Title: ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पिता कौन? रामचरितमानस से गुप्त रहस्य
Description: संत रामपाल जी महाराज रामचरितमानस, शिव पुराण, देवी भागवत और गीता से प्रमाणित करते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश पूर्ण परमात्मा नहीं, बल्कि काल ब्रह्म और दुर्गा के पुत्र हैं। वीडियो में बताया गया है कि सच्चा मोक्षदायक मंत्र कौन सा है और परम अक्षर ब्रह्म (कबीर) की महिमा क्या है।
Keywords: ब्रह्मा विष्णु महेश का पिता, रामचरितमानस रहस्य, सच्चिदानंद ब्रह्म, काल ब्रह्म और दुर्गा, संत रामपाल जी, मोक्षदायक मंत्र, कबीर परमेश्वर
Content:
मुख्य रहस्य: तीनों देवताओं की उत्पत्ति
- रामचरितमानस (बालकांड दोहा 143, 145, 149) से सिद्ध हुआ कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव किसी अन्य परमात्मा (सच्चिदानंद ब्रह्म) के अंश हैं और उनकी भक्ति करते हैं।
- इन तीनों का स्थूल शरीर काल ब्रह्म और दुर्गा से उत्पन्न हुआ है, जबकि आत्मा रूप में उत्पत्ति परम अक्षर ब्रह्म (कबीर) से है।
- शिव पुराण और देवी भागवत से प्रमाण: ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीन गुण (रज, सत, तम) हैं और दुर्गा इनकी माता हैं। (इस परंपरा के गहन अध्ययन के लिए देखें: The Itihas-Puran Tradition and Foreign Travelogues in Ancient Indian History)
ब्रह्मा-विष्णु के भ्रम का निवारण
- काल ब्रह्म ने शिव का रूप धारण कर ब्रह्मा और विष्णु को समझाया कि वे ईश (भगवान) नहीं हैं।
- ऋषियों को समाधि में विष्णु/ब्रह्मा/शिव रूप में दर्शन देकर काल ब्रह्म ने उन्हें भ्रमित किया, जिससे पुराणों में उनकी महिमा लिखी गई।
गीता जी से प्रमाण
- गीता अध्याय 7 श्लोक 12-15: तीन गुणों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) से परे हटकर परमात्मा की भक्ति करने का आदेश।
- गीता अध्याय 15 श्लोक 16-17: दो पुरुष – क्षर (नाशवान) और अक्षर (अविनाशी); उत्तम पुरुष परमात्मा (कबीर) ही सच्चिदानंद ब्रह्म है।
- गीता अध्याय 18 श्लोक 62-64: उसी परमात्मा की शरण में जाने का निर्देश।
मोक्षदायक मंत्र का रहस्य
- द्वादश अक्षर मंत्र “ओम नमो भगवते वासुदेवाय” वास्तविक नहीं है; असली मंत्र आदि सनातन धर्म के तीसरे चरण में दिया जाता है (ओम + तत + सत)।
- सतयुग में कबीर परमात्मा (सत सुकृत) ने तीन चरणों में नाम दीक्षा दी थी।
संत गरीबदास व कबीर सागर से पुष्टि
- सूक्ष्म वेद के अनुसार, ब्रह्मा, विष्णु, शिव क्रमशः रज, सत, तम गुण हैं; चौथा (काल) उनका पिता है और पंचम (कबीर) पूर्ण परमात्मा है।
- कबीर प्रभु ने ही इन देवताओं को एक-एक मंत्र दिया था।
निष्कर्ष
ब्रह्मा, विष्णु, महेश पूर्ण परमात्मा नहीं हैं। सच्ची भक्ति के लिए परम अक्षर ब्रह्म (कबीर) की शरण में जाना आवश्यक है, जिससे पूर्ण मोक्ष (सतलोक) प्राप्त होता है। वीडियो में आगे के रहस्यों के लिए “लाइव डिबेट परिचय प्रभु” की किस्तें देखने का आग्रह किया गया है।
महाराज की जय हो [संगीत] महाराज की जय की जय
श्री [संगीत] जय
माननीय जनता जनार्दन की अदालत में आज दिनांक 11 अक्टूबर 2026 को मैं संत रामपाल दास एक अजब गजब रहस्य है। संत तुलसीदास
कृत श्री रामचरितमानस यानी रामायण से पेश करूंगा। यह एक ऐसा गढ़ रहस्य है [संगीत] जो आज तक मानव समाज को नहीं बताया गया।
जिसमें ब्रह्मा विष्णु और महेश जी की उत्पत्ति [संगीत] तथा द्वादश अक्षर मंत्र का सच है। ओम नमो भगवते वासुदेवाय। यह
द्वादश अक्षर मंत्र नहीं है। वास्तविक मोक्षदायक द्वादश अक्षर मंत्र कौन सा है? [संगीत]
इसका भेद इस रिटन आर्गुममेंट में है जो मेरे द्वारा माननीय जनता की अदालत में ग्राफिक वीडियो के रूप में पेश किया जा
रहा है। आप देख रहे हैं संत रामपाल [संगीत] जी महाराज द्वारा शास्त्रार्थ का शंखनाद
किस्त चार दर्शकों मानव सदियों से ही प्रभु यानी परमेश्वर की खोज में लगा हुआ है। परमेश्वर
की खोज करते-करते वो अनेक विभागों में बट गया। सतयुग के प्रारंभ में परम अक्षर ब्रह्म परमात्मा कबीर साहिब जी ने आदि
सनातन पंथ यानी धर्म स्वयं चलाया था। उसी आदि सनातन धर्म से आगे चलकर सनातन धर्म बना। सनातन धर्म से हिंदू धर्म, हिंदू
[नाक से की जाने वाली आवाज़] धर्म से ही आगे यहूदी धर्म। यहूदी धर्म से ईसाई और मुस्लिम धर्म और हिंदू
[नाक से की जाने वाली आवाज़] धर्म से ही सिख धर्म बना। दर्शकों आदि सनातन धर्म स्वयं परम [संगीत] अक्षर ब्रह्म ही इस
धरती पर प्रकट होकर चलाता है। सतयुग में परम अक्षर ब्रह्म कबीर जी सत सुकृत नाम से धरती पर प्रकट हुए थे। उस समय परमात्मा ने
आदि सनातन पंथ यानी धर्म चलाया था। इस पंथ में तीन चरण में नाम दीक्षा दी जाती थी। आदि सनातन धर्म के प्रथम चरण में सात नाम
दिए जाते थे। इसमें प्रथम नाम पृथ्वी पर प्रकट गुरु रूप में पूर्ण परमात्मा का है। जिसे [संगीत] गुरु गोविंद का नाम कहा जाता
है। दूसरा नाम श्री ब्रह्मा सावित्री जी का है। तीसरा नाम श्री विष्णु लक्ष्मी जी का है। चौथा नाम श्री शिव पार्वती जी का
है। पांचवा नाम देवी दुर्गा जी का है। छठा नाम श्री गणेश जी का है तथा सातवां नाम पूर्ण परमात्मा सत्पुरुष जी का है।
दर्शकों आदि सनातन धर्म के दूसरे चरण में दो नाम दिए जाते हैं। एक है ओम और दूसरा तत यानी सोहम। तीसरे चरण में तीन नाम दिए
जाते हैं। एक है ओम, दूसरा तत यानि सोहम और तीसरा है सत्य जो कि गुप्त है। जिसको दीक्षा के समय उपदेश लेने वाले साधक
को बताया जाता है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में भी है। दर्शकों आदि सनातन धर्म से
हटकर सतयुग में ही सनातन धर्म शुरू हुआ था और यह गलती स्वयंभू मनुजी व शत्रूपा से हुई थी। इन्होंने सतयुग में सत सुकृत नाम
से प्रकट परमेश्वर कबीर जी से केवल प्रथम मंत्र लिया था। दर्शकों उस समय कबीर परमेश्वर जी प्रथम नाम के केवल पांच नाम
ही देते थे। यह दो नाम नहीं देते थे। कारण यह रहा कि परमात्मा जानी जान है। वे जानते थे कि उपदेश प्राप्त करने वाला केवल नामों
को जानने के लिए ही दीक्षा ले रहा है ताकि उसे पता चल जाए कि यह क्या नाम देता है। इसी दृष्टिकोण से मनु तथा शतरूपा ने भी
दीक्षा ली थी। कुछ दिन जाप करके छोड़ दी थी। यह पांच नाम बहुत कारगर हैं। इन मंत्रों के जाप से कार्य सिद्धि शीघ्र
होती है। यह धन ध्य से संपन्न करते हैं। स्वस्थ रखते हैं। इनके जाप से साधक को मनुष्य जन्म मिलता है तथा भक्ति में आस्था
बनी रहती है। बशर्ते यह नाम अधिकारी संत से लिया जाए। मनु तथा सतरूपा ने कुछ दिन तो यह साधना की। लेकिन उसके बाद काल
प्रेरणा से इन्होंने सत सुकृत नाम से आए। परमात्मा द्वारा दिया गया नाम छोड़ [संगीत] दिया और फिर हठ योग करने लगे।
दर्शकों इसी का प्रमाण हमें श्री तुलसीदास कृत रामचरितमानस में भी मिलता है जिसको पूरा [संगीत] हिंदू समाज एक प्रमाणित
शास्त्र मानता है। रामचरितमानस साक्षात प्रेम समुद्र है। सियाराम का मूर्तिमान स्वरूप है। जो वांग
में भगवान का स्वरूप है वो रामचरितमानस है। उसके गायन का मतलब है सियाराम की प्राप्ति। ऐसे रामचरितमानस पर कोई कैसे
उंगली उठा सकता है। एक एक शब्द अपने आप में ब्रह्म एक एक शब्द परमात्मा मैं यह समझो। सब कुछ रामचरितमानस पर किसी भी
सनातनी को संदेह नहीं करना चाहिए। रामचरितमानस एक ऐसा सद ग्रंथ है जो जीवन का सार बता देता है।
दर्शकों इन तमाम धर्म गुरुओं ने रामचरितमानस का क्या सार बताया है? पहले आपको [संगीत] वह सुना देते हैं। सुनिएगा
हमारे धर्मुरुओं ने आपको केवल एक कथा सुनाई कि भगवान श्री विष्णु स्वयं अवतार लेकर माता कौशल्या के गर्भ से जन्मे थे।
उन्होंने जन्म के समय ही अपना चतुर्भुज रूप माता कौशल्या को दिखाकर स्पष्ट भी कर दिया था कि मैं भगवान विष्णु हूं। उसके
बाद जब श्री रामचंद्र जवान हुए तब उनका विवाह सीता जी से हुआ। राजा के घर जन्मे श्री रामचंद्र जी का ज्येष्ठ पुत्र होने
के नाते राजा बनना तय था। परंतु राज्य अभिषेक से पहले ही उनको वनवास जाना पड़ा। उनके साथ उनकी पत्नी माता सीता जी व
[संगीत] भाई लक्ष्मण भी गए। सीता जी का अपहरण निर्भाग रावण ने किया। अपना भी नाश कराया और श्री रामचंद्र जी को भी दुख
पहुंचाया। 12 वर्ष [संगीत] तक श्री रामचंद्र जी सीता जी की खोज में लगे रहे। रावण से युद्ध किया। सीता जी को बचाया और
14 वर्ष [संगीत] का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे। अयोध्या लौटने के 2 वर्ष बाद ही किसी कारण से श्री रामचंद्र जी ने
गर्भवती सीता जी को घर से बाहर निकाल दिया। आजीवन पति-पत्नी कभी नहीं मिल पाए। लेकिन हमेशा मर्यादाओं का [संगीत] पालन
किया। इसलिए श्री राम जी को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है और यही रामचरितमानस का सार है। दर्शकों यह था
हमारे धर्मुरुओं का श्री रामचरितमानस [संगीत] को लेकर दिया गया आज तक का ज्ञान। दर्शकों
रामचरितमानस हर सनातनी हिंदू के लिए बहुत मान्य और पवित्र ग्रंथ है। क्या ऐसा हो सकता है कि सिर्फ एक राजा और रानी [संगीत]
वाली कहानी की तरह रामचरितमानस का सार होगा? बिल्कुल नहीं। रामचरितमानस को भले ही यह तत्वज्ञानहीन धर्मुरु समझ नहीं पाए।
अब जो रहस्य मैं रामचरितमानस से आपके सामने उजागर करूंगा, उन्हें देखकर आपके होश [संगीत] उड़ जाएंगे। आज रामचरितमानस
का असली सार आपके सामने उजागर [संगीत] होने जा रहा है जो आज तक आप सभी सनातनी हिंदू भाई बहनों से छिपाया गया था। क्या
आप यकीन कर सकते हैं कि ब्रह्मा विष्णु महेश किसी अन्य भगवान की [संगीत] भक्ति करते हैं। आपको इसी रामचरितमानस से
प्रमाणित करके बताते हैं कि ब्रह्मा विष्णु महेश भी किसी अन्य भगवान की भक्ति करते हैं। जिससे [संगीत] सिद्ध होगा कि
ब्रह्मा विष्णु महेश भी किसी प्रभु के भक्त हैं। अब आपको दिखाते हैं श्री रामचरितमानस से वह प्रमाण जिससे स्पष्ट
होगा कि ब्रह्मा विष्णु महेश से ऊपर भी कोई भगवान है। बालकांड में एक प्रकरण आता है जब मनु और सतरूपा परमात्मा को पाने के
लिए तपस्या करने लगते हैं। आइए देखते हैं मनु और सतरूपा किस परमात्मा की भक्ति कर रहे थे। यह है श्री रामचरितमानस से
बालकांड का दोहा नंबर 143 जिसकी चौपाई नंबर तीन में लिखा है कि नेति नेति जेह वेद निरूपा निजंद निरूपाधि अनुपा शंभू
विरंच विष्णु भगवाना उपजहीन जासु अंसते नाना जिन्हें वेद नेति नेति यानी यह भी नहीं यह भी नहीं कहकर निरूपण करते हैं जो
आनंद स्वरूप उपाधि रहित और अनुपम है एवं जिनके अंश से अनेकों शिव ब्रह्मा और विष्णु भगवान प्रकट होते हैं। रामचरितमानस
की इस चौपाई का भावार्थ है शंखों ब्रह्मा विष्णु और शिव की आत्मा रूप में उत्पत्ति सच्चिदानंद घन ब्रह्म से हुई है। यहां
बताने का अर्थ यह है सब आत्माओं की उत्पत्ति उसी पूर्ण परमात्मा से हुई है जिससे शंखों ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसी
आत्माएं उत्पन्न हो चुकी हैं। इसलिए रामचरितमानस में ये भी कहा गया है कि हम सब की उत्पत्ति परम अक्षर ब्रह्म से हुई
है। इसमें ब्रह्मा विष्णु महेश भी शामिल हैं। इसलिए अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न होने के कारण आत्मा भी अविनाशी है। जब तक
आत्मा जीव रूप में इन स्थूल शरीरों में अन्य माता-पिता से जन्म लेती रहती है तब तक शरीर नाशवान होता है। जबकि आत्मा तब भी
अविनाशी ही रहती है। इसलिए काल अर्थात क्षर पुरुष और दुर्गा तथा इनसे उत्पन्न ब्रह्मा विष्णु शिव व इनके अंतर्गत सभी
जीव नाशवान है। इसीलिए कहा है कि आत्मा किसी की नहीं मरती क्योंकि यह पूर्ण परमात्मा के द्वारा उत्पन्न हुई है। वहीं
रामचरितमानस के बालकांड के दोहा नंबर 149 की चौपाई नंबर तीन में ब्रह्मा विष्णु महेश की उत्पत्ति काल ब्रह्म से बताई है।
दर्शकों यहां इन तीनों देवताओं के शरीर की उत्पत्ति काल ब्रह्म और दुर्गा देवी द्वारा मैथुन क्रिया से होने का प्रमाण
है। अर्थात आत्मा रूप में तीनों भगवानों की उत्पत्ति पूर्ण परमात्मा से हुई है और बाद में स्थूल शरीर में पैदा करने वाले
काल, ब्रह्म और देवी दुर्गा जी हैं। यहां दर्शक भ्रमित ना हो कि इस चौपाई में लिखा है कि तीनों देवता सच्चिदानंद ब्रह्म से
पैदा हुए हैं। जबकि दूसरी चौपाई में लिखा है ब्रह्म से पैदा हुए हैं। यहां आपको दोनों चौपाइयों का भेद समझा दिया गया है।
दर्शकों, परम अक्षर ब्रह्म से आत्म रूप में सब जीवों की उत्पत्ति कैसे हुई है? यह विस्तार से जानने के लिए मेरे द्वारा लाइव
डिबेट परिचय प्रभु का किस्त एक, दो और तीन वीडियो अवश्य देखिए। दर्शकों रामचरितमानस की चौपाइयों को देखने और समझने के बाद कोई
संशय शेष नहीं रह जाता है। लेकिन हैरानी की बात है हमारे हिंदू धर्म के शीर्ष शंकराचार्य आज भी ब्रह्मा विष्णु महेश की
वास्तविक स्थिति को नहीं समझ पाए हैं। ये हैं हिंदू धर्म के शीर्ष शंकराचार्य जगन्नाथ पुरी के पीठाधीश्वर श्री निश्चनंद
सरस्वती जी महाराज। इनकी एक प्रवचन सभा में एक बच्चे ने बहुत ही सधा हुआ सवाल किया। पहले इस बच्चे का सवाल सुन लीजिए।
मैं कक्षा पांच का छात्र हूं और मेरा यह प्रश्न है कि कि शिव पुराण में तो ये लिखा है कि महादेव सबसे बड़े हैं और विष्णु
पुराण में ये लिखा है कि विष्णु जी सबसे बड़े हैं। तो फिर कौन सबसे बड़े हैं? दर्शकों निसंदेह बच्चे ने बहुत अच्छा सवाल
किया है। लेकिन क्या शंकराचार्य जी का जवाब भी इतना ही अच्छा होगा? सुनिए एक बार शंकराचार्य जी का जवाब।
बहुत अच्छा बैठो जी प्रेमनाथ बैठ लक्षण एक होने पर वस्तु और व्यक्ति में एकत्व मान्य है। लक्षण सम्य से वस्तु सम्य
के कारण वेदों में जो परमात्मा का लक्षण है वही लक्षण पौराणिक जगत में और वेदों में
भी स्कंदोपनिषद आदि वेद है। एक ही परमात्मा सृष्टि के प्रारंभ में स्वयं को पांच
रूपों में व्यक्त करते हैं। उत्पत्ति नामक कृति का निर्वाह करने के लिए स्वयं को हिरणघर ब्रह्मा बना देते
हैं। ब्रह्मा के रूप में व्यक्त होते हैं। स्थिति नामक कृति का पालन रक्षण नामक कृति
का निर्वाह करने के लिए वे विष्णु के रूप में श्रीमन नारायण के रूप में स्वयं को प्रकट करते हैं। संहार नामक कृति का
निर्वाह करने के लिए शिव के रूप में प्रकट करते हैं। निग्रह नामक कृति का निर्वाह करने के लिए कृत माने कार्य। शक्ति के रूप
में स्वयं को व्यक्त करते हैं। अनुग्रह नामक कृति का निर्वाह करने के लिए गणपति या गणेश के रूप में स्वयं को प्रकट करते
हैं। शिव पुराण में शिव जी को ब्रह्म कहा गया है। वही लक्षण विष्णु पुराण में विष्णु जी को लेकर है। देवी भागवत में
देवी को लेकर है। गणेश पुराण में गणेश को लेकर है। सूर्य पुराण में सूर्य को लेकर है। तो लक्षण सम से वस्तु सगुण साकार रूप
है। लेकिन पूर्ण परमात्मा के ही सब अवतार हैं। दर्शकों सुना आपने शंकराचार्य जी के जवाब
को सुनकर कोई भी व्यक्ति यह नहीं बता सकता कि ब्रह्मा विष्णु व शिव में बड़ा कौन है तथा पूर्ण परमात्मा कौन है और शायद इसीलिए
आज तक हिंदू धर्म का सबसे बेबस चेहरा आज इन तस्वीरों के रूप में देखने को मिल रहा है। अगर इन शंकराचार्यों ने इस सवाल का
सही जवाब दिया होता, तो हर सभा में इनको इस सवाल का सामना ना करना पड़ता। लेकिन, दर्शकों मायूस मत होइएगा। आज आपको प्रमाण
सहित बताएंगे कि ब्रह्म पुराण में ब्रह्मा भगवान क्यों हैं? विष्णु पुराण में विष्णु भगवान क्यों है? और शिव पुराण में शिव
भगवान कैसे हैं। आज आपको इस पूरे रहस्य की जानकारी मुझ दास के द्वारा प्रमाण सहित दी जाएगी। आप देख रहे हैं संत रामपाल [संगीत]
जी महाराज द्वारा शास्त्रार्थ का शंखनाद किस्त चार साधक साधना करते थे मेडिटेशन हठ योग करके
समाधिस्थ होते थे तो कालिन को भ्रमित करने के लिए किसी को तो विष्णु रूप में दर्शन दे देता तो ऋषि महर्षि सोचते कि यह विष्णु
जी देवता है यह पूर्ण परमात्मा है और उनको आकर पुल बांध देते कि आप ही समर्थ हो आप ही सर्वशक्तिमान हो समाधि दशा में आपके
दर्शन हुए आप खुद परमात्मा हो आप अपने आप को छुपाए हो तो इस बात से विष्णु जी फूल का जो है ना कुपा हो जाते और सोच लिया कि
मैं ही भगवान हूं। एक ने दो ने 10 ने 20 ने ऐसे ही कहा फिर किसी को यह ज समाधि तोरे किसी को ब्रह्मा के रूप में दर्शन दे
देता है और वह जो थोड़ी बहुत मांगे को सिद्धि विधि उन्हें देकर अंतर्ध्य हो जाता समाधि दशा में तो वह क्या कहते थे कि हे
भगवन यह ब्रह्मा जी को कहते आप खुद पर पूर्ण परमात्मा हो आप ही समर्थ हो हमने समाधि दशा में आपका दर्शन पाए हैं और आप
ही समर्थ हो आप अपने आप को छुपाए हुए हो आप सृष्टि के रचनहार हो और किसी को शिव रूप में दे देता है तो वह सोचते हैं शिव
ही सृष्टि रचने वाला है। यह छुपाए हुए हैं अपने आप को। तो इसी आधार से ब्रह्मा जी ने तो न्यू सोच लिया मैं सृष्टि करता सब मेरे
से उत्पन्न हुए। और विष्णु जी ने यह सोच लिया कि मैं सबका मालिक। एक दिन ब्रह्मा जी आ गए विष्णु जी के पास। ब्रह्मा जी को
देखकर विष्णु उठे नहीं। यह जानकर के मैं इससे बड़ा हूं और मैंने इसकी उत्पत्ति की है। जैसे उसने
और ऋषि महर्षियों से सुन रखी थी। उधर से ब्रह्मा जी ने सोचा कि मैं इसका बाप हूं। मैं इसका जनक हूं और यह मेरी आदर भी नहीं
कर रहा है। ब्रह्मा जी कहने लगे बेटा उठ देख मैं तेरा बाप आया हूं। अब विष्णु जी कहे कि मैं तेरा बाप हूं। तू
तेरा जन्म मेरी नाभि कमल से हुआ है। इस बात पर दोनों का झगड़ा हो गया। अब उन झगड़े को समाप्त करने के लिए इस काल
ने सदाशिव ने बीच में एक नूरी एक पिलर सा खड़ा कर दिया। तो यह दोनों ने झगड़ा था छिया दिया छोड़
उसको ढूंढने लगे उसके एंड को। कहने का भाव यह है कि फिर यह शिव रूप में प्रकट हो गया। और फिर यह क्या समझाता है? ब्रह्मा
विष्णु महेश ने इनसे प्रश्न किया तो काल इनको धोखा देता है कि यह तो मेरा साकार रूप है। यो यू पिलर और मैं निराकार रूप
हूं। मैं अब तुम्हारे सामने साकार बनकर आया हूं। मैं ही भगवान हूं। तुम अपने आप को भगवान मत समझो। अब देखो
विद्वेश्वर संहिता यह वही शिव पुराण गीता प्रेस गोरपुर से प्रकाशित और यह देखो ब्रह्मा विष्णु महेश
का आपस में झगड़ा हो गया था बीच में यो स्तंभ खड़ा कर दिया इस पर हम दिखाते हैं ब्रह्मा और विष्णु ने पूछा प्रभु सृष्टि
आदि पांच करतों के लक्षण क्या-क्या हैं क्या है यह हम दोनों को बताइए भगवान शिव बोले यू काल बोला कि मेरे मेरे कर्तों को
समझना अत्यंत गहन है। तथापि मैं कृपा पूर्वक तुम्हें उनके विषय में बता रहा हूं। अब यहां देखो यहां देखिएगा
संक्षिप्त शिव पुराण नीचे आते हैं। अब यह काल शिव रूप में खड़ा क्या कह रहा है? पुत्रों तुम दोनों ने तपस्या करके प्रसन्न
हुए मुझ परमेश्वर से सृष्टि और सतिथि नामक दो कृत प्राप्त किए। यह तुमको बहुत प्रिय है। अब देखो यह तो दो तो यह हो गए ब्रह्मा
और विष्णु और फिर क्या कहता है? इसी प्रकार मेरी विभूति स्वरूप रुद्र और महेश्वर ने यह मैं गलत लिखा दो अन्य उत्तम
कृत संहार और तिरोभाव मुझसे प्राप्त किए तो दो ब्रह्मा विष्णु महेश हो गए और दो यह रुद्र और महेश हो गए और बोलिया पांचवा
यह सिद्ध हो गया कि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र और महेश इस काल के ही पुत्र हैं। यह अपने पुत्र इस शिव को ही इन 11 रुद्रों का
मुखिया बनाता है। इसलिए यही एक रुद्र रूप भी धारण करता है। वैसे वह लीला काल की ही होती है। तो यहां यह महेश और रुद्र को चार
सुनकर आप भ्रम में ना पड़ना। हमने यह देखना है कि यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश यह इस यह इनसे न्यारा है जो इनका पिता जो
यह बोल रहा है जिससे इनका जन्म हुआ है। हमने चार सिद्ध करने थे ये न्यारे न्यारे तो ब्रह्मा विष्णु और महेश रुद्र भी
इन्हीं की एक अलग से इन्होंने बना रखा है मुखिया वो अलग है। तो ये ब्रह्मा विष्णु और ये महेश ये इस काल के पुत्र हैं। यह
सिद्ध करना था इनका जन्म और दुर्गा इनकी मान। दर्शकों, मैंने पवित्र शास्त्रों से यह
प्रमाणित कर दिया कि ब्रह्म पुराण में ब्रह्मा जी को सर्वशक्तिमान अर्थात बड़ा क्यों बताया है। विष्णु पुराण में विष्णु
जी को और शिव पुराण में शिव जी को बड़ा क्यों बताया है। संत रामपाल जी महाराज ने प्रमाणित किया है कि काल ब्रह्म ने जिन
ऋषियों को समाधि दशा में ब्रह्मा रूप में दर्शन दिए। उन ऋषियों ने मान लिया कि ब्रह्मा जी ही सबके रचयिता हैं और सबसे
श्रेष्ठ हैं। इनसे ही यह देवता उत्पन्न हुए हैं। फिर उन ऋषि जनों ने ब्रह्मा पुराण में ब्रह्मा जी की महिमा का गुणगान
करते हुए ब्रह्मा जी को सबसे बड़ा लिख दिया। इसी प्रकार इस काल ब्रह्म ने जो कि इन तीनों देवताओं का पिता है। उसने जिन
ऋषियों को विष्णु रूप में दर्शन दिए उन्होंने विष्णु जी को सबसे बड़ा मान लिया और विष्णु पुराण में सबका रचयिता विष्णु
जी को बता दिया। इसी प्रकार जिन ऋषियों को इस काल ब्रह्म ने शिव रूप में दर्शन दिए उन्होंने शिव को सबका रचयिता मान लिया और
शिव पुराण में शिव की महिमा का गुणगान करते हुए शिव को सबसे बड़ा बता दिया। आज मैंने आपको शिव पुराण से सिद्ध कर दिया कि
जिस प्रकार काल ब्रह्म ने शिव रूप में प्रकट होकर दोनों देवताओं का अर्थात ब्रह्मा और विष्णु का युद्ध रुकवाया तो सब
ने मान लिया कि शिव ही भगवान है। जबकि यहां एक शंकर और खड़े हैं और रुद्र भी वहीं है। इससे सिद्ध होता है कि यह काल
ब्रह्म ही इन तीनों देवताओं का रूप बनाकर प्रकट होता है। दर्शकों अगर आप यह सोच रहे हैं कि काल ब्रह्म खुद ऋषियों के सामने
क्यों नहीं आ जाता ब्रह्मा विष्णु महेश के रूप में क्यों आता है इसका विस्तार से वर्णन मेरे द्वारा लाइव डिबेट परिचय प्रभु
का किस्त एक दो तथा तीन में किया गया है। इन सभी [संगीत] डिबेट की वीडियो का लिंक इस वीडियो के डिस्क्रिप्शन बॉक्स में दे
दिया है। फिर भी संक्षिप्त जानकारी के लिए आपको गीता जी अध्याय सात का श्लोक 24 व 25 देखना चाहिए। इन श्लोकों में काल ब्रह्म
कहता है कि बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अर्थात घटिया परम भाव को नहीं जानते। श्लोक 25 में कहा है कि मैं अपनी योग माया
से छिपा रहता हूं। सबके प्रत्यक्ष नहीं होता। दर्शकों काल ब्रह्म द्वारा यह नियम बनाने का कारण यह है कि इस संसार में
जितने भी जीव है उन सबको खाने वाला यही काल ब्रह्म है जो गीता जी अध्याय 11 के श्लोक 32 में कहता है कि मैं काल हूं और
इस समय इन सब योद्धाओं को खाने के लिए प्रवृत्त हुआ हूं। दर्शकों इस बात का प्रमाण ऋग्वेद में भी मिलता है जिसमें दो
भगवानों का जिक्र है। एक खाने वाला और एक ना खाने वाला। जो खाने वाला भगवान है वो यही काल ब्रह्म है। यही काल ब्रह्म अपना
उल्लू सीधा करने के लिए पुरंज में प्रवेश करके दैत्यों का नाश करता है और यही काल ब्रह्म पुरकुत्स में प्रवेश करके गंधर्वों
का नाश करता है तथा उपस्थित ऋषियों को विष्णु रूप में दर्शन दे देता है। जिससे मौजूद ऋषियों को भ्रम हो जाता है कि
विष्णु जी ही यह सब कार्य कर रहे हैं। जबकि प्रकुत्स के शरीर में प्रवेश करके खुद काल ब्रह्म गंधर्वों का नाश करता है।
और इसी प्रकार श्री कृष्ण में प्रवेश करके गीता का ज्ञान देता है और अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार करके करोड़ों योद्धाओं का
नाश करवा देता है। दर्शकों काल ब्रह्म जीवों को क्यों खाता है तथा काल ब्रह्म को अपनी पत्नी दुर्गा को यह वचन क्यों देना
पड़ा कि आज के बाद मैं कभी किसी को दर्शन नहीं दूंगा। यह जानने के लिए मेरे द्वारा की गई लाइव डिबेट की किस्त नंबर एक, दो
तथा तीन को देखें, जिनका लिंक डिस्क्रिप्शन [संगीत] बॉक्स में दे दिया है। दर्शकों, मैंने पवित्र शास्त्रों से
यह सिद्ध कर दिया है कि इन तीनों देवताओं में से कोई भी पूर्ण परमात्मा नहीं है। बल्कि यह तीनों तो तीन लोक में एक-एक
विभाग के स्वामी है। ब्रह्मा को उत्पत्ति का कार्य मिला है। विष्णु को पालन का और शिव को संहार का कार्य मिला है। ये तीनों
देवता स्वर्ग लोक, पाताल लोक और पृथ्वी लोक पर एक-एक विभाग के स्वामी हैं। जबकि काल के 21 ब्रह्मांड में बहुत से लोक हैं।
लेकिन इन तीनों देवताओं का अधिपत्य केवल स्वर्ग लोक, पाताल लोक और पृथ्वी लोक पर ही है। वास्तव में मैंने ही इस बच्चे के
सवाल का सटीक और शास्त्र प्रमाणित जवाब दिया है। देखिए किस प्रकार ब्रह्मा और विष्णु को भी खुद के ईश होने का भ्रम हो
गया था। और किस प्रकार काल ब्रह्म ने उनको यह साफ किया कि आप तीनों देवता ईश नहीं है। ईश यानी भगवान नहीं है। अर्थात सबके
धारण पोषण करने वाले नहीं हैं। यह है शिव महापुराण हिंदी टीका सहित भाग एक विधा वृद्धि पंडित जवाला प्रसाद जी मिश्र कृत
हिंदी टीका सहित जिसके प्रकाशक हैं खेमराज श्री कृष्णदास जो कि मुंबई से प्रकाशित है। इसके रुद्र संहिता एक अध्याय छ से 10
में लिखा है कि दोनों के युद्ध को देखते हुए काल यानी ब्रह्म जो तीनों देवताओं के पिता हैं अपने तीसरे पुत्र शिव का रूप
बनाकर युद्ध के मैदान में प्रकट हो जाते हैं। तभी काल ब्रह्म शिव के रूप में उनके सामने आते हैं और कहते हैं कि अज्ञानता वश
तुम दोनों ने अपने आप को भगवान मान लिया। तुम ईश नहीं हो तुम भगवान नहीं हो। यही बताने के लिए मैं रण स्थान पर आया हूं।
दर्शकों शिव पुराण में यहां स्पष्ट लिखा है कि कि काल ब्रह्म शिव में प्रकट होकर ब्रह्मा और विष्णु को कह रहा है कि तुमने
जो अज्ञानता से अपने को ईश माना यह बड़ा अद्भुत हुआ अर्थात तुम ईश नहीं हो। तुम भगवान नहीं हो। तुम्हारा यह भ्रम दूर करने
के लिए ही मैं यहां रण स्थान पर प्रकट हुआ हूं। दर्शकों यही भ्रम हिंदू धर्म के बहुत से धर्म गुरुओं को हो रखा है। जबकि हमारे
पुराण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि यह तीनों देवता पूर्ण परमात्मा नहीं है। इनसे ऊपर कोई और भगवान है। दर्शकों [संगीत]
आइए अब आपको एक और प्रमाण दिखाते हैं जिसमें स्पष्ट होता है कि यह तीनों देव नाशवान हैं और देवी दुर्गा इनकी माता है।
यह है संक्षिप्त देवी भागवत जिसके पेज 138 पर विष्णु भगवान देवी दुर्गा से कहते हैं कि तुम शुद्ध स्वरूपा हो। यह सारा संसार
तुमसे उद्भाषित हो रहा है। मैं यानी विष्णु ब्रह्मा और शंकर तुम्हारी कृपा से विद्यमान है। हमारा तो आविर्भाव यानी जन्म
तिरोभाव यानी मृत्यु हुआ करता है। केवल तुम ही नित्य हो। जगत जननी हो। प्रकृति और सनातनी देवी हो। दर्शकों यह प्रकृति शब्द
भी आप ध्यान में रखना। प्रकृति इसी दुर्गा को कहते हैं। यह हम आपको आगे चलकर गीता जी से प्रमाणित करेंगे। दर्शकों इस लेख से यह
बात स्पष्ट हुई कि तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु और शिव नाशवान हैं और उनकी माता देवी दुर्गा हैं। आगे भगवान शिव यानी शंकर
जी देवी दुर्गा को कहते हैं कि हे देवी यदि महाभाग विष्णु तुम से प्रकट हुए हैं तो उनके बाद उत्पन्न होने वाले ब्रह्मा भी
तुम्हारे ही बालक हुए तो फिर मैं तमोगुणी लीला करने वाला शंकर तुम्हारी संतान नहीं हुआ। यानी मुझे भी उत्पन्न करने वाली तुम
ही हो। आगे कहते हैं कि हे देवी इस संसार की सृष्टि, स्थिति और संहार में तुम्हारे गुण सदा समर्थ हैं। उन्हीं तीनों गुणों से
उत्पन्न हम यानी ब्रह्मा, विष्णु और शंकर नियमानुसार कार्य में तत्पर रहते हैं। दर्शकों यहां यह स्पष्ट हुआ कि ब्रह्मा,
विष्णु, महेश ही तीनों गुण हैं। दर्शकों, आइए आपको एक और प्रमाण दिखाते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों गुण हैं और
दुर्गा इनकी माता है। देखिए यह है श्रीमद् देवी भागवत हिंदी टीका सहित भाग एक खेमराज श्री कृष्णदास प्रकाशन बंबई इसके तृतीय
स्कंध के पेज नंबर 11 पर भगवान शंकर देवी दुर्गा को कहते हैं कि हे माता यदि आप हमारे ऊपर सदा दया युक्त रहती हैं तो हमको
तमोगुण किस प्रकार प्रदान किया ब्रह्मा को रजोगुण प्रदान किया है और हरि यानी विष्णु जी को सतोगुण क्यों बना दिया नीचे संस्कृत
भी आप देख सकते हैं यदि दया धर्म न सदांबिके कठम अहम विहित च तमोगुण कमल ज रजो गुण संभव सुविहित कीमो सतोगुणो हरि
दर्शकों यहां भगवान शंकर देवी दुर्गा से कह रहे हैं कि हे माता आप हम पर दया रखती हैं तो
आपने मुझे तमोगुण क्यों बना दिया और कमल से उत्पन्न होने वाले ब्रह्मा को रजोगुण क्यों बना दिया तथा हरि यानी विष्णु को
सतोगुण क्यों बना दिया। इससे स्पष्ट हुआ कि यह तीनों गुण ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। दर्शकों, अभी आपको एक और प्रमाण
दिखाते हैं जिससे यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाएगा कि यह तीनों देवता ही तीन गुण हैं। यह है संक्षिप्त मार्कंडेय पुराण सचित्र
मोटा टाइप गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित जिसके 131 पृष्ठ पर लिखा है कि रजोगुण प्रधान ब्रह्मा, तमोगुण प्रधान रुद्र और
सतोगुण प्रधान विश्वपालक विष्णु हैं। यही तीन देवता हैं और यही तीन गुण हैं। दर्शकों मार्कंडेय पुराण ने यह स्पष्ट कर
दिया कि यह तीनों देवता ही तीन गुण हैं। आइए अब देखिए इन तीन गुणों की भक्ति करने वालों के विषय में श्रीमद्भगवत गीता जी
में क्या लिखा है। यह है श्रीमद्भगवत गीता। गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित अध्याय सात के श्लोक 12 में लिखा है कि जो
सतोगुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजोगुण से तथा तमोगुण से होने वाले भाव हैं उनको तू मुझसे ही होने वाला ऐसा जान।
इस श्लोक में यह स्पष्ट हुआ कि रजोगुण यानी ब्रह्मा से उत्पत्ति, सतोगुण, विष्णु से स्थिति और तमोगुण शिव जी से संहार हो
रहा है। अध्याय सात के श्लोक 13 में लिखा है कि गुणों के कार्य रूप सात्विक, रजस और तमस। इन तीनों प्रकार के भाव से यह सारा
संसार मोहित हो रहा है। इसलिए इन तीनों गुण से परे मुझे नहीं जानते। अध्याय सात के श्लोक 14 में लिखा है कि यह त्रिगुणमई
माया बड़ी दुस्तर यानी घटिया है। जो पुरुष इस माया का उल्लंघन कर जाते हैं वह संसार से पार हो जाते हैं। दर्शकों गीता ज्ञान
दाता का कहना है कि जो साधक इन तीनों गुणों की भक्ति न करके ऊपर उठ जाते हैं यानी मेरी भक्ति करते हैं उनको ज्यादा लाभ
मिलता है। अध्याय सात के श्लोक 15 में लिखा है कि इस त्रिगुण माया के द्वारा यानी ब्रह्मा विष्णु महेश के द्वारा जिनका
ज्ञान हरा जा चुका है। वे आसुर स्वभाव को धारण किए हुए मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते।
दर्शकों यहां इस भजते शब्द पर गौर करना जरूरी है। भजना मतलब पूजा करना, भक्ति करना। यहां गीता ज्ञान दाता ने स्पष्ट
किया है जिनका ज्ञान त्रिगुणमई माया के द्वारा हरा जा चुका है। यहां गुणों से मतलब सीधा तीनों देवताओं से है क्योंकि
गुणों को नहीं भजा जाता। यहां गीता ज्ञान दाता का कहना है कि जिनका ज्ञान इन त्रिगुणमई माया के द्वारा अथवा इन तीनों
देवताओं के द्वारा हरा जा चुका है। मतलब जो इन देवताओं को ही भगवान मान चुके हैं। वो असुर स्वभाव को धारण किए हुए मूढ़ यानी
मूर्ख लोग मुझे भी नहीं भजते। दर्शकों यही प्रमाण श्री देवी भागवत पुराण के पंचम स्कंध अध्याय 11 श्लोक नंबर छह से सात
पृष्ठ नंबर 630 पर है। हे जननी जो मनुष्य माया के गुणों से प्रभावित होकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश, चंद्रमा, अग्नि, यम,
[संगीत] वायु, गणेश आदि प्रमुख देवताओं की स्तुति करते हैं। वे अज्ञानी ही हैं। क्योंकि क्या वे देवता भी आपकी कृपा शक्ति
के बिना उन मनुष्यों को कार्य फल प्रदान करने में समर्थ हो सकते हैं? हे अंब जो लोग सुविस्तृत यज्ञ में देवताओं को अधिकृत
करके अग्नि में पुष्कल आहुति देते हैं वे मंदमती हैं क्योंकि यदि स्वाहा के रूप में आप ना होती तो वे देवता हवीर द्रव्य को
कैसे पाते तब फिर वे मूढ़ आपका ही यजन क्यों नहीं करते दर्शकों यह सिद्ध हुआ कि हमारे हिंदू धर्म के शीर्ष शंकराचार्यों
को भी अपने शास्त्रों का ज्ञान नहीं है। केवल सुनी सुनाई बातों को भोली जनता के सामने सुनाकर केवल झूठी महिमा बनाए बैठे
हैं। वास्तविक ज्ञान मैंने अपने ही पवित्र शास्त्रों से आप सबके सामने रख दिया है। दर्शकों ऐसा नहीं है कि आदरणीय शंकराचार्य
जी पुराणों को नहीं मानते। हिंदू धर्म में प्रत्येक व्यक्ति और स्वयं शंकराचार्य जी भी पुराणों को परम सत्य मानते हैं। देखिए
शंकराचार्य जी स्वयं इस बात की पुष्टि कर रहे हैं। तो शंकराचार्य जी क्या आप पुराणों को भी
सत्य मानते हैं? परम सत्य। आप जी पुराणों को भी सत्य मानते हैं?
मानते हैं। क्या आप जी पुराणों को सत्य मानते हैं? सत्य ही है।
क्या आप पुराणों को भी सत्य मानते हैं? नहीं पुराण सत्य है। पुराण को हम कैसा असत्य माने? हमारे लिए पुराण सत्य ही है।
दर्शकों यदि पुराण परम सत्य हैं और पुराणों में ब्रह्मा विष्णु महेश के पिता सदाशिव अर्थात काल ब्रह्म है और इनकी माता
देवी दुर्गा जी हैं तो फिर शंकराचार्य जी जो ज्ञान इस बच्चे को दे रहे हैं वो क्या है? दर्शकों आखिर समाज के सामने ब्रह्मा
विष्णु महेश को सर्वशक्तिमान बताकर भ्रमित क्यों किया जा रहा है? तीनों देवताओं को एक ही तत्व बताकर बार-बार झूठ बोला जाता
है। जबकि ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीन देवता हैं और तीनों देवी दुर्गा और काल ब्रह्म के पुत्र हैं। यह बात मैंने अपने पवित्र
पुराणों से सिद्ध कर दी है। लेकिन यह तमाम धर्मगुरु शास्त्र विरुद्ध ज्ञान देकर समाज को सर्व सुखों से और पूर्ण मोक्ष से वंचित
कर रहे हैं। आज मेरे अतिरिक्त इस धरती पर कोई पूर्ण संत नहीं है। इतना अद्भुत और गूढ़ ज्ञान [संगीत] जो हमारे ही पवित्र
शास्त्रों में छुपा था, उसको केवल मैंने ही भक्त समाज को बताया और समझाया है। दर्शकों, रामचरितमानस,
शिव पुराण, देवी भागवत पुराण, मार्कंडेय पुराण [नाक से की जाने वाली आवाज़] तथा श्रीमद्भगवत गीता जी से यह स्पष्ट हो गया
कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश यह तीनों काल ब्रह्म और देवी दुर्गा के पुत्र हैं। लेकिन आत्मा रूप में सबकी उत्पत्ति पूर्ण
परमात्मा से हुई है। देवी दुर्गा और काल की उत्पत्ति भी पूर्ण परमात्मा से ही हुई है। रामचरितमानस की इस चौपाई में बिल्कुल
स्पष्ट है कि वेद जिन्हें नेति कहकर निरूपण करते हैं, वो आनंद स्वरूप, उपाधि रहित और अनुपम है। जिनके अंश से अनेकों
शिव, ब्रह्मा और विष्णु भगवान प्रकट होते हैं। कि वेदों में जिसको पूर्ण परमात्मा बताया गया है, वह पूर्ण परमात्मा इतना
समर्थ है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश उनके अंश से आत्म रूप में प्रकट हुए हैं। यहां स्पष्ट है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव
पूर्ण परमात्मा नहीं है। जिसके अंश से यह तीनों देवता उत्पन्न होते हैं, वह पूर्ण परमात्मा हैं। रामचरितमानस में कहा है कि
ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन अमल सहज सुखरासी यानी ईश्वर से ही उत्पन्न होने के कारण आत्मा अविनाशी है यानी आत्मा कभी
नहीं मरती जिसका समर्थन गीता अध्याय 15 श्लोक 16 भी करता है। आत्मा को अविनाशी इसीलिए कहा गया है क्योंकि आत्मा रूप में
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, दुर्गा व क्षर पुरुष यानी गीता ज्ञान दाता तथा सर्व प्राणियों की उत्पत्ति उसी पूर्ण परमात्मा
ने की है। इसलिए रामचरितमानस में लिखा है कि अनेकों ब्रह्मा, विष्णु, महेश उस सच्चिदानंद ब्रह्म से आत्मा रूप में
उत्पन्न होते हैं। जिस परमात्मा से सभी प्राणी आत्मा रूप में उत्पन्न हुए हैं। उस परमात्मा को गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में
उत्तम पुरुष कहा गया है। उसी परमात्मा को तीनों लोकों में धारण पोषण करने वाला परमात्मा तथा वास्तव में अविनाशी परमेश्वर
कहा गया है। जो गीता ज्ञान दाता से अन्य है। वास्तव में अविनाशी है। गीता अध्याय चार श्लोक पांच और नौ में तथा गीता जी
अध्याय दो श्लोक 12 में तथा गीता अध्याय 10 श्लोक दो में गीता ज्ञान दाता यानी क्षर पुरुष ने अपने आप को नाशवान कहा है
तथा स्वीकार किया है कि अर्जुन मेरे और तेरे बहुत जन्म हो चुके हैं उनको तू नहीं जानता मैं जानता हूं। इससे सिद्ध हो जाता
है कि क्षर पुरुष यानी गीता ज्ञान दाता जो ब्रह्मा विष्णु महेश के स्थूल शरीर का पिता है वह भी अविनाशी नहीं है। उसका शरीर
भी नष्ट होता है। अब आपको गीता अध्याय 15 श्लोक 16 से भी स्पष्ट करते हैं। इस श्लोक में कहा है कि दो पुरुष हैं। क्षर पुरुष
और अक्षर पुरुष तथा इनके अंतर्गत सब प्राणियों के शरीर तो नाशवान है। यानी यह सब नष्ट होते हैं परंतु आत्मा सब की
अविनाशी है। इसलिए ही रामचरितमानस में कहा है कि ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन अमल सहज सुख राशि यानी परमात्मा का अंश होने के
कारण आत्मा का कभी नाश नहीं होता। गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में पूर्ण परमात्मा को उत्तम पुरुष और अविनाशी इसलिए कहा गया है
क्योंकि उत्तम पुरुष यानी पूर्ण परमात्मा का शरीर भी अविनाशी है। इस उत्तम पुरुष को परमात्मा भी इसलिए कहा गया है क्योंकि यह
पूर्ण रूप से अविनाशी है। सब आत्माओं का स्वामी है। जिसका शरीर भी कभी नष्ट नहीं होता। इस उत्तम पुरुष के लोक में किसी
प्रकार का कोई दुख नहीं है। यह किसी को दुख नहीं देता। सिर्फ सुख ही सुख देता है। जिस गीता ज्ञान दाता काल के लोक में हम रह
रहे हैं। इस लोक के मालिक को परमात्मा नहीं कहा जा सकता। क्योंकि इस काल लोक में कोई सुखी नहीं है। इसलिए पूरी गीता जी में
गीता ज्ञान दाता ने अपने को कहीं भी परमात्मा नहीं कहा। केवल उस उत्तम पुरुष को ही परमात्मा तथा अविनाशी परमेश्वर कहा
है। दर्शकों गीता जी में अन्य स्थानों पर जहां भी परमात्मा शब्द से संबोधन किया गया है, वह इसी उत्तम पुरुष अर्थात सच्चिदानंद
घन ब्रह्म के विषय में बोला गया है। अर्थात पूर्ण परमात्मा का शरीर कभी नष्ट नहीं होता। इसीलिए इस श्लोक में लिखा है
कि वह उत्तम पुरुष तो अन्य ही है जो वास्तव में अविनाशी है। उसी को परमात्मा कहा गया है। मैं सभी को आदि सनातनी भक्ति
पर इसलिए दृढ़ कर रहा हूं ताकि हम सब आदि सनातनी भक्ति करके उस उत्तम पुरुष के अविनाशी लोक में चले जाएं। जहां जाने वाली
सभी जीवात्माओं को भी अविनाशी शरीर प्राप्त होता है। अविनाशी शरीर होने के कारण उस शाश्वत लोक में पुनर्जन्म व
मृत्यु नहीं होती। जहां जाने के बाद साधक लौटकर इस काल लोक में कभी वापस नहीं आते। इसी को पूर्ण मोक्ष कहा जाता है। गीता
अध्याय 18 श्लोक 62 में गीता ज्ञान दाता इसी अविनाशी लोक की बात कर रहा है। यही वो शाश्वत यानी सदा रहने वाला स्थान सतलोक
है। जहां जाने के बाद साधक इस संसार में यानी इस क्षर पुरुष गीता ज्ञान दाता जो ब्रह्मा विष्णु महेश के स्थूल शरीर का
पिता है। इस ब्रह्म के लोक में लौटकर कभी वापस नहीं आते। उस सनातन परमधाम यानी सतलोक में जाने के बाद ही आत्मा को
अविनाशी शरीर प्राप्त होता है। जिस शरीर का कभी नाश नहीं होता। उस परमधाम यानी सतलोक में वृद्ध अवस्था नहीं होती। वहां
शरीर सदा ही युवा रहता है। किसी के शरीर की मृत्यु नहीं होती। वहां आत्मा को हमेशा के लिए अमर शरीर प्राप्त होता है। इसी को
पूर्ण मोक्ष कहते हैं। क्योंकि गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 18 के श्लोक 62 में कहा है कि हे अर्जुन तू सर्वभाव से उस
परमात्मा की शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से तू परम शांति और सनातन परमधाम को प्राप्त होगा। फिर गीता अध्याय 15 के
श्लोक चार में कहा है कि तत्वदर्शी संत से तत्वज्ञान प्राप्त करने के पश्चात परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए
जहां जाने के बाद साधक लौटकर संसार में कभी वापस नहीं आते अर्थात उनका पूर्ण मोक्ष हो जाता है। दर्शकों वो सनातन
परमधाम यही सतलोक है। इसका विस्तार से वर्णन मेरे द्वारा लाइव डिबेट परिचय प्रभु का किस्त एक, दो तथा तीन में किया गया है।
इन सभी डिबेट की वीडियो [संगीत] का लिंक इस वीडियो के डिस्क्रिप्शन बॉक्स में दे दिया है। जबकि तथाकथित धर्मुगुरु इन्हीं
तीनों देवताओं को पूर्ण परमात्मा बताकर भक्त समाज को गलत भक्ति बता रहे हैं। बल्कि रामचरित्रमानस से यह स्पष्ट हुआ कि
यह पूर्ण परमात्मा नहीं है। मनु और सतरूपा आदि सनातनी पूजा करते थे। यानी श्री रामचरितमानस बालकांड में बताए गए
सच्चिदानंद ब्रह्म का स्मरण करते थे। गीता जी में भी इसी सच्चिदानंद ब्रह्म की साधना करने को कहा है। गीता अध्याय 17 श्लोक 23
में इसी सच्चिदानंद ब्रह्म को पाने का ओम तत सत मंत्र बताया गया है जो सांकेतिक है। सतयुग में इन्हीं मंत्रों का जाप किया
जाता था। आगे चलकर ऋषियों ने अपने मत अनुसार मनमानी साधना शुरू कर दी जो सनातनी पूजा के पतन का कारण बना। गीता अध्याय चार
श्लोक 34 में इस मंत्र की सही जानकारी तत्वदर्शी संत से प्राप्त करने को कहा है। इसी सच्चिदानंद ब्रह्म को गीता अध्याय 15
श्लोक 17 में उत्तम पुरुष कहा गया है। कहा है कि यही उत्तम पुरुष तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण पोषण करता है। इसी
सच्चिदानंद ब्रह्म को गीता अध्याय आठ श्लोक तीन में परम अक्षर ब्रह्म कहा है। गीता अध्याय आठ श्लोक आठ नौ 10 में इसी
सच्चिदानंद ब्रह्म की महिमा बताई गई है। गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में भी इसी सच्चिदानंद ब्रह्म की शरण में जाने को कहा
गया है। गीता ज्ञान दाता अध्याय 18 श्लोक 64 में इसी सच्चिदानंद ब्रह्म को अपना इष्ट देव बता रहा है। दर्शकों गीता अध्याय
15 श्लोक चार में भी गीता ज्ञान दाता स्वीकार करता है कि गीता अध्याय चार श्लोक 34 में बताए तत्वदर्शी संत से ज्ञान
प्राप्त करके उसके पश्चात परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहां जाने के पश्चात साधक फिर लौटकर संसार में कभी नहीं
आते। जिस परमेश्वर से इस संसार रूपी वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है। यानी जिसने सर्व सृष्टि की रचना की है,
उसकी भक्ति करो। मैं भी उसी परमेश्वर की शरण में हूं। दर्शकों आपको शंका हो सकती है कि गीता अध्याय 15 श्लोक चार में
अनुवाद गलत है। इसके लिए गीता अध्याय 18 श्लोक 64 को देखिए जिसमें गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि हे अर्जुन मैंने जो गीता
अध्याय 18 श्लोक 63 में गुप्त बात बताई है उससे गुप्त से भी गुप्त अति गोपनीय बात बताता हूं कि गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में
बताया उत्तम पुरुष जो मेरे से अन्य है। जो सबका धारण-पोषण करने वाला परमात्मा तथा अविनाशी कहा है, [संगीत] वह परम अक्षर
ब्रह्म मेरा भी इष्ट देव यानी पूजित देव है। आपको फिर शंका हो सकती है कि गीता अध्याय 18 श्लोक 64 में अनुवादक ने इष्टह
का अर्थ प्रिय किया है। इसका उत्तर यह है कि इसी अनुवादक ने गीता अध्याय 18, श्लोक 70 में इष्ट शब्द का अर्थ पूजित किया है।
इससे सिद्ध हो जाता है कि गीता अध्याय 15 श्लोक चार में गीता ज्ञान दाता ने अपने को उसी सच्चिदानंद घन ब्रह्म की शरण में
बताया है। दर्शकों गीता जी की तरह रामचरितमानस की यह चौपाई भी यही सिद्ध कर रही है कि पूर्ण परमात्मा ब्रह्मा विष्णु
शिव तथा ब्रह्म नहीं है। वास्तव में सच्चिदानंद ब्रह्म कोई और है जिसकी साधना स्वयं ब्रह्म भी करता है। दर्शकों
रामचरितमानस की इस चौपाई में यह स्पष्ट है कि पूर्ण परमात्मा ये तीनों देवता ब्रह्मा विष्णु और शिव नहीं है। पूर्ण परमात्मा
सच्चिदानंद घन ब्रह्म है। सच्चिदानंद घन ब्रह्म कौन है? इसका विस्तार से वर्णन मेरे द्वारा [संगीत] लाइव डिबेट परिचय
प्रभु का किस्त एक, दो तथा तीन में किया गया है। इन सभी डिबेट की वीडियो का लिंक इस वीडियो के डिस्क्रिप्शन बॉक्स में दे
दिया है। बालकांड दोहा नंबर 145 चौपाई नंबर एक में लिखा है कि सुनु सेवक सुर तरु सुरधेनु विधि हरिहर बंदित पद रेणु सेवत
सुलभ सकल सुखदायक प्रणतपाल सचराचर नायक हे प्रभु सुनिए आप सेवकों के लिए कल्पवृक्ष और कामधेनु है। आपकी चरण रज की ब्रह्मा
विष्णु और शिव जी भी वंदना करते हैं। आप सेवा करने में सुलभ हैं तथा सब सुखों के देने वाले हैं। आप शरणार्थी के रक्षक और
जड़ चेतन के स्वामी हैं। इस चौपाई से स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्मा विष्णु महेश भी अन्य परमात्मा की यानी सच्चिदानंद
ब्रह्म की भक्ति करते हैं। बालकांड दोहा नंबर 149 चौपाई नंबर तीन तुम ब्रह्मादि जनक जग स्वामी ब्रह्म सकल उर अंतर्यामी
आप ब्रह्मा आदि के भी पिता हैं। यानी उत्पन्न करने वाले हैं। जगत के स्वामी हैं और सबके हृदय के भीतर की जानने वाले
ब्रह्म हैं। दर्शकों इस चौपाई में यह बताया गया है कि काल ब्रह्म ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि के जनक हैं। अर्थात काल
ब्रह्म के अंतर्गत आने वाले सभी लोकों में रहने वाले प्राणियों के स्थूल शरीर की उत्पत्ति काल ब्रह्म और दुर्गा देवी से
हुई है। यहां दर्शक भ्रमित ना हो कि रामचरितमानस के बालकांड [संगीत] के दोहा नंबर 143 की चौपाई नंबर तीन में लिखा है
कि उस सच्चिदानंद ब्रह्म से अनेकों ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पन्न हुए हैं और बालकांड के दोहा नंबर 149 की चौपाई नंबर
तीन में लिखा है कि ब्रह्मा विष्णु महेश ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं। यह फर्क क्यों है? दर्शकों इस चौपाई में ब्रह्मा विष्णु
महेश को जन्म देने वाले की बात हो रही है और इस चौपाई में काल ब्रह्म देवी दुर्गा और ब्रह्मा विष्णु महेश सहित सभी आत्माओं
को आत्मा रूप में प्रकट करने वाले सच्चिदानंद घन परमात्मा की बात हो रही है। काल ब्रह्म सहित 21 ब्रह्मांड में मौजूद
सभी प्राणी इसी परमात्मा के अंश हैं। सब आत्माओं का स्वामी परम अक्षर ब्रह्म है। जिसमें काल अर्थात यह ब्रह्म, दुर्गा
अर्थात यह जगमुला तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश व संसार के सभी प्राणी शामिल हैं। जबकि इस चौपाई में यह बताया है कि
ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि का जन्म ब्रह्म और दुर्गा से हुआ है। दर्शकों, इस चौपाई में जिस ब्रह्म की बात हो रही है, यही
ब्रह्म ब्रह्मा विष्णु महेश का पिता है। इसी ब्रह्म को गीता अध्याय 15 श्लोक 16 में क्षर पुरुष कहा गया है। दर्शकों क्षर
का अर्थ नाशवान होता है जैसा कि आप यहां गीता अनुवाद में भी देख रहे हैं और यही बात इसी काल ब्रह्म ने गीता अध्याय दो
श्लोक 12 में गीता अध्याय चार श्लोक पांच और नौ में गीता अध्याय 10 के श्लोक दो में भी स्वीकार की है। कहा है कि अर्जुन तेरे
और मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं। अर्थात तेरी और मेरी जन्म मृत्यु होती रहती है। अर्थात मैं भी नाशवान हूं। अर्थात क्षर
ब्रह्म हूं। शर ब्रह्म का अर्थ है नाशवान प्रभु। गीता अध्याय आठ। श्लोक 13 में भी इस ब्रह्म की साधना का एक ओम मंत्र बताया
गया है। गीता अध्याय 14 श्लोक तीन में भी इसी ब्रह्म गीता ज्ञान दाता ने अपनी पत्नी मूल प्रकृति यानी दुर्गा को बताया है। फिर
आगे गीता अध्याय 14। श्लोक चार में इसी ब्रह्म ने कहा है कि यह मूल प्रकृति यानी दुर्गा सभी प्राणियों की माता है और इस
प्रकृति यानी दुर्गा की योनि में बीज स्थापित करने वाला मैं पिता ब्रह्म हूं। फिर आगे गीता अध्याय 14 श्लोक पांच में
इसी ब्रह्म ने कहा है कि हे अर्जुन सत्वगुण रजोगुण और तमोगुण यह प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को
शरीर में बांधते हैं। मार्कंडेय पुराण से आपको पहले ही प्रमाणित कर चुके हैं कि रजोगुण ब्रह्मा जी हैं। तमोगुण शंकर जी
हैं और सतोगुण विष्णु जी हैं। यही तीन देवता हैं। यही तीन गुण हैं। दर्शकों इससे सिद्ध होता है कि यह तीनों देवता सत्वगुण
विष्णु, रजोगुण ब्रह्मा और तमोगुण शिव जी, यह प्रकृति अर्थात दुर्गा से उत्पन्न हुए हैं। दर्शकों यह ब्रह्म कौन है? तीनों
देवता दुर्गा और काल से कैसे उत्पन्न हुए? पूर्ण परमात्मा कौन है? इसका विस्तार से वर्णन मेरे द्वारा लाइव डिबेट परिचय प्रभु
का किस्त एक, दो तथा तीन में किया गया है। इन सभी [संगीत] डिबेट की वीडियो का लिंक इस वीडियो के डिस्क्रिप्शन बॉक्स में दे
दिया है। बालकांड दोहा नंबर 147 चौपाई नंबर एक में लिखा है कि पद राजीवर्णी नहीं जाही मुनि मन मधुप बसह जेन माही बाम भाग
सोभति अनुकूला आदि शक्ति छवि निधि जगमूला जिनमें मुनियों के मन रूपी भौरे बसते हैं। भगवान के उन चरण कमलों का तो वर्णन ही
नहीं किया जा सकता। भगवान के बाएं भाग में सदा अनुकूल रहने वाली शोभा की राशि जगत की मूल कारण रूपा आदि शक्ति श्री जानकी जी
सुशोभित है। दर्शकों अनुवादकर्ता [संगीत] ने यहां आदि शक्ति जगमूला का अर्थ श्री जानकी जी अर्थात सीता जी कर दिया। जबकि
मूल पाठ में स्पष्ट लिखा है कि आदि शक्ति छवि निधि जगमूला यह जगमूला [संगीत] दुर्गा देवी हैं। लेकिन अनुवादकर्ताओं ने
श्री राम जी को मद्देनजर रखते हुए यहां जगमूला का अर्थ जानकी अर्थात सीता जी कर दिया। यहां आदि शक्ति जगमूला दुर्गा देवी
अर्थात प्रकृति देवी हैं। दर्शकों इस दोहे में स्पष्ट किया गया है कि काल ब्रह्म के बाएं [संगीत] भाग में श्री दुर्गा जी
विराजमान रहती हैं। धार्मिक मान्यता है कि पत्नी पति के बाम [संगीत] भाग में विराजे। यहां दुर्गा जी अर्थात आदि शक्ति जगमूला
का ब्रह्म के बाम [संगीत] भाग में बैठने का वर्णन है। दर्शकों अब चौपाई नंबर दो पर आते हैं। बालकांड के दोहा [संगीत] नंबर एक
147 की चौपाई नंबर दो में लिखा है कि जासू अंश उपजहिम [संगीत] गुणखानी अगणित लक्ष्मी उमा ब्रह्माणी। दर्शकों इस पंक्ति में भी
दुर्गा जी की महिमा का वर्णन है। कहा है जिनके अंश से अर्थात दुर्गा जी के अंश से अगणित लक्ष्मी पार्वती और ब्रह्माणी
त्रिदेवों की शक्तियां [संगीत] अर्थात तीनों देवताओं की पत्नियां उत्पन्न होती हैं। भृकुटी [संगीत] विलास जासू जग
होई अर्थात दुर्गा जी के बोहों के इशारे से ही जगत की रचना हो जाती है। अब इस दोहे [संगीत] की यह जो पंक्ति है जिसमें लिखा
है कि रामबा दिस सीता सोई। यहां पर सीता जी का श्री राम जी के बाएं भाग में बैठने का वर्णन है। दर्शकों यहां सीता जी का
जिक्र [संगीत] केवल उदाहरण के तौर पर किया गया है। कहा है कि जिस प्रकार सीता जी श्री राम जी के बाम भाग में बैठती हैं,
उसी प्रकार देवी दुर्गा [संगीत] जी भी ब्रह्म के बाम भाग में बैठती हैं। ऊपर वाली इस चौपाई में दुर्गा जी द्वारा
ब्रह्म के बाएं भाग में बैठने [संगीत] की बात कही गई है। और इस पंक्ति में राम के बाएं भाग में सीता जी के बैठने की बात कही
गई है। इसी प्रकार ब्रह्मा जी के बाएं [संगीत] भाग में सावित्री जी बैठी होती हैं और शिव जी के बाएं भाग में पार्वती जी
बैठी होती हैं। ठीक इसी प्रकार यहां श्री राम अर्थात विष्णु [संगीत] जी के बाएं भाग में सीता जी अर्थात लक्ष्मी जी बैठी हैं।
जिस प्रकार श्री राम जी श्री विष्णु जी के अवतार हैं। अर्थात विष्णु जी ही [संगीत] श्री राम हैं। उसी प्रकार सीता जी लक्ष्मी
जी का अवतार हैं। अर्थात सीता जी ही लक्ष्मी जी हैं। सीता जी को दुर्गा जी नहीं [संगीत] कह सकते क्योंकि सीता जी
अर्थात लक्ष्मी जी तो दुर्गा जी अर्थात जगमूला से उत्पन्न होती है। रामचरितमानस [संगीत]
की इस चौपाई में भी स्पष्ट लिखा है कि उस आदि शक्ति जगमूला [संगीत] से अनेकों लक्ष्मी पार्वती तथा ब्रह्माणी उत्पन्न
होती हैं। इससे सिद्ध होता है कि सीता जी जगमूला [संगीत] नहीं है। इस चौपाई में आदि शक्ति दुर्गा देवी जी का ब्रह्म के बाएं
भाग में बैठने [संगीत] का वर्णन है। और इस चौपाई में यह बताया गया है जैसे सीता जी श्री राम जी [संगीत] के बाम भाग में बैठती
हैं। उसी प्रकार देवी दुर्गा जी भी ब्रह्म के बाम भाग [संगीत] में बैठती हैं। दर्शकों सीता जी तो श्री राम जी के बाम
भाग में बैठी दिखाई देती हैं। लेकिन दुर्गा जी काल ब्रह्म के बाम भाग में बैठी दिखाई नहीं देती। तुलसीदास जी को [संगीत]
दिव्य दृष्टि प्राप्त थी। इसलिए उनको यह दृश्य दिख रहा था कि जिस प्रकार सीता जी श्री राम के बाम भाग में बैठी हैं, उसी
प्रकार दुर्गा जी भी ब्रह्म [संगीत] के बाम भाग में बैठी हैं। इसलिए दर्शक अनुवाद को देखकर भ्रमित ना हो कि सीता जी आदि
शक्ति हैं अर्थात जगमूला [संगीत] है। आदि शक्ति दुर्गा देवी हैं। इसी देवी दुर्गा से लक्ष्मी पार्वती और ब्रह्माणी अर्थात
सावित्री की उत्पत्ति हुई है। रामचरितमानस की इन दोनों चौपाइयों ने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया। सोचने की बात है कि सीता
जी तो खुद लक्ष्मी जी का अवतार थी और चौपाई नंबर दो कह रही है कि मूल प्रकृति से लक्ष्मी जी उत्पन्न हुई है। इससे भी
सिद्ध हो जाता है कि बालकांड के दोहा [संगीत] नंबर 147 की चौपाई नंबर एक में जिस जगमुला की बात हो रही है, वह सीता जी
नहीं है बल्कि देवी [संगीत] दुर्गा जी ही हैं। देवी दुर्गा जी से ही सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती जी उत्पन्न हुई हैं।
यह तीनों देवियां दुर्गा जी से कैसे उत्पन्न हुई? यह जानने के लिए मेरे द्वारा लाइव डिबेट परिचय प्रभु का किस्त एक, दो
तथा तीन में किया गया है। इन सभी डिबेट की वीडियो का लिंक इस वीडियो के डिस्क्रिप्शन बॉक्स में दे दिया है। दर्शकों इस चौपाई
में जिस मूल कारण रूपा आदि शक्ति की बात हो रही है। इसी मूल कारण आदिशक्ति प्रकृति यानी दुर्गा को गीता ज्ञान दाता ब्रह्म ने
गीता अध्याय 14 श्लोक तीन में अपनी पत्नी होने का संकेत किया है। फिर आगे गीता अध्याय 14 श्लोक चार में इसी ब्रह्म ने
कहा है कि यह मूल प्रकृति यानी दुर्गा सभी प्राणियों की माता है और इस प्रकृति यानी दुर्गा की योनि में बीज स्थापित करने वाला
मैं पिता ब्रह्म हूं। फिर आगे गीता अध्याय 14 श्लोक पांच में इसी ब्रह्म ने कहा है कि हे अर्जुन सत्वगुण रजोगुण और तमोगुण ये
प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बांधते हैं। दर्शकों इससे सिद्ध होता है कि यह तीनों देवता
सतगुण विष्णु, रजोगुण ब्रह्मा और तमोगुण शिव जी यह प्रकृति अर्थात दुर्गा से उत्पन्न हुए हैं। मार्कंडेय पुराण से आपको
पहले ही प्रमाणित कर चुके हैं कि रजोगुण ब्रह्मा जी हैं, तमोगुण शंकर जी हैं और सतोगुण विष्णु जी हैं। यही तीन देवता हैं।
यही तीन गुण हैं। दर्शकों यही प्रमाण हमें देवी भागवत पुराण में भी मिलता है। दर्शकों, यह है देवी भागवत पुराण तीसरा
स्कंध जिसमें विष्णु जी देवी दुर्गा की स्तुति करते हुए कहते हैं कि तुम शुद्ध स्वरूपा हो। यह सारा संसार तुम्ही से
उद्भाषित हो रहा है। मैं ब्रह्मा और शंकर हम सभी तुम्हारी कृपा से ही विद्यमान हैं। हमारा आविर्भाव और तिरोभाव हुआ करता है।
केवल तुम ही नित्य हो। जगत जननी हो प्रकृति और सनातनी देवी हो। भगवान शंकर बोले हे देवी यदि महाभाग विष्णु तुम से
प्रकट हुए हैं तो उनके बाद उत्पन्न होने वाले ब्रह्मा भी तुम्हारे ही बालक हुए। फिर मैं तमोगुणी लीला करने वाला शंकर क्या
तुम्हारी संतान नहीं हुआ अर्थात मुझे भी उत्पन्न करने वाली तुम ही हो संसार की सृष्टि करने में तुम बड़ी चतुर हो अपनी
इच्छा के अनुसार क्रीड़ा करती और शांत भी हो जाती हो इस संसार की सृष्टि स्थिति और संहार में तुम्हारे गुण सदा समर्थ हैं।
उन्हीं तीनों गुणों से उत्पन्न हम ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर नियमानुसार कार्य में तत्पर रहते हैं। दर्शकों, देवी
भागवत पुराण ने यह स्पष्ट किया कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश ही तीन गुण हैं अर्थात तीन देवता हैं। यह तीनों देव
नाशवान है और दुर्गा इनकी माता है तथा दुर्गा को ही प्रकृति कहते हैं। बालकांड दोहा नंबर 147
चौपाई नंबर दो में लिखा है कि जासू अंश उपजहिंग गुणखानी अगणित लक्ष्मी उमा ब्रह्माणी जिनके अंश से गुणों की खान
अगणित लक्ष्मी पार्वती और ब्राह्मणी त्रिदेवों की शक्तियां उत्पन्न होती हैं तथा जिनकी भह के इशारे से ही जगत की रचना
हो जाती है। इस चौपाई में मूल प्रकृति दुर्गा और पति ब्रह्म की बात हो रही है। सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती कैसे पैदा हुई?
यह जानना दिलचस्प रहेगा। इसका विस्तार से वर्णन मेरे द्वारा लाइव डिबेट परिचय प्रभु का किस्त [संगीत]
1, 2 तथा तीन में किया गया है। इन सभी डिबेट की वीडियो का लिंक इस वीडियो के डिस्क्रिप्शन बॉक्स में दे दिया है।
दर्शकों जिस प्रकार रामचरितमानस को तुलसीदास जी ने रामचंद्र जी के जीवन काल के लाखों वर्ष बाद अपनी दिव्य दृष्टि से
विक्रमी संवत 1631 अर्थात सन 1574 में लिखा जो संपूर्ण हिंदू समाज को आज मान्य है। इसी प्रकार संत गरीब
दास जी महाराज को कबीर परमात्मा ने दिव्य दृष्टि देकर सूक्ष्म वेद यानी अमर ग्रंथ विक्रमी संवत 1787 सन 1730 में लिखवाया
था। कबीर परमात्मा ने स्वयं इस दिव्य ज्ञान को कबीर सागर में लिपिबद्ध करवाया क्योंकि सूक्ष्म वेद में लिखी सब बातें
इसलिए भी प्रमाणित हैं क्योंकि यह सब प्रमाणित ग्रंथों से मेल खाती है। गरीब दास जी ने सूक्ष्म वेद में कहा है कि
रजगुण ब्रह्मा तमगुण शंकर सतगुण विष्णु कहावे रे चौथे पद का भेद न्यारा कोई बिरला साधु पावे रे। भावार्थ है कि तीनों देवता
अर्थात श्री ब्रह्मा जी रजगुण हैं। श्री विष्णु जी सतगुण हैं तथा श्री शंकर जी तमगुण हैं। इनका पिता चौथा है जो इन तीनों
का रूप धारण करके एक ब्रह्मांड में बने 14 लोकों का संचालन करता है। उस चौथे का भेद भी कोई तत्वदर्शी संत ही जानता है। कबीर
साहिब जी ने कहा है कि चारों छोड़ जो पंचम को ध्यावे कह कबीर वह हम तक आवे अर्थात जो इन चारों से ऊपर पांचव परम अक्षर ब्रह्म
की पूजा करता है वह पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है। जो प्रमाण आपको रामचरितमानस में मिले वह सूक्ष्म वेद में विस्तार से मिलते
हैं। दर्शकों रामचरितमानस से यह स्पष्ट हुआ कि पूर्ण परमात्मा श्री कृष्ण उर्फ विष्णु जी नहीं हैं। लेकिन हमारे धर्म
गुरु क्यों इन पवित्र शास्त्रों के विपरीत ज्ञान दे रहे हैं? मैंने हिंदू धर्म के इस पवित्र शास्त्र से प्रमाणित किया कि
ब्रह्मा विष्णु महेश पूर्ण परमात्मा की साधना करते हैं। ब्रह्म यानी काल इनका पिता है। दुर्गा इनकी माता है। दर्शकों
रामचरितमानस की यह चौपाई एक बार फिर से पढ़ते हैं जिसमें कहा है कि तीनों देवता उस सच्चिदानंद ब्रह्म यानी पूर्ण परमात्मा
की भक्ति करते हैं। देखिए बालकांड दोहा नंबर 145 चौपाई नंबर एक में लिखा है कि सुनु सेवक सुरत तरु सुरधेनु विधि हरिहर
वंदित पद रेणु सेवत सुलभ सकल सुखदायक प्रणतपाल सचराचर नायक हे प्रभु सुनिए आप सेवकों के लिए कल्प वृक्ष और कामधेनु है।
आपकी चरण रज की ब्रह्मा विष्णु और शिव जी भी वंदना करते हैं। आप सेवा करने में सुलभ हैं तथा सब सुखों के देने वाले हैं। आप
शरणार्थी के रक्षक और जड़ चेतन के स्वामी हैं। इस चौपाई से स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्मा विष्णु महेश भी अन्य परमात्मा की
यानी सच्चिदानंद ब्रह्म की भक्ति करते हैं। दर्शकों आपने देखा कि श्री ब्रह्मा जी श्री विष्णु जी और श्री शिव जी पूर्ण
परमात्मा की भक्ति करते हैं। दर्शकों आपके मन में यह शंका उत्पन्न हो रही होगी कि फिर इन देवताओं [संगीत] को यह भक्ति किसने
बताई? अर्थात तीनों देवताओं को यह भक्ति बताने वाला कौन है? इनका गुरु कौन है? दर्शकों इस शंका का निवारण मैंने सूक्ष्म
वेद से किया है। देखिए यह वीडियो। अनंत कोटि ब्रह्मांड का एक रति निभार। सतगुरु पुरुष कबीर हैं ये कुल के सजनहार।
अयोध्या दशरथ ना होते और नहीं रामचंद्र अवतार। रावण गर्भ ना जन्मिया वह लंका का सिकदार
एक कबीर पुरुष अनादि और सकल है बाद एक कबीर परमात्मा अविनाशी हैं और सभी नाशवान रचनहार जगत गुरु यह लीला अगम अगाद
अगम संदेशा आदि है यह होते सूर न चंद गरीबदास जी बता रहे हैं कि पहले सूरज चंद भी नहीं थे। उसको पहले की कथा सुनाता हूं।
शिव वृच पतिया भय ये बारू जेते अंद गरीब सिंधु शब्द में सहल कर फिर आए ब्रह्मा
पास। गरीब दास जी कहते हैं कबीर साहिब ने बताया कबीर साहिब ने बताया था कि मैंने ब्रह्मा,
विष्णु और शिव इन सबको मंत्र दिए थे। यह मेरे शष्य बने थे। क्या बता रहे हैं? शब्द सिंधु में सहल
[संगीत] कर फिर आए ब्रह्मा पास। मंत्र नाम सुनाइया ये चेरा की ना दास। ब्रह्मा जी को ओम मंत्र दिया परमात्मा ने।
ब्रह्मा जी ओम मंत्र का जाप करता है। और फिर ब्रह्मा जी से कहा था कि एक और मंत्र दूंगा सतनाम।
जब [संगीत] आपकी दृढ़ता देखूंगा और दोबारा जब परमात्मा गए तो काल ने ब्रह्मा जी को भ्रमित कर दिया कि यह कुछ
नहीं जानता यह झूठ बोलता है तो बुद्धि बदल गई। आगे रुचि ब्रह्मा जी ने नहीं दिखाई तो परमात्मा ने अगला मंत्र नहीं किया। फिर
क्या बताते हैं? एक शब्द से सब ये ब्रह्मा विष्णु महेश कच मच कोम गति सस पुनि धुन शेष
कहते अक्षर समुंदर हम गए शेष सुनाया नाम रम राम अगाद धुन शेष सेस ब जाऊं
हम दाता दानी सुरु और ब्रह्मा दीना नाम शब्द स्वरूपी उतरे सत शब्द निर्वाण हम बैरागी ब्रह्म पद सन्यासी महादेव
क्या कहते हैं परमात्मा कि हम बैरागी ब्रह्म पद और सन्यासी महादेव और सो हम नाम दिया शिव जी को वो करे हमारी सेव श्वेत
भूमि का हम गए विष्णु विश्वंभर नाथ हम इस विष्णु जी के लोक में गए। इनका श्वेत लोक है। अभी इस नकली लोक बना रखे।
सतलोक से मिलती जुलती कुछ श्वेत लोक है विष्णु जी का भी। लेकिन वो सपेती उसके बहुत कम है जो सतलोक वाली। तो वहां कहते
हैं श्वेत भूमि का हम गए जहां विष्णु विष्ना। हरिम हीरा नाम दे अष्ट कमल दल स्वा
दर्शकों मैंने अमर ग्रंथ की जिन वाणियों को अपने मुखारविंद से पढ़कर सुनाया है उनसे यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया है कि
परमात्मा कबीर जी [संगीत] जब सबसे पहले इस संसार में आए तब सबसे पहले ब्रह्मा जी को [संगीत] मिले। ब्रह्मा जी ने कबीर
परमात्मा के ज्ञान को बड़ी रुचि से सुना और ओम नाम कबीर परमात्मा से प्राप्त किया। इसी प्रकार शंकर जी के पास आए उनको ज्ञान
सुनाया। शंकर जी ने कबीर [संगीत] परमात्मा से सोहम मंत्र प्राप्त किया। उसके बाद कबीर परमात्मा जी विष्णु जी के पास आए।
उनको हरि नाम दिया। इसी प्रकार दुर्गा जी और गणेश जी [संगीत] को भी कबीर परमात्मा मिले। गणेश जी को किले मंत्र दिया और
दुर्गा जी को श्री मंत्र दिया। इन सभी को कबीर परमात्मा ने अपनी महिमा और [संगीत] ज्ञान बताया था और एक-एक मंत्र इनको दिया
था। क्योंकि यह देवता गण भी कबीर प्रभु के बच्चे हैं क्योंकि पिता की दृष्टि में सर्व संतान एक [संगीत] समान होती है।
पूर्ण ब्रह्म कबीर देव सभी को सुखी देखना चाहते हैं। इसलिए इन देवताओं को शरण में लेने के लिए प्रभु कबीर [संगीत] देव जी ने
इन देवताओं को एक-एक नाम प्रदान किया। ताकि यह देवता [संगीत] गण इन नामों का जाप करते रहें और सुखी रहें। यह देवता गण खुद
भी कबीर [संगीत] प्रभु द्वारा दिए गए नाम का जाप करते हैं। इसलिए इन नामों का जाप करने वाले साधक को [संगीत] यह देवता गण
तुरंत लाभ प्राप्त करवाते हैं। इस विषय पर मैंने बड़े सरल और प्रमाणित तरीके से प्रकाश डाला है। सुनिए। अब जैसे परमात्मा
कहते हैं इन तीनों को हमने प्रथम बार एक-एक मंत्र दिया ताकि इनकी दृढ़ता देखूं। यह कुछ विश्वास मेरे पर करेंगे तो कंप्लीट
कोर्स दूंगा। तो कहते हैं हम श्वेत भूमि का हम गए जहां विष्णु विंभर नाथ और हरियम हीरा नाम दे
ओए होए और अष्ट कमल दल स्वाद जहां विष्णु जी रहते हैं नाभि कमल में इसके अष्ट कमल है और इनको हरियम नाम दिया अब यह भी हरियम
नाम जाप करते हैं और हम इनको इसी नाम से पुकारते हैं। हम भी वही जाप करते हैं। तो इनको कसक होती है कि यह उसी परम संत से ही
संबंधित है और उससे आकर्षित होकर के विवश होकर के अब देखो पुण्य आत्माओं परमात्मा कितने दयालु है। अब जैसे
आप ब्लूटूथ से एक मोबाइल में दूसरे मोबाइल में कोई चीज डालते हो तो दोनों ओपन करने
पड़ते हैं। इसी प्रकार परमात्मा ने वह पहले ओपन कर रखे हैं। और तुम अपना ओपन कर लो। अपने आप को शक्ति [संगीत] आप में आनी
शुरू हो जाएगी। उनके तो पहले ओपन कराई। तो कहने का भाव यह है कि जो जो नाम इन सभी देवों को मालिक ने दे रखे हैं ये उन्हीं
का जाप करते हैं। यह इनकी पूजा नहीं समझना। मंत्र इनसे लाभ लेने के हैं। और वही मंत्र आज आप जाप कर रहे हो तो यह
विवश है। इनके बस की बात नहीं। क्योंकि वह पहले ब्लूटूथ ओपन कर दिए भगवान ने उनके पहला करे। अब आपके कर दिए लूट लो लूट इस
राम नाम की। दर्शकों जिस प्रकार रामचरितमानस को तुलसीदास जी ने रामचंद्र जी के जीवन काल के लाखों वर्ष बाद अपनी
दिव्य दृष्टि से विक्रमी संवत 1631 अर्थात सन 1574 में लिखा जो संपूर्ण हिंदू समाज को आज मान्य है। इसी प्रकार संत गरीब
दास जी महाराज को कबीर परमात्मा ने दिव्य दृष्टि देकर सूक्ष्म वेद यानी अमर ग्रंथ विक्रमी संवत 1787 सन 1730 में लिखवाया
था। कबीर परमात्मा ने स्वयं इस दिव्य ज्ञान को कबीर सागर में लिपिबद्ध करवाया क्योंकि सूक्ष्म वेद में लिखी सब बातें
इसलिए भी प्रमाणित हैं क्योंकि यह सब प्रमाणित ग्रंथों से मेल खाती है। गरीब दास जी ने सूक्ष्म वेद में कहा है कि
रजगुण ब्रह्मा तमगुण शंकर सतगुण विष्णु कहावे रे चौथे पद का भेद न्यारा कोई बिरला साधु पावे रे। भावार्थ है कि तीनों देवता
अर्थात श्री ब्रह्मा जी रजगुण हैं। श्री विष्णु जी सतगुण हैं तथा श्री शंकर जी तमगुण हैं। इनका पिता चौथा है जो इन तीनों
का रूप धारण करके एक ब्रह्मांड में बने 14 लोकों का संचालन करता है। उस चौथे का भेद भी कोई तत्वदर्शी संत ही जानता है। कबीर
साहिब जी ने कहा है कि चारों छोड़ जो पंचम को ध्यावे कह कबीर वह हम तक आवे अर्थात जो इन चारों से ऊपर पांचवें परम अक्षर ब्रह्म
की पूजा करता है वह पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है। जो प्रमाण आपको रामचरितमानस में मिले वो
सूक्ष्म वेद में विस्तार से मिलते हैं। दर्शकों जिस प्रकार कबीर परमेश्वर जी ने ब्रह्मा विष्णु शिव गणेश तथा दुर्गा जी को
जो आदि सनातनी भक्ति दी थी वही आदि सनातनी भक्ति सतयुग में मनु और सतरूपा को भी दी थी। मनु और सतरूपा दोनों सत सुकृत रूप में
सतयुग में प्रकट कबीर परमात्मा से दीक्षा लेकर आदि सनातनी पूजा करते थे। गीता जी में भी यही प्रमाण है जिसमें लिखा है कि
ओम तत्सत इति निर्देश ब्राह्मण त्रिविध स्मृतः ब्राह्मणा तेन विवेदा च यज्ञा च विहितापुरा भावार्थ है कि सृष्टि अर्थात
सतयुग के आदिल में ब्राह्मण ऋषि जन ओम तत सत मंत्रों का जाप करते थे जो कि सच्चिदानंद घन ब्रह्म के नाम कहे जाते
हैं। काल ब्रह्म ने बाद में मनु और सतरूपा को चारों वेदों वाला ज्ञान प्रदान किया और ओम नाम जाप करने का विधान बताया। काल
ब्रह्म से भ्रमित होकर मनु और सतरूपा ने सत सुकृत रूप में आए कबीर देव के ज्ञान को मानने से इंकार कर दिया और उनको वामदेव
कहने लगे। इसकी संपूर्ण जानकारी [संगीत] मेरे द्वारा की गई लाइव डिबेट परिचय प्रभु का किस्त एक, दो और तीन में है जिसका लिंक
डिस्क्रिप्शन बॉक्स में है। आइए आपको सबसे पहले वह प्रमाण दिखाते हैं जिसमें यह स्पष्ट हो जाएगा कि मनु और सतरूपा सत
सुकृत रूप में आए कबीर परमात्मा से प्राप्त आदि सनातनी भक्ति के मंत्र जाप करते थे। रामचरितमानस के बालकांड के दोहा
नंबर 143 पर गौर कीजिएगा जिसमें लिखा है कि द्वादश अक्षर मंत्र पूर्ण जपह ही सहित अनुराग वासुदेव पद पंकरहु दंपति मण अतिलाग
अनुवाद किया है कि मनु और सदरूपा द्वादश अक्षर मंत्र का प्रेम सहित जप करते थे। दर्शकों यहां मंत्र जाप करने के बारे में
कहा गया है। जबकि अनुवादकर्ता ने ओम नमो भगवते वासुदेवाय को द्वादश अक्षर मानकर अनुवाद में लिख दिया। हिंदू धर्म के
धर्मगुरु इसी ओम नमो भगवते वासुदेवाय को द्वादश अक्षर मंत्र बता रहे हैं। देखिए और मैं जिस मंत्र की आज बात करने वाला हूं वो
है ओम नमो भगवते वासुदेवाय। और इस मंत्र को द्वादशाक्षर मंत्र क्यों कहा जाता है? तो आप इस मंत्र के प्रत्येक
अक्षर को अगर गिने तो ओम न मो भ ग व ते वा सु दे दे वा य यानी 12 तो इस मंत्र के जो अक्षर है मंत्राक्षर है वो कुल मिलाकर 12
है। इसीलिए इसको द्वादशाक्षर मंत्र कहा जाता है। ओम नमो भगवते वासुदेवाय को इस प्रकार
द्वादश अक्षर परिभाषित किया है। अनुवादकर्ता ने लिखा है ओम नमो भगवते वासुदेवाय। अब अगर अक्षरों को गिना जाए तो
पहला अक्षर है ओम जिसमें अक्षरों की संख्या है एक। इसी प्रकार नमो कुल अक्षर दो भगवते कुल अक्षर चार वासुदेवाय कुल
अक्षर पांच। इसको जोड़ने पर कुल अक्षर 12 होते हैं। दर्शकों लेकिन यह वह 12 अक्षर नहीं है। जबकि हम गणेशाय नमः ओम नमः शिवाय
कबीर देवाय नमः पूर्ण परमात्मने नमः आदि शब्दों को प्रभु की स्तुति करने से पहले प्रणाम रूप में बोलते हुए सुनते हैं। यह
मंत्र नहीं है। दर्शकों इसी विषय पर आपको प्रेमानंद जी की एक वीडियो दिखाते हैं जिसमें प्रेमानंद जी भी यह स्वीकार कर रहे
हैं कि ओम नमो भगवते वासुदेवाय अथवा ओम कृष्णा देवाय नमः आदि यह मंत्र नहीं है। यह जप करने का नहीं है।
महर्षि आपने सत्संग में कृष्णााय वासुदेवाय वाला मंत्र बताया था। उसको किस विधि में से जपा जाए फिर?
यह तो प्रार्थना पुकार है। उसका जप का मतलब थोड़ी है। दर्शकों सच यही है कि ओम नमः शिवाय ओम नमो
कृष्णााय वासुदेवाय ओम नमो भगवते वासुदेवाय यह मंत्र हैं ही नहीं। यह तो केवल प्रणाम वाक्य है जो केवल नमन करने के
लिए बोले जाते हैं। इस बात की पुष्टि जानेमाने कथावाचक प्रदीप मिश्रा जी भी कर रहे हैं। इनका भी यही मानना है कि ओम नमः
शिवाय केवल प्रणाम वाक्य है। हम अपने मुख से पंचाक्षर मंत्र का जाप करते हैं। नमः
शिवाय बोलते हैं तो शंकर जी को नमन होता है। जब हम अपने मुख से षडाक्षर मंत्र का जाप
करते हैं, ओम नमः शिवाय कहते हैं तो शिव जी को प्रणाम होता है। दर्शकों अभी आपको कथावाचक पंडित गिरी बापू
जी के विचार भी सुनाते हैं। उनका भी यही कहना है कि ओम नमः शिवाय मंत्र नहीं है। यह केवल प्रणाम वाक्य है। उन्होंने तो ओम
नमः शिवाय का अर्थ भी बताया है। सुनिए। ओम नमः शिवाय मंत्र का अर्थ क्या है? ओम का अर्थ है समस्त ब्रह्मांड। अनंत कोटि
ब्रह्मांड नमः का अर्थ है नमस्कार शिव का अर्थ है कल्याण शिवाय का अर्थ है शिव और शिवाय हे भगवान
शिव और शिवाय नमस्कार करते हैं हम पूरे ब्रह्मांड का आप कल्याण करो ऐसा अर्थ इस मंत्र का रहता है
ओम नमः शिवाय कोई मंत्र नहीं है यह तो सिर्फ प्रार्थना है प्रणाम रूप में बोले जाने वाला एक वाक्य मात्र है जैसा की इन
कथावाचकों व धर्म गुरुओं ने खुद भी इस बात को अपने प्रवचनों में स्वीकार किया है। दर्शकों जिस प्रकार यह प्रमाणित हुआ कि ओम
नमः शिवाय मंत्र नहीं है। यह केवल प्रणाम वाक्य है। उसी प्रकार यह द्वादश अक्षर ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र नहीं है। यह भी
प्रणाम वाक्य ही है। अनुवादकर्ताओं को द्वादश अक्षर का यथार्थ ज्ञान ना होने से तथा तत्व ज्ञान के अभाव से द्वादश अक्षर
मंत्र को गलत परिभाषित किया है। जबकि मूल पाठ में कहीं भी ओम नमो भगवते वासुदेवाय नहीं लिखा है। यदि द्वादश अक्षर मंत्र ओम
नमो भगवते वासुदेवाय होता तो तुलसीदास जी रामचरितमानस की इस चौपाई में अवश्य लिख देते। लेकिन तुलसीदास जी [संगीत] ने इस
प्रणाम वाक्य को कहीं द्वादश अक्षर मंत्र नहीं लिखा। इससे स्पष्ट है कि ओम नमो भगवते वासुदेवाय द्वादश अक्षर मंत्र नहीं
है। द्वादश अक्षर मंत्र कौन सा है? आइए जानते हैं जो मैंने प्रमाणित करते हुए [संगीत] विस्तार से समझाया है। इस दोहे का
यथार्थ अनुवाद है कि मनु और सतरूपा सतयुग के आदि में द्वादश अक्षरों के मंत्रों का जाप बड़े ही अनुराग अर्थात कसक के साथ
करते थे। पूर्ण परमात्मा अर्थात वासुदेव पर उन राजा और रानी का पूर्ण विश्वास हो गया था। दर्शकों आपको वासुदेव का अर्थ भी
विस्तार से बताएंगे। पहले यह जान लेते हैं कि मनु और सदरूपा जिन 12 अक्षरों के मंत्रों का जाप करते थे वो 12 अक्षर के
मंत्र कौन से हैं? दर्शकों अनुवादकर्ता ने यहां जिन 12 अक्षरों के मंत्रों का वर्णन किया है। यह वो 12 अक्षर मंत्र नहीं है
जिनका जाप मनु और सदुपा जी करते थे। अनुवादकर्ता और वर्तमान धर्म गुरुओं के अनुसार श्री कृष्ण जी वासुदेव हैं। इसलिए
उन्होंने मनमाने ढंग से उन 12 अक्षर के मंत्रों को ओम नमो भगवते वासुदेवाय लिख दिया। जबकि श्री कृष्ण जी तो द्वापर युग
में हुए हैं तथा मनु और सतरूपा जी सतयुग में हुए हैं। आइए आपको विस्तार से बताते हैं वो द्वादश अक्षर मंत्र अर्थात वो 12
अक्षर मंत्र कौन से हैं जिनका जाप मनु और शतरूपा जी करते थे। दर्शकों पहले आपको हिंदू धर्म के दो शीर्ष शंकराचार्यों के
विचार सुनाते हैं। जिनमें एक हैं श्री निश्चनंद जी और दूसरे हैं श्री माधवाचार्य जी। आइए पहले श्री निश्चनंद जी के विचार
सुनते हैं। एक ही परमात्मा सृष्टि [गला साफ़ करने की आवाज़] के
प्रारंभ में स्वयं को पांच रूपों में व्यक्त करते हैं। उत्पत्ति नामक कृति का निर्वाह करने के
लिए स्वयं को हिरणघर ब्रह्मा बना देते हैं। हिरणघर ब्रह्मा के रूप में व्यक्त होते हैं। स्थिति नामक कृति का पालन रक्षण
नामक कृति का निर्वाह करने के लिए वे विष्णु के रूप में श्रीमन नारायण के रूप में स्वयं को प्रकट करते हैं। संहार नामक
कृति का निर्वाह करने के लिए शिव के रूप में प्रकट करते हैं। निग्रह नामक कृति का निर्वाह करने के लिए कृत माने कार्य।
शक्ति के रूप में स्वयं को व्यक्त करते हैं। अनुग्रह नामक कृति का निर्वाह करने के लिए गणपति या गणेश के रूप में स्वयं को
प्रकट करते हैं। श्री निश्चनंद जी ने बताया है कि काल ब्रह्म के लोक में इन मुख्य पांच देवी
देवताओं ने काल ब्रह्म की सारी व्यवस्थाओं को संभाला हुआ है। यह पांच देवता मुख्य तौर पर हिंदू धर्म में पूजे जाते हैं। आइए
अब आपको शंकराचार्य माधवाचार्य जी के भी विचार सुनाते हैं जिसमें वे भी स्वीकार [संगीत] कर रहे हैं कि हिंदू धर्म में
मुख्य तौर पर इन पंचदेव की भक्ति होती है। सुनिए माधवाचार्य जी के विचार। आप जी का इष्ट देव कौन है?
इष्ट देव तो कोई भी हो सकता है। हम सभी हमारे हम उपासना करते हैं। पांच देवता होते हैं।
तो दर्शकों देखा आपने दोनों ही शंकराचार्यों [संगीत] जी ने यह बताया है कि हिंदू धर्म में इन पंच देवों की भक्ति
का प्रावधान है। वे पंच देवता इस प्रकार हैं। ब्रह्मा जी, विष्णु जी, शिव जी, देवी दुर्गा जी और गणेश जी। दर्शकों शंकराचार्य
[संगीत] जी बिल्कुल सही बता रहे हैं कि यह पंचदेव काल ब्रह्म के लोक की व्यवस्था को संभालते [संगीत] हैं। यह देवता प्रत्येक
मनुष्य के शरीर में बने कमलों में विराजमान रहते हैं। इसलिए भक्ति साधना में इन पंचदेव का विशेष स्थान [संगीत] है।
दर्शकों अब आपको इन देवी देवताओं की यथार्थ स्थिति के बारे में बताते हैं। विडंबना है कि कुछ धर्मगुरु तो इन देवी
देवताओं के अस्तित्व को ही नहीं मानते और कुछ धर्मगुरु इन देवी देवताओं को ही फाइनल गॉड अर्थात पूर्ण परमात्मा माने बैठे हैं।
संत रामपाल जी महाराज ने इन देवी देवताओं की स्थिति को [संगीत] बिल्कुल प्रमाणित और सही-सही बताया है। दर्शकों, आज तक हमारे
धर्म गुरुओं ने हमें यही बताया था कि भगवान श्री कृष्ण [संगीत] उर्फ विष्णु जी, ब्रह्मा जी, शिव जी से ऊपर कोई भगवान नहीं
है। वो अखिल ब्रह्मांड के स्वामी हैं। दर्शकों, पहली बात तो यह है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश यह अखिल ब्रह्मांड के
स्वामी नहीं हैं। ना ही तीन लोक के स्वामी हैं बल्कि तीन लोकों में एक-एक विभाग के अधिकारी हैं। यह सब आप अच्छे से जानते ही
हैं कि रजगुण विभाग के ब्रह्मा जी, सतगुण विभाग के [संगीत] विष्णु जी और तमगुण विभाग के शिव जी अधिकारी हैं। जैसे एक
राज्य में एक मुख्यमंत्री होता है तथा अन्य मंत्री भी होते हैं। मान लीजिए कि एक राज्य में 23 जिले हैं। उन सब जिलों के
ऊपर अलग-अलग विभागों का एक-एक मंत्री भी होता है। दर्शकों, वह मंत्री उस पूरे राज्य में एक विभाग का मंत्री होता है। उस
मंत्री को पूरे राज्य का स्वामी नहीं कह सकते। इसी प्रकार इस ब्रह्मांड [संगीत] रूपी राज्य में 14 लोक अर्थात जिले जानो
और उन 14 जिलों में से इन तीन जिलों में यानी तीन लोकों स्वर्ग लोक [संगीत] पाताल लोक और पृथ्वी लोक में एक-एक विभाग के
मालिक हैं ब्रह्मा विष्णु महेश यानी इन तीन लोकों में ब्रह्मा जी [संगीत] का विभाग है रजोगुण जिससे जीवों की उत्पत्ति
होती है। विष्णु जी का विभाग है सतोगुण जिससे [संगीत] जीवों का पालन पोषण होता है और शिव का विभाग है तमोगुण जिससे जीवों
[संगीत] का संहार होता है। इन तीनों देवताओं के पिता जिसको ब्रह्म कहते हैं जो क्षर पुरुष है उसको इस ब्रह्मांड का यानी
इस राज्य का मुख्यमंत्री जानो। दर्शकों यह ब्रह्मक्षर पुरुष यानी मुख्यमंत्री अपने पास इनमें से कोई भी विभाग कभी भी रख लेता
है। अर्थात यह सभी विभाग [संगीत] इसी ब्रह्म के अंतर्गत आते हैं क्योंकि यह ब्रह्मांड यानी प्रांत का भी मालिक होता
है। इसी प्रकार यह ब्रह्म इन तीनों देवताओं के ऊपर स्वामी है। इसीलिए यह काल ब्रह्म क्षर पुरुष इन तीनों देवताओं का
रूप बनाकर इस ब्रह्मांड [संगीत] की व्यवस्था को भी संभालता है। यही काल ब्रह्म कभी विष्णु का रूप बनाकर तो कभी
शिव का रूप बनाकर कभी ब्रह्मा का रूप बनाकर इस ब्रह्मांड में मौजूद 14 लोकों की व्यवस्थाएं [संगीत] संभालता है। जबकि
ब्रह्मा, विष्णु, महेश केवल तीनों लोकों में एक-एक विभाग की व्यवस्था संभालते हैं। हमारे धर्म गुरु [संगीत] गलतफहमी के कारण
विष्णु जी को सर्वेशवा मानकर यह धारणा बनाकर बैठे थे कि विष्णु ही शिव बन जाता है। विष्णु ही ब्रह्मा बन जाता है। कभी
शिव के बारे में यह धारणा बना लेते थे कि शिव ही ब्रह्मा बन जाता है। शिव ही विष्णु [संगीत] बन जाता है। कहते थे कि यह तीनों
देवता एक ही हैं। इनमें कोई फर्क नहीं है। जबकि यह सब कलाबाजी उस काल [संगीत] ब्रह्म की है। जिसने प्रतिज्ञा कर रखी है कि मैं
कभी किसी के सामने प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आऊंगा। जिसका प्रमाण गीता अध्याय सात के श्लोक 24 और 25 में मिलता है। जिसमें
यह काल ब्रह्म खुद स्वीकार करता है और श्री कृष्ण जी [संगीत] में प्रवेश करके अर्जुन को बताता है कि यह बुद्धिहीन जन
समुदाय मेरे अनुत्तम नियम से अपरिचित है कि मैं कभी भी अपने वास्तविक रूप में किसी के सामने प्रकट नहीं [संगीत] होता। अपनी
योग माया से छुपा रहता हूं। इसलिए मुझ अव्यक्त को मनुष्य रूप में [संगीत] आया हुआ अर्थात कृष्ण मानते हैं। अपने इस
अनुतम नियम के कारण ही यह अपने पुत्रों [संगीत] का रूप बनाकर इन 14 लोकों में सब कार्य करता है। काल ब्रह्म ने अव्यक्त
रहने की प्रतिज्ञा कब और क्योंकि यह तत्वज्ञान केवल [संगीत] मैंने ही प्रमाणित करके बताया है। कृपया मेरे द्वारा की गई
लाइव डिबेट परिचय प्रभु का किस्त [संगीत] एक, दो और तीन अवश्य देखिए। जैसे मुख्यमंत्री किसी विभाग के कार्य की फाइल
पर जब हस्ताक्षर करते हैं यानी किसी विभाग का कार्य खुद करने जाते हैं तो उस समय मंत्री की हैसियत से हस्ताक्षर [संगीत]
करते हैं। जबकि होते वो मुख्यमंत्री ही हैं। लेकिन उस समय वो उस विभाग का कार्य देख रहे होते हैं। इसी प्रकार जब इस
ब्रह्म को ब्रह्मा, विष्णु या शिव के स्तर का कार्य खुद करना होता है तो इनका रूप बनाकर वहां प्रकट हो जाता है। इसके बाद
आता है अक्षर पुरुष जिसको उप प्रधानमंत्री [संगीत] के समान जानो। उसके बाद आते हैं सबसे ऊपर
वाले पद पर। परम अक्षर ब्रह्म उनको प्रधानमंत्री जानो। वो सब प्रांतों का स्वामी है और किसी भी राज्य के किसी भी
जिले में हस्तक्षेप कर सकता है। अर्थात सब राज्यों का यानी सब लोगों पर ऑल ओवर कंट्रोलर होता है। अगर कोई एक विभाग के
मंत्री को प्रधानमंत्री [संगीत] बताए तो यह उसकी नासमझी है। यदि कोई यह कहे कि प्रांत का मंत्री कोई [संगीत] मायने नहीं
रखता तो वह भी महामूर्ख हैं। इसलिए मैं इन सभी देवी देवताओं से लेकर परम अक्षर ब्रह्म तक की स्थिति को अच्छे से जानते
[संगीत] हुए कभी किसी देवता का अर्थात किसी मंत्री का अनादर नहीं करते और ना ही किसी मंत्री को प्रधानमंत्री बताकर अर्थात
ब्रह्मा विष्णु [संगीत] महेश को पूर्ण परमात्मा बताकर उस प्रधानमंत्री यानी पूर्ण परमात्मा का अनादर करते हैं। ऐसी
गलती सिर्फ वो लोग कर सकते हैं जिनको यह तत्वज्ञान नहीं है। दर्शकों आपसे पुनः निवेदन है कि इन सभी देवी [संगीत] देवताओं
की और पूर्ण परमात्मा की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए डिस्क्रिप्शन बॉक्स पर दिए गए लिंक पर क्लिक करके परिचय प्रभु
का किस्त एक, दो और तीन को अवश्य देखिए। आप मेरे प्रवचनों पर न सही लेकिन अपने पवित्र शास्त्रों को कदापि अनदेखा नहीं कर
सकते हैं। यह सभी गढ़ [संगीत] रहस्य मैंने पवित्र शास्त्रों से ही बताए हैं। दर्शकों काल ब्रह्म के लोक से निकलने के लिए तथा
हर प्रकार की सुविधा प्राप्त [संगीत] करने के लिए इन्हीं पंच देवी देवताओं की साधना करनी होती है। दर्शकों इनसे यह सब
सुविधाएं प्राप्त करने के लिए इनकी साधना का द्वादश अक्षर मंत्र का जाप करना पड़ेगा। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इन
सभी शंकराचार्यों को तथा हिंदू धर्म के इन सभी कथावाचकों, धर्मगुरुओं और प्रचारकों को द्वादश अक्षर मंत्र की जानकारी नहीं
है। जो इन्हीं पांच देवी देवताओं की साधना के यथार्थ मंत्र हैं। सभी शंकराचार्य तथा हिंदू धर्म के ये सभी कथावाचक धर्मगुरु और
प्रचारक इन देवी देवताओं का मूल मंत्र इस द्वादश अक्षर ओम नमो भगवते वासुदेवाय को माने बैठे हैं और इसी मंत्र का जाप करके
मोक्ष की आस लगाए बैठे हैं। यदि सभी शंकराचार्यों तथा हिंदू धर्म के इन प्रचारकों की बात को सत्य माना जाए तो यह
मंत्र पांच देवताओं की भक्ति अर्थात साधना का नहीं हो सकता। क्योंकि यह मंत्र तो केवल वासुदेव के लिए है जिसे सभी
शंकराचार्य जी श्री कृष्ण अर्थात विष्णु जी के तौर पर मानते हैं। जबकि शंकराचार्य जी खुद यह स्वीकार कर रहे हैं कि हिंदू
धर्म में मुख्य पांच देवी देवता हैं जो काल ब्रह्म की सब व्यवस्थाओं को संभालते हैं और यही पंच देवता इस लोक में सर्व
सुविधाएं प्राप्त करवाते हैं। दर्शकों इन पंचदेव साधना के यथार्थ द्वादश अक्षर मंत्र आपके सामने [संगीत] उजागर करने जा
रहे हैं। जिनको वर्तमान में केवल और केवल मैंने ही दुनिया के सामने उजागर किया है। तो आइए देखते हैं मनु और शतरूपा जी इन
पांच देवी देवताओं [संगीत] के कौन से द्वादश अक्षर मंत्रों का जाप करते थे। दर्शकों मनु और सतरूपा जी सतयुग के आदि
में पंचदेव के यथार्थ मंत्रों का जाप करते थे। जिन मंत्रों को मैं भी प्रथम दीक्षा के समय अपने शिष्यों को देता हूं। इन पांच
देवों के मंत्रों के द्वादश अक्षर मंत्र इस प्रकार हैं। जिनका जाप मनु और शतरूपाजी करते थे। ओम किम हरिम श्रीम सोहम। दर्शकों
इस प्रकार इन अक्षरों को जोड़कर देखा जाए तो कुल 12 अक्षर बनते हैं। दर्शकों ये 12 अक्षर का एक मंत्र कहलाता है और इस एक
मंत्र को साधक को प्रतिदिन 108 बार करना होता है। यही वो 12 अक्षर मंत्र है। इनका जाप मनु और सतपाजी करते थे। यह आदि सनातनी
पूजा के प्रथम चरण के मंत्र हैं। इन्हीं मंत्रों को मैं अपने शिष्यों को देता हूं। दर्शकों आप सोच रहे होंगे यह जो ओम शब्द
है इसको एक ही अक्षर क्यों गिना गया जबकि सुनने व बोलने में एक प्रतीत नहीं हो रहा। इस शंका के निवारण के लिए हमें गीता जी
अध्याय आठ के श्लोक 13 को देखना होगा। जिसकी संस्कृत में लिखा है कि ओम इति एकाक्षरम जिसके अनुवाद में लिखा है कि ओम
इस एक अक्षर रूप का अर्थात ब्रह्म के नाम का चिंतन करता हुआ। दर्शकों गीता जी से यह स्पष्ट हो जाता है कि ओम को एक ही अक्षर
गिना जाता है। इसी प्रकार यहां शिव पुराण में भी प्रमाण है कि वह प्रणव ओम नामक एक अक्षर हो गया। इसी प्रकार रामचरितमानस की
इस चौपाई में भी अनुवादकर्ता ने ओम को एक अक्षर गिना है। तभी यह 12 अक्षर होते हैं। दर्शकों इससे स्पष्ट है कि शास्त्रों के
आधार पर ओम शब्द को एक अक्षर ही गिना जाता है। दर्शकों, किसी भी श्रद्धालु को यह शंका नहीं रहनी चाहिए कि यह अक्षर सही हैं
या यह वाले अक्षर सही हैं। जैसा कि आप इसी रामचरितमानस की इस चौपाई में देख रहे हैं कि यहां अक्षर शब्द लिखा है। यहां यह
अक्षर शब्द संत भाषा में लिखा गया है। जबकि इस अक्षर शब्द को अगर हम शुद्ध करके लिखेंगे तो ऐसे लिखेंगे। इसमें ना तो च
शब्द है और ना ही छ शब्द है। लेकिन यह दोनों ही शब्द अक्षर का बोध करवाते हैं। अनुवादकर्ता ने द्वादश अक्षर शब्द का अर्थ
द्वादशाक्षर किया है। यानी अक्षर शब्द को अक्षर लिखा है जो बिल्कुल ठीक है। इसी प्रकार इन मंत्रों को व्याकरण की दृष्टि
से देखने में भिन्नता नजर आ रही है। लेकिन यह इन देवी देवताओं के मूल मंत्र होने का ही बोध करवाते हैं। इसी प्रकार एक और शब्द
है। यह देखिए रामचरितमानस की इस चौपाई में लक्ष्मी शब्द है जो कि संत भाषा में इस प्रकार लिखा गया है। लेकिन यदि इस शब्द को
शुद्ध करके लिखेंगे तो लक्ष्मी शब्द बन जाएगा। इसी प्रकार रामचरितमानस के इस दोहे में ओरु शब्द लिपिबद्ध है जो कि संत भाषा
के दृष्टिकोण से लिखा गया है। लेकिन अनुवादक ने इस शब्द का अनुवाद करते समय ओरु को और लिखा है। दर्शकों दोनों शब्द
समान अर्थ का बोध करवा रहे हैं। इसी प्रकार लक्षी को अनुवादक ने लक्ष्मी लिखा है। अर्थात लच्छी संत भाषा के दृष्टिकोण
से लिखा गया है और लक्ष्मी व्याकरण की दृष्टिकोण से लिखा गया है। लेकिन दोनों शब्द श्री लक्ष्मी का बोध करवाते हैं। ठीक
इसी तरह जैसे यहां यह किलियम शब्द और यह किलिम शब्द दोनों ही श्री गणेश जी के मूल मंत्र का बोध करवा रहे हैं। इसलिए सभी
श्रद्धालुओं से निवेदन है कि आप यह देखकर भ्रमित ना हो कि एक ही मंत्र अलग-अलग तरह से क्यों लिखा अथवा बोला गया है। दर्शकों,
यह आदि सनातनी पूजा के प्रथम चरण के द्वादश अक्षर मंत्र हैं। इन मंत्रों को केवल पूर्ण संत से लेकर ही जाप किया जाता
है। तत्वदर्शी संत ही इन मंत्रों को जाप करने की विधि बताता है। आपको शंका हो सकती है कि इन मंत्रों का प्रमाण और किस ग्रंथ
में है। दर्शकों, यह तो प्रमाणित [संगीत] हो ही चुका है कि आदि सनातनी पूजा के अंतर्गत आने वाले इन द्वादश अक्षर मंत्रों
को सतयुग के आदि में सत सुकृत रूप में आए कबीर परमात्मा ने मनु और सतरूपा को दिया था। जिसके कुछ वर्ष बाद यह भक्ति लुप्त हो
गई। दर्शकों यही द्वादश अक्षर मंत्र कलयुग में आज से लगभग 600 वर्ष पहले कबीर परमात्मा ने इन द्वादश अक्षर मंत्रों का
जाप अपने शिष्यों को दिया था। जिसका प्रमाण आपको कबीर शब्दावली के पेज 77 पर देखने को मिलेगा। जिसमें कबीर साहिब जी
[संगीत] का एक शब्द है कर नैनो दीदार महल में प्यारा है। कबीर साहिब जी ने अपने इस शब्द में इन द्वादश अक्षर मंत्रों [संगीत]
को स्पष्ट लिखा है। वाणी है कि कर नैनो दीदार महल में प्यारा है। फिर आगे लिखा है मूल कमल दल चतुर बखानो किलिम जाप लाल रंग
मानो देव गणेश तहां रोपा थानो रिद्धि सिद्धि चवर ढुलारा है। स्वाद चक्र षट दल विस्तारो ब्रह्मा सावित्री रूप निहारो उलट
नागिनी का सिर मारो तहां शब्द ओंकारा है नाभि [संगीत] अष्ट कमल दल साझा सेत सिंहासन विष्णु विराजा हरिम जाप तासु मुख
गाजा लक्ष्मी शिव आधारा है द्वादश कमल हृदय के माही जग गौरी शिव [संगीत] ध्यान लगाई सोहम शब्द तहां धुन छाई गण करे जय
जयकारा है शोडस दल कमल [संगीत] कंठ के माही तेह मध्य बसे अविद्या बाई हरिहर ब्रह्मा चवर ढुराई जहां श्रीम नाम उच्चारा
है। दर्शकों कबीर साहिब जी के इस शब्द में वो द्वादश अक्षर मंत्र स्पष्ट लिखे हैं जो सृष्टि के आदि में मनु और सत उपाजी करते
थे। यहां संत भाषा में शब्दों को अलग तरह से लिखा गया है। दर्शकों संतों ने अपनी स्थानीय भाषा [संगीत] को मध्य नजर रखते
हुए संत भाषा में इन द्वादश अक्षर मंत्रों को इस तरह लिखा है। व्याकरण की दृष्टि से इन द्वादश अक्षर मंत्रों को इस तरह लिखा
जाता है। लेकिन यह सभी शब्द इन्हीं द्वादश अक्षरों का बोध करवा रहे हैं। आपको एक प्रमाण और दिखाते हैं। 600 वर्ष पहले कबीर
परमात्मा ने इन द्वादश अक्षर मंत्रों को लिपिबद्ध [संगीत] करवाया। जिसके बाद फिर से इन द्वादश अक्षर मंत्रों का लोप हो गया
था। कबीर परमात्मा ने आज से लगभग 300 साल पहले फिर प्रकट होकर गरीब दास जी महाराज को छुड़ानी में आकर इन द्वादश अक्षर
मंत्रों को प्रदान [संगीत] किया। प्रमाण के लिए देखिए गरीब दास जी महाराज द्वारा रचित अमर ग्रंथ जिसके ब्रह्म कला अंग में
और मुक्ति मुद्रा अंग में यह द्वादश अक्षर मंत्र स्पष्ट लिखे हैं। देखिए यह है ब्रह्म कला अंग जिसमें यह द्वादश अक्षर
मंत्र स्पष्ट लिखे हैं। और यह देखिए यह है मुक्ति मुद्रा अंग जिसमें यह द्वादश अक्षर मंत्र स्पष्ट लिखे हैं। यही पांच मंत्र
कबीर परमात्मा ने संत शिरोमणि रविदास जी को दिए थे। जिनका जाप रविदास जी किया करते थे। जिसका प्रमाण पुस्तक सद्गुरु समन दास
ज्ञान प्रकाश के पृष्ठ नंबर 31 पर भी है। देखिए ओम किलिम किलिम हरिम हरिम श्रीम श्रीम सोहम सोहम मंत्र स्पष्ट लिखे हैं।
जिसका जाप संत शिरोमणि रविदास जी भी किया करते थे। इन्हीं द्वादश अक्षर मंत्रों का जाप परमात्मा कबीर जी ने नानक जी को दिया
था। जिसको नानक जी स्वयं जाप करते थे। कबीर परमात्मा ने बाबा नानक जी को दूसरे चरण की साधना का यथार्थ मंत्र सतनाम भी
प्रदान किया था। जिसको बाबा नानक जी ने कभी किसी को आगे जपने के लिए नहीं दिया। प्रथम चरण में मिलने वाले इन द्वादश
अक्षरों वाले मंत्रों को बाबा नानक जी ने आगे गुरु परंपरा में केवल गद्दी पर बैठने वाले उत्तराधिकारी को इन द्वादश अक्षरों
वाले मंत्रों का भेद बताया। जिसका प्रमाण हमें सिख धर्म की प्रमाणित पुस्तक 35 अखरी में देखने को मिलता है। जिसमें यही द्वादश
अक्षर मंत्र शुद्धता के साथ लिखे हैं। देखिए यहां पर ओम हरिम श्रीम किलिम और सोहम स्पष्ट लिखे हैं। वर्तमान में इन
द्वादश अक्षरों वाले मंत्रों का जाप और इनके करने की सही विधि केवल मेरे पास है और इस मंत्र को प्रदान करने का एकमात्र
अधिकारी संत हूं। यदि कोई श्रद्धालु इन मंत्रों का जाप स्वतः ही करने लग जाए तो उससे कोई लाभ नहीं मिल सकता। दर्शकों जिस
प्रकार कोई व्यक्ति यदि किसी असली पासपोर्ट की फोटो देखकर खुद से पासपोर्ट बनाने लग जाए या किसी अनधिकारी से
हस्ताक्षर करवा के पासपोर्ट प्राप्त करने की कोशिश करें तो यह उसका व्यर्थ प्रयत्न होगा जो कि उसके लिए बहुत हानिकारक होगा।
इसी प्रकार परमात्मा प्राप्ति के इन मंत्रों का जाप केवल अधिकारी संत से ही प्राप्त कर सकते हैं। जो कि वर्तमान समय
में इन मंत्रों को देने के अधिकारी केवल मैं हूं। इन्हीं द्वादश अक्षर वाले मंत्रों का जाप मैं संत रामपाल दास प्रथम
मंत्र की दीक्षा [संगीत] में अपने शिष्यों को सन 1994 से दे रहा हूं। दर्शकों यह द्वादश अक्षर मंत्र पंचदेव साधना के
यथार्थ मंत्र हैं। जबकि यह तमाम धर्मगुरु ओम नमो भगवते वासुदेवाय को द्वादश अक्षर मंत्र बताकर आपको भ्रमित कर रहे हैं और
खुद भी भ्रमित हैं। ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र श्री कृष्ण जी का यथार्थ मंत्र मानकर जप रहे हैं। जबकि खुद
शंकराचार्य जी भी मानते हैं कि हिंदू धर्म में पंचदेव साधना बताई गई है। कोई धर्मगुरु केवल श्री कृष्ण जी का प्रणाम
वाक्य ही बोल रहा है। कोई शिव जी का प्रणाम वाक्य ही बोल रहा है। जबकि दूसरी ओर मैं संत रामपाल दास श्री कृष्ण जी उर्फ
श्री विष्णु जी के सहित यह पंचदेव साधना की [संगीत] यथार्थ भक्ति बता रहा हूं। इन धर्म गुरुओं ने जीवन भर आपसे ओम नमो भगवते
वासुदेवाय ओम नमः शिवाय आदि प्रणाम वाक्य जपवाए हैं। लेकिन श्रद्धालुओं को कोई लाभ नहीं मिला। इसका कारण है कि यह यथार्थ
मंत्र है ही नहीं। आपकी पुकार इन देवी देवताओं तक पहुंच ही नहीं रही। दर्शकों इसको एक [संगीत] उदाहरण के माध्यम से
समझने की कोशिश करते हैं। मान लीजिए आपको किसी मंत्री से लाभ प्राप्त करना है। अब उस मंत्री से लाभ प्राप्त करने के लिए या
तो आपको उसके कार्यालय जाकर उनसे रूबरू होकर अपना कार्य करवाना होगा या आप उनसे मोबाइल पर कॉल करके अपना कार्य उनसे
[संगीत] करवा सकते हैं। अब यदि कोई व्यक्ति उस मंत्री का खास बनकर आपको किसी साधारण व्यक्ति का नंबर दे दे या कोई गलत
नंबर दे दे तो आप उस नंबर से कोई लाभ प्राप्त नहीं कर पाएंगे। आज इसी प्रकार इन धर्म गुरुओं ने इन देवताओं रूपी मंत्रियों
के आपको गलत नंबर दे दिए हैं। जिसको आप जिंदगी भर डायल करते रहें लेकिन कोई लाभ नहीं मिल पाएगा। आप जब तक उनकी साधना का
सही नंबर डायल नहीं करेंगे तब तक आप उनसे अपना कोई कार्य [संगीत] सिद्ध नहीं करवा पाएंगे। इन देवताओं के सही नंबर अर्थात
वास्तविक साधना [संगीत] के मंत्र मेरे पास हैं। सभी प्रमाणित संतों ने पंचदेव साधना के इन्हीं मंत्रों का जाप किया है जो मैं
बता रहा हूं। पंचदेव साधना के यह द्वादश अक्षर मंत्र विश्व कल्याण के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं? आइए जानते हैं। भविष्य
मालिका पुराण में लिखा है कि 2032 [संगीत] तक पूरे विश्व में सत्य सनातन धर्म प्रतिष्ठित हो जाएगा। ऐसा ही संकेत कबीर
परमात्मा ने कबीर सागर में किया है कि सारा संसार सत्य भक्ति अपनाएगा और आदि सनातन धर्म पूरे विश्व में प्रतिष्ठित हो
जाएगा। दर्शकों आदि सनातनी पूजा के प्रथम चरण की यह पूजा ही विश्व में सनातन धर्म प्रतिष्ठित करने में अहम भूमिका निभाएगी।
दर्शकों आज विश्व के सभी प्राणी बेशक अलग-अलग धर्मों में बटे हुए हैं। विश्व के सभी मानवों यानी स्त्री व पुरुषों के शरीर
की संरचना एक जैसी है तथा इनमें बने कमल भी [संगीत] एक जैसे हैं। प्रत्येक साधक को परमात्मा प्राप्ति के लिए और मोक्ष
प्राप्त करने के लिए इन्हीं कमलों से होकर गुजरना होता है। इन द्वादश अक्षर वाले मंत्र का जाप करने से यह कमल अपने आप खुल
जाते हैं। हठ योग करने की कोई आवश्यकता नहीं है। जिस प्रकार ऋषि जन पहले हठ योग करके इन कमलों को खोलने का प्रयत्न करते
रहे। जबकि कमलों को खोलने की आसान अवश्रेष्ठ विधि यह है जो मैंने बताया है। यही विधि कबीर परमात्मा जी ने अपने शिष्य
धर्मदास जी को बताई। अपने शिष्य गरीब दास जी को बताई। यही विधि बाबा नानक जी को तथा उन तमाम महापुरुषों को बताई जिनको कबीर
परमात्मा स्वयं आकर मिले। इसी विधि से इन महापुरुषों का मोक्ष हुआ। इन सभी महापुरुषों ने अपने ग्रंथों में इस द्वादश
अक्षर मंत्र को लिपिबद्ध कर दिया था। जिसका प्रमाण आपको मैंने प्रमाणित करके दिखा दिया है। दर्शकों विचारणीय विषय यह
भी है कि यदि आज के वर्तमान धर्म गुरुओं के अनुसार यदि भक्ति साधना की जाए तो विश्व कल्याण नामुमकिन है क्योंकि जो
साधना मुस्लिम धर्म में बताई जा रही है वो हिंदू धर्म में तथा अन्य धर्मों में नहीं बताई जा रही। इसका मतलब हिंदू समाज का तथा
अन्य धर्मों के लोगों का मोक्ष होना असंभव है। इसी प्रकार जो साधना [संगीत] हिंदू धर्म के धर्मगुरु बता रहे हैं वो
साधना मुस्लिम धर्म व अन्य धर्मों में नहीं बताई जा रही। इसका मतलब मुस्लिम समाज के लोगों का तथा अन्य धर्मों के लोगों का
मोक्ष होना असंभव है। वास्तव में सच तो यह है दर्शकों कि किसी भी धर्म के धर्म गुरुओं के पास विश्व कल्याण का तथा पूर्ण
मोक्ष मार्ग का यथार्थ भक्ति का द्वादश अक्षर मंत्र नहीं है। केवल मैं ही विश्व में एक ऐसा संत हूं जो विश्व के संपूर्ण
मानव समाज के लिए सभी धर्म ग्रंथों में प्रमाणित भक्ति को पूरे मानव समाज के [संगीत] लिए दे रहा हूं। इसी भक्ति से
संपूर्ण मानव समाज का कल्याण हो सकता है। जैसे कबीर जी ने सभी धर्मों की पुण्य आत्माओं को यह सतभक्ति [संगीत] देकर मोक्ष
प्रदान किया था। ठीक वैसे ही आज मैं हर धर्म के धार्मिक लोगों को यह यथार्थ भक्ति प्रदान करके मोक्ष का अधिकारी बना रहा
हूं। यह पंचदेव समान रूप से विश्व के सभी प्राणियों के शरीर में बने इन कमलों में विद्यमान हैं। इन पंचदेव को प्रसन्न करने
का तथा पूर्ण लाभ प्राप्त [संगीत] करने का यह एकमात्र द्वादश अक्षर मंत्र है जो जाप करने का है। मैं यानी संत रामपाल दास इस
द्वादश अक्षर मंत्र का जाप दिन में कम से कम 108 बार अपने शिष्यों को जपने का निर्देश देता हूं। [संगीत] जो विश्व में
केवल एकमात्र मैं यानी संत रामपाल दास ही दे रहा हूं। संपूर्ण विश्व के प्राणी इस द्वादश अक्षर मंत्र की जब साधना करेंगे तो
चारों ओर खुशहाली और भाईचारा कायम होगा। पूरा विश्व एक हो जाएगा और आदि सनातन धर्म पूरे विश्व में प्रतिष्ठित हो जाएगा। सभी
मानवों के जीवन से दुख हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। क्योंकि इस द्वादश अक्षर मंत्र में इन पंचदेवों की शक्ति सामूहिक
रूप से कार्य करती है। मेरे यानी संत रामपाल दास के अथक प्रयासों से यह शास्त्र प्रमाणित ज्ञान [संगीत] तेजी से विश्व में
फैल रहा है। आदि सनातनी पूजा के प्रथम चरण की यह भक्ति पंचदेव से मिलने वाले लाभों को प्रदान करने वाली है तथा संपूर्ण भक्त
समाज के लिए संजीवनी है। आदि सनातनी पूजा के तीन चरण होते हैं। प्रथम चरण की साधना में इन पंचदेव की साधना के मंत्र होते
हैं। उसके बाद दूसरे चरण की साधना जो कि सनातनी पूजा भी कहलाती है। इसके मंत्र होते हैं ओम तत यहां तत सांकेतिक मंत्र
है। उसके बाद तीसरे चरण की साधना आदि सनातनी पूजा कहलाती है। इसके मंत्र होते हैं ओम तत्सत यहां तक और सत सांकेतिक हैं।
भक्ति साधना के इन तीन चरणों को आप इस प्रकार समझें जैसे प्रथम चरण की साधना जो कि पंचदेव पूजा है उसको आप प्राथमिक
शिक्षा जाने अर्थात पांचवी कक्षा तक की पढ़ाई जाने जिसके पढ़ने से आपको आपके जीवन में केवल आंशिक लाभ प्राप्त होते हैं।
लेकिन प्रथम चरण की यह साधना भक्ति मार्ग में बेहद महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार पांचवी कक्षा तक की पढ़ाई पूरी किए बिना
दसवीं 12वीं तक की पढ़ाई नहीं की जा सकती। इसी प्रकार प्रथम चरण की यह पंचदेव साधना [संगीत] किए बिना दूसरे व तीसरे चरण की
साधना नहीं की जा सकती। दूसरे चरण की साधना जो कि सनातनी पूजा है। यह गीता अध्याय 15 के श्लोक [संगीत] 16 में बताए
क्षर और अक्षर पुरुष की पूजा है। इसको आप उच्च शिक्षा अर्थात इसको आप दसवीं तक की कक्षा की पढ़ाई जाने जो आपको प्राथमिक
शिक्षा से कुछ ज्यादा लाभ देती है। तीसरे चरण की साधना जो कि आदि सनातनी पूजा है। गीता जी अध्याय 17 के श्लोक 23 में भी
इसका वर्णन है। यह गीता अध्याय आठ के श्लोक तीन में [संगीत] बताए परम अक्षर ब्रह्म की पूजा है। इसको आप सर्वोच्च
शिक्षा जाने जो कि आपको सब सुख और लाभ प्राप्त [संगीत] करवाती है। दर्शकों केवल मैं यानी संत रामपाल दास ही आध्यात्मिक
मार्ग की भक्ति साधना इस प्रकार तीन चरण में पूरी करता हूं। दर्शकों आपको यहां यह भी शंका हो सकती है कि इस द्वादश अक्षर
मंत्र को एक [संगीत] नाम अर्थात एक मंत्र क्यों कहा जाता है? जबकि यह तो अलग-अलग देवी देवताओं के पांच [संगीत] नाम हैं।
दर्शकों गीता जी अध्याय 17 के श्लोक 23 में यह जो ओम तत्सत मंत्र लिखे हैं यह भी दिखने [संगीत] में तीन मंत्र हैं। लेकिन
इन तीनों नामों को गीता जी में लिखा है कि ओम तत्सत इस प्रकार का यह सच्चिदानंद घन ब्रह्म का यह नाम कहां है? मतलब आदि
सनातनी पूजा [संगीत] के तीसरे चरण की साधना का यह एक नाम है। यह तीन नाम मिलकर एक नाम कहलाता है। जिसको मेरे शिष्य तीसरा
नाम अर्थात सार नाम कहते हैं। इसी प्रकार प्रथम चरण की साधना में मिलने वाला द्वादश अक्षर मंत्र ओम कििम हरिम श्रीम और सोहम
मिलकर एक नाम अर्थात प्रथम नाम कहलाता है। मैं और मेरे शिष्य हमेशा इन द्वादश अक्षर को प्रथम नाम ही पुकारते हैं। इसी प्रकार
दूसरे चरण की साधना का यह ओम तथा तत मंत्र एक ही नाम अर्थात दूसरा नाम अर्थात सतनाम कहलाता है। मेरे अनुयाई इन दोनों मंत्रों
को प्राप्त करने के बाद कहते हैं कि हमें दूसरा नाम अर्थात सतनाम मिल गया है। अर्थात यहां दो नाम मंत्र होने के बाद भी
यह केवल एक नाम ही कहलाता है जिसको सतनाम [संगीत] कहते हैं। इसी प्रकार तीसरे चरण की साधना
का यह ओम तत्सत मंत्र मिलकर भी एक ही नाम कहलाता है जिसे मेरे अनुयाई सारनाम कहते हैं अर्थात तीसरा नाम कहते हैं। इसलिए
यहां दर्शकों को कोई शंका नहीं होनी चाहिए कि इन द्वादश अक्षर मंत्र को एक नाम क्यों कहा है। दर्शकों यह द्वादश अक्षर मंत्र
मिलकर एक ही नाम कहलाता है। मैं यानी संत रामपाल दास। इस प्रकार अपने शिष्यों को सनातनी पूजा के तीनों चरण [संगीत] की
साधना का प्रथम नाम, दूसरा नाम और तीसरा नाम देता हूं। मैं यानी संत रामपाल दास पंचदेव [संगीत] पूजा और सनातनी पूजा के यह
मंत्र सन 1994 से और आदि सनातनी पूजा के यह मंत्र 1997 से अपने सभी शिष्यों को दे रहा हूं। [संगीत] 1997 से पहले मैं केवल
दो चरण वाली भक्ति साधना अपने शिष्यों को देता था। 1997 में स्वयं कबीर साहिब [संगीत] जी ने स्वयं मुझे तीसरे चरण वाली
इस भक्ति को आगे शिष्यों को प्रदान करने [संगीत] का आदेश दिया था। दर्शकों, आपके मन में यहां यह विचार आना स्वाभाविक है कि
क्या मेरे पूज्य गुरुदेव ने उन्हें आदि सनातनी पूजा के तीसरे चरण में दिए जाने वाले इन मंत्रों को शिष्यों को देने का
आदेश नहीं दिया [संगीत] था। दर्शकों आपको स्पष्ट करना चाहेंगे कि मेरे पूज्य गुरुदेव ने ही मुझे यानी संत रामपाल दास
को आदि सनातनी पूजा के [संगीत] यह तीनों मंत्र प्रदान किए थे। परंतु मैं इन मंत्रों को अपने शिष्यों को कब प्रदान
करूंगा। यह आदेश स्वयं कबीर परमात्मा को ही देना था। क्योंकि कबीर साहिब जी ने कबीर सागर में यह पहले ही निर्धारित कर
दिया था कि कलयुग के 5505 वर्ष बीत जाने के बाद मैं स्वयं आऊंगा और यथार्थ ज्ञान अर्थात आदि सनातनी पूजा को
जनजन तक पहुंचाऊंगा। इससे स्पष्ट है मुझे यह मंत्र अपने गुरु जी से [संगीत] ही प्राप्त हुए हैं। लेकिन भक्त समाज को इन
मंत्रों को देने की आज्ञा खुद पूर्ण ब्रह्म कबीर साहिब जी ने दी है। दर्शकों जैसा कबीर जी ने कहा था कि कलयुग 5505
वर्ष बीत जाने के बाद मैं स्वयं आऊंगा तथा यथार्थ भक्ति मार्ग जनजन तक पहुंचाऊंगा। दर्शकों परमात्मा का भेजा हुआ संत भी
परमात्मा तुल्य होता है। मम संत मुझे जान मेरा ही स्वरूपम यह मत सोचना कि मैं ही आऊंगा। यह दास
उसी का ही स्वरूप भेज रखा है। यानी अपना कुत्ता भेज रखा है। इसको कबीर
परमात्मा ही जानो। इसमें श्रद्धालुओं को तनिक भी शंका नहीं करनी चाहिए कि कबीर परमात्मा मेरे रूप में लीला कर रहे हैं।
जिस प्रकार आज से 600 वर्ष पहले कबीर जी [संगीत] के ज्ञान को उस समय के तथाकथित विद्वानों ने स्वीकार नहीं किया था।
उन्होंने कबीर जी का विरोध किया था। ठीक वैसी ही स्थिति आज मेरे साथ देखने को मिल रही हैं। कबीर जी जिस तरह निर्भीक और
बेपरवाह अपने आध्यात्मिक ज्ञान को जन-जन तक पहुंचा रहे थे। ठीक वैसे ही आज मैं [संगीत] संत रामपाल दास कबीर परमात्मा के
स्वरूप अपने द्वारा 600 वर्ष पहले जन कल्याण के कार्य को निरंतर आगे बढ़ा रहा हूं। जो अद्भुत और प्रमाणित ज्ञान मैंने
उजागर किया है, वह केवल कबीर परमेश्वर ही कर सकते हैं। यह आपकी श्रद्धा और विवेक [संगीत] पर निर्भर करता है कि आप मुझे
कबीर जी द्वारा भेजे गए परम संत के तौर पर देखते हैं या कबीर जी के रूप में। लेकिन यह बात स्पष्ट है कि दोनों ही सूरत में
मानव का कल्याण हो रहा है। तब से लेकर आज तक मैं अपने शिष्यों को आध्यात्मिक मार्ग की भक्ति साधना प्रदान करके इसे तीन चरण
में पूरी करता हूं। दर्शकों मेरे द्वारा तीन चरण में दी जाने वाली इस भक्ति विधि का प्रमाण कबीर सागर में अमर मूल अध्याय
के पेज नंबर 265 पर मिलता है। लिखा है प्रथम ही शिष्य होए जो आई ताके हम बाण देहु तुम भाई। यह प्रथम चरण की दीक्षा है।
फिर लिखा है जब देखहु तुम दृढ़ता जाना ता कह कहूं शब्द परवाना। यह दूसरे चरण की दीक्षा है। फिर लिखा है शब्द माही जब
निश्चय आवे ता कह ज्ञान अगाध सुनावे। यह तीसरे चरण की दीक्षा है। इससे स्पष्ट है कि स्वयं कबीर साहिब जी ने इस प्रकार तीन
चरण में मंत्र दीक्षा देने की विधि बताई है। दर्शकों आपको यहां यह भी शंका हो सकती है कि कबीर जी तो मात्र 600 वर्ष पहले हुए
हैं। फिर कबीर जी ने कैसे मनु और शत्रूपा जी को आदि सनातनी पूजा प्रदान कर दी। दर्शकों सूक्ष्म वेद में प्रमाण मिलता है
कि कबीर परमात्मा चारों युगों में अलग-अलग नाम से प्रकट होते हैं और आदि सनातनी पूजा की विधि अपनी प्रिय आत्माओं को प्रदान
करते हैं। दर्शकों आइए देखते हैं मेरे इस विषय पर विशेष सत्संग प्रवचन। देखिए शेष शास्त्रार्थ 17 व 18 अक्टूबर 2026 को
साधना टीवी तथा संत रामपाल जी महाराज YouTube चैनल पर शाम 7:30 से [संगीत]
महाराज की जय महाराज की जय [संगीत] महाराज की जय
महाराज की जय
ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पिता काल ब्रह्म (क्षर पुरुष) और माता दुर्गा (प्रकृति) हैं। ये तीनों रज, सत और तम गुणों के प्रतिनिधि हैं तथा परम अक्षर ब्रह्म (कबीर) के अंश मात्र हैं।
रामचरितमानस के बालकांड दोहा 143, 145 और 149 में स्पष्ट किया गया है कि ये तीनों देवता सच्चिदानंद ब्रह्म (परमात्मा) के अंश हैं और उनकी भक्ति करते हैं। साथ ही उनका स्थूल शरीर काल ब्रह्म और दुर्गा से उत्पन्न हुआ है।
गीता अध्याय 7 श्लोक 12-15 में कहा गया है कि तीनों गुणों (ब्रह्मा-विष्णु-शिव) से परे हटकर परमात्मा की भक्ति करें। अध्याय 15 श्लोक 16-17 में दो पुरुष (क्षर और अक्षर) बताए गए हैं, और उत्तम पुरुष (परमात्मा कबीर) को ही सच्चिदानंद ब्रह्म कहा गया है।
असली मोक्षदायक मंत्र 'ओम तत सत' तीन अक्षरों का है, जो सतयुग में कबीर परमात्मा (सत सुकृत) द्वारा तीन चरणों में दीक्षा के रूप में दिया गया था। 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' (द्वादश अक्षर) वास्तविक नहीं है।
संत रामपाल जी महाराज रामचरितमानस, शिव पुराण, देवी भागवत, गीता और कबीर सागर से प्रमाणित करते हैं कि परम अक्षर ब्रह्म (कबीर) ही पूर्ण परमात्मा हैं। वे तीनों देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) के रचयिता और सच्चिदानंद स्वरूप हैं।
काल ब्रह्म (चौथा पुरुष) और दुर्गा (प्रकृति) तीनों देवताओं के स्थूल शरीर के जनक हैं। शिव पुराण और देवी भागवत के अनुसार दुर्गा इनकी माता हैं और काल ब्रह्म उनके पिता हैं। ये तीनों गुण (रज, सत, तम) हैं, जो क्षर पुरुष के अधीन हैं।
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