फार्माकोविजिलेंस परीक्षा: महत्वपूर्ण प्रश्नों की पूरी गाइड
यह वीडियो फार्माकोविजिलेंस की परीक्षा की तैयारी के लिए एक रणनीतिक मार्गदर्शिका है। इसमें सभी 6 यूनिट्स को कवर किया गया है, जिसमें बताया गया है कि कौन से प्रश्न 100% (फिक्स) हैं और किन्हें प्राथमिकता के आधार पर पढ़ना चाहिए।
यूनिट 1: 100% फिक्स टॉपिक्स
इस यूनिट से प्रश्न हर बार पूछे जाते हैं और इन्हें छोड़ा नहीं जा सकता।
- गुड क्लिनिकल प्रैक्टिसेस (ICH-GCP गाइडलाइन्स): 100% प्रश्न यहाँ से आएगा।
- इन्फॉर्म्ड कंसेंट प्रोसेस: यह भी 100% पूछा जाता है। इन्वेस्टिगेटर द्वारा सब्जेक्ट को समझाने के बाद लिए जाने वाले इस दस्तावेज़ की पूरी प्रक्रिया याद रखें।
दूसरी प्राथमिकता: यदि समय बचे तो "शेड्यूल वाई" और "ICMR" गाइडलाइन्स को पढ़ सकते हैं। ये वैकल्पिक वर्षों में पूछे जाते हैं लेकिन महत्वपूर्ण हैं।
यूनिट 2: क्लिनिकल ट्रायल्स (पूरी तरह से न छोड़ें)
इस यूनिट से 2-3 प्रश्न तय हैं, इसलिए इसे पूरी तरह से नहीं छोड़ना चाहिए।
- क्लिनिकल ट्रायल्स के प्रकार और डिजाइन:
- फेज़: फेज़ 0, फेज़ 1, फेज़ 2, फेज़ 3, फेज़ 4 (100%)।
- स्टडी के प्रकार:
- एक्सपेरिमेंटल स्टडीज़: जब इन्वेस्टिगेटर सक्रिय रूप से दवा दे रहा हो। इसमें RCT (रैंडमाइज़्ड कंट्रोल्ड ट्रायल) और नॉन-रैंडमाइज़्ड ट्रायल शामिल हैं (100%)।
- ऑब्ज़र्वेशनल स्टडीज़: इसमें कोहर्ट स्टडीज़ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। उदाहरण: धूम्रपान करने वालों और स्वस्थ जीवनशैली जीने वालों पर 10 साल का अध्ययन यह दर्शाता है कि धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर का कारण बनता है (100%)।
- क्लिनिकल ट्रायल में भूमिकाएँ:
- इन्वेस्टिगेटर: ट्रायल करता है।
- स्टडी कोऑर्डिनेटर: इन्वेस्टिगेटर की सहायता करता है।
- स्पॉन्सर: सारा धन, उपकरण और दवा उपलब्ध कराता है।
- CRO (कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च ऑर्गनाइज़ेशन): स्पॉन्सर द्वारा नियुक्त, पूरे ट्रायल की निगरानी करता है।
- मॉनिटर: यह जाँचता है कि सब्जेक्ट्स के साथ सही व्यवहार हो रहा है, उन्हें सही मुआवजा मिल रहा है, और कोई ओवरडोज़ नहीं किया जा रहा है।
यूनिट 3: एडवर्स ड्रग रिएक्शन (ADR) - बहुत महत्वपूर्ण
यह यूनिट 100% पूछी जाती है और इस पर पूरी पकड़ होनी चाहिए।
- ADR की परिभाषा (WHO के अनुसार): जब सामान्य खुराक में भी दवा लेने पर शरीर में असामान्य प्रतिक्रिया होती है।
- ADR के प्रकार: Type A, B, C, D, E (100%)।
- ADR का पता लगाना (Detection), रिपोर्टिंग, गंभीरता (Severity/Seriousness), पूर्वानुमान (Prediction), रोकथाम (Prevention) और प्रबंधन (Management): इन सभी पहलुओं पर प्रश्न आते हैं। उदाहरण: सामान्य एलर्जी बनाम एनाफिलेक्टिक शॉक (गंभीरता में अंतर) (Comprehensive Review of Pulmonary and Critical Care Medicine)।
दूसरी प्राथमिकता:
- इन्वेस्टिगेटर ब्रोशर: इसमें दवा से संबंधित सभी जानकारी होती है।
- प्रोटोकॉल: यह क्लिनिकल ट्रायल के लिए एक फिक्स्ड रूल या रोड मैप होता है।
यूनिट 4: फार्माकोविजिलेंस का इतिहास और प्रगति
- थैलिडोमाइड त्रासदी: इस घटना के बाद WHO ने फार्माकोविजिलेंस प्रोग्राम शुरू किया (100%)।
- भारत में समयरेखा:
- 1997: भारत ने WHO से जुड़ा (एम्स दिल्ली से)।
- 2004 तक: कार्यक्रम जारी रहा।
- 2004: नेशनल फार्माकोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया लॉन्च किया गया।
- 2010: इसका नाम बदलकर फार्माकोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (PvPI) रखा गया।
प्राथमिकता श्रेणियाँ: प्रथम प्राथमिकता (थैलिडोमाइड + भारतीय इतिहास), फिर द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ प्राथमिकता के टॉपिक्स को समय के अनुसार पढ़ें।
यूनिट 5: छोटे लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न
इस यूनिट से अक्सर 15 अंकों का प्रश्न (जिसमें 4 उप-प्रश्न होते हैं) पूछा जाता है।
- ICD (इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीज): यह प्रत्येक बीमारी को एक अद्वितीय कोड प्रदान करता है।
- INN (इंटरनेशनल नॉन-प्रोपराइटरी नेम): यह दवाओं का सार्वभौमिक नाम है, जिस पर कोई पेटेंट अधिकार नहीं होता। उदाहरण: पैरासिटामोल (PCM)।
- पैसिव और एक्टिव सर्विलेंस: यह भी एक अनिवार्य प्रश्न है।
- वैक्सीन सेफ्टी सर्विलेंस।
प्राथमिकता: पहले ICD और INN, फिर पैसिव/एक्टिव सर्विलेंस, फिर वैक्सीन सेफ्टी और अंत में अन्य टॉपिक्स को पढ़ें।
यूनिट 6: अवधारणाओं को समझना (एक साथ पढ़ें)
- फार्माकोएपिडेमियोलॉजी: मार्केट में गई दवा का आबादी पर प्रभाव (डिजीज इन पॉपुलेशन) का अध्ययन।
- फार्माकोइकोनॉमिक्स: कम पैसे में बेहतर इलाज कैसे किया जाए।
- सेफ्टी फार्माकोलॉजी: यह सुनिश्चित करना कि दवा शरीर के महत्वपूर्ण और गैर-महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित न करे।
प्रश्न पैटर्न: "निम्नलिखित पर नोट लिखें: फार्माकोएपिडेमियोलॉजी का महत्व, फार्माकोइकोनॉमिक्स की उपयोगिता, सेफ्टी फार्माकोलॉजी का महत्व।"
निष्कर्ष: फोकस्ड तैयारी के लिए टिप्स
- पहले इंट्रोडक्शन वीडियो देखें: इससे पूरे सिलेबस का एक रोडमैप तैयार हो जाएगा।
- लेक्चर को 2x स्पीड पर सुनें: इससे समय बचेगा और जानकारी जल्दी ग्रहण होगी।
- हर यूनिट की प्राथमिकता तय करें: पहले 100% फिक्स टॉपिक्स को कवर करें, फिर दूसरी प्राथमिकता वालों को पढ़ें।
- उदाहरणों के साथ पढ़ें: कोहर्ट स्टडी, ADR के प्रकार जैसे उदाहरणों को समझकर याद करें, इससे अवधारणा मजबूत होगी।
इस रणनीति के साथ तैयारी करें और "डेप्थ ऑफ बायोलॉजी" के साथ जुड़े रहें। हैप्पी लर्निंग!
अब नेक्स्ट हम देखेंगेट क्वेश्चंस ऑफ विजिलेंस। तो सबसे पहले बात करते हैं यूनिट वन। यहां पर मैं आपको यह बताने वाला
हूं कि कौन सी यूनिट में से किस तरह के क्वेश्चन पुट अप होते हैं। किस तरह के क्वेश्चन को आप स्किप कर सकते हैं। किस
तरह के क्वेश्चन को आप बिल्कुल भी स्किप नहीं कर सकते। कौन से क्वेश्चन रिपीट होते हैं? सब कुछ बात करेंगे। डिटेल में बात
करेंगे। तो सबसे पहले बात करेंगे यूनिट वन की। यूनिट वन में आपसे पूछा जाता है गुड क्लीनिकल प्रैक्टिसेस आईसीएच जीसीपी
गाइडलाइन। ये 100% आपको करके जाना है। 100% मतलब 100% ही होता है। फिर आपसे पूछा जाता है इनफॉर्म्ड कंसेंट प्रोसेस। ये
क्वेश्चन भी आपको 100% करके जाना है। तो जैसा कि आप जानते हैं इनफॉर्म्ड कंसेंट। हां सर याद आ रहा है। इनफॉर्म्ड कंसेंट एक
इस तरह का डॉक्यूमेंट होता है जो कि सब्जेक्ट साइन करता है। मैं इन्वेस्टिगेटर हूं। मैं क्लीनिकल ट्रायल को परफॉर्म
करूंगा। सब्जेक्ट वो है जिस पे क्लीनिकल ट्रायल परफॉर्म होगा। तो इन्वेस्टिगेटर जब समझाएगा ना कि देखो भैया इतनी दवाई देनी
पड़ेगी इस टाइम पर देनी पड़ेगी तो इन्वेस्टिगेटर सब्जेक्ट को समझा रहा है तो फिर वो साइन लेगा सब्जेक्ट के कि हां
मैंने सब समझा दिया तो ये साइन किस पे लेंगे इनफॉर्म्ड कंसेंट फॉर्म पे लेंगे तो ये दोनों क्वेश्चन इस यूनिट से करने ही
करने हैं। क्या आपको ये बात क्लियर हुई? उसके बाद अगर आपके पास टाइम बचता है तो आप शेड्यूल व और आईसीएमआर को देख सकते हैं।
यह अल्टरनेट इयर्स में आते हैं। पर यह 100% है। ये भी 100% है। क्या यूनिट वन क्लियर है? इतना ही करना है यूनिट वन में
ज्यादा नहीं। फिर नेक्स्ट आते हैं यूनिट टू के बारे में। ये क्वेश्चंस लिखे हैं यूनिट वन के।
यूनिट टू तो बिल्कुल भी स्किप नहीं करनी है। यूनिट टू से दो से तीन क्वेश्चन बनेंगे ही बनेंगे। जैसे कि सबसे पहला
जरूरी क्वेश्चन क्लीनिकल ट्रायल के टाइप्स बताओ। डिजाइन बताओ। टाइप्स मतलब कि वही फेज ज़ीरो, फज़ वन, फज़ टू, फज़ थ्री, फज़ फोर।
है ना? क्लीनिकल ट्रायल की डिज़ भी होती है। चलिए, तो ये 100% करना ही करना है। फिर मैंने आपको बताया था एक्सपेरिमेंटल
स्टडी इस तरह की स्टडी होती है। जब इन्वेस्टिगेटर एक्टिवली ड्रग दे रहा है पेशेंट को। पेशेंट मतलब सब्जेक्ट को। तो
जो भी मेरा सब्जेक्ट है, मैं उसको ड्रग दे रहा हूं तो वो कंडीशन होती है एक्सपेरिमेंटल स्टडी। इसमें आती है आरसीटी
रेंडमाइज कंट्रोल ट्रायल और नॉन रेंडमाइज वाली। यह भी 100% है। यह भी करना ही करना है। है ना? क्लनिकल ट्रायल के साथ ही आता
है ये। उसके बाद आती है आपकी ऑब्जरवेशनल स्टडी। 100% करनी है। ऑब्ज़रवेशनल स्टडीज़ में आपको कोहर्ट स्टडीज़ आती है। कोहर्ट
होता है। रेट्रोप्रोस्पेक्टिव कोहर्ट होता है। अलग-अलग तरह की कोहर्ट स्टडी होती है। जैसे मैंने इंट्रोडक्शन वीडियो में आपको
बताया भी था कि पांच स्मोकर हैं और पांच बिल्कुल हेल्दी लाइफस्टाइल जीने वाले हैं। तो आने वाले 10 सालों में उन पांच में से
जो पांच स्मोकिंग करते थे उनमें से चार को लंग कैंसर होगा ही होगा। और इधर जो हेल्दी लाइफस्टाइल जीते थे उन पांच में से शायद
किसी एक को लंग कैंसर हो। ठीक है? तो हमने यह पता करा कि स्मोकिंग लीड टू लंग कैंसर। तो यही होती है कोहट स्टडी।
फिर मैंने आपको इंट्रोडक्शन वीडियो में बताया था कि इन्वेस्टिगेटर का काम होता है क्लीनिकल ट्रायल को परफॉर्म करना। स्टडी
कोऑर्डिनेटर इन्वेस्टिगेटर की हेल्प करती है। स्पोंसरर जो सब कुछ चुनता है। सारा पैसा इकट्ठा करता है। सारे इक्विपमेंट
लाता है। ड्रग की अवेलेबिलिटी करवाता है। सब कुछ काम स्पॉन्सर का होता है। और स्पॉन्सर हायर करता है कंट्रोल सॉरी
कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन सीआरओ पीआरओ हेड क्वार्टर आप बोल सकते हैं। तो ये जो सीआरओ हेड क्वार्टर होती है
कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन यह सीआरओ हेड क्वार्टर पूरी तरह से ध्यान रखती है कि इन्वेस्टिगेटर स्टडी कोऑर्डिनेटर यह
सही से काम कर रहे हैं या नहीं कर रहे इनके अलावा एक मॉनिटर भी होता है और वो मॉनिटर का भी यही काम होता है नाम
से पता लग रहा है मॉनिटर है तो मॉनिटरिंग करेगा क्लीनिकल ट्रायल सही से हो रहा है यह जो पेशेंट आते हैं आपके पास सब्जेक्ट
इनको सब सही से समझाया इनफॉर्म कंसेंट पे साइन लिया इन सब्जेक्ट को पैसा सही से दे रहे हो? इनके ऊपर कोई जुल्म तो नहीं कर
रहे। ड्रग ज्यादा तो नहीं दे रहे। जल्दी एक्शन का पता लगाने के लिए ओवरडोज़ तो नहीं कर रहे। ये सब चीजें चेक करेगा मॉनिटर।
और पीआरओ हेड क्वार्टर भी ध्यान रखते हैं। तो यहां से इंपॉर्टेंट की बात करूं। 100% 100% 100% और इन चारों में से एक 100% यह
यूनिट ऐसी है ना कि यहां से दो से तीन क्वेश्चन बनेंगे। है ना? दो तो फिक्स है। फिक्स है। इसको पढ़ना ही है। इसमें से कुछ
स्किप करना ही नहीं है। प्रायोरिटी की बात करूं। कोई प्रायोरिटी नहीं है। सारी फर्स्ट प्रायोरिटी पे है। चलिए यूनिट थ्री
की बात करते हैं। यूनिट थ्री में आपको सबसे पहले जो पढ़ेंगे वो है एडवर्स ड्रग रिएक्शन। यह पढ़ना ही पढ़ना है। और एडवर्स
ड्रग रिएक्शन इस तरह की रिएक्शन होती है। जैसे मान लीजिए मुझे बुखार आ रहा था। बुखार आ रहा था तो मैंने पैरासिटामॉल ले
ली। क्या ली मैंने? पैरासिसमॉल ताकि मेरा बुखार सही हो जाए। पर मुझे पता लगा कि जब मैंने उस दवाई को नॉर्मल डोज पर भी लिया
ना तो भी मुझे एबनॉर्मल रिएक्शनंस आना शुरू हो गई। तो एडवर्स ड्रग रिएक्शन अकॉर्डिंग टू वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन
अकॉर्डिंग टू डब्ल्यूho जब आप ड्रग को नॉर्मल डोज़ में भी लेते हैं तो भी आपकी बॉडी में एब्नॉर्मल रिएक्शंस आ जाती है।
उसी एब्नॉर्मल रिएक्शंस को एडवर्स ड्रग रिएक्शन कहते हैं। तो एडवर्स ड्रग रिएक्शन क्या होती है? इसके अलग-अलग तरह के टाइप्स
होते हैं। जैसे टाइप ए, टाइप बी, टाइप सी, टाइप डी, टाइप ई। अलग-अलग तरह के टाइप होते हैं। ठीक है? बहुत इंपॉर्टेंट 100%
करके जाना है। फिर अब एडवर्स ड्रग रिएक्शन हो गया तो उसको डिटेक्ट कैसे करोगे? कि एडवर्स ड्रग रिएक्शन हुआ। है ना?
डिटेक्टिंग की प्रोसेस क्या है? फिर डिटेक्ट कर लिया तो अब उसको रिपोर्ट कैसे करोगे? रिपोर्टिंग की प्रोसेस क्या है? तो
डिटेक्ट करना, रिपोर्ट करना। फिर हमें यह चेक करना कि एडवर्स ड्रग रिएक्शन जो आया है उसकी सीवियरिटी कितनी है? सीरियसनेस
कितनी है? पता लगा कि एग एडवर्स ड्रग रिएक्शन तो कि सिर्फ एलर्जी हो गई नॉर्मल सी। एग एडवर्स ड्रग रिएक्शन ऐसी आई कि
एलर्जिक शोक हो गया। पेशेंट ही पहुंच गया ऊपर। है ना? तो अलग-अलग सीवियरिटी अलग-अलग सीरियसनेस की एडवर्स ड्रग रिएक्शंस होती
है। फिर उनसे किस तरह से प्रेडिक्ट किया जाए? उन्हें किस तरह से प्रिवेंट किया जाए? किस तरह से उन्हें मैनेज किया जाए?
तो एडवर्स ड्रग रिएक्शन बहुत ईजी है। सबसे पहले एडवर्स ड्रग रिएक्शन की डेफिनेशन, फिर एडवर्स ड्रग रिएक्शन के टाइप्स, फिर
एडवर्स ड्रग रिएक्शन को किस तरह से डिटेक्ट करोगे, किस तरह से रिपोर्ट करोगे, किस तरह से उसकी सीवियरिटी चेक करोगे,
सीरियसनेस चेक करोगे, कैसे उसको प्रेडिक्ट करोगे, कैसे उसको प्रिवेंट करोगे और कैसे मैनेज करोगे? मैनेजमेंट भी बहुत
इंपॉर्टेंट है एडवर्स डग रिएक्शन का। 100% उसके बाद आप चाह तो इनमें से कुछ पढ़ सकते
हैं। पर 100% 100% ये करके ही जाना है। यही क्वेश्चन है आपका। है ना? फिर चाहे तो इन्वेस्टिगेटर ब्रोस्टर में तो सारी आपकी
वो ड्रग की डिटेल आती है। ईजी है बहुत ईजी है। और प्रोटोकॉल का मतलब होता है फिक्स्ड रूल।
जैसे कि मान लीजिए मुझे क्लीनिकल ट्रायल करना है। अब मुझे आता ही नहीं क्लीनिकल ट्रायल करना। तो मेरे पास एक फिक्स्ड रूल
होते हैं। एक रोड मैप होता है कि इस तरह से आपको क्लीनिकल ट्रायल करना है। उसे कहते हैं प्रोटोकॉल। प्रोटोकॉल का मतलब
होता है फिक्स्ड रूल। क्लियर? चलिए आगे चलते हैं। यह है आपकी यूनिट नंबर थ्री। सारे क्वेश्चंस लिखे हुए हैं। यूनिट फोर
की बात करते हैं। यह बहुत ही इंपॉर्टेंट है। हिस्ट्री एंड प्रोग्रेस ऑफ़ फार्माकोविजिलेंस। मैंने आपको इंट्रोडक्शन
वीडियो में भी बताया कि जब वह हुआ था थेलिडोमाइट ट्रेजडी तो उसके बाद WHO ने फार्माको विजिलेंस प्रोग्राम बनाया था। है
ना? तो शुरू में तो उसके साथ कोई नहीं था। फिर धीरे-धीरे कंट्री ऐड ऑन होने लगी। इंडिया भी ऐड ऑन हो गई थी 1997 में एम्स
दिल्ली से। 2004 तक ऐड ऑन में चली। फिर 2004 में इंडिया ने खुद का नेशनल फार्माको विवजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया ल्च किया।
फिर उस नेशनल फार्माकोविलेंस प्रोग्राम जो 2004 में लांच हुआ था इंडिया के द्वारा उसको रीमोडिफाई किया गया और नया नाम दिया
गया 2010 में फार्माकोजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया। तो ये पूरी हिस्ट्री आपको याद रखनी है। इसमें आप वो थैलेडोमाइट ट्रेजडी
भी जोड़ सकते हैं। ठीक है? फिर यह तो 100% हो गया। उसके बाद आपको करना है अ क्या करेंगे आप? उसके बाद ये कर लीजिए।
उसके बाद यह कर लीजिए फिर यह कर लीजिए। तो फर्स्ट प्रायोरिटी, सेकंड प्रायोरिटी, थर्ड प्रायोरिटी, फोर्थ प्रायोरिटी। इस
तरह से आप कर सकते हैं। अगर आपके पास समय कम है तो इसको बिल्कुल नहीं छोड़ना। फिर इसको बिल्कुल नहीं छोड़ना। समय के ऊपर है।
है ना? ठीक है? उसके बाद हम बात करते हैं यूनिट फिफ्थ की। यूनिट फिफ्थ में छोटे-छोटे
क्वेश्चंस बनते हैं। जैसे मान लीजिए 15 मार्क्स का कोई क्वेश्चन बना। अब 15 मार्क्स के क्वेश्चन में चार तरह के
क्वेश्चन दे दिए। तो वो सब इसी यूनिट से आएंगे। देखो किस तरह के क्वेश्चंस आते हैं। सबसे पहले आपसे पूछ लेंगे आईसीडी
बताइए। इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीज क्योंकि आईसीडी एक यूनिक नंबर प्रोवाइड करता है डिजीज को। डायबिटीज के लिए अलग,
कैंसर के लिए अलग। आईसीडी नंबर होते हैं। एक फिर इंटरनेशनल नॉन प्रोपिएटरी नेम ऑफ ड्रग। जैसे कि कोई मुझे कह रहा मैंने बोला
यार सर दर्द है। तो कोई बोल रहा है सर क्रोसिन ले लो। मैंने कहा सर दर्द है। कोई बोल रहा है क्रोसिन ले लो। कोई बोल रहा
मेटासिन ले लो। कोई बोल रहा है काल्पोल ले लो। कंफ्यूज हो गया ना मैं। अब एक ही नाम है फिर नॉन अप्रोप्रिएट नेम है जिस पर कोई
पैटर्न वेट नहीं करा सकते। कोई किसी का अधिकार नहीं है। वह इंटरनेशनलली एक्सेप्टेड भी होता है। वह होता है
पैरासिटोमॉल पीसीएम ले लो। तो जब कोई मुझे पीसीएम बोलेगा तो मुझे राहत मिलेगा कि हां भाई ये अपना नाम है। पीसीएम ले लो। है ना?
चलिए क्लियर हुआ? तो ये भी आपको पूछा जाता है। बहुत-बहुत इंपॉर्टेंट क्वेश्चन जो कि आना ही होता है वो है पैसिव एंड एक्टिव
सर्िलेंस। यह भी आपसे पूछा जाता है कि पैसिव और एक्टिव सर्विलेंस क्या होता है? मैंने बताया इंट्रोडक्शन वीडियो में। ठीक
है? वैक्सीन सेफ्टी यह सब वो छोटे-छोटे क्वेश्चंस हैं। मैंने आपको बोला ना कि जो 15 मार्क्स का क्वेश्चन बनता है उसमें चार
तरह के क्वेश्चन दे देते हैं। तो यही पूछेंगे पैसिव एक्टिव सर्लेंस बता दो, वैक्सीन सेफ्टी सर्िलेंस बता दो,
इंटरनेशनल नॉन प्रॉपर्टी नेम फॉर ड्रग बता दो, इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीज बता दो। यह क्वेश्चंस हैं और अगर यह मैं चारप
क्वेश्चन बता रहा हूं तो इसमें से तीन फिक्स रहते हैं और उनसे भी ज़्यादाेंट एरर्गस एरिस वीजीf
तैयार रहो इनके लिए तो ठीक है तो यहां पर प्रायोरिटी की बात करें तो दिस इज द फर्स्ट प्रायोरिटी एगस एरिस जीडी दिस इज द
सेकंड प्रायोरिटी है ना फिर वैक्सीन सेफ्टी सर्िलेंस थर्ड प्रायोरिटी और यह दोनों मिलाकर फोर्थ
प्रायोरिटी क्वेश्चंस लिखे हुए हैं आपको फिर यूनिट सिक्स या यूनिट सिक्स पूरी ही
पूछ लेते हैं 15 मार्क्स में पूरी पूरी पूछ लेते हैं। कुछ भी नहीं है इसमें। देखो फार्म एपिडेमोलॉजी मतलब कि जब ड्रग जब
आपकी ड्रग मार्केट में गई तो मार्केट में जाने के बाद वो एक पॉपुलेशन के पास जाएगी। ऑब्वियसली सर अगर ड्रग मार्केट में गई तो
एक पॉपुलेशन के पास जाएगी। तो आपकी ड्रग उन पॉपुलेशन को अफेक्ट तो नहीं कर रही। और अगर कर रही है तो किस तरह से कर रही है
उसकी स्टडी करना। स्टडी ऑफ डिजीज इन पपुलेशन उसको कहते हैं एपिमोलॉजी। ठीक है? फिर फार्माकोइकोनॉमिक्स मतलब कि
कम पैसों में बहुत अच्छा इलाज किस तरह से लेते हैं वो फार्माकोइकोनॉमिक्स में आता है। फिर आता है सेफ्टी फार्माकोलॉजी।
सेफ्टी फार्माकोलॉजी का मतलब होता है कि हमारी ड्रग हमारे वाइटल ऑर्गन नॉन वाइटल ऑर्गन के फंक्शन को स्ट्रक्चर को अफेक्ट
तो नहीं कर रही उसको चेक करना। उसे कहते हैं सेफ्टी फार्माकोलॉजी। तो यह तीनों एक साथ ही आते हैं। ठीक है? इसके अंदर
एग्जांपल है जो मैंने लेक्चर में बता रखा है वो एग्जांपल लिख देना। यह तो बहुत डिटेल में आपको याद हो ही जाएगा और ये
बहुत ईजी है। बहुत ईजी है। यहां पर प्रिंसिपल ऑफ एपिडेमोलॉजी को हम अप्लाई करते हैं फार्माकोलॉजी में। और
फार्माकोलॉजी का मतलब तो आपको पता ही है। स्टडी ऑफ़ ड्रग क्वेश्चन देखो यही बनेगा। राइट नोट ऑन
फॉलोइंग सिग्निफिकेंस ऑफ़ फार्माकोडेमोलॉजी, यूटिलिटी ऑफ़ फार्माको इकोनॉमिक्स, सिग्निफिकेंस ऑफ़ सेक्टिव
फार्माकोलॉजी। दैट्स इट। ठीक है? चलिए, तो आई होप आपको यहेंट क्वेश्चन का
वीडियो क्लियर हुआ होगा। और इससे पहले प्लीज इंट्रोडक्शन वीडियो मैंने बनाया है, वह देख लीजिएगा और लेक्चर को देख लीजिएगा।
लेक्चर को जब आप देखेंगे, सुनेंगे, 2x पर सुनेंगे तो आपको अलग ही मजा और अलग ही फील आने वाला है। क्योंकि जब आपने इंट्रोडक्शन
देख लिया,ेंट क्वेश्चन देख लिया तो अब तो आपको सिलेबस का पूरा आईडिया लग चुका है। तो बने रहिए, जुड़े रहिए, देखते रहिए
डेप्थ ऑफ बायोलॉजी ताकि ऐसी वीडियोस मैं आपके लिए और लेकर आता रहूं। हैव ए नाइस डे। हैव ए गुड डे। जय श्री राम। थैंक यू।
फार्माकोविजिलेंस परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण इकाईयाँ यूनिट 1 (गुड क्लिनिकल प्रैक्टिसेस और इन्फॉर्म्ड कंसेंट), यूनिट 3 (ADR के प्रकार और प्रबंधन), और यूनिट 4 (थैलिडोमाइड त्रासदी और भारत में PvPI का इतिहास) हैं। ये हर साल 100% प्रश्नों के रूप में पूछी जाती हैं।
यूनिट 2 में क्लिनिकल ट्रायल के फेज़ (फेज़ 0 से 4) और स्टडी डिज़ाइन (जैसे RCT, कोहर्ट स्टडी) से 2-3 प्रश्न निश्चित हैं। कोहर्ट स्टडी का उदाहरण धूम्रपान और फेफड़ों के कैंसर के संबंध को दर्शाता है। इसके अलावा इन्वेस्टिगेटर, स्पॉन्सर और CRO जैसी भूमिकाओं पर भी प्रश्न आते हैं।
ADR के प्रकारों में Type A (डोज़ पर निर्भर), Type B (एलर्जिक), Type C (क्रोनिक), Type D (विलंबित), और Type E (निकासी) शामिल हैं। गंभीरता के अंतर को समझने के लिए सामान्य एलर्जी बनाम एनाफिलेक्टिक शॉक का उदाहरण याद रखें। WHO के अनुसार ADR की परिभाषा भी महत्वपूर्ण है।
थैलिडोमाइड त्रासदी (1950-60) के बाद WHO ने फार्माकोविजिलेंस प्रोग्राम शुरू किया। भारत में 1997 में एम्स दिल्ली से WHO से जुड़ा, 2004 में नेशनल प्रोग्राम लॉन्च हुआ और 2010 में इसका नाम PvPI रखा गया। यह समयरेखा हर साल 100% पूछी जाती है।
ICD रोगों को अद्वितीय कोड प्रदान करता है (जैसे J45 अस्थमा के लिए), जबकि INN दवाओं का सार्वभौमिक नाम है जिस पर पेटेंट नहीं होता (जैसे पैरासिटामोल PCM)। पैसिव सर्विलेंस (स्वतंत्र रिपोर्टिंग) और एक्टिव सर्विलेंस (सक्रिय ट्रैकिंग) के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है।
फार्माकोएपिडेमियोलॉजी मार्केट में दवा के जनसंख्या पर प्रभाव का अध्ययन है, फार्माकोइकोनॉमिक्स कम लागत में बेहतर इलाज पर केंद्रित है, और सेफ्टी फार्माकोलॉजी यह सुनिश्चित करती है कि दवा महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान न पहुँचाए। इन अवधारणाओं को एक साथ समझने से नोट लिखने जैसे प्रश्नों में मदद मिलेगी।
पहले सभी 6 यूनिट्स की प्राथमिकता तय करें: 100% फिक्स टॉपिक्स को पूरी तरह कवर करें, फिर दूसरी प्राथमिकता वाले टॉपिक्स पढ़ें। उदाहरणों (जैसे कोहर्ट स्टडी, ADR प्रकार) के साथ पढ़ने से अवधारणा मजबूत होगी। इसके अलावा इंट्रोडक्शन वीडियो देखें और लेक्चर को 2x स्पीड पर सुनकर समय बचाएँ।
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इस विस्तृत वीडियो में क्लास 11वीं के फिजिक्स के महत्वपूर्ण टॉपिक्स को डिटेल में समझाया गया है। यूनिट्स, डायमेंशंस, मोशन, न्यूटन के नियम, एनर्जी, रोटेशनल मोशन, और ग्रेविटेशन सहित सभी कॉन्सेप्ट्स के महत्वपूर्ण फॉर्मूले, डेरिवेशन और पेपर में आने वाले सवालों की प्रैक्टिस शामिल है। पूरी किताब 2 दिनों में मैराथॉन से कवर करने का यह बेहतरीन मौका है।
ऑर्गेनिक और इनऑर्गेनिक स्पेक्ट्रोस्कोपी का संपूर्ण रिवीजन (NMR, IR, UV, ESR, Mass)
इस वीडियो में स्पेक्ट्रोस्कोपी के सभी प्रमुख विषयों जैसे 1H NMR, 13C NMR, IR, UV-Vis, ESR और मास स्पेक्ट्रोमेट्री का गहन रिवीजन कराया गया है। इसमें केमिकल शिफ्ट, कपलिंग कांस्टेंट, स्प्लिटिंग पैटर्न, इंटेंसिटी, सिग्नल एनालिसिस और न्यूमेरिकल प्रॉब्लम्स को अनेक उदाहरणों और पिछले वर्षों के प्रश्नों के साथ समझाया गया है।
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