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एक शॉट लेक्चर: यूनिट 1 इलेक्ट्रॉनिक्स: सेमीकंडक्टर, डायोड & एप्लीकेशन

इस वन-शॉट लेक्चर में फंडामेंटल ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग (FOEE) की यूनिट नंबर 1 को कवर किया गया है। इसमें तीन मुख्य टॉपिक शामिल हैं: सेमीकंडक्टर डायोड, डायोड एप्लीकेशन, और स्पेशल पर्पस टू टर्मिनल डिवाइसेस. यह लेक्चर विशेष रूप से उन छात्रों के लिए है जो परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, क्योंकि इसमें पीडीएफ नोट्स, सॉल्व्ड न्यूमेरिकल्स और पिछले वर्षों के प्रश्न (PYQs) शामिल हैं. लेक्चर शुरू होने से पहले गेटवे क्लासेस एप्लीकेशन के बारे में जानकारी दी गई है, जहाँ नए सेशन के कोर्स शुरू हो चुके हैं. टॉपिक को और गहराई से समझने के लिए आप बेसिक इलेक्ट्रॉनिक्स: PN जंक्शन डायोड की पूरी जानकारी देख सकते हैं।

सेमीकंडक्टर का बेसिक्स और क्लासिफिकेशन

सबसे पहले सेमीकंडक्टर के बेसिक्स को समझाया गया है।

  • इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस: वे डिवाइस जिनमें इलेक्ट्रॉन का प्रवाह (फ्लो) नियंत्रित (कंट्रोल) होता है।
  • सेमीकंडक्टर की यूनिक प्रॉपर्टीज:
    • इलेक्ट्रॉन फ्लो को कंट्रोल किया जा सकता है।
    • करंट को केवल एक दिशा (यूनिडायरेक्शनल) में प्रवाहित कराया जा सकता है।

सॉलिड मटेरियल का वर्गीकरण (इलेक्ट्रिकल और एनर्जी बैंड के आधार पर)

1. इलेक्ट्रिकल प्रॉपर्टी के आधार पर:

  • कंडक्टर: उच्च चालकता (high conductivity), निम्न प्रतिरोधकता (low resistivity) (जैसे: सिल्वर, कॉपर, एल्युमिनियम) |
  • इंसुलेटर: बहुत कम चालकता, उच्च प्रतिरोधकता |
  • सेमीकंडक्टर: चालकता कंडक्टर और इंसुलेटर के बीच होती है (जैसे: सिलिकॉन, जर्मेनियम) |
    • सिलिकॉन और जर्मेनियम के वैलेंस शेल में 4 इलेक्ट्रॉन होते हैं (कार्बन अपवाद है).

2. एनर्जी बैंड थ्योरी के आधार पर:

  • एनर्जी बैंड थ्योरी: जब परमाणु (Atom) क्रिस्टल में होता है, तो एक ही शेल के इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा भिन्न-भिन्न (लो से हाई) होती है। इस रेंज को एनर्जी बैंड कहते हैं।
    • वैलेंस बैंड (Valence Band): निम्न ऊर्जा वाला बैंड, जहाँ बॉन्डेड इलेक्ट्रॉन होते हैं।
    • कंडक्शन बैंड (Conduction Band): उच्च ऊर्जा वाला बैंड, जहाँ फ्री इलेक्ट्रॉन होते हैं जो करंट प्रवाह के लिए जिम्मेदार होते हैं।
    • फॉरबिडन एनर्जी गैप (Forbidden Energy Gap): वैलेंस बैंड और कंडक्शन बैंड के बीच का गैप। यह वह न्यूनतम ऊर्जा है जो इलेक्ट्रॉन को वैलेंस बैंड से कंडक्शन बैंड में जाने के लिए चाहिए।

| मटेरियल | फॉरबिडन एनर्जी गैप (Eg) | | :--- | :--- | | कंडक्टर | शून्य (Eg = 0), वैलेंस और कंडक्शन बैंड ओवरलैप करते हैं।| | इंसुलेटर | बहुत अधिक (Very High) | | सेमीकंडक्टर | कम (कंडक्टर से अधिक, इंसुलेटर से कम) |

  • टेंपरेचर का प्रभाव: सेमीकंडक्टर की चालकता टेंपरेचर बढ़ने पर बढ़ती है (कंडक्टर के विपरीत).

इंट्रिंसिक और एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर

इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर

  • यह प्योर (शुद्ध) सेमीकंडक्टर होता है।
  • 0 केल्विन पर यह इंसुलेटर की तरह व्यवहार करता है।
  • रूम टेंपरेचर पर थर्मल एनर्जी के कारण कुछ कोवेलेंट बॉन्ड टूटते हैं, जिससे इलेक्ट्रॉन-होल पेयर बनते हैं और यह कम चालकता दर्शाता है।

एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर

  • यह इंप्योर (अशुद्ध) सेमीकंडक्टर होता है, जिसे इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर में डोपिंग (Doping) करके बनाया जाता है।
  • डोपिंग: शुद्ध सेमीकंडक्टर में अशुद्धि मिलाने की प्रक्रिया को डोपिंग कहते हैं, जिससे चालकता बढ़ाई जाती है।

1. N-टाइप सेमीकंडक्टर:

  • इसमें पेंटावेलेंट इंप्योरिटी (जैसे: फॉस्फोरस, आर्सेनिक) मिलाई जाती है।
  • इसे डोनर एटम कहते हैं क्योंकि यह एक अतिरिक्त (एक्स्ट्रा) इलेक्ट्रॉन देता है।
  • इसमें इलेक्ट्रॉन मेजॉरिटी चार्ज कैरियर और होल माइनॉरिटी चार्ज कैरियर होते हैं।
  • इसमें इमोबाइल पॉजिटिव आयन होते हैं।

2. P-टाइप सेमीकंडक्टर:

  • इसमें ट्राईवेलेंट इंप्योरिटी (जैसे: बोरोन, एल्युमिनियम) मिलाई जाती है।
  • इसे एक्सेप्टर एटम कहते हैं क्योंकि यह इलेक्ट्रॉन स्वीकार करके होल क्रिएट करता है।
  • इसमें होल मेजॉरिटी चार्ज कैरियर और इलेक्ट्रॉन माइनॉरिटी चार्ज कैरियर होते हैं।
  • इसमें इमोबाइल नेगेटिव आयन होते हैं।

पीएन जंक्शन डायोड और डिप्लीशन लेयर

  • पीएन जंक्शन डायोड: एक ही सेमीकंडक्टर क्रिस्टल (सिलिकॉन/जर्मेनियम) का आधा भाग P-टाइप और आधा भाग N-टाइप डोप करने पर बनता है।
  • डिप्लीशन लेयर (निःशेष क्षेत्र):
    1. जब P और N को जोड़ा जाता है, तो जंक्शन के पास के इलेक्ट्रॉन और होल एक-दूसरे को आकर्षित करके पुनर्संयोजित (recombine) हो जाते हैं।
    2. इस क्षेत्र में कोई फ्री चार्ज कैरियर नहीं बचता, केवल स्थिर आयन (P साइड में नेगेटिव आयन, N साइड में पॉजिटिव आयन) रह जाते हैं।
    3. इन आयनों के बीच एक आंतरिक विद्युत क्षेत्र (Internal Electric Field) बनता है जो अन्य फ्री चार्ज कैरियर्स को इस क्षेत्र में आने से रोकता है। इसी क्षेत्र को डिप्लीशन लेयर कहते हैं।

डायोड का फॉरवर्ड और रिवर्स बायसिंग

  • फॉरवर्ड बायस: P-साइड को बैटरी के पॉजिटिव और N-साइड को नेगेटिव टर्मिनल से जोड़ने पर डायोड कंडक्ट (चालू) होता है।
  • रिवर्स बायस: P-साइड को बैटरी के नेगेटिव और N-साइड को पॉजिटिव टर्मिनल से जोड़ने पर डायोड नॉन-कंडक्ट (बंद) रहता है।

डायोड एप्लीकेशन

  • रेक्टिफायर: AC करंट को DC करंट में बदलने के लिए उपयोग होता है (हाफ वेव और फुल वेव).
  • क्लिपर: सिग्नल के एक निश्चित हिस्से को काटने (क्लिप) के लिए।
  • क्लैंपर: सिग्नल के DC लेवल को बदलने (शिफ्ट) के लिए।
  • वोल्टेज मल्टीप्लायर: AC वोल्टेज को DC वोल्टेज के रूप में कई गुना बढ़ाने के लिए।
  • जेनर डायोड: वोल्टेज रेगुलेशन के लिए, ब्रेकडाउन क्षेत्र में काम करता है। इस कॉन्सेप्ट से जुड़े न्यूमेरिकल्स के लिए आप ईएमआई यूनिट 4: करंट और पोटेंशियल ट्रांसफॉर्मर का संपूर्ण परिचय देख सकते हैं।

स्पेशल पर्पस डायोड

  • लाइट एमिटिंग डायोड (LED): करंट प्रवाहित होने पर प्रकाश उत्सर्जित करता है।
  • फोटो डायोड: प्रकाश की तीव्रता के अनुपात में करंट उत्पन्न करता है।
  • वेरेक्टर डायोड: वेरिएबल कैपेसिटर के रूप में कार्य करता है।
  • टनल डायोड: नेगेटिव रेज़िस्टेंस प्रदर्शित करता है, हाई स्पीड स्विचिंग में उपयोगी।

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