श्री कृष्ण बनाम भगवान बुद्ध: दो मार्ग, एक मंजिल | रथ का दर्शन
दो गुरु, दो उत्तर, एक समस्या
- अर्जुन का प्रश्न युद्ध में मरने वाले को स्वर्ग मिलता है या नहीं?
- श्री कृष्ण का उत्तर: हाँ, मरने पर स्वर्ग, जीतने पर पृथ्वी का सुख, युद्ध करो।
- भगवान बुद्ध का उत्तर: युद्ध में मारने की भावना रखने वाला स्वर्ग नहीं, नरक जाता है।
- योद्धा जीव का शोक: वर्षों के भ्रम पर रोना, उत्तर पर नहीं।
समस्या: अगर दोनों पूज्य हैं तो हम किसके मार्ग पर चलें?
रथ का दर्शन: श्री कृष्ण बनाम बुद्ध
रथ के पीछे कौन है?
| पहलू | श्री कृष्ण | भगवान बुद्ध | |------|-----------|-------------| | मैं कौन हूँ? | शाश्वत आत्मा जो कभी नहीं बदलती | पाँच स्कंधों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) का क्षणिक संयोग | | रथ में स्वामी | पीछे बैठा है, दृष्टा मात्र | कोई नहीं बैठा, केवल पुर्जों का असेंबल | | बदलाव पर दृष्टि | आत्मा बदलाव को देखती है, खुद नहीं बदलती | मैं हर क्षण बदलता हूँ, "एक ही जलेबी दो बार नहीं खाई जा सकती" |
व्यावहारिक उदाहरण: परीक्षा में असफलता
- श्री कृष्ण का दृष्टिकोण: "हार मन और शरीर की है, आत्मा तो दृष्टा मात्र है। तुम हारे नहीं, इसलिए दुख कैसा?"
- बुद्ध का दृष्टिकोण: "जो हार हुई वह पल भर में बदल चुकी। न तुम स्थायी हो, न तुम्हारी असफलता। स्थायी मानकर पकड़ना ही दुख है।"
मृत्यु और पुनर्जन्म
रथ टूटने पर क्या होता है?
| श्री कृष्ण | भगवान बुद्ध | |-----------|-------------| | आत्मा नए रथ (शरीर) में चली जाती है, पुनर्जन्म | कोई नहीं जाता; तृष्णा (बने रहने की चाह) ही नया रथ रच देती है | | उदाहरण: कर्म और संस्कारों के आधार पर नया जन्म | उदाहरण: एक दीपक से दूसरा दीपक जलाना, पहली लौ नहीं जाती, फिर भी नई लौ जलती है |
धर्म और दुख का स्थान
- श्री कृष्ण: धर्म सर्वोपरि। सुख-दुख द्वितीयक हैं। अर्जुन को युद्ध करना ही धर्म है, चाहे कितना दुख हो।
- बुद्ध: दुख मुख्य विषय है। धर्म भी दुख के अंत के लिए है। युद्ध किसी प्राणी को दुख देता है, इसलिए अहिंसा।
दोनों के लक्ष्य एक हैं: नए रथ का न बनना।
- श्री कृष्ण: निष्काम कर्म से मुक्ति
- बुद्ध: तृष्णा त्याग से निर्वाण
सृष्टि का आरंभ
- श्री कृष्ण: "यह जगत मुझसे जन्मा है, मैं अजन्मा, अनादि हूँ।"
- बुद्ध: "सृष्टि कारणों की श्रृंखला है, कोई रचयिता नहीं। पहला सिरा नहीं दिखता, जैसे तीर लगे पर पूछे कि किसने मारा? अभी उपचार करो।"
निष्कर्ष: दो मार्ग, एक मंजिल
दोनों का संदेश: खेल को मत पकड़ो, क्योंकि वह बदलता है। पकड़ने की कोशिश ही दुख है।
- श्री कृष्ण: "उद्धरेत् आत्मनात्मानम्", अपना उद्धार स्वयं करो; तुममें शक्ति है।
- बुद्ध: "अत्ता हि अत्तनो नाथो", मनुष्य ही अपना सहारा है।
अंतिम निर्णय: रथ तुम्हारा है, घोड़े तुम्हारे, लगाम तुम्हारे हाथ में। जैसा श्री कृष्ण ने कहा, यथेच्छ तथा कुरु (जैसा चाहे वैसा कर)।
आपका मार्ग कौन सा?
- श्री कृष्ण का मार्ग: निष्काम कर्म, धर्म पालन, आत्मा की शाश्वतता
- बुद्ध का मार्ग: तृष्णा त्याग, अहिंसा, क्षणभंगुरता का बोध
दोनों ही दुखों के पार ले जाते हैं। मंजिल एक है, मार्ग भिन्न।
अधिक जानकारी के लिए, बुद्ध और उनका दर्शन: जीवन कथा, नवयान और ऐतिहासिक संदर्भ (भाग 1) देखें।
कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन के हाथ से गांडीव फिसल रहा था तो आपको याद है कि श्री कृष्ण जी ने क्या कहा था। हतो
वासीसी स्वर्गम जीत्वा वा भोक्षस महिम मारे जाओगे तो स्वर्ग जाओगे और कहीं जीत गए तो इस पृथ्वी पर रहकर सुख का भोग
करोगे। इसलिए उठो और लड़ो। अब शायद आपको यह बात ना मालूम हो कि अर्जुन के बाद एक और योद्धा हुआ जिसका नाम था योद्धा जीव और
योद्धा जीव ने इस बात को भगवान बुद्ध से कंफर्म किया। उसने भगवान बुद्ध से पूछा कि हमारी परंपरा में कहा जाता है कि जो
योद्धा युद्ध में लड़ते हुए मरता है उसे स्वर्ग मिलता है। क्या यह बात सही है? इस पर भगवान बुद्ध चुप रहते हैं। और योद्धा
जीव जब फिर से पूछता है तो भगवान बुद्ध कहते हैं कि युद्ध में लड़ने वाला योद्धा उसने पहले से ही मन बना लिया है कि उसके
सामने के सारे प्राणी मारे जाएं। ऐसा योद्धा स्वर्ग नहीं नरक जाता है। योद्धा जीव रो पड़ता है। उत्तर पर नहीं इस बात पर
कि वह इतने वर्षों तक भ्रम में जिया। अब आप देखिए कि दो योद्धा हैं। एक समस्या है लेकिन दोनों के गुरुओं के जो उत्तर हैं वो
अलग-अलग हैं। अब आप अपने घर में वापस आ जाइए। आपके घर के पूजा घर में भगवत गीता रखी है। वहीं ड्राइंग टेबल पर भगवान बुद्ध
रखे हैं। दोनों दिव्या आत्माओं को करोड़ों लोग पूजते हैं। लेकिन अगर दोनों के दिखाए हुए मार्ग इतने विपरीत हैं तो हम किस
मार्ग पर चलें? तो साथियों आज की क्वेस्ट में हम इसी प्रश्न की हाइपर पड़ताल करेंगे। तो आप सभी हाइपर क्वेस्ट को
सब्सक्राइब कर लीजिए। अब बिना किसी विलंब के आज की क्वेस्ट को प्रारंभ करते हैं। अब साथियों अगर आप श्री कृष्ण जी को और
भगवान बुद्ध को देखें तो दोनों को सारथी कहा गया है। भगवान श्री कृष्ण जी पार्थ सारथी हैं क्योंकि वो अर्जुन के रथ के
सारथी थे। वहीं अगर आप बौद्ध परंपरा में जाएं भगवान बुद्ध को अनुत्तरोपुरी सदंब सारथी कहा गया है। यानी एक ऐसा अद्वितीय
सारथी जो समस्त मानव मात्र का मार्गदर्शन करता है। अब साथियों ये जो रथ और सारथी की तस्वीर है ये जो एनालॉजी है इस एनालॉजी का
उपयोग भारतीय ज्ञान परंपरा में बहुत प्राचीन काल से हो रहा है आध्यात्म को समझाने के लिए। जैसे अगर आप वैदिक परंपरा
की बात करें श्री कृष्ण जी की परंपरा की तो वहां पर कठोपनिषद में बहुत अच्छे से आपको समझ में आ जाए कि जीवन क्या है? एक
रथ का उदाहरण लिया गया है जिसमें बताया गया है कि जो रथ के घोड़े हैं वो आपके शरीर की इंद्रियां हैं। जो उसकी लगाम है
वो आपका मन है और वो लगाम जिसके हाथ में है यानी सारथी वो बुद्धि है और जो उस रथ में बैठा हुआ पीछे स्वामी है वो आपकी
आत्मा है और फिर जो पूरे रथ है जो पुरजे हैं वो आपके शरीर को दिखाते हैं। इस एनालॉजी के माध्यम से हमें जीवन के बारे
में समझ में आता है और इसी रथ की एनालॉजी को ना केवल वैदिक परंपरा में बल्कि बौद्ध परंपरा में भी उपयोग में लाया गया है।
लेकिन अब चूंकि श्री कृष्ण जी का दर्शन और भगवान बुद्ध के दर्शन में कुछ भेद हैं इसलिए दोनों के जो रथ हैं वो अलग-अलग तरह
से काम करते हैं। आइए इन रथों के माध्यम से ही हम अपने प्रश्नों के उत्तर जानते हैं जिससे हमें समझ में आए कि हमारे जीवन
को लेकर श्री कृष्ण जी भगवान बुद्ध अपनी-अपनी जगह पर क्या कह रहे हैं और पहला सवाल सबसे सीधा है कि इस रथ के पीछे बैठा
कौन है। अब साथियों कभी आप अपने फोन में अपने बचपन की फोटो देखिए। आप देखेंगे कि आपका चेहरा,
आपका कद, आपकी पसंद सब कुछ बदल गई है। लेकिन फिर भी आप उस फोटो को देखकर कहते हैं यह मैं हूं। तो पहला ही प्रश्न उठता
है कि मैं है क्या? और यहां पर श्री कृष्ण जी का साफ उत्तर है कि जो मैं है वो आत्मा है जो कभी नहीं बदलती। बदलता तो शरीर है,
छोटा रहता है, बड़ा होता है, जवान होता है, बूढ़ा होता है। लेकिन इन सब बदलाव में जो एक चीज नहीं बदलती, जो बिना बदले हुए
केवल इस बदलाव को दिखती रहती है वो आत्मा है। और श्री कृष्ण जी कहते हैं कि रथ में जो पीछे बैठा स्वामी है वो यही आत्मा है।
यानी रथ की एनालॉजी में जो पीछे बैठा हुआ व्यक्ति है वो आपका मैं है। जो ना कभी मरता है ना कभी जन्म लेता है और अगर रथ
टूट भी गया तो जाकर दूसरे रथ पर बैठ जाता है। पर वहीं पर अगर आप भगवान बुद्ध के रथ को देखेंगे तो उनके रथ में पीछे कोई नहीं
बैठा है क्योंकि भगवान बुद्ध के दर्शन में आत्मा नहीं होती और ये जो आपको मैं का आभास हो रहा है कि यह मैं बदल नहीं रहा है
तो भगवान बुद्ध कहते हैं कि इस मैं को और गहराई में देखेंगे तो यह मैं पांच अलग-अलग चीजों के कॉम्बिनेशन से बना हुआ है और ये
पांच अलग-अलग चीजें हमेशा प्रतिक्षण बदलती रहती हैं। यदि आप शीशे के सामने खड़े होकर अपने आप को देखें तो मैं आपको आपका शरीर,
आपकी बुद्धि, आपका मन, मन में उठने वाले संस्कार और आपका अहंकार दिखेगा और यह सब मिलकर परिणाम स्वरूप आपका मैं बनाते हैं।
मैं कोई इकलौती चीज नहीं है और चूंकि हर चीज बदल रही है तो मैं भी समय के साथ बदल जा रहा है। इसीलिए भगवान बुद्ध कहते हैं
कि आप एक काम दो बार नहीं कर सकते। एक ही जलेबी को दो बार नहीं खाया जा सकता। जब आप दूसरी बार खाएंगे तो आपको स्वाद में, आपको
उसकी अनुभूति में, आपको उसके टेक्सचर में कुछ ना कुछ बदलाव जरूर दिखेगा। हर क्षण चीजें बदल जा रही हैं। इसके साथ भगवान
बुद्ध के अनुसार इन पांच चीजों में कोई भी एक चीज नहीं है जिस पर आप कह सकते हो कि मेरा कंट्रोल है। शरीर अपने आप बदल रहा
है। आप शरीर पर कंट्रोल नहीं कर सकते। आपके मन में उठने वाले विचार, अनुभूति आपके कहने से समाप्त नहीं हो जाती। आप
कितनी भी कोशिश कर लो, आप अपनी सिचुएशन को पकड़ कर नहीं रख सकते। इसलिए कोई भी ऐसी चीज नहीं है जिसको आप देखकर कह दें कि यह
मैं हूं। मैं तो बहुत ढेर सारी चीजों का एक परिणाम मात्र है। तो अगर आप वापस भगवान बुद्ध के रथ में जाएं और मैं को समझने का
प्रयास करें तो भल के रथ में कोई बैठा नहीं है। लेकिन वहां पर मैं क्या है? वो रथ के जो अलग-अलग पार्ट हैं उनका आपस में
आकर असेंबल हो जाना ही मैं को दिखाता है। तो जहां श्री कृष्ण जी के रथ में मैं पीछे बैठा हुआ स्वामी है बुद्ध जी के रथ में वो
जो अलग-अलग पुरजे साथ में आ गए हैं वो मैं बनाते हैं। लेकिन इस ज्ञान से हमें क्या फायदा? तो आइए इसको एक सिनेरियो से समझते
हैं। मान लीजिए कि आप किसी चीज में किसी एग्जाम में फेल हो जाते हैं और आप सोचने लगते हैं कि मैं तो फेलियर हूं। मैं नाकाम
हूं। तो यहां पर भगवान श्री कृष्ण जी आपको कैसे गाइड करेंगे और भगवान बुद्ध जी कैसे गाइड करेंगे इससे ये चीज समझ में आएगी।
भगवान श्री कृष्ण जी कहेंगे कि ये जो फेलियर है ये जो नाकामयाबी है ये बदलने वाले हिस्से की है। यह मन की है। बुद्धि
की आपके शरीर की है। लेकिन आप तो आत्मा है। दृष्टा मात्र है। तो आपने केवल हार को होते हुए देखा है। आप नहीं हारे हैं। तो
जब आप नहीं हारे हैं। आत्मा नहीं हारी है तो दुख किस बात का? और अगर यही समस्या आप भगवान बुद्ध के पास ले जाएंगे तो भगवान
बुद्ध कहेंगे कि जो तुम हारे हो जो नाकामयाब तुम हो वो ऑलरेडी बदल चुका है। तुम्हारी हार तो एक क्षण में हुई थी उस
क्षण के बीतते ही अगले क्षण में तुम कुछ और हो गए क्योंकि प्रतििक्षण तुम बदल जा रहे हो। तो ना तो आप और ना आपकी फेलियर
परमानेंट है और जो परमानेंट नहीं है उसी को परमानेंट मानकर उसी को अपना मानकर पकड़े रहना ही दुख है। तो देखिए समस्या एक
ही है लेकिन दोनों गुरुओं के पास उस समस्या से बाहर निकालने का दर्शन अलग है। साथियों इससे पहले कि हम वीडियो में आगे
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अगर हमें मृत्यु को समझना है यानी जब रथ टूट जाता है तो क्या होता है? आइए समझते हैं। तो साथियों अगर रथ टूट जाए यानी
मृत्यु हो जाए तो हमने देखा कि श्री कृष्ण जी के रथ पर एक स्वामी बैठा है। वो रथ के टूटते ही दूसरे रथ पर आरूढ़ हो जाता है।
यानी जो आप हैं आपकी आत्मा है वो एक नए शरीर के साथ एक नए जन्म का अनुभव करने लगती है और इसे ही हम पुनर्जन्म कहते हैं।
अब भगवान बुद्ध के रथ पर कोई नहीं बैठा है। लेकिन भगवान बुद्ध तब भी पुनर्जन्म को मानते हैं। लेकिन कैसे? भगवान बुद्ध का रथ
टूट गया तो नए रथ पर कौन जाएगा? तो यहां पर भगवान बुद्ध कहते हैं कि किसी के जाने की आवश्यकता नहीं है। अगर हमें इस बात को
समझना है तो हमें समझना होगा कि यह पहला रथ ही क्यों बना था और जिस कारण से इस पहले रथ के पुरजे साथ में आए थे अगर वो
कारण विद्यमान है तो नए पुरजे भी साथ में आकर नया रथ बना सकते हैं। यानी जब तक ये कारण है तो एक क्या सैकड़ों रथ बन सकते
हैं और इस कारण को वो तृष्णा कहते थे। यानी बने रहने की चाह। इसे आसानी से समझाने के लिए हमें बौद्ध परंपरा में एक
एनालॉजी मिलती है। एक दीपक से दूसरे दीपक को जलाने की। जब आप एक दीपक से दूसरे दीपक को जलाते हैं तो पहले दीपक की जो लौ है वो
दूसरे दीपक में नहीं चली जाती फिर भी एक दीपक दूसरे दीपक को जला देता है। ठीक इसी तरह से पहले जीवन से दूसरा जीवन उत्पन्न
हो जाता है। जबकि पहले जीवन से दूसरे जीवन में कुछ भी नहीं जाता। यानी भगवान बुद्ध कह रहे हैं कि जो पहले जीवन को रचने वाली
आपकी तृष्णा है वही आपके दूसरे जीवन को भी रच देती है। अब चूकि भगवान श्री कृष्ण और भगवान बुद्ध दोनों ही पुनर्जन्म मानते हैं
तो यह प्रश्न उठता है कि जब हमें नया रथ मिलने ही वाला है। जब नया जीवन मिलने ही वाला है तो इस जीवन में इतना धर्म कर्म
क्यों करना? तो साथियों जब हमें नया रथ मिलना ही है तो हम कुछ भी करें। हमें धर्म से चलने की
क्या जरूरत है? लेकिन यहां पर हमें एक बात ध्यान देनी होगी। श्री कृष्ण जी के अनुसार जब आप किसी रथ पर होते हैं यानी किसी जीवन
में होते हैं तो उसमें आप जो भी विचार करते हैं जो भी कर्म करते हैं जहां-जहां आप जाते हैं तो आपकी मन और बुद्धि उसका
नोट्स बनाती रहती है जिसे संस्कार कहते हैं और इन संस्कारों के ही आधार पर जब आपका यह वाला रथ टूटता है तो आपको नया रथ
मिलता है। अब ये संस्कार अच्छे हैं तो आपको उससे भी अच्छा रथ मिलेगा और अगर यह संस्कार अच्छे नहीं है तो आपको उससे खराब
रथ मिलेगा। लेकिन यहां पर श्री कृष्ण जी इसके आगे भी जाते हैं। वो यह कहते हैं कि ब्रह्मलोक तक मोक्ष तक जितने भी रथ आपको
मिलेंगे चाहे वो कितने भी सुंदर क्यों ना हो, चाहे वो कितने भी अच्छे क्यों ना हो वो टूटते जरूर हैं। कोई भी रथ टिकता नहीं
है। तो असली लक्ष्य क्या होना चाहिए? असली लक्ष्य अच्छा रथ पाना नहीं है बल्कि अच्छे रथों के माध्यम से उस जगह पर पहुंच जाना
है जहां पर आपको नए रथ की जरूरत ही ना हो। अब यहां पर अगर आप बुद्ध जी से पूछेंगे तो वो ये कहेंगे कि कोई भी रथ अपने आप में
अच्छा नहीं होता और ना ही आपको अच्छे रथों के माध्यम से किसी जगह पर पहुंचना है। हर रथ में समस्या है क्योंकि हर रथ तृष्णा से
बना है और अगर इस तृष्णा को हम समाप्त कर दें तो इसी जीवन में इसी रथ पर हम मुक्त हो जाएंगे। तो भले श्री कृष्ण जी का और
बुद्ध जी का दर्शन अलग-अलग है लेकिन दोनों का जो गोल है जो लक्ष्य है वो एक ही है कि नए रथ का नहीं बनना। श्री कृष्ण आपको
निष्काम कर्म के माध्यम से वहां पहुंचा रहे हैं और बुद्ध आपको तृष्णा का त्याग करवा के अब श्री कृष्ण निष्काम कर्म को
क्यों बोल रहे हैं? क्योंकि श्री कृष्ण यह कह रहे हैं कि जब तक रथ है जब तक जीवन है आप कर्म से नहीं बच सकते और अगर कर्म है
तो सुख-दुख आते ही रहेंगे। लेकिन श्री कृष्ण जी के लिए यह सुख-दुख सेकेंडरी है। उनके लिए टॉप प्रायोरिटी है धर्म। वो कहते
हैं कि सुख और दुख नहीं डिसाइड करेंगे कि जीवन जीना कैसे है। जीवन जीने का पैमाना यह नहीं होगा। जीवन जीने का पैमाना धर्म
होगा क्योंकि धर्म ही आपको आगे बढ़ाकर मुक्ति दे सकता है। इसलिए अगर धर्म के रास्ते में दुख भी आए तो वह दुख भी प्यारा
है। उसको गले लगाकर धर्म को करना चाहिए। जैसे अर्जुन का धर्म युद्ध करना था। लेकिन उस धर्म के रास्ते में बहुत पेन था, बहुत
दुख था क्योंकि अपनों से ही युद्ध करना था। लेकिन श्री कृष्ण जी ने कर्तव्य को ऊपर रखा और उस दुख से भी गुजरने के लिए
अर्जुन को कहा। लेकिन अगर आप बुद्ध जी को देखेंगे तो उनके लिए दुख सेकेंडरी नहीं है। दुख तो उनका मेन विषय है। उन्होंने
जितना सब कुछ सिखाया है उसमें दो मुख्य पॉइंट है कि दुख है और उस दुख से बचा जा सकता है। इसलिए भगवान बुद्ध के लिए दुख को
गले लगाना कोई रास्ता नहीं है। बल्कि उस दुख को समझकर उसका अंत करना तृष्णा को समाप्त करके यह रास्ता है और इसका सबसे
बड़ा उदाहरण यही है कि अर्जुन भी क्षत्रिय थे। भगवान बुद्ध भी क्षत्रिय थे। लेकिन अर्जुन को श्री कृष्ण जी ने क्षत्रिय धर्म
का पालन करने को कहा क्योंकि धर्म सर्वोपरि है और भगवान बुद्ध ने अपने क्षत्रिय धर्म को छोड़कर दुख को समझने के
लिए राजमहल भी छोड़ दिया। यानी उन्होंने अपने धर्म को नीचे कर दिया दुख का अंत करने के लिए और अगर आप युद्ध में देखेंगे
तो भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं अगर धर्म युद्ध में है तो युद्ध भी कर्तव्य बन जाता है। लेकिन भगवान बुद्ध यह कह रहे हैं कि
कोई भी प्राणी मरना नहीं चाहता। कोई भी प्राणी दुख नहीं चाहता तो हम युद्ध करके किसी भी प्राणी को दुख ना दें। तो साथियों
भगवान श्री कृष्ण ने और भगवान बुद्ध ने जीवन को कैसे देखा है ये आपको समझ में आ गया होगा। लेकिन ये जीवन आया ही कहां से?
अगर हम इस प्रश्न पर सोचें कि जिस रथ की हम बात कर रहे हैं उसको बनाया ही किसने? तो आइए देखते हैं कि इन दोनों दार्शनिकों
का इस पर क्या मत है। तो साथियों जब यह प्रश्न आता है कि रथ आखिर बनाया किसने? तो श्री कृष्ण जी का
उत्तर साफ है कि यह मुझे से जन्मा है। श्री कृष्ण कहते हैं कि पूरा जगत उन्हीं से जन्म लेता है। उन्हीं में चलता है और
उन्हीं में लौट जाता है। और फिर कोई पूछे कि श्री कृष्ण किससे जन्मे? तो यहां पर श्री कृष्ण ही कहते हैं कि वो अजन्मे हैं।
अनादि हैं। यानी जिनका कभी भी कोई आरंभ नहीं हुआ। अब आप इसी प्रश्न को लेकर भगवान बुद्ध के पास जाएं तो भगवान बुद्ध कहते
हैं कि इस सृष्टि का इस रथ का कोई भी रचयिता नहीं है। यह सृष्टि तो कारणों की लंबी श्रृंखला है यानी कि यह है तो वो है।
इस प्रकार से चीजें आपस में गुथी हुई है। और फिर अगर आप उनसे पूछेंगे कि यह जो कारणों की श्रृंखला है। इसमें पहला सिरा
कहां है? वो पहला रथ कब बना था? तो भगवान बुद्ध भी कुछ गीता की ही तरह यही कहते हैं कि सृष्टि का जो पहला सिरा है, उसका आरंभ
कहां से हुआ है? इसका आरंभ नहीं दिखता है। तो श्री कृष्ण कह रहे हैं कि तुम कृष्ण का ही अंश हो और भगवान बुद्ध कह रहे हैं कि
जब तुम्हारे पैर में तीर लगी हो तो तुम यह नहीं पूछते कि यह तीर किसने मारी है। इसलिए जो सवाल है कि इस दुनिया को इस
संसार को इस सृष्टि को किसने बनाया है इसकी अभी जरूरत नहीं है। तो साथियों हमने देखा कि कैसे हर एक फ्रंट पर श्री कृष्ण
और बुद्ध इन दोनों के विचार इन दोनों के दर्शन इन दोनों का ज्ञान करीब आते-आते एकदम से अलग हो जाता है। लेकिन इस वीडियो
का अभी तक निष्कर्ष क्या निकला? आइए जानते हैं। तो साथियों निष्कर्ष यह है कि रथ पर तो हम
ही बैठे हैं। रथ को तो हमें ही चलाना है। बस श्री कृष्ण जी यहां पर बता रहे हैं कि ये जो खेल चल रहा है बस इस खेल का आनंद
लो। इस खेल को पकड़ने का प्रयास मत करो क्योंकि यह खेल तुम्हारा है नहीं। तुम इस खेल से बहुत ऊपर की चीज हो। वहीं पर भगवान
बुद्ध कह रहे हैं कि तुम इस खेल को पकड़ भी नहीं पाओगे क्योंकि यह खेल हर पल बदल जा रहा है। तुम इसको पकड़ना ही चाहते हो
इसीलिए दुखी हो। तो इतनी ढेर सारी बात करने के बाद हमें दिखता है कि भगवान बुद्ध और श्री कृष्ण दोनों एक ही जगह पर खड़े
हैं। दोनों चाहते हैं कि हम इस खेल को ना पकड़े क्योंकि परिवर्तन को पकड़ने की कोशिश करना ही दुख का कारण है और जब यह
हमें दुख होता है तो जहां पर श्री कृष्ण जी कहते हैं कि उद्ध्रेता आत्मन आत्मानम यानी अपना उद्धार स्वयं करो क्योंकि
तुम्हारे अंदर ही श्री कृष्ण की शक्ति है तो वहीं पर भगवान बुद्ध भी कहते हैं कि अत्ता ही [संगीत] अत्तनो नाथो यानी मनुष्य
ही अपना सहारा है। तो आपको भगवान बुद्ध के मार्ग पर चलना है या भगवान श्री कृष्ण के मार्ग पर चलना है। यह तो इस वीडियो को
देखने के बाद बहुत विवेक से आपको निर्णय करना है क्योंकि भगवान श्री कृष्ण जी ने भी गीता में पूरा ज्ञान देने के बाद
अर्जुन को यही कहा था कि यथेच्छ तथा गुरु क्योंकि रथ आपका है, घोड़े आपके हैं। लगाम आपके हाथ में है और मुझे यह भी लगता है कि
आपने ऑलरेडी निर्णय ले लिया है कि आपको श्री कृष्ण जी के मार्ग पर चलना है या भगवान बुद्ध के। मार्ग आप कोई भी चुनिए
मंजिल [संगीत] एक ही मिलेगी। तो साथियों मैं आशा करता हूं कि इस वीडियो के माध्यम से आपको श्री कृष्ण जी का दर्शन और भगवान
बुद्ध का दर्शन दोनों समझ में आया होगा और समझ में आया होगा कि दोनों आपको दुखों के पार कैसे ले जाते हैं और साथियों अगर आपको
गहराई में धर्म को सनातन धर्म को भगवत गीता को उपनिषदों को समझना है तो आप हमारे साथ शिक्षणम पर जुड़ सकते हैं। लाखों
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अब साथियों इस वीडियो को इस टॉपिक को यहीं पर दूंगा विराम। अब मैं मिलूंगा एक नई क्वेस्ट में। तब तक के लिए, जय श्री राम।
श्री कृष्ण के अनुसार, मृत्यु के बाद शाश्वत आत्मा नए शरीर (रथ) में चली जाती है, जिसे हम पुनर्जन्म कहते हैं। वहीं, बुद्ध के अनुसार कोई स्थायी आत्मा नहीं होती, बल्कि तृष्णा (बने रहने की चाह) ही एक नया रथ रच देती है, जैसे एक दीपक से दूसरा दीपक जलाना।
श्री कृष्ण आत्मा को शाश्वत, अविनाशी और दृष्टा मानते हैं जो कभी नहीं बदलती। बुद्ध के अनुसार, 'आत्मा' पाँच स्कंधों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) का एक क्षणिक संयोग मात्र है, जो निरंतर बदलता रहता है और इसमें कोई स्थायी स्वामी नहीं है।
दोनों ही दृष्टिकोण व्यावहारिक हैं। श्री कृष्ण के अनुसार हार मन और शरीर की है, आत्मा तो दृष्टा मात्र है, इसलिए दुख क्यों? बुद्ध के अनुसार हार पल भर में बदल चुकी, न आप स्थायी हैं न असफलता; इसे स्थायी मानकर पकड़ना ही दुख है। दोनों ही हार के दुख को समाप्त करने में मदद करते हैं।
श्री कृष्ण मानते हैं कि संपूर्ण जगत उनसे जन्मा है, वे स्वयं अजन्मा और अनादि हैं, इसलिए एक रचयिता का अस्तित्व है। बुद्ध के अनुसार सृष्टि कारणों की एक श्रृंखला है जिसका कोई आदि या रचयिता नहीं है, जैसे तीर लगे पर यह पूछना कि 'किसने मारा?' अर्थहीन है; वर्तमान दुख के उपचार पर ध्यान देना चाहिए।
श्री कृष्ण के अनुसार धर्म सर्वोपरि है। अर्जुन के लिए युद्ध करना उसका कर्तव्य (धर्म) है, चाहे कितना भी दुख क्यों न हो। बुद्ध के अनुसार दुख मुख्य विषय है और धर्म दुख के अंत के लिए है; युद्ध किसी प्राणी को दुख देता है, इसलिए अहिंसा श्रेष्ठ है। दोनों का लक्ष्य दुख से मुक्ति है, लेकिन मार्ग भिन्न हैं।
दोनों का अंतिम लक्ष्य है 'नए रथ का न बनना', यानी जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति। श्री कृष्ण इसे निष्काम कर्म के माध्यम से प्राप्त करने का उपदेश देते हैं, जबकि बुद्ध तृष्णा त्याग और क्षणभंगुरता के बोध द्वारा निर्वाण की बात करते हैं। दोनों ही मार्ग स्थायी पदार्थों को पकड़ने की कोशिश को दुख का कारण बताकर उसे छोड़ने का संदेश देते हैं।
वीडियो के अनुसार, मंजिल एक है और मार्ग भिन्न हैं, इसलिए व्यक्ति अपनी प्रकृति और परिस्थिति के अनुसार चुन सकता है। श्री कृष्ण का निष्काम कर्म और धर्म पालन, और बुद्ध का तृष्णा त्याग एवं अहिंसा का मार्ग, दोनों ही दुखों के पार ले जाते हैं। अंतिम निर्णय व्यक्ति का है, जैसा श्री कृष्ण ने कहा, 'यथेच्छ तथा कुरु' (जैसा चाहे वैसा कर)।
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मोल कॉन्सेप्ट वन शॉट रिवीजन | नीट केमिस्ट्री की बैकबोन
यह वीडियो मोल कॉन्सेप्ट (कुछ बुनियादी अवधारणाएँ) का संपूर्ण वन-शॉट रिवीजन है जो विशेष रूप से नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार किया गया है। इसमें पदार्थ, मापन, SI इकाइयाँ और रूपांतरण कारकों को बेसिक से एडवांस लेवल तक कवर किया गया है।
Brahma Vishnu Mahesh Ka Pita: Ramcharitmanas Se Gupt Rahasya
Video summary in Hindi covering the main revelations from the transcript.
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