मौर्य साम्राज्य और जैन धर्म: पूरा इतिहास एक ही क्लास में
मौर्य साम्राज्य और जैन धर्म का विस्तृत अध्ययन
इस क्लास में दिग्विजय सर महावीर स्वामी और जैन धर्म से लेकर मौर्य साम्राज्य के प्रमुख शासकों और अशोक के शिलालेखों तक की पूरी जानकारी दे रहे हैं।
जैन धर्म के प्रमुख तीर्थंकर
- प्रथम तीर्थंकर: ऋषभदेव (आदिनाथ) – प्रतीक: बैल
- 23वें तीर्थंकर: पार्श्वनाथ – प्रतीक: सर्प; चार व्रत दिए (सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह)
- 24वें तीर्थंकर: महावीर स्वामी – प्रतीक: शेर; इन्होंने ब्रह्मचर्य जोड़कर पंच महाव्रत बनाए
महावीर स्वामी का जीवन परिचय
- जन्म: 540 ईसा पूर्व, कुंडग्राम (वैशाली)
- पिता: सिद्धार्थ (ज्ञात्रक कुल के मुखिया), माता: त्रिशला
- 30 वर्ष की आयु में गृह त्याग, 12 वर्ष कठोर तपस्या
- ज्ञान प्राप्ति के बाद कैवल्य (पूर्ण ज्ञान) प्राप्त किया
- उपदेश प्राकृत की अर्धमागधी भाषा में दिए
जैन धर्म के सिद्धांत
- त्रिरत्न: सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र
- स्यादवाद (अनेकांतवाद): सत्य के अनेक रूप होते हैं
- कर्म सिद्धांत: आश्रव (कर्मों का प्रवाह), संवर (रोकना), निर्जरा (निकालना)
जैन धर्म का विभाजन
- प्रथम जैन संगीति: 300 ईसा पूर्व, पाटलिपुत्र (स्थूलभद्र के नेतृत्व में)
- द्वितीय जैन संगीति: 512 ईस्वी, बल्लभी (गुजरात) – देवधि क्षमाश्रवण के नेतृत्व में
- दो भाग: दिगंबर (नग्न) और श्वेतांबर (श्वेत वस्त्र धारण करने वाले)
The Itihas-Puran Tradition and Foreign Travelogues in Ancient Indian History में आप जैन और बौद्ध ग्रंथों के साथ-साथ विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों के बारे में और अधिक जान सकते हैं, जो मौर्य काल को समझने में सहायक हैं।
मौर्य साम्राज्य के स्रोत
- अर्थशास्त्र: चाणक्य (कौटिल्य) द्वारा रचित; 15 अधिकरण, 150 अध्याय, 6000 श्लोक
- इंडिका: मेगस्थनीज (सेल्यूकस का राजदूत) द्वारा लिखित; समाज को सात वर्गों में बांटा
- मुद्रा राक्षस: विशाखदत्त द्वारा रचित ब्राह्मण ग्रंथ
चंद्रगुप्त मौर्य
- चाणक्य की सहायता से धनानंद को पराजित कर मौर्य वंश की स्थापना
- यूनानी नाम: सेंड्रोकस (जस्टिन), एंड्रोकोट्स (प्लूटार्क)
- सेल्यूकस निकेटर को पराजित कर 4 प्रांत प्राप्त किए
- जीवन के अंत में जैन धर्म अपनाया, श्रवण बेलगोला में संथारा विधि से प्राण त्यागे
बिंदुसार
- उपाधि: अमित्रघात (शत्रुओं का संहारक)
- उपलब्धि: पिता से प्राप्त साम्राज्य को अक्षुण्ण बनाए रखा
- दो विदेशी राजदूत: डायमेकस (एंटियोकस प्रथम) और डायोनिसस (टॉलमी सेकंड)
सम्राट अशोक
- उपाधियां: देवानाम प्रिय (देवताओं का प्रिय) और प्रियदर्शी देखने में प्रिय
- कलिंग युद्ध (राज्याभिषेक के 8वें वर्ष) के बाद बैरीघोष त्याग, धम्मघोष अपनाया
- बौद्ध धर्म की दीक्षा उपगुप्त से ली
Crash Course World History: Hinduism, Buddhism, and Ancient India में अशोक के धम्म प्रचार और मौर्य साम्राज्य के वैश्विक संदर्भ का संक्षिप्त परिचय दिया गया है।
अशोक के 14 बृहद शिलालेख (मुख्य बिंदु)
- 1. पशु बलि की निंदा
- 2. मानव और पशु चिकित्सा
- 3. युक्त-राजुक को हर 5 वर्ष में दौरे का आदेश
- 4. बैरीघोष के स्थान पर धम्मघोष
- 5. धम्म महामात्रों की नियुक्ति (13वें वर्ष)
- 6. राजा को प्रजा की सूचना हर समय देने का निर्देश
- 7. सभी संप्रदायों में सहिष्णुता
भाषा टिप्पणी
- अशोक के शिलालेख: अधिकांश ब्राह्मी लिपि में (बाएं से दाएं)
- कुछ अभिलेख खरोष्ठी (दाएं से बाएं), अरामाइक, और यूनानी लिपि में भी मिले
यदि आप मौर्य साम्राज्य को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहते हैं, तो A Comprehensive History of India: From Ancient Civilizations to Independence आपको प्राचीन सभ्यताओं से लेकर स्वतंत्रता तक की यात्रा में मार्गदर्शन करेगा। इसके अलावा, Comprehensive Overview of Ancient Indian Historical Sources: Archaeology and Literature में पुरातात्विक और साहित्यिक स्रोतों, जैसे अशोक के शिलालेखों और अर्थशास्त्र, का विस्तृत विवरण मिलेगा।
नमस्ते जी आप सभी का बहुत-बहुत स्वागत है और आशा करता हूं कि आप सभी बहुत अच्छे होंगे। यह बताओ तुम्हें लग रहा है कि मैं
12 घंटे अभी लगातार पढ़ा के आया हूं। मुझे देख के लग रहा है क्यों भाई रूपेश कुमार जी आपका बहुत-बहुत
स्वागत है। प्लीज एक बार आप सब लोग सेशन को शेयर कर दो मेरे भाई। 12 घंटे हम लगातार पढ़ चुके हैं। ठीक है? अब यह 13वां
घंटा लग चुका है। और 13व घंटे से हम आगे और आगे बढ़ेंगे। देखो भाई कमिटमेंट होती है वो पूरी होनी चाहिए। भाई सिंपल सी बात
है। ठीक है? जो भी कमिटमेंट की है हमने की है। गगन सर ने की है तो मेरे भाई वो पूरी होनी चाहिए। है ना? तो उसके लिए फिर हम
मेहंदी आदमी हैं मेरे भाई। जी तो पंकज सिंह आपका बहुत-बहुत स्वागत है। यश मौर्या जी हैं। ठीक है? दानिश खान जी हैं। नसीब
सैनी है। जितने भी लोग इससे पुरानी वाली क्लास पे थे सब लोग इस क्लास पे आ जाओ मेरे भाई। ठीक है। अब इसके बाद मैं आपको
बता दूं स्टैटिक जीके आपकी 19 सितंबर को हो चुकी है इसी चैनल पर। आप स्टैटिक जीके सर्च कर लेना। डालना स्टैटिक जीके बाय
दिग्विजय सर। है ना? सिलेक्शन वे एसएससी। तो जब आप डालोगे स्टैटिक जीके बाय दिग्विजय सर सिलेक्शन विद एसएससी तो
स्टैटिक जीके की आपकी क्लास आ जाएगी 19 सितंबर की। यह स्टैटिक जीके मेरे भाई कंप्लीट है।
कंप्लीट है। अब इसमें कुछ इवेंट्स हैं। ठीक है? बुक्स एंड ऑथर हैं, इवेंट है, स्पोर्ट्स हैं। ठीक है? वो सारी चीजें मैं
29 सितंबर को कराऊंगा एनवायरमेंट एंडेंट इवेंट वाली क्लास में। इसके बाद फिर दूसरी क्लास हुई पिटी। इसके भी नीचे आप लिख लो
कंप्लीट मेरे सिग्नेचर के सहित। ठीक है? यहां पर भी कंप्लीट लिख लो। ये भी कंप्लीट है। किसी भी एग्जाम्स के लिए
कंप्लीट पिटी करनी है। इस क्लास को कर कर चला जाओ आप लोग। इसके बाद ज्योग्राफी में मैं लेकिन मैं बोलूंगा ज्योग्राफी में
वर्ड ज्योग्राफी पूरी कंप्लीट थी। उस दिन थोड़ी सी तबीयत मेरी नासाज थी। 8 घंटे में हमने वर्ड ज्योग्राफी कंप्लीट की। 8 घंटे
लगे और इतना लगता भी है यार 8 घंटे लगते भी हैं। इंडियन ज्योग्राफी का एक ही चैप्टर हो पाया था केवल।
ठीक है? एक बार प्लीज सब लोग थम्स अप करो। है ना? लाइक कर दो। तो यहां पर जो है ना मैं ये बोलूंगा वर्ल्ड जग्राफी आपकी
कंप्लीट है। वर्ल्ड जग्राफी यहां पर मेरे भाई कंप्लीट है।
इसमें यह किसी भी एग्जाम्स के लिए है आपके लिए और उसके बाद फिर हिस्ट्री हिस्ट्री में हमने मेडवल हिस्ट्री कंप्लीट कर ली।
ठीक है? 100% मेडवल हिस्ट्री को हमने बहुत अच्छे से कंप्लीट कर लिया। मेडिव हिस्ट्री में मेरे भाई कुछ भी नहीं बचा है। ठीक है?
और एंशिएंट को हम आधा कर चुके हैं। बौद्ध धर्म हमने पूरा कंप्लीट कर लिया। अब हम जैन धर्म से आगे स्टार्ट करेंगे और फिर
उसके बाद हम मॉडर्न पढ़ेंगे अभी। ठीक है? फिर आपका इकोनॉमिक्स 27 सितंबर को मैं इकोनॉमिक्स नहीं लूंगा संडे को। भाई संडे
को मेरा कहीं जाने का प्लान है। मैंने कहा थोड़ा बहुत दर्शन कर आऊं एक जगह जाके। तो इसलिए संडे को मैं नहीं लूंगा 27 सितंबर
ये इकोनॉमिक्स की क्लास को। ठीक है? इसको हम आगे फर्दर ठीक है वो कर देंगे इकोनॉमिक्स को। है ना? कभी आगे मूव कर
देंगे। तो वो मैं आपको बता दूंगा। तो यह सारी चीजें हैं। अब हम आगे बढ़ते हैं। आप लोग प्लीज देख लेना है ना सारी चीजों को
जो भी मैंने बोला है अगर किसी की कोई भी मैराथन इनकंप्लीट है तो उस मैराथन को मेरे भाई वो आदमी वो भैया ठीक है वो हमारी बहन
कंप्लीट कर ले। बस मैं इतनी सी बात बोलना चाहूंगा। आइए जैन धर्म के बारे में बात करते हैं। अभी बौद्ध धर्म की संगीति हमने
जस्ट अभी इससे पहली वाली क्लास में कंप्लीट करी। जब जैन धर्म के बारे में हम बात करते हैं बच्चे तो जैन धर्म के
संस्थापक और प्रथम तीर्थंकर जो माने जाते हैं वो ऋषभदेव माने जाते हैं। ऋषभदेव को आदिनाथ कहा जाता है और इनके प्रतीक पूछे
जाते हैं कि साहब इनका प्रतीक कौन सा है? जी नमस्ते जी नमस्ते मेरे भाई। ठीक है एक बार प्लीज
सब लोग यहां पर आ जाओ। और भाई तुम सब लोग हिम्मती हो, मेहनती हो खूब हो। अगर हिम्मती मेहनती हो तो आओ। हां भाई थ्योरी
हो रही है। इससे पहले भी थ्योरी हुई है। थ्योरी हुई है। वह एमसीक्यू वाला लॉलीपॉप नहीं देते हम। ठीक है? फ्री है तो इसका
मतलब फ्री है। है ना? और फ्री है तो फिर कंटेंट फ्री है। यह ध्यान रखना। कंटेंट फ्री है।
चलिए तो मेरे दोस्त स्टार्ट करें। आप सभी की आज्ञा हो तो अनुमति हो तो। तो संस्थापक और प्रथम तीर्थंकर जो है वो ऋषभदेव जी
हैं। ऋषभदेव जी को आदिनाथ जी कहा जाता है। और ऋषभदेव जी का जो प्रतीक है वो है मेरे भाई बैल। ठीक है? बैल मींस वृषभ। ठीक है?
और ऋग्वेद में दो जैन तीर्थंकरों का उल्लेख है। एक जो पहले जैन तीर्थंकर हैं ऋषभदेव उनका उल्लेख है। दूसरे हैं 22वें
तीर्थंकर अरिष्ट नेमी उनका उल्लेख है। ऋग्वेद में दो जैन तीर्थंकरों का उल्लेख है। ऋग्वेद के बच्चे पहले तीर्थंकर से
लेकर 22वें तीर्थंकर तक मतलब अरिष्ट नेमी तक इनको माना जाता है कि संध्यास्पद है क्योंकि जैन ग्रंथों के अलावा और कोई भी
ऐसा ग्रंथ नहीं है जहां पर इनका उल्लेख किया गया हो। लेकिन जो 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी वो वास्तविक ऐतिहासिक
व्यक्ति हैं क्योंकि उनका नॉट इवन जैन धर्म में बल्कि कई सारे अन्य बौद्ध ग्रंथ और ब्राह्मण ग्रंथों में भी पार्श्वनाथ जी
का उल्लेख मिलता है। तो ये 23वें तीर्थंकर हैं। वाराणसी के हैं। वाराणसी के इच्छुक वंशी शासक हैं। अश्वसेनी ये उनके पुत्र
हैं। है ना? इन्होंने 30 वर्ष की आयु में घर त्याग दिया था। बकायदा इन्होंने अपने पेरेंट्स की अनुमति ली थी कि वह फर्दर जो
है ना आगे ज्ञान की खोज में जाना चाहते हैं और वह एक ग्रस्त जीवन को त्याग कर अभी 30 वर्ष की आयु में ही वानप्रस्थ और
सन्यास जीवन को अपनाना चाहते हैं। ठीक है? क्षत्रिय थे क्षत्रिय राजकुल से थे और एक और इंटरेस्टिंग बात है। पहले तीर्थंकर से
लेकर 24वें तीर्थंकर मतलब महावीर स्वामी तक जितने भी तीर्थंकर हुए वो सारे के सारे क्षत्रिय हुए। ठीक है? सारे तीर्थंकर
क्षत्रिय फिर बाद में उन्होंने तपस्या की, ज्ञान की प्राप्ति की और मानव समुदाय के विकास में फिर वो लग गए बच्चे। उनका भला
करने में फिर उन्होंने अपना पूरा योगदान दे दिया। तो इस तरह का था जो पूरा सिनेरियो था। तो मैं इनके बारे में बात कर
रहा था 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी के बारे में। तो पार्श्वनाथ जी वाराणसी के इच्छक वंशी शासक हैं। उनके पुत्र हैं
अशोसेन के 30 वर्ष की आयु में गृह त्याग दिए और ये झारखंड का गिरिडीह जिले में एक संवेद शिखर है जिसको आज हम पारसनाथ की
पहाड़ी बोलते हैं। पारसनाथ की पहाड़ी इज़ अ पार्ट ऑफ विंध्यांचल। लेकिन विंध्यांचल का ही पूर्वी विस्तार है। तो वहां पर गए।
इन्होंने 83 दिनों की घोर तपस्या की और घोर तपस्या करने के बाद फिर इनको ज्ञान की प्राप्ति हुई और उसके बाद ज्ञान की
प्राप्ति के बाद ये जगह-जगह घूमे और इन्होंने अपने धर्म का प्रचार प्रसार किया। ठीक है ना? इतिहासकार लेन पूल हैं
स्मिथ हैं। वो तो यह तक कह देते हैं कि एक्चुअली जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक तो पार्श्वनाथ ही हैं। जैन धर्म का जो पंच
महाव्रत है सत्य, अहिंसा, अस्त्र, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। इसमें जो ब्रह्मचर्य वाला पार्ट है, यह महावीर
स्वामी ने जोड़ा है ब्रह्मचर्य वाले पार्ट को। लेकिन जो चार पार्ट है ना मेरे प्यारे बच्चे सत्य अस्त अहिंसा और अपरिग्रह ये
इन्हीं की देन है पार्श्वनाथ जी की ठीक है इनको चातुर्ति कहा जाता है जो उनके चार सिद्धांत है फिर बाद में महावीर स्वामी जी
ने इसमें पांचवा सिद्धांत जोड़ दिया तो वे पंच महाव्रत हो गए इनका जो प्रतीक है वो सर्प है ये पूछा जाता है है ना इनका
प्रतीक सर्प है इन्होंने चार महाव्रत दिए सत्य अहिंसा अस्तेय अस्तेय मींस बच्चे चोरी ना करना और अपरिग्रह का मतलब है कि
संपत्ति ना रखना संपत्ति इन द सेंस बिल्कुल संपत्ति नहीं संपत्ति जरूरत से ज्यादा संपत्ति ना रखना यह अपरिग्रह है।
24वें अंतिम तीर्थंकर हैं। वास्तविक संस्थापक हैं जिनका नाम है महावीर स्वामी जी। महावीर स्वामी जी का जो प्रतीक है वो
शेर है। अब महावीर स्वामी जी के बारे में यहां पर पूरा जीवन परिचय है कि उनका जन्म 540 ईसा पूर्व में हुआ है। 540 ईसा पूर्व
में एक्चुअली उनका जन्म कुंडग्राम वैशाली में हुआ है। ठीक है? कुछ लोग कुंडग्राम वैशाली भी मानते हैं, कुछ लोग कुंडलवन भी
मानते हैं। इस तरह की दो मान्यताएं हैं। तो बेसिकली इनका जन्म कुंडग्राम वैशाली में हुआ है। और इनके जो पिता हैं वो बज्जी
में जो आठ संघ हैं ना बज्जी जिन आठ संघों से मिलकर बना है मैंने महाजनपद काल में अभी आपको पढ़ाया था। उन आठ संघों में से
ज्ञात्रक कुल हैं उसके मुखिया हैं इनके पिताजी। पिताजी का नाम है सिद्धार्थ। इनकी माताजी जो है वह त्रिशला है। इनकी माताजी
त्रिशला लच्छवी के शासक जो चेटक हैं उनकी बहन है। एक्चुअली लच्छवी शासक चेटक की एक बहन के साथ विवाह हुआ है बिंबिसार का। है
ना? तो बिंबिसार एक्चुअली अगर देखा जाए तो बिंबिसार का विवाह चेटक की बहन के साथ हुआ है। और इनकी माताजी भी चेटक की बहन थी
त्रिशला। तो बिंबिसार और इनमें कैसे संबंध है? ठीक है ना? आप बोलेंगे रिश्तेदारी वाले। ठीक है? ये दोनों आपस में एक दूसरे
के रिलेटिव हैं। वो रिलेशन कौन सा निकलेगा? आप वो बता दो। ठीक है ना? दोनों की बहन-बहन है। ठीक है? तो ये एक्चुअली
बिंबिसार कौन हुए? ठीक है ना? इनका ओदा छोटा हुआ महावीर स्वामी जी का। महावीर स्वामी और बिमसार है ना? तो कौन हुए? आई
थिंक। ठीक है? आप मुझे बता देना कौन लगे। इतना मुझे नहीं पता। ठीक है ना? दोनों की ही इनकी माताजी बहन है। उनकी पत्नी बहन है
चेटक की। तो इनकी जो पत्नी सॉरी इनकी जो माताजी हैं माता त्रिशला है वो लक्ष्मी शासक चेटक की सिस्टर हैं। यहां पर मैंने
बताया अब इनके बच्चे ज्ञान की प्राप्ति के बारे में बात करेंगे तो 30 वर्ष की आयु में इन्होंने घर त्यागा था। 30 वर्ष में
इन्होंने भी देखिए इन्होंने महात्मा बुद्ध की तरह घर नहीं त्यागा। इन्होंने जब इनके पिताजी का देहावसान हो गया, मृत्यु हो गई
तो फिर इन्होंने डिसाइड किया कि पिताजी की मृत्यु के बाद अब यह घर त्याग देंगे क्योंकि पिता की मृत्यु के बाद इनके जो
बड़े भाई हैं नंदीिवर्धन इनके अग्रज वो अगले शासक बने क्योंकि जेष्ठ पुत्र के उत्तराधिकार का नियम होता है। तो जब
नंदीिवर्धन गद्दी पर बैठे तो बैठने के बाद इन्होंने हाथ जोड़े अपने भाई के और अपने भाई से आज्ञा मानी कि मैं जो है सन्यास की
तरफ जाना चाहता हूं। ठीक है? इनकी पत्नी भी है। इनकी पत्नी का नाम है यशोदा और उनसे एक पुत्री भी पैदा हुई थी जिनका नाम
है अनुजा प्रियदर्शनी। तो पुत्री तो बहुत छोटी थी लेकिन पत्नी से भी इन्होंने उनका भी कंसेंट लिया और कहा कि मैं ऐसे-से जो
है ना सन्यास के लिए जाना चाहता हूं। पत्नी ने कह दिया कि ठीक है। लेकिन जैसी आपकी इच्छा बड़े भाई से आज्ञा ली। जब तक
बड़े भाई ने आज्ञा नहीं दी तब तक नहीं गए। जब बड़े भाई ने आज्ञा दे दी तो उसके बाद फिर यह पहुंचे। 12 वर्ष की इन्होंने कठोर
तपस्या की। इसके बाद फिर यह रिजुपालका नदी के तट पर पहुंचते हैं। ताल वृक्ष के नीचे कठोर तपस्या करने बैठ जाते हैं। यह कहा
जाता है कि 12 सालों में एक बार भी इन्होंने वस्त्र नहीं बदले। और जब इनको ज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञान मींस
आत्मज्ञान है। अपने होने का अनुभव। तो जब इनको ज्ञान की प्राप्ति हुई तो वो एक वस्त्र भी जो कि मैला हो चुका था। 12
सालों से क्योंकि चेंज नहीं किया था। तो उसको भी इन्होंने त्याग दिया। और जब उसको इन्होंने त्याग दिया। तो फिर उसके बाद फिर
इन्होंने एक सिद्धांत दे दिया जिसको कहते हैं मेरे भाई ब्रह्मचर्य का कि आज से आप सभी ब्रह्मचर्य का जीवन जिएंगे। ठीक है?
तो यह सारी बातें तब ब्रह्मचर्य जोड़ा। जब इनको ज्ञान की प्राप्ति हुई तो ज्ञान की प्राप्ति का मतलब है कि भाई ज्ञान की
प्राप्ति उसे होती है जिसने अपनी इंद्रियों को बस में कर लिया हो। जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया हो तो ये जिन
कहलाए। है ना? ज्ञान की प्राप्ति के बाद ये जिन कहलाए। इन्होंने पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति की है। पूर्ण ज्ञान को कैवल्य
कहते हैं। तो पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति इन्होंने की। दैट्स व्हाई ये कैवलिन कहलाए। है ना? और इन्होंने अपने इस तपस्वी
जीवन में महान पराक्रम दिखाया। यार 12 साल कठोर तपस्या कोई छोटी बात थोड़ी नहीं है। तो बहुत ठीक है ना? कठोर इन्होंने तपस्या
की। पराक्रमी जीवन इन्होंने प्रदर्शित किया। तो इसलिए ये महावीर कहलाए। और इनका बचपन का नाम है वर्धमान। बचपन का नाम
वर्धमान इसलिए है कि जब इनका जन्म हुआ था तो इनके जन्म के समय राज्य में अतुलनीय आर्थिक समृद्धि हुई। बहुत सारी मतलब ठीक
है मतलब ऐसा था कि इनके जन्म के टाइम पर जब जन्म हुआ था तो उस साल फसल बहुत अच्छी हुई। आर्थिक उन्नति हुई, तरक्की हुई,
उद्योग व्यापार बहुत अच्छे चले। तो कहा गया कि यह राज्य का गौरव है। ये राज्य का भाग्य विधाता है। तो इसलिए वर्धमान नाम
पड़ा। वर्धमान। ठीक? जिसने वृद्धि की हो जिसके जन्म के बाद राज्य में अतुलनी आर्थिक समृद्धि हुई है तो इसलिए वर्धमान
कहलाए गए। क्या मेरी बात समझ में आ रही है? यहां तक कोई इशू तो नहीं है? चलिए अब यहां पर यह ध्यान रखना इन्होंने
पार्श्वनाथ जी के चार व्रतों में पार्श्वनाथ जी के चार व्रत मैंने बता दिया। सत्य अहिंसास्ते अपरिग्रह उसमें
इन्होंने पांचवा व्रत जोड़ा ब्रह्मचर्य को जोड़ दिया था। इन्होंने जो भाषा ठीक है? जिसमें इन्होंने उपदेश दिए वो प्राकृत की
अर्धमागधी शाखा थी। तो प्राकृत भाषा में प्राकृत में अर्धमागधी में इन्होंने अपने उपदेश दिए थे। जबकि महात्मा बुद्ध साहब ने
पाली में दिए थे। मैंने बताया। इसके बाद अगर हम जैन दर्शन के बारे में बात करें तो त्रिरत्न है जैन दर्शन में त्रिरत्ना
सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञान और सम्यक आचरण आचरण को चरित्र भी कह देते हैं तो सम्यक दर्शन ठीक है आपका दर्शन अच्छा होना चाहिए
दर्शन मींस योर आईडियोलॉजी ठीक है सम्यक ज्ञान आपको सही ज्ञान होना चाहिए और सम्यक चरित्र और सम्यक आचरण बात एक ही होती है
तो इसके बाद आपका एक्ट भी बहुत ठीक है प्यारा होना चाहिए पवित्र होना चाहिए तो उसको हम लोग बोलेंगे सम्यक चरित्र जैन
धर्म का एक और सिद्धांत है अगर अगर हम जैन धर्म के सिद्धांतों के बारे में बात करेंगे नेक्स्ट तो जिसको बोलते हैं
स्यादवाद या अनेकांतवाद का सिद्धांत। स्यादवाद या अनेकांतवाद का सिद्धांत ये सत्य के सापेक्षता का सिद्धांत है कि सत्य
के अनेक रूप होते हैं। ठीक है? इसको कहते हैं। इसमें क्या है कि छह अंधे और एक हाथी की कहानी है। एक्चुअली छह अंधे हैं। ठीक
है? ऐसे करके खड़े हैं। 1 2 3 4 मैं नहीं हूं मेरे भाई। 1 2 3 4 और दो इधर खड़े हैं। ठीक है? ये छह अंधे या फिर यह कहा
जाता है कि भाई छह लोगों की आंखों पर पट्टियां बांध दी और उनसे कहा कि बताओ छू के दिखाओ इस हाथी को कि हाथी कैसा लगता
है? हाथी क्या है? हाथी एक परम सत्य है। ठीक है? हाथी यहां पर सिंबलाइज किया गया है सत्य से कि हाथी का मतलब है सत्य। तो
छह अंधे हैं। तो एक व्यक्ति हाथी की सूंड को छूता है। और सूंड को छूने के बाद कहता है कि हाथी तो रस्सी के सॉरी हाथी तो पाइप
के जैसा है। एक कठोर नली के जैसा है हाथी। जबकि हाथी कैसा है? ठीक है? वह तभी दिखाई देगा जब आंखों में से पट्टी कि भाई बहुत
विशालकाय जानवर है। तो जिसने सूंड को छुआ तो कहा उसने कि भाई तो एक जो है वह कठोर नली के जैसा है। एक ने हाथी का पैर पकड़
लिया। उसने कहा कि हाथी तो खंभे के जैसा है। एक ने हाथी की पीठ पकड़ ली। वो कह रहा हाथी तो दीवार के जैसा है। एक ने पूंछ
पकड़ ली। वो कह रहा है तो रस्सी के जैसा है। तो इस तरह से लोगों ने अपने-अपने विचार दिए उन छहों अंधों ने। जबकि सही
हाथी का कोई भी चित्रण नहीं कर रहा। हाथी एक्चुअल में कैसा है? क्यों? क्योंकि उनकी आंखों पे पट्टी तो ऐसे ही जब मनुष्य कर्म
करता है तो वह कर्मों के बंधन में फंस जाता है। यह जैन धर्म का ही सिद्धांत है। जब मनुष्य कर्म करता है तो वह कर्मों के
बंधन में फंस जाता है। तो इसलिए उसको सत्य नहीं दिखाई देता और जब तक उसको सत्य नहीं दिखाई देगा, परम सत्य नहीं दिखाई देगा तब
तक उसको पूर्ण ज्ञान कैवल्य की प्राप्ति नहीं होगी। इसी को हिंदू धर्म में मोक्ष कहा गया है। तो तब तक उसको मोक्ष नहीं
मिलेगा। तो क्या करना चाहिए? सबसे पहले जो कर्मों का प्रभाव उसकी तरफ आ रहा है उसको कहा गया आश्रव। आप लिख सकते हैं अगर आप
लिखना चाहे अच्छे स्टूडेंट है तो जो कर्मों का प्रभाव उसकी तरफ आ रहा है आश्रव उसको रोकना है उसके रोकने की प्रोसेस को
कहते हैं संवर कर्मों का प्रभाव जो मनुष्य की तरफ आ रहा है वो आश्रव है कर्मों का प्रभाव जैसे लाइक ठीक है आज मेरा मन करेगा
मेरे पास एक कार है लेकिन मुझे लगता है कि नहीं यार इससे बड़ी कार होनी चाहिए मेरे पास एक घर है मुझे लगता है कि नहीं इससे
भी बड़ा घर होना चाहिए बात समझ में आ रही है तो ये क्या है कि मनुष्य की जो भौतिक इच्छाएं है वो लगातार बढ़ती चली जाती हैं
तो वह कर्मों के बंधन में फंसता हुआ चला जाता है तो इसको बंधन कहेंगे और कर्मों का प्रभाव आ रहा है मनुष्य की तरफ। ठीक है?
वह सोच रहा है कि यार ठीक है? एक तो गर्लफ्रेंड है ही एक दो और बन जाए यार मजा आ जाए। मेरी बात समझिएगा कि ये कर्मों का
प्रवाह ही तो है और क्या है कि चलो यार आज पिज़्ज़ा खाया यार। कल को कोई इटालियन फूड खाएंगे बढ़िया सा या फिर कुछ सर जैपनीज़ कोई
फूड खाएंगे या फिर कोई और फूड खाएंगे। इस तरह का कर्मों का प्रवाह है। आश्रव है। ठीक है? ठीक है? तो सबसे पहले जो कर्मों
का प्रभाव आ रहा है उसको रोकना है। संवर मतलब अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण स्थापित करना है। अपनी इंद्रियों को अपने बस में
करना है। संवर ठीक है? संवर करना। उसके बाद जो कर्म तुम्हारे अंदर प्रविष्ट कर गए हैं जो तुमने कांड किए हैं ना जो कर्म
तुम्हारे अंदर प्रविष्ट कर गए उनको निकालो। ठीक है? हृदय शुद्धि करो। इसको निर्जरा कहा गया है। उसके बाद फिर आपको
केवल या पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति होगी। यह है जैन धर्म में। है ना? मगध में 12 वर्षीय अकाल के बाद जैन धर्म दो भागों में
बट गया। और जब मगध में 12 वर्षीय अकाल पड़ा जैन धर्म दो भागों में बट गया तो एक है भद्रबाहु ठीक है एक्चुअली यह ध्यान
रखना है आपको बहुत अच्छे से कि भद्रबाहु को जैन धर्म का चौथा थेरा कहते हैं चौथा थेरा कहते हैं भद्रबाहु को ठीक
महावीर स्वामी जी के दो प्रिय शिष्य दो प्रिय शिष्य थे। एक था इंद्रभूति। ठीक है? और जो दूसरे शिष्य थे मेरे भाई
उनको हम कहते थे सुधर्म। सुधर्मा तो इनके दो प्रमुख शिष्य थे इंद्रभूति और सुधर्मा एक्चुअली सुधर्मा
महावीर स्वामी की मृत्यु के बाद भी जीवित रहे तो इसलिए सुधर्मा को जैन धर्म का प्रथम थेरा थेरा मींस उपदेशक थेरा का मतलब
क्या होता है उपदेशक तो इसलिए सुधर्मा को जैन धर्म का प्रथम थेरा कहा जाता है जैन धर्म का प्रथम थेरा कहा जाता है
सुधर्मा को। क्या मेरी बात समझ में आ रही है? इसके बाद चौथा थेरा यह है भद्रबाहु भद्रबाहु के शिष्य थे जिनका नाम था
स्थूलभद्र। यह भद्रबाहु के शिष्य हैं और इनके शिष्य का नाम है स्थूलभद्र। अब एक्चुअली हुआ क्या कि मगध में 12 वर्षों
का भीषण अकाल पड़ा। तो वद्रबाहु तो अपने अनुयायों के साथ दक्षिण भारत चले गए श्रवण श्रवण गोला। और यहीं पर एक बहुत
इंटरेस्टिंग फैक्ट मिलता है हिस्ट्री का कि चंद्रगुप्त मौर्य जो मौर्य वंश के संस्थापक हैं। है ना? चंद्रगुप्त मौर्य
उन्होंने भद्रबाहु के शिष्यत्व ग्रहण किया। मतलब वो भद्रबाहु के शिष्य बने। जैन धर्म को स्वीकार किया और वो भी जैन धर्म
को स्वीकार करने के बाद भद्रबाहु के साथ वो भी चले गए। श्रवण बेलगोला और वहां पर सल्लेखना विधि होती है। उपवास करके शरीर
को त्यागना सल्लेखना कहते हैं। और उस विधि के माध्यम से इन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। चंद्रगुप्त मौर्य ने। ठीक है? अब जब
मगध में स्थिति सामान्य हो गई अकाल वगैरह की स्थिति तो ये वापस लौट कर आए। तो वापस जब लौट कर आए तो इनके जो शिष्य थे स्थल
स्थूलभद्र वो नहीं गए थे। स्थूलभद्र ने मना कर दिया कि अगर मैं चला गया तो मगध जैन धर्म ही समाप्त हो जाएगा। मैं नहीं
जाऊंगा। मुझे जैन धर्म की रक्षा करने के लिए यहीं पर रुकना पड़ेगा। लेकिन गुरु जी तुम जाओ। लेकिन जब गुरु जी वापस लौट के आए
तो गुरु जी के साथ जितने भी चिले चपाटे गए थे जो गुरु जी के अनुयाई थे वह दिगंबर कहलाए क्योंकि वह नग्न रहते थे। दिगंबर का
मतलब होता है दिशा है अंबर जिसके दिशा का मतलब क्या होता है बच्चे कि जिसने कोई वस्त्र ही नहीं पहन रखा दिशा ही उसके
वस्त्र हैं। ठीक है? दिशा ही उसके वस्त्र हैं। तो वह दिगंबर और जो स्थूलभद्र के अनुयाय थे वो श्वेत वस्त्र धारण करते थे
वह श्वेतांबर कहलाए। दोनों में वैचारिक मतभेद हो गया। और इस तरह से जैन धर्म जो है वह दो भागों में बट गया। श्वेतांबर और
दिगंबर। ये यहां पर ध्यान रखना। नेक्स्ट आगे हम बात करेंगे। दो जैन संगीतियां हुई हैं। जैसे मैंने बौद्ध संगीतियां आपको
बताई थी। चार हुई हैं। ऐसे दो जैन संगीतियां हुई हैं। पहली जैन संगीति जो हुई है वो 300 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र
में हुई है। स्थूलभद्र के नेतृत्व में जब भद्रबाहु वहां पर चले गए हैं। श्रवण भील बोला उस समय हुई है। और इसमें 12 अंगों का
संकलन किया गया है। 11 12 अंगों का संकलन का मतलब यही होता है कि महावीर स्वामी जी के जो प्रवचन थे। ठीक है? जो उन्होंने
अपने तपस्वी जीवन में लोगों को जो शिक्षाएं दी उनको उन शिक्षाओं को संकलन 12 अंगों का संकलन इसको कहा जाता है। तो
प्रथम जैन संगीति 300 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र में हुई। स्थूलभद्र इसके अध्यक्ष थे।
ठीक है? प्रथम जैन संगीति 300 ईसा पूर्व में हुई। 300 ईसा पूर्व में हुई। पाटलिपुत्र में
हुई स्थूलभवद्र और इसमें 12 अंगों का संकलन किया गया और जैन धर्म श्वेतांबर और दिगंबर में उसका औपचारिक विभाजन इस समय हो
गया। ठीक है? इसके बाद हुआ। फिर उसके बाद जो दूसरी जैन संगीति हुई है वो बहुत सालों बाद हुई है। 512 ईसवी में हुई है। ठीक है?
यह ईसा पूर्व में है, बीसी में है, एडी में है। तो, यह 512 ईसवी में हुई है। बल्लभी गुजरात में हुई है। और इसके जो
अध्यक्ष थे, वह थे देवधि क्षमाश्रवण। केवल आप क्षमाश्रवण ही बोले क्षमाश्रवण इसके अध्यक्ष थे। इसमें जैन धर्म ग्रंथों, 12
अंग और 12 उपांगों को अंतिम रूप से अब स्क्रिप्टेड किया गया। लिपिबद्ध किया गया। जो जैन धर्म ग्रंथ हैं। 12 अंग और 12
अंगों के साथ-साथ 12 उपांग। 12 अंग और 12 अंगों के साथ-साथ 12 उपांग। तो इनको अंतिम रूप से मेरे भाई
स्क्रिप्टेड मींस लिपिबद्ध किया गया इस समय। अब हम आगे चलेंगे और आगे चलने के क्रम में हम चैप्टर फाइव पर आ चुके हैं।
मौर्य साम्राज्य। ठीक है? देखिए किसी भी काल विशेष के इतिहास को जानने के दो सोर्सेस होते हैं।
आर्कियोलॉजिकल। ठीक है? और लिटरेचर। पुरातात्विक और साहित्यिक स्रोत। मैंने बिल्कुल शुरुआत में ही आपको बताया था जब
मैं हिस्ट्री को बता रहा था। ठीक है? एंशिएंट हिस्ट्री की शुरुआत में मैंने जब मिडवल पढ़ाया तो मैंने बता दिया था कि अभी
तो मैं बस केवल इतिहास इतना बता रहा हूं कि इति धन हा धन आस ये इतिहास है। है ना? ऐसा ही निश्चित रूप से था। ये इतिहास है।
मैं केवल इतना बता रहा हूं। लेकिन फिर जब मैं आगे चलूंगा एंशिएंट हिस्ट्री स्टार्ट करूंगा तो मैं इतिहास क्या है? इतिहास की
परिभाषा इतिहास का लिपि के आधार पर जो वर्गीकरण किया गया है और इतिहास जानने के जो सोर्सेज हैं मैं उन सभी को बताऊंगा
बहुत अच्छे से। ठीक है तो वहां पर मैंने बताया और वहां पर जब मैं बता रहा था तो मैंने बताया कि इतिहास जानने के दो
सोर्सेस हैं। एक पुरातात्विक, एक साहित्यिक। ठीक है? पुरातात्विक सूत्रों में ठीक है? आप जो भी खनन और उत्खनन से जो
भी आपको जानकारी प्राप्त होती है, उसमें आपको मुद्रा लेख मिले। उसको आपको स्तंभ लेख मिले। उसमें आपको गुफा लेख मिले।
उसमें शिलालेख मिले। आपको उसमें आपको मृतवांड, मिट्टी के बर्तन और कोई भी टूल्स मिला वह पुरातात्विक स्रोत है।
पुरातात्विक स्रोतों से प्राप्त जानकारी ज्यादा सटीक मानी जाती है क्योंकि उसमें हेरफेर नहीं किया जा सकता। लेकिन जिसने
लिखा है क्या गारंटी है कि उसने सही लिखा हो। ठीक है? मैं खुद अपनी आत्मकथा लिखूं और मैं कह दूं कि ठीक है? मैं तो ईश्वर ही
हूं। उससे कम थोड़ी ना हूं मैं। बात समझ में आ रही है? तो मैं लिख सकता हूं। वही स्वाभाविक सी बात है। तो इसलिए
पुरातात्विक साक्ष्यों से प्राप्त जानकारी को ज्यादा सटीक माना जाता है। यह बात मेरी बात बहुत अच्छे से आप लोग समझ लेना। चलिए
सर आगे बात करते हैं। फिर हम साहित्यिक स्रोतों पे आते हैं। तो साहित्यिक स्रोतों को दो भागों में बांटते हैं। एक धार्मिक
साहित्य दूसरा गैर धार्मिक साहित्य। सॉरी पहले दो भागों में बांटेंगे। एक देसी साहित्य, एक विदेशी विवरण। विदेशी विवरण
का मतलब है कि जितने भी विदेशी आए हैं। ठीक है ना? जो विभिन्न राजाओं के समयाल में आए। ठीक है? बेसिकली धार्मिक यात्रा
के लिए आए या फिर टूरिज्म के सिलसिले में आए या फिर कई लोग व्यापार के सिलसिले में आए और जब वो फिर यहां पर रहे तो उन्होंने
ठीक है भारत का आंखों देखा हाल लिखा कि भारत की राजनीति कैसी है भारत का धर्म कैसा है ठीक है इन्होंने भारत के बारे में
बहुत सारी चीजें बताई तो उसको हम लोग कहते हैं विदेशी विवरण दूसरा होता है देसी साहित्य देसी साहित्य को दो भागों में
बांटते हैं धार्मिक और गैर धार्मिक दो भागों में बांटते हैं। अब धार्मिक में जैसे जैन टेक्स्ट है, बौद्ध टेक्स्ट है,
ब्राह्मण टेक्स्ट है। गैर धार्मिक कोई भी दरबारी इतिहासकार है उसने जो भी लिख दिया प्रशंसा में लिख दिया या कोई किसी बाहरी
व्यक्ति ने लिख दिया तो उसको हम लोग गैर धार्मिक साहित्य के अंतर्गत मेंशन करते हैं। ये सारी बातें मैंने आपको बताई हैं।
तो सबसे पहले अगर आपको मौर्य इतिहास के बारे में जानना है तो जानकारी का जो सबसे प्रमुख स्रोत है वो है अर्थशास्त्र। ठीक
है? ये ध्यान रखना यहां पे अर्थशास्त्र लिखा हुआ है वो है अर्थशास्त्र। अर्थशास्त्र की जो रचना है वह चाणक्य
कौटिल्य या विष्णुगुप्त ने की है। इन्होंने एक्चुअली अर्थशास्त्र को लिखा है। अर्थशास्त्र में 15 तो अधिकरण हैं और
150 अध्याय हैं। अधिकरण का मतलब होता है मेरे भाई भाग। अधिकरण का मतलब क्या होता है? अधिकरण कहने का मतलब होता है भाग। तो
इसमें 15 अधिकरण हैं। 15 भाग हैं। इसमें 150 अध्याय हैं और 6000 इसमें श्लोक हैं। तो 15 अधिकरण 150 अध्याय 6000 श्लोक। कि
प्लीज आपको याद कर लेना है। यह मैंने पहले भी आपको बताया है। इसमें सप्तांग सिद्धांत है। राज्य के सात अनिवार्य अंग हैं।
जिसमें राजा है, अमात्य है, दुर्ग है, कोष है, दंड है, मित्र है। तो इस तरह से सात अंग हैं। जो सात अंग मैंने बताए लिख लेना
आप। मैं इनको लिखवाने नहीं जा रहा। क्लियर है? अर्थशास्त्र। इसका मूल विषय है राजनीति। नाम बेशक इसका अर्थशास्त्र है।
लेकिन इसका मूल विषय राजनीति से संबंधित है। यह शासन और ठीक है? लोक प्रशासन से संबंधित है ना कि अर्थशास्त्र से। क्लियर
है इसमें बच्चे सात अंक जो हैं अच्छा वो लिखे हुए भी हैं सात अंक वेरी गुड बच्चे तो सात अंगों में बच्चे ठीक है स्वामी
मींस राजा है तो राजा को आप राजा ही लिखना राजा है अमात्य मींस मंत्री होते हैं जनपद है दुर्ग है ठीक है उसके बाद उसका कोष है
फिर दंड है दंड को बल भी कहा गया है और फिर मित्र है मित्र का मतलब होते हैं जो विदेशी शासक होते हैं उनको मित्र कहा गया
है ठीक है इसमें गुप्तचरों का उल्लेख किया गया है मौर्य काल में गुप्तचर दो प्रकार के होते थे संस्था और सचर संस्था का मतलब
होता था जो एक ही स्थान पर रहकर गुप्तचर ही करते करते थे। आमतौर पर वह राज दरबार में रहते थे और राज दरबार में राजा को
प्रत्येक मंत्री और जो अधिकारी कर्मचारी है उसके चरित्र के बारे में समय-समय पर बताते रहते थे कि भाई किसका कैसा क्या चल
रहा है वो संस्था था। दूसरे होते थे सचर। सचर इसमें महिलाएं भी होती थी, वैश्याएं भी होती थी। इसमें दार्शनिक भी होते थे।
सचर में सब लोग शामिल थे। पता ही नहीं पड़ता। किसान भी इसमें थे। सैनिक भी इसमें शामिल थे। घूम-घूम कर गुप्तचरी करते थे।
आमतौर पे विदेशी राज्यों में क्या चल रहा है? वहां का राजा क्या षड्यंत्र बना रहा है। ठीक है? तो इस तरह से उनको सचर कहा
जाता था और गुप्तचरों को गुण पुरुष कहा गया है अर्थशास्त्र में। इसके बाद इंडिका है। इंडिका विदेशी विवरण है। इंडिका ठीक
है? ये आप देख रहे हो ना इंडिका। ये विदेशी विवरण है। सेल्यूकस निकेटर और चंद्रगुप्त मौर्य दोनों आपस में एक दूसरे
के समकालीन है। एक्चुअली सेल्यूकस निकेटर जो है वह सिकंदर का सक्सेसर था। ठीक है? उसने यूनान के क्षेत्रों से वो आया और
यहां पर जो है ना उसने नॉर्थ वेस्ट इंडिया। ठीक है? के जो उत्तर पश्चिम भारत है वहां पर अपने साम्राज्य को स्थापित
किया और उसे ये लगा कि जिस तरह से सिकंदर ने भारत को ठीक है जीता था इन प्रांतों को जीता था तो मैं भी बड़े आराम से जीत लूंगा
लेकिन सिकंदर और इसके भारत में जमीन आसमान का अंतर है। अब भारत में केंद्रीय राज्य की स्थापना हो चुकी है और चंद्रगुप्त
मौर्य उस केंद्रीय राज्य का एक शक्तिशाली शासक है। तो जब सेल्यूकस निकेटर चंद्रगुप्त मौर्य का आमनासामना हुआ तो
बुरी तरह से सेल्यूकस निकेटर पराजित हुआ। संधि स्वरूप सेलुकस निकेटर को अपने चार प्रांत काबुल, कंधार, मकरान और हैरात
सौंपने पड़े। ठीक है? और इसके अलावा यह तो सौंपने पड़े चार प्रांत। अपनी पुत्री का विवाह भी करवा
दिया था। कार्निलिया हेलन का विवाह चंद्रगुप्त मौर्य के साथ। तो चंद्रगुप्त मौर्य को ठीक है? एक बड़ी सी पत्नी भी मिल
गई। इस तरह से। तो इसने सेल्यूकस निकेटर का राजदूत है। यह चंद्रगुप्त के दरबार में आया है। मेगस्थनीज लगभग छ वर्षों तक रहा
है। इसने पाटलिपुत्र नगर के प्रशासन और समकालीन समाज का आंखों देखा विवरण दिया है। पाटलिपुत्र नगर के पूरे प्रशासन के
बारे में और समकालीन समाज जो है उस समय का समाज कैसा था उसके बारे में पूरी जानकारी दी है। उसने भारतीय समाज को सात जाति या
वर्गों में बांटा है। कौन-कौन सी जातियां वर्ग हैं? उसने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र में समाज का वर्गीकरण नहीं
किया। उसने समाज को सात वर्गों में बांटा कि दार्शनिक है, कृषक है, पशुपालक हैं, मींस फिलॉसफर है, फार्मर्स हैं। फार्मर्स
की सबसे ज्यादा संख्या है। उसने बोला है कि हाईएस्ट पॉपुलेशन जो है इंडिया में वो फार्मर्स की है। इसके बाद हर्डर्स हैं,
पशुपालक हैं, कारीगर या शिल्पी है, आर्टिशियंस हैं, सैनिक हैं, सोल्जर्स हैं, निरीक्षक या गुप्तचर हैं जिनको इंस्पेक्टर
उसने कहा है और अमात्य हैं। जिनको ठीक है? काउंसलर इसने बोला है। तो अमात्य हैं। मेगस्थनीज के अनुसार भारत में दास प्रथा
नहीं थी और अकाल भी नहीं पढ़ते थे। यह मेगस्थनीज बोलता है। जबकि कौटिल्य ने खुद एक जगह अर्थशास्त्र में दास प्रथा का बड़े
दबे से शब्दों में उल्लेख किया है कि दास प्रथा थी। इस तरह का उन्होंने उल्लेख किया है खुद कौटिल्य ने। लेकिन मेगस्थनीज मना
कर देता है कि ना तो भारत में दास प्रथा थी और ना ही भारत में कवि अकाल पड़ते थे। ठीक है? चलिए विशाखदत्त की है। मुद्रा
राक्षस एक ब्राह्मण टेक्स्ट है। ये जो मुद्रा राक्षस है यह विशाखदत्त साहब की है। इसमें चंद्रगुप्त के लिए वृसल शब्द का
प्रयोग किया गया है। वृसल का मतलब होता है कि ऐसा व्यक्ति जो निम्न कुल में जन्मा हो। ठीक है? ठीक है? अब विशाखादत्त की
मुद्रा राक्षस में ही नहीं है। चंद्रगुप्त के लिए विसल शब्द मतलब निम्न कुल का प्रयोग किया गया हो बल्कि सोमदेव की कथा
सरिस सागर है। छमेंद्र की व्रत कथा मंजरी है। ठीक है? उसमें भी जितने भी ब्राह्मण टेक्स्ट है उसमें चंद्रगुप्त मौर्य को
एक्चुअली यही बताया गया है कि वह निम्न जाति से था। ठीक है? वही बौद्ध टेक्स्ट जो हैं वो बोलते हैं कि नहीं वो मोरों को जो
पालने वाले शासक थे पिपली वन के उस शासक की पुत्री से यह जन्मा था। तो इसलिए जो है ना इनको मौर्य कहा जाता है और चंद्रगुप्त
मौर्य मतलब मौर्यों का जो राजकीय चिन्ह था वह मूर भी था। इस बात की हमको जानकारी मिलती है। लोरिया नंदनगढ़ में चंद्रगुप्त
अशोक का एक स्तंभ लेख मिला है जिसके सिर पर मूर की आकृति अंकित है। ठीक है? सबसे पहले मौर्यों का राजकीय चिन्ह मूर्त था।
इस बात की जानकारी ग्रुंडीवेल ने दी। आप लिख लें। मौर्यों का राजकीय चिन्ह मूर था। इस बार में जानकारी सबसे पहले किसने दी?
ग्रुंडीवेल ने दी। प्लस आगे चलेंगे मेरे प्यारे बच्चे। सोमदीप कर कृत कथा सरिस सागर है। छेमेंद्र की वृत कथा मंजरी है।
गुणा की वृत कथा है। उन सब में जो है इनको वृसल या निम्न कुल का ही बताया गया है। दीप वंश और महावंश जो सहेली बौद्ध ग्रंथ
हैं उनसे भी हमें जो है मौर्यों के बारे में जानकारी मिलती है और रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से हमें यह जानकारी मिलती
है कि चंद्रगुप्त मौर्य के ही एक मंत्री थे जिनका नाम था पुष्यगुप्त वैश्य। उन्होंने जूनागढ़ में
जो गिरनार है वहां पर जो है ना एक झील खोदी और सबसे पहली बार उस झील का उन्होंने निर्माण करवाया जिससे कि वहां पर लोगों को
जो वहां पर रह रहे हैं प्लस जो उनकी सैनिक टुकड़ी वहां पर ठहरी हुई है उनको पीने के लिए एक स्वच्छ पानी मिल सके। तो जो
जूनागढ़ अभिलेख है उसमें जो क्या नाम है उस झील का जो उल्लेख किया गया है वो पहली बार एक्चुअली रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख
में है और उसमें बताया है कि पुष्यगुप्त व जो कि चंद्रगुप्त मौर्य के सामंत हैं जो उनके मंत्री हैं। उन्होंने ही सबसे पहले
चंद्रगुप्त मौर्य के कहने पर इस झील का निर्माण करवाया था। फिर आगे चलके इस झीलण का कई बार जीर्णोद्धार हुआ। समुद्रगुप्त
के समय में इस झील का जीर्णोद्धार हुआ था। ठीक है? इस झील को किस नाम से जाना जाता था? एक बार प्लीज मुझे बताएंगे। मेरे
दिमाग से बिल्कुल निकल गया। भाई दिमाग अब बिल्कुल हो गया। दिमाग की अपनी सीमाएं होती हैं। अपनी क्षमताएं होती हैं। ठीक
है? उन क्षमताओं से हम परे जा चुके हैं। सुदर्शन झील ठीक है ना सुदर्शन झील का निर्माण
ठीक है ना चंद्रगुप्त मौर्य का मंत्री है मंत्री है जिसका नाम है पुष्यगुप्त वैश्य उसने इसका निर्माण करवाया था।
पुष्यगुप्त वैश्य के द्वारा निर्मित निर्मित ठीक है मेरी बात समझ में आ रही है यहां तक किसी को किसी भी तरह का मेरे भाई
कोई इशू तो नहीं ठीक है अब यहां पर सोमदेव की कथा सर सागर है ठीक है आप इसके साथसा याद कर लेंगे छमेंद्र ने
बृहत कथा मंजरी लिखी है भ्रत कथा मंजरी लिखी है। ठीक है ना? दीप वंश एवं महावंश है। अब ये जो दीप वंश और
महावंश है मेरे भाई। ठीक है? ये जो दीप वंश और महावंश है ये सहली बौद्ध ग्रंथ है। ठीक है ना? ये बौद्ध टेक्स्ट है। सहली
बौद्ध टेक्स्ट है और रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख है। ऑब्वियस सी बात है। उससे तो हमें जानकारी मिलती है। आगे चलेंगे मेरे
भाई। चंद्रगुप्त मौर्य के बारे में बात करेंगे। ठीक है? चाणक्य की सहायता से अंतिम जो नंद वंश के शासक धनानंद। मैंने
स्टोरी आपको पूरी बताई थी। पूरा क्रम बताया है जब मैं मगध का उत्कर्ष पढ़ा रहा था। तो अब यहां पर जो है चाणक्य की सहायता
से अंतिम नंद शासक धनानंद को पराजित करके मौर्य वंश की इन्होंने ठीक है ना? स्थापना की है। यूनानी लेखकों ने इनके कुछ नाम दिए
हैं। इनके नामों को मैं एक ट्रिक से बताता हूं। जे एस ठीक है ना? पी ए
ठीक है ना? जे एस जे एस का मतलब होता है जस्टिन ने इनको सेंड्रोकस कहा है तो सेंड्रोकस इनको बेसिकली जस्टिन ने कहा है
मुख्यत और जस्टिन ने चंद्रगुप्त मौर्य की सेना को सेंड्रोकस की सेना को डाकुओं का गिरोह कहा है
इसने कहा है कि चंद्रगुप्त मौर्य की जो सेना थी वह क्या थी? डाकुओं का ग्रोह थी। चंद्रगुप्त मौर्य की सेना को डाकुओं का
गिरोह कहा है। तो यूनानी लेखकों के द्वारा इनको उपनाम दिए गए। सेंड्रोकस जस्टिन ने दिया। यह
ध्यान रखना है। और प्लूटार्क ने इनको एंड्रोकोट्स नाम दिया है। प्लूटार्क ने पी एंड्रोकोट्स। प्लूटार्क ने इनको क्या कहा
है? एंड्रोकोट्स कहा है। ठीक है? सबसे पहले सर विलियम जॉन्स ही थे जॉन्स जिन्होंने इस बात की पहचान की कि
सेंड्रोकस ही चंद्रगुप्त मौर्य है। विलियम जॉन्स ने एक और है बच्चे प्लूटार्क ने एंड्रोकस कहा है जस्टिन ने इनको सेंड्रोकस
कहा है जस्टिन ने सेंड्रोकस प्लूटार्क ने एंड्रोकस और ठीक है इनको अ स्टैबो ने पालीब्रूथस बोला है स्टेबो ने इनको
पालीब्रोथस बोला है हालांकि स्टेबो सेंड्रोकस शब्द का भी यूज़ करता है इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन
स्टेबो ने पालीब्रोथस भी बोला है स्टेबो ने पालीब्रोथस का मतलब मतलब होता है कि पाटलिपुत्र का शासक।
पाटलिपुत्र इनकी कैपिटल थी। तो पाटलिपुत्र का रूलर पाटलिपुत्र का शासक ये इनको बोला है। ठीक
है? इसके बाद फिर हम आगे चलेंगे। सेल्यूकस से युद्ध हुआ इनका। ठीक है? इसमें सिकंदर के सेनापति थे। सेल्यूकस निकेटर को
इन्होंने पराजित किया। ठीक है? संधि के तहत 500 हाथी दिए। लेकिन इस वो 500 हाथी संधि के स्वरूप नहीं दिए। उपहार भी दिए।
ठीक है? दे दिए। भाई उसने अपनी बेटी ब्याह दी यार। हैं किसी ने अगले आदमी ने बेटी दे दी तो उसने भी 500 हाथी दे दिए कि जा भाई
अब तो ठीक मैं तेरा दामाद हो गया। तू मेरा ससुर हो गया। तो ससुर को तो आदमी गिफ्ट कर ही देता है। तो अपने ससुर को गिफ्ट कर
दिए। 500 हाथी सेल्यूकस निकेटर को और चार प्रांत सेल्यूकस निकेटर को देने पड़े। ठीक है? वह कौन-कौन से हैं? एरिया मींस हैरात।
अराकोशिया मींस कंधार। गेड्रोशिया मींस मकरान और आपका पैरो पेसी सडाई मतलब काबुल तो काबुल कांधार मकरान और हैरात सेलिकस ने
अपनी पुत्री हेलेना या कार्निलिया से विवाह किया यह पहला अंतरराष्ट्रीय विवाह है बच्चे
ठीक है आज अगर कोई विदेशी बहू ले आता है तो चर्चे हो जाते हैं ठीक है सोच के देखिए चंद्रगुप्त ने ठीक है उस समय एक गोरी मैडम
से विवाह कर लिया था कार्निलिया हेलन से किस समय सोच सोच रहे हो यार वैसा रोला हो गया होगा
चंद्रगुप्त मौर्य का मुंह दिखाई में बहुत रुपया आया होगा सारी महिलाएं दुनिया भर की महिलाएं आती आई
होंगी कि देखे तो सही किसी ने कह दिया होगा साहब बहू तो बहुत गोरी है हां उसके बाद भाई साहब जबरदस्त मुंह दिखाई हुई होगी
क्या सही बात है ना चलिए इसने अपने जीवन के अंतिम समय में बच्चे जैन मुनि है भद्रबाहु उनसे जैन धर्म
की दीक्षा ली है ना जैन धर्म का शिषत इन्होंने ग्रहण किया और 298 ईसा पूर्व में कर्नाटक के श्रवण बेलगोला जो कि चंद्रगिरी
की पहाड़ी पर है वहां पर सल्लेखना या संतारा विधि कहते हैं उपवास के द्वारा इन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। संथारा
अभी संथारा विधि बहुत ज्यादा चर्चाओं में हुई है जब एक छोटी सी बच्ची ने प्राण त्यागे थे। है ना? तो ये मामला सुप्रीम
कोर्ट तक पहुंचा था। इसके बाद इनके बेटे हैं बिंदुसार। मैं सच बात बताऊं। बिंदुसार की उपलब्धि इसी बात में है कि बिंदुसार ने
ना तो किसी नए क्षेत्र को जीता। टू बी ऑनेस्ट। ना ही इसने अपने पिता के द्वारा जीते हुए क्षेत्र में कुछ भी लॉस किया ना
ही प्रॉफिट किया। नो लॉस नो प्रॉफिट। मतलब अपने पिता से इसने जिस विस्तृत साम्राज्य को पाया था। ठीक है? एज अ उत्तराधिकार
उसको अक्षुण बनाए रखा। ये इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है बिंदुसार की। ठीक? बिंदुसार के बारे में अगर हम बात करें मेरे प्यारे
बच्चे तो 298 से 273 ईसा पूर्व ये बिंदुसार का शासनकाल है। ठीक है? इसकी उपाधि अगर मैं बात करूं तो बिंदुसार को
अमित्रघात कहा जाता है। अमित्रघात मींस शत्रुओं का संहारक। ठीक है? अमित्रघात। अमित्रो कैडीज भी कह दिया जाता है। तो
यूनानी ग्रंथों में इसी अमित्रोघात को क्या बोला गया है? अमित्रोकडीज। अमित्रो कैडीज कहा गया है। ठीक है? इस
आदमी को क्या मेरी बात समझ में आ रही है? एक बार प्लीज बोलेंगे। हां या ना? तो अमित्रोकडीज कहा गया है। इसके अलावा वायु
पुराण में इसके लिए व्रसार शब्द का प्रयोग किया गया है। ठीक है? और जैन ग्रंथों में इसके लिए सहसेन सहसेन जैन ग्रंथों में ठीक
है ना और अगर सहली कथाओं के बारे में हम बात करें बौद्ध ग्रंथ तो सहली कथाओं मतलब सहली बौद्ध ग्रंथ जो हैं उसमें बिंदुपाल
कहा गया है बड़ा क्यूट सा नाम है बिंदुपाल इसके बाद इसने सेल्यूकस निकेटर का जो शास उत्तराधिकारी हुआ देखो ये चंद्रगुप्त
मौर्य के बेटे हैं उनके सक्सेसर हैं तो वहां चंद्रगुप्त मौर्य का समकालीन जो यूनानी शासक है वो कौन है सेल्यूकस निकेटर
तो सेल्यूकस निकेटर की मृत्यु के बाद उसका बेटा गद्दी पर बैठा है जिसका नाम था एंटीयकस फर्स्ट। ठीक है? तो इसने एंटीयकस
फर्स्ट से तीन चीजों की मांग की। ठीक है? अब देखो ठीक है? बहुत पैशनेट व्यक्ति था। ठीक है? अब सोचो कि एक मीठी शराब मंगवाई।
ठीक? इसने कहा कि साहब यूनान में मीठी शराब मिलती है। मैंने सुना है तो मीठी शराब लाओ। हमारे यहां की शराब बहुत कड़वी
है। मजा नहीं आता यार। है ना? कड़वी शराब है। मजा नहीं आता। तो एक तो मीठी शराब लेकर आओ। तो मीठी शराब मंगवाई। ठीक है।
दूसरा सूखी अंजीर। ठीक है? एक अंजीर जो आज चलती हैं आपने देखा होगा सूखी अंजीर और तीसरा एक दार्शनिक तो एंटीकस फर्स्ट ने
पहली दो चीजें तो विजवादी सम्मान सहित उपहार में खूब भरभर के लेकिन उसने कहा कि साहब दार्शनिक जो है वो हमारे यहां पर ठीक
है ना बाई एंड सेल खरीद फरोख्त की वस्तु नहीं है तो मैं हाथ जोड़ के आपसे माफी चाहता हूं कि मैं दार्शनिक को नहीं भिजवा
सकता बाकी की दोनों चीज तुम ले जाओ ठीक है ना मतलब मैं खुद लेकर आ रहा हूं दोनों चीजों को बाकी की दोनों चीजें भिजवा दी
राजा ने दार्शनिक भेजने से इंकार कर दिया क्योंकि यूनानी कानूनों में दार्शनिकों का क्रय विक्रय नहीं हो सकता। देखिए इसके
दरबार में दो विदेशी राजदूत आए। एक एंटियोकस फर्स्ट का राजदूत आया जिसका नाम था डायमेकस और एक है मिस्र का शासक इजिप्ट
का शासक है जिसका नाम है टॉलमी सेकंड या फ्लाडेलफस। ठीक है? उसने भी अपना राजदूत भेजा था इसके दरबार में जिसका नाम था
डायोनिसस। तो दो राजदूत इसके दरबार में आए हैं। एक डायमेकस और दूसरा डायोनिसस।
है ना? देखो कितने सिमिलर नेम है। डायमेकस डायनेसस। यह जो है यह एंटियोकस फर्स्ट का राजदूत है।
[गला साफ़ करने की आवाज़] एंटियोकस फर्स्ट का राजदूत है। और यह जो है ना मेरे प्यारे बच्चे डायोनिसस। यह
मिस्र के शासक हैं जिनका नाम है टॉलीमी या फिलाडेफस
फलाडेफस यह उसका राजदूत है। यह दोनों ही बिंदुसार के दरबार में आए।
दोनों ही बिंदुसार के दरबार में आए। इसके अलावा अगर हम इसके इसका झुकाव देखें तो इसकी माताजी जो थी वो एक्चुअली आजीवक धर्म
को मानती थी। आजीवक संप्रदाय की स्थापना मैंने आपको बताई थी। मक्खली गोशाल में की थी जब मैं आपको धार्मिक आंदोलन बता रहा
था। तो इनकी माताजी आजीवक थी। तो इसलिए बचपन से ही इसका जो झुकाव था वो आजीवक संप्रदाय की तरफ था। जबकि इसके पिताजी ने
जीवन के अंतिम दिनों में जैन धर्म को स्वीकार कर लिया था। इसके दरबार में एक आजीवक ज्योतिषी हैं जिनका नाम है पिंगल
वत्स वो निवास करते थे। ठीक है? तो बाकी का यह मैंने बता ही दिया आपको इसके बारे में। फिर नेक्स्ट आगे हम चलते हैं। सम्राट
अशोक ठीक है? और उसके बाद फिर कलिंग युद्ध के बारे में बात करेंगे। देखिए सबसे पहले अशोक के नाम और उपाधियों के बारे में
जिक्र होता है। यह मोस्ट एंड मोस्ट इंपोर्टेंट है। ठीक है? अशोक ने दो उपाधियां धारण की थी। देव नाम पी और
पीदस्य। यह अशोक की दो उपाधियां आपको देखने को मिलेंग। प्लीज यहां पर देखें। अशोक की दो उपाधियां आपको देखने को
मिलेंग। एक मिलेगी आपको देना प्रिय। देवा नाम प्रिय का मतलब होता है मेरे भाई वो व्यक्ति जो देवताओं का प्रिय हो।
देवताओं का प्रिय देवा नाम प्रिय। इस उपाधि को सबसे पहले अजात शत्रु ने धारण किया था। अजात शत्रु आप समझ गए? ठीक है?
अभी थोड़ी देर पहले पहली वाली मैराथन में हमने अजात शत्रु को पढ़ा है। जो कौन है? बिंबिसार का लड़का है। अपने बाप की हत्या
कर दी। क्योंकि बाप जीवन के अंतिम दिनों में वैशाली पर आक्रमण नहीं करना चाहता था। क्योंकि भाई साहब बाप की मतलब पिताजी की
एक बीवी जो थी वो वैशाली से थी। तो वैशाली से संबंध नहीं खराब करना चाहता था। लेकिन यह कह रहा था कि साहब वैशाली पर आक्रमण
करो। तो इसलिए अपने पिता को टपका दिया कि साहब ऐसे थोड़ी नहीं है साम्राज्य का विस्तार होगा। तुम्हारी नीतियों के कारण
थोड़ी ना हम बड़े बन पाएंगे। ठीक है? महत्वाकांक्षी व्यक्ति था अजातशत्रु। ठीक है? तो अशोक देव नाम पी की उपाधि अजात
शत्रु ने धारण की। फिर उसके बाद अशोक ने धारण की यह उपाधि। अशोक के बाद उसका पोता हुआ दशरथ।
दशरथ ने इस उपाधि को धारण किया और उसके बाद फिर श्रीलंकाई शासकों ने भी इस उपाधि को धारण किया। यहीं से ठीक है? अशोक से ही
सीखकर या अशोक को फॉलो करते हुए श्रीलंकाई शासक हुए। एक तो हुए तिस और तिस के बाद के जितने भी शासक हैं
जितने भी शासक हैं उन सभी ने बच्चे ठीक है ना दे नाम पे दूसरी उपाधि होती है मेरे प्यारे बच्चे पियसिन जो इन्होंने धारण किए
पियसिन पियसिन बोले तो देखने में प्रिय जो व्यक्ति देखने में सुंदर लगता हो ठीक
है बिल्कुल तुम्हारी तरह तुम लोग लगते हो देखने में सुंदर सीजा पिसा देखते हो चार पांच बार दिन में या नहीं होता है यह भी
एक उम्र होती है। बहुत शीशा देखा जाता है। ठीक है? लेकिन मेरे पापा जी मुझसे इस बात से खासी नाराज थे कि मैं अपना मुंह भी
नहीं धोता। मुझसे कहते हैं कि तू कैसा लड़का है? तेरी उम्र पे तो चार बार मैं शीशे में मुंह देखता था और 20 बार कम से
कम बाल काटता था। कैसा लड़का है तू? मैंने कहा पिताजी अब जहां पर दिल लगना था वहां पर लग गया। अब क्या फायदा शीशा देखने से
या फिर बाल संवारने से? आओ अब हम आगे बात करेंगे। पेद मींस देखने में प्रिय। तो यह उपाधि चंद्रगुप्त मौर्य ने धारण की है।
केवल दो ही शासकों ने। चंद्रगुप्त मौर्य उसके कौन हो गए? ग्रैंडफादर हो गए चंद्रगुप्त मौर्य। ठीक है ना? अशोक के और
चंद्रगुप्त मौर्य के बाद अशोक। क्योंकि अशोक का बाप जो है वह बिंदुसार है। बिंदुसार के पिताजी जो हैं वह चंद्रगुप्त
मौर्य हैं। तो ये दादा और पोते हैं। ठीक है? अगर देखा जाए दादा और पोते दोनों ही भाई साहब अच्छे थे देखने में इसलिए दोनों
ने प्रियदर्शी देखने में जो प्रिय हो जो देखने में अच्छा लगता हो ऐसी उपाधियां धारण की तो इन्होंने देवा नाम प्रिय
देवताओं का प्रिय और प्रियदसि सुंदर मुख माला मतलब देखने में प्रिय ये दो उपाधियां धारण की अशोक नाम केवल चार लघु शिलालेखों
में मिलता है तो अशोक का नाम जो चार लघु शिलालेखों में मतलब जो आपके माइनर रॉक एडिक्ट्स हैं उनमें हमें केवल अशोक का नाम
अशोक मिला है। कौन से हैं? मास्की, गुरजरा, नेतूर और उडगोलम। ये चार लघु शिलालेख हैं। ठीक है ना? माइनर
रॉक एडिक्ट्स हैं। ये चार हैं। कौन-कौन से हैं? मेरे साथ एक बार आप बोलेंगे। प्लीज बोलो। मासकी है। बोलो बच्चे। मासकी है,
गुर्जरा है, नेतूर है और उडगुलम है। मासकी है, गुर्जरा है, नेतूर है और उडगुलम है। तो चार लघु शिलालेखों में अशोक का नाम
केवल अशोक मिलता है। पुराणों में अशोक का नाम अशोकवर्धन मिलता है। ठीक है ना? अशोकवर्धन और वहीं जयपुर से जिसको बाबरू
वैराट शिलालेख कहा जाता है उसमें अशोक ने स्वयं को कहा है कि वह मगध अधिराज है। किंग ऑफ मगध है। मगध अधिराज कहा है। तो
प्लीज ध्यान रखना है यह मोस्ट एंड मोस्टेंट है। चार लघु शिलालेखों में अशोक का नाम अशोक मिलता है। वह है मास्की,
गुर्जर, नेतूर और ओडगोलम। इसके बाद पुराणों में अशोकवर्धन नाम मिलेगा। और भाबू वैराट शिलालेख में उसने खुद को मगध
अधिराज कहा है। द किंग ऑफ मगध कहा है। आगे हम बात करेंगे ठीक है? कलिंग का युद्ध यह इसके राज्याभिषेक के आठवें वर्ष में कलिंग
का युद्ध हुआ था। ठीक है? अगर हम देखें तो इसका साम्राज्य जो है चंद्रगुप्त मौर्य के बाद बिंदुसार का साम्राज्य उतना ही रहा।
ठीक है? इनके साम्राज्य से एक तो दक्षिण भारत पूरी तरह से नदारद था। दूसरा कलिंग इनके साम्राज्य में शामिल नहीं था। तो
इसने कलिंग के शासक उस समय कलिंग पर नंदराज जिसकी कैपिटल टोसली हुआ करती थी। वह शासन कर रहा था। तो इसने उसके
साम्राज्य को जीतने के लिए एक बहुत जबरदस्त युद्ध हुआ। दोनों के बीच में जिसको कलिंग का युद्ध कहा जाता है। यह
माना जाता है कि डेढ़ लाख से अधिक सैनिक मारे गए। उस भीषण रक्तपात को देखकर इसके हृदय का परिवर्तन हुआ और फिर इसने हमेशा
हमेशा के लिए तलवार को त्याग दिया। ठीक है? इसने धम्मघोष की जगह सॉरी इसने बहरी घोष के स्थान पर धम्मघोष की नीति अपनाई।
यह बहुत पूछा जाता है कि इसने बैरी घोष के स्थान पर स्थान पर धम्मघोष की नीति अपनाई।
नीति अपना बहरी घोष का मतलब है बच्चे युद्ध के द्वारा विजय। तो उसने कहा युद्ध के द्वारा विजय नहीं करनी। ठीक है ना?
धर्म विजय करनी है। ठीक है ना? एक गाना है ना कि जीते हो किसी ने देश तो क्या हमने भी दिलों को जीता है। यहां राम अभी तक है
नर में नारी में अभी तक सीता है। और मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती मेरे देश तो यह वो वाली बात है कि हमें
तलवार के माध्यम से नहीं जीतना किसी को। अरे तलवार के दम पर किसी को जीता तो क्या जीता? प्यार से जीतो। प्यार में बहुत ताकत
होती है। तुम्हें नहीं पता पता चलेगा। 12 घंटे लगातार मैंने पढ़ा लिया। 13वा घंटा चल रहा है। वह भी खत्म होने वाला है।
प्यार की ताकत है। लेकिन वो प्यार तुम लोगों से आ रहा है मेरे भाई। ठीक है? चलिए तो इसमें जो है ना अशोक के
13वें ब्रह्म शिलालेख में कलिंग के युद्ध का वर्णन है। इसमें 1 लाख लोक के आसपास मारे गए। डेढ़ लाख लोग बंदी बनाए गए। फिर
इसका आउटकम यह निकला कि इसने बैरीघोष को त्याग दिया और धम्मघोष को इसने अपनाया। ठीक है? कि बौद्ध भिक्षु उपगुप्त ने अशोक
को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी। उपगुप्त ने। यह बहुत इंपॉर्टेंट प्रश्न है कि बौद्ध धर्म की जो दीक्षा ली थी, वह
उपगुप्त से इन्होंने ली थी अशोक ने। अब इसके बाद अशोक के शिलालेख एवं लिपियों के बारे में बात करेंगे। अशोक भारत का पहला
शासक था जिसने प्रजा को सीधे अभिलेखों के द्वारा संबोधित किया। ठीक है ना? ईरानी शासक है जिसका नाम है दाराप्रथम मतलब
डेरियस। यह उससे इंस्पायर्ड था। मैंने बताया ना कि भारत पर सबसे पहला आक्रमण जो हुआ था वो ईरानी आक्रमण हुआ था दरियाबाू
का या डेरियस फर्स्ट का तो उसने भी अपनी प्रजा को संबोधित करने के लिए इसी तरह से अभिलेखों को खुदवाया था तो उसी से
इंस्पायर्ड था और इसने भी जो है ना लेकिन यह अशोक भारत का पहला ऐसा शासक बना वो ईरान का शासक है। यह भारत का ऐसा शासक बना
जिसने प्रजा को सीधे अभिलेखों के द्वारा संबोधित करवाया। अशोक के अभिलेखों में चार लिपियां हैं। सबसे ज्यादा अशोक के जो
अभिलेख मिले हैं हमें स्पेशली पूर्वी भारत से और मध्य भारत से वो ब्राह्मी लिपि में मिले हैं। ब्राह्मी लिपि बाएं से दाएं
लिखी जाती है लाइक देवनागरी। ठीक है? और भारत के अधिकांश हिस्सों में शिलालेख इसी हिस्से मिले हैं। दूसरी है खरोष्ठी लिपि
ये उर्दू की तरह लिखी जाती है दाएं से बाएं खरोष्ठी लिपि है। ये जो पश्चिम उत्तर भारत है ना नॉर्थ वेस्ट इंडिया वहां पर
सहवासगढ़ी और मानसहेरा। खरोष्ठी लिपि में ध्यान रखना है सहवासगढ़ और मानसाहेरा के जो अभिलेख हैं वह खरोष्ठी लिपि में है।
ठीक है? क्योंकि वहां के लोग उसी प्रकार की लिपि को जानते थे। उन्हीं की लिपि में इसने शिलालेखों को उत्कीर्ण करवाया। इसके
बाद अरमाइक लिपि है जो अफगानिस्तान के क्षेत्रों में मिली है और फिर यूनानी या ग्रीक लिपि यह अफगानिस्तान में मिली है
हमें सारे कुना नाम के स्थान से कंधार में सारे कुना। ठीक है? अब अशोक के अभिलेखों की खोज एवं
उनके रीडिंग्स के बारे में अगर हम बात करें डिस्कवरी एंड रीडिंग्स तो इसमें खोज जो की है वो टी
फैंथिलर ने की है। दिल्ली मेरठ स्तंभ लेख को इन्होंने खोजा था। टी फैंथिलर ने सबसे पहली बार ठीक है। अब जब उसने टी फैंथिलर
ने वो दिल्ली मेरठ दिल्ली मेरठ स्तंभ लेख को छोटी लाट कहा जाता है। छोटी लाट कहा जाता है। इसको अभी मैं मिडवल
पढ़ाया है मैंने थोड़ी देर पहले। ठीक है? और जो दिल्ली टोपरा वाला है दिल्ली टोपरा
उसको मेरे भाई बड़ी लाट बोला जाता है। बड़ी लाट ये दोनों अशोक के हैं और ये फिरोज शाह तुगलक के द्वारा देखिए दिल्ली
टोपरा जो है वो टोपरा कला गांव है हरियाणा में। टोपरा कला गांव है हरियाणा में।
ठीक है ना? और यह जो मेरठ वाला है आप सभी को पता है मेरठ है तो यह वहां से मेरठ से और यह टोपरा कलाओं से दिल्ली लाया गया। यह
किसके द्वारा लाए गए? एफ एस टी मैंने बताया था ना फिरोज शाह तुगलक में फिरोजशाह तुगलक के द्वारा लाए गए।
फिरोज शाह तुगलक के द्वारा लाया गया। ठीक है? टीथ फैंथिलर ने दिल्ली मेरठ स्तंभ को खोजा। इसके बाद सबसे पहले इसको पढ़ा है
जेम्स प्रिंसेसिप ने। 1837 की बात है। जेम्स प्रिंसेसप ने ब्राह्मी लिपि को सफलतापूर्वक पढ़ लिया और फिर धीरे-धीरे
अशोक के सारे के सारे जो भी अभिलेख हैं वो सारे अभिलेख डिकोड होने लगे समय के साथ। मतलब ये बहुत बड़ा अचीवमेंट था। सच में
अशोक के अभिलेखों को ठीक है? रीड करना। अब हम बात करेंगे अशोक के 14 बृह शिलालेख हैं। ठीक है? जो मेजर एडिक्ट्स हैं वह 14
हैं। रॉक एडिक्ट्स 14। ठीक है? 14 के 14 को हम लोग देखेंगे। बहुत अच्छे से देखेंगे। ठीक है? और मैं बताऊंगा कि आप
इनको क्लास में कैसे याद करेंगे। क्योंकि अभी तक मैंने जितना भी पढ़ाया मेरा उसमें उद्देश्य यही था कि मेरे भाई मैं क्लास के
क्लास में आपको याद करवा सकूं। है ना? इसी पे मैं चला हूं। तो सबसे पहले हम बात करेंगे मेरे भाई पहला शिलालेख फर्स्ट पहले
शिलालेख में पशु बलि की निंदा की है जो पहला शिलालेख है कि नहीं भाई पशुबलि निंदनीय है पशु बलि नहीं होनी चाहिए और
राजकीय रसोई में पशु हत्या पर प्रतिबंध है इसमें खुद बोला है उसने कि पहले देव नाम पी है मतलब वो खुद है देव नाम पी कि पहले
देव नाम पी के रसोई में हजारों जीव सैकड़ों जीव आते थे ठीक है चिकन बनता था मटर बनता था ठीक है इस तरह से ठीक है और
फिश करी वगैरह पता नहीं क्या-क्या बनता होगा। है ना? लेकिन अब जो है केवल तीन ही जीव
आते हैं। लेकिन एक इसने मोर बताया एक कि मोर आता है और एक और पता नहीं क्या बताया कि बस वो भी धीरे-धीरे बंद कर दिए जाएंगे।
वो भी नहीं आएंगे। यह कहता है कि मैं प्रॉमिस करता हूं। तो पशु बलि की निंदा की है इसमें और इसमें एक्चुअली धार्मिक उत्सव
व समारोह पर प्रतिबंध लगाने की बात कही है। मैं एक्स्ट्रा बता देता हूं। पशु बलि की निंदा की है। ठीक है? रसोई घर में पशु
हत्या पर प्रतिबंध है। इसने खुद कहा है कि पहले मेरे रसोई में इतने जीव आते थे। रोजाना डेली इतने जीव मारे जाते थे। ठीक
है? अब नहीं मारे जाएंगे। गलत बात है ये। ठीक है? जीव हत्या गलत है। पाप पड़ेगा। इसने कहा और इसने खुद कहा है धार्मिक
उत्सव व त्यहारों पर प्रतिबंध लगाने की बात कही है कि धार्मिक उत्सव व त्यहारों में शो ऑफ नहीं करना।
उन पर प्रतिबंध लगाने की बात कही है। दूसरा देखिए मानव व पशु चिकित्सा दो प्रकार की चिकित्सा का उल्लेख किया है कि
जितनी चिकित्सा मानव के लिए उपयोगी है। जितनी मानव के लिए चिकित्सा जरूरी है उतनी ही जरूरी है चिकित्सा पशुओं के लिए भी। तो
इसने मानव और पशु चिकित्सा दोनों का उल्लेख किया है। इसके अलावा लोक कल्याण और सीमावर्ती राज्यों का उल्लेख किया।
स्पेशली जो दक्षिण भारत के राज्य हैं उनका उल्लेख दूसरे शिलालेख में किया गया और वो दक्षिण भारत के राज्य हैं। चोल हैं,
पांड्य हैं, सती पुत्र हैं, केरल पुत्र हैं। तो इनका उल्लेख किया है। इसने अपने तीसरे शिलालेख में युक्त राजुक
प्रादेशिक अधिकारियों को यह आदेश दिया है कि वह हर पांचवें वर्ष में साम्राज्य का दौरा करें। ठीक है? युक्त राजुक ठीक।
युक्त जो होता है वह एक ठीक? जिला का मुखिया होता है। राजुक जो होता है वह एक प्रदेश का मुखिया होता है। प्रादेशिक
अधिकारी जो और अन्य स्थानीय अधिकारी होते हैं तो उनको इसने आदेश दिया है और आदेश दिया है कि भाई हर पांचव वर्ष में वह दौरा
करें और अपने माता-पिता की सेवा करें। ब्राह्मण व श्रमणों की भी सेवा करें। ना केवल माता-पिता की सेवा बल्कि जो ब्राह्मण
हैं, श्रमण हैं, उनकी सेवा करें और दान दें उनको माता-पिता के साथ-साथ। चौथा है इसने बहरी घोष के स्थान पर धम्मघोष। आप
समझ गए बहरी घोष और धम्मघोष क्या है? तो वैरी घोष के स्थान पर धम्मघोष को अपनाने की इसने बात कही है। फिर इसके बाद हम इसके
पांचवें शिलालेख के बारे में बात करेंगे। इसमें पांचव शिलालेख इसने अपने राज्याभिषेक के 13व वर्ष में एक जो दम
महामात्रों की नियुक्ति की है ना उनके आदेश दिया है उनकी नियुक्ति के बारे में बताया है पांचव शिलालेख में कि मैंने जो
है ना अपने राज्यारोहण के जब उसका राज्याभिषेक हुआ है तो इसकी घटनाएं इसके राज्याभिषेक
के वर्ष से मिलती हैं। तो इसने अपने राज्याभिषेक के 13व वर्ष में धम्म महामात्रों की नियुक्ति की थी। इन द धम्म
महामात्रों का कार्य यह था कि वह देखिए गांव-गांव कस्बे कस्बे गली-गली जाएंगे। और जो धार्मिक मान्यताएं हैं उनका
प्रचार प्रसार करेंगे। लोगों को धार्मिक जीवन जीने के लिए प्रेरित करेंगे। मजबूर नहीं करेंगे। बाध्य नहीं करेंगे। ऐसा नहीं
कि मारेंगे पीटेंगे लेकिन इंस्पायर्ड करेंगे कि लोग धार्मिक जीवन जिए। है ना? बहुत अच्छे से अपना जीवन व्यतीत करें। तो
राज्य अभिषेक के 13व वर्ष में और यहीं पर लिखेंगे राज्याभिषेक के 12व वर्ष में उसने राजकों की नियुक्ति की है।
देखो 12व वर्ष में राज्याभिषेक 12व वर्ष में उसने राजकों की नियुक्ति की है और 13व वर्ष में उसने धम्म महामात्रों
की नियुक्ति की है। सबसे पहले मैं बता देता हूं राज्याभिषेक के सातवें वर्ष में कश्मीर व खोतान विजय है। सातवें वर्ष में
मोस्ट एंड मोस्ट इंपोर्टेंट है जो कि राज्याभिषेक के सातवें वर्ष में है। और यह अशोक की पहली विजय मानी जाती है। किस में?
कश्मीर और खूतान के प्रदेशों को जीता। इसके बाद आठ वर्ष पूरे होने के बाद नौवें वर्ष में कलिंग युद्ध है जिसमें लाखों लोग
मारे गए और इसी युद्ध में जो है देवा नाम पिय पीिय दर्शन राजा अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ और उसने बहरी घोष के स्थान
पर धम्मघोष की नीति अपनाई और कहा कि वह हमेशा हमेशा इसी नीति को इसी पॉलिसी को फॉलो करेगा चाहे कुछ भी हो जाए।
जो छठवां रॉक एडिक्ट है छठवां शिलालेख है उसने आत्मनियंत्रण की बात कही है और कहा है कि राजा को प्रजा के मामलों की सूचना
हर समय दिया जाए। उसने ये कहा है कि मैं इनफैक्ट अपने सैयन कक्ष में भी हूं। ठीक है ना? तब भी मुझे प्रजा से संबंधित
हर एक मामले की जानकारी दी जाए। बिल्कुल भी यह ना सोचा जाए कि मैं सैयन कक्ष में सहवास कर रहा हूं। ठीक है? तब भी मुझे
जानकारी मिलनी चाहिए। आत्मनियंत्रण की बात कही है और किसी भी हालत में राजा को ठीक प्रजा की सूचना देने के लिए निर्देश दिया
है। इसके बाद सातवां और आठवां है। ठीक है? एक्चुअली सभी संप्रदायों में सहिष्णुणता यह सातवां शिलालेख है। इसने बोला है कि
सभी संप्रदाय आपस में एक दूसरे के साथ मिलकर रहे हैं। तो उस समय केवल बौद्ध धर्म थोड़ी नहीं था। जैन धर्म था। आजीवक थे।
ऐसे मिला के टोटल बौद्ध ग्रंथों में लिखा है कि महात्मा बुद्ध के समय में 62 धार्मिक संप्रदाय थे। 62
ठीक है? केवल इनका ही नहीं था। तो जितने भी धार्मिक संप्रदाय हैं इनको जो मानने वाले अलग-अलग लोग हैं, ठीक है? वो सभी आपस
में बहुत अच्छे से अपना जीवन व्यतीत करें। तो सभी संप्रदायों में सहिष्णुता की बात कही गई है। और अशोक की धम्म यात्राओं का
वर्णन है। ठीक है? अशोक की इसी में अशोक की धम्म यात्रा तो अशोक ने सबसे पहले अपनी धम्म यात्रा बुधगया में की है। राज्यारोहण
के 10वें वर्ष में। अशोक की पहली धम्म यात्रा जो है वह इसके राज्यारोहण के 10वें वर्ष में है।
10वें वर्ष में है। ठीक है ना? और दूसरी धम्म यात्रा जो है वह लुंबिनी की है। लुंबिनी वहां पर इसने टैक्स को
ठीक है? टैक्स में कुछ रिलीफ दिया था। कुछ रिलैक्सेशन दिया था। लुंबिनी क्योंकि आप सभी को पता है कि लुंबिनी में महात्मा
बुद्ध साहब का जन्म हुआ है तो इसलिए वहां पर टैक्स रिलैक्सेशन दिया वहां के लोगों को और लुंबिनी की धर्म यात्रा राज्यारोहण
के 20वें वर्ष में इसने की है। राज्यारोहण के 20वें वर्ष में की है। तो इसने सातवें शिलालेख में सभी संप्रदायों
में सहिष्णुता अशोक की धम्म यात्राओं का वर्णन ठीक है और सबसे पहले अशोक ने जो अपनी धर्म यात्रा की है वो बोधगया में की
है। नम जो है उसने व्यर्थ के रीति रिवाजों की निंदा की है। नमे शिलालेख में कि जितने भी यह जो व्यर्थ के रीति रिवाज हैं भाई
इनको खत्म करो। तो व्यर्थ के रीति रिवाजों की निंदा की है। सच्ची शिष्टाचार व धम्म नीति पर बल दिया है। तो व्यर्थ के रीति
रिवाजों की निंदा सच्ची शिष्टाचार और धम्म की नीति का इसने समर्थन किया है। उस पर बल दिया है। 11वें शिलालेख में धम्मदान के
महत्व की व्याख्या की है और कहा है कि संसार में धम्मदान सबसे बड़ा दान है। तो धम्मदान के महत्व की व्याख्या यह इन्होंने
11वें शिलालेख में की है। धम्मदान के महत्व की व्याख्या की है और कहा है कि संसार में धम्म का जो दान है वह सबसे बड़ा
दान है। 12वां है धार्मिक सहिष्णुता वही जो सातवें में है कि सभी धर्मों के बीच में धार्मिक सहिष्णुता सर्वधम संभव और
स्त्री महामात्रों की नियुक्ति की है जिससे कि स्त्रियों को धर्म से संबंधित शिक्षाएं दी जा सके। 13 माह में कलिंग
युद्ध का वर्णन है और अशोक के पांच यूनानी राजाओं के साथ संबंधों का जिक्र है। जिसमें एंटियोकस सेकंड है। अशोक के समय
में एंटियोकस सेकंड है। ठीक है? अलेक्जेंडर है, मग या मागस है। ठीक है? एपेरस है इसमें और एक है फिलाडेफस या
टोलमी द्वितीय। ये पांच यूनानी राजा हैं। इनके नाम का उल्लेख है। फिर 14वां शिलालेख है और बार-बार जनता से निवेदन किया है कि
मेरे भाई धार्मिक जीवन जियो। बार-बार। ठीक है? हाथ जोड़-जोड़ के जनता से निवेदन कर रहा है कि मेरे भाई ठीक है? हाथ जोड़ के
मैं तुम लोगों से निवेदन कर रहा हूं कि धार्मिक जीवन जियो। धार्मिक जीवन जीने के लिए इसने लोगों को प्रेरित किया है।
इंस्पायर्ड किया है। तो जनता को धार्मिक और सदाचारी जीवन जीने के लिए बिताने की इसने बारंबार प्रेरणा दी है। इसके बाद फिर
इसके लघु स्तंभ लेख देखेंगे जो प्लर एडिक्ट्स हैं। सबसे पहले राज्याभिषेक के 20वें वर्ष में बुद्ध के जन्म स्थल
लुंबिनी की यात्रा की है। तो रूमन अभिलेख मिला है हमें। ठीक? ठीक रुमनदई एक्चुअली लुंबिनी में ही पड़ता है। रुम्मनदई
लुंबिनी के पास में है। तो रमनदेई लघु स्तंभ लेख मिला है कि और उससे यह जानकारी मिलती है। मैंने जस्ट बताया था ना कि इसने
अपने राज्याभिषेक के 20वें वर्ष में अपनी दूसरी धम्म यात्रा की जो कि लिंबिनी में की महात्मा बुद्ध का जन्म स्थल है। वहां
पर इसने धार्मिक कल को पूरी तरह से माफ कर दिया जो बलि होता है। धार्मिक कर बलि को पूरी तरह से माफ कर दिया। भू-राजस्व भाग
1/6 से घटाकर 1/8 कर दिया। तो मैंने बोला था रिलैक्सेशन दिया था। अशोक का एकमात्र यह आर्थिक अभिलेख है जिसमें अर्थ से
संबंधित बातें हैं। इसके बाद मौर्यकालीन केंद्रीय एवं प्रांतीय प्रशासन इसके बारे में बात करेंगे। टोटल जो शीर्ष अधिकारी
हैं उनको 18 तीर्थ कहते हैं। ठीक है? लेकिन इनको महामात्र भी कहते हैं। इनकी संख्या 18 है। और जो विभागीय प्रमुख होते
हैं डिपार्टमेंटल हेड्स जिनको अध्यक्ष कहते हैं उनकी संख्या टोटल 27 है। जैसे नवाध्यक्ष है,
कुप्य अध्यक्ष है इस तरह से है ना खनिजाध्यक्ष है। तो टोटल ऐसे जो अध्यक्ष है इस हैं जो डिपार्टमेंटल हेड्स हैं उनकी
संख्या टोटल 27 है। ठीक है? और जो तीर्थ या महामात्र हैं उनकी टोटल संख्या 18 है। समाहर्ता। अब मैं कुछ प्रमुख अधिकारियों
के नाम बता रहा हूं। समाहर्ता मींस आपका चीफ रेवेन्यू कलेक्टर ये सर्वोच्च राजस्व संग्रहकर्ता है मतलब जो टैक्स को कलेक्ट
करता है ये टैक्स कलेक्टर है संग्रहकर्ता ठीक है ये आपको ध्यान रखना है मेरे भाई तो ये जो संग्रहकर्ता मतलब समाहर्ता है सॉरी
ये जो समाहर्ता है यह समाहर्ता मेरे भाई सर्वोच्च राजस्व संग्रहकर्ता है यह वित्त मंत्री हैं।
मेरी बात आ रही है समझ में? समाहर्ता कौन है? सर्वोच्च राजस्व संग्रहकर्ता हैं। वित्त मंत्री हैं। सर्वोच्च राजस्व
संग्रहकर्ता हैं। वित्त मंत्री हैं। इनका नाम है साहब समाहर्ता। सर्वोच्च राजस्व संग्रहकर्ता और वित्त मंत्री ये समाहर्ता
हैं। ठीक है? दूसरे हैं मेरे भाई। ठीक है? जो हैं सन्निधाता ये जो सन्निधाता हैं ये राज्य के कोषाध्यक्ष हैं। सन्निधाता
कोषाध्यक्ष इनको कहेंगे। मतलब ये चीफ ट्रेजरी ऑफिसर हैं और स्टोर इंचार्ज हैं। सीता अध्यक्ष राजकीय कृषि भूमि का मुखिया
होता है। सरकारी भूमि को सीधा कहा जाता है। तो इसलिए राजकीय कृषि भूमि के मुखिया को सीता अध्यक्ष कहेंगे। ठीक है? पोतवा
अध्यक्ष है। पोतवा अध्यक्ष का मतलब होता है जो मापतोल का अधिकारी है। ठीक है? सुपरिडेंटेंट ऑफ वेट एंड मेजर्स। मापतोल
का प्रमुख अधिकारी और वाट का नियंत्रक। पोतवाध्यक्ष। पण अध्यक्ष है। पण का मतलब होता है जो व्यापार और वाणिज्य का प्रधान
है सुपरिटेंडेंट ऑफ कॉमर्स एंड ट्रेड उसको हम लोग प्याध्यक्ष कहेंगे जो व्यापार और वाणिज्य का प्रधान होगा प्लस आठविक ये वन
विभाग का प्रधान होगा इसको उपाध्यक्ष भी बोलेंगे। पाटलिपुत्र नगर प्रशासन के बारे में मेगस्थनीज जी ने इंडिका में जिक्र
किया है और बोला है कि टोटल पांच-प लोगों की छह समितियां थी। तो इस तरह से 30 सदस्यों का पूरा एक मंडल था। ये जो छह
समितियां हैं उसमें औद्योगिक कला से संबंधित समितियां हैं। इसमें पांच सदस्य हैं। विदेशियों की देखरेख से संबंधित
समितियां हैं। इसमें भी पांच सदस्य हैं। जन्म मरण पंजीकरण है। है ना? इसमें भी ऑब्वियस सी बात है पांच सदस्य हैं। तो ऐसे
करके छह समितियां हैं। औद्योगिक कला इसमें पांच सदस्य हैं। विदेशियों की देखरेख से संबंधित समिति इसमें भी पांच सदस्य हैं।
जन्म मरण पंजीकरण से संबंधित समिति है। इसमें भी पांच सदस्य हैं। व्यापार वाणिज्य से संबंधित समिति इसमें भी पांच सदस्य
हैं। माल विक्रय निरीक्षण से संबंधित समिति है। इसमें भी पांच सदस्य हैं। और विक्री कर वसूली से संबंधित समिति है।
इसमें भी पांच सदस्य हैं। तो टोटल इस तरह से पांच-प सदस्यों की छह समितियां हैं और ये छह समितियां हैं। टोटल 30 सदस्य होते
हैं। सैन्य प्रशासन। ठीक? अगर हम देखें मेरे प्यारे बच्चे तो नौसेना, रसदवा, यातायात, पैदल सेना, अश्वारोही, गजारोही
और रथ सेना। तो इस तरह से यहां पर भी 30 सदस्यों का मंडल है और पांच-प सदस्यों की यहां पर भी ये छह समितियां हैं। ठीक है?
अब मौर्य साम्राज्य के पांच प्रमुख प्रांत हैं। सबसे पहला है उत्तरापथ। मतलब जो उत्तरी प्रांत है वो उत्तरापथ कहा जाता
है। इसकी राजधानी तक्षशिला है। उत्तरी प्रांत को उत्तरापथ कहा जाएगा। इसकी राजधानी तक्षशिला है। जो पश्चिम का प्रांत
होगा उसको अवंती राष्ट्र बोला जाएगा। पश्चिम के प्रांत का नाम है अवंती राष्ट्र और इसकी राजधानी उज्जैनी है। अवंती
राष्ट्र की राजधानी क्या है? उज्जैनी। उज्जैनी। ठीक है? तो पश्चिमी प्रांत है अवंती राष्ट्र इसकी राजधानी उज्जैनी है।
इसके बाद है दक्षिणी प्रांत। दक्षिणी प्रांत मींस दक्षिणापथत। इसकी राजधानी स्वर्णगृह है। दक्षिणी प्रांत मींस
दक्षिणापथ। दक्षिणापथ की राजधानी स्वर्णगिरी है। फिर है आपका पूर्वी प्रांत। कलिंग है। कलिंग की राजधानी टोसली
है। और फिर केंद्र केंद्र को बोला जाएगा प्राशी या प्राची और इसकी राजधानी मेरे भाई पाटलिपुत्र है। 185 ईसा पूर्व में
अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ जब एक सैन्य परीक्षण का निरीक्षण कर रहा था तब उसी का एक ब्राह्मण सेनापति है पुष्यमित्र शुंग
ने ठीक भरे सेना परेड में सब लोगों के सामने इसकी हत्या कर दी और इस तरह से मगध पर शुंग वंश की स्थापना की। अब हम इसके
बाद नेक्स्ट अध्याय पर आए हैं मेरे प्यारे बच्चे जो है आपका मौर्योत्तर काल। बस मौर्योत्तर काल के बाद फिर गुप्त काल है।
फिर गुप्तत्तर काल है। तो कुछ ज्यादा नहीं बचा हुआ। ठीक? बहुत आराम से अच्छे-अच्छे से अब आपने मौर्य काल खत्म किया। आपको पता
चला कब खत्म हुआ? बताओ मेरी बात। देखिए बड़े आराम से 1 घंटे में हमने पूरा मौर्य काल खत्म कर लिया। ऐसे ही आपका मौर्योत्तर
काल है। तो प्लीज एक बार आप थम्स अप करेंगे और मुझे बताएंगे मौर्योत्तर काल। देखिए इसे हम पढ़ने जा रहे हैं। एक बार
थम्स अप करके बताओ क्या सबको समझ में आया? सब लोग करो थम्स अप। जितने भी लोग हैं
ठीक है और मेरे भाई इस सेशन को लाइक जरूर कर देना यार। है ना? चलिए यार तुम लोग भी बहुत हिम्मती हो। सच
में कमाल कर दिया तुमने। ठीक है? हिम्मत कूट कूट के मेरे भाई तुम लोगों में भरी हुई है। क्या कमाल के लोग हो। आओ मेरे भाई
आगे चलते हैं। और आगे चलने के क्रम में मैं क्या बोल रहा था आपको? मौर्योत्तर काल। देखो मौर्यों के दो प्रकार के
उत्तराधिकारी हुए। एक मौर्यों के उत्तराधिकारी हुए देसी और दूसरे उत्तराधिकारी हुए विदेशी। देसी और विदेशी
दोनों के बारे में बताऊंगा। और मौर्योत्तर काल ऐसे करके खत्म हो जाएगा। आपको पता भी नहीं चलेगा। आओ और बहुत सिंपल है, बहुत
सरल है। मौर्य उत्तर का दो उत्तराधिकारी हैं इनके
देसी उत्तराधिकारी ठीक है। मूड हैंग हो गया। रुक लो एक सेकंड।
[हंसी] भाई देखो मौर्यों के बाद के पीरियड को हम मौर्योत्तर काल कहेंगे ना बड़ा स्वाभाविक
है। ठीक है? जो मौर्यों के बाद का पीरियड है। ठीक है? उसको हम लोग क्या कहेंगे? मौर्योत्तर काल कहेंगे। तो मौर्यों के दो
उत्तराधिकारी हुए। ठीक है? एक हुए उत्तराधिकारी और दूसरे मेरे भाई हुए विदेशी उत्तराधिकारी।
विदेशी उत्तराधिकारी देसी उत्तराधिकारियों में अगर हम बात करें लेकिन तो ये सारे के सारे देसी
उत्तराधिकारी एक्चुअली ब्राह्मण धर्म से हैं। तो इसलिए इस पूरे वंश को हम ब्राह्मण वंश भी कहते हैं। ये सभी ब्राह्मण है ना
वंश इन द सेंस ठीक है ऑन द बेसिस ऑफ द कास्ट वी कैन मेंशन इट कि ब्राह्मण डायनेस्टी है क्योंकि सब लोग ब्राह्मण
हैं। तो इसलिए इसको ब्राह्मण वंश भी बोल दिया जाता है। ब्राह्मण वंश देखिए मगध में शुंग वंश की
स्थापना हुई और इसका जो संस्थापक है वह पुष्यमित्र शुंग है।
देखिए शुंगों के बाद फिर सत्ता कन्वों के पास चली गई। कन्व वंश
इसका संस्थापक वासुदेव है मगध में। ठीक है? फिर इस समय बच्चे कलिंग में एक और राजवंश की स्थापना हुई है जिसको
कहते हैं कलिंग का चेदी वंश या फिर
महामेघवान वंश महामेघन वंश ठीक है ना और इसका संस्थापक जो है मेरे प्यारे बच्चे
भाई महामेघवाहन है महामेघवाहन है जो इसका संस्थापक है यह आपको बहुत अच्छे से ध्यान रखना है इसका
संस्थापक है जो महामेघवाहन है लेकिन इस राजवंश का जो सबसे शक्तिशाली शासक हुआ। सबसे योग्य शासक हुआ। ठीक है? जिसकी विजय
पताका कीर्ति पताका दूर-दूर तक फैली। तो वह था बच्चे आपने नाम सुना होगा खारबेल। ठीक है? बस इतना याद रख लेना कि खारबेल
जाना जाता है अपने हाथी गुमफा अभिलेख के लिए। खरबेल। इसके बाद फिर तीसरा आया और दक्षिण
भारत में पहले राजवंश स्थापित हुआ है। भाई इससे पहले आपने दक्षिण भारत में कोई राजवंश देखा? बताओ।
ठीक है? इससे पहले आपने दक्षिण भारत में कोई भी राजवंश देखा? नहीं देखा? तो दक्षिण भारत में [नाक से की जाने वाली आवाज़]
दक्षिण भारत में सबसे पहला राजवंश स्थापित हुआ है। सातवाहन वंश। ठीक है? इनकी जो राजधानी थी प्रतिष्ठान या पैठन। इनकी
राजधानी थी [गला साफ़ करने की आवाज़] इनकी राजधानी थी और इनके संस्थापक थे दंती
दुर्ग दंती दुर्ग अब इसके बाद हम बात करेंगे मेरे भाई विदेशी उत्तराधिकारियों में यहां
पर आ जाते हैं विदेशी उत्तराधिकारी मींस विदेशी आक्रमण भी हुए क्योंकि मौर्यों के बाद सत्ता का इतना तेजी से विघटन हुआ।
अशोक की कुछ ऐसी पॉलिसियां थी कि अशोक की मृत्यु के बाद एक तो डिसेंट्रलाइजेशन हो गया। ठीक है? अशोक का एक उत्तराधिकारी हुआ
दशरथ जो उसका पोता था। उसने ठीक है? प्राची से शासन किया। मतलब पूर्वी क्षेत्रों से प्राशन किया। अशोक का एक
उत्तराधिकारी हुआ जलोक। उसने उत्तरी क्षेत्रों में प्रशासन किया। स्पेशली कश्मीर का राजा बन गया वह कश्मीर के
क्षेत्रों में। ठीक है? एक था कुणाल। कुणाल अंधा था तो कुणाल के बेटे संप्रति ने शासन किया। उसने पश्चिमी क्षेत्रों से
प्रशासन किया है। तो इस तरह से अशोक की मृत्यु के बाद खुद उसके साम्राज्य का विभाजन हो गया। विकेंद्रीकरण हो गया और सब
इस तरह से एक दूसरे से लड़ते रहे। कमजोर हो गए। तो जो इनके अधीनस्थ थे जो उनके सेनापति
वगैरह थे यही आगे चलकर शक्तिशाली हुए और इन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में एक स्वतंत्र और पृथक राजवंश की स्थापना की।
देखो इतिहास का कोई मुझसे निचोड़ पूछे। मैं हिस्ट्री का स्टूडेंट हूं भाई टीचर से पहले। पढ़ता हूं और तभी मैं पढ़ा भी लेता
हूं और आपको इतना तो पता चल रहा होगा। तो मैंने एक निष्कर्ष निकाला है कि हमेशा शक्ति किसी के पास नहीं रहती।
ठीक है? कोई भी व्यक्ति ठीक ना? एक सर्वोच्च शक्ति धारण करता है। सत्ता के शिखर पर पहुंचता है। फिर उसके
बाद उसका डाउनफॉल आता है। वो बहुत लंबे समय तक डाउनफॉल उसका चलता है। और इसी बीच जो उसके अधीनस्थ हैं, जो
उसके सबोर्डिनेट्स हैं, जो उसके लिए टैक्स कलेक्शन वगैरह का काम करते हैं। उसकी जी हजूरी करते हैं। वो इस बात को अपनी आंखों
से देखते हैं कि जो सेंटर है, वह कमजोर हो रहा है। तो अब आप अपनी शक्ति में धीरे-धीरे वृद्धि करो। और वह अपनी शक्ति
में धीरे-धीरे वृद्धि करते हैं और एक स्थिति ऐसी आती है कि वे फिर शीर्ष पर चले जाते हैं। ठीक? अब क्योंकि बहुत सारे हैं।
कोई एक नहीं है तो फिर इनमें आपस में लड़ाईयां होती हैं कि कौन टॉप पर पहुंचेगा। फिर एक टॉप पे पहुंच भी जाता
है। वो कुछ समय तक कंटिन्यू करता है। फिर वो कमजोर होता है और यही इतिहास है और ये चलता रहता है। मैं बिल्कुल शुरुआत से लेकर
और अभी तक इतिहास को इसी तरह से बता सकता हूं कि कब कौन राजवंश बड़ा हुआ। वह सत्ता के शीर्ष पर पहुंचा।
वह सत्ता के शीर्ष पर पहुंचा और फिर धीरे-धीरे धीरे-धीरे मेरे भाई वो कमजोर हुआ और फिर शक्ति के नए केंद्र उठ खड़े
हुए। अब फिलहाल हम विदेशी उत्तराधिकारियों पर चलेंगे। सबसे पहले बचे मौर्योत्तर काल में इंडोवेक्टरियन इन्होंने आक्रमण किया।
ठीक है? इनको कहेंगे हिंद यूनानी। ये एक्चुअली बैक्टीरिया के थे। बैक्टीरिया के थे। इनकी दो शाखाएं भारत
में आई। ठीक है? एक डमेट्रियस आया। जिसने पाटलिपुत्र को जीता। उसको अपनी
राजधानी बनाया। दूसरा यूक्रेटाइट्स आया। यूक्रेटाइट्स आया। तो डमेट्रियस इसने पाटलिपुत्र को जीता।
पाटलिपुत्र को अपनी राजधानी बनाया। डमेट्रियस ने दूसरा मेरे भाई यूक्रेटाइट्स आया। ठीक है? अब ये जो यूक्रेटाइट्स है
इसने सियालकोट को अपनी राजधानी बनाया साकल को। है ना? क्लियर है ना बच्चे? डमेट्रियस यूक्रेटाइट्स। तो हिंदी यूनानियों की दो
शाखाएं भारत में आई। इसके बाद जो आए वह आए शक इनको सीथियन कहा जाता है।
सीथियन ये मेरे भाई सीथिया ईरान के निवासी थे। ठीक है? और इनका जो भारत में संस्थापक था
वो था माउस। ठीक है? चूहा माउस वो इनका संस्थापक था। इसके बाद पहल
पार्थ ये आए ये आए ये मेरे भाई पार्थिया ईरान के निवासी थे
और भारत में जो इनका संस्थापक था वह गोंडू फर्निस था। गोंडो फर्नेस वह भारत में इनका संस्थापक
था और इसके बाद मेरे प्यारे बच्चे जो चौथे आए वह कुषाण आए कुषाण आए कुषाण ठीक है यह बेसिकली
तोची कबीले के थे तोशी कबीला तोशी
[गला साफ़ करने की आवाज़] इनकी दो शाखाएं भारत में आई। पहला कुजलक कटफिसस आया भारत में
कुजल कटफिशस और उसके बाद फिर बचे दूसरी शाखा जो आई वह कनिष्क की शाखाई। तो एक इसमें कुजल कटफिसस आया और दूसरे मेरे भाई
जो भारत में इसकी शाखा आती है वह कनिष्क की आती है। तो यह मौर्योत्तर काल का पूरा चार्ट है जो आपके सामने है। मैंने बना
दिया मेरे भाई। ठीक है? मैं हट जाता हूं साइड में। आप बड़े आराम से अच्छे से इस चार्ट को देख लीजिएगा।
चलिए ठीक है मेरे भाई ये बात समझ में आई आओ अब हम मौर्योत्तर काल को पढ़ लेते हैं। सबसे पहले ठीक मौर्य साम्राज्य का पतन
हुआ। अंतिम शासक थे वृहद्रथ निकम्मा शासक था। अयोग्य शासक था। तो इसलिए जब जो है ना बृहद्रथ एक सैन्य परीक्षण का निरीक्षण कर
रहा था तो खुले मैदान में सेना के सामने ठीक उसी के एक सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने उसकी हत्या कर दी और खुद शुंगा डायनेस्टी
मगध पर एक नए राजवंश शुंग वंश की उसने स्थापना की। ठीक है सर अब हम आगे चलते हैं। आगे चलने के क्रम में ये पूरा ट्री
मैंने बता दिया कि किस तरह से मौर्योत्तर काल में देसी उत्तराधिकारी ये पूरा ब्राह्मण वंश है क्योंकि ये सब ब्राह्मण
है। है ना? सात वाहनों को इस बात का श्रेय दिया जाता है कि मात्र नामधारी शासक हैं। इन्होंने सबसे पहली बार शीशे के सिक्के
चलाए थे। ठीक है? इस बात का भूमि अनुदान की प्रथा इन्होंने स्थान की है। दक्षिण भारत में सबसे पहले स्थापित होने वाले ये
हैं। ठीक है? और इन्होंने शकों को भी पराजित किया है। शकों ने इनको भी किया है। यह सारी बातें हैं। कलिंग के चेदी राजवंश
में इसका संस्थापक महामेघवाहन है। बस इसके बारे में एक ठीक है। व्यक्ति है खारविल। खारविल एक बहुत महान शासक था। बहुत योग्य
शासक था और खारविल का हाथी गुफा अभिलेख है। बस उसी से हमें खारविल के बारे में जानकारी मिलती है। लेकिन इस इतने महान
शासक का अंत कैसे हुआ? ठीक है? इसके बारे में हमें कोई जानकारी नहीं मिली। ठीक है? यह बड़ा एक दुर्भाग्य है कि हम इस बारे
में कोई जानकारी प्राप्त नहीं कर सके। लेकिन हां ठीक बहुत व्यक्ति मतलब बहुत ताकतवर व्यक्ति था और फिर पुष्यमित्र शुंग
ठीक है ये सारी बातें अब यहां पर आप बहुत अच्छे से रीड आउट करेंगे क्योंकि मैं सारी कहानी ठीक है एज अ स्टोरी मैंने आपको बता
दी तो यहां पर आप देखेंगे मौर्य साम्राज्य का पतन हुआ और उसके बाद भारत में राजनीतिक डिसेंट्रलाइजेशन हुआ ठीक है विकेंद्रीकरण
मतलब मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत में राजनीतिक केंद्रीकरण समाप्त हुआ यस पॉलिटिकल डिसेंट्रलाइजेशन स्टार्ट हुआ और
सेंट्रलाइजेशन खत्म हुआ। है ना? तो सर भारत में पॉलिटिकल सेंट्रलाइजेशन राजनीतिक विकेंद्रीकरण समाप्त हुआ। इस काल में एक
ओर मगध और दक्कन में देसी राजवंशों का उदय हुआ। तो वहीं दूसरी ओर पश्चिम उत्तर सीमा से विदेशी शक्तियों का भी निरंतर प्रवेश
हुआ। ठीक है ना? इसको बनाए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन फिर भी आप बनाना चाहो तो आप यहां पर देख सकते हो। इस तरफ
है देसी उत्तराधिकारी, देसी राजवंश। इंडीजीनियस डायनेस्टी। दूसरे हैं विदेशी आक्रमणकारी। इसमें देसी में शुंग वंश हैं।
संस्थापक बच्चे जो है ना पुष्यमित्र शुंग है। शुंगों के बाद दूसरा कनवाय। फिर सातवाहनों ने दक्षिण भारत में पहले राजवंश
की स्थापना की और चौथा चेदी है। इधर आप देखेंगे इंडोग्रीक है। फिर शक है। फिर पैलव है और फिर उसके बाद कुषाण है। सबसे
पहले हम बात करेंगे शुंगों के बारे में। शुंगों का जो शासनकाल है वह 185 से लेकर 73 ईसा पूर्व तक है। मतलब एक लंबा शासनकाल
शुंगों ने। अंतिम मौर्य शासक था बृहद्रथ। जैसा कि मैंने आपको बताया। ठीक है? थोड़ा सा आगे आ जाता हूं।
तो अंतिम मौर्य शासक है मेरे प्यारे बच्चे बृहद्रथ। इसी बृहद्र की हत्या की उसके एक ब्राह्मण सेनापति ने जिसका नाम था
पुष्यमित्र शुंग और पुष्यमित्र शुंग ने शुंग वंश की स्थापना की। ठीक है? पुष्यमित्र शुंग जो है वो मूलतः उज्जैन के
भरद्वाज गोत्री ब्राह्मण था। ये जो है पुष्यमित्र शुंग। ठीक है? पुष्यमित्र शुंग के बारे में एक और बात इसने राजधानी
पाटलिपुत्र स्थापित की और इसकी दूसरी राजधानी जो थी वो विदिशा थी। पुष्यमित्र संघ ने
चलिए ठीक है। इसने दो बार अश्वमेध यज्ञ कराए। सबसे पहला अश्वमेध यज्ञ कराया जब इसने राज [गला साफ़ करने की आवाज़]
सिंहासन को धारण किया तो अपने राज्याभिषेक के उपलक्ष में इसने सबसे पहला अश्वमेदी यज्ञ कराया। अच्छा अश्वमेदी यज्ञ किया
किसने है? पतंजलि। ठीक है? जो संस्कृत के बहुत प्रसिद्ध व्याकरण हैं। ठीक है? बहुत प्रसिद्ध
संस्कृत के विद्वान हैं। ठीक है? पतंजलि वही हैं जिन्होंने है ना? महाभाष्य लिखी है। पाणिनि के
अष्टाध्याय पर दो टीकाएं लिखी गई हैं। एक तो पतंजलि ने महाभाष्य लिखी है और एक वरचि ने वर्तिका लिखी है। यह पाणिनि के
अष्टाध्यायी पर लिखी है और पाणिनि की जो अष्टाध्यायी है वह संस्कृत की सबसे प्राचीन व्याकरण की पुस्तक मानी जाती है।
पाणिनि के अष्टाध्यायी। क्लियर है? तो पाणिनि के अष्टाध्यायी पर इन्होंने टीका लिखी। तो पुष्यमित्र शुंग ने दो बार
अश्वमेध यज्ञ किया। दो। इनके पुरोहित थे प्रसिद्ध व्याकरण पतंजलि। इन्होंने पारणिक की अष्टाध्यायी पर महाभाष्य लिखा है दो
बार। ठीक है बच्चे? कब? एक तो अपने राज्याभिषेक के उपलक्ष में। दूसरा इसने एक हिंदमनी शासक को पराजित किया था। है ना?
डमिट्रियस को। तो डमिट्रियस को पराजित करने के उपलक्ष में भी एक बार इन्होंने अश्वमेदी यज्ञ कराया।
ठीक है? इनका एक अयोध्या अभिलेख है। एक्चुअली इनका नहीं है। धनदेव ने लिखा है अयोध्या अभिलेख। तो यह जो धनदेव का
अयोध्या अभिलेख है, इसी से इस बात की पुष्टि होती है कि इसने दो अश्वमेध यज्ञ किए थे। इस धनदेव के अयोध्या अभिलेख से ही
इस बात की पुष्टि होती है कि मेरे भाई इसने दो अश्वमेध यज्ञ किए थे। अगर हम इसके स्थापत्य व धार्मिक नीतियों को देखें तो
प्रारंभ में बौद्ध विरोधी छवि है। लेकिन उसके बावजूद भी बाद में भरूत स्तूप का पुनर्निर्माण करवाया और सांची के स्तूप की
जो रेलिंग है वो इन्हीं के समय में लगी है। ठीक है? लेकिन कुछ बौद्ध विद्वान मानते हैं कि नहीं यार जो है ना शुंगों ने
बौद्धों का बहुत शोषण किया। ऐसा नहीं है। कुछ शुंग ऐसे थे सॉरी कुछ बौद्ध ऐसे मतलब कुछ बौद्ध कहते
हैं कि शुंगों ने जो है वो बौद्ध भिक्षुओं का उनके ब्याह नष्ट करवाए हैं। उनके चैत्य नष्ट करवाए। उनके बहुत अत्याचार किए हैं।
लेकिन ये बात गलत है। यहां पर भी ये बात गलत लिखी है कि प्रारंभ में बौद्ध विरोधी छवि के बावजूद सभी बौद्ध विरोधी नहीं है।
वो एक्चुअली ये हुआ कि कुछ बौद्ध ऐसे थे जो उत्तर पश्चिम सीमा पे शुंगों के अगेंस्ट षड्यंत्र रच रहे थे। मतलब विदेशी
आक्रांताओं की हेल्प कर रहे थे। तो यहां से पुष्यमित्र शुंग को गुस्सा आ गई और उसने उस स्पेशली उन बौद्ध भिक्षुओं को जो
कि उत्तर पश्चिम में जो है ना विदेशियों की स्पेशली इंडोबक्ट्रियन की जो सहायता कर रहे हैं उनको दंडित किया तो जब उनको दंडित
किया तो यह लगने लगा कि बेसिकली पुष्यमित्र शुंग क्योंकि ब्राह्मण धर्म को मानता है दो-दो बार अश्वमेध यज्ञ किए हैं
तो यह लगने लगा कि यार ये ब्राह्मण व्यक्ति जो है ये बौद्धों का दुश्मन है। लेकिन ऐसा नहीं था। भाई उसने राजनीतिक रूप
से उनको दंडित किया है। धार्मिक रूप से नहीं ये समझना है। है ना? क्योंकि वो इंडोवेक्टरियंस की मदद कर रहे हैं ऐसी
स्थिति में। अब वो थोड़ी ना मदद करने देगा मेरे भाई। लेकिन अगर यह ऐसे बौद्ध धर्म का विरोधी था
तो फिर इसने भरूत स्तूप का पुनर्निर्माण क्यों करवाया? सोचने की बात है। जो सांची का स्तूप है अशोक ने बनवाया। उसकी
रेलिंग्स इसने बनवाई है। भेदिकाएं इसने बनवाई है पत्थर की। तो ऐसा कैसे हो सकता है ना? चलिए अब हेलडोरस का गरुण स्तंभ है
जिसको बेसनगर या विदिशा का स्तंभ बोला जाता है। हेलडोरस का गरुण स्तंभ इसको बेसनगर या
विदिशा का स्तंभ बोला जाता है। एक्चुअली हुआ क्या कि शुंग शासक हैं भागद्र। पुष्पमित्र शुंग के बाद अग्निमित्र अगले
शासक हुए। अग्निमित्र वही हैं जो मालविकाग्निमित्रम में पात्र हैं। एक मालविका अग्नि है। मालविका हैं और दूसरे
हैं अग्निमित्र। मालविका नायिका हैं इस नाटक के। अग्निमित्र नायक हैं इस नाटक के। दोनों के बीच में प्रेम प्रसंग है और इसी
प्रेम प्रसंग को आधार बनाकर कालिदास ने मालविका अग्निमित्रम नाटक लिखा है। ठीक है? फिर इसके बाद अग्निमित्र के बाद
सुजेष् अगले शासक हुए। ठीक है? उसके बाद फिर वशुमित्र और उसके बाद फिर भागद्र शासन शासक हुए। यह विदिशा के हैं। तो इनके
दरबार [गला साफ़ करने की आवाज़] में ठीक है ना? भागद्र के शासनकाल में इनके दरबार में तक्षशिला का शासक है जिसका नाम है
इसका नाम इसमें गलत लिखा है। एंटियल साइड्स है उसका नाम। क्या नाम है? एंटियल साइड्स। तो ये जो एंटियल साइड्स है
इसका राजदूत है हेलडोरस। वो विदिशा आया। ठीक है? और उसने भगवान विष्णु के सम्मान में क्योंकि वो इसलिए आया कि अच्छे संबंध
शुंगों से स्थापित कर सके। ठीक है ना? ये एंटियल साइट्स का जो राजदूत है एलिडोरस वो इसलिए आया था। वो
यूक्रेटाइट्स वंश का है। एंटियल साइट्स यूक्रेटाइट्स का सक्सेसर है। एंटियल साइट्स तो वो आया और उसने इसलिए आया कि वो
शुंगों से अच्छे संबंध स्थापित कर सके क्योंकि मेरे भाई नो डाउट ठीक है? शुंग शक्तिशाली हैं। ठीक है? और अच्छे खासे
शक्तिशाली हैं शुंग जो है तो इसलिए शुंगों के दरबार में आया। इसने भगवान विष्णु के सम्मान में एक तो वैष्णव धर्म स्वीकार
किया और उसके बाद उसने गरुणध्वज स्तंभ स्थापित करवाया और यह गरुणध्वज जो स्तंभ इसने स्थापित करवाया था। यह भागवत धर्म का
प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य है। ठीक है? गरुणध्वज स्तंभ स्थापित करवाया जो भागवत धर्म का प्रथम अभिलेखी साक्ष्य है।
इसके बाद इस राजवंश का अंतिम शासक देवभूति हुआ। इसकी हत्या वासुदेव ने कर दी और फिर कण वंश की स्थापना की। कालिदास का नाटक
मालविका, अग्निम्न मित्रम,म पुष्यमित्र के पुत्र अग्निमित्र और मालविका के प्रेम प्रसंग पर आधारित है। फिर कण वंश है। कण
वंश के हमें शासकों के केवल नाम ही मिलते हैं और कुछ नहीं मिलता हमें। ठीक है? कन वंश का जो संस्थापक है वासुदेव है।
वासुदेव के बाद भूमिित्र फिर नारायण फिर सुशर्मा अंतिम शासक हुआ। ठीक है ना? और यह कहा जाता है कि सातवाहन शासक सिमुक ने
सुशर्मा की हत्या करके मगध क्षेत्र में कन्वस सत्ता समाप्त कर दी और सातवाहन राजवंश की स्थापना की। फिर इसके बाद
सातवाहन वंश है। इसको आंध्र सातवाहन वंश भी कहते हैं। संस्थापक सिमुक या सिंधुक कहा जाता है। इसको सिमुक कह दिया जाता है।
सिंधुक ये मान्यता है कि जब इसने शासन की स्थापना की थी तो बड़ा अच्छा व्यक्ति था। ठीक है ना? मेलजोल वाला व्यक्ति था। लोगों
का बड़ा सम्मान करता था। तो इस तरह का था। बहुत शानदार व्यक्तित्व था इसका। लेकिन यह जीवन के अंतिम दिनों में बहुत आतताई बन
गया। बहुत ज्यादा आतताई बन गया। तो इसलिए फिर सरदारों ने इसकी हत्या कर दी कि भाई अगर यह ऐसा रहेगा तो प्रजा के बीच में
असंतोष पैदा होगा और इसके भाई को फिर गद्दी पर बैठाया था। ये इसके बारे में हमें है ना इसने अपनी
राजधानी प्रतिष्ठान या पैठन जो कि गोदावरी नदी के तट पर है उसको स्थापित की। वर्तमान में औरंगाबाद महाराष्ट्र में है। ठीक है?
अब इस राजवंश के प्रमुख शासकों के बारे में हम लोग बात करेंगे। तो सातकर्णी प्रथम सातकर्णी प्रथम इस राजवंश का देखिए पहला
सबसे शक्तिशाली शासक है। इनफैक्ट इनकी पत्नी है नागनिका जो त्रिन करो की पुत्री हैं। त्रिनकरो राजवंश की है नागनिका।
नागनिका और इनके बीच में बहुत प्रेम है। जब इनकी मृत्यु हो जाती है तो इनकी मृत्यु के बाद नागनिका इनकी प्रशस्ति में इनके
प्रशंसा में नासिक में एक गुफा की छत पर एक लेख लिखवाती हैं। इसको नासिक गुफा लेख कहते हैं। इसको नागनिका का नानाघाट अभिलेख
भी कहते हैं। और यहीं पर सबसे पहली बार उल्लेख मिला है कि इन्होंने ब्राह्मणों को करमुक्त भूमि दान में दी और यहां से भूमि
अनुदान की प्रथा के बारे में हमें जानकारी मिलती है। ठीक है? हाल जो हैं हाल महान कवि व विद्वान शासक हैं। हाल वो शासक हैं
जो हाल हैं इसी के वंश के हैं। ठीक है ना? और इन्होंने जो है गाथा सप्तशती लिखा है। इन्हीं के दरबारी गुणाधीन इन्होंने भ्रत
कथा लिखी और यही जो भ्रत कथा है इसी पर आधारित सोमदेव ने कथा सरिस सागर लिखी है। छमेंद्र ने बृहत कथा मंजरी लिखी है। फिर
गौतमी पुत्र शातकर्णी वे इस राजवंश के 23वें शासक थे। ठीक है? कि गौतमी पुत्र शातकर्णी इस राजवंश का प्रथम मात्र
नामधारी शासक है। मातृ नामधारी शासक का मतलब क्या होता है? आप मुझसे पूछेंगे कि सर बताइए मातृ नामधारी तो यह है गौतमी
पुत्र शातकर्णी मतलब माता गौतमी के पुत्र नाम इनका सातकर्णीय है। जी ठीक है ना बच्चे? तो माता गौतमी के
पुत्र और नाम इनका सातकर्णीय है। सातवाहन वंश के महानतप शासक हैं। और यह इसके 23वें राजा हैं। सातवाहन राजवंश के।
ठीक है ना? चलिए अब इनके बारे में जो भी हमें जानकारी मिलेगी, ठीक है ना? वह भी नासिक गुफा अभिलेख से
मिलेगी। इनका भी एक नासिक गुफा अभिलेख है जो नासिक में एक गुफा की छत पर उत्कीर्ण है। तो इनसे इनके बारे में भी हमें वहीं
से जानकारी मिलती है। ऑब्वियस सी बात है। तो ये प्रथम मात्र नामधारी शासक है। 23वें शासक है। इस राजवंश के महानतम शासक हैं।
नासक प्रशस्ति लेख जो कि इनकी माता गौतमी बलसरी के द्वारा उत्कीर्ण करवाया गया है। ठीक है? इसमें इनको कहा गया है कि ये
अद्वितीय ब्राह्मण हैं। ठीक है? ठीक है? क्षत्रियों के दर्प का नाश करने वाला है। बताओ यार ऐसा ब्राह्मण जो क्षत्रियों के
दर्प का नाश करता है। ठीक है? तो यह अद्वितीय ब्राह्मण ऐसा ब्राह्मण कभी नहीं हुआ।
क्षत्रियों के दर्भ का नाश करने वाला है। उनके अहंकार का और एक ऐसा व्यक्ति है जिसके घोड़े ने तीन समुद्रों का पानी पिया
है। मींस इसके साम्राज्य का विस्तार अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर तक है। तीन समुद्रों का पानी
पिया। इतना विशाल साम्राज्य है। इसने शक शासक नेहपान को पराजित किया। नेहपान और उसके बेटे ऋषभदा को भी। दोनों को पराजित
किया। नेहपान और ऋषभदा को। ये शक शासक है और जो जोगलथंबी सिक्के हैं वो इसके एविडेंसेस हैं। जोगलथंबी सिक्कों से इस
बात की हमें जानकारी मिलती है। फिर इसके बाद इसका बेटा हुआ वशिष् पुत्र पुलमावी इसको आंध्र सम्राट कहा गया है। इसने
अमरावती के स्तूप का विस्तार करवाया है। ठीक लेकिन वशिष् पुत्र पुलमावी जो है वह रुद्रदामन से पराजित हुआ है।
यह लिखना चाहिए था यार। यह तो बहुत महत्वपूर्ण फैक्ट है। वशिष् पुत्र पुलमावी रुद्रदामन से पराजित हुआ।
ठीक है ना? और रुद्रदामन ने इस बात की पुष्टि कहां पर की है? उसका जूनागढ़ अभिलेख है। यह संस्कृत का पहला अभिलेख है
रुद्रदामन का। तो आप कहेंगे इससे पहले सर अभिलेख अशोक के ब्राह्मी में थे, अरमाइक में थे, ग्रीक
में थे या फिर खरोष्ठी में थे। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो जूनागढ़ अभिलेख में लेकिन इसने यह कहा कि मैंने
पराजित किया बुरी तरह से वशिष्ठी पुत्र पुलमावी को लेकिन मेरा निकट संबंधी था। निकट संबंधी होने के कारण मैंने छोड़
दिया। मैंने कहा चल ठीक है यार है ना तू मेरा निकट संबंधी है तुझे मैं क्या ही पराजित करूं तो इसलिए मैंने छोड़ दिया
निकट संबंधी होने के कारण। ठीक है? तो वशिष् पुत्र पुलमावी इसे आंध्र सम्राट भी कहा गया है। वशिष् पुत्र
पुलमावी को इसने अमरावती स्तूप का विस्तार करवाया। आंध्र सम्राट कहा गया है। और अमरावती स्तूप का इसने विस्तार करवाया है।
फिर इसके बाद हम बात करेंगे यज्ञश्री सातकर्णी। ठीक है? नेक्स्ट यज्ञश्री सातकर्णी जो है
यह अंतिम शक्तिशाली शासक है इस राजवंश का। ठीक है ना? इसके सिक्कों पर जलपूत जहाज का चित्र मिलता है जो समुद्री व्यापार व
नौसेना का प्रतीक है। सातवाहन प्रशासन एवं समाज की विशेषताएं। सबसे पहले मातृ नाम परंपरा है। देखो समाज पितृसत्तात्मक था।
लेकिन राजाओं के नाम के आगे माता का नाम जुड़ता था। जैसे लक गौतमी पुत्र सातकर्णी वशिष्ठी पुत्र पुलमावी एटसेट्रा राजसत्ता
पितृसत्तात्मक थी। उत्तराधिकारी ज्येष्ठ पुत्र ही बनता था। सात वाहनों ने मुख्य रूप से सी से लेड जो
कि रोम से आयादित थे उसके सिक्के चलवाए। पोटीन जो कि एक मिश्र धातु थी उसके सिक्के चलवाए। तांबे और कासे के लेकिन सोने के
सिक्के बेसिकली इन्होंने नहीं चलवाए थे। फिर इसके बाद चेदिया महामेघवान वंश है। इसका संस्थापक महामेघवान वंश है।
महामेघवान है इसका संस्थापक और इस राजवंश का संस्थापक है महामेघवान। इसके बाद जो अगला शासक हुआ वो खारविल हुआ। खारविल इस
वंश का अनडाउटेडली सबसे ज्यादा शक्तिशाली शासक है। यह जैन धर्म का संरक्षक है खारविल। और मैंने बताया था कि खारविल का
एक हाथीगुफा अभिलेख मिलता है। ठीक? जिससे खारविल की विजयों के बारे में उल्लेख है कि वो कितना महान शासक है। वो कितना
शक्तिशाली शासक है। हाथी गुंफा अभिलेख से हमें इसके बारे में जानकारी मिलती है। ठीक है ना? इसके बाद इसका जो हाथी गुंफा
अभिलेख है वह उदयगिरी की पहाड़ियों से भुवनेश्वर से मिला है। लेकिन यह प्राकृत में है जो कि ब्राह्मी लिपि है। प्राकृत
अभिलेख है। लिपि ब्राह्मरी है। भाषा प्राकृत है। लिपि ब्राह्मी है। है ना? और इसमें खारविल के जीवन के 13 वर्षों का
उल्लेख है। लेकिन यह तिथि रहित है। अनडेटेड है। इसमें किसी प्रकार की कोई तिथि नहीं है। चलिए अब इसके बाद नंद राजा
महापदम्म नंद द्वारा कलिंग के नहर खुदवाए जाने का उल्लेख मिलता है। तो नहर प्रणाली का जो प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य है वो हाथी
गुंफा अभिलेख में है। ठीक है? कि जो नंद वंश के राजा हैं ना जो नंद वंश मैंने जब मगध का विस्तार पढ़ाया
था कि महापद्म नंद ने नंद वंश की स्थापना की जिसने इकराट की उपाधि धारण की सर्वत्र प्रांत तक की उपाधि धारण की द्वितीय
परशुराम तो यह वही है महापद्म नंद तो इसने कलिंग में एक नहर खुदवाई और कलिंग में नहर खुदवाए जाने का जो पहला अभिलेखीय साक्ष्य
मिला है वो खारवल के हाथी गुंफा अभिलेख में ही मिला है। मगध पर आक्रमण करके नंद राजा के द्वारा ले जाई गई शीतलनाथ ऋषभदेव
की जिन प्रतिमा को इसने पुनः प्राप्त किया और इसके बाद उदयगिरी में इसने जैन मुनियों के लिए गुफा का विहार बनवाए। जैन मुनियों
के लिए विदेशी आक्रमणकारियों में हिंदी हवन फिर शक फिर पहल फिर कुषाण 190 ईसा पूर्व 90 ईसा पूर्व पहलवों का जो भारत में
आक्रमण हुआ है। ठीक है? वो आप मान के चल सकते हैं। बेसिकली 2030 ठीक है ना? ईसा पूर्व के आसपास और ये जो
है कुषाण फिर ये ईवी में भारत में आए हैं। चलिए तो हिंदी वन भारत की सीमा में सबसे पहले प्रवेश करने वाला शासक डमेट्रियस
प्रथम था। इसने अपनी राजधानी स्थापित की साकलिया सियालकोट में। अब मैंने बताया था ना कि इंडोवेक्ट्रियंस
की दो शाखाएं भारत में आई हैं। हिंद यूनानियों की दो शाखाएं भारत में आई हैं। जो सबसे पहली शाखा भारत में आई है। ठीक
है? वो है डमेट्रियस। और जो दूसरी शाखा भारत में आई है वह है यूक्रेटाइट्स। मेरे भाइयों वह यूक्रेटाइट्स है। तो भारत की
सीमा में सबसे पहले प्रवेश करने वाला शासक एक्चुअली डमिट्रियस प्रथम था और डमिट्रियस प्रथम की राजधानी साकल या सियालकोट थी।
भारत की सीमा में सबसे पहले प्रवेश किया डमिट्रियस प्रथम ने राजधानी साकल या सियालकोट। इसके बाद इसी का उत्तराधिकारी
हुआ डमिट्रियस डमेट्रियस का मिनांडर या मिलिंद। ठीक है? यह सर्वाधिक विख्यात यह वन शासक है जिसकी बहुत क्योंकि एक वो है
कि एक बौद्ध विद्वान है नागसेन और इसके मन में धर्म को लेकर समाज को लेकर जीवन को लेकर ऐसी बहुत सारी उत्सुकताएं थी बहुत
सारी थी। है ना? तो इसने बौद्ध भिक्षु नागसेन नागार्जुन के साथ दार्शनिक प्रश्न उत्तर
किया। और यह जो दार्शनिक प्रश्न उत्तर मिलता है बच्चे मिलिंद पन्हो में मिलता है। मतलब राजा मिलिंद के प्रश्न। ठीक है?
ये पाली भाषा में है। और नागसेन ने राजा मिलिंद के सभी प्रश्नों का बड़ा है। ठीक है ना? स्वाभाविक तरीके से जवाब दिया।
मिनांडर बहुत प्रभावित हुआ। उसने तुरंत बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। तो ये है मिलिंद पन्हो। इसके बारे में जानकारी
मिलती है। ठीक है? अगर हम इंडोवेक्टरियन शासकों की प्रमुख देन के बारे में बात करें कि भारत में इन्होंने भारत को
क्या-क्या दिया। तो सबसे पहले इन्होंने लेख युक्त और तिथि युक्त सोने के सिक्के हिंदी यवन शासकों ने जारी किए। ठीक है? एक
तो यह सिक्के ऐसे थे मेरे प्यारे बच्चे जिन पर डेट भी लिखा हुआ था। ठीक है? और प्लस जिन पर बच्चे लेख भी लिखे हुए थे।
दूसरा सिक्कों पर राजाओं की आकृति और उपाधि यह पहली बार इन्होंने ही शुरू किए। सिक्कों पर राजाओं की उपाधि और ठीक है ना?
आकृति पश्चिमोत्तर भारत में यूनानी मूर्तिक कला की जो हेलिस्टिक शैली है उसका भारत में प्रसार हुआ और यही हेलिनिस्टिक
शैली आगे चलकर गांधार कला शैली की अग्रवांग पूर्वगामी बनी। शक यह सक जो है यह मध्य एशिया की खानाबदोस जनजाति है।
पूरी तरह से खानाबदोस का मतलब होता है पूरी तरह से भैया नो मैट्स यावर कोई ठिकाना नहीं। आज यहां तो कल वहां इसको हम
खानाबदोश कहेंगे। है ना? कोई ठिकाना नहीं। आज यहां तो कल वहां पूरी तरह से खानाबदोश जनजाति है मध्य एशिया की जो कि यूची कबीले
के दबाव में एक इसके पीछे यूची कबीला था। यूची कबीला एक्चुअली बहुत ताकतवर कबीला था। ठीक है ना? अब इसकी पेस नहीं पड़ पा
रही थी यूची कबीले से। तो यह जो है यूची कबीले के दबाव से पूर्व की तरफ खिसकती हुई चली गई। मध्य एशिया से यूची कबीला इसके
पीछे ये आगे-आगे। कबीला पीछे-पीछे ये आगे-आगे। तो इस तरह से पू तरफ मध्य एशिया से तो भारत पूरब की तरफ पड़ा। तो इस तरह
से पूरब की तरफ आए और इन्होंने सबसे पहले भारत में एक बुलंद दर्रे को पार किया। ये प्रश्न एसएससी में पूछा गया है। यह बुलंद
दर्रे को पार करके भारत में आए। ठीक है? भारत में टोटल शकों की पांच शाखाएं स्थापित हुई। तक्षशिला में, मथुरा में,
नासिक में, उज्जैन में और अफगानिस्तान में। लेकिन जो दो शाखाएं आगे चलकर बहुत ज्यादा फेमस हुई वो तक्षशिला
और तक्षशिला के साथ-साथ बेसिकली जो है वो मथुरा और नासिक और उज्जैन। तक्षशिला और मथुरा की शाखा को बोलते हैं कि यह है
उत्तरी छत्रप। उत्तरी छत्रप। और नासिक और उज्जैन के बोलते हैं यह हैं पश्चिमी छत्रप। नेपान और ऊसबदास जो हैं वह नासिक
और उज्जैन शाखा के हैं। और रुद्रदामन देखिए रुद्रदामन यह एक्चुअली इस शाखा का है। उत्तरी क्षेत्रफ है। दक्षिणशिला और
मथुरा शाखा का है। रुद्रदामन यह उज्जैन के पश्चिमी क्षेत्रफ है। मैंने उल्टा बोल दिया।
लगता है कि दिमाग का घड़ा भर चुका है। चलिए आप सबको बहुत अच्छे से समझ में आ रहा
है। प्लीज मुझे यहां तक आप बताओ। देखिए मैं भी एक से दो मिनट अपने दिमाग को हल्का सा आराम दे लेता हूं। है ना यार दिमाग है
यार बेचारा कोई एमसीक्यू तो है नहीं कि टिक लगाते जाओ भाई। थ्योरी क्लास है।
तो प्लीज मुझे एक बार बताओ आप। चलिए लाफिंग वर्ड्स सिस्टम राधा कुंज बिहारी
बेटा पूरा लेक्चर जो है ना हिस्ट्री का वो अपलोड हो जाएगा लेकिन थोड़ा सा टाइम लेगा वो प्रोसेसिंग में चलता है इसलिए अपलोड हो
जाता है और प्लीज एकद मिनट बातचीत कर लेते हैं और बताओ आप सब ठीक हो बढ़िया हो घर पे सब लोग कैसे हैं
ठीक है सौरभ अपलोड हो जाएगा वो पार्ट कोई इशू नहीं है मैं एक बार देख लेता हूं वो प्रोसेसिंग में चली जाती है YouTube की
वीडियोस ऐसा इसलिए हो जाता है ओ मेरे सपने अपनों की रानी कब आएगी तू आई
रुत मस्तानी कब आएगी तू बीती जाए जिंदगानी कब आएगी तू चली आ तू चली आ भाई हो गई पूरे 12 घंटे की अपलोड हो गई वो
ठीक है आ गई पूरे 12 घंटे की आई है तो इसलिए बिल्कुल परेशान मत हो डोंट वरी ठीक है बस उसे आराम से अच्छे से देखो को
बढ़िया तरीके से उस क्लास को रिवीजन करो। ठीक है? उसमें पूरी मिडवल है। आधी उसमें एंसिएंट है। और बाकी के आधी से अगली जो
एंसिएंट है वो मैं एंशिएंट आपको पढ़ा रहा हूं। हाल भाई साहब ठीक है। अच्छा है। मजा आ रहा
है आपको पढ़ाने में। ऐसी मेहनत आपके लिए करते रहेंगे मेरे भाई। ठीक है। और आप सब लोग बहुत अच्छे से बने रहो। बहुत मन से
पढ़ते रहो। बस और कुछ नहीं चाहिए आप सभी से आपकी ठीक है दुआओं में याद रखना मेरे भाई
बस इतनी सी बात है जी ठीक है नितिन आओ तो यहां पर हम बात करेंगे ठीक है ठीक है थोड़ा सा रिफ्रेश हुआ जब
आदमी उल्टा बोलने लग जाए पश्चिमी छत्रप को उत्तरी बोलने लग जाए उत्तरी को पश्चिमी बोलने लग जाए तो समझ लो है ना कि हां ठीक
है ये भी तो गर्म हो जाता होगा यार है ना? जैसे कार चलती चलती गर्म हो जाती है। ठीक है? तो पहले क्या था कि रेडिएटर
गर्म हो जाता था। तो रेडिएटर में गर्म पानी है ना वो पानी गर्म हो जाता है। उसमें ठंडा पानी डालना पड़ता था। ठंडा
पानी नीचे चला जाता था। गर्म पानी ऊपर आ जाता था ऐसे करके। है ना? तो उसको थोड़ी सी जरूरत पड़ती है
सस्ता आने की। तो ऐसे ही ये जो रेडिएटर है थोड़ा सा गर्म हो गया है मेरे भाई। आइए तो नेक्स्ट आगे स्टार्ट करेंगे। तो रुद्रदामन
जो है वह उज्जैन के पश्चिमी छत्रप है। रुद्रदामन रुद्रदामन किसके लिए जाने जाते हैं? अपने जूनागढ़ अभिलेख के लिए
रुद्रदामन जाने जाते हैं। तो रुद्रदामन प्रथम ये उज्जैन के पश्चिमी छत्रप है। शक शासकों में बेसिकली सबसे ज्यादा जो
प्रसिद्ध हुए वो रुद्रदामन ही हुए। जूनागढ़ या गिरनार अभिलेख के लिए जाने जाते हैं। गुजरात से मिला है। विशुद्ध
संस्कृत में है। संस्कृत भाषा में लिखा गया भारत का पहला सबसे लंबा शिलालेख है। ठीक? मौर्य काल में चंद्रगुप्त के गवर्नर
पुष्यमित्र पुष्यगुप्त वैश्य के द्वारा ठीक है ना एक सुदर्शन झील का निर्माण करवाया गया था। ठीक है? इसकी जानकारी
मिलती है इसमें बच्चे और फिर इसके बाद फिर समय-समय पर इसका जीर्णोद्धार हुआ है। समुद्रगुप्त ने भी इसका जीणोद्धार किया
है। ठीक है ना? और उससे पहले जो है ना इन्होंने किया है। तो इसके बारे में जानकारी मिलती है कि मौर्य काल में
चंद्रगुप्त के गवर्नर पुष्यगुप्त के द्वारा निर्मित तथा अशोक के समय ठीक है? तुषस हुए उनके द्वारा इसको संवर्धित किया
गया। सुदर्शन झील का बिना जनता पर अतिरिक्त कर लगाए अपने निजी कोष से जीणोद्धार बांध मरम्मत कराई। यह इसके बारे
में उल्लेख मिलता है। फिर आते हैं पार्थियन। ये जो पार्थियन है यह मूलत पार्थिया मतलब
ये ईरान से आए हैं। जो पार्थियन है। ठीक है? सकथिया सक भी ईरान से आए। सीथिया से और जो पार्थियन है यह भी बेसिकली ईरान से
आए। पार्थिया एक स्थान है ईरान में वहां से आए। ठीक है? और इसका जो संस्थापक है वो है गोंडोफर्निस। गोंडो फर्निस ने ही
बेसिकली जो है ना पार्थियन या पहलवों को भारत में स्थापित किया और इसके समय में एक ईसाई धर्म प्रचारक आए हैं जिनका नाम है
सेंट थॉमस पादरी हैं। ठीक है? यह बहुत प्रभावित हुआ सेंट थॉमस से। जब उन्होंने ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार भारत में किया
तो यह प्रभावित हुआ और इसने भी फिर आगे चलके जो है ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था। एक्चुअली इसकी कैपिटल तक्षशिला थी और फिर
लास्ट में आए हैं कुषाण। कुषाणों की जो है ना दो शाखाएं भारत में आई। कुषाण यूची कबीले के तोखारियन या तोखी या तोची शाखा
जैसा कि मैंने बोला था यह उससे संबंधित है यह भी यूची कबीले के लेकिन यह यूची कबीले की तोखारियन शाखा है उससे संबंधित है ठीक
है इनके दो शाखाएं भारत में आई हैं वो दो शाखाओं में सबसे पहली जो शाखा है वह तो ठीक है ना कुजल कटफिशस के द्वारा कटफिशियस
वंश है कुजल कटफिशस है उसका बेटा बिमकटपिस है ठीक है फिर इसके बाद उनकी दूसरी शाखा भारत में आई है कनिष्क के संबंध में
कनिष्क है कनिष्क का बेटा हुविष् है हुविष्क के बेटा वशिष् है। हुविष्क के बाद फिर वशिष्क है।
वशिष्क है। वशिष् के बाद फिर वासुदेव प्रथम है। तो ये हमें मिलते हैं।
ये हमें मिलते हैं। ठीक है ना? चलिए अब यहां पर ध्यान रखना बिमकटफिशस अगर आपसे पूछा जाए कि सबसे पहले भारत में सोने के
सिक्के इंडोबैक्टीरियन शासकों ने जारी किए। इंडोबियन सोनिक ठीक ना सर्वाधिक मात्रा में जो सोने के
सिक्के सबसे पहले जारी किए वह विमक कटफिशस ने या कुषाणों कुषाणों में कुजल कटफिशस ने नहीं यह कुजल कटफिशस तो बेचारा गरीब था
इसका चीनी स्रोतों में नाम मिलता है कुजट कटफिशस का क्यूस क्यू क्या नाम मिलता है कुजल कटफिस का क्यूसिक क्यू ये आगे आएगा
या फिर शायद हो सकता है यहां पर ना हो और कनिष्क चीनी स्रोतों में नाम मिलता है चीनी से ची
ठीक है चीनी नीचे से तो कुजल कटविसस इसने बेसिकली तांबे के सिक्के ये इतना पैसे वाला नहीं था भाई इसने अभी-अभी तो कुषाणु
की सत्ता भारत में स्थापित की है तो इसने ठीक है शुरुआती शासक सोने के सिक्के जारी भी नहीं करते थे तो दैट्स व्हाई इसने ठीक
है वही तामी वगैरह के सिक्के लेकिन इसका बेटा जो है विमकट विशस इसने भारत में अपने आप को बहुत अच्छे से स्थापित कर लिया बहुत
बढ़िया तरीके से भारत में अपने आप को एस्टैब्लिश किया और सबसे पहले कुषाण शासकों में सोने के
सिक्के इसी ने जारी किए कनिष्क के समय समय में सोने के सिक्कों की मात्रा में वृद्धि हो गई। संख्या में वृद्धि हो गई। ठीक है?
यह प्रश्न पूछा जाता है। जी। ठीक है। कुजल कटफिशस जो है इसके बारे में है
बच्चे। देखो ये लिखा कुजल कटफिशस जो है इसने तांबे के सिक्के और ये इस राजवंश का संस्थापक है। इसने तांबे के सिक्के जारी
किए। इस राजवंश का संस्थापक है। फिर वम कटफिसस है। इसने शुद्ध स्वर्ण सिक्के जारी किए।
ठीक है। इसके बाद कनिष्क है। यह कनिष्क के बारे में है। इसने 78 ईस्वी में एक शक संवत जारी किया और इस राजवंश का महानतम
शासक है। ठीक। और फिर वासुदेव प्रथम के बारे में है। वो इस राजवंश का अंतिम शासक हुआ। वासुदेव प्रथम।
कुजल कटफिशस भारत में कुषाण सत्ता का संस्थापक है। मेरे प्यारे बच्चे। है ना? सबसे पहले कुषाणों की शाखा जो भारत में आई
वो कटफिशस शाखा थी। तो यह भारत में कुषाण सत्ता का संस्थापक है। लेकिन इसने केवल तांबे के सिक्के चलाए। इसने सोने के
सिक्के नहीं चलाए। फिर इसके बाद बिम कटफिसस आया। इसका बेटा था बच्चे। भारत में इसने बहुत बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के
जारी किए। सिक्कों पर इसने शिव, त्रिशूल, नंदी की आकृतियां और प्लस माहेश्वर की उपाधि भी धारण की। और यह माहेश्वर मींस ये
शैव धर्म का मतवाना नहीं था। क्योंकि इसके सिक्कों पर जब शिव त्रिशूल नंदी की आकृतियां मिलती हैं तो ये तो क्लियर है
प्लस इसने महा धन ईश्वर माहेश्वर की उपाधि धारण की और महेश किसको कहा जाता है भगवान शिव को तो इससे यह तो पता चलता है कि ये
शैव धर्म का फॉलोअर्स था अनुय था फिर उसके बाद सम्राट कनिष्क के बारे में हम बात करेंगे सबसे पहले हम बात करेंगे इनका
राज्याभिषेक 78 ईस्वी में हुआ और इसी उपलक्ष में अपने राज्याभिषेक के उपलक्ष में इन्होंने शक संवत को प्रवर्तित कराया
78 ईस्वी में और यही शक संवत जो है आज भारत सरकार का ऑफिस ियल कैलेंडर है जिसको 22 मार्च 1957 को स्वीकार किया गया है।
इसकी दो राजधानियां थी। एक राजधानी थी जो प्रमुख राजधानी थी पुरुषपुर या पेशावर और दूसरी राजधानी थी इसकी भारत मतलब मथुरा।
दूसरी राजधानी इसकी मथुरा थी। तो इसकी दो राजधानियां हैं। यह तो पीसीएस में भी पूछा है। कई एग्जाम्स में रिपीट मोड पे यह
प्रश्न पूछा है। रिपीट मोड पे एक्चुअली ये प्रश्न पूछा है। कि इसकी दो राजधानियां थी। जो इसकी पहली राजधानी थी प्रथम
राजधानी वो पुरुषपुर पेशावर में और द्वितीय सांस्कृतिक राजधानी इसकी मथुरा थी। इसके समय में चौथी बौद्ध महासंगति हुई
जो कश्मीर के कुंडलवन में आयोजित हुई जिसके अध्यक्ष वशुमित्र थे। उपाध्यक्ष अश्वघोष थे और यहीं पर बौद्ध धर्म जो है
मैंने बताया था हीनयान मींस छोटा पंथ और महायान मींस बड़े पंथ में बौद्ध धर्म डिवाइड हो गया। वो यहीं पर था। जो बौद्ध
धर्म दो पंथों में डिवाइड हुआ। ठीक है? अब इसके दरबारी विद्वान अश्वघोष हैं। जिन्होंने बुद्ध चरित्र लिखी है। यह
कनिष्क के राजकवि हैं। और जो चौथी बौद्ध संगीति हुई है, फोर्थ बौद्ध समिट हुई है। ठीक है? ये उसके उपाध्यक्ष हैं। ठीक है?
अश्वघोष ने बुद्ध चरित्र लिखी है। कनिष्क के राजकवि हैं। चतुर्थ संगीति के उपाध्यक्ष हैं। सौंदरानंद लिखी है और सारी
पुत्र प्रकरण लिखी है। ये तीन कृतियां लिखी हैं। अश्वघोष ने और यह पूछी जाती हैं। अश्वघोष की ये तीनों कृतियां पूछी
जाती हैं। अश्वघोष ने बुद्ध चरित्र लिखी है। मेरे साथ-साथ बोलेंगे। अश्वघोष ने बुद्ध चरित लिखी है। हां, है ना? अश्व ने
बुद्ध चरित्र लिखी है। सौंदरानंद लिखी है और सारी पुत्र प्रकरण लिखी है। इसके बाद इनके दरबार में
नागार्जुन रहते थे। ठीक? जिन्होंने माध्यमिक सूत्र दिया है। सापेक्षता का सिद्धांत दिया है इन्होंने। इनको भारत का
आइंस्टीन कहा जाता है और यह माना जाता है कि शून्यवाद के प्रणेता यही हैं। इन्होंने माध्यमिक सूत्र लिखी है और इन्होंने
प्रज्ञा पारमिता सूत्र भी लिखी है नागार्जुन साहब ने। ठीक है? माध्यमिक सूत्र लिखी है। प्रज्ञा
पारमिता सूत्र लिखी है। द थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी सापेक्षता का सिद्धांत इन्होंने ही दिया। भारत का आइंस्टीन है और
प्लस शून्यवाद के प्रणेता इनको माना जाता है। चरक साहब ठीक है? बहुत बड़े डॉक्टर थे। ठीक है ना? एक आयुर्वेद के बहुत बड़े
डॉक्टर ये रहे। एक बहुत बड़े बेसिकली चिकित्सक हुए। इन्होंने चरक संहिता लिखी है चरक साहब ने। ये कनिष्क के राज्य वैद्य
थे और आयुर्वेद चिकित्सा के जनक इनको माना जाता है। इसके बाद है वशुमित्र। वशुमित्र चौथी बौद्ध संगीति के अध्यक्ष हैं।
इन्होंने महाविवाह शास्त्र लिखी है। महाविवाह शास्त्र लिखी है। इसको महाविवाह शास्त्र को बौद्ध धर्म का विश्वकोष कहा
जाता है। इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ बौद्ध धर्म इसको कहते हैं। इसके बाद इनके दरबार में माटर और संरक्षक थे। जो राजनीति एवं दर्शन
से संबंधित थे। यह कनिष्क के प्रमुख सलाहकार और कूटनीज्ञ थे। इसके बाद कनिष्क के बारे में मिलता है कि कंट्रोल ओवर द
सिल्क रूट जो मध्य एशिया सेंट्रल एशिया को रोम से जोड़ने वाला जो प्रसिद्ध सिल्क रूट है उस पर चुंगी या कर नियंत्रण स्थापित
करने वाला एकमात्र प्रमुख भारतीय साम्राज्य ठीक है कुषाण ये कनिष्क था ठीक है कुषाणों ने सर्वाधिक संख्या में तांबे
के सिक्के और सर्वाधिक शुद्धता वाले इसने सोने के सिक्के चलाए थे ठीक है बौद्ध स्थापत्य कला पश्चिमी भारत में चैत्य देखो
ये ध्यान रखना इन्हीं के समय में चैत्य का मतलब होता है पूजाघर बिहार का मतलब मतलब होता है बौद्ध
भिक्षुओं का निवास स्थान और स्तूप शुरुआत में यह था कि महात्मा बुद्ध साहब के भस्मावशेषों पर स्तूप का निर्माण करवाया
गया था। फिर आगे चलकर स्तूप एक ऐसा सिंबल बन गया। ठीक है? कि बौद्ध धर्म की अगर किसी बड़ी बिल्डिंग को रिप्रेजेंट करना है
तो फिर वो स्तूप से जोड़ा गया। क्लियर है ना? तो चैत्य का मतलब है पूजा गृह। विहार का मतलब होता है भिक्षुओं का आवास या
निवास स्थान। यह आमतौर पर चट्टानों को काटकर बनाए जाते थे। जैसे कि आप अगर देखेंगे तो महाराष्ट्र में कारले है।
है ना कारली चैत्य कारली की विहार है तो सबसे बड़ा भव्य भव्य भाग है भाजा है कनेरी है यह सारी चीजें हैं ठीक है गांधार
वर्सेस मथुरा कला गांधार वर्सेस मथुरा कला के बारे में यह मैंने कंपैरिजन किया है बस इस कंपैरिजन को आप लोग पढ़ लेना और उसके
बाद फिर हम आ जाएंगे गुप्त साम्राज्य पर ठीक है अब कुछ नहीं बचा आप परेशान मत हो बचा ही क्या है
इसके बारे में आप पढ़ लो ठीक है? गांधार वर्सेस मथुरा कला। गांधार मूर्ति कला में यह बेसिकली जो है ना अगर
हम देखें तो पश्चिमोत्तर सीमा क्षेत्र में ये गांधार मूर्ति कला फली-फूली है ना जो पश्चिमोत्तर सीमा क्षेत्र है
पश्चिमोत्तर सीमा क्षेत्र में गांधर कला ये फली-फूली तक्षशिला और पेशावर और अफगानिस्तान इसके प्रमुख केंद्र थे। अगर
मथुरा मूर्ति कला देखें तो सोनक, कंकाली टीला और मथुरा उत्तर प्रदेश में एक कंकाली टीला भी मथुरा में ही है। सोनक भी है।
इस पर अगर हम इनफ्लुएंस देखें, प्रभाव देखें तो ग्रीक रूमन यूनानी प्रभाव है। इसे हेलिस्टिक कला या इंडोग्रीक कला भी
कहते हैं। विशुद्ध स्वदेशी है। इंडीजीनियस है। कोई बाह्य प्रभाव नहीं है। ठीक है? अगर हम बात करें मटेरियल यूज्ड तो इसमें
ग्रेसिस्ट स्टोन यूज़ हुआ है और इसमें गच यूज़ हुआ है। इसमें सफेद चित्तीदार लाल वलुआ पत्थर जो भारत में स्थानीय फतेहपुर
सीकरी के आसपास क्षेत्रों से मिलता है वो यूज़ हुआ है। इसमें केवल बौद्ध धर्म का चित्रण है। केवल बौद्ध धर्म भगवान बुद्ध
और बौद्ध शत्रु की मूर्तियां हैं। इसमें सर्व धर्म समन्वय है। ठीक है? सभी धर्मों का इसमें समन्वय है। इसमें बौद्ध, जैन और
जो है ना हिंदू धर्म से भी संबंधित विष्णु और शिव से संबंधित भी मूर्तियां हैं। इसमें बुद्ध के जो भाग भाव भंगिमा है मतलब
जो आप कहेंगे उनके जो ठीक है डेफिसंस हैं महात्मा बुद्ध साहब के वो लाइका महात्मा बुद्ध साहब को एक यून यूनानी देवता है
रोमन देवता अपोलो उनके समान दर्शाया गया बिल्कुल लाइका अपोलो है ना उनके समान चित्रण किया गया है तो
महात्मा बुद्ध साहब की अगर हम भाव भंग विवाह के बारे में बात करें तो यूनानी देवता अपोलो के समान ठीक है उनका चित्रण
किया गया है घुघराले बाल ठीक है मूछे पारदर्शी वस्त्र और ध्यान में मग्न उनका मुख इस तरह से तो यूनानी देवता जो है
अपोलो के समान उनका चित्रण है यूनानी देवता अपोलो के समान चित्रण जैसे लाइक दैट घुंघराली बाल हैं है ना जी घुंघराली बाल
हैं मूछे हैं महात्मा बुद्ध साहब की ठीक है पारदर्शी वस्त्र हैं बिल्कुल लायक है आप बोलो और ध्यान है वहीं अगर हम बात करें
मथुरा में तो महात्मा बुद्ध साहब को आध्यात्मिक उनके स्वरूप में दिखाया गया है। उनका खुला है दाहिना कंधा हस्तपष्ट
शरीर है और मुंडा है और जटा युक्त सिर है उनका। [नाक से की जाने वाली आवाज़] संरक्षक हैं कुषाण और शक यहां पर शुंग है
कुषाण है और बाद में फिर गुप्त शासकों ने भी मथुरा कला शैली का संरक्षण किया। इसमें पहली बुद्ध प्रतिमा जो है वो यूनानी
प्रभाव से विकसित है। इसमें अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार जो बुद्ध की मानव रूपी प्रतिमा वो मथुरा कला में गढ़ी गई कि
बुद्ध कैसे दिखते हैं? बुद्ध कैसे लगते हैं? इसी तरह से ठीक है मेरे भाई समझ में आया? अब इसके बाद
भाई हिस्ट्री की एक क्लास और लेनी पड़ेगी जिसमें गुप्ता पीरियड और गुप्ता पीरियड के बाद फिर मॉडर्न हिस्ट्री मुझे करानी
पड़ेगी क्योंकि अब नहीं। अब मेरे बस की बात नहीं है। इससे ज्यादा अगर चला तो मैं पागल हो जाऊंगा मेरे भाई।
ठीक है? तो बस आप सब लोग बताना कि आपको यह सेशन कैसा लगा। है ना? अपने सभी दोस्तों के बीच में बिल्कुल भी शेयर मत करना।
कंपटीशन बढ़ेगा मेरे भाई। लेकिन चुपचाप पढ़ो, छुपा के पढ़ो। किसी को मत बताओ यह प्लेलिस्ट।
चलिए 11:00 बज गए हैं। सुबह 9:00 बजे से। तो कुल मिलाकर 14 घंटे हो चुके हैं। तो भाई सबको बहुत-बहुत थैंक यू। बहुत-बहुत
धन्यवाद। कि आप सब लोग मेरे साथ लगभग ठीक है 14 घंटे 13 क्यों कौन सा गणित लगा रहा हूं मैं 14 घंटे आप सब लोग मेरे साथ
14 घंटे बने रहे ठीक है गुप्त काल खत्म कराने के बाद एंशिएंट खत्म हो जाता लेकिन मेरा मन है कि मैं कोई भी चीज
पढ़ाऊं मन से पढ़ाऊं ठीक है अब ये मन मेरे मन के खिलाफ हो रहा था
तो अब जब ये मेरे मन के खिलाफ हो रहा है तो मन के खिलाफ नहीं जाना चाहिए है ना चलिए तो आप आप लोग प्लीज बताइए कि आप सभी
को यह सेशन कैसा लगा। चलिए प्रियांंशु जी एक दिग्विजय सर द्वितीय ना अस्ति ना भूतो ना भविष्यति।
अरे नहीं बच्चे ठीक है। पहले भी बहुत योग्य लोग थे। आगे भी बहुत योग्य लोग आएंगे। ठीक है।
दिग्विजय ठीक है यार। ठीक है। थोड़ा बहुत ठीक है ना? पढ़ा लेते हैं। अच्छा वो सब आप लोगों की दुआ है। कृपा है मेरे भाई।
ठीक है। थैंक यू प्रियांंशु। थैंक यू सो मच लाफिंग वर्ल्ड। थैंक यू दीपक कुमार। मस्त है।
चलिए भाई 14 घंटे की क्लास लेने के बाद भी बोल रहे हो। 14 घंटे में तुमसे ये कहूंगी एक
जगह पर खड़े हो जाओ। तुम खड़े नहीं हो पाओगे। चलो
सर मुझे लगता है आपको कोई अलौकिक शक्ति प्राप्त है। अलौकिक शक्ति प्राप्त होती तो मैं कंप्लीटली करा देता हिस्ट्री। कोई
अलौकिक शक्ति नहीं है मेरे भाई। जी ठीक है। देखो शरीर नहीं थका। मैं सच बात
बता रहा हूं। ठीक है। मेरा जो है ना अब मस्तिष्क थक गया। गुप्त पीरियड है। मैं पढ़ाने को पढ़ा दूं।
ठीक है? 20 मिनट में खत्म करवा दूं। लेकिन यार ऐसा खत्म नहीं करवाना होता खत्म। तो कोई बात नहीं। आगे फिर हम एक क्लास ले
लेंगे। ठीक है? और मॉडर्न और जो बचा हुआ है एंशिएंट उसको कंप्लीट करा देंगे। एक क्लास और सही लग जाएगी एक क्लास। कोई इशू
नहीं है। लेकिन ऐसा ना लगे कि यार कोई लूत उतारी है। हमने कोई फॉर्मेलिटी की है। ठीक है? कम पढ़ो या ज्यादा पढ़ो। लेकिन जितना
भी पढ़ो मेरे भाई पूरे मन से पढ़ो। मेरा हमेशा से यही रहा। मैं जितना भी पढ़ता था पूरे मन से पूरे मनोभाव से कोई फॉर्मेलिटी
नहीं। ठीक है। चलिए। थैंक यू यार। थैंक यू सो मच।
ठीक है ना? और बहुत-बहुत धन्यवाद आप सभी का। आज इतना तो क्लियर है मेरे भाई कि नींद बहुत अच्छी आएगी।
ठीक है? ओके। थैंक यू। तो
चंद्रगुप्त मौर्य ने जीवन के अंत में जैन धर्म अपनाया और श्रवण बेलगोला में जैन मुनियों की तरह संथारा विधि (अनशन) से प्राण त्यागे। यह दर्शाता है कि मौर्य साम्राज्य का जैन धर्म से गहरा संबंध था, हालांकि बाद के शासकों ने बौद्ध धर्म को अधिक बढ़ावा दिया।
पार्श्वनाथ ने चार व्रत दिए: सत्य, अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह। महावीर स्वामी ने इनमें ब्रह्मचर्य जोड़कर पंच महाव्रत बनाए। यह अंतर जैन धर्म के आचार-व्यवहार में एक महत्वपूर्ण विकास को दर्शाता है।
अशोक के अधिकांश शिलालेख ब्राह्मी लिपि (बाएं से दाएं) में लिखे गए थे। हालांकि, कुछ अभिलेख खरोष्ठी (दाएं से बाएं), अरामाइक और यूनानी लिपि में भी मिले हैं, जो विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक क्षेत्रों में अशोक के प्रभाव को दर्शाता है।
मौर्य साम्राज्य के तीन मुख्य स्रोत हैं: चाणक्य द्वारा रचित 'अर्थशास्त्र' (राज्य प्रबंधन पर), मेगस्थनीज द्वारा लिखित 'इंडिका' (समाज और संस्कृति पर), और विशाखदत्त द्वारा रचित नाटक 'मुद्रा राक्षस'। ये स्रोत साम्राज्य के प्रशासन, समाज और राजनीति के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करते हैं।
जैन धर्म के त्रिरत्न हैं: सम्यक दर्शन (सही विश्वास), सम्यक ज्ञान (सही ज्ञान) और सम्यक चरित्र (सही आचरण)। ये तीनों मिलकर मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बनाते हैं और जैन धर्म के आचार-व्यवहार की नींव हैं।
अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद 'बैरीघोष' (युद्ध की घोषणा) को त्यागकर 'धम्मघोष' (धर्म की घोषणा) अपनाया। उन्होंने पशु बलि की निंदा की, मानव और पशु चिकित्सा की व्यवस्था की, और धम्म महामात्रों की नियुक्ति कर धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया।
दिगंबर (नग्न रहने वाले) और श्वेतांबर (श्वेत वस्त्र धारण करने वाले) जैन धर्म के दो मुख्य संप्रदाय हैं। यह विभाजन द्वितीय जैन संगीति (512 ईस्वी, बल्लभी) के बाद स्पष्ट हुआ। दिगंबर महिलाओं को मोक्ष प्राप्ति में सक्षम नहीं मानते, जबकि श्वेतांबर उन्हें समान अधिकार देते हैं।
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