सेमीकंडक्टर डायोड, डायोड एप्लीकेशन और स्पेशल पर्पस टू टर्मिनल डिवाइसेस
यह यूनिट नंबर 1 का कंप्लीट वन शॉट लेक्चर है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग के तीनों टॉपिक को कवर किया गया है।
यूनिट का सिलेबस
- चैप्टर 1: सेमीकंडक्टर डायोड
- चैप्टर 2: डायोड एप्लीकेशन
- चैप्टर 3: स्पेशल पर्पस टू टर्मिनल डिवाइसेस
मोस्ट इंपॉर्टेंट टॉपिक
- डायोड ब्रेकडाउन मैकेनिज्म (जेनर और एवलांच ब्रेकडाउन)
- फुल वेव रेक्टिफायर (कंस्ट्रक्शन और वर्किंग)
- क्लिपर और क्लैंपर के न्यूमेरिकल्स
- जेनर डायोड के न्यूमेरिकल्स
- वोल्टेज मल्टीप्लायर सर्किट
- स्पेशल पर्पस डायोड (LED और टनल डायोड)
टॉपिक 1: सेमीकंडक्टर का बेसिक्स
इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और इलेक्ट्रॉनिक्स
- इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस: ऐसे डिवाइस जिनमें इलेक्ट्रॉन का फ्लो अंडर कंट्रोल रहता है।
- इलेक्ट्रॉनिक्स: इंजीनियरिंग की वह ब्रांच जिसमें हम इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस को पढ़ते हैं।
सेमीकंडक्टर की दो यूनिक प्रॉपर्टीज
- इलेक्ट्रॉन फ्लो को कंट्रोल कर सकते हैं।
- केवल यूनिडायरेक्शनल (एक दिशा) में करंट फ्लो करा सकते हैं।
सॉलिड मटेरियल का क्लासिफिकेशन (इलेक्ट्रिकल प्रॉपर्टी के बेसिस पर)
- कंडक्टर: लार्ज नंबर ऑफ फ्री चार्ज कैरियर्स, हाई कंडक्टिविटी, लो रेजिस्टिविटी। उदाहरण: सिल्वर, कॉपर।
- इंसुलेटर: कोई फ्री चार्ज कैरियर्स नहीं, लो कंडक्टिविटी, हाई रेजिस्टिविटी।
- सेमीकंडक्टर: कंडक्टिविटी कंडक्टर से कम और इंसुलेटर से ज्यादा। उदाहरण: सिलिकॉन, जर्मेनियम।
एनर्जी बैंड थ्योरी
- एनर्जी बैंड: सॉलिड में एक ही ऑर्बिट के इलेक्ट्रॉनों द्वारा प्राप्त ऊर्जा की रेंज।
- वैलेंस बैंड: लो एनर्जी पर, इसमें बॉन्डेड वैलेंस इलेक्ट्रॉन होते हैं।
- कंडक्शन बैंड: हाई एनर्जी पर, इसमें फ्री इलेक्ट्रॉन होते हैं।
- करंट फ्लो: केवल कंडक्शन बैंड के इलेक्ट्रॉन और वैलेंस बैंड के होल्स के कारण होता है।
- फॉरबिडन एनर्जी गैप (Eg): वैलेंस बैंड से कंडक्शन बैंड में इलेक्ट्रॉन को जाने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा।
एनर्जी बैंड डायग्राम के बेसिस पर क्लासिफिकेशन
- कंडक्टर: वैलेंस और कंडक्शन बैंड के बीच कोई गैप नहीं (ओवरलैप)।
- इंसुलेटर: वैलेंस और कंडक्शन बैंड के बीच बहुत बड़ा गैप।
- सेमीकंडक्टर: गैप कंडक्टर से ज्यादा और इंसुलेटर से कम होता है।
सेमीकंडक्टर पर टेंपरेचर का इफेक्ट
- 0 केल्विन: इंसुलेटर की तरह काम करते हैं।
- रूम टेंपरेचर: थर्मल एनर्जी से कुछ कोवेलेंट बॉन्ड टूट जाते हैं, जिससे थोड़ी बहुत कंडक्टिविटी आ जाती है।
- टेंपरेचर बढ़ाने से: कंडक्टिविटी बढ़ती है।
टॉपिक 2: टाइप्स ऑफ सेमीकंडक्टर
इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर
- एक्सट्रीमली प्योर सेमीकंडक्टर (बिना मिलावट के)।
- 0 केल्विन पर इंसुलेटर, रूम टेंपरेचर पर थोड़ी कंडक्टिविटी।
एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर
- इंप्योर सेमीकंडक्टर (इसमें डोपिंग की गई है)।
- डोपिंग: इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर में इंप्योरिटी मिलाने की प्रक्रिया।
- एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर के दो प्रकार: n-टाइप और p-टाइप।
n-टाइप सेमीकंडक्टर
- डोपेंट: पेंटावेलेंट इंप्योरिटी (जैसे फॉस्फोरस, आर्सेनिक) - जिनके पास 5 वैलेंस इलेक्ट्रॉन होते हैं।
- डोनर एटम: पेंटावेलेंट एटम जो एक एक्सट्रा इलेक्ट्रॉन डोनेट करता है।
- मेजॉरिटी चार्ज कैरियर: इलेक्ट्रॉन
- माइनॉरिटी चार्ज कैरियर: होल
p-टाइप सेमीकंडक्टर
- डोपेंट: ट्राइवेलेंट इंप्योरिटी (जैसे बोरोन, एलुमिनियम) - जिनके पास 3 वैलेंस इलेक्ट्रॉन होते हैं।
- एक्सेप्टर एटम: ट्राइवेलेंट एटम जो एक होल क्रिएट करता है और इलेक्ट्रॉन को एक्सेप्ट करता है।
- मेजॉरिटी चार्ज कैरियर: होल
- माइनॉरिटी चार्ज कैरियर: इलेक्ट्रॉन
टॉपिक 3: pn जंक्शन डायोड और डिप्लीशन लेयर
pn जंक्शन डायोड क्या है?
- यह एक सिंगल क्रिस्टल (सिलिकॉन या जर्मेनियम) है जिसका एक हाफ p-टाइप और दूसरा हाफ n-टाइप डोप किया जाता है।
- प्रभावी रूप से, यह एक p-टाइप और एक n-टाइप सेमीकंडक्टर को जोड़कर बनाया जाता है।
डिप्लीशन लेयर का फॉर्मेशन
- जब p और n टाइप सेमीकंडक्टर को जोड़ा जाता है, तो इलेक्ट्रॉन और होल एक-दूसरे को अट्रैक्ट करते हैं और जंक्शन के पास रिकॉम्बाइन हो जाते हैं।
- इस रिकॉम्बिनेशन के कारण जंक्शन के पास मोबाइल चार्ज कैरियर्स (फ्री इलेक्ट्रॉन और होल) खत्म हो जाते हैं, और केवल इमोबाइल आयन (p-साइड में नेगेटिव, n-साइड में पॉजिटिव) बच जाते हैं।
- आयनों के इस चार्ज के कारण जंक्शन पर एक इलेक्ट्रिक फील्ड बन जाता है, जो आगे के डिफ्यूजन को रोकता है। इस चार्ज-फ्री रीजन को डिप्लीशन लेयर कहते हैं।
तो हम शायद लाइव कनेक्ट हो चुके हैं। एक बार आप लोग ऑडियो और वीडियो को चेक करके बताइए। क्या ऑडियो और वीडियो क्लियर है?
उसके बाद हम स्टार्ट करेंगे यूनिट नंबर वन। तो एक बार चेक करके बताएं क्या ऑडियो और वीडियो क्लियर है?
गुड आफ्टरनून सभी स्टूडेंट्स को और एक बार चेक कर लें कि ऑडियो और वीडियो क्लियर है। उसके बाद हम स्टार्ट करते हैं।
गुड आफ्टरनून टू ऑल स्टूडेंट्स। चलिए क्लियर है? तो अब हम स्टार्ट करेंगे यूनिट नंबर वन। है ना? तो देखिए
इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग के अंदर यूनिट नंबर वन के अंदर हमें तीन टॉपिक पढ़ने हैं। सेमीकंडक्टर डायोड, डायोड एप्लीकेशन
एंड स्पेशल पर्पस टू टर्मिनल डिवाइसेस। और इन तीनों ही टॉपिक को आज के इस वन शॉट लेक्चर में हम कंप्लीट करेंगे। ठीक है? तो
इस वन शॉट लेक्चर के अंदर मैं आपको यूनिट नंबर वन का कंप्लीट सिलेबस कवर कराऊंगा। है ना? तो इस वन शॉट लेक्चर के जो पीडीएफ
नोट्स होंगे उसके अंदर आपको कंप्लीट थ्योरी मिलेगी यूनिट नंबर वन की। ऑल डेरिवेशंस मिलेंगे। सॉल्व न्यूमेरिकल्स
होंगे, पीवाईक्यूस होंगे। मोस्ट इंपोर्टेंट क्वेश्चंस भी होंगे एनडीपीपी। मतलब सब कुछ आपको एक ही वन शॉट लेक्चर में
मिल जाएगा। आगे बढ़ने से पहले मैं आपको बता देता हूं कि गेटवे क्लासेस एप्लीकेशन पर न्यू सेशन 2025 एंड 26 के लिए कोर्सेज
कब से स्टार्ट होंगे। जिस दिन लास्ट ईयर का जिस दिन फर्स्ट ईयर का लास्ट पेपर होगा उसी दिन से आपको सेकंड ईयर के कोर्सेज
मिलने स्टार्ट हो जाएंगे। और जिस दिन सेकंड ईयर का लास्ट पेपर होगा उसी दिन से थर्ड ईयर के कोर्सर्सेस मिलने स्टार्ट हो
जाएंगे। और ऐसे स्टूडेंट जो इस बार फर्स्ट ईयर में एडमिशन ले रहे हैं उनके कोर्सेज ऑलरेडी गेटवे क्लासेस एप्लीकेशन पर
स्टार्ट हो चुके हैं। गेटवे क्लासेस एप्लीकेशन Google Play Store के साथ-साथ एप स्टोर में भी अवेलेबल है। अब थोड़ा सा
यहां मैं आपको अपने सब्जेक्ट के बारे में बता देता हूं कि गेटवे क्लासेस एप्लीकेशन पर मैं आपको कौन-कौन से सब्जेक्ट पढ़ाता
हूं। तो देखिए फर्स्ट सेमेस्टर में इंजीनियरिंग मैथमेटिक्स वन पढ़ा चुका हूं। सेकंड सेमेस्टर में इंजीनियरिंग
मैथमेटिक्स टू मैं आपको पढ़ा रहा हूं। इंजीनियरिंग फिजिक्स फर्स्ट सेमेस्टर में और सेकंड सेमेस्टर में दोनों सेमेस्टर में
चलता है। तो इंजीनियरिंग फिजिक्स भी मैं आपको पढ़ा रहा हूं। फंडामेंटल ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग जो कि फर्स्ट
एंड सेकंड सेमेस्टर दोनों में चलता है। इंजीनियरिंग मैथमेटिक्स थर्ड इंजीनियरिंग मैथमेटिक्स फोर एंड डिसक्रीट मैथमेटिक्स
और डिस्क्रीट मैथमेटिक्स को थर्ड सेमेस्टर में सीएस के स्टूडेंट्स पढ़ते हैं। तो ये वो सारे सब्जेक्ट हैं जो मैं आपको गेटवे
क्लासेस एप्लीकेशन पर पढ़ाता हूं। अब हम सबसे पहले यूनिट नंबर वन का सिलेबस डिस्कस कर लेते हैं। उसके बाद हम स्टार्ट करेंगे।
तो यहां पर ध्यान दीजिएगा यूनिट नंबर वन का सिलेबस। तो यूनिट नंबर वन के अंदर जैसा मैंने आपको बताया तीन चैप्टर हैं। पहला
चैप्टर है सेमीकंडक्टर डायोड। दूसरा डायोड एप्लीकेशन और तीसरा है स्पेशल पर्पस टू टर्मिनल डिवाइसेस। तो देखिए यूनिट नंबर वन
जैसा कि आप पहले से जानते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी यूनिट यूनिट नंबर वन है। है ना? यूनिट
नंबर टू, यूनिट नंबर थ्री एंड यूनिट नंबर फाइव। ये तीनों यूनिट बहुत छोटी यूनिट है और यूनिट नंबर वन सबसे बड़ी यूनिट है।
यूनिट नंबर फोर बहुत ज्यादा बड़ी भी नहीं है और बहुत ज्यादा छोटी भी नहीं है। है ना? वो बीच में आती है। बाकी तीन यूनिट
बहुत छोटी है और ये आपकी सबसे बड़ी यूनिट है। तो यहां पर आज के इस वन शॉट लेक्चर में मैं आपको कंप्लीट सिलेबस कवर कराऊंगा।
लेकिन यहां पर हम न्यूमेरिकल वो कवर करेंगे जो इंपॉर्टेंट है और जहां से रेगुलर न्यूमेरिकल यूनिवर्सिटी एग्जाम में
आते हैं। जैसे कि अगर मैं यूनिट नंबर वन की बात करूं तो यूनिट नंबर वन से हर साल एक न्यूमेरिकल क्लिपर और क्लैंपर का आता
है। तो हम यहां पर क्लिपर क्लैंपर के बहुत सारे न्यूमेरिकल को रिवाइज करेंगे। बात समझ में आ रही है? उसके बाद जो यहां से
न्यूमेरिकल ज्यादा पूछा जाता है वो पूछा जाता है जेनर डायोड से। तो जेनर डायोड के भी हम काफी सारे न्यूमेरिकल्स को कवर
करेंगे। बाकी और जो टॉपिक के ऊपर बेस्ड न्यूमेरिकल है वो जनरली यूनिवर्सिटी एग्जाम में नहीं पूछे जाते हैं या कभी-कभी
पूछे जाते हैं। तो नोट्स के अंदर आपको हर एक टॉपिक के न्यूमेरिकल्स मिलेंगे जो यूनिवर्सिटी एग्जाम में आ सकते हैं। लेकिन
यहां पर जो हम रिवाइज करेंगे न्यूमेरिकल्स वो इन दो टॉपिक के करेंगे। बाकी थ्योरी मैं यहां पर आपको कंप्लीट रिवाइज कराऊंगा।
न्यूमेरिकल इंपॉर्टेंट रिवाइज करेंगे। बाकी पीडीएफ नोट्स के अंदर आपको टोटल न्यूमेरिकल्स मिलेंगे। हर टॉपिक के आपको
न्यूमेरिकल्स मिलेंगे। क्लियर है? तो सबसे पहले हम सेमीकंडक्टर डायोड को रिवाइज करेंगे। तो देखिए जो पहला वाला चैप्टर
हमारा सेमीकंडक्टर डायोड इसमें पहला टॉपिक हमारा आता है डिप्लीशन लेयर। लेकिन डिप्लीशन लेयर को स्टार्ट करने से पहले
हमें काफी सारे टॉपिक पढ़ने होंगे जो कि बेसिक्स होते हैं और यूनिवर्सिटी एग्जाम में वहां से क्वेश्चंस भी पूछे जाते हैं।
बात समझ में आ रही है? उसके बाद जाकर के हम डिप्लीशन लेयर पढ़ेंगे। तो डिप्लीशन लेयर वीआई कररेक्टरिस्टिक्स, आइडियल एंड
प्रैक्टिकल डायोड, डायोड इक्विवेलेंट सर्किट, जेनर डायोड, ब्रेकडाउन मैकेनिज्म है ना? जहां पर हम जेनर और एलेंस
ब्रेकडाउन पढ़ेंगे। तो सब कुछ हम कवर करेंगे आज के इस लेक्चर में। उसके बाद डायोड एप्लीकेशन पढ़ेंगे। एप्लीकेशन के
अंदर हम डायोड कॉन्फ़िगरेशन, हाफ वेव, फुल वेव रेक्टिफायर पढ़ेंगे। क्लिपर क्लैंपर को बहुत डिटेल में पढ़ेंगे। गेनर डायोड को
पढ़ेंगे। है ना? उसके बाद वोल्टेज मल्टीप्लायर सर्किट पढ़ेंगे। और हमारा जो इसमें लास्ट टॉपिक है दैट इज़ स्पेशल पर्पस
टू टर्मिनल डिवाइसेस। तो इसके अंदर चार छोटे-छोटे से हमारे डायोड हैं जो थ्योरिटिकल है। यहां पर कोई न्यूमेरिकल
नहीं है। जैसे कि लाइट एमिटिंग डायोड, फोटो डायोड, वेरेक्टर डायोड एंड टनल डायोड। तो ये हम कवर करेंगे। तो मुझे लगता
है आपको सिलेबस का समझ में आ गया होगा कि सिलेबस क्या है। तो यहां पर मैं आपको एक चीज और बता दूं कि इस यूनिट के अंदर
मोस्टेंट टॉपिक कौन-कौन से हैं। है ना? मोस्टेंट टॉपिक कौन-कौन से हैं? तो एक तो यहां से ये क्वेश्चन पूछा जाता है डायोड
ब्रेकडाउन मैकेनिज्म है ना? जहां पर हम पढ़ते हैं जेनर और एलेंस ब्रेकडाउन बहुतेंट क्वेश्चन है थ्योरी के लिए।
क्लियर है? बहुत इंपॉर्टेंट है और इसका ग्राफ भी इंपॉर्टेंट है। उसके बाद डायोड एप्लीकेशनेशंस की अगर मैं बात करूं तो
यहां से फुल वेव रेक्टिफायर बार-बार रिपीट होता है। तो फुल वेव रेक्टिफायर बहुत ज्यादा इंपॉर्टेंट है। फुल वेव रेक्टिफायर
की कंस्ट्रक्शन और वर्किंग बार-बार पूछी जाती है। क्लिपर क्रैंपर के न्यूमेरिकल्स मोस्टेंट है। जेनर डायोड के न्यूमेरिकल भी
मोस्टेंट है। ये न्यूमेरिकल के लिए बहुत इंपॉर्टेंट टॉपिक है दोनों के दोनों। उसके बाद अगर हम आगे बढ़े तो यहां पर वोल्टेज
मल्टीप्लायर सर्किट यह भी बार-बार पूछा जाता है। यूनिवर्सिटी एग्जाम में अगेन इंपॉर्टेंट है। और अगर हम स्पेशल पर्पस
डायोड में आ जाए तो यहां पर सबसे ज्यादा एलईडी पूछा जाता है, लाइट एमिटिंग डायोड और टनल डायोड पूछा जाता है। तो ये हमारे
मोस्टेंट टॉपिक है जिनको आपको बहुत अच्छे से रिवाइज करके जाना है। तो चलिए स्टार्ट करते हैं। अब है ना? तो सबसे पहले हम
सेमीकंडक्टर का बेसिक्स पढ़ेंगे। है ना? सेमीकंडक्टर का बेसिक्स। तो देखिए सबसे पहले यहां पर आता है इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस।
इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस ऐसे डिवाइस होते हैं जिनके अंदर जो इलेक्ट्रॉन का फ्लो है वो अंडर कंट्रोल रहता है। यानी कि
इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में इलेक्ट्रॉन फ्लो तो करते हैं लेकिन अंडर कंट्रोल फ्लो करते हैं। और एक चीज मैं यहां पर आपको बता दूं।
देखिए यहां पर जो हम पढ़ने वाले हैं वो सेमीकंडक्टर पढ़ने वाले हैं। क्यों सेमीकंडक्टर पढ़ने वाले हैं? क्योंकि
जितने भी हमारे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस होते हैं वो सब सेमीकंडक्टर से बने होते हैं। और सेमीकंडक्टर के अंदर दो
इंपॉर्टेंट प्रॉपर्टीज होती हैं जिसकी वजह से इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में हम सेमीकंडक्टर को यूज़ करते हैं। पहली जो
यूनिक प्रॉपर्टी है सेमीकंडक्टर की वो ये है कि सेमीकंडक्टर के अंदर जो इलेक्ट्रॉन का फ्लो होता है उसको हम कंट्रोल कर सकते
हैं। जबकि कंडक्टर और इंसुलेटर के अंदर नहीं कर सकते और करेंगे तो एनर्जी लॉस होगी। दूसरी यूनिक प्रॉपर्टी होती है
सेमीकंडक्टर की कि सेमीकंडक्टर में हम यूनडायरेक्शनल में करंट फ्लो करा सकते हैं। यानी कि एक सिंगल डायरेक्शन में करंट
फ्लो करा सकते हैं। जो कि कंडक्टर और इंसुलेटर में पॉसिबल नहीं है। तो यहां पर आपको देख के ही समझ में आ गया होगा कि
इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस ऐसे डिवाइस है जिसमें इलेक्ट्रॉन का जो फ्लो होता है वो अंडर कंट्रोल होता है। क्लियर है? नाउ व्हाट इज
इलेक्ट्रॉनिक्स? इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की ऐसी ब्रांच है जिसके अंदर हम इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस को पढ़ते हैं।
तो मुझे लगता है आपको इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और इलेक्ट्रॉनिक्स क्या है? ये तो आपको क्लियर हो गया होगा। अब हम आगे बढ़ते हैं।
देखिए अब हमारा यहां पर पहला टॉपिक आता है क्लासिफिकेशन ऑफ सॉलिड मटेरियल ऑन द बेसिस ऑफ इलेक्ट्रिकल प्रॉपर्टीज। हम यहां पर
सॉलिड मटेरियल क्लासिफिकेशन दो बार पढ़ेंगे। एक बार ऑन द बेसिस ऑफ इलेक्ट्रिकल प्रॉपर्टी और एक बार ऑन द
बेसिस ऑफ एनर्जी बैंड थ्योरी। और यह इंपॉर्टेंट है। कभी-कभी यूनिवर्सिटी एग्जाम में दो नंबर में क्लासिफिकेशन पूछ
लेते हैं। तो यहां पर जरा ध्यान देना इलेक्ट्रिकल प्रॉपर्टीज के बेस पर क्लासिफिकेशन पढ़ना है। और ये
क्लासिफिकेशन आप बहुत छोटी क्लासेस से पढ़ते आ रहे हैं। कंडक्टर, इंसुलेटर एंड सेमीकंडक्टर। तो मैं शॉर्ट में आपको बता
देता हूं। कंडक्टर वो सॉलिड मटेरियल्स होते हैं, वो मटेरियल्स होते हैं जिसमें जो चार्ज कैरियर्स हैं या फ्री
इलेक्ट्रॉन्स हैं वो बहुत ज्यादा होते हैं। है ना? तो लार्ज नंबर ऑफ मोबाइल चार्ज कैरियर्स हाई कंडक्टिविटी होती है,
लो रेजिस्टिविटी होती है। जब फ्री चार्ज कैरियर्स ज्यादा है तो कंडक्टिविटी भी ज्यादा होगी। है ना? एग्जांपल सिल्वर,
कॉपर और एलुमिनियम। और अगर इंसुलेटर की बात करें तो इंसुलेटर वो मटेरियल है जिसमें फ्री इलेक्ट्रॉन्स या फ्री चार्ज
कैरियर्स नहीं होते हैं। है ना? तो सीधी सी बात है इनकी कंडक्टिविटी लो होगी और रेजिस्टिविटी क्या होगी? हाई होगी। ये
इनके एग्जांपल लिखे हैं। अब बात करते हैं सेमीकंडक्टर की। जो सेमीकंडक्टर होते हैं वो ऐसे मटेरियल्स हैं जिनकी कंडक्टिविटी
कंडक्टर से कम होती है और इंसुलेटर से ज्यादा होती है। यानी कि ये बीच में आते हैं। एग्जांपल की अगर मैं बात करूं तो
यहां पर सिलिकॉन और जर्मेनियम और इन्हीं को हम सबसे ज्यादा यहां पर पढ़ने वाले हैं। तो सिलिकॉन और जर्मेनियम क्या है?
दोनों के दोनों सेमीकंडक्टर है। अब यहां पर अगर आप एक चीज आपको और ध्यान दें तो आप छोटी क्लासेस से पढ़ते आ रहे हैं कि
कंडक्टर्स में जो वैलेंस इलेक्ट्रॉन होते हैं वो तीन से कम होते हैं। और जो इंसुलेटर होते हैं उनमें वैलेंस
इलेक्ट्रॉन मतलब कंडक्टर में वैलेंस इलेक्ट्रॉन तीन या तीन से कम होते हैं। बात समझ में आ रही? और जो इंसुलेटर होते
हैं उनमें वैलेंस इलेक्ट्रॉन फाइव या फाइव से ज्यादा होंगे। और जो सेमीकंडक्टर होते हैं उनमें वैलेंस इलेक्ट्रॉन फोर होते
हैं। लेकिन यहां पर एक्सेप्शन है भाई कार्बन के पास भी चार इलेक्ट्रॉन हैं लेकिन कार्बन हमारा सेमीकंडक्टर नहीं होता
है। कार्बन होता है नॉन मेटल। क्लियर है? चलिए तो ये बात आपको समझ में आ गई होगी। अब हम आगे बढ़ते हैं। देखिए यहां पर यहां
पर सेमीकंडक्टर के अंदर सिलिकॉन और जर्मेनियम है। ये हमारे दो इंपॉर्टेंट सेमीकंडक्टर है और एलिमेंटल सेमीकंडक्टर
है। सेमीकंडक्टर कंपाउंड की फॉर्म में भी होते हैं जो आगे चलकर हम पढ़ेंगे। लेकिन ये जो दोनों सेमीकंडक्टर हैं ये एलिमेंट
की फॉर्म में है। सिलिकॉन और जर्मेनियम और आप अच्छे से जानते हैं पीरियडिक टेबल में ये दोनों ही एलिमेंट कार्बन फैमिली के
मेंबर हैं। है ना? 14थ ग्रुप के क्या हैं? मेंबर है। तो यहां पर थोड़ा सा हम सिलिकॉन जो हमारा सिलिकॉन है इसका स्ट्रक्चर देख
लेते हैं। जर्मेनियम का स्ट्रक्चर देख लेते हैं। तो आगे हमें समझने में आसानी होगी। देखिए सिलिकॉन आप जानते हैं एटॉमिक
नंबर होता है 14। तो सीधी सी बात है इसके न्यूक्लियस में 14 ही प्रोटॉन होंगे और 14 ही क्या होंगे? न्यूट्रॉन होंगे। है ना?
तो यहां पर एटॉमिक नंबर 14 है। इसके अंदर जो न्यूक्लियस है उसमें कितने प्रोटॉन होंगे? 14 होंगे। है ना? इलेक्ट्रॉन भी
कितने होंगे? 14। और आप अच्छे से जानते हैं जो इलेक्ट्रॉन होते हैं वो सेल में रिवॉल्व करते हैं। तो ये हमारी सेल है।
पहली सेल में दो इलेक्ट्रॉन है उसके बाद एट इलेक्ट्रॉन्स हैं। है ना? और जो हमारी आखिरी वाली सेल में इलेक्ट्रॉन होते हैं
उन्हीं को हम कहते हैं वैलेंस इलेक्ट्रॉन। क्या कहा जाता है? वैलेंस इलेक्ट्रॉन। चलिए अब यहां पर आ जाते हैं स्ट्रक्चर पे।
देखिए ये तो हमारा क्या है? एटम सिलिकॉन एटम है। तो ये तो सिलिकॉन एटम का स्ट्रक्चर है जिसकी आउटरमोस्ट शेल में चार
वैलेंस इलेक्ट्रॉन है। फोर वैलेंस इलेक्ट्रॉन है। नाउ क्रिस्टल स्ट्रक्चर ऑफ़ सिलिकॉन एटम। क्रिस्टल का मतलब है जो
सिलिकॉन का सॉलिड होगा उसमें तो इनफाइनाइट नंबर ऑफ़ एटम होंगे। तो सॉलिड के अंदर जो एटम्स होते हैं वो किस तरीके से अरेंज
होते हैं? तो वो यहां पर मैंने डायग्राम बनाया है। देखिए यहां पर ये हमारा सिलिकॉन एटम है। इसके आउटरमोस्ट शेल में कितने
इलेक्ट्रॉन हैं? चार इलेक्ट्रॉन हैं। क्लियर है? और इसको स्टेबल होने के लिए कितने इलेक्ट्रॉन चाहिए? एट चाहिए। तो
देखो यहां पर एट इलेक्ट्रॉन कैसे होंगे? अब देखो इसके बराबर में यहां पर एक सिलिकॉन एटम ये भी है। एक सिलिकॉन एटम ये
भी है और एक सिलिकॉन एटम ये भी है। तो क्या होगा? इन दोनों सिलिकॉन एटम के बीच में कोवेलेंट बॉन्ड बनेगा। तो एक कोवेलेंट
बॉन्ड यहां पर बना, एक कोवेलेंट बॉन्ड यहां पर बना, एक कोवेलेंट बॉन्ड यहां पर बना, एक कोवेलेंट बॉन्ड यहां पर बना। तो
ये चार कोवेलेंट बॉन्ड बन गए। तो अब इसके पास भी एट इलेक्ट्रॉन हो गए और ये स्टेबल हो गया। तो जो सिलिकॉन का क्रिस्टल होता
है उसमें चार कोवेलेंट बॉन्ड बनते हैं। आपको अच्छे से मालूम है कि अगर आउटर मोस्ट शेल में फोर इलेक्ट्रॉन है तो कौन सा
बॉन्ड बनेगा? कोवेलेंट बॉन्ड बनेगा। यहां पर शेयरिंग होगी। इलेक्ट्रोवेलेंट बॉन्ड नहीं बनेगा। तो क्रिस्टल स्ट्रक्चर हमारा
सिलिकॉन का कुछ इस टाइप का होता है। इसमें इनफाइनाइट नंबर ऑफ़ एटम्स होते हैं। क्लियर है? आगे बढ़ते हैं। अब बात करते हैं
जर्मेनियम की। देखो जर्मेनियम का भी स्ट्रक्चर सेम होगा। बस डिफरेंस इतना है कि यहां पर एटॉमिक नंबर ज्यादा है। तो
इसकी जो वैलेंस शेल है वो बाद में आएगी। तो यहां पर इसका एटॉमिक नंबर 32 है। नंबर ऑफ़ प्रोटॉन 32 हैं। नंबर ऑफ़ इलेक्ट्रॉन भी
32 हैं। प्रोटॉन न्यूक्लियस के अंदर होते हैं। इलेक्ट्रॉन शेल में रिवॉल्व करते हैं। तो आप यहां पर देख सकते हैं इसके
आउटरमोस्ट शेल में भी फोर इलेक्ट्रॉन हैं। कितने हैं? फोर इलेक्ट्रॉन हैं। तो ये तो इसका एटॉमिक स्ट्रक्चर हो गया। नाउ अब अगर
हम इसके क्रिस्टल स्ट्रक्चर की बात करें तो क्रिस्टल स्ट्रक्चर इसका बिल्कुल वैसा ही होगा जैसा सिलिकॉन का होता है। बिल्कुल
सेम होगा। है ना? यहां पर भी कोवेलेंट बॉन्ड बनेंगे और चार-चार बॉन्ड यहां पर बनेंगे। तो ये इसका क्रिस्टल स्ट्रक्चर
है। अब आगे बढ़ते हैं। नाउ एनर्जी बैंड थ्योरी अगेन इंपॉर्टेंट है क्योंकि एनर्जी बैंड थ्योरी के ऊपर बेस्ड आपसे सॉलिड
मटेरियल का क्लासिफिकेशन पूछा जा सकता है। तो आपको पता होना चाहिए व्हाट इज एनर्जी बैंड थ्योरी। अब मैं आपको समझा देता हूं
कि एनर्जी बैन क्यूरी का मतलब क्या है? देखिए अब यहां पर एक चीज मैं आपको क्लियर कर दूं। जब यह जो हमारा एटम है तो इसके
आउटर मोस्ट शेल में क्या है? इलेक्ट्रॉन है। आपने पढ़ा है कि सेल की जो एनर्जी होती है वो फिक्स होती है। सेल की एनर्जी
क्या होती है? फिक्स होती है। तो इसका मतलब सेल के अंदर जो इलेक्ट्रॉन होते हैं उनकी एनर्जी भी फिक्स होगी। बिल्कुल सही
बात है। भाई यहां पर इस सेल के अंदर जितने भी इलेक्ट्रॉन हैं उन सबकी एनर्जी क्या होगी? सेम होगी। क्लियर है? लेकिन जब ये
एटम क्रिस्टल में होता है। जब ये एटम क्रिस्टल में होता है तो शेल के सभी इलेक्ट्रॉन की जो एनर्जी है वो इक्वल नहीं
होती। कुछ इलेक्ट्रॉन की एनर्जी लो होती है और कुछ की एनर्जी हाई होती है। बात समझ में आ रही है? ध्यान से समझिए। जब हमारा
एटम क्रिस्टल के अंदर होता है तो क्रिस्टल के अंदर जब एटम होता है तो एक ही शेल के इलेक्ट्रॉन की एनर्जी अलग-अलग होती है।
कुछ की एनर्जी लो होती है। कुछ की एनर्जी क्या होती है? हाई होती है। इसका मतलब यहां पर एनर्जी की रेंज बन जाती है। कुछ
की एनर्जी लो है, कुछ की एनर्जी क्या है? हाई है। और इसी को हम कहते हैं एनर्जी क्या बोला जाता है? इसी को बोला जाता है
एनर्जी बैंड थ्योरी। अब देखो यहां पर डेफिनेशन लिखी है। वैलेंस शेल एनर्जी फ्लक्चुएट्स इन सॉलिड। मतलब अगर हमारा एटम
सॉलिड में है तो उसकी जो एनर्जी है, वैलेंस शेल के इलेक्ट्रॉन्स की जो एनर्जी है, वो वेरीरी करती है। सेम नहीं रहती है।
क्लियर है? द रेंज ऑफ एनर्जी पज़ेस बाय इलेक्ट्रॉन ऑफ द सेम ऑर्बिट इन ए सॉलिड इज कॉल्ड एनर्जी बैंड। और यह जो इलेक्ट्रॉन
की जो एनर्जी वेरीरी कर रही है, जो एक रेंज यहां पर मिलती है, उसी को हम कहते हैं एनर्जी बैंड। कुछ इलेक्ट्रॉन की
एनर्जी लो होती है, कुछ की एनर्जी हाई होती है। तो जिन इलेक्ट्रॉन्स की एनर्जी लो होती है, वो हमारे आते हैं देखो यहां
पर दो बैंड बनेंगे। यहां पर एनर्जी बैंड की बात हो रही है, दो बैंड बनेंगे। एक वैलेंस बैंड जो कि लो एनर्जी लोअर एनर्जी
पर होता है। एक होता है कंडक्शन बैंड जो कि हायर एनर्जी पर होता है। इसका मतलब यह हुआ कि ऐसे वैलेंस इलेक्ट्रॉन जिनकी
एनर्जी लो है वो वैलेंस बैंड में होंगे और जिनकी एनर्जी हाई है वो कंडक्शन बैंड में होंगे। बोलो बात क्लियर हो गई? कौन से
इलेक्ट्रॉन होंगे वैलेंस बैंड में? जिनकी एनर्जी लो है। और जिनकी हाई है वो कहां पर होंगे? कंडक्शन बैंड में होंगे। नाउ। अब
देखो यहां पर लिखा भी है वैलेंस बैंड। द एनर्जी बैंड व्हिच पज़ेस ऑल बॉन्डेड वैलेंस इलेक्ट्रॉन इज कॉल्ड वैलेंस बैंड। मतलब अब
इसको देखो दूसरे पॉइंट से समझिए। जो वैलेंस बैंड होता है उसके अंदर वो इलेक्ट्रॉन होते हैं जो कि बॉन्ड में
पार्टिसिपेट करते हैं जो बॉन्ड बनाते हैं। और जो इलेक्ट्रॉन बॉन्ड नहीं बनाते हैं वो होते हैं कंडक्शन बैंड में। कहां पर होते
हैं? कंडक्शन बैंड में। तो मुझे लगता है अब आपको समझ में आ गया होगा कि वैलेंस बैंड में कौन से इलेक्ट्रॉन होते हैं? जो
बॉन्ड बनाते हैं। और कंडक्शन बैंड में कौन से इलेक्ट्रॉन होते हैं? जो बॉन्ड नहीं बनाते हैं जो फ्री होते हैं। अब आप कहेंगे
सर यहां पर तो सभी इलेक्ट्रॉन बॉन्ड बना रहे हैं। कोई इलेक्ट्रॉन फ्री ही नहीं है। तो इसका मतलब कोई भी इलेक्ट्रॉन हमारा
कंडक्शन बैंड में नहीं होगा। हां, बात बिल्कुल सही है। जब सभी इलेक्ट्रॉन बॉन्ड बना रहे हैं, तो सभी इलेक्ट्रॉन वैलेंस
बैंड में होंगे। कोई भी इलेक्ट्रॉन कंडक्शन बैंड में नहीं होगा। लेकिन अब मैं यहां पर आपको एक इंपॉर्टेंट प्रॉपर्टी
बताता हूं सेमीकंडक्टर की। देखिए अगर सेमीकंडक्टर का जो सॉलिड है अगर वो 0 केल्विन पर है 0 केल्विन पर तो यहां पर
कोई भी इलेक्ट्रॉन फ्री नहीं होगा। सारे इलेक्ट्रॉन बॉन्ड बनाएंगे। लेकिन अगर सेमीकंडक्टर रूम टेंपरेचर पर है
तो सीधी सी बात है रूम टेंपरेचर पर यहां पर इलेक्ट्रॉन को कुछ थर्मल एनर्जी मिलेगी। जिसकी वजह से यहां पर कुछ
कोवेलेंट बॉन्ड ब्रेक हो जाते हैं। जैसे मैंने यहां पर ब्रेक करके दिखा रखा है। तो जब थर्मल एनर्जी की वजह से कोवेलेंट बॉन्ड
ब्रेक होता है तो यहां पर क्या होता है? हमारा जो इलेक्ट्रॉन है वो एक इलेक्ट्रॉन फ्री हो जाता है। और जो पोजीशन इलेक्ट्रॉन
की खाली हुई है वहां पर एक होल क्रिएट हो जाता है। देखिए होल क्या होता है? वेकेंसी ऑफ़ इलेक्ट्रॉन। मतलब वेकेंट स्पेस होता है
जहां से इलेक्ट्रॉन चला गया। तो इसका मतलब ये हुआ रूम टेंपरेचर पर थर्मल एनर्जी की वजह से थर्मल एनर्जी की वजह से कुछ
कोवेलेंट बॉन्ड ब्रेक हो जाते हैं। जिसकी वजह से हमारे कुछ इलेक्ट्रॉन कंडक्शन बैंड में चले जाते हैं। बात क्लियर हो गई होगी
आपको? तो अब आपको समझ में आ गया होगा कि जो इलेक्ट्रॉन बॉन्ड में पार्टिसिपेट करते हैं वो वैलेंस बैंड में होते हैं और जो
बॉन्ड में पार्टिसिपेट नहीं करते वो कंडक्शन बैंड में होते हैं। क्लियर हो गई बात? चलिए अब यहां पर देखो इंपॉर्टेंट
पॉइंट देखिए क्या? बहुत इंपॉर्टेंट है। इलेक्ट्रॉन्स इन कंडक्शन बैंड आर रेस्पांसिबल फॉर द फ्लो ऑफ़ करंट। मतलब
करंट कौन से इलेक्ट्रॉन की वजह से फ्लो होगा? उन इलेक्ट्रॉन की वजह से फ्लो होगा जो कंडक्शन बैंड में है। जो इलेक्ट्रॉन
वैलेंस बैंड में है उनकी वजह से करंट फ्लो नहीं होगा। पॉइंट नंबर टू होल्स इन वैलेंस बैंड आर आल्सो रिस्पांसिबल फॉर द फ्लो ऑफ़
करंट। और जो होल वैलेंस बैंड में है उनकी वजह से भी करंट फ्लो होगा। तो देखो दो टाइप के करंट यहां पर हो गए। एक
इलेक्ट्रॉन करंट जो इलेक्ट्रॉन की वजह से फ्लो होगा। एक होल करंट जो होल की वजह से फ्लो होगा। और ध्यान रखना केवल उन्हीं
इलेक्ट्रॉन की वजह से करंट फ्लो होता है जो कंडक्शन बैंड में होते हैं। जो वैलेंस बैंड में इलेक्ट्रॉन है उनकी वजह से करंट
फ्लो नहीं होता है। तो यहां से एक पॉइंट आपको क्लियर हो गया होगा कि जो हमारे सेमीकंडक्टर है सिलिकॉन और जर्मेनियम ये
जीरो केल्विन पर इंसुलेटर हैं और रूम टेंपरेचर पर ये थोड़ी बहुत कंडक्टिविटी को शो करते हैं। मतलब इनसे थोड़ा बहुत करंट
फ्लो हो सकता है रूम टेंपरेचर पर। जबकि जीरो केल्विन पर दोनों क्या है? इंसुलेटर हैं। नेक्स्ट यहां पर आता है फॉरबिडन
एनर्जी गैप। और ये इंपॉर्टेंट दो नंबर में आपसे पूछा जा सकता है कि फॉरबिडन एनर्जी गैप क्या है? या बैंड गैप एनर्जी क्या है?
अब इस बात को समझिए। देखिए ये हमारा बैलेंस बैंड है। ये हमारा कंडक्शन बैंड है। तो इन दोनों के बीच का
जो गैप होता है, इसी को हम कहते हैं फॉरबिडन एनर्जी गैप। वैलेंस बैंड कंडक्शन बैंड के बीच का जो गैप होता है, फॉरबिडन
एनर्जी गैप। अब यहां पर एक बात को समझिए। देखिए इस इलेक्ट्रॉन को जब एनर्जी मिलेगी तो ये इलेक्ट्रॉन क्या करेगा? अगर इसको
एनर्जी मिलती है तो ये इलेक्ट्रॉन ऊपर चला जाएगा कंडक्शन बैंड में। है ना? कहां चला जाएगा? कंडक्शन बैंड में। तो इसका मतलब इस
इलेक्ट्रॉन को हम कितनी एनर्जी प्रोवाइड करें कि ये कंडक्शन बैंड में चला जाए। तो जितनी भी एनर्जी हम प्रोवाइड करेंगे उसी
को कहते हैं फॉरबिडन एनर्जी। तो वही चीज यहां पर लिखा है फॉरबिडन एनर्जी गैप या बैंड गैप एनर्जी। तो मिनिमम एनर्जी
रिक्वायर्ड टू मूव इलेक्ट्रॉन फ्रॉम वैलेंस बैंड टू कंडक्शन बैंड। यानी कि इलेक्ट्रॉन को जो मिनिमम एनर्जी चाहिए
जिससे कि वो वैलेंस बैंड से कंडक्शन बैंड में चला जाए उसी को हम कहते हैं फॉरबिडन गैप एनर्जी जिसको रिप्रेजेंट करते हैं ईजी
से। तो ये भी अब आपको समझ में आ गया होगा। नाउ क्लासिफिकेशन ऑफ़ मटेरियल ऑन द बेसिस ऑफ़ एनर्जी बैंड डायग्राम। अब एनर्जी बैंड
डायग्राम के बेसिस पर हमें क्या करना है? सॉलिड मटेरियल को क्लासिफाई करना है। तो जल्दी से इसको क्लासिफाई कर लेते हैं।
ध्यान दीजिएगा ना। सबसे पहले बात करेंगे कंडक्टर की। देखो कंडक्टर के अंदर फ्री इलेक्ट्रॉन बहुत ज्यादा होते हैं। ये हम
पहले से जानते हैं। तो अगर हम कंडक्टर को डिफाइन करें ऑन द बेसिस ऑफ एनर्जी बैंड थ्योरी तो ध्यान दीजिएगा क्या होगा? देखिए
कंडक्टर के केस में वैलेंस बैंड और कंडक्शन बैंड के बीच में कोई गैप नहीं होता। और ये दोनों एक दूसरे के साथ क्या
करते हैं? ओवरलैप करते हैं। देखो यहां पर आपको गैप दिखाई दे रहा है। लेकिन लेकिन अगर मैं कंडक्टर की बात करूं तो कंडक्टर
के केस में इन दोनों के बीच में कोई गैप नहीं होता और ये दोनों के दोनों वैलेंस दोनों के दोनों बैंड एक दूसरे को ओवरलैप
कर जाते हैं। क्या कर जाते हैं? ओवरलैप। तो वही चीज़ यहां पर लिखी है। फॉरबिडन एनर्जी गैप बिटवीन वैलेंस बैंड एंड
कंडक्शन बैंड इज़ ज़ीरो। कोई गैप नहीं होता। नो फॉरबिडन एनर्जी गैप। कोई गैप नहीं होता यहां पर। ठीक है ना? इनफैक्ट वैलेंस बैंड
एंड कंडक्शन बैंड ओवरलैप ईच अदर। बल्कि यहां पर दोनों के दोनों क्या करते हैं? एक दूसरे को ओवरलैप करते हैं। आप यहां पर देख
सकते हैं जो वैलेंस बैंड है ना वो यहां से यहां तक है और जो कंडक्शन बैंड है वो यहां से यहां तक है। दोनों के बीच में कोई गैप
नहीं है। दोनों में ओवरलैपिंग हो रही है। तो ये क्या हो गया? हमारा कंडक्टर हो गया। तो अब आपको समझ में आ गया कि एनर्जी बैंड
के बेसिस पर हम कंडक्टर को कैसे डिफाइन करेंगे? जहां पर कोई गैप ना हो। क्लियर है? एग्जांपल यहां पर लिखा है कॉपर,
सिल्वर, एलुमिनियम। आप पहले से भी जानते हैं और जो हमारे कंडक्टर होते हैं उनकी कंडक्टिविटी क्या होती है? बहुत हाई होती
है। एनर्जी गैप जीरो। तो ये हमारा एनर्जी बैंड डायग्राम है कंडक्टर का। अब हम चलते हैं इंसुलेटर पे। नाउ इंसुलेटर देखो
इंसुलेटर सीधी सी बात है। इंसुलेटर का जो एनर्जी बैंड डायग्राम होगा उसमें जो गैप होगा ना फॉरबिटन एनर्जी गैप ये बहुत
ज्यादा होगा। फॉरबिटन एनर्जी गैप इज वेरी हाई। बहुत हाई होगा। क्लियर है? अब अगर ये गैप हाई होगा तो हमारा वैलेंस बैंड का जो
इलेक्ट्रॉन है वो कंडक्शन बैंड में जाएगा नहीं। और जब इलेक्ट्रॉन वैलेंस बैंड से कंडक्शन बैंड में नहीं जाएगा तो सीधी सी
बात है करंट फ्लो नहीं करेगा। क्योंकि करंट फ्लो कब करता है? जब हमारा इलेक्ट्रॉन कंडक्शन बैंड में हो। और यहां
पर कंडक्शन बैंड में इलेक्ट्रॉन जाएगा ही नहीं तो करंट फ्लो करेगा नहीं। बात समझ में आ रही? और जब यहां से कोई इलेक्ट्रॉन
ऊपर नहीं जाएगा तो यहां पर होल भी क्रिएट नहीं होगा। तो होल की वजह से भी करंट फ्लो नहीं करेगा। तो इलेक्ट्रॉन की वजह से भी
फ्लो नहीं करेगा और होल की वजह से भी फ्लो नहीं करेगा। अब आपको समझ में आ गया होगा कि इंसुलेटर में करंट क्यों नहीं फ्लो
करता? क्योंकि वहां पर कंडक्शन बैंड में कोई इलेक्ट्रॉन नहीं होता और वैलेंस बैंड में कोई होल नहीं होता है। तो मुझे लगता
है आपको अब ये बात क्लियर हो गई होगी। आगे बढ़ते हैं। अब चलते हैं सेमीकंडक्टर पे जो हमें पढ़ना है और जो हमारा आज का टारगेट
है सेमीकंडक्टर। पूरे इलेक्ट्रॉनिक्स में हम सेमीकंडक्टर की ही बात करते हैं। नाउ व्हाट इज सेमीकंडक्टर? अगर हम इसका एनर्जी
बैंड डायग्राम को देखें तो सेमीकंडक्टर का जो एनर्जी बैंड डायग्राम होता है उसमें जो गैप होता है कंडक्शन बैंड और बैलेंस बैंड
के बीच का ये कंडक्टर से तो ज्यादा होता है लेकिन इंसुलेटर से कम होता है। मतलब बीच में होता है। बात समझ में आ रही? इसका
मतलब ये है कि अगर हम वैलेंस बैंड के इलेक्ट्रॉन को कुछ एनर्जी प्रोवाइड करें तो यह इलेक्ट्रॉन कंडक्शन बैंड में चला
जाएगा। जैसे कि रूम टेंपरेचर पर रूम टेंपरेचर पर हमारे पास अगर सिलिकॉन का या जर्मेनियम का क्रिस्टल है तो रूम टेंपरेचर
पर क्या होता है? कुछ इलेक्ट्रॉन वैलेंस बैंड से कूद के कहां चले जाते हैं? कंडक्शन बैंड में चले जाते हैं। जिसकी वजह
से जो हमारा सिलिकॉन और जर्मेनियम का सॉलिड होता है वो कंडक्टिविटी को रिप्रेजेंट करता है। वो कंडक्टिविटी को शो
करता है। उसकी कुछ ना कुछ कंडक्टिविटी होती है। जबकि जीरो केल्विन पर सिलिकॉन और जर्मेनियम दोनों की कंडक्टिविटी जीरो होती
है। तो मुझे लगता है अब आपको बात समझ में आ गई होगी। क्लियर है? बाकी यहां पर मैंने जो चीज मैं आपको बता रहा हूं उसको और
अच्छे से बहुत ही सिंपल लैंग्वेज में पॉइंट टू पॉइंट लिखा हुआ है। देखिए यहां पर इलेक्ट्रॉनिक्स के अंदर किसी भी यूनिट
के अगर आप नोट्स देखेंगे तो नोट्स के अंदर मैंने केवल उतना ही कंटेंट लिखा है जितना आपको एग्जाम में लिख के आना है। तो आप अगर
नोट्स से रिवाइज करेंगे तो नोट्स के अंदर आपको एकदम प्रॉपर कंटेंट मिलेगा। इजी लैंग्वेज में मिलेगा और पूरा कंटेंट
मिलेगा। जितना आपको एग्जाम में लिख के आना है उतना ही मिलेगा ना ज्यादा होगा ना कम होगा। तो एकदम कंप्लीट नोट्स यहां पर आपको
मिल जाएंगे। चलिए तो अब आपको ये बात समझ में आ गई कि सेमीकंडक्टर में जो गैप होता है वो कंडक्टर से ज्यादा और इंसुलेटर से
क्या होता है? कम होता है। है ना? तो यहां पर अगर हम इलेक्ट्रॉन को एनर्जी देंगे तो वो कहां पर चला जाएगा? कंडक्शन बैंड में
चला जाएगा। क्लियर है? तो क्लासिफिकेशन अब आपको समझ में आ गया होगा। नाउ इफेक्ट ऑफ टेंपरेचर ऑन कंडक्टिविटी ऑफ़ सेमीकंडक्टर।
मतलब जो हमारे सेमीकंडक्टर होते हैं उनकी कंडक्टिविटी पर टेंपरेचर का क्या इफेक्ट होता है? तो यह तो आपको समझ में आ ही गया
होगा। भाई जीरो केल्विन पर जो हमारे सेमीकंडक्टर होते हैं वो इंसुलेटर की तरह काम करते हैं। लेकिन रूम टेंपरेचर पर उनकी
थोड़ी बहुत कंडक्टिविटी होती है। और अगर टेंपरेचर और बढ़ा दें तो कंडक्टिविटी और बढ़ जाएगी। तो इसका कंक्लूजन ये निकलता है
कि सेमीकंडक्टर का अगर हम टेंपरेचर बढ़ाते हैं तो सेमीकंडक्टर की कंडक्टिविटी क्या होती है? इनक्रीज होती है। जबकि आप लोग
पढ़ चुके हैं कंडक्टर के बारे में। कंडक्टर में उल्टा है। अगर आप कंडक्टर में टेंपरेचर को इनक्रीस करेंगे तो उसकी
कंडक्टिविटी क्या होती है? डिक्रीज होती है। तो अब आपको समझ में आ गया होगा कि सेमीकंडक्टर की प्रॉपर्टी और कंडक्टर की
प्रॉपर्टी अलग-अलग है। है ना? तो यहां पर कंडक्टिविटी टेंपरेचर के साथ क्या होती है? इनक्रीस होती है। इसका मतलब ये है कि
आप सेमीकंडक्टर को जितने ज्यादा टेंपरेचर पर यूज करेंगे, उसकी कंडक्टिविटी उतनी ही ज्यादा होगी। लेकिन सीधी सी बात है हमारे
जितने भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस हैं वो सब रूम टेंपरेचर पर यूज होते हैं। तो रूम टेंपरेचर पर सेमीकंडक्टर की जो
कंडक्टिविटी होती है वो बहुत कम होती है। वेरी लो होती है। बात समझ में आ रही है? बहुत लो होती है। तो फिर हमारे
इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस काम कैसे करते हैं? जब उनकी कंडक्टिविटी कम है। तो अभी थोड़ी देर के बाद आपको समझ में आ जाएगा कि काम
कैसे करते हैं। क्लियर है? चलिए नाउ अब हमारे पास यहां पर आपको सब कुछ समझ में आ जाएगा। क्लासिफिकेशन ऑफ़ सेमीकंडक्टर। अब
हम यहां पर सेमीकंडक्टर को क्लासिफाई करेंगे। तो सेमीकंडक्टर हमारे दो टाइप के होते हैं। इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर और
एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर। अब दोनों में डिफरेंस बताता हूं। दोनों में डिफरेंस क्या है? देखिए जो इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर
होते हैं ये प्योर सेमीकंडक्टर होते हैं। एक्सट्रीमली प्योर सेमीकंडक्टर। मतलब अगर सिलिकॉन है तो एकदम प्योर होगा।
उसमें कोई मिलावट नहीं होगी। अगर जर्मेनियम है तो एकदम प्योर होगा। उसमें कोई मिलावट नहीं होगी। तो अगर प्योर
सेमीकंडक्टर है तो उसको कहा जाता है इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर और अभी तक जो मैं सेमीकंडक्टर की बात कर रहा था वो
इंट्रिंसिक ही थे क्योंकि वहां पर हमने प्योर लिया था। क्लियर है? अब बात करते हैं एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर। सीधी सी
बात है अगर ये प्योर है तो ये प्योर नहीं है। अगर हम प्योर सेमीकंडक्टर के अंदर कुछ मिलावट कर दें तो वो एक्सट्रिंसिक
सेमीकंडक्टर बन जाएगा। बात समझ में आ रही है? तो एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर जो होते हैं वो इंप्योर सेमीकंडक्टर होते हैं।
प्योर नहीं होते हैं। इसमें हम कुछ क्या करते हैं? इंप्योरिटी को ऐड करते हैं। अब यहां पर क्वेश्चन आता है कि हम इंप्योरिटी
क्यों ऐड करते हैं? इंप्योरिटी ऐड करने का फायदा क्या है? तो देखिए एक चीज मैं आपको बता दूं। मिलावट करने का हमेशा नुकसान
नहीं होता है। मिलावट करने का फायदा भी होता है। जैसे फॉर एग्जांपल अगर मैं बात करूं गोल्ड की प्योर गोल्ड। प्योर गोल्ड
की ज्वेलरी नहीं बन सकती। इसका मतलब जो प्योर गोल्ड है वो हमारे लिए बहुत ज्यादा यूजफुल नहीं है क्योंकि उसकी ज्वेलरी नहीं
बनेगी और ज्वेलरी नहीं बनेगी तो फिर गोल्ड भी बेकार है। बात समझ में आ रही है? तो जो प्योर गोल्ड होता है उसकी ज्वेलरी नहीं
बनती। लेकिन अगर हम प्योर गोल्ड में कुछ मिलावट कर दें तो उसकी ज्वेलरी बन जाती है। इसका मतलब मिलावट हमेशा नुकसानदायक
नहीं होती है। फायदेमंद भी होती है। तो यहां पर जो एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर होते हैं, इसमें हम क्या करते हैं? इंप्योरिटी
को ऐड करते हैं। इंप्योरिटी को ऐड करने का फायदा क्या होगा? इसकी कंडक्टिविटी बढ़ जाएगी। बात समझ में आ रही है? इसका मतलब
ये हुआ जो इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर हैं वो प्रैक्टिकली हमारे लिए ना के बराबर यूज़ होते हैं। लेकिन जो एक्सट्रिंसिक
सेमीकंडक्टर हैं इन्हीं को हम प्रैक्टिकली यूज़ करते हैं। जितने भी हमारे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस होते हैं उसमें
एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर का यूज करते हैं। अब ये जो एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर हैं ये भी दो टाइप के हैं। कौन-कौन से? एक
है एन टाइप सेमीकंडक्टर और एक है पी टाइप सेमीकंडक्टर। अब ये एन टाइप कैसे बनेगा और पी टाइप सेमीकंडक्टर कैसे बनेगा? इसको भी
हम यहां पर डिटेल में समझ लेंगे। क्लियर है? तो सबसे पहले मैं आपको बता दूं इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर क्या होता है? तो
ये मैं आपको बता ही चुका हूं। अ सेमीकंडक्टर इन एन एक्सट्रीमली प्योर फॉर्म इज नोन एज इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर।
प्योर फॉर्म में होगा तो इंट्रिंसिक है। इंप्योर फॉर्म में होगा तो एक्सट्रिंसिक है। एग्जांपल यहां पर लिखे हैं। सिलिकॉन
और जर्मेनियम आर टू द मोस्ट वाइडली यूज्ड इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर। क्लियर है? चलिए एट लो टेंपरेचर मतलब जीरो केल्विन पर द ऑल
द वैलेंस इलेक्ट्रॉन आर टाइटली हेल्ड बाय द कोवेलेंट बॉन्ड विद अनदर एटम। कहने का मतलब ये है कि अगर इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर
है तो जीरो केल्विन पर इंसुलेटर का काम करेगा। वहां पर कोई फ्री इलेक्ट्रॉन नहीं होगा।
हेंस इलेक्ट्रॉन कैन नॉट मूव। तो सीधी सी बात है जब कोई इलेक्ट्रॉन फ्री नहीं होगा तो वो इंसुलेटर का ही काम करेगा। क्लियर?
द इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर बिहेव एस इंसुलेटर एट एब्सोल्यूट जीरो केल्विन। 0 केल्विन पर इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर
इंसुलेटर की तरह काम करता है। और यहां पर देखो अगेन मैंने यहां पर अगेन डायग्राम बनाया है। देखो अगर हमारा प्योर
सेमीकंडक्टर है। अब देखो सिलिकॉन की जगह पर आप जर्मेनियम भी लिख सकते हैं। अगर प्योर सेमीकंडक्टर का सॉलिड है तो
क्रिस्टलाइन स्ट्रक्चर है जीरो केल्विन तो जीरो केल्विन पर ये इंसुलेटर का काम करेगा। है ना? लेकिन 300 केल्विन 300
केल्विन क्या होता है? रूम टेंपरेचर। तो रूम टेंपरेचर पर यहां पर कुछ फ्री इलेक्ट्रॉन यहां पर होंगे क्योंकि
कोवेलेंट बॉन्ड ब्रेक हो जाएगा। तो रूम टेंपरेचर पर इंटक सेमीकंडक्टर कंडक्टिविटी को शो करता है। लेकिन कंडक्टिविटी की
वैल्यू क्या होती है? बहुत कम होती है। आगे बढ़ते हैं। तो ये अब आपको बात समझ में आ गई होगी। सब कुछ यही है। देखो यहां पर
ये वैलेंस बॉन्ड है। ये कंडक्शन बॉन्ड है। तो यहां से जब वैलेंस बैंड से वैलेंस वैलेंस बैंड से ये बैंड है। जब वैलेंस
बैंड से इलेक्ट्रॉन हमारा कंडक्शन बैंड में जाता है तो उसी की वजह से हमारी क्या आती है? कंडक्टिविटी आती है। क्लियर? चलिए
अब थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं। नेक्स्ट पॉइंट पर चलते हैं। दैट इज़ एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर। समझ में आ गया होगा आपको।
यहां पर इंप्योरिटी क्या होगी? ऐड होगी। तो एन इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर इज कन्वर्टेड इनू एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर
बाय एडिंग इंप्योरिटी। तो अगर आप इंप्युरिटी को ऐड कर दें तो इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर में
कन्वर्ट हो जाएगा। बोलो बात समझ में आ गई? अब ये जो प्रोसेस होता है इंप्योरिटी को ऐड करने का इस प्रोसेस को कहते हैं
डोपिंग। और ये इंपॉर्टेंट है। दो नंबर में बहुत बार पूछा जाता है। द प्रोसेस ऑफ़ एडिंग इंप्योरिटी टू इंट्रिंसिक
सेमीकंडक्टर इज कॉल्ड डोपिंग। एन इंप्योर सेमीकंडक्टर इज कॉल्ड एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर। और जो हमारा इंप्योर होता है
सेमीकंडक्टर है ना उसी को हम क्या कहते हैं? एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर कहते हैं। तो आपको ये पता होना चाहिए कि इंप्योरिटी
को ऐड करने का जो प्रोसेस होता है उसको यहां पर क्या कहा जाता है? डोपिंग कहा जाता है। क्लियर है? नाउ टाइप्स ऑफ
इंप्योरिटी एडेड टू इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर। अब ये जो हमारा इंट्रिंसिक सेमीकंडक्टर है, इसमें कौन-कौन से टाइप की
इंप्योरिटी को ऐड किया जाता है? अब इसको जरा ध्यान से समझिए। देखिए यहां पर दो टाइप की इंप्योरिटी को ऐड किया जाता है।
एक होती है हमारी ट्राईवेलेंट इंप्योरिटी जिसको हम एक्सेप्टर इंप्योरिटी भी कहते हैं और दूसरी होती है पेंटावेलेंट
इंप्योरिटी जिसको हम डोनर इंप्योरिटी भी कहते हैं। अब इनका मतलब समझिए क्या है? देखिए सबसे पहले मैं आपको यहां पर ये बता
दूं जो सिलिकॉन और जर्मेनियम होते हैं उनके आउटरमोस्ट शेल में चार इलेक्ट्रॉन होते हैं। वैलेंस इलेक्ट्रॉन कितने हैं?
चार। और ऐसे एलिमेंट जिनकी वैलेंस शेल में चार इलेक्ट्रॉन होते हैं उनको टेट्रावेलेंट बोला जाता है। क्या बोला
जाता है? टेट्रावेलेंट। और जिनकी आउटरमोस्ट शेल में तीन इलेक्ट्रॉन होते हैं उनको ट्राईवेलेंट
बोला जाता है। और जिनकी आउटरमोस्ट शेल में पांच इलेक्ट्रॉन होते हैं उनको पेंटावेलेंट बोला जाता है। बोलो बात समझ
में आ गई? तो यहां पर हम दो तरह की इंप्योरिटी को ऐड करेंगे। या तो ट्राईवेलेंट या पेंटावेलेंट। ट्राईवेलेंट
इंप्योरिटी जिनकी आउटर मोस्ट शेल में तीन इलेक्ट्रॉन है और पेंटावेलेंट इंप्योरिटी जिनकी आउटरमोस्ट शेल में फाइव इलेक्ट्रॉन
है। बोलो बात समझ में आ रही है? अब अगर आप अगर आप सेमीकंडक्टर में ट्राईवेलेंट इंप्योरिटी को ऐड करते हैं ट्राईवेलेंट
इंप्योरिटी को तो हमें मिलता है पी टाइप का सेमीकंडक्टर और अगर पेंटावेलेंट इंप्योरिटी को ऐड करते हैं तो हमें मिलता
है एन टाइप का सेमीकंडक्टर एग्जांपल यहां पर लिखे हुए हैं ट्राईवेलेंट इंप्योरिटी होती है बोरोन एलुमिनियम गैलियम ये सब
ट्राईवेलेंट है ना फास्फोरस आर्सेनिक एंटीमनी ये क्या है पेंटावेलेंट इंप्योरिटी है और अगर आप पीरियडिक टेबल
में देखेंगे तो जो सिलिकॉन और जर्मेनियम है यह 14थ ग्रुप में आते हैं और जो ट्राईवेलेंट इंप्योरिटी है यह 13थ ग्रुप
में आएंगी और यह 15 ग्रुप में आएंगी। इसका मतलब यह हुआ कि यहां पर जो इंप्योरिटी होंगी वो 13 ग्रुप की और 15 ग्रुप की
होंगी। नाउ नीड ऑफ डोपिंग। अब डोपिंग करते क्यों हैं? तो ये तो मैं आपको पहले ही बता चुका। डोपिंग करने सेमीकंडक्टर
की सेमीकंडक्टर की जो कंडक्टिविटी है वो इनक्रीस हो जाती है। कंडक्टिविटी क्या होती है? इनक्रीस होती है। तो देखिए कई
बार क्वेश्चन पूछा गया है कि व्हाट इज डोपिंग एंड व्हाट इज द नीड ऑफ डोपिंग? तो आपको पता होना चाहिए डोपिंग क्या होती है
और उसकी नीड क्या है? नाउ डिपेंडिंग अपॉन द टाइप ऑफ इंप्योरिटी एडेड एक्सट्रिंसिक सेमीकंडक्टर आर फर्दर क्लासिफाइड। देखिए
हम कौन से टाइप की इंप्योरिटी को ऐड कर रहे हैं। उस बेसिस पर हमारे सेमीकंडक्टर दो टाइप के हो गए। एन टाइप और पी टाइप। अब
इसको और थोड़ा सा डिटेल में समझ लेते हैं। एन टाइप एंड पी टाइप। दोनों को समझ लेते हैं। देखिए एन टाइप सेमीकंडक्टर। एन टाइप
सेमीकंडक्टर मतलब इसमें हम पेंटावेलेंट इंप्योरिटी को क्या करेंगे? ऐड करेंगे। पेंटावेलेंट इंप्योरिटी। तो व्हेन ए
पेंटावेलेंट इंप्योरिटी इज़ एडेड इन प्योर सेमीकंडक्टर द रिजल्टिंग सेमीकंडक्टर इज़ n टाइप। मतलब अगर हम पेंटावेलेंट इंप्योरिटी
को ऐड करेंगे प्योर सेमीकंडक्टर में तो जो रिजल्टिंग सेमीकंडक्टर होगा वो n टाइप का बनेगा।
द पेंटावेलेंट इंप्योरिटी एटम इज कॉल्ड डोनर एटम बिकॉज़ इट डोनेट वन एक्स्ट्रा इलेक्ट्रॉन फॉर कंडक्शन। अब मैं यहां पर
आपको समझाता हूं कि एक्चुअल में जब हम पेंटावेलेंट इंप्योरिटी को ऐड करते हैं तो कंडक्टिविटी बढ़ती कैसे है? अब जरा यहां पर
ध्यान से समझिए। देखिए ये हमारा सिलिकॉन का स्ट्रक्चर है। लेकिन हमने इसमें क्या करा? पेंटावेलेंट इंप्योरिटी को ऐड कर
दिया। जैसे कि फास्फोरस मैंने यहां पर ऐड किया है। है ना? भ फास्फोरस इज़ अ पेंटावेलेंट इंप्योरिटी। तो आपको अच्छे से
मालूम है फास्फोरस के जो वैलेंस इलेक्ट्रॉन होते हैं वो फाइव होते हैं। तो यहां पर फास्फोरस की इंप्योरिटी आ चुकी
है। अब देखो क्या होगा? फास्फोरस के पास पांच इलेक्ट्रॉन हैं। तो सीधी सी बात है चार इलेक्ट्रॉन तो सिलिकॉन के साथ बॉन्ड
बना लेंगे। लेकिन यहां पर एक इलेक्ट्रॉन फ्री बचेगा। एक इलेक्ट्रॉन क्या बचेगा? फ्री बचेगा। बोलो बात समझ में आ रही है?
और ये जो फ्री इलेक्ट्रॉन है जब ये कंडक्शन बैंड में जाएगा तो इसकी वजह से कंडक्टिविटी होगी। इसका मतलब ये हुआ कि जब
हम पेंटावेलेंट इंप्योरिटी को ऐड करेंगे। है ना? मतलब हम इंप्योरिटी को ऐड करेंगे तो हमारी कंडक्टिविटी बढ़ेगी क्योंकि हमारे
फ्री इलेक्ट्रॉन बढ़ेंगे। भाई ये फ्री है ना पांचवा इलेक्ट्रॉन। तो हम जितने एटम ऐड करेंगे उतने ही फ्री इलेक्ट्रॉन हमारे पास
आ जाएंगे और हम इनफाइनाइट एटम ऐड करेंगे। तो इनफाइनाइट इलेक्ट्रॉन्स यहां पर आ जाएंगे। जिसकी वजह से कंडक्टिविटी क्या
होगी? इनक्रीस होगी। बोलो बात समझ में आ रही? एक और चीज़ मैं आपको बता दूं कि यहां पर जैसा मैं आपको पहले ही बता चुका हूं कि
जो हमारे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है वह रूम टेंपरेचर पर यूज़ होते हैं। तो रूम टेंपरेचर पर हमारे कुछ कोवेलेंट बॉन्ड भी
तो ब्रेक होंगे। तो कोवेलेंट बॉन्ड के ब्रेक होने की वजह से जितने इलेक्ट्रॉन प्रोड्यूस होंगे उतने ही होल भी प्रोड्यूस
होंगे। मतलब इलेक्ट्रॉन भी प्रोड्यूस होंगे और होल भी प्रोड्यूस होंगे। यानी कि यहां पर इलेक्ट्रॉन और होल पेयर में
प्रोड्यूस होंगे। पेयर में प्रोड्यूस होंगे। तो वही चीज यहां पर देखो सब कुछ लिखा है मैंने। इक्वल नंबर ऑफ इलेक्ट्रॉन
एंड होल आर आल्सो जनरेटेड बाय थर्मल एनर्जी। तो यहां पर मेरी बात को जरा ध्यान से समझना। जितने फास्फोरस एटम ऐड करेंगे
उतने फ्री इलेक्ट्रॉन इसके अंदर आ जाएंगे। क्लियर है? दूसरा जितने कोवेलेंट बॉन्ड ब्रेक होंगे उतने ही इलेक्ट्रॉन और होल भी
हमारे इसके अंदर आ जाएंगे। इसका मतलब यह हुआ कि रूम टेंपरेचर पर रूम टेंपरेचर पर इस सॉलिड के अंदर होल भी हैं और फ्री
इलेक्ट्रॉन्स भी हैं। बोलो इतनी बात समझ में आ गई? तो अब देखो यहां पर जरा ध्यान देना। देखो ये फास्फोरस है। फास्फोरस के
पास पांच इलेक्ट्रॉन है। अगर ये अपना एक इलेक्ट्रॉन दे देगा तो इसके पास कौन सा चार्ज आएगा? पॉजिटिव चार्ज आएगा। आप अच्छे
से जानते हैं कि अगर कोई भी एलिमेंट अपना एक इलेक्ट्रॉन दे देता है तो उसके ऊपर पॉजिटिव चार्ज आता है। जैसे सोडियम अगर
अपना एक इलेक्ट्रॉन दे देगा तो इस पे पॉजिटिव चार्ज आएगा। अगर फास्फोरस अपना एक इलेक्ट्रॉन दे देगा तो फास्फोरस पर
पॉजिटिव चार्ज आएगा। कौन सा चार्ज आएगा? पॉजिटिव। तो देखो जो n टाइप का सेमीकंडक्टर होता है उसको हम ऐसे
रिप्रेजेंट करते हैं। यहां पर जो आपको ये प्लस प्लस प्लस दिखाई दे रहा है ना ये ये एक्चुअल में क्या है? पॉजिटिव आयंस हैं।
जो फास्फोरस है ना इंप्योरिटी उसने अपना एक इलेक्ट्रॉन डोनेट कर दिया। भाई ये जो इसके पास एक्सेस इलेक्ट्रॉन था ये इसने
डोनेट कर दिया। ये कंडक्शन बैंड में चला जाएगा। तो इसके पास पॉजिटिव चार्ज बचेगा। तो यहां पर जो आपको पॉजिटिव पॉजिटिव दिखाई
दे रहे हैं ये एक्चुअल में पेंटावेलेंट इंप्योरिटी है और पॉजिटिव आयंस हैं। क्योंकि इन्होंने अपना एक इलेक्ट्रॉन
डोनेट कर दिया। और इसीलिए पेंटावेलेंट इंप्योरिटी को कहा जाता है डोनर एटम। क्योंकि अपना यह इलेक्ट्रॉन डोनेट करता है
बिकॉज़ इट डोनेट वन एक्स्ट्रा इलेक्ट्रॉन फॉर कंडक्शन। क्योंकि अपने एक्स्ट्रा इलेक्ट्रॉन को यह डोनेट कर देता है
कंडक्शन के लिए। इसीलिए इसको डोनर एटम कहा जाता है। और ये n टाइप सेमीकंडक्टर की रिप्रेजेंटेशन है। अब आप इसमें मुझे ये
बता सकते हैं कि इस n टाइप सेमीकंडक्टर में इलेक्ट्रॉन ज्यादा होंगे या होल ज्यादा होंगे? कौन ज्यादा होंगे? देखो
बहुत सिंपल सा है ये क्वेश्चन। दो भाई यहां पर जो थर्मल एनर्जी की वजह से होल जनरेट हो रहे हैं तो वो तो बराबर हैं।
जितने होल जनरेट हो रहे हैं उतने इलेक्ट्रॉन भी जनरेट हो रहे हैं। तो ये तो दोनों बराबर हो गए। लेकिन आप जितने
फास्फोरस एटम को ऐड करेंगे उतने इलेक्ट्रॉन ऐड हो जाएंगे। तो अब मुझे बताओ इसके अंदर इलेक्ट्रॉन ज्यादा होंगे या होल
ज्यादा होंगे? सीधी सी बात है इलेक्ट्रॉन ज्यादा होंगे। होल कम होंगे। तो n टाइप सेमीकंडक्टर में फ्री इलेक्ट्रॉन जो होते
हैं वो मेजॉरिटी चार्ज कैरियर होते हैं। और होल होते हैं माइनॉरिटी चार्ज कैरियर्स। और ये जो पॉजिटिव चार्ज आपको
दिखाई दे रहे हैं ये होते हैं इमोबाइल पॉजिटिव आयंस। ये ई मोबाइल पॉजिटिव आयंस हैं। मतलब इनकी पोजीशन चेंज नहीं होगी। ये
अपनी जगह पर फिक्स रहेंगे। मूव कौन करता है? चार्ज कैरियर्स। तो मुझे लगता है अब आपको समझ में आ गया होगा n टाइप का
सेमीकंडक्टर। और अगर हम n टाइप सेमीकंडक्टर का एनर्जी बैंड डायग्राम बनाएं तो कुछ इस तरह से बनेगा। वैलेंस
बैंड, कंडक्शन बैंड और एनर्जी लेवल ऑफ़ डोनर। और ये जो हमने डोनर एटम को इसमें ऐड किया है ना इसका जो एनर्जी लेवल होता है
वो कंडक्शन बैंड के एकदम पास में होता है। जिसकी वजह से थोड़ी सी एनर्जी देने पर ही हमारा इलेक्ट्रॉन कंडक्शन बैंड में चला
जाता है। तो अब आपको समझ में आ गया होगा कि n टाइप में अच्छा एक पॉइंट मैं यहां पर और क्लियर कर दूं। बहुत सारे स्टूडेंट को
कंफ्यूजन हो जाता है कि n टाइप सेमीकंडक्टर का मतलब है नेगेटिव। नेगेटिव नहीं होता। हम इसको n टाइप सेमीकंडक्टर
इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें इलेक्ट्रॉन जो हैं वो मेजॉरिटी चार्ज कैरियर्स हैं। लेकिन होता ये ओवरऑल न्यूट्रल ही है।
नेगेटिव नहीं होता है। आगे बढ़ते हैं पी टाइप सेमीकंडक्टर। देखो पी टाइप अब ये बिल्कुल उल्टा हो गया। इसमें हम कौन सी
इंप्योरिटी ऐड करेंगे? ट्राईवेलेंट इंप्योरिटी ऐड करेंगे। अब ट्राईवेलेंट इंप्योरिटी ऐड करेंगे। जैसे कि यहां पर
मैंने ले लिया बोरॉन। तो बोरोन के पास तीन ही इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसका मतलब तीन ही इलेक्ट्रॉन होते हैं तो तीन सिलिकॉन के
साथ यहां पर बॉन्ड बन जाएंगे। अब प्रॉब्लम क्या है कि सिलिकॉन के पास चार हैं। तो इसकी वजह से बोरोन के पास यहां पर एक
इलेक्ट्रॉन का जो स्पेस है वो वेकेंट रह जाएगा। है ना? इसका मतलब यहां पर एक जितने बोरोन एटम हम ऐड करेंगे उतने होल इसके
अंदर ऐड हो जाएंगे। बात समझ में आ रही है? जब हम ट्राईवेलेंट इंप्योरिटी को ऐड करते हैं, तो जितने एटम हम ऐड करते हैं, उतने
होल इसके अंदर आ जाते हैं। दूसरा अब अगेन वही रूम टेंपरेचर पर कुछ कोवेलेंट बॉन्ड ब्रेक होंगे तो यहां पर इलेक्ट्रॉन और होल
का पेयर जनरेट होगा। तो ये तो आपस में दोनों बराबर हैं। तो अब आप मुझे बता सकते हैं कि इसके अंदर इलेक्ट्रॉन ज्यादा होंगे
या होल ज्यादा होंगे। भाई सीधी सी बात है जितने बोरोन ऐड किए हैं उतने होल ऐड होंगे और बाकी ये तो बराबर है। तो यहां पर
मेजॉरिटी चार्ज कैरियर कौन हो जाएगा? होल। और माइनॉरिटी चार्ज कैरियर कौन हो जाएगा? इलेक्ट्रॉन। अब यहां पर नेगेटिव क्यों आ
रहा है ये? नेगेटिव इसलिए आ रहा है क्योंकि बोरोन के पास तीन ही इलेक्ट्रॉन है। तो सीधी सी बात है ये यहां पर इसका एक
वेकेंट स्पेस है। तो ये जो वेकेंट स्पेस है क्या होगा? जैसे यहां पर ये इलेक्ट्रॉन है तो ये इलेक्ट्रॉन यहां से जंप करके
यहां चला जाएगा और यहां पर इलेक्ट्रॉन आ जाएगा और यहां पर होल बन जाएगा। तो कहने का मतलब ये है बोरोन एटम क्या करेगा?
इलेक्ट्रॉन को एक्सेप्ट करेगा। बात समझ में आ रही है? क्या करेगा? एक्सेप्ट करेगा। तो देखो वही चीज़ यहां पर लिखी है।
द ट्राईवेलेंट इंप्योरिटी एटम इज़ कॉल्ड एन एक्सेप्टर एटम। फैक्टर क्यों कह रहे हैं? बिकॉज़ इट क्रिएट ए होल व्हिच कैन एक्सेप्ट
एन इलेक्ट्रॉन फ्रॉम द नेबरिंग बॉन्ड। ये क्या करेगा? इलेक्ट्रॉन को एक्सेप्ट करेगा नेबर वाले बॉन्ड से। इसीलिए इसको कहा जाता
है असेप्टर एटम। तो ट्राईवेलेंट इंप्योरिटी जो होती है वो असेप्टर है। इक्वल नंबर ऑफ़ इलेक्ट्रॉन एंड होल आल्सो
जनरेटेड बाय थर्मल एनर्जी। अब यहां पर सेम चीज़ है। थर्मल एनर्जी की वजह से इक्वल नंबर ऑफ़ इलेक्ट्रॉन और होल भी यहां पर
क्या होंगे? जनरेट होंगे। तो अब आपको ये चीज क्लियर हो गई कि यहां पर इलेक्ट्रॉन जो होंगे वो माइनॉरिटी
चार्ज कैरियर्स होंगे। होल जो होंगे वो मेजॉरिटी होंगे और जो नेगेटिव चार्ज है ये ए मोबाइल नेगेटिव आयन है। और देखो आगे चल
के इनका बहुत यूज़ है। इसलिए आपको पता होना चाहिए कि पी टाइप का सेमीकंडक्टर कैसे बनता है। बहुत सारे स्टूडेंट कंफ्यूजन हो
जाता है कि सर ये पी टाइप का है तो इसमें नेगेटिव चार्ज क्यों आ रहा है? तो मुझे लगता है अब आपको समझ में आ गया होगा कि पी
टाइप में नेगेटिव क्यों आ रहा है? तो याद रखना पी टाइप का मतलब पॉजिटिव नहीं होता है। पी टाइप का मतलब होता है कि इसके अंदर
मेजॉरिटी चार्ज कैरियर क्या है? होल्स हैं। और होल पॉजिटिव चार्ज की तरह क्या करते हैं? एक्ट करते हैं। और इसका एनर्जी
बैंड डायग्राम मैंने इधर बनाया। इधर जो एनर्जी बैंड डायग्राम होता है जो एनर्जी लेवल होता है एक्सेप्टर एटम का वो वैलेंस
बैंड के पास में होता है। क्यों? क्योंकि इसके पास होल है तो होल को थोड़ी सी एनर्जी देंगे तो वो वैलेंस बैंड में चले
जाएंगे। और जब वैलेंस बैंड में होल होता है उसकी वजह से करंट फ्लो करता है। तो हमारा पी टाइप एन टाइप यहां पर हो गया। अब
यह देखो पी टाइप एन टाइप के बीच में आपसे डिफरेंस पूछा जा सकता है। कई बार पूछा गया है। व्हाट इज द डिफरेंस बिटवीन पी टाइप
एंड एन टाइप सेमीकंडक्टर? दो नंबर में। तो यहां पर मैंने जो चीजें आपको समझाई है वही चीजें यहां पर लिखी है। तो एक बार डिफरेंस
देख लेंगे आपको समझ में आ जाएगा। ये सब कुछ वही पॉइंट है जो मैं आपको बता चुका हूं।
क्लियर है? अब आगे बढ़ते हैं। नाउ अब यहां से देखिए ये जो क्वेश्चन यहां पर अगर इनको देखें आप तो अभी तक जो हमने पढ़ा है ना ये
हमारा सेमीकंडक्टर का बेसिक्स था। और यहां से यूनिवर्सिटी एग्जाम में क्वेश्चन भी पूछे जाते हैं और जो हमने अभी तक पढ़ा है
इसका आगे बहुत ज्यादा यूज़ है। तो अब हम चलते हैं अपने नेक्स्ट टॉपिक पर और नेक्स्ट टॉपिक है हमारा पीएन जंक्शन
डायोड। पीए जंक्शन डायोड। है ना? पीएन जंक्शन डायोड के बाद हम पढ़ेंगे फॉरवर्ड एंड रिवर्स बायोसिंग। उसके बाद हम पढ़ेंगे
वीआई कैरेक्टरिस्टिक्स। तो चलिए स्टार्ट करते हैं। सबसे पहले पीएन जंक्शन डायोड। पीएन जंक्शन डायोड क्या है? इसको समझ लेते
हैं। देखिए अभी तक हमने पी टाइप सेमीकंडक्टर पढ़ लिया। n टाइप का सेमीकंडक्टर भी हमने पढ़ लिया है। अब हम
पढ़ेंगे पीएन जंक्शन डायोड। अब पीएन जंक्शन डायोड मैं आपको समझाता हूं है क्या? मान लीजिए ये हमारे पास एक
सेमीकंडक्टर है। मान लीजिए ये सिलिकॉन है। मान लेते हैं ये सिलिकॉन है। है ना? तो अगर हम इसमें इसके आधे पार्ट में इसके आधे
पार्ट में डोपिंग कर दें पेंटावेलेंट इंप्योरिटी की और आधे पार्ट में डोपिंग कर दें ट्राईवेलेंट इंप्योरिटी की। तो सीधी
सी बात है ये एन टाइप बनेगा। भाई सीधी सी बात है इधर हमने पेंटावेलेंट इंप्योरिटी को ऐड किया है तो यह कौन सा सेमीकंडक्टर
बन गया पी एन टाइप और इधर ट्राईवेलेंट को ऐड किया है तो यह कौन सा बन गया पी टाइप तो अगर इसका आधा पोर्शन एन टाइप है और आधा
पोर्शन पी टाइप है तो ये बन चुका है क्या पीएन जंक्शन डायोड इसी को हम डायोड कहेंगे तो अगर हम किसी भी सेमीकंडक्टर में
सिलिकॉन हो या जर्मेनियम हो अगर उसके आधे पार्ट में पेंटावेलेंट इंप्योरिटी ऐड कर दें और आधे पार्ट में ट्राईवेलेंट
इंप्योरिटी ऐड कर दें तो वो बन जाएगा डायोड जिसको हम पीएन जंक्शन डायोड या फिर सेमीकंडक्टर डायोड कहते हैं। तो व्हाट इज
पीएन जंक्शन डायोड? इट इज अ सिंगल क्रिस्टल ऑफ़ जर्मेनियम और सिलिकॉन। ये एक सिंगल क्रिस्टल होता है। सिलिकॉन का भी हो
सकता है, जर्मेनियम का भी हो सकता है। डोप्ड इन सच अ मैनर दैट वन हाफ पोर्शन ऑफ इट एक्ट एज पी टाइप। इसका आधा पोर्शन पी
टाइप होगा। एंड अदर हाफ क्या होगा? एन टाइप होगा। जैसे कि आप यहां पर डायग्राम में देख सकते हैं। यह हमारा मान लीजिए एक
सिलिकॉन है। क्या है? मान लीजिए सिलिकॉन का एक क्रिस्टल है। तो इसके आधे पार्ट में आधा पार्ट पी टाइप बन गया। आधा पार्ट क्या
बन गया? एन टाइप बन गया। अब हम इसको सिंपल समझने के लिए ये भी कह सकते हैं कि हमारे पास एक पी टाइप का सेमीकंडक्टर है और एक
एन टाइप का सेमीकंडक्टर है। दोनों को अगर जॉइ कर दें तो क्या बन जाएगा? डायोड बन जाएगा। जिसको हम क्या कहते हैं? पीएन
जंक्शन डायोड भी कह सकते हैं, सेमीकंडक्टर डायोड भी कह सकते हैं। और सिंपली हम इसको डायोड भी कह सकते हैं। अब यहां पर आगे एक
वर्ड लिखा अनबायस कंडीशन। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब ये है कि हमारा जो ये डायोड है, हमने इसमें अभी कोई बैटरी नहीं लगाई
है। जब बैटरी लगा देंगे तो बायसिंग हो जाएगी। जब तक बैटरी नहीं लगाई है तो ये अनबायसिंग है। है ना? अनबायस कंडीशन है।
तो अब आपको समझ में आ गया होगा व्हाट इज डायोड? तो डायोड कुछ भी नहीं है। सिंपली एक पी टाइप सेमीकंडक्टर और एक एन टाइप
सेमीकंडक्टर को अगर हम जॉइ कर दें तो डायोड बन जाता है। बात समझ में आ रही है? और ये डायोड कितना इंपॉर्टेंट है।
जैसे-जैसे आप आगे बढ़ेंगे आपको समझ में आ जाएगा और आप पहले पढ़ भी चुके होंगे। आपको मालूम है कि डायोड कितना इंपॉर्टेंट है।
लगभग हर एक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के अंदर आपको डायोड दिखाई देगा। चलिए तो देखो ये पी टाइप अब इसीलिए मैंने आपको कहा था कि
पी टाइप सेमीकंडक्टर कैसे बनता है? आपको पता होना चाहिए। ये n टाइप कैसे बनता है आपको पता होना चाहिए। तो ये हमारा पी टाइप
है। इसमें जो होल है वो मेजॉरिटी कैरियर्स हैं। इलेक्ट्रॉन यहां पर माइनॉरिटी कैरियर्स हैं। होल मेजॉरिटी में है और
इलेक्ट्रॉन क्या है? माइनॉरिटी में है। n टाइप में इलेक्ट्रॉन मेजॉरिटी में है और होल क्या है? माइनॉरिटी चार्ज कैरियर्स
हैं। बोलो बात समझ में आ गई? द बाउंड्री और रीजन ऑफ़ ट्रांजिशन बिटवीन n टाइप एंड p टाइप सेमीकंडक्टर इज़ कॉल्ड pए जंक्शन।
देखिए ये पी टाइप है ये एन टाइप है। तो जिस जो इनकी बाउंड्री है दोनों की उसी बाउंड्री को हम कहते हैं पीएन जंक्शन और
इसीलिए इसको कहा जाता है पीएन जंक्शन डायोड। अब ये सेमीकंडक्टर से बना है इसलिए सेमीकंडक्टर डायोड भी इसको कहते हैं। आगे
बढ़ते हैं। थोड़ा सा और यहां पर समझ तो ये तो आपको समझ में आ गया जो पी टाइप सेमीकंडक्टर है पी टाइप सेमीकंडक्टर इसमें
ट्राईवेलेंट इंप्योरिटी होती है और एक्सेप्टर आयन होते हैं। है ना? होल्स इसमें मेजॉरिटी कैरियर्स होते हैं।
इलेक्ट्रॉन इसमें माइनॉरिटी कैरियर्स होते हैं। इसी तरह से हमारे पास n टाइप में भी होता है। क्लियर है? अब यहां पर हम बात
करेंगे फॉर्मेशन ऑफ डिप्ल्यूशन लेयर। बहुत इंपॉर्टेंट है। बहुत बार यूनिवर्सिटी एग्जाम में पूछा जा चुका है कि व्हाट इज
डिप्ल्यूशन लेयर? या फॉर्मेशन ऑफ डिप्ल्यूशन लेयर। ये शॉर्ट क्वेश्चन में भी आता है, लॉन्ग क्वेश्चन में भी आता है।
अगर दो नंबर में आएगा तो केवल आप डिफाइन कर देंगे, डायग्राम बना देंगे। और अगर सेवन मार्क्स में आएगा तो पूरा एक्सप्लेन
करके आएंगे। तो चलिए इसको समझ लेते हैं एक बार। फॉर्मेशन ऑफ डिप्लीशन रीजन नाउ डिप्लीशन रीजन कैसे बनता है वो मैं आपको
यहां पर समझा देता हूं। बहुत सिंपल है। समझते हैं इस बात को। यहां पर हमारा एक साइड में है पी टाइप। एक साइड में हमारा N
टाइप। इस डायग्राम से समझते हैं। ये P टाइप है। ये N टाइप है। अब जरा ध्यान देना क्या होगा? ध्यान देना। देखिए जिस समय ये
डायोड बनेगा मतलब जब हम P और N टाइप को जॉइन करेंगे तो उस समय पर क्या होगा? उस सिचुएशन को समझते हैं। देखिए ध्यान देना
जरा। P टाइप में होल क्या है? मेजॉरिटी कैरियर्स हैं। और होल एक तरह से पॉजिटिव चार्ज है। और जो इलेक्ट्रॉन है N टाइप में
इलेक्ट्रॉन मेजॉरिटी कैरियर्स हैं और इलेक्ट्रॉन आप जानते हैं नेगेटिव चार्ज हैं। तो जैसे ही हम इन दोनों को जॉइ
करेंगे तो होगा क्या? देखो जैसे हम जॉइन करेंगे ये नेगेटिव ये पॉजिटिव। और आप अच्छे से जानते हैं नेगेटिव एंड पॉजिटिव
चार्ज अट्रैक्ट ईच अदर। दोनों एक दूसरे को क्या करते हैं? अट्रैक्ट करते हैं। तो सीधा सा मतलब ये हुआ कि जैसे ही हम इन
दोनों को जॉइ करेंगे तो क्या होगा? ये जो इलेक्ट्रॉन है ये इधर भागेगा। होल इधर भागेगा। मतलब ये जो इलेक्ट्रॉन और होल है
आपस में एक दूसरे को करेंगे अट्रैक्ट। क्योंकि अपोजिट चार्ज अट्रैक्ट ईच अदर। बोलो बात समझ में आ रही? अब इससे होगा
क्या? देखो सबसे पहले ये होल इस इलेक्ट्रॉन को अट्रैक्ट करेगा या ये कह लीजिए ये इलेक्ट्रॉन इस होल को अट्रैक्ट
करेगा। है ना? जो पास में होंगे वो पहले अट्रैक्ट करेंगे एक दूसरे को। क्लियर है? तो अब मान लीजिए ये इलेक्ट्रॉन ये
इलेक्ट्रॉन कूद करके इस होल के ऊपर आ गया। तो इलेक्ट्रॉन और होल न्यूट्रलाइज ईच अदर। दोनों एक दूसरे को क्या कर देंगे?
न्यूट्रलाइज कर देंगे। तो अब अगर अब अगर आप ये सोचिए कि यहां से अगर ये जो इलेक्ट्रॉन है ये इधर चला गया होल के पास
तो दोनों के दोनों खत्म हो गए। बचा क्या यहां पर? यहां बचा पॉजिटिव चार्ज। यहां बचा नेगेटिव चार्ज। सिमिलरली ये और ये भी
एक दूसरे को न्यूट्रलाइज कर देंगे। तो यहां पॉजिटिव बचेगा यहां नेगेटिव बचेगा। फिर ये दोनों करेंगे पॉजिटिव नेगेटिव। ये
दोनों करेंगे पॉजिटिव नेगेटिव। उसके बाद इसके जो बराबर में है ये इलेक्ट्रॉन आपस में इलेक्ट्रॉन और होल आपस में क्या
करेंगे? अट्रैक्ट करेंगे। ये आपस में अट्रैक्ट करेंगे। तो कहने का मतलब ये है कि इसके जंक्शन के पास में जो इलेक्ट्रॉन
और होल होंगे वो एक दूसरे को अट्रैक्ट करेंगे और एक दूसरे को क्या कर देंगे? न्यूट्रलाइज कर देंगे। बोलो ये बात समझ
में आ रही है? क्या कर देंगे? न्यूट्रलाइज कर देंगे। अब इससे होगा क्या? यहां पर देखो जरा। देखो इस पोर्शन में जितने भी
इलेक्ट्रॉन थे और इस पोर्शन में जितने भी होल थे उन्होंने एक दूसरे को अट्रैक्ट किया और दोनों ने एक दूसरे को क्या कर
दिया? न्यूट्रलाइज कर दिया। इसका मतलब अब ये जंक्शन के पास वाला जो रीजन है इधर पॉजिटिव चार्ज बचा। इधर नेगेटिव चार्ज
बचा। मतलब n टाइप में बचा पॉजिटिव चार्ज और p टाइप में बचा नेगेटिव चार्ज जंक्शन के पास में। जंक्शन के पास में। अब यहां
पर देखो बहुत इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है। ध्यान दीजिएगा। ये पॉजिटिव चार्ज है। ये नेगेटिव चार्ज है। तो अब आप कहेंगे सर ये
इलेक्ट्रॉन और ये होल भी तो आपस में अट्रैक्ट करेंगे। U क्यों नहीं इधर गए? भाई ये सारे के सारे इधर जाने चाहिए ना।
ये सब इधर जाने चाहिए। तो सब क्यों नहीं गए? अब इस कांसेप्ट को समझिए। क्यों नहीं गए सब? देखो जब जंक्शन के पास वाले
इलेक्ट्रॉन और होल एक दूसरे से कंबाइन हुए तो उन दोनों ने एक दूसरे को न्यूट्रलाइज कर दिया। तो हुआ क्या? यहां पर पॉजिटिव
चार्ज बचा। यहां पर नेगेटिव चार्ज बचा। अब मेरी बात को जरा ध्यान से समझना। आप क्लास 12th में पढ़ चुके हैं कि अगर
पॉजिटिव चार्ज और नेगेटिव चार्ज हमारे पास बचा है। है ना? तो इनके बीच में क्या होगा? इलेक्ट्रिक फील्ड जनरेट होगा।
पॉजिटिव और नेगेटिव चार्ज के बीच में क्या आएगा? इलेक्ट्रिक फील्ड आएगा। और इलेक्ट्रिक फील्ड की जो डायरेक्शन होगी वो
पॉजिटिव से नेगेटिव में होगी। आपको मालूम है अगर ये पॉजिटिव चार्ज है और ये नेगेटिव चार्ज है तो इनके बीच में क्या होगा?
इलेक्ट्रिक फील्ड डेवलप होगा और जब इलेक्ट्रिक फील्ड डेवलप हो जाएगा देखो इलेक्ट्रिक फील्ड डेवलप हुआ इस डायरेक्शन
में ये इलेक्ट्रिक फील्ड है क्या है ये इलेक्ट्रिक फील्ड अब इलेक्ट्रिक फील्ड की प्रॉपर्टी आप
जानते हैं जो इलेक्ट्रिक फील्ड होता है ना इलेक्ट्रिक फील्ड की डायरेक्शन में इलेक्ट्रिक फील्ड की डायरेक्शन में होल
मूव कर सकता है इलेक्ट्रॉन मूव नहीं कर सकता तो अब इलेक्ट्रिक फील्ड की डायरेक्शन इधर है तो इसका मतलब इस डायरेक्शन में होल
तो मूव कर सकता है इलेक्ट्रॉन मूव नहीं कर सकता इसका मतलब ये जो इलेक्ट्रिक फील्ड है ना ये और इलेक्ट्रॉन को इधर अब आने नहीं
देगा। भाई जब तक इलेक्ट्रिक फील्ड डेवलप नहीं हुआ तब तक तो ये एक दूसरे को अट्रैक्ट कर रहे थे। लेकिन जैसे यहां पर
इलेक्ट्रिक फील्ड डेवलप हुआ ये इलेक्ट्रिक फील्ड अब इलेक्ट्रॉन को इधर नहीं आने देगा और होल को उधर नहीं जाने देगा। बोलो बात
समझ में आई? अब एक तरह से यहां पर ये मतलब सिक्योरिटी का काम कर रहा है। भाई जैसे ही ये इलेक्ट्रिक फील्ड यहां पर डेवलप हुआ ये
इलेक्ट्रिक फील्ड इलेक्ट्रॉन को इधर नहीं आने देगा। होल को उधर नहीं जाने देगा। क्यों? क्योंकि इलेक्ट्रिक फील्ड की ये
प्रॉपर्टी होती है कि इलेक्ट्रिक फील्ड की डायरेक्शन में पॉजिटिव चार्ज मूव कर सकता है। नेगेटिव चार्ज मूव नहीं कर सकता। इसका
मतलब इलेक्ट्रिक फील्ड की डायरेक्शन इधर है। तो इधर ये नेगेटिव चार्ज है तो नेगेटिव इधर मूव नहीं कर सकता। पॉजिटिव
मूव कर सकता है। मतलब इधर जो होल है वो इधर जा सकते हैं। सिमिलरली जो इलेक्ट्रॉन होते हैं इधर जो होल है ये जो होल हैं ये
इलेक्ट्रिक फील्ड की डायरेक्शन में तो मूव कर सकते हैं लेकिन उधर मूव नहीं कर सकते। अपोजिट में मूव नहीं कर सकते। तो कहने का
मतलब यह है जब तक इलेक्ट्रिक फील्ड डेवलप नहीं हुआ था तब तक तो ये इलेक्ट्रॉन इधर आ रहे थे। होल उधर जा रहे थे। लेकिन जैसे ही
इलेक्ट्रिक फील्ड डेवलप हो जाएगा अब इलेक्ट्रिक फील्ड इनको जाने नहीं देगा। यानी कि बचे हुए इलेक्ट्रॉन इधर ही रह
जाएंगे और बचे हुए होल इधर ही रह जाएंगे। और ये जो बीच में रीजन बना है, इसी रीजन को हम कहते हैं डिप्लीशन रीजन और डिप्लीशन
लेयर। अब आपको समझ में आ गया होगा कि डिप्लीशन लेयर कैसे बनती है। बाकी मैंने यहां पर स्टेप टू स्टेप सब कुछ लिखा हुआ
है कि कैसे ये डिप्लीशन लेयर का फॉर्मेशन होगा। तो अब आपको डिप्लीशन लेयर समझ में आ गई कि डिप्लीशन लेयर कैसे बनेगी? यहां पर
मैंने पूरा प्रॉपर वे में डिफाइन किया हुआ है। द लेयर ऑफ इमोबाइल पॉजिटिव आयन एंड नेगेटिव आयन व्हिच हैव नो फ्री इलेक्ट्रॉन
एंड होल आर कॉल्ड डिप्लीशन लेयर। यानी कि ये जो डिप्लीशन लेयर के अंदर पॉजिटिव आयंस होते हैं, नेगेटिव आयंस होते हैं और ये
इमोबाइल होते हैं। ये मूव नहीं करते कभी भी। मूव कौन करता है? इलेक्ट्रॉन और होल चार्ज कैरियर्स मूव करते हैं। बात समझ में
आ रही है? ये मूव नहीं करते। तो अब आपको समझ में आ गया यहां पर इलेक्ट्रिक फील्ड डेवलप होगा। तो जब भी डिप्लीशन लेयर बनती
है तो डिप्लीशन लेयर बनती है तो वहां पर इलेक्ट्रिक फील्ड होते हैं। और इसी इलेक्ट्रिक फील्ड की वजह से फर्दर
इलेक्ट्रॉन होल का मूवमेंट रुक जाता है। हां एक इंपॉर्टेंट चीज है यहां पर देखो यहां पर इस n टाइम में होल क्या होंगे?
माइनॉरिटी कैरियर्स होंगे। तो जो माइनॉरिटी कैरियर्स हैं वो इधर आ सकते हैं और यहां पर जो आपके इलेक्ट्रॉन है वो
माइनॉरिटी कैरियर्स हैं तो इलेक्ट्रॉन इधर जा सकते हैं। तो कहने का मतलब ये है कि डिप्लीशन लेयर से माइनॉरिटी कैरियर फ्लो
कर सकते हैं। मेजॉरिटी कैरियर फ्लो कभी भी नहीं करेंगे। अब यहां पर एक चीज और आती है। दैट इज़ पोटेंशियल बैरियर। अब ये
पोटेंशियल बैरियर क्या है? देखो, अगर यह पॉजिटिव चार्ज है, यह नेगेटिव चार्ज है, तो यह हाई पोटेंशियल है, यह लो पोटेंशियल
है। क्योंकि पॉजिटिव हाई पोटेंशियल होता है, नेगेटिव लो पोटेंशियल होता है। तो इसका मतलब इन दोनों के बीच में एक
पोटेंशियल डिफरेंस भी डेवलप होगा। क्या डेवलप होगा? पोटेंशियल डिफरेंस। और ये जो पोटेंशियल डिफरेंस इनके बीच में डेवलप
होगा, इसी को हम कहते हैं पोटेंशियल बैरियर। क्या कहा जाता है? पोटेंशियल बैरियर कहा जाता है। अब एक चीज मैं आपको
यहां पर क्लियर कर दूं। अगर मैं अगर मैं मान लीजिए यहां पर एक बैटरी लगा देता हूं। एक बैटरी लगा देता हूं। है ना? यह मैंने
यहां पर एक बैटरी लगा दी। तो क्या इसमें से करंट फ्लो करेगा? क्या इसमें से करंट फ्लो करेगा? तो यहां पर एक चीज मैं क्लियर
कर दूं। करंट फ्लो तो करेगा लेकिन ये करंट तभी फ्लो कर सकता है जब अप्लाइड बैटरी का जो पोटेंशियल है वो इस बैरियर पोटेंशियल
से ज्यादा हो। अब हमें कैसे पता चलेगा बैरियर पोटेंशियल किसका कितना है? तो मैं एक चीज आपको क्लियर कर दूं कि अगर ये
क्रिस्टल सिलिकॉन का है तो बैरियर पोटेंशियल होगा 0.7 वोल्ट। है ना? आगे मैंने सब दोनों की वैल्यू लिखी हुई है
सिलिकॉन के लिए भी और जर्मेनियम के लिए भी। तो आपको अब ये समझ में आ गया होगा कि यहां
पर करंट कब फ्लो करेगा। देखो ये लिखा मैंने सिलिकॉन के लिए बैरियर पोटेंशियल होता है 0.7 वोल्ट और जर्मेनियम के लिए
होता है 0.3 वोल्ट। इसका मतलब यह हुआ यहां से करंट केवल तभी फ्लो कर सकता है जब हम जो बैटरी हम अप्लाई कर रहे हैं अगर उसका
पोटेंशियल इस पोटेंशियल से ज्यादा है। यानी कि अगर ये सिलिकॉन का है तो 0.7 वोल्ट से ज्यादा होना चाहिए और अगर
जर्मेनियम का है तो 0.3 वोल्ट से ज्यादा होना चाहिए। अब देखो यहां पर नोट करके मैंने जो बातें आपको बताई है वो भी लिखी
है यहां पर। जो इलेक्ट्रॉन होता है वो लो से हाई पोटेंशियल की तरफ मूव करता है। जो इलेक्ट्रॉन होते हैं ना वो लोअर पोटेंशियल
से हायर पोटेंशियल की तरफ मूव करते हैं। अब इस डायग्राम में आप देखो इलेक्ट्रॉन लो से हाई की तरफ मूव करते
हैं। तो ये जो इलेक्ट्रॉन है ये इधर मूव नहीं कर सकते। क्यों? क्योंकि इधर हाई पोटेंशियल है इधर लो पोटेंशियल है। और जो
होल होते हैं वो हाई से लो की तरफ मूव करते हैं। तो ये इधर से उधर मूव नहीं करेंगे। तो आप किसी भी तरीके से समझिए।
बहुत सिंपल कांसेप्ट है ना। सर्किट सिंबल ऑफ़ पीएन जंक्शन डायोड। अब ये जो हमारा पीएन जंक्शन डायोड है, इसका सर्किट सिंबल
क्या होगा? ये हमारा डायोड है। इसका सिंबल क्या होगा? अब हम इसको सर्किट में ऐसे तो रिप्रेजेंट नहीं करेंगे ना। तो हम इसको
सिंबल से रिप्रेजेंट करते हैं। तो अब देखिए इसका सिंबल क्या होगा? ये P टाइप है। वो N टाइप है। तो इसका सिंबल बनेगा
ऐसे। ये हमारा डायोड का सिंबल है। इधर P होता है। इधर N होता है। है ना? इसको हम एनोड कहते हैं। इसको हम कैथोड कहते हैं।
बोलो बात समझ में आ रही है? मतलब यह पॉज़िटिव, यह नेगेटिव। तो, यह हमारा सर्किट सिंबल हो गया पीएन जंक्शन डायोड का। आगे
बढ़ते हैं। नाउ, वर्किंग ऑफ़ पीएन जंक्शन डायोड अंडर फ़ॉरवर्ड एंड रिवर्स बायसिंग। मतलब अब हम यहां पर जो हमारा पीएन जंक्शन
डायोड अभी तक हम पढ़ रहे थे, ये अनबायस कंडीशन में पढ़ रहे थे। अभी तक हमने उसमें बैटरी नहीं लगाई थी। लेकिन जैसे ही हम
बैटरी लगाते हैं, तो हमारे डायोड की हो जाती है बायसिंग। अब बायसिंग दो टाइप की होगी। फॉरवर्ड बायसिंग एंड रिवर्स
बायसिंग। अब दो टाइप की कैसे होगी वो आपको यहां पर समझ में आ जाएगी। है ना? तो वर्किंग ऑफ पीएन जंक्शन डायोड अंडर
फॉरवर्ड बायस एंड रिवर्स बायस। अंडर फॉरवर्ड बायस एंड रिवर्स। देखिए बैटरी में दो टर्मिनल होते हैं। एक पॉजिटिव टर्मिनल
और एक नेगेटिव टर्मिनल। एक पॉजिटिव और एक नेगेटिव। तो अगर हम पॉजिटिव टर्मिनल को P टाइप से कनेक्ट करेंगे तो फॉरवर्ड बायसिंग
होगी। मतलब पॉजिटिव को P टाइप से कर दो और नेगेटिव को N टाइप से कर दो तो फॉरवर्ड बायसिंग होगी। अगर हम P टाइप को नेगेटिव
से कनेक्ट करते हैं और N टाइप को पॉजिटिव से कनेक्ट करते हैं तो रिवर्स बायसिंग होती है। तो इसी बात को यहां पर अब समझ
लेते हैं। फॉरवर्ड बायसिंग। तो इफ द पॉजिटिव टर्मिनल ऑफ़ द बैटरी इज़ कनेक्टेड टू द पी साइड। अगर बैटरी का पॉजिटिव
टर्मिनल पी साइड से कनेक्ट करेंगे और नेगेटिव टर्मिनल को N साइड से कनेक्ट करेंगे तो ये बायसिंग कैसी होगी? फॉरवर्ड
बायसिंग होगी। कैसी बायसिंग होगी? फॉरवर्ड बायसिंग होगी। और यहां पर करंट फ्लो करेगा कब? अगर इस बैटरी का पोटेंशियल अगर बैटरी
का पोटेंशियल अप्लाइड देखिए ये जो बैटरी का पोटेंशियल ये अप्लाइड पोटेंशियल है। अगर बैटरी का पोटेंशियल बैरियर पोटेंशियल
से ज्यादा है तो करंट फ्लो करेगा नहीं तो करंट फ्लो नहीं करेगा। तो देखो बैरियर पोटेंशियल की डायरेक्शन इधर है और अप्लाइड
पोटेंशियल की डायरेक्शन इधर है। तो जब ये अप्लाइड पोटेंशियल इस बैरियर पोटेंशियल से ज्यादा हो जाएगा तो करंट फ्लो करेगा। बोलो
बात समझ में आ गई? अब इसका सर्किट डायग्राम देखो यह तो ऐसे बनाया हमने लेकिन सर्किट डायग्राम इसका ऐसे बनेगा। देखो यह
डायोड है। यह P टाइप है। ये N टाइप है। तो P टाइप को पॉजिटिव से कनेक्ट कर दिया। N टाइप को नेगेटिव से कनेक्ट कर दिया। तो ये
हमारा क्या हो गया? फॉरवर्ड बायसिंग हो गई। तो यहां पर इस बात को समझना जरूरी है कि डायोड हमारा फॉरवर्ड बायसिंग में कब
होता है? तो यहां पर हमारा डायोड क्या है? फॉरवर्ड बायसिंग में है। किसमें है? फॉरवर्ड बायसिंग में। अब आगे चलते हैं।
रिवर्स बायसिंग की बात करेंगे। अच्छा यहां पर एक चीज़ और मैं क्लियर कर दूं। फॉरवर्ड बायसिंग तो आपको समझ में आ गई ना कब होगी?
जब P को पॉजिटिव से और N को नेगेटिव से कनेक्ट करेंगे। और यह पूरा यहां पर डिटेल में मैंने लिखा हुआ है। आपको आसानी से समझ
में आ जाएगा। अब यहां पर एक चीज आती है नी वोल्टेज और कट इन वोल्टेज। ये क्या चीज है? नी वोल्टेज और कट इन वोल्टेज। इसको एक
बार समझ लीजिए। इंपॉर्टेंट है। अ मिनिमम पॉजिटिव वोल्टेज इज़ रिक्वायर्ड टू स्टार्ट कंडक्शन इन फॉरवर्ड बाय एस डायोड। दिस
मिनिमम पॉजिटिव वोल्टेज इज कॉल्ड नी वोल्टेज और कट इन वोल्टेज। यहां से आपको समझाता हूं। जैसे मैंने आपको अभी बताया कि
जब तक ये अप्लाइड पोटेंशियल इस बैरियर पोटेंशियल से ज्यादा नहीं होगा तो करंट फ्लो नहीं करेगा। इसका मतलब ये हुआ अगर
अप्लाइड पोटेंशियल बैरियर पोटेंशियल के बराबर हो गया अगर बराबर हो गया तो उस अप्लाइड पोटेंशियल को हम कहेंगे कट इन
वोल्टेज या नी वोल्टेज। क्या बोला जाता है इसको? नी वोल्टेज। और कट इन वोल्टेज। तो आपका सिलिकॉन के लिए जो मिनिमम अप्लाइड
वोल्टेज होना चाहिए वो 0.7 वोल्ट है और जो जर्मेनियम के लिए होना चाहिए वो 0.3 वोल्ट है। तो अब आपको समझ में आ गया कि कट इन
वोल्टेज या नी वोल्टेज किसको कहते हैं? ये मिनिमम वोल्टेज है। मिनिमम वोल्टेज रिक्वायर्ड टू कंडक्शन।
नाउ रिवर्स बायसिंग। रिवर्स बायसिंग में उल्टा हो जाएगा। रिवर्स बायसिंग में हम क्या करेंगे? बैटरी के पॉजिटिव टर्मिनल को
N टाइप से कनेक्ट करेंगे और नेगेटिव टर्मिनल को P टाइप से कनेक्ट करेंगे। तो ये क्या हो जाएगी? हमारी रिवर्स बायसिंग
हो जाएगी। है ना? अच्छा एक चीज मैं यहां पर और आपको क्लियर कर दूं। फॉरवर्ड बायसिंग में एक पॉइंट छूट गया जो
इंपॉर्टेंट है वो भी मैं आपको बता देता हूं। देखो जब ये फॉरवर्ड बायसिंग में होता है तो होगा क्या? देखो यहां पर ये पॉजिटिव
है और ये हमारा P टाइप है। पी टाइप के अंदर होल क्या है? मेजॉरिटी कैरियर्स। N टाइप के अंदर इलेक्ट्रॉन क्या है?
मेजॉरिटी कैरियर्स। तो जब हम यहां पर बैटरी कनेक्ट करेंगे फॉरवर्ड बायसिंग में तो देखो ये जो बैटरी का पॉजिटिव टर्मिनल
है यह क्या करेगा होल को आगे पुश करेगा मतलब जंक्शन की तरफ फ्लो कराएगा और इधर से ये इलेक्ट्रॉन इसको जंक्शन की साइड में
फ्लो कराएगा तो देखो इससे क्या होगा अब मैं आपको पिछले डायग्राम में जाके समझाता हूं इससे फायदा क्या होगा देखो जब हम
इसमें बैटरी लगा देंगे तो बैटरी लगाने से क्या होगा अब इधर मैंने पॉजिटिव टर्मिनल कनेक्ट किया है बैटरी का और इधर हमने
कनेक्ट किया है नेगेटिव टर्मिनल बैटरी का तो इससे क्या होगा जरा ध्यान से समझिए ये पॉजिटिव टर्मिनल है। तो ये क्या करेगा?
यहां पर जितने भी होल है होल के पास क्या है? पॉजिटिव चार्ज है। तो ये बैटरी का जो पॉजिटिव टर्मिनल है ये होल को आगे पुश
करेगा और इधर ये नेगेटिव टर्मिनल है। तो ये इलेक्ट्रॉन को इधर पुश करेगा क्योंकि सेम चार्ज रिपेल करते हैं। तो ये पॉजिटिव
जो है इस होल को आगे पुश करेगा और नेगेटिव साइड इलेक्ट्रॉन को आगे पुश करेगी। तो इससे क्या होगा? ये होल आगे जाएंगे। तो
अगर ये होल आगे जाएंगे तो यहां पर जो हमारे ये आयंस हैं ये आयंस कम हो जाएंगे क्योंकि अब होल उधर जाने स्टार्ट हो
जाएंगे। इलेक्ट्रॉन इधर जाने स्टार्ट हो जाएंगे। तो कहने का मतलब ये है कि ये इलेक्ट्रॉन इधर फ्लो करना स्टार्ट कर
देंगे। होल उधर फ्लो करना स्टार्ट कर देंगे और बीच में जो हमारे ये इमोबाइल आयंस इमोबाइल आयंस ये आयंस क्या होंगे?
धीरे-धीरे कम हो जाएंगे। तो कहने का मतलब ये है कि फॉरवर्ड बायसिंग में जो डिप्लीशन लेयर की विड्थ होती है ये कम हो जाती है।
कम क्यों हो जाती है? क्योंकि इलेक्ट्रॉन इधर फ्लो करते हैं, होल उधर फ्लो करते हैं। तो ये आयंस हमारे यहां से क्या हो
जाते हैं? खत्म हो जाते हैं। तो अब आपको ये बात समझ में आ गई होगी कि यहां पर फॉरवर्ड बायसिंग में डिप्लीशन लेयर की जो
विड्थ होती है वो डिक्रीज हो जाती है। तो आपको ये पता होना चाहिए कि डिक्रीज क्यों होती है। चलिए अच्छा रिवर्स बायसिंग की
बात कर लेते हैं। अब रिवर्स बायसिंग में क्या होगा? देखो रिवर्स बायसिंग में अब ये होल है। अब यहां पर हम ये तो अभी फॉरवर्ड
बायसिंग है। रिवर्स बायसिंग का डायग्राम लेता हूं। ये रिवर्स बायसिंग का डायग्राम है। देखो अब यहां पर ये होल है। इसको हमने
बैटरी के नेगेटिव टर्मिनल से कनेक्ट कर दिया। यहां पर हमारे पास इलेक्ट्रॉन है। इनको हमने पॉजिटिव टर्मिनल से कनेक्ट कर
दिया। तो होगा क्या? जो ये इलेक्ट्रॉन है ये पॉजिटिव टर्मिनल की तरफ अट्रैक्ट होंगे और जो होल है ये नेगेटिव टर्मिनल की तरफ
अट्रैक्ट होंगे। तो कहने का मतलब ये जो बीच वाला एरिया है ये तो और बढ़ेगा। बोलो बात समझ में आ रही है? क्यों बढ़ेगा? देखो
इसलिए बढ़ेगा क्योंकि जब हम यहां पर बैटरी को अप्लाई करेंगे। अगर हम बैटरी का इधर मान लीजिए
हमने बैटरी का अप्लाई कर दिया पॉजिटिव टर्मिनल है ना और इधर अप्लाई कर दिया हमने बैटरी का नेगेटिव टर्मिनल तो क्या होगा ये
जो इलेक्ट्रॉन है ये पॉज बैटरी का पॉजिटिव टर्मिनल इलेक्ट्रॉन को अपनी तरफ पुल करेगा और ये जो नेगेटिव टर्मिनल है ये होल को
अपनी तरफ पुल करेगा तो कहने का मतलब ये है यहां से होल इधर जाएंगे और इलेक्ट्रॉन उधर जाएंगे तो यहां पर ये जो इमोबाइल आयंस हैं
पॉजिटिव आयन जब इसका इलेक्ट्रॉन उधर चला जाएगा तो ये तो डिप्लिशन लेयर और बढ़ जाएगी। गी तो रिवर्स बायसिंग में डिप्लीशन
लेयर इंक्रीस करती है और फॉरवर्ड बायसिंग में डिप्लीशन लेयर करती है डिक्रीज। बोलो बात समझ में आ गई? चलिए अब आगे चलते
हैं। अब आपको समझ में आ गया होगा कि रिवर्स बायसिंग में डिप्लीशन लेयर क्या होगी? डिक्रीज होगी। रिवर्स बायसिंग में।
है ना? अब एक और इंपॉर्टेंट चीज यहां पर रिवर्स बायसिंग में। अब जरा ध्यान से देखो। क्या? रिवर्स बायसिंग में डिप्लीशन
लेयर क्या करेगी? इंक्रीस करेगी। क्या? क्या रिवर्स बायसिंग में करंट फ्लो करेगा? भाई करंट तो फ्लो तब करेगा ना जब यहां पर
इलेक्ट्रॉन और होल जंक्शन को क्रॉस करेंगे। तब हमारा इलेक्ट्र करंट फ्लो करेगा। लेकिन रिवर्स बायसिंग में तो हमारा
इलेक्ट्रॉन और होल जंक्शन को क्रॉस नहीं कर रहे हैं तो करंट फ्लो नहीं करेगा। लेकिन अब आपको याद होगा कि P टाइप में
माइनॉरिटी कैरियर्स होते हैं इलेक्ट्रॉन और N टाइप में माइनॉरिटी कैरियर्स होते हैं होल। तो जो माइनॉरिटी कैरियर्स हैं
मतलब यहां पर जो इलेक्ट्रॉन होंगे तो ये बैटरी का नेगेटिव टर्मिनल जो माइनॉरिटी कैरियर्स है इलेक्ट्रॉन उनको उधर पुश
करेगा और ये पॉजिटिव टर्मिनल जो यहां पर होल होंगे माइनॉरिटी कैरियर उनको इधर पुश करेगा। कहने का मतलब ये है कि इस बैटरी की
वजह से इस बैटरी की वजह से जो माइनॉरिटी कैरियर्स हैं वो जंक्शन को क्रॉस करेंगे। मेजॉरिटी नहीं करेंगे।
फॉरवर्ड बायसिंग में मेजरिटी चार्ज कैरियर्स फॉरवर्ड बायसिंग में मेजॉरिटी चार्ज कैरियर जंक्शन को क्रॉस करते हैं
जिसकी वजह से करंट फ्लो होता है। रिवर्स बायसिंग में मेजॉरिटी चार्ज कैरियर जंक्शन को क्रॉस नहीं करते। इसका मतलब मेजॉरिटी
चार्ज कैरियर की वजह से कोई करंट फ्लो नहीं होगा। लेकिन रिवर्स बायसिंग में जो माइनॉरिटी
कैरियर्स होते हैं वो जंक्शन को क्रॉस करते हैं। तो इसका मतलब रिवर्स बायसिंग में माइनॉरिटी कैरियर की वजह से करंट फ्लो
करेगा। और जो करंट माइनॉरिटी कैरियर की वजह से फ्लो करता है उसको हम कहते हैं रिवर्स सैचुरेशन करंट। क्या कहते हैं?
रिवर्स सैचुरेशन करंट। तो रिवर्स बायसिंग में रिवर्स सैचुरेशन करंट फ्लो करता है और रिवर्स सैचुरेशन करंट की जो वैल्यू होती
है वो बहुत कम होती है। तो यही सब कुछ मैंने यहां पर लिखा है कि रिवर्स सैचुरेशन करंट यहां पर क्या होगा? फ्लो करेगा।
रिवर्स सैचुरेशन करंट को हम लीकेज करंट भी कहते हैं। क्या कहते हैं? लीकेज करंट। तो अब आपको क्लियर हो गया होगा कि व्हाट इज
पीएन जंक्शन डायोड और सेमीकंडक्टर डायोड। तो पीएन जंक्शन डायोड इज़ अ सेमीकंडक्टर डिवाइस फॉर्म बाय जॉइनिंग पी टाइप एंड एन
टाइप सेमीकंडक्टर। भाई पी टाइप और एन टाइप से बनता है। दैट अलव करंट टू फ्लो इन वन डायरेक्शन जो कि करंट को केवल एक ही
डायरेक्शन में अलव करता है फ्लो करने के लिए। मतलब फॉरवर्ड बाय फॉरवर्ड बायस में करंट फ्लो करेगा। रिवर्स बायस में करंट
फ्लो नहीं करेगा। एंड ब्लॉक इन द अपोजिट डायरेक्शन। रिवर्स बायस में क्या कर देता है? ब्लॉक कर देता है। तो जो डायोड होता
है वो फॉरवर्ड बायस में करंट को फ्लो कराता है। रिवर्स बायस में नहीं फ्लो कराता। रिवर्स बायस में स्मॉल करंट फ्लो
करता है। जिसको हम कहते हैं रिवर्स सैचुरेशन करंट। और आइडियल डायोड के केस में हम रिवर्स सैचुरेशन करंट को मान लेते
हैं जीरो। तो अब आपको समझ में आ गया होगा कि व्हाट इज पीएन जंक्शन डायोड या सेमीकंडक्टर
डायोड। अब यहां पर फॉरवर्ड बायसिंग और रिवर्स बायसिंग का मैंने डिफरेंस लिखा हुआ है। तो मेरे ख्याल से जो बातें मैंने बताई
है आपको वही सारी बातें यहां पर लिखी है। एक बार पढ़ लेंगे समझ में आ जाएगा। ठीक है? नाउ वोल्ट एंपियर कररेक्टरिस्टिक्स ऑफ़
पीएन जंक्शन डायोड। बहुत इंपॉर्टेंट है क्योंकि आपको VI कर्व बनाना आना चाहिए डायोड का। तो यहां पर अब हम VI कर्व
पढ़ेंगे। वोल्ट एंपियर या VI कररेक्टरिस्टिक कर्व और पीएन जंक्शन डायोड। तो अब यहां पर जरा ध्यान दीजिएगा।
ए ग्राफ शोइंग द वेरिएशन ऑफ़ करंट फ्लोइंग थ्रू पीएन जंक्शन विद वोल्टेज अप्लाइड अक्रॉस इट। ए ग्राफ शोइंग वेरिएशन ऑफ़ करंट
फ्लोइंग थ्रू द पीएन जंक्शन डायोड। यानी कि डायोड से जो करंट फ्लो करेगा उसके बीच में। एंड विद द वोल्टेज अप्लाइड अक्रॉस द
अक्रॉस इट। मतलब आप किसी डायोड पे एक बैटरी को अप्लाई करिए। तो बैटरी से आप बैटरी अप्लाई करने का मतलब है कि आप
पोटेंशियल अप्लाई कर रहे हैं। अब उस बैटरी की वजह से करंट भी फ्लो करेगा डायोड में। तो हमें क्या करना है? करंट के बीच में और
पोटेंशियल के बीच में ग्राफ ड्रॉ करना है। उसी को हम कहते हैं VI कैरेक्टरिस्टिक्स कर्व। तो ये कर्व हमें यहां पर ड्रॉ करना
है। बोथ व्हेन इट इज़ फॉरवर्ड बायस एंड रिवर्स बायस। और दोनों केस में करना है फॉरवर्ड के लिए भी और रिवर्स के लिए भी।
और इसी को हम कहते हैं वीआई कररेक्टरिस्टिक्स ऑफ पीए जंक्शन टाइप। अब यह बहुत इंपॉर्टेंट है। यह जो ग्राफ आपके
सामने बना है, यह बहुत इंपॉर्टेंट ग्राफ है और इसको आगे भी मैं कई बार बनाऊंगा। तो, इसलिए आपको यहां पर ही इसको एक बार
समझ लीजिए। बहुत इंपॉर्टेंट है। देखिए, नाउ, यहां पर x एक्सिस पर हमने क्या लिया है? पोटेंशियल लिया है। और y-एक्सिस पर
हमने क्या लिया है? करंट को लिया है। है ना? यह हमारा करंट है इस एक्सिस पर। और यह क्या है? पोटेंशियल है। अब जरा ध्यान
देना। VF का मतलब है फॉरवर्ड मतलब फॉरवर्ड बायस। F का मतलब क्या है? यहां पर फॉरवर्ड वोल्टेज है ये। है ना? मतलब फॉरवर्ड
बायसिंग में अप्लाई किया गया है। और यहां पर होगा VR मैं लिख देता हूं। लिखा नहीं है VR मतलब रिवर्स बायस का वोल्टेज। ये
हमारा फॉरवर्ड करंट है। ये हमारा रिवर्स करंट है। अब जरा ध्यान से समझना। मान लीजिए स्टार्टिंग में हमारा जो डायोड
है वो उसमें हमने बैटरी अप्लाई नहीं करी है। बायसिंग नहीं हो रही है। है ना? तो हम यहां से स्टार्ट करेंगे। अभी तक हमने कोई
बैटरी अप्लाई नहीं की है। अब हम बैटरी को अप्लाई करते हैं और हम करते हैं फॉरवर्ड बायसिंग। क्या करते हैं? फॉरवर्ड बायसिंग।
तो देखो फॉरवर्ड बायसिंग में क्या होगा? जब जरा ध्यान से देखना। जैसे ही हम बैटरी को अप्लाई करेंगे फॉरवर्ड बायसिंग में, तो
बैटरी अप्लाई करने पे क्या होगा? क्या करंट फ्लो करना स्टार्ट करेगा? नहीं। करंट फ्लो करना स्टार्ट नहीं करेगा। क्यों?
क्योंकि करंट फ्लो स्टार्ट करना तब करेगा जब बैटरी का जो पोटेंशियल होगा वो बैरियर पोटेंशियल से ज्यादा होगा। इसका मतलब यह
है कि अगर आप बैटरी को अप्लाई करते हैं फॉरवर्ड बायसिंग में तो जब तक बैटरी का पोटेंशियल नी वोल्टेज से ज्यादा नहीं हो
जाएगा तब तक कोई करंट फ्लो नहीं करेगा। तो आप देख सकते हैं यहां से यहां तक करंट क्या है? जीरो है। क्यों है जीरो? क्योंकि
बैटरी का पोटेंशियल जब तक बैरियर पोटेंशियल से कम रहेगा, नी वोल्टेज से कम रहेगा, तब तक कोई करंट फ्लो नहीं करेगा।
लेकिन जैसे ही बैटरी का पोटेंशियल बैरियर पोटेंशियल से ज्यादा होगा मतलब नी वोल्टेज से ज्यादा होगा हमारा करंट फ्लो करेगा और
ये एक्सप्पोनेंशियली वैरी करेगा। तो फॉरवर्ड बायसिंग में ये हमारा VI कर्व हो गया। तो अगर मैं इधर का पोर्शन हटा दूं तो
अगर आपसे पूछा जाए कि फॉरवर्ड बायसिंग में VI कर्व बनाओ तो फॉरवर्ड बायसिंग में VI कर्व ये बनेगा। ये फॉरवर्ड बायसिंग का हो
गया। नाउ अब हम बैटरी को लगाते हैं रिवर्स बायस में। अब हम रिवर्स बायसिंग में बैटरी को देखते हैं क्या होगा। हमारी जो बैटरी
है वो रिवर्स बायसिंग में लगी हुई है। तो देखो क्या होगा? जैसे-जैसे हम रिवर्स बायस में वोल्टेज इनक्रीस करेंगे तो क्या होगा?
जब हम वोल्टेज को इनक्रीस करेंगे तो यहां पर स्टार्टिंग में करंट इनक्रीज होगा और उसके बाद कांस्टेंट हो जाएगा। है ना?
एक्चुअल में जब बैटरी रिवर्स बायसिंग में लगाएंगे तो स्मॉल करंट फ्लो करेगा डायोड से जिसको हम कहते हैं रिवर्स सैचुरेशन
करंट। है ना? तो यहां पर आप देख सकते हैं ये रिवर्स सैचुरेशन करंट फ्लो करेगा। इतनी जो वैल्यू है ये ये रिवर्स सैचुरेशन करंट
की है। मतलब ये जो मैग्नीट्यूड है करंट का ये रिवर्स सैचुरेशन करंट है। तो जब जैसे-जैसे हम बैटरी के पोटेंशियल को
इंक्रीस करते जाएंगे रिवर्स बायस में तो क्या होगा? अब यहां पर मेरी बात को जरा ध्यान से समझिए। अगर आप रिवर्स बायसिंग
में बैटरी के पोटेंशियल को इनक्रीस करते जा रहे हैं। इनक्रीस करते जा रहे हैं तो एक पॉइंट ऐसा आएगा जहां पर हमारा जो डायोड
है वह ब्रेक हो जाएगा। मतलब उसमें ब्रेकडाउन हो जाएगा। रिवर्स ब्रेकाउन बात समझ देखिए अगर आप डायोड को रिवर्स बायसिंग
में यूज कर रहे हैं और पोटेंशियल बढ़ाते जा रहे हैं तो एक समय ऐसा आएगा कि हमारा जो डायोड है वो फेल हो जाएगा। बात समझ में
आ रही? और उस पॉइंट को हम कहते हैं रिवर्स ब्रेकडाउन वोल्टेज। मतलब उस पॉइंट पर जो वोल्टेज होगा जो हम अप्लाई कर रहे हैं
उसको कहेंगे रिवर्स ब्रेकडाउन वोल्टेज। और ये हमारा रिवर्स बायसिंग में यहां पर ब्रेक हो जाएगा। बोलो बात समझ में आ रही
है? तो अगर रिवर्स बायस में हम वोल्टेज बढ़ाते जाते हैं, बढ़ाते जाते हैं, बढ़ाते जाते हैं तो एक पॉइंट ऐसा आएगा जहां पर
हमारा डायोड ब्रेक हो जाएगा, फेल हो जाएगा। बोलो बात समझ में आ गई? क्लियर है? तो अब आपको ग्राफ समझ में आ गया होगा कि
ग्राफ कैसे बनाना है। तो यहां पर जो रिवर्स सैचुरेशन करंट होता है क्योंकि वो बहुत स्मॉल होता है। तो रिवर्स सैचुरेशन
करंट को हम रिप्रेजेंट करते हैं माइक्रो एंपियर से। मतलब इसकी यूनिट क्या है? माइक्रो एंपियर में आता है ये। और जो
हमारा फॉरवर्ड करंट होता है वो मिली एंपियर में आता है। फॉरवर्ड करंट मिली एंपियर में होता है। रिवर्स करंट माइक्रो
एंपियर में होता है। तो ये कर्व अब आपको समझ में आ गया होगा। अगर एग्जाम में आपसे पूछा जाता है तो बिल्कुल आप ऐसा ही बना
करके आएंगे। अब आगे बढ़ते हैं। नाउ इफेक्ट ऑफ टेंपरेचर ऑन vi कर्व। भई vi कर्व पर टेंपरेचर का
क्या इफेक्ट होगा? तो यह तो हमें पहले से पता है क्योंकि देखो सेमीकंडक्टर है। अगर टेंपरेचर बढ़ाएंगे अगर टेंपरेचर को
बढ़ाएंगे तो उसकी कंडक्टिविटी भी क्या होगी? बढ़ेगी। तो अब यहां पर ध्यान से देखो अगर देखो ये हमारा T1 टेंपरेचर पे
कर्व है जो ग्रीन कलर से है और जो वाइट कलर से है ये T2 टेंपरेचर पर है। T2 टेंपरेचर हमारा ज्यादा है T1 से। तो देखो
जब हम टेंपरेचर को बढ़ाएंगे तो सीधी सी बात है हमारा जो कट इन वोल्टेज या नी वोल्टेज है वो कम हो जाएगा। मतलब हमें जल्दी करंट
मिलना स्टार्ट हो जाएगा। भाई पहले क्या था? करंट हमें यहां पर मिल रहा था। लेकिन अब यहीं पर करंट मिल जाएगा। तो अगर हम
टेंपरेचर को बढ़ाते हैं तो कंडक्टिविटी बढ़ जाती है। और कंडक्टिविटी बढ़ने से हमें करंट की वैल्यू हमारी क्या हो जाती
है? इनक्रीस हो जाती है। आप देख सकते हैं यहां पर करंट की वैल्यू इनक्रीस हो रही है। है ना? रिवर्स सैचुरेशन करंट में भी
क्या होता है? जब हम टेंपरेचर को बढ़ाते हैं तो रिवर्स सैचुरेशन करंट भी ज्यादा फ्लो करता है। क्योंकि अगर टेंपरेचर
बढ़ाएंगे तो कंडक्टिविटी बढ़ेगी जिसकी वजह से टेंपरे करंट ज्यादा फ्लो करेगा। तो कभी-कभी पूछ लेते हैं कि
जो हमारा VI कर्व है उस पर टेंपरेचर का क्या इफेक्ट होगा? तो यहां पर आप देख सकते हैं यह T1 टेंपरेचर का कर्व है और यह T2
टेंपरेचर का कर्व है। आप चाहे तो T3 के लिए भी बना सकते हैं। T3 का और पास में आ जाएगा तो ऐसे ही आप बना देंगे। क्लियर है?
अब आगे तो यहां पर अब हमारा जो नेक्स्ट टॉपिक स्टार्ट होगा वो होगा ब्रेकडाउन
मैकेनिज़्म। ध्यान दीजिएगा। बहुत इंपॉर्टेंट है ब्रेकडाउन मैकेनिज़्म। क्योंकि यहां से बहुत बार पूछा जाता है
व्हाट इज द डिफरेंस बिटवीन जेनर ब्रेकडाउन एंड अवेलेंस ब्रेकडाउन? तो जेनर ब्रेकडाउन और एलेंस ब्रेकडाउन के बीच का जो डिफरेंस
है ये इंपॉर्टेंट है और यूनिवर्सिटी एग्जाम में कई बार पूछा जा चुका है। तो चलिए स्टार्ट करते हैं।
ब्रेकडाउन मैकेनिज्म। देखो मैं अभी-अभी आपको बता चुका हूं ब्रेकडाउन मैकेनिज्म क्या होता है? ब्रेकडाउन मैकेनिज्म का
मतलब है कि जब हम रिवर्स बायसिंग में वोल्टेज को इंक्रीस करते जाते हैं तो एक पॉइंट ऐसा आता है जहां पर हमारा डायोड
क्या हो जाता है? फेल हो जाता है और उसी को हम कहते हैं ब्रेकडाउन मैकेनिज्म। देखो यहां पर वही ग्राफ फिर से बनेंगे।
ब्रेकडाउन मैकेनिज्म। ब्रेकडाउन मैकेनिज्म अकर इन रिवर्स बायसिंग। तो ये तो मैं आपको बता ही चुका हूं कि ब्रेकडाउन मैकेनिज्म
कहां होता है? रिवर्स बायसिंग में होता है। इफ अप्लाइड रिवर्स वोल्टेज कंटीन्यूअसली इंक्रीज। अगर हम रिवर्स
वोल्टेज को लगातार बढ़ाते जाएंगे। अ कंडीशन कम एट व्हिच करंट इंक्रीसेस एट वेरी रैपिड रेट। मतलब क्या है? इसका
समझिए। देखो रिवर्स बायसिंग में जब हम पोटेंशियल को बढ़ाते जाएंगे, बढ़ाते जाएंगे, बढ़ाते जाएंगे तो एक समय ऐसा आएगा
जब हमारा जो डायोड है वो फेल हो जाएगा। फेल होने का मतलब ये है कि रिवर्स बायसिंग में जो रिवर्स सैचुरेशन करंट है वो सडनली
इनक्रीस करेगा। आप वहां पर ग्राफ से भी देख सकते हैं। यहां पर देखो जो हमने अभी ग्राफ बनाया था ना यह देखो जब ब्रेकडाउन
होगा ना तो रिवर्स सैचुरेशन करंट सडनली इनक्रीस करेगा और बहुत तेजी से इनक्रीस करेगा। क्यों इनक्रीस करेगा वह भी अभी समझ
लेंगे। तो रिवर्स बायसिंग में रिवर्स बायसिंग में जब हमारा डायोड फेल होता है तो रिवर्स
सैचुरेशन करंट सडनली क्या करता है? इनक्रीस करता है। अब यहां पर इस बात को जरा समझिए। द रिवर्स वोल्टेज एट दिस
कंडीशन इज़ कॉल्ड ब्रेकडाउन वोल्टेज। तो जिस कंडीशन पर हमारा फेल होता है, उसको हम क्या बोलते हैं? ब्रेकडाउन वोल्टेज बोलते
हैं। जिस वोल्टेज पर फेल होता है, उसको ब्रेकडाउन वोल्टेज कहा जाता है। द ब्रेकडाउन ऑफ ए जंक्शन डायोड मे अकर थ्रू
टू डिफरेंट मैकेनिज्म। अब यहां पर ब्रेकडाउन भी दो टाइप के होते हैं। एक होता है जनरल ब्रेकडाउन, एक होता है
अवेलेंस ब्रेकडाउन और दोनों ही इंपॉर्टेंट है और एग्जाम में बहुत बार पूछे जाते हैं। अब दोनों में डिफरेंस को समझ लेते हैं।
दोनों में है क्या? देखिए यहां पर ये डायग्राम मैंने बना रखा है। है ना? यहां पर हमारे पास ये डायोड है। इसमें
हमने बैटरी लगा रखी है। अब देखो यहां पर क्योंकि हम ब्रेकडाउन मैकेनिज्म की बात कर रही कर रहे हैं। तो मैंने यहां पर फॉरवर्ड
बायसिंग वाला कर्व नहीं बनाया। केवल रिवर्स बायसिंग का कर्व बनाएं। अब यहां रिवर्स बायसिंग में भी दो तरह के
ब्रेकडाउन होते हैं। एक होता है जेनर ब्रेकडाउन, एक होता है एलेंस ब्रेकडाउन। अब इन दोनों को जरा समझ लेते हैं दोनों
होते कैसे हैं? पहले बात कर लेते हैं जेनर ब्रेकडाउन। तो देखो सबसे पहले तो आपको ये पता होना चाहिए कि जेनर ब्रेकडाउन कौन से
डायोड में होता है। तो जेनर ब्रेकडाउन ऐसे डायोड में होता है जिसमें हाई लेवल की डोपिंग होती है। ध्यान दीजिएगा। तब दिस
प्रोसेस अकर इन डायोड हैविंग हाई लेवल और डोपिंग। ऐसे डायोड जिसमें डोपिंग हाई लेवल की होगी उसमें जनरल ब्रेकडाउन होगा और
जिसमें डोपिंग लो लेवल की होगी उसमें एलेंस ब्रेकडाउन होगा। तो यहां पर डिफरेंस को भी समझते चलना।
दिस प्रोसेस अकर फॉर लो ब्रेकडाउन वोल्टेज। जो जनरल ब्रेकडाउन है वह लो वोल्टेज पर होता है। लेस देन 6 वोल्ट पे
होता है। और जो एलेंस ब्रेकडाउन होता है वह हाई वोल्टेज पर होता है। मतलब 6 वोल्ट से ज्यादा पर होता है। नेक्स्ट द
ब्रेकडाउन वोल्टेज डिक्रीज विद इंक्रीज इन टेंपरेचर। मतलब हम टेंपरेचर को बढ़ाते हैं तो ब्रेकडाउन वोल्टेज डिक्रीज होता जाता
है। क्लियर है? अब यहां पर जरा ध्यान से समझिए। एक्चुअल में होगा कैसे? देखो यहां पर हाई लेवल की डोपिंग है। अगर हाई लेवल
की डोपिंग है तो ये जो डिप्लीशन लेयर की विड्थ होगी ये कम होगी। भाई हाई लेवल की डोपिंग होगी तो डिप्लेशन लेयर की जो विड्थ
होती है वो कम होती है। क्लियर है? दूसरी अगर यह हाई लेवल की डोपिंग है तो यहां पर जो इलेक्ट्रिक फील्ड जनरेट होगा ध्यान
देना यहां पर जो इलेक्ट्रिक फील्ड जनरेट होगा उसका जो मैग्नीट्यूड होगा वो बहुत ज्यादा होगा। यानी कि यहां पर इलेक्ट्रिक
फील्ड की जो स्ट्रेंथ होगी वो हाई होगी। हाई इलेक्ट्रिक फील्ड होगा। क्या होगा? हाई इलेक्ट्रिक फील्ड होगा। ठीक है? हाई
लेवल की डोपिंग होगी। हाई इलेक्ट्रिक फील्ड होगा। अब मेरी बात को जरा ध्यान से समझना। हाई इलेक्ट्रिक फील्ड से क्या फर्क
पड़ेगा? अगर इलेक्ट्रिक फील्ड बहुत स्ट्रांग है तो क्या होगा? ये जैसे-जैसे हम रिवर्स बायसिंग में वोल्टेज को बढ़ाते
जाएंगे, वोल्टेज को बढ़ाते जाएंगे तो क्योंकि यहां पर इलेक्ट्रिक फील्ड की जो स्ट्रेंथ है वो बहुत हाई है। तो जैसे-जैसे
हम पोटेंशियल बढ़ाएंगे, इलेक्ट्रिक फील्ड और बढ़ता जाएगा। और हाई इलेक्ट्रिक फील्ड की वजह से स्ट्रांग इलेक्ट्रिक फील्ड की
वजह से क्या होगा? जो ये बीच में हमारे इमोबाइल्स आयंस होते हैं। अब मेरी बात को जरा ध्यान से समझना। ये इमोबाइल आयंस हैं।
लेकिन स्ट्रांग इलेक्ट्रिक फील्ड की वजह से स्ट्रांग इलेक्ट्रिक फील्ड की वजह से इन इमोबाइल्स आयन के जो कोवेलेंट बॉन्ड
होते हैं भाई ये जो हमारी इंप्योरिटी के ही तो आयंस हैं ये। और इंप्योरिटी के जो आयंस हैं ये कोवेलेंट बॉन्ड बनाते हैं
सिलिकॉन या जर्मेनियम के साथ में। तो इनके जो कोवेलेंट बॉन्ड होंगे वो कोवेलेंट बॉन्ड ब्रेक हो जाएंगे ड्यू टू स्ट्रांग
इलेक्ट्रिक फील्ड। यह जो हमारा स्ट्रांग इलेक्ट्रिक फील्ड है ना इस स्ट्रांग इलेक्ट्रिक फील्ड की वजह से इनके कोवेलेंट
बॉन्ड होंगे ब्रेक और जब कोवेलेंट बॉन्ड ब्रेक होंगे तो बहुत सारे इलेक्ट्रॉन और होल जनरेट होंगे और इन इलेक्ट्रॉन और
होल्स की वजह से करंट फ्लो करेगा सडनली करंट इनक्रीस करेगा और इसी को हम कहते हैं जेनर ब्रेकडाउन। तो अगर इलेक्ट्रिक फील्ड
की वजह से कोवेलेंट बॉन्ड ब्रेक होते हैं तो उसको कहा जाता है जेनर ब्रेकडाउन। तो वहां पर रिवर्स सैचुरेशन करंट क्या होता
है? सडनली इनक्रीज हो जाता है। बोलो बात समझ में आ गई? वही सब कुछ यहां पर लिखा हुआ है। इन हैवली डोप डायोड डिप्लिशन लेयर
थिन होती है। इलेक्ट्रिक फील्ड हाई होता है। है ना? दिस स्ट्रांग इलेक्ट्रिक फील्ड पुल द वैलेंस इलेक्ट्रॉन इंटू द कंडक्शन
बैंड। अब ये स्ट्रांग इलेक्ट्रिक फील्ड क्या करेगा? जो कोवेलेंट बॉन्ड के इलेक्ट्रॉन हैं उनको पुल करेगा और कंडक्शन
बैंड में लेके जाएगा बाय ब्रेकिंग देयर कोवेलेंट बॉन्ड। उनके कोवेलेंट बॉन्ड को ब्रेक करके। दिस इलेक्ट्रॉन देन बिकम
फ्री। अब ये इलेक्ट्रॉन फ्री हो गए और ये कंडक्शन कर सकते हैं। है ना? कंडक्शन कर सकते हैं। जिसकी वजह से यहां पर क्या
होगा? लार्ज अमाउंट में रिवर्स सैचुरेशन करंट फ्लो करेगा। और इस ब्रेकडाउन को हम कहेंगे जेनर ब्रेकडाउन। डायग्राम आप यहां
पर देख सकते हैं। ये हमारा जेनर ब्रेकडाउन का वीआई कररेक्टरिस्टिक्स कर्व है। बात समझ में आ रही है? ये हमारा जेनर का। अब
देखो मैंने दोनों के डायग्राम एक जगह बना रखे थे। जो जेनर ब्रेकडाउन होता है वो पहले होता
है। एलेंस ब्रेकडाउन बाद में होता है। क्योंकि एलेंस ब्रेकडाउन जो होता है वो हाई पोटेंशियल पर होता है। ये थोड़ा सा लो
पोटेंशियल पर होता है। दोनों में डिफरेंस समझ में आ गया? चैनल ब्रेकडाउन कब होगा? जब डोपिंग हाई लेवल की होगी। एलेंस
ब्रेकडाउन कब होगा? जब डोपिंग लो लेवल की होगी। अब देखो यहां पर डोपिंग लो लेवल की है। एलेंस ब्रेकडाउन डोपिंग क्या है? कम
है। यहां पर लो लेवल की डोपिंग है। अब इसको जरा ध्यान से समझिए। अगर यहां पर लो लेवल की डोपिंग है तो इसका मतलब यहां पर
जो इलेक्ट्रिक फील्ड होगा वो स्ट्रांग नहीं होगा। वीक इलेक्ट्रिक फील्ड होगा। डिप्लेशन लेयर की विड्थ भी ज्यादा होगी।
है ना? तो यहां पर वीक इलेक्ट्रिक फील्ड है। इसका मतलब यहां पर इलेक्ट्रिक फील्ड कोवेलेंट बॉन्ड को ब्रेक नहीं कर पाएगा।
तो ये जो ब्रेकडाउन है ये इलेक्ट्रिक फील्ड की वजह से नहीं होगा। जनरल ब्रेकडाउन इलेक्ट्रिक फील्ड की वजह से
होता है। ये इलेक्ट्रिक फील्ड की वजह से नहीं होगा। तो फिर कैसे होगा? अब इस बात को ध्यान से समझिए। देखिए इलेक्ट्रिक
फील्ड की वजह से यहां पर कोई ब्रेकडाउन नहीं हो रहा। लेकिन जैसे-जैसे जैसे-जैसे हम अप्लाइड पोटेंशियल को बढ़ाते जाएंगे,
अप्लाइड पोटेंशियल को इनक्रीस करते जाएंगे। इससे क्या होगा? यहां पर जो माइनॉरिटी कैरियर्स हैं, माइनॉरिटी
कैरियर्स भाई माइनॉरिटी कैरियर्स तो रिवर्स बायसिंग में फ्लो करते हैं ना। मैं पढ़ा चुका हूं कि रिवर्स बायसिंग में
माइनॉरिटी कैरियर फ्लो करते हैं। तो जैसे-जैसे हम इसकी वैल्यू बढ़ाते जाएंगे, माइनॉरिटी कैरियर्स की जो स्पीड है, वो
बढ़ती जाएगी, वेलोसिटी बढ़ती जाएगी। इसका मतलब जो माइनॉरिटी कैरियर्स हैं वो हाई वेलोसिटी फ्लो करेंगे अगर हम वोल्टेज को
बढ़ाएंगे और ये जो हाई वेलोसिटी से हमारे माइनॉरिटी कैरियर फ्लो कर रहे हैं ये माइनॉरिटी कैरियर्स जब इन ईोबाइल आयन से
टकराएंगे तो ये क्या करेंगे? ये जो ई मोबाइल आयन के कोवेलेंट बॉन्ड है ना जो इलेक्ट्रॉन बॉन्ड में पार्टिसिपेट कर रहे
हैं। जब ये हमारे माइनॉरिटी कैरियर इनके साथ स्ट्राइक करेंगे तो ये माइनॉरिटी कैरियर्स क्या करेंगे? अपनी एनर्जी को
अपनी एनर्जी को इलेक्ट्रॉन को दे देंगे। कौन से इलेक्ट्रॉन को? जो यहां पर बॉन्ड बना रहे हैं। उसकी वजह से क्या होगा? जब
इलेक्ट्रॉन को एनर्जी मिलेगी तो वो क्या करेंगे? बॉन्ड को तोड़ देंगे और बॉन्ड से बाहर आ जाएंगे। तो कहने का मतलब यह है जब
हम पोटेंशियल बढ़ाते जाएंगे और पोटेंशियल को इनक्रीस करने की वजह से माइनॉरिटी कैरियर की वेलोसिटी बढ़ेगी है ना उनकी
एनर्जी बढ़ेगी तो वो क्या करेंगे इन कोवेलेंट बॉन्ड को ब्रेक करेंगे और जब कोवेंट बॉन्ड ब्रेक होंगे तो बहुत सारे
इलेक्ट्रॉन और होल क्या होंगे प्रोड्यूस होंगे जिसकी वजह से रिवर्स सैचुरेशन करंट फ्लो करेगा तो अब आपको दोनों में समझ में
आ गया होगा कि जनरल डायोड में ब्रेकडाउन होता है इलेक्ट्रिक फील्ड की वजह से और जो हमारा एवेंस ब्रेकडाउन ये हमारा होता है
माइनॉरिटी कैरियर्स की वजह से क्योंकि माइनॉरिटी कैरियर्स की जो एनर्जी है वो बहुत ज्यादा बढ़ जाती है और उसी एनर्जी से
ये जो हमारे इमोबाइल आयंस हैं इनके बॉन्ड हो जाते हैं ब्रेक और बहुत सारे इलेक्ट्रॉन और होल क्या होते हैं? जनरेट
होते हैं। जिसकी वजह से रिवर्स सैचुरेशन करंट क्या करता है? फ्लो करता है। अब ये हमारा एवेलेंस ब्रेकडाउन का कर्व है। आप
देख सकते हैं ये हाई पोटेंशियल पर हो रहा है। जबकि जेनर ब्रेकडाउन लो पोटेंशियल पर होता है। ये कहां पर हो रहा है? हाई
पोटेंशियल पर और जेनर के केस में जो हमारा करंट इनक्रीस होता है वो एकदम शार्प होता है। मतलब एकदम इनक्रीस होता है। जबकि यहां
पर थोड़ा सा ग्रेजुअली इनक्रीस होता है। आप देख सकते हैं ये कर्व थोड़ा सा ग्रेजुअल है। एक और इंपॉर्टेंट चीज मैं
यहां पर आपको बता दूं। ये जो हमारा जेनर ब्रेकडाउन है ये आगे हम फिर से पढ़ेंगे। कहां पर? जेनर डायोड में फिर से आएगा। तो
यह जो हमारा जेनर ब्रेकाउन है, जेनर ब्रेकाउन की जो एप्लीकेशन है, वह जेनर डायोड है। और मैं आपको बता दूं कि रिवर्स
जो हमारा रेगुलेटर होता है, वोल्टेज रेगुलेटर वोल्टेज रेगुलेटर जिसको हम जेनर डायोड भी कहते हैं। तो वोल्टेज रेगुलेटर
जेनर ब्रेकडाउन रीजन में ही काम करता है। जेनर ब्रेकडाउन रीजन में ही वर्क करता है। तो जब हम जेनर डायोड पढ़ेंगे तो वहां पर
भी हम जेनर ब्रेकडाउन की बात करेंगे। तो यह कर्व मैं आपको जेर डायोड में फिर से बताऊंगा। तो यहां पर अगर आपको समझ में आ
गया तो आगे आपको कोई दिक्कत नहीं होगी। क्लियर है? चलिए तो यहां पर ये जनरल ब्रेकडाउन और अवेलेंस ब्रेकडाउन का मैंने
डिफरेंस लिखा है। क्योंकि यूनिवर्सिटी एग्जाम में बहुत बार दोनों का डिफरेंस पूछा जाता है। तो जितने भी पॉइंट मैंने
बताए हैं वो सारे पॉइंट मैंने यहां पर लिख दिए हैं। एक बार आप पढ़ोगे सब आपको समझ में आ जाएंगे। क्लियर है? चलिए तो यहां पर
हमारा ब्रेकडाउन मैकेनिज्म हो गया कंप्लीट। नाउ अब नेक्स्ट टॉपिक देखिए क्या है?
इक्विवेलेंट सर्किट ऑफ ए डायोड। अब यहां पर हम डायोड का इक्विवेलेंट सर्किट बनाएंगे। है ना? देखो ये भी अगेन एक दो
बार यूनिवर्सिटी एग्जाम में पूछा गया है कि राइट डाउन द इक्विवेलेंट सर्किट ऑफ ए डायोड। तो अगर आपसे डायोड के इक्विवेलेंट
सर्किट पूछे जाते हैं तो आप यहां पर डायोड के इक्विवेलेंट सर्किट बना सकते हैं। तीन इक्विवेलेंट सर्किट होते हैं डायोड के। अब
ध्यान दीजिएगा कौन-कौन से। पहला होता है पीस वाइज लीनियर इक्विवेलेंट सर्किट। मतलब पीस वाइज लीनियर इक्विवेलेंट सर्किट। इसका
मतलब क्या है? इसका मतलब ये है कि जो हमारे डायोड की नॉन लीनियर कररेक्टरिस्टिक्स होती है, नॉन लीनियर
कररेक्टरिस्टिक्स उसको हम स्ट्रेट लाइन से रिमूव कर देते हैं। कैसे? जैसे आपने फॉरवर्ड बायस में देखा था। फॉरवर्ड बायस
में जो हमारा कर्व था, कर्व की फॉर्म में हमारा जो करंट था वो एक्सप्पोनेंशियल फॉर्म में इंक्रीस कर रहा था। तो मतलब
एक्सप्पोनेंशियल का मतलब क्या हो गया? कि कररेक्टरिस्टिक्स कैसी है? नॉन लीनियर है। लेकिन जो हमारा पीस वाइज लीनियर
इक्विवेलेंट सर्किट होता है डायोड का उसमें हम नॉन लीनियर कर्व को स्ट्रेट लाइन से क्या कर देते हैं? रिमूव कर देते हैं।
सो रेजिस्टेंस ऑफ़ द डायोड इज़ कांस्टेंट। जिसकी वजह से हमारे डायोड का जो रेजिस्टेंस होता है वो कांस्टेंट हो जाता
है। है ना? तो अब यहां पर जरा ध्यान देना। ये हमारा डायोड है फॉरवर्ड बायसिंग में। डायोड इज रिप्लेस्ड बाय ए बैटरी विद
रेजिस्टेंस इन सीरीज। तो अगर आप इस डायोड का पीस वाइज लीनियर इक्विवेलेंट सर्किट बनाना चाहते हैं तो कैसे बनेगा? इस डायोड
को आप रिप्लेस कर देंगे एक बैटरी से। अब इस बैटरी का पोटेंशियल कितना होगा? इस बैटरी का पोटेंशियल उतना ही होगा जितना इस
डायोड का बैरियर पोटेंशियल है। अगर ये सिलिकॉन का डायोड है तो V की वैल्यू 0.7 होगी। और अगर ये जर्मेनियम का है तो V की
वैल्यू 0.3 होगी। बोलो बात समझ में आ रही है? ठीक है? अब यहां पर यह हमारा क्या है? यह हमारा फॉरवर्ड रेजिस्टेंस है। तो डायोड
का रेजिस्टेंस है। और अगर हम इसके VI को ड्रॉ करें तो कुछ इस तरीके से डॉ होगी। देखो ये हमारा V और ये X I है ना? तो यहां
पर देखो जब तक हमारा बैरियर पोटेंशियल के बराबर अप्लाइड पोटेंशियल नहीं होता तब तक करंट ज़ीरो रहेगा। उसके बाद लीनियरली
इंक्रीस करेगा। क्योंकि हमने यहां पर नॉन लीनियर कर्व को स्ट्रेट लाइन से क्या कर दिया? रिमूव कर दिया। सिलिकॉन के केस में
V की वैल्यू7 होगी। जर्मेनियम के केस में 3 होगी। दूसरा सिंपलीफाइड इक्विवेलेंट सर्किट। अब देखो
सिंपलीफाइड में हम क्या करते हैं? ध्यान से समझना। जो हमारा डायोड होता है ना उसका जो रेजिस्टेंस होता है वो बहुत कम होता
है। मतलब हम रेजिस्टेंस को नेगलेक्ट भी कर सकते हैं। तो अगर हम डायोड से अगर हम डायोड से इस रेजिस्टेंस को नेगलेक्ट कर
दें। नेगलेक्ट कर दें इसको रिमूव कर दें। तो हमारा जो सर्किट बनता है उसको हम कहते हैं सिंपलीफाइड इक्विवेलेंट सर्किट। मतलब
RF को ज़ीरो मान लेना है। तो, यहां पर क्या होगा? जो हमारा डायोड है, वह सिंपली एक बैटरी से रिमूव हो जाएगा। और इस बैटरी का
पोटेंशियल कितना होगा? अगर सिलिकॉन का है तो 0.7, जर्मेनियम का है तो 0.3 और अगर इसका आपको कर्व बनाना है तो क्योंकि हमने
यहां पर रेजिस्टेंस को हटा दिया तो अब क्या होगा? अगर रेजिस्टेंस को हटा देंगे तो हमारी ये वर्टिकल लाइन आ जाएगी।
क्योंकि रेजिस्टेंस की वजह से क्या हो रहा था? हमारी इंक्लाइंड लाइन आ रही थी। आगे बढ़ते हैं। थर्ड नाउ इक्विवेलेंट सर्किट ऑफ़
एन आइडियल डायोड। मतलब हम यहां पर आइडियल डायोड की बात कर रहे हैं। तो अगर आइडियल डायोड का इक्विवेलेंट सर्किट बनाना है तो
कैसे बनेगा? अब मेरी बात को ज़रा ध्यान से समझना। अगर डायोड आइडियल है तो डायोड में हम रेजिस्टेंस को भी ज़ीरो लेंगे और नी
वोल्टेज को भी ज़ीरो लेंगे। भाई आइडियल का मतलब क्या है? आइडियल का मतलब ये है कि कोई बैरियर पोटेंशियल नहीं है। बैरियर
पोटेंशियल को हमने क्या अस्यूम कर लिया? ज़ीरो। देखिए बैरियर पोटेंशियल कभी भी ज़ीरो नहीं होता। क्योंकि बैरियर पोटेंशियल कम
होता है इसलिए हम उसको जीरो अस्यूम कर सकते हैं। तो जो हमारा आइडियल डायोड होता है, आइडियल डायोड में हम डायोड का
रेजिस्टेंस भी जीरो लेते हैं और हम डायोड का बैरियर पोटेंशियल भी जीरो लेंगे। तो सीधी सी बात है यहां पर RF भी ज़ीरो लेंगे,
V भी ज़ीरो लेंगे। है ना? तो यहां पर हमारा जो और हमारा यहां पर जो रिवर्स सैचुरेशन करंट होगा वो भी ज़ीरो होगा। सब यहां पर
ज़ीरो लेंगे। तो जो हमारा आइडियल डायोड होता है आइडियल डायोड वो परफेक्ट स्विच की तरह काम करता है। अब देखो कैसे भाई सीधी
सी बात है यह हमारा डायोड है। हम इसको फॉरवर्ड बायस में यूज़ कर रहे हैं। तो अगर फॉरवर्ड बायस में यूज़ कर रहे हैं तो इसका
रेजिस्टेंस क्या है? ज़ीरो। इसका बैरियर पोटेंशियल क्या है? ज़ीरो। तो सीधी सी बात है जब इसका रेजिस्टेंस भी ज़ीरो है। बैरियर
पोटेंशियल भी ज़ीरो है तो ये तो क्लोज स्विच की तरह काम करेगा ना। मतलब यहां से तो करंट फ्लो करेगा आराम से। क्योंकि यहां
पर कोई बैरियर है ही नहीं। तो जो हमारा आइडियल डायोड होता है वो फॉरवर्ड बायसिंग में स्विच की तरह काम करता है। क्लोज
स्विच मतलब शॉर्ट सर्किट। या तो क्लोज स्विच कहेंगे या शॉर्ट सर्किट कहेंगे। कब? फॉरवर्ड बायस में। और अगर हम आइडियल डायोड
को रिवर्स बायस में यूज़ करें तो सीधी सी बात है आइडियल डायोड है और हम रिवर्स में कह रहे हैं। तो रिवर्स बायस में अगर इसको
यूज़ करेंगे और आइडियल है तो रिवर्स सैचुरेशन करंट ज़ीरो होगा। इसका मतलब कोई करंट फ्लो नहीं करेगा। रिवर्स सैचुरेशन भी
नहीं करेगा। तो अगर रिवर्स सैचुरेशन करंट भी फ्लो नहीं कर रहा तो इसका मतलब ये है कि आइडियल डायोड को रिवर्स बायस में हम
ओपन स्विच की तरह काम कर सकते हैं। जिसको हम कह सकते हैं ओपन सर्किट। तो ये तीन हमारे इक्विवेलेंट सर्किट सर्किट होते हैं
डायोड के। और इसमें तीसरा सबसे इंपॉर्टेंट है क्योंकि मैक्सिमम जगह पर हम डायोड को आइडियल मान लेते हैं। तो अगर हमारा डायोड
आइडियल है तो शॉर्ट सर्किट होगा और अगर मतलब अगर हमारा डायोड आइडियल है तो फॉरवर्ड बायसिंग में शॉर्ट सर्किट होगा।
रिवर्स बायसिंग में ओपन सर्किट होगा। अगर आप इसका वीआई कर्व बनाएं आइडियल डायोड का। कभी-कभी आइडियल डायोड का वीआई कर्व पूछ
लेते हैं। तो देखो अगर आप आइडियल डायोड का वीआई कर्व बनाएंगे। अब क्योंकि यहां पर नी वोल्टेज भी ज़ीरो है। यहां पर रेजिस्टेंस
भी सब कुछ जीरो है। तो इसका कर्व कैसे बनेगा भाई? यहां पर सीधे-सीधे V इनक्रीस करेगा और रिवर्स सैचुरेशन करंट में आप देख
सकते हैं कोई रिवर्स सैचुरेशन करंट यहां पर फ्लो नहीं करेगा। कोई वोल्टेज ड्रॉप यहां पर नहीं होगा। तो ये कर्व बनेगा
हमारा आइडियल डायोड के केस में। आगे बढ़ते हैं। नाउ डायोड कॉन्फ़िगरेशन। अब हमारे सिलेबस का नेक्स्ट टॉपिक है डायोड
कॉन्फ़िगरेशन। है ना? तो डायोड कॉन्फ़िगरेशन का यहां पर मतलब क्या है? देखिए डायोड कॉन्फ़िगरेशन दो टाइप की है। एक है सीरीज
कॉन्फ़िगरेशन और दूसरा है पैरेलल कॉन्फ़िगरेशन। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा रेजिस्टेंस नहीं होता। सीरीज रेजिस्टेंस
और पैरेलल रेजिस्टेंस। बिल्कुल सब कुछ सेम है। तो डायोड कॉन्फ़िगरेशन का मतलब है कि डायोड को हम सीरीज में भी यूज़ कर सकते
हैं, पैरेलल में भी यूज़ कर सकते हैं। जैसे कि हमारा रेजिस्टेंस सीरीज में भी होते हैं और पैरेलल में भी होते हैं। और ये
बिल्कुल रेजिस्टेंस की तरह ही है। देखो, डायोड आर कनेक्टेड एंड टू एंड। अगर हमारे डायोड सीरीज में है तो इसका मतलब वो एंड
टू एंड कनेक्टेड है। जैसे रेजिस्टेंस कनेक्ट होते हैं ना एंड टू एंड वैसे ही कनेक्ट होंगे। सेम करंट फ्लो अगर डायोड
सीरीज में कनेक्टेड है तो सभी डायोड से सेम करंट फ्लो करेगा। जैसे रेजिस्टेंस अगर सीरीज में होते हैं तो सेम करंट फ्लो करता
है। और जो वोल्टेज ड्रॉप होगा वो देखो जितने डायोड आप लगाओगे सभी का वोल्टेज ड्रॉप ऐड कर दो तो टोटल वोल्टेज ड्रॉप आ
जाएगा। आपने देखा होगा जब सीरीज में रेजिस्टेंस होते हैं, जब सीरीज में रेजिस्टेंस लगे होते हैं, तो सबका वोल्टेज
ड्रॉप अपना अलग-अलग होता है। जब हम सबको ऐड कर देते हैं, तो हमारे पास टोटल वोल्टेज ड्रॉप आ जाता है। पैरेलल
कॉन्फ़िगरेशन तो यहां पर क्या होगा? जो हमारे डायोड होंगे वो पैरेलल कनेक्टेड होंगे। मतलब साइड बाय साइड होंगे। और आपको
मालूम है पैरेलल में करंट क्या होता है? करंट डिवाइड हो जाता है। है ना? और वोल्टेज पैरेलल में क्या रहता है? सेम
रहता है। तो सेम चीज यहां पर है। तो जो डायोड की कॉन्फ़िगरेशन होती है, दो कॉन्फ़िगरेशन होती है सीरीज़ और पैरेलल। और
बिल्कुल जैसा रेजिस्टेंस होता है सीरीज़ में, वैसे ही डायोड भी सीरीज़ में होता है। और पैरेलल में जैसे रेजिस्टेंस होते हैं,
वैसे ही पैरेलल में डायोड भी होते हैं। बोलो बात समझ? देखिए, इनके ऊपर बेस्ड न्यूमेरिकल जो नोट्स है ना, नोट्स के अंदर
इनके ऊपर बेस्ड न्यूमेरिकल भी होंगे। लेकिन ज्यादा इंपॉर्टेंट नहीं है। इसलिए न्यूमेरिकल मैंने यहां पर नहीं लिए हैं।
नाउ किरचॉफ्स लॉ। अब देखो यहां पर मैं आपको किरचॉल्स लॉ क्यों बताने जा रहा हूं? क्योंकि यूनिट नंबर वन के जो न्यूमेरिकल
है चाहे क्लिपर क्लैंपर के न्यूमेरिकल हो या जेनर डायोड के न्यूमेरिकल हो या किसी भी टॉपिक के न्यूमेरिकल हो वहां पर आपको
किरचॉफ्स लॉ को अप्लाई करना ही होगा। मतलब किचॉफ्स लॉ यूनिट नंबर वन के मैक्सिमम न्यूमेरिकल में अप्लाई होगा। इसलिए आपको
पता होना चाहिए किचॉफ्स लॉ क्या होता है? किरचॉफ्स लॉ आप क्लास 12th में भी बहुत पढ़ चुके हैं। है ना? और बीटेक में भी आप
पढ़ रहे होंगे। जैसे कि आप लोग इलेक्ट्रिकल में इसको पढ़ते हैं। तो किरचॉफ्स लॉ एक बात समझ लेते हैं। है
क्या? देखिए दो लॉ होते हैं। एक होता है क्रचॉफ्स करंट लॉ। दूसरा होता है क्रचॉफ्स वोल्टेज लॉ। बहुत इंपॉर्टेंट है। यूज़ बहुत
होता है इनका। यूनिट वन में भी यूज़ होता है और आगे चलके जब हम यूनिट नंबर थ्री पढ़ेंगे तो वहां पर भी यूज़ होगा। पढ़ेंगे
क्या? हम पढ़ चुके हैं यूनिट नंबर थ्री। है ना? तो किरचॉफ्स करंट लॉ। किरचॉफ वोल्टेज लॉ। अब जरा इनको ध्यान से समझिए। देखिए
किरचॉफ्स करंट लॉ क्या कहता है? एट एनी जंक्शन। अगर मान लीजिए कोई भी एक जंक्शन है। जैसे फ़ॉर एग्ज़ांपल मैं यहां पर बना
देता हूं। यह मान लीजिए हमारा जंक्शन है। है ना? तो यहां पर ये जंक्शन है। जंक्शन मतलब जहां
पर तीन या तीन से ज्यादा वायर कनेक्ट होते हैं। तो ये हमारा जंक्शन है। अगर मान लीजिए यहां से करंट फ्लो कर रहा है I तो
ये करंट सीधी सी बात है दो पार्ट में डिवाइड हो जाएगा। एक इधर जाएगा और एक इधर जाएगा। I1 I2 तो कहने का मतलब यह है कि
किसी भी जंक्शन पर जितना करंट आता है उस जंक्शन से उतना ही करंट जाता है। मतलब यहां पर इनकमिंग करंट जितना होगा उतना ही
आउटगोइंग करंट भी होगा। तो मैं यहां पर कह सकता हूं कि जो I की वैल्यू है वो I1 + I2 है। और यही हमारा किरचॉफ्स करंट लॉ है।
देखो सम ऑफ़ करंट एंटरिंग द जंक्शन। जंक्शन पे जितना करंट एंटर कर रहा है उन सबका सम और जितना करंट जंक्शन से बाहर जा रहा है
उनका सम। अगर मान लीजिए मैं यहां पर एक करंट और अप्लाई कर देता हूं। यह हमारा I1 I2 है। है ना? और इसको मैं मान लेता
हूं ये I3 है। ये I4 है। तो इस केस में देखो ये दोनों के दोनों हो गए इनकमिंग करंट। और ये दोनों हो गए आउटगोइंग करंट।
तो इस केस में हमारा I3 + I4 ये इनकमिंग है और आउटगोइंग कौन-कौन से हैं? I1 + I2। ये हमारा होता है किचॉफ्स करंट लॉ। जो
जंक्शन पे अप्लाई होता है। जंक्शन पे। जंक्शन मतलब जहां पर तीन या तीन से ज्यादा वायर क्या हो रहे हैं? कनेक्ट हो रहे हैं।
तो अब आपको समझ में आ गया होगा व्हाट इज किरचॉसफ्स करंट लॉ? बहुत यूज़ करेंगे आगे चल के न्यूमेरिकल में। नेक्स्ट है किचॉफ्स
वोल्टेज लॉ। है ना? किरचॉफ्स वोल्टेज लॉ। अब इसको समझना भी बहुत जरूरी है क्योंकि क्रचॉफ्स वोल्टेज लॉ का यूज़ क्रचॉफ्स करंट
लॉ से भी ज्यादा होगा। अब इसको समझिए। इसमें क्या है? देखिए। अलजेब्रिक सम ऑफ़ चेंज इन पोटेंशियल अराउंड अ क्लोज्ड लूप
इज़ ज़ीरो। मतलब अगर आप किसी क्लोज लूप में हैं। क्लोज लूप क्या होता है? जब न्यूमेरिकल करेंगे सब समझ में आ जाएगा। तो
देखिए क्लोज लूप में जो वोल्टेज का सम होता है वो ज़ीरो होता है। वही चीज़ यहां पर लिखी गई है। सम ऑफ़ चेंज इन पोटेंशियल
अराउंड ए क्लोज लूप। क्लोज लूप के अराउंड सम ऑफ़ पोटेंशियल जो होता है वो ज़ीरो होता है। है ना? तो बस आपको कुछ नहीं करना। जिस
लूप में भी आप जिस लूप को भी आप स्टडी कर रहे हैं उस लूप के अंदर जितने भी पोटेंशियल लगे हुए हैं, सबको ऐड कर दो और
सबका सम कर दो ज़ीरो। तो वो क्या आ जाएगा हमारा? फिरस वोल्टेज लॉ आ जाएगा। लेकिन प्रॉब्लम यहां पर कहां पर आती है?
प्रॉब्लम आती है साइन में। भाई मान लीजिए किसी लूप के अंदर चार पोटेंशियल लगे हुए हैं। तो आपको उन चारों का साइन देखना
पड़ेगा कि साइन क्या है? कुछ पॉजिटिव होंगे, कुछ नेगेटिव होंगे। तो हमें कैसे पता चलेगा कौन सा पॉजिटिव है, कौन सा
नेगेटिव है? तो अब जरा ध्यान देना। आप जो लूप है आप लूप को क्लॉकवाइज भी ले सकते हैं, एंटीक्लॉकवाइज भी ले सकते हैं। तो
सबसे पहले तो आपको लूप की डायरेक्शन डिसाइड करनी पड़ेगी कि आप क्लॉकवाइज ले रहे हैं या एंटीक्लॉकवाइज ले रहे हैं। अगर
मान लीजिए आपने क्लॉकवाइज एंटीक्लॉकवाइज दोनों में से किसी को भी ले सकते हैं। आपने अगर क्लॉकवाइज लिया है तो आप
क्लॉकवाइज डायरेक्शन में चलेंगे। और क्लॉकवाइज डायरेक्शन में चलते समय आपको ध्यान क्या रखना है कि अगर आप नेगेटिव से
पॉजिटिव की तरफ जा रहे हैं तो उस पोटेंशियल को पॉजिटिव लेंगे और अगर आप पॉजिटिव से नेगेटिव की तरफ जा रहे हैं तो
उस पोटेंशियल को आप नेगेटिव लेंगे। बस इतना ही ध्यान रखना है। अगर आप नेगेटिव से पॉजिटिव की तरफ जा रहे हैं तो उसको
पॉजिटिव लेंगे। और अगर आप पॉजिटिव से नेगेटिव की तरफ जा रहे हैं उसको नेगेटिव लेंगे। मतलब आप जिसकी तरफ जा रहे हैं वही
साइन हो जाएगा आपके पोटेंशियल का। बोलो बात समझ में आ रही है? यहां पर बस आपको दो बातें पता होनी चाहिए कि जो करंट है वह
हमेशा हाई पोटेंशियल से मतलब पॉजिटिव से नेगेटिव की तरफ फ्लो करता है और लूप आप कुछ भी ले सकते हैं क्लॉकवाइज भी ले सकते
हैं एंटीक्लॉकवाइज भी ले सकते हैं। तो बाकी जब किचॉफ्स लॉ को हम न्यूमेरिकल में अप्लाई करेंगे तो आपको और अच्छे से समझ
में आ जाएगा। क्लियर है? चलिए अब हमारा स्टार्ट होता है नेक्स्ट टॉपिक दैट इज़ हाफ वेव रेक्टिफायर। हाफ वेव
रेक्टिफायर। तो यहां से अब हम रेक्टिफायर को स्टार्ट करने जा रहे हैं। तो हाफ वेव रेक्टिफायर पढ़ेंगे, फुल वेव रेक्टिफायर
पढ़ेंगे। है ना? तो जल्दी से यहां पर स्टार्ट करते हैं। अब हाफ वेव रेक्टिफायर को। नाउ देखिए हाफ वेव रेक्टिफायर। तो
यहां पर देखो अभी तक मैं सिलेबस में क्या-क्या कंप्लीट कर चुका हूं। हमारा सेमीकंडक्टर डायोड वाला ये पूरा टॉपिक
कंप्लीट हो चुका है। हैं? इसमें हम सब कुछ कंप्लीट कर चुके हैं। डायोड एप्लीकेशन में हम डायोड की कॉन्फ़िगरेशन को कंप्लीट कर
चुके हैं। अब हम रेक्टिफायर को स्टार्ट करने जा रहे हैं। है ना? और रेक्टिफायर के बाद हमारा स्टार्ट होगा क्लिपर एंड
क्लैंपर। चलिए नाउ रेक्टिफायर। तो देखिए रेक्टिफायर की अगर हम बात करें रेक्टिफायर है क्या? अ
रेक्टिफायर इज एन इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस व्हिच इज यूज्ड टू कन्वर्ट एसी इंटू पलसेटिंग डीसी बाय यूजिंग वन और मोर
डायोड। रेक्टिफायर की हेल्प से हम एसी को पलसेटिंग डीसी में कन्वर्ट कर सकते हैं। अब देखो यहां पर वर्ड लिखा है पलसेटिंग।
मतलब हम एसी को प्योर डीसी में कन्वर्ट नहीं कर सकते रेक्टिफायर से। रेक्टिफायर की हेल्प से हम प्योर एसी को पलसेटिंग
डीसी में कन्वर्ट कर सकते हैं। बोलो बात समझ में आ रही है? अगर आपको एसी को प्योर डीसी में कन्वर्ट करना है तो उसके लिए
रेक्टिफायर के साथ-साथ कुछ और डिवाइस का भी यूज़ करना पड़ता है। जैसे कि आप ऊपर देख सकते हैं। मान लीजिए आपके पास एसी है।
है ना? 230 वोल्ट 50 हz या 220 वोल्ट भी यहां लिख सकते हैं। 220 वोल्ट 50 हz की आपके पास एसी है। तो उसके लिए आपको
क्या-क्या लगाना पड़ेगा? पहले एक ट्रांसफार्मर लगाना पड़ेगा। है ना? अब ये जो ट्रांसफार्मर होता है ये स्टेप डाउन
ट्रांसफार्मर होता है। उसके बाद रेक्टिफायर लगेगा। तो ये रेक्टिफायर और ट्रांसफार्मर दोनों मिलकर के एसी को
पलसेटिंग डीसी में कन्वर्ट कर देंगे। बोलो बात समझ में आ रही है? मतलब यहां पर जो रेक्टिफायर है ये एसी को पलसेटिंग डीसी
में कन्वर्ट कर देगा। और यह जो ट्रांसफार्मर लगा है ना यह इंसुलेशन प्रोवाइड करता है। उसके बाद यहां पर लगा
होता है एक फिल्टर। फिल्टर क्या करता है? यहां पर जो हमारे पास पलसेटिंग डीसी आई है इसको फिल्टर करता है। उसके बाद एक लगा
होता है रेगुलेटर। तो रेगुलेटर के बाद हमें प्योर डीसी मिलती है। तो कहने का मतलब ये है कि अगर एसी को हमें प्योर डीसी
में कन्वर्ट करना है तो हमें क्या-क्या चाहिए? ट्रांसफार्मर चाहिए, रेक्टिफायर चाहिए, फिल्टर चाहिए, रेगुलेटर चाहिए?
लेकिन यहां पर हम केवल रेक्टिफायर पढ़ेंगे। हम फिल्टर और रेगुलेटर को अभी नहीं पढ़ रहे हैं। बोलो बात समझ में आ गई
ना? तो रेक्टिफायर का काम क्या है? एसी को पर्सेंटेड डीसी में कन्वर्ट करना। अब ये रेक्टिफायर दो टाइप के हैं। हाफ वेव
रेक्टिफायर फुल वेव रेक्टिफायर। अब यहां पर एक चीज मैं आपको क्लियर कर दूं। जो हमारा एसी होता है एसी
अल्टरनेटिंग करंट या अल्टरनेटिंग वोल्टेज। आपको अच्छे से मालूम है हमारा जो एसी होता है या एसी करंट या एसी वोल्टेज होता है वो
जनरली साइन वेव की फॉर्म में होता है। इस तरह से यहां से स्टार्ट साइन वेव की फॉर्म में होता है। इस तरह से
ये तो आपको मालूम है ना ये हमारा क्या है? AC है। अब इसमें देखो जब हमारा कर्व X एक्सिस के ऊपर होता है तो इसको हम बोलते
हैं पॉजिटिव हाफ। देखो हमारी एक साइकिल कहां पर खत्म होगी? साइकिल यहां से स्टार्ट होगी और यहां पर जाकर के खत्म
होगी। यहां पर हमारी एक साइकिल क्या हो जाती है? कंप्लीट हो जाती है। तो आप इसमें देख सकते हैं इसमें आधी साइकिल तो पॉजिटिव
है और आधी साइकिल क्या है? नेगेटिव है। मतलब एक साइकिल के अंदर आधी पॉजिटिव साइकिल होती है। आधी नेगेटिव साइकिल होती
है। अगेन ये पॉजिटिव है। फिर आपसे नेगेटिव आ जाएगी। यहां पर ये नेगेटिव साइकिल पॉजिटिव साइकिल नेगेटिव साइकिल पॉजिटिव
साइकिल। तो ऊपर वाला जो पार्ट होता है यह पॉजिटिव है। नीचे वाला जो पार्ट होता है नेगेटिव है। तो जो अल्टरनेटिंग करंट होता
है उसमें पॉजिटिव हाफ साइकिल होती है और पॉजिटिव नेगेटिव हाफ साइकिल होती है। बोलो बात समझ में आ रही है? पॉजिटिव हाफ साइकिल
एंड नेगेटिव हाफ साइकिल। तो रेक्टिफायर दो टाइप के हो गए। हाफ वेव रेक्टिफायर एंड फुल वेव रेक्टिफायर।
क्लियर है? तो हाफ वेव रेक्टिफायर आपको समझ में आ गया होगा। है ना? मतलब अभी हम इसको समझेंगे। समझ में नहीं आया। हाफ वेव
रेक्टिफायर एंड फुल वेव रेक्टिफायर। अब जरा यहां पर ध्यान देना दोनों में अंतर क्या है? पहले दोनों का अंतर समझ लेते
हैं। हाफ वेव और फुल वेव। जो हाफ वेव रेक्टिफायर होता है वो एसी की पॉजिटिव हाफ साइकिल को कन्वर्ट करता है। नेगेटिव को
कन्वर्ट नहीं करता है। और जो फुल वेव रेक्टिफायर है ये पॉजिटिव साइकिल को भी कन्वर्ट करेगा और नेगेटिव को भी कन्वर्ट
करेगा। अब ये जो फुल वेव रेक्टिफायर है ये दो टाइप के होते हैं। सेंटर टेप फुल वेव रेक्टिफायर एंड फुल वेव ब्रिज रेक्टिफायर।
है ना? तो पहले हम यहां पर हाफ वेव रेक्टिफायर पढ़ेंगे। उसके बाद हम सेंटर टेप फुल वेव रेक्टिफायर पढ़ेंगे और उसके बाद
फुल वेव ब्रिज रेक्टिफायर पढ़ेंगे। यहां पर जो सबसे इंपॉर्टेंट है तीनों में वो है आपका फुल वेव रे ब्रिज रेक्टिफायर।
क्योंकि सबसे ज्यादा बार इसी की कंस्ट्रक्शन और वर्किंग पूछी जाती है। तो यहां पर आपको हमें तीनों की कंस्ट्रक्शन
वर्किंग पढ़नी है। लेकिन तीनों में सबसे इंपॉर्टेंट किसकी है? ब्रिज रेक्टिफायर की। तो चलिए स्टार्ट करते हैं। न्यूमेरिकल
जनरली यहां से आते नहीं है। कभी-कभी यहां से न्यूमेरिकल आते हैं। नोट्स में आपको इनके न्यूमेरिकल भी मिल जाएंगे। यहां पर
मैं आपको इनकी कंस्ट्रक्शन और वर्किंग समझाने वाला हूं। चलिए स्टार्ट करते हैं हाफ वेव रेक्टिफायर से। हाफ वेव
रेक्टिफायर इज़ अ सर्किट दैट कंडक्ट करंट ओनली ड्यूरिंग पॉजिटिव हाफ साइकिल। मतलब जो हाफ वेव रेक्टिफायर होता है वो केवल
करंट को कब तब कंडक्ट करता है? जब पॉजिटिव हाफ साइकिल हो तो पॉजिटिव हाफ साइकिल के समय पर यह करंट कंडक्ट करेगा और नेगेटिव
हाफ साइकिल के समय पर ये करंट कंडक्ट नहीं करेगा। मतलब ये पॉजिटिव साइकिल को तो कन्वर्ट करेगा लेकिन नेगेटिव को नहीं
करेगा। बोलो बात समझ में आ गई? अ हाफ वेव रेक्टिफायर कंसिस्ट। अब देखो हाफ वेव रेक्टिफायर किस-किस से बना होता है? इसमें
एक तो स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर होता है। क्योंकि बिना ट्रांसफार्मर के हमारा रेक्टिफायर काम नहीं करेगा। है ना? तो
इसमें एक तो होता है स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर। एक होता है इसमें डायोड और एक होता है इसमें लोड रेजिस्टेंस। तो देखो
यह वाला जो पार्ट है यह यह है आपका स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर। भाई ट्रांसफार्मर आप पढ़ चुके होंगे बहुत बार। तो ये हमारा
स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर है। ये डायोड है और ये हमारा लोड रेजिस्टेंस है। क्या है? लोड रेजिस्टेंस। अब यहां पर जरा ध्यान से
समझना। वर्किंग। देखो जो हमारे तीनों के तीनों रेक्टिफायर है ना हाफ वेव रेक्टिफायर, सेंटर टेप फुल
वेव रेक्टिफायर और फुल वेव ब्रिज रेक्टिफायर तीनों की कंस्ट्रक्शन वर्किंग बहुत ज्यादा इजी है। बहुत ईजी है।
कंस्ट्रक्शन भी और वर्किंग भी। तो तीनों की कंस्ट्रक्शन वर्किंग को ध्यान से समझना। आपको रटना नहीं पड़ेगा। अपने आप
बना के लिख के आ जाएंगे। देखो वर्किंग। अब यहां पर वर्किंग को हम दो पार्ट में पढ़ेंगे। अब एक चीज मैं आपको बता दूं।
यहां से हाफ वेव रेक्टिफायर से हम आगे के जितने भी टॉपिक अब पढ़ने वाले हैं क्लिपर क्लैंपर और वोल्टेज मल्टीप्लायर तक वहां
तक हम दो साइकिल में बात करेंगे। एक पॉजिटिव हाफ साइकिल में और एक नेगेटिव हाफ साइकिल में। मतलब हम वर्किंग को दो स्टेप
में पढ़ेंगे। पॉजिटिव हाफ साइकिल और नेगेटिव हाफ साइकिल। तो वर्किंग ड्यूरिंग पॉजिटिव हाफ साइकिल। अब जरा पॉजिटिव हाफ
साइकिल पर ध्यान दीजिएगा। ड्यूरिंग पॉजिटिव हाफ साइकिल इसमें क्या होगा? देखो ड्यूरिंग पॉजिटिव आर साइकिल
द टर्मिनल देखो यहां से हमने AC को अप्लाई किया। यहां से हम 230 वोल्ट 50 हz एसी अप्लाई करेंगे या यहां पर इसको आप 220 भी
कर सकते हैं। है ना? 220 देखिए कुछ बुक्स के अंदर 230 दिया होता है। कुछ के अंदर 220 दिया होता है।
वैसे ज्यादा स्टैंडर्ड 220 है। क्लियर है? 220 नाउ तो जब हम यहां से AC को अप्लाई करेंगे तो देखो क्या होगा? जब
यहां से पॉजिटिव साइकिल अप्लाई होगी ड्यूरिंग पॉजिटिव साइकिल तो देखो ड्यूरिंग पॉजिटिव साइकिल क्या होगा? ड्यूरिंग
पॉजिटिव साइकिल ये ऊपर आएगा पॉजिटिव नीचे आएगा नेगेटिव। मैंने आगे डायग्राम दूसरा बना रखा है। अच्छा मैं एक चीज आपको यहां
पर बता दूं। अगर हाफ वेव रेक्टिफायर आपको एग्जाम में आता है तो आप क्या करेंगे? सबसे पहले आप हाफ वेव रेक्टिफायर को
डिफाइन करेंगे। इसका ये डायग्राम बनाएंगे। है ना? ये डायग्राम है। ये हमारा क्या है? यह स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर है। यह
प्राइमरी वाइंडिंग है। यह सेकेंडरी वाइंडिंग है। प्राइमरी वाइंडिंग में जो नंबर ऑफ टर्न्स होते हैं वो n1 होते हैं।
सेकेंडरी वाइंडिंग में नंबर ऑफ टर्न्स n2 होते हैं। प्राइमरी वाइंडिंग का जो वोल्टेज होता है वो v1 होता है। सेकेंडरी
वाइंडिंग का जो वोल्टेज होता है वो v2 होता है। तो ये फार्मूला आपको न्यूमेरिकल में काम आएगा। क्लियर है? आगे देखो।
तो जब पॉजिटिव हाफ साइकिल को अप्लाई करते हैं तो पॉजिटिव हाफ साइकिल के समय पर जो ए टर्मिनल होता है वो पॉजिटिव होता है। जो B
टर्मिनल होता है वो नेगेटिव होता है। जैसा कि आप यहां पर देख सकते हैं इस डायग्राम में। अब देखो डायग्राम आपको दोबारा बनाना
होगा अगर आपको अच्छे नंबर चाहिए। भाई पहले तो आपने ये डायग्राम बना दिया। अब जब आप पॉजिटिव साइकिल को अप्लाई करेंगे तो
पॉजिटिव साइकिल को अप्लाई करेंगे तो डायग्राम ऐसा बनेगा। देखो A टर्मिनल पर A टर्मिनल पॉजिटिव हो जाएगा और B टर्मिनल
क्या हो जाएगा? नेगेटिव। मतलब यहां पर पॉजिटिव होगा। यहां पर क्या होगा? होगा नेगेटिव होगा क्योंकि पॉजिटिव हाफ साइकिल
लगा रहे हैं। ठीक है? इट विल मेक डायोड डीव इन फॉरवर्ड बायस। अब एक बात बताओ अगर ये पॉजिटिव है तो इसके पॉजिटिव होने से ये
जो डायोड है ये फॉरवर्ड बायस में चला जाएगा। क्यों? क्योंकि देखो डायोड का ये P है। ये N है। तो जब हम P को पॉजिटिव से
कनेक्ट करते हैं तो फॉरवर्ड बायसिंग होती है। तो अगर हमारा यहां पर पॉजिटिव आएगा और ये
नेगेटिव आएगा तो जो डायोड होगा वह फॉरवर्ड बायस में होगा। और आपको मालूम है अगर डायोड
अगर डायोड फॉरवर्ड बायस है तो वह शॉर्ट सर्किट की तरह काम करेगा। क्योंकि हम रेक्टिफायर के अंदर यह मान के चलेंगे कि
डायोड कैसा है? आइडियल है। और आइडियल डायोड आपको मालूम है आइडियल डायोड स्विच की तरह काम करता है। क्लोज स्विच की तरह
फॉरवर्ड बायसिंग में। तो फॉरवर्ड बायोसिंग में ये जो डायोड है ये डायोड ऑन हो जाएगा या कह सकते हैं शॉर्ट सर्किट हो जाएगा।
तो अगर आपका डायोड ऑन हो गया, शॉर्ट सर्किट हो गया तो इसका मतलब ड्यूरिंग पॉजिटिव साइकिल इस सर्किट में करंट फ्लो
करेगा। अब अगर यहां पर करंट फ्लो करेगा तो हमें आउटपुट मिलेगा। और कितना आउटपुट मिलेगा? जितना हमारा यहां पर ये इनपुट था
उतना ही हमें यहां पर आउटपुट मिलेगा। इसका मतलब ये हुआ हाफ वेव रेक्टिफायर में ड्यूरिंग पॉजिटिव साइकिल हमें आउटपुट
मिलेगा और जो आउटपुट होगा वो इनपुट को फॉलो करेगा। देखो हमारा आउटपुट इनपुट को क्या कर रहा है? फॉलो कर रहा है। अब चलते
हैं नेगेटिव साइकिल पे। तो देखो नेगेटिव साइकिल में क्या होगा? अब उल्टा हो जाएगा। नेगेटिव साइकिल में ऊपर वाला जो टर्मिनल
है ये ये नेगेटिव हो जाएगा। भाई नेगेटिव साइकिल के समय पर ऊपर नेगेटिव आएगा। नीचे पॉजिटिव आएगा। अब आपको मालूम है अगर यहां
पर नेगेटिव आ गया तो ये जो डायोड लगा है अब यहां पर P साइड में नेगेटिव कनेक्ट हो गया। और आपको मालूम है ड्यूरिंग नेगेटिव
साइकिल अगर यहां पर नेगेटिव और यहां पर पॉजिटिव है तो जो हमारा डायोड यहां पर लगा हुआ था वो डायोड रिवर्स बायस में चला
जाएगा और अगर डायोड आइडियल होता है तो रिवर्स बायसिंग में डायोड ओपन सर्किट की तरह काम करता है। बोलो बात समझ में आ गई?
अच्छा एक चीज और आप यहां पर डायोड का डायग्राम बना सकते हैं। अगर देखो ये दो तरीके होते हैं बनाने के। जैसे अगर मान
लीजिए हमारा पॉजिटिव साइकिल है और आपने यहां डायोड बना रखा है तो यहां पर आप लिख सकते हैं फॉरवर्ड बायस या इसमें यहां पर
ऐसा भी लिख सकते हैं आप ऑन तो कहने का मतलब ये है या तो आप शॉर्ट सर्किट करके दिखा दो या डायोड बना करके उसके ऊपर लिख
दो ऑन मतलब ये ऑन हो चुका है शॉर्ट सर्किट हो चुका है अब नेगेटिव साइकिल के समय पर ये ओपन हो जाएगा क्योंकि आइडियल डायोड है
तो आप डायोड को बना करके उसके ऊपर लिख सकते हैं ऑफ। तो अब आपको समझ में आ गया होगा कि ड्यूरिंग नेगेटिव साइकिल हमारा जो
डायोड है वो ओपन हो जाएगा। ओपन स्विच की तरह काम करेगा। अब अगर ओपन स्विच की तरह काम करेगा तो क्या यहां पर करंट फ्लो
होगा? नहीं करंट फ्लो होगा। इसका मतलब क्या हमें आउटपुट मिलेगा? नहीं मिलेगा। तो इससे कंक्लूजन क्या निकल रहा है? कि
पॉजिटिव साइकिल के समय पर आउटपुट मिलेगा V नॉट और नेगेटिव साइकिल के समय पर हमें आउटपुट नहीं मिलेगा।
बोलो बात समझ में आ गई? तो इसी बात को अब कर्व की हेल्प से समझ लेते हैं। हाफ वेव रेक्टिफायर इनपुट आउटपुट वेवफॉर्म। अगर
आपको एग्जाम में सेवन मार्क्स में हाफ वेव रेक्टिफायर आता है लिखने के लिए तो आप क्या लिखेंगे उसमें?
आप उसमें यहां से स्टार्ट करेंगे। ये डायग्राम बनाएंगे। उसके बाद पॉजिटिव साइकिल के लिए ये डायग्राम बनाएंगे।
नेगेटिव साइकिल के लिए ये डायग्राम बनाएंगे। और साथ ही साथ आप इनपुट आउटपुट वेवफॉर्म को भी बना के आएंगे। तब जाके
आपका सेवन मार्क्स का क्वेश्चन क्या होगा? कंप्लीट होगा। अब देखो कितना आसान है। ये हमारी इनपुट वेव फॉर्म है साइन कर्व की
फॉर्म में। है ना? ये पॉजिटिव साइकिल, नेगेटिव साइकिल, पॉजिटिव साइकिल, नेगेटिव साइकिल। आपको मालूम है जो हाफ वेव
रेक्टिफायर है वो पॉजिटिव साइकिल के समय पर तो पॉजिटिव साइकिल में जो आउटपुट है वो इनपुट को फॉलो कर रहा है। देखो जो हमारा
आउटपुट है वो बिल्कुल इनपुट के जैसा ही है। फॉलो कर रहा है। लेकिन ड्यूरिंग नेगेटिव साइकिल हमारा आउटपुट ज़ीरो है। तो
आप देख सकते हैं यहां पर नेगेटिव साइकिल हट गई। क्योंकि आउटपुट क्या मिल रहा है? ज़ीरो। फिर से पॉजिटिव साइकिल आई तो हमारा
आउटपुट इनपुट को फॉलो कर रहा है। अगेन नेगेटिव साइकिल आई तो हमारा आउटपुट क्या हो गया? ज़ीरो हो गया। तो यह कर्व से आपको
क्लियर हो गया होगा कि हाफ वेव रेक्टिफायर में पॉजिटिव हाफ साइकिल में आउटपुट मिलता है और नेगेटिव हाफ आउट नेगेटिव हाफ साइकिल
में आउटपुट नहीं मिलता है। बोलो बात समझ में आ गई? आगे बढ़ते हैं। नाउ परफॉर्मेंस पैरामीटर क्या परफॉर्मेंस पैरामीटर
इंपॉर्टेंट है? तो मैं यहां पर एक चीज बता दूं आपको कि बहुत ज्यादा इंपॉर्टेंट तो नहीं है। लेकिन जब आपको एग्जाम में हाफ
वेव रेक्टिफायर या फुल वेव रेक्टिफायर पूछा जाता है तो कभी-कभी उसके साथ में एक या दो परफॉर्मेंस पैरामीटर भी पूछ लेते
हैं। है ना? और एक दो बार ऐसा भी हुआ कि परफॉर्मेंस पैरामीटर का डेरिवेशन आपको एग्जाम में पूछा गया है तो बहुत ज्यादा
इंपॉर्टेंट नहीं है। लेकिन हां अगर आपको न्यूमेरिकल्स करने हैं रेक्टिफायर के ऊपर बेस्ड तो आपको ये परफॉर्मेंस पैरामीटर के
सारे फॉर्मूले याद होने चाहिए। चलिए स्टार्ट करते हैं। थोड़ा सा शॉर्ट में समझ लेते हैं परफॉर्मेंस पैरामीटर। तो यहां पर
सात आठ परफॉर्मेंस पैरामीटर होते हैं। और अगर आपको हाफ वेव रेक्टिफायर के परफॉर्मेंस पैरामीटर समझ में आ गए तो
बिल्कुल वैसे ही फुल वेव रेक्टिफायर के परफॉर्मेंस पैरामीटर भी आप डिराइव कर सकते हैं। तो जल्दी से इनको समझ लेते हैं।
ध्यान देना जरा। परफॉर्मेंस पैरामीटर पहला परफॉर्मेंस पैरामीटर है एवरेज और डीसी आउटपुट करंट। मतलब जो हमारा हाफ वेव
रेक्टिफायर होता है। इस हाफ वेव रेक्टिफायर में यहां पर आउटपुट पर जो हमें करंट मिलता है यहां पर डीसी करंट तो यहां
पर तो डीसी मिलेगा ना तो उस डीसी करंट की वैल्यू को हमें कैलकुलेट करना है। है ना? तो डीसी को डीसी वैल्यू को हम एवरेज
वैल्यू भी कहते हैं। तो एवरेज और डीसी आउटपुट करंट या लोड करंट जिसको हम रिप्रेजेंट करते हैं IDC से या इसको हम
IAV भी लिख सकते हैं। है ना? चलिए तो इसकी वैल्यू कैसे कैलकुलेट करेंगे? तो देखो इसके लिए आपको क्या करना
है? अगर आपको इसका फार्मूला ड्राइव करना है तो सबसे पहले आपको डीसी करंट का ये फार्मूला याद रखना होगा। ये फार्मूला कहां
से आया? ये फार्मूला आप क्लास 12th में कई बार पढ़ चुके होंगे। तो यहां पर हम इस फ़ूले को कहां से आया? इसकी बात नहीं
करेंगे क्योंकि हमें डायरेक्ट इस फ़ूले का यहां पर यूज़ करना है। तो अगर आप डी डीसी आउटपुट करंट निकालना चाहते हैं, तो आपको
इस फ़ूले से स्टार्ट करना होगा। अब देखो इसमें करेंगे क्या? यहां पर ये im sinθ im तो कांस्टेंट है। बाहर आ जाएगा। बचा sinθ
अच्छा लिमिट कहां से कहां तक है? 0 से 2π 0 से 2π क्यों लिया? क्योंकि हमारी एक साइकिल 0 से 2π पे जाके खत्म हो रही है। 0
से 2π पर। आधी साइकिल में मिलेगा आउटपुट आधी में नहीं मिलेगा। तो इसीलिए लिमिट यहां पर 0 से 2π है। अब हमें करना क्या
है? इस imm को हमने बाहर कर दिया क्योंकि कांस्टेंट है। अब बचा हमारे पास sinθ। अब इस sinθ को देखो ये जो लिमिट है हमारी
इस लिमिट को हम दो पार्ट में ब्रेक करेंगे। पहली लिमिट हम 0 से π लेंगे। फिर π से 2π लेंगे। दोनों में sinθ है। अब
इसको इंटीग्रेट कर देंगे। sinθ का इंटीग्रेशन होता है - cosθ। लिमिट हो जाएगी 0 से π। अच्छा इसका इंटीग्रेशन
करेंगे नहीं। क्यों? क्योंकि ये ज़ीरो आएगा। ज़ीरो क्यों आएगा? क्योंकि आपको मालूम है π से 2π में हमें कोई आउटपुट
नहीं मिल रहा। भाई π से 2π में हमें कोई भी आउटपुट नहीं मिल रहा है। तो इसलिए हम इसको ज़ीरो ले लेंगे। तो ये हमारा ज़ीरो हो
जाएगा। बस इसको इंटीग्रेट कर दिया हमने। अब यहां पर लिमिट लगा देंगे तो हमारी ये वैल्यू आ जाएगी। तो जो डीसी करंट होता है
हाफ वेव रेक्टिफायर में वो IM/π होता है। बोलो बात समझ में आ गई? इसी तरीके से आप डीसी वोल्टेज भी निकाल सकते हैं आउटपुट
पे। कैसे निकालेंगे? अब देखो V का फार्मूला ओम्स लॉ के अकॉर्डिंग क्या होता है? I * R होता है। तो बस आपको यहां पर
कुछ नहीं करना है। केवल आपको यहां पर I की जगह जो अभी-अभी आपने IDC लिया है, कैलकुलेट किया है, तो I की जगह IDC रखेंगे
और R की जगह जो लोड रेजिस्टेंस लगा हुआ है हाफ वेव रेक्टिफायर में उसको रखेंगे। दोनों का मल्टीप्लाई यहां पर आ जाएगा। तो
यहां पर IDC अब IDC का ये जो फार्मूला IM /π यहां पर पुट कर देना। ये आपका RL हो जाएगा। और
यहां पर जो ये IM है अब I का फार्मूला क्या होगा? अकॉर्डिंग टू ओम्स लॉ I होता है V/ R तो यहां पर I की जगह हम VM / R
रखेंगे। अब R जो होगा यहां पर जो टोटल रेजिस्टेंस होगा टोटल रेजिस्टेंस जो होगा यहां पर वो आपका होगा लोड रेजिस्टेंस प्लस
डायोड रेजिस्टेंस। लेकिन आपको मालूम है डायोड रेजिस्टेंस को हम ज़ीरो मानते हैं। तो यहां पर RF को हम ज़ीरो पुट कर देंगे।
है ना? तो बचेगा यहां पर RL RL से RL कट जाएगा VM/π। तो IDC की वैल्यू IM /π VDC की वैल्यू VM/π। अब इनको आपको याद रखना
है। क्यों याद रखना है? क्योंकि ये आगे के डेरिवेशन में भी काम आएंगे और अगर आप न्यूमेरिकल करते हैं तो न्यूमेरिकल में भी
काम आएंगे। क्लियर है? नाउ थर्ड पैरामीटर नाउ आरएस वैल्यू निकालनी है। RMS आउटपुट जो हमें आउटपुट पे करंट मिलेगा उसकी
आरएमएस वैल्यू को कैलकुलेट करना है। RMS वैल्यू तो देखिए RMS वैल्यू को कैलकुलेट करने का फार्मूला होता है ये। अगेन क्लास
12th का ही फार्मूला है। में 1 / 2π 0 से 2π imina होल स्क्वायर dheटा। बस इसके बाद क्या करना है? इसको
इंटीग्रेट करना है। अच्छा एक चीज मैं आपको यहां पर बता दूं। यहां पर मैं बार-बार थीटा ले रहा हूं। लेकिन अगर आप बुक्स के
अंदर देखेंगे तो कुछ बुक्स के अंदर तो थीटा लिया गया है। कुछ बुक्स के अंदर थीटा की जगह लिखा है omegat तो मैं आपको बता
दूं थीटा और omegat omegat को ही हम थीटा कहते हैं। तो आप थीटा भी लिख सकते हैं omegat भी लिख सकते हैं। तो यहां पर मेरे
जितने भी ये डेरिवेशन है परफॉर्मेंस पैरामीटर के अगर मैंने वहां पर थीटा लिखा है तो आप थीटा की जगह पर omegat भी लिख
सकते हैं। omegat को भी आप लिख सकते हैं। क्लियर है? चलिए तो ये im/π हो गया। ये VM/π हो गया
हमारा एवरेज वैल्यू। RMS वैल्यू यहां से निकलेगी। ये RMS वैल्यू को निकालने का फार्मूला है। और यहां पर बहुत ही सिंपल सा
इंटीग्रेशन है। im बाहर आ जाएगा। है ना? क्योंकि स्क्वायर हो रहा है तो इस imm का स्क्वायर बाहर आ जाएगा। sin² थीटा का
इंटीग्रेशन करेंगे। इसका इंटीग्रेशन करने के लिए हमें यहां पर 1 - cos 2 थीटा / 2 लिखना पड़ेगा। उसके बाद इसका इंटीग्रेशन
कर देंगे। इंटीग्रेशन करके अगर आप सिंपलीफाई करेंगे तो rms वैल्यू आएगी imm / 2 im / 2 अच्छा एक चीज़ मैं आपको और बता
दूं। हम फुल वेव रेक्टिफायर में भी ये पैरामीटर पढ़ेंगे। यही सेम पैरामीटर पढ़ेंगे। तो वहां पर क्या होगा? करने का
तरीका ऑलमोस्ट सेम होगा। ये वैल्यू अलग आएंगी। फुल वेव रेक्टिफायर के लिए ये वैल्यू अलग आएंगी। जैसे हाफ वेव
रेक्टिफायर के लिए तो IM / π है। फुल वेव के लिए 2M/π आएगा। ये फुल वेव के लिए फुल वेव रेक्टिफायर के लिए 2VM / π आएगा।
क्लियर है? तो RMS वैल्यू आ जाएगी हमारी IM / 2. इसी तरह से वोल्टेज की RMS वैल्यू आ जाएगी VM / 2 कितनी आ जाएगी? VM / 2 अब
आगे बढ़ते हैं। नेक्स्ट जो हमारा पैरामीटर है दैट इज़ रिल फैक्टर एंड ये इंपॉर्टेंट है। देखिए रिल फैक्टर बहुत बार पूछा जाता
है। दो नंबर में भी पूछ लेते हैं और हाफ वेव रेक्टिफायर या फुल वेव रेक्टिफायर के साथ में भी रिपल फैक्टर पूछ लेते हैं। तो
रिल फैक्टर है क्या? देखिए एक्चुअल में क्या होता है? जो हमारा रेक्टिफायर होता है वो हमारे एसी को पलसेटिंग डीसी में
कन्वर्ट करता है और जो हमारा आउटपुट होता है ना रेक्टिफायर का उस आउटपुट में डीसी कंपोनेंट के साथ-साथ एसी कंपोनेंट भी होता
है। मतलब हमें प्योर डीसी नहीं मिलता। डीसी कंपोनेंट के साथ में एसी कंपोनेंट भी मिलता है। तो रिपल फैक्टर हमें ये बताता
है कि आउटपुट पर कितना एसी कंपोनेंट हमें मिल रहा है। बात समझ में आ रही है? तो व्हाट इज़ रिपल फैक्टर? द आउटपुट ऑफ
रेक्टिफायर कंटेन एसी एज वेल एज डीसी कंपोनेंट। तो रेक्टिफायर का जो आउटपुट होता है उसमें
एसी के साथ डीसी के साथ-साथ एसी कंपोनेंट भी होता है। रिपल फैक्टर मेजर द परसेंटेज ऑफ़ AC कंपोनेंट प्रेजेंट इन द आउटपुट। तो
आउटपुट में AC का कितना परसेंट कंपोनेंट है उसको मेजर करता है रिल फैक्टर। है ना? तो रिपल फैक्टर इज डिफाइंड एज द रेशियो ऑफ
RMS वैल्यू ऑफ AC कंपोनेंट टू द डीसी कंपोनेंट इन द रेक्टिफायर। तो हमारा जो रिपल फैक्टर की डेफिनेशन है डेफिनेशन के
अकॉर्डिंग जो रिपल फैक्टर होता है वो रेश्यो होता है किस-किस का? RMS वैल्यू ऑफ़ AC कंपोनेंट ऑफ़ आउटपुट। यानी कि आउटपुट पर
जो हमें AC कंपोनेंट मिल रहा है उसकी आरएमएस वैल्यू अपॉन में आउटपुट पर जो हमें डीसी मिल रहा है वो नीचे आ जाएगा। तो बस
आपको यहां पर कुछ नहीं करना है। ऊपर एसी कंपोनेंट रखना है। नीचे डीसी कंपोनेंट रखना है। और ऊपर जो हमारा एसी कंपोनेंट
हमें मिलेगा आउटपुट पे उसका फार्मूला ये होता है। एसी कंपोनेंट का ये फार्मूला होता है। अगेन आपको डायरेक्ट फार्मूला यूज़
करना है। कहां से आया? ये आपको प्रूव नहीं करना। तो ये हमारा AC कंपोनेंट का फार्मूला होता है। यहां पर इसको पुट कर
देंगे। पुट करने के बाद इसको सिंपलीफाई करेंगे। तो यहां से हमारी रिपल फैक्टर की वैल्यू आती है 1.21। तो देखो मैं एक चीज़
आपको बताऊं। डेरिवेशन इंपॉर्टेंट नहीं है। आपको रिपल फैक्टर की डेफिनेशन आनी चाहिए और आपको यह पता होना चाहिए कि रिपल फैक्टर
कितना है हाफ वेव रेक्टिफायर का। तो हाफ वेव रेक्टिफायर के लिए रिपल फैक्टर आता है 1.21। अब यहां पर एक इंपॉर्टेंट पॉइंट
रेक्टिफायर का जितना रिपल फैक्टर कम होगा हमारा रेक्टिफायर उतना ही ज्यादा इफेक्टिव होगा। हाफ वेव रेक्टिफायर का रिपल फैक्टर
1.21 है। जबकि फुल वेव रेक्टिफायर का जो रिपल फैक्टर होता है वो 0.48 के आसपास होता है। तो सीधी सी बात है हमारा जो फुल
वेव रेक्टिफायर होगा वो ज्यादा इफेक्टिव होगा। हाफ वेव रेक्टिफायर हमारा उतना इफेक्टिव नहीं है। तो अब आपको रिपल फैक्टर
भी समझ में आ गया होगा। नेक्स्ट एफिशिएंसी ऑफ़ रेक्टिफायर। तो हम रेक्टिफायर की एफिशिएंसी को भी कैलकुलेट कर सकते हैं। अब
आपको मालूम है एफिशिएंसी का फार्मूला होता है आउटपुट अप इनपुट। तो सेम चीज यहां पर होगी। एफिशिएंसी ऑफ अ रेक्टिफायर डिफाइंड
एज द रेशियो ऑफ डीसी आउटपुट पावर टू द एसी इनपुट पावर। मतलब यहां पर आउटपुट ऊपर लिखेंगे। इनपुट नीचे लिखेंगे। आउटपुट
हमारा क्या है भाई? आउटपुट हमारा क्या होगा? जितना हमें करंट आउटपुट पर मिल रहा है। पावर लिखना है ना हमें। तो पावर का
फार्मूला क्या होता है? I² R तो आउटपुट पे हमें करंट कितना मिल रहा है? IDC * RL अपॉन में AC इनपुट पावर मतलब हम जितना भी
इनपुट अप्लाई कर रहे हैं वो नीचे आएगा। तो इनपुट पावर क्या होगी भाई? I RMS² * RL + RF RF यहां से अगेन हम नेगलेक्ट कर देंगे।
तो यहां पर RF को अगर मैं जीरो ले लूं तो देखो यहां ये IDC है। अब IDC का फार्मूला होता है IM/π और I RMS का फार्मूला होता
है IM / 2 बस यहां पर पुट करके इसको सिंपलीफाई कर देंगे तो एफिशिएंसी आएगी 40.6%
तो हाफ वेव रेक्टिफायर की जो एफिशिएंसी होती है ना वो 40.6% होती है। इसके बाद जब हम फुल वेव रेक्टिफायर पढ़ेंगे तो उसकी
एफिशिएंसी 40.6% नहीं होगी। इसके डबल होगी। तो इसका डबल कितना हो जाएगा? 81.2%
तो फुल वेव रेक्टिफायर की एफिशिएंसी होती है 81.2% नाउ अब लास्ट में दो पैरामीटर यहां पर और
हैं। पीक इनवर्स वोल्टेज। देखिए जो हाफ वेव रेक्टिफायर होता है उसका पीक इनवर्स वोल्टेज होता है VM। कितना होता है? VM।
मतलब जो हमारी पीक वैल्यू होती है मैक्सिमम वोल्टेज की वह vm होती है। और जो रिल फ्रीक्वेंसी होती है इसकी वह
रिल फ्रीक्वेंसी हाफ वेव रेक्टिफायर की रिपल फ्रीक्वेंसी आपकी इनपुट फ्रीक्वेंसी के बराबर ही होती है। कहने का मतलब ये है
कि हाफ वेव रेक्टिफायर में फ्रीक्वेंसी चेंज नहीं होती। जितनी इनपुट की फ्रीक्वेंसी है उतनी हमारी आउटपुट की
फ्रीक्वेंसी भी होगी। तो यहां पर हमारे सारे परफॉर्मेंस पैरामीटर क्या हो गए? खत्म हो गए। नाउ अब हम बात करेंगे फुल वेव
रेक्टिफायर की। फुल वेव रेक्टिफायर। अब फुल वेव रेक्टिफायर के अंदर दो रेक्टिफायर हैं। एक सेंटर टेप और एक हमारा ब्रिज वाला
है। है ना? तो फुल वेव रेक्टिफायर इज़ अ सर्किट दैट करंट कंडक्ट। देखो नाम से ही समझ में आ रहा है। फुल वेव रेक्टिफायर में
क्या होगा? दोनों साइकिल में करंट कंडक्ट होगा। हाफ वेव में क्या हो रहा था? पॉजिटिव साइकिल के समय पर करंट कंडक्ट हो
रहा था। नेगेटिव साइकिल के समय पर कंडक्ट नहीं हो रहा था। लेकिन यहां पर ऐसा नहीं है। फुल वेव रेक्टिफायर इज अ सर्किट दैट
कंडक्ट करंट ड्यूरिंग बोथ पॉजिटिव एंड नेगेटिव हाफ साइकिल। नेगेटिव हाफ साइकिल ऑफ एसी इनपुट एसी सप्लाई। मतलब यहां पर
दोनों साइकिल में हमें आउटपुट मिलेगा। तो सीधी सी बात है इसके जो परफॉर्मेंस पैरामीटर होंगे उसमें हमें हर जगह पर
वैल्यू डबल मिलेगी। क्योंकि इस बार हमें आउटपुट दोनों साइकिल में मिल रहा है। तो हमारी वैल्यू भी क्या हो जाएंगी? पैरामीटर
की डबल हो जाएंगी। चलिए पहले हम बात करेंगे सेंटर टेप फुल वेव रेक्टिफायर की। सेंटर टेप फुल वेव
रेक्टिफायर। तो सेंटर टेप फुल वेव रेक्टिफायर हैव अ सेंटर टेप स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर। अब जरा ध्यान देना इसके
कंस्ट्रक्शन पे जो हमारा सेंटर टेप फुल वेव रेक्टिफायर होता है। इसमें क्या-क्या होता है? एक तो इसमें स्टेप डाउन
ट्रांसफार्मर होगा पहले की तरफ। ये हमारा स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर है। तो दो डायोड होंगे। अब देखो इसमें दो डायोड होंगे।
जबकि पहले एक डायोड था E1 एंड D2 एंड लोड रेज़िस्टेंस लोड रेज़िस्टेंस एक ही होगा। सेंटर टेप ट्रांसफ़ार्मर सेकेंडरी वाइंडिंग
इज़ डिवाइडेड इंटू टू इक्वल पार्ट्स। अब देखो इसमें क्या होता है? सेंटर टेप ट्रांसफार्मर में सेंटर टेप फुल वेव
रेक्टिफायर में जो सेकेंडरी वाइंडिंग होती है उसको दो पार्ट में डिवाइड कर देते हैं। दो इक्वल पार्ट में डिवाइड हो जाती है। है
ना? दो इक्वल पार्ट में क्या हो जाती है? डिवाइड। इसीलिए इसको कहा जाता है सेंटर टैप। देखो यहां पर ये क्या है? इसको हम
सेंटर टैप बोलते हैं। तो यहां पर सेकेंडरी वाइंडिंग दो इक्वल पार्ट में क्या हो गई? डिवाइड हो गई। सेंटर टैप ट्रांसफार्मर
में। अब इसकी वर्किंग को समझते हैं। देखो वर्किंग बहुत सिंपल है। देखिए क्या होगा? यहां से हमने एसी को सप्लाई किया। तो जब
हम दो दो पार्ट में वर्किंग होगी ड्यूरिंग पॉजिटिव साइकिल एंड ड्यूरिंग नेगेटिव साइकिल। तो जब हम पॉजिटिव साइकिल को
अप्लाई करेंगे तो ये टर्मिनल पॉजिटिव होगा और ये टर्मिनल क्या होगा? नेगेटिव होगा। तो अब जरा ध्यान देना। तो पहले तो अगर आप
एग्जाम में आपसे पूछा जाता है सेंटर टेप फुल वेव रेक्टिफायर तो पहले आप इसको डिफाइन करेंगे ये डायग्राम बनाएंगे उसके
बाद आप पॉजिटिव साइकिल वर्किंग लिखेंगे पहले पॉजिटिव साइकिल के लिए उसके बाद नेगेटिव साइकिल के लिए तो ड्यूरिंग
पॉजिटिव हाफ साइकिल तो देखो पॉजिटिव साइकिल के समय पर क्या होगा ड्यूरिंग पॉजिटिव साइकिल तो ये वाला टर्मिनल
पॉजिटिव होगा और ये वाला टर्मिनल नेगेटिव होगा ड्यूरिंग पॉजिटिव साइकिल तो देखो अगर ये पॉजिटिव है ये नेगेटिव है तो सीधी सी
बात है ये डायोड हमारा फॉरवर्ड बायस में चला जाएगा मतलब मतलब ये शॉर्ट सर्किट होगा या हम लिख सकते हैं ऑन। अब देखो ध्यान
देना। पहले मैंने डायोड को हटा के शॉर्ट सर्किट कर दिया था। अब मैंने यहां पर ऑन लिख दिया। तो बात एक ही है। चाहे आप डायोड
को हटा के शॉर्ट सर्किट कर दो या इसके ऊपर ऑन लिख दो। तो ऑन का मतलब ये है कि ये शॉर्ट सर्किट हो गया। बोलो बात समझ में आ
गई? तो अब देखो क्या होगा? ये पॉजिटिव साइकिल है और इधर नेगेटिव साइकिल है। है ना? अब एक और चीज ये पॉजिटिव है। ये
पॉजिटिव है तो ये नेगेटिव होगा। सिमिलरली अगर ये नेगेटिव है तो ये पॉजिटिव होगा। तो अब देखो होगा क्या? ये पॉजिटिव है। ये
नेगेटिव है। तो हमारा ये फॉरवर्ड बायस हो गया। तो हमारा इस सर्किट में करंट फ्लो करेगा। इस सर्किट में करंट क्या होगा?
फ्लो करेगा। इसका मतलब हमें यहां पर आउटपुट मिलेगा। तो पॉजिटिव हाफ साइकिल में हमें आउटपुट मिलेगा। और कितना मिलेगा? जो
हमें आउटपुट मिलेगा वो हमारा इनपुट को फॉलो करेगा। बोलो बात क्लियर हो गई? आगे बढ़ते हैं। नाउ
ड्यूरिंग नेगेटिव साइकिल। अब देखो नेगेटिव साइकिल के समय पर क्या होगा? अच्छा एक बात और समझिए। जब हमने पॉज़िटिव ड्यूरिंग
पॉज़िटिव हाफ साइकिल को हमने अप्लाई किया तो ये पॉजिटिव था। ये नेगेटिव था। तो ये फॉरवर्ड बायस में हो गया। और ये जो डायोड
है क्योंकि यहां नेगेटिव है। भाई जब पॉजिटिव साइकिल को अप्लाई किया तो ये पॉजिटिव था। ये नेगेटिव था। तो ये फॉरवर्ड
बायस हो गया। ये रिवर्स बायस हो गया। इसका मतलब ये ऑन हो गया। ये ऑफ हो गया। तो पॉजिटिव साइकिल के समय पर ये वाला डायोड
हमारा ओपन सर्किट रहेगा। ये हमारा शॉर्ट सर्किट रहेगा। तो यहां पर करंट फ्लो करेगा। यहां करंट फ्लो नहीं करेगा। बोलो
बात समझ में आ गई? तो हमें जो आउटपुट मिलेगा वो इनपुट के बराबर मिलेगा। अब हम चलते हैं आगे। देखो जो बातें मैंने आपको
बताई वही सारी बातें यहां पर लिखी हैं। नाउ ड्यूरिंग नेगेटिव साइकिल। अब नेगेटिव साइकिल के समय पर क्या होगा? नेगेटिव
साइकिल के समय पर यहां पर नेगेटिव होगा। यहां पर पॉजिटिव होगा। तो सीधी सी बात है अगर यहां पर नेगेटिव है तो ये पॉजिटिव
होगा। तो अगर ये नेगेटिव है तो ये डायोड हमारा ओपन हो जाएगा। ऑफ हो जाएगा। मतलब यहां पर कोई करंट फ्लो नहीं करेगा। लेकिन
नेगेटिव साइकिल के समय पर ये वाला टर्मिनल पॉजिटिव है। और यहां पर जो ये डायोड लगा है इस डायोड से करंट कंडक्ट करेगा।
क्योंकि ये हमारा डायोड क्या हो जाएगा? शॉर्ट सर्किट हो जाएगा। ऑन हो जाएगा। तो इस बार इसमें करंट फ्लो करेगा। तो कहने का
मतलब ये है पॉजिटिव साइकिल में इस वाले सर्किट में करंट फ्लो करता है और हमें आउटपुट मिलता है इनपुट के बराबर। और
ड्यूरिंग नेगेटिव साइकिल नेगेटिव हाफ साइकिल इसमें करंट फ्लो करेगा इसमें नहीं करेगा। तो देखो पॉजिटिव हाफ साइकिल में
इसकी वजह से हमें आउटपुट मिलेगा और नेगेटिव हाफ साइकिल में हमें इसकी वजह से आउटपुट मिलेगा। इसका मतलब इस बार दोनों
साइकिल में आउटपुट मिलेगा और दोनों में इनपुट के बराबर मिलेगा। हमारा जो आउटपुट है वो इनपुट को फॉलो करेगा। तो अब आपको
समझ में आ गया होगा कि फुल वेव रेक्टिफायर में दोनों साइकिल में क्या होगा? आउटपुट मिलेगा। और आप यहां पर देख सकते हैं। है
ना? जब हमारी पॉजिटिव साइकिल थी उस समय भी हमें आउटपुट मिला। नेगेटिव साइकिल के समय पर भी हमें आउटपुट मिला। हां। लेकिन एक
ध्यान रखना क्योंकि यहां पर हमें जो आउटपुट मिलेगा वो पॉजिटिव ही मिलेगा। नेगेटिव नहीं मिलेगा। मतलब कहने का क्या
है कि जब हम नेगेटिव साइकिल को अप्लाई करेंगे तो उस समय भी हमें आउटपुट vi के बराबर ही मिलेगा। - VI के बराबर नहीं
मिलेगा। तो यहां पर जो हमारी आउटपुट वेवफॉर्म होगी पॉजिटिव साइकिल के समय पर भी आउटपुट मिलेगा नेगेटिव में भी मिलेगा
लेकिन साइकिल ऊपर ही बनेगी नीचे नहीं बनेगी तो देखो हमें यहां पर पॉजिटिव में मिल रहा है नेगेटिव में मिल रहा है
पॉजिटिव में मिल रहा है नेगेटिव में भी मिल रहा है तो इसका मतलब इस बार हमें आउटपुट दोनों हाफ साइकिल में मिल रहा है
पॉजिटिव में भी और नेगेटिव में भी क्लियर है तो मुझे लगता है अब आपको ये समझ में आ गया होगा नाउ ये बहुत इंपॉर्टेंट है
फुल वेव ब्रिज ब्रिज रेक्टिफायर पुल वेव ब्रिज रेक्टिफायर बहुत ज्यादा इंपॉर्टेंट है। इसको भी समझ लेते हैं। पुल वेव ब्रिज
रेक्टिफायर हैव स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर। देखो इसके अंदर क्या-क्या है? स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर है। इसके अंदर चार डायोड है
और एक लोड रजिस्टर है RL। हाफ वेव रेक्टिफायर में एक डायोड था। फुल वेव सेंटर टेप रेक्टिफायर में दो डायोड थे। और
फुल वेव ब्रिज रेक्टिफायर में चार डायोड होंगे। कितने होंगे? फोर। ठीक है? अब आगे देखो।
नाउ ब्रिज रेक्टिफायर अवॉयड द नीड ऑफ सेंटर टेप ट्रांसफार्मर। इसमें हमें कोई सेंटर टेप ट्रांसफार्मर की रिक्वायरमेंट
नहीं होती है। क्लियर है? चलिए नाउ अब इसको थोड़ा सा समझ लेते हैं वर्किंग को इसकी। वर्किंग अगेन सेम है और
सिंपल है। देखिए तो अगर आपको एग्जाम में फुल वेव ब्रिज रेक्टिफायर पूछा जाता है तो सबसे पहले आप डिफाइन करेंगे। उसके बाद ये
डायग्राम बनाएंगे। है ना? यह आपका स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर है। यहां से एसी को अप्लाई करेंगे और यह आपके चार डायोड लगे
हुए हैं। यहां पर आपका यह लोड रजिस्टर है। इसी तरह से आपको डायग्राम बनाना है। D1, D2, D3, D4 अब देखो क्या होगा ना?
ड्यूरिंग पॉजिटिव साइकिल, ड्यूरिंग पॉजिटिव साइकिल। देखो पॉजिटिव साइकिल के समय पर क्या होगा? सीधी सी बात है।
पॉजिटिव साइकिल के समय पर ये टर्मिनल पॉजिटिव होगा, नीचे वाला नेगेटिव होगा। अब मेरी बात को जरा ध्यान से देखना। यह
पॉजिटिव है। तो यह पॉजिटिव है। तो इसका मतलब यहां पर देखो इस डायोड को देखो। इस डायोड का P पॉजिटिव से कनेक्ट है। तो ये
वाला जो डायोड है ये फॉरवर्ड बायस में होगा। इसका मतलब ये हमारा शॉर्ट सर्किट हो जाएगा। और यहां पर देखो ये P है। ये P और
ये P इसके N से कनेक्ट है। तो इसका मतलब ये वाला जो डायोड है ये ओपन सर्किट होगा। तो ड्यूरिंग पॉजिटिव साइकिल ड्यूरिंग
पॉजिटिव साइकिल ये फॉरवर्ड बायस होगा या रिवर्स बायस होगा। बोलो बात समझ में आ रही है? तो पॉजिटिव साइकिल के समय पर हमारा
करंट ऐसे फ्लो करेगा। यह तो शॉर्ट सर्किट है ना। यहां से करंट फ्लो करेगा। यहां से करंट फ्लो नहीं करेगा। तो यहां से करंट
फ्लो करेगा। अब यहां पर करंट पहुंचा। अब देखो ये हमारा पॉजिटिव है। अब यहां पर ये डायोड का नेगेटिव है। n टाइप n है ना ये।
तो इसका मतलब ये वाला जो डायोड है ये ओपन हो जाएगा। तो देखो ये डायोड ओपन होगा। ये डायोड भी ओपन होगा। ये शॉर्ट सर्किट होगा।
अब हमारा जो करंट है वो ऐसे फ्लो करके आएगा इस तरह से। अब देखो ये हमारा पॉजिटिव टर्मिनल था। तो हमारा पॉजिटिव ऐसे गया,
ऐसे गया, ऐसे गया और ऐसे आ गया। इसका मतलब ये वाला जो डायोड है ये क्या होगा? अगेन हमारा शॉर्ट सर्किट हो जाएगा। तो इसका
मतलब ये और ये डायोड शॉर्ट सर्किट होंगे। ये दोनों ओपन सर्किट होंगे। तो हमारा करंट कैसे फ्लो करेगा? इस तरह से। इस तरह से
करंट फ्लो करेगा। तो हमें आउटपुट मिलेगा। अब देखो इस डायग्राम को। अगर ये पॉजिटिव है, ये नेगेटिव है, तो हमारा करंट ऐसे
फ्लो करेगा। ये दोनों शॉर्ट सर्किट हो जाएंगे। ये दोनों ओपन सर्किट हो जाएंगे। करंट ऐसे फ्लो करेगा। तो इसका मतलब
रजिस्टर से करंट फ्लो कर रहा है। तो यहां पर हमें आउटपुट मिलेगा V नॉट। तो ड्यूरिंग पॉजिटिव साइकिल हमें यहां पर आउटपुट मिल
जाएगा जो कि इनपुट को ही फॉलो करेगा। बोलो बात समझ में आ गई? आगे बढ़ो। नाउ ड्यूरिंग नेगेटिव साइकिल तो नेगेटिव साइकिल के समय
पर क्या होगा? ये नेगेटिव टर्मिनल होगा। ये पॉजिटिव टर्मिनल होगा। है ना? ये नेगेटिव ये पॉजिटिव। अब जरा ध्यान देना।
अगर यह पॉजिटिव है तो पॉजिटिव के केस में नीचे वाला पॉजिटिव है। देखो यहां से समझ लीजिए यह पॉजिटिव है। तो पॉजिटिव अगर ये
है तो ये फॉरवर्ड बायस होगा। ये रिवर्स बायस होगा। इसका मतलब ये शॉर्ट सर्किट होगा और ये ओपन सर्किट होगा। हमारा करंट
फ्लो होगा इधर आएगा। अब ये पॉजिटिव है। तो देखो ये रिवर्स बायस हो जाएगा। मतलब ये ओपन हो जाएगा। तो करंट इधर से फ्लो करेगा
और यह हमारा फॉरवर्ड बायस हो जाएगा। यह शॉर्ट सर्किट हो जाएगा। तो इस केस में यह दोनों ओपन होंगे। यह दोनों शॉर्ट होंगे।
तो नेगेटिव साइकिल के केस में यह दोनों ओपन हो जाएंगे और ये दोनों शॉर्ट हो जाएंगे क्योंकि यह पॉजिटिव है तो यह शॉर्ट
होगा। करंट ऐसे फ्लो करेगा ऐसे फ्लो करके इधर आ जाएगा। तो इसका मतलब यहां पर भी हमारा जो आउटपुट है वो इनपुट को क्या कर
रहा है? फॉलो कर रहा है। बोलो बात समझ में आ रही है? अब यहां पर आप आउटपुट वेवफॉर्म देख सकते हैं। आउटपुट वेवफॉर्म बिल्कुल
वैसे ही बनेगी जैसे हमारी सेंटर टेप में बनी थी। अब इसके बाद यहां पर इनके आते हैं परफॉर्मेंस पैरामीटर। तो परफॉर्मेंस
पैरामीटर जैसे हमारे हाफ वेव रेक्टिफायर के थे वैसे ही परफॉर्मेंस पैरामीटर हमारे फुल वेव रेक्टिफायर के भी हैं। बिल्कुल
सिमिलर तरीके से ड्राइव होंगे। बस वैल्यू डबल हो जाएगी। है ना? देखो अब आप यहां पर मैं वन बाय वन आपको बता देता हूं। देखो
पहला परफॉर्मेंस पैरामीटर में हमें एवरेज वैल्यू निकालनी है। तो डेरिवेशन का तरीका वही है जो पहले था। बस आंसर डबल आएगा।
देखो वहां पर आया था imm /π। यहां पर आएगा 2M /π। तो फुल वेव के केस में एवरेज डीसी करंट की वैल्यू होती है 2M / 2im/π
और डीसी वोल्टेज की वैल्यू होती है 2VM/π बस वैल्यू डबल हो गई। RMS की वैल्यू अगर आप देखेंगे तो RMS की वैल्यू वहां पर होती
थी IM / 2 यहां पर हो गई IM / 2 वहां पर था VM / 2 यहां पर आ जाएगा VM / 2 तो आपको बस ये वैल्यू याद होनी चाहिए। रिपल फैक्टर
देखो वहां पर रिपल फैक्टर की डेफिनेशन अगेन सेम वहां पर रिपल फैक्टर की वैल्यू आई थी 1.21 यहां पर रिपल फैक्टर की वैल्यू
आएगी 0.482 बाकी डेफिनेशन वही है जो वहां पर थी कुछ भी अंतर नहीं है।
एफिशिएंसी की अगर मैं बात करूं तो देखो एफिशिएंसी को ड्राइव करने का तरीका वही है जो वहां पर था। हां यहां पर एफिशिएंसी
81.2% आएगी। जबकि वहां पर एफिशिएंसी 40.6% आई थी। पीक इनवर्स वोल्टेज। देखो पीक इनवर्स
वोल्टेज में थोड़ा सा वेरिएशन आता है। मैं आपको यहां पर बता देता हूं। देखो सेंटर टेप के लिए पीक इनवर्स वोल्टेज होता है 2
vm और फुल वेव ब्रिज रेक्टिफायर के लिए पीक इनवर्स वोल्टेज होता है vm। अब यहां पर एक चीज मैं आपको और क्लियर कर दूं। जो
सेंटर टेप ट्रांसफार्मर होता है। है ना? और जो फुल वेव रेक्ट फुल वेव ब्रिज रेक्टिफायर होता है। दोनों में से कौन सा
ज्यादा यूज़ होता है? तो जो हमारा फुल वेव ब्रिज रेक्टिफायर है ये ज्यादा यूज़ होता है क्योंकि इसमें हम चार डायोड यूज़ करते
हैं और यहां पर हमारा जो फेल होना मतलब जो फुल वेव ब्रिज रेक्टिफायर है इसमें हम इसको हम हाई वोल्टेज के लिए भी यूज़ कर
सकते हैं जो कि सेंटर टेप ट्रांसफार्मर है उसको केवल लो वोल्टेज के लिए यूज़ किया जाता है। हाई वोल्टेज के लिए वो काम नहीं
करता है। तो इंपॉर्टेंट ज्यादा कौन है? फुल वेव ब्रिज रेक्टिफायर। और सेंटर टेप ट्रांसफार्मर में जो पीक वैल्यू होती है
वो 2VM होती है और इसी की वजह से हम इसको यूज कम करते हैं। जबकि फुल वेव ब्रिज रेक्टिफायर में पीक वैल्यू VM के बराबर
होती है। अब पीक वैल्यू के बढ़ने से नुकसान क्या है? अगर पीक वैल्यू बढ़ जाएगी तो पीक वैल्यू के बढ़ने का मतलब है कि जो हमारे
डायोड हैं वो बहुत ज्यादा हाई कॉन्फ़िगरेशन के डायोड हमें यूज़ करने पड़ेंगे। बहुत ज्यादा कॉस्टली वाले डायोड हमें यूज़ करने
पड़ेंगे। अगर पीक वैल्यू कम होगी तो जो सिंपल जो नॉर्मल डायोड होते हैं उनको हम यूज कर सकते हैं। रिपल फ्रीक्वेंसी यहां
पर डबल हो जाती है। हाफ वेव में सेम रहती है। अब देखो यहां पर पूरे के पूरा जो समरी है ना पैरामीटर की वो मैंने इस टेबल में
बना रखी है। पूरी समरी हाफ वेव की भी फुल वेव की भी। है ना? तो देखो यहां पर पैरामीटर हैं। यहां पर हाफ वेव रेक्टिफायर
के पैरामीटर हैं। यहां पर सेंटर टेप के पैरामीटर हैं। यहां पर फुल वेव ब्रिज रेक्टिफायर के पैरामीटर हैं। जैसे अगर मैं
बात करूं नंबर ऑफ डायोड की तो हाफ वेव रेक्टिफायर में एक डायोड यूज़ होता है। सेंटर टेप में दो यूज़ होते हैं। फुल वेव
में चार यूज़ होते हैं। अगर बात करें हम एफिशिएंसी की तो हाफ वेव की 40.6 है। इन दोनों की 81 टू 81.2 है। रिल फैक्टर की
बात करूं तो हाफ वेव का 1.21 है और इन दोनों का 0.48 है। अगर पीक इनवर्स वोल्टेज की बात करें तो हाफ वेव का VM है। सेंटर
टेप का 2 vm है और इसका अगेन VM है। बस ये यहां पर वेरीरी कर रहा है थोड़ा सा। अगर हम लोड करंट की बात करें तो हाफ वेव में IM /
पाई है। इन दोनों में डबल हो गया। और अगर बात करें RMS की तो इसमें IM/2 है। इन दोनों में IM / 2 है। और अगर बात करें
रिपल फ्रीक्वेंसी की तो इसमें FI है और इन दोनों में 2FI है। तो ये पूरी समरी है रेक्टिफायर की। क्लियर है? तो यहां पर ये
पूरी हमारी क्या है? समरी है रेक्टिफायर की। और यहां पर मैंने ये भी लिखा है कि हम ब्रिज रेक्टिफायर को क्यों यूज़ करते हैं
सेंटर टेप रेक्टिफायर के रेस्पेक्ट में? तो वो मैं आपको बता ही चुका हूं। क्लियर है? तो देखिए यहां पर हमारा रेक्टिफायर तो
कंप्लीट हो गया। अब इसके बाद हमें स्टार्ट करना है क्लिपर एंड क्लैंपर। क्लिपर एंड क्लैंपर। तो क्लिपर एंड क्लैंपर के लिए
हमें बहुत सारे न्यूमेरिकल सॉल्व करने हैं क्योंकि वहां से न्यूमेरिकल ही पूछे जाते हैं। तो अब हम पढ़ेंगे क्लिपर, क्लैंपर,
वोल्टेज मल्टीप्लायर सर्किट, जनरल डायोड और स्पेशल पर्पस डायोड। है ना? तो आगे के जो हमारे टॉपिक हैं लगभग हमारे एक से 1ढ़
घंटे में कंप्लीट हो जाएंगे। लेकिन यहां पर यहां पर अभी मैं वीडियो को यहीं पर रोक रहा हूं। इसके बाद आगे वाला जो पार्ट है
वह हम शाम को 8:00 बजे स्टार्ट करेंगे। अभी मैंने जो आपको यह पढ़ाया जहां तक मैंने पढ़ाया है इसको एक बार रिवाइज कर
लीजिए। इसके नोट्स आपको गेटवे क्लासेस एप्लीकेशन पर मिल जाएंगे। तो गेटवे क्लासेस एप्लीकेशन से नोट्स को देख कर के
आप यहां तक का पार्ट रिवाइज कर लीजिए। उसके बाद हम स्टार्ट करेंगे क्लिपर एंड क्लैंपर। क्योंकि क्लिपर क्लैंपर के
न्यूमेरिकल को अच्छे से समझने के लिए आपको किचॉफ लॉ आने चाहिए और डायोड की बेसिक प्रॉपर्टी आनी चाहिए। तो इसको आप रिवाइज
करिए। उसके बाद हम आगे का पार्ट स्टार्ट करेंगे शाम को 8:00 बजे। ठीक है ना? तो हम यहां पर इसको
इस यूनिट का जो नेक्स्ट बचा हुआ पार्ट है उसको हम कंटिन्यू करेंगे। 8 PM है ना तो 8:00 बजे स्टार्ट करेंगे
क्लीपर एंड क्लैंपर तो हम 8:00 बजे सीधे स्टार्ट करेंगे क्लिपर एंड क्लैंपर से तो अगर आपको क्लिपर क्लैंपर में कोई डाउट है
तो हम सीधे 8:00 बजे क्लीपर क्लैंपर से ही स्टार्ट करेंगे क्लियर है तो अभी मैं वीडियो को यहीं पर रोक रहा हूं है ना उसके
बाद इसको कंटिन्यू करेंगे शाम को 8:00 बजे जब तक आप इसको एक बार रिवाइज कर लीजिए नोट्स की हेल्प से नोट्स आपको गेटवे
क्लासेस एप्लीकेशन पर मिल जाएंगे
सेमीकंडक्टर डायोड एक pn जंक्शन डिवाइस है, जो एक ही सिलिकॉन या जर्मेनियम क्रिस्टल के दो हिस्सों को p-टाइप और n-टाइप डोप करके बनाया जाता है। यह केवल एक दिशा में करंट प्रवाहित करने की अनुमति देता है, क्योंकि p-टाइप से n-टाइप की ओर फॉरवर्ड बायस में करंट फ्लो होता है, जबकि रिवर्स बायस में डिप्लीशन लेयर चौड़ी होकर करंट को ब्लॉक करती है।
जेनर ब्रेकडाउन में, उच्च डोपिंग के कारण पतली डिप्लीशन लेयर में इलेक्ट्रॉन सीधे p-टाइप से n-टाइप में टनल कर जाते हैं, यह कम रिवर्स वोल्टेज (5V से कम) पर होता है। एवलांच ब्रेकडाउन में, रिवर्स वोल्टेज बढ़ने से मोबाइल चार्ज कैरियर्स तेजी से इमोबाइल आयनों से टकराकर नए इलेक्ट्रॉन-होल जोड़े बनाते हैं, जिससे बड़ा करंट फ्लो होता है, यह अधिक वोल्टेज (5V से अधिक) पर होता है।
फुल वेव रेक्टिफायर एसी वोल्टेज के दोनों हाफ साइकिल (पॉजिटिव और नेगेटिव) को डीसी में बदलता है, जिससे आउटपुट वेवफॉर्म में कम रिपल होता है। यह सेंटर-टैप या ब्रिज कॉन्फिगरेशन में बनाया जा सकता है, और हाफ वेव रेक्टिफायर की तुलना में अधिक एफिशिएंसी और बेहतर वोल्टेज रेगुलेशन प्रदान करता है।
क्लिपर सर्किट का उपयोग वेवफॉर्म के कुछ हिस्से (ऊपर या नीचे) को काटने (क्लिप) करने के लिए किया जाता है, जिससे आउटपुट वोल्टेज एक निश्चित स्तर तक सीमित हो जाता है। क्लैंपर सर्किट वेवफॉर्म के डीसी स्तर (ऑफसेट) को बदलता है, पूरी वेवफॉर्म को ऊपर या नीचे शिफ्ट करता है, बिना इसके शेप को बदले।
जेनर डायोड रिवर्स बायस में ब्रेकडाउन वोल्टेज (Vz) पर संचालित होता है और इस वोल्टेज को स्थिर रखता है, भले ही इनपुट वोल्टेज या लोड करंट में बदलाव हो। इसे वोल्टेज रेगुलेटर के रूप में उपयोग करने के लिए, इसे एक सीरीज रेसिस्टर के साथ लोड के समानांतर जोड़ा जाता है, ताकि लोड पर स्थिर वोल्टेज प्राप्त हो सके।
LED (लाइट एमिटिंग डायोड) फॉरवर्ड बायस में इलेक्ट्रॉन और होल के रिकॉम्बिनेशन से प्रकाश उत्सर्जित करता है, इसका उपयोग डिस्प्ले और इंडिकेशन में होता है। टनल डायोड का उपयोग टनलिंग इफेक्ट पर आधारित है, जो नेगेटिव रेजिस्टेंस क्षेत्र प्रदर्शित करता है, इसका उपयोग उच्च-आवृत्ति ऑसिलेटर और स्विचिंग सर्किट में किया जाता है।
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