेप्ट पढ़ने
वाले हैं जो आगे आपको बहुत ज्यादा काम आएंगे। सबसे पहले गुड्स जरा मुझे बताओ आपने बहुत देखा होगा गुड्स कैरियर जब हम
छोटे थे तो हम सोचते थे इनको अच्छा उठाना वाला कहते हैं। लेकिन ऐसा नहीं होता है। अब गुड्स इकोनॉमिक्स में किसको कहते हैं?
बहुत ही इंपॉर्टेंट डेफिनेशन है। मजेदार डेफिनेशन है। एनीथिंग सेटिसफाई ह्यूमन वांट्स। गुड्स हम सब उन चीजों को कहते हैं
जो ह्यूमन बीइंग की वांट्स को सेटिस्फाई करते हैं। अगर आपके पास कोई ऐसी चीज है जो किसी भी ह्यूमन बीइंग की वांट्स को
सेटिस्फाई नहीं करेगी। उसको आप गुड्स ही नहीं कह सकते हो। ठीक है? इसी तरह से जो गुड्स है ना यह एक ब्रॉडर कांसेप्ट है।
इसके अंदर सर्विज भी आती है। ठीक है? तो गुड्स कैन बी टेंजिएबल। जिस तरह से फूड है, क्लॉथ है, कार है, मशीनरी है
वगैरह-वगैरह एंड इनटेंजिएबल। जैसे सर्विज है, टीचिंग है, मेडिकल केयर एंड सो ऑन। इसी तरह से जो मैंने गुड्स का आपको
कांसेप्ट दिया इसी तरह से भी सर्विज सिर्फ वह सर्विज है वो एक्शंस है वो एक्टिविटीज है जो ह्यूमन बीइंग्स की वांट्स को
सेटिस्फाई करते हैं। आप कोई ऐसी एक्टिविटी करोगे जो किसी भी ह्यूमन बीइंग की वांट को सेटिस्फाई नहीं करेगा उसको हम सर्विस नहीं
कहेंगे। जैसे हेयर कार्ड, बैंकिंग एटसेट्रा। उसके बाद काइंड्स ऑफ गुड। हमारे पास फ्री एंड इकोनमिक गुड्स होते हैं। अब
फ्री गुड्स कौन से होते हैं? जो हमें नेचर ने दिए हैं बिल्कुल फ्री ऑफ कॉस्ट। जैसे सनलाइट है, हवा है, पानी है वगैरह वगैरह।
अब इकोनॉमिक गुड्स कौन से होते हैं? वह गुड्स जो सप्लाई में स्केस होते हैं जो स्केस होती हैं जिनके लिए हमें पैसे खर्च
करने पड़ते हैं। अगर आप उनको खरीदना चाहते हो उनको आप ऑन करना चाहते हो तो आपको पैसे खर्च करने पड़ेंगे। ठीक है?
उसके बाद कंज्यूमर गुड्स एंड कैपिटल गुड्स। नाउ कंज्यूमर गुड्स किनको हम कहते हैं? जो ह्यूमन बीइंग्स की वांट्स को
डायरेक्टली सेटिसफाई करते हैं। जैसे फूड आपके पास है। टीवी है, फर्नीचर है, आपके पास गाड़ी है,
मोबाइल है। तो ये हमारे पास क्या हो गए? कंज्यूमर गुड्स हो गए। फिर कैपिटल गुड्स। कैपिटल गुड्स एक ह्यूमन बीइंग की एक
कंज्यूमर की वांट्स को डायरेक्टली सेटिस्फाई नहीं करते। बल्कि जो कैपिटल गुड्स हैं, यह प्रोड्यूस करते हैं
कंज्यूमर गुड्स। ठीक है? कैपिटल गुड्स को हम प्रोड्यूसर गुड्स भी कहते हैं। जैसे एक मशीन है। अब वो मशीन जो है मोबाइल बना रही
है। वो मशीन जो है कार बना रही है। ठीक है? वो मशीन आपके लिए टीवी बना रही है। ठीक है? या ये मशीन दूसरी मशीन बना रही
है। तो ये हमारे पास क्या हो गया? कैपिटल गुड्स हो गया। फिर हमारे पास है यूटिलिटी। बहुत ही इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है
इकोनॉमिक्स में। यूटिलिटी इज द वांट सेटिसफाइंग पावर ऑफ अ कमोडिटी। एक आपके पास गुड है। उसके अंदर जो एक कैपेसिटी है
ना वांट सेटिस्फाइंग उसी को हम कहते हैं यूटिलिटी। जैसे आपको बहुत ज्यादा भूख लगी है। आपके पास ऑप्शन है। एक तो आपके पास
एप्पल है। दूसरी सिगरेट है। आप सिगरेट बिल्कुल भी नहीं पीते हो। ठीक है? आप मुझे बताओ इन दो चीजों में से आप किसको चूज
करोगे? डेफिनेटली आप एप्पल को चूज करोगे। क्यों? क्योंकि एप्पल के अंदर यूटिलिटी है जो आपकी भूख को मिटा सकती है। यानी यह
आपको अच्छा लगता है। जो यह अच्छा लगना है ना इसी को हम कहते हैं यूटिलिटी। अब सिगरेट आपको अच्छी नहीं लगती है। इसका
मतलब इसके अंदर यूटिलिटी नहीं है। आपकी जो वांट है उसको सेटिस्फाई करे। लेकिन यहां पर दूसरा आदमी है। यह सिगरेट बहुत
ज्यादा पीता है। तो, इसके लिए सिगरेट के अंदर यूटिलिटी है। जैसे आपने देखा होगा रोजों के अंदर जब हम फास्टिंग करते हैं,
तो बहुत सारे ऐसे लोग होते हैं वो कहते हैं हमें खाना मिले या ना मिले लेकिन हमें सिगरेट जरूर मिलनी चाहिए। यानी खाने से
ज्यादा यूटिलिटी क्या है? उनको सिगरेट के अंदर है। ठीक है? तो जब भी आप अब देखोगे कोई आदमी आपसे कहेगा कि मुझे फास्टिंग में
बस सिगरेट मिलनी चाहिए। खाने की मुझे कोई जरूरत नहीं है। तो आप उसको कहोगे अच्छा सिगरेट के अंदर यूटिलिटी आपके लिए ज्यादा
है एज कंपेयर टू फूड। ठीक है? तो ये क्या है? ये एक साइकोलॉजिकल कांसेप्ट है। ठीक है? इसको आप फिजिकली नहीं बता सकते हो। ये
आपके अंदर दिमाग के अंदर एक सोच है कि आपके लिए यूटिलिटी किसके अंदर है। अब एक चीज याद रखना जो यूटिलिटी है ना यह
डिमिनिश होती है। क्या मतलब? अब फॉर एग्जांपल आपके अंदर क्रेविंग बहुत ज्यादा है कि यार मुझे एप्पल बहुत ज्यादा खाने
हैं। ठीक है? आपके पास पांच एप्पल है। जो मजा आपको पहले एप्पल के अंदर आएगा क्या वो आपको लास्ट के एप्पल के
अंदर आएगा? पहले जब खाओगे बहुत मजा आएगा। दूसरा खाओगे थोड़ा सा और मजा आएगा। तीसरा खाओगे थोड़ी सी नफरत अब होने लगेगी।
क्योंकि जितना हम ज्यादा खाएंगे फिर थोड़ा सा नफरत होती जाएगी। यानी जो यूटिलिटी है वह डिमिनिश होती जाएगी।
नेक्स्ट हमारे पास है जब भी हम इकोनॉमिक्स के अंदर कोई भी इकोनॉमिक प्रॉब्लम को स्टडी करते हैं तो हम यूजुअली दो मेथड का
इस्तेमाल करते हैं जिसको हम कहते हैं डिडक्टिव मेथड एंड इंडक्टिव मेथड। अब डिडक्टिव मेथड के अंदर आपको याद रखना है
जनरल टू स्पेसिफिक और इंडक्टिव में आपको याद रखना है स्पेसिफिक टू जनरल। डिडक्टिव मेथड में हम क्या करते हैं? एक जनरल
थ्योरी हम लेते हैं। फिर इसको हम एक स्पेसिफिक केस के ऊपर अप्लाई करते हैं। जैसे जनरल प्रिंसिपल यह है पीपल ट्राई टू
मैक्सिमाइज देयर इनकम। आपने एक जनरल थ्योरी बताई। जो लोग हैं वो चाहते हैं कि हमारी इनकम बढ़े। फिर आपने क्या किया? इसी
थ्योरी को एक स्पेसिफिक केस के ऊपर अप्लाई किया। रमेश वर्क एक्स्ट्रा आवर्स टू अर्न मोर इनकम। जो रमेश है वह एक्स्ट्रा घंटे
काम करते हैं टू अर्न मोर इनकम। यानी यह जो जनरल थ्योरी है यह आपने एक स्पेसिफिक केस के ऊपर अप्लाई की। ठीक है? यहां पर
क्या याद रखा? जनरल टू स्पेसिफिक। यह एक थरेटिकल इकोनॉमिक्स है। अब इंडक्टिव मेथड में क्या होता है? स्पेसिफिक
ऑब्जरवेशन या फैक्ट से एक जनरल थ्योरी डिराइव की जाती है। जैसे आपने एक ऑब्जरवेशन किया रमेश एंड सीता वर्क्स
एक्स्ट्रा आर टू अर्न मोर। अब आपने देखा कि जो रमेश है और सीता है यह कुछ एक्स्ट्रा घंटे काम करते हैं इन आर्डर टू
अर्न मोर इनकम। फिर आपने यहां से एक जनरल थ्योरी निकाली। पीपल वर्क एक्स्ट्रा आउट टू मैक्सिमाइज देयर इनकम। ठीक है? यहां पर
आप स्पेसिफिक से जनरल की तरफ गए और जो इंडक्टिव मेथड है यह एक्सपेरिमेंटेशन पर बिलीव करता है। ऑब्जरवेशन एंड यहां पे
स्टैटिस्टिकल मेथड का इस्तेमाल होता है। जो हमारे पास डिडक्टिव मेथड है यह ज्यादातर थ्यरेटिकल इकोनॉमिक्स है।
नेक्स्ट हम पढ़ने वाले हैं अब माइक्रोइकोनॉमिक्स एंड मैइकोनॉमिक्स। जो दो मेजर ब्रांचेस हैं इकोनॉमिक्स की इसके
बारे में हम पढ़ेंगे। अब माइक्रो जो है ना यह ग्रीक वर्ड है। म्रो से निकला हुआ है जिसका मतलब है स्मॉल। इट स्टडीज इकोनॉमिक
एक्टिविटीज ऑफ एन इकोनॉमिक यूनिट। जो माइक्रोइकोनॉमिक्स है ना यह स्टडी करती है इकोनॉमिक एक्टिविटीज एक इकोनॉमिक यूनिट के
एक छोटे लेवल पर जैसे डिमांड ऑफ एन इंडिविजुअल डिमांड फॉर साल्ट ऑफ एन इंडिविजुअल हो गया डिमांड ऑफ एन हाउसहोल्ड
हो गया या 101 घरों का एक ग्रुप है उनकी डिमांड हो गई तो माइक्रोइकोनॉमिक्स एक छोटे लेवल पर स्टडी करती है एक इकोनॉमिक
यूनिट की अब यहां पे आप सभी के लिए एक क्वेश्चन है आपने बताना है हु इज द फादर ऑफ माइक्रोइकोनॉमिक्स। स्टार्टिंग में
मैंने बोला था अगर आपने ध्यान से देखा होगा तो इस वक्त आप आराम से आंसर कर सकते हो। फटाफट से आंसर करो। उसके बाद
मैइकोनॉमिक्स मैक ये भी ग्रीक वर्ड से आया है। मैक से जिसका मतलब है लार्ज। अब मैक इकोनॉमिक्स
स्टडी करती है जितनी भी हमारी इकोनॉमिक एक्टिविटीज है रिलेटेड टू इकोनमी एज ए होल यानी पूरी इकॉनमी की जैसे इंडियन इकॉनमी
ठीक है वर्ल्ड इकॉनमी ये कौन स्टडी करेगा मैकोनॉमिक्स यहां पे एग्रीगेट डिमांड की बात होती है
यानी टोटल डिमांड ठीक है टोटल सर्विसेस उसके बाद फादर ऑफ मैकोनॉमिक्स जो इकोनॉमिस्ट जॉन माइनर किंग्स है। इसको कहा
जाता है फादर ऑफ मैइकोनॉमिक्स। बिकॉज़ इसी ने मैकइकोनॉमिक्स को स्टार्ट किया एज अ सेपरेट ब्रांच जो उसने बुक लिखी थी 1936
में जनरल थ्यरी ऑफ़ एंप्लॉयमेंट इंटरेस्ट एंड मनी। जिसमें उसने एक्सप्लेन किया अनइंप्लॉयमेंट, नेशनल इनकम एंड गवर्नमेंट
रोल इन इकोनमी। अब यहां पर हम देखेंगे माइक्रो इकोनॉमिक्स एंड मैक इकोनॉमिक्स इकोनॉमिक्स में क्या
डिफरेंस है। इट इज दैट ब्रांच ऑफ इकोनॉमिक्स व्हिच डील विद द इकोनॉमिक डिसीजन। अब यहां पे जो इकोनॉमिक डिसीजन
होते हैं वो एक इंडिविजुअल यूनिट के होते हैं। जैसे मेकिंग ऑफ़ इंडिविजुअल इकोनॉमिक एजेंट हो गया। जैसे प्रोड्यूसर हो गया,
कंज्यूमर हो गया। एक एक इकोनमिक एजेंट की बात हो रही है। यहां पर एग्रीगेट बात हो रही है। टोटल जैसे आउटपुट पूरे कंट्री का
आउटपुट हम देखेंगे। नेशनल इनकम देखेंगे। ठीक है? अब नेशनल इनकम पूरी एक कंट्री की देखेंगे। ओवरऑल एग्रीगेट टोटल सेविंग टोटल
इन्वेस्टमेंट की बात करेंगे। ठीक हो गया? इट टेक्स इनू अकाउंट स्माल कंपोनेंट्स। यहां पे स्माल कंपोनेंट्स की बात होती है।
यहां पे कंट्री एज ए होल होता है। ठीक है? इट डील विद द प्रोसेस ऑफ प्राइस डिटरमिनेशन। यहां पर हम बात करते हैं
प्राइस डिटरमाइन करते हैं। इन केस ऑफ इंडिविजुअल फैक्टर्स फैक्टर्स ऑफ प्रोडक्शन जो हमारे पास है। यहां पे हम
जनरल प्राइस लेवल देखते हैं। ठीक है? पूरी इकॉनमी के अंदर जनरल प्राइस लेवल क्या है? इनफ्लेशन कैसा है? ठीक है? इसको हम प्राइस
थ्योरी भी कहते हैं। और इसको हम मैकोनॉमिक्स इज आल्सो नोन एस इनकम थ्योरी। कभी कबभार एग्जामिनेशन में पूछा जाता है
जो माइक्रोइकोनॉमिक्स है यह देखती है ऑप्टिमाइजेशन गोल ऑफ इंडिविजुअल कंज्यूमर एंड प्रोड्यूसर यानी जो इंडिविजुअल का
ऑप्टिमाइजेशन गोल है क्या है इंडिविजुअल कंज्यूमर का ऑप्टिमाइजेशन गोल उसका ऑप्टिमाइजेशन गोल है अपनी सेटिस्फेक्शन को
मैक्सिमाइज करना इसी तरह से हमारे पास जो प्रोड्यूसर है इसका मैक्सिमम जो मैक्सिमाइजेशन इसका गोल क्या है वो है
प्रॉफिट को मैक्सिमाइज करना लेकिन लेकिन यहां पे देखा जाता है ऑप्टिमाइजेशन गोल ऑफ एंटायर इकॉनमी पूरी इकॉनमी पूरी कंट्री की
यहां पे बात होती है। नेक्स्ट अब हम देखेंगे इकोनमी किसको कहते हैं? व्हाट इज एन इकॉनमी? इकोनमी मीन्स अ
सिस्टम वेयर पीपल अर्न एंड स्पेंड मनी टू सेटिस्फाई देयर नीड्स एंड व्स। जो इकॉनमी है ना यह एक सिस्टम है। इस सिस्टम के अंदर
प्रोडक्शन होती है, कंजशन होती है, डिस्ट्रीब्यूशन होती है। यानी यहां पर लोग अर्न करते हैं। फिर उसी अर्निंग को स्पेंड
करते हैं। क्यों? टू सेटिस्फाई देर नीड्स एंड वांट्स। ठीक है? जैसे फार्मर ग्रोस क्रॉप, शॉपकीपर सेल्स, पीपल बाय। यह सारी
हमारे पास क्या है? ये एक इकॉनमी है। अब हमारे पास इकॉनमी सिंपल भी हो सकती है, कॉम्प्लेक्स भी हो सकती है। अब सिंपल
इकॉनमी में क्या होता है? वहां पे थोड़े से लोग होते हैं। फेवर एक्टिविटीज होती है। जो इकोनॉमिक एक्टिविटीज है वो थोड़ी
सी होती है। कॉम्प्लेक्स में बहुत ज्यादा पापुलेशन बहुत ज्यादा इकोनमिक एक्टिविटीज होती है। यहां पे मेनली बेसिक फूड्स
प्रोड्यूस किए जाते हैं। जैसे खाना हो गया, कपड़े हो गए। ठीक है? लेकिन कॉम्प्लेक्स इकॉनमी में मेनी टाइप्स ऑफ
गुड्स एंड सर्विज बहुत ज्यादा यहां क्योंकि यहां पर टेक्नोलॉजी हमारे पास है। एडवांस टेक्नोलॉजी है। नईनई चीजें बनती
है। यहां पे हमारे पास ट्रेडिशनल्स मेथड है। बेसिक चीजें होती है। बस सिंपल इकॉनमी में बर्ट सिस्टम का भी
इस्तेमाल होता है। अब बर्ट सिस्टम क्या होता है? पहले जमाने में और आज में आज भी बहुत सारे गांव के अंदर क्या होता है?
गुड्स वर एक्सचेंज फॉर गुड्स। जैसे आपने इनको साल्ट दिया। इन्होंने आपको हल्दी दी। आपने इनको राइस दिया। इन्होंने आपको वीट
दिया। यानी गुड्स के बदले में गुड्स। अभी भी गांव में बहुत सारे बहुत जगह ये होता है। इसको हम कहते हैं बर्ट सिस्टम। लेकिन
कॉम्प्लेक्स इकॉनमी में मनी है, बैंकिंग है। यहां पर सब चीजें एडवांस लेवल पर है। यहां पर लिमिटेड रोल है, लिमिटेड ट्रेड
है। यहां पे नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पे यहां पे ट्रेड होता है। अब जो सिंपल इकॉनमी है, यह मोस्टली सेल्फ डिपेंडेंट
होती है। यह अपने ऊपर डिपेंड है। जैसे पहले जमाने में अगर आप देखोगे तो ज्यादातर लोग चीजें नहीं खरीदते थे। वो खुद ही
प्रोड्यूस करते थे। अपना खेत होता था सिर्फ जैसे नमक है या हल्दी है कुछ चीजें वह बाहर से लाते थे ज्यादातर वह खुद ही
प्रोड्यूस करते थे लेकिन यहां पे हायर इंटरडिपेंडेंसी है जब इंटरनेशनल ट्रेड होगा बाहर की जो हमारे पास बाहर मुल्कों
के साथ हम ट्रेड करेंगे हम उनके ऊपर डिपेंडेंट होंगे कोई किसी कंट्री में ऑयल निकलता है हम उसके ऊपर डिपेंड होगा किसी
कंट्री में किसी और चीज की ज्यादा प्रोडक्शन होती है उसके ऊपर हम डिपेंड होंगे ये हमारे पास सिंपल इकॉनमी दिस इज़
विलेज इकॉनमी और ये हो गई इंडियन इकॉनमी, यूएस इकॉनमी, चाइना की इकॉनमी और बहुत सारी इकॉनमीज़।
नेक्स्ट अब हम पढ़ेंगे टाइप्स ऑफ इकॉनमीज़। हमारे पास जनरली थ्री टाइप्स ऑफ इकॉनमीज़ होती है। कंट्रोलोल्ड आर सेंट्रली प्लंड
इकॉनमी हो गई। फ्री इकॉनमी, मार्केट इकॉनमी। इसी को हम कहते हैं लेस फेयर इकॉनमी और मिक्स्ड इकॉनमी। ठीक है? अब
कंट्रोलोल्ड इकॉनमी में क्या होता है? दी आर द इॉनमी वेयर द इकोनमिक एक्टिविटीज आर फर्मली कंट्रोल बाय द गवर्नमेंट। जो
कंट्रोलोल्ड इकॉनमी है या सेंट्रली प्लंड इकॉनमी है यहां पे जितनी भी इकोनॉमिक एक्टिविटीज होती है ना इसको कौन कंट्रोल
करता है? गवर्नमेंट। यानी प्रोडक्शन आपको कितनी करनी है? कंजमशन कैसे होनी चाहिए? इन्वेस्टमेंट कैसे होनी चाहिए? एक्सचेंज
कैसा होना चाहिए? इस सब के ऊपर किसकी अथॉरिटी है? सेंटर की अथॉरिटी है। गवर्नमेंट की अथॉरिटी है। अब फ्री इकॉनमी
में क्या है? यहां पे सब कुछ प्राइवेट है। दीज़ आर द इकॉनमीज़ वेयर द इकोनमिक एक्टिविटीज आर कंट्रोलोल्ड बाय द मार्केट
फोर्सेस। यहां पे मार्केट पे डिपेंड करता है। मार्केट फोर्सेस क्या है? डिमांड एंड सप्लाई। जिस चीज की डिमांड होगी वो
प्रोडक्शन करेंगे। यहां पर प्रॉफिट मैक्सिमाइजेशन है। यहां पर किसी का कंट्रोल नहीं है। यहां पर फ्री
हैंड है। इंडिविजुअल को जो मर्जी आएगी प्रोड्यूस करेगा। जो मर्जी आएगा कंज्यूम करेगा। जितनी मर्जी है इन्वेस्टमेंट
करेगा। सब कुछ अपनी मर्जी है। अब मिक्स्ड इकॉनमी में क्या है? दीज़ आर द इकॉनमीज़ वेयर इकोनॉमिक एक्टिविटीज आर गवर्न बाय द
फ्री प्ले ऑफ़ मार्केट फोर्सर्सेस बट रेगुलेटेड बाय द गवर्नमेंट। नेक्स्ट इकॉनमी में इन दोनों के फीचर्स मिलते हैं।
यहां पर मार्केट फर्सेस भी है, डिमांड सप्लाई भी है। लेकिन गवर्नमेंट यहां पर रेगुलेशन करती है। ऐसा नहीं कि कंपनी को
जो मर्जी आएगी प्राइस रखेगी। नहीं बल्कि गवर्नमेंट उसको रेगुलेट करेगी। इकोनमिक डिसीजन आर ड्रिवन बाय द मोटिव ऑफ़
सोशल वेलफेयर। अब यहां पे क्या है? सेंट्रली प्लंड इकॉनमी में। यहां पे जो भी चीजें होती हैं, जो भी इकोनॉमिक
एक्टिविटीज होती हैं, उन सब के पीछे एक ही चीज है, वह है सोशल वेलफेयर। सोसाइटी का वेलफेयर कैसे हो? फ्री में फ्री मार्केट
इकॉनमी में एक ही कांसेप्ट है वो है प्रॉफिट मैक्सिमाइजेशन। हमारा प्रॉफिट कैसे मैक्सिमाइज होगा? हम वो गुड्स
प्रोड्यूस करेंगे जिससे हमें प्रॉफिट मिलेगा। ठीक है? अब मिक्स्ड इकॉनमी में प्रॉफिट
मैक्सिमाइजेशन भी है, सोशल वेलफेयर भी है। उसके बाद जो हमारे पास सेंट्रली प्लंड इकॉनमी है यहां पे कंज्यूमर हो या
प्रोड्यूसर हो वो सोवरन नहीं है। उसके पास फुल पावर नहीं है। वो गवर्नमेंट डिसाइड करेगी सब कुछ। यहां पर फुल पावर है, फुल
सोनिटी है। अब मिक्स्ड इकॉनमी में सोवनिटी तो है लेकिन जो पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम है वो यह एनश्योर करता है कि जो
एसेंशियल आइटम है वो कंज्यूमर तक पहुंचे। वहां पे कोई ज्यादा हाई प्राइस ना हो। उसको रेगुलेट कौन करता है? गवर्नमेंट करता
है। इसी तरह से नेक्स्ट हमारे पास है मोस्ट रिसोर्सेज आर ओनड एंड कंट्रोल बाय द
गवर्नमेंट। यहां पे क्या है? ज्यादातर जो रिसोर्सेज है उसको कौन कंट्रोल करता है? गवर्नमेंट करती है। यहां पर ज्यादातर
प्राइवेट इंडिविजुअल इसको कंट्रोल करते हैं। ठीक है? रिसोर्सेज आर कंट्रोलोल्ड बाय बोथ गवर्नमेंट एंड इंडिविजुअल। जैसे
अगर आप इंडिया के अंदर देखोगे तो मिक्स्ड इकॉनमी में है। यहां पे कुछ रिसोर्सेज गवर्नमेंट के हैं। कुछ रिसोर्सेज प्राइवेट
इंडिविजुअल के हैं। ठीक है? अगर आप चाइना के अंदर देखोगे, रशिया के अंदर देखोगे। हालांकि अब वहां पर भी थोड़ा सा मिक्स्ड
इकॉनमी का कांसेप्ट है। लेकिन ओवरऑल जो इनकी आईडियोलॉजी थी पहले वहां पर क्या था? सारी चीजें किसकी थी? गवर्नमेंट की थी।
ठीक है? और फ्री मार्केट इकॉनमी जैसे यूएस के अंदर है वहां पे क्या है? सिर्फ प्राइवेटाइजेशन का कांसेप्ट है। यहां पे
जो प्राइवेट सेक्टर है वो डोमिनेंट है। यहां पे पब्लिक सेक्टर यानी गवर्नमेंट सेक्टर डोमिनेंट है। ठीक है? और यहां पे
जो मिक्स्ड इकॉनमी है वहां पे प्राइवेट एंड पब्लिक सेक्टर दोनों डोमिनेंट है। आज का लेक्चर हम यहीं पर खत्म करते हैं।
एक बार फिर से आपको मैं रिक्वेस्ट करता हूं इस वीडियो को आप लाइक भी आपने करना है, शेयर भी करना है और कमेंट करके मुझे
बताना है आपको कितनी समझ आई? आपके कांसेप्ट्स क्लियर हुए या नहीं हुए। बाकी यहां से आगे हम नेक्स्ट लेक्चर में
कंटिन्यू करेंगे।
आर्थिक समस्या का मूल कारण अभाव और चयन है, जहाँ सीमित साधनों के साथ असीमित आवश्यकताओं को पूरा करना होता है। इसके तीन मूल प्रश्न हैं: क्या उत्पादन करें, कैसे उत्पादन करें, और किसके लिए उत्पादन करें।
अर्थशास्त्र प्राचीन ग्रीक शब्द 'ओइकोस' (घर) और 'नेमिन' (प्रबंधन) से बना है। एडम स्मिथ ने इसे धन का विज्ञान बताया, अल्फ्रेड मार्शल ने मानव कल्याण, लायनल रॉबिंस ने अभाव और चयन तथा पॉल सैमुअलसन ने संसाधनों के विकास और वितरण के रूप में परिभाषित किया।
एडम स्मिथ को अर्थशास्त्र और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का जनक माना जाता है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'An Inquiry into the Nature and Causes of the Wealth of Nations' (1776) में श्रम विभाजन, अदृश्य हाथ और मुक्त बाज़ार की अवधारणाएँ दी गई हैं।
सकारात्मक अर्थशास्त्र 'क्या है' (What is) का अध्ययन करता है और तथ्यों तथा कारण-प्रभाव संबंधों पर आधारित होता है, जैसे 'बेरोज़गारी 8% है'। वहीं, मानक अर्थशास्त्र 'क्या होना चाहिए' (What ought to be) पर ध्यान देता है और मूल्य निर्णयों पर आधारित होता है, जैसे 'बेरोज़गारी कम होनी चाहिए'।
वस्तुएँ मूर्त (जैसे भोजन) या अमूर्त होती हैं जो मानवीय आवश्यकता को संतुष्ट करती हैं, जबकि सेवाएँ (जैसे बैंकिंग) अमूर्त क्रियाएँ हैं। उपयोगिता किसी वस्तु में आवश्यकता संतुष्ट करने की शक्ति है, और क्रमिक ह्रास नियम के अनुसार जैसे-जैसे हम किसी वस्तु का अधिक उपभोग करते हैं, उसकी अतिरिक्त इकाई से मिलने वाली संतुष्टि घटती जाती है।
सूक्ष्मअर्थशास्त्र व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों (जैसे उपभोक्ता या फर्म) और कीमत निर्धारण का अध्ययन करता है, जबकि समष्टिअर्थशास्त्र संपूर्ण अर्थव्यवस्था (जैसे राष्ट्रीय आय, बेरोज़गारी) पर ध्यान देता है। सूक्ष्मअर्थशास्त्र को 'मूल्य सिद्धांत' और समष्टिअर्थशास्त्र को 'आय सिद्धांत' भी कहा जाता है।
मिश्रित अर्थव्यवस्था में मुक्त बाज़ार शक्तियों और सरकारी नियमन दोनों का मिश्रण होता है, जिसका उद्देश्य लाभ अधिकतमीकरण और सामाजिक कल्याण दोनों होता है। इसमें संसाधनों पर सरकार और निजी क्षेत्र दोनों का स्वामित्व होता है, और भारत इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
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