परिचय
यह लेक्चर 500 से अधिक प्रमुख राजनीतिक विचारकों और उनके योगदानों को समग्र रूप में प्रस्तुत करता है। यह विस्तारपूर्वक राजनीतिक सोऽच, नीति, सिद्धांत और उनके विकास पर केंद्रित है।
इतिहासिक राजनीतिक विचारक और उनकी अवधारणाएँ
क्लासिकल विचारक
- प्लेटो: न्याय, आदर्श राज्य (कैलीपोलिस), फिलॉसफर किंग की अवधारणा (Understanding Plato: Concepts, Philosophy, and Importance for UPSC)
- मैक्यावली: वास्तविक राजनीति, राज्य और शक्ति के व्यावहारिक नियम
- रूसो: सामाजिक करार, जनरल बिला, प्राकृतिक स्वातंत्र्य
आधुनिक राजनीतिक विचारक
- कार्ल मार्क्स: वर्ग संघर्ष, राज्य का अन्त, कम्युनिज्म का लक्ष्य
- जेएस मिल: व्यक्तिगत स्वतंत्रता, बहुलवाद, टिरनी ऑफ मेजॉरिटी
- स्वामी विवेकानंद: आध्यात्मिक राष्ट्रवाद, मानवतावाद
राजनीतिक सिद्धांत के विविध दृष्टिकोण
मतभेद और विमर्श
- हिस्टोरिकल अप्रोच: राजनीतिक विचारों का इतिहासिक विकास
- साइंटिफिक अप्रोच: राजनीति का विज्ञान और सांख्यिकीय विश्लेषण
- फिलॉसॉफिकल अप्रोच: राजनीतिक न्याय, नैतिकता, और दार्शनिक आधार
पोस्ट बिहेवियरलिज्म और क्रिटिकल थ्योरी
- प्रासंगिकता और कार्रवाई पर जोर, समाज में अन्तरविष्लेषण
- फ्रैंकफर्ट स्कूल और मार्क्सियन परंपरा से प्रभावित आलोचना
राजनीतिक विचारकों का योगदान
फेमिनिस्ट विचारक
- मैरी वॉलस्टोन क्राफ्ट: महिला अधिकार और शिक्षा की वकालत
- साइमन डी बोवौर: स्त्री-पुरुष समानता, द्वितीय सेक्स
- एंथ्रोपोज़: अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संदर्भ में जेंडर
इंटरनेशनल रिलेशन और रियलिज्म
- सुंजू, थसीडाइडस, मॉर्गनथाऊ: शक्ति, संघर्ष और सुरक्षा दृष्टिकोण
- किनेथ वाल्ट: संरचनात्मक रियलिज्म, द्विध्रुवीयता सिद्धांत
सामाजिक और राजनीतिक भारतीय विचारक
- डॉ. बी आर अंबेडकर: जातिवाद का प्रतिरोध, लोकतंत्र और संविधान (भारतीय संविधान का भाग 1: यूनियन और उसके क्षेत्रीय संगठन की समझ)
- रजनी कोठारी: भारतीय राजनीति में कास्ट और कंसेंसस
- योगेंद्र यादव, कंचन चंद्रा: आधुनिक भारतीय राजनीतिक दल और सामाजिक आंदोलन
आधुनिक राजनीतिक प्रक्रियाएँ और व्यवस्थाएँ
लोकतंत्र के स्वरूप
- प्रतिनिधित्वात्मक, सहभागी, और लोकमत संग्रह के प्रकार
- भारत में पार्टी प्रणाली: कांग्रेस सत्ता और बहुदलीय व्यवस्था
पब्लिक प्रशासन और नीति
- विल्सन से लेकर मुन और डहल तक: प्रशासनिक विज्ञान और लोकतांत्रिक अभ्यास
- भ्रष्टाचार, सामाजिक न्याय, और विकास के मॉडल
निष्कर्ष
यह व्यापक व्याख्यान राजनीतिक सिद्धांत के विभिन्न आयामों का समुचित पुनरावलोकन कराता है। यह न केवल ऐतिहासिक और आधुनिक थिंकर्स के विचारों को स्पष्ट करता है, बल्कि उनके सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक पहलुओं को भी उजागर करता है। इसका अध्ययन उम्मीदवारों के लिए गहन ज्ञान और परीक्षा सफलता का मार्ग प्रशस्त करेगा।
सुझाव:
- इस लेक्चर को बार-बार सुनें और नोट्स बनाएं।
- प्रमुख कृतियों और थ्योरिस्ट्स के नामों को याद रखें।
- विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के तुलनात्मक अध्ययन पर ध्यान दें।
- भारतीय राजनीतिक विचारकों के योगदान और सिद्धांतों को समझना विशेषतः महत्वपूर्ण है (Comprehensive Guide to Constitution of India: BTech Third Year Unit 1 Summary)।
इस व्यापक विषय-आधारित समीक्षा के साथ आपकी राजनीतिक विज्ञान की समझ और परीक्षा योग्यता निश्चित रूप से सुदृढ़ होगी।
सार सक्सेस में आप सभी का स्वागत है। आज का यह लेक्चर रिवीजन बेस्ड बिग मैराथॉन टाइप लेक्चर है। जिसमें हम 500 प्लस
पॉलिटिकल साइंस के थिंकर्स को डिस्कस करेंगे। यह लेक्चर मैंने जितने भी सारे लेक्चर्स मैंने पहले अपलोड किए हैं या नए
लेक्चर हैं, पुराने हैं, उन सभी को कंपाइल करके आपकी रिवीजन को देखकर तैयार किया है। तो, यह लेक्चर आपके लिए बेहद इंपॉर्टेंट
होने वाला है। इस लेक्चर को आप पूरा देखें, सुने और अच्छे से अपनी रिवीजन करें और अगर आप इस लेक्चर को पूरा देखते हैं,
सुनते हैं तो आपका जेआरएफ होना पक्का है। लेकिन इससे पहले कि हम इस लेक्चर को अच्छे से डिस्कस करें, रिवाइज़ करें। मैं अपने
सभी स्टूडेंट्स को हैप्पी न्यू ईयर 2026 की बहुत-बहुत शुभकामनाएं देना चाहता हूं। और मैं गॉड से यह प्रे करता हूं कि आपका
इस साल ना केवल जेआरएफ हो बल्कि जॉब लगे। अधिक से अधिक आप खुशियों को गेन करें। यही मैं चाहता हूं और यही गॉड से प्रे करता
हूं। सबसे इंपॉर्टेंट पॉइंट यह है कि जो हिस्टोरिकल अप्रोच है पॉलिटिकल थ्योरी में
इसके जनक रहे हैं जॉर्ज सेबाइन और यह पॉइंट आपको याद रखना है। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह जाने जाते हैं अपनी प्रमुख
कृति और हिस्ट्री ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी के लिए जो कि 1937 को पब्लिश हुई थी। और खास बात यह है कि इसमें इन्होंने प्लेटो से
लेकर आधुनिक समय में जो फासिज्म है और नाजिज्म है उसके जितने भी पॉलिटिकल थॉट्स रहे हैं उनका किस तरह से डेवलपमेंट हुआ।
इन सभी चीजों का इन्होंने इसमें पता लगाया है। और खास बात यह भी है कि इनकी कुछ और कृतियां रही है। जिनमें पहला आता है व्हाट
इज पॉलिटिकल थ्योरी और दूसरी आती है द प्रगमेटिक अप्रोच टू पॉलिटिकल साइंस जो कि 1930 को पब्लिश होती है। कि लियोस्ट्रोस
फिलॉसोफिकल अप्रोच से जुड़े हैं। और दूसरी बड़ी बात यह है कि लियोस्ट्रोस ने कहा था कि पॉलिटिकल थ्योरी एज फिलॉसोफी इज एन
अटेमप्ट टू रिप्लेस ओपिनियन और अजमशन अबाउट द नेचर ऑफ पॉलिटिकल थिंग्स एंड द राइट्स और द गुड पॉलिटिकल ऑर्डर। इसका
मतलब यह है कि दर्शन के रूप में राजनीतिक सिद्धांत, राजनीतिक चीजों की प्रकृति और अधिकारों या अच्छे राजनीतिक व्यवस्था के
बारे में जो राय होती है, ओपिनियन होती है या फिर कांसेप्ट होता है, उसको बदलने का एक प्रयास है, एफर्ट है। लियोस्ट्रोस के
कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। तो, स्क्रीन में जितने भी आपको इनके वक्स दिखाई दे रहे हैं, आप अच्छे से याद कर लें
क्योंकि आपके एग्जाम के लिए यह वर्क बहुत ही इंपॉर्टेंट है। यह अक्सर एग्जाम में पूछे जाते हैं। तीसरा पॉइंट आता है
पॉलिटिकल थ्योरी एज अ साइंस। तो जब हम पॉलिटिकल थ्योरी को साइंस के रूप में समझते हैं, अंडरस्टैंड करते हैं तो हम यही
कह सकते हैं कि यह एक विज्ञान है क्योंकि इसकी मेथोडोलॉजी, इसकी एप्रोच और जो इसका एनालिसिस होता है, वह साइंटिफिक होता है
क्योंकि इसके जितने भी कंक्लूजंस है, यह निकाले जाते हैं डीप स्टडी के द्वारा, ऑब्जरवेशन के द्वारा और एक्सपेरिमेंट के
द्वारा। दूसरी बड़ी बात यह है कि इसके कुछ इंपॉर्टेंट स्कॉलर्स रहे हैं, विचारक रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है आर्थर बेंटले
का। इनकी प्रसिद्ध कृति रही है द प्रोसेस ऑफ गवर्नमेंट। दूसरे थिंकर का नाम आता है जॉर्ज कैटलिन। इनकी प्रसिद्ध कृति रही है
द साइंस एंड मेथड ऑफ पॉलिटिक्स। और तीसरे थिंकर का नाम आता है डेविड ईस्टन। इनकी प्रसिद्ध कृति रही है द पॉलिटिकल सिस्टम।
और चौथे विचारक आते हैं रॉबर्ट देहल जिनकी प्रसिद्ध कृति रही है मॉडर्न पॉलिटिकल एनालिसिस जो कि 1963 को पब्लिश होती है।
अल्फर्ड कॉबन ही ऐसे पहले व्यक्ति रहे हैं जिन्होंने पॉलिटिकल साइंस में पॉलिटिकल थ्योरी के कोलैप्स डिक्लाइन की बात की।
दूसरी बड़ी बात यह है कि इनके आर्टिकल जो कि इनकी अपनी कृति पॉलिटिकल साइंस क्वार्टरली 1953 में पब्लिश हुआ उसमें
इन्होंने लिखा कि इन कंटेंपररी सोसाइटी पॉलिटिकल थ्योरी हैज़ नो रिलेवेंस आइदर इन कैपिटलिस्ट सिस्टम और इन कम्युनिस्ट
सिस्टम। तो इसमें यह कह रहे हैं कि जो पॉलिटिकल थ्योरी है समकालीन समय में उसका कोई रिलेवेंस नहीं रहा है। ना तो उसका जो
रिलेवेंस है वो कैपिटलिस्ट सोसाइटी में रहा ना ही कम्युनिस्ट सोसाइटी में रहा। अल्फ्रेड कॉबन ने डिक्लाइन ऑफ पॉलिटिकल
थ्योरी के पीछे तीन इंपॉर्टेंट फैक्टर्स की बात की है। जिनमें पहला फैक्टर यह बताते हैं कि राज्य की जो गतिविधियां है
उसका जो दायरा है उनमें कोई रेस्ट्रिक्शन नहीं है। कोई चेक्स नहीं है। जिसकी वजह से जो राज्य है वह तानाशाही कर देता है।
डिक्टेटरशिप कर देता है। जिसकी वजह से पॉलिटिकल थ्योरी का जो डिक्लाइन है वह हो गया। दूसरा फैक्टर इन्होंने बताया कि
राज्य में जो समाज है, समाज की जितनी भी गतिविधियां है, वहां पर नौकरशाही का इमरजेंस हो गया और उसी का नियंत्रण हो
गया। उसी की जो सत्ता है, वो स्थापित हुई। अधिनायकवादी नियंत्रण हो गया। उदाहरण के लिए जैसे इन्होंने कहा कि जो कम्युनिस्ट
कंट्री है वहां पर इस तरह की नौकरशय का जन्म हुआ। जिसकी वजह से जो पॉलिटिकल थ्योरी है, उसका डिक्लाइन हो गया। और
तीसरा इंपॉर्टेंट फैक्टर है बड़े पैमाने पर जो सैन्य संगठन है उनका निर्माण यानी कि क्रिएशन ऑफ लार्ज स्केल मिलिटरी
ऑर्गेनाइजेशन जिसकी वजह से जितने भी राजनीतिक वैल्यू है चाहे डेमोक्रेसी हो राइट्स हो लिबर्टी हो उनको हम किया गया और
जितने भी ऑर्गेनाइजेशन है चाहे एनजीओस हो सिविल सोसाइटी ऑर्गेनाइजेशन हो या फिर न्यू सोशल मूवमेंट हो इनको भी गहरा आघात
लगा शॉक लगा अल्फर्ड कॉबन की कुछ इंपॉर्टेंट बुक्स भी रही है जिनने में पहला नाम आता है पॉलिटिकल साइंस
क्वार्टरली। दूसरा नाम आता है रूसो एंड द मॉडर्न स्टेट और तीसरा नाम आता है द डिक्लाइन ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी। 1953 में
डेविड ईस्टन ने डिक्लाइन ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी की बात की। डेविड ईस्टन कनेडियन बोर्न अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे
हैं। डेविड ईस्टन ने कंपैरेटिव पॉलिटिक्स में सिस्टम एप्रोच बिहेवल एप्रोच पोस्ट बिहेवल थ्योरी को दिया था। और इनके कुछ
इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जिनमें पहला वर्क आता है द पॉलिटिकल सिस्टम। दूसरा आता है एन एप्रोच टू द एनालिसिस ऑफ पॉलिटिकल
सिस्टम्स। और तीसरा आता है एट सिटी स्टडी ऑफ चाइल्ड पॉलिटिकल सोशलाइजेशन। डेविड ईस्टन ने अपने जर्नल ऑफ पॉलिटिक्स
में चार इंपॉर्टेंट ऐसे फैक्टर्स की बात की जिनकी वजह से पॉलिटिकल थ्योरी का डिक्लाइन हुआ। तो पहला फैक्टर आता है
हिस्टोरिसिज्म जिसको आप हिंदी में कहते हैं इतिहासवाद। तो जब हम बात करते हैं इस फैक्टर यानी कि हिस्टोरिसिज्म की तो डेविड
ईस्टन कहते हैं कि राजनीतिक सिद्धांत आज मुख्य रूप से विचारों के इतिहास में रुचि रखता है। यानी कि जो पॉलिटिकल थ्योरी है
उसमें केवल जो इतिहास है यानी कि जो हिस्टोरिकल फैक्ट्स है आइडियाज है उसको ही स्टडी किया जाता है। जिसकी वजह से जो
पॉलिटिकल थ्योरी है उसका कोलैप्स डिक्लाइन हो गया। दूसरा इंपॉर्टेंट पॉइंट ये है कि जो ऐतिहासिकता है यानी कि जो
हिस्टोरिसिज्म है उसकी इंपॉर्टेंट भूमिका बढ़ रही है जिसकी वजह से पॉलिटिकल थ्योरी का डिक्लाइन हुआ पतन हुआ और अगला ये
फैक्टर बताते हैं इसी के अंदर कि जो रिस्चरर्स हैं जितने भी शोधकर्ता हैं उन्होंने अपनी जो स्टडी है उसमें केवल
वैल्यूस को ही डिस्कस किया और जो इतिहास में जो वैल्यूस रही वैल्यूुएबल फैक्ट्स रहे उसको ही स्टडी किया जिसकी वजह से जो
क्लासिकल पॉलिटिकल थ्योरी है उसका रिलेवेंस खत्म हो गया और डिक्लाइन हो गया। तो इस तरह से डेविड ईस्टन कहते हैं कि
ऐतिहासिक जो विश्लेषण है यानी कि हिस्टोरिकल जो एनालिसिस है उसी की वजह से पॉलिटिकल थ्योरी का कोलैप्स हुआ, डिक्लाइन
हुआ। जैसा कि डेविड ईस्टन ने लिखा भी है कि द रूट कॉज ऑफ द डिक्लाइन ऑफ़ पॉलिटिकल थ्योरी इज़ द मेन हिस्टोरिकल थिंकर्स डनिंग
लिनसे और मैकलवेन। इसमें डेविड ईस्टन कहते हैं कि राजनीतिक सिद्धांत के पतन का मूल कारण जो इतिहासवादी विचारक है डनिंग
सेबाइन लिंसे मैकलविन उनकी जो इतिहासवादी अवधारणा है उसी की वजह से इसका पतन हुआ। दूसरा इंपॉर्टेंट फैक्टर आता है मोरल
रिलेटिविटी जिसका मतलब होता है नैतिक सापेक्षता। इसके अंतर्गत यह माना जाता है कि पॉलिटिकल साइंस से मूल्यों को बाहर
निकाल देना चाहिए। क्योंकि पॉलिटिकल साइंस या फिर जो पॉलिटिकल थ्योरी है उसमें वैल्यूस की कोई जगह नहीं है। इस प्रकार यह
पॉलिटिकल साइंस और जो पॉलिटिकल थ्योरी है उसमें वैल्यूस के निगेशन की बात करता है। दूसरी बड़ी बात यह है कि मिड 20थ सेंचुरी
में पॉलिटिकल साइंस को साइंस में बदलने के लिए इंपेरिकल साइंस पर बल दिया गया। जिसकी वजह से पॉलिटिकल थ्योरी का डिक्लाइन हो
गया। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो इंपेरिकल साइंस है इसका मुख्य सिद्धांत है वैल्यू न्यूट्रलिटी यानी कि ये वैल्यूस को नहीं
मानता है और खास बात यह भी है कि जो नैतिक सापेक्षता यानी कि वैल्यू न्यूट्रलिटी का कांसेप्ट है इसको ईस्टन से पहले मैक्स
बेबर और ऑगस्ट कॉमटे के द्वारा भी दी गई थी। जैसा कि डेविड ईस्टन ने लिखा भी है कि द पॉलिटिकल साइंटिस्ट इज नॉट ओनली एन
एनालिस्ट ऑफ वैल्यूस बट आल्सो अ क्रिएटर ऑफ वैल्यूस। जिसका मतलब यह है कि जो राजनीतिक वैज्ञानिक होता है जब वो स्टडी
करता है तो केवल मूल्यों का विश्लेषण नहीं करता है एनालिसिस नहीं करता है बल्कि वो मूल्यों को क्रिएट करता है। यानी कि वह
मूल्यों का निर्माता है। थर्ड इंपॉर्टेंट फैक्टर आता है कंफ्यूजन बिटवीन साइंस एंड थ्योरी यानी कि विज्ञान और सिद्धांत के
बीच भ्रम। तो राजनीतिक सिद्धांत के पतन का सबसे प्रमुख कारण यह भी था कि राजनीतिक विज्ञान को जितने भी स्कॉलर्स रहे या फिर
थिंकर्स रहे इन्होंने इसको विज्ञान बनाने के लिए इसका जो साइंटिफिक स्टेटस है उसको उठाने के लिए जितने भी साइंटिफिक मेथड्स
थे उनके ऊपर डिपेंडेंसी स्थापित की यानी कि अत्यधिक निर्भरता स्थापित की जिसकी वजह से पॉलिटिकल थ्योरी का कोलैप्स हो गया।
वहीं दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि शोध कार्यों में ठीक है कि वैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग किया जा सकता है। परंतु
सिर्फ साइंटिफिक मेथड्स के ऊपर डिपेंडेंट रहना किसी भी चीज को पतन कर सकता है। जैसा कि पॉलिटिकल थ्योरी के साथ भी हुआ। और एक
इंपॉर्टेंट बात यह है कि आधुनिक राजनीतिक वैज्ञानिक किसी भी विषय पर जानकारी इकट्ठा करने के लिए केवल साइंटिफिक जो मेथड हैं,
उनका ही उपयोग करते थे। और उन सभी कारकों को नेगलेक्ट करते थे, अनदेखा करते थे जो घटना के पीछे काम कर रहे हो। उदाहरण के
लिए 1928 में ग्रेट इकोनॉमिक डिप्रेशन आया तो वहां पर सिर्फ साइंटिफिक मेथड ही काम नहीं कर सकते हैं। बल्कि उन वजह उन
फैक्टर्स को भी देखना पड़ेगा जिनकी वजह से 1928 में ग्रेट डिप्रेशन यानी कि जो इकोनॉमिक ग्रेट डिप्रेशन है वो आई।
पॉलिटिकल थ्योरी के डिक्लाइन का अगला फैक्टर आता है हाइपरफक्चुअलिज्म जिसको आप हिंदी में कहते हैं अति तथ्यवाद।
तथ्यों पर बहुत अधिक भरोसा किया गया और थ्योरीज यानी कि सिद्धांतों का निर्माण किया गया। दूसरा इंपॉर्टेंट पॉइंट यह है
कि पॉलिटिकल थ्योरिस्ट के द्वारा केवल उन्हीं समस्याओं, उन्हीं प्रॉब्लम्स के ऊपर रिसर्च किया गया जिन पर आसानी से
रिसर्च किया जा सकता था। उन सभी जितने भी पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं, थ्यरिस्ट रहे हैं, उनको रिसर्च की सीमाएं पता नहीं थी।
वे तो सिर्फ फैक्ट को जुटाने में व्यस्त थे। और अगला इंपॉर्टेंट फैक्टर यह भी आता है कि उनके पास कोई सैद्धांतिक झुकाव नहीं
था। इसीलिए उनके पास भरोसा करने के लिए कोई ठोस आधार नहीं था क्योंकि वे सिर्फ फैक्ट को ढूंढने में व्यस्त थे। और अगला
इंपॉर्टेंट पॉइंट इसमें यह भी आता है कि कुछ खास दृष्टिकोणों से आगे वे नहीं देख पाते थे क्योंकि उनमें उद्देश्यों की कमी
थी। उनके पास जो बना बनाया था, जो थ्योरीज उनके पास पहले से मौजूद थी, जो दृष्टिकोण पहले से मौजूद थे, उसमें ही वे सिमटे रहे।
हाइपरफक्चुअलिज्म में अगला पॉइंट आता है कि जो पॉलिटिकल थ्योरिस्ट रहे हैं, उनके पास साइंटिफिक दृष्टिकोण नहीं था।
सिद्धांत निर्माण के लिए आम जनता की राय आवश्यक है। लेकिन उसे अनुसंधान यानी कि रिसर्च और जो क्रिएशन ऑफ न्यू थ्योरी है
उसका आधार बनाना गलत था। और दूसरा सबसे इंपॉर्टेंट पॉइंट जिसको आपको याद रखना है कि डेविड ईस्टन ने इस स्थिति को देखा है
थ्योरेटिकल माल न्यूट्रिशन एंड सरफेट ऑफ फैक्ट्स। यानी कि डेविड ईस्टन ने इसे सैद्धांतिक कुपोषण और तथ्यों के खुलासे के
रूप में देखा है। जिसका मतलब यह होता है कि जो थ्योरीज है, जो सिद्धांत है उसका कुपोषण हो गया। क्यों हो गया? क्योंकि
इसमें सिर्फ और सिर्फ वैल्यूज़ और जो फैक्ट्स हैं उनकी ही स्टडी की गई। उनके ऊपर ही ध्यान दिया गया। जितने भी पॉलिटिकल
थ्योरिस्ट रहे थे। दंते जर्मिनो ने अपनी प्रसिद्ध कृति बियों्ड आईडियोलॉजी द रिवाइवल ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी जो कि 1967 को
पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने कहा कि 19वीं शताब्दी का अधिकांश समय और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में पॉलिटिकल जो थ्योरी
है उसके पतन के उसके डिक्लाइन के दो इंपॉर्टेंट कॉजेस थे। तो इसमें पहला जो कॉज था वो था अगस्ट कॉमटेक का पॉजिटिविज्म
और दूसरा कॉज इसमें था हैज़ेमनी ऑफ़ पॉलिटिकल आईडियोलॉजी। तो अगस्त कॉमटे का जो प्रत्यक्षवाद है उसमें साइंटिफिक और जो
इंपेरिकल स्टडी है उसके ऊपर फोकस किया गया जिसकी वजह से पॉलिटिकल थ्योरी का डिक्लाइन हुआ। वहीं दूसरी तरफ हैज़ेमनी ऑफ़ पॉलिटिकल
आइडियोलॉजी में दंते जर्मिनो कहते हैं कि डीट्रेसी ने जो आईडियोलॉजी है उसको बढ़ावा दिया। जिसकी वजह से जो पॉलिटिकल थ्योरी है
उसकी तरफ लोगों का यानी कि जो रिस्चर है जो थिंकर्स हैं उनका ध्यान नहीं रहा बल्कि उन्होंने अब आइडियोलॉजी की तरफ अपना झुकाव
किया और पिछले जो 100 से 150 साल रहे हैं उसमें जितनी भी रिसर्च हुई वो सिर्फ आइडियोलॉजी के बेस पे हुई और इसमें जितनी
भी विचारधाराएं हैं खासतौर पे मार्क्सिज्म आइडियलिज्म उनका बहुत बड़ा रोल रहा जिसने पॉलिटिकल थ्योरी को कोलैप्स किया और इस
घटना को दते जर्मिनो ने आइडियोलॉजिकल रिडक्शनिज्म कहा है। यानी कि वैचारिक अपचयनवाद कहा है। वहीं दूसरी तरफ पीटर
लासलेट और रॉबर्ट डाहल ने कहा कि पॉलिटिकल थ्योरी इज डेड यानी कि राजनीतिक सिद्धांत की मृत्यु हो चुकी है। पीटर लासलेट ने कहा
कि पॉलिटिकल थ्योरी इज डेड। और इन्होंने यह 1956 में अपनी प्रसिद्ध कृति फिलॉसोफी पॉलिटिक्स एंड सोसाइटी में कहा। वहीं
दूसरी तरफ रॉबर्ट डहल ने कहा कि पॉलिटिकल थ्योरी इज डेड और इन्होंने 1958 में अपनी प्रसिद्ध कृति पॉलिटिकल थ्योरी ट्रुथ एंड
कॉन्शियसनेस में कहा। वहीं दूसरी तरफ एसएम लिपसेट ने अपनी प्रसिद्ध कृति पॉलिटिकल मैन द सोशल बेसिस ऑफ़ पॉलिटिक्स जो कि 1959
को पब्लिश हुई। इसमें इन्होंने कहा कि वी हैव नो नीड फॉर पॉलिटिकल थ्योरी बिकॉज़ द वैल्यूस हैव ऑलरेडी बीन डिटरमाइंड इन द
सोसाइटी। इसमें ये कह रहे हैं कि हमें राजनीतिक सिद्धांत की अब कोई जरूरत नहीं है। कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि समाज
में जो भी मूल्य है वो पहले से ही निर्धारित किए जा चुके हैं। पहले से ही बनाए जा चुके हैं। इसलिए हमें पॉलिटिकल
थ्योरी की अब बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। अगले थिंकर का नाम आता है कार्ल पॉपर। कार्ल पॉपर ने अपनी प्रसिद्ध कृति द लॉजिक
ऑफ साइंटिफिक डिस्कवरी जो कि 1934 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने लॉजिकल पॉजिटिविज्म के आईडिया को चुनौती दी और
इन्होंने यह कहा कि जो वैज्ञानिक कथन है उसकी कसौटी पर सत्यपन्यता नहीं बल्कि मिथ्यापन्यता आता है। इसका मतलब यह है कि
जो रिस्चर होते हैं जो स्कॉलर होते हैं वो पहले ट्रुथ को ना खोजें बल्कि फाल्स को खोजें। क्योंकि फाल्स से ही फाल्स के
आइडेंटिफिकेशन से ही सत्य की खोज की जा सकती है। और दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने अपने कुछ अन्य वक्स जैसे द
पॉवर्टी ऑफ़ हिस्टोरिसिज्म जो कि 1936 को पब्लिश होता है। और दूसरा द ओपन सोसाइटीज एंड इट्स एनिमीज़ जो कि 1945 को पब्लिश
होता है। इसमें इन्होंने हिस्टोरिसिज्म को अटैक किया है। अगले थिंकर का नाम आता है नील रिमर का। तो इन्होंने कहा कि पॉलिटिकल
थ्योरी इज इन डॉग हाउस अर्थात राजनीतिक सिद्धांत गर्त में है। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं जिनमें पहला आता
है पॉलिटिकल साइंस एंड इंट्रोडक्शन टू पॉलिटिक्स। दूसरा आता है कार्ल मार्क्स एंड प्रोफेटिक पॉलिटिक्स। तीसरा आता है द
न्यू वर्ल्ड ऑफ पॉलिटिक्स एंड इंट्रोडक्शन टू पॉलिटिकल साइंस। और लास्ट आता है द चैलेंज ऑफ पॉलिटिक्स। अगले थिंकर का नाम
आता है ब्राइन बेरी का। तो इन्होंने कहा कि पॉलिटिकल फिलॉसोफी हैज़ डेड अ ड्रामेटिक डेथ। जिसका मतलब यह है कि राजनीतिक दर्शन
की नाटकीय तरीके से मृत्यु हो गई है। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जिनमें पहला वर्क आता है पॉलिटिकल आर्गुमेंट।
दूसरा आता है डेमोक्रेसी पावर एंड जस्टिस। और तीसरा आता है द लिबरल थ्योरी ऑफ़ जस्टिस। और चौथा आता है लिबर्टी एंड
जस्टिस। और पांचवा आता है जस्टिस एज इंपार्शियलिटी। और छठा आता है भाई सोशल जस्टिस मैटर। तो यह जितने भी वक्स हैं
इनको आप अच्छे से याद करें। अगले थिंकर का नाम आता है जॉन र्स जिन्होंने 1971 में एक अपनी बहुत चर्चित कृति को लिखा जिसका
टाइटल था अ थ्योरी ऑफ़ जस्टिस। इस पुस्तक में इन्होंने जो डिक्लाइन ऑफ़ पॉलिटिकल थ्योरी की डिबेट थी उसको रिजेक्ट कर दिया
और इन्होंने पॉलिटिकल थ्योरी में जो नॉर्मेटिव थ्योरी है इसको एस्टैब्लिश किया। जिसकी वजह से जो पॉलिटिकल थ्योरी है
वह डेथ से बच गया। जॉन र्स ने लिखा कि द कांसेप्ट ऑफ द डिक्लाइन ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी हैज़ बिकम टोटली इररिलेवेंट। इसका
मतलब यह है कि जो बहुत सारे विचारक यह कहते रहे कि पॉलिटिकल थ्योरी डिक्लाइन कर गई है, पतन हो गया है, यह बिल्कुल
इररिलवेंट हो गया है, अप्रासंगिक हो गया है। जॉन र्स अमेरिकन पॉलिटिकल फिलॉसोफर रहे हैं। यह पॉलिटिकल साइंस में जो लिबरल
ट्रेडिशन है, उसके महान राजनीतिक विचारक रहे हैं। इनकी अनेक कृतियां रही है। जिनमें पहली आती है अ थ्योरी ऑफ़ जस्टिस।
दूसरी आती है जस्टिस एज फेयरनेस। तीसरी आती है पॉलिटिकल लिबरलिज्म। चौथी आती है द लॉ ऑफ़ पीपल। पांचवी आती है जस्टिस एज
फेयरनेस और रीस्टेटमेंट। अगले थिंकर का नाम आता है इजाया बर्लिन का। तो इजाइया वर्लिन कहते हैं कि राजनीतिक सिद्धांत के
पतन का प्रमुख कारण जो वेस्टर्न में डेमोक्रेटिक सोशल रेवोल्यूशन है उसकी विजय होना है। दूसरा तर्क बर्लिन देते हैं कि
जो लिबरल डेमोक्रेसी है उसको दुनिया के सभी देशों के द्वारा एक्सेप्ट किया गया है। जिसकी वजह से जो डिबेट है पॉलिटिकल
थ्योरी के डिक्लाइन की वो खत्म हो जाती है। वह समाप्त हो जाती है। और अगला तर्क देते हैं बर्लिन जिसमें ये कहते हैं कि
यदि शास्त्रीय यानी कि जो क्लासिकल पॉलिटिकल थ्योरी है मर गया है तो उसके पीछे कॉज ये है कि जो डेमोक्रेसी है उसकी
जीत हो गई है। और अगला पॉइंट ये बताते हैं कि राजनीतिक सिद्धांत ना तो कभी मरा था ना ही पतन की स्थिति में। बल्कि यह कहते हैं
कि राजनीतिक दर्शन के बिना कोई भी युग नहीं हो सकता है। बर्लिन ने तर्क दिया कि जब तक तर्कसंगत जिज्ञासा मौजूद है यानी कि
जो थ्यरिस्ट है उनके अंदर रैशन क्यूरोसिटी है तब तक राजनीतिक सिद्धांत ना तो मरेगा और ना ही गायब होगा ना ही उसका डिक्लाइन
होगा। ईसाया बर्लिन रशियन ब्रिटिश सोशल पॉलिटिकल थरिस्ट फिलॉसफर और हिस्टोरियन रहे हैं। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स है
जिनमें पहला वर्क आता है टू कांसेप्ट्स ऑफ लिबर्टी। दूसरा आता है डज पॉलिटिकल थ्योरी स्टिल एकिस्ट। तीसरा आता है फोर एस्स ऑन
लिबर्टी। चौथा इसमें आता है वीको एंड हर्डर। पांचवा आता है कार्ल मार्क्स। और छठा आता है कांसेप्ट्स एंड कैटेगरीज। अगले
थिंकर का नाम आता है जॉर्ज सेवाइन का तो इन्होंने कहा था कि अगर राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक समस्याओं की सिस्टमेटिक या फिर
डिसिप्लिन इन्वेस्टिगेशन करता है तो यह कहना मुश्किल होगा कि 1950 और 60 के दशक में राजनीतिक सिद्धांत मर चुका था और इनकी
अगली मान्यता यह रही है कि हन्ना आरंट ऑक्स लियोस्ट्रोस जॉन र्स रॉबर्ट नोजिक हरबर्ट मार्क्यूजे एरिक बोगलिन जैसे
विचारकों ने अपने कार्यों में राजनीतिक िक सिद्धांत को जीवित रखा। यानी कि राजनीतिक सिद्धांत की डेथ नहीं हुई थी। उसका
डिक्लाइन नहीं हुआ था। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। जिनमें पहला आता है अ हिस्ट्री ऑफ़ पॉलिटिकल थ्योरी। दूसरा
आता है व्हाट इज पॉलिटिकल थ्योरी। अगले इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम आता है हन्ना आरंट जो कि जर्मन अमेरिकन हिस्टोरियन और
पॉलिटिकल फिलॉसफर रही है। हन्ना आरंट ने इतिहास में छिपी और गुमनाम ताकतों के विचार को खारिज किया। राजनीतिक सिद्धांत
के पुनरुद्धार में जो अन्य प्रमुख विद्वानों की भूमिका रही है उसी तरह आरंट की भी रही है और इन्होंने विचारधारा और जो
राजनीतिक सिद्धांत है उसके बीच जो आवश्यक असंगति होती है यानी कि इनकंफर्टेबिलिटी होती है उसकी तरह भी संकेत किया और सबसे
इंपॉर्टेंट बात यह है कि हन्ना आरंट ने अपनी राइटिंग्स में अपने चिंतन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता यानी कि इंडिविजुअल
फ्रीडम और जो मानवीय गरिमा होती है यानी कि ह्यूमन डिग्निटी होती है उस पर काफी बल दिया जिसकी वजह से राजनीतिक सिद्धांत के
जो रिवाइवल है या फिर रिसर्जेंस है उसमें महत्वपूर्ण रोल रहा। हन्ना आर्यन बहुत बड़ी लेखिका भी रही है। इनकी अनेक कृतियां
रही है जिनमें पहला वर्क आता है टोटलिटेरियनिज्म। दूसरा आता है द ओरिजंस ऑफ टोटलीनिज्म।
तीसरा आता है द ह्यूमन कंडीशन। चौथा आता है बिटवीन द पास्ट एंड फ्यूचर। और अगला आता है ऑन रेवोल्यूशन। और लास्ट आता है ऑन
वायलेंस। अगले इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम आता है लियोस्ट्रोसका जो कि अमेरिकन पॉलिटिकल फिलॉसफर और पॉलिटिकल थ्योरिस्ट
रहे हैं। इनका प्रमुख वर्क है व्हाट इज पॉलिटिकल फिलॉसोफी जो कि 1957 को पब्लिश हुआ। और खास बात यह है कि लियोस्ट्रोस ने
कहा था कि एंशिएंट पॉलिटिकल जो फिलॉसोफी है वह सुपीरियर है मॉडर्न पॉलिटिकल फिलॉसोफी के मुकाबले। क्योंकि संपूर्ण
राजनीतिक जीवन के जो समस्त पक्ष है उसका विवेचन केवल जो क्लासिकल पॉलिटिकल फिलॉसोफी है वो करती है और खास बात यह भी
है कि लियोस्ट्रोस ने जो क्लासिकल पॉलिटिकल थ्योरी है उसको आधुनिक समय के संकट के उपचार के रूप में बिचारा है और
सबसे बड़ी बात यह है कि लियोस्ट्रोस ने दोनों जो पॉजिटिविज्म और बिहेवियरलिज्म है दोनों की आलोचना की है। लियोस्ट्रोस ने
कहा कि फिलॉसोफी सर्व्ड ट्रुथ व्हिच वाज नॉट डिटरमाइंड बाय इट्स हिस्टोरिकल सेटिंग जिसका मतलब यह होता है कि जो फिलॉसोफी
होती है वो सत्य की सेवा के लिए काम करता है जो इसकी ऐतिहासिक सेटिंग से निर्धारित नहीं होता है। इसका मतलब यह है कि
इन्होंने भी हिस्टोरिसिज्म की आलोचना की। अगले थिंकर का नाम आता है माइकल ऑक्सड का जो कि इंग्लिश फिलॉसोफर और पॉलिटिकल
थ्योरिस्ट रहे हैं। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। जिनमें पहला आता है रैशनलिज्म इन पॉलिटिक्स। दूसरा आता है ऑन
ह्यूमन कंडक्ट। तीसरा आता है वॉइस ऑफ लिबरल लर्निंग। चौथा आता है इंट्रोडक्शन टू लेबथान। और पांचवा आता है रिलीजन
पॉलिटिक्स एंड द मोरल लाइफ। और छठा आता है व्हाट इज हिस्ट्री। अगले थिंकर का नाम आता है इरिक बोगलिन का जो कि जर्मन अमेरिकन
पॉलिटिकल फिलॉसोफर रहे हैं और इनकी यह मान्यता रही है कि पॉलिटिकल थ्योरी और जो पॉलिटिकल साइंस है यह इनसेपरेबल है यानी
कि कभी भी अलग नहीं हो सकते हैं क्योंकि एक दूसरे के बिना संभव नहीं है और खास बात यह है कि इन्होंने कहा कि व्यवहारवाद के
प्रभाव में पुराने राजनीतिक सिद्धांत का पतन हो गया है। यह विचार सही नहीं है। इनके कुछ वर्क रहे हैं जिनमें पहला आता है
न्यू साइंस ऑफ़ पॉलिटिक्स और दूसरा आता है साइंस पॉलिटिक्स एंड इग्नोस्टिसिज्म। अगले इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम आता है बर्टन
डीजवेनल का जो कि फ्रेंच फिलॉसफर पॉलिटिकल इकोनॉमिस्ट और फ्यूचरिस्ट रहे हैं। और खास बात यह है कि इन्होंने कंट्रीब्यूट किया
रिसर्जेंस और पॉलिटिकल थ्योरी में और इन्होंने नियो कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म की अवधारणा दी। इनके कुछ वक्स रहे हैं जिनमें
पहला आता है ऑन पावर। दूसरा आता है सोवनिटी और तीसरा आता है द प्योर थ्योरी ऑफ़ पॉलिटिक्स। और खास बात यह भी है कि
इन्होंने प्योर थ्योरी ऑफ़ पॉलिटिक्स में इन्होंने राजनीतिक सिद्धांत की परंपरा को एक नया रूप दिया जिसे नव प्रत्यक्षवादियों
ने मृत घोषित किया था। अगले थिंकर का नाम आता है हरबर्ट मार्क्यूजे का। हरबर्ट मार्क्यूजे जर्मन अमेरिकन फिलॉसोफर सोशल
क्रिटिक एंड पॉलिटिकल थ्योरिस्ट रहे हैं जो कि फ्रैंकफर्ट स्कूल के साथ जुड़े हुए हैं जो कि क्रिटिकल थ्योरी का एक
महत्वपूर्ण स्कूल था। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने अपने वर्क वन डायमेंशनल मैन जो कि 1961 को पब्लिश होता है। इसमें
इन्होंने बहुत सारे नए सिद्धांत और अवधारणाएं दी। इन सभी ने राजनीतिक सिद्धांत के पुनरुद्धार में मदद की और खास
बात यह है कि इन्होंने एक घरेलू मनुष्य की अवधारणा और मुक्ति का सिद्धांत दिया। इन्होंने आधुनिकता और पूंजीवाद की भी
आलोचना की। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है जिनमें आती है इरोस एंड सिविलाइजेशन। दूसरी आती है वन डायमेंशनल
मैन और तीसरी आती है मार्क्सिज्म रेवोल्यूशन एंड यूटोपिया। अब हम कुछ और कंट्रीब्यूटर्स को देख लेते हैं। तो
जिनमें पहला नाम आता है शेल्डन एस बोलिन का। इन्होंने अपने प्रमुख कृति पॉलिटिक्स एंड विज़न कंटिन्यूटी एंड इनोवेशन इन
वेस्टर्न पॉलिटिकल थॉट जो कि 1960 को पब्लिश होती है। कहा कि परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत अत्यधिक महत्वपूर्ण है जिसकी
अवहेलना नहीं की जा सकती है। वहीं अगले कंट्रीब्यूटर का नाम आता है थॉमस सैमुअल कुन काका। इन्होंने अपनी प्रमुख कृति द
स्ट्रक्चर ऑफ साइंटिफिक रेवोल्यूशन जो कि 1962 को पब्लिश होती है। लिखा कि प्रत्येक समाज में समस्याओं के समाधान का तरीका
अलग-अलग होता है। इसलिए सभी समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान संभव नहीं है। तो इसमें पहला नाम आता है
एंटिन्यूडेट्रेसी का। जिन्होंने यह कहा कि आईडियोलॉजी का मतलब होता है साइंस ऑफ आइडियाज अर्थात विचारों का विज्ञान जो कि
एक विचार विज्ञान है। वहीं दूसरा नाम इसमें आता है मिशल फुको का जिन्होंने यह कहा कि आइडियोलॉजीस आर रिजीम्स ऑफ ट्रुथ
अर्थात विचारधाराएं सत्य का शासन होता है। वहीं अगला इसमें नाम आता है कार्ल मार्क्स का जिन्होंने यह कहा कि आइडियोलॉजी
डल्यूजन और मिस्ट्रीफिकेशन होती है। अर्थात भ्रम और रहस्य होता है। वहीं खास बात यह है कि कार्ल मार्क्स ने कहा कि ऑल
आइडियोलॉजी एक्सेप्ट मार्क्सिज्म आर ओपियम फॉर द पीपल। जिसका मतलब यह है कि मार्क्सवाद को छोड़कर दूसरी जितनी भी
आईडियोलॉजीस विचारधाराएं होती है वो लोगों के लिए एक अफीम की तरह हैं नशे की तरह हैं। वहीं अगला नाम आता है इनके परम मित्र
फ्रेडरिक एंजेल्स का जिन्होंने यह कहा कि आईडियोलॉजी फाल्स कॉन्शियसनेस होती है। मिथ्या चेतना होती है। वहीं अगला नाम
इसमें आता है एसएम ड्रकर का जिन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति द पॉलिटिकल यूज़ज़ ऑफ़ आइडियोलॉजी जो कि 1974 को पब्लिश होती है।
इसमें इन्होंने कहा कि आईडियोलॉजी इज द करेक्शन ऑफ आइडियाज अबाउट सोसाइटी। अर्थात विचारधारा समाज के बारे में विचारों का
सुधार है। वहीं अगला नाम इसमें आता है डेविड मैकलेन का जिन्होंने 1995 में कहा कि विचारधारा संपूर्ण सामाजिक विज्ञानों
में सबसे भ्रामक अवधारणा है। अर्थात आइडियोलॉजी इज द मोस्ट इल्यूसिव कांसेप्ट इन द होल ऑफ द सोशल साइंसेस। वहीं सीबी
मैकफर्सन ने आईडियोलॉजी के बारे में कहा कि मैं विचारधारा को कमोबेश प्रकृति, समाजशास्त्र और इतिहास में मनुष्यों के
स्थान के बारे में विचारों का एक व्यवस्थित समूह मानता हूं जो राजनीतिक परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण संख्या में
लोगों की प्रतिबद्धता को प्रेरित कर सकता है। अब हम आईडियोलॉजी के बैकग्राउंड को अच्छे से समझ लेते हैं। तो इसमें पहला नाम
आता है एंटिनियो डीट्रेसी का जिन्होंने फ्रेंच रेवोल्यूशन के दौरान 1796 में आईडियोलॉजी टर्म को काइंड किया था और
इन्होंने आईडियोलॉजी के बारे में कहा था न्यू साइंस ऑफ आइडियाज खास बात यह भी है कि इन्होंने आईडियोलॉजी को क्वीन ऑफ द
साइंसेस के रूप में देखा। इन्होंने यह कहा कि आने वाले समय में जो विचारधारा है उसको क्वीन ऑफ द साइंसेस के रूप में जानी
जाएगी। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो प्रेसी है इनके आईडियोलॉजी के मीनिंग कुछ निम्नलिखित बातों के तहत निकाल सकते हैं।
जिनमें पहला यह है कि यह बोलते हैं कि आइडियोलॉजी साइंस ऑफ आइडियाज है। अर्थात विचारों का विज्ञान है। वहीं दूसरा पॉइंट
यह है कि इन्होंने बोला कि जो आइडियोलॉजी है वह वास्तविकता को समझने में यूज़फुल होती है। तीसरा पॉइंट यह है कि इन्होंने
कहा कि जो आइडियाज है वह सिस्टमैटिक स्टडी के लिए आवश्यक हैं। और इन्होंने कहा कि जो आईडियोलॉजी होती है यह प्रोग्राम ऑफ एक्शन
है। यानी कि जब भी कोई हम कार्यवाही करना चाहते हैं तो उसका यह कार्यक्रम सुनिश्चित करता है। डी ट्रेसी का यह मानना है कि
उन्होंने जो आईडियोलॉजी की जो एपिस्टेमोलॉजी है वह उन्होंने दार्शनिक जॉन लॉक और 18 बोनट डी कॉडिलिक का जो
एपिस्टेमोलॉजी है वहां से लिया जिनके लिए सभी मानव ज्ञान विचारों का ज्ञान था। दूसरी बड़ी बात यह है कि 19वीं सदी में जो
कार्ल मार्क्स है उनके लेखन में सबसे ज्यादा आईडियोलॉजी के ऊपर बल दिया गया। हालांकि इन्होंने आईडियोलॉजी को नेगेटिवली
कनोट किया। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि इटालियन पॉलिटिकल फिलॉसफर निकोलो मैक्यावली मॉडर्न आईडियोलॉजीस के परिक्षण
माने जाते हैं। अग्रदूत माने जाते हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि मैक्यावली ने ही सबसे पहले जो आईडियोलॉजी है उसको टेरर से
जोड़ा। और खास बात यह भी है कि जो 17th सेंचुरी इंग्लैंड है वहां पर सबसे ज्यादाेंस आइडियोलॉजी को दी गई। अर्थात
आईडियोलॉजी का अच्छा खासा इतिहास रहा। जहां पर लॉक की टू ट्रीटीज ऑफ गवर्नमेंट जो कि 1690 को पब्लिश होती है। उसमें
इन्होंने लिबरलिज्म की फाउंडेशन रखी। जहां पर इन्होंने जो टिरनी है उसके खिलाफ जो इंडिविजुअल राइट्स है उनको प्रायोरिटी दी।
अब हम आईडियोलॉजी के ऊपर डिफरेंट-डिफरेंट व्यूज को अच्छे से समझ लेते हैं। तो पहला व्यू आता है मार्क्सिस्ट व्यूज ऑन
आईडियोलॉजी। तो कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंजेल ने अपनी प्रसिद्ध कृति द जर्मन आईडियोलॉजी में कहा कि आइडियोलॉजी डल्यूजन
होती है, मिस्ट्रीफिकेशन होती है और आईडियोलॉजी लीड करती है फाल्स कॉन्शियसनेस को। खास बात यह भी है कि आइडियोलॉजी को
इन्होंने क्लास सिस्टम के साथ जोड़ के देखा। और दूसरी बड़ी बात यह भी है कि इन्होंने कहा कि आईडियोलॉजी पावर की
मैनिफेस्टेशन होती है। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि कार्ल मार्क्स ने कहा कि जैसे ही स्टेटलेस और क्लासलेस सोसाइटी की
स्थापना हो जाएगी तो जो आईडियोलॉजी है वह भी खत्म हो जाएगी। क्योंकि कम्युनिज्म में किसी भी तरह की आईडियोलॉजी नहीं होती है।
हालांकि कार्ल मार्क्स ने यह कहा था कि केवल मार्क्सिज्म ही एक बढ़िया आईडियोलॉजी है। बाकी जितनी भी आईडियोलॉजी है वह सारी
की सारी ओपीएम है लोगों के लिए। बलादमीर लेनिन ने अपनी प्रसिद्ध कृति व्हाट इज टू बी डन जो कि 1902 को पब्लिश होती है।
इसमें इन्होंने कहा कि जो प्रोिट्रेट क्लास के आइडियाज होते हैं वो सोशलिस्ट आइडिया और मार्क्सिस्ट आईडियोलॉजी के साथ
जुड़े होते हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इस तरह की जो धारणा लेनिन ने दी वह मार्क्स के लिए बिल्कुल भी सही नहीं थी।
और खास बात यह भी है कि लेनिन और बाद के जितने भी मार्क्सिस्ट रहे हैं इन्होंने कहा कि विचारधारा का मतलब होता है जो
विशेष सामाजिक वर्ग यानी कि पर्टिकुलर सोशल जो क्लास होती है उनके विचारों से होता है और यह ऐसे विचार होते हैं जो अपनी
वर्ग स्थिति की परवाह नहीं करते हैं और अपने इंटरेस्ट को आगे बढ़ाते हैं। लेनिन ने अपनी प्रसिद्ध कृति व्हाट इज टू बी डन
जो कि 1902 को पब्लिश होती है। इस कृति में इन्होंने कहा था कि आइडियोलॉजी इज अनडाउटेडली एन एक्सप्रेशन ऑफ क्लास
इंटरेस्ट। जिसका मतलब यह है कि विचारधारा निसंदेह वर्ग हित की अभिव्यक्ति होती है, आवाज होती है। एक तरफ जहां मार्क्स के लिए
आइडियोलॉजी मिथ है, वहीं दूसरी तरफ लेनिन के लिए आइडियोलॉजी बहुत आवश्यक है। क्योंकि इन्होंने कहा कि प्रोिट्रेट क्लास
के लिए भी आईडियोलॉजी होना बहुत जरूरी है। इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति व्हाट इज टू बी डन जो कि 1902 में पब्लिश होती है।
इसमें इस बात की वकालत की कि प्रोलिट्रेट क्लास के लिए भी कम्युनिस्ट आईडियोलॉजी का होना आवश्यक है। ठीक उसी तरह से जिस तरह
से वर्चुअ क्लास के पास कैपिटलिस्ट आईडियोलॉजी होती है। एंटोनियो ग्रामशी ने ही कार्ल मार्क्स के बाद आईडियोलॉजी की
मार्क्सिस्ट थ्योरी को सबसे ज्यादा प्रोपाउंड किया। इन्होंने यह कहा कि जो कैपिटलिस्ट क्लास सिस्टम होती है इसमें ना
केवल जो अनकल इकोनॉमिक और पॉलिटिकल पावर है उससे ही केवल पूंजीवादी जो वर्ग व्यवस्था है कायम रहती है बल्कि जो
वर्जुआजी थॉट्स होते हैं आइडियाज होते हैं और जो इनकी डॉक्ट्रिंस होती है उससे भी जो इनकी हैज़मनी होती है उससे कायम रहती है
जिसे इन्होंने वैचारिक आधिपत्य कहा यानी कि इन्होंने इसे आइडियोलॉजिकल हैज़ेमनी कहा। एंटोनियो ग्रमशी ने ही कार्ल मार्क्स
के बाद मार्क्सिस्ट थ्योरी ऑफ़ आईडियोलॉजी को अच्छे से डेवलप किया। इन्होंने यह कहा कि जो कैपिटलिस्ट क्लास सिस्टम होता है,
इसमें केवल जो अनकल इकोनॉमिक और पॉलिटिकल पावर होती है, इससे ही हैज़ेमनी कायम नहीं होती है। बल्कि जो वर्जुआजी क्लास होते
हैं, उनके आइडियाज और उनकी जो डॉक्ट्रिंस होती है, उससे भी जो हैज़ेमनी है, वह कायम रहती है। जिसे इन्होंने वैचारिक आधिपत्य
कहा यानी कि आइडियोलॉजिकल हैज़ेमनी कहा। ग्रामशी के आइडियोलॉजी के कांसेप्ट को हम तीन तरीके से समझ सकते हैं। पहला यह है कि
इन्होंने हैजेमनी की बात की। इन्होंने कहा कि जो शासक वर्ग है उसके द्वारा चुमास यानी कि जो लेबर क्लास होती है उसके ऊपर
हैजेमनी दबदबा अर्थात प्रभुत्व स्थापित किया जाता है। वहीं दूसरा पॉइंट यह है कि यह कहते हैं कि जो शासक वर्ग है इनकी
हैजेमनी का मुकाबला करने के लिए काउंटर हैज़ेमनी को भी क्रिएट करना पड़ेगा। और तीसरा कांसेप्ट इन्होंने यह दिया कि जो
आइडियोलॉजी होती है उसकी अंडरस्टैंडिंग होना बहुत जरूरी है। क्योंकि आइडियोलॉजी के द्वारा ही जो रूलिंग क्लास है वो मास
के ऊपर लेबर क्लास के ऊपर एक्सप्लइटेशन करती है। हैजेमनी स्थापित करती है। अतः जो आईडियोलॉजी है उसको अंडरस्टैंड करना बहुत
जरूरी है। हरबर्ट मार्क्यूजे जो कि एक जर्मन अमेरिकन फिलॉसोफर रहे हैं। इन्होंने आइडियोलॉजी को कहा टोटलरियन थ्योरी अर्थात
इन्होंने यह कहा कि जो विचारधारा है यह अधिनायकवादी सिद्धांत है। इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति जिसका टाइटल था वन
डायमेंशनल मैन जो कि 1964 को पब्लिश होती है। इसमें तर्क दिया कि एडवांस्ड इंडस्ट्रियल सोसाइटी हैज़ डेवलप्ड अ
टोटलिटेरियन कररेक्टर थ्रू द कैपेसिटी ऑफ़ इट्स आइडियोलॉजी टू मैनपुलेट थॉट एंड डिनाई एक्सप्रेशन टू अपोजिशनल ओब्यूज।
इसका मतलब यह है कि जो उन्नत औद्योगिक समाज है उसने विचारों में हेरफेर करने और विरोधी विचारों को अभिव्यक्ति से वंचित
करने की अपनी विचारधारा की क्षमता के माध्यम से एक अधिनायकवादी चरित्र विकसित किया है। अब हम आइडियोलॉजी के नॉन
मार्क्सिस्ट व्यू को अच्छे से समझ लेते हैं। तो इसके सबसे बड़े विचारक रहे हैं कार्ल मैनहम जो कि जर्मन सोशियोलॉजिस्ट
रहे हैं। खास बात यह है कि इन्होंने कार्ल मार्क्स की तरह इस बात को एक्सेप्ट किया कि लोगों के विचार उनकी सोशल सिचुएशंस के
अनुसार बदलते रहते हैं, आकार लेते हैं। हालांकि मार्क्स के विपरीत इन्होंने विचारधारा को इसके नकारात्मक प्रभाव से
मुक्त कराने का एफर्ट किया। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने अपनी अक्षय कृति आईडियोलॉजी एंड यूटोपिया में
विचारधाराओं के विचार प्रणालियों के रूप में चित्रित किया जो एक विशेष सामाजिक व्यवस्था की रक्षा के लिए काम करती है और
जो मोटे तौर पर इसके प्रमुख या शासक समूह के हितों को व्यक्त करती है। कार्ल मैनहम ने एक इंपॉर्टेंट कोट दी जिसमें इन्होंने
यह कहा कि आइडियोलॉजीस आर मेंटल फ़िक्शन यूज्ड टू कंसील द रियल नेचर ऑफ पर्टिकुलर सोसाइटी जिसका हिंदी में मतलब होता है कि
विचारधाराएं मानसिक कल्पनाएं होती है। जिनका उपयोग किसी विशेष समाज की वास्तविक प्रकृति को छिपाने के लिए किया जाता है।
इस तरह से कार्ल मैनहम के लिए आइडियोलॉजी का मतलब होता है इंटरेस्ट ऑफ द डोमिनेंट क्लास। जबकि यूटोपिया का मतलब होता है
इंटरेस्ट ऑफ द डिप्रेस्ड क्लास। अगले थिंकर का नाम आता है हन्ना आरेंट जो कि जर्मन अमेरिकन हिस्टोरियन और फिलॉसोफर रही
है। इन्होंने यह कहा कि जो आईडियोलॉजी है यह सोशल ऑर्डर का एक इंस्ट्रूमेंट होता है जिसके द्वारा कंपैलेंस और सबऑर्डिनेशन को
सुनिश्चित किया जाता है। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति द ओरिजंस ऑफ टोटलीटेरियनिज्म जो कि 1951
को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने कहा कि आइडियोलॉजी टोटलीज्म का इंस्ट्रूमेंट होता है। तो जब हम इनके टोटोिटेरियनिज्म को
समझते हैं तो इसमें दो रूप आते हैं। पहला फासिज्म और दूसरा स्टनिज्म। और वहीं इन्होंने यह भी कहा कि जो थर्ड वर्ल्ड है
यह कोई रियलिटी नहीं है बल्कि आइडियोलॉजी है जिसके तहत जो थर्ड वर्ल्ड कंट्रीज है उनको इनफीरियर समझा जाता है। हन्ना आरंट
और कार्ल पपर दोनों ने आइडियोलॉजी के बारे में कहा कि आइडियोलॉजी इज फाउंड इन टोटलिटेरियन सोसाइटीज। आइडियोलॉजी देयर
फॉर सब्स एज अ टूल ऑफ टोटलिटेरियनिज्म। जिसका मतलब यह है कि आरेंट और पॉपर दोनों ने ही विचारधारा के बारे में कहा कि यह
अधिनायकवादी समाज में पाई जाती है। अतः विचारधारा सर्वसत्तावाद के उपकरण के रूप में इंस्ट्रूमेंट के रूप में काम करती है।
एंथोनी गिडिस ने अपनी प्रसिद्ध कृति बिय्ड लेफ्ट एंड राइट जो कि 1994 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने इस बात का तर्क दिया
कि ग्लोबलाइजेशन के डेवलपमेंट से जो सोशियोलॉजिकल डेवलपमेंट है इसने जो लेफ्ट और राइट का कॉ कासेप्ट है उनके बीच जो
आईडियोलॉजिकल लड़ाई होती है आईडियोलॉजिकल ट्रेडिशंस होती है इसको खत्म कर दिया है और खास बात यह भी है कि इन्होंने यह कहा
कि आज की जो राजनीति है पॉलिटिक्स है वह लेफ्ट और राइट से आगे निकल गई है। इस प्रकार से इन्होंने लेफ्ट और राइट का जो
कांसेप्ट है इसको इन्होंने खत्म बताया एंड बताया अपनी प्रमुख कृति जिसका नाम है बिय्ड लेफ्ट एंड राइट। अब हम कंजर्वेटिव्स
के व्यू को आइडियोलॉजी के ऊपर समझते हैं। तो कंजर्वेटिव्स यह मानते हैं कि जो ट्रेडिशनली है वह आइडियोलॉजी एक
मैनिफेस्टेशन है एोगेंस ऑफ रैशनलिज्म का। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह कहते हैं कि जो आईडियोलॉजी हैं, यह एक ऐसी विस्तृत
प्रणालियां हैं जो खतरनाक और अविश्वसनीय हैं। यानी कि इनके ऊपर विश्वास नहीं किया जा सकता है। यह डेंजरस है क्योंकि इनका
वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता है और यह ऐसे सिद्धांत और लक्ष्य स्थापित करती है जो वास्तविक नहीं होते हैं जो व्यक्ति
को दमन की ओर ले जाती है और फिर जो लक्ष्य होते हैं उनको प्राप्त नहीं किया जा सकता है। और यह कहते हैं कि इस दृष्टि से जो
सोशलिज्म है और जो लिबरलिज्म है यह भी आइडियोलॉजिकल है। और खास बात यह है कि माइकल ऑक्शॉट ने अपनी प्रसिद्ध कृति जिसका
टाइटल है रैशनलिज्म इन पॉलिटिक्स जो कि 1962 को पब्लिश होती है। इस कृति में इन्होंने तर्क दिया कि आइडियोलॉजी एज एन
एब्स्ट्रैक्ट सिस्टम ऑफ़ थॉट सेट ऑफ़ आइडियाज व्हिच डिस्टोर्ट पॉलिटिकल रियलिटीज़। इसमें यह कहते हैं कि जो
विचारधारा है यह एक अमूर्त विचार प्रणाली है। अर्थात विचारों का एक ऐसा समूह है जो राजनीतिक वास्तविकताओं को विकृत करता है।
अर्थात जो पॉलिटिकल रियलिटीज होती है उसको खंडित करता है, कोलैप्स करता है, खत्म कर देता है। माइकल ऑक्शॉट ने अपनी प्रसिद्ध
कृति रैशनलिज्म इन पॉलिटिक्स में तर्क दिया कि इन पॉलिटिकल एक्टिविटी मैन सेल अ बाउंडलेस एंड बॉटमलेस सी। जिसका मतलब यह
है कि राजनीतिक गतिविधि में लोग एक असीम और अथाह समुद्र में यात्रा करते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि माइकल ऑकशॉट कह रहे हैं कि
विचारधारा एक हठधर्मिता के बराबर है अर्थात डॉग्मैटिज्म के बराबर है जो कि निश्चित या सिद्धांतवादी विश्वास है जो
वास्तविक दुनिया की जटिलताओं से अलग होता है। अब हम इस बात को डिस्कस कर लेते हैं कि फेमिनिस्ट थिंकर आइडियोलॉजी के बारे
में क्या सोचते हैं? तो जब हम बात करते हैं फेमिनिस्ट्स की खासतौर पे जो मार्क्सिस्ट फेमिनिस्ट रही हैं तो यह कहती
है कि जो आईडियोलॉजी है यह पेट्रियिकल सोसाइटी के लिए काम करती है और ऐसी सोसाइटी में जब महिलाओं का सबऑर्डिनेशन
होता है एक्सप्लइटेशन होता है तो उसको यह लेजिटमेट करता है। अर्थात जो आईडियोलॉजी है यह पुरुषों को ही फायदा देता है।
महिलाओं को तो उनके अधिकार छीनने में, उनकी सबऑर्डिनेशन में और एक्सप्लइटेशन में भूमिका निभाती है। इस तरह से जो
आईडियोलॉजी है इसका कैरेक्टर सेक्सिस्ट है अर्थात लिंगवादी है जो केवल पुरुषों को ही फायदा करता है। अब हम सबसे इंपॉर्टेंट
कांसेप्ट द एंड ऑफ आईडियोलॉजी जिसे हिंदी में विचारधारा का अंत कहा जाता है। इसको अच्छे से समझ लेते हैं। तो, यह जो
कांसेप्ट है, यह 1950 और 60 के दशक में एमर्ज होता है। जब 1960 में डेनियल बेल ने अपनी प्रसिद्ध कृति जिसका टाइटल था एंड ऑफ़
आईडियोलॉजी लिखी। इस कृति में इन्होंने तर्क दिया कि आफ्टर सेकंड वर्ल्ड वॉर पॉलिटिक्स इन द वेस्ट वाज़ कैरेक्टराइज्ड
बाय ब्रॉड एग्रीमेंट अमंग मेजर पॉलिटिकल पार्टीज एंड द एब्सेंस ऑफ़ आइडियोलॉजिकल डिवीज़ और डिबेट। जिसका मतलब यह है कि जो
सेकंड वर्ल्ड वॉर है उसके बाद जो वेस्टर्न कंट्रीज है वहां की जो पॉलिटिक्स है उसकी प्रमुख विशेषता ये रही कि वहां के जो
पॉलिटिकल पार्टीज है उनमें जो व्यापक सहमति होती है कंसेंसस होता है और जो वैचारिक विभाजन होता है यानी कि
आइडियोलॉजिकल डिवीजन होता है और जो डिबेट होती है वह खत्म हो गई थी। खास बात यह भी है कि डेनियल बेल ने अपनी इसी कृति में यह
कहा कि फासिज्म और जो कम्युनिज्म है इन दोनों ने अपनी जो क्रेडिबिलिटी है उसको लॉस्ट कर दिया है और बाकी के जो दल है
इन्होंने भी इस बात पर सहमति नहीं जताई है कि वह किस विचारधारा की पालना करें ताकि वे आर्थिक विकास को सुनिश्चित कर सके और
सबसे बड़ी बात यह भी है कि यह कहते हैं कि अर्थशास्त्र यानी कि जो इकोनॉमिक्स है वह बहुत इंपॉर्टेंट हो गया है राजनीति के
बजाय और इकोनॉमिक्स ने पॉलिटिक्स के ऊपर जीत अर्जित कर ली है। अब यह लोग सोचते हैं कि राजनीति से कैसे समृद्धि प्राप्त की
जाए। इस प्रकार से डेनियल बेल कहते हैं कि जो विचारधारा है वह अब रिलेवेंट नहीं रही। अर्थात अप्रासंगिक हो गई है। इररेिलेवेंट
हो गई है। एंड ऑफ आईडियोलॉजी के कुछ इंपॉर्टेंट सुपुटर भी रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है एसएम लिप्सट का। दूसरा
आता है रेमंड एरो का। तो एसएम लिपसेट की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है जिनमें पहला नाम आता है पॉलिटिकल मैन द सोशल
बेसिस ऑफ पॉलिटिक्स। दूसरी कृति रही है हुज हु इन डेमोक्रेसी। वहीं रेमंड एरो की प्रमुख कृति है द ओपियम ऑफ द
इंटेलेक्चुअल्स और दूसरी इनकी है डेमोक्रेसी एंड टोटलिटेरियनिज्म। दूसरा नाम आता है ऑगस्टाइन हिपो का।
इन्होंने एक इंपॉर्टेंट राइटिंग लिखी जिसका नाम है द सिटी ऑफ़ गॉड। और इसमें इन्होंने दो तरह की सिटीज में डिफरेंस
किया। पहली सिटी है सिटी ऑफ गॉड और दूसरी है अर्थली सिटी। तो इसको भी यूटोपियनिज्म से जोड़ के देखा जा सकता है। क्योंकि इनका
जो एनविज़ है वह भी पूरी तरह से प्लेटो से मिलताजुलता है। यानी कि जिस तरह से प्लेटो ने आइडियल स्टेट की बात की। उसी तरह से
इसमें ऑगस्टाइन हिपो ने भी सिटी ऑफ़ गॉड की बात की जो कि यूटोपियन या फिर काल्पनिक नजर आता है। अब बात कर लेते हैं कि
यूटोपियन सोशलिज्म क्या है? तो बेसिकली यूटोपियन जो सोशलिज्म है उसकी नींव थॉमस मुरे ने डाली थी जिनको कि फाउंडेशन ऑफ
यूटोपियन सोशलिज्म के रूप में देखा जाता है। तो इन्होंने 1516 ईस्वी में एक इंपॉर्टेंट राइटिंग लिखी जिसका नाम है
यूटोपिया जिसमें इन्होंने एक ऐसी सोसाइटी की स्थापना की या उसकी वकालत की जो कि यूटोपियन बेस्ड सोसाइटी थी और यह एक और से
फिक्शनल आइसलैंड सोसाइटी थी जिसमें इन्होंने एक काल्पनिक तौर पर इस बात की वकालत की कि वहां पर किस तरह का कल्चर
सोशल स्टेटस लोगों का रहन-सहन पाया जाता है और इन्होंने ही यूटोपिया शब्दावली को गाड़ा था और नोट करने वाली बात यह है कि
सेंट साइमन, रॉबर्ट ओबेन, चार्ल्स फुरियर को यूटोपियन सोशलिस्ट के रूप में जाना जाता है। और यूटोपियन सोशलिस्ट इनको कहा
है कार्ल मार्क्स ने। मार्क्स ने कहा कि इनके जो विचार है अर्थात साइमन, ओविन और फुरियर के जो विचार है वह साइंटिफिक नहीं
है। काल्पनिक है। क्योंकि इन्होंने सोशलिज्म से संबंधित यूटोपियन विचार दिए। ऐसे विचार दिए जो वैज्ञानिक नहीं है। इसी
वजह से कार्ल मार्क्स ने इनको यूटोपियन सोशलिस्ट कहा। अब हम एक-एक करके कार्ल मार्क्स, एंजेल्स, ट्रॉट्सकी, कॉर्स्की,
लेनिन, रोजा लग्जमबर्ग, स्टारलिन, एडवर्ड बर्नस्टिन, निकोस पोलंतजा, माउसडोंग जैसे अनेकों मार्क्सिस्ट विचारकों को पढ़ लेते
हैं। उनकी फिलॉसोफी, उनके वक्स, उनके कोर्ट्स को अच्छे से समझ लेते हैं। तो इनमें सबसे पहला नाम आता है कार्ल मार्क्स
का। कार्ल मार्क्स, जर्मन फिलॉसफर, इकोनॉमिस्ट, पॉलिटिकल थिंकर रहे हैं। इनको जाना जाता है फादर ऑफ द 20थ सेंचुरी
कम्युनिज्म और इनका जन्म 1818 को जर्मनी के ट्रायर नगर में हुआ था और इन्होंने कैपिटलिज्म को पूरी तरह से खंडित किया
यानी कि क्रिटिसिज्म किया कैपिटलिज्म का और इन्होंने 1842 में गायनुस जायरन नामक अखबार जो कि एक जर्मन अखबार था उसके यह
एडिटर बने। यानी कि संपादक का जिम्मा इन्होंने संभाला। और अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ कोर्ट्स की। पहला कोर्ट्स है
जिसमें यह कहते हैं कि विचारधाराएं झूठ होती है, मिथ होती है और यह कहते हैं कि संपत्ति जो है वह पूंजीवाद का आधार होता
है। आगे यह कहते हैं कि जो पूरा का पूरा इतिहास है वो क्लास स्ट्रगल का इतिहास रहा है। और एक इंपॉर्टेंट कोटेशन यह देते हैं
जिसमें यह कहते हैं कि आज तक जितने भी फिलॉसोफर्स रहे हैं, उन्होंने अलग-अलग तरीके से दुनिया को व्याख्यात किया है।
लेकिन अब मुद्दा है इसे चेंज करने का। यानी कि अब टाइम आ गया है कि इसे चेंज करना है। इस दुनिया को चेंज करना है।
परिवर्तन लाना है। अगली कोट यह देते हैं जिसमें यह कहते हैं कि जो रेवोल्यूशन होती है वह इनिडिस्पेंसिबल मिडवाइफ होती है
सोशल चेंज की। यानी कि इंपॉर्टेंट मेन माध्यम होता है सामाजिक परिवर्तन का। और अगली कोटेशन यह देते हैं जिसमें यह कहते
हैं कि राज्य कैपिटलिस्ट्स अर्थात पूंजीपतियों की एक एग्जीक्यूटिव कमेटी अर्थात कार्यकारी समिति होती है। और यह
कहते हैं कि राज्य एक माध्यम होता है शोषण का यानी कि एक शोषण का यंत्र होता है। और आगे एक कोटेशन मार्क्स देते हैं जिसमें
कहते हैं कि केवल लेबर ही एक ऐसा एलिमेंट है तत्व है जो समाज में वैल्यू्यूज को पैदा करता है। और इन्होंने लास्ट कोटेशन
दी है जिसमें ये कहते हैं कि आईडियोलॉजी रिप्रेजेंट करता है फाल्स कॉन्शियसनेस को। अर्थात यह मिथ्या चेतना को रिप्रेजेंट
करता है और दूसरी तरफ यह कहते हैं कि जो फैटिसिज्म ऑफ कमोडिटीज है वह रिप्रेजेंट करता है फाल्स सोशल रिलेशनशिप। तो नोट
करने वाली बात यह है कि जहां एक तरफ यह कहते हैं कि आईडियोलॉजी मिथ्या चेतना को बढ़ावा देता है। वहीं दूसरी तरफ यह कहते
हैं कि जो फैटिसिज्म है यानी कि अंधभक्ति वस्तुओं की जो अंधभक्ति है जिसे हम अंग्रेजी में कहते
हैं फैटिसिज्म ऑफ कमोडिटीज वह रिप्रेजेंट करता है। झूठे सामाजिक संबंधों को। कार्ल मार्क्स के सबसे प्रमुख नोशंस में पहला
नोशन आता है यंग मार्क्स। और यंग मार्क्स कार्ल मार्क्स के अर्लियर थॉट्स हैं जो कि इनकी प्रमुख कृति इकोनॉमिक एंड फिलॉसोफिक
मैनुस्क्रिप्ट ऑफ 1844 में पाए जाते हैं। इसमें इन्होंने बात की थी ह्यूमन फ्रीडम, एलिनेशन, फैटिसिज्म ऑफ कमोडिटीज कांसेप्ट
ऑफ प्रैक्टिस। तो इन्हीं जितने भी कांसेप्ट है इन्हीं सभी को यंग मार्क्स कहा जाता है। यानी कि इस कृति में जितने
भी ये विचार पाए गए हैं उसको सामूहिक रूप से यंग मार्क्स कहा गया है। इनका दूसरा नोशन आता है डायलेक्टिकल मटेरियलिज्म
जिसको कि हिस्टोरिकल मटेरियलिज्म भी कहा जाता है। तो ये दो शब्दों के मेल से बना है। डायलेक्टिकल प्लस मटेरियलिज्म।
डायलेक्टिकल वर्ड मार्क्स ने हगल से ग्रहण किया था। हालांकि डायलेक्टिकल वर्ड उनसे पहले भी अर्थात हेगल से पहले भी सॉक्रेट
और प्लेटो ने इसे यूज किया था। प्रयोग में लाया था। वहीं दूसरी तरफ मार्क्स ने मटेरियलिज्म शब्द को फायर वाहक से ग्रहण
किया था। तो इस तरह से डायलेक्टिकल मटेरियलिज्म दो शब्दों का एक मेल है जिसमें कार्ल मार्क्स कहते हैं कि जो
मटेरियलिज्म है यानी कि जो भौतिक वस्तुएं हैं वे ही सृष्टि का सार है। जब भौतिक वस्तुओं में या फिर मटेरियलिज्म में चेंज
आता है तो दुनिया में भी चेंज आता है। दूसरी तरफ हेगल कहते हैं कि आइडिया या फिर कॉन्शियसनेस ही सृष्टि का सार है। उन्हीं
की वजह से सृष्टि चलायमान होती है। तो इसको एक और उदाहरण के द्वारा हम अच्छे से समझ सकते हैं जो कि आपको इमेज में या फिर
डायग्राम के रूप में दिखाई दे रहा है। तो कार्ल मार्क्स बात करते हैं डइलेक्टिक मटेरियलिज्म की जिसमें यह बात करते हैं
थीसिस, एंटीथीसिस एंड सिंथेसिस की। तो मार्क्स ने माना है कि जो वर्जुआ क्लास है वो है थीसिस। और जो प्रोिट्रेट है वो है
एंटीथीसिस। क्यों है? क्योंकि सबसे पहले वर्जुआ क्लास एमर्ज होती है और अपने हितों की पूर्ति के लिए वह पूंजीवाद को बढ़ावा
देती है और जो छोटे-छोटे या फिर गरीब लोग हैं उनको एक्सप्लइट करती है। तो ऐसी स्थिति में जो प्रोिट्रेट क्लास है वो
एंटीथीसिस बन जाती है क्योंकि इन दोनों के बीच संघर्ष चलता है। जब डायलक्ट होता है, द्वंद होता है, तो उन दोनों के संघर्ष के
परिणाम स्वरूप एक सिंथेसिस निकलता है जिसको कि कार्ल मार्क्स ने कहा है कम्युनिज्म। यानी कि जब दोनों क्लासेस आपस
में टकराएंगी, लड़ाई होंगी, रेवोल्यूशन आएगी तो रेवोल्यूशन के परिणाम स्वरूप जो सिंथेसिस होगा वो होगा क्लासलेस एंड
स्टेटलेस सोसाइटी जिसे कार्ल मार्क्स ने कम्युनिज्म कहा है। कार्ल मार्क्स का अगला सिद्धांत या फिर अगला नोशन आता है नेगेशन
ऑफ द नेगेशन। जिसको कि हिंदी में कहा जाता है नकार का नकार और इसको प्रतिपादित इन्होंने किया था अपनी इंपॉर्टेंट कृति
दास कैपिटल में जिसमें इन्होंने बात की थी एवोल्यूशन ऑफ द प्राइवेट प्रॉपर्टी। कार्ल मार्क्स कहते हैं कि नेगेशन ऑफ द नेगेशन
का जो सिद्धांत है वो हमेशा से पाया जाता है क्योंकि इतिहास हमेशा से वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है जिसमें दो क्लासेस पाई
जाती है वर्जुआ एंड प्रोलिट्रेट। तो कार्ल मार्क्स कहते हैं कि सबसे पहले वर्जुआ रेवोल्यूशन आती है। जिसमें कि जो इलीट
क्लास के लोग हैं यानी कि कैपिटलिस्ट क्लास के लोग हैं वे संपत्ति की स्थापना कर देते हैं। कैपिटल प्राइवेट प्रॉपर्टी
स्टेट जैसे इंस्टिट्यूशन की स्थापना कर देते हैं और मजदूरों का शोषण करते हैं अपने फायदे के लिए अपने हितों की प्राप्ति
के लिए। लेकिन मार्क्स कहते हैं कि जैसे ही एक्सप्लइटेशन बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो जो प्रोडट क्लास के जो लोग हैं उनके
अंदर एक चेतना विकसित हो जाती है। क्लास कॉन्शियसनेस विकसित हो जाती है और दुनिया भर के जो मजदूर हैं वह इकट्ठे होकर प्रोडट
रेवोल्यूशन लाते हैं जिसके अंतर्गत यह कैपिटलिज्म, प्राइवेट प्रॉपर्टी और स्टेट जैसे इंस्टीट्यूशन को खत्म करके क्लासलेस
एंड स्टेटलेस सोसाइटी की स्थापना करते हैं। अर्थात कम्युनिज्म की स्थापना करते हैं। तो इस तरह से कार्ल मार्क्स कहते हैं
कि यह जो नेगेशन ऑफ द नेगेशन है यानी कि नकार का नकार सिद्धांत है वह पाया जाता है। क्योंकि दोनों ही जो क्लासेस है एक
दूसरे को नकारती है। एक दूसरे से संघर्ष करती है। अगला इनका नोशन है एलिनेशन और यह बहुत ही इंपॉर्टेंट नोशन है। इस नोशन को
इन्होंने अपनी प्रमुख कृति इकोनॉमिक एंड फिलॉसोफिक मैनुस्क्रिप्ट ऑफ 1844 में दिया है जिसमें इन्होंने चार प्रकार के
एलिनेशंस की बात की है। कार्ल मार्क्स कहते हैं कि मजदूरों का इतना ज्यादा शोषण होता है कि हर तरह से यानी कि चार प्रकार
से जो मजदूर है, लेबर है, वर्कर्स है वो अलग हो जाते हैं, पराए हो जाते हैं। तो पहले होते हैं लेबर से और वर्क से। क्यों
होते हैं? क्योंकि उनके पास अब जो है वह इतना टाइम नहीं होता है और वे सिर्फ लेबर से और वर्क से जुड़े रहते हैं और उसके
बावजूद भी लेबर का उन्हें कोई फल नहीं मिलता है। कोई मूल्य नहीं मिलता है। उनका जो सारा मूल्य है वह पूंजीपतियों को ही
मिल जाता है। दूसरा यह कहते हैं कि फैमिली एंड सोसाइटी। मार्क्स कहते हैं कि उनके पास इतना भी टाइम नहीं होता है कि फैमिली
के साथ रहे। समाज में रहे और तीसरा होता है नेचर से। मार्क्स कहते हैं कि नेचर के साथ रहने और उसके साथ समय व्यतीत करने का
भी उनके पास टाइम नहीं होता है। और मार्क्स कहते हैं कि लास्ट में खुद से भी जो वर्कर्स है वह अलग हो जाते हैं क्योंकि
खुद के लिए भी इनके पास टाइम नहीं होता है। मार्क्स का अगला नोशन है क्लासलेस एंड स्टेटलेस सोसाइटी जिसको कि कम्युनिज्म कहा
जाता है। मार्क्स के फिलॉसोफी का जो उद्देश्य था या फिर अल्टीमेट जो एम था वो कम्युनिज्म को स्थापित करना था। लेकिन
मार्क्स कहते हैं कि कम्युनिज्म की स्थापना सिर्फ और सिर्फ प्रोिट्रेट रेवोल्यूशन से ही की जा सकती है। कार्ल
मार्क्स ने अगला नोशन दिया है थ्योरी ऑफ़ क्लास स्ट्रगल जिसमें कार्ल मार्क्स कहते हैं कि इतिहास हमेशा से क्लास स्ट्रगल का
इतिहास रहा है जिसमें वर्जुआ और पॉलिट्रेट क्लास के बीच हमेशा से संघर्ष चला रहता है। अगला इनका नोशन है थ्योरी ऑफ सरप्लस
वैल्यू। तो कार्ल मार्क्स बेसिकली कहते हैं कि जो कैपिटलिस्ट क्लास है वह मजदूरों से एक्स्ट्रा काम करवाते हैं। एक्स्ट्रा
घंटे काम करवाते हैं और उसका जो वैल्यू है, मूल्य है, वह मजदूरों को दिया जाना चाहिए था। लेकिन वे मजदूरों को ना देकर,
वर्कर्स को ना देकर अपने जेब में रखते हैं। जिसको कि कार्ल मार्क्स ने थ्योरी ऑफ़ सरप्लस वैल्यू कहा है। अगला इनका नोशन है
क्लासिकल मार्क्सिज्म। तो, बेसिकली इसका जो कोर आईडिया है, वो है द मार्क्सिज्म ऑफ़ मार्क्सिज्म। यानी कि ये मार्क्स के जितने
भी विचार है, फिलॉसोफी है, उसी पर आधारित है। इसको ऑर्थोडॉक्स मार्क्सिज्म से भी जोड़कर देखा जा सकता है। हालांकि बाद में
लेनिन भी इससे जुड़े। तो बेसिकली अगर हम देखें तो क्लासिकल जो मार्क्सिज्म है वो कार्ल मार्क्स की जो दो प्रमुख कृतियां
हैं दास कैपिटल एंड कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो उन पर इन्होंने जितने भी विचार दिए, फिलॉसोफी दी, आइडियाज दी, उसको सामूहिक
रूप से क्लासिकल मार्क्सिज्म कहा जाता है। इनका अगला नोशन रहा है साइंटिफिक सोशलिज्म। इनकी जितनी भी विचारधारा है या
फिलॉसोफी है, दर्शन है, आईडिया है, उसको साइंटिफिक सोशलिज्म कहा जाता है। क्यों? क्योंकि मार्क्स ही ऐसे पहले फिलॉसोफर या
फिर विद्वान रहे हैं जिन्होंने यह पता लगाने की कोशिश की कि स्टेट क्यों एमर्ज होता है? स्टेट क्यों एक्सप्लइटेटिव
इंस्टीट्यूशन है? क्यों क्लास स्ट्रगल होता है? क्यों स्टेट को खत्म करना चाहिए? क्यों कैपिटलिज्म के इमरजेंस से इनक्वल या
फिर अनइक्वल जो सोसाइटी है इनकलिटी है वह बढ़ी। तो इस तरह से कार्ल मार्क्स ने इन सभी चीजों का एनालिसिस किया। इसी वजह से
इनका जो सोशलिज्म है उसको साइंटिफिक सोशलिज्म कहा जाता है। जबकि इनसे पहले का जो सोशलिज्म था उसको यूटोपियन सोशलिज्म
कहा जाता है। अगला इनका नोशन है फाल्स कॉन्शियसनेस। तो मार्क्स ने आइडियोलॉजीज़ यानी कि जितनी भी प्रकार की विचारधाराएं
होती है उनको मिथ्या चेतना कहा है। फाल्स कॉन्शसनेस कहा है। अगला इनका नोशन है क्लास कॉन्शियसनेस। तो मार्क्स कहते हैं
कि बेसिकली जब एक्सप्लॉयटेशन बहुत अधिक बढ़ जाता है तो दुनिया भर के जितने भी वर्कर्स हैं वे इकट्ठे हो जाते हैं।
यूनाइट हो जाते हैं। उनके अंदर एक जागरूकता आ जाती है और इस प्रकार से वे एक होकर एक क्रांति लाते हैं जिसे कि
प्रोिट्रेट रेवोल्यूशन कहा जाता है। जिसके बाद दुनिया भर में क्लासलेस एंड स्टेटलेस सोसाइटी की स्थापना की जाएगी और फिर
कम्युनिज्म की स्थापना की जाएगी और इसका प्रमुख उदाहरण हम 1917 की जो रशियन रेवोल्यूशन रही है उसको दे सकते हैं।
कार्ल मार्क्स की सभी राइटिंग्स को आपको क्रोनोलॉजिकल ऑर्डर में अच्छे से याद रखना है। इनकी पहली राइटिंग है फिलॉसोफिकल
मैनिफेस्टो ऑफ द हिस्टोरिकल स्कूल ऑफ लॉ 1842 में। दूसरी है क्रिटिक ऑफ हीगल्स फिलॉसोफी ऑफ़ राइट। अगली है ऑन द जस
क्वेश्चन। अगली है नोट्स ऑन जेएस मिल। अगली है इकोनॉमिक एंड फिलॉसोफिक मैनुस्क्रिप्ट्स ऑफ 1844। और अगली है द
होली फैमिली। नेक्स्ट है थीसिस ऑन फायर वार्क। अगली है जर्मन आईडियोलॉजी। अगली है द प्रॉपर्टी ऑफ़ फिलॉसोफी। और अगली है वेज़
लेबर एंड कैपिटल। और अगली है कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो जो कि इनकी बहुत ही इंपॉर्टेंट कृति है। और अगली राइटिंग है इनकी क्लास
स्ट्रगल इनफेंस। अगली है द 18थ ब्रूमेयर ऑफ लुईस नेपोलियन। और अगली है अ कंट्रीब्यूशन टू द क्रिटिक्स ऑफ लुईस
नेपोलियन। और अगली है ग्रैंड्री से। और अगली है राइटिंग्स ऑन द यूएस क्रिटिक ऑफ़ पॉलिटिकल इकोनमी। अगली है राइटिंग्स ऑन द
यूएस सिविल वॉर। और अगली है थ्योरीज़ ऑफ़ सरप्लस वैल्यूज़। और अगली है वैल्यू प्राइस एंड प्रॉफिट। नेक्स्ट है दास कैपिटल जो कि
तीन वॉल्यूम में पब्लिश हुई थी। 1867, 1885, 1894। यह भी इनकी अक्षय कृति है। और अगली है इनकी सिविल वॉर इन फ्रांस।
नेक्स्ट है क्रिटिक ऑफ द गोथा प्रोग्राम। और नेक्स्ट है नोट्स ऑन एडोल्फ बोगनर। तो यह जितनी भी इनकी राइटिंग्स है आप सभी को
इन सभी राइटिंग्स को क्रोनोलॉजिकल ऑर्डर्स में अच्छे से याद करना है। दूसरे की मार्क्सिस्ट थिंकर आते हैं फ्रेडरिक
एंजेल्स और फ्रेडरिक एंजेल्स जर्मन फिलॉसफर कम्युनिस्ट सोशल साइंटिस्ट रहे हैं। जो कि कार्ल मार्क्स के एक लंगोटिया
यार अर्थात बेस्ट फ्रेंड रहे हैं। और इनको जाना जाता है फाउंडर ऑफ द सोशियोलॉजिकल फेमिनिज्म।
और इनके कुछ इंपॉर्टेंट आइडियाज हैं। जैसे एलिनेशन एंड एक्सप्लइटेशन ऑफ द वर्कर्स। दूसरा आईडिया है हिस्टोरिकल मटेरियलिज्म।
तो जो विचार कार्ल मार्क्स के एलिनेशन के ऊपर, एक्सप्लइटेशन के ऊपर, हिस्टोरिकल मटेरियलिज्म के ऊपर है, वही विचार इनके भी
है। क्योंकि इन दोनों दोस्तों ने मिलकर ही एलिनेशन, हिस्टोरिकल मटेरियलिज्म, एक्सप्लॉयटेशन से संबंधित विचार दिए थे।
इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग्स हैं। जैसे द कंडीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड। दूसरी है प्रिंसिपल ऑफ कम्युनिज्म। अगली
है द पीजेंट्स बोर इन जर्मनी। अगली है सोशलिज्म यूटोपियन एंड साइंटिफिक। अगली है द ओरिजिन ऑफ फैमिली प्राइवेट प्रॉपर्टी
एंड द स्टेट जो कि 1884 में इन्होंने लिखी। और यह इनकी बहुत ही इंपॉर्टेंट कृति मानी जाती है। एटलीस्ट इस राइटिंग को आपने
अच्छे से याद रखना। और इनकी कुछ ऐसी राइटिंग्स है जो इन्होंने मार्क्स के साथ मिलकर लिखी थी। और यह
राइटिंग्स बहुत ही इंपॉर्टेंट है। एग्जाम में कई बार पूछी गई है। तो यह राइटिंग्स है द होली फैमिली 1845, द जर्मन
आईडियोलॉजी 1845, द कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो 1848। तो ये तीनों राइटिंग्स को आपने अच्छे से याद रखना है। क्यों? क्योंकि
एंजेल्स ने कार्ल मार्क्स के साथ ही यह राइटिंग्स मिलकर लिखी थी। ट्रॉ्सकी यूक्रेनियन रशियन मार्क्सिस्ट
रेवोल्यूशनरी और थरिस्ट रहे हैं। जिन्होंने रशियन रेवोल्यूशन के दौरान लेनिन के साथ फोर्सेस को भी ज्वॉइ किया
था। हालांकि लेनिन की डेथ के बाद इनको स्टालिन के द्वारा कत्ल कर दिया गया, मार दिया गया और इन्होंने वर्कर्स का जो
इंटरनेशनलिज्म है उसके ऊपर फोकस किया और यह स्टालिन विरोधी भी रहे हैं। स्टालिन और स्टालिन की नीतियों का भी इन्होंने विरोध
किया था और नोट करने वाली बात यह है कि इन्होंने जो मार्क्सिज्म है, मार्क्स के विचार है, फिलॉसोफी है, इसको आगे बढ़ाया।
हालांकि इन्होंने इसमें कुछ नयापन लाया, नए तरीके से व्याख्या किया जिसको कि ट्रोट्सकीज्म भी कहा जाता है। अब हम बात
कर लेते हैं इनके नोशन की। तो इनका पहला नोशन है डस्टबिन ऑफ हिस्ट्री जिसको कि ऐश हिप ऑफ हिस्ट्री भी कहा जाता है। तो इसमें
बेसिकली यूज़ किया जाता है या फिर जो डस्टबिन ऑफ हिस्ट्री है इसको यूज़ किया जाता है जब
रशियन रेवोल्यूशन के दौरान बोलशविक और मैनशेविक की एक मीटिंग हो रही थी। तो उसमें जब मॉनशविक ने वक आउट किया मीटिंग
से उठकर चले गए तो उसमें ट्रोस्की ने कहा मॉनशविक को कि दैट्स राइट गेट आउट ऑफ हियर सही है यहां से निकल जाइए यू आर बर्थस तुम
बेकार हो गोयर यू बिलोंग नाउ तुम वहां जाइए जहां से तुम आते हो इनू द डस्टबिन ऑफ हिस्ट्री यानी कि कूड़ेदान के इतिहास में
जाइए जहां से तुम आते हो। तो इस फ्रेज को बेसिकली ट्रस्की ने यूज किया था जिसे कि डस्टबिन ऑफ हिस्ट्री या फिर ऐश हिप ऑफ
हिस्ट्री कहा जाता है। इसको गार्बेज हिप ऑफ हिस्ट्री और लैंडफ ऑफ हिस्ट्री के नाम से भी जाना जाता है। और पॉइंट शुड बी
नोटेड कि इसके बाद जो रोनाल्ड रिगन है उन्होंने भी इस शब्दावली को यूज़ किया था। जिसके अंतर्गत इन्होंने कहा था कि सोवियत
यूनियन लेनिज्म मार्क्सिज्म जो है वह ज्यादा लंबे समय तक नहीं टिकेगा। इसका कोलैप्स हो जाएगा। लोग इनको भुला देंगे।
और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इससे पहले भी ऐश हिप ऑफ हिस्ट्री जैसे शब्दों का यूज़ किया जा चुका है। 14 सेंचुरी में
पैट्राक जैसे विचारकों ने इसको यूज़ में लाया था जब वे रोम आए थे और रोम को इन्होंने रबिश हिप ऑफ़ हिस्ट्री के रूप में
बताया था या फिर देखा था। दूसरा इनका कांसेप्ट है परमानेंट रेवोल्यूशन जो कि बहुत ही इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है। इसमें यह
बात करते हैं कि जो भी बैकवर्ड कंट्रीज है उनके लिए जरूरी नहीं है कि उसी रास्ते से होकर अपना विकास करें जिस रास्ते से होकर
एडवांस कंट्री ने किया है। अलग-अलग कंट्रीज के अलग-अलग तरीके होते हैं। अलग-अलग उनका जो एक एनवायरनमेंट होता है,
उसी के हिसाब से उनको गुजरना चाहिए। और यह बात करते हैं कि रशिया में कोई जरूरत नहीं है कि इसी आधार पर यानी कि जो वर्जुआ
स्टेज ऑफ डेवलपमेंट है उसी के आधार पर रेवोल्यूशन लाएं। और इन्होंने कहा कि जो स्टालिन और स्टालिन के जो साथी है उनका जो
कांसेप्ट है सोशलिज्म इन वन कंट्री उसकी भी जरूरत नहीं है। क्योंकि इनका सपना था कि
वर्ल्ड कम्युनिज्म को बढ़ावा दिया जाए। यानी कि कम्युनिज्म को धीरे-धीरे पूरी दुनिया में स्थापित किया जाए। लेकिन उस
तरीके से नहीं जिस तरीके से स्टालिन ने स्थापित करना चाहा बल्कि धीरे-धीरे करके इसी को इन्होंने परमानेंट रेवोल्यूशन कहा।
ट्रोट्सकी ने कुछ इंपॉर्टेंट वक्स भी लिखे जैसे हिस्ट्री ऑफ द रशियन रेवोल्यूशन, द परमानेंट रेवोल्यूशन 1930, द रेवोल्यूशन
बेट्रियार्ड 1936, द ट्रांजिशनल प्रोग्राम फॉर सोशलिस्ट रेवोल्यूशन 1938। तो ये इनकी कुछ इंपॉर्टेंट की राइटिंग्स हैं। इनको
आपने अच्छे से याद रखना क्योंकि एग्जाम की दृष्टि से बहुत ही इंपॉर्टेंट है। अब हम बात कर लेते हैं लेनिन की। तो लेनिन रशियन
रेवोल्यूशनरी पॉलिटिशियन एंड पॉलिटिकल थ्यरिस्ट रहे हैं। और यह फॉर्मर जो सोवियत यूएसएसआर रहा है, सोवियत यूनियन रहा है,
उसके प्रीमियर यह रहे हैं। यानी कि राष्ट्रपति यह रहे हैं। और इनका जो जन्म है, वह रशिया में 1870 को होता है। 1924
में इनकी डेथ हो जाती है रशिया में। और सबसे बड़ी बात है कि इन्होंने फोकस किया था रूल ऑफ आईडियोलॉजी। जबकि मार्क्स ने
पूरी तरह से नेगलेक्ट किया था। तो यही मार्क्स और लेनिन में डिफरेंस भी आ जाता है। तो अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ
इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स की। तो पहला जो कांसेप्ट है वो है बैनगार्ड ऑफ द प्रोलिट्रेट। तो यह कहते हैं कि जो
प्रोलिट्रेट होते हैं यानी कि सर्वहारा जो वर्कर्स क्लास होती है उनको एक कवज की जरूरत होती है। और कवज कौन है? आइडियोलॉजी
है। क्योंकि जिस तरह से कैपिटलिस्ट क्लास के पास भी एक आईडियोलॉजी होती है, उसी तरह से जो प्रोलिट्रेट क्लास है, उनके पास भी
एक आईडियोलॉजी होनी चाहिए। दूसरा कांसेप्ट है इंपीरियलिज्म इज़ द लास्ट स्टेज ऑफ़ कैपिटलिज्म। जो इनकी एक राइटिंग भी रही
है। इसमें यह कहते हैं कि जो इंपीरियलिज्म होता है यानी कि साम्राज्यवाद होता है वह कैपिटलिज्म यानी कि पूंजीवाद का हाईएस्ट
स्टेज होता है। उच्च स्तर होता है। और अगला कांसेप्ट है डेमोक्रेटिक सेंट्रिसिज्म। यानी कि इन्होंने बात की थी
कि डेमोक्रेसी तो होनी चाहिए। लेकिन इन्होंने ऐसी डेमोक्रेसी की बात की थी जो सेंट्रलिज़्म हो। जहां पर सेंट्रलिज़्म हो।
यानी कि जहां पर जो सारी शक्तियां है, अथॉरिटी है, वो कम्युनिस्ट पार्टी के हाथों में केंद्रित हो। ऐसे लोकतंत्र की
इन्होंने बात की थी। अगला नोशन है सोशलिस्टिक प्रोग्राम। तो इन्होंने कई तरह के सोशलिस्टिक प्रोग्राम भी चलाए ताकि
समाजवाद को अधिक से अधिक बढ़ावा दिया जा सके। और इन्होंने बात की वन पार्टी कम्युनिस्ट स्टेट। इन्होंने कहा कि हर तरह
के जितने भी कम्युनिस्ट स्टेट है वहां पर एक ही पार्टी होगी यानी कि कम्युनिस्ट पार्टी होगी। उसी की ही अथॉरिटी होगी और
उसी की ही आईडियोलॉजी होगी जो कि प्रोिट्रेट क्लास यानी कि जो वर्कर्स हैं उनके हित के लिए काम करेगी। और अगला नोशन
है इनका बैनगार्ड ऑफ द प्रोफेशनल रेवोल्यूशन। तो इसमें यह बात करते हैं कि जो व्यवसाय क्रांतिकारी होते हैं उनको भी
जो है वह क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का मौका दिया जाना चाहिए। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे प्रोफेशनल
होते हैं। वे जहां क्रांति को लाने में मदद करते हैं, वहीं वे दूसरी तरफ लोगों को जागरूक करने में भी मदद करते हैं। अब हम
बात कर लेते हैं लेनिन के कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की। तो लेनिन का पहला वर्क है द डेवलपमेंट ऑफ कैपिटलिज्म। दूसरा है व्हाट
टू बी डन। तीसरा है वन स्टेप फॉरवर्ड टू स्टेप बैक। चौथा है टू टैिक्स ऑफ सोशल डेमोक्रेसी इन द रेवोल्यूशन। नेक्स्ट है
मटेरियलिज्म एंड इंपीरियो क्रिटिसिज्म। नेक्स्ट है द राइट ऑफ नेशंस टू सेल्फ डिस्क्रिमिनेशन। अगला है द अप्रैल थीसिस।
नेक्स्ट है द स्टेट एंड रेवोल्यूशन। नेक्स्ट है इंपीरियलिज्म इज़ द हाईएस्ट स्टेज ऑफ कैपिटलिज्म। और नेक्स्ट है लेफ्ट
विंग कम्युनिज्म एंड इनफेंटाइल डिसऑर्डर। अब हम बात कर लेते हैं लेनिन के कुछ कोड्स की। तो पहला कोड है विदाउट डाउट
आईडियोलॉजी इज़ द एक्सप्रेशन ऑफ़ क्लास इंटरेस्ट। तो यह कहते हैं कि बिना किसी शंका के जो विचारधारा होती है वो क्लास
इंटरेस्ट की एक्सप्रेशन होती है। अभिव्यक्ति होती है। अगली कोटेशन यह देते हैं कि इंपीरलिज्म इज द हाईएस्ट स्टेज ऑफ़
कैपिटलिज्म। अगली कोटेशन यह देते हैं कम्युनिस्ट आइडियोलॉजी इज़ वेरी एसेंशियल टू डू फाइट विद कैपिटलिस्ट आईडियोलॉजी। तो
ये कहते हैं कि जिस तरह से कैपिटलिस्ट क्लास के पास एक आईडियोलॉजी होती है उसी तरह से जो प्रोलिट्रेट क्लास है उनके पास
भी एक आईडियोलॉजी होनी चाहिए और उस आईडियोलॉजी को कहा जाता है कम्युनिस्ट आईडियोलॉजी और ये आईडियोलॉजी फाइट करेगी
कैपिटस्ट कैपिटलिस्ट आईडियोलॉजी के साथ। अगला इनका कोर्ट है इंपीरियलिज्म इज द एनिमी ऑफ़
सोशलिज्म। यह कहते हैं कि जो साम्राज्यवाद होता है वह समाजवाद का दुश्मन होता है। और सबसे इंपॉर्टेंट इंपॉर्टेंट जो नोशन इनका
रहा है वो है सोशलिज्म में इन्होंने कहा कि फ्रॉम ईच अकॉर्डिंग टू हिज एबिलिटी। यानी कि सोशलिज्म में सभी को उनकी योग्यता
के अनुसार और सभी को उनके काम के अनुसार मिलता है। परंतु जब कम्युनिज्म की हम बात करते हैं तो लेनिन कहते हैं कि सभी को
उनकी योग्यता के अनुसार मिलता है और सभी को उनकी नीड के अनुसार यानी कि जरूरत के हिसाब से मिलता है। तो यह डिफरेंस है
क्योंकि सोशलिज्म में मिलता है एबिलिटी और काम के अनुसार। लेकिन कम्युनिज्म में सभी को मिलता है एबिलिटी और जरूरत के हिसाब से
नीड के हिसाब से। कार्ल कॉस्की का जन्म होता है 1854 को जैक में। वहीं इनकी डेथ होती है 1938 को नीदरलैंड में। और यह जैक
ऑस्ट्रियन फिलॉसोफर रहे हैं। मार्क्सिस्ट थ्योरिस्ट रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि कार्ल मार्क्स और एंजेल्स की डेथ
होने के बाद इनको ऑर्थोडॉक्स कम्युनिज्म या फिर मार्क्सिज्म के मोस्ट अथोरेटिव थिंकर्स के रूप में जाना जाता है। अब हम
बात कर लेते हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स की। तो पहला है थॉमस मोरे एंड हिज इटोपिया। दूसरा है क्लास स्ट्रगल। तीसरा
है फॉर्च्यूंस ऑफ मॉडर्न सोशलिज्म। चौथा है द एग्रेरियन क्वेश्चंस। पांचवा है एथिक्स एंड द मटेरियलिस्ट कॉनसेप्शन ऑफ
हिस्ट्री। छठा है सोशलिज्म एंड कॉलोनियल पॉलिसी। अगला है फाउंडेशन ऑफ द क्रिश्चियनिटी। नेक्स्ट है द रो टू पावर।
नेक्स्ट इज टेररिज्म एंड कम्युनिज्म। और 10th है द लेबर रेवोल्यूशन। और 11थ है आर द जज और रेस। और 12 है सोशल डेमोक्रेसी
वर्सेस कम्युनिज्म। और 13 है द डिक्टेटरशिप ऑफ द प्रोलिट्रेट। तो, यह है इनके इंपॉर्टेंट वर्क्स। हो सके, तो इसको
क्रोनोलॉजिकल ऑर्डर में अच्छे से याद करना। अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट नोटेबल आइडियाज की। पहला है
इवोल्यूशनरी एपिस्टोमोलॉजी। इसमें यह बात करते हैं कि किस तरह से ह्यूमन बीइंग का इवोल्यूशन होता है।
मॉडर्नाइजेशन और कैपिटलिज्म का इमरजेंस होता है और किस तरह से समाज में नॉलेज की ग्रोथ होती है। वहीं दूसरा है सोशल
इंस्टिंक्ट। सोशल इंस्टिंक्ट में यह बात करते हैं कि किस तरह से मोरालिटी का इवोल्यूशन होता है। ह्यूमन बिहेवियर और
कल्चर का इवोल्यूशन होता है। वहीं एक इंपॉर्टेंट टर्म यह कॉइन करते हैं जिसका नाम है हाइपर रियलिज्म। इसको यह 1914 में
गढ़ते हैं। जिसमें यह बात करते हैं कि जो देश है इंटरनेशनल रिलेशन में या स्टेट्स है उनके बीच जो आर्थिक हित है उसके गेन
करने के लिए उसकी प्राप्ति के लिए उनके बीच होड़ लगेगी जो कि इंपीरियलिज्म का भी एक बाप होगा। मतलब हाइपर इंपीरियलिज्म
होगा जो कि बहुत ही खतरनाक होगा जो कि इंपीरलिज्म से भी उच्च कोटि का होगा। जिसको इन्होंने हाइपर इंपीरलिज्म कहा।
वहीं अगला इनका कांसेप्ट है कोलैप्स ऑफ कैपिटलिज्म। इन्होंने कहा कि जिस तेजी से कैपिटलिज्म बढ़ रहा है वो धीरे-धीरे खुद
ही कोलैप्स हो जाएगा उसका। यानी कि कैपिटलिज्म के कोलैप्स के लिए प्रोिट्रेट रेवोल्यूशन को लाने की जरूरत नहीं है।
अगला कांसेप्ट है क्लास कॉन्फ्लिक्ट। इन्होंने कहा कि क्लास में हमेशा से कॉन्फ्लिक्ट होते रहेंगे और उसी की वजह से
जो कैपिटलिज्म है उसका भी खंडन होगा। वहीं इनका एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा है फोकस ऑन पार्लियामेंट्री रोड टू सोशलिज्म। तो
इन्होंने कहा कि अगर सोशलिज्म को स्थापित करना है तो हमें पार्लियामेंट्री का जो रास्ता है यानी कि संसदीय रास्ता है
जिसमें लोकतंत्र, समानता, इक्वलिटी, न्याय जैसे तत्वों को अपनाना होगा और इन्होंने जो रेवोल्यूशनरी रोल टू सोशलिज्म रहा है,
जो मार्क्स का आईडिया रहा है, उसको पूरी तरह से इन्होंने रिजेक्ट किया। और अगला इनका कांसेप्ट रहा है कि जो डिक्टेटरशिप
ऑफ द प्रोिट्रेट है उसकी इन्होंने आलोचना की और इन्होंने सपोर्ट किया पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी क्योंकि इनकी
यह मान्यता रही है कि हम पार्लियामेंट्री जो रोड है यानी कि पार्लियामेंट्री जो तरीके हैं उसकी मदद से ही अगर हम सोशलिज्म
की स्थापना करेंगे तो वह अधिक लंबा चलेगा। रेवोल्यूशनरी सोशलिज्म अधिक लंबा नहीं चलेगा।
रोजा लग्जमबर्ग पॉलिश रेवोल्यूशनर थ्यरिस्ट रही है। पॉलिटिकल थ्योरिस्ट रही है और लिबेटेरियन मार्क्सिस्ट रही है। और
28 की उम्र में वे न्यूट्रलाइज जर्मन सिटीजन बन जाती है। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट आइडियाज रहे हैं। जैसे पहला है
क्रिटिसिज्म ऑफ एनी टाइप ऑफ नेशनलिज्म। ये कोई भी या किसी भी तरह का चाहे यूरोपियन हो चाहे नॉन यूरोपियन नेशनलिज्म हो उसका
ये पूरी तरह से खंडन करती है। वहीं इन्होंने बात की बिल ऑफ द पीपल और अगला इनका कांसेप्ट है जो बहुत ही इंपॉर्टेंट
है पिरामिड ऑफ़ पावर जिसमें यह बात करती है कि यूएसएसआर में जो ब्यूरोक्रेसी है वह अधिक से अधिक पावरफुल हो रही है। यानी कि
सारी शक्ति सारी अथॉरिटी यूएसएसआर में ब्यूरोक्रेसी के पास जा रही है। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स हैं। जैसे सोशल
रिफॉर्म्स एंड रेवोल्यूशन, द मास स्ट्राइक, द पॉलिटिकल पार्टी एंड द ट्रेड यूनियन। द एक्यूमुलेशन ऑफ कैपिटल बहुत ही
इंपॉर्टेंट राइटिंग है। अगली है द क्राइसिस इन द जर्मन सोशल डेमोक्रेसी। और अगली इंपॉर्टेंट राइटिंग है सोशलिज्म एंड
बारबेरिज्म जो कि 1916 में इन्होंने लिखी। इसमें यह बात करती है कि जो वर्जुआ सोसाइटी है वह अब बदल रही है। यानी कि
उसका ट्रांजिशन हो रहा है सोशलिज्म में। और दूसरी सबसे इंपॉर्टेंट राइटिंग इनकी है द लेटर्स ऑफ रोजा लग्जबर्ग जो कि बाद में
इनकी डेथ के बाद पब्लिश होती है 1978 में। माओ जेडोंग चाइनीस कम्युनिस्ट रेवोल्यूशनरी रहे हैं। फॉर्मर चेयरमैन ऑफ
द पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना रहे हैं। और नोट करने वाली बात यह है कि पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना जो कि 1949 में लाल
क्रांति के बाद बना था। उसके यह फाउंडिंग फादर रहे हैं। इन्होंने कुछ इंपॉर्टेंट कोटेशंस दी जिनमें पहली है यह कहते हैं कि
शक्ति बंदूक की नली से निकलती है। और दूसरी कोटेशन यह देते हैं बेसिकली एक इनका आईडिया रहा है। इनका स्लोगन रहा है जिसमें
यह कहते हैं कि हमें 3 साल के लिए हार्ड वर्क करना है। और अगर हम ऐसा करते हैं तो आने वाले जो 10,000 साल होंगे वह हमारी
खुशहाली के होंगे। और इन्होंने कहा कि रेवोल्यूशन कोई डिनर पार्टी नहीं होती है। इनके कुछ इंपॉर्टेंट आइडियाज रहे हैं।
जिनमें पहला है कल्चरल रेवोल्यूशन। कल्चरल रेवोल्यूशन बेसिकली चाइना में इन्होंने 1966 से लेके 1977 में शुरू की थी। यह एक
बेसिकली सोशियोपॉलिटिकल मूवमेंट था जिसे सामूहिक रूप में कल्चरल रेवोल्यूशन कहा गया। और इसका जो गोल था वो था प्रिजर्वेशन
ऑफ चाइनीस कम्युनिज्म। दूसरा इनका जो इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा वो है लॉ ऑफ कंट्राडिक्शन। ये इन्होंने अपनी
इंपॉर्टेंट कृति ऑन कंट्राडिक्शन में दिया था जिसमें ये कहते हैं कि चाहे हमारी लाइफ हो या स्टेट में कोई घटना होती हो या
हमारी लाइफ से कोई जुड़ा हुआ इंसिडेंट होता है वो कंट्राडिक्शन का परिणाम होता है। उदाहरण के लिए अगर हम कम्युनिज्म की
बात करें तो कम्युनिज्म जो स्थापित हुआ वो तभी हुआ जब दो क्लासेस के बीच कंट्राडिक्शन हुआ। दो क्लासेस आपस में
संघर्ष करती रही। तो यह कहते हैं कि कोई भी घटना इंसिडेंट या फिर लाइफ कंट्राडिक्शन का परिणाम होता है। अगली
नोशन या फिर अगली आईडिया यह देते हैं डॉक्ट्रिन ऑफ़ पार्लियामेंट्री रेवोल्यूशन जिसमें यह बात करते हैं कि अगर हमें
सोशलिज्म को स्थापित करना है पूरी दुनिया में तो हमें पार्लियामेंट्री रेवोल्यूशन लानी होगी। यानी कि जो पार्लियामेंट्री
टूल्स मींस होते हैं उन्हें यूज़ में लाना होगा ना कि हमें जो ब्लडी रेवोल्यूशन होती है उसे हमें यूज करना होगा। जैसे कि कार्ल
मार्क्स ने बात की थी। अगला नोशन है इंटेलेक्चुअल लेबर जिसमें यह बात करते हैं कि हमें इंटेलेक्चुअल लेबर पे भी फोकस
करना होगा। अब हमें अगर चाइना को उठाना है, चाइना को एक महाशक्ति बनाना है, सुपर पावर बनाना है तो इंटेलेक्चुअल लेबर पर भी
फोकस करना होगा। यानी कि दिमाग से जो काम होता है, दिमाग का जो श्रम होता है, दिमाग से जो काम किया जाता है, उसको
इंटेलेक्चुअल लेबर कहा जाता है। और इनका अगला प्रोग्राम कह सकते हैं या फिर आईडिया कह सकते हैं लेट अ 100 फ्लावर्स प्लुसोम।
इसमें बेसिकली यह जो एक कैंपेन था या स्लोगन इन्होंने दिया जो 19 56 से लेके 57 तक रहा। इसमें बेसिकली इनका यह टारगेट था
कि जितने भी चाइना में इंटेलेक्चुअल्स है उनको इकट्ठा करना और डिबेट करवाना उनसे और क्रिटिक करना पॉलिटिकल सिस्टम की।
अब हम बात कर लेते हैं माओ के कुछ इंपॉर्टेंट वक्स की। तो इनमें पहला आता है पीपल्स वॉर 1928 में। बेसिकली यह जो
आधारित था वो था माओस्ट जो मिलिट्री स्ट्रेटजी है उस पर यह आधारित था। अगला है ऑन कंट्राडिक्शन 1937 और इसमें इन्होंने
लॉ ऑफ कंट्राडिक्शन का नियम दिया था जिसकी बात मैंने अभी की थी थोड़ी देर पहले और इनकी अगली राइटिंग रही है ऑन प्रैक्टिस
एंड कंट्राडिक्शन 1937 ऑन गोरिल्ला वॉरफेयर अगला है ऑन पीपल्स डेमोक्रेटिक रूल अगला है ऑन प्रैक्टिकल
वॉर और नेक्स्ट है न्यू डेमोक्रेसी 1967 और अगला है क्रिटिक ऑफ सोवियत इकोनमी 1967 एडवर्ड बर्नस्टीन का जन्म जन्म होता है
1850 को जर्मनी के बर्लिन में और उनकी डेथ होती है 1932 को बर्लिन में। यह प्रशियन जो कि अब जर्मनी कहा जाता है उसके
मार्क्सिस्ट फिलॉसोफर और पॉलिटिशियन रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि मार्क्स और एंजेल्स के यह काफी करीबी दोस्त रहे
हैं। और इन्होंने जो मार्क्स का नोशन है मटेरियलिस्टिक थ्योरी ऑफ़ हिस्ट्री उसको चेंज किया। इसी वजह से इनको रिवीजनिस्ट भी
कहा जाता है। तो इनके कुछ इंपॉर्टेंट आइडियाज रहे हैं जिनमें पहला आता है सोशल डेमोक्रेसी की। ये बात करते हैं सोशल
डेमोक्रेसी की। ये बोलते हैं कि अगर हमें सोशलिज्म को एस्टैब्लिश करना है तो सोशलिज्म को बढ़ावा देना है तो सोशल
डेमोक्रेसी को स्थापित करना होगा। यानी कि हमें डेमोक्रेटिक और सोशल के जो दोनों वैल्यूज़ होते हैं, नॉर्म्स होते हैं, उसको
स्थापित करना होगा। उसी वजह से हम सोशलिज्म को कायम कर सकते हैं ना कि रेवोल्यूशनरी तरीके से। और दूसरी यह बात
करते हैं रिवीजनिज्म की क्योंकि इन्होंने रिवीजन की मार्क्स का जो हिस्टोरिकल थ्योरी है या फिर मटेरियलिस्टिक थ्योरी ऑफ
हिस्ट्री है उसमें इन्होंने रिवीजन किया और अगला इनका इंपॉर्टेंट कांसेप्ट या फिर आईडिया है न्यू इंटरप्रिटेशन ऑफ
मार्क्सिज्म जीनोइज़्म यानी कि जो क्लासिकल मार्क्स रहा है जिनमें लेनिन और मार्क्स के जो विचारों का प्रभाव है एंजेल के
विचारों का प्रभाव है। दास कैपिटल और कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो पे जो उनके विचार है उसकी इन्होंने नई व्याख्या दी। इसी वजह
से इनको रिवीजनिस्ट थिंकर भी कहा जाता है मार्क्सिज्म का। अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की जिनमें
पहला इंपॉर्टेंट वर्क आता है इवोल्यूशनरी सोशलिज्म। तो ये रेवोल्यूशनरी सोशलिज्म की जगह यूज़ करते हैं इवोल्यूशनरी सोशलिज्म।
तो इनकी राइटिंग का पूरा नाम है इवोल्यूशनरी सोशलिज्म ऑफ क्रिटिसिज्म एंड अफ़मेशन जो कि 1898 में यह लिखते हैं।
इसमें बेसिकली यह बात करते हैं कि हिस्ट्री जो है वो दो क्लासेस की नहीं है। यह बोलते हैं कि जिस तरह से मार्क्स ने
वकालत की कि हिस्ट्री तो सिर्फ जो दो वर्गों के बीच क्लास स्ट्रगल रहा है उसकी ही उपज है। तो ये इस मान्यता को बिल्कुल
रिजेक्ट कर देते हैं और यह कहते हैं कि क्लास स्ट्रगल जो है वो लंबे समय तक जीवित नहीं रहेगा। इफेक्टिव नहीं रहेगा। क्यों?
क्योंकि जो मिडिल क्लास है, वह इंक्रीजिंग हो रही है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है। इसको अच्छे से याद रखना। और दूसरी बड़ी
बात यह है कि इस सेमिनल वर्क में यह बात करते हैं कि जो फोर्सिबल रेवोल्यूशन होती है यानी कि रेवोल्यूशनरी जो होता है,
रेवोल्यूशन जो होती है, जिसमें ब्लड होता है, उसका यह खंडन करते हैं और साथ में यह खंडन करते हैं डिक्टेटरशिप ऑफ द
प्रोलिट्रेट। और इन्होंने इसी में बात की सोशल डेमोक्रेसी की। और अगला इनका इंपॉर्टेंट वर्क है प्री कंडीशंस ऑफ द
सोशलिज्म। और नेक्स्ट वर्क है इनका क्रोम्बेल एंड कम्युनिज्म 1930 में। अब हम बात कर लेते हैं निकोस पोलंतजा की। तो
निकोस पोलंतजा का जन्म 1936 में हुआ था। ग्रीक के एथेंस में हुआ था और 1979 पेरिस में जो कि फ्रांस की राजधानी है डेथ
हुई थी। और यह ग्रीक फ्रेंच मार्क्सिस्ट पॉलिटिकल सोशियोलॉजिस्ट और फिलॉसोफर रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने
एक इंपॉर्टेंट आईडिया दिया जिसको कि द रिलेटिव ऑटोनोमी ऑफ द स्टेट कहा जाता है। जिसमें इन्होंने बात की कि जो राज्य है वह
स्वायत होना चाहिए। ऑटोनॉमस होना चाहिए। रूलिंग क्लास। यानी कि अब जो रूलिंग क्लास है उसी का बोलबाला उसी का वर्चस्व राज्य
पे नहीं होना चाहिए। बल्कि वो रूलिंग क्लास से ऑटोनॉमस होता है और होना चाहिए। और यह जो नोशन है यह आधारित है स्ट्रक्चरल
पोजीशन पर। इन्होंने जो है र्फ मिलवैंड का जो आईडिया है या मॉडल है इंस्ट्रूमेंटलिस्ट का उसको भी इन्होंने
पूरी तरह से इसमें क्रिटिसाइज किया। अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की। तो पहला वर्क है
पॉलिटिकल पावर एंड सोशल क्लासेस 1968 में। अगला है फासिज्म एंड डिक्टेटरशिप। द थर्ड इंटरनेशनल
एंड द प्रॉब्लम ऑफ़ फासिज्म। अगला है क्लास इन कंटेंपरेरी कैपिटलिज्म। और अगला है द क्राइसिस ऑफ डिक्टेटरशिप। अगला है स्टेट
पावर एंड सोशलिज्म। कोलांतजा एक इंपॉर्टेंट आइडिया या फिर नोशन देते हैं जिसे कहा जाता है रिलेटिव
ऑटोनोमी ऑफ द स्टेट फ्रॉम द कैपिटलिस्ट क्लास। इसके अंतर्गत यह कहते हैं कि जो राज्य होता है, वह सापेक्षता स्वायत होता
है कैपिटलिस्ट क्लास से। यानी कि राज्य एक उपकरण या फिर इंस्ट्रूमेंट नहीं होता है कैपिटलिस्ट क्लास का। और इसी आधार पे
जितने भी इंस्ट्रूमेंटलिस्टिक मार्क्सिस्ट रहे हैं जैसे र्फ मिलीबैंड है उनको ये पूरी तरह से क्रिटिसाइज करते हैं। क्योंकि
र्ल्फ मिलीबैंड ने अपनी प्रसिद्ध कृति द स्टेट इन कैपिटलिस्ट डेमोक्रेसी में यह कहा था कि जो राज्य होता है वह कैपिटलिस्ट
एंटिटी होती है। यानी कि जो कैपिटलिस्ट क्लास है उनके हाथों में एक इकाई या फिर उपकरण के रूप में होती है जो कि
कैपिटलिस्ट मोड ऑफ प्रोडक्शन को बढ़ावा देता है और जो वर्कर्स होते हैं उनका शोषण करता है। लेकिन इस मान्यता को पूरी तरह से
निकोस पोंदजा ने खंडित किया जिसे कि द रिलेटिव ऑटोनोमी ऑफ द स्टेट फ्रॉम द कैपिटलिस्ट क्लास कहा जाता है। यह
कांसेप्ट एग्जाम की दृष्टि से बहुत इंपॉर्टेंट है। इसीलिए इसको अच्छे से याद रखना। स्टालिन का जन्म होता है 1878 को
जॉर्जिया गोरी में। वहीं इनकी डेथ होती है 1953 को कुंचतेवा ढक्का में और यह जॉर्जियन रेवोल्यूशनरी रहे हैं। सोवियत
पॉलिटिशियन रहे हैं। जिन्होंने सोवियत यूनियन को 1925 से लेकर 1953 तक रूल किया। वहीं यह कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल
सेक्रेटरी के रूप में भी रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि यह सोवियत यूनियन के प्रीमायर भी रहे हैं। अब बात कर लेते हैं
इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की। तो इनका पहला वर्क है मार्क्सिज्म एंड द नेशनल क्वेश्चन। दूसरा है फाउंडेशंस ऑफ
लेनिनिज्म। अगला है द रोड टू पावर। अगला है डलेक्टिकल एंड हिस्टोरिकल मटेरियलिज्म। नेक्स्ट इज इकोनॉमिक प्रॉब्लम्स ऑफ
सोशलिज्म इन द यूएसएसआर। अब हम बात कर लेते हैं जॉर्ज प्लेनोब की। जॉर्ज प्लेनोब का जन्म रशिया में होता है 1856 में। इनकी
डेथ भी 1918 को रशिया में ही होती है और यह रशियन रेवोल्यूशनरी रहे हैं और यह फिलॉसोफर मार्क्सिस्ट एंड थ्यरिटिशियन रहे
हैं। अगर हम बात करें तो यह फाउंडर रहे हैं सोशियो डेमोक्रेटिक मूवमेंट जो कि रशिया में हुआ था और सबसे इंपॉर्टेंट बात
यह है कि यह ऐसे पहले व्यक्ति रहे हैं जिन्होंने रशिया के पहले मार्क्सिस्ट के रूप में खुद को आइडेंटिफाइड किया था। अब
हम बात कर लेते हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की। तो पहला वर्क है एनार्किज्म एंड सोशलिज्म। दूसरा है द वर्चुअल
रेवोल्यूशन। अगला है द डेवलपमेंट ऑफ द मोनिस्ट व्यू ऑफ हिस्ट्री। अगला है द रोल ऑफ इंडिविजुअल इन हिस्ट्री। नेक्स्ट इज़
यूथोपियन सोशलिज्म ऑफ द 19 सेंचुरी। और नेक्स्ट इज़ द मटेरियलिस्ट कांसेप्ट ऑफ हिस्ट्री। क्लासिकल लिबरलिज्म के प्रमुख
थिंकर आते हैं। जिनको हम एक-एक करके डिस्कस करेंगे। इनमें पहला नाम आता है जॉन लॉक का। दूसरा आता है एडम स्मिथ का। तीसरा
आता है डेविड रिकार्डो का। चौथा नाम आता है हरबर्ट स्पेंसर का। पांचवा नाम आता है थॉमस पेन का। छठा नाम आता है थॉमस जेफरसन
का। सातवां नाम आता है जर्मी बेंथम का। आठवां नाम आता है रिचर्ड कॉबिन का। नाइंथ नेम आता है जॉन ब्राइट का और 10वां नाम
आता है इमैनुअल कांट का। क्लासिकल लिबरलिज्म में पहला नाम आता है जॉन लॉक का। तो जॉन लॉक इंग्लिश फिलॉसोफर रहे हैं।
जिनको कि एनलाइटनमेंट थिंकर के रूप में जाना जाता है। और खास बात यह है कि इनको फादर ऑफ लिबरलिज्म के रूप में जाना जाता
है। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने नेचुरल राइट्स का सिद्धांत दिया जिनमें इन्होंने लाइफ, लिबर्टी एंड प्रॉपर्टी तीन
प्रकार के नेचुरल राइट्स की बात की। और इनके कुछ वर्क रहे हैं जो आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं। आप इनको अच्छे से नोट
कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी है। जॉन लॉक के कुछ इंपॉर्टेंट नोशंस भी रहे हैं जिनमें पहला नोशन आता है
अ ग्रेट सुपर ऑफ ग्लोरियस रेवोल्यूशन। 1688 को इंग्लैंड में ग्लोरियस रेवोल्यूशन की शुरुआत होती है जो कि बहुत ही ऐतिहासिक
रूप से चर्चित रेवोल्यूशन मानी जाती है क्योंकि इसी रेवोल्यूशन की वजह से इंग्लैंड में जो एब्सोल्यूट मोनार्की है
उसको अबोलिश किया जाता है और कॉन्स्टिट्यूशनल मोनार्की की स्थापना की जाती है और ऐसा माना जाता है कि इस
रेवोल्यूशन को लाने में ना केवल जॉन लॉ का हाथ था बल्कि उन्होंने इस रेवोल्यूशन को बड़ी मात्रा में सपोर्ट किया। इनका दूसरा
जो प्रमुख नोशन है, इसका नाम है फादर ऑफ लिबरलिज्म। क्योंकि जॉन लॉक को फादर ऑफ लिबरलिज्म के रूप में जाना जाता है। जैसा
कि प्रोफेसर वॉन ने स्पष्ट भी किया था कि लॉक इज द लीडर ऑफ इंडिविजुअलिस्ट। एवरीथिंग इन लॉक सिस्टम रिवोल्व्स अराउंड
द इंडिविजुअल। एवरीथिंग इज डिस्पोज्ड सो एस टू एनश्योर द सोवनिटी ऑफ द इंडिविजुअल। इसका मतलब यह है कि जो लॉक है वो
व्यक्तिवादियों के शिरोमणि है। लीडर ऑफ द इंडिविजुअलिस्ट है। और दूसरी बड़ी बात यह है कि लॉक का जो सिस्टम है वो सब कुछ
इंडिविजुअल के इर्द-गिर्द घूमता है। चारों तरफ घूमता है और इनका जो सिस्टम ऑफ थॉट है इस तरह से इसको स्थापित किया गया है कि
जिसमें इंडिविजुअल की जो सोवनिटी है उसको सुनिश्चित किया जा सके। सीबी मैकफर्सन ने अपनी प्रमुख कृति द पॉलिटिकल थ्योरी ऑफ़
पज़ेसिव इंडिविजुअलिज्म जो कि 1962 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने लिखा कि इंडीड लॉक वाज़ द फंडामेंटल सोर्स ऑफ
इंग्लिश लिबरलिज्म यानी कि वास्तव में लॉक अंग्रेजी उदारवाद का मूल स्त्रोत था। क्योंकि उन्हीं के बाद से जो अंग्रेज यानी
कि जो ब्रिटिश लिबरलिज्म है उसका जन्म होता है। उसका बर्थ होता है। जॉन लॉक का अगला कांसेप्ट आता है प्रॉपर्टी और लेबर
का कांसेप्ट। तो जब हम बात करते हैं इनके इस कांसेप्ट की तो इन्होंने कहा है कि जो इंडिविजुअल है उसको अपनी जो प्रॉपर्टी है
उसके ऊपर अनलिमिटेड राइट है और इन्होंने यह कहा कि अगर व्यक्ति अपने लेबर से या फिर अपनी कैपेबिलिटी से संपत्ति को अर्जित
करता है तो उसके ऊपर उसका अनलिमिटेड राइट है और स्टेट उस मामले में यानी कि जो उसकी संपत्ति है उसके ऊपर इंटरवीन नहीं कर सकता
है। उसके ऊपर कोई टैक्स नहीं लगा सकता है। उसकी संपत्ति को वह किसी को भी नहीं दे सकता है। और दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि
इसी वजह से जो सीवी मैकफर्सन है इन्होंने अपनी प्रमुख कृति द पॉलिटिकल थ्योरी ऑफ़ पज़ेसिव इंडिविजुअलिज्म में लॉक के बारे
में कहा कि लॉक पज़ेसिव इंडिविजुअलिस्ट रहे हैं। स्पोक्समैन ऑफ़ बर्जुआज़ डिक्टेटरशिप रहे हैं। और खास बात यह है कि जो
कैपिटलिस्ट स्पिरिट है इसको इन्होंने रिप्रेजेंट किया है। जॉन लॉक के कुछ अदर इंपॉर्टेंट नोशंस भी रहे हैं जिनकी वजह से
इनका जो लिबरलिज्म का कंसेप्ट है उसको हम और अधिक गहराई से समझ सकते हैं तो इनका पहला कांसेप्ट आता है लिमिटेड गवर्नमेंट
जॉन लॉक ऐसे थिंक कर रहे हैं जिन्होंने लिमिटेड गवर्नमेंट की बात की क्योंकि जो शासक वर्ग है उनके ऊपर भी कुछ चेकक्स और
कुछ रेस्ट्रिकशंस थी यानी कि राजा अपना शासन तभी चला सकते थे जब वे लोगों के हित में काम करें। दूसरा कांसेप्ट था राइट टू
कंसेंट और रेवोल्यूशन। इसका मतलब यह था कि एक ऐसी सरकार हो जो लोगों की सहमति पर बनी हो और अगर शासक लोगों के लिए काम ना करें।
उनके हित में काम ना करें तो लोग ऐसी स्थिति में जो रूलर हैं उसके विरुद्ध रेवोल्यूशन भी ला सकते हैं। और तीसरा आता
है एडवोकेसी टू वुमेन राइट्स। इसका मतलब यह है कि जॉन लॉक ने कहीं ना कहीं महिलाओं के अधिकारों की भी वकालत की। अगले
क्लासिकल लिबरलिस्ट थिंकर का नाम आता है थॉमस जेफरसन जो कि यूएस पॉलिटिशियन राइटर और नेचुरल राइट्स के बहुत बड़े एडवोकेटर
रहे हैं। खास बात यह है कि इन्होंने अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति के रूप में काम किया और जो अमेरिकन डिक्लेरेशन ऑफ
इंडिपेंडेंस है उस डॉक्यूमेंट के प्रिंसिपल ऑथर रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने लिमिटेड गवर्नमेंट और लेसर
अफेयर को सपोर्ट किया और इनका प्रमुख तर्क रहा कि वह सरकार सबसे अच्छी होती है जो कम से कम शासन करती है। खास बात यह है कि
इन्होंने तीन प्रकार के नेचुरल राइट्स की बात की जिसमें पहला आता है लाइफ, दूसरा आता है लिबर्टी और तीसरा इसमें आता है
पर्स्यूट ऑफ हैप्पीनेस। खास बात यह है कि इन्होंने लॉ की तरह राइट टू प्रॉपर्टी को नेचुरल राइट्स नहीं माना। जबकि इन्होंने
कहा कि जो पर्स्यूट ऑफ़ हैप्पीनेस होता है अर्थात प्रत्येक व्यक्ति का खुश रहना या फिर खुशी की तलाश करना ही व्यक्ति का
नेचुरल राइट्स होता है। अगले थिंकर का नाम आता है थॉमस पेन जो कि अमेरिकन पॉलिटिकल फिलॉसोफर, एक्टिविस्ट और पॉलिटिकल
थ्यरिस्ट रहे हैं। खास बात यह है कि इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कोट दिया जो कि क्लासिकल लिबरलिज्म का बेस या फिर कोर
माना जा सकता है। तो इन्होंने कहा था कि स्टेट इज अ नेसेसरी इवल। इसका मतलब यह है कि राज्य आवश्यक बुराई है। आवश्यक राज्य
इसलिए है क्योंकि राज्य कम से कम नाइट वॉचमैन के रूप में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। और इवल यानी कि बुराई इसलिए है
क्योंकि यह अनावश्यक रूप से जो इंडिविजुअल है उसके कार्यों में इंटरवेंशन करता है। उसके जो फ्रीडम है, लिबर्टी है, उसको कम
करता है, चेकक्स करता है। थॉमस पेन के कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जिनमें पहला वर्क आता है कॉमन सेंस। दूसरा आता है द
अमेरिकन क्राइसिस। तीसरा आता है द राइट्स ऑफ़ मैन। चौथा आता है द एज़ ऑफ़ रीजन। और पांचवा आता है एग्रेरियन जस्टिस। नेक्स्ट
थिंकर का नाम आता है एडम स्मिथ। एडम स्मिथ स्कॉटिश इकोनॉमिस्ट फिलॉसोफर रहे हैं। खास बात यह है कि इनको जाना जाता है पाइनियर
ऑफ पॉलिटिकल इकोनमी और स्कॉटिश एनलाइटनमेंट के यह प्रमुख व्यक्तित्व रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनको जाना
जाता है फादर ऑफ इकोनॉमिक्स एंड मार्केट इकोनॉमिक्स और इन्होंने एक प्रमुख आईडिया दिया जिसका नाम है इनविज़िबल हैंड। इनके
कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं जिनमें पहला आता है द इनविज़िबल हैंड। दूसरा आता है द थ्योरी ऑफ मोरल सेंटीमेंट्स और तीसरा आता
है द वेल्थ ऑफ नेशंस और चौथा आता है लेक्चर्स ऑन जरिसूडेंस। वहीं दूसरी तरफ डेविड रिकार्डो ब्रिटिश पॉलिटिकल
इकोनॉमिस्ट रहे हैं और इनको रिकॉग्नाइज्ड किया जाता है मोस्ट इन्फ्लुएंशियल क्लासिकल इकोनॉमिस्ट और इनके साथी रहे हैं
थॉमस माल्थस, एडम स्मिथ एंड जेम्स मिल। इनकी प्रमुख कृति रही है जिसका टाइटल है ऑन द प्रिंसिपल्स ऑफ पॉलिटिकल इकोनमी एंड
टैक्सेशन जो कि 1817 को पब्लिश होती है। अगले थिंकर का नाम आता है हरबर्ट स्पेंसर जो कि इंग्लिश पॉलीमैथ फिलॉसोफर
साइकोलॉजिस्ट बायोलॉजिस्ट, सोशियोलॉजिस्ट और एंथ्रोपोलॉजिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने थ्योरी ऑफ़ सोशल
इवोल्यूशन दी और जिसमें इन्होंने बात की सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट जिसको आप हिंदी में कहते हैं योग्यतम के जीवित रहना और खास
बात यह है कि इन्होंने अपने सबसे प्रमुख वर्क जिसका टाइटल है द मैन वर्सेस द स्टेट जो कि 1884 को पब्लिश होता है। इसमें
हरबर्ट स्पेंसर ने लेस फेयर का कांसेप्ट दिया और ऑर्गेनिक थ्योरी ऑफ़ द स्टेट की बात की। इनके कुछ इंपॉर्टेंट अन्य वक्स
रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है सोशल स्टैटिक्स और दूसरा नाम आता है द प्रिंसिपल ऑफ सोशियोलॉजी। इमैनुअल कांट
जर्मन फिलॉसोफर और एनलाइटनमेंट के प्रमुख थिंकर रहे हैं। खास बात यह है कि इन्होंने नोशन दिया परपेचुअल पीस का और डेमोक्रेटिक
पीस थ्योरी का जो कि इनकी अंतरराष्ट्रीय राजनीति और पॉलिटिकल साइंस में बहुत बड़ी देन मानी जाती है। दूसरी खास बात यह है कि
इन्होंने कांसेप्ट दिया मोरल फ्रीडम का यानी कि जो मोरालिटी है, जो नैतिकता है, इसको इन्होंने लिबर्टी फ्रीडम के साथ
जोड़ा। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है जिनमें पहला नाम आता है क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन दूसरा नाम आता है व्हाट इज
एनलाइटनमेंट और तीसरा नाम आता है परपेचुअल पीस और फिलॉसोफिकल स्केच जेरेमी बेंथम ब्रिटिश फिलॉसोफर रहे हैं लीगल रिफॉर्मर
रहे हैं जिनको जाना जाता है फाउंडर ऑफ यूटिलिटेरियनिज्म अर्थात उपयोगितावाद के संस्थापक के रूप में जाने जाते हैं। दूसरी
बड़ी बात यह है कि बेंथम ने मोरल एंड फिलॉसोफिकल सिस्टम को एस्टैब्लिश किया जो कि इस मान्यता पर आधारित था कि जो ह्यूमन
बीइंग्स होते हैं वे रैशनली सेल्फ इंटरेस्टेड क्रिएचर होते हैं। अर्थात अपने बारे में सब कुछ जानते हैं कि उनका हित
क्या होता है और खास बात यह है कि जो इंडिविजुअल है ये यूटिलिटी मैक्सिमाइजर होते हैं। यानी कि अपना अधिक से अधिक भला
चाहते हैं। अपने लिए ऐसी यूटिलिटी चाहते हैं जिससे उनकी सुखों में वृद्धि हो। खास बात यह है कि इन्होंने जो जनरल यूटिलिटी
है उस प्रिंसिपल को यूज किया और इन्होंने कांसेप्ट दिया द ग्रेटेस्ट हैप्पीनेस फॉर द ग्रेटेस्ट नंबर जिसमें इन्होंने यह कहा
कि जो लेस अफेयर इकोनॉमिक्स होती है और जो कॉन्स्टिट्यूशनल रिफॉर्म्स होते हैं और जो पॉलिटिकल डेमोक्रेसी होती है उसको
एस्टैब्लिश किया जाए ताकि बड़ी संख्या में जो लोग हैं उनको बड़ी मात्रा में खुशी प्राप्त हो। हैप्पीनेस प्राप्त हो। इनके
कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स भी रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है अ फ्रेगमेंट ऑन गवर्नमेंट और दूसरा नाम आता है एन इंट्रोडक्शन टू द
प्रिंसिपल्स ऑफ मोरल्स एंड लेजिसलेशन। अगले प्रमुख थिंकर का नाम आता है रिचर्ड कॉबडन जो कि ब्रिटिश रेडिकल पॉलिटिशियन और
लिबरल पॉलिटिशियन रहे हैं। इन्होंने भी लिबरलिज्म के डेवलपमेंट में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। खास बात यह है कि यह जाने
जाते हैं इनका जो रिसर्च रहा है डिफेंस ऑफ फ्री ट्रेड और पीस के ऊपर उसके लिए इनका प्रमुख वर्क है जिसका टाइटल रहा है हाउ
वॉर्स आर गॉट अप इन इंडिया द ओरिजिन ऑफ द बर्मीज वॉर वहीं लास्ट स्कॉलर का नाम आता है जॉन ब्राइट जो कि ब्रिटिश रेडिकल और
लिबरल स्टेट्समैन रहे हैं। खास बात यह है कि इन्होंने रिचर्ड कॉप्टन के साथ रिसर्च किया और इन्होंने फाउंड किया एंटी कॉर्न
लॉ लीग को। मॉडर्न लिबरलिज्म के कुछ इंपॉर्टेंट थिंकर्स रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है जेएस मिल का। दूसरा नाम इसमें
आता है टीएस ग्रीन का। तीसरा नाम आता है हेरोल्ड लॉस्की का। और चौथा नाम आता है जे ए हॉब्सन का। पांचवा नाम आता है एलटी हॉबस
का और छठा नाम आता है जॉन रोल्स का। मॉडर्न लिबरलिज्म में पहला नाम आता है जेएस मिल का। जेएस मिल ब्रिटिश फिलॉसोफर,
इकोनॉमिस्ट और पॉलिटिशियन रहे। खास बात यह है कि इनके जो आइडियाज है इनको जाना जाता है हार्ट ऑफ लिबरलिज्म। और ऐसा इसलिए है
क्योंकि इन्होंने जो क्लासिकल लिबरलिज्म है और जो मॉडर्न लिबरलिज्म है इसके बीच एक पुल का काम किया। एक ब्रिज का काम किया।
और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि मिल भी एक यूटिलिटेरियन थिंकर रहे हैं। और इन्होंने जेरमी बेंथम का जो
यूटिलिटेरियनिज्म है इसको रिवाइज किया। और सबसे बड़ी बात यह है जो याद रखने वाली बात है कि जेएस मिल ने इंडिविजुअल की जो
लिबर्टी है उसके ऊपर एक्सट्रीम फोकस किया और इन्होंने यह कहा कि जो इंडिविजुअल है उसे पूरी तरीके से स्वतंत्रता होनी चाहिए
और इन्होंने इस प्रकार से जो लिबर्टी है इसको नेगेटिव कनोटेशन दी। अब हम जेएसमिल के लिबर्टी के ऊपर क्या विचार रहे हैं?
इसको डिस्कस कर लेते हैं। तो जेएसमिल ने अपनी प्रमुख कृति ऑन लिबर्टी जो कि 1859 को पब्लिश होती है। इस कृति में लिबर्टी
के ऊपर अपने विचारों को अभिव्यक्त किया है। खास बात यह है कि इन्होंने अपने इस प्रमुख वर्क में कहा है कि अ पर्सन इज द
मास्टर ऑफ हिज ओन माइंड एंड बॉडी। जिसका मतलब यह है कि व्यक्ति स्वयं अपने मन और शरीर का स्वामी है। इसका मतलब यह है कि जो
इंडिविजुअल होता है उसका अपने मन और शरीर पर अपना अधिकार है। कोई भी दूसरा व्यक्ति उसका मन और उसका जो शरीर है उसके ऊपर
अधिकार नहीं कर सकता है। जॉन स्टथ मिल ने अपनी प्रमुख कृति ऑन लिबर्टी जो कि 1859 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने तीन
प्रकार की लिबर्टी की बात की जिसमें पहली आती है फ्रीडम ऑफ़ वर्क। दूसरी आती है फ्रीडम ऑफ़ थॉट एंड एक्सप्रेशन और तीसरी
आती है फ्रीडम ऑफ़ एसोसिएशन। तो जो फ्रीडम ऑफ़ वर्क है इसको इन्होंने दो भागों में बांटा है। जिनमें पहला आता है सेल्फ
रिलेटेड वर्क। ऐसे काम जिनको व्यक्ति अपनी मनमानी से कर सकता है जो उससे स्वयं से जुड़े हैं। और दूसरा आता है अदर रिलेटेड
वर्क्स जो कि हार्म प्रिंसिपल मिल इसमें बताते हैं। जिसका मतलब यह है कि कोई भी व्यक्ति ऐसे काम नहीं कर सकता है जो
दूसरों से जुड़े हुए हो। क्योंकि ऐसी स्थिति में दूसरों का नुकसान हो सकता है। दूसरों की जो फ्रीडम है, लिबर्टी है, उसका
हार्म हो सकता है, नुकसान हो सकता है। जेएसमिल ने अपनी प्रसिद्ध कृति ऑन लिबर्टी में एक प्रमुख कोर्ट को दिया जिसे अक्सर
एग्जाम में पूछा जाता है। यह कोर्ट यह है कि यह कहते हैं कि पुटिंग रेस्ट्रिकशंस ऑन द फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन ऑफ ह्यूमन बीइंग्स
इज लाइक द रबिंग द प्रेजेंट एंड फ्यूचर जनरेशन। जिसका मतलब यह है कि जो जेएसमिल है जो व्यक्ति की विचार और अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता है उसको बहुत अधिक मानते हैं और यह कहते हैं कि अगर किसी भी व्यक्ति की जो विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
होती है अगर उसके ऊपर रेस्ट्रिकशंस लगाई जाए, प्रतिबंध लगाया जाए तो इसका सीधा मतलब यह होता है कि जो वर्तमान और जो
भविष्य की हमारी जनरेशंस होती है, नस्लें होती है, उसको लूटने के समान है। जेएसमिल की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां भी रही है।
जिनमें पहला नाम आता है ऑन लिबर्टी का। दूसरा नाम आता है यूटिलिटेरियनिज्म का। तीसरा आता है कंसीडरेशंस ऑन
रिप्रेजेंटेटिव गवर्नमेंट। और चौथा आता है द सब्जेक्शन ऑफ वुमेन। मॉडर्न लिबरलिज्म के अगले प्रमुख थिंकर का नाम आता है टीएच
ग्रीन जो कि ब्रिटिश फिलॉसोफर, सोशल रिफॉर्मिस्ट और आइडियलिस्टिक थिंकर रहे हैं। इनके बारे में सबसे बड़ी इंपॉर्टेंट
बात यह है कि 1885 को इनका प्रमुख वर्क पब्लिश होता है। जिसका टाइटल था लेक्चर्स ऑन द प्रिंसिपल ऑफ़ पॉलिटिकल ऑब्लिगेशन
जिसमें इन्होंने तर्क दिया कि लिबर्टी एक सकारात्मक अवधारणा है और इसका मतलब होता है ऐसे कार्यों को करने या फिर ऐसी
फैसिलिटीज को उपभोग करने की स्वतंत्रता जो करने योग्य और भोगने योग्य होते हैं। इसका मतलब यह है कि टी एस ग्रीन कह रहे हैं कि
लिबर्टी बहुत अच्छी पॉजिटिव धारणा है जो कि हमें इस बात की स्वतंत्रता देती है कि अगर कोई काम करने योग्य है या फिर भोगने
योग्य है तो उसको अवश्य ही किया जाए और भोगा जाए। दूसरी सबसे प्रमुख बात यह है कि टीएच ग्रीन ने बड़ी शिद्दत से यानी कि
बड़े जोर से यह कहा कि जो राज्य होता है उसको कल्याणकारी कार्य करने चाहिए और उन्होंने तर्क भी दिया था कि द स्टेट
रिमूव्स द ऑब्सकल्स दैट कम इन द पाथ ऑफ द इंडिविजुअल। इसका मतलब यह है कि टीएच ग्रीन कह रहे हैं कि राज्य का प्रमुख काम
व्यक्ति के मार्ग में आने वाली बाधाओं को बाधित करना होता है। टी एच ग्रीन ने अपने प्रमुख वर्क लेक्चर्स ऑन द प्रिंसिपल ऑफ
पॉलिटिकल ऑब्लिगेशन में कॉमन गुड का कांसेप्ट दिया। तो कॉमन गुड को एक्सप्लेन करते हुए इन्होंने कहा था कि राज्य एक ऐसी
संस्था है जिसका प्रमुख उद्देश्य जो कॉमन गुड है उसको बढ़ावा देना है। अतः जो राज्य है वह वहीं तक कानून बना सकता है। लॉज़ बना
सकता है जहां तक कॉमन गुड को बढ़ावा मिले। उसको प्रोत्साहन मिले। दूसरी बड़ी बात यह है कि पीएस ग्रीन ने यह भी कहा कि कानून
की पालना कोई भी व्यक्ति वहीं तक कर सकता है जहां तक किसी भी व्यक्ति का जो कॉमन गुड होता है उसके अकॉर्डिंग हो उसके
अनुरूप हो और टीएस ग्रीन यह भी कहते हैं कि जो सामान्य हित की धारणा है वह मनुष्य को कहीं ना कहीं जो उसकी ऑब्लिगेशंस है जो
कर्तव्य है उसको करने की प्रेरणा देती है। ईएस ग्रीन की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है जिनमें पहला नाम आता है प्रोलेगमना टू
एथिक्स और दूसरा नाम आता है लेक्चर्स ऑन द प्रिंसिपल्स और पॉलिटिकल ऑब्लिगेशंस। अगले थिंकर का नाम आता है लॉस्की। तो लॉस्की
इंग्लिश पॉलिटिकल थ्यरिस्ट और इकोनॉमिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो लिबरल थ्योरी है इसके डेवलपमेंट में
इन्होंने बहुत बड़ा योगदान दिया। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि लॉस्की ने क्राइसिस ऑफ कैपिटलिज्म की बात की। और खास
बात यह भी है कि लॉस्की ने वेलफेयर स्टेट की वकालत की और इन्होंने यह कहा कि जो स्टेट होता है वह कहीं ना कहीं मीन होता
है साधन होता है जिससे जो इंडिविजुअल होता है उसका डेवलपमेंट होता है। हेराल्ड लॉस्की ने अपनी प्रसिद्ध कृति अ ग्रामर ऑफ़
पॉलिटिक्स जो कि 1925 को पब्लिश होती है। इसमें स्टेट का गुणगान किया और इन्होंने यह कहा कि राज्य जो समाज रूपी मेहराब होती
है, उसकी बुनियाद होती है, उसकी फाउंडेशन होती है और ये कहते हैं कि राज्य को असंख्य लोगों की जो नियति होती है, किस्मत
होती है, उसके निर्माण का कार्य सौंपा गया है। स्टेट ही उन सभी लोगों के जीवन को आकार देता है, शेप देता है और उनमें एसेंस
भरता है। लॉस्की की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है। जिनमें पहला नाम आता है अथॉरिटी इन द मॉडर्न स्टेट। दूसरा नाम आता
है द फाउंडेशंस ऑफ सोवनिटी एंड अदर एस्स। तीसरा नाम आता है अ ग्रामर ऑफ़ पॉलिटिक्स जो कि बहुत इंपॉर्टेंट है। चौथा नाम आता
है लिबर्टी इन द मॉडर्न स्टेट। और पांचवा नाम आता है एन इंट्रोडक्शन टू पॉलिटिक्स। छठा नाम आता है द स्टेट इन थ्योरी एंड
प्रैक्टिस। और लास्ट नाम आता है द राइज़ ऑफ यूरोपियन लिबरलिज्म। अगले थिंकर का नाम आता है जे ए हॉबसन जो कि इंग्लिश
इकोनॉमिस्ट और सोशल साइंटिस्ट रहे हैं। खास बात यह है कि यह जुड़े हुए हैं लिबरल सोशलिज्म स्कूल के साथ और इससे भी
इंपॉर्टेंट बात यह है कि यह जाने जाते हैं अपनी इंपीरियलिज्म के ऊपर राइटिंग के लिए। जिसकी वजह से जो ब्लादमीर लेनिन है वह
काफी इन्फ्लुएंस्ड हुए थे। और खास बात यह भी है कि यह जाने जाते हैं अपनी थ्योरी ऑफ अंडर कंजमशन के लिए। और सबसे बड़ी बात यह
है कि जो इंपीरलिज्म की इनकी स्टडी है उसने कहीं ना कहीं हॉबसन को अंतरराष्ट्रीय ख्याति रेपुटेशन दिलाई और जिसकी वजह से
बहुत सारे नोटेबल थिंकर्स है वह इनसे इंस्पायर हुई। जिनके नाम है लेनिन लन ट्रोट्सकी और ह्ना आरंट। हन्ना आरंट ने द
ओरिजंस ऑफ टोटल टेररिनिज्म जो कि 1951 को पब्लिश होती है। इनसे इंस्पायर होकर ही लिखी थी। हॉबसन की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां
रही है। जिनमें पहला नाम आता है द इवोल्यूशन ऑफ मॉडर्न कैपिटलिज्म। दूसरा नाम आता है प्रॉब्लम्स ऑफ पॉवर्टी। तीसरा
नाम आता है द साइकोलॉजी ऑफ जिंगज़्म। चौथा नाम आता है इंपीरियलिज्म ऑफ स्टडी। और पांचवा नाम आता है द क्राइसिस ऑफ
लिबरलिज्म जो कि बहुत ही इंपॉर्टेंट कृति है इनकी। अगले इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम आता है एलटी हॉबस का जो कि इंग्लिश लिबरल
पॉलिटिकल थ्योरिस्ट और सोशियोलॉजिस्ट रहे हैं। खास बात यह है कि इन्होंने सोशल प्रोग्रेस को बढ़ावा देने के लिए
लिबरलिज्म और जो कलेक्टिविज्म है उसको रिकंसाइल करने की कोशिश की। अर्थात सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश की। और
सबसे प्रमुख बात यह है कि इन्होंने जो आईडिया है लेसफेयर का उसको रिजेक्ट किया क्योंकि इन्होंने कहा कि जो सर्टेन डिग्री
ऑफ़ यूनिवर्सल कोपरेशन है उसकी बहुत आवश्यकता है नेसेसरी है क्योंकि इसी से जो इंडिविजुअल होते हैं व्यक्ति होते हैं
उनकी जो पोटेंशियलिटीज है उसको फुलफिल किया जा सकता है। एलटी हॉबस की प्रमुख कृतियां रही है। जिनमें पहला नाम आता है द
थ्योरी ऑफ़ नॉलेज। दूसरा नाम आता है डेवलपमेंट एंड पर्पज। तीसरा नाम आता है द मेटाफिजिकल थ्योरी ऑफ द स्टेट। चौथा नाम
आता है द रैशन गुड। पांचवा नाम आता है द एलिमेंट्स ऑफ सोशल जस्टिस। छठा नाम आता है सोशल डेवलपमेंट। अगले मोस्ट इंपॉर्टेंट
स्कॉलर का नाम आता है जॉन र्स जो कि अमेरिकन पॉलिटिकल एथिकल फिलॉसोफर रहे हैं। और खास बात यह है कि यह जाने जाते हैं
इगैलिटेरियन जो लिबरलिज्म है उसके लिए जिसकी व्याख्या इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति और थ्योरी ऑफ़ जस्टिस में की जो कि
1971 को पब्लिश होती है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने फ़ेमसली कहा भी था कि ननंद द वॉर इज़ नॉट जस्ट वॉर। अर्थात कोई
भी युद्ध न्यायोचित नहीं होता है। क्योंकि किसी भी युद्ध से मानवता का नाश होता है। 1971 को जॉन र्स की एक प्रमुख कृति पब्लिश
होती है। जिसका टाइटल था अ थ्योरी ऑफ़ जस्टिस। इस कृति में इन्होंने जस्टिस एज फेयरनेस की बात की। जिसका मतलब यह है कि
जो न्याय यानी कि जस्टिस का जो प्रोसेस है वो सही होना चाहिए, निष्पक्ष होना चाहिए। अब हम जॉन र्स के पॉलिटिकल लिबरलिज्म के
कांसेप्ट को अच्छे से समझ लेते हैं। तो 1993 को जॉन र्स की प्रमुख कृति पॉलिटिकल लिबरलिज्म पब्लिश होती है। इस कृति में
इन्होंने पॉलिटिकल कांसेप्ट और जो वेल ऑर्डर्ड सोसाइटी है उसकी अवधारणा दी। उसको प्रतिपादित किया और दूसरी बड़ी बात यह है
कि इन्होंने पॉलिटिकल कांसेप्ट ऑफ जस्टिस को इस कृति में प्रोपाउंड किया। जॉन र्स ने एक इंपॉर्टेंट कोट दी जिसके अंतर्गत
इन्होंने यह कहा था कि द राइट इज प्रायर टू द गुड और द सेल्फ इज द प्रायर टू इट्स एंड जिसका मतलब यह है कि जो अधिकार होता
है वह गुड से पहले आता है। शुभ से पहले आता है और या इसका दूसरा मतलब यह भी है कि जो आत्मन है यानी कि जो सेल्फ है जो
व्यक्ति खुद है वह साध्य से पहले आता है। जॉन रोल्स के मेजर वक्स रहे हैं। जिनमें पहला आता है अ थ्योरी ऑफ़ जस्टिस जो कि
इनका सबसे इंपॉर्टेंट वर्क है। दूसरा आता है जस्टिस एज फेयरनेस। तीसरा आता है पॉलिटिकल लिबरलिज्म जो कि बहुत ही
इंपॉर्टेंट है। चौथा आता है द लॉ ऑफ पीपल जो कि बहुत ही इंपॉर्टेंट है। पांचवा आता है लेक्चर्स ऑन द हिस्ट्री ऑफ़ मोरल
फिलॉसोफी। और छठा आता है जस्टिस एज फेयरनेस और ईस्टमेंट। थर्ड प्रकार का लिबरलिज्म आता है नियोलिबर जो कि मिड 20थ
सेंचुरी में शुरू हुआ। खास बात यह है कि इसे जाना जाता है लिबर्टेरियनिज्म अर्थात इसे स्वेच्छा तंत्रवाद के रूप में जाना
जाता है और यह जो टर्म है नियोलिबर इसको ओरिजिनली कॉइ किया गया था 1938 को जर्मन स्कॉलर एलेग्जेंडर रुस्तोब के द्वारा। और
सबसे बड़ी बात यह है कि हायक को जाना जाता है फादर ऑफ न्यूलिबरलिज्म जिन्होंने 1944 को एक इंपॉर्टेंट बुक लिखी थी जिसका टाइटल
था रोड टू सर्फडम और खास बात यह भी है कि जो नियोलिबरलिज्म है यह एक्चुअली 1970 में डेवलप हुई थी और सबसे बड़ी बात यह है कि अ
ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ नियोलिबरलिज्म कृति 2005 में डेविड हार्वे के द्वारा लिखी गई और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि जो न्यू
लिबरल है इसका प्रमुख गोल है रोल बैक द फ्रंटियर ऑफ द स्टेट जिसका मतलब यह है कि जो राज्य हैं उसकी सीमाओं को पीछे ले जाना
है। यानी कि राज्य की कोई अब ज्यादा इतनीेंस नहीं है। उसके इतने ज्यादा काम नहीं है। क्योंकि इसकी यह मान्यता रही है
कि अगर स्टेट जो कैपिटलिज्म है और जो मार्केट कैपिटलिज्म है उसमें इंटरवेंशन नहीं करेगा तो ऐसी स्थिति में एफिशिएंसी
आएगी, डेवलपमेंट होगा और ग्रोथ होगी। इससे पहले कि हम नियोलिबर को डिटेल में समझे, सबसे पहले हम यह डिस्कस कर लेते हैं कि
किनेजियनिज्म क्या है? तो जब हम बात करते हैं किनेजनिज्म तो इस अवधारणा को दिया था जॉन मिनार्ड कंस ने अपनी प्रमुख कृति द
जनरल थ्योरी ऑफ़ एंप्लॉयमेंट इंटरेस्ट एंड मनी और इसमें इन्होंने कहा था कि जो क्लासिकल इकोनॉमिक थिंकिंग है उसका कोई
महत्व नहीं है और इन्होंने रिजेक्ट किया था सेल्फ रेगुलेटिंग मार्केट को। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि जो किजिनिज्म है
यह जॉन जो किस है उनकी आर्थिक नीतियों को बताता है दिखाता है और अगर हम व्यापक रूप में कहें तो हम कह सकते हैं कि कीस के
द्वारा दी गई कुछ इकोनॉमिक पॉलिसीज की श्रंखला है जो कि इन सिद्धांतों से प्रभावित है जिसमें इन्होंने कहीं ना कहीं
जो क्लासिकल इकोनॉमिक थिंकिंग है और जो सेल्फ रेगुलेटिंग मार्केट है उसको रिजेक्ट किया। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो
किजियनिज्म है यह जो नियो क्लासिकल इकोनॉमिक्स है उसका विकल्प प्रदान करता है। उसका अल्टरनेट ढूंढता है। और सबसे
बड़ी बात यह है कि जो लेसफेयर कैपिटलिज्म है उसकी जो एनार्की है यानी कि जो इकोनॉमिक एनार्की है लेसफेयर कैपिटलिज्म
की उसकी कहीं ना कहीं यह आलोचना करता है। किनेजनिज्म की कुछ इंपॉर्टेंट एजमशन रही है। जिनमें पहला पॉइंट यह है कि इन्होंने
वेलफेयर स्टेट की बात की। इन्होंने एक ऐसे राज्य की बात की जिसमें जो मॉनिटरी सिस्टम है उसके द्वारा स्टेट के द्वारा कहीं ना
कहीं जो एंप्लॉयमेंट है उसको सुनिश्चित किया जाएगा। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने इसमें कुछ बातें बताई। जैसे पहला
पॉइंट यह है कि यह कहते हैं कि गवर्नमेंट सिर्फ एक नाइट बॉशमैन नहीं है बल्कि एक वेलफेयर स्टेट है जो कि लोगों के विकास के
लिए एंप्लॉयमेंट के लिए काम करता है। दूसरा पॉइंट यह है कि जो मार्केट है वह सेल्फ रेगुलेटरी नहीं है। यानी कि स्टेट
का इंटरवेंशन मार्केट में जरूरी है। और तीसरी बड़ी बात यह है कि जो मॉडर्न कैपिटलिज्म है उसको जरूरत है कंट्रोल की
और राज्य के द्वारा कंट्रोल किया जाएगा। सबसे इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि ग्रेट डिप्रेशन के बाद 1930 के दशक में रुजवेल्ट
के द्वारा कहीं ना कहीं यूएसए में जो उदार कल्याणवाद है यानी कि लिबरल वेलफेयरिज्म है उसको अपनाया गया और 1960 के दशक में
जॉन एफ कनेडी के द्वारा न्यू फ्रंटियर नीतियों और जो लिंडन जॉनसन है उन्होंने कहीं ना कहीं जो ग्रेट सोसाइटी कार्यक्रम
है उसके द्वारा यूएसए में लिबरल पॉलिसी को अपनाने की कोशिश की। 1942 को बेबेज रिपोर्ट पब्लिश होती है। जिसने दुनिया में
जो पांच इंपॉर्टेंट परेशानियां हैं, समस्याएं हैं, उसको उजागर किया था। तो जो बेबेज रिपोर्ट है, यह 1942 में विलियम
बेबिज के द्वारा पेश की जाती है। जिसने पांच इंपॉर्टेंट जो परेशानियां हैं, समस्याएं हैं, उसको उजागर किया था। जिससे
पूरा जो दुनिया है, पूरा वर्ल्ड है, वह परेशान है या फिर पीड़ित है। तो इसमें पहली थी आइडलनेस, आलस्य, दूसरी इसमें थी
इग्नोरेंस यानी कि अज्ञानता, तीसरी इसमें थी डिजीज यानी कि बीमारी और चौथी इसमें थी स्क्वेलर यानी कि गंदगी और पांचवी इसमें
थी वांट अभाव यानी कि स्क्सिटी। अब हम यह भी समझ लेते हैं कि मॉनट पेरिन सोसाइटी क्या थी? क्योंकि जो माउंट पैलेरिन
सोसाइटी है यह सीधी की सीधी नियोलिबर के साथ जुड़ी थी और इसको स्थापित किया गया था 1947 में और इसके फाउंडिंग मेंबर्स थे
फ्रेडिक हायग मिल्टन फ्रेडमैन कार्ल पॉपर जॉर्ज स्टिगलर और लुडविक वॉन मिसेस। दूसरी बड़ी बात यह है कि इसको जाना जाता है न्यू
लिबरल इसकी जो आइडियोलॉजिकल ओरिएंटेशन है उसमें और इसका जो हेड क्वार्टर स्थापित था यह था टेक्सस टेक यूनिवर्सिटी जो कि लुबॉक
यूएस में स्थापित है और सबसे बड़ी बात यह है कि जो सोसाइटी है यह बात करती है फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन की फ्री मार्केट
इकोनॉमिक पॉलिसीज की और जो ओपन सोसाइटी है उसमें पॉलिटिकल वैल्यूस की भी यह बात करती है। अब हम यह समझ लेते हैं कि न्यू
लिबरलिज्म क्या है? तो जब हम बात करते हैं नियोलिबर की तो हम कह सकते हैं कि नियो लिबरलिज्म क्लासिकल लिबरलिज्म की एक
रीस्टेटमेंट है और जो क्लासिकल लिबरलिज्म है उसका एक अपडेटेड वर्जन है। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि जो
नियोलिबर है यह बताता है कि जो स्टेट है उसकी कोईेंस नहीं रही है। अर्थात रोल बैक ऑफ द स्टेट स्टेट को वापस लो। और दूसरी
सबसे बड़ी बात यह है कि यह फोकस करता है फ्री मार्केट एंड फ्री ट्रेड में जिसको कि जोड़ के हम देख सकते हैं फ्री मार्केट
कैपिटलिज्म के साथ और सबसे प्रमुख बात यह है कि यह कहता है कि जो मार्केट है वह अच्छा है स्टेट बुरा है और यह कहता है कि
प्राइवेट अच्छा है लेकिन पब्लिक बैड है। अब हम यह समझ लेते हैं कि नियो लिबरलिज्म में आखिर नया क्या है? तो एक तरफ है
लिबरलिज्म और दूसरी तरफ है न्यू लिबरलिज्म। लिबरलिज्म जहां प्रमोट करता है इक्वलिटी को वहीं दूसरी तरफ न्यू
लिबरलिज्म डिफेंड करता है इनकलिटी को। पहली तरफ जो लिबरलिज्म है, यह बोलता है कि जो वेलफेयर स्टेट है, वह होना जरूरी है।
क्योंकि लिबरलिज्म के अंतर्गत हम मॉडर्न लिबरलिज्म को भी पढ़ते हैं जो कि वेलफेयर स्टेट की बात करता है। वहीं न्यू
लिबरलिज्म पूरी तरीके से जो वेलफेयर स्टेट है उसको रिजेक्ट करता है। वहीं लिबरलिज्म जो है यह बात करता है फ्रीडम ऑफ स्पीच की,
सिविल राइट्स की, फ्रीडम ऑफ रिलीजन की इन सभी की। वहीं दूसरी तरफ जो न्यू लिबरलिज्म है यह केवल जो मार्केट इकोनॉमी है उसके
ऊपर ही ध्यान केंद्रित करता है। यानी कि जो फ्री इकोनमी है उसके ऊपर ही ध्यान केंद्रित करता है। अब हम न्यू लिबरलिज्म
के कोर थीम को समझ लेते हैं तो जब हम बात करते हैं न्यू लिबरलिज्म की तो इसका पहला थीम आता है रोल बैक ऑफ द स्टेट जिसका मतलब
यह है कि स्टेट की कोई बहुत बड़ी भूमिका नहीं है। इसके बहुत ज्यादा फंक्शनंस नहीं है। इसका हद से ज़्यादा जो फंक्शन है, वह
सिर्फ नाइट वॉचमैन के रूप में है। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह बात करता है फ्री मार्केट एंड फ्री ट्रेड की और सबसे
इंपॉर्टेंट बात यह है कि यह बोलता है कि प्राइवेट अच्छा है और जो पब्लिक है वह बुरा है। इसीलिए यह बोलता है कि जो रोल है
प्राइवेट सेक्टर का वह बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट यह है कि जो एलपीजी है अर्थात लिबरलाइजेशन,
प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइज़ेशन है उसका राइज़ हो जाता है। उसका इमरजेंस हो जाता है 1990 के दशक में। इंडिया में भी हमने देखा
कि एनईपी को अपनाया। एलपीजी का इमरजेंस इंडिया में भी 1990 के दशक में हुआ। अगला पॉइंट आता है सेमी एनाकिज़्म। क्योंकि
नोजिक जैसे विचारकों ने यह कहा कि राज्य ना के बराबर भूमिका रखता है। राज्य की कोईेंस नहीं है। इसीलिए इनको सेमी
एनार्किस्ट भी कहा जाता है। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट आता है कि यह कहता है कि प्राइवेट अच्छा है और जो पब्लिक है वह
बुरा है। और अगला पॉइंट यह आता है कि जो इकोनॉमिक ऑटोनोमी है वह होनी चाहिए। क्योंकि जितनी भी निजी कंपनियां हैं,
व्यक्ति हैं, उनको आर्थिक क्षेत्र में पूरी तरीके से स्वतंत्रता होनी चाहिए, स्वायत्तता होनी चाहिए। और लास्ट पॉइंट
आता है कि यह बात करता है लेस फेयर इकोनॉमी की यानी कि जो देन कहीं ना कहीं क्लासिकल लिबरलिज्म की है जिन्होंने यह
कहा था कि अहस्तक्षेप होना चाहिए राज्य का। तो इसमें जो न्यू लिबरलिज्म है यह भी बोलता है कि ऐसी अर्थव्यवस्था की स्थापना
होनी चाहिए जहां पे स्टेट लेस अफेयर करता हो और हस्तक्षेप करता हो। अब हम यह भी समझ लेते हैं कि वाशिंगटन कंसेंसस क्या था?
क्योंकि यह सीधा का सीधा न्यू लिबरलिज्म के साथ जुड़ा हुआ है। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो वाशिंगटन कंसेंसस है यह जाना
जाता है नव उदारवाद के रूप में और इसको 1989 में जॉन विलियमसन के द्वारा प्रमोट किया गया था। जिसका प्रमुख उद्देश्य यह था
कि जो वर्ल्ड बैंक है, आईएमएफ है और जो यूएस गवर्नमेंट है उसके द्वारा जो भी नीति सलाह दी जाती थी उसको रिप्रेजेंट करना है।
और खास बात यह भी है कि जो वाशिंगटन कंसेंसस है इसमें 10 इंपॉर्टेंट पॉइंट्स बताए गए थे जिसमें नियो जो लिबरल
गाइडलाइंस है वो दी गई थी पूरी दुनिया के देशों के लिए ताकि वहां पर लिबरल इकोनॉमिक रिफॉर्म्स को किया जा सके। तो इसके कुछ
इंपॉर्टेंट पॉइंट्स थे जिनमें आते हैं प्राइवेट प्रॉपर्टी राइट्स। दूसरा आता है मार्केट प्राइसेस। तीसरा आता है इकोनॉमिक
ओपननेस यानी कि फ्री ट्रेड एंड एफडीआई और चौथा आता है पॉलिटिकल रिफॉर्म्स। और पांचवा आता है पॉवर्टी रिडक्शन। ऐसे भी
बहुत सारे लीडर्स रहे हैं जिन्होंने नियोलिबर की जो वैल्यूज़ है उसको अपनी कंट्री में अडॉप करने की कोशिश की। तो
इनमें पहला नाम आता है रोनाल्ड रिगन का। रिगन ने यूएस में 1980 के दशक में कुछ लिबरल वैल्यूज़ को एस्टैब्लिश करने की
कोशिश की। जिसको कि सामूहिक रूप में रिगनिज्म कहा जाता है। दूसरा नाम आता है मार्गेट थेचर का। तो इन्होंने भी यूके में
1975 से 1990 के बीच कुछ न्यू लिबरल पॉलिसीज को अपनाने की कोशिश की। जिसको कि सामूहिक रूप में थेचरिज्म के नाम से जाना
जाता है। और तीसरा नाम आता है डेंगशिया ओपिंग का जिन्होंने 1978 में चाइना में ओपन डोर पॉलिसी की स्थापना की। इस तरह से
चीन में भी जो नियोलिबर की पॉलिसीज है उसको एस्टैब्लिश किया गया था। नियोलिबरलिज्म के कुछ इंपॉर्टेंट थिंकर्स
रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है ईसा या बर्लिन का। दूसरा नाम इसमें आता है रॉबर्ट नोजिक का। तीसरा नाम आता है फ्रेडरिक हायक
का और चौथा नाम आता है मिल्टन फ्रेडमैन का। अब हम एक-एक करके न्यू लिबरलिज्म के की थिंकर्स को डिस्कस कर लेते हैं। जिनमें
पहला नाम आता है फ्रेडरिक हयाक का। तो फ्रेडरिक हयाक ऑस्ट्रियन ब्रिटिश एकेडमिशियन रहे हैं। जिन्होंने इकोनॉमिक्स
पॉलिटिकल फिलॉसोफी साइकोलॉजी और इंटेलेक्चुअल हिस्ट्री में अपना रोल प्ले किया। दूसरी बड़ी बात यह है कि 1974 में
इन्हें गुनार मृदेल के साथ नोबेल मेमोरियल प्राइज दिया गया था। इन्होंने इकोनॉमिक्स साइंस के क्षेत्र में जो योगदान दिया था
उसके लिए इन्हें नोबेल प्राइज मिला था। और दूसरी बड़ी बात यह है कि जो हायक है इनको जाना जाता है फादर ऑफ न्यू लिबरलिज्म के
रूप में। और खास बात यह है कि इन्होंने तीन इंपॉर्टेंट आर्गुमेंट दी जिसमें इन्होंने पहला यह कहा कि एब्सेंस ऑफ
रेस्ट्रेंट्स जिसका मतलब यह है कि जो प्रतिबंध होते हैं उसका अभाव। दूसरा इन्होंने कहा कि नो रेस्टोरेंट्स ऑन रियल
फ्रीडम। यानी कि जो वास्तविक स्वतंत्रता है उसके ऊपर कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। और तीसरा इन्होंने कहा कि सामाजिक
जो न्याय होता है यानी कि जो सोशल जस्टिस होता है उसके नाम की कोई चीज नहीं होती है। इसी वजह से इन्होंने जो सामाजिक न्याय
है उसको मृग मरीचिका कहा था यानी कि भ्रम कहा था। फ्रेडरिक हाया की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है। जिनमें पहला नाम आता है द
प्योर थ्योरी ऑफ़ कैपिटल। दूसरा नाम आता है द रो टू सरफडम। तीसरा नाम आता है द कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ लिबर्टी। चौथा नाम आता
है द इंटेलेक्चुअल्स एंड सोशलिज्म। पांचवा नाम आता है लॉ लेजिसलेशन एंड लिबर्टी। छठा नाम आता है द मेरेज ऑफ सोशल जस्टिस। और
सातवां नाम आता है व्हाई आई एम नॉट अ कंजर्वेटिव। अगले प्रमुख थिंकर का नाम आता है इसाया बर्लिन जो कि रशियन ब्रिटिश
फिलॉसोफर रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति टू कांसेप्ट्स ऑफ लिबर्टी जो कि 1958 को
पब्लिश होती है। इसमें तर्क दिया था कि राज्य केवल व्यक्ति की जो नकारात्मक स्वतंत्रता होती है उसकी रक्षा करेगा। और
जो नेगेटिव लिबर्टी है या फिर जो नेगेटिव फ्रीडम है उसका मतलब यह होता है कि व्यक्ति को अपने विवेक के अनुसार कार्य
करना चाहिए और उसे ऐसा करने से नहीं रोका जाना चाहिए और खास बात यह है कि इन्होंने यह कहा कि राज्य को व्यक्ति की जो
स्वनिर्धारित गतिविधियां होती है एक्टिविटीज होती है उसके ऊपर कोई रेस्ट्रिकशंस या फिर प्रतिबंध नहीं लगाना
चाहिए। ईसाया बर्लिन ने अपनी प्रमुख कृति जिसका टाइटल था टू कांसेप्ट्स ऑफ लिबर्टी। इसमें इन्होंने दो प्रकार की लिबर्टीज की
बात की है। तो पहली लिबर्टी का नाम आता है पॉजिटिव लिबर्टी। दूसरी लिबर्टी का नाम आता है नेगेटिव लिबर्टी। तो जब हम बात
करते हैं पॉजिटिव लिबर्टी की तो इसमें इन्होंने कहा कि एबिलिटी टू सेल्फ मास्टर यानी कि जो आत्म नियंत्रण है उसकी क्षमता
का विकास होता है पॉजिटिव लिबर्टी में और नेगेटिव लिबर्टी में इन्होंने कहा कि एब्सेंस ऑफ ऑल रेस्ट्रिकशंस यानी कि स्टेट
के द्वारा जितने भी प्रतिबंध लगाए जाते हैं उसका अभाव पाया जाता है। यानी कि किसी भी प्रकार के रेस्ट्रिकशंस नहीं होने
चाहिए। बर्लिन की प्रमुख कृतियां हैं। जिनमें पहला नाम आता है हैजहग एंड द दूसरा आता है टू कांसेप्ट्स ऑफ लिबर्टी।
तीसरा आता है द रूट्स ऑफ रोमांटिसिज्म। चौथा आता है फॉर एस ऑन लिबर्टी। और पांचवा आता है वीको एंड हर्डर। अगले थिंकर का नाम
आता है मिल्टन फ्रायडमैन का जो कि अमेरिकन इकोनॉमिस्ट और स्टैटिस्टिशियन रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनका प्रमुख वर्क
1962 में पब्लिश होता है जिसका टाइटल था कैपिटलिज्म एंड फ्रीडम। इसमें इन्होंने इस बात का तर्क दिया कि सरकार को केवल उन
क्षेत्रों में हस्तक्षेप करना चाहिए, इंटरवेंशन करना चाहिए जहां जो मार्केट सिस्टम है वह कंट्रोल करने में विफल रह
जाती है, फेल हो जाती है। और इन्होंने यह कहा कि जो कंट्रोल प्राइस होते हैं, वेलफेयर होता है, रेवोल्यूशन होता है या
फिर जो सपोर्ट प्राइस होते हैं, वेजेस होते हैं, इंटरेस्ट एंड रेंट होते हैं, इंपोर्ट एंड एक्सपोर्ट होते हैं। इन सभी
के जो काम है वो स्टेट के दायरे में नहीं आते हैं। इसका मतलब यह है कि मिल्टन फ्रेडमैन कहते हैं कि लॉ एंड ऑर्डर
प्रोटेक्ट प्राइवेट प्रॉपर्टीज, इकोनॉमिक गेम कंपटीशन और जो मोनेरी फंक्शनंस होते हैं, रूल्स होते हैं और जो टेक्निकल
मोनोपोलीज़ होती है, यह सारे के सारे काम ही केवल राज्य के क्षेत्र में आते हैं और राज्य को केवल इन कार्यों को करना चाहिए।
फ्राइडमैन की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है। जिनमें पहला नाम आता है कैपिटलिज्म एंड फ्रीडम का। दूसरा नाम आता है प्राइस
थ्योरी का और तीसरा नाम आता है फ्री टू चूस। लास्ट बट सबसे इंपॉर्टेंट थिंकर का नाम है रॉबर्ट नोजिक जो कि अमेरिकन
फिलॉसोफर रहे हैं। इनके बारे में खास बात यह है कि यह जाने जाते हैं अपनी प्रसिद्ध कृति एनाकी स्टेट एंड यूटोपिया जो कि 1974
में पब्लिश होती है। इस कृति में इन्होंने जो जॉन र्स की कृति रही है और थ्योरी ऑफ़ जस्टिस उसको इन्होंने लिबर्टेरियन आंसर
दिया था। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि रॉबर्ट नोजिक को जाना जाता है सेमी एनाकिस्ट। रॉबर्ट नोजिक ने यह भी कहा कि
जो स्टेट है इसके पास इस तरह का कोई भी राइट नहीं है कि जो व्यक्ति है उसकी प्रॉपर्टी को ट्रांसफर करें,
रिीस्ट्रीब्यूट करें या फिर उसके ऊपर टैक्स लगाएं। और एक इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि रॉबर्ट नोजिक ने यह कहा कि स्टेट के
तीन ही प्रकार के कार्य होते हैं। और यह कार्य हैं प्रोटेक्शन, जस्टिस एंड सिक्योरिटी। नॉजिक के कुछ इंपॉर्टेंट वक्स
रहे हैं। जिनमें पहला आता है एनार्की स्टेट एंड यूटोपिया। दूसरा इसमें आता है द एकमाइन लाइफ। तीसरा आता है द नेचर ऑफ
रैशनलिटी। चौथा इसमें आता है सोक्रेटिक पज़ल्स और पांचवा आता है इनवेरियंसेस। अब हम कंजर्वेटिविज्म के की थिंकर्स को
अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। जिसमें पहला नाम आता है रिचर्ड हुकर का जो कि चर्च ऑफ इंग्लैंड के इंग्लिश प्राइस रहे हैं और
इन्फ्लुएंशियल थियोलॉजियन रहे हैं। अगली इंपॉर्टेंट बात यह आती है कि यह 16वीं शताब्दी के इंग्लिश थियोलॉजियन रहे हैं।
और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने एक किताब लिखी जिसका शीर्षक था ऑफ द लॉजेस ऑफ एक्लेक्सिस्टिकल
पॉलिटी। इस किताब की खास बात यह है कि इन्होंने जो चर्च ऑफ इंग्लैंड है इसको डिफेंड किया और जो रोमन कैथोलिसिज्म है और
जो प्यूरिटिनिज्म है उसकी इन्होंने आलोचना की और सबसे बड़ी बात यह है कि जो एंग्लिकन ट्रेडिशन है इसकी इन्होंने काफी प्रशंसा
की और इन्होंने बाइबल चर्च और जो रीजन है इसको इन्होंने इंग्लिश ट्रेडिशन की तीन इंपॉर्टेंट डोरियां बताई जो कि बहुत मजबूत
है। अगले इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम आता है एडममंड वर्क का जो कि ब्रिटिश स्टेट्समैन, पार्लियामेंट्री ऑडिटर और कंजर्वेटिव
पॉलिटिकल थिंकर रहे हैं। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने अपनी प्रमुख कृति रिफ्लेक्शंस ऑन द रेवोल्यूशन इन फ्रांस जो
कि 1790 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने जहां एक तरफ जैकोविनिज्म की आलोचना की उसको अपोज किया। वहीं दूसरी तरफ
इन्होंने कंजर्वेटिविज्म को काफी प्रज़ किया। अगली इंपॉर्टेंट बात यह आती है कि इन्होंने इसी महत्वपूर्ण कृति में यह कहा
कि रेवोल्यूशन सही नहीं होती है क्योंकि रेवोल्यूशन के द्वारा जो गुड सोसाइटी होती है स्टेट की और जो ट्रेडिशनल इंस्टीटशंस
होते हैं उसका जो फैब्रिक है उसको डिस्ट्रॉय किया जाता है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह कंजर्वेटिव जो फैक्शन है उसकी
जो विग पार्टी थी उसके यह सदस्य रहे थे। हालांकि इनके विरोध में और एक पार्टी थी जिसका नाम था प्रो फ्रेंच रेवोल्यूशन न्यू
विग्स जो कि चार्ल्स जेम्स फोक्स के द्वारा लीड की गई थी। अगले थिंकर का नाम आता है थॉमस हॉब्स जो कि इंग्लिश फिलॉसोफर
रहे हैं और यह जाने जाते हैं अपनी प्रमुख कृति लेबाइथान के लिए जो 1651 को पब्लिश होती है। दूसरी सबसे अहम बात यह है कि इसी
कृति में इन्होंने सोशल कॉन्ट्रैक्ट थ्योरी को दिया था और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इनको मॉडर्न पॉलिटिकल
फिलॉसोफी के फाउंडर के रूप में जाना जाता है। और एक खास बात यह है कि इनको ट्रेडिशनली माना जाता है एक कंजर्वेटिव
थ्यरिस्ट। तो इनके कुछ वक्स रहे हैं। तो स्क्रीन पर जितने भी वर्क आपको दिखाई दे रहे हैं आप इनको अच्छे से नोट कर लें।
अगले थिंकर का नाम आता है जॉन लॉक जो कि अगेन इंग्लिश पॉलिटिकल फिलॉसोफर रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि इनको मोस्ट
इन्फ्लुएंशियल एनलाइटनमेंट थिंकर के रूप में जाना जाता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इनको फादर ऑफ लिबरलिज्म के रूप में
जाना जाता है। नेक्स्ट पॉइंट यह आता है कि लॉक ने यह कहा कि राइट्स आर वांटेड बाय सोशल ड्यूटीज एंड ऑब्लिगेशन। और खास बात
यह भी है कि जॉन लॉक को जाना जाता है फादर ऑफ क्लासिकल लिबरलिज्म और सबसे बड़ी बात यह है कि इनको पाइनियर माना जाता है
कंजर्वेटिव थॉट का। तो इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क रहे हैं जो आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं। आप इनको अच्छे से
नोट कर लें क्योंकि आपके एग्ज़ाम के लिए बहुत ही जरूरी है। कंजर्वेटिवज्म के नेक्स्ट थिंकर का नाम आता है माइकल ऑश जो
कि अगेन ब्रिटिश फिलॉसोफर रहे हैं और कंजर्वेटिव पॉलिटिकल थिंकर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने यह कहा कि जो
ट्रेडिशन और जो एक्सपीरियंस होती है, हिस्ट्री होती है, यह अनलिमिटेड होती है और इन्होंने इन सभी चीजों के ऊपर बहुत
ज्यादा फोकस किया। अगली महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कोट दी जिसमें इन्होंने यह कहा कि इन पॉलिटिकल
एक्टिविटी मैन सेल ऑफ़ बाउंडलेस एंड बॉटमलेस सी। तो, यह कोट आपके एग्जाम के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। इसको आप अच्छे से
नोट कर लें। वहीं इन्होंने कंजर्वेटिज्म को डिफाइन करते हुए एक लंबी चौड़ी कोट दी जिसको मैं हिंदी में पढ़ रहा हूं। तो
इन्होंने यह कहा कि रूढ़िवादी होने का अर्थ है अज्ञात के स्थान पर परिचित को प्राथमिकता देना। अपर्युक्त के स्थान पर
परीक्षित को प्राथमिकता देना। रहस्य के स्थान पर तथ्य को प्राथमिकता देना। संभव के स्थान पर वास्तविक को प्राथमिकता देना।
असीम के स्थान पर सीमित को प्राथमिकता देना। दूरस्थ के स्थान पर निकट को प्राथमिकता देना। प्रचुर के स्थान पर
पर्याप्त को प्राथमिकता देना। पूर्ण के स्थान पर सुविधाजनक को प्राथमिकता देना। काल्पनिक आनंद के स्थान पर वर्तमान जो
खुशी होती है, हंसी होती है, उसको प्राथमिकता देना। इसी का मतलब कंजर्वेटिज्म है। यह माइकल ऑक्स ने कहा।
तो एग्जाम के पॉइंट ऑफ व्यू से यह कोट हालांकि लंबी चौड़ी है लेकिन बहुत इंपॉर्टेंट है। इसको आप ज़हन में यानी कि
अपने माइंड में अच्छे से बिठा लें। वहीं इनकी कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां भी रही है जो आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रही है। आप
अच्छे से इनको याद कर लें। कंजर्वेटिज्म के अगले थिंकर का नाम आता है डेविड ह्यूम जो कि स्कॉटिश फिलॉसोफर हिस्टोरियन
इकोनॉमिस्ट रहे हैं और एसेस्ट रहे हैं जिनकी खासतौर पे फिलॉसोफिकल जो इंप्रिसिज्म है और जो स्केप्टिसिज्म है
उसमें काफी रुचि रही। दूसरी बड़ी बात यह है कि ह्यूम ने एक इंपॉर्टेंट नोशन यानी कि एक आइडिया दिया जिसका नाम था
सिविलाइज्ड मोनाकी। तो इन्होंने सिविलाइज्ड मोनार्की को डिफाइन करते हुए कहा कि ऐसी मोनार्की को हम सिविलाइज्ड कह
सकते हैं जहां पर राजा रूल ऑफ लॉ के अधीन काम करता है ना कि रूल ऑफ लॉ को अपने हिसाब से चलाता है। दूसरे शब्दों में हम
यह भी कह सकते हैं कि जो मोनार्क है यानी कि किंग है जब अपने आप को लिमिट करता है ब्रेक द रूल ऑफ लॉ के लिए तो उसको आप
सिविलाइज्ड मोनाकी कहते हैं। अगली महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जो इनका कंजर्वेटिवज़्म है, यह एनलाइटनमेंट के जो
मटेरियल्स है, उससे काफ़ी ज़्यादा कंस्ट्रक्टेड था, निर्मित था। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क रहे हैं जो आपको स्क्रीन
पर दिखाई दे रहे हैं। आप इनको अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। अगले थिंकर का नाम
आता है एलेक्स डी टोकेबिले का जो कि फ्रेंच एरिस्टोक्रेट, डिप्लोमेट, सोशियोलॉजिस्ट, पॉलिटिकल
साइंटिस्ट, पॉलिटिकल फिलॉसोफर और हिस्टोरियन रहे हैं। खास बात यह है कि यह जाने जाते हैं डेमोक्रेसी इन अमेरिका की
बुक के लिए जो कि 1835 को पब्लिश होती है। इनकी एक और महत्वपूर्ण कृति रही है जिसका टाइटल था द ओल्ड रिजीम एंड द रेवोल्यूशन।
खास बात यह भी है कि यह 20थ सेंचुरी में जो अमेरिका में कंजर्वेटिव राइड था उसके बहुत बड़े फिलॉसोफर यह रहे हैं और
इन्होंने अपनी प्रमुख कृति डेमोक्रेसी इन अमेरिका में पॉलिटिकल कंजर्वेटिविज्म के जो सेंट्रल किनेट्स है यानी कि विशेषताएं
हैं पहलू है उसकी इन्होंने चर्चा की। खास बात यह भी है कि अमेरिका में जो कंजर्वेटिव राइट रहा उसके जितने भी
थिंकर्स रहे वह कहीं ना कहीं किसी ना किसी रूप में एलेक्स डिटॉकविले के पॉलिटिकल थॉट से इंस्पायर रहे। अगले इंपॉर्टेंट थिंकर
का नाम आता है रसेल क्रिक जो कि अगेन अमेरिकन पॉलिटिकल फिलॉसोफर, मोरलिस्ट, हिस्टोरियन, सोशल क्रिटिक, लिटरेरी
क्रिटिक और ऑथर रहे हैं। और खास बात यह है कि 20थ सेंचुरी में जो अमेरिकन कंजर्वेटिज्म है उसके ऊपर इनका काफी
इन्फ्लुएंस रहा। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इनकी 1953 में द कंजर्वेटिव माइंड नाम से एक बुक पब्लिश होती है। जिसमें
इन्होंने जो अमेरिका है उसमें जो कंजर्वेटिव मूवमेंट है उसको प्ले करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। और खास बात
यह है कि जो एंग्लो अमेरिकन ट्रेडिशन है उसके डेवलपमेंट में जो कंजर्वेटिव थॉट है उसको इन्होंने काफी विकसित किया था। काफी
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अगले थिंकर का नाम आता है टैड हन्रेक का जो कि कनेडियन बोर्न ब्रिटिश फिलॉसोफर रहे हैं।
इनकी खास बात यह है कि 1990 में यह एक कंजर्वेटिविज्म के नाम से बुक लिखते हैं। जिसमें इन्होंने जो ब्रिटिश कंजर्वेटिज़्म
है और जो अमेरिकन कंजर्वेटिविज़्म है उसके बीच अंतर को इन्होंने इस बुक में दिखाया और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने यह
कहा इस बुक में कि किस तरह से जो अमेरिकन पॉलिटिक्स और ब्रिटिश पॉलिटिक्स है उसमें जो कंजर्वेटिविज्म के बीच एक आइडियोलॉजिकल
जो अंतर है उसको इन्होंने इस कृति में दिखाया। अगले थिंकर का नाम आता है जोसेफ डी मेस्त्रे जो कि फ्रेंच पॉलीमिकल ऑथर,
मोरलिस्ट और डिप्लोमेट रहे हैं। इनकी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 1789 की जो फ्रेंच रेवोल्यूशन है उसके बाद इन्होंने
कंजर्वेटिव ट्रेडिशन में काफी योगदान दिया। इसके बहुत बड़े एक्सप्पोनेंट बन जाते हैं। इनको फोरफादर ऑफ कंजर्वेटिविज्म
के रूप में जाना जाता है। और इन्होंने फ्रेंच रेवोल्यूशन के बाद सोशल हायरार्की और मोनार्की की वकालत की। इनके कुछ
इंपॉर्टेंट वर्क भी रहे हैं। जिनमें पहला आता है कंसीडरेशन ऑन फ्रांस और दूसरा इसमें आता है द जनरेटिव प्रिंसिपल ऑफ
पॉलिटिकल कॉन्स्टिट्यूशन। अगले थिंकर का नाम आता है फ्रेडरिक हयाक जो कि ऑस्ट्रियन बोर्न ब्रिटिश एकेडमिक रहे हैं। इन्होंने
पॉलिटिकल इकोनमी पॉलिटिकल फिलॉसोफी और इंटेलेक्चुअल हिस्ट्री में बड़ी मात्रा में कंट्रीब्यूट किया। इनकी खास बात यह भी
रही है कि यह इंडिविजुअलिज्म के ऊपर बहुत बड़ी आस्था रखते थे। यानी कि फॉर्म बिलीवर थे। इन्होंने मार्केट ऑर्डर को भी काफी
प्रज़ किया और इन्होंने सोशलिज्म को काफी मात्रा में यानी कि बड़ी मात्रा में क्रिटिसाइज किया। इनकी खास बात यह भी है
कि इन्होंने अपनी महत्वपूर्ण कृति जिसका शीर्षक था द रो टू सॉफडम जो कि 1944 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने डिफेंस
किया लेसेस फेयर जो पॉलिसी है उसका और इन्होंने इकोनॉमिक इंटरवेंशन के ऊपर भी काफी अटैक किया। इन्होंने इसको
टोटोलिटेरियन के फॉर्म के रूप में देखा। इनकी खास बात यह भी है कि यह 1960 में द कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ लिबर्टी लिखते हैं।
जबकि 1979 में इनकी बुक लॉ लेजिसलेशन एंड लिबर्टी पब्लिश होती है। और इसमें इन्होंने जो मॉडिफाइड फॉर्म है
ट्रेडिशनलिज्म का उसको इन्होंने सपोर्ट किया और इन्होंने एंग्लो अमेरिकन जो वर्जन है कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म का उसको काफी प्रज़
किया जो कि लिमिटेड गवर्नमेंट के ऊपर फोकस करता है। इन तीन वक्स के अलावा इनके कुछ अन्य वक्स भी रहे हैं। जिनमें पहला आता है
प्योर थ्योरी ऑफ कैपिटल। अगला इसमें आता है द इंटेलेक्चुअल्स एंड सोशलिज्म। अगला आता है द मिरेज ऑफ सोशल जस्टिस और अगला
आता है इसमें व्हाई आई एम नॉट अ कंजर्वेटिव। अगले थिंकर का नाम आता है रॉबर्ट नोजिक जो कि अगेन अमेरिकन पॉलिटिकल
फ़िलॉसोफर रहे हैं। इनकी खास बात यह है कि इन्होंने जॉन र्स के आइडियाज को रिस्पांस करने के लिए चैलेंज करने के लिए इन्होंने
राइट बेस्ड लिबर्टेरियनिज्म को डेवलप किया। इनकी एक इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि यह जॉन लॉक से काफी इंस्पायर रहे। इसके
अलावा अमेरिका के जो इंडिविजुअलिस्ट रहे 19th सेंचुरी के उनसे भी यह काफी ज्यादा इंप्रेस रहे। काफी ज्यादा इंस्पायर हुए और
इन्हीं के विचारों से प्रभावित होकर इन्होंने यह कहा कि प्रॉपर्टी के मामले में जो इंडिविजुअल्स हैं इनको बड़ी मात्रा
में राइट्स होने चाहिए और स्टेट को कोई भी हक नहीं होगा कि इंडिविजुअल की जो प्रॉपर्टी है उसके ऊपर इंटरवेंशन करें। बस
शर्त इतनी है कि जो इंडिविजुअल की प्रॉपर्टी है वह लीगली अर्नड हो। अगर किसी भी इंडिविजुअल की प्रॉपर्टी लीगली अर्नड
है तो इसमें स्टेट इंटरवेंशन नहीं कर सकता है। उसकी प्रॉपर्टी के ऊपर टैक्स नहीं लगा सकता है या फिर दूसरे को ट्रांसफर नहीं कर
सकता है। इनकी खास बात यह भी रही कि इनकी प्रमुख कृति एनआरकी स्टेट एंड यूटोपिया जो कि 1974 को पब्लिश होती है। इसमें
इन्होंने वेलफ़ेरिज्म और जो रिस्ट्रीब्यूशन है जिसकी वकालत जॉन रोल्स ने की थी उसको इन्होंने रिजेक्ट किया और इन्होंने मिनिमल
गवर्नमेंट और मिनिमल टैक्सेशन की बात की। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स भी रहे हैं जो आपको याद रखने हैं। तो इसमें पहला आता है
एनार्की स्टेट एंड यूटोपिया। दूसरा आता है फिलॉसोफिकल एक्सप्लेनेशंस। तीसरा इसमें आता है द नॉर्मेटिव थ्योरी ऑफ़ इंडिविजुअल
चॉइस। इसमें अगला आता है द एग्जामाइन लाइफ। इसमें नेक्स्ट आता है द नेचर ऑफ रैशनलिटी। अगला इसमें आता है सोक्रेटिक
पजल्स और लास्ट इसमें आता है इनका एक एस्स जो कि नेट के एग्जाम में भी पूछा गया था। इसका टाइटल था द जिगजैग ऑफ पॉलिटिक्स।
अगले थिंकर का नाम आता है हन्ना आरंट जो कि अगेन जर्मन अमेरिकन हिस्टोरियन और फिलॉसोफर रही हैं। इनके बारे में खास बात
यह है कि इनको 20थ सेंचुरी की मोस्ट इनफ्लुएंशियल पॉलिटिकल थ्योरिस्ट मानी जाती है। और इनकी खास बात यह भी है कि
इनका वर्क इनकी रिसर्च नेचर ऑफ वेल्थ पावर इविल पॉलिटिक्स डायरेक्ट डेमोक्रेसी अथॉरिटी ट्रेडिशन एंड टोटली टेररिनिज्म के
ऊपर रही है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इनको जाना जाता है कंट्रोवर्सी जिस कंट्रोवर्सी का नाम था ट्रायल ऑफ़ एडोल्फ
आयुष्मान। खास बात यह है कि इन्होंने इसमें यह बताने की कोशिश की कि जो टोटलिटेरियन सिस्टम है उसके अंतर्गत
साधारण से साधारण ऑर्डिनरी से ऑर्डिनरी पीपल भी कैसे एक्टर बन जाते हैं। और इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया
जिसका नाम था द बेनेलिटी ऑफ़ इविल। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जिनको आपको याद करना है। तो इसमें इनका पहला आता है द
ओरिजंस ऑफ टोटलिटेरियनिज्म। अगला इसमें आता है द ह्यूमन कंडीशन। नेक्स्ट आता है बिटवीन पास्ट एंड फ्यूचर। अगला इसमें आता
है ऑन रेवोल्यूशन। नेक्स्ट आता है आयुष्मान इन जेरूशलम और लास्ट इसमें आता है ऑन वायलेंस। अगले थिंकर का नाम आता है
इरविन क्रिस्टोल जो कि अमेरिकन जर्नलिस्ट और राइटर रहे हैं। इनकी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इनको न्यू कंजर्वेटिज्म के
गॉड फादर के रूप में जाना जाता है। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है। जिनमें पहली आती है ऑन द डेमोक्रेटिक आइडिया इन
अमेरिका और दूसरी आती है टू चेयर्स फॉर कैपिटलिज्म। अगर आप यह वीडियो पूरी देखते हो तो स्क्रीन पर जितनी भी आपको फेमिनिस्ट
थिंकर दिखाई दे रही है इनके बारे में आप डिटेल में जानेंगे। इनकी राइटिंग्स, इनकी फिलॉसोफी और इनकी बायोग्राफी के बारे में।
तो चलिए सबसे पहले हम बात कर लेते हैं मैरी वस्टन क्राफ्ट की और इनकी इंपॉर्टेंट कोटेशन के साथ। इन्होंने कहा आई डू नॉट
विश वुमेन टू हैव पावर ओवर मैन बट ओवर देमसेल्व। इसमें यह कहती है कि मैं कभी भी यह नहीं चाहती हूं कि महिलाओं को पुरुषों
के ऊपर शक्ति प्राप्त हो जाए। बस मैं तो सिर्फ इतना चाहती हूं कि महिलाओं को खुद के ऊपर शक्ति प्राप्त हो जाए क्योंकि
महिलाएं हमेशा से शोषण का शिकार रही है, दासता का शिकार रही है। इसीलिए मैं तो सिर्फ इतना चाहती हूं कि महिलाओं को खुद
के ऊपर शक्ति प्राप्त हो जाए। यह इंग्लिश राइटर रही है और फिलॉसोफर रही है और ऐसी पहली थिंकर रही है जिन्होंने वूमस के राइट
की एडवोकेसी की। इनका जन्म 27 अप्रैल 1759 को इंग्लैंड में हुआ और इनकी डेथ 10 सितंबर 1797 को इंग्लैंड में हुई थी। इनके
पति का नाम विलियम गॉडविन था जिनसे इन्होंने 1797 में शादी की थी। इनके दो बच्चे मैरीशली और नैनी इमली थे। और इनको
फर्स्ट वेव ऑफ फेमिनिज्म की फाउंडर भी माना जाता है। मैरी वालस्टोन क्राफ्ट रूसो के डेमोक्रेटिक रेडिकलिज्म का जो आईडिया
था उससे काफी प्रभावित रही और इसी वजह से इनको फर्स्ट सिस्टमैटिक फेमिनिस्ट क्रिटिक के रूप में भी देखा जाता है और साथ में
इनको रिपब्लिकन थिंकर भी माना जाता है और यह रूसो के रिपब्लिकन आइडियाज से काफी प्रभावित रही और सबसे बड़ी बात यह है कि
इनका जो जीवन है या फिर लाइफ है। बड़ी स्ट्रगल में रही। इनकी जो लाइफ है वह बड़ी अनहै रही। जिसकी वजह से इन्होंने अपने आप
को सुसाइड्स के लिए भी कमिटेड किया। और नोट करने वाली बात यह है कि यह ऐसी पहली पॉलिटिकल थिंकर रही है जिन्होंने पहली बार
वुमस के पॉलिटिकल राइट्स की एडवोकेसी की वकालत की। और यह रही है इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग्स। और जिनमें सबसे
इंपॉर्टेंट है अंडिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमेन विद स्ट्रिक्चर्स ऑन द पॉलिटिकल एंड मोरल सब्जेक्ट्स। यह बहुत ही इंपॉर्टेंट
राइटिंग है। इसी राइटिंग में इनकी पूरी फिलॉसफी पाई जाती है और एग्जाम की दृष्टि से यह राइटिंग बहुत ही इंपॉर्टेंट है
क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से लगातार इस राइटिंग्स को एग्जाम में पूछा जा रहा है। इस राइटिंग को इन्होंने 1792 में लिखा।
बाकी जो कुछ अन्य राइटिंग्स रही है इनको आप स्क्रीनशॉट लेकर या फिर वीडियो को पॉज करके नोट कर सकते हो। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट
राइटिंग्स और रही है जैसे मैरी अफिक्शन अ प्लेट मेमोरीज और मेमोरीज इनकी एक बायोग्राफी रही है जिसको कि इनके पति
विलियम गॉडविन के द्वारा इनकी डेथ के बाद 1798 ईस्वी में लिखा गया था। हालांकि इस बायोग्राफी की काफी निंदा भी की जाती है
क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस बायोग्राफी में विलियम गॉडविन ने अपनी पत्नी मैरी वस्टन क्राफ्ट के बारे में
काफी नकारात्मक टिप्पणियां की जिसकी वजह से यह काफी चर्चित रही और काफी चर्चा का विषय रही। अगली इनकी इंपॉर्टेंट राइटिंग
रही है एन हिस्टोरिकल एंड मोरल व्यू ऑफ़ द फ्रेंच रेवोल्यूशन। अगली रही है ऑन पोएट्री एंड आवर रेलिश फॉर द ब्यूटीज़ ऑफ़
नेचर। और लास्ट बट नॉट लीस्ट इज़ द केव ऑफ़ फैंसी जो कि 1787 में इन्होंने लिखी थी। हालांकि इसको पब्लिश 1798 में इनके पति
विलियम गॉडविन के द्वारा इनकी डेथ के बाद किया गया था। साइमन दी बुआ इनकी सबसे इंपॉर्टेंट कोट रही है जिसके अंतर्गत
इन्होंने कहा वुमेन आर मेड दे आर नॉट बोर्न। जी हां, इन्होंने कहा कि महिलाओं की जो आज हमारे समाज में पोजीशन है उसके
अंतर्गत महिलाओं को बनाया गया है। क्योंकि महिलाओं को हमेशा से यह सिखाया गया है कि तेरा काम सजना है, सवरना है, पुरुषों को
खुश करना है, घर के कामकाज करना है, तेरे पास कम दिमाग है। इसलिए तू पॉलिटिक्स में पार्टिसिपेट नहीं कर सकती है, बिजनेस नहीं
कर सकती है, एजुकेशन नहीं कर सकती है। तो यह कहती है कि महिलाओं को बनाया गया है। इसीलिए महिलाएं पैदा नहीं हुई है। साइमन
दी बुआ फ्रेंच राइटर रही है, इंटेलेक्चुअल रही है, फिलॉसोफर, पॉलिटिकल एक्टिविस्ट, फेमिनिस्ट एंड सोशल थ्योरिस्ट रही है।
इनका जन्म 1908 में हुआ और इनकी डेथ 1986 को हुई और ये जीन पॉल शास्त्री के साथ लंबे समय तक काम करती रही। एक साथ
इन्होंने काफी काम किया। खासतौर पे पॉलिटिकल साइंस में और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने 1949 में द सेकंड
सेक्स नामक सबसे इंपॉर्टेंट कृति लिखी जिसमें इन्होंने एक तरफ यह कहा कि लाइक मैन वुमेन इज अ ह्यूमन बीइंग। जी हां,
इन्होंने कहा कि पुरुषों की तरह महिलाएं भी ह्यूमन बीइंग है। इसीलिए उनके साथ अच्छा ट्रीट होना चाहिए। दूसरी तरफ
इन्होंने समाज में जो पेटियार्किकल सोसाइटी है या फिर जिस तरह का जो सामाजिक ढांचा बनाया गया है जहां पर महिलाओं को
भोग विलासिता की वस्तु और घर के कामकाज तक ही सीमित माना जाता है उसकी भी आलोचना की और द सेकंड सेक्स नामक कृति में इन्होंने
कहा कि महिलाओं को हमेशा सेकंड सेक्स समझा जाता है क्योंकि फर्स्ट सेक्स पुरुषों को समझा जाता है। इसीलिए महिलाओं के साथ
दुर्व्यवहार होता है या फिर महिलाओं के साथ एक्सप्लॉयटेशन किया जाता है। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग्स रही है।
जैसे द ब्लड ऑफ अदर्स, ऑल मैन आर मल, द एथिक्स ऑफ एंबग्विटी, द सेकंड सेक्स। सबसे इंपॉर्टेंट राइटिंग ये इनकी रही है जो कि
1949 में लिखी। द मंदारिंस, मेमोरीज ऑफ ब्यूटीफुल डॉटर्स, फोर्स ऑफ सरकमस्ट्ससेस, लेस बैललेस इमेजज़, द कमिंग ऑफ एज, द वुमेन
डिस्ट्रॉयड। यह भी इंपॉर्टेंट राइटिंग रही है लेटर्स टू शास्त्रे और कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जैसे व्हेन थिंग्स ऑफ द
स्पिरिट कम फर्स्ट अमेरिका डे बाय डे मस्ट बी बर्न सेड द लॉन्ग मार्च व्हाट इज एकिस्टेंशियलिज्म
द इंडिपेंडेंट वुमेन एक्सट्रैक्ट्स फ्रॉम द सेकंड सेक्स 1949 और यह इनका बेसिकली एस्स रहा है। तो यह इनकी इंपॉर्टेंट
राइटिंग थी जो कुछ बहुत ही इंपॉर्टेंट है एग्जाम की दृष्टि से। अब हम बात कर लेते हैं बै फ्राइडन की। बैफ फ्राइडन का जन्म
1921 ईवी को हुआ था। इनकी डेथ 2006 ईस्वी को हुई थी। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनको सेकंड वेव ऑफ फेमिनिज्म की फाउंडर
माना जाता है। और इससे भी इंपॉर्टेंट बात यह है कि यह यूएसए की पॉलिटिकल एक्टिविस्ट रही है और पॉलिटिशियन रही है। जिनको कि
मदर ऑफ वुमेन लिबरेशन के नाम से जाना जाता है। जी हां, इनको मदर ऑफ वुमेन लिबरेशन अर्थात नारी मुक्ति की मां के रूप में
जाना जाता है। और एक इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि 1966 में इन्होंने नेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर वुमेन को अमेरिका में
एस्टैब्लिश किया और बाद में यह इसकी प्रेसिडेंट भी चुनी गई। और एक इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि 1963 में इन्होंने द
फेमिनिन मिस्टेक नामक कृति लिखी जिसमें इन्होंने एक चर्चित स्लोगन दिया जिसका नाम है द प्रॉब्लम विद नो नेम। अब बात कर लेते
हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की। इनके इंपॉर्टेंट वर्क्स है जैसे द फेमिनाइन मिस्टिक 1963 जो इनका सबसे इंपॉर्टेंट
वर्क रहा है। प्रॉब्लम दैट हैज़ नो नेम द सेकंड स्टेज यह भी इनकी इंपॉर्टेंट कृति रही है। द फाउंटेन ऑफ एज इट चेंज्ड माय
लाइफ लाइफ सो फॉर बिय्ड जेंडर मिथोस आफ्टर। तो यह इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग्स रही है और नोट करने वाली बात यह
भी है कि 1963 में इन्होंने अपनी प्रमुख कृति द फेमिनाइन मिस्टेक में कुछ इंपॉर्टेंट आर्गुमेंट दिए। जैसे इन्होंने
कहा नो पार्टिसिपेशन ऑफ वुमेन इन पब्लिक लाइफ। इन्होंने कहा कि अभी तक पब्लिक लाइफ़ में पब्लिक लाइफ़ का मतलब होता है एजुकेशन,
बिज़नेस, पॉलिटिक्स, टीचिंग यानी कि घर के बाहर से जो काम होते हैं उसको हम पब्लिक लाइफ कहते हैं। तो इन्होंने कहा कि अभी तक
महिलाओं को पब्लिक लाइफ में किसी भी तरह के अधिकार नहीं मिले हैं। महिलाओं की किसी भी तरह की पार्टिसिपेशन पब्लिक लाइफ में
नहीं हुई है। दूसरी इंपॉर्टेंट बात इन्होंने कही कि इस प्रकार की अजंपशन या फिर मान्यताएं कि महिलाएं डोमेस्टिक वर्क
यानी कि जो फ़ैमिली के कामकाज होती है उसको एंजॉय करती है। यह मिथ है। यह झूठ है क्योंकि महिलाएं घर के कामकाज पसंद नहीं
करती है। इसीलिए इन्होंने कहा कि महिलाओं को केवल घरेलू कामकाज तक जोड़ना एक मिथ है। एक और इंपॉर्टेंट बात इन्होंने कही कि
वुमेन आर अनहैपी डिसएपॉइंटेड एंड अनफुलफिल्ड एज अ मदर एंड वाइफ। इन्होंने कहा कि हमारी समाज में जो एक औरत को मां
के रूप में या फिर पत्नी के रूप में जो रोल दिया गया है उससे महिलाएं पूरी तरह से नाख रहती है, उदास रहती है और इनका जीवन
नीरस रहता है। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट है शी आल्सो आर्ग्यूड दैट वुमेन आर अप्रेस्ड। इन्होंने कहा कि जिस तरह का हमारा
पेट्रियकिकल सोसाइटी का ढांचा है उसमें महिलाओं का हमेशा से दमन होता है। महिलाएं हमेशा अप्रेस्ड होती है। और एक इंपॉर्टेंट
बात इन्होंने कही कि इसी वजह से हमें महिलाओं के अधिकारों की वकालत करनी चाहिए। महिलाओं की इक्वलिटी, इक्वल अपॉर्चुनिटी
और महिलाओं को इक्वल एजुकेशनल राइट्स होने चाहिए। तो यह रही इनकी की आर्गुममेंट्स जो आपको अच्छे से याद रखनी है। केट मिलेट केट
मिलेट का जन्म 1934 को हुआ। इनकी डेथ 2017 को अभी हाल ही में हुई और केट मिलेट अमेरिकन फेमिनिस्ट राइटर रही है। आर्टिस्ट
और एक्टिविस्ट रही है। जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए बहुत ज्यादा संघर्ष किया। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि
1970 ईवी में इन्होंने अपनी अक्षय कृति सेक्सुअल पॉलिटिक्स लिखी जिसमें इन्होंने एक कोटेशन दी जो बहुत ही फेमस है।
इन्होंने कहा अ सेक्सुअल रेवोल्यूशन बिगिंस विद द इमसिपेशन ऑफ़ वुमेन हु आर द चीफ विक्टिम्स विक्टिम्स ऑफ़ पैथर्की एंड
आल्सो विद द एंडिंग ऑफ़ होमोसेक्सुअल ऑपरेशन। तो यह कहती है कि अगर भाई हमें लैंगिक क्रांति लानी है तो वह तभी होगी जब
हम महिलाओं को पूरी तरह से मुक्त करेंगे जो कि हमारे समाज में जो पेटियािकल सोसाइटी है उसकी सबसे ज्यादा पीड़ित रही
है और इन्होंने यह भी कहा कि इसके साथ-साथ इसके साथ जो होमोसेक्सुअल ऑपरेशन है उसका भी अंत होगा। तो अब हम बात कर लेते हैं
इनके वर्क्स की। तो सेक्सुअल पॉलिटिक्स जो कि इन्होंने 1970 ईस्वी में लिखी। इसमें इन्होंने दो इंपॉर्टेंट आर्गुमेंट दी
जिसमें इन्होंने कहा मेल शैल डोमिनेट फीमेल। तो इन्होंने कहा कि हमारी समाज में पेट्रियटिकल स्ट्रक्चर इस तरह का है
जिसमें पुरुष महिलाओं को डोमिनेट करते हैं। यानी कि एक ओर से पुरुषों की ही हैज़मानी होती है हमारे समाज में, हमारी
फैमिली में। और दूसरा पॉइंट इन्होंने दिया कि इतना ही नहीं है कि केवल पुरुष ही महिलाओं को डोमिनेट करते हैं बल्कि एल्डर
मेल शैल डोमिनेट यंगस्टर। और इन्होंने कहा कि एक हमारे समाज में या फिर हमारी फैमिली में जो बड़े-बड़े पुरुष होते हैं, जो एज
में ज्यादा होते हैं, वे अपने यंगस्टर यानी कि अपने से कम उम्र के लोगों को भी डोमिनेट करते हैं। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट
राइटिंग्स रही है। जैसे फ्लाइंग 1974, द पॉलिटिक्स ऑफ रियलिटी मदर मिलेट सीता द बेसमेंट द प्रॉस्टिट्यूशन पेपर्स। अब हम
बात कर लेते हैं जीन बेथक एलस्टेन की। इनका जन्म 1941 को हुआ। इनकी डेथ 2013 को हुई थी। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि
यह अमेरिकन फेमिनिस्ट राइटर रही है। पॉलिटिकल फिलॉसफर, एथिस्ट एंड एक्टिविस्ट रही है। और इन्होंने 1973 में वुमेन एंड
पॉलिटिक्स नामक केसिस लिखा जो कि बहुत चर्चित रहा और सबसे इंपॉर्टेंट बात जिसको आपको अच्छे से याद रखना है कि इन्होंने
जस्ट वॉर थ्योरी दी और यह इनकी सेमिनल थ्योरी रही है और नोट करने वाली बात यह है कि जस्ट वॉर थ्योरी को इन्होंने वुमेन
पर्सपेक्टिव से दी। अब हम बात कर लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट वर्क्स की। तो 1987 में इन्होंने वुमेन एंड वॉर नामक एक
महत्वपूर्ण कृति लिखी जिसमें इन्होंने कुछ इंपॉर्टेंट बातें कही। जैसे इन्होंने कहा कि हम पुरुषों को जस्ट वॉरियर के रूप में
दर्शाते हैं। अर्थात केवल पुरुष ही युद्ध लड़ सकते हैं। पुरुष ही युद्ध कर सकते हैं। और महिलाएं तो ब्यूटीफुल सोलर होती
है। यानी कि महिलाओं का काम तो सिर्फ सजना और सवरना होता है। इसके बारे में एलस्टेन कहती है कि यह सिर्फ एक मिथ है। क्योंकि
महिलाएं भी युद्ध कर सकती है। महिलाएं भी वॉरियर हो सकती है। योद्धा हो सकती है। सैनिक की तरह लड़ाई कर सकती है। महिलाएं
सिर्फ सजने सवरने वाली वस्तुएं नहीं होती है या फिर उनका काम सिर्फ सौंदर्य नहीं होता है। सजना सवरना नहीं होता है। तो
इन्होंने बेसिकली यह कहा कि कि पुरुष जस्ट वॉरियर होते हैं। यानी कि पुरुष ही युद्ध लड़ सकते हैं और महिलाएं तो सिर्फ सजने
सवरने तक या फिर घरेलू कामों तक सीमित होती है। यह एक प्रकार का मिथ है। अगली इंपॉर्टेंट राइटिंग इनकी रही है
डेमोक्रेसी ऑन ट्रेल और अगली इंपॉर्टेंट राइटिंग रही है जस्ट वॉर अगेंस्ट टेरर जो कि इन्होंने 2003 में लिखी और इस
महत्वपूर्ण कृति में इन्होंने जहां एक तरफ जस्ट वॉर थ्योरी दी वहीं दूसरी तरफ इन्होंने इस कृति में वॉर ऑन टेरर की भी
बात की। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग रही है। जैसे सोवनिटी गॉड स्टेट एंड सेल्फ अगस्टाइन एंड द लिमिट्स ऑफ पॉलिटिक्स हु
आर बी क्रिटिकल रिफ्लेक्शन एंड होपफुल पॉसिबिलिटीज। मिडिएटेशन ऑन मॉडर्न पिटिकल थॉट पावर
ट्रिप्स एंड अदर जर्नीज एस्स इन फेमिनिज्म एस सिविक डिस्कोर्स फैमिली इन पॉलिटिकल डिस्कोर्स न्यू वाइन एंड ओल्ड वाटर्स रियल
पॉलिटिक्स एट द सेंटर ऑफ एवरीडे लाइफ डेमोक्रेटिक अथॉरिटी एट सेंचुरीज एंड सीबीसी मेसी लेक्चर सीरीज डेमोक्रेसी ऑन
ट्रेल 2011 में यह राइटिंग लिखी पीस इन यूरो पीस इन द वर्ल्ड वेज़ ऑफ़ पीस ग्लोबल पॉलिटिक्स आफ्टर 91 द डेमोक्रेटिया
इंटरव्यूज। यह राइटिंग इन्होंने 2007 में लिखी। अब मैं आपको एक इंपॉर्टेंट बात बताने जा
रहा हूं। इसको थोड़ा सा ध्यान से सुनना। इन्होंने 1981 में एक इंपॉर्टेंट राइटिंग लिखी। पब्लिक मैन एंड प्राइवेट वूमेन।
पहले तो आपको इस राइटिंग को अच्छे से याद रखना है क्योंकि यह एग्जाम में बहुत बार पूछा गया है और पॉसिबिलिटी हमेशा से ही
पूछने की रहती है और दूसरा पॉइंट यह कि आपको इस कृति में जो बातें हैं वह भी अच्छे से याद रखना है। तो इसी कृति में
इन्होंने एक इंपॉर्टेंट चीज बताई जिसमें यह कहती है कि पब्लिक जो वर्ल्ड होता है यानी कि पब्लिक स्फेयर में जितने भी काम
होते हैं वह पुरुषों के द्वारा डोमिनेट किया जाता है। जबकि दूसरी तरफ जो प्राइवेट वर्ल्ड होता है यानी कि फैमिली अफेयर्स
होते हैं, फैमिली रियल होता है उसको महिलाओं के द्वारा डोमिनेट किया जाता है। आप इसको चित्र के द्वारा और डायग्राम के
द्वारा अच्छे से समझ सकते हैं। एक तरफ आप देख सकते हैं पब्लिक मैन और दूसरी तरफ आप देख सकते हैं प्राइवेट वुमेन। बेसिकली
एलस्टेन ने पुरुषों के लिए पब्लिक मैन कहा और महिलाओं के लिए प्राइवेट वुमेन कहा। ऐसा इसलिए है क्योंकि इनका मानना है कि
पब्लिक स्फीयर जो होता है। यानी कि पॉलिटिक्स, आर्ट, एजुकेशन, लिटरेचर और करियर में पुरुषों की ही हैज़ मनी होती है।
पुरुषों का ही दबदबा होता है। और दूसरी तरफ जब हम बात करते हैं प्राइवेट स्फीयर की अर्थात फैमिली की, केयरिंग की, कुकिंग
की, क्लीनिंग की, चाइल्ड रेयरिंग की। तो ये जितने भी काम हैं इनको महिलाओं के द्वारा ही किया जाता है। आप इमेज में भी
देख सकते हैं। तो इस तरह से इन्होंने पुरुषों के लिए पब्लिक मैन कहा और महिलाओं को इन्होंने प्राइवेट वुमेन की संज्ञा दी।
एंड्रिया डॉर्किन इनका जन्म 1946 को हुआ था। इनकी डेथ 2005 को हुई थी। और इनका पूरा नाम एंड्रिया रीता डॉर्किन था। और यह
अमेरिकन रेडिकल फेमिनिस्ट राइटर एंड एक्टिविस्ट रही है। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनको जाना जाता है एनालिसिस
ऑफ पोर्नोग्राफी एंड एंटी पोर्नोग्राफी मूवमेंट एंड एंटी प्रॉस्टिट्यूशन मूवमेंट के लिए भी इनको काफी मात्रा में जाना जाता
है। अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ वर्क्स की। इन्होंने कुछ इंपॉर्टेंट वर्ब्स लिखे हैं। जैसे वुमेन हेडिंग, आवर
ब्लड, द न्यू वुमस ब्रोक हार्ट, पोर्नोग्राफी, मैन पोसेसिंग वुमेन, राइट बीइंग वुमेन, आइस एंड फायर इंटरकोर्स। और
यह लिखा है इन्होंने 1987 में लेटर्स फ्रॉम अ वॉर जोन पोर्नोग्राफी एंड सिविल राइट्स और न्यू डे फॉर वुमस इक्वलिटी। कुछ
और रहे हैं जैसे मर्स 1990 लाइफ एंड डेथ हार्ट ब्रेक 2002 बेलहक्स
बेलहक्स का जन्म 1952 को हुआ अभी तक इनकी डेथ नहीं हुई है और इनका रियल नाम रहा है ग्लोरिया जीन बॉटकिंस और इनको सामान्यता
जाना जाता है इनके पेन नेम से बेलहक्स और यह अमेरिकन ऑथर फेमिनिस्ट और सोशल एक्टिविस्ट रही है
और खासतौर पे यह ब्लैक फेमिनिज्म से जुड़ी रही है जिसको हम अगली वीडियो में अच्छे से डिस्कस करेंगे।
अब हम बात कर लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट वर्क्स की। इनके बहुत सारे वक्स रहे हैं। जैसे फेमिनिस्ट थ्योरी फ्रॉम मार्जिन टू
सेंटर टॉकिंग बैक थिंकिंग फेमिनिस्ट थिंकिंग ब्लैक इयरिंग इयर्निंग बिलोंगिंग द कल्चर ऑफ प्लेस
ब्लैक लुक्स अ वुमस मोरिंग सॉन्ग आउट लॉ कल्चर टीचिंग टू ट्रांस ग्रेस किलिंग ग्रेस एंडिंग रेसिज्म बोर्न ब्लैक मेमोरीज
ऑफ गर्लहुड ऑल अबाउट लव न्यू विजन हैप्पी टू बी नेपी रिमेंबर रैप्चर वेयर वी स्टैंड क्लास
मैटर्स फेमिनिज्म इज फॉर एवरीबॉडी सेल्वेशन ब्लैक पीपल एंड लव बी बॉय बज कम्युनियन द फीमेल सर्च फॉर लव होममेड लव
बी रियल कूल ब्लैक मैन एंड मैस्कुलिनिटी कुछ और रहे हैं जैसे द विल टू चेंज स्किन अगेन सोल सिस्टर वुमेन फ्रेंडशिप एंड
फुलफिलमेंट वी लव बेबी लव 2007 तो यह थे कुछ इनके इंपॉर्टेंट वक्स जर्मेन ग्रियर जर्मेन ग्रियर का जन्म 1939 को हुआ था और
यह ऑस्ट्रेलियन राइटर पब्लिक इंटेलेक्चुअल रहे हैं और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनको सेकंड वेव ऑफ़ फेमिनिस्ट मूवमेंट के
मेजर बॉयस या फिर प्रमुख नारीवादी विचारक माना जाता है। और इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कोट दी जो बहुत ही प्रसिद्ध है जिसमें यह
कहती है वुमेन हैव वेरी लिटिल आईडिया ऑफ़ हाउ मच मैन हेट देम। यह कहती है कि महिलाओं को इस बात का बहुत कम अंदाजा होता
है कि पुरुष किस हद तक या फिर पुरुष महिलाओं से कितनी नफरत करते हैं। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे द फीमेल
इनंच द ऑब्सकल रेस सेक्स एंड डेस्टिनी द मेड वुमेन अंडर क्लोथ्स शेक्सपियर्स द चेंज द होल वुमेन
द ब्यूटीफुल बॉय पो्स फॉर गार्डनर्स द फ्यूचर ऑफ फेमिनिज्म यह भी इनकी अक्षय कृति रही है ऑन रेज 2010 एंड लास्ट बट नॉट
लीस्ट ऑन रेज 2018 अब हम बात कर लेते हैं सिंथिया एनलॉय की। इनका जन्म 1938 को हुआ था और यह एक बहुत
बड़ी फेमिनिस्ट राइटर और पॉलिटिकल थ्योरिस्ट रही है। जिनको कि जेंडर एंड मिलिट्री के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता
है। क्योंकि जेंडर एंड मिलिट्री पर इनका काफी वर्क रहा है। काफी काम रहा है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने
इंटरनेशनल रिलेशन में भी फेमिनिज्म में काफी कंट्रीब्यूट किया। अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की।
एथेनिक कॉन्फ्लिक्ट एंड पॉलिटिकल डेवलपमेंट बनानाज़, बीसीस एंड बेसिस, द मॉर्निंग आफ्टर सेक्सुअल पॉलिटिक्स एट द
एंड ऑफ द कोल्ड वॉर मेने द इंटरनेशनल पॉलिटिक्स ऑफ मिलिटराइजिंग वुमस लाइफ्स, द को द क्यूरियस फेमिनिस्ट ग्लोबलाइजेशन एंड
मिलिटरिज्म। अब बात कर लेते हैं शैला रबाथम। इनका जन्म 1943 को हुआ था। और सबसे
इंपॉर्टेंट बात यह है कि जहां एक तरफ यह ब्रिटिश फेमिनिस्ट रही है और सोशलिस्ट फेमिनिस्ट थ्योरिस्ट और हिस्टोरियन रही
है। वहीं सबसे बड़ी बात यह भी है कि सोशलिस्टिक फेमिनिज्म जो रहा है उस ट्रेडिशन से उस विचारधारा से यह बिलोंग
करती है। यानी कि इन्होंने फेमिनिज्म का सोशलिस्टिक मेन स्ट्रीम जो है या फिर पर्सपेक्टिव है उससे संबंधित इन्होंने
अपने विचार दिए। अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ वक्स की। तो, यह इनके कुछ वक्स रहे हैं। जैसे वुमस लिबरेशन एंड द न्यू
पॉलिटिक्स, वुमेन रेसिस्टेंस एंड रेवोल्यूशन, वुमस कॉन्शियसनेस एंड मैनस वर्ल्ड, हिडन फ्रॉम हिस्ट्री। यह भी इनकी
काफी अक्षय कृति रही है। जिसमें यह कहती है कि समाज में महिलाओं की इस तरह की पोजीशन रही है कि हमें इतिहास में महिलाओं
का कहीं नाम नहीं दिखाई देता है। यानी कि महिलाएं इतिहास से पूरी तरह से हिडन है, छुपी हुई है। क्योंकि महिलाओं को हमेशा घर
की चार दीवारी तक रखा गया और कुकिंग, क्लीनिंग और केयरिंग जैसे कामों तक ही सीमित रखा गया। इसीलिए महिलाएं हिडन फ्रॉम
हिस्ट्री है। अगली इनकी राइटिंग है अ न्यू वर्ल्ड ऑर्डर फॉर वुमेन सोशलिज्म एंड द न्यू लाइफ ब्यूटीफुल डॉटर्स बिय्ड द
फ्रेगमेंट्स ड्रीम्स एंड डायलेमाज़ और कुछ और राइटिंग्स है जैसे न्यू पॉलिटिक्स
वुमेन इन मूवमेंट और सेंचुरी ऑफ़ वुमेन प्रॉमिस ऑफ अ ड्रीम। तो यह रही है इनकी इंपॉर्टेंट राइटिंग्स जो एग्जाम की दृष्टि
से और आपकी नॉलेज की दृष्टि से बहुत ही ज्यादा इंपॉर्टेंट है। नसी चदो इनका जन्म 1943 को हुआ और नसी जूलिया चौरो अमेरिकन
सोशियोलॉजिस्ट रही है। प्रोफेसर रही है और साइको एनालिटिकल फेमिनिस्ट रही है। इसका मतलब यह है कि इनको जाना जाता है साइको
एनालिटिकल फेमिनिज्म के लिए। यानी कि इन्होंने नारीवाद का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण दिया। अब हम बात कर लेते हैं
इनके इंपॉर्टेंट वर्क्स की। इनका सबसे प्रमुख कार्य रहा है द रिप्रोडक्शन ऑफ मदरिंग जो कि इन्होंने 1978 में लिखा। कुछ
और है जैसे फेमिनिज्म एज साइको एनालिटिकल थ्योरी 1989 इंडिविजुअलाइजिंग जेंडर एंड सेक्सुअलिटी थ्योरी एंड प्रैक्टिससेस 2012
द पावर ऑफ फीलिंग्स 1999 फेमिनिटीज, मैस्कुलिनिटीज एंड सेक्सुअलिटीज 1994।
अब हम बात कर लेते हैं मैरी एस्टेल की। यह बहुत पुरानी नारीवादी विचारक रही हैं। इनका जन्म इंग्लैंड में हुआ था 1666 ईस्वी
में और इनकी डेथ 1731 ईवी को हुई थी। यह इंग्लिश प्रोफेसर एंड फेमिनिस्टिक थिंकर रही है। जिन्होंने पहली बार महिलाओं के
लिए समान रूप से शैक्षिक अवसरों की वकालत की। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनको जाना जाता है द फर्स्ट इंग्लिश फेमिनिस्ट
विचारक। तो इनको पहले इंग्लिश नारीवादी विचारक के रूप में जाना जाता है। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग्स रही है। जैसे अ
सीरियस प्रपोजल टू द लेडीज 1694 सम रिफ्लेक्शंस अपॉन मैरिजेस 1700 द फर्स्ट इंग्लिश फेमिनिस्ट रिफ्लेक्शन ऑन मैरिज
1996 86 1986 तो यह बाद में जाकर 1986 में पब्लिश हुई थी। जुदित बटलर इनका जन्म 1956
को हुआ था और यह अमेरिकन फिलॉसफर जेंडर थ्योरिस्ट रही है। जिनके वक्स की वजह से पॉलिटिकल फिलॉसोफी काफी मात्रा में
प्रभावित हुई। खासतौर पे फेमिनिज्म काफी प्रभावित हुआ। और एक इंपॉर्टेंट बात यह है कि यह थर्ड वेव ऑफ़ फेमिनिज्म से जुड़ी रही
है। और थर्ड वेव ऑफ़ फेमिनिज्म को हमने लास्ट वीडियो में डिस्कस किया था। अगर आपने अभी तक वह वीडियो नहीं देखी है तो आप
उसको भी देख सकते हैं। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि इन्होंने दो इंपॉर्टेंट आइडियाज दिए और यह है जेंडर एज सोशल
कंस्ट्रक्शन। इन्होंने कहा कि जब हम जेंडर की बात करते हैं तो यह कोई प्राकृतिक नहीं है क्योंकि जेंडर को हमारे जो सामाजिक
नॉर्म्स है उसके द्वारा बनाया गया है। यानी कि जेंडर सोशली और कल्चरली कंस्ट्रक्टेड है जिसमें केवल पुरुषों को
हीेंस दी जाती है। यानी कि पुरुषों को ही फायदा मिलता है और महिलाओं की हमेशा शोषण होता है या फिर महिलाओं का हमेशा दमन किया
जाता है। और दूसरी बात इन्होंने की जेंडर परफॉर्मेंसिविटी की जिसमें यह कहती है कि जेंडर का जो निर्माण किया गया है वह
परफॉर्मेंस के आधार पे किया गया है। जिसमें यह कहती है कि पुरुषों को केवल इस आधार पर श्रेष्ठ बनाया गया है कि ऐसा लगता
है कि उनकी जो परफॉर्मेंस है वह पब्लिक स्फीयर में दिखाई देती है। यानी कि पुरुष पढ़ने में अच्छे हैं। उनके पास दिमाग
अच्छा है। बिजनेस कर सकते हैं। एजुकेशन प्राप्त कर सकते हैं। पॉलिटिक्स में भाग ले सकते हैं। वहीं महिलाओं को उनके
परफॉर्मेंस अर्थात उनके गुणों के आधार पर कि महिलाएं सेंसिटिव होती है, सुंदर होती है। इसीलिए उनका काम सजना सवरना है। घर के
काम करने हैं। तो ये दो इंपॉर्टेंट कांसेप्ट इन्होंने दिए जिनको आपको अच्छे से याद रखना है। अब हम बात कर लेते हैं
इनके वर्क्स की। तो इन्होंने सबसे इंपॉर्टेंट कृति लिखी जेंडर ट्रबल 1990 में। जिसको कि थर्ड वेव ऑफ फेमिनिज्म की
अक्षय कृति मानी जाती है। इसीलिए आपने इसको अच्छे से याद रखना। बॉडीज दैट मैटर यह भी इंपॉर्टेंट राइटिंग है। ऑन द
डिस्कर्सिव लिमिट्स ऑफ सेक्स अनडूइंग जेंडर द फोर्स ऑफ नॉन वायलेंस एंड एथिकोपिलिटिकल माइंड सब्जेक्ट्स ऑफ डिजायर
नोट्स टवर्ड्स ऑफेटिव थ्योरी ऑफ असेंबली सेंसेस ऑफ द सब्जेक्ट कैरोल पैटमैन इनका जन्म 1940 ईवी को हुआ
और यह एक बहुत बड़ी फेमिनिस्ट थिंकर रही है थ्यरिस्ट रही है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह जानी जाती है क्रिटिक ऑफ लिबरल
डेमोक्रेसी। इन्होंने उदार लोकतंत्र की आलोचना की जिसकी वजह से यह काफ़ी प्रसिद्ध है और फ़ेमिनिस्ट थिंकर तो यह रही ही है।
इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जैसे द सेक्सुअल कॉन्ट्रैक्ट 1997 पार्टिसिपेशन एंड डेमोक्रेटिक थ्योरी 1970 कॉन्ट्रैक्ट
एंड डोमिनेशन 2007 द डिसऑर्डर ऑफ वुमेन द प्रॉब्लम ऑफ पॉलिटिकल ऑब्लिगेशंस डेमोक्रेसी फ्रीडम एंड स्पेशल राइट्स। तो
यह रहे हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स। कैरोल गिलगन इनका जन्म 1936 ईवी को हुआ था। और कैरोल गिलगन अमेरिकन फेमिनिस्ट
पॉलिटिकल थ्योरिस्ट एंड सबसे बड़ी बात यह है कि यह एथिकल कम्युनिटी के साथ एसोसिएटेड रही है। और इनके बहुत सारे
इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे इन अ डिफरेंट वॉइस 1982 और यह सबसे इंपॉर्टेंट वर्क इनका यह रहा है। जॉइनिंग द
रेसिस्टेंस व्हाई डज़ पेट्रियाकी पर्सिस्ट 2018 में इन्होंने हाल ही में यह वर्क लिखा। अ बर्थ ऑफ प्लेजर और न्यू मैप ऑफ लव
डार्कनेस नाउ वििबल पेट्रिय्कीस रिसर्जेंस एंड फेमिनिस्ट रेसिस्टेंस 2018 बर्थ ऑफ प्लेजर प्रूफ 2002 तो यह रहे हैं इनके कुछ
इंपॉर्टेंट वक्स कैरोल हेनिस्ट इनका जन्म 1970 में हुआ और कैरोल हेनिस्ट रेडिकल फेमिनिस्ट थिंकर रही
है और पॉलिटिकल थ्यरिस्ट रही है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह न्यूयॉर्क रेडिकल वुमेन एंड रेड स्टॉकिं्स की सदस्य रही है
जो कि अमेरिका में बहुत प्रसिद्ध ऑर्गेनाइजेशन रहा है और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने एक इंपॉर्टेंट
फेमस प्रेज दिया जिसका नाम है पर्सनल इज पॉलिटिकल 1970 के दशक में इन्होंने यह बहुत ही इंपॉर्टेंट स्लोगन बहुत ही
इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया। अगर आपने अभी तक इस कांसेप्ट को नहीं समझा है तो आप हमारी लास्ट की वीडियो देख सकते हैं। उस
वीडियो में मैंने अच्छे से समझाया है। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। जैसे पॉलिटिक्स ऑफ द गिफ्ट्स 1969
फाइट ऑन सिस्टर्स एंड अदर सॉन्ग्स फॉर लिबरेशन विदाउट अपोलॉजी द अबॉर्शन स्ट्रगल नाउ।
सुसन मोलर ओकिन इनका जन्म 1946 को हुआ था और इनकी डेथ 2004 को हुई थी। यह न्यूजीलैंड बोर्न यूएस लिबरल फेमिनिस्ट
थिंकर रही है। पॉलिटिकल फिलॉसफर एंड ऑथर रही है। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे जस्टिस जेंडर एंड द फैमिली
1989 और यह इनका प्रमुख वर्क रहा है। इज मल्टील्चरलिज्म बैड फॉर वुमेन? 1999 और यह तो इनका बहुत ही इंपॉर्टेंट वर्क रहा है
और यह एग्जाम में भी कई बार पूछा गया है। वुमेन इन वेस्टर्न पॉलिटिकल थॉट 1979 जॉन स्टवरर्ट मिल द सब्जेक्शन ऑफ वुमेन भी
इनकी एक महत्वपूर्ण कृति रही है। आइरिस मेरियन यंग इनका जन्म 1949 को हुआ था और इनकी डेथ 2006 को हुई थी। यह अमेरिकन
पॉलिटिकल थरिस्ट रही हैं और सोशलिस्टिक फेमिनिस्ट थिंकर रही है। इसका मतलब यह है कि यह सोशलिस्टिक फेमिनिज्म से जुड़ी एक
महत्वपूर्ण नारीवादी विचारक रही है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने नेचर ऑफ जस्टिस एंड सोशल डिफरेंसेस जैसे मुद्दों
पर इन्होंने अपना रिसर्च किया, फोकस किया। यानी कि जो सोशल डिफरेंसेस होते हैं हमारी सोसाइटी में जहां पर महिलाओं को कमेंस
होती है और पुरुषों का दबदबा होता है। ऐसे डिफरेंसेस पर इन्होंने ज्यादा फोकस किया। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे
जस्टिस एंड द पॉलिटिक्स ऑफ डिफेंस 1990, इंट इंटरसेक्टिंग वॉइसेस 1997 इल्ल्यूजन एंड डेमोक्रेसी यह भी इनकी एक महत्वपूर्ण
कृति रही है जो कि इन्होंने 2000 में लिखी रिस्पांसिबिलिटी फॉर जस्टिस 2011 ऑन फीमेल बॉडी एक्सपीरियंस 2004
अब हम कन्फशियस की लाइफ को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो इसमें पहला पॉइंट यह आता है कि यह चीन के बहुत बड़े फिलॉसफर
रहे हैं जो कि गौतम बुद्धा और स्वामी महावीर के कंटेंपररी माने जाते हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनका जन्म होता है
चाइना के स्टेट ऑफ लू के गुफों में। कन्फ्यूस के फादर का नाम था कंगघही और इनकी माता का नाम था यान जंगजाई। अगली
महत्वपूर्ण बात यह है कि इनका रियल नेम था कंगफूजी जिसका मतलब होता है अ मास्टर कंग। अगली महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यह
चाइनीज़ फिलॉसोफर रहे, पॉलिटिशियन रहे, टीचर रहे जिनको वाइडली रिगार्ड किया जाता है वन ऑफ द मोस्ट इन्फ्लुएंशियल थिंकर इन
[संगीत] चाइनीस हिस्ट्री। इनकी अगली बात यह भी इंपॉर्टेंट है कि इनको चाइना के फर्स्ट टीचर के रूप में जाना जाता है और
अपने थॉट्स अपने आइडिया को जनरेट करने के लिए आगे बढ़ाने के लिए इन्होंने रूस स्कूल ऑफ थॉट की स्थापना की जो कि चाइना में एक
प्रकार का इंपॉर्टेंट स्कूल था जिसकी वजह से ही इनके जो आइडियाज है उसको कन्फ्यूशनिज्म कहा जाता है। अगली
इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि यह ह्यूमनिस्ट थिंकर थे जिसके अंतर्गत इन्होंने पीस और काइंडनेस की बात की और सबसे महत्वपूर्ण
बात यह है कि इनकी जितनी भी टीचिंग्स रही है इसको कलेक्टिवली जाना जाता है कन्फ्यूजनिज्म जिसके अंतर्गत इन्होंने
पर्सनल एंड गवर्नमेंटल मोरालिटी की बात की। करेक्टनेस ऑफ सोशल रिलेशनशिप की बात की। जस्टिस और सिंसियरिटी की बात की।
कन्फ्यूशियस ने जैसे ही अपनी एजुकेशन को कंप्लीट किया तो सबसे पहले इन्होंने [संगीत] मैजिस्ट्रेट के रूप में जॉब की।
फिर इसके बाद इन्होंने असिस्टेंट मिनिस्टर ऑफ पब्लिक वक्स के रूप में काम किया। फिर इन्होंने स्टेट ऑफ लू के मिनिस्टर ऑफ
जस्टिस के रूप में काम किया। अगली इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि इनके आइडियाज ह्यूमनिटेरियन थे। जबकि दूसरी तरफ स्टेट
ऑफ लू बिलीव करता था बोर और अनाकी के ऊपर जिसकी वजह से इनके [संगीत] डिसअपॉइंटमेंट या फिर क्लैशेस हो गए स्टेट ऑफ लू के साथ
और इनको स्टेट ऑफ लू को छोड़ना पड़ा और 12 वर्ष के दौरान इन्होंने चाइना में डिफरेंट-डिफरेंट प्लेसेस को विजिट किया और
जैसे ही कन्फ्यूशियस 68 वर्ष की अवस्था में अपने नेटिव होम स्टेट ऑफ लू आते हैं तो यह एक मजे हुए व्यक्ति थे। यानी कि
इनको एक प्रकार से एनलाइटनमेंट प्राप्त हो गया था। जिसकी वजह से इन्होंने अपनी फिलॉसोफी को शुरू किया और [संगीत]
इन्होंने फाउंडेशन रखी चाइनीस फिलॉसोफी की जिसको कि कलेक्टिवली जाना जाता है कन्फ्यूशनिज्म। अब हम कन्फ्यूशियस के
लिटरेचर को अच्छे से समझ लेते हैं क्योंकि आपके एग्जाम के लिए इनके लिटरेचर को जानना, इनके वर्क्स को जानना बेहद
इंपॉर्टेंट है। तो इसमें इनका पहला वर्क आता है एनालेक्ट्स ऑफ कन्फशियस। जिसकी खास बात यह है कि यह एक प्रकार का कलेक्शन है
जो इनकी सेइंग्स रही है, टीचिंग्स रही है, डायलॉग्स रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि इस वर्ब को माना जाता है मोस्ट रिलायबल
सोर्स ऑफ कन्फशियस थॉट। अगली इनकी वर्क यानी कि राइटिंग [संगीत] आती है मेंशियस जिसमें इन्होंने मेंशियस के साथ और इनके
जो स्टूडेंट रहे हैं, ग्रैंड सन रहे हैं, वेरियस रूलर्स रहे हैं, स्कॉलर्स [संगीत] रहे हैं, जितने भी इनके डायलॉग्स रहे इनके
साथ उनका यह कलेक्शन है। अगला इनका वर्क आता है द ग्रेट लर्निंग जिसका मतलब यह है कि इसके अंतर्गत इन्होंने गाइडेंस [संगीत]
दी लोगों को अपने स्टूडेंट्स को कि किस तरह से स्वयं को कल्टीवेट करना है, खुद को क्रिएट करना है और दूसरों के ऊपर गवर्न
करना है, रूल करना है। अगला इनका वर्क आता है द डॉक्ट्रिन ऑफ द मीन। इसके अंतर्गत इन्होंने कहीं ना कहीं मिडिल वे या फिर
गोल्डन मीन का कांसेप्ट दिया जिसको बाद में एरिस्टोटल ने भी दिया था। जिसके अंतर्गत इन्होंने यह कहा कि हमें बीच का
रास्ता अपनाना चाहिए क्योंकि वही हमारे लिए बेहतर होता है। कन्फशियस का अगला वर्क आता है द बुक ऑफ हिस्ट्री। यह बेसिकली
कलेक्शन है हिस्टोरिकल डॉक्यूमेंट का जिसके अंतर्गत इन्होंने बहुत सारी स्पीशीज दी। और अगला इनका वर्क आता है द बुक ऑफ
पोएट्री। यह एक बेसिकली कलेक्शन है इनकी पोएम्स का, इनकी पोएट्री का और अगला इनका वर्क आता है द बुक ऑफ चेंजेस [संगीत]
जिसके अंतर्गत इन्होंने फ्यूचर में क्या होगा, क्या होना चाहिए, क्या-क्या चेंजेस होंगे? इसके बारे में फिलॉसोफी दी है और
इनका लास्ट वर्क आता है जिसका नाम है द स्प्रिंग एंड ऑटम एनल्स। और यह हिस्टोरिकल टेक्स्ट माना जाता है और इसको सबसे
इंपॉर्टेंट बुक मानी जाती है इनकी। अब हम कन्फ्यूशियस की फिलॉसोफी को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो इसमें इनकी पहली
थ्योरी आती है द थ्योरी ऑफ डिवाइन ओरिजिन ऑफ द स्टेट जिसको आप हिंदी में कहते हैं राज्य की दैवीय उत्पत्ति [संगीत] का
सिद्धांत। तो सबसे पहली बात यह है कि कन्फ्यूशियस ने मोनार्की को सपोर्ट किया और इन्होंने फुडलिज्म को भी सपोर्ट किया
क्योंकि इनके समय में चीन में बड़ी मात्रा में मोनार्की थी। फ्यूडलिज्म था। लेकिन विचारणीय बात यह भी है कि इन्होंने
ऑटोक्रेटिक मोनार्की और एक्सप्लॉयटेटिव फुडलिज्म की बड़ी मात्रा में आलोचना की। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि
इन्होंने यह कहा कि तीन इंपॉर्टेंट पावर्स होती है जिसमें पहली आती है ईश्वर की यानी कि गॉड की। दूसरी पावर इसमें आती है स्टेट
की और तीसरी पावर इसमें आती है पीपल की। इसका मतलब यह हुआ कि जहां कन्फ्यूशियस ने एक तरफ गॉड की बात की है, गॉड की पावर की
बात की है, वहीं दूसरी तरफ इन्होंने स्टेट की सोवनिटी की भी बात की है और साथ में इन्होंने पीपल की सोवनिटी की भी बात की
है। कन्फ्यूशियस ने महत्वपूर्ण कोट दिया जिसमें इन्होंने यह कहा कि अनजस्ट रूल इज मोर डेंजरस देन अ [संगीत] लायन। जिसका
मतलब यह है कि अन्यायपूर्ण शासन शेर से भी भयानक होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शेर केवल बॉडी को खा जाता है। लेकिन जहां पर
अनजस्ट रूल होता है वहां लोगों की आत्मा को खाया जाता है। उनकी चेतना को मारा जाता है। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने
कौटिल्य की तरह यह कहा एज द किंग सो आर द सब्जेक्ट्स। जिसका मतलब यह है कि यथा राजा तथा प्रजा अर्थात जिस राज्य में जैसा राजा
होगा वैसी ही प्रजा होगी। अगली इंपॉर्टेंट बात यहां पर यह भी आती है कि इन्होंने यह कहा कि किंग गॉड का रिप्रेजेंटेटिव होता
है और दूसरी बड़ी बात यह भी है कि इन्होंने कहा कि स्ट्रांग सेंट्रल गवर्नमेंट होनी चाहिए और ऐसा इसलिए है
क्योंकि इनके समय में चीन डिफरेंट-डिफरेंट प्रोविंसेस में बटा हुआ था। तो उसको यूनाइट रखने के लिए एकजुट रखने के लिए
इन्होंने स्ट्रांग सेंट्रल गवर्नमेंट की बात की। कन्फ्यूशियस का अगला कांसेप्ट आता है आइडियल स्टेट। तो इनकी खास बात यह है
कि इन्होंने यह कहा कि जो ऑफिशियल्स होते हैं और पब्लिक होती है उनको हमेशा अपने जीवन में मोरल रूल्स और ड्यूटी को फॉलो
करना चाहिए। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने यह कहा कि जो [संगीत] आइडियल स्टेट होता है इसके फाइव कोर प्रिंसिपल्स
होते हैं। जिसमें पहला आता है रेन जिसको आप हिंदी में कहते हैं परोपकार और इंग्लिश में कहते हैं वेनवुलेंस। इसकी खास बात यह
है कि इन्होंने कहा कि जब आप दूसरों को ट्रीट करते हैं तो उसमें काइंडनेस होनी चाहिए, कंपैशन होना चाहिए, एंपैथी होनी
चाहिए। अगला कांसेप्ट आता है ई जिसका मतलब होता है राइटियसनेस जिसको आप धार्मिकता कहते हैं। इसका मतलब यह है कि जो भी आप
काम करते हैं, उसको आप धर्म के अनुसार करें। सही रूप से करें, जस्ट के साथ करें। हालांकि यह काम करना डिफिकल्ट होता है।
अगला कांसेप्ट इसमें आता है ली जिसको आप एटीिक्वेट कहते हैं यानी कि शिष्टाचार कहते हैं। इसका मतलब यह है कि आपको सोशल
नॉर्म्स को फॉलो करना होता है और दूसरों के साथ आप अच्छा व्यवहार रखें। अगला कांसेप्ट आता है शिन। इसका मतलब है
इंटेग्रिटी [संगीत] यानी कि ईमानदारी या फिर सत्य निष्ठा के साथ कार्य करना। दूसरों के प्रति आप हमेशा से ट्रू रहें,
फेथफुल रहें और आप अपने जीवन में प्रमाणिक रूप से रहें। ईमानदारी से अच्छे से काम करें। और लास्ट इसमें आता है जी जिसका
मतलब होता है विज़डम बुद्धि। इसका मतलब यह है कि कन्फिशियस कहते हैं कि इंसान को हमेशा नॉलेज को कल्टीवेट करना होगा।
अंडरस्टैंडिंग को इंक्रीस करना होगा और डिसर्नमेंट को बढ़ाना होगा। यानी कि विवेक को विकसित [संगीत] करना होगा। विज़डम को
इनक्रीस करना होगा। अगली इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि कन्फशियस कहते हैं कि किंग को टिट फॉर टैट की पॉलिसी अपनानी चाहिए।
जिसका मतलब यह है कि कन्फ्यूशियस कहीं ना कहीं रियलिस्टिक थिंकर थे ना कि आइडियलिस्टिक थिंकर थे। अगली महत्वपूर्ण
बात यह भी आती है कि कन्फ्यूसियस ने हायरार्किकल सोशल सिस्टम की बात की जिसके अंतर्गत इन्होंने यह कहा कि समाज में
हायरार्की और इनकलिटी [संगीत] पाई जाती है जो कि नेचुरल है क्योंकि यह गॉड गिवन है और अगली इंपॉर्टेंट बात यह भी रही कि
इन्होंने कहीं ना कहीं पब्लिक एजुकेशन के ऊपर भी बड़ी मात्रा में जोर दिया। एक तरफ जहां कन्फ्यूशियस ने यह कहा कि स्टेट किंग
की फैमिली का रिटलार्ज होता है। अर्थात राज्य के परिवार का ही विस्तृत रूप होता है। बृहत रूप होता है। यह कन्फ्यूशियस ने
कहा। वहीं दूसरी तरफ प्लेटो ने कहा कि स्टेट [संगीत] इज एन इंडिविजुअल रिटलार्ज। जिसका मतलब यह है कि राज्य व्यक्ति का
बृहत रूप होता है। तो इन दोनों पॉइंट को आप अच्छे से याद रखें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है।
[संगीत] अब हम कन्फ्यूशियस के एजुकेशन की स्कीम को अच्छे से समझ लेते हैं। तो इनकी एजुकेशन
की स्कीम की पहली बात यह है कि इन्होंने कहा कि जो एजुकेशन होता है वह पर्सनल डेवलपमेंट का मीन होता है। सोशल मोबिलिटी
और मोरल कल्टीिवेशन एजुकेशन के द्वारा होना चाहिए। ऐसी मान्यता कन्फ्यूशियस की रही है। अगला पॉइंट यह है कि इनकी जो
फिलॉसोफी ऑफ़ एजुकेशन रही है, इसके इन्होंने तीन आधार बताए हैं। तीन बातें बताई हैं। जिसमें पहला इसमें आता है सेल्फ
कल्टीिवेशन यानी कि एजुकेशन ऐसी होनी चाहिए जिसके द्वारा आप सेल्फ कल्टीिवेशन कर सके, स्वाध्याय कर सकें। अगला मेथड
इसमें आता है मोरल एजुकेशन। यानी कि आपकी जो एजुकेशन है उसके अंदर मोरालिटी होनी चाहिए। और तीसरा आता है इंटेलेक्चुअल
क्यूरियोसिटी। [संगीत] जिसका मतलब यह है कि आपके अंदर कहीं ना कहीं इस बात की जिज्ञासा होनी चाहिए।
क्यूरियोसिटी होनी चाहिए [संगीत] कि आप कौन हैं? आपके अंदर जो कॉन्शियसनेस है, जो आत्मा है, वह क्या है? आप क्या हो? आपका
जन्म क्यों हुआ है? यह जितने भी सारे इंटेलेक्चुअल क्वेश्चंस हैं, वह आपके अंदर होने चाहिए और इनका जवाब लेने की क्षमता
आपके अंदर होने चाहिए। यानी कि जिज्ञासा होनी चाहिए। कन्फशियस ने एजुकेशन के तीन इंपॉर्टेंट मेथड्स की बात की है। जिसमें
पहला मेथड आता है क्वेश्चनिंग और डायलॉग। इसका मतलब यह है कि आप क्वेश्चनिंग [संगीत] कर सकते हैं, प्रश्न कर सकते हैं
और दूसरों के साथ डायलॉग कर सकते हैं। जब आप क्वेश्चनिंग करते हैं, डायलॉग करते हैं तो आप एजुकेशन यानी कि लर्निंग को प्राप्त
करते हैं। इसका दूसरा मेथड आता है स्टोरी टेलिंग और एनालॉजीस। इसका मतलब यह है कि जो कहानियां होती है, उपमाएं होती है,
उससे भी आप एजुकेशन को गेन [संगीत] कर सकते हैं। और इसमें तीसरा मेथड आता है प्रैक्टिकल एप्लीकेशन। जिसका मतलब यह है
कि जो आप सीख रहे हैं, जिस नॉलेज को आप प्राप्त कर रहे हैं, उसको प्रैक्टिकली अप्लाई करना। और सबसे बड़ी बात यह है कि
इन्होंने एजुकेशन के तीन इंपॉर्टेंट गोल्स की बात की। जिसमें पहला गोल आता है पर्सनल डेवलपमेंट। दूसरा गोल आता है सोशल
मोबिलिटी और तीसरा गोल इसमें आता है सर्विस टू सोसाइटी। कन्फशियस ने ऐसे तीन तरीके बताए हैं जिनकी वजह से आप नॉलेज को
गेन कर सकते हैं। या आप यह भी कह सकते हैं कि कन्फशियस के अनुसार तीन प्रकार की नॉलेज होती है। तो इसमें पहली नॉलेज
[संगीत] आती है रिफ्लेक्शन प्रतिबिंबित नॉलेज जिसको आप कहते हैं। इसकी खास बात यह है कि यह सबसे नोवेलेस्ट वे होता है विज़डम
को प्राप्त करने का और इसकी खास बात यह है कि यह कहते हैं कि जो रिफ्लेक्शन होता है वो मेडिटेशन के द्वारा आता है जब आप सत्य
को एज इट इज़ देखते हैं। जैसे किसी मिरर के ऊपर लाइट पड़ती है तो वह रिफ्लेक्ट होती है एज इट इज़। उसी तरीके से मेडिटेशन से भी
सत्य एज इट इज आपको दिखाई देता है। आपको यह पता चलता है कि अल्टीमेटली आप कौन हैं? तो इसमें आपको फर्स्ट हैंड नॉलेज मिलती
है। इसीलिए इसको विज़डम को, नॉलेज को गेन करने का सबसे नवेलेस तरीका माना जाता है। इसमें दूसरा तरीका आता है इमिटेशन जिसको
आप नकल करना, कॉपी करना कहते हैं। तो, इसकी खास बात यह है कि इसमें आप दूसरों के एक्सपीरियंसेस सीखते हैं और इसको नॉलेज को
प्राप्त करने का सबसे इजीिएस्ट तरीका माना जाता है। क्योंकि इसमें आप दूसरों की नकल करते हैं। उदाहरण के लिए सोसाइटी में
एक्सपर्ट्स हैं या बहुत ग्रेट माइंड्स हैं, एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी पीपल हैं। उनके एक्सपीरियंस से आप सीखते हैं। वहां से आप
नकल करते हैं, कॉपी करते हैं, इमिटेशन करते हैं। इसके अलावा बुक्स हैं, पोस्ट हैं या फिर बायोग्राफीज़ हैं, पडकास्ट है,
इंटरव्यूज है। इन सभी से आप सीखते हैं, वहां से नकल करते हैं। इसीलिए इसको आप नकल करना कहते हैं और इसको आप सबसे इजीिएस्ट
तरीका मानते हैं नॉलेज को गेन करने का। इसमें तीसरा आता है एक्सपीरियंस यानी कि अनुभव। इसकी खास बात यह है कि आप दूसरों
के एक्सपीरियंस के बाद अब आप खुद के एक्सपीरियंसेस सीखते हैं। और इसको कन्फ्यूशियस ने बिट्रेस्ट वे माना है।
यानी कि सबसे कड़वा तरीका माना है नॉलेज को प्राप्त करने का। और ऐसा इसलिए है क्योंकि कन्फशियस कहते हैं कि जो तीसरा
तरीका है यानी कि एक्सपीरियंस है यह विटरेस्ट होता है क्योंकि इसमें काफी समय लग जाता है। टाइम कंज्यूमिंग होता है और
इसमें आपको काफी हार्ड वर्क करना होता है क्योंकि आपको खुद के एक्सपीरियंस से होकर गुजरना होता है। तब जाकर कहीं आपको नॉलेज
गेन होती है। [संगीत] अब हम कन्फशियस के कॉमनव्थ के आईडिया को
अच्छे से समझ लेते हैं। तो इसमें पहली बात यह है कि इन्होंने कहा कि सोसाइटी का वेलफेयर होना चाहिए ना कि इंडिविजुअल का
वेलफेयर होना चाहिए। और ऐसा इसलिए है क्योंकि इन्होंने कहा कि अगर सोसाइटी में वेलफेयर होगा तो हारमोनियस सोशल ऑर्डर को
स्थापित किया जाना पॉसिबल हो जाएगा। वहीं इन्होंने अपनी प्रमुख कृति बुक ऑफ राइट्स में कॉमनव्थ के नोशन को दिया। और अगली
महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने कॉमनव्थ की कुछ इंपॉर्टेंट फीचर्स बताई। जिनमें पहली आती है सोशल हार्मोनी। दूसरी आती है
कलेक्टिव गुड। तीसरी आती है पीस एंड ऑर्डर और चौथी इसमें आती है गुड गवर्नेंस और पांचवी इसमें आती है मल्टीचरलिज्म। और छठी
इसमें आती है ग्रेट लर्निंग। इसका मतलब यह है कि जो छह विशेषताएं हैं, यह किसी भी कॉमनव्थ में होनी चाहिए क्योंकि यह
कॉमनव्थ के कोर बेसिस है, आधार हैं। अब हम कन्फ्यूशियस के कुछ अन्य कांसेप्ट्स को देख लेते हैं जो कि आपके एग्जाम के लिए
बहुत इंपॉर्टेंट है। तो, इसमें पहला कांसेप्ट आता है द गोल्डन मीन जिसका मतलब यह है कि स्वर्णिम मध्यम मार्ग। इन्होंने
यह कहा कि हमें हमेशा से 20 का रास्ता अपनाना चाहिए। मिडिल वे अपनाना चाहिए। इसके बाद अरिस्टोटल ने भी इस कांसेप्ट को
दिया और वहीं इंडिया में गौतम बुद्धा ने भी इस कांसेप्ट को दिया था। इसमें इन्होंने यह कहा था कि डू नॉट डू टू अदर्स
व्हाट यू वुड नॉट हैव देम टू डू यू। इसका मतलब यह है कि दूसरों के साथ वैसा व्यवहार मत करो जैसा तुम नहीं चाहते हैं कि वे
तुम्हारे साथ करें। अगला कांसेप्ट इसमें आता है द फाइव रिलेशनशिप्स। इसका मतलब यह है कि इन्होंने पांच संबंधों की बात की।
जैसे रूलर, सब्जेक्ट, फादर, सन, [संगीत] एल्डर, यंगर, ब्रदर, हस्बैंड, वाइफ एंड फ्रेंड, फ्रेंड। और अगला इनका कांसेप्ट
आता है द फाइव वर्चूज़। इसका मतलब यह है कि इन्होंने रेन, ई, ली, शिन और जी इन सभी पांच सद्गुण की इन्होंने बात की जिनको
हमने पहले ही अच्छे से डिस्कस किया है। और अगला इनका कांसेप्ट आता है द सिक्स आर्ट्स। इन्होंने उस समय चीन में छह
इंपॉर्टेंट आर्ट्स यानी कि कलाओं की बात की जिसमें पहली आती है राइट्स, दूसरी आती है म्यूजिक, तीसरी आती है आर्चरी, चौथी
आती है चैरियट ड्राइविंग, पांचवी आती है कैलग्राफी और छठी आती है अर्थमैटिक। अब हम कन्फ्यूशियस के इस चैप्टर को सम अप कर
लेते हैं यानी कि कंक्लूड कर लेते हैं। तो इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कन्फ्यूशियस ने यह कहा कि जो हमारी सोल
होती है वह कभी मरती नहीं है। रादर यह ट्रांसफॉर्म होती है एक बॉडी से दूसरी बॉडी में। इसका मतलब यह हुआ कि आत्मा के
बारे में कन्फशियस के विचार हिंदू फिलॉसोफी से मिलते जुलते हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने
काइंडनेस, बेनोबलेंट और पीस के ऊपर फोकस किया। इसको इन्होंने परिभाषित करते हुए यह कहा कि हवन सेंड्स डाउन इट्स गुड और इविल
सिंबल्स एंड वाइज मैन [संगीत] एक्ट अकॉर्डिंगली जिसका मतलब यह है कि इन्होंने कहा कि स्वर्ग अपने अच्छे या बुरे प्रतीक
भेजता है और जो बुद्धिमान व्यक्ति होते हैं वे उसी के अनुसार अपना कार्य करते हैं फंक्शनंस करते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण
बात यह है कि माओ जेडोंग ने रिजेक्ट किया कन्फ्यूशनिज्म को चाइना में। इन्होंने यह कहा कि हम काइंडनेस के द्वारा, वेनोवलेंट
के द्वारा, ह्यूमैनिटी के द्वारा, पीस के द्वारा चाइना में कभी भी डेवलपमेंट और प्रोग्रेस को अचीव नहीं कर सकते हैं। अब
हम सबसे पहले प्लेटो की लाइफ को डिस्कस कर लेते हैं। तो, इनके बारे में पहली इंपॉर्टेंट बात यह है कि यह एंशिएंट ग्रीक
ग्रेट पॉलिटिकल फिलॉसोफर रहे हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि प्लेटो का जन्म होता है एथेंस में। इनके [संगीत] पिता का
नाम था एरिस्टन यानी कि एरिस्टोक्लीज़ और इनकी माता का नाम था पेरिक्टोन। खास बात यह है कि इनकी माता सिस्टर रही है चामोडीज
की और क्रिटियाज़ की कजिन रही है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि प्लेटो के तीन भाई थे जिनमें पहला नाम आता है ग्लूकोन
का। दूसरा नाम आता है एंटीफोन का और तीसरा नाम आता है एडिमेंटस का। और इनकी एक सिस्टर थी जिनका नाम था पोटॉन। तो जितने
भी यह फैक्ट्स हैं आप इनको अच्छे से याद करें क्योंकि एग्जाम [संगीत] में पूछे जा सकते हैं। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट आता है
कि यह सोक्रेटीज जो कि महान फिलॉसोफर रहे हैं ग्रीक के उनके यह स्टूडेंट रहे हैं। और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि
इन्होंने द एकेडमी को एस्टैब्लिश किया था 387 बीसीई में जो कि इनका बहुत बड़ा स्कूल था। खासतौर पे इनकी फिलॉसोफी का बहुत बड़ा
स्कूल था। अगला पॉइंट यह आता है कि इनका रियल नेम था एरिस्टोक्लीज जो कि इनके फादर से ही इनको मिला हुआ था और इनका निक नेम
था प्लेटो जिसका मतलब होता है ब्रॉड या फिर बाइड। ऐसा माना जाता है कि यह हष्टपुष्ट शरीर वाले थे। यानी कि इनका
शरीर बहुत हेल्दी था। इनके कंधे चौड़े थे। जिस वजह से इनको प्लेटो नाम मिला [संगीत] और इनको अफलातून के नाम से भी जाना जाता
है। खास बात यह है कि इनकी जो माता है उनका वंश एथेंस में सोलोन से संबंधित था जो कि अगेन बहुत एरिस्टोक्रेट यानी कि रिच
फैमिली थी जो कि फेमस लॉ मेकर्स थे, पोएट थे। पैलोपोनेशियन वॉर प्लेटो की लाइफ का एक बेहद [संगीत] इंपॉर्टेंट फेज माना जा
सकता है। तो जब हम बात करते हैं पैलोपोनेशियन वॉर की तो हम कह सकते हैं कि यह सीरीज ऑफ कॉन्फ्लिक्ट्स है जो कि एथेंस
और स्पाता के बीच 431 ईसा पूर्व से 404 ईसा पूर्व के बीच लड़ा गया था। इसकी दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस वॉर में बहुत
सारे सिटी स्टेट्स ने भाग लिया था। पार्टिसिपेट किया था ताकि जो ग्रीक वर्ल्ड है उसको कंट्रोल किया जा सके। अगली
महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें 404 ईसा पूर्व में एथेंस ने सरेंडर किया था और स्पार्टंस की इसमें जीत होती है और इसी के
साथ यह वॉर 404 ईसा पूर्व में खत्म हो जाता है। और अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि तुसी डाइडस ने द हिस्ट्री ऑफ द पैलोपोनेशन
वॉर लिखी थी। जिसको कि क्लासिकल [संगीत] रियलिज्म के ऊपर लिखी गई सेकंड इंपॉर्टेंट बुक मानी जाती है। क्योंकि इससे कुछ ही
साल पहले सुनजू ने द आर्ट ऑफ वॉर लिखी थी। प्लेटो की लाइफ की सबसे महत्वपूर्ण घटना यह है कि प्लेटो को [संगीत] पैलोपोनेशियन
वार के बाद उस समय जो 30 ट्राय्स थे जो एथेंस को रूल कर रहे थे। उन्होंने पेशकश [संगीत]
की थी कि प्लेटो इस 30 ट्राय्स में शामिल हो जाए। लेकिन प्लेटो ने पूरी तरह से सख्ती के साथ मना कर दिया था। अगला पॉइंट
यह आता है कि प्लेटो उस समय के बहुत बड़े मैथमेटिशियन और फिलॉसोफर पाइथागोरस से काफी प्रभावित थे। यह भी बात विचारणीय है
कि प्लेटो ने अपनी पूरी लाइफ में कोई शादी नहीं की थी। और इससे भी महत्वपूर्ण बात है कि प्लेटो 407 बीसीई में सोक्रेटीज से
मिलते हैं और उस समय इनकी एज थी 20 साल और इसके बाद प्लेटो सोक्रेटीज से काफी प्रभावित हो जाते हैं और यह सोक्रेटीज
[संगीत] के स्टूडेंट बन जाते हैं। प्लेटो की लाइफ तब पूरी तरह से बदल जाती है जब 399 बीसीई [संगीत] में 30 ट्राय्स ऑफ
एथेंस के द्वारा जो कि उस समय एक नाम मात्र डेमोक्रेटिक रूल को एस्टैब्लिश कर रहे थे या फिर चला रहे थे उन्होंने
सॉक्रेटीज को देशद्रोह और यूथ को भड़काने के मामले में ट्रायल चला दी और उनको मौत की सजा दे दी। इसके बाद प्लेटो को
डेमोक्रेसी से काफी घृणा हो गई थी और उनकी पूरी लाइफ बदल गई थी। सोक्रेटीज का लास्ट डायलॉग क्रिटो [संगीत] के साथ हुआ था जो
कि बाद में प्लेटो के द्वारा लिखा गया था और यह एक प्रकार से इमोर्टल बना था। हालांकि विचारणीय बात यह है कि प्लेटो
बीमारी [संगीत] के चलते इस डायलॉग में भाग नहीं ले पाए थे। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सोक्रेटीज की डेथ के [संगीत] बाद
प्लेटो काफी परेशान थे। तो इन्होंने एथेंस को छोड़ दिया था और 12 वर्षों तक अनेकोंने डिफरेंट-डिफरेंट कंट्रीज की यात्राएं की।
जिनमें प्रमुख थे मेगारा, सिरेज, साइरिन, मिस्र, सिसली, इटली और भारत। हालांकि यह बात विवाद का रहा है और अनुमान पर आधारित
है कि प्लेटो ने भारत की यात्रा [संगीत] की होगी क्योंकि बहुत सारे विद्वानों के द्वारा इस बात पर जोर दिया जाता है या फिर
अनुमान लगाया जाता है कि उस समय भारत पर भी सिस्टमैटिक कास्ट सिस्टम था जो कि प्लेटो इंस्पायर हुए थे वहां से और प्लेटो
ने इसीलिए फिलॉसोफर, सोल्जर्स और आर्टिजन नाम के तीन क्लासेस का जिक्र इन्होंने किया था। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि
प्लेटो 12 साल बाद 40 साल की अवस्था में एथेंस लौट आते हैं। अब हम प्लेटो की द एकेडमी को डिस्कस कर लेते हैं। तो सबसे
पहली बात यह है कि प्लेटो एथेंस को लौट आते हैं 387 बीसी में। जहां पर इन्होंने द एकेडमी को 387 बीसीई में एस्टैब्लिश किया
था। अगली विचारणीय बात यह है कि प्लेटो की जो एकेडमी थी यह एक प्रकार का फिलॉसोफिकल स्कूल था एंशिएंट ग्रीस में और इसको
प्लेटो ने 387 बीसीई में एस्टैब्लिश किया था। अगली इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि इस यूनिवर्सिटी को यानी कि जो प्लेटो की जो
एकेडमी है इसको वेस्टर्न वर्ल्ड की पहली यूनिवर्सिटी मानी जाती है। और विचारणीय बात यह भी है कि जो एकेडमी था यह एक
प्रकार का प्लेस था जहां पर इंटेलेक्चुअल डिस्कशन होता था। एक्सरसाइजज़ होती थी और रिलीजियस एक्टिविटीज होती थी। वहीं दूसरी
बात जो आपको याद रखनी है कि यह एथेंस के बाहर एक एकेडमिया नामक जगह थी। वहां पर इसको एस्टैब्लिश किया गया था। इसीलिए इसको
द एकेडमी कहा गया था। वहीं अगली बात यह भी विचारणीय है प्लेटो की द एकेडमी उनकी पूरी लाइफ में निशुल्क रही थी। यानी कि चार्ज
फ्री रही थी। द एकेडमी में स्टूडेंट्स फिलॉसोफी, मैथमेटिक्स, एस्ट्रोनॉमी और पॉलिटिक्स को स्टडी करते थे। जबकि
एरिस्टोटल इस एकेडमी [संगीत] के सबसे मोस्ट फिलॉसोफर रहे हैं हिस्ट्री में। और यह द एकेडमी के प्रसिद्ध स्टूडेंट रहे।
प्लेटो के यह स्टूडेंट रहे थे। जबकि विचारणीय बात यह भी है कि एरिस्टोटल ने द एकेडमी पर तब तक स्टडी की जब तक इन्होंने
अपना खुद [संगीत] का स्कूल द लाइसियम नहीं खोला था। और विचारणीय बात यह भी है कि प्लेटो ने अपने जीवन के लास्ट जो वर्ष है
वह इसी एकेडमी में स्पेंड किए। यहां पर इन्होंने स्टूडेंट्स को पढ़ाया, इंस्ट्रक्ट किया। लेकिन 347 बीसी में इस
महान ग्रीक फिलॉसोफर की डेथ हो जाती है। अब हम प्लेटो के वक्स को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं क्योंकि आपके एग्जाम के लिए
बेहद इंपॉर्टेंट है। तो अगर हम बात करें प्लेटो की राइटिंग्स की तो इनका जो लिटरेचर है वह बहुत ही व्यापक रहा है।
इनके वॉक्स में 35 डायलॉग और 13 लेटर्स आते हैं जो कि आपको याद रखने हैं। हम आगे चलकर इनको अच्छे से डिस्कस करेंगे। दूसरी
बड़ी बात यह है कि प्लेटो ही पॉलिटिकल साइंस की हिस्ट्री में ऐसे फिलॉसोफर रहे हैं जिन्होंने रिटन फॉर्म में सबसे पहले
डायलेक्टिक मेथड का प्रयोग किया था। हालांकि इनसे पहले इनके गुरु सोक्रेटीज ने भी डायलक्टिक [संगीत] मेथड का प्रयोग किया
था लेकिन उन्होंने रिटन फॉर्म में नहीं किया था। अगली विचारणीय बात यह है कि प्लेटो की जितनी भी बुक्स रही है वह
डायलॉजिकल स्टाइल में रही है और जो द लॉज़ है उसको छोड़कर इनकी जितनी भी राइटिंग्स रही है उसके नायक यानी कि हीरो मेन
कैरेक्टर सोक्रेटीज हैं। प्लेटो का पहला डायलॉग आता है द अपोलॉजी। इसकी खास बात यह है कि इसको प्लेटो का पहला डायलॉग माना
जाता है और इसे जाना जाता है एपोलॉजी ऑफ सोक्रेटीज के नाम से। यह बेसिकली एक सोक्रेटिक डायलॉग है जिसमें प्लेटो ने
वर्णन किया [संगीत] है कि किस तरह से सोक्रेटीज ने 399 बीसी पूर्व में जो उनके ऊपर मुकदमा चलाया गया था और जो वहां पर
अधर्म था, भ्रष्टाचार था उसके खिलाफ किस तरह से इन्होंने बोला था। इन सभी बातों का वर्णन इस डायलॉग में प्लेटो ने किया था।
वहीं इसमें प्लेटो कहीं ना कहीं अपने गुरु के प्रति क्षमा यासना करते हैं। अपोलॉजी करते हैं कि वे अपने गुरु को नहीं बचा
पाए। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्लेटो का पहला डायलॉग तो माना ही जाता है। साथ में यह पहली बुक भी मानी जाती है
[संगीत] जो सोक्रेटीज के डेथ से रिलेटेड है। वहीं अगली एक विचारणीय बात यह भी है कि इसमें सोक्रेटीज का जो डिस्कशन हुआ था
क्रिटो के साथ, फायदों के साथ, इथोप्रो के साथ उसको प्लेटो ने अच्छे से वर्णन किया है, एक्सप्लेन [संगीत] किया है। महात्मा
गांधी ने द अपोलॉजी को गुजराती में ट्रांसलेट [संगीत] किया एज अ सत्यवीर की कथा और इन्होंने इस कृति में सोक्रेटीज को
कहा सत्यवीर। अब हम प्लेटो के सेमिनल वर्क्स को डिस्कस कर लेते हैं। तो इसमें पहला वर्क आता है द रिपब्लिक। तो जब हम
बात करते हैं रिपब्लिक की तो पहला पॉइंट यह आता है कि हमें सबसे पहले यह समझना है कि द रिपब्लिक का थीम क्या है? विषय क्या
है? [संगीत] तो यह क्वेश्चन बहुत अहम हो जाता है क्योंकि लॉन्ग में भी या फिर सब्जेक्टिव में भी इसे एग्जाम में पूछा
जाता है। तो पहला पॉइंट यह है कि जो द रिपब्लिक है यह प्लेटो [संगीत] का सेमिनल वर्क है। फंडामेंटल वर्क माना जाता है
पॉलिटिकल फिलॉसोफी के ऊपर और द रिपब्लिक बेसिकली एक सोक्रेटिक डायलॉग है। प्लेटो के द्वारा इसे अराउंड 380 बीसी में लिखा
गया था। और सबसे बड़ी बात यह है कि इसका फुल टाइटल है कंसर्निंग जस्टिस यानी कि न्याय से संबंधित। तो दूसरा पॉइंट यहां पर
यह आता है कि द रिपब्लिक में 10 चैप्टर्स हैं और जो द रिपब्लिक है इसको पॉलिटिकल फिलॉसोफी और पॉलिटिकल थ्योरी के ऊपर बोथ
इंटेलेक्चुअली और हिस्टोरिकली फंडामेंटल वर्क माना जाता है। यानी कि मोस्ट इनफ्लुएंशियल वर्क माना जाता है। प्लेटो
ने द रिपब्लिक में हाईलाइट किया है कैलीपॉलिस को जो कि प्लेटो के द्वारा बताया गया एक यूटोपियन सिटी स्टेट है यानी
कि काल्पनिक [संगीत] नगर राज्य है। हाइपोथेटिकल सिटी स्टेट है जिसको कि फिलॉसोफर किंग के द्वारा रूल किया जाएगा।
दूसरी अहम बात यह है कि इस सेमिनल वर्क में प्लेटो ने डिस्कस किया है [संगीत] थ्योरी ऑफ फॉर्म्स को, इम्मोर्टलिटी ऑफ द
सोल को और इन्होंने इसमें यह भी बताया कि सोसाइटी में फिलॉसोफर्स की क्या भूमिका होती है। लेकिन इन सबसे भी बढ़कर प्लेटो
ने इस कृति में यह बताया कि व्हाट इज जस्टिस? अर्थात न्याय क्या है? यही प्लेटो की द रिारी पब्लिक का मूलभूत प्रश्न
[संगीत] है। अगला पॉइंट यह आता है कि यह जो बुक है यह मेनली डिस्कस करती है एथिक्स [संगीत] एंड पॉलिटिक्स को और इन्होंने यह
भी बताने की इसमें कोशिश की कि फिलॉसोफर्स कौन होते हैं? उनकी ड्यूटीज क्या होती है? और सबसे बड़ी बात यह भी है कि ग्रीक
लैंग्वेज में रिपब्लिक का मतलब होता है पॉलिथिया अर्थात पॉलिटिकल सिस्टम जिसको आप हिंदी में कहते हैं राज व्यवस्था।
प्रोफेसर डनिंग ने प्लेटो के आइडियल स्टेट को रोमांस कहा। वहीं दूसरी तरफ रूसो ने द रिपब्लिक को कहा अ ग्रेट ट्रिटाइज ऑन
एजुकेशन और यहां से इन्होंने इंस्पायर होकर द इमाइल नामक बुक रूसो ने लिखी थी। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि इंडिया के
फॉर्मर प्रेसिडेंट डॉ. जाकिर हुसैन ने द रिपब्लिक को उर्दू में ट्रांसलेट किया एज रियासत। तो जितने भी यह सारे फैक्ट्स हैं
आप इनको अच्छे से याद करें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बेहद इंपॉर्टेंट है। अपनी प्रमुख कृति जिसका टाइटल था अ हिस्ट्री ऑफ
वेस्टर्न फिलॉसोफी जो कि 1945 को पब्लिश होती है। इस कृति में ब्रिटेन रसेल ने द रिपब्लिक के तीन इंपॉर्टेंट पार्ट्स की
डिस्कस की। यानी कि इन्होंने तीन पार्ट्स में द रिपब्लिक को आइडेंटिफाई किया। जिसमें पहला पार्ट आता है बुक एक से बुक
पांच तक। तो इसमें बेसिकली इन्होंने एक ऐसी आइडियल [संगीत] कम्युनिटी जो कि एक यूरोपियन है उसकी चर्चा की है। साथ में
इन्होंने इसमें गार्डियंस का जो एजुकेशन है उसकी चर्चा की है और लास्ट में इन्होंने जस्टिस को भी इसमें डिफाइन करने
की कोशिश की है। वहीं दूसरा पार्ट आता है बुक छ से आठ। तो इसकी खास बात यह है कि इन्होंने इसमें फिलॉसोफर्स को डिफाइन किया
है कि जो फिलॉसोफर्स है वो किस तरह से इस तरह की जो कम्युनिटी है खासतौर पे जो यूटोपियन कम्युनिटी है उसके आइडियल रूलर्स
कैसे होते हैं इसको इन्होंने इसमें चर्चित [संगीत] किया है यानी कि डिस्कशन किया है। वहीं तीसरा पार्ट आता है बुक नाइन और 10।
इसमें इन्होंने डिस्कस किया है कि जो प्रैक्टिकल फॉर्म्स [संगीत] ऑफ़ गवर्नमेंट होती है उसके प्रोज़ और क्स क्या-क्या होते
हैं। प्लेटो की अगली कृति का नाम आता है द स्टेट्समैन। तो जब हम बात करते हैं इस कृति की तो [संगीत] इसकी सबसे अहम सबसे
इंपॉर्टेंट बात यह है कि इसमें प्लेटो ने स्टेट्स को क्लासिफाई [संगीत] किया है। यानी कि राज्यों का वर्गीकरण किया है।
जिसको बाद में एरिस्टोटल ने भी एक्सेप्ट किया था, स्वीकार किया था। दूसरी इसकी अहम बात यह है कि इसमें प्लेटो ने स्टेट्समैन
की डेफिनेशंस दी थी और रूल ऑफ लॉ की बात की [संगीत] थी। इसका मतलब यह है कि इन्होंने इस कृति में यह समझाने की यह
बताने की कोशिश की थी कि जो राजनेता होते हैं, राजमर्मज्ञ होते हैं, स्टेट्समैन होते हैं, कौन होते हैं? उनके काम क्या
होते हैं? और साथ में इन्होंने रूल ऑफ लॉ यानी कि कानून के शासन को भी डिफाइन किया। अगली अहम बात यह भी है कि जो द स्टेट्समैन
है इसमें इन्होंने यह बताया कि जो स्टेट्समैन होता है यानी कि राजनेता होता है उसके पास एक स्पेशल नॉलेज होनी चाहिए
जिसके द्वारा वह रूल को जस्ट तरीके से चला सके और लोगों के हित में काम कर सके और सबसे बड़ी बात यह है कि उनके पास इस तरह
की नॉलेज होना अनिवार्य है। तब जाकर ही लोगों के हित में रूल को चलाया जा सकता है। गवर्न किया जा सकता है। वहीं दूसरी
तरफ प्लेटो का अगला वर्ब आता है द लॉज़। तो द लॉज़ की पहली बात यह है कि यह प्लेटो का लास्ट और लॉन्गेस्ट डायलॉग माना जाता है।
दूसरी बड़ी बात यह है कि इस कृति में प्लेटो ने यह कहा था कि लॉ इज अ प्रोडक्ट ऑफ माइंड। इसका मतलब यह है कि जो कानून है
वह मन की उपज है। मन के द्वारा ही कानूनों का निर्माण होता है। अगली महत्वपूर्ण बात यह आती है कि यह जो सेमिनल वर्क है प्लेटो
का इसमें इन्होंने नक्सर्नल काउंसिल की अवधारणा दी थी जिसको आप हिंदी में कहते हैं श्रेष्ठ परिषद। कि [संगीत] जो यह
नक्सर्नल काउंसिल होती थी प्लेटो ने द लॉज़ में इसको मेंशन किया है। जिनका प्रमुख काम यह होता था कि जो रिसर्च होती थी
रिगार्डिंग नेचर ऑफ लॉ उसके लिए यह काम करती थी। यानी कि इसको फिलॉसोफिकल तरीके से रिसर्च करनी होती थी नेचर ऑफ लॉ के रूप
में। और कई बार यह जो काउंसिल है यह एडवाइस करती थी कि किस तरह से मैग्नीशिया में जो रूल ऑफ लॉ है यानी कि लॉज़ है उनको
इंप्लीमेंट करना है। अब हम प्लेटो की तीनों ही बुक का नटशेल में एक कंपैरिजन कर लेते हैं। तो द रिपब्लिक में इन्होंने ऐसे
स्टेट की बात की है जो यूटोपियन है यानी कि आइडियल स्टेट है। वहीं दूसरी तरफ इन्होंने द [संगीत] स्टेट्समैन में ऐसे
स्टेट की चर्चा की है जो पॉसिबल स्टेट है यानी कि संभावित राज्य हैं। वहीं इन्होंने द लॉज़ में ऐसे स्टेट [संगीत] की बात की है
जो बेसिकली रियल स्टेट है यानी कि जो वास्तविक राज्य होता है। अब हम प्लेटो के कुछ अदर इंपॉर्टेंट वर्क्स को डिस्कस कर
लेते हैं। तो इसमें पहला वर्क आता है सोक्रेटिक डायलॉग। तो इसको लिखा था प्लेटो और जेनोफेन ने। इसकी खास बात यह है कि
इसमें सोक्रेटीज के आइडियाज और उनकी फिलॉसोफी है जो उन्होंने अपने स्टूडेंट्स के साथ डिस्कस किया था। प्लेटो का अगला
इंपॉर्टेंट वर्क आता है चारमडीज। तो, इसकी सबसे बेहद इंपॉर्टेंट बात यह है कि इसमें [संगीत] प्लेटो ने सोक्रेटीज और चारडीज के
बीच हुई डिस्कशन को मेंशन किया है। जिसमें इन्होंने दो इंपॉर्टेंट कांसेप्ट की बात की है। जिसमें [संगीत] पहला आता है नो
योरसेल्फ यानी कि स्वयं को जानो। तुम्हारे जीवन का पर्पज होना चाहिए स्वयं को जानना। और दूसरा कांसेप्ट दिया है सेल्फ नॉलेज
यानी कि आत्मज्ञान। यानी कि तुम्हें स्वयं का पता होना चाहिए कि तुम कौन हो। तो यह दोनों कांसेप्ट इन्होंने सोक्रेटीज ने जो
चामंडीज के साथ शेयर किए थे, प्लेटो ने इसमें चर्चा की है। प्लेटो के अगले इंपॉर्टेंट वर्क का नाम आता है मेनो। तो
इसकी सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इसमें प्लेटो ने सोक्रेटीज और मेनो के बीच हुए डिस्कशन को मेंशन किया है। इसकी खास बात
यह है कि इसमें इन्होंने वर्चू और नॉलेज का कांसेप्ट [संगीत] दिया है। जिसके अंतर्गत इन्होंने यह कहा कि वर्चू नॉलेज
होती है। यानी कि सद्गुण ही ज्ञान है। जिसका मतलब यह है कि जो सद्गुण होता है यानी कि वर्चू होता है वह हाई मोरल
स्टैंडर्ड होता है। जिसको नॉलेज के द्वारा ही गेन किया [संगीत] जाता है और यह आत्मा की आवाज होती है। इसीलिए वर्चू नॉलेज होता
है क्योंकि नॉलेज के द्वारा ही वर्चू को कल्टीवेट किया जाता है। प्लेटो की अगली इंपॉर्टेंट किताब का नाम आता है द
सिंपोजियम। तो इसकी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इसमें प्लेटो ने सोक्रेटीज और उनके दो फेमस स्टूडेंट्स जिनके नाम थे अल्कवाइडीज
और एरिस्टोफेन उनके बीच जो लव और जो दूसरा ब्यूटी है उसके बीच जो डिस्कशन हुआ था उसको मेंशन किया है। प्लेटो की अगली किताब
का नाम है क्रिटो। तो इस किताब की खास बात यह है कि इस किताब में प्लेटो ने सोक्रेटीज की डेथ को मेंशन किया है और
इसमें सोक्रेटीज का जो क्रिटो के साथ लास्ट डिस्कशन था उसको भी मेंशन किया है। परमंडीज भी प्लेटो का एक इंपॉर्टेंट वर्क
रहा है। जिसमें प्लेटो ने सोक्रेटीज और उनके दो प्रमुख शिष्य जिनके नाम थे जेनो और परमंडीज उनके साथ थ्योरी ऑफ आइडिया के
ऊपर डिस्कशन किया है। प्लेटो की अगली किताब का नाम आता है फाइदो। तो इस किताब की खास बात यह है कि इसमें प्लेटो [संगीत]
ने सोक्रेटीज की डेथ को एक्सप्लेन किया है। वहीं दूसरा पॉइंट यह है कि इसमें सोक्रेटीज का जो लास्ट डिस्कशन रहा सोल
एंड कांसेप्ट के ऊपर इसकी भी प्लेटो ने इसमें चर्चा की है। वहीं विचारणीय बात यह है कि इस किताब में प्लेटो ने सॉक्रेटीज
का जो थीवंस सीव्स और सिमियास [संगीत] के साथ इमोटलिटी ऑफ सोल के ऊपर जो डिस्कशन हुआ था उसकी इन्होंने डिटेल में चर्चा की
है। वहीं प्लेटो का अगला वर्क आता है टीमियस। [संगीत] तो इस किताब की खास बात यह है कि इसमें सोक्रेटीज का जो डिस्कशन
हुआ था कीमियस और क्रिटियास के साथ ओरिजिन ऑफ लाइफ एंड यूनिवर्स के ऊपर उसको इन्होंने इसमें मेंशन किया है। प्लेटो के
अगले इंपॉर्टेंट वर्क का नाम है फिलेबस। तो इस कृति की खास बात यह है कि इसमें प्रोटार्कस नाम का एक कैरेक्टर है जिसके
साथ सोक्रेटीज डिस्कस [संगीत] करते हैं नेचर ऑफ प्लेजर विज़डम एंड गुड के ऊपर। प्लेटो की नेक्स्ट किताब आती है फाइदेरस।
तो इस किताब की खास बात यह है कि इसको प्लेटो के द्वारा लिखा गया एक महत्वपूर्ण डायलॉग माना जाता है जिसमें प्लेटो ने
चर्चा की है सोक्रेटीज और फाइदेरस के बीच हुए डायलॉग [संगीत] या फिर डिस्कशन की। इसको 370 बीसी में तब लिखा गया था जब
प्लेटो [संगीत] ने द रिपब्लिक और सिंपोजियम जैसी महान कृतियों का सृजन किया था। इसकी खास बात यह है कि इसमें प्लेटो
[संगीत] ने जो इरोटिक लव है और आर्ट ऑफ रेटोरिक है उसको एक्सप्लेन किया है। मतलब जब आपका लव फिजिकली ज्यादा रहता है या फिर
लस्टफुल रहता है तो उसको आप इरोटिक लव कहते हैं। वहीं दूसरी तरफ आर्ट ऑफ रेटोरिक की जब आप बात करते हैं तो इसमें आपके पास
बोलने की ऐसी कला होती है कि लोगों को आप अपने शब्दों से लुभाते हैं, इंप्रेस करते हैं। इसमें दूसरा पॉइंट प्लेटो ने यह
डिस्कस किया [संगीत] कि मैटम साइकोसिस जो होता है यानी कि ग्रीक ट्रेडिशन ऑफ़ जो रीइकारनेशन है उसको इन्होंने इसमें
[संगीत] कहीं ना कहीं डिस्कस किया है। जैसा कि आप इंडिया में भी इस कांसेप्ट को देख सकते हैं। और तीसरा इसमें जो आत्मा की
अमरता होती है यानी कि नेचर ऑफ द ह्यूमन सोल होता है जो कि फेमसली चैरियट एलेगरी के द्वारा इसको दर्शाया गया है। रूपक रूप
में समझाया गया है। जैसा कि आपने महाभारत में अर्जुन और श्री कृष्ण के बीच भी इस तरह की चीज देखी थी। वही चीज कहीं ना कहीं
आपको सोक्रेटीज और फाइदरस के बीच दिखाई पड़ती है। प्लेटो की नेक्स्ट किताब का नाम आता है क्रिटलस। तो इस किताब की खास बात
यह [संगीत] है कि प्लेटो की यह एकमात्र ऐसी किताब है जो कहीं ना कहीं एक्सक्लूसिवली लैंग्वेज के ऊपर और इसके जो
रिलेशंस [संगीत] होते हैं रियलिटी के साथ उसके ऊपर यह लिखी गई है। तो इसका जो स्पेसिफिक टॉपिक है वो
है करेक्टनेस ऑफ नेम्स यानी कि जो नाम होते हैं उसकी जो करेक्टनेस होती है उसके ऊपर यह लिखी गई है। अगली महत्वपूर्ण बात
यह है कि जो यह डायलॉग है इसमें सोक्रेटीज दो लोगों के साथ जिनके नाम थे क्रिटेलस और हार्मोन जींस उनके [संगीत] साथ यह डिस्कस
करते हैं और दोनों जो यह स्टूडेंट हैं इनके यह सोक्रेटीज से पूछते हैं कि जो नाम [संगीत] होते हैं यह कन्वेंशनल होते हैं
या फिर नेचुरल होते हैं और इनकी रियलिटी के साथ क्या संबंध होते हैं? क्या इनका रोल होता है? इस तरह का डिस्कशन कहीं ना
कहीं इन दोनों छात्रों का [संगीत] सोक्रेटीज के साथ होता रहता है। प्लेटो का अगला डायलॉग आता है [संगीत] यूथ डेमस। तो
यह भी प्लेटो का एक इंपॉर्टेंट डायलॉग है जिसे 384 बीसी में लिखा गया था और इसमें प्लेटो ने प्रेजेंट किया है लॉजिकल फैलेसी
ऑफ द सोफिस्ट्स। यानी कि जो सोफिस्ट्स हैं उनकी जो लॉजिकल फैलेसीज रही है उनको इस कृति में प्लेटो ने मेंशन किया हुआ है।
प्लेटो का अगला वर्क आता है थिएटेटस। तो यह भी अगेन प्लेटो का फिलॉसोफिकल वर्क माना जाता है जिसमें प्लेटो ने नेचर ऑफ
नॉलेज को इन्वेस्टिगेट करने की कोशिश की है और इस कृति को फाउंडिंग वर्क माना जाता है एपिस्टेमोलॉजी के ऊपर। दूसरी अहम बात
यह है कि यह डायलॉग रहा है सोक्रेटीज और थिएटर्स के बीच में जिसके अंतर्गत डेफिनेशन दी गई है एपिस्टीम की और नॉलेज
की और डिस्कस किया गया है थ्री डेफिनेशन ऑफ नॉलेज को जिसमें पहली डेफिनेशन यह आती है कि नॉलेज एज नथिंग बट परसेप्शन यानी कि
ज्ञान धारणा के अलावा कुछ भी नहीं है। दूसरी इसमें आती है कि नॉलेज एज अ ट्रू जजमेंट। यानी कि जो नॉलेज होता है वो एक
सच्चे निर्णय के रूप में होता है और तीसरा कि नॉलेज [संगीत] एज अ ट्रू जजमेंट होती है विद एन अकाउंट। प्लेटो का लास्ट वर्क
आता है क्रिटियाज़। तो इस किताब की खास बात यह है कि इसमें प्लेटो ने जो आइसलैंड किंगडम अटलांटीज है [संगीत] और उनका जो
अटेमप्ट रहा था एथेंस को कॉनकर करने का उस युद्ध को इन्होंने इसमें डिस्कस किया है। हालांकि जो अटलांटिज है वो फेल रहा था
एथेंस पर विजय [संगीत] पाने के लिए। इसीलिए प्लेटो कहते हैं कि ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि उस समय एथेंस में सुव्यवस्थित
सामाजिक व्यवस्था थी। यानी कि वेल ऑर्डर सोसाइटी थी। जिसकी वजह से इसमें एथेंस जीता था। जबकि किंगडम ऑफ जो अटलांटिज है
वह हार गया था। यानी कि एथेंस के ऊपर विजय प्राप्त नहीं कर पाया था। दूसरी बड़ी बात यह है कि इस डायलॉग के मेन कररेक्टर्स
[संगीत] आते हैं क्रिटियाज, डीमियस और हर्मोक्रेट्स। ह्ना आरेंट ने प्लेटो को फिलॉसोफर ऑफ फासिस्ट कहा। वहीं मैक्सी ने
प्लेटो को फर्स्ट यूटोपियन थिंकर कहा। और कार्ल पॉपर ने अपनी प्रसिद्ध कृति द ओपन सोसाइटी एंड इट्स एनिमीज़ में हगल और
मार्क्स के साथ प्लेटो को मुक्त समाज का शत्रु कहा। तो सबसे पहले हम बात कर लेते हैं प्लेटो से जुड़े कुछ की फैक्ट्स की।
प्लेटो क्लासिकल ग्रीस के एक महान फिलॉसोफर रहे हैं। जिन्होंने 386 बीसी में एथेंस में द एकेडमी को एस्टैब्लिश किया
था। और द एकेडमी को यूरोप की फर्स्ट यूनिवर्सिटी के रूप में जाना जाता है। वहीं प्लेटो को फादर ऑफ एंशिएंट पॉलिटिकल
फिलॉसोफी के रूप में जाना जाता है। और समटाइ प्लेटो के बारे में कहा जाता है कि प्लेटो इज़ फिलॉसोफी एंड फिलॉसोफी इज
प्लेटो। अर्थात प्लेटो ही दर्शन है और दर्शन ही प्लेटो है। और प्लेटो को फादर ऑफ आइडियलिज्म के रूप में जाना जाता है।
क्योंकि सबसे पहले प्लेटो ने ही आइडिया और कॉन्शियसनेस की बात की थी। और आगे चलकर उनसे कांट और हीगल जैसे विचारकों ने
प्रेरणा लेते हुए आइडियलिज्म को आगे बढ़ाया था। वहीं इन्होंने डेमोक्रेसी को ओपनली क्रिटिसाइज किया क्योंकि इनका मानना
था कि डेमोक्रेसी फैक्शनलिज्म को बढ़ावा देता है। वहीं इन्होंने यह भी कहा कि डेमोक्रेसी की वजह से ही उनके महान गुरु
सोक्रेट्स की हत्या कर दी गई थी। और इन्होंने कहा कि आइडिया यूनिवर्स का सार होता है। क्योंकि आईडिया की वजह से ही यह
यूनिवर्स यह दुनिया चलायमान हैं। और इन्होंने कहा कि हमें एक फिलॉसोफर किंग की जरूरत पड़ती है क्योंकि फिलॉसोफर किंग ही
गुड सोसाइटी को या फिर अच्छी सोसाइटी को बढ़ावा देता है। इसी वजह से इन्होंने मोनार्की को एडवोकेट किया था। जिसमें
इन्होंने कहा कि मोनार्की एक फिलॉसोफर किंग के द्वारा ही चलायमान की जानी चाहिए। इनकी एक इंपॉर्टेंट कोटेशन रही है जिसमें
यह कहते हैं कि द स्टेट इज रिटलार्ज ऑफ इंडिविजुअल। इसमें यह कहते हैं कि राज्य व्यक्ति का एक बहत रूप होता है। अर्थात
राज्य व्यक्तियों से ही मिलकर बना होता है। और इन्होंने कहा कि मुझे एक सिटी ऑफ हेवेंस चाहिए अर्थात स्वर्ग की नगरी चाहिए
जिसके लिए इन्होंने एक आइडियल स्टेट की अवधारणा दी जो कि इन्होंने सॉक्रेट से ग्रहण की और इन्होंने एक इंपॉर्टेंट
कांसेप्ट दिया जिसे इन्होंने सॉक्रेट से ही ग्रहण किया था जिसका नाम है वर्चू इज नॉलेज अर्थात सद्गुण ही ज्ञान है और इनका
जो रूल है या फिर जो गवर्न सिस्टम है उसको कहा जाता है रीज़नेबल अथॉरिटेरियन इन्होंने कहा कि स्टेट क्राफ्ट इज एन
आर्ट। अर्थात जो शासन कला होती है, वह वास्तव में एक कला होती है जो कि केवल फिलॉसोफर किंग के पास ही मौजूद होती है।
और प्लेटो को फर्स्ट सिस्टेटिक थिंकर के रूप में भी जाना जाता है और प्लेटो ने एक इंपॉर्टेंट कोट दी जिससे आप यह अंदाजा लगा
सकते हैं कि वे डेमोक्रेसी से कितनी नफरत करते थे। इन्होंने कहा कि टिरनी नेचुरली अराइज़ेस आउट ऑफ डेमोक्रेसी। अर्थात जो
तानाशाह है या फिर निरंकुशता है वह प्राकृतिक रूप से डेमोक्रेसी से ही निकल कर आती है। यानी कि खुद ब खुद डेमोक्रेसी
से निरंकुशता प्रकट हो जाती है। ऐसा मानना प्लेटो का था। और मैक्सी जैसे विचारकों ने प्लेटो को
फर्स्ट यूटोपियन थिंकर कहा है। अपने इंपॉर्टेंट वर्क द ओपन सोसाइटी एंड इट्स एनिमीज़ में कार्ल पॉपर लिखते हैं कि
प्लेटो मुक्त समाज के दुश्मन हैं। अकॉर्डिंग टू पॉपर प्लेटो, हगल और मार्क्स फ्री सोसाइटीज के दुश्मन हैं। इसी वजह से
प्लेटो को कंसीडर किया जाता है फोरमोस्ट थिंकर ऑफ ऑथॉरिटेरियनिज्म। यानी कि सर्वसत्तावाद के इनको अग्रदूत के रूप में
देखा जाता है। और कार्ल पॉपर ने इनको अर्थात प्लेटो को फर्स्ट फास्टिस्ट थिंकर इन द वर्ल्ड भी कहा है। वहीं हन्ना आरंट
ने इनको फिलॉसोफर ऑफ फासिस्ट कहा है। और डनिंग ने प्लेटो के स्टेट को रोमांस कहा है। वहीं सेबाइन ने प्लेटो के स्टेट को
यूटोपिया कहा है। वहीं सेबाइन ने प्लेटो के फिलॉसोफर किंग को एनलाइटन टिरनी कहा है। और एनलाइटन टिरनी क्यों कहा है?
क्योंकि प्लेटो का जो फिलॉसोफर किंग है वह पूरी तरह से एनलाइटन है। अर्थात वह सच को जानता है। रियलिटी को जानता है। वह यह भी
जानता है कि न्याय क्या है? अन्याय क्या है? सत्य क्या है? शुभ क्या है? इसीलिए वह पूरी तरह से जागृत है। यानी कि एनलाइटन
है। और टिरनी इसलिए है क्योंकि वह सर्वोच्च है। वह अपनी मनमर्जी कर सकता है। तानाशाह स्थापित कर सकता है। इसी वजह से
सेवाइन जैसे विचारकों ने प्लेटो के फिलॉसफर किंग को एनलाइटन टिनी कहा। वहीं जे जे रूसो ने कहा कि रिपब्लिक इज अ
ट्रीटी नॉट ऑन गवर्नमेंट बट ऑन एजुकेशन। तो इन्होंने कहा कि जो रिपब्लिक है वो एक ट्रीटी है। एक समझौता है लेकिन वो सरकार
पर नहीं एजुकेशन पर है। और सेबाइन ने कहा कि एन आइडियल स्टेट इज प्लेटोस सेकंड बेस्ट। अर्थात आइडियल जो स्टेट है वह
प्लेटो का दूसरा सबसे प्रसिद्ध या फिर दूसरा सबसे अच्छा राज्य है। प्लेटो ने डिडक्टिव मेथड अपनी फिलॉसोफी में यूज़
किया। डिडक्टिव का मतलब होता है कि जो कॉमन से जो है स्पेसिफिक की तरफ आना। अर्थात जो चीज जनरलाइज्ड हो चुकी है वहां
से कॉमन की तरफ आना। और इसका उदाहरण देते हुए प्लेटो ने खुद कहा था कि मान लीजिए इस संसार में सारे लोग मर जाते हैं। मनुष्य
जाति का नाश हो जाता है तो प्लेटो भी तो मर जाएगा ना। प्लेटो जिंदा नहीं रहेगा। तो इन्होंने इस प्रकार से डिडक्टिव मेथड का
एक एग्जांपल दिया था। प्लेटो ने कहा कि राजा डॉग सोल्जर की भूमिका निभाएगा। और प्लेटो ने यह भी कहा कि उसका जो राजा होगा
वह एक प्रकार से पायलट होगा। यानी कि लोगों को लीड करेगा। जैसे कि हमारे देश में राष्ट्रपति भी होता है। राष्ट्रपति
देश का पहला नागरिक होता है और प्लेटो को माना जाता है कि उन्होंने सबसे पहले डायलेक्टिक मेथड का यूज किया था द
रिपब्लिक में। हालांकि यह विधि इन्होंने सबसे पहले सॉक्रेट से ही ग्रहण की थी क्योंकि सॉक्रेट ने ही इसे उनसे पहले यूज़
किया था। जब सॉक्रेट्स अपने स्टूडेंट्स के साथ मिलकर डायलॉग करते थे, डिस्कशन करते थे। वहीं इन्होंने टिलियोलॉजिकल मेथड और
एनालॉजी जैसी विधि का भी प्रयोग किया। टिलियोलॉजी का मतलब होता है उद्देश्यवाद। अर्थात जब आप किसी उद्देश्य तक पहुंचने के
लिए मोरालिटी या फिर रियलिटी, नॉलेज जैसे तत्वों का सहारा लेते हैं तो उसे हम टिलियोलॉजिकल मेथड कहते हैं। और एनालॉजी
का मतलब होता है जब दो समान चीजों के बीच हम तुलना करते हैं तो उसे हम एनालॉजी कहते हैं। जैसे उदाहरण के लिए अगर किसी लड़की
का चेहरा बहुत सुंदर होता है तो उसकी तुलना हम चांद से कर देते हैं। तो उसी प्रकार से
प्लेटो ने भी एथेंस में एक ऐसे आइडियल स्टेट की कल्पना की थी जिसकी तुलना एक सिटी ऑफ हवन या फिर जो ह्यूबन स्टेट है
उससे की जा सके और इन्होंने नॉर्मेटिव स्कूल ऑफ पॉलिटिकल फिलॉसोफी को स्थापित किया और इन्होंने दो
प्रकार के वर्ल्ड की बात की। पहला है वर्ल्ड ऑफ आइडियाज और दूसरा है मटेरियलिस्टिक वर्ल्ड। वर्ल्ड ऑफ आइडियाज
बेसिकली एक ऐसी दुनिया है जहां पर रियलिटी होती है। जहां पर ऐसे लोग रहते हैं जो सच को जानते हैं। रियलिटी को जानते हैं जो
आत्मा से जुड़ते हैं और मटेरियलिस्टिक जो दुनिया है उससे कट जाते हैं। और मटेरियलिस्टिक वर्ल्ड का मतलब है कि जब हम
इस दुनिया में रहते हैं जो हमें दिख रही होती है जो रियलिटी नहीं है। जिसमें हम परिवार के साथ हम फैमिली के साथ रहते हैं।
हम मटेरियलिस्टिक चीजों को लेते हैं, देते हैं तो उसे मटेरियलिस्टिक वर्ल्ड कहा जाता है। और इन्होंने कहा कि आइडिया इज
परमानेंट अर्थात जो विचार है वो अमर है। वो हमेशा रहता है। लाइक मनु इन्होंने भी वर्क स्पेशलाइजेशन की थ्योरी दी। और सबसे
बड़ी बात यह है कि इन्होंने द लॉस में एक नटर्नल काउंसिल की बात की जो कि लॉ से जुड़ी हुई है और इनकी जो थ्योरी है वो
इंडिविजुअल के अगेंस्ट मानी जाती है क्योंकि इन्होंने हमेशा अपनी फिलॉसोफी में ड्यूटीज की बात की फंक्शनंस की बात की
राइट्स की बात नहीं की। और सबसे बड़ी बात यह है कि जो दालज है वह ग्रीक भाषा के शब्द डिकायासून से मिलकर बना है। जिसका
नाम या फिर जिसका मतलब होता है राइटियसनेस। और इन्होंने डॉक्टर्स और लॉयर्स जो
इंस्टीटशंस है या फिर पद है उसकी इन्होंने पूरी तरह से निंदा की। इन्होंने बोला कि हमें एक ऐसा राज्य बनाना है जहां पर कोई
लोग रोग से पीड़ित ना हो। जहां पर कोई अन्याय ना हो। जहां पर लोग आपस में लड़े ना। इसीलिए हमें डॉक्टर्स और लॉयर्स की भी
जरूरत नहीं है। प्लेटो के वक्स को हम मेनली तीन भागों में बांटते हैं। पहला पार्ट है इनके कुछ सेमिनल वक्स जैसे द
रिपब्लिक, द लॉज़, द स्टेट्समैन। वहीं दूसरी कैटेगरी में आते हैं इनके कुछ सोक्रेटिक डायलॉग्स। यह डायलॉग्स ऐसे हैं
जो सुकरात और उनके शिष्यों के बीच हुए हैं जिन्हें प्लेटो ने लिखा है। इनमें प्रमुख आते हैं एपोलॉजी, क्रिटो, चारमडीज, लेक्स,
एथिप्रो, लाइसिस एंड प्रोटागोरस। वहीं तीसरी कैटेगरी में आते हैं इनके कुछ अदर वक्स जैसे सिमपोजियम, यूथिमस, पेहडो,
गॉर्जियस, मिनो, टाइमियस, फिलवस, मिनेक्सनस एंड हाइपियस। तो ये कुछ इनके इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं जो कि एग्जाम के
दृष्टि से बहुत ही इंपॉर्टेंट हैं। अब हम बात कर लेते हैं इनकी थ्योरी ऑफ टाइप्स ऑफ गवर्नमेंट। बेसिकली इन्होंने छह प्रकार के
गवर्नमेंट्स की बात की हैं। जिनमें सबसे पहली आती है मोनार्की, दूसरे में आती है ओलगार्की, तीसरे में आती है
एरिस्टोक्रेसी, चौथे में आती है प्लूटोक्रेसी और पांचवें में आती है टिरनी और छठे में आती है डेमोक्रेसी। अगर हम बात
करें मोनार्की की तो मोनार्की को इन्होंने सबसे बेस्ट फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट कहा है क्योंकि इन्होंने बोला कि मोनार्की जिसको
हम हिंदी में राजतंत्र कहते हैं ये फिलॉसोफर किंग के द्वारा रूल्ड होगा जहां पर आइडियल स्टेट की स्थापना की जाएगी।
वहीं अगर हम बात करें डेमोक्रेसी की तो डेमोक्रेसी को इन्होंने वर्स्ट फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट कहा है। इन्होंने बोला है कि
डेमोक्रेसी सबसे खराब और गंदा शासन होता है। और ऐसा इन्होंने इसलिए बोला क्योंकि इन्होंने बोला कि जो डेमोक्रेसी होती है
वो मूर्खों का शासन होती है। गधों या फिर सूअरों का शासन होता है। इसी वजह से इन्होंने डेमोक्रेसी की आलोचना की और
डेमोक्रेसी की आलोचना इन्होंने इस वजह से भी क्यों? क्योंकि उनका मानना था कि सुकरात जैसे महान फिलॉसफर को डेमोक्रेसी
की वजह से ही मृत्यु के घाट उतार दिया गया था। तो अब हम बात कर लेते हैं प्लेटो की एक इंपॉर्टेंट थ्योरी जिसका नाम है
एलिगोरी ऑफ द केव। लेकिन अगर आप इस वीडियो को डिटेल में समझना चाहते हैं तो आप इस वीडियो को जरूर देख सकते हैं क्योंकि
मैंने इस वीडियो को पहले ही बनाया है। आप आई बटन पर क्लिक करके या फिर वीडियो के एंड में लिंक प्राप्त करके इस वीडियो को
देख सकते हैं। तो प्लेटो ने ही एक प्रमुख थ्योरी एलिगरी ऑफ़ द केव दी है। जिसमें प्लेटो यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि
केव जो है वह वास्तव में एक ऐसी पोजीशन है जहां पर हम अंधकार में रहते हैं। जहां पर हम रियलिटी को नहीं देख पाते हैं। तो इस
थ्योरी के माध्यम से प्लेटो ने केव को एक संकेत दिया है। यानी कि केव के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि जो केव है
वो इल्यूजन की दुनिया है। भ्रम की दुनिया है। यानी कि जो केव में जब हम रहते हैं यानी कि अंधकार में जब हम रहते हैं तो उसी
पोजीशन में जब हम रहते हैं तो उसको ही हम सब कुछ समझ लेते हैं और रियलिटी को महसूस नहीं कर पाते हैं। तो प्लेटो कहते हैं कि
जो केव है बेसिकली एक उपमा है। यानी कि केव के माध्यम से हमें अपनी पोजीशन समझनी है। किस तरह से हम अंधकार में रहते हैं।
प्लेटो कहते हैं कि जो केव है वह बेसिकली हमारी जो दुनिया में जो बिलीफ होते हैं और ओपिनियन होते हैं उसका एक नाम है और यह
कहते हैं कि यह ऐसी दुनिया है जहां पर हमारी जो लाइफ है कंफर्टेबल है और उस कंफर्टेबल लाइफ से हम बाहर नहीं निकलना
चाहते हैं। क्योंकि हमें ये लगता है कि जिस केव में या फिर जिस इग्नोरेंस की पोजीशन में हम रह रहे हैं वही हमारे लिए
सब कुछ है। लेकिन प्लेटो कहते हैं कि अगर हमें इस रियलिटी को जानना है यानी कि बाहर की दुनिया को हमें जानना है कि बाहर भी
दुनिया है, सूर्य हैं, धरती है, सुंदर नदी, नाले, झरने हैं। यानी कि इस दुनिया की रियलिटी को देखना है। तो प्लेटो कहते
हैं कि एक आदमी को फोर्सफुली बाहर निकालना होगा या फिर एक आदमी को बाहर आना होगा। लेकिन प्लेटो कहते हैं कि ऐसा कौन करेगा
और कैसे होगा? तो प्लेटो कहते हैं कि ऐसा एजुकेशन के द्वारा होगा। जब एजुकेशन एक फिलॉसोफर के द्वारा दी जाएगी तो ऐसी
स्थिति में जो लोग हैं यानी कि जो केवर्स हैं जो अंधकार में रह रहे हैं वो धीरे-धीरे बाहर आने लगेंगे। तो प्लेटो आगे
कहते हैं कि जब एक आदमी बाहर आएगा या उसे फोर्सफुली बाहर लाया जाएगा तो वो रियलिटी को नहीं देख पाएगा। यानी कि बाहर की जो
दुनिया है उसको नहीं देख पाएगा। क्यों? क्योंकि वह हमेशा से अंधकार में रहा है और उसकी आंखें उस लाइट उस हरीभरी दुनिया को
नहीं देख पाएगी। लेकिन प्लेटो यह कहते हैं कि धीरे-धीरे उसकी जो आंखें हैं वह एडजस्ट कर लेगी और वह रियलिटी को देख पाएगा। ऐसी
स्थिति में प्लेटो यह भी कहते हैं कि फिर वह अब क्या करेगा कि वह अब केवर्स के जो आदमी हैं उनके पास जाएगा। उनको रियलिटी
बताने की कोशिश करेगा। लेकिन प्लेटो कहते हैं कि वे लोग उसका कहना नहीं मानेंगे बल्कि उसे उल्टा मारने लगेंगे। तो प्लेटो
कहते हैं कि ऐसी स्थिति में जो वो व्यक्ति जिसने रियलिटी को देखा है वह अब व्यक्ति नहीं बल्कि वो फिलॉसोफर बन गया है। तो
प्लेटो कहते हैं कि ऐसी स्थिति में वो फिलॉसोफर अब प्यार से उन्हें नहीं समझाएगा बल्कि उनके ऊपर फोर्स का प्रयोग करेगा और
ऐसा इसलिए है क्योंकि प्लेटो ये कहते हैं कि अगर वो प्यार से उन्हें समझाने की कोशिश करेगा तो उल्टा उसके साथ वो होगा जो
एथेंस में सॉकेट के साथ हुआ था। इसीलिए प्लेटो कहते हैं कि अब वो जो फिलॉसोफर है वो उनके ऊपर फोर्स का प्रयोग करके उन्हें
उस अंधकार से या फिर केव से बाहर निकालेगा और रियलिटी दिखाएगा। तो ऐसी स्थिति में वो जो फिलॉसोफर है अब वो फिलॉसोफर नहीं है
बल्कि वो अब फिलॉसोफर किंग बन जाता है। फिलॉसोफर इसलिए क्योंकि वो रियलिटी को जानता है। वो सच को जानता है कि रियलिटी
क्या है और किंग इसलिए क्योंकि उसके पास अब पावर है। वह फोर्स का प्रयोग करके लोगों को कंट्रोल कर सकता है। अब हम बात
कर लेते हैं प्लेटो की जस्टिस थ्योरी की। लेकिन प्लेटो कहते हैं कि इससे पहले कि हम यह बताएं कि न्याय क्या है? जस्टिस क्या
है? हमें इससे पहले यह समझना होगा कि न्याय क्या नहीं है यानी कि व्हाट इज नॉट जस्टिस। तो इसके लिए प्लेटो सबसे पहले
ट्रेडिशनल थ्योरी ऑफ जस्टिस लेते हैं। जिन्हें कि सैफल्स और उनके पुत्र पॉलीमार्कस ने प्रतिपादित किया था। तो
इसमें सबसे पहले सैफल्स कहते हैं कि जस्टिस लाइ इन स्पीकिंग द ट्रुथ एंड पेइंग योर डेप्स। तो पहले सैफल्स कहते हैं कि
न्याय का मतलब है सच बोलना और अपने कर्जों को यानी कि ऋण को चुकाना। और दूसरी यह परिभाषा देते हैं गिविंग एवरीवन व्हाट
ड्यू टू हिम। यानी कि यह कहते हैं कि न्याय प्रत्येक व्यक्ति को उसका भाग या फिर हक देने में है। और वहीं पॉलीमार्कस
कहते हैं कि जस्टिस लाइ इन डूइंग गुड टू वंस फ्रेंड एंड हार्म टू वंस एनिमी। तो पॉलीमार्कस कहते हैं कि न्याय एक ऐसी
अवधारणा है जिसमें हम मित्रों के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और जो दुश्मन होते हैं उनके साथ बुरा व्यवहार करते हैं।
लेकिन प्लेटो इसको पूरी तरह से रिजेक्ट कर देते हैं। प्लेटो कहते हैं कि अगर हम न्याय को इस तरह से देखें तो यह न्याय
नहीं बल्कि अन्याय है। क्योंकि इसमें विरोधी कार्य की संभावना बनी रहती है और सबसे बड़ी बात है कि इस तरह का न्याय
अनुभव के द्वारा अर्जित नहीं है। और प्लेटो यह भी कहते हैं पॉलीमार्कस के विचार के बारे में कि मित्र तथा शत्रु की
पहचान करना बहुत ही कठिन है। और यह भी कहते हैं प्लेटो कि इसमें बुरे को और अत्यधिक बुरा बनाया जाता है। और यह एक
राज्य का न्याय ना होकर व्यक्तिवादी है। जो कि न्याय कभी भी व्यक्तिवादी नहीं होता है। न्याय तो सिर्फ एक अंतरात्मा की आवाज
है जो स्वाभाविक है जो नैतिक है। प्लेटो अगला सिद्धांत लेते हैं प्रगमेटिक थ्योरी ऑफ जस्टिस जिसे ग्लूकॉन ने दिया है। तो
ग्लूकोन कहते हैं कि जस्टिस इज द इंटरेस्ट ऑफ द वीकर यानी कि न्याय हमेशा से कमजोर वर्ग का हित होता है। यह बात ग्लूकॉन करते
हैं। लेकिन प्लेटो इसको भी रिजेक्ट करते हैं क्योंकि प्लेटो कहते हैं कि न्याय किसी भी समझौते का परिणाम नहीं होता है और
ना ही न्याय समाज पर कोई लादी गई वस्तु है बल्कि प्लेटो यह कहते हैं कि न्याय अंतरात्मा की आवाज होती है और न्याय ना ही
भय की उपज होती है और ना ही न्याय की पालना भय के कारण की जाती है बल्कि न्याय तो स्थाई है और परिवर्तनशील भी नहीं है
बल्कि अपरिवर्तनशील है क्योंकि इससे पहले ग्लूकोन ने यह कहा था कि जस्टिस इज़ अ सोशल कॉन्ट्रैक्ट दैट इमर्ज बिटवीन पीपल हु आर
रफली इक्वल इन पावर। सो नो वन इज़ एबल टू ऑप्रेस द अदर्स सिंस द पेन ऑफ सफरिंग इन जस्टिस आउटवेट्स द बेनिफिट ऑफ कमिटिंग इट।
तो ग्लूकोन कहते हैं कि न्याय की जो स्थापना हुई है वह सोशल कॉन्ट्रैक्ट के द्वारा हुई है। जिसमें दो ऐसे लोग या फिर
दो ऐसे वर्ग जिनके पास बराबर शक्ति है जो एक दूसरे का ऑपरेस या फिर दमन नहीं कर सकते हैं उनके बीच हुआ ताकि वे उस
इनजस्टिस से या फिर अन्याय से होने वाले नुकसान से बच सके। लेकिन प्लेटो इन सभी को रिजेक्ट कर देते हैं। न्याय से जुड़ी हुई
तीसरी अवधारणा दी है थ्रेसीमक्स ने जिसे हम कहते हैं रेडिकल थ्योरी ऑफ जस्टिस। थसीमक्स कहते हैं कि जस्टिस इज ऑलवेज द
इंटरेस्ट ऑफ द स्ट्रांगर। अर्थात न्याय हमेशा से ही शक्तिशाली लोगों का हित होता है। दूसरी कोटेशन यह देते हैं जिसमें यह
कहते हैं कि इनजस्टिस इज बेटर देन जस्टिस। यानी कि अन्याय न्याय से अच्छा होता है। लेकिन प्लेटो इसको भी पूरी तरह से रिजेक्ट
कर देते हैं। प्लेटो कहते हैं कि न्याय कभी भी शक्तिशाली लोगों का हित नहीं होता है। क्योंकि अगर ऐसा होगा तो फिर जो कमजोर
लोग हैं उनका क्या होगा? वहीं प्लेटो यह भी कहते हैं कि यह समाज का सिद्धांत नहीं है जो सिद्धांत थ्रेसीमक्स ने दिया है।
वहीं प्लेटो यह भी कहते हैं कि अन्याय न्याय से अच्छा नहीं हो सकता है क्योंकि अन्याय के बिना कोई भी राज्य विकास नहीं
कर सकता है। आइडियल स्टेट की स्थापना नहीं की जा सकती है। तो इन सभी या फिर इन तीनों थ्योरीज को प्लेटो ने पूरी तरह से रद्द
किया है। प्लेटो द रिपब्लिक में जस्टिस का आईडिया देते हुए पहले वाले जो नोशंस थे न्याय के बारे में उनको रिजेक्ट करते हैं
और कहते हैं कि जस्टिस इज नॉट द रिजल्ट ऑफ सोशल कॉन्ट्रैक्ट यानी कि न्याय सामाजिक समझौते का परिणाम नहीं है और प्लेटो कहते
हैं कि न्याय स्ट्रांगर का इंटरेस्ट नहीं होता है अर्थात शक्तिशाली लोगों का हित नहीं होता है। प्लेटो कहते हैं कि न्याय
भय की उपज भी नहीं है और कभी भी अन्याय न्याय से बेहतर नहीं हो सकता है। तो प्लेटो कहते हैं कि जस्टिस अंतरात्मा की
आवाज होती है जो कि नेचुरल है, मोरल है और प्लेटो कहते हैं कि जस्टिस आइडियल स्टेट का वर्चू होता है यानी कि सद्गुण होता है
और बिना न्याय के आदर्श राज्य काम नहीं कर सकता है। अस्तित्व में नहीं रह सकता है। तो अब जो मैं आपको बताने जा रहा हूं इसको
थोड़ा सा ध्यान से सुनिए क्योंकि इसको बिना समझे और सुने आप प्लेटो के जस्टिस के कांसेप्ट को अच्छे से नहीं समझ सकते हैं।
प्लेटो तीन प्रकार की क्लासेस की बात करते हैं जिनमें रूलर, सोल्जर और आर्टिशंस आते हैं। प्लेटो कहते हैं कि रूरल के पास अनेक
मेटल, वर्चू और सोल जैसे चीजें होती है। जिनमें रूलर की अगर हम बात करें तो इनकी जो मेटल होती है वो होती है गोल्ड। यानी
कि जिस तरह से गोल्ड की हाई क्वालिटी या फिर कीमत होती है उसी तरह से जो रूलर होते हैं वे गोल्ड के मेटल से बने होते हैं। और
इनके पास वर्चू होती है विज़डम यानी कि विवेक और सोल होती है रैशन। यानी कि इनके पास तार्किकता होती है। अच्छे बुरे की समझ
होती है और इनके पास आइडिया होता है गुड। वहीं सोल्जर की अगर हम बात करें तो प्लेटो कहते हैं कि यह सिल्वर मेटल से बने होते
हैं। जिनके पास करज यानी कि साहस होता है। इनके पास स्पिरिट होती है और इनके पास ऑनर यानी कि सम्मान का आईडिया होता है। और
आर्टिशंस की अगर हम बात करें तो इनके पास कॉपर का गुण होता है। यानी कि ये कॉपर मेटल से बने होते हैं। इनके पास टेंपपरेंस
होता है। और सोल की अगर हम बात करें तो इनके पास एपटीट्यूड होता है यानी कि शुद्धा यानी कि भूख होता है। और इसके लिए
ये इनके पास जो आईडिया होता है वो मनी का होता है। यानी कि ये पैसे के लिए ही काम करते हैं, व्यापार करते हैं, कृषि करते
हैं। तो अगर आप प्लेटो के इस कांसेप्ट को थोड़ा सा ध्यान से देखो तो ये हिंदू फिलॉसोफी से भी मिलता-जुलता है। क्योंकि
मनु की अगर हम बात करें या फिर हिंदू फिलॉसोफी की अगर हम बात करें, तो उसमें भी यह मान्यता है कि जो हिंदू फ़िलॉसोफी में
चार वर्ण हैं, उसमें ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से निकले हैं। क्षत्रिय भुजाओं से निकले हैं। वहीं जो वैश्य हैं वो झंघा से
निकले हैं और शूद्र पांव से निकले हैं। तो उसी तरह का जो मिलताजुलता दोनों का कांसेप्ट है जो कि बहुत ही इंपॉर्टेंट है
एग्जाम की दृष्टि से। प्लेटो का जस्टिस का कांसेप्ट तीन प्रिंसिपल्स पर आधारित है। जिनमें प्रमुख है नॉन इंटरफेरेंस, वर्क
स्पेशलाइजेशन और हार्मोनी। नॉन इंटरफेरेंस में प्लेटो कहते हैं कि इसमें कोई भी वर्ग यानी कि तीनों वर्ग में से एक दूसरे के
कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। वर्क स्पेशलाइजेशन का मतलब यह है कि तीनों वर्ग अपने-अपने काम में ही निपुण होंगे। अर्थात
जिनका जिस काम में स्किल है वह वर्ग या फिर उस वर्ग से संबंधित लोग वही काम करेंगे। और हार्मोनी का मतलब है कि राज्य
में सामंजस्य बनाया रखा जाएगा। यानी कि लोग आपस में मेल मिलाप से रहेंगे। दुश्मनी से नहीं रहेंगे। एकता की भावना से रहेंगे।
प्लेटो के जस्टिस की कुछ इंपॉर्टेंट विशेषताएं हैं। जैसे इंटरनल यानी कि प्लेटो का जो जस्टिस है वह आंतरिक है।
आत्मा से जुड़ा हुआ है। दूसरा है वर्क स्पेशलाइजेशन। यानी कि जिस-जिस काम में जिस व्यक्ति की स्पेशलाइजेशन है यानी कि
स्किल है वही काम व्यक्ति करेगा। फिर प्लेटो कहते हैं कि नॉन इंटरफेरेंस यानी कि कोई भी व्यक्ति एक दूसरे के कार्य में
हस्तक्षेप नहीं करेगा। वही प्लेटो के लिए न्याय है। और अगला है हार्मोनी एंड यूनिटी। यानी कि पूरा समाज सामंजस्य पूर्ण
भावना से रहेगा। मेल मिलाप से रहेगा। एकता की भावना से रहेगा। वहीं अगला है बेस्ड ऑन मोरालिटी। यानी कि जो न्याय है वो नैतिकता
के सिद्धांत पर आधारित है। और दूसरी सबसे इंपॉर्टेंट बात है कि जो न्याय का कांसेप्ट है वो इंडिविजुअल के अगेंस्ट है।
क्यों? क्योंकि प्लेटो ने हमेशा से ड्यूटीज पर फोकस किया है। इंडिविजुअल के जो राइट्स है उनके ऊपर फोकस नहीं किया है।
फिलॉसोफर किंग यानी कि सबसे बड़ी बात है कि जस्टिस फिलॉसोफर किंग के बिना नहीं हो सकता है। क्योंकि फिलॉसोफर किंग के साथ ही
आइडियल स्टेट की उत्पत्ति होती है और आइडियल स्टेट में ही केवल न्याय संभव है। थ्योरी ऑफ़ कम्युनिज्म यानी कि जस्टिस तभी
होगा जब कम्युनिज्म की थ्योरी होगी। यानी कि राजा और जो सैनिक है वो प्रॉपर्टी और वाइब्स यानी कि पत्नियों से और घर परिवार
से दूर रहेंगे। वहीं अगला है डिसेंट्रलाइज्ड पावर यानी कि शक्तियों का बंटवारा होगा। राजा के पास यानी कि जो
रूलर क्लास है उनके पास अलग शक्तियां होंगी। मिलिट्री जो मैन है उनके पास अलग पावर्स होंगी और जो आर्टिशियन क्लास है
उनके पास अलग पावर होंगी। अगला है इक्वल राइट टू वुमेन। और ये सबसे इंपॉर्टेंट कांसेप्ट माना जाता है। और इसी वजह से
प्लेटो को फेमिनिस्ट या फिर फर्स्ट फेमिनिस्ट थिंकर भी माना जाता है। क्योंकि इन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति चाहे वो
पुरुष हो या फिर महिला हो दोनों में से फिलॉसफर किंग बन सकता है। सोल्जर बन सकते हैं। आर्टिजन बन सकते हैं। बस शर्त इतनी
है कि उनके अंदर अलग-अलग क्लास में बनने के लिए या फिर राजा या फिर आर्टिजन या फिर सोल्जर बनने के लिए अलग-अलग योग्यताएं
होनी चाहिए। और अगला नोशन है बेस्ड ऑन ड्यूटीज क्योंकि यह कर्तव्यों पर आधारित है। और अगला है कंसर्न विद ऑल एस्पेक्ट्स
ऑफ लाइफ। यानी कि प्लेटो का जो जस्टिस है, न्याय है वो जिंदगी के हर पहलुओं से चाहे वह राजनीतिक हो, सामाजिक हो, आर्थिक हो,
सांस्कृतिक हो, आध्यात्मिक हो, नैतिक हो, सभी पहलुओं से जुड़ा है। अब हम बात कर लेते हैं प्लेटो और मनु के जो क्लास के
बारे में या फिर वर्णना के बारे में जो विचार रहे हैं, उसका हम एक दृष्टि में कंपेयर करते हैं कि मनु वर्णना के बारे
में क्या कहते हैं और प्लेटो क्लास सिस्टम के बारे में क्या कहते हैं। तो बेसिकली मनु ने चार प्रकार की क्लासेस या फिर
वर्णास की बात की है जिसमें प्रमुख है ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रा। वहीं दूसरी तरफ प्लेटो ने बात की है तीन
प्रकार के क्लासेस की जिनमें आते हैं रूलर्स, सोल्जर्स, आर्टिशंस एंड वर्कर्स। वहीं अगर मनु की हम दूसरी तरफ बात करें तो
मनु का जो बनना सिस्टम है वो जन्म पर आधारित है। यानी कि स्किल और फंक्शनंस पर आधारित नहीं है। वहीं प्लेटो की अगर हम
बात करें क्लास सिस्टम की तो ये स्किल्स और फंक्शन पर आधारित है। और दूसरी सबसे इंपॉर्टेंट बात जो मनु की दृष्टि से वर्णन
सिस्टम के बारे में वह यह है कि इनका जो वर्णन सिस्टम है वह बहुत ही रिजिड यानी कि कठोर है क्योंकि नॉन चेंजबल है। इसको बदला
नहीं जा सकता है। यहां तक कि लोग अपने वर्ण को अपनी स्किल और एजुकेशन के द्वारा भी नहीं बदल सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ अगर
हम प्लेटो की बात करें तो यह बहुत कम कठोर है यानी कि लेस रिजिड है। क्यों? क्योंकि यह चेंजबल है। लोग अपनी स्किल और एजुकेशन
के द्वारा अपने क्लास को बदल सकते हैं। यानी कि अगर किसी व्यक्ति के पास स्किल है तो वह राजा भी बन सकता है। किसी के पास
लड़ने की स्किल है तो वह सोल्जर बन सकता है। किसी के पास व्यापार या फिर काम करने की स्किल है तो वह आर्टिस्ट बन सकता है।
वहीं मनु की अगर हम बात करें तो यह स्ट्रेंथन करता है सोसाइटी को। ऐसा मानना मनु का है और ये धर्म को बनाए रखता है।
यानी कि जो धर्म होता है उसको मेंटेन रखता है क्योंकि इस तरह से सामाजिक जो व्यवस्था है वो सुचारू रूप से चलती है और लोग आपस
में मिश्रित नहीं होते हैं। इसी वजह से जो सोशल सिस्टम है वो बनाए रहता है और धर्म की स्थापना विद्यमान रहती है। वहीं दूसरी
तरफ प्लेटो की अगर हम बात करें तो प्लेटो कहते हैं कि अगर अच्छे तरीके से क्लास सिस्टम होगा यानी कि तीनों कैटेगरी के लोग
अपने-अपने काम करेंगे। हस्तक्षेप नहीं करेंगे तो ऐसी स्थिति में आइडियल स्टेट बहुत व्यापक मात्रा में फलेगा फूलेगा यानी
कि स्ट्रांग होगा और जस्टिस जो है हमेशा से स्थापित किया जाएगा। तो यह है एक छोटा सा कंपेयर मनु का वर्णना सिस्टम और प्लेटो
का क्लास सिस्टम। प्लेटो ने एक आइडियल स्टेट की अवधारणा दी है जिसे ग्रीक भाषा में कैलिपोलिस कहा जाता है। कैलिपोलिस
ग्रीक शब्द है जो कि ग्रीक के दो शब्दों के मेल से बना है। कैलस कैलोस का मतलब होता है ब्यूटी अर्थात सौंदर्य और पॉलिश
का मतलब होता है सिटी स्टेट। यानी कि कैलीपॉलिस एक ऐसा राज्य है, एक ऐसा सिटी स्टेट है जो बहुत ही सुंदर है, ब्यूटीफुल
स्टेट है या फिर एक आइडियल स्टेट है। तो प्लेटो कहते हैं कि कैलपोलिस को इसीलिए स्थापित करना जरूरी है क्योंकि करप्टेड जो
एथेंस है उसको आइडियल सिटी में बदलना है। वहीं प्लेटो ने यह भी कहा कि आइडियल स्टेट की स्थापना के लिए हमें तीन प्रकार की
रेवोलशंस को लाना पड़ेगा। जिनमें प्रमुख है इक्वल राइट्स टू वुमेन कम्युनिज्म ऑफ प्राइवेट प्रॉपर्टी एंड फैमिली रूल ऑफ द
फिलॉसोफर किंग। वहीं द रिपब्लिक में प्लेटो यह भी कहते हैं कि एक आदर्श राज्य के चार बेसिस या फिर फोर एलिमेंट्स होते
हैं। जिनमें प्रमुख है जस्टिस, एजुकेशन, कम्युनिज्म ऑफ प्रॉपर्टी एंड वाइब्स एंड फिलॉसफर किंग। वहीं प्लेटो ने एक
इंपॉर्टेंट कोटेशन दी है या फिर अपना एक मत दिया है जिसमें प्लेटो कहते हैं कि एन आइडियल स्टेट विल रूल ओनली बाय द फिलॉसोफर
किंग यानी कि आदर्श राज्य को एक फिलॉसफर किंग के द्वारा ही शासित किया जाएगा। प्लेटो ने स्टेट के बारे में एक
इंपॉर्टेंट कोटेशन दी जिसमें कहते हैं कि द स्टेट इज रिट लार्ज ऑफ इंडिविजुअल। यानी कि जो राज्य है वह व्यक्ति का बृहत रूप
होता है। व्यक्तियों के मेल से ही राज्य बनता है। इस प्रकार से राज्य व्यक्तियों का एक विशालतम रूप होता है। तो अब हम
प्लेटो के आइडियल स्टेट की कुछ इंपॉर्टेंट फीचर्स को भी देख लेते हैं। तो पहली फीचर है रूल्ड बाय द फिलॉसफर किंग। यानी कि
प्लेटो का जो आदर्श राज्य होगा उसको फिलॉसफर किंग के द्वारा रूल्ड किया जाएगा। दूसरी विशेषता है स्टेट कंट्रोल एजुकेशन
यानी कि राज्य ही शिक्षा का प्रबंध करेगा और तीसरी विशेषता है कि राज्य ही आर्ट और लिटरेचर का भी प्रबंध करेगा। चौथी विशेषता
है कि स्टेट एक प्राकृतिक इंस्टीट्यूशन प्लेटो बताते हैं और इन्होंने ऑर्गेनिक थ्योरी ऑफ़ द आइडियल स्टेट दी। इन्होंने
कहा कि जिस प्रकार से हमारी बॉडी डिफरेंट-डिफरेंट ऑर्गन्स के मेल से बनती है, उसी प्रकार स्टेट भी बनता है। अर्थात
इन्होंने भी मनु की तरह या फिर कौटिल्य की तरह यह कहा या फिर एरिस्टोटल की तरह यह कहा कि स्टेट एक उस तरह से बनता है जिस
तरह से एक बॉडी डिफरेंट-डिफरेंट अंगों से मिलके बनती है। ऑर्गन से मिलकर बनती है। तो इन्होंने कहा कि जस्टिस हो गया,
फिलॉसोफर किंग हो गया या फिर सोल्जर हो गए, आर्टिशंस हो गए। ये डिफरेंट-डिफरेंट क्लासेस है जिनके मेल से ही एक आइडियल
स्टेट बनता है। छठा है स्टेट इज अ मोरल इंस्टीट्यूशन। नैतिक संस्था है। अगली इनकी विशेषता है इक्वल राइट्स टू वुमेन। यानी
कि इन्होंने पुरुषों के समान महिलाओं को भी अधिकार दिए। इसी वजह से कभी कभार इनको फर्स्ट फेमिनिस्ट थिंकर के नाम से भी जाना
जाता है। और इन्होंने वर्क स्पेशलाइज़ेशन की बात की। इन्होंने कहा कि तीनों वर्गों को अपने-अपने क्षेत्र में काम करना होगा।
जिसजिस में वे कुशलता प्राप्त करते हैं। यानी कि इनके पास स्किल है। अगला है सोवनिटी ऑफ द किंग। इन्होंने कहा कि राजा
संप्रभु होगा। और अगली विशेषता है कम्युनिज्म ऑफ प्रॉपर्टी एंड वाइब्स। यानी कि जो आर्मी मैन है या फिर जो किंग है
यानी कि गार्डियंस है वे अपनी पत्नियों से दूर रहेंगे। प्रॉपर्टी और परिवार से दूर रहेंगे। और इन्होंने कहा कि कानून और
पनिशमेंट के लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि इनका स्टेट आइडियल स्टेट होगा। जहां पर सिर्फ न्याय होगा जहां पर लोग सदाचार से
रहेंगे। इसीलिए वहां पर ना कानूनों की जरूरत पड़ेगी, ना पनिशमेंट की जरूरत पड़ेगी, ना डॉक्टर की जरूरत पड़ेगी और ना
ही वकीलों की जरूरत पड़ेगी। और लास्ट विशेषता आइडियल स्टेट की है। जस्टिस इज पॉसिबल इन द आइडियल स्टेट। और ये कहते हैं
कि जो जस्टिस है वो केवल और केवल आइडियल स्टेट में ही पॉसिबल है। यानी कि आदर्श राज्य में ही संभव है। अब हम प्लेटो के
आइडियल स्टेट के ऊपर कुछ कमेंट्स को देख लेते हैं। तो सबसे पहले डनिंग कहते हैं कि प्लेटो का जो स्टेट है वो रोमांस है। वहीं
सेबाइन कहते हैं कि प्लेटो का स्टेट यूटोपिया है। और सेबाइन ने तो यह भी कहा कि एन आइडियल स्टेट इज प्लेटोस सेकंड
बेस्ट। अब बात कर लेते हैं प्लेटो के फिलॉसोफर किंग की। तो प्लेटो ने द रिपब्लिक के छठे यूनिट में फिलॉसोफर किंग
की बात की है। तो प्लेटो सबसे पहले हमें यह बताते हैं कि हमें फिलॉसोफर किंग की जरूरत क्यों है? तो प्लेटो कहते हैं कि
हमें फिलॉसोफर इन की तीन वजह से जरूरत है। पहली वजह है कि जो करप्टेड एथेंस था उसको एक आइडियल सिटी में बदलना है और ऐसा काम
सिर्फ और सिर्फ फिलॉसफर किंग ही कर सकता है। दूसरा तथ्य इन्होंने दिया एस्टैब्लिशमेंट ऑफ द आइडियल स्टेट यानी कि
कैलीपॉलिस की स्थापना करनी है और कैलीपॉलिस को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका फिलॉसफर किंग ही निभा सकता है। और
तीसरी बात इन्होंने की एस्टैब्लिशमेंट ऑफ़ स्ट्रांग एंड स्टेबल मोनार्किक रिज़म यानी कि एक ऐसे राजतंत्र की स्थापना करना जो
स्ट्रांग तो है लेकिन साथ में स्थिर भी है और स्थिर भी होगा और स्ट्रांग भी होगा अगर फिलॉसोफर किंग के द्वारा ही ऐसा मोनार्किक
रिजीम रूल्ड किया जाएगा। तो प्लेटो ने एक इंपॉर्टेंट कोटेशन दी जिसमें यह कहते हैं कि रूलर इज़ द
एंबोडीमेंट ऑफ द ह्यूमन माइंड। तो यह कहते हैं कि मानवीय आत्मा का प्रतीक राजा होता है, शासक होता है।
तो इनकी एक और इंपॉर्टेंट कोटेशन रही है जिसमें यह कहते हैं कि अ वॉशरमैन एंड कॉबलर कांट बी अ किंग। यह कहते हैं कि कोई
धोबी और मोची राजा नहीं बन सकता है। राजा अपनी योग्यता, अपनी स्किल और हायर एजुकेशन के आधार पर ही बनेगा।
तो अब प्लेटो यह सवाल करते हैं कि फिर कौन फिलॉसफर किंग होगा? यानी कि ऐसी कौन सी विशेषताएं एक व्यक्ति में एक फिलॉसोफर में
होगी जो उसे एक फिलॉसोफर किंग बनाएगा। तो प्लेटो मनु की तरह कहते हैं कि स्टेट रूल्ड बाय द फिलॉसफर किंग इज अ डिवाइन
इंस्टीट्यूशन। यानी कि राजा के द्वारा जो स्टेट रूल्ड किया जाता है, शासित किया जाता है, वह बेसिकली ऐसा इंस्टीट्यूशन एक
डिवाइन इंस्टिट्यूशन होता है। दैय संस्था होती है। क्यों? क्योंकि राजा खुद दैय गि गुणों का प्रतीक होता है। इसीलिए प्लेटो
मनु की तरह कहते हैं कि जो स्टेट या जो राज्य एक राजा के द्वारा शासित किया जाएगा वो अपने आप में एक डिवाइन इंस्टीट्यूशन
होगा। तो प्लेटो ने एक राजा की या फिर फिलॉसोफर किंग की कुछ क्वालिटीज का जिक्र किया है। जैसे लवर ऑफ विज़डम। दूसरा
इन्होंने कहा फॉलोअर ऑफ ट्रुथ यानी कि सत्य को चाहने वाला हो। फिर इन्होंने कहा सेल्फ कंट्रोल उसके अंदर आत्मनियंत्रण हो
यानी कि मोह माया में वह ना पड़े। आगे कहा लवर ऑफ जस्टिस यानी कि न्यायप्रिय होना चाहिए और फ्री फ्रॉम सेल्फिशनेस और
इन्होंने कहा कि काम नेचर भी एक राजा का होना चाहिए। और इन्होंने कहा कि राजा के पास विज़डम यानी कि अच्छी मेमोरी होनी
चाहिए। और इन्होंने कहा कि कम्युनिज्म ऑफ वाइब्स एंड प्रॉपर्टी। तो अगर आप ध्यान से देखो शुरू के जो सात विशेषताएं एक राजा के
लिए फिलॉसफर किंग के लिए जो प्लेटो ने बताई वह बिल्कुल कौटिल्य और मनु से मिलती है। हां आठवां जो पॉइंट है कम्युनिज्म ऑफ
वाइब्स एंड प्रॉपर्टी यह हिंदू फिलॉसोफी या फिर जो मनु के विचार है या फिर कौटिल्य के विचार है उससे डायरेक्टली नहीं मिलती
है। हालांकि इनडायरेक्टली जरूर मिलता है क्योंकि मनु भी और कौटिल्य भी यह कहते हैं कि राजा भोग विलासी ना हो।
प्लेटो का जो एजुकेशन प्रोसेस है वह बहुत ही लंबा है। प्लेटो कहते हैं कि एक जो राजा होगा जब उसको एजुकेशन दी जाएगी तो
उसको हम चार भागों में बांटते हैं। पहली होगी प्राइमरी एजुकेशन जो कि 0 साल से 20 साल के बीच होगी। उसके बाद हायर एजुकेशन
होगी जो 20 से 30 साल के बीच चलेगी और उसके बाद फाइनल एजुकेशन होगी जो 30 से 35 वर्षों के बीच चलेगी और फिर लास्ट में
ट्रेनिंग होगी जो कि 35 से 50 साल के बीच होगी। तो सबसे पहले प्लेटो बात करते हैं प्राइमरी एजुकेशन की। तो यह कहते हैं कि
प्राइमरी एजुकेशन का उद्देश्य कैरेक्टर बिल्डिंग होगा। वहीं यह कहते हैं कि फिजिकल एजुकेशन बॉडी के लिए दी जाएगी और
माइंड के लिए म्यूजिक दिया जाएगा। प्लेटो कहते हैं कि 18 से 20 साल के बीच व्यक्ति को या फिर लोगों को जो एजुकेशन प्राप्त कर
रहे हैं उनको मिलिट्री ट्रेनिंग दी जाएगी। और फिर प्लेटो कहते हैं कि 20 साल की उम्र में एक एलिमिनेशन टेस्ट होगा। जो इस टेस्ट
में फेल होगा उसे वॉरियर या फिर प्रोड्यूसर क्लास में काम करना होगा और जो पास होगा उसे आगे की हायर एजुकेशन के लिए
भेज दिया जाएगा। तो प्लेटो कहते हैं कि जो 20 साल का का की अवस्था में जो एलिमिनेशन टेस्ट होता है उसमें जो पास होगा उसे फिर
आगे की जो हायर एजुकेशन है उसके लिए भेज दिया जाएगा। और प्लेटो कहते हैं कि इस अवस्था में यानी कि एलिमिनेशन टेस्ट को
पास करने के बाद हायर एजुकेशन में उसे मैथ्स, मोरल साइंस, एस्ट्रोलॉजी एंड फिलॉसोफी जैसी शिक्षा दी जाएगी। और प्लेटो
कहते हैं कि 30 की अवस्था में फिर दूसरा एक एलिमिनेशन टेस्ट होगा। और जो इस टेस्ट में फेल होगा उसे फिर ऑर्डिनरी ऑफिसर्स
बना दिया जाएगा। यानी कि ब्यूरोक्रेट्स वगैरह छोटे-छोटे जो ऑफिसर्स होते हैं उन्हें बना दिया जाएगा।
और प्लेटो कहते हैं कि जो इस दूसरे एलिमिनेशन टेस्ट में पास होगा उसे फाइनल एजुकेशन के लिए भेज दिया जाएगा। तो प्लेटो
कहते हैं कि जो फाइनल एजुकेशन होगी वह सबसे इंपॉर्टेंट है क्योंकि इसी एजुकेशन की वजह से कोई एक व्यक्ति फिलॉसफर बनता
है। क्यों? क्योंकि ऐसी एजुकेशन में उसे जस्टिस, लॉजिक, फिलॉसोफी, एजुकेशन ऑफ डायलेक्टिक्स जैसी अनेकों शिक्षाएं दी
जाती है और इन्हीं शिक्षा की वजह से वो सत और शुभ का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। यानी कि रियलिटी को जान लेता है। सच को देख
लेता है और इस प्रकार से वह इस दुनिया की जो अल्टीमेट रियलिटी है उसको जान लेता है और वह फिलॉसोफर बन जाता है। तो लास्ट में
प्लेटो कहते हैं कि फिर 35 से 50 की अवस्था के बीच अब एक जो फिलॉसोफर है उसको राजा बनने की ट्रेनिंग दी जाएगी। उसे शासन
चलाना सिखाया जाएगा। और प्लेटो कहते हैं कि उसे प्रैक्टिकल नॉलेज भी दी जाएगी। शासन की राज्य की या फिर वर्ल्डली जो
अफेयर है उसको उसे प्रैक्टिकल नॉलेज से अवगत कराया जाएगा। और प्लेटो कहते हैं कि 50 की उम्र आते-आते ही एक जो फिलॉसोफर है
वह फिलॉसफर किंग बनेगा और रूल को चलाएगा। प्लेटो ने कहा है कि फिलॉसोफर किंग कैन बी मेक ओनली थ्रू द हाई एंड गुड क्वालिटी ऑफ
एजुकेशन सिस्टम। तो प्लेटो कहते हैं कि जो फिलॉसफर किंग है वह केवल अच्छी और उच्च क्वालिटी की जो एजुकेशन सिस्टम है, उसके
द्वारा ही बनाया जा सकता है। यह कोई धोबी और मोची कोई फिलॉसफर किंग नहीं बन सकता है। यह बात प्लेटो करते हैं। तो प्लेटो ने
बेसिकली जो एक फिलॉसोफर किंग होता है उनके तीन फंक्शनंस की बात की है। जिनमें पहला है टू मैनेज क्लास फंक्शनंस एंड जस्टिस।
यानी कि जो डिफरेंट-डिफरेंट क्लासेस होती है उनके कार्य और न्याय को बनाए रखना। एक राजा का काम होता है। एक फिलॉसफर किंग का
सबसे पहला फंक्शन होता है। दूसरा फंक्शन है टू मैनेज एन आइडियल एजुकेशन सिस्टम फॉर अपकमिंग रूलर्स। यानी कि जो आने वाले जो
शासक हैं जो भविष्य में जिनका निर्माण होना है उनके लिए भी एक अच्छा एजुकेशन सिस्टम तैयार करना। और तीसरा फंक्शन है एक
फिलॉसफर किंग का कंट्रोल ओवर द रिलीजियस फेथ। यानी कि जो धार्मिक मामले होते हैं उनके ऊपर भी एक राजा या फिलॉसोफर किंग
नियंत्रण स्थापित करेगा। अब बात कर लेते हैं कि प्लेटो का जो फिलॉसोफर किंग है उसकी क्या पोजीशन है? तो
अगर पोजीशन की बात हम करें तो प्लेटो का जो फिलॉसोफर किंग है वो टिरनी होता है। यानी कि उसके पास तानाशाह होती है। उसके
पास असीमित शक्तियां होती है। इसी वजह से सेबाइन ने प्लेटो के फिलॉसोफर किंग को कहा एनलाइटन टिरनी। एनलाइटन का मतलब होता है
प्रबुद्ध। यानी कि वो रियलिटी को जानता है। इसीलिए एनलाइटन है। सत्य को वो जानता है। और टिरनी क्यों है? क्योंकि उसके पास
बल है, शक्ति है। इसीलिए वो सेबाइन के शब्दों में एनलाइटन टिरनी है। वहीं प्लेटो का जो रूल है और गवर्न सिस्टम है उसको
जाना जाता है रीज़नेबल अथॉरिटेरियन। और कार्ल पॉपर जैसे विद्वानों ने प्लेटो को फर्स्ट फासिस्ट इन द वर्ल्ड कहा है। वहीं
हना आरंट ने भी उसे फिलॉसफर ऑफ फासिस्ट कहा है। और दूसरा पॉइंट है अनलिमिटेड पावर्स ऑफ द फिलॉसफर किंग। क्योंकि
फिलॉसोफर किंग के पास असीमित शक्तियां होती है। इसीलिए उसकी जो पोजीशन है वो तानाशाह वाली होती है। इसी वजह से ह्ना
आरंट ने उसे फिलॉसोफर ऑफ फास्टेस्ट कहा। अब हम प्लेटो की स्कीम ऑफ एजुकेशन को थोड़ा सा डिटेल में पढ़ लेते हैं, समझ
लेते हैं। और इसके लिए हमें दो मॉडल लेने हो गए। पहला एथेनियन मॉडल और दूसरा स्पार्टन मॉडल। और इन दोनों मॉडल्स की
हमें आपस में तुलना करनी है। अर्थात प्लेटो के अकॉर्डिंग एथेंस में किस तरह की एजुकेशन सिस्टम था और स्पार्ट में किस तरह
का एजुकेशन सिस्टम था। इसमें हमें कंपैरेटिवली स्टडी करनी है। तो सबसे पहले अगर हम बात करें एथेनियन मॉडल की तो यह
फैमिली कंट्रोलोल्ड एजुकेशन सिस्टम था। यानी कि परिवार के द्वारा ही नियंत्रित एजुकेशन सिस्टम था। दूसरी तरफ स्पार्टन
अगर मॉडल की हम बात करें तो वहां पर स्टेट कंट्रोलोल्ड एजुकेशन सिस्टम था। एथेन मॉडल में कोई स्टेट का कोई इंटरफेरेंस नहीं था।
वहीं स्पार्टन में फैमिली का किसी भी तरह का कोई इंटरफेरेंस नहीं था। उदाहरण के लिए हम यह समझ सकते हैं कि एथेंस में जो
एजुकेशन है वह फैमिली के द्वारा निर्धारित की जा सकती थी। वहीं स्पार्ट में जो एजुकेशन सिस्टम है, वह राज्य के द्वारा
निर्धारित किया जाता था। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि एथेंस में जो सिलेबस था वह बड़ा कंप्रहेंसिव था। प्राइमरी एजुकेशन छ
से 14 साल के बीच थी। मिडिल एजुकेशन 14 से 18 साल के बीच थी और वहां पर कंपलसरी मिलिट्री जो एजुकेशन थी वो 2 साल के लिए
थी 18 से 20 वर्ष के बीच। वहीं स्पटा के दूसरी तरफ अगर हम बात करें तो सिलेबस बड़ा लिमिटेड था। प्राइमरी एजुकेशन छ से 14,
मिडिल एजुकेशन 14 से 18 और कंपलसरी मिलिट्री ट्रेनिंग वहां पर थी 7 साल के लिए और 18 से 20 साल की जो अवस्था है वह
वहां पर कंपलसरी मिलिट्री ट्रेनिंग थी। लेकिन एक व्यक्ति को 7 साल के लिए अनिवार्य रूप से मिलिट्री सेवा देनी पड़ती
थी और यह दोनों ही मैन और वुमेन के लिए कंपलसरी था। दूसरी तरफ अगर हम बात करें एथेन मॉडल ऑफ
एजुकेशन की तो वहां पर एजुकेशन का एम जो है वह सिक्योरिटी ऑफ द स्टेट नहीं था लेकिन स्पार्ट में एजुकेशन का एम
सिक्योरिटी ऑफ द स्टेट था। रूसू लिखते हैं कि रिपब्लिक इज अ ट्रीटी नॉट ऑन गवर्नमेंट बट ऑन एजुकेशन। रिपब्लिक एक संधि है। एक
समझौता है सरकार के ऊपर नहीं बल्कि एजुकेशन के ऊपर, शिक्षा के ऊपर। वहीं प्लेटो लिखते हैं कि एजुकेशन इज़ द
प्राइमरी फंक्शन ऑफ द स्टेट। तो प्लेटो का जो एजुकेशन मॉडल है उसकी अनेकों विशेषताएं हैं। पहली विशेषता है लाइफ लॉन्ग प्रोसेस
यानी कि जीवन भर चलने वाला प्रोसेस है। जीरो साल से ले 50 साल तक एक व्यक्ति को एजुकेशन ही प्राप्त करनी होती है। तब जाके
वह फिलॉसोफर बनता है। दूसरी विशेषता है स्टेट कंट्रोल। प्लेटो चाहते थे कि जो शिक्षा है वह राज्य के द्वारा नियंत्रित
हो। तीसरी विशेषता है ओवरऑल डेवलपमेंट। यानी कि एक जो व्यक्ति है उसका बहुमुखी और चुमुखी विकास हो। अगली विशेषता है एनहांस
स्टेट सिक्योरिटी यानी कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे राज्य की जो सुरक्षा है उसको बढ़ोतरी मिले। उसको बल मिले। डिवीजन ऑफ
एजुकेशन इन्होंने एजुकेशन का बंटवारा किया दो भागों में। एलिममेंट्री एजुकेशन छ से 20 साल और दूसरी हायर एजुकेशन 20 से 35
वर्ष। प्लेटो कहते हैं कि एक सिस्टमेटिक एजुकेशन सिस्टम होना चाहिए। प्लेटो यह भी कहते हैं
कि जो एजुकेशन है वह सभी के लिए कंपलसरी है क्योंकि शिक्षा से ही लोगों में सद्गुण और ज्ञान की प्राप्ति होती है और प्लेटो
कहते हैं कि इक्वल टू बोथ मैन एंड वुमेन यानी कि एजुकेशन महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए बराबर रूप से उपलब्ध होनी चाहिए।
एम ऑफ एजुकेशन इज जस्टिस। और सबसे इंपॉर्टेंट पॉइंट प्लेटो देते हैं कि एजुकेशन का जो ऐ होता है वो न्याय को
बढ़ावा देना है। सत्य की प्राप्ति करना है। रियलिटी की प्राप्ति करना है। और प्लेटो कहते हैं कि मैनेज्ड बाय द
फिलॉसोफर किंग। यानी कि जो एजुकेशन है वो मैनेज की जाएगी फिलॉसोफर किंग के द्वारा। अब हम बात कर लेते हैं प्लेटो की स्कीम ऑफ
कम्युनिज्म ऑफ वाइब्स एंड प्रॉपर्टी। और यह सबसे अजीबोगरीब धारणा रही है इनकी। जहां एक तरफ प्लेटो कहते हैं कि एजुकेशन
इज द प्राइमरी फंक्शन ऑफ स्टेट। यानी कि सबसे पहला कर्तव्य राज्य का एजुकेशन को प्रोवाइड कराना है। वहीं दूसरी तरफ कहते
हैं कि एक राज्य के लिए राजाओं का और जो वॉरियर क्लास है उनके लिए कम्युनिज्म ऑफ वाइब्स और प्रॉपर्टी करना भी बहुत जरूरी
है। तो प्लेटो का जो स्कीम है कम्युनिज्म ऑफ वाइब्स एंड प्रॉपर्टी उसकी अनेकों विशेषताएं हैं। जिनमें पहली विशेषता है
गार्डियन एंड ऑगिलरी क्लास विल नॉट हैव एनी प्राइवेट प्रॉपर्टी। जो गाइड गार्डियन है या फिर संरक्षक वर्ग है या फिर जो हायर
क्लास के लोग हैं, मिलिट्री क्लास के लोग हैं उनके पास प्रॉपर्टी जैसी कोई चीज नहीं होगी। दूसरी विशेषता यह है कि दे विल
आल्सो हैव नॉट एनी फैमिली। और उनके पास किसी भी तरह का कोई परिवार नहीं होगा। वे अपना परिवार नहीं बनाएंगे। और प्लेटो कहते
हैं कि इंस्टीट्यूशन ऑफ फैमिली अबोलिश्ड फॉर गार्डियन एंड वॉरियर क्लास। और ये कहते हैं कि जो राजा होता है, संरक्षक
वर्ग होता है, योद्धा की जो क्लास होती है, सैनिक होते हैं, उनके पास भी किसी तरह की कोई फैमिली की इंस्टिट्यूशन नहीं होगी।
यानी कि परिवार से वो पूरी तरह से दूर रहेंगे। और प्लेटो सबसे इंपॉर्टेंट धारणा देते हैं यूजेनिक्स की। और यह कहते हैं कि
यूजेनिक्स की तरह ही लोग रहेंगे। यानी कि यूजेनिक्स की धारणा की पालना लोग करेंगे। बेसिकली यूजेनिक्स एक ऐसी धारणा है जिसमें
जो लोग हैं लोगों की जो जेनेटिक क्वालिटी है उसको सुधारने का प्रयत्न किया जाता है जिसमें हष्टपुष्ट बुद्धिमान स्त्री पुरुष
मिलके आपस में संभोग करते हैं या फिर फिजिकल एक्टिविटी करके संतानों को जन्म देते हैं। वहीं प्लेटो यह भी कहते हैं कि
बेस्ट ऑफ मैन मेड टू मेड विद बेस्ट ऑफ वुमेन यानी कि जो अच्छा पुरुष होगा जिसके पास अच्छी बुद्धि होगी जिसका शरीर
हष्टपुष्ट होगा और दूसरी तरफ जो महिला विवेकपूर्ण होगी जिसके पास अच्छी बॉडी होगी अच्छा शरीर होगा वे आपस में मिलेंगे
फिजिकल एक्टिविटीज करके बच्चे को जन्म देंगे और यह प्लेटो कहते हैं कि स्टेट विल फिक्स मीटिंग सीजन और प्लेटो कहते हैं कि
ऐसा जो सीजन है यानी कि स्त्री पुरुष का मिलने का जो समय है उसका अधिकार सिर्फ राज्य को है। राज्य ही यह तय करेगा कि कौन
सा पुरुष किस स्त्री के साथ संभोग स्थापित करेगा। फिजिकल रिलेशन बनाएगा और बच्चों को जन्म देगा। कब किस मौसम में किस दिन
स्त्री पुरुष आपस में मिलेंगे। यह सारा का सारा जो टाइम है, यह स्टेट ही फिक्स करेगा। और लास्ट में प्लेटो कहते हैं कि
सक्सेसफुल वॉरियर्स एंड रूलर्स मेड टू हैव एज मेनी चाइल्डन एज पॉसिबल। और यह कहते हैं कि जो वॉरियर होते हैं उनके पास भी
साहस होता है और जो राजा होता है उसके पास विवेक होता है, नॉलेज होती है, रियलिटी होती है। यानी कि उनकी जो बुद्धि है वे
बहुत ही स्ट्रांग होती है। उनके पास विज़डम होती है और बॉडी उनकी शक्तिशाली होती है। इसीलिए राजा और जो वॉरियर क्लास के जो लोग
हैं वे जहां तक संभव हो सके अधिक से अधिक बच्चे पैदा करेंगे ताकि राज्य में हष्टपुष्ट और बुद्धिमान बच्चे पैदा हो। द
प्रिंस निकोलो मैक्यावली द्वारा लिखित एक ऐसी बेहद इंपॉर्टेंट कृति है जिसको क्लासिकल रियलिज्म की एक आधारशिला और
मुख्य कृति मानी जाती है। लेकिन इससे पहले कि हम द प्रिंस और निकोलो मैकावली के बारे में विस्तारपूक पढ़ें। स्क्रीन पर जो आपको
कोटेशन दिखाई दे रही है, इसको थोड़ा सा डेप्थ में पढ़ लेते हैं, समझ लेते हैं। यह कहते हैं मनुष्य अपने पिता के हत्यारे को
क्षमा कर सकता है, परंतु अपनी संपत्ति छीनने वालों को नहीं। इसका मतलब यह है कि यह मनुष्य स्वभाव का नेगेटिव एक्सप्लेनेशन
करते हैं और कहते हैं कि मनुष्य स्वभाव से ही लोभी होता है, स्वार्थी होता है, लालची होता है और इतना ज्यादा होता है कि वह
अपने पिता के हत्यारे को भूल सकता है। लेकिन अगर कोई उसकी संपत्ति को छीने तो उसको कभी वह क्षमा नहीं कर सकता है। इसलिए
यह कोटेशन आपको याद रखना और समझना बहुत ही जरूरी है। ना केवल इसलिए कि यह एग्ज़ाम में बार-बार पूछी जाती है बल्कि इसलिए भी इस
कोटेशन को समझना आपके लिए बहुत ही जरूरी हो जाता है क्योंकि यह कोटेशन आपको द प्रिंस और मैकेवली के विचारों को समझने
में बहुत ज्यादा मदद कर सकती है। तो अब हम इनकी बायोग्राफी एंड लाइफ को थोड़ा सा समझ लेते हैं। यह इटली के रेनेसामैन,
डिप्लोमेट, फिलॉसोफर, राइटर और पॉलिटिकल फिलॉसोफर रहे हैं। और इनका जन्म 3 मई 1469 को इटली के फ्लोरेंस में हुआ था। और इनकी
डेथ 21 जून 1527 को इटली के फ्लोरेंस में हुई। और इनका पूरा नाम था निकोलो दाई बरनादो दाई मैकावली। और इनकी पिता का नाम
था बरनादो दाई निकोलो मैकावली। और इनकी माता का नाम था बारतोलो मया दाई स्टेफानो नैली और डनिंग ने इनको कहा है कि
मैक्यावली अपने हालात का बच्चा है और ऐसा इन्होंने इसलिए कहा क्योंकि तत्कालीन जो इटली की परिस्थितियां थी उसका इनके जीवन
पर और इनकी फिलॉसोफी पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा। चाहे वो रेनेसा हो या फिर वहां के गवर्नमेंट्स हो या फिर वहां की
दूसरी परिस्थितियां हो। इन सभी चीजों का मैक्यावली के जीवन पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा। जिसकी वजह से डनिंग ने कहा कि
मैक्यावली अपने हालात का बच्चा है। इनकी पत्नी का नाम मैरिता कोरसेनी था जिससे इन्होंने 1502 ईस्वी में शादी की और
निकोलो मैकावली को क्लासिकल रियलिज्म और क्लासिकल रिपब्लिकन से भी जोड़ा जा सकता है क्योंकि इनकी दो महत्वपूर्ण कृति पहली
द प्रिंस क्लासिकल रियलिज्म के बारे में बताती है। दूसरी द डिस्कोर्सेस क्लासिकल रिपब्लिकन के बारे में बताती है। और कई
बार इनको फ़ादर ऑफ मॉडर्न पॉलिटिकल फिलॉसोफी और मॉडर्न पॉलिटिकल साइंस भी जाना जाता है। और 29 वर्ष की अवस्था में
इन्होंने एज अ चांसलर जॉब की। उसके बाद ये 10 ऑफ़ वॉर कमेटी के मेंबर बने और ई कमेटी ऐसी थी जिसने इनकी दिशा और दशा को पूरी
तरह से परिवर्तित कर दिया और उसके बाद इन्होंने एज अ डिप्लोमेट 14 वर्षों के लिए काम किया। जहां से इन्होंने बहुत सारी
बातें सीखी और इनके चिंतन पर इस एक्सपीरियंस का इस अनुभव का बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा।
लेकिन 1513 में इटली में मेडिसी गवर्नमेंट वापस आती है और इनको जॉब से निकाल दिया जाता है और कॉनस्परेसी के केस में इनको
जेल में डाल दिया जाता है और इनको बहुत टॉर्चर किया जाता है। हालांकि बाद में इन्हें छोड़ दिया जाता है। लेकिन एक
कंडीशन तय की जाती है। इनको कहा जाता है कि वह कभी भी पब्लिक लाइफ में भाग नहीं लेंगे, हिस्सा नहीं लेंगे। तब जाकर ही
इनको छोड़ा जाता है। उसके बाद यह फिर अपने नेटिव विलेज में आ जाते हैं और वहां पर 1513 ईस्वी में द प्रिंस और द डिस्कोर्सेस
को लिखना शुरू कर देते हैं और यही दोनों कृतियां इनकी अक्षय कृतियां मानी जाती है। इनको फर्स्ट मॉडर्न थिंकर भी कहा जाता है
और इन्होंने एथिक्स को पॉलिटिक्स से पूरी तरह से अलग कर दिया। इनकी कोटेशन भी आप देख सकते हो जिसमें इन्होंने कहा है
पॉलिटिक्स हैव नो रिलेशन विद मोरल्स जिसमें यह कहते हैं कि राजनीति का मोरल्स अर्थात नैतिकता के साथ किसी भी प्रकार का
कोई संबंध नहीं है। अब हम इनके वक्स देख लेते हैं। सबसे पहली अक्षय कृति इनकी है द प्रिंस जो कि इन्होंने 1513 ईस्वी में
लिखनी शुरू कर दी थी और 1532 ईसवी को यह पब्लिश हुई थी। इसका वैसे तो कंटेंट अगर देखा जाए बहुत ही व्यापक रहा है। लेकिन
इसमें यह मूल प्रश्न करते हैं कि क्यों वंशीय राजतंत्र बेस्ट फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट है। वैसे इन्होंने इस कृति में प्रिंस को
कुछ टिप्स भी दिए हैं, कुछ सुझाव भी दिए हैं जिनको हम बाद में चलकर आगे डिस्कस करेंगे। इसके बाद इन्होंने एक और
महत्वपूर्ण कृति लिखी द डिस्कोर्सेस ऑन लिबी 1531 ईवी में और यह गणतंत्र के बारे में बता दी
है। इसका मूल प्रश्न यह है कि क्यों रिपब्लिक अर्थात किन परिस्थितियों में रिपब्लिक बेस्ट फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट है।
इसके बाद इन्होंने एक और महत्वपूर्ण कृति लिखी जिसका नाम है द आर्ट ऑफ वॉर और ये 1521 में पब्लिश हुई। इसके बाद इन्होंने
एक और राइटिंग लिखी जिसका नाम है फ्लोरेंटाइन हिस्ट्रीज। 1532 में पब्लिश हुई और इसमें इन्होंने फ्लोरेंस नगर जो है
उसकी इतिहास अर्थात हिस्ट्री के बारे में इसमें वर्णन किया है और एक और इनकी कृति रही है जिसका नाम है लाइफ ऑफ टेस्टको
टेस्टाकनी जो कि 1520 में पब्लिश हुई। तो ये थी इनकी महत्वपूर्ण कृतियां जो आपको याद रखनी है। आप इसका स्क्रीनशॉट लेके या
फिर पॉज करके आप इनको नोट कर सकते हैं। अब हम द प्रिंस की फिलॉसोफी का एनालिसिस कर लेते हैं।
तो द प्रिंस को इन्होंने 1513 ईवी में लिखना शुरू कर दिया था और 1532 ईस्वी में यह पब्लिश हुई थी। इस किताब को द आर्ट ऑफ
स्टेट क्राफ्ट के नाम से जाना जाता है क्योंकि यह शासन कला पर लिखी गई थी कि शासन को कैसे चलाया जा सकता है। इसी वजह
से इसको द आर्ट ऑफ़ स्टेट क्राफ्ट के नाम से जाना जाता है। और यह प्रेजेंट करती है थ्योरी ऑफ़ प्रिज़र्वेशन ऑफ़ स्टेट। अर्थात
यह बताती है कि स्टेट को राज्य को किस तरह से सुरक्षित रखा जा सके, संरक्षित रखा जा सके। और इसमें मैक्यावली प्रिंस को कुछ
सुझाव देता है कि पावर को कैसे गेन किया जाए, उसको स्टेबलाइज कैसे किया जाए, स्थिर कैसे रखा जाए?
और इसको बेसिकली जाना जाता है अ हैंडबुक ऑफ रियल पॉलिटिक अर्थात वास्तविक राजनीति क्या होती है? एक राजा किस तरह से राजनीति
बनाए रखता है? राजनीति या राज्य को कायम रखता है, प्राप्त करता है, शक्ति को इसके बारे में यह बताती है। इसीलिए इसको
बेसिकली अ हैंड बुक ऑफ रियल पॉलिटिक भी कहा जाता है। और यह कुछ ऐसी बुराइयों को सपोर्ट करती है। जैसे वलेंस है या फिर
कनिंगनेस है, डिसेप्शन है। इनको यह मानती है। अर्थात यह बताती है कि हिंसा, धोखेबाजी, छल यह जरूरी हैं। राज्य की पावर
को सुरक्षित रखने के लिए, राज्य को हमेशा स्थिर बनाए रखने के लिए, शक्ति को गेन करने के लिए चाहे वह हिंसा हो, धोखेबाजी
हो, छल हो। ये सारी जितनी भी ईवेल है, वह बहुत ही जरूरी है। और यह बेसिकली जो किताब है, यह क्लासिकल रियलिज्म का एक मूल आधार
है, मूल किताब है। तो, मैक्यावली ने द प्रिंस में ह्यूमन नेचर को बताया है। जिसमें वह कहते हैं कि
मनुष्य स्वभाव से ही सेल्फिश है, फिकल है, इगोस्टिक है, रन अवे फ्रॉम डेंजर है,
एग्रेसिव एंड पजेसिव है। इसका मतलब यह है कि मनुष्य स्वभाव से ही लालची है, स्वार्थी है, लोभी है, अत्याचारी है,
अहमवादी है, इगोइसिस्टिक है। और वह हमेशा डेंजर यानी कि खतरों से दूर रहना चाहता है। हमेशा कंफर्ट ज़ोन में रहना चाहता है।
एग्रेसिव है, पज़ेसिव है। अर्थात दूसरों को वह दबाना चाहता है। आक्रामक है। और मैक्यावली कहते हैं कि इन परिस्थितियों की
वजह से ही मनुष्य एक एनार्किकल सिचुएशन में फंसा होता है और कंफ्लिक्ट और कंपटीशन की भावना स्टेट या
सोसाइटी में होती है। यह कहते भी हैं कि आदमी अपने बाल बच्चों की अपेक्षा संपत्ति को ही अधिक चाहता है। तो यह दर्शाता है कि
वे ह्यूमन नेचर के बारे में नेगेटिव वर्णन करते हैं। नेगेटिव बताते हैं और यह कहते हैं कि इसी ह्यूमन नेचर की वजह से
क्फ्लिक्ट और कंपटीशन बढ़ता है और क्फ्लिक्ट और कंपटीशन की वजह से ही सिक्योरिटी और सर्वाइवल जो होता है वो
खतरे में पड़ जाती है। और जब सिक्योरिटी एंड सर्वाइवल खतरे में पड़ जाता है तो वहां पे एनार्किकल सिचुएशन हो जाती है।
अर्थात समाज में या फिर राज्य में अव्यवस्था फैल जाती है। अराजकता फैल जाती है। एनार्किकल स्थापित हो जाती है। और
मैक्यावली द प्रिंस में कहते हैं कि इसी एनार्की को दूर करने के लिए हमें एक प्रिंस एक राजकुमार की आवश्यकता होती है।
जरूरत होती है। अब जान लेते हैं कि मैक्यावली स्टेट के बारे में क्या विचार देते हैं। मैक्यावली
कहते हैं कि स्टेट में दो प्रकार के शासन पाए जा सकते हैं। एक है मोनार्की दूसरा है रिपब्लिक। वह कहते हैं कि मोनार्की में
हमेशा प्रिंस शासन करेगा। अर्थात उनका जो राजकुमार है उसका ही रूल होगा। दूसरी तरफ रिपब्लिक में पॉपुलर रूल होगा। यानी कि
लोग ही वास्तव में शासन करेंगे। लेकिन ये कहते हैं कि मोनार्की में जो शासन होगा वो राजकुमार करेगा। लेकिन वो वंशानुक्रम के
आधार पर नियुक्त होगा। फॉर एग्जांपल जैसे मैं एक राजा हूं तो मेरे बाद मेरा बेटा बैठेगा। फिर मेरा मेरे बेटे बेटे के बाद
फिर मेरा पोता राजकुमार बनेगा। तो इस तरह से जो है वह मोनार्की में अकॉर्डिंग टू मैक्यावली शासन चलता है। दूसरी तरफ वह
कहते हैं कि रिपब्लिक में लोगों की पार्टिसिपेशन होती है। अर्थात सारे लोग ही मिलकर शासन को चलाते हैं। पार्टिसिपेट
करते हैं। तो ये है मैक्यावली की सिद्धांत स्टेट के बारे में जिसमें यह कहते हैं द प्रिंस में कहते हैं कि मोनार्की होगी।
प्रिंस का शासन होगा और ये वंशानुक्रम जो है प्रिंस चुना जाएगा, इ होगा, नियुक्त होगा। दूसरी तरफ यह कहते हैं डिस्कोर्सेस
ऑन लेबी में कि रिपब्लिक में पॉपुलर रूल होगा। इसमें लोगों की पार्टिसिपेशन होगी। तो ये है मैक्यावली के द प्रिंस में स्टेट
के बारे में विचार। अब हम जान लेते हैं कि मैक्यावली गवर्नमेंट के बारे में क्या कहते हैं? अर्थात गवर्नमेंट के बारे में
इनके क्या विचार रहे हैं। तो ये कहते हैं कि गवर्नमेंट दो प्रकार की होती है। पहली है मोनार्की दूसरी है रिपब्लिक। और ये
कहते हैं कि मोनार्की हमेशा से प्रैक्टिकल फॉर्म होती है और रिपब्लिक दूसरी तरफ आइडियल फॉर्म होती है। ऐसा क्यों है? यह
कहते हैं कि प्रैक्टिकल मोनार्की इसलिए है क्योंकि मनुष्य स्वभाव से स्वार्थी होता है, लालची होता है, भ्रष्टाचारी होता है,
धोखेबाज होता है। इसीलिए मोनार्की प्रैक्टिकल फॉर्म है और यह वहां पर सबसे ज्यादा उपयुक्त है जहां के लोग स्वार्थी
हो, लालची हो, भ्रष्टाचारी हो ताकि उन पर लगाम लगाई जाए। दूसरी तरफ यह कहते हैं कि रिपब्लिक एक आइडियल अर्थात आदर्श फॉर्म है
और यह ऐसे लोगों के लिए उपयुक्त है जो लोग सदाचारी हो, सहयोगी हो, भ्रष्टाचारी ना हो जिनका गुड मैनर हो। तो कुल मिला के द
प्रिंस में मैक्यावली कहते हैं कि गवर्नमेंट दो तरह की होती है। तो अब हम देख लेते हैं कि द प्रिंस में मैकबली अपने
राजकुमार को क्या-क्या टिप्स देते हैं। क्या-क्या सजेशंस देते हैं? तो वे पहली सजेशन देते हैं कि प्रिजर्वेशन ऑफ हिज
स्टेट। अर्थात राजकुमार का पहला कार्य यह होगा कि वह अपने राज्य को सुरक्षित रखेगा। कैसे रखेगा? इसके लिए मैक्याबली कहते हैं
कि सबसे पहले उसे अपने राज्य में ऑर्डर एंड स्टेबिलिटी बनाए रखना है। उसके बाद उसे अपने लैंड से प्यार भी होना बहुत ही
जरूरी है। उसके बाद वह लोगों की केयर करेगा, सुरक्षा करेगा और लोगों की जो प्रॉपर्टी होगी, लाइफ होगी उसको भी वह
सुरक्षित रखेगा। जब राजा यह काम कर लेगा तब जाके ही उसके राज्य का प्रिजर्वेशन अर्थात उसका राज्य सुरक्षित हो सकता है।
गेटल ने कहा भी है मैक्यावली का राजदर्शन राज्य का सिद्धांत ना होकर राज्य की सुरक्षा का सिद्धांत है। इसमें गेटल यह कह
रहे हैं कि मैक्यावली का जो राजदर्शन है वह यह नहीं बताता है कि राज्य क्या है बल्कि यह बताता है कि राजकुमार को अपना
राज्य किस तरह से सुरक्षित रखा जाना चाहिए। दूसरी टिप्स वे देते हैं कि राजा के पास क्वालिटी ऑफ ब्रिटि होनी चाहिए।
ब्रिटि एक प्रकार का गुण है जिसमें राजा के पास लीडरशिप की क्वालिटी होती है। पावर होती है और जिसके द्वारा वह पावर को गेन
कर सकता है। राज्य को स्टेबलाइज रख सकता है। अगली टिप्स शो देता है कि राजा के पास रूलर्स शुड हैव वर्चू यानी कि वर्चू होनी
चाहिए। सद्गुण होना चाहिए। सद्गुण का मतलब यह है कि उन्हें सत और शुभ का ज्ञान हो। सत और शुभ का मतलब यहां पे यह है कि क्या
चीज उनके राज्य के लिए सही है और क्या चीज उनके राज्य के लिए गलत है। अर्थात उन्हें यह समझ होनी चाहिए कि कौन सी चीजें उनके
राज्य को पावरफुल बना सकती है, सुरक्षित रख सकती है और कौन सी नहीं और उन दो चीजों के आधार पर ही उन्हें अर्थात राजकुमार को
कार्य करने चाहिए। अगली टिप्स वे देते हैं। वे कहते हैं कि प्रिंस मस्ट बी फियरलेस एंड कोजियस। यानी कि जो प्रिंस
है, राजकुमार है, उनके अंदर भय नहीं होना चाहिए और उनके अंदर हमेशा साहस कूट-कूट के भरा होना चाहिए। वे कहते हैं कि ही मस्ट
नेवर बी हेटेड बाय द पीपल। और वह कहते भी हैं कि लोग उससे कभी भी नफरत ना करें। डरे लेकिन नफरत ना करें। अर्थात लोगों के दिल
में उसके लिए भय हो, प्यार हो लेकिन नफरत ना हो। और अगली वो बात कहते हैं कि कीप पीपल सेटिस्फाइड एंड स्टुफिफाइड। वे कहते
हैं कि राजा के अंदर ऐसी क्वालिटी होनी चाहिए। राजकुमार के अंदर ऐसी क्वालिटी होनी चाहिए कि हमेशा लोगों को वो
सेटिस्फाई रखें जिसकी वजह से लोग उसके विरुद्ध क्रांति ना लाए और लोगों को वो मूर्ख भी बनाएं। लोगों को वो पागल भी
बनाएं यानी कि अंधविश्वास में या धोखे में रखें। उनको पागल करें। ऐसी क्वालिटी एक राजकुमार या राजा के अंदर होनी चाहिए। और
इसके लिए वे कहते हैं कि द प्रिंस में वह कहते हैं कि द रिलेशन बिटवीन प्रिंस एंड पीपल शुड बी बेस्ड ऑन फियर। तो
वो कहते हैं द प्रिंस में कि जो लोग और राजकुमार के बीच रिलेशन है वो डर के आधार पर होना चाहिए। बिकॉज़ लव इज़ टेंपरेरी बट
फियर इज़ परमानेंट। वे कहते हैं कि लव टेंपरेरी होता है। यानी कि अस्थाई होता है लेकिन फ़ियर स्थाई होता है। परमानेंट होता
है। द बॉन्ड ऑफ़ लव कैन बी ईज़ली ब्रोकन एट वंस विल बट फियर ऑफ़ पनिशमेंट ऑलवेज रिमेंस। तो वह कहते हैं कि जो प्यार का
संबंध है वह कभी भी तोड़ा जा सकता है। लेकिन जो फ़ियर है वह हमेशा दिल में रहती है। हमेशा वह उसका जो डर है वह रहता है।
इसीलिए इन्होंने कहा कि फियर लव से ज्यादा इंपॉर्टेंट होता है। और इसके लिए लोगों के दिल में भय होना चाहिए। लेकिन लोगों को
साथ में प्रिंस पागल भी करें। यानी कि उन्हें धोखे में भी रखें। उन्हें प्यार देने का उनके लिए काम करने का वह उन्हें
एहसास दिलाएं। भले ही वह धोखे से दिलाए। तो इसमें द प्रिंस में यह मैक्यावली कह रहे हैं। इन्होंने एक कोटेशन भी दी है
जिसमें इन्होंने कहा इट इज़ बेटर टू बी फियर्ड देन लव्ड इफ यू कांट बी बोथ। तो इन्होंने कहा कि अगर एक राजकुमार दोनों
नहीं कर सकता है। यानी कि लोगों का दिल नहीं जीत सकता है और लोगों को डर नहीं दे सकता है तो दोनों में से अच्छा है कि
लोगों में उसके लिए भय हो। भय पैदा करें। यानी कि लोग उस राजकुमार से राजा से डरें। अगली सजेशन इन्होंने दी है कि प्रिंस शुड
बी इकोनॉमिकल। यानी कि जो राजकुमार है वह मिथितय होना चाहिए। ज्यादा खर्च ना करें। फिजूल के खर्च ना करें क्योंकि इससे राज्य
की जो अर्थव्यवस्था है उसको फायदा हो सकता है अगर प्रिंस इकोनॉमिकल होगा यानी कि मिथितव्य होगा। अगला इंपॉर्टेंट है प्रिंस
मस्ट हैव मोरालिटी। यानी कि नैतिकता भी होनी चाहिए। लेकिन इन्होंने कहा कि नैतिकता दो प्रकार की होनी चाहिए। एक
अच्छी अच्छी जो उसके लिए खुद के लिए अच्छी है। बैड का मतलब यह है कि उसे नैतिकता को दिखावा करना चाहिए। जिससे लोग यह समझे कि
राजा उसके हित के लिए काम कर रहा है। राजा लोगों से प्रेम करता है। तो इस तरह से उसने मोरालिटी को दो भागों में बांटा। एक
गुड और दूसरा बैड। प्रिंस शुड बी अपॉर्चुनिस्टिक। यानी कि राजा जो है वह अवसरवादी होना चाहिए। यानी कि मौकों को
देखकर वह अपने वायदे तोड़ सकता है, तोड़ने वाला होना चाहिए। इसके बारे में भी इन्होंने द प्रिंस में कहा। अगली इन्होंने
सलाह दी कि स्किल ऑफ आर्ट ऑफ वॉर। इन्होंने कहा कि स्किल होनी चाहिए। आर्ट ऑफ वॉर होनी चाहिए। यानी कि उसे हमेशा
युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए। वो कुशल योद्धा होना चाहिए। द आर्ट ऑफ वॉर जो कि 1521 में पब्लिश हुई। इसमें इन्होंने कहा
भी कि प्रिंस के पास स्किल होनी चाहिए और आर्ट होनी चाहिए युद्ध की। अगर शांति का समय है तब भी हमेशा राजा को युद्ध के लिए
प्रेफर रहना चाहिए। उसे तैयारी करनी चाहिए। लेकिन यहां पे नोट करने वाली बात यह है कि मैक्यावली ने द प्रिंस में और द
आर्ट ऑफ़ वॉर जो कि 1521 में पब्लिश हुई उसमें इन्होंने कहा कि सिटीजन आर्मी राजा के पास होनी चाहिए। यानी कि जो भाड़े के
टट्टू है जिसको भाड़े के सोल्जर कहते हैं जो किराए के जो सोल्जर होते हैं उनको कभी भी नहीं रखना चाहिए क्योंकि वह कभी भी
धोखा दे सकते हैं। तो इन्होंने कहा कि सिटीजन आर्मी होनी चाहिए क्योंकि लोगों को अपने देश से अपने नेशन से प्यार होता है।
वे ज्यादा वफादारी कर सकते हैं। इसीलिए राजा को सिटीजन आर्मी रखनी चाहिए ना कि उन्हें किराए के सैनिक रखने चाहिए।
तो डनिंग ने इनके बारे में कहा भी है कि उसकी विचारधारा शासन की कला का अध्ययन है ना कि राज्य का सिद्धांत है। प्रिंस
शासितों के लिए लिखी नहीं गई है बल्कि शासकों के लिए लिखी गई है। तो गैटल इसमें कह रहे हैं कि उनकी जो द प्रिंस है वो यह
बताती है कि शासन एक कला है। स्टेट क्राफ्ट है। यह शासितों के लिए नहीं लिखी गई है। बल्कि यह लिखी गई है शासकों के लिए
कि शासक जो है यानी कि प्रिंस राजकुमार उसको क्या करना चाहिए? वह क्या कर सकता है? जिससे राज्य स्थिर रहे, स्टेबल रहें,
राज्य प्रगति करें, पावर को अधिक से अधिक गेन करें। तो द प्रिंस में मैकवली लिखते हैं कि पीपल
फियर फ्रॉम प्रिंस नॉट हेट्रिड। तो यह कहते हैं कि लोग प्रिंस से राजकुमार से डरें, भय करें लेकिन घृणा ना करें। अगली
सजेशन वह देते हैं कि पॉपुलरिटी अमंग पीपल। राजा लोगों के मध्य बहुत फेमस होना चाहिए, प्रसिद्ध होना चाहिए। भले ही इसके
लिए उसे साम दाम दंड भेद अपनाना पड़े। लोगों को उसे जो है झूठ बोलना पड़े, छल करना पड़े लेकिन वो किसी भी हाल में लोगों
के मध्य पॉपुलर होना चाहिए, प्रसिद्ध होना चाहिए। इसके साथ-साथ वे कहते हैं कि प्रिंस मस्ट बी एक्सपेंशनिस्ट। यानी कि
राजा जो है वह महत्वाकांक्षी होना चाहिए, विस्तारवादी होना चाहिए। उसके दिमाग में हमेशा से यह होना चाहिए कि वह अधिक से
अधिक अपने राज्य का विस्तार कर सकें। और वे कहते हैं कि पॉलिसी ऑफ एंड लायन। और ये बेहद इंपॉर्टेंट पॉलिसी है इनकी
जिसमें यह कहते हैं कि राजा में हमेशा दो गुण होने चाहिए। एक है फॉक्स एंड दूसरा है लायन का। यानी कि राजा फॉक्स की तरह चालाक
होना चाहिए, छलिया होना चाहिए और लायन की तरह पावरफुल होना चाहिए। मैक्यावली ने एक कोटेशन दी भी है। आप स्क्रीन पर देख भी
रहे होंगे। ये कहते हैं राज्य की स्थापना के लिए बल की जरूरत होती है। बल का मतलब है लायन और परंतु राज्य को कायम रखने के
लिए छल की जरूरत होती है और छल का मतलब है फॉक्स यानी कि फॉक्स की तरह चालाक होना चाहिए और लायन की तरह बलवान होना चाहिए।
पावरफुल होना चाहिए। तो इसमें यह कहते हैं कि ही शुड बी कोजियस एंड स्ट्रांग लाइक अ लायन। अर्थात शेर की तरह ही वह कोजियस
होना चाहिए और स्ट्रांग होना चाहिए। दूसरी तरफ यह कहते हैं कि ही शुड आल्सो बी कनिंग लाइक अ फॉक्स। और वो चालाक होना चाहिए,
छलियां होना चाहिए लोमड़ी की तरह। तो इस तरह से ये एक बेहद इंपॉर्टेंट पॉइंट है। इन्होंने कहा कि राजकुमार के पास दोनों ही
गुण होने चाहिए। अर्थात फोकस का भी और लयन का भी। यानी कि छलिया भी और बलिया भी। अगली इंपॉर्टेंट पॉइंट जो इन्होंने बताया
है या फिर टिप्स दी है राजकुमार को वो यह है कि इन्होंने कहा कि राजा के पास हमेशा पॉलिसी ऑफ़ इक्वलिटी, मनी, पनिशमेंट एंड
डिस्क्रिमिनेशन होनी चाहिए। जिसको हम यह भी कह सकते हैं कि इन्होंने कौटिल्य की तरह ही कहा कि राजा को चार थिंग्स अपनानी
चाहिए। अपने फायदे के लिए, राज्य की सुदृढ़ता के लिए, राज्य के स्थिरता के लिए, राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिए एक
राजा को, प्रिंस को चारों चीजों को अपनाना चाहिए अगर जरूरत हो। और चार चीजें क्या है वो? साम, दाम और दंड भेदा। और इसकी बात
कौटिल्य ने भी पहले ही की है। और इन्होंने कहा कि स्टेट इज जस्ट एन एंड। इन्होंने कहा कि राज्य अपने आप में एंड है यानी कि
उद्देश्य हैं, लक्ष्य हैं। और इसके लिए इन्होंने कहा कि एन एंड जस्टिफाइज़ मीन। और इन्होंने कहा कि जो उद्देश्य है यानी कि
एंड है वही मेन जो हमारा मीन है यानी कि हमारा जो साधन है उसको औचित्यपूर्ण बताता है। ओनली एन एंड मस्ट बी राइट। और
इन्होंने कहा कि एंड यानी कि हमारा उद्देश्य सही होना चाहिए। अगर हमारा उद्देश्य सही है तो हमारा जो मीन है वो
खुद सही होता हो जाता है। माइट इज राइट। और इन्होंने इसमें यह भी कहा कि जिसकी लाठी उसकी भैंस हमें अपनानी चाहिए। अर्थात
बल हो, हिंसा हो, क्रूरता हो, साम, दाम, दंड भेद जो भी कुछ हो उन सभी पॉलिसीज को हमें अपनाना चाहिए। अपने फायदे के लिए,
अपने राज्य के फायदे के लिए, शक्ति को अधिक से अधिक गेन प्राप्त करने के लिए। रूसो का जन्म 28 जून 1712 ईस्वी को हुआ था
और इनकी मृत्यु 2 जुलाई 1778 को हुई थी। और यह फ्रेंच फिलॉसोफर रहे हैं। हालांकि इनका जो जन्म है वह स्विट्जरलैंड के
जेनेवा में हुआ था। इसी वजह से इनको जेनेवन फिलॉसोफर भी कहा जाता है। वहीं इनको थिंकर ऑफ पैराडॉक्स कहा जाता है और
ये फ्रेंच रेवोल्यूशन के अग्रदूत भी रहे हैं क्योंकि फ्रेंच रेवोल्यूशन इनकी प्रेरणा से ही शुरू हुई थी और सफल हुई थी।
वहीं इन्होंने रिप्रेजेंटेटिव डेमोक्रेसी की बड़ी मात्रा में आलोचना की। वहीं डायरेक्ट डेमोक्रेसी का इन्होंने सपोर्ट
किया। यह लिबरल्स, सोशलिस्ट, डेमोक्रेट्स और टोटलिटेरियंस जितने भी थिंकर रहे हैं उनके लिए भी यह प्रेरणा का स्त्रोत रहे
हैं। और इन्होंने एक फेमस नोशन दिया जिसको कहा जाता है नोवेल सेबेज। यह बेसिकली ऐसा नोशन है जो इन्होंने प्राकृतिक अवस्था में
या फिर आदिकालीन जो मानव है उसके लिए इन्होंने प्राकृतिक अवस्था में प्रयुक्त किया था। वहीं इन्होंने एक इंपॉर्टेंट
स्लोगन दिया जिसका नाम है बैक टू द नेचर। और इस स्लोगन से महात्मा गांधी बड़ी मात्रा में प्रभावित हुए थे। और इनको
यूटोपियन आइडियलिस्ट थिंकर भी कहा जाता है। और दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि जे एल टॉलमैन एक बहुत बड़े विचारक हुए
जिन्होंने रूसो के बारे में लिखा कि वे इंटेलेक्चुअल पाइनियर ऑफ द 20थ सेंचुरीज टोटलनिज्म रहे हैं। इसका मतलब यह है कि जो
20वीं शताब्दी का जो सर्वसत्तावाद रहा है, उसके बौद्धिक अग्रदूत रूसो रहे हैं। और उनकी जनरल जो बिल है इसको जाना जाता है
पैराडॉक्स ऑफ फ्रीडम। वहीं रूसो ने एक इंपॉर्टेंट कोट दी मैन कैन बी फोर्स्ड टू बी फ्रीडम। अर्थात व्यक्ति को स्वतंत्र
रहने के लिए बाध्य किया जा सकता है। और रूसो ऐसे पहले विचारक रहे हैं जिन्होंने बड़ी मात्रा में मॉडर्निटी सिविलाइजेशन,
साइंस, आर्ट, प्राइवेट प्रॉपर्टी एंड एनलाइटनमेंट को पूरी तरह से नकारा। उसकी आलोचना की।
रूसो के वक्स को हम तीन भागों में बांटते हैं। पहला है इनके एस्स, दूसरा है इनके फंडामेंटल वक्स और तीसरा है इनके अपनी खुद
की ऑटोबायोग्राफीज़। तो सबसे पहले हम बात कर लेते हैं एस्स की। पहला एस्स इनका डिस्कोर्स ऑन साइंसेस एंड
आर्ट्स जो कि 1750 ईस्वी में इन्होंने लिखा। दूसरा एस्स द स्टेट ऑफ़ बोर। यह भी इन्होंने 1750 में लिखा। और तीसरा
इंपॉर्टेंट एस्स रहा है डिस्कोर्सेज ऑफ द ओरिजिन ऑफ इनकलिटी 1755 ईस्वी में। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स हैं द इमाइल जो
कि 1762 में इन्होंने लिखी और शिक्षा पर लिखी गई सबसे इंपॉर्टेंट कृति इसको माना जाता है। दूसरी है सोशल कॉन्ट्रैक्ट जो कि
1762 में ही इन्होंने लिखी और इसको सबसे इंपॉर्टेंट पॉलिटिकल फिलॉसोफी पर लिखी गई किताब मानी जाती है जिसमें इन्होंने सोशल
कॉन्ट्रैक्ट स्टेट गवर्नमेंट पॉपुलर सोवनिटी जैसे कांसेप्ट्स दिए। वहीं तीसरी एक इंपॉर्टेंट राइटिंग रही है इनकी न्यू
हेलोसिस और यह भी बहुत ही इंपॉर्टेंट मानी जाती है और यह है तीन इनकी ऑटोबायोग्राफीज़ कनंफेशन डायलॉग एंड रिब्रीज
रूसो की फिलॉसोफी बहुत ही व्यापक रही है। मैंने पहले भी कहा कि रूसो से उदारवादी, लोकतंत्रवादी, सर्वसत्तावादी और समाजवादी
सभी तरह के विचारक प्रभावित रहे। और रूसो ने एक फेमस कोट दी जो कि उनकी पूरी फिलॉसोफी का आधार है। और इन्होंने कहा कि
मैन इज बोर्न फ्री बट ही इज एवरीवेयर इन चेंज्स। इन्होंने कहा कि मनुष्य जब पैदा होता है वह बिल्कुल स्वतंत्र होता है
क्योंकि उसे किसी भी कानून की समझ नहीं होती है। पारिवारिक दायित्व राज्य के कानूनों में वो किसी तरह से बंधा नहीं
होता है। परंतु जैसे-जैसे व्यक्ति समाज में रहता है, राज्य के कानून समझता है, वैसे-वैसे वो बंधनों में जकड़ा जाता है।
ये बात रूसो कहते हैं। तो, रूसो की फिलॉसोफी को अब हम समझ लेते हैं। और उनकी फिलॉसोफी को समझने के लिए हम उनके दो
इंपॉर्टेंट वर्क्स लेंगे। पहला डिस्कोर्स ऑन द ओरिजिन ऑफ इनकलिटी और दूसरा है द सोशल कॉन्ट्रैक्ट। तो डिस्कोर्स ऑन द
ओरिजिन ऑफ इनकलिटी में रूसो कहते हैं स्टेट ऑफ नेचर के बारे में और इवोल्यूशन ऑफ सोसाइटी के बारे में। वहीं द सोशल
कॉन्ट्रैक्ट में यह कहते हैं जनरल बिल के बारे में और पॉपुलर सोवनिटी के बारे में। तो रूसो की जब हम फिलॉसफी को समझते हैं तो
हम अलग-अलग फॉर्म में इनको समझते हैं। जैसे पहले नेचर ऑफ स्टेट फिर स्टेट ऑफ वॉर फिर सोशल कॉन्ट्रैक्ट। तो नेचर ऑफ स्टेट
की पहले बात कर लेते हैं। रूसो कहते हैं कि नेचर ऑफ स्टेट में जो व्यक्ति थे या आदिकालीन समाज में जो व्यक्ति रहते थे वे
शांत प्रिय थे। पीस थी। फीलिंग ऑफ कोऑपरेशन थी। सहयोग की भावना थी। स्टेट ऑफ ब्लिस थी। आनंदपूर्ण भावना से रहते थे।
म्यूट थे। शांत रहते थे और पृथक रहते थे। झुंडों में नहीं रहते थे। समाज में नहीं रहते थे। नो वरी अबाउट फ्यूचर। और उन्हें
भविष्य की कोई चिंता भी नहीं होती थी। रूसो आगे कहते हैं कि स्टेट ऑफ नेचर में एक ऐसी चीज थी व्यक्ति के पास जो उसे
एनिमल से या फिर पशुओं से अलग करती थी और वो थी फ्रीडम एंड कंपेशन कंपैशन। यानी कि पीटी की भावना दया या फिर सहानुभूति की
भावना और फ्रीडम की भावना स्वतंत्रता की भावना। और इंडिविजुअल जो स्टेट ऑफ नेचर में रहता था रूसो ने उसको कहा है नोवेल
सेबेज। नोवेल सेबेज मींस शांत है वो कोपरेशन करता है। वो किसी का बुरा नहीं चाहता है। इसलिए वो नोवेल है और सेबेज है
क्योंकि वो जंगलों में रहता है। इसीलिए इन्होंने इसको नोबेल सेबेज कहा यानी कि सभ्य जंगली कहा और स्टेट ऑफ़ बोर की जब हम
बात करते हैं तो रूसो कहते हैं कि इसमें कंडीशन ऐसी हो गई थी कि प्राइवेट प्रॉपर्टी अस्तित्व में आई। उसकी वजह से
फिर क्या हुआ कि सोसाइटी की शुरुआत हुई और जैसे ही सोसाइटी की शुरुआत हुई फिर ओरिजिन ऑफ इनकलिटी हुई और जैसे ही इनकलिटी आई
उसके बाद फिर पूरी जो बुरी चीजें हैं वो शुरू होने लगी। जैसे डिपेंडेंसी यानी कि लोगों की अब डिपेंडेंसी बढ़ती गई।
आत्मनिर्भरता पूरी तरह से खत्म हो गई। इमोर प्रोपरे यानी कि यह बेसिकली फ्रेंच वर्ड है जिसमें यह कहते हैं कि दूसरों से
लोगों की यह एक्सपेक्टेशंस बढ़ गई कि लोग उनकी रिस्पेक्ट करेंगे। उनका समाज में स्टेटस बढ़ेगा और इमोर दे सोई का मतलब है
कि लोग उनसे प्यार करेंगे। उनकी ऐसी इस तरह की एक्सपेक्टेशंस बढ़ती गई और ग्रीड एंड फेम और उनके अंदर लालच की भावनाएं भी
पैदा हो गई और फेम की भावनाएं भी पैदा हो गई। तीसरा जो स्टेज आता है वो है सोशल कॉन्ट्रैक्ट। जैसे ही सोशल कॉन्ट्रैक्ट
हुआ तो स्टेट ऑफ वॉर खत्म हुआ। सोशल कॉन्ट्रैक्ट अस्तित्व में आया। जिसकी वजह से हुआ क्या कि स्टेट अस्तित्व में आया।
जनरल विल अस्तित्व में आई। पॉपुलर सोवनिटी अस्तित्व में आई और गवर्नमेंट भी अस्तित्व में आई।
अब रूसो की जो ह्यूमन बिल रही है उसको हम थोड़ा सा और समझ लेते हैं। रूसो कहते हैं कि ह्यूमन बिल को हम दो भागों में बांट
सकते हैं। पहला है इंडिविजुअल दूसरा है कम्युनिटी। रूसो कहते हैं कि इंडिविजुअल पर्टिकुलर बिल को रिप्रेजेंट करता है।
वहीं कम्युनिटी जनरल बिल को रिप्रेजेंट करता है। रूसो कहते हैं कि पर्टिकुलर बिल को आगे चलकर हम दो भागों में इसको बांट
सकते हैं। एक है एक्चुअल बिल जिसको हम हिंदी में कहते हैं यथार्थ इच्छा और दूसरी है रियल बिल जिसको हम कहते हैं आदर्श
इच्छा। तो एक्चुअल बिल में बहुत सारी विशेषताएं आती है। जैसे सेल्फ इंटरेस्ट, लोअर सेल्फ, नो रीजन, शॉर्ट प्लेजर, लोअर
सेटिस्फेक्शन और ट्रांसाइन। तो ये इसकी विशेषताएं हैं। वहीं रियल बिल की कुछ विशेषताएं हैं। जैसे इंस्पाइरेशन फ्रॉम
कॉमन गुड, हायर सेल्फ, अल्टीमेट, रियल एंड सेल्फलेसनेस, सोशल वेलफेयर एंड एक्सप्रेशन ऑफ रियल
फ्रीडम। और सबसे इंपॉर्टेंट बात जो आपको ध्यान में रखनी है वो ये है कि जनरल बिल इज द सम टोटल ऑफ रियल बिल। ध्यान से सुनिए
इस बात को क्योंकि ये एग्जाम में कई बार पूछा गया है और लोग बड़े कंफ्यूज होते हैं इसमें। जनरल जो बिल है अर्थात जो सामान्य
इच्छा है वो सभी आदर्श इच्छाओं का योग है। जनरल बिल इज द सम टोटल ऑफ रियल बिल। यानी कि जनरल बिल
केवल रियल बिल का ही योग है। एक्चुअल बिल इसमें शामिल नहीं होती है। एक्चुअल बिल ऑलरेडी बाहर है क्योंकि रियल बिल ही
कम्युनिटी को या फिर कॉमन गुड को रिप्रेजेंट करती है। इसीलिए रियल बिल ही जनरल बिल का पार्ट है या फिर योग है। या
हम यह भी कह सकते हैं कि जनरल बिल इज द सम टोटल ऑफ रियल बिल। अब हम बात कर लेते हैं रूसो के द्वारा दिए गए इंपॉर्टेंट नोशंस
की। पहला नोशन है पॉपुलर सोवनिटी। पॉपुलर प्लस सोवनिटी। इसका मतलब यह है कि रूसो कहते हैं कि जो संप्रभुता होगी वह लोगों
में होगी। क्यों? क्योंकि सारी जो शक्तियां है वो जनरल बिल के पास है। और जनरल बिल रिप्रेजेंट करती है लोगों को,
लोगों की इच्छा को और पूरी कम्युनिटी को। इसीलिए इनकी जो सोवनिटी है उसको पॉपुलर सोवनिटी कहा जाता है। दूसरा कांसेप्ट है
पॉपुलर डेमोक्रेसी। पॉपुलर प्लस डेमोक्रेसी यानी कि ऐसा लोकतंत्र जिसमें लोगों का शासन होगा। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए
है क्योंकि पहले तो रूसो ने डायरेक्ट डेमोक्रेसी को सपोर्ट किया है और दूसरा इसीलिए है कि रूसो कहते हैं कि सभी को
राइट्स होंगे। सभी के पास शक्तियां होगी क्योंकि जो लोगों की इच्छा है सामान्य इच्छा है वो कम्युनिटी को रिप्रेजेंट करती
है। और इसी वजह से इन्होंने अगला एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया जिसका नाम है माइनॉरिटी ओपिनियन। इसमें यह कहते हैं कि
लोगों के पास माइनॉरिटी ओपिनियन का अधिकार होना चाहिए। अर्थात जो माइनॉरिटी है उनको भी अधिकार होना चाहिए। उन्हें भी बहुत
सारे राइट्स होने चाहिए। जैसे पॉलिटिकल इकोनॉमिक सोशल एंड एक्सप्रेशन ऑफ राइट्स यानी कि अभिव्यक्ति और विचार प्रकट करने
का भी उन्हें अधिकार होना चाहिए माइनॉरिटी पीपल को। अगला इंपॉर्टेंट नोशन है रूसोस पैराडॉक्स।
अब ये क्या है? इसको भी समझ लेते हैं। रूसो ने एक इंपॉर्टेंट कोट दी जिसका नाम है मैन इज़ बोर्न फ्री बट ही इज़ एवरीवेयर
इन चेस। तो रूसो एक तरफ तो भाई यह कह रहे हैं कि मनुष्य स्वतंत्र पैदा होते हैं। दूसरी तरफ ये कह रहे हैं कि वह हर जगह
बेड़ियों में जकड़े रहते हैं। तो ऐसा कैसे पॉसिबल है? एक तरफ व्यक्ति स्वतंत्र है, दूसरी तरफ बेड़ियों में है। जहां बेड़ियां
हैं, वहां स्वतंत्रता नहीं हो सकती। और जहां स्वतंत्रता है वहां चेंज की कोई पॉसिबिलिटी नहीं है। इसीलिए इनके जो आलोचक
रहे हैं उन्होंने इसको रूसो का पैराडॉक्स कहा है। अगली इंपॉर्टेंट नोशन है जनरल बिल। और जनरल बिल को मैंने पहले भी डिस्कस
किया है। बेसिकली ये है लोगों की इच्छा या फिर पूरी कम्युनिटी की इच्छा और इसी वजह से रूसो को कम्युनिटेरियन थिंकर भी कहा
जाता है। और अगली नोशन इनकी है कम्युनिटेरियन। कम्युनिटेरियन क्यों है? क्योंकि यह कहते हैं कि जो जनरल विल है वह
पूरे कम्युनिटी की इच्छा है। अर्थात पूरे लोगों की इच्छा है। रियल विल का योग है। इसी वजह से रूसो को कम्युनिटेरियन थिंकर
भी कहा जाता है और इस धारणा की वजह से ह्ना आरंट काफी प्रसिद्ध हुई थी। और ह्ना आरंट प्रसिद्ध भी हुई थी और इनसे काफी
प्रभावित भी हुई थी। क्योंकि इन्होंने जो अन्ना आरेंट रही है उन्होंने रूसो का जो कम्युनिटेरियन नोशन है उससे काफी प्रेरणा
ली। अगली है नेचुरल लिबर्टी। नेचुरल लिबर्टी बेसिकली रूसो यह कहते हैं कि जो स्टेट ऑफ
नेचर था उसमें इंडिविजुअल पूरी तरह से या फिर प्राकृतिक रूप से स्वतंत्र थे। क्यों थे? क्योंकि वे शांतिपूर्ण तरीके से रहते
थे। पीस थी, फीलिंग ऑफ़ कोऑपरेशन था, स्टेट ऑफ़ ब्लिस थी। लोग आनंद में रहते थे, म्यूट थे, आइसोलेटेड थे, झुंडों में समाज में
नहीं रहते थे। और उन्हें फ्यूचर की कोई भी चिंता नहीं होती थी। इसीलिए रूसो कहते हैं कि लोगों के पास प्राकृतिक अवस्था में
नेचुरल लिबर्टी थी। अगला इंपॉर्टेंट नोशन है नोवेल सेबेज। अब ये नोवेल सेबेज क्या है? रूसो कहते हैं कि जो प्राकृतिक अवस्था
में व्यक्ति था वो नोवेल था। यानी कि सभ्य था। सभ्य क्यों था? क्योंकि उनके पास कोई एंगर नहीं था। कोई ग्रीड नहीं थी, लालच
नहीं था। उनके पास केवल पीस, शांति और कोऑपरेशन अर्थात सहयोग था। इसी वजह से उन्होंने प्राकृतिक इंसान को अर्थात
आदिकालीन समाज में रहने वाले व्यक्ति को नोवेल कहा है। और सेबेज सैबेज इसलिए था क्योंकि लोग उस समय जंगलों में रहते थे।
फॉरेस्ट में रहते थे और कंदमूल खा के अपना जीवन यापन करते थे। इसीलिए रूसो ने उसको सभ्य जंगली कहा है। अर्थात नोवेल सेवेबेज
कहा है। अगला इंपॉर्टेंट नोशन है थ्योरी ऑफ़ इनकलिटी। इसको थोड़ा सा ध्यान से सुनना।
रूसो ऐसे पहले विचारक रहे हैं जिन्होंने तत्कालीन समाज में विषमताओं का जिक्र करते हुए उन्हें दूर करने की मांग की और
इन्होंने अपने एक प्रसिद्ध एस्स जिसका नाम है द डिस्कोर्सेस ऑन द ओरिजिन ऑफ इनकलिटी में टू टाइप्स ऑफ इनकलिटी का जिक्र किया।
कौन सी है? तो ये देख लीजिए। ये कहते हैं कि दो तरह की इनकलिटीज होती है। पहली नेचुरल इनकलिटी। दूसरी है कन्वेंशनल।
कन्वेंशनल मींस परंपरागत। नेचुरल इनकलिटी में यह कहते हैं कि जब व्यक्ति के मध्य सेक्स, एज, बॉडी, ब्यूटी, विज़डम और हेल्थ
को लेकर इनकलिटीज होती है अर्थात विषमताएं होती है तो वो नेचुरल इनकलिटीज में आती है। वहीं कन्वेंशनल इनकलिटीज़
ऐसी होती है जो परंपरागत होती है। समाज के विकसित होने के साथ-साथ खुद ब खुद विकसित होती है और ये होती है स्टेटस, वेल्थ एंड
पावर के साथ। तो यह थी एक इंपॉर्टेंट वीडियो। मुझे लगता है कि इस वीडियो के साथ आपने बहुत ज्यादा एंटरटेनमेंट किया होगा,
एंटरटेनमेंट किया होगा। इसलिए प्लीज वीडियो को लाइक कीजिए, शेयर कीजिए और अगर आपने अभी तक हमारे चैनल सार सक्सेस को
सब्सक्राइब नहीं किया है तो लाल बटन पर क्लिक करके सब्सक्राइब कर दीजिए। वीडियो को देखने के लिए दिल से धन्यवाद।
मैरी वालस्टोन क्राफ्ट। इससे पहले कि हम इनकी पूरी लाइफ एंड बायोग्राफी को डिटेल में समझें। स्क्रीन पर आपको इनकी जो
कोटेशन दिखाई दे रही है, इसको पहले हम अच्छे से समझ लेते हैं क्योंकि यही कोटेशन इनकी पूरी फिलॉसोफी का आधार है। यह कहती
है आई डू नॉट विश वुमेन टू हैव पावर ओ वुमेन बट ओवर देमसेल्फ। इसके अंतर्गत यह कहती है कि मैं कभी भी यह नहीं चाहती हूं
कि महिलाओं को पुरुषों के ऊपर शक्ति प्राप्त हो जाए। बल्कि मैं तो यह चाहती हूं कि महिलाओं को खुद के ऊपर शक्ति
प्राप्त हो जाए। और ऐसा यह इसलिए कह रही है क्योंकि इन्होंने अपने समाज में ऐसी विषमताओं को देखा जिसके अंतर्गत महिलाओं
को केवल नाम मात्र अधिकार प्राप्त थे। यहां तक कि महिलाओं को पुरुषों की निजी संपत्ति समझा जाता था और उनको पुरुषों की
भोग विलासिता की वस्तु के रूप में देखा जाता था। इसीलिए इन्होंने कहा कि मैं तो सिर्फ इतना चाहती हूं कि महिलाओं को खुद
के ऊपर शक्ति प्राप्त हो जाए। मैरी इंग्लिश राइटर, पॉलिटिकल फिलॉसफर, फेमिनिस्ट रही है। जिन्होंने वुमस राइट की
एडवोकेसी की। इनका जन्म 27 अप्रैल 1759 को इंग्लैंड में हुआ था और इनकी डेथ 10 सितंबर 1797 को इंग्लैंड में हुई थी। इनके
पति का नाम विलियम गॉडविन था। जिनसे इन्होंने 1797 में शादी की थी। इनके दो बच्चे मैरीशली एंड नैनी इमले थे। वहीं
इनको फर्स्ट वेव ऑफ फेमिनिज्म की फाउंडर माना जाता है। रूसो के एक इंपॉर्टेंट आईडिया डेमोक्रेटिक
रेडिकलिज्म से यह काफी हद तक प्रभावित थी और बोलस्टोन क्रॉप एक ऐसी फेमिनिस्ट विचारक रही है जिन्होंने फेमिनिज्म की
सिस्टमेटिक क्रिटिक पहली बार की। वहीं इनको रिपब्लिकन थिंकर के रूप में भी देखा जाता है। जिसके अंतर्गत इन्होंने वुमस
राइट की एडवोकेसी की। वहीं हालांकि इनकी जो लाइफ है बड़ी स्ट्रगल में रही। बड़ी दुखदाई इनकी लाइफ रही। अनहै रही। जिस वजह
से कभी कबभार इन्होंने अपने आप को सुसाइड्स के लिए भी कमिटेड किया और यह ऐसी फिलॉसोफर रही है, ऐसी पहली थिंकर रही है
जिन्होंने पहली बार वुमस के पॉलिटिकल राइट्स की भी वकालत की। अब हम बात कर लेते हैं मैरी के कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की।
मैरी के जितने भी वर्क रहे हैं, यह बहुत ही इंपॉर्टेंट माने जाते हैं। जहां एक तरफ इनके वर्क से जितनी भी लेट फेमिनिस्ट
थिंकर रही, वे इनके वर्क से इंस्पायर्ड हुई, वहीं दूसरी तरफ जितने भी स्टूडेंट है जो नेट की तैयारी कर रहे हैं, पॉलिटिकल
साइंस में या फिर सेट या फिर पॉलिटिकल साइंस से जुड़े किसी भी एग्जाम की तैयारी कर रहे हैं, उनके लिए भी यह वक्स बहुत
इंपॉर्टेंट हो सकते हैं। क्योंकि पिछले कुछ सालों से बार-बार मैरी से जुड़े कुछ इंपॉर्टेंट वक्स बार-बार पूछे जा रहे हैं।
तो पहला वर्क है अ विंडिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमेन विद स्ट्रिक्चर्स ऑन द पॉलिटिकल एंड मोरल सब्जेक्ट्स जो कि इन्होंने 1792
में लिखा और इनका यह सबसे इंपॉर्टेंट वर्क माना जाता है। दूसरा वर्क है थॉट्स ऑन द एजुकेशन ऑफ डॉटर्स विद रिफ्लेक्शंस ऑन
फीमेल कंडक्ट इन द मोरेंट ड्यूटीज ऑफ लाइफ। यह लिखा इन्होंने 1787 में। और अगला वर्क है इनका ओरिजिनल स्टोरीज फ्रॉम रियल
लाइफ 1788। अगला वर्क लिखा इन्होंने अ विंडिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ द मैन इन अ लेटर टू द राइट ऑनरेबल एडममंड वर्क 1790 में यह
लिखा और इस वर्क की खास बात यह है कि इसमें इन्होंने एडवर्डबर्ग जो कि रूढ़िवादी विचारक रहे हैं उनको रिस्पॉन्ड
करते हुए इसमें एडवर्डबर्ग की विचारों की आलोचना की। अगला वर्क है मारिया और द रोंग्स ऑफ़ वुमेन इलस्ट्रेटेड। यह 1788 में
लिखा और अगला वर्क है इनका ऑन द प्रिवेलिंग ओपिनियन ऑफ अ सेक्सुअल कररेक्टर इन वुमेन जो कि इन्होंने 1792
में लिखा। अगला इनका वर्क है मैरी अ फिक्शन 1788 में। और अगला एक इंपॉर्टेंट वर्क है ऑफ
पमफलेट जो कि 1786 में लिखा और इससे जितनी भी लेट फेमिनिस्ट थिंकर रही काफी जागरूक हुई। काफी उन्हें इससे प्रेरणा मिली
क्योंकि इसमें इन्होंने ऐसी टेिक्स बताई है जिससे कि औरतों को मुक्ति मिल सके या फिर औरतों में अवेयरनेस आ सके। अगला वर्क
है मेमोरीस जो कि 1798 में लिखा और यह मैरी के जो लेट हस्बैंड रहे हैं विलियम गॉडविन जो कि एक रूढ़िवादी विचारक रहे हैं
उन्होंने लिखा और यह बायोग्राफी है। हालांकि इस बायोग्राफी की आलोचना भी की जाती है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि
विलियम गॉडविन ने इसमें मैरी के बारे में गलत विचार दिए। अगली इंपॉर्टेंट वर्क है एन हिस्टोरिकल
एंड मोरल व्यू ऑफ द फ्रेंच रेवोल्यूशन 1794 और अगली एक वर्क है ऑन पोएट्री एंड आवर
रेलिश फॉर द ब्यूटीज ऑफ नेचर 1797 और लास्ट बट नॉट लीस्ट इज़ द केव ऑफ़ फैंसी 1787 में इन्होंने लिखी और यह पब्लिश हुई
थी 1798 में। तो यह रहे हैं मैरी के इंपॉर्टेंट वक्स। मैरी वालस्टोन क्राफ्ट की जब हम फिलॉसोफी एंड थॉट्स की बात करते
हैं तो यह बहुत ही इंपॉर्टेंट हो जाती है। इंपॉर्टेंट इसलिए हो जाती है क्योंकि एक तरफ जहां इनके विचारों से और इनकी
फिलॉसोफी से फर्स्ट वेव ऑफ़ फेमिनिज्म शुरू हुआ या फिर फेमिनिज्म शुरू हुआ वहीं दूसरी तरफ लेट जितनी भी फेमिनिस्ट थिंकर रही
उनको इनके विचारों से इनकी फिल फिलॉसोफी से काफी प्रेरणा मिली। तो हमारे लिए इनकी फिलॉसोफी को जानना बहुत ही इंपॉर्टेंट हो
जाता है। इन्होंने 1792 में अपनी अक्षय कृति लिखी जिसका नाम है अ विंडिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमेन और ऐसा माना जाता है कि
यह राइटिंग लॉकिन लिबरलिज्म जो रहा है उससे काफी इंस्पायर्ड रही और इसी कृति में इन्होंने इक्वल राइट्स ऑफ वुमेन एस्पेशली
राइट टू एजुकेशन की डिमांड की एडवोकेसी की और इन्होंने कहा कि वुमेन को भी पुरुषों की तरह ही राइट्स होने चाहिए। खासतौर पे
राइट टू एजुकेशन होना चाहिए। क्योंकि बिना राइट टू एजुकेशन के महिलाएं डे बाय डे पिछड़ रही है। और इन्होंने इस कृति में
नोशन ऑफ पर्सनहुड भी दिया। पहला पॉइंट है इक्वल राइट्स टू बोथ मैन एंड वुमेन। इन्होंने कहा कि चाहे पुरुष हो या फिर
स्त्री हो। दोनों को बराबर अधिकार होने चाहिए। ना किसी को कम ना किसी को ज्यादा। इन्होंने अपनी इंपॉर्टेंट राइटिंग ऑफ
इंडिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमेन में लिखा कि अभी तक महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति ही समझा जाता है जो कि गलत है। दूसरा
इंपॉर्टेंट इनका पॉइंट रहा इक्वल एजुकेशन राइट्स फॉर मैन एंड वुमेन। इन्होंने कहा कि महिलाओं के पास भी बुद्धि होती है,
तर्क होता है और अगर महिलाओं के पास कम कॉन्शियसनेस है या फिर लैक ऑफ अवेयरनेस है तो उस वजह से हैं क्योंकि दो कारण रहे
हैं। पहला है लैक ऑफ एजुकेशन, दूसरा है लैक ऑफ अपोरर्चुनिटीज। तीसरा पॉइंट है क्रिटिसिज्म ऑफ रूसोस द
इमाइल। रूसो ने द इमाइल लिखी थी जिसमें इन्होंने यह कहा कि महिलाओं के पास कम बुद्धि होती है और महिलाओं को केवल
डोमेस्टिक राइट्स मिलने चाहिए। इसमें रूसो ने यह भी कहा था कि महिलाएं पुरुषों के मुकाबले कम बुद्धि ग्रहण करती है। कम इनके
पास बुद्धि होती है और इन्होंने कहा था कि महिलाओं को केवल डोमेस्टिक एजुकेशन ही देनी चाहिए क्योंकि महिलाएं इसी के लिए
उपयोगी होती है। लेकिन इस तथ्य का मैरी ने पूरी तरह से खंडन किया और कहा कि रूसो ने जो द इमाइल में लिखा है वह बिल्कुल गलत
है। इसी को जवाब में इन्होंने अपनी इंपॉर्टेंट कृति लिखी जिसका नाम है अवेंडिकेशन ऑफ़ द राइट्स ऑफ़ वुमेन। और अगर
आप रूसो के ऊपर एक इंपॉर्टेंट वीडियो को देखना चाहते हो तो आप देख सकते हो। मैंने ऑलरेडी बनाई है। आप आई बटन पर क्लिक करके
उसको भी देख सकते हो। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट है अटैक ऑन मोनार्की एंड एरिस्टोक्रेसी। जी हां, मैरी
ने मोनार्की एंड एरिस्टोक्रेसी पे भी अटैक किया। और ऐसा इसलिए है क्योंकि इन्होंने कहा कि एरिस्टोक्रेसी एंड जो मोनार्की
होती है उसमें महिलाओं को चार दीवारी तक ही सीमित रखा जाता है। उसे पब्लिक स्फीयर में भाग लेने का कोई अधिकार नहीं होता है।
इसीलिए इन्होंने रिपब्लिकनिज्म की बात की। क्रिटिसिज्म ऑफ एडवर्ड वर्क्स कंजर्वेटिज्म। जी हां, एडवर्डबर्ग एक
कंजर्वेटिव थिंकर रहे हैं। जिसकी इन्होंने बड़ी मात्रा में आलोचना की। कंजर्वेटिवज्म
की अगर हम बात करें तो वैसे भी यह महिलाओं को कम अधिकार ही देता है। बर्क ने फ्रेंच रेवोल्यूशन के बाद एक इंपॉर्टेंट राइटिंग
लिखी थी जिसका नाम है रिफ्लेक्शंस ऑन द रेवोल्यूशन इन फ्रांस जिसमें इन्होंने महिलाओं को कम अधिकार दिए थे। देने की बात
कही थी और उसको जवाब में देते हुए मैरी ने एक अपना वर्क लिखा जिसका नाम है अ विंडिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ मैन इन अ लेटर
टू द राइट ऑनरेबल एडममंड वर्क जिसमें इन्होंने वर्क को रिसोंड करते हुए उनके विचारों की आलोचना की थी।
अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट है एडवोकेसी ऑफ़ जेंडर इक्वलिटी। इन्होंने जेंडर इक्वलिटी की भी बात की थी। इन्होंने कहा था कि
जेंडर इक्वलिटी का होना बहुत ही जरूरी है और महिलाओं के पुरुषों के साथ अच्छे रिलेशंस होने चाहिए। फोकस ऑन
रिपब्लिकनिज्म। इन्होंने रिपब्लिकनिज्म की बात की थी। इन्होंने कहा कि मोनार्की एंड एररिस्टोक्रेसी सही नहीं है क्योंकि इसके
अंतर्गत महिलाओं को पब्लिक स्फीयर में भाग लेने की कोई अधिकार नहीं होते हैं। और साथ में इन्होंने तीन प्रकार की क्लासेस की भी
बात की। मिडिल क्लास, अप्पर क्लास, लोअर क्लास। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट है क्रिटिसिज्म ऑफ
मैरिज सिस्टम। जी हां, मैरी ने पूरी तरह से मैरिज सिस्टम को भी नकारा क्योंकि इन्होंने कहा कि यह प्रॉस्टिट्यूशन को
बढ़ावा देता है। यानी कि जो वेश्यावत्ति है उसको बढ़ावा देता है। भले ही समाज के लिए शादी का करना या शादी का होना बहुत
इंपॉर्टेंट हो। लेकिन इन्होंने कहा कि इसमें क्या होता है कि महिलाओं को पुरुषों की निजी संपत्ति समझा जाता है। महिलाओं को
पुरुषों की भोग विलासिता की वस्तु समझा जाता है। इसीलिए जो मैरिज सिस्टम है वह गलत है। यह बात मैरी करती है। तो, यह थी
एक इंपॉर्टेंट वीडियो। मुझे उम्मीद है कि आपने इस वीडियो के साथ बहुत ज्यादा एंटरटेनमेंट किया होगा और कुछ ना कुछ इस
वीडियो में नया सीखा होगा। कुछ नई इंफॉर्मेशन ग्रहण की होगी। सबसे पहले हम ब्रीफली जेएस मिल को डिस्कस कर लेते हैं।
जेएस मिल का पूरा नाम था जॉन स्टुअर्ट मिल। जेएस मिल ब्रिटेन के 19th सेंचुरी के मोस्ट इनफ्लुएंशियल पॉलिटिकल थिंकर थे।
मिल का जन्म 20th मई 1806 को लंदन में होता है। जेएस मिल के पिता का नाम जेम्स मिल था जो कि रिनोन्नड हिस्टोरियन माने
जाते हैं। जेम्स मिल की प्रसिद्ध पुस्तक हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया 1818 को पब्लिश होती है। जेम्स मिल ईस्ट इंडिया
हाउस के असिस्टेंट एग्जामिनर के पद पर अपॉइंट किए गए थे। जेएस मिल के टीचर का नाम जेरेमी बेंथम था जो कि एक
यूटिलिटेरियन थिंकर थे। जेएस मिल ने बेंथम के विचारों को यह कहते हुए रिवाइज [संगीत] किया था कि मैं वह पीटर हूं जिसने अपने
गुरु को नकार दिया था। जेएस मिल की वाइफ का नाम हेरियट हडी टेलर मिल था। जिनके साथ जेएस मिल ने द सब्जेक्शन ऑफ वुमेन लिखकर
वुमेन को थ्री फील्ड्स में इक्वलिटी [संगीत] की बात की थी। जिनमें पहली फील्ड थी राइट टू वोट। दूसरी फील्ड थी राइट टू
एजुकेशन और तीसरी फील्ड थी इक्वल राइट्स इन जॉब्स। 1826 को जेएस मिल मेंटल क्राइसिस से गुजर जाते हैं। हालांकि मिल
ने कॉलरिज और विलियम ब्सब की रोमांटिक पोएट्री को स्टडी करके मेंटल क्राइसिस को ओवरकम किया। 1830 को जेएस मिल की मुलाकात
हेरियट हडी टेलर से होती है और इसी समय जेएस मिल को इनसे प्यार हो जाता है। 1849 को हेरियट टेलर के हस्बैंड जॉन टेलर की
डेथ हो जाती है और 1851 को हेरियट टेलर जेएस मिल से शादी कर लेती है। इसके बाद जेएस मिल ने हेरियट मिल को उनके ऑनर चीफ
ब्लेसिंग्स ऑफ हिज एकिस्टेंस के रूप में [संगीत] और ऐसा माना जाता है कि मिल ने ऑन लिबर्टी
और द सब्जेक्शन ऑफ वुमेन हेरियट मिल के साथ मिलकर लिखी 1873 को मिल की इंग्लैंड के एविंगटन में डेथ हो जाती है। जेएस मिल
के कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जो कि आपके एग्जाम के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। तो इसमें पहला वर्क आता है सिस्टम ऑफ
लॉजिक जो कि 1843 को पब्लिश होता है। इसमें इन्होंने कोहेरेंट फिलॉसोफी ऑफ पॉलिटिक्स की बात की जिसका मतलब यह है कि
इन्होंने फिलॉसोफी ऑफ पॉलिटिक्स को इस कृति में अच्छे ढंग से एक्सप्लेन किया। दूसरा वर्क इनका आता है प्रिंसिपल ऑफ
पॉलिटिकल इकोनॉमी जो कि 1848 को पब्लिश होता है। इसमें इन्होंने वेलफेयर इकोनॉमिक्स की बात की। अगला इनका वर्क आता
है ऑन द इंप्रूवमेंट इन द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ इंडिया जो कि 1858 को पब्लिश होता है और अगला इनका वर्क आता है ऑन लिबर्टी जो
कि 1859 को पब्लिश होता है। इस कृति में इन्होंने लिबर्टी लॉ एंड हार्म प्रिंसिपल को डिस्कस किया। अगला इनका वर्क आता है
कंसीडरेशंस ऑन रिप्रेजेंटेटिव गवर्नमेंट जो कि 1861 को पब्लिश होता है। इस कृति की खास बात यह है कि इसमें इन्होंने आइडियल
गवर्नमेंट की बात की जो कि प्रोपोशनल रिप्रेजेंटेशन पर बेस्ड होगा। इन्होंने इस कृति में प्रोटेक्शन ऑफ माइनॉरिटीज
इंस्टीटशंस ऑफ सेल्फ गवर्नमेंट की बात की। इनका अगला वर्क आता है यूटिलिटेरियनिज्म जो कि एक प्लेट था और यह 1863 को पब्लिश
होता है। इसकी खास बात यह है कि इसमें इन्होंने बेंथम का जो प्रिंसिपल है ग्रेटेस्ट हैप्पीनेस ऑफ द ग्रेटेस्ट नंबर
इसको इन्होंने इसमें एक्सप्लेन किया और इन्होंने इसमें जो बेंथम का यूटिलिटेरियनिज्म है इसको मॉडिफाई किया।
वहीं अगला इनका वर्क आता है द सब्जेक्शन ऑफ़ वुमेन जो कि 1869 को पब्लिश होता है। इसकी खास बात यह है कि इसमें इन्होंने तीन
प्रकार के जो एरियाज है उसमें वुमेन इक्वलिटी की बात की है। जिसमें पहला आता है राइट टू सफरेंस। दूसरा आता है राइट टू
एजुकेशन और तीसरा आता है इक्वल राइट्स इन जॉब्स। खास बात यह है कि ये जो कृति है ये जो वर्क ये इन्होंने अपनी पत्नी हेरियट
मिल के साथ लिखा। जेएसमिल के कुछ इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स रहे हैं जो कि आपके एग्ज़ाम के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। तो इन
कांसेप्ट्स में पहला कांसेप्ट आता है मॉडिफिकेशन ऑफ बेंथम्स यूटिलिटेरियनिज्म। हालांकि जे एस मिल भी एक यूटिलिटेरियन
थिंकर थे लेकिन इन्होंने बेंथम के यूटिलिटेरियनिज्म को कहीं ना कहीं मॉडिफाई किया और कुछ चीजें बेंथम की रिजेक्ट की।
अगला कांसेप्ट इनका आता है टिरनी ऑफ़ द मेजॉरिटी। इन्होंने यह बताया कि जो डेमोक्रेसी होती है उसमें जो मासेस होते
हैं यानी कि जो मेजॉरिटी पीपल होते हैं उनकी टिरनी होती है उनकी तानाशाही होती है। अगला इनका कांसेप्ट आता है प्लूरल
वोटिंग जो कि इनका अजीबोगरीब एक कांसेप्ट है। इसके अंतर्गत इन्होंने यह बताया कि जो अधिक कुशल और जो एजुकेटेड लोग हैं उनको एक
से अधिक वोट देने का अधिकार होगा। उदाहरण के लिए इन्होंने यह कहा कि जो कुशल श्रमिक होते हैं, उनको एक अतिरिक्त मत देने का
अधिकार और जो फोरमैन होते हैं, उनको दो मत देने का अधिकार और जो राइटर्स होते हैं, यूनिवर्सिटी प्रोफ़ेसर्स होते हैं,
आर्टिस्ट होते हैं, उनको पांच मत देने का अधिकार होगा। इस प्रकार से जे एस मिल ने प्लूरल वोटिंग की वकालत की। अगला इनका
कांसेप्ट आता है हार्म प्रिंसिपल। यह बेसिकली जुड़ा हुआ है जो अदर रिगार्डिंग एक्शन है उससे। जेएस मिल यह कहते हैं कि
अगर कोई व्यक्ति ऐसा काम करता है जो दूसरे की लिबर्टी को स्वतंत्रता को हार्म करता है तो ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति की जो
लिबर्टी है यानी कि जो एकशंस है उसको बाधित किया जा सकता है। चेक किया जा सकता है। लिमिट किया जा सकता है। इनका अगला
कांसेप्ट आता है इक्वल राइट्स टू वुमेन। जेएसमिल ऐसे विचारक रहे हैं जिन्होंने महिलाओं के लिए भी पुरुषों के समान ही
इक्वल राइट्स की वकालत की। अगला इनका कॉन्सेप्ट आता है प्रपोशनल रिप्रेजेंटेशन जिसका मतलब यह है कि जो हमारे
रिप्रेजेंटेटिव्स होते हैं उनको प्रपोर्शन के आधार पर नियुक्त किया जाना चाहिए यानी कि इलेक्ट किया जाना चाहिए। अगला इनका
कॉन्सेप्ट आता है रिप्रेजेंटेटिव और डेवलपमेंटल डेमोक्रेसी यानी कि इन्होंने डेवलपमेंटल डेमोक्रेसी की बात की और
रिप्रेजेंटेशन की बात की। अगला इनका कांसेप्ट आता है कि इन्होंने इंडिविजुअल फ्रीडम और इंडिविजुअलिटी को डिफेंस किया।
जिसका मतलब यह है कि इन्होंने यह बोला कि इंडिविजुअल सोसाइटी का सेंटर होता है। इंडिविजुअल एंड होता है। जबकि स्टेट और
सोसाइटी मीन होते हैं जो कि इंडिविजुअल की फ्रीडम के लिए काम करेंगे। अगला इनका कांसेप्ट आता है कि इन्होंने माइनॉरिटी के
ऊपर फोकस किया क्योंकि इन्होंने बोला कि डेमोक्रेटिक रीजी में जो मासेस होते हैं उनकी वजह से माइनॉरिटी का शोषण होता है।
उनको सप्रेस किया जाता है। इसीलिए हमें माइनॉरिटीज जो लोग होते हैं उनको भी कहीं ना कहीं राइट्स देने होंगे। और इनका अगला
कांसेप्ट आता है नेगेटिव लिबर्टी। जेस मिल को कहीं ना कहीं नेगेटिव लिबर्टी के चैंपियन के रूप में देखा जा सकता है।
क्योंकि इन्होंने यह बोला कि हर एक व्यक्ति को वह करने का अधिकार होता है, स्वतंत्रता होती है, लिबर्टी होती है जो
वह करना चाहता है जो कि कहीं ना कहीं नेगेटिव लिबर्टी का एक फॉर्म माना जा सकता है। अब हम जैस मिल के लिबर्टी के ऊपर
व्यूज को अच्छे से एक्सप्लेन कर लेते हैं जो कि हमारा कोर सब्जेक्ट है। तो सबसे पहली बात यह है कि इन्होंने अपने प्रमुख
वर्क ऑन लिबर्टी जो कि 1859 को पब्लिश होता है। इस कृति में अपने लिबर्टी के बारे में व्यूज दिए, आइडियाज दिए। अगली
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह इंडिविजुअल लिबर्टी के बहुत बड़े एडवोकेटर माने जाते हैं। इन्होंने फेमसली कहा भी था कि ओवर
हिमसेल्फ हिज बॉडी एंड माइंड एन इंडिविजुअल इज सोवन। जिसका मतलब यह है कि कोई व्यक्ति, कोई इंडिविजुअल स्वयं के
ऊपर, अपनी बॉडी यानी कि अपने शरीर और जो उसका माइंड होता है, उसका मन होता है, उसके ऊपर सोबर होता है, संप्रभु होता है।
यानी कि इन सभी चीजों के ऊपर उसका पूरा हक होता है, राइट होता है। अगली इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि जैसमिल ऐसे पहले
प्रोमिनेंट लिबरल थिंकर माने जाते हैं। जिन्होंने इस बात को रियलाइज़ किया कि जो कैपिटलिस्ट इकोनॉमी होती है उसमें जो
लेसफेयर इंडिविजुअलिज्म होता है उसमें जो वर्किंग क्लास है उनको डिप्र्राइव किया जाता है। और विचारणीय बात यह भी है कि
जेएसमिल जो फ्रीडम ऑफ थॉट एंड एक्सप्रेशन होती है ह्यूमन बीइंग की उसके कंप्लीट यानी कि बहुत बड़े सपोर्टर रहे हैं।
जेसमिल ने ह्यूमन बीइंग के फ्रीडम ऑफ थॉट एंड एक्सप्रेशन को डिफाइन करते हुए यह कहा था कि इंपोजिंग रेस्ट्रिकशंस ऑन फ्रीडम ऑफ
थॉट एंड एक्सप्रेशन ऑफ ह्यूमन बीइंग्स इज लाइक रोबिंग द प्रेजेंट एंड फ्यूचर जनरेशंस। जिसका मतलब यह है कि जैसमिल कहते
हैं कि अगर हम व्यक्ति के यानी कि इंडिविजुअल की जो फ्रीडम ऑफ थॉट एंड एक्सप्रेशन होती है। विचार या अभिव्यक्ति
की स्वतंत्रता होती है। अगर हम उसके ऊपर रेस्ट्रिकशंस यानी कि उसके ऊपर हम प्रतिबंध लगाते हैं तो इसका मतलब यह होगा
कि जो हमारी प्रेजेंट यानी कि वर्तमान की और जो फ्यूचर यानी कि भविष्य की जो जनरेशंस होती है, नस्लें होती है उनको हम
लूट रहे हैं। लूटने के समान है। इनके बारे में एक विचारणीय बात यह भी है कि इन्होंने यह कहा कि फ्रीडम का मतलब होता है जो
पर्सन होता है उसको आप अकेला छोड़ दो। उसे अपनी मनमर्जी से जो करना चाहता है उसे करने दिया जाए। इसका मतलब यह हुआ कि यह
कहते हैं कि फ्रीडम का रियल मीनिंग होता है कि जो व्यक्ति अपनी आत्मा के अनुसार करना चाहता है, उसे ऐसा करने दिया जाए और
ऐसा करने से उसे ना रोका जाए। जेस्मिल ने तीन प्रकार की फ्रीडम की बात की है। पहली इसमें फ्रीडम आती है फ्रीडम ऑफ थॉट एंड
एक्सप्रेशन। दूसरी इसमें फ्रीडम आती है फ्रीडम ऑफ एसोसिएशन। तीसरी इसमें फ्रीडम आती है फ्रीडम ऑफ वर्क। और फ्रीडम ऑफ वर्क
को इन्होंने दो भागों में बांटा है। जिसमें पहली फ्रीडम आती है सेल्फ रिगार्डिंग एक्शन और दूसरी फ्रीडम आती है
अदर रिगार्डिंग एकशंस जिसको मिलने खाम प्रिंसिपल कहा है। तो चलिए अब हम इनको एक-एक करके डिटेल में समझ लेते हैं। पहली
फ्रीडम आती है फ्रीडम ऑफ थॉट एंड एक्सप्रेशन। इसके बारे में जेएस मिल ने यह कहा कि द डेंजर टू फ्रीडम इज नॉट फ्रॉम
गवर्नमेंट बट फ्रॉम द टिनी ऑफ द मेजॉरिटी। जिसका मतलब यह है कि जेएस मिल कहते हैं कि हमारी फ्रीडम को खतरा डेंजर गवर्नमेंट से
नहीं है बल्कि टिनी ऑफ द मेजॉरिटी से है। इनकी खास बात यह भी रही है कि इन्होंने यह भी कहा कि द स्टेट द गुड ऑफ द स्टेट लाइज
इन द गुड ऑफ द इंडिविजुअल जिसका मतलब यह है कि व्यक्ति के हित में ही राज्य का हित होता है क्योंकि व्यक्ति ही एंड होता है
और स्टेट मीन होता है। अगली इनके बारे में खास बात यह है कि इन्होंने सनकी जो लोग होते हैं, पागल लोग होते हैं उनको भी
इन्होंने विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देने का अधिकार दिया। इन्होंने यह कहा कि चाहे सनकी व्यक्ति हो, पागल
व्यक्ति हो, विद्वान हो, सभी को थॉट एंड एक्सप्रेशन का राइट होना चाहिए। क्योंकि सभी की मत या फिर सभी की राय सोसाइटी के
लिए, राष्ट्र के लिए, स्टेट के लिए उपयोगी हो सकती है। इनकी खास बात यह भी है कि इन्होंने यह कहा कि जब आइडिया का स्ट्रगल
होता है तो उसमें सत्य यानी कि ट्रुथ की जीत होती है। जॉन स्टर्ट मिल ने एलेक्स डिटॉकबिले द्वारा लिखित बुक डेमोक्रेसी इन
अमेरिका को दो पार्ट्स में रिव्यू किया। पहला 1835 में। दूसरा 1840 में। खास बात यह है कि इस बुक का जेएस मिल की जो
फिलॉसोफी है, आइडियाज है, उनके ऊपर बहुत बड़ा इंपैक्ट किया और इस कृति में एलेक्स डिटॉक विले ने सबसे पहले टिरनी ऑफ द
मेजॉरिटी का कांसेप्ट दिया और जे एस मिल ने इस कांसेप्ट को बाद में यूज़ किया। तो टिरनी ऑफ़ द मेजॉरिटी का मतलब होता है
टिरनी ऑफ द मासेस। इसकी खास बात यह है कि मिल कहते हैं कि डेमोक्रेसी में माइनॉरिटी को सप्रेस किया जाता है ऑन द बेसिस ऑफ
मेजॉरिटी। और खास बात यह भी है कि मिल ने माइनॉरिटी राइट्स और इंडिविजुअल राइट्स के लिए आवाज उठाई। और एक इंपॉर्टेंट बात यह
भी है कि जेएस मिल ने रिप्रेजेंटेटिव रूल को प्रायोरिटी दी इंस्टीड ऑफ मेजॉरिटी रूल। नेक्स्ट फ्रीडम का नाम आता है फ्रीडम
ऑफ एसोसिएशन। तो इसमें जे एस मिल ने यह कहा कि फ्रीडम ऑफ एसोसिएशन का होना किसी भी व्यक्ति के लिए किसी भी इंडिविजुअल के
लिए अनिवार्य है। इंपॉर्टेंट है और ऐसा इसलिए है क्योंकि इससे जहां एक तरफ लोगों को पॉलिटिकल एजुकेशन मिलती है। वहीं दूसरी
तरफ इसमें लोगों की पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन बढ़ती है और लोग पर्सनल और फैमिली इंटरेस्ट से बाहर आते हैं। दूसरी
इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने फ्रीडम ऑफ वर्क की बात की। जिसका मतलब यह है कि इन्होंने दो प्रकार के इसमें एक्शंस की
बात की। जिसमें पहला एक्शन आता है सेल्फ रिगार्डिंग एकशंस। सेल्फ रिगार्डिंग एकशंस ऐसे एकशंस होते हैं जो व्यक्ति से स्वयं
जुड़े होते हैं यानी कि स्वयं के साथ संबंधित होते हैं और इनको करने से दूसरे व्यक्ति को हार्म नहीं होता है। उनकी
लिबर्टी या फिर फ्रीडम को नुकसान नहीं होता है और जेएस मिल कहते हैं कि ऐसे कार्य यानी कि ऐसे एकशंस कोई भी व्यक्ति
कर सकता है। इनको करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है। दूसरे प्रकार के एकशंस आते हैं अदर्स रिगार्डिंग एक्शंस
जिसका मतलब यह है कि ऐसे काम जिनसे या जिनको करने से दूसरों को नुकसान पहुंचता है उनको हार्म होता है या फिर उनकी जो
फ्रीडम है लिबर्टी है वह कहीं ना कहीं रेस्ट्रिक्ट होती है और इसी को जेसमिल ने हार्म प्रिंसिपल कहा है। इंपॉर्टेंट बात
यह भी है कि जेएस मिल यह कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को हार्म करता है, क्षति पहुंचाता है तो ऐसी स्थिति में
उसकी लिबर्टी को रेस्ट्रिक्ट किया जा सकता है जिसको हार्म प्रिंसिपल कहा जाता है। जेएसमिल एक ऐसे फिलॉसफर रहे हैं जिन्होंने
नेगेटिव लिबर्टी को पॉपुलराइज किया। इसका मतलब यह है कि इन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति अपने मन के अनुसार, अपनी आत्मा के
अनुसार काम कर सकता है। इसके बावजूद जेएस मिल ने फ्रीडम के ऊपर कुछ रीज़नेबल रेस्ट्रिकशंस लगाई। जिनमें पहली आती है
प्रिंसिपल ऑफ हार्म। इसका मतलब यह है कि अगर कोई व्यक्ति काम करता है और वह ऐसा काम करता है कि दूसरे की जो लिबर्टी है
फ्रीडम है उसको हार्म होता है तो ऐसी स्थिति में स्टेट उसकी लिबर्टी के ऊपर उसके एक्शन के ऊपर रेस्ट्रिकशंस लगा सकता
है। दूसरा इसमें आता है थ्रेट टू द सिक्योरिटी ऑफ द स्टेट। अगर राज्य की सुरक्षा को थ्रेट होता है तो ऐसी स्थिति
में भी इंडिविजुअल की लिबर्टी या फिर एक्शंस के ऊपर चेकक्स लगाई जा सकती है। अगला इसमें आता है ऑब्स्ट्रक्शन इन
परफॉर्मिंग सोशल ड्यूटी। इसका मतलब यह है कि अगर सामाजिक दायित्व या फिर जो सोशल ड्यूटी है उसको परफॉर्म करने में बाधाएं आ
रही है, ऑब्स्ट्रक्शन आ रहे हैं तो इसका मतलब यह है कि स्टेट वहां पर भी फ्रीडम के ऊपर रेस्ट्रिकशंस लगा सकता है। अगला
इंपॉर्टेंट पॉइंट यह आता है कि कंप्लीट आर्म टू अ पर्सन नोइंग और अननोइंगली। इसका मतलब यह है कि अगर कोई व्यक्ति जानबूझ के
अनजाने में स्वयं को क्षति पहुंचाता है, नुकसान करता है, हार्म करता है। उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति सुसाइड करने की कोशिश
करता है, डेथ करने की कोशिश करता है, तो ऐसी स्थिति में भी जो स्टेट है, वह इंडिविजुअल की लिबर्टी को नुकसान पहुंचा
सकता है। यानी कि उसको रोक सकता है, उसको कम कर सकता है, लिमिट कर सकता है। जेसमिल के लिबर्टी के ऊपर व्यूज को अंडरस्टैंड
करने के बाद अब हम इसको कंक्लूड कर लेते हैं। यानी कि इसके बेसिस को समझ लेते हैं। तो इसमें पहला पॉइंट यह आता है कि
इन्होंने टिनी ऑफ द मेजॉरिटी की बात की थी। दूसरा पॉइंट यह आता है कि इनकी फ्रीडम नेगेटिव फ्रीडम है। तीसरा पॉइंट यह आता है
कि इनकी फ्रीडम में आ प्रिंसिपल है। अगला पॉइंट इसका यह आता है कि इन्होंने इंडिविजुअलिटी की बात की है जिसका मतलब यह
है कि मिल के लिए इंडिविजुअल ही सब कुछ है और उसको बड़ी मात्रा में लिबर्टी है जिसमें कोई भी व्यक्ति कुछ भी कर सकता है।
हालांकि यह भी बात विचारणीय है कि जे एस मिल ने कुछ इंपॉर्टेंट रेस्ट्रिकशंस लगाए थे। इंडिविजुअलिटी का यहां पर यह मतलब है
कि इंडिविजुअल ही सोसाइटी के कोर में है और स्टेट मीन है जबकि इंडिविजुअल अपने आप में एंड है। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट यह आता
है कि इन्होंने फ्रीडम के अंतर्गत सेल्फ और अदर रिगार्डिंग एक्शंस की बात की थी। अगला पॉइंट यह आता है कि इन्होंने कहा कि
फ्रीडम हाई सोशल यूटिलिटी होती है। जिसका मतलब यह होता है कि फ्रीडम की वजह से ही लोग हैप्पीनेस को गेन करते हैं। इसीलिए जो
फ्रीडम होती है उसकी सोशल यूटिलिटी होती है वह भी हाई होती है। अगला पॉइंट यह आता है कि इंडिविजुअल अपने आप में एंड होता
है। स्टेट मीन होता है। और लास्ट पॉइंट यानी कि बेस आता है इनकी फ्रीडम का यह कि फ्रीडम नेचुरल नहीं होती है। बल्कि इसको
कल्टीवेट करना पड़ता है, बनाना पड़ता है। जेएस मिल्क लिबर्टी को कई विचारकों ने क्रिटिसाइज किया है। जिनमें पहला नाम आता
है आर्नेस्ट बार्कर का। इन्होंने यह कहा कि जेएसमिल प्रॉफेट ऑफ एन एंप्टी लिबर्टी है। जिसका मतलब यह है कि इन्होंने यह कहा
कि जेएसमिल खोखली स्वतंत्रता के पैगंबर है। और ऐसा इसलिए इन्होंने कहा क्योंकि यह कहते हैं कि जहां जेएस मिल एक तरफ व्यक्ति
को स्वतंत्रता देते हैं, वहीं दूसरी तरफ दूसरे हाथ से लेते हैं। और ऐसा इसलिए है क्योंकि जहां एक तरफ जेएस मिल स्वतंत्रता
के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। वहीं दूसरी तरफ इन्होंने इंडिविजुअल लिबर्टी के ऊपर बहुत सारे रेस्ट्रिकशंस
लगाए हैं। वहीं दूसरी तरफ विचारणीय बात यह भी है कि बेपर ने भी मिल को माना है रिलक्टेंट डेमोक्रेट जिसका मतलब यह है कि
मिल एक अनच्छुक लोकतंत्रवादी है। और ऐसा इसलिए बेपर कहते हैं क्योंकि बेपर बोलते हैं कि इनका लोकतंत्र यानी कि डेमोक्रेसी
के ऊपर बहुत कम विश्वास था। जेएस मिल ने स्वयं कहा था कि एजुकेशन लोगों के पास बहुत कम होती है। खासतौर पर डेमोक्रेसी
में मासेस का रूल होता है। वहां पर टिनी ऑफ द मेजॉरिटी होती है। इसीलिए जो माइनॉरिटी लोग होते हैं उनके हितों का
ध्यान नहीं रखा जाता है। इसीलिए बेपर्स जैसे विचारकों ने मिल को रिलक्टेंट डेमोक्रेट कहा।
फ्रेंच फेनोन का जन्म 20 जुलाई 1925 को कैरेबियन आइसलैंड की एक फ्रेंच कॉलोनी मार्टिनीक में होता है। 1943 में फेनोन
मार्टिन को लेफ्ट करके फ्री फ्रेंच फोर्सेस को जॉइ करते हैं और बाद में वह अल्जीरिया में भी सेना में काम करते हैं।
1945 में फेनोन मार्टिनिक आ जाते हैं और वहां पर लिबरेशन के लिए स्ट्रगल करते हैं। 1951 में फेनोन साइकेट्रिस्ट बन जाते हैं
और 1950 के बाद उनका असली स्ट्रगल शुरू होता है। उनकी जो फिलॉसोफी है उसकी शुरुआत होती है। फिलॉसोफी देना या फिर वक्स लिखना
वे शुरू कर देते हैं। वहीं 1954 में अल्जीरियन रेवोल्यूशन की शुरुआत हो जाती है और इसके अंतर्गत फेनोन फोर्ट डी
लिबरेशन नेशनल को ज्वॉइ करके अल्जीरियन रेवोल्यूशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और साथ में वे नेशनल लिबरेशन मूवमेंट
की शुरुआत करते हैं। 6 दिसंबर 1961 को फेनोन की डेथ हो जाती है। फ्रांस फेनोन फ्रेंच कॉलोनी मार्टिनी के एक महान
साइकेट्रिस्ट, फिलॉसोफर, रेवोल्यूशनरी पॉलिटिकल थ्योरिस्ट और राइटर रहे हैं। और दूसरी सबसे इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि
फेनोन को पॉलिटिकल रेडिकल, पेन अफ्रीकनिस्ट और मार्क्सिस्ट ह्यूमनिस्ट के रूप में जाना जाता है। इनको पॉलिटिकल
रेडिकल इसलिए जाना जाता है क्योंकि इनके राजनीतिक विचार बड़े उग्र थे। जिनमें इन्होंने वायलेंस की बात की थी। वहीं पेन
अफ्रीकनिस्ट इनको इसलिए जाना जाता है क्योंकि इन्होंने अश्वेत जो रेस है उसके गौरव की बात की थी। उसके कल्चर की बात की
थी। वहीं मार्क्सिस्ट ह्यूमनिस्ट इन्हें इसलिए जाना जाता है क्योंकि मार्क्स के जो मानवतावादी विचार थे जिसे हम यंग मार्क्स
से जोड़ के देखते हैं। उससे यह काफी प्रभावित थे। फेनोन मार्क्सिस्ट स्कूल, ब्लैक
एग्जिस्टेंशियलिज्म और क्रिटिकल थ्योरी से जुड़े हैं। यानी कि मार्क्सिस्ट स्कूल और ब्लैक एग्जिस्टेंशियलिज्म और क्रिटिकल
थ्योरी में इनका काफी योगदान है। वहीं इनका जो मेन इंटरेस्ट है वो रहा है डीलोनाइजेशन पर, पोस्ट कॉलोनियलिज्म पे,
वायलेंट रेवोल्यूशन पर और साइकोपैथोलॉजी ऑफ कॉलोनियलिज्म पे। इन्होंने कहा कि चाहे कॉलोनाइजर हो या फिर कॉलोनाइज्ड हो। यानी
कि चाहे उपनिवेशवाद स्थापित करने वाले हो या फिर ऐसे देश जो गुलाम बने हुए हैं। दोनों के ऊपर ही
कॉलोनियलिज्म या फिर उपनिवेशवाद का नेगेटिव असर पड़ता है। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जिनमें पहला
आता है ब्लैक स्किन वाइट मास्क्स। दूसरा अ डाइंग कॉलोनिज्म। तीसरा द रिसेट ऑफ द अर्थ। चौथा टुवर्ड्स द अफ्रीकन
रेवोल्यूशन। और पांचवा है एलिनेशन एंड फ्रीडम। सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनके जितने भी बॉक्स रहे हैं जो आप
स्क्रीन पर भी देख रहे हैं ये सारे के सारे जीन पॉल सातरे लाका और नेगट्यूड मूवमेंट जो कि 1930 के दशक में काफी
प्रचलित रहा उससे यह प्रभावित हैं। अब हम बात कर लेते हैं फेनोन की फिलॉसोफी एंड थॉट्स की। 1961 में फेनोन की प्रमुख कृति
द रेचड ऑफ द अर्थ पब्लिश होती है। और इस कृति में फेनोन कहते हैं कि वलेंस डीलोनाइजेशन अर्थात वी उपनिवेशवाद की
प्राप्ति के लिए जरूरी है। अतः जितने भी एक्टिविस्ट्स रहे हैं उनको वायलेंस का प्रयोग करना चाहिए। और इस कृति में फेनोन
यह भी कहते हैं कि क्लास, रेस, नेशनल कल्चर, वायलेंस की नेशनल लिबरेशन में बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस
कृति में इन्होंने कॉलोनियलिज़्म और डॉलोनाइजेशन का साइकोलॉजी, हिस्ट्री, सोशियो कल्चर और पॉलिटिकल के आधार पर
एक्सप्लेनेशन दिया है। और इन्होंने कहा है कि साइकोलॉजी, हिस्ट्री, सोशियो कल्चर एंड पॉलिटिकल के आधार पर ही कॉलोनियलिज्म
स्थापित होता है और इन्हीं आधारों पर डीकोलोनाइज़ेशन की स्थापना की जाएगी। फेनोन आगे लिखते हैं कि वायलेशन से ही नेशनल
लिबरेशन पॉसिबल है। इस प्रकार फेनोन ने वायलेंट रेवोल्यूशन का सपोर्ट किया है। पूरी तरह से समर्थन किया है। अब हम फेनोन
के इंपॉर्टेंट कांसेप्ट कॉलोनियलिज्म को अच्छे से समझ लेते हैं। अपनी प्रमुख कृति द रिच ऑफ द अर्थ में फेनोन कॉलोनियलिज्म
का कांसेप्ट देते हैं और कहते हैं कि कॉलोनियलिज्म का दोनों कॉलोनाइजर और कॉलोनाइज्ड दोनों पर ही नेगेटिव इफ़ेक्ट
पड़ता है। और अपनी दूसरी प्रमुख कृति ब्लैक स्किन बाइट मास्क में कहते हैं कि दोनों ही रेसेस कॉलोनाइजर और कॉलोनाइज्ड
कॉलोनिज्म के अंडर तनाव में रहती है। फेनोन कहते हैं कि उपनिवेशवाद दो क्फ्लिक्टिंग सोसाइटीज की क्रिएशन होती
है। जिनमें पहला आता है कॉलोनाइजर। कॉलोनाइजर ऐसे देशों का समूह होता है जो पावरफुल होते हैं और अपनी शक्ति के बल पर
ऐसे देशों को जो कमजोर होते हैं लेकिन संसाधन उनके पास भरपूर होते हैं उनको अपने नियंत्रण में करके उनका शोषण करते हैं।
उदाहरण के लिए हम ब्रिटेन, फ्रांस, पुर्तगाल को कॉलोनाइजर कह सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ कॉलोनाइज्ड ऐसे देश होते हैं
जिनके पास संसाधन तो भरपूर होते हैं लेकिन कमजोर होते हैं और उनका इन्हीं पावरफुल देशों के द्वारा शोषण किया जाता है। उनको
अपने नियंत्रण में स्थापित किया जाता है। उदाहरण के लिए इंडिया हो, श्रीलंका हो या फिर लैटिन और अफ्रीकन महाद्वीप के जितने
भी देश रहे हैं उनको हम कॉलोनाइज्ड कह सकते हैं। वहीं फेनोन आगे लिखते हैं कि उपनिवेशवाद ने कॉलोनाइज्ड अर्थात ब्लैक्स
को अस्तभ्य बना दिया है। और कॉलोनियल जितने भी मास्टर्स हैं उन्होंने उपनिवेशवाद को पुलिस और जो मिलिट्री की
वायलेंस है उसके द्वारा कायम रखा है। इस प्रकार से फेनोन कहते हैं कि कॉलोनियलिज्म अर्थात उपनिवेशवाद अपने आप में एक हिंसा
है। अब हम फेनोन के डॉलोनाइजेशन संबंधी विचारों को अच्छे से देख लेते हैं। तो फेनोन लिखते हैं कि वायलेंट रेवोल्यूशन का
होना बहुत जरूरी है। अगर हम नेशनल लिबरेशन और डीलोनाइजेशन को सफल बनाना चाहते हैं। और आगे फेनोन लिखते हैं कि जो कॉलोनियल
वर्ल्ड है वह वास्तव में एक वयलेंट वर्ल्ड है। क्योंकि उसने कॉलोनियलिज्म को वायलेंस के द्वारा ही स्थापित किया है। और वहां पे
जो लोग रहते हैं वो बेसिकली पोस्ट ट्रेमेटिक डिसऑर्डर के शिकार हैं। जिस प्रकार से पोस्ट ट्रिमेटिक डिसऑर्डर होता
है जहां पर लोग वायलेंस में रहते हैं, स्ट्रेस में रहते हैं, ए्जायटी में रहते हैं, स्ट्रेस में रहते हैं, नेगेटिव थॉट
सोचते हैं। उसी तरह से फेनोन कहते हैं कि इस वलेंट वर्ल्ड के जो लोग हैं वे भी पोस्ट ट्रोमेटिक डिसऑर्डर से ग्रसित है।
अर्थात नेगेटिव थॉट्स, वायलेंस, स्ट्रेस, ए्जायटी से ग्रसित है। अतः फेनोन कहते हैं कि जो नेटिव सोसाइटीज हैं या फिर ब्लैक्स
है, कॉलोनाइजर है इनको डीह्यूमनाइज्ड किया जाता है। अमानुषिक बनाया जाता है और डील्क्चर्ड किया जाता है। अर्थात इनको खुद
के कल्चर से बाहर निकाला जाता है, वंचित किया जाता है। और आगे फेनो लिखते हैं कि वायलेंट रेवोल्यूशन का होना बहुत जरूरी
है। अगर हमें डीलोनाइजेशन को स्थापित करना है और नए प्रकार की ह्यूमन सोसाइटी की स्थापना करनी है। इस प्रकार से फेनोन ने
कहा है कि जो डीलोनाइजेशन है वह दो प्रकार का होता है। पहला होता है फिजिकली और दूसरा होता है साइकोलॉजिकली। फेनोन लिखते
हैं कि फिजिकली डीलोनाइजेशन वह होता है जब नेटिव लैंड से जो कॉलोनाइजर है या फिर वाइट पीपल है उनको भगाया जाता है। उनको
हिंसा के द्वारा वहां से खदेड़ा जाता है। वहीं साइकोलॉजी पे यह कहते हैं कि साइकोलॉजिकली बेसिकली ऐसा डीलोनाइजेशन
होता है। जहां पे जो ब्लैक्स है जो कॉलोनाइज्ड है उनको साइकोलॉजिकली श्रेष्ठ बनाया जाता है। उनको यह विश्वास दिलाया
जाता है कि वे श्रेष्ठ है। उनकी जो ब्लैक रेस है वह श्रेष्ठ है और उनका जो कल्चर है वह अपने आप में एक गौरवमय है। तो इस
प्रकार से फेनोन ने दो प्रकार के डीलोनाइजेशन की बात की है। पहला फिजिकली दूसरा साइकोलॉजिकली।
अब हम बात कर लेते हैं फेनोन के की आइडियाज की। तो सबसे पहला इनका आईडिया आता है डबल कॉन्शियसनेस का। और इस आईडिया को
सबसे पहले कॉइन किया था डब्ल्यूईबी ड्यू बॉयस ने। यह 1903 में एक अपनी बुक लिखते हैं जिसका नाम है द सोल्स ऑफ ब्लैक फोक।
और इसी में यह सबसे पहले डबल कॉन्शियसनेस का आईडिया को देते हैं और बाद में फेनोन इस शब्दावली को यूज करते हैं और कहते हैं
कि ब्लैक पीपल वाइट पीपल को फॉलो कर रहे हैं। और ऐसा वे इसलिए कर रहे हैं क्योंकि ब्लैक पीपल अपने आप को इंफीरियर समझते
हैं। और खुद का जो कल्चर है, लैंग्वेज है, सोशियोइकोनॉमिक स्टेटस है, उसको डल अर्थात बेकार समझते हैं। इनफीरियर अर्थात हीन
समझते हैं। और इसी वजह से जो भी ब्लैक पीपल है या फिर अफ्रीकन अमेरिकन लोग हैं वेस्टर्न कल्चर, वेस्टर्न लैंग्वेजज़,
वेस्टर्न रिलीजन, वेस्टर्न सोशियोइकोनॉमिक स्टेटस को अपना रहे हैं ताकि वे भी वेस्टर्न लोगों की तरह ही सुपीरियर अर्थात
श्रेष्ठ और सिविलाइज्ड अर्थात सभ्य बना सके खुद को। तो, ऐसी स्थिति में फेनोन दो प्रकार के कॉन्शियसनेस की बात कहते हैं।
यह कहते हैं कि पहली है नेटिव कॉन्शियसनेस। अर्थात ऐसी कॉन्शसनेस जो मूल रूप से ब्लैक पीपल की है। क्यों? क्योंकि
यह कॉन्शियसनेस उस भावना को रिप्रेजेंट करते हैं जहां पे ब्लैक पीपल का जन्म होता है। उनकी खुद की संस्कृति जुड़ी हुई है।
धर्म भाषा जुड़ा हुआ है। वहीं दूसरी जो कॉन्शियसनेस है वो है वेस्टर्न कॉन्शियसनेस। और यह कॉन्शसनेस ऐसी है जो
ब्लैक पीपल के द्वारा अपनाई जा रही है। यानी कि खुद के अंदर विकसित की जा रही है। क्यों? क्योंकि जो ब्लैक पीपल है वे खुद
ही जो वेस्टर्न लोग हैं उनके कल्चर, उनकी संस्कृति, उनकी भाषा, उनका जो रिलीजन है, उनका जो सामाजिक आर्थिक स्ट्रक्चर है,
उसको अपना रहे हैं। तो इस प्रकार से फेनोन ने दो प्रकार की कॉन्शियसनेस की बात की है और इसी को डबल कॉन्शियसनेस कहा जाता है।
फेनोन का अगला इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है आइडिया ऑफ ब्लैकनेस। और इस आईडिया को वह अपनी प्रमुख कृति ब्लैक स्किन वाइट मास्क
जो कि 1952 में पब्लिश होती है उसमें देते हैं। और यह कहते हैं कि ब्लैकनेस बेसिकली काले यानी कि ब्लैक पीपल की साइकोलॉजिकल
प्रॉब्लम रही है। और यह कहते हैं कि कॉलोनियलिज्म की वजह से जो ब्लैक पीपल है या फिर नेटिव पीपल है वे अमानुषिक बन गए
हैं। डीह्यूमनाइज्ड हो गए हैं। और ऐसा इसलिए है क्योंकि ब्लैक पीपल अपने आप को इनफीरियर समझते हैं। इसीलिए वह कोशिश कर
रहे हैं। वाइट पीपल का जो कल्चर है, लैंग्वेज है, उनके वैल्यूज़ है, उसको अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। और इसको
बेसिकली कहा जाता है मिरर इमेज ऑफ़ द वाइट मैन। यानी कि जिस तरह से वाइट पीपल होते हैं, उसी तरह से वे भी बनना चाहते हैं।
उनकी तरह दिखना चाहते हैं। उनकी तरह कल्चर अपनाना चाहते हैं। उनकी तरह सिविलाइज्ड होना चाहते हैं। उनकी तरह लैंग्वेज बोलना
चाहते हैं। तो इस वजह से फेनोन कहते हैं कि आखिर जो ब्लैक पीपल है वे वाइट क्यों बनना चाहते हैं? तो फेनोन कहते हैं कि वे
वाइट इसलिए बनना चाहते हैं क्योंकि जो वाइट पीपल है यानी कि जो वेस्टर्न वर्ल्ड के जो लोग हैं वे उनको रियलाइज करवाते हैं
कि जो ब्लैक पीपल है यानी कि जो कॉलोनाइज्ड पीपल है वे इनफीरियर है। हीन है, डल है, बैकवर्ड है, अनसिविलाइज्ड है।
और दूसरी तरफ़ वे कहते हैं कि जो वेस्टर्न पीपल है वे मॉडर्न है, रैशन है, सिविलाइज्ड है। तो इस वजह से फेनोन कहते
हैं कि जो ब्लैक पीपल है वे अपने आप को एक हीन पिछड़ी हुई रेस समझते हैं और वह कहते हैं कि इस प्रकार से उनका खुद का फेलियर
है क्योंकि वे ऐसी रेस में पैदा हुए हैं जो पिछड़ी हुई है जो अनसिविलाइज्ड है जो रैशन नहीं है और इसी वजह से जो ब्लैक लोग
हैं उनके अंदर इनफीरियरिटी का कॉम्प्लेक्स आ जाता है। यानी कि अपने आप को वेस्टर्न पीपल से कम समझने लगते हैं। और इस वजह से
जो वाइट रेस है उसको माना जाता है कि वे सिविलाइज्ड रेस हैं। और जो ब्लैक रेस हैं वह अनसिविलाइज्ड रेस हैं। फेनोन का अगला
इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है वाइट मैन बर्डन थ्योरी। और इस इंपॉर्टेंट नोशन को इन्होंने दिया है अपनी प्रमुख कृति ब्लैक
स्किन वाइट मास्क। और जिसमें यह कहते हैं कि ऐसा माना जाता है कि जो ब्लैक लोग होते हैं वह इंफीरियर होते हैं, हीन होते हैं।
कैनवल अर्थात नरभक्षी होते हैं। अनसिबिलाइज्ड अर्थात असभ्य होते हैं। दूसरी तरफ ऐसा माना जाता है कि जो वाइट
पीपल है वे सुपीरियर होते हैं। रैशन होते हैं, सिविलाइज्ड होते हैं। और इसी तरह से ऐसी मान्यता बना दी गई है कि क्योंकि जो
वाइट पीपल है वे सुपीरियर होते हैं, रैशन होते हैं। और दूसरी तरफ ब्लैक्स इंफीरियर होते हैं, कैनबल होते हैं, अनस्टिविलाइज
होते हैं। इसी तरह से या फिर इसी वजह से जो वाइट पीपल है उनकी यह जिम्मेदारी है कि वे अपनी तरह ही उन ब्लैक जो लोग हैं उनको
ह्यूमनाइज करें, सिविलाइज करें और इसी थ्योरी को इसी मान्यता को वाइट मैन वर्डन के रूप में देखा जाता है। अब हम बात कर
लेते हैं नेगट्यूड की। तो बेसिकली सबसे पहले नेगेट्यूड शब्द को कॉइन किया था 1930 के दशक में एमए फर्नाड सिज़र ने और सबसे
इंपॉर्टेंट बात यह है कि नेगेट्यूड बेसिकली एक लिटरेरी और पॉलिटिकल मूवमेंट रहा है जिसने कि यूरोपियन कॉलोनाइजेशन ऑफ
अफ्रीका इंपीरियलिज्म और लिगेसी ऑफ कल्चरल रेसिज्म की कठोर आलोचना की उसका विरोध किया और इस नेगेटिव मूवमेंट का नेतृत्व
1930 के दशक में एम एम ए सिज़ेर, लियोफोल्ड सैगर और लन डेमस ने 1930 के दशक में किया। और सबसे बड़ी बात यह है कि इस मूवमेंट का
जो उद्देश्य है वह है ब्लैक कॉन्शियसनेस को कल्टीवेट करना। ब्लैक कॉन्शियसनेस का मतलब यह है कि जो ब्लैक रेस है उसको अच्छा
मानना। उसको गौरव के रूप में समझना और ब्लैक लोगों के अंतर्गत यह चेतना विकसित करना कि वे यह समझे कि उनकी जो जाति है
उनकी जो रेस है वो अपने आप में श्रेष्ठ है। उनका रंग भले ही काला हो लेकिन वो अच्छा है और वे भी सिविलाइज्ड हैं। तो इस
मूवमेंट से फेनोन काफी इंस्पायर्ड हुए थे और इस मूवमेंट के अंतर्गत फेनोन ने बात की थी कि प्राइड ऑफ ब्लैक रेस अर्थात जो
ब्लैक रेस है उसके गौरव की इन्होंने बात की थी। फेनोन का अगला इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है कॉलोनियल एलिनेशन। तो इसके अंतर्गत
फेनोन कहते हैं कि जो कॉलोनाइज्ड पीपल है वे एलिनेटेड हो जाते हैं। अर्थात पराए हो जाते हैं खुद के लैंग्वेजज़ से। खुद के
कल्चर से खुद का जो सोशियोइकोनॉमिक कंडीशंस है उससे वे पराए हो जाते हैं। और ऐसा इसलिए है क्योंकि फेनोन कहते हैं कि
कॉलोनियलिज्म के अंतर्गत जो कॉलोनाइज्ड पीपल है वे कॉलोनाइज़र्स के कल्चर, उनकी लैंग्वेजज़, उनके सोशियोइकोनॉमिक स्टेटस को
अपना लेते हैं। तो इस वजह से फिनोन कहते हैं कि जो कॉलोनाइज्ड पीपल होते हैं और ब्लैक पीपल होते हैं वे अपने खुद के कल्चर
को उनकी भाषाओं को भूल जाते हैं और उसके स्थान पर जो वेस्टर्न कल्चर है, वेस्टर्न सिविलाइजेशन है, उनकी भाषा है, उनका
रिलीजन है, उसको अपना लेते हैं। और इसी को सिंपल भाषा में कॉलोनियल एलिनेशन कहा जाता है। अब हम लास्ट में एक इंपॉर्टेंट
कंपैरिजन गांधी और फेनोन के बीच कर लेते हैं। क्योंकि दोनों ही बहुत बड़े स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं। लेकिन इनके
विचारों और इनके जो मीम्स हैं उस पर जमीन आसमान का फर्क था। इसीलिए इन दोनों के बीच एक कंपैरिजन करना तो बनता है। तो जहां एक
तरफ गांधी ने बात की थी नॉन वायलेंस की अर्थात गांधी ने कहा था कि हमें स्वतंत्रता अर्थात लिबरेशन अहिंसा के
द्वारा प्राप्त करनी है। वहीं फेनोन कहते थे कि कॉलोनियलिज्म वायलेंस के आधार पर स्थापित हुआ था। इसीलिए वायलेंस के द्वारा
ही नेशनल फ्रीडम या फिर नेशनल लिबरेशन की प्राप्ति हो सकती है। वहीं एक तरफ गांधी ने हिंदू स्वराज की बात की थी जिसके
अंतर्गत गांधी ने कहा था कि हिंदू स्वराज दो आधारों पर होगा। एक फिजिकली और दूसरा होगा स्पिरिचुअली। वहीं फेनोन ने बात की
थी नेशनल लिबरेशन की जिसके अंतर्गत फेनोन कहते हैं कि नेशनल लिबरेशन भी दो आधारों पर होगा। एक फिजिकली दूसरा साइकोलॉजिकली।
वहीं एक तरफ गांधी ने सत्याग्रह की बात की थी। दूसरी तरफ फेनोन ने बात की थी वायलेंट रेवोल्यूशन की। वहीं एक तरफ गांधी ने बात
की थी कास्ट की। वहीं दूसरी तरफ फेनोन ने बात की थी रेस की। तो यह है गांधी और फेनोन के बीच इंपॉर्टेंट कंपैरिजन। अब हम
लास्ट में बात कर लेते हैं उन सोर्सेज और रेफरेंसेस की जिनकी वजह से मैं यह एक अच्छी वीडियो बना पाया। तो स्क्रीन पर
जितने भी आपको यह रिसोर्सेज और सोर्सेज दिख रहे हैं उनके लिए दिल से धन्यवाद। और आपने जो इस वीडियो को ना केवल देखा बल्कि
अच्छे से समझा, वीडियो को लाइक किया, चैनल को सब्सक्राइब किया, शेयर किया उसके लिए भी दिल से धन्यवाद।
फर्स्ट चैप्टर आता है धर्मशास्त्र। तो जब हम बात करते हैं धर्मशास्त्र की तो सबसे पहली बात यह है कि धर्मशास्त्र जो जितने
भी एंशिएंट संस्कृत ग्रंथ रहे हैं उनका एक कलेक्शन है कंपाइलेशन है जो कि हिंदुओं के लिए यह बताता है कि नैतिकता के साथ किस
तरह से जीवन यापन को किया जाए। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह साइंस ऑफ धर्मा की बात करता है और तीसरी सबसे बड़ी बात यह है कि
यह बताता है कि व्यक्ति को स्वयं के प्रति अपनी फैमिली के प्रति और जो उसकी कम्युनिटी है, समुदाय है, सोसाइटी है उसके
प्रति जो उसकी रिस्पांसिबिलिटीज होती है, ऑब्लिगेशंस होती है और जो मोरालिटी होती है, उसके बारे में यह एक्सप्लेनेशन देता
है। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो मनुस्मृति है, यह धर्मशास्त्र का पार्ट है, हिस्सा है। हिंदू ट्रेडिशंस में टू इंपॉर्टेंट
ट्रेडिशंस आती है। जिनमें पहली ट्रेडिशन का नाम आता है धर्मशास्त्र और दूसरी ट्रेडिशन का नाम आता है अर्थशास्त्र।
अर्थशास्त्र को हम नेक्स्ट चैप्टर में अच्छे से डिस्कस करेंगे। परंतु जब हम बात करते हैं धर्मशास्त्र की तो यह एक हिंदू
टेक्स्ट है जिसको कि हम दो भागों में श्रुति और दूसरा सम्मृति में बांट सकते हैं। तो जब हम बात करते हैं श्रुति की तो
श्रुति का मतलब होता है वेद और दूसरी तरफ सम्मृति का मतलब है मनुस्मृति अर्थात धर्मशास्त्र जो कि मनु के साथ जुड़ा हुआ
है। तो अगर हम वेदास यानी कि श्रुति की बात करें तो इसमें कुछ बातें हमें ध्यान में रखनी है। जैसी यह बात करता है इटरनल
लॉज़ ऑफ द यूनिवर्स की। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह जो लॉ है ऐसा माना जाता है कि यह गॉड के द्वारा दिए गए हैं। और सबसे बड़ी
बात यह है कि श्रुति का मतलब होता है लिसनिंग सुनना। इसका मतलब यह हुआ कि इसे केवल सुना गया था। इसका मतलब यह हुआ कि
इसका कोई लेखक नहीं है और खास बात यह है कि इसकी जो लैंग्वेज है वह वैदिक संस्कृत है। दूसरी तरफ जब हम बात करते हैं समृद्धि
की तो इसका मतलब यह है कि इसमें इस तरह की गाइडलाइंस दी गई है कि किस तरह से कोई व्यक्ति अपने जीवन को अच्छे तरीके से
व्यतीत कर सकता है, स्पेंड कर सकता है। और खास बात है कि इसकी जो लैंग्वेज है वह लौकिक संस्कृत है। यानी कि आम भाषा वाली
जो संस्कृत है उसमें इसका प्रयोग किया गया है और दूसरी बड़ी बात यह है कि इसको लिखा गया है और जो सेजेस हैं और जो सेंट्स हैं
यानी कि साधु और जो संत है उसके द्वारा इसे लिखा गया है। सबसे इंपॉर्टेंट और नोट करने वाली बात यह है कि जो हिंदू
स्क्रिप्चर्स है उसकी जो ग्लोरियस हिस्ट्री रही है और जो नॉलेज रही है उसको कहीं ना कहीं उजागर करने में इंट्रोड्यूस
करने में दो इंपॉर्टेंट व्यक्तियों का रोल रहा है। जिनमें पहला नाम इसमें आता है सर विलियम जों्स का और दूसरा नाम इसमें आता
है पांडुरंग ओवीकाने का। तो जब हम बात करते हैं विलियम जों्स की तो बड़ी बात यह है कि ईस्ट इंडिया कंपनी में यह जज रह
चुके हैं। 1784 में इन्होंने एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल की स्थापना की और खास बात यह है कि इन्होंने ही 1794 में
इंग्लिश ट्रांसलेशन किया मनुसमृद्धि का पहली बार। दूसरी तरफ जब हम बात करते हैं पांडुरंग वी का की तो सबसे महत्वपूर्ण जो
बात है आपको याद रखनी है इन्होंने 1930 में हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र नामक बुक लिखी और इसी कार्य के लिए और जो इन्होंने
इंडियन सोसाइटी में कंट्रीब्यूशन दिया इसके लिए 1963 में इन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। राजा मनु ने ही
मनुस्मृति को लिखा था। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो किंग मनु है उसको ह्यूमैनिटी का फर्स्ट टीचर माना जाता है। जिसने जो समाज
में मनुष्य का जो ज्ञान है नॉलेज है उसको महर्षि भृगु के सामने प्रकट किया था। उसके सामने रखा था। बोला था। दूसरी बड़ी बात यह
है कि जो मनु है इनको जाना जाता है फर्स्ट किंग ऑफ द वर्ल्ड और इनको ह्यूमन जो बीइंग है उसके फादर के रूप में भी जाना जाता है।
दूसरी बड़ी बात यह है कि इनको फर्स्ट लॉ गीबर भी माना जाता है और सबसे खास बात यह है कि ऐसी मान्यता है कि जो मनु है वो
परमपिता ब्रह्मा के पुत्र थे और साथ में जो मनु है इनको मनुष्य जाति का यानी कि जो ह्यूमन रेस है उसका ओरिजिनल सोर्स माना
जाता है। मनु के द्वारा रचित मनुस्मृति को मानव संहिता, मानव धर्मशास्त्र और एंथ्रोपोलॉजी आदि नामों से भी जाना जाता
है। मनुस्मृति में 12 चैप्टर और 2694 श्लोक हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इसको लिखा गया था 200 ईसा पूर्व से 200 ईसवी के
मध्य। और दूसरी सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि सर विलियम जॉन्स के द्वारा 1794 को ऑर्डिनेंस ऑफ मनु के नाम से इसको अंग्रेजी
में पहली बार अनुदित यानी कि ट्रांसलेटेड किया गया था। दूसरी बड़ी बात यह भी है कि ऐसा माना जाता है कि यह जो ग्रंथ है
मनुस्मृति यह संस्कृत भाषा से अंग्रेजी में अनुवादित पहला ग्रंथ था। अब हम मनुस्मृति के कंटेंट को डिटेल में समझ
लेते हैं। तो जब हम बात करते हैं मनुस्मृति की तो इसका प्रमुख ऑब्जेक्टिव प्रमुख पर्पस यह है कि धर्म को किस तरह से
एस्टैब्लिश करना है। धर्म का दूसरा मतलब है लॉ एंड ऑर्डर को किस तरह से बनाए रखना है। इसमें उन नियमों के बारे में बताया
गया है। उन रूल्स और रेगुलेशन के बारे में बताया गया है जो व्यक्ति, परिवार और वर्ण को नियंत्रित करते हैं। इसका मतलब ये है
कि इसमें इस तरह की गाइडलाइंस दी गई है जिसमें एक अच्छा समाज किस तरह से मेंटेन रहता है, चलायमान होता है और मनु को पहला
कानून निर्माता भी माना जाता है। दूसरी बड़ी बात यह है कि मनुस्मृति ही ऐसा प्रथम ग्रंथ है जिसमें भारतीय जो सभ्य समाज है
उसकी नींव रखी गई थी। उसकी फाउंडेशन रखी गई थी। और इसमें यह सिखाया गया भारतीयों को कि मानव जीवन का अल्टीमेट जो पर्पज
होता है वो क्या होता है और जो धर्मा है उसमें मानव जीवन का क्या महत्व है तो इस तरह से हम कह सकते हैं कि जो मनुस्मृति है
यह भारतीय कानून की पहली संहिता है और अगर हम मनुस्मृति को कंक्लूड करें तो हम कह सकते हैं कि यह बेसिकली जो मनुस्मृति है
वो मनु का लॉ है जिसका मतलब यह है कि यह हिंदू लॉ है जिसमें यह बताया गया है कि मानव को किस तरह से एक आदर्श जीवन यापन
करना चाहिए और कहीं ना कहीं जो मानव है उसको धर्म के अनुसार अपना जीवन यापन कैसे करना चाहिए। उसके जीवन में धर्म का क्या
महत्व है? इन सभी चीजों के बारे में मनुस्मृति में विस्तार पूर्वक राजा मनु ने उल्लेख किया है। अब हम मनु के द्वारा दिए
गए धर्म और जो दंड है उसके कांसेप्ट को भी समझ लेते हैं। तो धर्म की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द दृह धातु से हुई है।
जिसका मतलब होता है धारण करना। उदाहरण के लिए जब व्यक्ति जो अपनी ड्यूटी होती है, नॉन वायलेंस होती है, जस्टिस होता है,
मोरालिटी होती है, वर्चू होते हैं। यह जितने भी गुण होते हैं, इनको जब व्यक्ति धारण करता है, तो उसको आप कह सकते हैं
धर्म। इसका दूसरा मतलब यह भी है कि जितनी भी यह सारी चीज़ें बताई गई है, इनको व्यक्ति को अपने जीवन में अडॉप्ट करना
धारण करना अनिवार्य है। दूसरी बड़ी बात यह है कि मनु कहते हैं कि जो धर्म है वो राज्य का मूल आधार है। फंडामेंटल बेस है।
दूसरी बड़ी बात यह है कि मनु कहते हैं कि राज्य का जो उत्पत्ति है या फिर अस्तित्व है वो इसीलिए हुआ कि जो रिलीजन है उसको
एनफोर्स किया जाए। और दूसरी बड़ी बात यह भी है कि राज्य एक ऐसी संस्था है जो धर्म पर आधारित जितने भी मानदंड होते हैं उनको
स्थापित करती है। उदाहरण के लिए जैसे महात्मा गांधी ने परिभाषित किया था धर्म को कि पॉलिटिक्स विदाउट रिलीजन इज अ डेथ
प्रप बिकॉज़ इट किल्स द सोल। जिसका मतलब यह है कि धर्म के बिना राजनीति मृत्यु का फंदा होता है क्योंकि यह आत्मा को मार
डालती है, किल करती है। अथर्ववेद में धर्मा को बहुत अच्छे ढंग से परिभाषित किया गया है जिसमें यह कहा गया है कि दुनिया
धर्म पर टिकी है। अगर संसार में धर्म नहीं रहेगा तो एनार्की फैल जाएगी और जैसे ही एनार्की फैल जाएगी तो संसार खत्म हो
जाएगा। प्रलय आ जाएगी। मनुस्मृति में राजा मनु ने चार प्रकार के दंडों की बात की है। जिनमें पहला दंड आता है वाकदंड। जिसका
मतलब यह होता है कि किसी को डांटना या फिर डांट के रूप में पनिश करना। दूसरा आता है इसमें अर्थदंड जिसका मतलब होता है फाइन
लगाना। अगर कोई अपराधी है उसके ऊपर। और तीसरा इसमें आता है दिक्त दंड जिसका मतलब होता है धिक्कार के या फिर डांट लगा के
किसी को पनिश करना। आपने सुना भी होगा। अगर कोई व्यक्ति अपराध करता है, गलत काम करता है तो आपने अक्सर सुना होगा धिक्कार
है तुझे। तो इस तरह से दिक्क दंड का मतलब होता है धिक्कार कह के या किसी की निंदा करके उसको पनिश करना और चौथे प्रकार का
दंड आता है भौतिक दंड जिसमें कि फिजिकल पनिशमेंट दी जाती है। जैसे किसी को कोड़े मारना या फिर उसका जो अंग है बॉडी का
पार्ट है उसको अलग करना या फिर फांसी की सजा देना। अब हम राजा मनु की डिवाइन ओरिजिन थ्योरी ऑफ किंगशिप को अच्छे से
डिस्कस कर लेते हैं। तो इस थ्योरी का वर्णन इन्होंने अपनी मनुस्मृति के चैप्टर सेवन में डिस्कस किया है। दूसरी बात यह है
कि यह कहते हैं कि ईश्वर ने पृथ्वी पर मत्स्य न्याय की समाप्ति और लॉ एंड ऑर्डर को एस्टैब्लिश करने के लिए राजा की
व्यवस्था की। मनुस्मृति में राज्य का वर्णन नहीं है बल्कि राजा की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है। दूसरी बड़ी बात यह है कि
मनु यह कहते हैं कि राजा सूर्य, चंद्र, यम, कुबेर, इंद्र, वरुण, पवन और अग्नि इन आठ देवताओं से बनता है, निर्मित होता है।
अगली इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि मनुस्मृति में राजा मनु कहते हैं कि राजा अपने कार्यों के लिए ईश्वर के प्रति
जिम्मेदार होता है ना कि प्रजा के प्रति। और दूसरी बड़ी बात यह भी है कि इस सिद्धांत को अर्ध अनुबंध सिद्धांत अर्थात
क्वाजाय कॉन्ट्रकुअल थ्योरी कहा जाता है और ऐसा इसलिए है क्योंकि यह समझौता राजा और भगवान के बीच हुआ था। उसी की वजह से जो
राज्य हैं उसकी उत्पत्ति होती है। इस प्रकार मनुस्मृति में राजा मनु क्वाजाय कॉन्ट्रक्चुअल थ्योरी को देते हैं क्योंकि
मनु का सामाजिक समझौता लोगों और राज्यों के बीच ना होकर राजा और भगवान के बीच होता है। मनु कहते हैं कि राज्य की उत्पत्ति से
पहले समाज में अनाकी फैली हुई थी क्योंकि वहां पर कोई राजा नहीं था। वहां पर मत्स्य न्याय था और सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसी
स्थिति में लोग एक दूसरे के ऊपर अत्याचार करते थे। मत्स्य न्याय का मतलब होता है कि जैसे ताकतवर और बड़ी मछली छोटी मछली को खा
जाती है उसी प्रकार से उस समय राज्य से पूर्व की जो अवस्था थी उसमें ताकतवर लोग जो कमजोर लोग थे उनका शोषण करते थे। तो
वहां पर एक प्रकार की जिसकी लाठी उसकी भैंस की अवस्था थी। माइट इज राइट की अवस्था मौजूद थी। जिसका मतलब यह था कि
सिर्फ उसी व्यक्ति की चलेगी। उसका ही सुना जाएगा। उसको ही अधिकार प्राप्त होंगे जो पावरफुल होगा। अब हम राजा मनु की सप्तांग
थ्योरी को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। जिसको अंग्रेजी में सेवन ऑर्गन थ्योरी ऑफ द स्टेट कहते हैं। तो सबसे बड़ी बात यह है
कि यह कहते हैं कि जिस प्रकार से शरीर में जो अंग होते हैं ह्यूमन बीइंग के उसकी इंपॉर्टेंट भूमिका होती है। उसी तरह से
स्टेट के भी कुछ ऑर्गन्स होते हैं जिनकी इंपॉर्टेंट भूमिका होती है। इसीलिए मनु का जो राज्य हैं वह ऑर्गेनिक राज्य हैं।
अर्थात आंगिक राज्य हैं। इसको बेसिकली सात प्रकृतियां कहा जाता है। जिनमें पहला जो तत्व है वह है स्वामी जिसका मतलब होता है
राजा किंग। दूसरा इसमें आता है आमात्य जिनको मिनिस्टर्स कहा जाता है। मंत्री कहा जाता है। तीसरा अंग आता है पुर जिसको आप
कैपिटल राजधानी कहते हैं। चौथा इसमें आता है राष्ट्रनेशन। पांचवा इसमें आता है कोष खजाना और छठा इसमें आता है दंड यानी कि लॉ
एंड ऑर्डर और सातवां इसमें आता है मित्र राष्ट्र यानी कि अलायस। अब हम राजा मनु की विदेश नीति को अच्छे से डिस्कस कर लेते
हैं। तो विदेश नीति के संबंध में इन्होंने सिक्स फोल्ड पॉलिसी को दिया है। जिसका मतलब है कि इन्होंने ऐसी छह नीतियों या
फिर छह ऐसे गुणों की बात की है जिसको कहीं ना कहीं विदेश नीति बनाते समय संबंधित देश को ध्यान में रखना होता है। तो इसमें पहली
नीति आती है ट्रीटी ऑफ़ पीस जिसको आप संधि कहते हैं। दूसरी इसमें आती है विग्रह जिसका मतलब होता है डिवाइड एंड रूल। तीसरा
इसमें आता है यान जिसका मतलब यह होता है कि आप युद्ध की तैयारी करते हैं। युद्ध के लिए आप प्रस्थान करते हैं और इसमें अगला
आता है आसन न्यूट्रलिटी जिसमें आप चुपचाप बैठते हैं। ज्यादा आप दिलचस्पी नहीं लेते हैं किसी भी मामले में। और अगला इसमें आता
है संशय। इसका मतलब यह होता है कि किसी के आश्रय में रहना। इसका मतलब यह है कि जब कोई देश कमजोर होता है और उसे यह लगता है
कि वह ताकतवर देश से नहीं लड़ सकता है तो ऐसी स्थिति में उसके आश्रय में कमजोर देश रहता है और उससे मैक्सिमम बेनिफिट लेता है
और अगला लास्ट इसमें आता है द्वेदी भाव जिसका मतलब होता है डिप्लोमेटिक मेनबुरिंद इसका मतलब यह होता है कि कोई देश एक साथ
दो तरह की पॉलिसी अपना सकता है। दो तरह के व्यवहार रख सकता है। हो सकता है कि एक देश के साथ कोई देश मैत्री भाव रखें और दूसरे
देश के साथ दुश्मनी यानी कि युद्ध की तैयारी करें। अब हम विदेश नीति संबंधी मनु के फोर मेथड्स को भी डिस्कस कर लेते हैं।
जिसमें पहला आता है साम। साम का मतलब यह होता है कि किसी से चापलूसी से या फिर किसी की खुशामदी करके काम करवाना। उससे
लाभ लेना। दूसरा इसमें आता है दाम। दाम का मतलब है कि पैसे का लालच देकर किसी से काम करवाना। तीसरा इसमें आता है दंड यानी कि
किसी को भय दिखाकर पनिश का जो भय है उसको दिखाकर काम करवाना उससे लाभ लेना और इसमें अगला आता है भेद जिसका मतलब होता है
डिवाइड एंड रूल की नीति को अपनाना जैसे कि अंग्रेजों ने भारत का विभाजन करने के लिए किया था। अब हम मनु के सोशल सिस्टम को
अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो इन्होंने मनुस्मृति में सोशल सिस्टम की बात की है। जिसके उन्होंने टू इंपॉर्टेंट अंग यानी कि
ऑर्ग्स की बात की है। जिनमें पहला आता है वर्ण सिस्टम और दूसरा इसमें आता है आश्रम सिस्टम। तो जब हम बात करते हैं आश्रम
सिस्टम की तो इसमें इन्होंने चार प्रकार के आश्रमों की बात की है। जिनमें पहला आता है ब्रह्मचर्य आश्रम जो कि जीरो से 25 साल
तक चलता है और इसमें किसी भी व्यक्ति को ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। सेलिब्रेसी का पालन करना होता है। अपनी
स्टडी करनी होती है और किसी भी प्रकार का फिजिकल रिलेशनशिप या फिर प्यार-व्यार के चक्कर में नहीं पड़ना होता है। दूसरा
आश्रम आता है गृहस्थ आश्रम। यह 26 साल से 50 साल तक चलता है। जिसमें कोई भी व्यक्ति अपना गृहस्थ जीवन आरंभ कर सकता है। जिसका
मतलब यह है कि शादी कोई व्यक्ति कर सकता है। परिवार का सुख भोग सकता है। बच्चे पैदा कर सकता है। फिर तीसरा आता है
वानप्रस्थ जो कि 51 से 75 साल तक चलता है। इसमें व्यक्ति को वनों में रहना पड़ता है और कंदमूल फल खाकर अपना जीवन यापन करना
होता है। और लास्ट आता है सन्यास आश्रम जो कि 76 साल से 100 साल तक चलता है। इसमें व्यक्ति को सब कुछ छोड़कर अपना ऐसा जीवन
यापन करना पड़ता है जो सादा हो, पवित्र हो जो उसके लिए मोक्ष के दरवाजे खोल दे। वहीं दूसरी तरफ जब हम बात करते हैं वर्ण
व्यवस्था की तो इसमें पहला आता है ब्राह्मण। दूसरा इसमें आता है क्षत्रिय, तीसरा इसमें आता है वैश्य और चौथा इसमें
आता है शूद्र। ब्राह्मणों को वर्ण सिस्टम में सबसे उच्च स्थान था। वहीं शूद्रों को सबसे निम्नतम स्थान था। विचारणीय बात यह
है कि डॉक्टर बी आर अंबेडकर ने मनुस्मृति की आलोचना की। इन्होंने उसे जला दिया और इन्होंने कहा कि मनुस्मृति में शूद्रों को
कोई अधिकार नहीं था। अंबेडकर ने दलितों के उत्थान के लिए संघर्ष किया। जिस वजह से इनको आधुनिक मनु भी कहा जाता है। इसका
मतलब यह है कि डॉ. अंबेडकर ने मनुस्मृति को इसलिए जलाया क्योंकि उन्हें यह लगता था कि इसकी वजह से जो शूद्र हैं उनकी जो
स्थिति है और दयनीय हो गई है क्योंकि इसमें जितने भी प्रावधान है वह सिर्फ उच्च वर्गों के लिए हैं। वहीं दूसरी तरफ कार्ल
पॉपर ने अपनी प्रमुख कृति ओपन सोसाइटी एंड इट्स एनिमीज़ जो कि 1945 को पब्लिश होती है। जिसमें इन्होंने प्लेटो हिगल मार्क्स
को मुक्त समाज के शत्रु कहा। इन्होंने बोला कि यह जो व्यक्ति है, यह जो फिलॉसोफर है, यह कहीं ना कहीं जो ओपन सोसाइटी होती
है, उसके एनिमी हैं और यह क्लोज्ड जो सोसाइटी है, उसके फिलॉसोफर है। उसी तरह अगर हम मनु की बात करें, तो हम इनको भी
ओपन सोसाइटी के एनिमी कह सकते हैं और क्लोज्ड सोसाइटी के फिलॉसोफर मान सकते हैं। राजा मनु ने मनुस्मृति में चार
पुरुषार्थों की बात की है। जिनमें पहला आता है धर्म। धर्म का मतलब है कि सही काम करना। मोरल वैल्यूज़ को अपनी लाइफ में
अडॉप्ट करना। यानी कि जो नैतिकता है उससे परिपूर्ण जीवन को जीना। और दूसरा इसमें आता है अर्थ जिसका मतलब यह है कि पैसा
कमाना ताकि आप अपने जीवन को अच्छे ढंग से जी सके। तीसरा इसमें आता है काम जिसका मतलब यह है कि आप अपने जीवन को और अच्छा
मधुर बना सकते हैं और अच्छा बना सकते हैं। जब आप शादी करते हैं, परिवार में रहते हैं, आपकी फैमिली होती है, आपको फिजिकल
प्लेजर मिलता है और लास्ट में आता है मोक्ष। जिसका मतलब है कि जब आपने सब कुछ भोग लिया तो अब ईश्वर की खोज में स्वयं की
खोज में निकले। एक ऐसी ऊंचाई पर पहुंचे जहां आप सभी बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। जहां पर आपको सेल्फ एक्चुअलाइजेशन प्राप्त
हो जाता है। जैसा कि बुद्धा को प्राप्त हुआ था। महावीर को प्राप्त हुआ था या फिर और भी बहुत सारे मनीषियों को प्राप्त हुआ
था। राजा मनु ने 13 प्रकार के संस्कारों की बात की है। जबकि हिंदू परंपरा में 16 संस्कारों का जिक्र मिलता है। तो इसमें
पहला संस्कार आता है गर्भादान। दूसरा आता है पंसवन। तीसरा इसमें आता है सीमांत नयन। चौथा संस्कार आता है जातक कर्म। पांचवा
आता है नामकरण। छठा आता है निष्क्रमण। सातवां आता है अन्य प्रश्नम। आठवां आता है चूड़ा कर्म। नाइंथ आता है उपनयन। 10थ आता
है केशांत, 11वां आता है समावर्तन और 12वां आता है विवाह और 13वां आता है अंत्यष्टि। वहीं दूसरी तरफ राजा मनु ने
प्रकृति के तीन गुणों की बात की है। जिन गुणों के आधार पर ही व्यक्ति अपनी गतिविधियां करता है, कार्य करता है। तो
इसमें पहला आता है सत, दूसरा आता है राजस और तीसरा आता है तमस। जब हम बात करते हैं सत की तो यह हाईएस्ट गुण होता है, वर्चू
होता है जिसमें व्यक्ति के अंदर गुडनेस होती है, कामनेस होती है और उसका जो जीवन है वह कहीं ना कहीं हारमोनियस होता है।
दूसरा आता है राजस जिसमें पैशन होता है, व्यक्ति के अंदर एक्टिविटीज करता है, मूवमेंट करता है। उसके जीवन में उथल-पुथल
रहती है। और तीसरा आता है तमस जो कि सबसे लो लेवल का गुण होता है। जिसमें व्यक्ति के पास इग्नोरेंस होती है, इनर्शिया होती
है, लेजीनेस होती है और तमस गुण से परिपूर्ण व्यक्ति गलत काम करता है। किसी की किलिंग करना, रेप करना, इस तरह की
चीजें व्यक्ति तब करता है जब उसके अंदर तमस जो गुण है, वह बहुत बड़ी मात्रा में पाया जाता है। राजा मनु ने मनुस्मृति में
राजा के अनेक कार्यों का वर्णन किया है। राजा मनु कहते हैं कि राजा क्षत्रिय क्लास से ही होगा। इन्होंने अनेकों कार्य राजा
को दिए हैं। जिनमें पहला कार्य आता है लोगों की बाहरी आक्रमण से सुरक्षा करना। दूसरा कार्य आता है लॉ एंड ऑर्डर को बनाए
रखना। तीसरा इसमें आता है जो कास्ट सिस्टम है उसको मेंटेन करना। चौथा इसमें आता है ब्राह्मणों की प्रोटेक्शन करना, सुरक्षा
करना। और अगला इसमें आता है जो सोशल इविल्स है उनको दूर करना। और अगला इसमें आता है व्यापारियों पर नियंत्रण स्थापित
करना। और लास्ट इसमें आता है जो इकोनॉमिक सिस्टम है उसको मेंटेन करना उसको कंट्रोल करना। राजा मनु ने मनुस्मृति में चार
प्रकार के नेशन स्टेट्स की बात की है। जिनमें पहला आता है मित्र अर्थात अलाइज़। दूसरा इसमें आता है शत्रु यानी कि एनिमीज़
और तीसरा इसमें आता है मध्यमा। मध्यमा एक ऐसा स्टेट होता है जो बड़े शक्तिशाली देशों के बीच होता है। उदाहरण के लिए 1991
तक चाइना और यूएसएसआर के बीच मंगोलिया एक बफर स्टेट था। मध्यमा था। वहीं लेबन इजराइल और सीरिया के बीच एक बफर स्टेट है।
वहीं इसमें चौथा नेशन स्टेट आता है उदासीन। अर्थात एक ऐसा राज्य जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भागीदारी नहीं
लेता है। कोई लेना देना नहीं रखता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से, समस्याओं से उदाहरण के लिए जैसे स्विट्जरलैंड है। राजा
मनु ने मनुस्मृति में कैबिनेट का भी वर्णन किया है। इन्होंने यह कहा कि राजा के लिए एक कैबिनेट का होना जरूरी है जिसमें सात
से आठ इंपॉर्टेंट मिनिस्टर्स को नियुक्त किया जा सकता है। हालांकि इन्होंने मिनिस्टर को अपॉइंट करने के तीन
इंपॉर्टेंट रास्ते वेज़ बताए जिनमें पहला इसमें आता है पैतृक ढंग जिसका मतलब यह है कि पिता के बाद पुत्र को नियुक्त किया जा
सकता है और पुत्र के बाद फिर आगे चलकर उसके पुत्र को नियुक्त किया जा सकता है मिनिस्टर के रूप में। दूसरा इसमें आता है
एग्जाम मेथड यानी कि परीक्षा विधि जिसमें एग्जाम देना होता है किसी भी व्यक्ति को अगर उसको मिनिस्टर बनना है और तीसरा इसमें
आता है कि राजा के द्वारा अपने वफादार यानी कि जो लॉयल फ्रेंड्स हैं उनको नियुक्त करना। लेकिन विचारणीय बात यह है
कि मनु ने कहा कि शूद्र जो वर्ग है वहां से कोई भी व्यक्ति मिनिस्टर नहीं बन सकता है। अब हम राजा मनु के टैक्सेशन सिस्टम को
अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो राजा मनु ने मनुसमृति में टैक्सेशन सिस्टम का जिक्र किया है। जिसमें इन्होंने राज्य की
सुरक्षा के लिए टैक्स का लगाया जाना अनिवार्य और बहुत ही महत्वपूर्ण माना है। हालांकि इन्होंने यह भी कहा कि प्रजा पर
अनावश्यक रूप से अननेसेसरी कोई भी टैक्स ना लगाया जाए बल्कि जो फसल होती है भूमि की उपज होती है उसको देखकर ही कर की वसूली
की जानी चाहिए। उदाहरण के लिए इन्होंने कहा जो सबसे ज्यादा उपजाऊ भूमि होती है वहां से 1/6 भाग कर के रूप में लिया जाना
चाहिए। उसके बाद जो कम उपजाऊ भूमि होती है वहां से 1/8 भाग कर के रूप में लिया जाना चाहिए। और उसके बाद जो उपजाऊ वाली भूमि
होती है वहां से 1/10 भाग लिया जाना चाहिए कर के रूप में। हालांकि नोट करने वाली बात यह है कि कुछ इंपॉर्टेंट और महंगी चीजें
जैसे हनी, मीट, फिश, एग, मिल्क, बटर, घी और जो कमर्शियल गुड्स होते हैं वहां से 1/6 भाग कर के रूप में लिया जाना अनिवार्य
है। राजा मनु ने चार प्रकार के टैक्सेस की बात की है। जिसमें पहला आता है बलि बलि टैक्स का एक ऐसा प्रकार था जो कृषि योग्य
भूमि और मवेशियों से लिया जाता था। दूसरा इसमें आता है शुल्क जो कि कृषि के उपज से लिया जाता था। तीसरा इसमें आता है दंड
यानी कि व्यक्ति को शारीरिक दंड इसमें दिया जाता था और चौथा इसमें आता है भाग यह भी फसल से अन्न के रूप में लिया जाता था।
वहीं दूसरी तरफ राजा मनु ने मनुस्मृति में लोकल गवर्नेंस को भी डिस्कस किया है। इन्होंने यह कहा कि लोकल गवर्नेंस में
सबसे छोटी इकाई गांव होती है और गांव में लोगों को अनेकों सुविधाएं होनी चाहिए। जैसे पानी, भोजन, ईंधन, मनोरंजन आदि। और
इसी वजह से राजा मनु को पहला ऐसा विचारक माना जाता है जिसने कल्याणकारी राज्य की बात की। इन्होंने यह कहा कि प्रशासन की
सुविधाओं के लिए जो राज्य हैं उसको अलग-अलग समूह में बांटा जा सकता है। उदाहरण के लिए जैसे इन्होंने 10 गांव का
समूह, 20 गांव का समूह, 50 गांव का समूह, 100 गांव का समूह और 1000 गांव का समूह। और खास बात यह भी है कि इन्होंने यह कहा
कि जो एक गांव का अध्यक्ष है उसको ग्रामाध्यक्ष कहा जाता है। 10 गांव के अध्यक्ष को दशाधिपति कहा जाता है। 20 गांव
के अध्यक्ष को विंशति और 100 गांव के अध्यक्ष को सती कहा जाता था। अब हम राजा मनु के स्त्री संबंधी विचारों को भी देख
लेते हैं। तो इन्होंने मनुस्मृति में स्त्री संबंधी विचारों को प्रकट किया है। जिसमें इन्होंने एक तरफ स्त्रियों को बहुत
अधिक सम्मान दिया है। वहीं दूसरी तरफ इन्होंने कहीं ना कहीं स्त्रियों को अधीन किया है पुरुषों के या फिर समाज के अधीन
किया है। मनुस्मृति में जहां एक तरफ कहा गया है कि यत्र नारस्तु पूजंते रमंते तत्र देवता जिसका मतलब यह है कि अगर नारियों की
पूजा होती है औरतों का मान सम्मान किया जाता है तो वहां पर देवता निवास करते हैं। गॉड रहते हैं। लेकिन दूसरी तरफ अगर देखा
जाए तो महिलाओं को मनु ने स्वतंत्रता नहीं दी। शिक्षा के अधिकार नहीं दिए। मनु कहते हैं कि स्त्रियों का चरित्र उच्च होना
चाहिए और अगर कोई स्त्री दूसरे पुरुष के साथ अवैध शारीरिक संबंध बनाती है तो ऐसी स्थिति में जो उसका पति है उसको उस स्त्री
के साथ संबंध नहीं बनाने चाहिए बल्कि उसे छोड़ देना चाहिए और खास बात यह भी है कि मनु कहते हैं कि एक स्त्री को बचपन में
पिता के अधीन शादी के बाद अपने पति के अधीन और पति की मृत्यु के बाद उसके पुत्र के अधीन रहना चाहिए। तो इस तरह से अगर हम
देखें तो हम कुल मिलाकर यही कह सकते हैं कि मनु के स्त्री संबंधी विचार नेगेटिव ही रहे हैं। नकारात्मक ही रहे हैं। बाबा साहब
आंबेडकर ने मनुस्मृति की आलोचना करते हुए लिखा था कि मनु ने जितना कठोर शूद्रों के लिए मनुस्मृति में लिखा है, उतना ही अधिक
कठोर औरतों के लिए भी लिखा है। अब हम यह भी समझ लेते हैं कि मनुस्मृति की प्रशंसा और आलोचना किन-किन लोगों ने की है। तो
इसमें सबसे पहला नाम आता है एम एम शंखुधर का जिन्होंने यह कहा कि मनुस्मृति संपूर्ण मानवता के लिए लिखी गई है। वहीं इसमें
दूसरा नाम आता है डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का एनी बेसेंट का और स्वामी दयानंद सरस्वती का जिन्होंने मनुसमृद्धि
की बहुत बड़ी मात्रा में प्रशंसा की और सबसे महत्वपूर्ण नाम आता है जर्मन विचारक फ्रेडरिक निशे का। जिन्होंने प्रशंसा करते
हुए यह कहा कि मनुस्मृति बाइबल की अपेक्षा कहीं अधिक अनुपम उत्कृष्ट बौद्धिक ग्रंथ है। जिसका मतलब यह है कि मनुस्मृति बाइबल
से अधिक एक्सीलेंट मोर यूनिक और इंटेलेक्चुअल बुक है। दूसरी तरफ स्वामी विवेकानंद ने कहा कि जो मनुस्मृति है वह
अप्रचलित हो चुकी है। ऑब्सोलेट हो चुकी है। जिसका मतलब यह है कि स्वामी विवेकानंद कहीं ना कहीं यह कहना चाहते हैं कि जिस
समय मनुस्मृति लिखी गई थी, हो सकता है उस समय इसका रेलेवेंस हो। लेकिन आज के जमाने के हिसाब से जो मनुस्मृति है वह अप्रचलित
हो चुकी है। दूसरी बात यह भी है कि डॉक्टर बी आर अंबेडकर ने इस ग्रंथ को दलितों के लिए अभिशाप मानते हुए कहा कि इस ग्रंथ को
बम से उड़ा देना चाहिए और ऐसा माना जाता है कि इन्होंने महद सत्याग्रह के दौरान 25 दिसंबर 1927 को मनुस्मृति को जलाया था।
पंडित नेहरू ने अपनी प्रमुख कृति डिस्कवरी ऑफ इंडिया जो कि 1946 को पब्लिश हुई थी। इसमें इन्होंने लिखा कि कौटिल्य इज द
मैकवली ऑफ़ इंडिया। अब हम कौटिल्य की लाइफ को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो कौटिल्य एंशिएंट इंडियन पॉलीमैक थे जो कि
एक टीचर, ऑथर, स्ट्रेटजिस्ट, फिलॉसोफर, इकोनॉमिस्ट, जरिस्ट और पॉलिटिशियन थे। खास बात यह है कि यह मौर्यन एंपायर के प्राइम
मिनिस्टर थे। जिनको कि ट्रेडिशनली जाना जाता था कौटिल्य और विष्णुगुप्त के नाम से। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह तक्षशिला
यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर थे। जिन्होंने कि मौर्यन एंपायर को एस्टैब्लिश किया और नंद डायनेस्टी को खत्म किया। दूसरी बड़ी बात
यह भी है कि इनको जाना जाता है फादर ऑफ एंशिएंट इंडियन पॉलिटिकल थॉट और इनको साथ में जाना जाता है फादर ऑफ क्लासिकल
रियलिज्म। खास बात यह भी है कि इन्होंने सर्व किया जो दो इंपॉर्टेंट एंपीयर थे चंद्रगुप्त और उनके पुत्र बिंदुसार उनके
एडवाइजर के रूप में काम किया और खास बात यह भी है कि जो कौटिल्य हैं इन्होंने कहा कि राजनीति में अकेली जो मोरालिटी होती है
केवल उसका रोल नहीं होता है। अब हम अर्थशास्त्र को डिस्कस कर लेते हैं। तो अर्थशास्त्र को लिखा गया था कौटिल्य के
द्वारा। इसकी लैंग्वेज थी संस्कृत और इसका मेन कंटेंट था स्टेट क्राफ्ट, इकोनॉमिक पॉलिसी, फॉरेन पॉलिसी, मिलिटरी स्ट्रेटजी,
मंडल थ्योरी, साइंस और पॉलिटिक्स। और इसमें कुछ और सब्जेक्ट्स को भी इंक्लूड किया गया था। जैसे नेचर ऑफ गवर्नमेंट, लॉ,
सिविल एंड क्रिमिनल कोर्ट, सिस्टम्स, एथिक्स, मार्केट एंड ट्रेड एंड थ्योरीज ऑफ वॉर एंड पीस को भी इसमें डिस्कस किया गया
था। लेकिन सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि आर सामा शास्त्री ने इसको 1905 में डिस्कवर किया था और यह 1909 को पब्लिश हुई
थी और 1915 में इसका पहला अंग्रेजी अनुवाद हुआ था। दूसरी बड़ी बात यह है कि पहली बार यह जो कृति है जर्मन में यानी कि जर्मन
लैंग्वेज में पब्लिश होती है 1909 को और इसको पब्लिश किया जाता है जकोवी के द्वारा। अर्थशास्त्र में कुल 15 किताबें
हैं और 150 चैप्टर्स हैं जबकि 6000 वर्सेस है और सबसे बड़ी बात यह है कि इसको जाना जाता है साइंस ऑफ पॉलिटिक्स और साइंस ऑफ
पॉलिटिकल इकोनमी और अर्थशास्त्र में हिंदू जो दर्शन है फिलॉसोफी है इसको दर्शाया गया है। दूसरी बड़ी बात यह है कि अर्थशास्त्र
को नीति शास्त्र के नाम से जाना जाता है। और सबसे इंपॉर्टेंट बात जो आपको याद रखनी है कि यह जो कृति है इसको फर्स्ट टेक्स्ट
बुक माना जाता है जिओपॉलिटिक्स की। कौटिल्य ने अर्थ को डिफाइन करते हुए कहा था कि अर्थ का मतलब होता है एक ऐसी भूमि
से जहां पर मनुष्य बसे हो। अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो उस पृथ्वी की प्राप्ति और रक्षा के साधनों को बताता है जिसका मतलब
होता है राजनीति का विज्ञान जिसको आप साइंस ऑफ पॉलिटिक्स कहते हैं। कौटिल्य ने फेमसली कहा कि सुखस्य मूलंम धर्म धर्मस्य
मूलंम अर्थस्य मूलंम राजस्य जिसका मतलब यह है कि जो हैप्पीनेस होती है उसका रूट होता है रिलीजन जबकि रिलीजन का रूट होता है
वेल्थ और वेल्थ का रूट होता है स्टेट। अब हम कौटिल्य की थ्योरी ऑफ़ ओरिजिन ऑफ़ द स्टेट को डिस्कस कर लेते हैं। तो कौटिल्य
कहते हैं कि स्टेट ऑफ नेचर में मत्स्य न्याय का बोलबाला था। अर्थात माइट इज राइट की अवस्था थी। यह कहते हैं कि ऐसा इसलिए
था क्योंकि ह्यूमन नेचर में कुछ वीकनेसेस पाई जाती है उदाहरण के लिए। जैसे लस्ट, ग्रीड, स्ट्राइविंग फॉर पावर, डोमिनेशन,
ईगो एंड सेल्फिशनेस। तो यह कहते हैं कि लोग स्टेट ऑफ नेचर की जो अवस्था थी उससे परेशान हो चुके थे। उससे छुटकारा पाना
चाहते थे। इसीलिए लोगों ने मनु से संपर्क किया और मनु ने उनका नेतृत्व किया और मनु ने वहां पर शांति और सुरक्षा स्थापित की।
दूसरी बड़ी बात यह है कि इसके लिए लोगों ने भी राजा को अपनी फसल का 1/6 भाग दिया और इन्होंने यह भी कहा कि जो लोग ट्रेड
करेंगे, बिजनेस करेंगे, उसका यह दवां भाग राजा को देंगे। तो इस तरह से हम कह सकते हैं कि जो कौटिल्य का राजा है वह कहीं ना
कहीं अस्तित्व में आता है शांति ऑर्डर और लोगों का वेलफेयर करने के लिए और जस्टिस को एश्योर करने के लिए। कौटिल्य ने स्टेट
के सेवन ऑर्ग्स की बात की। इसीलिए इनकी जो ये थ्योरी है इसको सेवन ऑर्गन थ्योरी ऑफ द स्टेट के नाम से जाना जाता है। और
इन्होंने इस थ्योरी को अर्थशास्त्र की जो बुक उसकी जो एक से लेके पांच तक जो बुक्स है उसमें वर्णन किया। तो इसमें पहला अंग
आता है स्वामी। दूसरा इसमें आता है अमात्य। तीसरा इसमें आता है जनपद। चौथा इसमें आता है दुर्ग जिसको फोर्ट कहते हैं।
पांचवा इसमें आता है कोष यानी कि खजाना। इसमें अगला आता है दंड यानी कि स्ट्रांग आर्मी और लास्ट इसमें आता है मित्र यानी
कि जो राज्य हैं उसके जो अलाइज है मित्र देश हैं वो इसमें शामिल होता है। स्टेट के ऑर्गन में पहला नाम आता है स्वामी अर्थात
किंग का जिसकी तुलना कौटिल्य ने सिर से की। तो इसमें पहली बात यह है कि यह राज्य का प्रथम और सर्वोपरि एलिमेंट होता है और
राजा राज ऋषि है। कौटिल्य कहते हैं कि जो मेरा राजा होगा वो सेज किंग होगा। यानी कि इनका जो राजा होगा वह कहीं ना कहीं प्लेटो
के फिलॉसफर किंग की तरह होगा। दूसरी बड़ी बात यह है कि राजा को फिजिकल, मेंटल, इंटेलेक्चुअल, स्पिरिचुअल जो क्वालिटीज है
वो होनी चाहिए। और इन्होंने कहा कि इस तरह का जो राजा होगा वह आत्मसम्मत होगा। एक इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि इनका जो राजा
होगा वो प्लेटो की तरह जो प्लेटो का फिलॉसोफर किंग था उसकी तरह होगा। और सबसे प्रमुख बात यह भी है कि इन्होंने कहा कि
जो चक्रवर्ती राजा होगा उसमें तीन गुण होने चाहिए। पहला इंटेलिजेंस, दूसरा मिलिट्री पावर और तीसरा फाइनेंशियल
सावधानी यानी कि जो फाइनेंशियल स्टेबिलिटी है वह होनी चाहिए। अगली इंपॉर्टेंट बात यह है कि कौटिल्य ने कहा कि प्रजा के सुख में
ही राजा का सुख है। जैसे इन्होंने कहा भी कि यथा राजा तथा प्रजा। और एक इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि राजा को जितेंद्रिय होना
चाहिए। यानी कि राजा का उसकी जो सेंसेस है उसके ऊपर कंट्रोल होना चाहिए। और एक प्रमुख बात यह भी है कि इन्होंने कहा कि
राजा का जो डेली रूटीन है वो आठ आठ आठ तीन भागों में डिवाइड होगा। और खास बात यह भी है कि इन्होंने कहा कि जो मेरा राजा है
यानी कि जो ऋषि राजा है उसको चार विद्याओं का ज्ञान होना चाहिए। फोर साइंसेस का उसके पास ज्ञान होना चाहिए। जिनमें पहला आता है
फिलॉसोफी। दूसरा आता है थ्री वेदाज़ का ज्ञान जिसको त्रेय कहा जाता है। अगला आता है वार्ता यानी कि जो वेल्थ है उसका ज्ञान
उसे होना चाहिए और लास्ट आता है दंड नीति यानी कि साइंस ऑफ गवर्नेंस उसे आना चाहिए। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में तीन प्रकार के
राजाओं की बात की है जिनमें पहला राजा आता है धर्म विजय राजा। दूसरा इसमें आता है लोभ विजय राजा और तीसरा इसमें आता है असुर
विजय राजा। तो धर्म विजय राजा वह राजा होता है जो धर्म से युक्त जो मींस होते हैं, साधन होते हैं, उनका प्रयोग करता है
और अपनी जो ग्लोरी है और जो साम्राज्य है उसका विस्तार करता है। लोभ विजय राजा वह राजा होता है जो केवल वेल्थ और जो लैंड
होती है उसकी लालसा रखता है। उसको अधिक से अधिक पाना चाहता है और उसको पाकर ही उसे चैन मिलता है। और तीसरा राजा जो असुर विजय
राजा होता है। यह एक ऐसा राजा होता है जो बड़ी मात्रा में वेल्थ चाहता है, लैंड चाहता है, वुमेन का जो प्लेजर है उसको
चाहता है और इन सभी चीजों को पाने के लिए वह अनफेयर जो मींस होते हैं, तरीके होते हैं उनका प्रयोग करता है। स्टेट का दूसरा
अंग आता है अमात्य जिनको मिनिस्टर्स कहा जाता है। इनकी तुलना कौटिल्य ने आंखों से की है। तो सबसे प्रमुख बात यह है कि
कौटिल्य ने कहा कि राजा और मंत्रियों को गाड़ी के साथ हम तुमा कर सकते हैं क्योंकि यह एक दूसरे के बिना बेकार है जिस तरह से
गाड़ी के पहिए एक दूसरे के बिना बेकार होते हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने कहा कि जो मिनिस्टर्स है इनको
चुना जा सकता है। व्यक्तिगत गुण के आधार पर कुलीन में अगर जन्म हो तब भी चुना जा सकता है और राजा के प्रति जो निष्ठा है
इनकी भक्ति है लॉयलिटी है उसके आधार पर भी मिनिस्टर्स को नियुक्त किया जा सकता है। अगली इंपॉर्टेंट बात यह है कि जो मंत्री
परिषद है यह ना तो बहुत बड़ी होनी चाहिए ना ही छोटी होनी चाहिए बल्कि जो परिषद होती है उससे राजा को सलाह लेनी चाहिए और
जो परिषद होती है उसमें महत्वपूर्ण पद होते हैं जैसे मंत्री प्रधानमंत्री सेनापति राजपुरोहित और जो युवराज होते
हैं। यह सारे महत्वपूर्ण पदों में आते हैं। दूसरी बड़ी बात यह भी है कि जो मंत्री होते हैं उनको अमात्य कहा जाता है।
जबकि जो प्रधानमंत्री है उसको महामात्य कहा जाता है। स्टेट का अगला ऑर्गन आता है जनपद जिसको आप पीपल या फिर टेरिटरी कह
सकते हैं। और इसकी तुलना कौटिल्य ने जगाऊ से की है। तो इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने जो जनपद है उसका एक
ऑर्गेनाइजेशन की बात की। उदाहरण के लिए इन्होंने कहा कि 10 गांव का समूह कहलाता है संग्रहण। 200 गांव का समूह कहलाता है
सार्वत्रिक, 400 गांव का समूह कहलाता है द्रोणमुख और 800 गांव का समूह कहलाता है स्थानीय। अगला ऑर्गन आता है दुर्ग जिसको
आप फोर्ट कहते हैं और इसकी तुलना इन्होंने की भुजाओं से। तो इसमें भी महत्वपूर्ण बात यह है कि कौटिल्य ने चार प्रकार के जो
किले होते हैं या किलेबंदी होती है उसका जिक्र अपनी प्रसिद्ध कृति अर्थशास्त्र में किया है। तो इसमें पहला आता है औदिक यानी
कि जो पानी से गिरा हुआ दुर्ग है। दूसरा इसमें आता है पर्वत यानी कि पर्वत से गिरा हुआ दुर्ग। तीसरा इसमें आता है धानवंत
यानी कि मरुस्थल के बीच और इसमें अगला आता है वन दुर्ग यानी कि चारों ओर वनों से गिरा हुआ किला। राज्य का अगला अंग आता है
कोष जिसकी तुलना कौटिल्य ने मुख से की है। तो इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कौटिल्य कहते हैं कि जो कोष वृद्धि होती
है वो ताकतवर राज्य का बेस होता है। आधार होता है और इन्होंने राजस्व प्राप्ति के लिए कुछ सिद्धांत कुछ थ्योरीज दी है
जिनमें पहली आती है परिपुष्ट सिद्धांत। दूसरी इसमें आती है दुर्लभ्य सिद्धांत और तीसरी इसमें आती है कर मुक्ति सिद्धांत।
परिपुष्ट सिद्धांत में यह आता है कि जो इंडस्ट्रीज होती है उसके ऊपर टैक्सेशन लगाया जाता है। दुर्लभ्य सिद्धांत में ऐसी
चीजों को कर मुक्त रखा जाता है जो बहुत ही दुर्लभ सामग्री हो जो बड़ी मुश्किल से मिलती हो और राज्य के लिए लाभदायक हो और
कर मुक्ति सिद्धांत वहां आता है जहां पर कुछ विशेष संस्कार व्रत यज्ञ और दान होते हैं उनको कर मुक्त किया जाता है। स्टेट का
अगला ऑर्गन आता है दंड जिसको आप जस्टिस मिलिट्री कह सकते हैं और इसकी तुलना कौटिल्य ने मस्तिष्क के साथ की है। तो
इसका प्रमुख उद्देश्य होता है मेंटेन लॉ एंड आर्डर। और खास बात यह है कि कौटिल्य ने दंड नीति के चार इंपॉर्टेंट पर्पस की
बात की है। जिनमें पहला पर्पज यह आता है कि जो आपके पास प्राप्त नहीं है, जो आपके पास नहीं है, उसको प्राप्त करना। दूसरा
आता है कि जो आपने प्राप्त किया उसका संरक्षण करना, प्रिजर्वेशन करना। तीसरा कि जो आपके पास संरक्षित है उसको और बढ़ाना,
उसकी वृद्धि करना और चौथा आता है कि जो आपने अर्जित किया, जो आपने बढ़ाया उसका सही तरीके से वितरण करना, डिस्ट्रीब्यूशन
करना। इस प्रकार से कौटिल्य ने दंड को इस तरह से परिभाषित किया है कि जो दंड होता है वह राज्य शक्ति और जो सोवनिटी होती है
उसका सिंबल होता है उसका प्रतीक होता है जो कि अर्थशास्त्र के जो ऑब्जेक्टिव्स है उसकी प्राप्ति का साधन होता है। स्टेट का
अगला ऑर्गन आता है एलाइस जिसको मित्र कहा जाता है और इसकी तुलना कौटिल्य ने कान से की है। तो इसकी खास बात यह है कि इसको
देखा जाता है कि किस तरह से एक स्टेट दूसरे स्टेट के साथ अपने संबंधों को रिलेशंस को स्थापित करता है। तो यह कहते
हैं कि हर एक स्टेट यह चाहता है कि उसके अपने जो इंटरेस्ट है, जो पावर है उसका मैक्सिमाइजेशन हो और कौटिल्य यह भी कहते
हैं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी स्टेट किसी का परमानेंट ना तो मित्र होता है, फ्रेंड होता है, ना ही एनिमी होता है।
दूसरी इंपॉर्टेंट बात ये है कि इन्होंने आइडियल जो मित्र होता है उसकी कुछ क्वालिटीज बताई है जैसे स्थिर यानी कि वो
लंबे समय तक उसका मित्र रहता है। उसके कंट्रोल में रहता है। पावरफुल होता है। इक्वल इंटरेस्ट होते हैं और जो उसकी जुबान
है जो वादा है उसका पक्का होता है। और खास बात यह है कि जब मदद की जरूरत होती है तो सेना जुटाने में ऐसा जो आइडियल मित्र है
वह सक्षम होता है। वहीं दूसरी तरफ इन्होंने कुछ मित्र के प्रकार बताए हैं। जैसे सहज मित्र यह रिलेटिव होता है और जो
कई जनरेशन से जिसके साथ फ्रेंडशिप हो ऐसे जो स्टेट है वह सहज मित्र कहलाते हैं। अगला आता है कृत्रिम यानी कि जो किसी
स्टेट के ऑब्लिगेशंस है या फिर एफर्ट्स है उसके द्वारा बनाया गया हो। तीसरा इसमें आता है प्राकृत। तो जो प्राकृत होता है यह
शत्रु का शत्रु होता है और मित्र का मित्र होता है। वहीं इन्होंने कुछ टाइप के एनिमीज़ भी बताए हैं जो सहज शत्रु होता है।
पहला जिसमें जो रिलेटिव्स होते हैं उसमें यह आते हैं। दूसरा कृत्रिम होता है जो कि एफर्ट के द्वारा या फिर जो हॉस्टिलिटी
होती है उसके द्वारा बन जाता है और फिर अगला आता है प्राकृत जो कि नेबरिंग किंग होता है। अब हम कौटिल्य की मंडल थ्योरी को
अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो कौटिल्य ने मंडल थ्योरी को अपनी प्रमुख कृति अर्थशास्त्र के चैप्टर नंबर टू में डिस्कस
किया है जो कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विदेश नीति से जुड़ी हुई है। कौटिल्य ने अंतरराष्ट्रीय संबंध की जो मंडल थ्योरी है
उसकी कुछ मान्यताएं बताई है जिनमें पहली आती है जियोफिकल डिटरमिनिज्म जिसका मतलब यह होता है कि जो जियोपॉलिटिक्स होती है
प्रत्येक स्टेट के लिए इंपॉर्टेंट होती है। दूसरा इसमें आता है कि जो नाइवर्स होते हैं वो नेचुरल एनिमी होते हैं। यानी
कि पड़ोसी प्राकृतिक दुश्मन होते हैं क्योंकि उनके साथ कुछ ना कुछ मुद्दों के ऊपर प्रॉब्लम्स क्रिएट हो जाती है। अगला
इसमें आता है कि जो एनिमी ऑफ़ एनिमी है वह फ्रेंड होता है। इसका मतलब यह है कि अगर किसी स्टेट का कोई एनिमी है तो उसका जो
एनिमी होगा वह आपका फ्रेंड हो जाएगा। और इसमें अगला आता है कि जो फ्रेंड और फ्रेंड है वह आपका फ्रेंड होगा। यानी कि आपका कोई
फ्रेंड है तो उसका जो फ्रेंड होगा वह आपका भी फ्रेंड होगा। इसमें अगला आता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई परमानेंट
फ्रेंड नहीं होता है। एनिमी नहीं होता है बल्कि सिचुएशन के अनुसार इंटरेस्ट के अनुसार बदलते रहते हैं। फिर इसमें अगला
आता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में निरंतर युद्ध चलते रहते हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि जो पावर होती है वह
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक साधन के रूप में होती है। मीन के रूप में होती है। अब हम मंडल थ्योरी को डायग्राम के थ्रू समझने
की कोशिश करते हैं। तो जो आपको ग्रीन सर्कल दिखाई दे रहा है यह बताता है कि जो बिजुगीशु राज्य हैं उसके फ्रेंड्स और जो
रेड सर्कल आपको दिखाई दे रहा है यह बताता है कि जो बिजुगीशु है उसके एनिमीज़ यानी कि दुश्मन इस तरह से कौटिल्य ने
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में 12 राज्यों का जिक्र किया है। तो सबसे सेंटर में होता है किंग यानी कि विजुगिशु राज्य विजय राज्य
जो कि जीतना चाहता है विजय होना चाहता है। तो इसमें जो विजुगिशु है उसके सामने सबसे पहला राज्य आता है अरि यानी कि शत्रु
अर्थात जो विजुगिशु है उसका शत्रु होगा क्योंकि रेड सर्कल में आता है। दूसरा इसमें आता है मित्र जो कि विजुगिशु का
मित्र होता है। इसमें तीसरा आता है दुश्मन का मित्र यानी कि अरिमित्रा क्योंकि आपका जो दुश्मन होगा उसका जो मित्र होगा वह
आपका भी दुश्मन होगा। फिर इसमें अगला आता है मित्रमित्रा यानी कि आपका जो मित्र है उसका जो मित्र होगा वह आपका भी मित्र
होगा। फिर इसमें अगला आता है अरिमित्रामित्रा यानी कि जो आपका दुश्मन होगा उसका जो
मित्र होगा वह आपका भी मित्र होगा। इसके अलावा कौटिल्य ने पीछे से भी कुछ राज्यों का जिक्र किया है जिनको कि विजुगिशु को
ध्यान रखना होता है। तो इसमें पहला आता है पार्श्व निग्रह जो कि शत्रु होता है। दूसरा इसमें आता है आक्रंदा जो कि मित्र
होता है। तीसरा आता है पार्श्व निग्रहसार जो कि शत्रु का मित्र होता है। यानी कि आपका जो शत्रु होगा उसका जो मित्र होगा वह
आपका भी शत्रु होगा। फिर इसमें अगला आता है मित्र का मित्र यानी कि आपका मित्र होगा उसका जो मित्र होगा वह आपका भी मित्र
होगा। अगला स्टेट आता है मध्यमा जिसको कि बफर स्टेट कहा जाता है और लास्ट में आता है उदासीन ऐसा राज्य जो तटस्थ होता है जो
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा कोई भूमिका नहीं निभाता है। कौटिल्य ने मनु की तरह चार मेथड्स की भी बात की है जिसमें
पहला आता है साम, दूसरा आता है दाम, तीसरा आता है दंड और चौथा आता है भेद यानी कि डिवाइड एंड रूल। अब हम कौटिल्य की सिक्स
फोल्ड पॉलिसी को भी डिस्कस कर लेते हैं जिसको कि षडग्गुणीय नीति कहा जाता है। इसमें कौटिल्य ने छह ऐसे गुणों की बात की
है जो कहीं ना कहीं किसी भी देश को अपनी विदेश नीति को बनाते समय निर्मित करते समय ध्यान में रखनी होती है। तो इसमें पहली
आती है संधि ट्रीटी ऑफ़ पीस। दूसरी इसमें आती है विग्रह। तीसरी इसमें आती है यान। चौथी इसमें आती है आसन। पांचवा इसमें आता
है संश्रय। और छठा इसमें आता है द्वेदी भाव यानी कि डिप्लोमेटिक में नोबिंग। इसके अलावा कौटिल्य ने चार विधाओं का जिक्र
किया है। यानी कि नॉलेज ऑफ फोर साइंसेस की बात की है। जिनमें पहली आती है अनविक्ष की जिसको फिलॉसोफी कहते हैं। दर्शन कहते हैं।
तो राजा को फिलॉसोफी आनी चाहिए। दर्शन का बोध ज्ञान यानी कि नॉलेज होनी चाहिए। दूसरी इसमें आती है त्रई यानी कि वेदों का
ज्ञान होना चाहिए। तीसरी इसमें आती है वार्ता यानी कि जो राजा होता है उसको साइंस ऑफ वेल्थ के बारे में अवेयरनेस हो।
उसको इस बात का अच्छे से ज्ञान हो कि किस तरह से राज्य की जो अर्थव्यवस्था है उसको इनक्रीज किया जा सकता है। और फोर्थ इसमें
आता है दंड नीति यानी कि साइंस ऑफ गवर्नेंस का पता भी एक अच्छे शासक को होना चाहिए। अब हम कौटिल्य की स्टेट को अच्छे
से डिस्कस कर लेते हैं। तो कौटिल्य का जो राज्य है वो टोटली ऑर्गेनिक राज्य है जिसमें जो राज्य है वो साध्य होता है और
जो व्यक्ति है वो साधन होता है मीन होता है। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो हमने पहले भी डिस्कस किया है कि इन्होंने राज्य की
उत्पत्ति के संबंध में सामाजिक समझौते का सिद्धांत दिया। क्योंकि स्टेट ऑफ नेचर में मत्स्य न्याय था तो उसकी समाप्ति के लिए
मनुष्यों ने आपस में समझौता किया और मनु को राजा बनाया जिसके बदले में लोग मनु को 1/6 भाग अपनी फसल का और व्यापार का देंगे
और साथ में जो राजा होगा वह बदले में लोगों की बाह्य आक्रमण से सुरक्षा करेगा। कानून और व्यवस्था और शांति को बनाए
रखेगा। दूसरी बड़ी बात यह है कि कौटिल्य एक ऐसे व्यक्ति रहे हैं जिन्होंने राजनीतिक अर्थशास्त्र अर्थात पॉलिटिकल
इकोनमी को एक इंडिपेंडेंट सब्जेक्ट बनाया और आदर्श के स्थान पर यथार्थवाद पर बल दिया। इसीलिए कई बार इनको क्लासिकल
रियलिज्म के फादर जनक के रूप में भी देखा जाता है। दूसरी बड़ी बात यह है कि कौटिल्य ने राजतंत्रात्मक जो शासन प्रणाली है उसका
पूरी तरह से समर्थन किया। और अगली इंपॉर्टेंट बात यह है कि कौटिल्य ने एक वेलफेयर स्टेट का समर्थन किया। कौटिल्य ने
अर्थशास्त्र में एडमिनिस्ट्रेशन का भी वर्णन किया है। यह कहते हैं कि संपूर्ण राज्य को अनेकों जनपदों में बांटा जाता था
और जनपद का मुख्य समाहर्ता कहलाता था जो कि आज के राज्यपाल की तरह स्थिति रखता था। दूसरा पॉइंट यह है कि इन्होंने आगे जो
जनपद है उसको चार डिस्ट्रिक्ट में बांटा जिसका जो मुख्य है वह स्थानिक कहलाता था जो कि आज के जिलाधीश की तरह अपनी पोजीशन
रखता था और कुछ टेक्निकल जो दूसरे नाम है वह भी आपको याद रखने हैं। यानी कि उस समय जो दूसरे ऑफिशियलल्स होते थे उनके कुछ
टेक्निकल नाम है जो कि एग्जाम की दृष्टि से बहुत इंपॉर्टेंट है। तो इसमें कृषि शास्त्री को कहा जाता था सीताध्यक्ष और जो
भंडार है भंडार ग्रहों का जो प्रभारी है उसको सन्निधाता कहा जाता था। वैश्याओं पर नियंत्रण रखने वाले को गणिका अध्यक्ष कहा
जाता था और जो कारखाने हैं उसके प्रभारी को क्रमांतिका कहा जाता था। और यह भी नोट करने वाली बात है कि जो गांव का मुखिया है
उसको गोप कहा जाता था। वहीं जो नगर का मुखिया होगा उसको नागरिक कहा जाता था और सीताध्यक्ष कृषि से संबंधित था। जबकि
रूपदर्शक सिक्कों के निरीक्षक को कहा जाता था। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में करप्शन को भी डिस्कस किया है। इन्होंने अर्थशास्त्र
में 40 प्रकार के करप्शन को डिस्कस किया है। तो इन्होंने फेमसली यह कहा कि जिस प्रकार यह जानना असंभव है कि पानी में
तैरती हुई मछली कैसे पानी पी लेती है। ठीक उसी प्रकार यह जानना भी नामुमकिन हो जाता है कि जो आधिकारिक है जो एडमिनिस्ट्रेटर्स
है, वह कैसे पैसों की चोरी करते हैं, भ्रष्टाचार करते हैं। कौटिल्य ने स्टेट की ऑर्गेनिक थ्योरी को दिया जिसका मतलब यह है
कि इन्होंने राज्य के अंगों की तुलना शरीर के अंगों के साथ की। उदाहरण के लिए इन्होंने राजा की तुलना सिर से की। आमात्य
यानी कि मिनिस्टर्स की तुलना आंखों से की। और जनपद की तुलना जंगाओं से की। भुजाओं की तुलना इन्होंने दुर्ग से की और जो दंड है
इसकी तुलना इन्होंने मस्तिष्क से की। और जो कोष है यानी कि जो खजाना है उसकी तुलना मुख से की और मित्र की तुलना इन्होंने कान
से की। अब हम एडिशनल इंफॉर्मेशन को भी डिस्कस कर लेते हैं। तो इन्होंने तीन प्रकार के पावर की बात की है। प्रभु
शक्ति, मंत्र शक्ति और उताहा शक्ति। वहीं इन्होंने पांच प्रकार के युद्धों की बात की है। जिनमें पहला युद्ध आता है धर्म
युद्ध। दूसरा आता है प्रकाश युद्ध। तीसरा आता है कूट युद्ध। चौथा आता है निम्न युद्ध और पांचवा आता है आकाश युद्ध। धर्म
युद्ध एक ऐसा युद्ध होता है जो नैतिक होता है, न्यायपूर्ण होता है और अच्छे उद्देश्यों के लिए यानी कि न्यायपूर्ण
उद्देश्यों के लिए किया जाता है। प्रकाश युद्ध एक ऐसा युद्ध होता है जो ओपन वॉर होता है जो कि दिन के उजाले में लड़ा जाता
है। कूट युद्ध एक ऐसा युद्ध होता है जो विश्वासघाती होता है। यानी कि गोरिल्ला युद्ध टाइप होता है। और निम्न युद्ध ऐसा
युद्ध होता है जो खाइयों में लड़ा जाता है और आकाश युद्ध एक ऐसा युद्ध होता है जो हवाई लड़ाई होती है यानी कि हवा में लड़ा
जाता है। वहीं कौटिल्य ने तीन प्रकार की विजयों की बात की है जिनमें पहली आती है धर्म विजय दूसरी आती है लोभ विजय और तीसरी
आती है असुर विजय। धर्म विजय एक ऐसी विजय होती है जिसमें केवल पराजित जो राजा होता है उसको अधीन किया जाता है। उसको नुकसान
नहीं पहुंचाया जाता है। लोभ विजय ऐसी विजय होती है जिसमें पराजित राज्य से भौतिक लाभ यानी कि धन संपदा को लिया जाता है और असुर
विजय एक ऐसी विजय होती है जिसमें टोटल लूट होती है। विनाश होता है। तो खास बात यह भी है कि कौटिल्य एक ऐसे विचारक रहे
जिन्होंने चेतावनी पूर्वक यह कहा कि ऑल इंडिया एंपायर को क्रिएट करना पड़ेगा और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि कौटिल्य
वर्ण व्यवस्था के पक्षधर रहे हैं। सुपर रहे हैं। लेकिन इन्होंने मनु की तरह वर्ण व्यवस्था का आधार जन्म नहीं बताया बल्कि
कर्म बताया है। कौटिल्य ने फ़ीमेल उत्तराधिकार का समर्थन किया और ख़ास बात यह है कि इन्होंने सेकुलर पॉलिटिक्स की बात
की और इससे भी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने गवर्नमेंट के 34 डिपार्टमेंट्स की बात की और इन्होंने नौ प्रकार के
गुप्तचर बताए हैं जिनमें पहला आता है कापातिक। दूसरा इसमें आता है उदास्थित। तीसरा इसमें आता है गृहपतिक। चौथा आता है
वैदेहक। पांचवा इसमें आता है तापस। छठा आता है स्त्री। सातवां आता है तीक्ष्ण, आठवां आता है रसद और नाइंथ आता है भिक्षु
की। और विचारणीय बात यह भी है कि जहां इन्होंने एक तरफ सरकार के 34 डिपार्टमेंट्स की बात की, वहीं इन्होंने
18 प्रकार के मंत्रियों का जिक्र किया जिसे कौटिल्य ने अष्टादश तीर्थ कहा है। कौटिल्य द अर्थशास्त्र बुक को लिखा गया था
एलएन रंगराजजन के द्वारा। और खास बात यह है कि रोजर बो ने अर्थशास्त्र को कहा कि यह राजनीतिक यथार्थवाद की पुस्तक है। और
सबसे बड़ी बात यह कि मैक्स बेबर ने अपनी प्रसिद्ध कृति पॉलिटिक्स एज वोकेशन जो कि 1919 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने
लिखा कि ट्रूली रेडिकल मैकबलिनिज्म इज़ द पॉपुलर सेंस ऑफ़ दैट वर्ड इज़ क्लासिकली एक्सप्रेस्ड इन इंडियन लिटरेचर इन द
अर्थशास्त्र ऑफ़ कौटिल्य कंपेयर टू इट। मैक्यावलीस द प्रिंस इज हार्मलेस जिसका मतलब यह है कि इन्होंने कौटिल्य के
अर्थशास्त्र को मैक्यावली का जो द प्रिंस है उससे भी महान बताया उग्र बताया रियलिज्म के क्षेत्र में अमेरिका के
फॉर्मर डिप्लोमेट और नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर हेनरी किसिंजर ने 2015 में वर्ल्ड ऑर्डर नाम से बुक लिखी जिसमें इन्होंने
लिखा कि अर्थशास्त्र रिवील्स द सेंट्रल रियलिटी ऑफ द नीड फॉर पावर अर्थात अर्थशास्त्र शक्ति की आवश्यकता की प्रमुख
वास्तविकता को बताता है। अब हम गौतम बुद्धा की लाइफ को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो खास बात यह है कि
इनका जन्म होता है 567 ईसा पूर्व कपिलवस्तु के एक छोटे से राज्य लुंबिनी जो कि शाक्य गणराज्य का हिस्सा हुआ करता था।
दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनके पिता राजा शुद्धोधन थे और माता का नाम महामाया था। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था जबकि
इनकी पत्नी का नाम यशोधरा था। इनके पुत्र का नाम राहुल था और सबसे बड़ी बात यह है कि गौतम बुद्ध को सर्वोच्च ज्ञान बौद्धगया
में हुआ था और इन्होंने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था और अंतिम उपदेश कुशीनगर में दिया था। और खास बात यह है कि
487 ईसा पूर्व में गौतम बुद्ध की कुशीनगर में 80 वर्ष की आयु में महापरिनिर्वाण होता है। यानी कि समाधि हो जाती है। गौतम
बुद्ध को एशिया का ज्योति पुंज भी कहा जाता है। अब हम बुद्धिस्ट लिटरेचर को अच्छे से समझ लेते हैं। तो जब हम बात करते
हैं बुद्धिस्ट लिटरेचर की तो सबसे पहले हमें यह समझना होता है कि त्रिपिटक इसके सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं। जिनमें पहला
पिटक आता है विनय, दूसरा आता है सुत और तीसरा आता है अभिदम। सूतपिटक को आगे हम 34 निकायों में बांटते हैं। यानी कि उसको
डिवाइड करते हैं। जिनमें 27वां जो सूत आता है वो अग्ना आता है। तो इस प्रकार से जो दिग्ग निकाय हैं उसमें टोटल 34 निकाय हैं
जिनमें 27वां जो सूत है वह अगणना सूता है और इनको पाली भाषा में लिखा गया है। इसकी खास बात यह है कि इस सूत्र में भगवान
बुद्ध के द्वारा दो ब्राह्मणों, भारद्वाज और वशिष्ठ को दिए गए प्रवचनों का वर्णन है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इनका यानी
कि जो त्रिपिटक है इनका संकलन 487 ईसा पूर्व राजगृह में आयोजित की गई प्रथम बौद्ध महासभा में किया गया था। बुद्धिस्ट
लिटरेचर की खास बात यह है कि इनको पाली भाषा में लिखा गया था। हालांकि बाद के कुछ ग्रंथों को संस्कृत भाषा में भी लिखा गया
था। तो इनमें सबसे महत्वपूर्ण आती है जातक कथाएं जिनकी कुल संख्या है 549 जिनको कि पाली भाषा में लिखा गया था और इन कथाओं
में महात्मा बुद्ध के जो पूर्व जन्म है उनका वर्णन किया गया है। दूसरा इसमें आता है मिलिंदपन। इसकी रचना पाहाड़ी भाषा में
की गई थी और इसको 100 बीसी पूर्व किया गया था। खास बात यह है कि इसमें बौद्ध भिक्षु नागसेन तथा जो भारत यूनानी शासक है मिलिंद
जिनको यूनानी भाषा में मिनांडर कहा जाता है। उनके बीच हुए धार्मिक वार्तालाप का एक्सप्लेनेशन है। अगला इसमें आता है
महाविभास। तो महाविवास की रचना प्रसिद्ध फिलॉसोफर जिनका नाम था वसुमित्र उन्होंने की और इसकी रचना इन्होंने 150 ईवी में की।
अगला ग्रंथ आता है बुद्ध चरित। तो बुद्ध चरित्र की रचना अश्वघोष ने की थी और इसकी जो रचना है वह दूसरी शताब्दी में की गई
थी। इसमें गौतम बुद्ध के जीवन चरित्र का वर्णन है। अब हम अग्नासुता को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं क्योंकि आपके एग्जाम
के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। तो इसकी खास बात यह है कि जो अगणना है इसका प्रयोग किया जाता है उत्पत्ति का वर्णन करने के
लिए। सूत का अर्थ होता है प्रवचन। इसका मतलब हुआ कि अगणना सुता का मतलब होता है उत्पत्ति का प्रवचन। इसमें ऐसे प्रवचन दिए
गए हैं जिसमें हमें वर्णन मिलता है कि किस तरह से पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति हुई। सामाजिक व्यवस्था इसकी संरचना और जो जाति
व्यवस्था है उसकी उत्पत्ति कैसे हुई। अब हम अग्नासुता में थ्योरी ऑफ ओरिजिन ऑफ द स्टेट को डिस्कस कर लेते हैं। तो सबसे
पहली बात यह है कि अगणना के प्रथम भाग में वशिष्ठ और भारद्वाज के साथ गौतम बुद्ध ने ब्राह्मणवाद पर चर्चा की है। दूसरे भाग
में पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति का वर्णन है। वहीं तीसरे भाग में सामाजिक व्यवस्था की स्थापना और जातियों का किस तरह से
ओरिजन हुआ उसका वर्णन है। उसकी एक्सप्लेनेशन है। दूसरी बड़ी बात यह है कि राज्य की उत्पत्ति संबंधी जो अगणना सुता
है उसमें सामाजिक समझौते का सिद्धांत दिया गया है और खास बात यह है कि इन्होंने यह कहा कि राजनीति का जो मूल आधार है वह
नैतिकता होती है और सबसे बड़ी बात यह है कि जो अश्वघोष है उन्होंने बुद्ध चरित्र में लिखा जिसमें इन्होंने यह लिखा कि
राजनीति धर्म व नैतिकता दोनों के विरुद्ध है लेकिन बुरी होते हुए भी राजनीति आवश्यक है क्योंकि समाज समाज में राज्य व्यवस्था
को कायम करना राज्य के द्वारा ही संभव है। अग्नासुता में राजा के 10 गुणों की बात की गई है। यानी कि वर्चूस की बात की गई है।
जिनमें पहला आता है जितेंद्र यानी कि राजा को इंद्रियों को जीतने वाला होना चाहिए। उसका अपनी सेंसेस के ऊपर कंट्रोल होना
चाहिए। अगला आता है ऑनेस्टी। फिर नेक्स्ट आता है जेनेरसिटी। यानी कि उसके अंदर दान का भाव होना चाहिए। और अगला आता है
सैक्रिफाइसेस। और नेक्स्ट आता है नॉन वायलेंट। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने कहा कि राजा करुणावान होना
चाहिए। उसके अंदर कंपैशन होना चाहिए। अगला आता है सहिष्णु यानी कि राजा टॉलरेंट होना चाहिए। सभी लोगों, सभी जातियों, सभी
धर्मों का आदर करें। और अगला इसमें आता है धैर्यवान और अगला आता है कि नॉन एंगर। वो शांत होना चाहिए। और लास्ट आता है
सद्भावना। यानी कि उसके अंदर गुडविल होनी चाहिए। यह बात ध्यान देने वाली है कि इन्होंने कहा कि जो राजा है उसकी
पर्सनालिटी करिज्मैटिक होनी चाहिए क्योंकि वह हैंडसम होना चाहिए, अट्रैक्टिव होना चाहिए, वेल बोर्न होना चाहिए और उसके पास
ग्रेट वेल्थ होनी चाहिए, पावरफुल आर्मी होनी चाहिए और सबसे बड़ी बात है कि दयालु होना चाहिए। और साथ में इन्होंने यह भी
कहा कि जो धम्म है यानी कि धर्म है उसको फॉलो करने वाला होना चाहिए। अग्नासूता में राजा की कुछ ड्यूटीज का जिक्र भी किया गया
है। जिनमें पहली ड्यूटी आती है कि राइट टैक्सेशन होना चाहिए। दूसरी ड्यूटी आती है कि राजा की नैतिक जीवन होना चाहिए। मोरल
लाइफ होनी चाहिए। तीसरा आता है कि राजा को सॉफ्ट डिप्लोमेसी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। और अगला इसमें आता है कि फेयर
पनिशमेंट सिस्टम होना चाहिए। पांचवा आता है यूज़ ऑफ मोरल मींस होना चाहिए। यानी कि जो नैतिक साधन है उनका प्रयोग होना चाहिए।
छठा इसमें आता है जस्ट वॉर यानी कि युद्ध वैसे ना हो लेकिन अगर हो तो न्यायोचित युद्ध हो जस्ट वॉर हो। अगला इसमें आता है
कि जो पॉलिटिक्स है उसमें मोरालिटी होनी चाहिए। नेक्स्ट आता है लोगों की सुरक्षा करना। राजा का कर्तव्य होगा और अगला आता
है पीस को बढ़ावा देना। राजा का परम कर्तव्य होगा और लास्ट इसमें आता है स्ट्रांग एंपायर। अब हम गौतम बुद्ध की
फिलॉसोफी को डिस्कस कर लेते हैं। जिसमें पहला नाम आता है फोर नोबेल ट्रुथ का जिसको हम आगे चलकर डिस्कस करेंगे। दूसरा पॉइंट
आता है द एट फोल्ड पाथ जिसको अष्टम्ग भी कहा जाता है क्योंकि इन्होंने अच्छा जीवन जीने के लिए आठ बातें बताई थी। फिर अगला
आता है बिलीव इन कर्मा। कर्म में विश्वास और अगली इनकी फिलॉसोफी आती है कि नॉन वायलेंस होना चाहिए। फिर इन्होंने बात की
स्ट्रेस ऑन मोरालिटी के ऊपर और इन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक जो भाईचारा है उसको बढ़ावा मिलना चाहिए। इसके बाद इन्होंने
बात की कि त्याग में कोई रुचि नहीं है। यानी कि जो त्याग होते हैं, व्रत होते हैं, पूजा-पाठ उसमें इन्होंने कोई रुचि
नहीं दिखाई। अगला पॉइंट आता है कि इन्होंने वेदों की आलोचना की। नेक्स्ट पॉइंट आता है कि जो कास्ट सिस्टम है उसकी
भी इन्होंने पूरी तरीके से आलोचना की। और अगला पॉइंट यह आता है कि इन्होंने युद्ध में अविश्वास किया और अगर युद्ध हो भी तो
जस्ट वॉर हो वैसे ना हो तो बहुत अच्छा है और अगला पॉइंट आता है कि इन्होंने जो संघ है संघ का जो जीवन है उसके ऊपर इन्होंने
विश्वास किया। इन्होंने कहा कि लोगों को संघ में रहकर जीवन यापन करना चाहिए और निर्वाण की प्राप्ति के लिए हमेशा
प्रयासरत रहना चाहिए। और लास्ट आता है लिबरेशन क्योंकि इन्होंने कहा कि मानव जीवन का अल्टीमेट जो पर्पज होता है वह
निर्वाण होता है, समाधि प्राप्त करना होता है। जिसको हिंदू फिलॉसोफी में मोक्ष कहा गया है। अब हम बुद्धिस्ट थ्योरी ऑफ
किंगशिप को डिस्कस कर लेते हैं। तो इसकी खास बात यह है कि इसमें इन्होंने थ्योरी ऑफ़ टू व्हील को दिया जिसमें पहला व्हील
आता है व्हील ऑफ लॉ जिसको राइटियसनेस कहा जाता है। जिसको बुद्धिस्ट भाषा में धर्म चक्र कहा जाता है। और दूसरा इसमें आता है
व्हील ऑफ कमांड जो कि पावर से जुड़ा है। इसको अन्नचक्र कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि संघ में जो नियम है, उन नियमों के
अनुसार ही जीवन यापन करना पड़ता था। और दूसरी तरफ व्हील ऑफ कमांड एक ऐसा शब्द है जो कहीं ना कहीं राज्य के लिए प्रयुक्त
होता है। और सबसे विचारणीय बात यह है कि जो थ्योरी ऑफ टू व्हील है, यह शब्दावली को कॉइंड किया गया था। अजात शत्रु के द्वारा।
महात्मा बुद्ध ने अष्टमार्ग की वकालत की है जिससे कोई भी व्यक्ति अपना जीवन अच्छे तरीके से व्यतीत कर सकता है। तो इसमें
पहला पॉइंट आता है राइट व्यू। दूसरा इसमें आता है राइट इंटेंशन। तीसरा इसमें आता है राइट स्पीच। चौथा इसमें आता है राइट
एस्पाइरेशन। पांचवा इसमें आता है राइट लाइव्लीहुड। छठा इसमें आता है राइट एफर्ट। और सातवां इसमें आता है राइट माइंडफुलनेस।
और आठवां लास्ट इसमें आता है राइट कंसंट्रेशन। महात्मा बुद्ध ने चार प्रकार की बुराइयों की बात की है। जिनसे व्यक्ति
को हमेशा दूर रहना चाहिए। इनमें पहली बुराई आती है चोरी करना। दूसरी आती है निंदा करना। तीसरी आती है झूठ बोलना और
चौथी आती है हिंसा करना। अब हम गौतम बुद्ध के फोर नोबेल ट्रुथ को समझ लेते हैं। तो इसमें पहला आता है कि जीवन दुख है अर्थात
जीवन में दुख होते रहते हैं। दूसरा यह है कि दुख का कारण तृष्णा है। यानी कि मनुष्यों की जो इच्छाएं हैं क्रेबिंग है
उसकी वजह से ही दुख होते हैं। और तीसरा पॉइंट यह आता है कि अगर दुख को खत्म करना है तो जो डिजायर है, क्रेबिंग है उनको
खत्म करना पड़ेगा। और चौथा पॉइंट आता है कि अष्टमार्ग ही ऐसा मार्ग है जिसकी वजह से जो तृष्णा है, डिजायर है और जो दुख है
उसको दूर किया जा सकता है। अब हम बौद्ध धर्म से जुड़े कुछ की फैक्ट्स को देख लेते हैं। तो पहला फ़ैक्ट यह आता है कि बाबा
साहब अंबेडकर ने 1955 में भारतीय बौद्ध महासभा का गठन किया और 14 अक्टूबर 1956 को महाराष्ट्र के नागपुर में 5 लाख
अनुयायियों के साथ इन्होंने हिंदू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया। दूसरा फैक्ट यह है कि सुनील खिलनानी ने अपनी प्रमुख कृति
अवतरण 50 जिंदगियों में भारत जो कि 2016 में लिखी गई थी। इसमें इन्होंने लिखा कि अंबेडकर अपने स्वयं के बुद्ध को गढ़ रहे
थे। ऐसे बुद्ध जो काफी हद तक सामाजिक क्रांतिकारी थे या फिर प्राचीन भारतीय रूसो। तीसरा पॉइंट यह आता है कि बुद्धिज्म
एंड कम्युनिज्म व्हिच होल्ड्स द फ्यूचर ऑफ एशिया बुक को लिखा गया था अनेस्ट वेंस के द्वारा। और चौथा पॉइंट यह आता है कि
भूपारेख ने कहा कि बौद्ध धर्म हिंदू धर्म का विद्रोही संतान है या फिर पूर्व का प्रोटेस्टेंटवाद है।
जियााउद्दीन बरनी दिल्ली सल्तनत के बहुत बड़े पॉलिटिकल फिलॉसोफर रहे हैं। इन्होंने अलाउद्दीन खिलजी, मोहम्मद बिन तुगलक और
फिरोज तुगलक के शासनकाल के दौरान दिल्ली सल्तनत पर राजनीतिक विचारक के रूप में काम किया। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनका जन्म
1286 ईस्वी को एक कुलीन परिवार में होता है। उस समय गुलाम वंश के शासक गयासुद्दीन बलबन का शासन था। और एक और महत्वपूर्ण बात
यह है कि इनकी फतवा जहांगीरी इनकी अक्षय कृति रही है। जहां पर इन्होंने मुस्लिम राजाओं के लिए सलाह दी यानी कि नसीहत दी
और शासन कला पर यह लिखी गई उतनी ही उत्कृष्ट कृति है जितनी कि कौटिल्य का अर्थशास्त्र और मैक्यावली की द प्रिंस है।
दूसरी सबसे बड़ी बात ये है कि इनका जो यह वर्क है ये पॉलिटिकल वर्क है जिसमें आदर्श शासक से संबंधित विचार है और राजनीतिक जो
चिंतन है इनका उसकी चर्चा इस कृति में की गई है। हालांकि नोट करने वाली बात यह है कि फतवा ए जहांगीरी में जहां आदर्श शासक
है महमूद गजनवी वहीं यह किताब फिरोजशाह तुगलक को समर्पित है। जियााउद्दीन बरनी की जितनी भी कृतियां आपको स्क्रीन पर दिखाई
दे रही है, इनको एक-एक करके अच्छे से आप याद कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए यह सभी कृतियां बहुत इंपॉर्टेंट है। अब हम
बरनी का लॉ सिस्टम को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो इन्होंने दो प्रकार के कानूनों की बात की है। जिनमें पहला आता है
शरीयत और दूसरा इसमें आता है जवाबित। जब हम बात करते हैं शरीयत की तो यह इस्लामिक कानून है। दूसरी तरफ जवाबित राज्य के
कानून हैं। शरीयत की खास बात यह है कि इसमें प्रेयर, सिविल लॉज़, क्रिमिनल लॉज़ को डिस्कस किया गया है। वहीं जवाबत में ऐसे
कानून हैं जो राज्य के द्वारा बनाए गए हैं और जो समय-समय पर जो बड़े-बड़े इलीट लोग हैं, उन्होंने आदेश दिए हैं, उनके परामर्श
से यह बने हैं। शरीयत की खास बात यह है कि इन लॉज़ को कंसीडर किया जाता है डिवाइन लॉ। जबकि दूसरी तरफ जवाबित ऐसे लॉ होते हैं जो
कि लौकिक कानून माने जाते हैं। जियााउद्दीन बरनी ने सुल्तान के तीन इंपॉर्टेंट कार्य बताए हैं। जिनमें पहला
आता है शरीयत को लागू करना। दूसरा इसमें आता है कानून व व्यवस्था को बनाए रखना और तीसरा इसमें आता है न्याय उपलब्ध करवाना।
जियााउद्दीन बर्नी ने एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया जिसका टाइटल है द प्रिंसिपल ऑफ अपोजिट पेयर्स। इसका मतलब यह है कि
बरनी कहते हैं कि दुनिया विपरीत जोड़ों के रूप में काम करती है और यह खुदा की देन है। उदाहरण के लिए सच हुआ झूठ, शांति व
अशांति, अच्छा हुआ बुरा, दिन व रात, अंधकार व प्रकाश आदि। और खास बात यह है कि इन्होंने अरस्तु की तरह मिडिल पाथ की बात
की और इन्होंने यह कहा कि जो विपरीतों का जो यह वर्ल्ड है, इसमें पैगंबर को यह कर्तव्य है कि वे सत्य की स्थापना करें।
जियााउद्दीन बरनी ने सोवनिटी का कांसेप्ट भी दिया जिसको कि बादशाही कहा जाता है। तो इसका मतलब होता है प्रभुत्व और जो वर्तमान
अवधारणा है सोवनिटी की बादशाही उसका ही रूप है। हालांकि इन्होंने यह कहा कि जो बादशाही होती है वह खुदा की नियामत होती
है। तोहफा होता है बादशाह को राजा को। और दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने यह कहा कि जो बादशाह की जो बादशाही होती है वह
केवल तब तक ही कायम रहती है जब तक लोग उसके ऊपर विश्वास करें। अब हम कबीर दास की लाइफ को अच्छे से
डिस्कस कर लेते हैं। तो यह 15वीं शताब्दी के इंडियन मिस्टिक पॉइंट और सेंथ ऑफ गॉड रहे हैं। खास बात यह है कि इनका जन्म होता
है 1398 ईवी में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में और इनकी डेथ होती है 1518 ईवी में मग में। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि कबीर
दास 15वीं शताब्दी के एक इंपॉर्टेंट कवि तो रहे ही हैं। लेकिन खास बात यह है कि यह जन्म लेते हैं हिंदू परिवार में। जबकि
इनका पालन पोषण किया जाता है मुस्लिम बनकर दंपति के द्वारा। और इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि यह भक्ति आंदोलन के सबसे प्रसिद्ध
व्यक्ति थे। जिन्होंने ईश्वर के प्रति जो डिवोशन होता है, लव होता है, उसके ऊपर जोर दिया और अगली इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि
इनके गुरु का नाम था रामानंद और शेख तकी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कबीर को हिंदू और मुसलमान दोनों ने पूजा और इनके
जो अनुयाई थे इनको जाना जाता था कबीरपंथी के नाम से। कबीर दास की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है जो कि आपके एग्जाम के लिए
बहुत इंपॉर्टेंट है। इसलिए इनको अच्छे से नोट करें और नोट करने वाली बात यह भी है कि इनकी भाषा ज्यादातर ब्रज भाषा रही है
और अवधि में इनके ग्रंथ लिखे गए हैं। लेकिन विचारणीय बात यह भी है कि इनकी भाषा को पंचमैली खिचड़ी कहा जाता है और सधुकड़ी
भाषा कहा जाता है। अब हम बेगमपुरा के कांसेप्ट को अच्छे से समझ लेते हैं क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत
इंपॉर्टेंट है। तो गेल ओंबेट ने अपनी प्रमुख कृति सी किंग बेगमपुरा द सोशल विज़ ऑफ एंटी कास्ट इंटेलेक्चुअल्स जो कि 2008
में पब्लिश हुई थी। इस कृति में इन्होंने यह कहा कि 15वीं शताब्दी के भक्ति कवि रविदास जो कि एक मुक्त चर्मकार थे।
उन्होंने अपने गीत बेगमपुरा में भारतीय स्वप्न लोक की कल्पना की और ऐसा करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। इन्होंने एक ऐसे समाज
की कल्पना की जो कि कास्टलेस था, क्लासलेस था और टैक्स फ्री सिटी थी। जहां पर कोई सो नहीं था, कोई उदासी नहीं थी। इसीलिए इसको
बेगमपुरा कहा गया। गेल अंबेट ने अपनी प्रमुख कृति सीकिंग बेगमपुरा द सोशल विज़न ऑफ एंटीकास्ट इंटेलेक्चुअल में दोनों कबीर
दास और रविदास को ड्रीमर ऑफ एन यूटुपियन कहा। अर्थात कल्पनावाद के स्वप्नदर्शी कहा। इस प्रकार बेगमपुरा का कांसेप्ट
दोनों रविदास और कबीर दास ने दिया। खास बात यह है कि इस बेगमपुरा कांसेप्ट की सबसे पहले अवधारणा भारतीय संदर्भ में कवि
रविदास ने दी थी जो कि एक ऐसा समाज है जहां पर कोई दुख नहीं है जहां पर कोई उदासी नहीं है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह
है कि बेगमपुरा को जाना जाता है इंडिया का यूटोपिया जो कि थॉमस मुरे का जो वर्क है यूटोपिया जो कि 1516 में पब्लिश हुआ उस पर
आधारित है। हालांकि उससे ही पहले कवि रविदास ने बेगमपुरा का कॉ कासेप्ट दिया था। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह एक
ऐसी रैशन और ह्यूमन सोसाइटी है जिसका आधार भक्ति है और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इस सोसाइटी में रहने वाले लोग भयमुक्त
होते हैं। उनके अंदर ग्रीड नहीं होता है। क्राइम नहीं करते हैं और उनके पास स्कार्सिटी नहीं होती है। पॉवर्टी नहीं
होती है। और अगला इंपॉर्टेंट कांसेप्ट यह भी है कि इसको जाना जाता है किंगडम ऑफ़ गॉड आइडियल सिटी है। जहां पर कुछ बातें नहीं
है। यह बातें हैं जिनमें पहली आती है कि यहां पर कोई सोरो नहीं है, उदासी नहीं है। दूसरी बात यह है कि यहां पर कोई कास्ट
क्लास नहीं है। तीसरी बात यहां पर यह है कि यहां पर कोई प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं है। चौथी बात यहां पर यह है कि यहां पर
कोई टैक्स नहीं है और पांचवी बात यह है कि यहां पर कोई सोशल हायरार्की नहीं है और लास्ट बात यहां पर यह है कि यहां पर कोई
राजतंत्र व्यवस्था नहीं है, मोनार्की नहीं है। अब हम कुछ की फ़ैक्ट्स को भी देख लेते हैं जो कि आपके एग्ज़ाम के लिए बहुत
इंपॉर्टेंट है। तो पहला फैक्ट यह है कि सिटी ऑफ़ आइडियल जो कि कैलीपॉलिस के नाम से जाना जाता है। इस कांसेप्ट को दिया प्लेटो
ने। दूसरा फैक्ट यह है कि सिटी ऑफ़ गॉड की अवधारणा दी संत अगस्टाइन ने। तीसरी इंपॉर्टेंट पॉइंट यह है कि सिटी ऑफ लव की
बात कबीर दास करते हैं और सिटी ऑफ इमोर्टल की बात भी कबीर दास करते हैं। और पांचवा इंपॉर्टेंट पॉइंट यह है कि सिटी विदाउट
सोरो यानी कि बेगमपुरा की बात की रविदास और कबीर दास दोनों ने। अब हम कबीर दास की फिलॉसोफी को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं।
तो पहला पॉइंट यह आता है कि इन्होंने सभी रिलीजंस की क्रिटिसिज्म की। उसके अंदर जो बुराइयां है उसको इन्होंने आलोचना की।
दूसरा पॉइंट यह आता है कि इन्होंने कास्ट सिस्टम की आलोचना की। तीसरा पॉइंट यह आता है कि इन्होंने पैसिव रेसिस्टेंस की बात
की जो आगे चलकर अरविंदो घोष ने अडॉप किया। और अगला पॉइंट आता है कि इन्होंने सीकिंग एब्सोल्यूट की बात की। यानी कि जो निर्गुण
परब्रह्म है उसकी तलाश हर व्यक्ति को करनी चाहिए। पूर्णता की जो तलाश है उसमें व्यक्ति को लगना चाहिए। अगला पॉइंट यह आता
है कि इन्होंने हिंदू मुस्लिम यूनिटी की बात की और अगला पॉइंट यह भी आता है कि इन्होंने एक ऐसे समाज की कल्पना की जहां
पर सभी लोग समान हो अर्थात इन्होंने इगलिटेरियन सोसाइटी की बात की। अगला पॉइंट आता है कि इन्होंने वुमेन को हीन दृष्टि
से देखा। इन्होंने यह कहा कि जो वुमेन होती है वह पुरुषों के लिए माया का काम करती है। पुरुषों के मार्ग में बाधक की
तरह होती है। और अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट यह आता है कि ये समन्वय वादी कवि रहे हैं क्योंकि इन्होंने विभिन्न जातियों विभिन्न
धर्मों में समन्वय किया। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट यह आता है कि इन्होंने सभी सोशल जो इविल है उसका खंडन किया। और अगला पॉइंट यह
आता है कि इनका आइडियल स्टेट रहा है अमरपुरा। जहां के लोग अमर होते हैं, अच्छे गुणों से परिपूर्ण होते हैं। देवताओं की
तरह राज्य हैं। और अगला पॉइंट यह आता है कि इन्होंने वेलफेयर और सेकुलर स्टेट की बात की। और लास्ट पॉइंट आता है कि इनके जो
थॉट्स है उसमें कहीं ना कहीं मल्टीचरलिज्म के बीज भी दिखाई देते हैं। क्योंकि इन्होंने सभी धर्मों का आदर किया और सभी
धर्मों के समान रूप में आलोचना की जहां जरूरी था। कबीर दास के ऊपर बहुत सारे लेखकों ने लेख लिखे, टिप्पणियां की जिनमें
पहला नाम था रविंद्रनाथ टैगोर का। इन्होंने कबीर दास को मुक्तिदाता और भारत पथिक कहा। दूसरा नाम इसमें आता है
द्विवेदी का। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर दास को क्रांतिकारी कहा। तीसरा नाम इसमें आता है पुरुषोत्तम अग्रवाल
जिन्होंने यह कहा कि कबीर दास एक ऐसे दार्शनिक थे जिन्होंने सत्ता को चुनौती दी।
अब हम सबसे पहले पंडिता रमाबाई की लाइफ को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो पंडिता रमाबाई भारत में महिला अधिकार शिक्षा
कार्यकर्ता और भारत में जो एजुकेशन है और जो महिलाओं की मुक्ति है उसकी सबसे बड़ी समाज सुधारक थी। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह
है कि वे भारत की ऐसी पहली महिला थी जिनको संस्कृत का विद्वान होने के नाते पंडिता और सरस्वती जैसी उपाधियां दी गई थी। दूसरी
महत्वपूर्ण बात यह है कि इनको जाना जाता है फर्स्ट लिबरल फेमिनिस्ट ऑफ इंडिया और 1882 में पंडित रमाबाई ने डिमांड की हंटर
कमीशन के सामने कि जो महिलाएं हैं उनको वोकेशनल एजुकेशन की आजादी दी जाए, छूट दी जाए। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि
इनके गुरु का नाम था केशव चंद्रा सेन। यह भी विचारणीय बात है कि 1882 में पंडिता रमाबाई ने आर्य महिला समाज की स्थापना की।
हालांकि बाद में लोकमान्य तिलक ने इस कार्य का पूरी तरीके से विरोध किया। पंडिता रमाबाई 1883 से 1886 तक ब्रिटेन
में रही और वहां पर उन्होंने ईसाई धर्म को ग्रहण किया। 1886 में पंडिता रमाबाई अमेरिका गई और वहां पर रमाबाई एसोसिएशन को
बोस्टन में स्थापित किया जाता है ताकि उच्च वर्ग की जो विधवा महिलाएं हैं उनका उत्थान किया जा सके और वहां पर जो है उनके
लिए रहने की सुविधा हो और सबसे बड़ी बात यह भी है कि 1889 में इन्होंने शारदा सदन की स्थापना की और बाद में इसका नाम पड़ा
पंडिता रमाबाई मुक्ति सदन और सबसे बड़ी बात यह भी है कि 1898 में पंडित संगीता रमाबाई ने कृपा सदन को शुरू किया ताकि जो
बिगड़ी हुई महिलाएं हैं उनको सुधारा जा सके रास्ते पे लाया जा सके और सबसे बड़ी बात यह भी है कि 1919 में ब्रिटिश जो
गवर्नमेंट है उन्होंने उनके सोशल रिफॉर्म्स में जो एक्टिविटीज है या फिर रोल है उसमें जो उनका योगदान रहा उसके लिए
इनको केसर एह हिंद की उपाधि से विभूषित किया गया सम्मानित किया गया हालांकि जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद इन्होंने
यह सम्मान त्याग दिया। और सबसे इंपॉर्टेंट बात जो आपको याद रखनी है कि बाल गंगाधर तिलक ने अपनी प्रमुख न्यूज़ पेपर केसरी
में पंडिता रमाबाई पर यह आरोप लगाया कि जो उनका शारदा सदन है वह हिंदू महिलाओं को क्रिश्चियन महिलाओं में कन्वर्ट कर रहा
है। हालांकि ज्योतिबा फुले ने रमाबाई की प्रशंसा की। गेल ओंबेट ने अपनी प्रसिद्ध कृति सीकिंग बेगमपुरा द सोशल विज़ ऑफ एंटी
कास्ट इंटेलेक्चुअल्स जो कि 2008 में पब्लिश होती है। इस कृति में गेल ओमबेट ने यह कहा कि पंडिता रमाबाई द्वारा स्थापित
मुक्ति सदन एक आदर्श स्त्री समुदाय को स्थापित करने का प्रयास था जिसे भारत में एक नए यरूशलम की संज्ञा दी जा सकती है।
यहां पर स्त्रियों ने बुनाई, डेयरी, फार्मिंग, कुकिंग, कृषि आदि से लेकर प्रिंटिंग प्रेस तक चलाई। वहीं दूसरी तरफ
गेल अंबेड ने अपनी इस कृति सिकिंग बेगमपुरा द सोशल विज़न ऑफ एंटी कास्ट इंटेलेक्चुअल्स में यह कहा कि पंडिता
रमाबाई औपनिवेशिक आधुनिकता के एक नए युग में ऐसी पहली इंडिपेंडेंट फेमिनिस्ट थी जिसने भारतीय महिलाओं को शोषण से मुक्ति
दिलाने की प्राथमिकता पर अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर दी थी। सरोजनी नायडू ने पंडिता रमाबाई के बारे में कहा कि पंडिता रमाबाई
इज़ द फर्स्ट वुमेन हु विल बी काउंटेड अमंग हिंदू सेंट्स। इसका मतलब यह है कि पंडिता रमाबाई ऐसी पहली महिला है जिन्हें हिंदू
संतों में गिना जाएगा। स्क्रीन पर आपको जितनी भी रमाबाई की कृतियां दिखाई दे रही है, इनको आप एक-एक करके अच्छे से नोट कर
लें क्योंकि यह सारी की सारी कृतियां आपके एग्जाम के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। अब हम पंडिता रमाबाई के थॉट्स को अच्छे से
डिस्कस कर लेते हैं। तो इनके थॉट्स में पहला नाम आता है कि इन्होंने जेंडर जस्टिस की बात की। दूसरा पॉइंट यह आता है कि
इन्होंने सोशल इविल्स की क्रिटिसिज्म किया। तीसरा पॉइंट यह आता है कि इन्होंने पेट्रियाकी की आलोचना की। चौथा पॉइंट आता
है कि इन्होंने नारी अधिकारों की वकालत की। पांचवा पॉइंट आता है कि इन्होंने वुमेन इमसिपेशन पर काफी बल दिया। छठा
पॉइंट आता है कि इन्होंने क्रिश्चियनिटी पर बल दिया क्योंकि इन्होंने खुद भी क्रिश्चियन यानी कि जो ईसाई धर्म है उसको
ग्रहण किया था। और अगला पॉइंट आता है कि इन्होंने क्रिटिसिज्म किया वर्ड सिस्टम का। और अगला पॉइंट आता है कि इन्होंने
हिंदूइज़्म और जो मनु है उसकी भी काफी आलोचना की। पंडिता रमाबाई ने अपनी प्रमुख कृति द हाई कास्ट हिंदू वुमेन जो कि 1887
को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने जो हिंदू सोसाइटी है उसकी कुप्रथाओं की आलोचना की और जो जेंडर इक्वलिटी है उसकी
बात की। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनकी जो यह कृति है इसको प्रथम भारतीय नारीवादी घोषणापत्र यानी कि मैनिफेस्टो के रूप में
जाना जाता है और इस कृति में पंडिता रमाबाई ने स्त्री जो मुक्ति होती है यानी कि वुमेन लिबरेशन है उसके तीन महत्वपूर्ण
आधारों की चर्चा की जिनमें पहला इसमें आता है आत्मनिर्भरता। दूसरा इसमें आता है शिक्षा और तीसरा इसमें आता है कार्य।
अब हम सबसे पहले बाल गंगाधर तिलक की लाइफ को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो बाल गंगाधर तिलक जिन्हें कि लोकमान्य के नाम
से जाना जाता है। इंडियन नेशनलिस्ट, टीचर और इंडिपेंडेंस एक्टिविस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनको लाल बालपाल की जो
टिनिटी है उसके महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में देखा जाता है। और वैलेंटाइन चिरोल ने इनको द फ़ादर ऑफ़ द इंडियन अनरेस्ट कहा।
अर्थात भारतीय अशांति का जनक कहा। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि 1889 को यह कांग्रेस के साथ जुड़े। और सबसे महत्वपूर्ण
बात यह है कि 1916 का जो लखनऊ पैक्ट हुआ था, उसको करवाने में कहीं ना कहीं बाल गंगाधर तिलक की भूमिका रही थी। और सबसे
महत्वपूर्ण भूमिका यह है कि 1893 में गणेश उत्सव और 1896 में शिवाजी उत्सव को इन्होंने शुरू किया ताकि देश के लोगों में
देशभक्ति का जो भाव है उसको पैदा किया जा सके। बाल गंगाधर तिलक मुजफ्फर बम्ब इंसिडेंट की वजह से 1908 से 1915 में
बर्मा की मांडले जेल में कारावास भुगतते हैं। और दूसरी बड़ी बात यह है कि तिलक ही ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सबसे पहले
पूर्ण स्वराज की बात की। और जेएस मिल का जो लिबर्टी या फिर फ्रीडम का आईडिया है उससे यह काफी इंस्पायर रहे। और सबसे बड़ी
बात यह है कि बेंथम का जो आईडिया था मैक्सिमम हैप्पीनेस ऑफ द मैक्सिमम नंबर ऑफ पीपल उसकी जगह इन्होंने बहुजन हिताय बहुजन
सुखाय का नारा दिया और इन्होंने इंपॉर्टेंट कोट दिया जिसमें इन्होंने कहा कि स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और
इसे मैं लेकर ही रहूंगा। लोकमान्य तिलक को भारत के उग्र राष्ट्रवाद के पिता के रूप में जाना जाता है और बाल गंगाधर तिलक ने
1916 में एन एसेंट के साथ इंडियन होमरूल लीग की स्थापना की और 1920 में इन्होंने डेमोक्रेटिक स्वराज पार्टी की स्थापना की।
और सबसे बड़ी बात यह है कि तिलक ने 1920 में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का विचार दिया जो कि 1956 में फजल अली आयोग
की रिपोर्ट के बाद ही भारत में संभव हुआ। दूसरी बड़ी बात यह भी है कि 1884 को बाल गंगाधर तिलक ने दक्कन एजुकेशन सोसाइटी की
स्थापना की और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बाल गंगाधर तिलक ने जो दादा भाई नौरोजी की ड्रेन थ्योरी है उसको सपोर्ट किया और
एक और इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनकी इंपॉर्टेंट पॉलिसी रही है जो कि प्रगमेटिक पॉलिसी मानी जाती है। इसका नाम है
रिस्पांसिव कोऑपरेशन। इसका मतलब यह है कि सामने वाला जैसा करेगा उसको वैसा ही उत्तर दिया जाएगा। इसीलिए 1919 में तिलक ने कहा
कि मैं अंग्रेजों के साथ उत्तरदाई सहयोग अर्थात रिस्पांसिव कोऑपरेशन करना चाहता हूं। अब हम बाल गंगाधर तिलक के स्वराज के
आइडिया को अच्छे से समझ लेते हैं। तो इन्होंने कहा कि स्वराज राष्ट्रीय धर्म है और इन्होंने स्वराज के बारे में चार
इंपॉर्टेंट पॉइंट बताएं। जिनमें पहला पॉइंट यह है कि शासक और शासित एक ही देश एक ही धर्म एवं एक ही प्रजाति से होने
चाहिए। दूसरा पॉइंट इन्होंने कहा कि विधि द्वारा स्थापित शासन होना चाहिए अर्थात सुशासन होना चाहिए। अगला पॉइंट इन्होंने
बताया कि सरकार आम जनता की भलाई करें और चौथा इन्होंने बताया कि सरकार जनता के प्रति उत्तरदाई होगी और जनता द्वारा
निर्वाचित होनी चाहिए। दूसरी तरफ बाल गंगाधर तिलक ने नेशनलिज्म के चार इंपॉर्टेंट एलिमेंट्स की बात की। जिनमें
पहला एलिमेंट आता है स्वदेशी, दूसरा आता है बहिष्कार, तीसरा आता है राष्ट्रीय शिक्षा और चौथा आता है निष्क्रिय
प्रतिरोध। जहां एक तरफ महात्मा गांधी ने लोकमान्य तिलक को द मेकर ऑफ मॉडर्न इंडिया कहा। वहीं दूसरी तरफ रविंद्रनाथ टैगोर ने
लोकमान्य तिलक को लोकमान्य की उपाधि दी। लोकमान्य तिलक की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है। जिनमें पहला नाम आता है द ओरियन,
दूसरा नाम आता है द आर्कटिक होम इन द वेदाज़, तीसरा नाम आता है गीता रहस्य और चौथा नाम आता है द हिंदू फिलॉसोफी ऑफ़ लाइफ
एथिक्स एंड रिलीजन। इनकी कुछ मैगजीनंस और न्यूज़ेपर भी रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है मराठा दर्पण और दूसरा नाम आता है केसरी
जो कि मराठी में लिखा गया था। अब हम सबसे पहले स्वामी विवेकानंद की लाइफ को देख लेते हैं। तो स्वामी विवेकानंद
इंडियन हिंदू मक फिलॉसोफर, ऑथर, रिलीजियस टीचर रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि रामकृष्ण परमहंस के शिष्य रहे हैं। इनके
बचपन का नाम या फिर मूल नाम नरेंद्रनाथ दत्त था और इनको हिंदू नेपोलियन और स्पिरिचुअल नेपोलियन के रूप में जाना जाता
है। और सबसे इंपॉर्टेंट बात जिसे आपको याद रखना है कि 1984 से स्वामी विवेकानंद का जो बर्थ डे है 12 जनवरी को इसको सेलिब्रेट
किया जाता है नेशनल यूथ डे भारत में और इनको जाना जाता है रूसो ऑफ बंगाल रेवोल्यूशन और 1897 में इन्होंने सैन
फ्रांसिस्को में शांति आश्रम और वेदांत सोसाइटी की स्थापना की थी और स्वामी विवेकानंद को जाना जाता है फादर ऑफ इंडियन
स्पिरिचुअल नेशनलिज्म के रूप में स्वामी स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर 1893 को अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म
सम्मेलन में ऐतिहासिक भाषण दिया जिसके बाद स्वामी विवेकानंद और भारत का पूरी दुनिया में डंका बज गया। 1897 में वे भारत लौट
आते हैं और कोलकाता के पास बैलूर मठ में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। दूसरी बड़ी बात यह है कि शुक्ल यजुर्वेद ने कहा कि एक
और विवेकानंद चाहिए यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने क्या किया है और स्वामी विवेकानंद ने दरिद्र नारायण अर्थात
आध्यात्मिक मानवतावाद का विचार दिया। स्वामी विवेकानंद ने कहा कि जो वर्ण व्यवस्था है यह एक प्रकार का साम्यवाद है।
और सबसे प्रमुख बात यह है कि स्वामी विवेकानंद समाजवादी विचारक कॉपर निकस से बहुत प्रभावित हुए थे। उन्होंने मैं
समाजवादी हूं। नामक पुस्तक में अपने विचार दिए और स्वामी विवेकानंद ने यह कहा कि मैं समाजवादी हूं। इसलिए नहीं कि मेरी दृष्टि
में समाजवाद कोई सर्वगुण संपन्न प्रणाली है। बल्कि मैं इसलिए इसको मानता हूं क्योंकि भूखा रहने से अच्छा है कि आधी
रोटी मिल जाए। सुभाष चंद्र बोस स्वामी विवेकानंद को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे। सुभाष चंद्र बोस ने स्वामी विवेकानंद
को आधुनिक भारत के चिंतक के रूप मेंचारा था। स्वामी विवेकानंद की इंपॉर्टेंट कृतियां रही है जिनको आपको अच्छे से याद
करना है। तो इसमें पहली आती है राजयोग, दूसरी आती है कर्म योग, तीसरी आती है लेक्चर्स फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा। चौथी
आती है जनाना योग। पांचवी आती है कास्ट कल्चर एंड सोशलिज्म। अगली आती है इंडिया एंड देयर प्रॉब्लम्स। अगली आती है मॉडर्न
इंडिया। नेक्स्ट आती है आवर ड्यूटीज टू द मासेस। और अगली आती है द इविल्स ऑफ अधिकारवाद। और अगली आती है द साइकिल ऑफ
कास्ट। वहीं अगली आती है द ईस्ट एंड द वेस्ट। और अगली आती है 4 जुलाई के प्रति जो कि इनकी एक पोएम रही है। नोट करने वाली
बात यह है कि इनके ऊपर कुछ लेखन रहा। यानी कि कई लोगों ने इनके ऊपर लिखा जिनमें पहली कृति आती है द लाइफ ऑफ विवेकानंदा एंड द
यूनिवर्सल गोस्पल जो कि रोमा रोला ने इसको लिखा। अगली आती है स्वामी विवेकानंदा एंड द मॉडर्नाइजेशन ऑफ हिंदूइज़्म जिसको कि
विलियम रेडीस ने लिखा और इनके कुछ न्यूज़ेपर भी रहे हैं जिनमें पहला नाम आता है प्रबुद्ध भारत दूसरा इसमें आता है
उद्बोधन। अब हम स्वामी विवेकानंद के नियो वेदांत के कांसेप्ट को समझ लेते हैं। तो इसको जाना जाता है हिंदू मॉडर्निज्म, नियो
हिंदूइज़्म और हिंदू यूनिवर्सलिज्म और ग्लोबल हिंदूइज़्म। इसकी सबसे बड़ी बात यह है कि यह 19th सेंचुरी में बंगाल में
डेवलप होता है और इसके साथ कुछ व्यक्तित्व जुड़े रहे हैं। जिनमें नाम आता है राजा राममोहन रॉय का, स्वामी विवेकानंद का,
अरविंद घोष का और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का। खास बात यह भी है कि जो नियो वेदांतीज्म है इसको कॉइन किया गया था
पॉल हैकर के द्वारा। और दूसरी बात यह भी है कि यह बात करता है कर्मा की। यह ऐसी सर्विस की बात करता है जो दरिद्र नारायण
है और दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि यह समन्वयवाद और जो आध्यात्मिक राष्ट्रवाद है उसके ऊपर आधारित है। अद्वैत जो
वेदांतवाद है इसका केंद्रबिंदु आध्यात्मिकता है और जो नव वेदांत है इसने आध्यात्मिकता में राष्ट्रवाद और मानवतावाद
का मिश्रण कर दिया। वहीं दूसरी तरफ स्वामी विवेकानंद ने सोशल चेंज की थ्योरी भी दी। इन्होंने इसमें साइक्लिक जो थ्योरी है
सोशल चेंज की उसकी बात की। उदाहरण के लिए जैसे पहला आता है ब्राह्मणिज्म जो कि इंडिया में दूसरा इसमें इन्होंने एग्जांपल
दिया क्षत्रिय रोमन एंपायर। तीसरा इन्होंने थ्योरी इसमें दी वैश्या जो कि ब्रिटिश समृद्ध वर्ग है। और अगला लास्ट
इन्होंने शूद्र की बात की जो कि अमेरिकन डेमोक्रेसी है। तो यह इनकी एक अपनी अवधारणा रही है सामाजिक परिवर्तन सिद्धांत
के रूप में। अब हम सबसे पहले रविंद्रनाथ टैगोर की लाइफ को डिस्कस कर लेते हैं। तो रविंद्रनाथ
टैगोर इंडियन पोएट, राइटर, प्ले राइटर, कंपोजर, फिलॉसफर, सोशल रिफॉर्मर और पेंटर रहे हैं बंगाल अरेसा के। दूसरी प्रमुख बात
यह है कि यह कोलकाता में जन्म लेते हैं। और इससे भी बड़ी बात यह है कि 1901 में टैगोर ने एक्सपेरिमेंटल स्कूल को स्थापित
किया वेस्ट बंगाल के शांति निकेतन में जो कि 1921 में विश्व भारती यूनिवर्सिटी बन जाता है और सबसे बड़ी बात यह है कि 1951
में इसको स्टेटस दिया जाता है यूनिवर्सिटी का और इससे भी महत्वपूर्ण बात है कि यह एकमात्र ऐसी सेंट्रल यूनिवर्सिटी है जिसके
चांसलर इंडियन प्रेसिडेंट ना होकर इंडियन प्राइम मिनिस्टर होते हैं और यह भी विचारणीय बात है कि 191 में रविंद्र नाथ
टैगोर ने इंडियन नेशनल एंथम जन गण मन को लिखा और यह भी विचारणीय बात है कि रविंद्रनाथ टैगोर दुनिया के एकमात्र ऐसे
व्यक्ति रहे हैं जिन्होंने दो देशों के राष्ट्रगानों को सृजन किया उसको लिखा। भारत का राष्ट्रगान जन गण मन व बांग्लादेश
का राष्ट्रगान अमार सोनार बंगला की रचना रविंद्रनाथ टैगोर ने ही की थी। 1913 में रवींद्रनाथ टैगोर को उनकी अक्षय कृति
गीतांजलि के लिए नोबेल प्राइज दिया जाता है लिटरेचर में और ऐसा करने वाले वे ऐसे पहले व्यक्ति थे जो गैर यूरोपियन थे। 1915
में इनको नाइटहुड की उपाधि अंग्रेजों के द्वारा दी जाती है। हालांकि 1919 का जो जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था उसके
विरोध में इन्होंने इसको त्याग दिया। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि महात्मा गांधी ने इनको गुरुदेव की उपाधि दी। वहीं
इन्होंने महात्मा गांधी को महात्मा की उपाधि दी। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इनको कहा कि रविंद्रनाथ टैगोर मेरे
इंटेलेक्चुअल गुरु है। और दूसरी बड़ी बात यह भी है कि रविंद्रनाथ टैगोर ने स्वामी विवेकानंद की तरह स्पिरिचुअल ह्यूमनिज्म
अर्थात आध्यात्मिक मानवतावाद का विचार दिया। रविंद्रनाथ टैगोर की प्रमुख कृतियां रही है। जिनमें पहला नाम आता है गीतांजलि।
दूसरा नाम आता है गौरा जो कि इनका नोवेल है। तीसरा नाम आता है जन गण मन जो कि भारत का राष्ट्रीय गान है। अगला आता है द पोस्ट
ऑफिस। अगला आता है साधना। अगला आता है घर बैरे जो कि डीपर मीनिंग ऑफ लाइफ से जुड़ी है। और अगला नाम आता है स्टेब्स। नेक्स्ट
नेम आता है नेशनलिज्म। और अगला नाम आता है क्रिएटिव यूनिटी। और लास्ट नाम आता है द रिलीजन ऑफ मैन। अब हम रविंद्रनाथ टैगोर के
क्रिएटिव फ्रीडम के कांसेप्ट को डिस्कस कर लेते हैं। तो इन्होंने ही क्रिएटिव फ्रीडम का कांसेप्ट दिया जिसको कि क्रिएटिव
हैप्पीनेस के रूप में जाना जाता है। इसमें बेसिकली इन्होंने चार इंपॉर्टेंट स्टेजेस बताई है लिबर्टी की। जिसमें पहली स्टेज
आती है इंडिविजुअल। दूसरी स्टेज इसमें आती है कम्युनिटी और तीसरी स्टेज इसमें आती है यूनिवर्स। और चौथी स्टेज इसमें आती है
फ्रॉम यूनिवर्स टू इंफिनिटी। वहीं दूसरी तरफ रविंद्रनाथ टैगोर ने नेशनलिज्म को क्रिटिसाइज किया है। इन्होंने नेशनलिज्म
को अपनी प्रमुख कृति नेशनलिज्म जो कि 1917 को पब्लिश होती है। क्रिटिसाइज किया और इंटरनेशनलिज्म का कांसेप्ट दिया। दूसरी
महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने हीगल का जो नेशनलिज्म है इसको पूरी तरीके से क्रिटिसाइज किया और इन्होंने सिंथेटिक
यूनिवर्सलिज्म का कांसेप्ट दिया जिसको कि इंटरनेशनलिज्म कहा जाता है और दूसरी बड़ी बात यह भी है कि इन्होंने जो नेशनलिज्म है
वह इस आधार पर क्रिटिसाइज किया कि इन्होंने कहा कि नेशनलिज्म युद्ध इंपीरियलिज्म और जो कॉलोनियलिज्म है उसको
कहीं ना कहीं प्रमोट करता है। अब हम महात्मा गांधी और टैगोर के बीच जो डिफरेंस है उसको भी समझ लेते हैं। तो एक तरफ़ है
रविंद्रनाथ टैगोर और दूसरी तरफ़ है महात्मा गांधी। रवींद्रनाथ टैगोर ने कोऑपरेटिव फार्मिंग की बात की। वहीं दूसरी तरफ
महात्मा गांधी ने चरखा की बात की। जहां एक तरफ रवींद्रनाथ टैगोर ने यह कहा कि कास्ट बेस्ड डिवीजन नहीं होना चाहिए। वहीं दूसरी
तरफ महात्मा गांधी ने वर्ण सिस्टम पर अपना फेथ किया। अगला पॉइंट यह है कि रविंद्रनाथ टैगोर ने जहां एक तरफ इंटरनेशनलिज्म की
बात की वहीं दूसरी तरफ महात्मा गांधी नेशनलिज्म पर जोर दिया। अब हम सबसे पहले डिस्कस कर लेते हैं
महात्मा गांधी की लाइफ को। तो महात्मा गांधी का जन्म होता है 2 अक्टूबर 1869 को और इनकी डेथ होती है 30th जनवरी 1948 को।
महात्मा गांधी इंडियन लॉयर, एंटी कॉलोनियल नेशनलिस्ट और पॉलिटिकल एथिस्ट थे। दूसरी बात यह है कि इनको जाना जाता है ब्रिटिश
रूल के खिलाफ जो इन्होंने नॉन वायलेंट रेसिस्टेंस किया था उसके सक्सेसफुल कैंपेन के लिए और बड़ी बात यह भी है कि 1915 तक
यह साउथ अफ्रीका में रहे और 1893 में यह साउथ अफ्रीका गए थे। दूसरी एक इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि 9 जनवरी 1915 को यह साउथ
अफ्रीका से भारत लौटते हैं और 9 जनवरी को इसी वजह से भारत में भारतीय प्रवासी दिवस को सेलिब्रेट किया जाता है। दूसरी
इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि सुभाष चंद्र बोस ने इनको फादर ऑफ द नेशन की उपाधि दी थी और 1917 में महात्मा गांधी ने चंपारण
सत्याग्रह को बिहार के चंपारण में शुरू किया और इन्होंने राजकुमार शुक्ला के कहने पर ऐसा किया। महात्मा गांधी ने 1918 को
अहमदाबाद में मिल स्ट्राइक को किया और महात्मा गांधी की पहली हंगर स्ट्राइक थी। 1918 में महात्मा गांधी ने खेड़ा
सत्याग्रह किया जो कि महात्मा गांधी का पहला नॉन कोऑपरेशन मूवमेंट था और सबसे बड़ी बात यह है कि 1919 में महात्मा गांधी
ने सत्याग्रह किया जो अंग्रेजों का रोलट एक्ट था उसके विरोध में और महात्मा गांधी का यह पहला मास मूवमेंट था और खास बात यह
भी है कि इन्होंने इसके विरोध में केसर-ए-ह हिंद बोर वॉर मेडल और जो लल्लू रेबेलियन मेडल है उसको त्याग दिया था।
यानी कि अंग्रेजों को वापस लौटा दिया था। 1919 में इन्होंने खिलाफत मूवमेंट को लांच किया और 1920 से 22 इन्होंने नॉन कोऑपरेशन
मूवमेंट को लांच किया और सबसे प्रमुख बात यह है कि 1924 में महात्मा गांधी ने बेलगांव में इंडियन नेशनल कांग्रेस की
अध्यक्षता की जो उसका सम्मेलन हुआ था। और एक इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि 4 मार्च 1930 को महात्मा गांधी ने सिविल
डिसओबिडियंस मूवमेंट को लांच किया था। 1932 को पूना पैक्ट पर साइन किए जाते हैं डॉ. अंबेडकर और महात्मा गांधी के द्वारा।
दूसरी बड़ी बात यह है कि 1942 को क्विट इंडिया मूवमेंट को स्टार्ट किया जाता है गांधी जी के द्वारा और इसमें इन्होंने
नारा दिया था डू और डाई का और 1937 में महात्मा गांधी के द्वारा बर्धा स्कीम को लांच किया जाता है जिसको नई तालीम और
बेसिक एजुकेशन फॉर ऑल के रूप में जाना जाता है। महात्मा गांधी ने कहा कि जो गवर्नेंस है उसका सेंटर पॉइंट विलेज होना
चाहिए जिसको कि ओशियनिक सर्कल थ्योरी कहा जाता है। गोपाल कृष्ण गोखले ने गांधी जी को अपना पॉलिटिकल गुरु माना था। अब हम यह
समझ लेते हैं कि महात्मा गांधी की साउथ अफ्रीका में क्या-क्या एक्टिविटीज रही है। तो सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि 1893 को
महात्मा गांधी एक मुस्लिम व्यापारी के चचेरे भाई का मुकदमा लड़ने के लिए साउथ अफ्रीका जाते हैं। और 1894 को वहां पर
इन्होंने नेटल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की ताकि वहां पर जो इंडियन ट्रेडर्स है जिनके साथ डिस्क्रिमिनेशन होता था उसके
खिलाफ लड़ाई लड़ सके। और सबसे बड़ी बात यह भी है कि 1906 में वहां पर ट्रांसवेल में इन्होंने पहला सत्याग्रह यानी कि सामूहिक
सविनय अवज्ञा आंदोलन को शुरू किया। इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि महात्मा गांधी ने अपना जो पहला सत्याग्रह है वो
1906 में जोहानिसबर्ग जो कि साउथ अफ्रीका का एक शहर है, एक सिटी है, वहां पर किया था। महात्मा गांधी पर अनेक लोगों और अनेक
बुक्स और जो ग्रंथ है, उनका इंपैक्ट पड़ा। जिसमें पहला नाम आता है रामायण और महाभारत का। दूसरा इसमें नाम आता है बुद्धा का नॉन
वायलेंस। तीसरा नाम आता है इस्लाम की फ्रेटरनिटी का। चौथा इसमें नाम आता है लियो टॉलस्टॉय का कांसेप्ट। गॉड इज विद इन
यू। वहीं से महात्मा गांधी ने इस कांसेप्ट को लिया। अगला नाम आता है जॉन रस्किन का जो ब्रेड लेबर है। वहीं से इन्होंने इस
कांसेप्ट को लिया। अगला नाम इसमें इंपॉर्टेंट आता है सिविल डिसओबिडियंस जो कि इन्होंने डेविड थरो से लिया। नेक्स्ट
नाम आता है फिलॉसोफिकल एनाकिज्म का कांसेप्ट जो कि इन्होंने अगेन लियो टॉलस्टॉय से लिया। और सबसे इंपॉर्टेंट बात
यह भी है कि गोपीनाथ धवन ने अपनी प्रमुख कृति द पॉलिटिकल फिलॉसोफी ऑफ महात्मा गांधी इसमें इन्होंने महात्मा गांधी को
फिलॉसोफिकल एनाकिस्ट कहा। महात्मा गांधी ने अपने जीवन में कुछ इंपॉर्टेंट आश्रम्स को एस्टैब्लिश किया जो कि आपके एग्जाम के
लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। तो इसमें पहला आश्रम आता है फेनिक्स सेटलमेंट जो कि इन्होंने 1904 में एस्टैब्लिश किया था और
दक्षिण अफ्रीका के जहानिसबर्ग में एस्टैब्लिश किया था। दूसरा इसमें आता है टॉलस्टॉय फॉर्म जो कि इन्होंने 1910 को
एस्टैब्लिश किया था दक्षिण अफ्रीका में। अगेन अगला फार्म या फिर आश्रम आता है कोचरव आश्रम जो कि इन्होंने 1915 में
गुजरात के कोच में एस्टैब्लिश किया था और इसमें अगला आता है साबरमती आश्रम जो कि 1915 में इन्होंने अगेन गुजरात के साबरमती
में एस्टैब्लिश किया था और इसमें अगला लास्ट आता है सेवाग्राम आश्रम जो कि इन्होंने महाराष्ट्र के वर्धा में 1936 को
एस्टैब्लिश किया था। अब हम महात्मा गांधी की इंपॉर्टेंट जो वक्स है जो कृतियां हैं उनको डिस्कस कर लेते हैं। तो इसमें पहला
नाम आता है हिंदू स्वराज का जो कि 1909 को पब्लिश होती है और इसको इंडियन होम रूल के नाम से भी जाना जाता है। तो इस किताब की
खास बात यह है कि इन्होंने इसमें वेस्टर्न सिविलाइजेशन को क्रिटिसाइज किया है और इसको डार्क एज के रूप में संबोधित किया
है। दूसरी बड़ी बात यह है कि इसमें इन्होंने ब्रिटिश पार्लियामेंट की आलोचना की है और इसको बारेन वूमेन के रूप में
देखा है। इस कृति को इन्होंने संवाद शैली में लिखा है और यह जो प्लेटो के डायलॉग्स हैं या फिर रिपब्लिक है वहां से इंस्पायर
है। दूसरी प्रमुख बात यह है कि इन्होंने बुक लिखी फ्रीडम्स बैटल। अगली बुक इनकी आती है द स्टोरी ऑफ़ माय एक्सपेरिमेंट विद
ट्रुथ। अगली बुक आती है द आइडिया ऑफ़ माय ड्रीम्स। और अगली आती है की टू हेल्थ जो कि 1948 को पब्लिश होती है। और विचारणीय
बात यह भी है कि महात्मा गांधी ने प्लेटो का जो मेजर वर्क है द अपोलॉजी इसको इन्होंने अनुवाद किया ट्रांसलेट किया एज
सत्यवीर की कथा के रूप में। इसके अलावा महात्मा गांधी की अन्य कृतियां भी रही है। जिनमें पहला नाम आता है खादी का। दूसरा
नाम आता है सर्वोदया का। तीसरा नाम आता है सत्याग्रह का और चौथा नाम आता है गीता बोध का। इसके अलावा इनकी कृति नॉन वायलेंस इन
पीस एंड बोर भी रही है। और नोट करने वाली बात यह भी है कि इनकी कुछ मैगज़ंस और न्यूज़ेपर रहे हैं जिनके साथ यह जुड़े रहे।
जिनमें पहला नाम आता है इंडियन ओपिनियन का जो कि साउथ अफ्रीका के डरबवन में पहली बार यह प्रकाशित हुई 1903 को। दूसरा नाम आता
है यंग इंडिया का जो कि 1919 में पहली बार प्रकाशित हुई। दूसरा नाम आता है हरिजन जो कि 1933 में यह इंग्लिश में प्रकाशित हुई
और अगला नाम आता है नवजीवन का जो कि 1947 को प्रकाशित हुई गुजराती में और अगला नाम आता है हरिजन सेवक और लास्ट नाम आता है
हरिजन बंधु गांधी जी के ऊपर अनेक विचारकों ने राइटिंग्स लिखी लेखन किया तो इनके ऊपर ऐसी कृतियां हैं जो काफी ज्यादा एग्जाम
में पूछी जाती है तो स्क्रीन में जितनी भी आपको यह कृतियां दिखाई दे रही है आप अच्छे से नोट नोट कर लें क्योंकि इनको अक्सर
एग्जाम में पूछा जाता है। इस वजह से यह सारी की सारी बड़ी इंपॉर्टेंट है। अब हम महात्मा गांधी के पॉलिटिकल थॉट को डिस्कस
कर लेते हैं। तो इनमें पहला थॉट आता है थ्री पॉइंट प्रोग्राम ऑफ महात्मा गांधी। तो इसमें पहला पॉइंट आता है यूज़ ऑफ चरखा।
दूसरा पॉइंट आता है एवववोल्यूशन ऑफ अनटचेबिलिटी और तीसरा पॉइंट आता है हिंदूु मुस्लिम यूनिटी। वहीं इनका अगला कांसेप्ट
आता है सर्वोदया का। तो इन्होंने कहा कि जो सर्वोदया है वह मैंने जॉन रस्किन से लिया है। जॉन रस्किन का जो कांसेप्ट था अन
टू द लास्ट वहां से इन्होंने अपने आप को इंस्पायर किया और सबसे बड़ी बात यह है कि जो सर्वोदया है इसका मतलब होता है
अपलिफ्टमेंट ऑफ ऑल अर्थात सभी वर्ग सभी तरह के लोग सभी जातियों के सभी धर्मों के लोगों का विकास होना उत्थान होना
डेवलपमेंट होना और खास बात यह भी है कि इसमें यह बोलते हैं कि जो ग्रामीण स्वराज है वह होना चाहिए और यह बेसिकली एक प्रकार
का गांधीियन सोशल िज्म है। महात्मा गांधी का अगला कांसेप्ट आता है स्वराज का। तो स्वराज के बारे में इन्होंने यह कहा कि
स्वराज ब्रिटिश जो पार्लियामेंट है उसका उपहार नहीं होगा बल्कि यह भारत की अपनी खुद की आत्म अभिव्यक्ति की घोषणा होगी।
दूसरी बड़ी बात यह है कि यह कहते हैं कि स्वराज का मतलब होता है जो फॉरेन रूल होता है उससे भारत की पॉलिटिकल, कल्चरल और जो
मोरल इंडिपेंडेंस है वो होनी चाहिए। और इसका दूसरा पॉइंट यह भी है कि इन्होंने कहा कि जो इंडिविजुअल लेवल पर है वह
इंडिविजुअल फ्री होना चाहिए कंप्लीटली और पॉलिटिकल लेवल पे जो इंडिया है यानी कि जो नेशन है वह फ्री होना चाहिए। और
इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि इन्होंने यह बोला कि स्वराज के लिए डीसेंट्रलाइजेशन का होना या फिर विलेज स्वराज का होना परम
आवश्यक है। और लास्ट इंपॉर्टेंट बात यह है कि महात्मा गांधी कहते हैं कि स्वराज विज़ है ट्रू डेमोक्रेसी का। और यह एक ऐसा
प्रोसेस है जिसके द्वारा सेल्फ कंट्रोल, सेल्फ डिसिप्लिन और सेल्फ जो प्यूरिफिकेशन है इन सभी चीजों में बढ़ोतरी होती है,
इंप्रूवमेंट होती है। महात्मा गांधी का अगला कांसेप्ट आता है सत्याग्रह का। तो सत्याग्रह का मतलब होता है इंसिस्टेंस ऑन
ट्रुथ। अर्थात सत्य पर हमेशा अडिग रहना, सत्य की पालना करना, सत्य का आग्रह करना। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि महात्मा
गांधी ने कहा कि सत्याग्रह पावरफुल व्यक्ति जो होते हैं पावरफुल जो पर्सन होते हैं उनका यह विपन होता है टूल होता
है। जो कायर या फिर जो कमजोर लोग होते हैं वे कभी भी सत्याग्रह का अनुसरण नहीं कर सकते हैं। तीसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि
महात्मा गांधी ने कहा कि हमें हमेशा सत्य की पालना करनी चाहिए और किसी भी व्यक्ति को हार्म नहीं करना चाहिए। नुकसान नहीं
पहुंचाना चाहिए। इसमें अगली इंपॉर्टेंट बात यह आती है कि इसमें दो प्रकार के सत्याग्रह की इन्होंने बात की। पहला है
नॉन कोऑपरेशन और दूसरा है सिविल डिसओबिडियंस। और इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि सत्याग्रह की कुछ टेक्निक्स होती है।
जैसे नॉन कोऑपरेशन, स्ट्राइक, फास्टिंग, सिविल डिसओबिडियंस, सेल्फ सफरिंग, सोशल बॉयकॉट, नेगोशिएशन, पिकेटिंग, सो ऑन। अब
हम इस बात को भी समझ लेते हैं कि गांधी जी की रिलीजन और पॉलिटिक्स के ऊपर क्या विचार रहे हैं। तो गांधी जी ने फेमसली कहा था कि
पॉलिटिक्स विदाउट रिलीजन इज लाइक डेथ जिसका मतलब यह है कि धर्म राजनीति में होना अनिवार्य है क्योंकि धर्म के बिना
राजनीति मृत्यु के समान है। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने कहा कि धर्म वह होता है जो धारण करने योग्य होता है। यानी
कि जिसको अपनी लाइफ में उतारा जा सके वही धर्म है और इन्होंने सर्वधर्म समभाव का विचार दिया। जिसका मतलब यह होता है कि
हमें सभी धर्म को स्पेस देना चाहिए, आदर देना चाहिए, रिस्पेक्ट देनी चाहिए। और खास बात यह है कि इन्होंने अपने बारे में यह
कहा कि मैं राजनीतिज्ञों में संत हूं व संतों में राजनीतिज्ञ हूं। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है अगर हम कंक्लूड के
रूप में कहें कि इन्होंने पॉलिटिक्स का स्पिरिचुअलाइजेशन किया। गांधी जी का नेक्स्ट कंसेप्ट आता है ट्रस्टीशिप का
कांसेप्ट जिसमें ये कहते हैं कि व्यक्ति संपत्ति का मालिक नहीं होगा बल्कि जो पूरी ट्रस्टी है वो संपत्ति की मालिक होगी।
दूसरे अर्थों में हम यह कह सकते हैं कि जो संपत्ति है वह व्यक्तिगत होगी परंतु उपयोग सभी करेंगे। और खास बात यह भी है कि इसमें
कुछ डोनेशंस होते हैं या डोनेशन के प्रकार होते हैं। जैसे लेबर डोनेशन होता है, प्रॉपर्टी डोनेशन होता है, लैंड डोनेशन
होता है, विलेज डोनेशन होता है जिसको आप सिंपल हिंदी में कह सकते हैं श्रमदान, संपत्ति दान, भूमि दान और ग्राम दान।
अगले थिंकर का नाम आता है अरविंदो घोष जो कि इंडियन फिलॉसफर योगी महर्षि पोएट और इंडियन नेशनलिस्ट रहे हैं। इनका ओरिजिनल
नेम था अरविंदो घोष और इनका जन्म होता है कोलकाता में। 1905 में इन्होंने क्रिटिक किया मॉडरेट्स जो कांग्रेस के अंदर थे
उसका और इसका क्रिटिक इन्होंने अपने जो वीकली पेपर था जिसका नाम था वंदे मातरम इसके अंतर्गत किया और 1907 में कांग्रेस
का स्प्लिट हो जाता है सूरत में जिसके बाद अरविंदो घोष ने जो एक्सट्रीमिस्ट ग्रुप था बाल गंगाधर तिलक के साथ इसको इन्होंने
कहीं ना कहीं लेड किया यानी कि इसका नेतृत्व किया। दूसरी बड़ी बात यह है कि 1908 में इनका संबंध रहा अलीपुर बम केस के
साथ जिसकी वजह से इनको कैद हो जाती है इंप्रिश किया जाता है और 1909 में श्री अरविंदो घोष ने कर्म योगी जो कि एक वीकली
इंग्लिश जर्नल था उसको ल्च किया और 1909 में ही इन्होंने धर्म जो कि एक वीकली बंगाली जर्नल था उसको ल्च किया और सबसे
महत्वपूर्ण बात यह है कि 1910 में श्री अरविंदो घोष जेल से बाहर आते हैं और उस समय की फ्रेंच कॉलोनी पोंडीचेरी में
इन्होंने एक आश्रम को एस्टैब्लिश किया और इसका नाम था अरविलो आश्रम और वहां पे ही इन्होंने पॉलिटिक्स से सन्यास लिया और
स्पिरिचुअल नेशनलिज्म ह्यूमन यूनिटी और वर्ल्ड यूनियन जैसे जो आइडिया है उनका डेवलपमेंट किया। दूसरी सबसे बड़ी बात यह
है कि अरविंदो घोष को लॉर्ड मिंटो ने कहा कि यह मोस्ट डेंजरस पर्सन है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि 1914 में
इन्होंने एक इंपॉर्टेंट मैगजीीन को पब्लिश किया जिसका टाइटल था आर्य और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि 1892 में लंदन
में यह लोटस और डगर्स नामक गुप्त संस्थाओं से जुड़े और इनका फेमस स्लोगन रहा है। नो कंट्रोल, नो कोऑपरेशन। और इससे भी
महत्वपूर्ण बात यह है कि अरविंदो घोष की जो डिसिपल है यानी कि शिष्य है इनका नाम था मीरा रिचर्ड जिनको कि मदर कहा जाता है।
और इनके जीवन के तीन इंपॉर्टेंट फेजेस रहे हैं। जिनमें पहला फेज आता है रेवोल्यूशनरी नेशनलिस्ट जिसको आप कहते हैं क्रांतिकारी
राष्ट्रवादी। दूसरा आता है नेशनलिस्ट यानी कि राष्ट्रवादी और तीसरा इसमें आता है स्पिरिचुअल नेशनलिस्ट यानी कि आध्यात्मिक
राष्ट्रवादी। अरविंदो घोष के बारे में रोमन रोलन ने कहा कि यह मास्टरफुल सिंथेसिस रहे हैं ईस्टर्न और वेस्टर्न
जीनियस के। दूसरी बड़ी बात यह है कि रविंद्रनाथ टैगोर ने कहा कि अरविंद घोष के माध्यम से भारत विश्व को अपना संदेश दे
सकेगा। डॉक्टर फ्रेडरिक स्पेलबर्ग ने कहा कि यह हमारे युग के प्रॉफेट रहे हैं। यानी कि पैगंबर रहे हैं। अब हम अरविंदो घोष की
कुछ इंपॉर्टेंट कृतियों को डिस्कस कर लेते हैं। जिनमें पहला नाम आता है द आइडियल ऑफ ह्यूमन यूनिटी। दूसरा नाम आता है द लाइफ
डिवाइन। तीसरा आता है द रेसंस इन इंडिया। चौथा आता है एस्स ऑन द गीता। अगला नाम आता है द मदर। नेक्स्ट नेम आता है सावित्री और
लिजेंड और सिंबल। और अगला नाम आता है द सिंथेसिस ऑफ योगा। नेक्स्ट नेम आता है लव एंड डेथ। और लास्ट नाम आता है द ह्यूमन
साइकिल जो कि 1949 को पब्लिश होती है। इसके अलावा अरविंदो घोष के कुछ न्यूज़पेपर्स और मैगजींस भी रही है।
जिनमें पहला नाम आता है भवानी मंदिर जो कि इनका एक पॉलिटिकल पेंट था जो कि 1905 को पब्लिश होता है। इसके अलावा दूसरा आता है
वंदे मातरम जो कि न्यूज़पेपर था। 1905 को यह ल्च होता है। अगला आता है कर्म योगी जो कि अगेन न्यूज़पेपर था इंग्लिश में। 1909
को यह ल्च होता है। अगला आता है धर्मा जो कि बंगाली न्यूज़पेपर था। 1909 को यह पब्लिश होता है। अगला आता है युगांतर जो
कि अगेन बंगाली न्यूज़पेपर था जो कि 19067 को पब्लिश हुआ था और लास्ट आता है आर्य जो कि एक मैगज़ीन रही है। 1914 में यह कहीं ना
कहीं संचालित हुई थी। पब्लिश हुई थी। अब हम अरविंदो घोष के पॉलिटिकल थॉट्स को डिस्कस कर लेते हैं। तो इसमें पहला इनका
थॉट आता है थ्योरी ऑफ पैसिव रेसिस्टेंस। तो यह जो आईडिया है इन्होंने आरिश लीडर रहे हैं पारनेल उनसे इन्होंने ग्रहण किया
और इसका मतलब यह होता है कि जब आप अपोज करते हैं किसी को तो आप नेगेटिव वे में करते हैं। अर्थात नकारात्मक रूप में किसी
का विरोध करना। यानी कि अफसर होने पर आप वायलेंस का प्रयोग भी कर सकते हैं और यह बेस्ड है वायलेंस या फिर दूसरे का जो लॉस
होता है और जो फोर्स होती है उसके ऊपर यह आधारित है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह बोलता है कि जो नेशनल फ्रीडम है उसको
अटेन करने के लिए कुछ साधन होते हैं। जिनमें पहला यह आता है कि बॉयकॉटिंग फॉरेन गुड्स, बॉयकॉटिंग एजुकेशनल इंस्टीटश,
बॉयकॉटिंग ब्रिटिश कोर्ट्स, बॉयकॉटिंग द एडमिनिस्ट्रेशन। तो इसका दूसरा मतलब यह है कि यूजिंग वायलेंस, असॉल्ट, पैसिव
रेसिस्टेंस, रेवोल्यूशन एंड आर्म्ड रिवेलियन। अरविंदो घोष का अगला कांसेप्ट आता है थ्योरी ऑफ़ सुपरमैन। तो यह सुपरमैन
की जो अवधारणा है इन्होंने फेमस जर्मन फिलॉसफर नीचे से ग्रहण की है और इसका मतलब इन्होंने यह बोला है कि अतिमानव यानी कि
जो सुपर ह्यूमन है इसका सच्चे अर्थ में भगवान श्री कृष्ण ने गीता में बताया है। यानी कि इसका अर्थ भगवान श्री कृष्ण ने
भगवत गीता में दिया है। जिसका मतलब होता है स्थित प्रज्ञ मानव अर्थात जो भगवान श्री कृष्ण स्वयं है। यानी कि एक ऐसा
व्यक्ति होना चाहिए जहां पर सोसाइटी सबसे पहले ऐसी हो जो स्पिरिचुअल सोसाइटी हो यानी कि आध्यात्मिक समाज हो और वहां का जो
व्यक्ति होगा वो आत्मज्ञान यानी कि सेल्फ नॉलेज के साथ-साथ विश्व का ज्ञान भी रखता हो। जो बात कहीं ना कहीं सोक्रेटीज ने कही
थी सेल्फ नॉलेज की आत्मज्ञान की वह बात श्री अरविंद घोष भी यहां पर कह रहे हैं और साथ में जो वर्ल्डली अफेयर्स है वो भी
रखता हो जैसे कि प्लेटो ने कहा था। वहीं अगला इनका कांसेप्ट आता है कल्चरल नेशनलिज्म। तो यह भी इनकी बहुत बड़ी देन
है। इन्होंने कहा कि जो कल्चरल नेशनलिज्म है यह पॉलिटिकल मूवमेंट नहीं होता है सिर्फ बल्कि रिलीजियस होता है। धार्मिकता
इसके साथ जुड़ी है। इसीलिए इसको कल्चरल नेशनलिज्म कहा जाता है और इसको स्पिरिचुअल नेशनलिज्म भी कहा जाता है। दूसरी सबसे
बड़ी बात यह है कि यह कहते हैं कि जो नेशनलिज्म था, यह भारतीयों के लिए कहीं ना कहीं एक धार्मिक कार्य था। क्योंकि यह
ईश्वर की इच्छा के लिए किया गया कार्य के समान था। और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने कहा कि जो नेशनलिज्म है यह
बेसिकली फॉर्म ऑफ गॉड होता है। इसीलिए जो नेशनलिज्म है यह इमोर्टल होता है यानी कि अमर होता है। तो इनके विचार कहीं ना कहीं
हेगल से मिलते जुलते हैं। जिस तरह से हीगल ने कहा कि राज्य धरती पर ईश्वर का अवतरण होता है, आगमन होता है, मार्च होता है।
उसी तरीके से इन्होंने भी यह कहा कि राष्ट्रवाद भी ईश्वर का रूप है जो कि अमर है, इमोर्टल है। अरविंदु घोष का नेक्स्ट
कांसेप्ट आता है द थ्योरी ऑफ ह्यूमन साइकिल। तो सबसे बड़ी बात यह है कि द थ्योरी ऑफ ह्यूमन साइकिल का जो कांसेप्ट
है इन्होंने द ह्यूमन साइकिल बुक में दिया जो कि 1949 को पब्लिश हुई थी। और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने इस
कांसेप्ट को लिया जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान कार्ल गोथर्ड लैंपस से जिन्होंने कल्चर साइकिल थ्योरी दी थी और वहां से
इंस्पायर होकर ही इन्होंने यह कांसेप्ट दिया था। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसको जाना जाता है इंटीग्रल थ्योरी ऑफ
डेवलपमेंट और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने कहा इस कांसेप्ट के अंतर्गत कि जो भी होता है वह ईश्वर की
मर्जी से होता है। दुनिया चल रही है, चलायमान है वह सिर्फ ईश्वर की मर्जी से है और जो कुछ होता है वह ईश्वर की इच्छा का
परिणाम होता है। आपने सुना भी होगा अक्सर लोगों को यह कहते हुए कि ईश्वर की मर्जी के बिना तो पत्ता नहीं हिलता है। तो इसका
मतलब यह है कि इस तरह की बातें कहीं ना कहीं अरविंदो घोष ने कही थी और यह उदाहरण भी देते हैं जिसमें यह कहते हैं कि भारत
अंग्रेजों के अधीन रहा, गुलाम रहा तो यह कहीं ना कहीं ईश्वर की मर्जी थी। इसीलिए ऐसा हुआ और सबसे बड़ी बात यह भी है कि
इसको जाना जाता है स्पिरिचुअल डिटरमिनिज्म और डिवाइन जस्टिस थ्योरी यानी कि आध्यात्मिक नियतिवाद और जो देवीय न्याय
सिद्धांत है उसके नाम के रूप में भी यह जाना जाता है। अगले थिंकर का नाम आता है पेरियार जो कि
इंडियन सोशल एक्टिविस्ट रहे हैं, पॉलिटिशियन रहे हैं जो जाने जाते हैं 1925 के सेल्फ रिस्पेक्ट मूवमेंट के लिए और
द्रविड़ कड़गम पार्टी की स्थापना के लिए। पेरियार का जन्म होता है तमिलनाडु स्टेट के इरोड टाउन में। और इनको जाना जाता है
फादर ऑफ द्रविडियन मूवमेंट। दूसरी बड़ी बात यह है कि तमिलनाडु में या फिर तमिल भाषा में पेरियार का मतलब होता है द ग्रेट
फादर द ग्रेट सेज ग्रेटली ऑनरेबल। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि पेरियार को जाना जाता है फादर ऑफ मॉडर्न तमिलनाडु के रूप
में। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि 1919 में इन्होंने कांग्रेस पार्टी को जॉइ किया था। 1925 को इन्होंने कांग्रेस से
रिजाइन किया। उसके बाद यह जस्टिस पार्टी में जुड़ते हैं और 1944 में जस्टिस पार्टी का नाम बदल दिया जाता है और बदल के रखा
जाता है द्रविड़ कड़गम पार्टी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने एक इंपॉर्टेंट स्लोगन दिया 1938 में जिसका
टाइटल था या फिर जिसका नाम था तमिलनाडु फॉर तमिलियंस अर्थात तमिलों के लिए ही तमिलनाडु है। सबसे बड़ी बात यह है कि
पेरियार ने सबसे ज्यादा फोकस किया द्रविड़ नेशनलिज्म के ऊपर और इन्होंने पाकिस्तान की तर्ज पर द्रविड़ ना की बात की और 1939
में यह जस्टिस पार्टी के हेड बन जाते हैं। 1944 में इस पार्टी का नाम बदलकर द्रविड़ कड़गम रखा जाता है। हालांकि 1949 में सीएन
अन्ना दुराई वाली जो पार्टी है उसमें स्प्लिट हो जाती है। उसमें बंटवारा हो जाता है। जिसकी वजह से 1949 में डीएमके की
स्थापना हो जाती है। पेरियार ने कुछ प्रिंसिपल्स को प्रमोट किया। जिनमें सबसे प्रमुख था रैशनलिज्म, सेल्फ रिस्पेक्ट,
वुमेन राइट्स और इरेडीिकेशन ऑफ कास्ट। यह सभी चीजें इन्होंने प्रमोट की जिसके लिए यह जाने जाते हैं। दूसरी बड़ी बात यह है
कि 1970 में यूनेस्को ने इनको उपाधि दी पेरियार को जिसमें पहला टाइटल यह था कि प्रॉफेट ऑफ द न्यू एज यूनेस्को ने इन्हें
कहा। दूसरी उपाधि यह थी कि यूनेस्को ने इनको स्रेटीज ऑफ साउथ एशिया कहा और साथ में यूनेस्को ने इनको कहा फादर ऑफ द सोशल
रिफॉर्म्स मूवमेंट। तो यह अपने आप में बहुत बड़ी अचीवमेंट्स थी। अन्ना मीनाबाई ऐसी पहली व्यक्ति थे जिन्होंने ईवी
रामास्सावामी को टाइटल दिया था पेरियार का और सबसे बड़ी बात यह है कि 1904 में ईवी रामास्वामी पेरियार ने काशी की धार्मिक
यात्रा की थी लेकिन उस समय ब्राह्मणों ने इनका बहुत बड़ा अपमान किया था। बहुत ज्यादा अपमान किया था। जिसकी वजह से यह
नास्तिक हो गए थे। अधार्मिक हो गए थे। यानी कि धर्म की इन्होंने आलोचना की और सबसे बड़ी बात यह है कि इसके बाद
ब्राह्मणवाद का यानी कि ब्राह्मणिज्म का काफी ज्यादा इन्होंने इसमें विरोध किया था। इस घटना के बाद पेरियार की एक
इंपॉर्टेंट कृति भी रही थी जिसका टाइटल था वाइवर वुमेन एंड स्लेव। तो यह कृति बहुत इंपॉर्टेंट है। आपके एग्जाम के लिए अक्सर
इसे पूछा जाता है। इसके अलावा इनके कुछ वीकली न्यूज़पेपर्स भी थे। जिनमें पहला नाम आता है कुड़ी अरासु जो कि 1925 में
पब्लिश हुआ था। यह तमिलनाडु वीकली था। दूसरा नाम आता है रिबोल्ट का जो कि अगेन 1925 को पब्लिश हुआ था। यह इंग्लिश वीकली
था। तो विचारणीय बात यह है कि 1925 का जो सेल्फ रिस्पेक्ट मूवमेंट था उसके दौरान इन्होंने इन दोनों वीकली को पब्लिश किया
था। अब हम पेरियार के पॉलिटिकल थॉट्स को समझ लेते हैं। तो पेरियार को अब हम सबसे पहले एक सोशल रेवोल्यूशनरी के रूप में समझ
लेते हैं। जिनमें पहला पॉइंट यह आता है कि इन्होंने ब्राह्मणिज्म अर्थात जो ब्राह्मणवाद है उसका अपोजिशन किया।
ब्राह्मणवाद का विरोध किया। दूसरा पॉइंट आता है कि इन्होंने कास्टिज्म का क्रिटिसिज्म किया। यानी कि जातिवाद का
विरोध किया। तीसरा महत्वपूर्ण पॉइंट यह आता है कि इन्होंने सोशल रिफॉर्म्स की बात की। अर्थात जो सामाजिक सुधार है उसकी
वकालत की और अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट आता है वुमस राइट की इन्होंने बात की। इसका मतलब यह है कि नारी अधिकारों की इन्होंने वकालत
की। अब हम पेरियार का 1925 का जो सोशल रिस्पेक्ट मूवमेंट है जो कि एग्जाम की दृष्टि से बहुत इंपॉर्टेंट है। इसको समझ
लेते हैं। तो सबसे पहली बात यह है कि 1925 में इन्होंने इस मूवमेंट को ल्च किया था। जिसका उद्देश्य था सोशल रिफॉर्म्स जो
प्रोग्राम है उसको सक्सेस करना और इसके कुछ एम्स थे जिनमें पहला आता है सोशल रिफॉर्म्स यानी कि सामाजिक सुधार करना।
दूसरा इसका एम था कि जो ब्राह्मणिज्म है अर्थात जो ब्राह्मणवाद है उसका अपोजिशन करना। अगला पॉइंट था कि जो द्रविड़
ट्रेडिशंस है उसको डेवलप करना। और अगला पॉइंट था कि जो नॉन ब्राह्मणस है क्योंकि यह ब्राह्मणों का बहुत विरोध करते थे।
इसीलिए जो नॉन ब्राह्मणस हैं उनके बीच यूनिटी को एस्टैब्लिश करना। अगला पॉइंट था एस्टैब्लिशमेंट ऑफ इक्वल सोसाइटी। और सबसे
बड़ी बात यह है कि इस मूवमेंट के दौरान इन्होंने एक इंपॉर्टेंट स्लोगन दिया जिसका नाम था नो गॉड, नो रिलीजन, नो गांधी, नो
कांग्रेस, नो ब्राह्मण। इसका मतलब यह था क्योंकि यह नास्तिक थे, तो भगवान को नहीं मानते थे, धर्म को नहीं मानते थे। गांधी
जी की यह आल्सो आलोचना करते थे और ऐसा इसलिए था क्योंकि गांधी जी कास्ट सिस्टम वरना सिस्टम को मानते थे। काफी बड़े
धार्मिक व्यक्ति थे। इसीलिए इन्होंने गांधी की आलोचना की, कांग्रेस की आलोचना की और ब्राह्मणों की तो आलोचना की ही थी।
अब हम पेरियार का वकॉम सत्याग्रह को डिस्कस कर लेते हैं। तो इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह शुरू होता है
किंगडम ऑफ त्रावणकोर के वकॉम टेंपल से और यह शुरू होता है 30 मार्च 1924 से 23 मार्च 1925 तक। इसी वजह से इसको वकॉम
सत्याग्रह भी कहा जाता है क्योंकि यह वायकॉम टेंपल से शुरू हुआ था। अब यह गहरा सवाल है कि यह शुरू क्यों हुआ? तो वह
इसलिए शुरू हुआ क्योंकि जो किंगडम ऑफ त्रावणकोर था यह जाना जाता था अपनी जो कठोर और जो ऑप्रेसिव कास्ट सिस्टम है उसके
लिए अतः इसका मतलब यह हुआ कि इसको शुरू किया गया था जो वहां पर ऑपरेसिव या फिर जो रिजिड कास्ट सिस्टम थी उसको खत्म करने के
लिए और एक इंपॉर्टेंट बात यह भी थी कि इसको लेड किया गया था। इसका जो कैंपेन है उसका नेतृत्व किया गया था। अनेक कांग्रेस
के नेता थे। जिनमें नाम आता है टी के माधवन के कैलप्पन के पी केशव मेनन। दूसरी बड़ी बात यह है कि बाद में इसमें कुछ और
नेता जुड़े जिनके नाम थे जॉर्ज जोसेफ और अगला नाम था ईबी रामास्वामी पेरियार का जिन्होंने इस मोमेंट में या फिर इस
सत्याग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसीलिए इनके जो प्रशंसक है या जो लोग हैं उन्होंने इनको एक उपाधि दी और इनको
वकॉम का नायक कहा। पेरियार के कुछ अन्य थॉट्स भी रहे हैं जिनके ऊपर विचार करना आपके लिए महत्वपूर्ण है। तो इनमें पहला
थॉट यह था कि इन्होंने एथिज्म यानी कि जो निरीश्वरवाद है अर्थात ईश्वर को नहीं मानते थे उसके यह बहुत बड़े एडवोकेटर रहे
हैं। स्पोक्समैन रहे हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि रेडिकल थॉट थे इनके क्योंकि इन्होंने जिस तरह से इक्वल
सोसाइटी की बात की, कास्ट सिस्टम को रिमूव करने की बात की, द्रविड़ जो मूवमेंट है उसको इन्होंने चलाया। द्रविड़ जाति का जो
गौरव है उसके उत्थान की बात की। हिंदी का विरोध किया। तो इस तरह से आप कह सकते हैं कि इनके जो विचार थे वह कहीं ना कहीं
रेडिकल लिबरल थे। अगला पॉइंट यह आता है कि यह फाउंडर रहे हैं एंटी हिंदी मूवमेंट के क्योंकि हिंदी भाषा का इन्होंने विरोध
किया। इन्होंने संस्कृत भाषा का विरोध किया क्योंकि यह कहते थे कि जो द्रविड़ जाति है, द्रविड़ कास्ट है या जो द्रविड़
कल्चर है, उसका उत्थान हो और उसके उत्थान के लिए जरूरी है कि ब्राह्मण के साथ-साथ जो इनकी भाषा रही है संस्कृत, हिंदी, उसको
भी कहीं ना कहीं दबाया जाए, कुचला जाए, उसका भी विरोध किया जाए। और अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट यह था कि इन्होंने
कांग्रेस और गांधी की आलोचना की। अगले थिंकर का नाम आता है मोहम्मद इकबाल जो कि अल्लामा इकबाल के नाम से जाने जाते
हैं। यह बहुत बड़े फिलॉसफर पोएट पॉलिटिशियन रहे हैं अर्ली 20थ सेंचुरी के। इनका जन्म 1877 को पाकिस्तान के सियालकोट
में होता है और इनको जाना जाता है स्पिरिचुअल फादर ऑफ पाकिस्तान। साथ में इनको पाकिस्तान के राष्ट्रीय कवि के रूप
में भी जाना जाता है। और इनके टीचर का नाम था सैयद मीर हसन। सबसे प्रमुख बात यह है कि 1905 को यह इंग्लैंड में चले जाते हैं
पढ़ाई करने के लिए और 1908 में जर्मनी से इन्होंने पीएचडी की थी। 1908 में जो इन्होंने पीएचडी की थी, वह जर्मनी के
लुडबग मैक्सिमिलन यूनिवर्सिटी ऑफ़ म्यूनिक से की थी और इनका पीएचडी थीसिस था द डेवलपमेंट ऑफ़ मेटाफिजिक्स इन प्रशिया। और
सबसे बड़ी बात यह है कि 1908 में ये इंडिया आते हैं और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के साथ जुड़ जाते हैं। सबसे बड़ी बात यह
है कि इनका एक इंपॉर्टेंट वर्क रहा जिसका नाम है असरार ए खुदी। यह इतना प्रसिद्ध हुआ कि इसके लिए 1923 में जो ब्रिटिश
गवर्नमेंट है उन्होंने नाइटहुड की उपाधि से इकबाल को सम्मानित किया। मोहम्मद इकबाल रूमी की मसनबी पोएम से काफी ज्यादा
प्रभावित थे। 1930 में मोहम्मद इकबाल मुस्लिम लीग के प्रेसिडेंट चुने जाते हैं। और सबसे प्रमुख बात यह है कि मोहम्मद
इकबाल ही ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1930 के दशक में मुस्लिम के लिए सेपरेट स्टेट की डिमांड की और इनको जाना जाता है
पाकिस्तान सोसाइटी में हकीम उल उम्मत जिसका मतलब होता है द थिंकर ऑफ पाकिस्तान। और दूसरी सबसे प्रमुख बात यह है कि
इन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस की जो मेन स्ट्रीम धारा थी उसकी आलोचना की। इन्होंने यह कहा कि इसको केवल हिंदूज के द्वारा
डोमिनेंट किया जाता है और इसकी जो विचारधाराएं हैं केवल हिंदुओं के लिए हैं। मोहम्मद इकबाल बहुत बड़े साहित्यकार रहे
हैं। तो स्क्रीन पर आपको जितनी भी इनकी राइटिंग्स दिखाई दे रही है आप अच्छे से नोट कर सकते हैं क्योंकि आपके एग्जाम के
लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। 1932 में इनकी जावेदनामा जिसको बुक ऑफ इटरनिटी के नाम से जाना जाता है। वह प्रकाशित होती है। जिसकी
तुलना दते अलीगिरी की प्रसिद्ध रचना डिवाइड कॉमेडी से की जाती है। उर्दू में भी इनकी कुछ कृतियां रही है जो आपको
स्क्रीन पर दिखाई दे रही है। आप इनको भी अच्छे से नोट करें और सबसे प्रमुख बात यह है कि मोहम्मद इकबाल ने एक इंपॉर्टेंट
सॉन्ग को भी लिखा जिसका टाइटल था तराना-ए-ह हिंद जो कि 1904 में इन्होंने लिखा और इसको पॉपुलरली जाना जाता है सारे
जहां से अच्छा। अब हम मोहम्मद इकबाल के खुद ही के कांसेप्ट को समझ लेते हैं। तो सबसे प्रमुख बात यह है कि इस अवधारणा को
इन्होंने फ्रेडरिक निश्चय का जो कांसेप्ट है सुपर ह्यूमन वहां से लिया। इन्होंने भी अरविंदो घोष की तरह ही सुपर ह्यूमन का
कांसेप्ट दिया यानी कि खुद ही का कांसेप्ट दिया। दूसरी प्रमुख बात यह है कि इसको जाना जाता है इंसान एमिल और मर्द ए मोमिन
जिसको आप परफेक्ट मैन कहते हैं। जिस तरह से अरविंदो घोष ने कहा था कि भगवान श्री कृष्ण की तरह जो व्यक्ति अपना कर्म करता
है इंद्रियों को नियंत्रण में करता है जो वर्ल्डली अफेयर्स है और जो स्वयं की खोज है उसको कर लेता है तो वह परफेक्ट मैन हो
जाता है। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनकी फेमस बुक रही है जाबेदनामा जो कि 1932 को पब्लिश होती है। इस बुक में इन्होंने
कांसेप्ट दिया था खुद ही का और दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने इसमें व्यक्ति के तीन चरणों की बात की थी जिनमें पहला चरण
आता है पर्सनालिटी स्टेट यानी कि एक ऐसी अवस्था जो व्यक्तित्व की अवस्था होती है। दूसरी स्टेज आती है सोशल स्टेट यानी कि
सामाजिक अवस्था जब समाज से व्यक्ति जुड़ता है। तीसरी आती है परम की अवस्था यानी कि अल्टीमेट स्टेट और यह तीसरी स्टेट ऐसी
स्टेट होती है जहां पर व्यक्ति खुदा से या फिर ईश्वर से मिल लेता है उसमें मर्ज हो जाता है और इस तरह से उसकी लिबरेशन हो
जाती है। मोक्ष मिल जाता है। अल्लाह की प्राप्ति उसे हो जाती है। खुदा की प्राप्ति उसे हो जाती है। दूसरी बड़ी बात
यह भी है कि इन्होंने खुद ही के तीन इंपॉर्टेंट रूल्स की बात की। जिनमें पहला रूल यह आता है कि धर्म की आज्ञाओं का पालन
करना। दूसरा रूल यह आता है कि सेल्फ कंट्रोल रखना, आत्मसयम रखना जिसकी बात गांधी जी ने भी कही थी। और अगला सबसे
इंपॉर्टेंट आता है कि धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि होके रहना। आप यह समझ के इस दुनिया में रहें कि ईश्वर ने आपको धरती पर
अच्छा काम, कोई मकसद पूरा करने के लिए या गोल अचीव करने के लिए भेजा है। इसका मतलब यह है कि जब आप धरती में जन्म लेते हो तो
आपका एक बहुत बड़ा मकसद होता है जिसको पूरा करने के लिए ईश्वर ने आपको धरती पर भेजा है। अब हम मोहम्मद इकबाल के
डेमोक्रेसी के कांसेप्ट को समझ लेते हैं। तो इसके बारे में इन्होंने चार इंपॉर्टेंट बातें बताई है। जिनमें पहली बात आती है
सुपरमैन यानी कि खुद ही का इन्होंने कांसेप्ट दिया। इन्होंने बोला कि लोकतंत्र में खुद ही का होना बहुत जरूरी है। दूसरा
इन्होंने कहा कि इक्वलिटी होनी चाहिए सोसाइटी में। तीसरा इन्होंने यह कहा कि जो इस्लामिक इंस्टीटशंस है वो होनी बहुत
जरूरी है। उनके जो नियम होते हैं, रूल्स होते हैं उनके अनुसार जीवन यापन होना चाहिए। और अगला इंपॉर्टेंट है कम्युनिटी
लाइफ होनी चाहिए। इसका मतलब यह है कि इन्होंने अरिस्टोटल की तरह ह्नारंड की तरह रूसो की तरह कहीं ना कहीं कम्युनिटी लाइफ
की बात की। तो इस तरह से हम कह सकते हैं कि इन्होंने यह कहा कि महात्मा गांधी की तरह एथिक्स भी पॉलिटिक्स में होनी चाहिए।
दूसरी सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि अगर हम कंक्लूड करें इनकी डेमोक्रेसी को तो हम कह सकते हैं कि इनकी जो डेमोक्रेसी है वह
कहीं ना कहीं एथिकल डेमोक्रेसी है या फिर स्पिरिचुअल डेमोक्रेसी है। जिसमें नैतिकता कूट-कूट के भरी होनी चाहिए। जैसा कि
महात्मा गांधी जी ने भी कहा था। दूसरी बड़ी बात यह है कि खुद ही डेमोक्रेसी का बेस होगा, आधार होगा। क्योंकि खुद ही के
बिना लोकतंत्र की आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। और अगली इंपॉर्टेंट बात यह है कि डेमोक्रेसी में कोई रेसिज्म नहीं होगा।
मेजोरिटेरियनिज्म नहीं होगा। यहां पर सिर्फ कम्युनिटी लाइफ होगी। और सबसे बड़ी बात यह है कि मार्क्स की तरह हाईली
इगलिटेरियन सोसाइटी होगी। अब हम लास्ट में मोहम्मद इकबाल के कुछ अन्य कांसेप्ट्स को समझ लेते हैं जो कि अगेन आपके एग्जाम के
लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। तो पहला कांसेप्ट यह है कि इन्होंने कैपिटलिज्म की आलोचना की। दूसरा कांसेप्ट यह है कि इन्होंने
थियोक्रेसी यानी कि धर्मतांत्रिक राज्य का समर्थन किया। अगला कांसेप्ट आता है कि इन्होंने यह बोला कि रिलीजन और पॉलिटिक्स
एक नहीं हो सकते हैं। दोनों के अलग-अलग लक्ष्य है। इसीलिए हमेशा से जो पॉलिटिक्स है, रिलीजन है उनके बीच डाइकटॉमी पाई जाती
है। डायलेक्ट पाया जाता है, द्वंद पाया जाता है। इनका अगला कांसेप्ट था मोकरी ऑफ द लीग ऑफ नेशन। इन्होंने लीग ऑफ नेशन की
आलोचना की। उसका मजाक उड़ाया। अगला कांसेप्ट था कि इन्होंने नेशनलिज्म की भी आलोचना की। इन्होंने यह कहा कि राष्ट्रवाद
कोई ऐसी चीज नहीं है बल्कि हमें तो इस्लामीकरण करना है दुनिया का। पूरे विश्व में हमें इस्लाम को फैलाना है क्योंकि
पूरी दुनिया हमारी है। अगला इनका कांसेप्ट रहा कि इन्होंने सोशलिज्म की भी आलोचना की। इन्होंने बोला कि समाजवाद भी कोई बहुत
अच्छी चीज नहीं है बल्कि हमें एक ऐसे लोकतंत्र को स्थापित करना है जहां पर खुद ही हो। और अगला इनका कांसेप्ट रहा
इगलिटेरियन सोसाइटी मार्क्स की तरह इन्होंने समतावादी समाज की वकालत की। और अगला इनका कांसेप्ट रहा है कि इन्होंने
स्पिरिचुअल डेमोक्रेसी की बात की जिसका आधार खुद ही होगा। जहां पर कोई रेसिज्म नहीं होगा। जहां पर केवल एक ऐसी सोसाइटी
होगी जो समान होगी। इगलिटेरियन होगा जहां पे यानी कि समतावादी समाज होगा। अब हम एमएन रॉय को डिस्कस कर लेते हैं। तो
एमएन रॉय भारत के 20थ सेंचुरी के इंडियन रेवोल्यूशनरी फिलॉसोफर, रेडिकल एक्टिविस्ट और पॉलिटिकल थ्यरिस्ट रहे हैं। खास बात यह
है कि इनका मूल नाम नरेंद्रनाथ भट्टाचार्य था। और इससे भी इंपॉर्टेंट बात यह है कि यह इंडिपेंडेंस इंडिया तक भारत के
कम्युनिस्ट नेता रहे हैं जो कि बहुत प्रसिद्ध थे, फेमस थे। दूसरी बात यह भी है कि 1916 में यह सैन फ्रांसिस्को पहुंच
जाते हैं। वहां पर अपना नाम चेंज कर लेते हैं और एमएन रॉय के नाम से प्रसिद्ध हो जाते हैं। इन्होंने 1917 में मेक्सिकन
सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी की स्थापना की जिसका 1919 में नाम बदलकर रखा जाता है मेक्सिकन कम्युनिस्ट पार्टी। दूसरी बड़ी
बात यह है कि 1925 में इन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। और यह
भी एक इंपॉर्टेंट बात है कि 1926 के अंत तक उन्हें कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की कार्यकारी समिति में शामिल कर लिया गया
था। लेकिन 1929 में उन्हें कम्युनिस्ट जो इंटरनेशनल था वहां से निष्कासित कर दिया गया था। यानी कि हटा दिया गया था। और एक
इंपॉर्टेंट बात यह है कि 1936 में इन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस को जॉइ किया था। लेकिन इन्होंने कांग्रेस को 1940
में ही छोड़ दिया था। और 1940 में इन्होंने रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना की थी। एमएन रॉय की लाइफ को हम
चार भागों में बांट सकते हैं। जिनमें पहला भाग आता है मिलिटेंट नेशनलिस्ट। दूसरा भाग आता है मार्क्सिस्ट। तीसरा भाग इसमें आता
है मॉडिफाइड मार्क्सिस्ट और चौथा इसमें आता है रेडिकल ह्यूमनिस्ट। एमएन रॉय को 1910 के हावड़ा शिवपुर कास्परेंसी केस और
कानपुर कॉनस्परेसी केस 1924 में जो हुआ था उसकी वजह से जेल में जाना पड़ा। इन्होंने 1857 का जो रिवोल्ट था इसको फ्यूडल
रेवेलियन कहा। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि 1936 में इन्होंने कांग्रेस के अंदर ही लीग ऑफ रेडिकल कांग्रेसमैन की स्थापना की।
अगली इंपॉर्टेंट बात यह है कि 1940 में एमए रॉय ने मौलाना आजाद के खिलाफ कांग्रेस प्रेसिडेंशियल चुनाव लड़ा लेकिन हार हो
जाती है। इसके बाद इन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया था और 1940 में इन्होंने रेजिकल डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना की थी।
जिसकी वजह से इन्होंने ऑर्गेनाइज्ड डेमोक्रेसी की बात की और साइंटिफिक पॉलिटिक्स की बात की जिसको कि
जैकोवियनिज्म ऑफ द 20थ सेंचुरी कहा जाता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि 1948 के बाद इन्होंने न्यू ह्यूमनिस्ट के विचार
रखे। न्यू ह्यूमनिज्म का आईडिया इन्होंने दिया और इन्होंने पार्टीलेस डेमोक्रेसी की बात की और सबसे बड़ी बात यह है कि जीवन के
आखिरी पड़ाव में यह इंडियन रेनेस इंस्टट्यूट देहरादून में जो था जो कि इन्होंने खुद एस्टैब्लिश किया था वहां
रहते हैं और वहां रहते हुए 1954 को इनकी डेथ हो जाती है। एमएन रॉय का लिटरेचर बहुत व्यापक रहा है। तो इनकी पहली कृति आती है
इंडिया इन ट्रांजिशन। दूसरी आती है इंडियास प्रॉब्लम एंड देयर सॉलशंस। अगली आती है वन ईयर ऑफ नॉन कोऑपरेशन फ्रॉम
अहमदाबाद टू गया। अगली आती है द फ्यूचर ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स। नेक्स्ट आती है रेवोल्यूशन एंड काउंटर रेवोल्यूशन इन
चाइना। अगली आती है मटेरियलिज्म एंड आउटलाइन ऑफ द हिस्ट्री ऑफ़ साइंटिफिक थॉट। नेक्स्ट आती है साइंटिफिक पॉलिटिक्स। अगली
आती है द प्रॉब्लम ऑफ फ्रीडम। नेक्स्ट आती है न्यू ह्यूमनिज्म ऑफ़ मैनिफेस्टो। और अगली आती है रीजन रोमांटिसिज्म एंड
रेवोल्यूशन। अगली आती है पॉलिटिक्स इन रशियन रेवोल्यूशन। अगली आती है पॉलिटिक्स पावर एंड पार्टीज। और नेक्स्ट आती है वॉर
एंड रेवोल्यूशन। इसके अलावा रॉय दो इंपॉर्टेंट रेवोल्यूशनरी कमिटीज से जुड़े जिनके नाम थे युगांतर और अनुशीलन। और सबसे
बड़ी बात यह है कि इनकी एक मैगज़ीन भी रही है जिसका नाम था इंडिपेंडेंट इंडिया जो कि 1939 को पब्लिश हुई थी। और इसका 1947 में
नाम चेंज कर दिया गया था और इसका नाम रेडिकल ह्यूमनिस्ट रखा गया था। अब हम एमएन रॉय के पॉलिटिकल थॉट्स को डिस्कस कर लेते
हैं। तो इनके थॉट्स को हम दो भागों में बांट सकते हैं। पहला इसमें आता है रॉय लेनिथसिस यानी कि डिबेट और दूसरा आता है
न्यू ह्यूमनिज्म। अब हम रॉयल लेनिन डिबेट को अच्छे से समझ लेते हैं। तो पहली बात यह है कि यह शुरू होती है जुलाई 19, 1920 से
7 अगस्त 1920 तक और इसका जो टॉपिक था वो था नेशनल कॉलोनियल क्वेश्चन। दूसरी प्रमुख बात यह है कि लेनिन ने एक आर्टिकल लिखा
जिसका टाइटल था क्राफ्ट थीसिस ऑन द नेशनल एंड कॉलोनियल क्वेश्चन। जिसके अंतर्गत इन्होंने यह कहा कि जितनी भी कॉलोनियल
पावर्स हैं उनके खिलाफ जो औपनिवेशिक देश है वहां पर पूंजीवादी राष्ट्रीय तत्वों के साथ सहयोग किया जा सकता है। लेकिन जो एमएन
रॉय हैं इन्होंने इस मान्यता को रिजेक्ट कर दिया था। इन्होंने अगेन एक आर्टिकल लिखा जो कि लेनिन के खिलाफ था। इसका टाइटल
था ओरिजिनल ड्राफ्ट ऑफ सप्लीमेंट्री थीसिस ऑन द नेशनल एंड कॉलोनियल क्वेश्चन। जिसमें इन्होंने यह कहा कि जो उपनिवेश है यानी कि
जो कॉलोनाइज्ड है वहां जन आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन से स्वतंत्र विकसित हो रहे हैं तथा जनता क्रांतिकारी गतिविधियों
को रोकने वाले नेताओं पर अविश्वास करती है यानी कि विश्वास नहीं करती है। इसका मतलब यह था कि जो ऊपर लेनिन की मान्यता हमने
डिस्कस की उसका इन्होंने क्रिटिसिज्म की आलोचना की। तो सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने लेनिन के जो आईडिया है नेशनलिज्म
और कॉलोनियलिज्म उसकी इन्होंने आलोचना की। अब हम लेनिन और रॉय के बीच जो मुख्य मतभेद या फिर अंतर थे उसको समझ लेते हैं। तो
पहली प्रमुख बात यह है कि इन्होंने यानी कि लेनिन ने यह कहा कि जो नेशनलिज्म है और जो डीलोनाइजेशन है उसमें रोल ऑफ बरवाजी
क्लास होगा यानी कि वर्जुआ वर्ग की भूमिका होगी। जबकि दूसरी तरफ एमएन रॉय ने यह कहा कि इसमें जो भूमिका होगी वह प्रोलिट्रेट
क्लास की होगी और जो पेटी बरुआ जीज है उसकी होगी। दूसरा एक प्रमुख अंतर यह था कि लेनिन ने कहा कि कम्युनिस्ट पार्टी की
बड़ी भूमिका होगी। जबकि रॉय ने यह कहा कि कम्युनिस्ट पार्टी की कोई भूमिका नहीं होगी। तीसरा प्रमुख अंतर यह था कि लेनिन
का जो कम्युनिज्म था वो इंटरनेशनल कम्युनिज्म था। क्योंकि लेनिन कम्युनिज्म को विश्व स्तर पे या फिर अंतरराष्ट्रीय
स्तर पर फैलाना चाहते थे। जबकि एमएन रॉय का जो कम्युनिज्म था वह इंडियन पर्सपेक्टिव में था। अब हम रॉय के प्रमुख
आइडिया न्यू ह्यूमनिज्म को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो 1947 में इनकी बुक पब्लिश होती है जिसका टाइटल था न्यू
ह्यूमनिज्म और मैनिफेस्टो जिसमें इन्होंने न्यू ह्यूमनिज्म का कांसेप्ट दिया और इसको जाना जाता है रेडिकल ह्यूमनिज्म और
साइंटिफिक ह्यूमनिज्म के नाम से और इसके तीन इंपॉर्टेंट एलिमेंट्स की इन्होंने बात की जिसमें पहला इसमें आता है रीजन दूसरा
आता है फ्रीडम तीसरा आता है मोरालिटी। अब हम एमएन रॉय के न्यू ह्यूमनिज़्म की प्रमुख विशेषताओं को समझ लेते हैं। तो, इसकी पहली
विशेषता यह है कि इन्होंने पार्टीलेस डेमोक्रेसी की बात की। दूसरी प्रमुख विशेषता यह है कि इन्होंने
पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी की आलोचना की। तीसरी प्रमुख विशेषता यह है कि इन्होंने यह बोला कि आईडियोलॉजी में मुझे कोई भरोसा
नहीं है। अगली विशेषता यह है कि इन्होंने इसके अंतर्गत डायरेक्ट डेमोक्रेसी की बात की। नेक्स्ट फीचर यह आती है कि इन्होंने
ऑर्गेनाइज्ड डेमोक्रेसी या फिर रेडिकल डेमोक्रेसी की बात की। अगली फीचर यह आती है कि इन्होंने इंडिविजुअल फ्रीडम के ऊपर
बहुत ज्यादा फोकस किया। अगली फीचर आती है कि इन्होंने कॉस्मोपॉलिटनिज्म यानी कि जो विश्व नागरिकता है उसके ऊपर भरोसा जताया
और अगली फीचर यह है कि इन्होंने इंडिविजुअलिज्म के ऊपर ध्यान दिया। अगले थिंकर का नाम आता है बी डी सावरकर जो
कि महाराष्ट्र में जन्म लेते हैं जिनको जाना जाता है वीर सावरकर के रूप में। 1911 में नासिक कॉन्सिपरेसी केस में 50 वर्ष की
इनको कैद होती है और कालापानी की सजा इनको अंडमान की सेल्यूलर जेल में होती है। हालांकि 1923 में इनको अंडमान से
महाराष्ट्र की रत्नागिरी जेल में स्थानांतरित किया जाता है, लाया जाता है और फाइनली 1937 में इनको जेल से पूरी तरह
से रिहा किया जाता है। लोकमान्य तिलक की पार्टी डेमोक्रेटिक स्वराज से यह जुड़ जाते हैं रिहा होने के बाद और खास बात यह
है कि 1937 से 1943 तक सावरकर हिंदू महासभा के प्रेसिडेंट रहे और प्रेसिडेंट रहते हुए इन्होंने एक स्लोगन दिया
हिंदुआइजेशन ऑफ ऑल पॉलिटिक्स एंड मिलिटराइजेशन ऑफ हिंदूज। वहीं सावरकर 1906 से 1910 के बीच लंदन में रहे। जहां पर
इन्होंने फ्री इंडिया सोसाइटी की स्थापना की जिसके ऊपर कहीं ना कहीं फेमस इटालियन रेवोल्यूशनरी मैजिनी का इंपैक्ट था।
इन्होंने इंडिया को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहा उसको संबोधित किया और इन्होंने 1857 के रिवोल्ट को फर्स्ट वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस
कहा। दूसरी बात विचारणीय यह है कि लोकमान्य तिलक के सुझाव पर रिकमेंडेशन के ऊपर फेमस रेवोल्यूशनरी श्याम जी कृष्णा
वर्मा ने इनको स्कॉलरशिप दी। जिसकी वजह से सावरकर ने लंदन इंडिया हाउस से बैरियस्टर की उपाधि को प्राप्त किया। वहीं
महत्वपूर्ण बात यह है कि 1900 में इन्होंने मित्र मेला नामक सेक्रेट रेवोल्यूशनरी सोसाइटी को एस्टैब्लिश किया
जिसका 1904 में नाम रखा जाता है अभिनव भारत और यह इंस्पायर था मैजिनी की यंग इटली से और दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह भी है
कि सावरकर ने मैजिनी की बायोग्राफी का मराठी में अनुवाद किया और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 1908 में सावरकर ने अभिनव
भारत सोसाइटी की स्थापना की। वहीं दूसरी तरफ अगर हम इनके लिटरेचर की बात करें तो बहुत व्यापक रहा है। जिसमें पहली कृति आती
है द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस। दूसरी कृति आती है हिंदुत्व हु इज अ हिंदू। तीसरी आती है एसेंशियल्स ऑफ हिंदुत्व।
चौथी आती है हिंदू पद पादशाही। पांचवी आती है हिस्ट्री ऑफ़ सिखिज्म। छठी आती है हिंदू राष्ट्र दर्शन। सातवीं आती है द स्टोरी ऑफ़
माय ट्रांसपोर्टेशन ऑफ लाइफ। आठवीं आती है एन इको फ्रॉम अंडमान। नाइंथ आती है सिक्स ग्लोरियस एपोक्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री और
अगली आती है हिंदू राष्ट्रवाद। वहीं नेक्स्ट आती है हिंदू राष्ट्र दर्शन। अगली आती है मेरा आजीवन कारावास। नेक्स्ट आती
है अंडमान निकोबार की प्रतिध्वनियां। अगली आती है कालापानी। अगली आती है हिंदुत्व पंच प्रमाण। नेक्स्ट आती है इनाइड द एनिमी
कैंप। और एक इंपॉर्टेंट आती है द राइज़ एंड फॉल ऑफ इस्लाम। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि धनंजय कीर ने इनके ऊपर एक कृति लिखी
थी जिसका टाइटल था सावरकर एंड हिज टाइम्स। अब हम इनके पॉलिटिकल थॉट्स को डिस्कस कर लेते हैं जिसमें पहला थॉट आता है हिंदू
नेशनलिज्म और हिंदुत्व का जो कि इन्होंने अपनी प्रमुख कृति हिंदुत्व में दिया था जो कि 1923 को पब्लिश हुई थी। खास बात यह है
कि इन्होंने इसमें फेमसली लिखा था कि हिंदू वह है जो सिंधु नदी से लेकर समुद्र तक भारतवर्ष को अपनी पितृभूमि व पुण्य
भूमि मानता है। और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि हिंदू हिंदूइज़्म या फिर हिंदुत्व हिंदू नेशनलिज्म का जो कांसेप्ट है उसका
मेनली इन्होंने ही कांसेप्ट दिया था और इसके अंतर्गत इन्होंने तीन इंपॉर्टेंट एलिमेंट नेशन रेस और कल्चर की बात की थी।
वहीं विचारणीय बात यह भी है कि 1939 में जब यह हिंदू महासभा की अध्यक्षता कर रहे थे उस समय इन्होंने फेमसली कहा था कि आइए
हम साहस पूर्वक इस अप्रिय सत्य को स्वीकार करें कि भारत में दो राष्ट्र पाए जाते हैं। एक है हिंदू दूसरा है मुस्लिम। वहीं
दूसरी तरफ सावरकर ने क्रिटिसिज्म किया एब्सोल्यूट नॉन वायलेंस का क्योंकि यह रेवोल्यूशनरी तो इन्होंने कहा कि जो
एब्सोल्यूट नॉन वायलेंस है यह फिक्सिशियस होता है, सिनफुल होता है, इमोरल होता है। इन्होंने फेमसली कहा था कि इसलिए ब्रूट्स
की तलवार पवित्र है। इसलिए शिवाजी का बग नखा न्यायसंगत है। इसलिए चार्ल्स प्रथम का सिर कटवा देना न्यायचित काय है। इसलिए
विलियम टेलर का तीर दिव्य है क्योंकि यह सब राष्ट्र के लिए किया गया था। अब हम डॉ बी आर अंबेडकर को अच्छे से
डिस्कस कर लेते हैं। तो डॉक्टर बी आर अंबेडकर इंडियन जरिस्ट, इकोनॉमिस्ट, सोशल रिफॉर्मर और पॉलिटिकल लीडर रहे हैं।
जिन्होंने इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन के ऊपर बनी ड्राफ्टिंग कमिटी को हेड किया था। खास बात यह भी है कि इन्होंने इंडिया के पहले
लॉ मिनिस्टर के रूप में काम किया। जस्टिस मिनिस्टर के रूप में काम किया नेहरू के अंतर्गत। दूसरी बड़ी बात यह भी है कि
इन्होंने हिंदू धर्म को त्याग दिया और दलित मूवमेंट को शुरू किया। इनका जन्म होता है मध्य प्रदेश के महू में। अगली
महत्वपूर्ण बात यह है कि इनको जाना जाता है प्रिंसिपल आर्किटेक्ट ऑफ द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन एंड इंडिपेंडेंट इंडियास
फर्स्ट लॉ मिनिस्टर। और सबसे प्रमुख बात यह है कि महाराजा बड़ौदा की फाइनेंशियल असिस्टेंट की वजह से इन्होंने अपनी हायर
एजुकेशन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स लंदन से की और साथ में इन्होंने यूनाइटेड स्टेट्स की जो कोलंबिया यूनिवर्सिटी है वहां से अपनी
पीएचडी की। इनकी पीएचडी का थीसिस था प्रॉब्लम ऑफ इंडियन रूपी इट्स ओरिजिन एंड सॉल्यूशन। अंबेडकर ने 1924 को बहिष्कृत
हितकारिणी सभा की स्थापना की। 1927 में इन्होंने समाज सैनिक दल की स्थापना की व समाज समता संघ की स्थापना की। अगेन 1927
में इन्होंने महाद में सत्याग्रह की शुरुआत की ताकि दलित लोगों को भी पानी पीने के अधिकार मिल सके। सार्वजनिक जो
टैंक्स है वहां से पानी लेने के अधिकार मिल सके। वहीं 1930 में इन्होंने कलाग्राम टेंपल जो कि नासिक में अवस्थित था। वहां
पर इन्होंने प्रतीकात्मक रूप से प्रदर्शन किया या फिर सत्याग्रह किया। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि 1920 में
मोकनायक, 1927 में बहिष्कृत भारत और 1930 में इक्वलिटी जनता का प्रकाशन किया ताकि दलितों के साथ जो भेदभाव होता है उसके
खिलाफ आंदोलन किया जा सके। और अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि 1928 में अंबेडकर ने डिप्रेस्ड क्लास एजुकेशन सोसाइटी की
स्थापना की और अंबेडकर को जाना जाता है मॉडर्न एज मनु फादर ऑफ द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन मेमोरियल ऑफ द 20थ सेंचुरी
और अगली महत्वपूर्ण बात यह भी है अंबेडकर के बारे में कि इन्होंने गांधी जी के साथ पूना पैक्ट 1932 में किया था। हालांकि
इसके ऊपर साइन अंबेडकर और पंडित मालवीय ने किए थे। दूसरी बड़ी बात यह है कि 29 अगस्त 1947 को अंबेडकर कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया
की जो ड्राफ्टिंग कमेटी थी उसके चेयरमैन बन जाते हैं और 1947 में नेहरू गवर्नमेंट के अंतर्गत देश के पहले कानून मंत्री बन
जाते हैं। अगली महत्वपूर्ण बात यह भी है कि 1951 को अंबेडकर ने नेहरू कैबिनेट से रिजाइन दिया क्योंकि इनके नेहरू के साथ
हिंदू को बिल्कुल लेकर मतभेद हो गए थे। और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इन्होंने गांधी जी को बड़ी मात्रा में क्रिटिसाइज
किया क्योंकि गांधी जी पंचायती राज डीसेंट्रलाइजेशन के ऊपर फोकस करते थे। जबकि अंबेडकर स्ट्रांग सेंटर के पक्षधर
थे। वहीं सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 1955 में अपनी प्रमुख कृति थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स में इन्होंने
रिपोर्ट ऑफ द स्टेट्स रिऑर्गेनाइजेशन कमीशन का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि मेमनों के ऊन कतर दिए गए हैं और वे सर्दी
की तीव्रता को महसूस कर रहे हैं। बाबा साहब अंबेडकर 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की दीक्षा भूमि में हिंदू धर्म को छोड़कर
मुस्लिम धर्म को अपनाते हैं। और दूसरी बड़ी बात यह है कि 31 मार्च 1990 को इनको देश का सबसे बड़ा अवार्ड भारत रत्न मिल
जाता है और इन्होंने ग्रेडेड इन इक्वलिटी का कांसेप्ट दिया जिसका मतलब यह है कि यह कहते हैं कि हिंदू जो रिलीजन है वह बिलीव
करता है रिचुअल्स के ऊपर फेटलिज्म के ऊपर बर्थ के ऊपर जो कि एक प्रकार के आडंबर है जहां पे व्यक्ति की कभी ग्रोथ नहीं हो
सकती है। जबकि दूसरी तरफ जो हिंदू धर्म है वह कर्मा और जो मेरिट है उसके ऊपर कभी फोकस नहीं करता है। जिसको कि ग्रेडेड
इनकलिटी कहा जाता है। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने कांग्रेस को क्रिटिसाइज करते हुए इसे धर्मशाला ऑर्गेनाइजेशन कहा।
वहीं दूसरी तरफ बाबा अंबेडकर ने पॉलिटिकल पार्टीज को भी एस्टैब्लिश किया था। जिनमें पहला नाम आता है बहिष्कृत हितकारिणी सभा।
दूसरा नाम आता है ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास एसोसिएशन। अगला नाम आता है इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी। नेक्स्ट नेम आता
है ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन। अगला नाम आता है भारतीय बुद्धा महासभा और लास्ट नाम आता है रिपब्लिकन पार्टी ऑफ
इंडिया। तो इन पार्टीज को भी आप याद रखें। एग्जाम में कई बार पूछी जाती है। वहीं दूसरी तरफ अगर हम बात करें इनके लिटरेचर
की तो इनका लिटरेचर बहुत व्यापक रहा है। जिनमें पहला वर्क आता है कास्ट इन इंडिया। अगला इसमें आता है द प्रॉब्लम ऑफ इंडियन
रूपी जो कि इनका पीएसडी थीसिस भी रहा है। अगला इनका आता है द एनहलेशन ऑफ कास्ट। अगला आता है हुवर द शद्राज़। नेक्स्ट आता
है द अनटचेबल्स हुवर दे एंड व्हाई दे बिकम अनटचेबल्स। अगला आता है थॉट्स ऑन पाकिस्तान। नेक्स्ट आता है रानाडे गांधी
एंड जिन्ना। अगला आता है थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट। और अगला आता है रिडल्स इन हिंदूइज़्म। इसके अलावा इनके और
भी वर्क रहे हैं जिनमें आता है व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स। अगला आता है वेटिंग फॉर अ
वीजा। नेक्स्ट आता है द बुद्धा एंड हिज धामा। और अगला आता है फेडरेशन वर्सेस फ्रीडम। और नेक्स्ट आता है गांधी एंड
गांधीज्म। और अगला आता है स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज। और सबसे प्रमुख बात यह है कि इनकी कुछ पत्रिकाएं भी रही है जो कि
इन्होंने पब्लिश किया था। मैगजींस रही है जिनमें पहला नाम आता है भूकनायक जो कि वीकली थी 1920 में पब्लिश हुई थी। अगला
नाम आता है बहिष्कृत भारत 1927। नेक्स्ट नेम आता है जनता और अगला नाम आता है समता। अब हम बी आर अंबेडकर के पॉलिटिकल थॉट्स को
डिस्कस कर लेते हैं। तो पहला थॉट आता है क्रिटिसिज्म ऑफ कास्ट सिस्टम। अगला इसमें थॉट आता है क्रिटिसिज्म ऑफ भरना सिस्टम।
अगला थॉट इसमें आता है क्रिटिसिज्म ऑफ अनटचेबिलिटी। नेक्स्ट थॉट इनका आता है फोकस ऑन सेंट्रलाइजेशन। अगला थॉट आता है
क्रिटिसिज्म ऑफ महात्मा गांधी। नेक्स्ट थॉट आता है क्रिटिसिज्म ऑफ ब्राह्मणिज्म यानी कि ब्राह्मणवाद की आलोचना की। और
अगला थॉट आता है क्रिटिसिज्म ऑफ पंचायती राज और लास्ट थॉट आता है दलित सेल्वेशन जिसमें इन्होंने कहा कि सदियों से दलियों
का शोषण होता आया है। इसीलिए अब हमें दलितों की मुक्ति करनी पड़ेगी, उद्धार करना पड़ेगा। अंबेडकर ने एक इंपॉर्टेंट
कांसेप्ट दिया जिसको कि ट्रिनिटी ऑफ अंबेडकर कहा जाता है। इसमें इन्होंने मानव जीवन के लिए तीन इंपॉर्टेंट चीजें बताई
जिनमें पहली आती है लिबर्टी, दूसरी आती है इक्वलिटी और तीसरी आती है फ्रेटरनिटी। अब हम पंडित नेहरू को डिस्कस कर लेते हैं।
तो पंडित नेहरू इंडियन एंटी कॉलोनियल नेशनलिस्ट, सेकुलर ह्यूमनिस्ट, सोशल डेमोक्रेट, ऑथर और स्टेट्समैन रहे हैं।
दूसरी बड़ी बात यह है कि इनका उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में जन्म होता है और भारत के पहले प्रधानमंत्री रह चुके हैं।
16 साल के लिए इनका कार्यकाल रहा था। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गुटनिरपेक्ष आंदोलन और पंचशील
के संस्थापक के रूप में इन्हें जाना जाता है। भारतीय विदेश नीति के फादर के रूप में इन्हें जाना जाता है और सबसे बड़ी बात यह
है कि 1919 में यह कांग्रेस के साथ जुड़े। 1928 में इंडिपेंडेंस ऑफ इंडिया लीग की स्थापना होती है। जिसकी स्थापना में
नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और एस श्रीनिवासन लायंगर की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। विचारणीय बात यह भी है कि पंडित नेहरू की
अध्यक्षता में 19 दिसंबर 1929 को कांग्रेस ने लाहौर सेशन में एक हिस्टोरिकल प्रस्ताव पारित किया जिसको पूर्ण स्वराज के नाम से
जाना जाता है। तो इसकी खास बात यह है कि पंडित नेहरू ने 31 दिसंबर 1929 से और जो 1 जनवरी 1930 है वहां पर मध्य रात्रि पर जो
इंडिया का इंडिपेंडेंस है उसका झंडा लहराया। स्वतंत्रता की घोषणा की। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि 13 दिसंबर 1946
को पंडित नेहरू ने ऑब्जेक्टिव रेसोल्यूशन पारित किया और यह बाद में इंडिया की जो प्रियमबल है उसका एक अभिन्न अंग माना जा
सकता है या फिर सोर्स माना जा सकता है। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि 15 अगस्त 1947 को पंडित नेहरू ने एक ऐतिहासिक
चर्चित भाषण दिया जिसका टाइटल था ट्विस्ट विद डेस्टिनी अर्थात नियति के साथ भेंट। वहीं महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इनको
1955 को भारत रत्न से सम्मानित किया गया जो कि देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान होता है। और लास्ट इंपॉर्टेंट बात यह भी
है कि पंडित नेहरू ने आईएसी की 1929 के लाहौर सेशन, 1936 के लाहौर और 1937 के फैजाबाद सेशन में अध्यक्षता की। पंडित
नेहरू एक बहुत बड़े लेखक भी रहे हैं। तो स्क्रीन पर जितनी भी आपको इनकी राइटिंग्स दिखाई दे रही हैं, आप इनको अच्छे से नोट
कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है क्योंकि अक्सर यह कृतियां एग्जाम में पूछी जाती है। अब हम पंडित
नेहरू के पॉलिटिकल थॉट्स को भी डिस्कस कर लेते हैं। तो इनका पहला थॉट था फोकस ऑन ह्यूमनिज्म। इन्होंने मानवतावाद के ऊपर
अपना ध्यान दिया। दूसरा इनका थॉट था साइंस एंड टेक्नोलॉजी के ऊपर फोकस। इन्होंने विज्ञान और तकनीक की आवश्यकता पर जोर
दिया। अगला थॉट था कि यह सेकुलर पर बहुत विश्वास रखते थे। भारत को एक सेकुलर देश बनाना चाहते थे। इसीलिए इन्होंने
सेकुलरिज्म अर्थात धर्मनिरपेक्षतावाद पर जोर दिया। अगला इनका थॉट था डेमोक्रेटिक सोशलिज्म अर्थात प्रजातांत्रिक समाजवाद पर
इन्होंने बल दिया। वहीं अगला थॉट इनका था इंटरनेशनलिज्म। अर्थात अंतरराष्ट्रीयवादी भी पंडित नेहरू थे। और अगला इनका थॉट यह
था कि इन्होंने पॉजिटिव नेशनलिज्म की वकालत की और नेक्स्ट थॉट इनका था मॉडर्निज्म क्योंकि यह बहुत बड़े
आधुनिकतावादी थे। भारत को एक आधुनिक देश बनाना चाहते थे और लास्ट थॉट इनका था कि इन्होंने पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी की
वकालत की थी। अगले थिंकर का नाम आता है राम मनोहर लोहिया। तो राम मनोहर लोहिया भी इंडियन
एक्टिविस्ट रहे हैं। इंडियन इंडिपेंडेंस जो मूवमेंट हुआ उसमें इनकी भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह सोशलिस्ट
पॉलिटिकल लीडर रहे हैं। तो इनका जन्म होता है उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में और जो सोशलिस्टिक पॉलिटिक्स रही है इंडिया में
उसके यह प्रोमिनेंट फिगर रहे हैं। और खास बात यह भी है कि 1932 में इन्होंने पीएचडी डिग्री की बर्लिन यूनिवर्सिटी से और जो
सब्जेक्ट था इसका टाइटल था साल्ट एंड टैक्सेशन। तो, यह पॉइंट इंपॉर्टेंट है याद रखें। और 1934 में लोहिया इनवॉल्व हो जाते
हैं कांग्रेस सोशलिस्टिक पार्टी में। और एडिटर बन जाते हैं वीकली जो कांग्रेस सोशलिस्ट था उसके। अगली महत्वपूर्ण बात यह
भी है कि 1936 में नेहरू के द्वारा इन्हें सिलेलेक्ट किया जाता है जो कांग्रेस पार्टी थी उसके विदेश विभाग के पहले सचिव
के रूप में। तो अगला पॉइंट यह आता है कि 1946 में इन्होंने जो गोवा के लोग हैं उनकी स्वतंत्रता है, सिविल लिबर्टी है,
उसके लिए भी इन्होंने काफी स्ट्रगल किया। राम मनोहर लोहिया के बारे में खास बात यह भी है कि भारत में ब्रिटिश शासन के अंतिम
चरण के दौरान इन्होंने कांग्रेस रेडियो के साथ काम किया जिसका प्रसारण 1942 तक बॉम्बे के विभिन्न स्थानों से गुप्त
रूप में होता था और इसका नाम था आजाद हिंद रेडियो। 1948 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी सेपरेट हो जाती है कांग्रेस से और
यह बन जाती है सोशलिस्ट पार्टी। हालांकि 1952 में अगेन सोशलिस्ट पार्टी जो है वह प्रजा सोशलिस्टिक पार्टी बन जाती है। अगली
महत्वपूर्ण बात यह है कि 1955 में कांग्रेस का आबादी सेशन होता है और वहां पर जो प्रजा सोशलिस्टिक पार्टी है
इसकी स्प्लिट हो जाती है। यानी कि इसका बंटवारा हो जाता है और 1955 में लोहिया ने प्रजा सोशलिस्टिक पार्टी को छोड़ दिया था
और इन्होंने भारतीय सोशलिस्टिक पार्टी की स्थापना की। हालांकि 1964 में इन्होंने अगेन यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना
की थी। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि 1967 में इन्होंने जो जनरल इलेक्शन था वहां पर इन्होंने नॉन कांग्रेसिज्म का नारा दिया
अर्थात गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया और सबसे बड़े नेता थे और इस तरह से इन्होंने कांग्रेस की आलोचना की और इंदिरा गांधी को
इन्होंने गूंगी गुड़िया कहा। दूसरी तरफ़ यह भी विचारणीय बात है कि 1967 के जनरल इलेक्शन में पहली बार राम मनोहर लोहिया के
सहयोग से यूपी में नॉन कांग्रेस गवर्नमेंट को स्थापित किया गया था और इसको सहयोग दिया था धनसंघ के लीडर नानाजी देशमुख के
द्वारा। लोहिया के कुछ प्रोग्राम्स और मूवमेंट भी रहे हैं जिनको आपको याद रखना है। तो इसमें पहला आता है जाति तोड़ो
आंदोलन। अगला आता है दाम बांधो आंदोलन। अगला आता है हिंदी आंदोलन। नेक्स्ट आता है अंग्रेजी हटाओ। अगला आता है हिमालय बचाओ।
अगला आता है भूमि सेना। अगला आता है 1 घंटा देश को दो और लास्ट आता है अन्न वाटो आंदोलन। तो जितने भी यह कार्यक्रम
मूवमेंट्स या फिर प्रोग्राम रहे हैं आप इनको अच्छे से नोट कर लें। आपके एग्जाम के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। अगर हम बात करें
लोहिया के लिटरेचर की तो इनका लिटरेचर भी बहुत व्यापक रहा है। इनमें पहली कृति आती है फ्रेगमेंट्स ऑफ वर्ल्ड माइंड। अगली आती
है एस्पेक्ट्स ऑफ सोशलिस्ट पार्टी। अगली आती है व्हील ऑफ हिस्ट्री। नेक्स्ट आती है विल टू पावर। फिर आती है मार्क्स गांधी
एंड सोशलिज्म। अगली आती है इंडिया चाइना एंड नॉर्दन फ्रंटियर्स। नेक्स्ट आती है द कास्ट सिस्टम। अगली आती है द मिस्ट्री ऑफ
स्टेफोर्ड क्रिप्स। और अगली आती है इंटरवल ड्यूरिंग पॉलिटिक्स। इसके अलावा अगली इनकी आती है गिल्टी मैन ऑफ इंडियास पार्टीशन।
और अगली आती है फॉरेन पॉलिसी। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने कुछ मैगजीनंस और न्यूज़ पेपर को भी पब्लिश किया था।
जिनमें पहला नाम आता है मैनकाइंड जो कि इंग्लिश में छपा था। अगला आता है जन जो कि हिंदी में छपा था। अब हम राम मनोहर लोहिया
के पॉलिटिकल थॉट्स को डिस्कस कर लेते हैं। तो इनका पहला थॉट आता है थ्योरी ऑफ इक्विडिस्टेंस जिसको आप हिंदी में कहते
हैं समान दूरी का सिद्धांत। तो इसकी सबसे प्रमुख बात यह है कि 1953 को जो अशोक मेहता है उन्होंने एक थ्योरी दी थी।
उन्होंने कहा था कि पॉलिटिकल कंपलशंस ऑफ डकबर्ड इकोनमी और कोऑपरेशन विद द कांग्रेस। इसका मतलब यह था कि उन्होंने
आग्रह किया कि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है कि कांग्रेस को हम कोपरेट करें क्योंकि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। लेकिन
लोहिया ने इस कांसेप्ट को रिजेक्ट किया और इन्होंने कहा कि हमें कांग्रेस और जो कम्युनिस्ट्स है उनसे समान दूरी बनाए रखना
है जिसको कि थ्योरी ऑफ़ इक्विडिस्टेंस कहा गया। इनका दूसरा कांसेप्ट आता है फोर पिलर थ्योरी जो कि बहुत इंपॉर्टेंट है। इनकी
बड़ी देन है पॉलिटिक्स में या आप कह सकते हैं कि जो इंडियन पॉलिटिकल थॉट है उसमें एक बहुत बड़ी देन है। तो इसमें पहला पॉइंट
आता है विलेज। दूसरा आता है मंडल डिस्ट्रिक्ट जिसको आप जिला कहते हैं। अगला आता है प्रोविंस प्रांत और लास्ट आता है
सेंटर। लेकिन लोहिया कहते हैं कि जैसे ही ये चार जो इंपॉर्टेंट चीजें अचीव हो जाती है तो फिर उसके ऊपर पांचवी चीज आती है
जिसको आप कहते हैं वर्ल्ड गवर्नमेंट या फिर वैश्विक सरकार जिसकी वकालत इन्होंने बड़ी मात्रा में की है। लोहिया का तीसरा
कांसेप्ट आता है सप्त क्रांति। तो सप्त क्रांति में पहली आती है आर्थिक अन्याय के विरुद्ध क्रांति। अगली आती है जाति
व्यवस्था के विरुद्ध क्रांति। अगली इसमें आती है लैंगिक असमानता के विरुद्ध क्रांति। अगली आती है साम्राज्यवाद के
विरुद्ध क्रांति और अगली आती है नागरिक स्वतंत्रता के लिए क्रांति और अगली आती है सत्याग्रह के पक्ष में हथियारों का त्याग
कर अहिंसा के मार्ग का अनुसरण करने के लिए क्रांति और लास्ट यानी कि सातवीं आती है कलर डिस्क्रिमिनेशन होता है उसके अगेंस्ट
रेवोल्यूशन। राम मनोहर लोहिया का अगला कांसेप्ट आता है थ्योरी ऑफ़ न्यू सोशलिज्म जिसको जाना जाता है एशियाटिक मॉडल ऑफ़
सोसाइटी। यानी कि एशिया के संदर्भ में इन्होंने सोशलिज्म का विचार दिया। इसमें इन्होंने मार्क्स का जो सोशलिज्म है
कम्युनिज्म है उसको क्रिटिसाइज किया। तो इसकी खास बात यह है कि इन्होंने अपनी प्रमुख कृति मार्क्स गांधी एंड सोशलिज्म
में इसका वर्णन किया। तो इसकी खास बात यह है कि इसमें चार इंपॉर्टेंट बातें इन्होंने बताई। इक्वलिटी, डेमोक्रेसी, नॉन
वायलेंस और डिसेंट्रलाइजेशन। और इनका अगला कांसेप्ट आता है थ्योरी ऑफ बिल। यानी कि इन्होंने इतिहास का चक्रीय
सिद्धांत दिया। इस सिद्धांत को इन्होंने अपनी प्रमुख कृति व्हील ऑफ हिस्ट्री जो कि 1955 को पब्लिश होती है। इसमें दिया। तो
इसमें इन्होंने यह बोला कि जो हमारा इतिहास है वो चक्र के रूप में चार युगों में घूमता है। उदाहरण के लिए पहले आता है
सतयुग, दूसरा आता है त्रेता युग, तीसरा आता है द्वापर युग और चौथा लास्ट आता है कलयुग। और फिर कलयुग के बाद सतयुग आएगा,
फिर त्रेता आएगा, फिर द्वापर आएगा, फिर कलयुग आएगा। तो इस तरह से यह जो प्रोसेस है, वह चलता रहेगा और इतिहास चक्र के रूप
में घूमता रहेगा। ऐसी मान्यता राम मनोहर लोहिया की रही है। अगले थिंकर का नाम आता है जयप्रकाश
नारायण। तो जयप्रकाश नारायण इंडियन पॉलिटिशियन, थरिस्ट और इंडिपेंडेंस एक्टिविस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है
कि इनको जाना जाता है जेपी या फिर लोकनायक जिसका मतलब होता है पीपल्स लीडर। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि 1929 को इन्होंने
इंडियन नेशनल कांग्रेस को जॉइ किया था और 1934 में इन्होंने कांग्रेस सोशलिस्टिक पार्टी को स्थापना करने में महत्वपूर्ण
भूमिका अदा की थी और 1947 से 1953 के बीच यह ऑल इंडिया रेलवेेज मेन फेडरेशन के प्रेसिडेंट रहे। अगली इंपॉर्टेंट बात यह
है कि 1948 में इन्होंने कई कांग्रेसी सोशलिस्ट के साथ कांग्रेस को छोड़ दिया था और 1952 में इन्होंने प्रजा सोशलिस्टिक
पार्टी की स्थापना की थी। 1954 में जयप्रकाश नारायण ने एक इंपॉर्टेंट अनाउंसमेंट की कि विनोबा भावे द्वारा 1951
को शुरू किए गए भूदान मूवमेंट को आगे बढ़ाएंगे और राजनीति से सन्यास लेंगे। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने
1959 में इंडियन पॉलिटिक के रिकंस्ट्रक्शन को करने की कोशिश की। जिसके अंतर्गत इन्होंने यह बोला कि अगर वास्तव में
डेमोक्रेटिक सोशलिज्म को अचीव करना है भारत में तो डीसेंट्रलाइजेशन के ऊपर फोकस करना पड़ेगा। जिसमें सबसे पहले गांव आएगा
फिर जिला फिर राज्य उसके बाद संघ परिषद और अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि 1974 को गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन शुरू होता है
और उसी की तर्ज में 1974 में बिहार मूवमेंट बिहार में शुरू होता है जिसको कि जेपी के द्वारा लीड किया गया और यह इतना
व्यापक हो गया कि इसको टोटल रेवोल्यूशन के नाम से जाना गया। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि 25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण ने
एक इंपॉर्टेंट रैली का आगाज किया। इंदिरा गांधी की जो पॉलिसीज थी उनके खिलाफ। तो ये बिहार का जो रामलीला ग्राम था वहां पर यह
शुरू किया गया था और रामधारी दिनकर उनकी जो कविताएं हैं उनकी पंक्तियों को वहां पर पढ़ा गया था। उदाहरण के लिए जैसे सिंहासन
खाली करो कि जनता आती है। जयप्रकाश नारायण के जीवन के कुछ पड़ाव रहे हैं जो कि एग्जाम के दृष्टि से डिस्कस करना बहुत
इंपॉर्टेंट है। तो पहला पड़ाव आता है इनका मार्क्सिस्ट 1930। दूसरा इनका पड़ाव आता है डेमोक्रेटिक सोशलिज्म 1940 और लास्ट
पड़ाव इनका आता है सर्वोदया जो कि 1950 के दशक में इन्होंने अडॉप किया था। 25 जून 1975 को भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती
इंदिरा गांधी के द्वारा मध्य रात्रि को आपातकाल की घोषणा की जाती है और इस आपातकाल में जयप्रकाश नारायण को भी जेल
में डाला जाता है। 1977 में जनता पार्टी की स्थापना की जाती है जिसमें कि एक इंपॉर्टेंट गाइडेंस जेपी नारायण ने भी दी
थी और इसी जनता पार्टी ने 1977 के इलेक्शन में कांग्रेस पार्टी को हराया था। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि जयप्रकाश नारायण
की जो बायोग्राफी है वह लिखी हिंदी लिटरेचर के एक महान राइटर जिनका नाम था राम वृक्ष बेनीपुरी और अगली महत्वपूर्ण
बात यह भी है कि 1999 को मरणोपरांत इनको भारत रत्न से सम्मानित किया गया और इनकी समाज सेवा के लिए 1965 को इनको मैगसे
पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। अगर हम बात करें जेपी के साहित्य की तो इन्होंने बहुत सारी बुक्स भी लिखी है
जिनमें पहली आती है व्हाई सोशलिज्म अगली आती है माय पिक्चर ऑफ सोशलिज्म नेक्स्ट आती है स्वराज फॉर द पीपल अगली आती है
फ्रॉम सोशलिज्म टू सर्वोदया अगली आती है अप्ली फॉर रिकंस्ट्रक्शन ऑफ इंडियन पॉलिटी और अगली आती है बाय सोशलिज्म नेक्स्ट आती
है कम्युनिटेरियन सोसाइटी एंड पंचायती राज अगली आती है प्रजन डायरी और अगली आती है टुवर्ड्स टोटल रेवोल्यूशन इसके अलावा
अलावा एक और आती है सोशलिज्म, सर्वोदया एंड डेमोक्रेसी। अब हम जेपी नारायण के पॉलिटिकल थॉट्स को डिस्कस कर लेते हैं।
जिसमें पहला आईडिया आता है थ्योरी ऑफ़ सोशलिज्म। तो, इसकी खास बात यह है कि 1946 में इन्होंने अपने प्रमुख आर्टिकल माय
पिक्चर ऑफ सोशलिज्म में इस आईडिया को दिया था। जिसमें इन्होंने यह कहा था कि अगर हमें लोकतांत्रिक समाजवाद को बढ़ावा देना
है तो राज्य की जो भूमिका है उसको सीमित करना पड़ेगा, चक्स करना पड़ेगा। सबसे बड़ी बात यह भी है कि इसमें इन्होंने पार्टीलेस
डेमोक्रेसी की बात की थी। इसमें इन्होंने लोक स्वराज की बात की थी और खास बात यह है कि इसमें इन्होंने सर्वोदया की बात की थी।
इनका दूसरा कांसेप्ट आता है डिसेंट्रलाइजेशन का क्योंकि इन्होंने बोला कि डिसेंट्रलाइजेशन के बिना जिस लोक
स्वराज की बात हम करते हैं, जिस समाजवाद की हम बात करते हैं, वह अर्जित नहीं कर सकते हैं। तो, इस तरह से इन्होंने
डिसेंट्रलाइजेशन के लिए पांच इंपॉर्टेंट चीजों की बात की। जिसमें पहला आता है विलेज, दूसरा आता है ब्लॉक, तीसरा आता है
मंडल जिसको आप डिस्ट्रिक्ट कहते हैं। अगला आता है प्रोविंस और लास्ट आता है सेंटर। जयप्रकाश नारायण ने सात क्रांतियों की भी
बात की जिसमें पहली आती है सोशल, दूसरी आती है पॉलिटिकल, तीसरी आती है इकोनॉमिक, चौथी आती है कल्चरल, पांचवी आती है
आईडियोलॉजिकल, छठी आती है एजुकेशनल और सातवीं आती है मोरल जिसे आप स्पिरिचुअल रेवोल्यूशन भी कहते हैं।
अगले थिंकर का नाम आता है पंडित दीनदयाल उपाध्याय जिनको पंडित जी भी कहा जाता है और ये इंडियन पॉलिटिशियन रहे हैं। भारतीय
जनसंघ के बहुत बड़े नेता रहे हैं जिन्होंने इंटीग्रल ह्यूमनिज्म का कांसेप्ट दिया और सबसे बड़ी बात यह है कि
यह भारतीय जनता पार्टी के फोर रनर रहे हैं। और अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि इनका जन्म होता है मथुरा के चंद्रभान गांव
के नगला क्षेत्र में। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि 1967 में यह भारतीय जनसंघ के प्रेसिडेंट बन जाते हैं। और दूसरी बड़ी
बात यह है कि इन्होंने एकात्म मानवतावाद पर अपना शोध किया। रिसर्च की जिसे 1965 में जनसंघ और बाद में बीजेपी के द्वारा
इसको आधिकारिक सिद्धांत के रूप में अडॉप किया गया। अपनाया गया। अब हम बात कर लेते हैं दीनदयाल उपाध्याय के लिटरेचर की। तो
इसमें इनका पहला वर्ग आता है अखंड भारत क्यों? अगला आता है द टू प्लांस प्रॉमिससेस परफॉर्मेंस प्रोस्पेक्ट्स।
अगला आता है भारतीय अर्थनीति विकास की एक दिशा। अगला आता है एकात्म मानवतावाद। नेक्स्ट आता है जनसंघ सिद्धांत और नीति।
अगला आता है डीवैल्यूएशन ऑफ ग्रेट फॉल। और अगला आता है द टू प्लांस। और अगला आता है पॉलिटिकल थ्योरी। तो ये जितने भी इनके
वक्स रहे हैं आप अच्छे से याद कर लें। और इनकी कुछ पत्रिकाएं भी रही है जिनमें पहली आती है राष्ट्र धर्म, दूसरी आती है
पंचजन्य और तीसरी इसमें आती है स्वदेश। अब हम पंडित दीनदयाल उपाध्याय के पॉलिटिकल थॉट्स को समझ लेते हैं। तो इनका पहला थॉट
आता है इंटीग्रल ह्यूमनिज्म जो कि इनकी बहुत बड़ी देन है। तो इसमें खास बात यह है कि यह कहते हैं कि मानव जाति के पास शरीर,
मन, बुद्धि और आत्मा के चार गुण होते हैं। जिनकी तुलना अर्थ, काम, धर्म, मोक्ष से की जा सकती है। उदाहरण के लिए शरीर की तुलना
अर्थ से की जा सकती है। मन की तुलना काम से की जा सकती है। बुद्धि की तुलना धर्म से की जा सकती है और आत्मा की तुलना मोक्ष
से की जा सकती है। यह कहते हैं कि जो पूंजीवादी और समाजवादी विचारधाराएं हैं यह केवल शरीर और मन की जरूरतों पर ही सिमट
जाती है। विचार करती है। लेकिन धर्म जो है वह आधारभूत है और मोक्ष मानव जाति और समाज का अंतिम उद्देश्य है। इसका मतलब यह हुआ
कि जो ह्यूमैनिटी होती है इसके चार एलिमेंट होते हैं। बॉडी, माइंड, इंटेलेक्ट और सोल। और सबसे ऊपर आते हैं इंटेलेक्ट और
सोल। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि उपाध्याय का जो एकात्म मानवतावाद है, यह विचार कहीं ना कहीं स्वदेशी सामाजिक
आर्थिक मॉडल पर आधारित है जो कि राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ सामाजिक आर्थिक लोकतंत्र पर बल देता है। उपाध्याय का अगला
कांसेप्ट आता है चित्ती का। तो यह बेसिकली राष्ट्र की एक आत्मा होती है। यह कहते हैं कि जिस प्रकार व्यक्ति के पास एक आत्मा
होती है, उसी तरीके से नेशन में भी आत्मा निवास करती है। यह कहते हैं कि हर राष्ट्र और संस्कृति के पास अपनी स्थित होती है।
जिस तरह से व्यक्ति के अंदर सोल होती है, उसको जिंदा रखती है। उसी तरह से राष्ट्र में भी एक स्थिति होती है, आत्मा होती है,
चेतना होती है जो राष्ट्र को जिंदा रखती है। इस लेक्चर में हम अनेकों की थिंकर्स के
बारे में भी पढ़ेंगे जो कंपेरेटिव पॉलिटिक्स के साथ जुड़े हुए हैं। तो इनमें नाम आते हैं एरिस्टोटलल, निकोलो मैकबली,
मॉन्टस्क्यू, एलेक्स डी टॉकले, जेम्स ब्राइस, रॉबर्ट मिशल्स, मैक्स बेवर, हरमन फाइनर। फिर हम बात करेंगे हेराल्ड
डिलासबेल की, कितानो मोस्का, गिविल आलमंड, मॉरिस डवरजे। फिर हम बात करेंगे डेविड ईस्टन की सैमुअल पी हंटिंगटन और जियोविन
ने सारतरी और फिर हम बात करेंगे टीएच मार्शल कार्ल डब्ल्यू ड्यूस आर एन लुसफर्ड एसएम लिपसेट फिर हम बात करेंगे टैड रॉबर्ट
गुर फिर हम बात करेंगे रॉबर्ट डाहल थेडास कॉकपॉल बेनेडिक एंडरसन और लास्ट में हम बात करेंगे आर्नेनेस्ट गैलनर तो यह जितने
भी थिंकर्स आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं इस वीडियो में तो हम इनके बारे में नर्शल में या फिर हल्के-फुल्के तरीके से
बात करेंगे लेकिन आगे आने वाली 10 वीडियो में हम डिटेल में एक-एक चीज को अच्छे से इनसे जुड़ी हुई और इन्होंने जो नोशन दिए
हैं उसके बारे में डिटेल में पढ़ेंगे। तो इसमें सबसे पहले हम बात करते हैं एरिस्टोटल की। एरिस्टोटल ने एक इंपॉर्टेंट
राइटिंग लिखी जो आप जानते हैं द पॉलिटिक्स जिसको ग्रीक भाषा में कहते हैं ता पॉलिटिका। और इसमें इन्होंने कंपेरेटिव
स्टडी का जो मेथड है वह यूज़ किया। कंपेरेटिव मेथड यूज़ करते हुए 158 संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन किया। जो
कि ग्रीक सिटी स्टेट्स के कॉन्स्टिट्यूशनंस थे। उसके बाद इन्होंने जो है कंपैरेटिव स्टडी को यूज किया और इसी
वजह से इनको फादर ऑफ पॉलिटिकल साइंस, कंपेरेटिव पॉलिटिक्स और कंपेरेटिव मेथड के रूप में भी जाना जाता है। हालांकि
इन्होंने यह कहा कि डेमोक्रेसी सबसे खराब शासन होता है। मूर्खों का शासन होता है। और सबसे इंपॉर्टेंट बात जो आपको याद रखनी
है वो यह है कि इन्होंने एक इंपॉर्टेंट नोशन दिया जिसको कि साइकिल नोशन ऑफ गवर्नमेंट्स कहा जाता है। इसके अंतर्गत
इन्होंने कहा कि सरकारें जो है वो बदलती रहती है। यानी कि जो शासन होता है वो बदलता रहता है। मोनार्की से वो टिरनी बन
जाता है। टिरनी से वो फिर एरिस्टोक्रेसी बन जाता है। एरिस्टोक्रेसी से वो ओलिगार्की ओलिगार्की से फिर वो पॉलिटी
पॉलिटी से फिर वो डेमोक्रेसी बन जाता है। इस तरह से शासन का जो फॉर्म है वो बदलता रहता है। इसलिए एक साइकिल के रूप में है।
और वहीं एरिस्टोटल ने लास्ट में जब इन्होंने तुलनात्मक अध्ययन किया। 158 संविधानों का अध्ययन किया। उसके बाद
इन्होंने क्रांति और राज्य के बारे में आइडियल स्टेट के बारे में अपने विचार दिए और यह कहा कि अगर एक अच्छे और आइडियल
स्टेट की स्थापना करनी है तो हमें मिक्स्ड कॉन्स्टिट्यूशन को अपनाना होगा और इसी मिक्स्ड कॉन्स्टिट्यूशन को इन्होंने
गोल्डन मीन की संज्ञा दी जो कि पॉलिटी और एरिस्टोक्रेसी का एक मिश्रित रूप होगा। पॉलिटी में कुछ साधारण लोग होते हैं जो
सिंपल लोग होते हैं। आम जनता होती है। एरिस्टोक्रेसी में ऐसे लोग आते हैं जो उच्च घराने के लोग होते हैं। कुलीन वर्ग
के लोग होते हैं। जिनके पास अच्छी शिक्षा होती है। बुद्धि होती है। विवेक होता है। तो ऐसी स्थिति में इन्होंने कहा कि जब इन
दोनों अर्थात पॉलिटी और एरिस्टोक्रेसी के लोग आपस में मिलते हैं तो एक मिक्स्ड कॉन्स्टिट्यूशन बन जाता है जो बहुत ही
अच्छा होता है। अब हम समझ लेते हैं एरिस्टोटल का जो फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट है। तो इसमें सबसे पहले
एरिस्टोटल बात करते हैं मोनार्की की और यह कहते हैं कि मोनार्की गुड फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट होता है क्योंकि इसमें राजा
लोगों के कल्याण के लिए काम करता है लेकिन एरिस्टोटल कहते हैं कि मोनार्की लंबे समय तक जीवित नहीं रह पाती है क्योंकि राजा
तानाशाह बन जाता है और इस तरह से एक जो टिरनी होती है वह स्थापित हो जाती है और यह वर्स्ट फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट है क्योंकि
राजा इसमें लोगों पर अत्याचार करता है और अपने लिए या फिर अपने जो करीबी लोग हैं उनके हितों के लिए ही काम करता है। लेकिन
एरिस्टोटल फिर कहते हैं कि जो टिरनी है वह भी लंबे समय तक नहीं रहता है और फिर लोग क्रांति लाकर फिर एरिस्टोक्रेसी की
स्थापना कर देते हैं। एरिस्टोक्रेसी में क्योंकि कुछ बुद्धिमान लोग होते हैं, पढ़े लिखे लोग होते हैं, ऐसे लोग होते हैं
जिनके पास संपत्ति होती है। तो इस तरह से यह एक अच्छा शासन होता है क्योंकि ऐसे लोगों के द्वारा ही यह शासन चलाया जाता
है। लेकिन एरिस्टोटल कहते हैं कि यह शासन का रूप भी ज्यादा लंबे समय तक नहीं टिक सकता है। क्योंकि एरिस्टोक्रेसी में भी
लोग जिनके पास शासन होता है वह स्वार्थी बन जाते हैं और अपने स्वार्थ के लिए ही काम करते हैं और फिर अल्पतंत्र का शासन
स्थापित हो जाता है यानी कि ओलिगार्की का शासन स्थापित हो जाता है जिसे एरिस्टोटल ने वर्स्ट फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट कहा। लेकिन
एरिस्टोटल कहते हैं कि ये भी लंबे समय तक नहीं रह पाता है और उसके बाद फिर पॉलिटी की स्थापना होती है जो कि गुड फॉर्म ऑफ
गवर्नमेंट है क्योंकि पॉलिटी में कुछ ऐसे लोग होते हैं आम लोग होते हैं लेकिन पढ़े लिखे लोग होते हैं जिनके द्वारा लोगों के
लिए लोगों के कल्याण के लिए समाज के कल्याण के लिए शासन चलाया जाता है। लेकिन एरिस्टोटल कहते हैं कि इसमें भी लोग जब
अपने फायदे के लिए काम करते हैं, अपने लालच में डूब जाते हैं तो फिर डेमोक्रेसी की स्थापना हो जाती है और डेमोक्रेसी को
इन्होंने पूरी तरह से नकारा। इन्होंने कहा कि डेमोक्रेसी मूर्खों का शासन होता है। और
इस प्रकार से लास्ट में एरिस्टोटल कहते हैं कि डेमोक्रेसी भी लंबे समय तक जीवित नहीं रह पाती है और यह जल्दी ही मोनार्की
में बदल जाती है। तो इस तरह से अगर हम एरिस्टोटल के फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट को देखें तो इन्होंने बोला कि एक चक्रीय है। यह
बदलता रहता है। यह उस तरह से हैं जिस तरह से साइकिल का पहिया घूमता रहता है। कंपैरेटिव पॉलिटिक्स के फर्स्ट फेज में
दूसरा नाम आता है निकोलो मैक्यावली का। निकोलो मैक्यावली इटालियन रियलिस्टिक थिंकर रहे हैं। जिनको जाना जाता है फर्स्ट
मॉडर्न थिंकर और इन्होंने दो इंपॉर्टेंट वर्क्स लिखे। पहला है द प्रिंस 1513 में लिखना शुरू किया और 1532 में यह पब्लिश
होता है। दूसरा वर्क है द डिस्कोर्सेस ओनली भी जो 1531 में पब्लिश होता है। वहीं निकोलो मैक्यावली ने पॉलिटिक्स से एथिक्स
को दूर किया, अलग किया और इन्होंने कहा कि पॉलिटिक्स हैव नो रिलेशंस विद मोरल्स। इन्होंने कहा कि राजनीति का नैतिकता के
साथ किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं है। और इन्होंने मोनार्की और रिपब्लिक जो शासन के दोनों ही रूप है इनके बीच कंपैरेटिव
स्टडी की। तो अब हम समझ लेते हैं मैक्यावली का जो फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट है अच्छे से इसको समझ लेते हैं। तो मैक्यावली
कहते हैं कि दो प्रकार की सरकारें पाई जाती है। पहली है मोनार्की दूसरी है रिपब्लिक। जब हम बात करते हैं मोनार्की की
तो यह प्रैक्टिकल फॉर्म है यानी कि एक व्यवहारिक फॉर्म है और रिपब्लिक की जब हम बात करते हैं तो मैक्यावली कहते हैं कि यह
आइडियल फॉर्म है यानी कि आदर्श फॉर्म है। और मैक्यावली कहते हैं कि मोनार्की क्योंकि यह प्रैक्टिकल फॉर्म है। इसीलिए
ऐसे लोगों के लिए उपयुक्त है जहां या फिर जिस देश के लोग करप्टेड होते हैं, देश प्रेमी नहीं होते हैं, अत्याचारी होते
हैं, पापी होते हैं, स्वार्थी होते हैं। क्योंकि ऐसी स्थिति में राजा अपने हाथों में शक्तियां अर्जित करता है और इन लोगों
को अपने नियंत्रण में करता है। इनके ऊपर अपनी शक्ति बनाए रखता है। वहीं दूसरी तरफ आइडियल फॉर्म में मैक्यावली कहते हैं कि
यह ऐसा फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट है जो वहां पर लागू होता है जहां कई लोगों का जीवन अच्छा हो, सदचरित हो, जिनके अंदर नैतिकता हो,
देश प्रेम की भावना हो। तो इस प्रकार से मैक्यावली ने फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट दिया है। कंपैरेटिव पॉलिटिक्स का सेकंड फेज रहता है
18th और 19 सेंचुरी में और इसमें सबसे प्रमुख नाम आता है चार्ल्स डी मॉनटेस्क्यू का। मॉन्टेस्क्यू फ्रेंच फिलॉसफर रहे हैं
जिन्होंने की नोशन दिया सेपरेशन ऑफ़ पावर्स। और ये सेपरेशन ऑफ़ पावर्स का जो कांसेप्ट है इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति
द स्पिरिट ऑफ लॉज़ जो कि 1748 में पब्लिश होती है, वहां पर दिया। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि यूएसए में भी
सेपरेशन ऑफ पावर्स पाया जाता है जो कि मॉनटेस्क्यू के विचारों पर ही आधारित है। यानी कि मॉनटेस्क्यू ने जो सेपरेशन ऑफ
पावर दिया उसी के आधार पर अमेरिका में सेपरेशन ऑफ़ पावर्स की स्थापना की गई है। मॉन्टस्क्यू ने भी कंपैरेटिव पॉलिटिक्स के
विकास में योगदान दिया और इन्होंने द स्पिरिट ऑफ लॉज़ में कंपेरेटिव स्टडी करते हुए कहा कि रिपब्लिक, मोनार्की और
डेस्पोटिज्म तीन प्रकार के फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट पाए जाते हैं। तो अब हम समझ लेते हैं कि मॉनटेस्क्यू का फॉर्म ऑफ
गवर्नमेंट क्या है? तो मॉनटेस्क्यू दो प्रकार के शासन की बात करते हैं। सबसे पहले एक है सुपीरियर दूसरा है इंफीरियर।
सुपीरियर में यह कहते हैं कि इसमें रिपब्लिक और मोनार्की आते हैं और इंफीरियर में कहते हैं कि डस्पोटिज्म आता है। आगे
यह लिखते हैं कि डस्पोटिज्म फियर और कोरजन पर आधारित होता है। यानी कि भय और बल पर आधारित होता है। लोगों पर इसमें अत्याचार
किए जाते हैं। वहीं यह कहते हैं कि रिपब्लिक होता है वर्चू यानी कि सद्गुण पर आधारित होता है। जहां पर लोगों को भी पूरे
के पूरे चांस होते हैं विकास करने का, जस्टिस पाने का और यह कहते हैं कि मोनार्की होता है ऑनर पर आधारित क्योंकि
इसमें राजा शासन करता है। आगे यह कहते हैं कि रिपब्लिक दो भागों में विभाजित होता है। पहला है डेमोक्रेसी दूसरा है
एरिस्टोक्रेसी। यह कहते हैं कि डेमोक्रेसी वहां पाया जाता है जहां लव हो, इक्वलिटी हो, कॉमन गुड हो। यानी कि आप यह कह सकते
हो कि डेमोक्रेसी में यह बताते हैं कि डेमोक्रेसी की विशेषताएं होती है लव, इक्वलिटी और कॉमन गुड। वहीं यह कहते हैं
कि एरिस्टोक्रेसी होता है मॉडरेशन के बेस पे बैलेंस्ड एप्रोच पे। यानी कि आप यह समझ सकते हो कि एरिस्टोक्रेसी में ना तो
ज्यादा ही लोगों को स्वतंत्रताएं दी जाती है, न्याय दिया जाता है और ना ही लोगों पर पूरी तरह से अत्याचार किया जाता है या
लोगों का दमन किया जाता है। यह बिल्कुल बीच का रास्ता होता है। वहीं 19 सेंचुरी में जेएस मिल फ्रीमैन और टॉकले जैसे
विचारकों ने भी कंपैरेटिव पॉलिटिक्स के डेवलपमेंट में बहुत बड़ा योगदान दिया। टॉकले ने 1835 में एक इंपॉर्टेंट राइटिंग
लिखी जिसका नाम है डेमोक्रेसी इन अमेरिका और इसमें इन्होंने कंपैरेटिव पॉलिटिक्स के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया और इसमें
इन्होंने अमेरिकन डेमोक्रेसी का अध्ययन किया और इस अध्ययन को इन्होंने यूरोपियन डेमोक्रेसी के साथ तुलना की यानी कि इसको
कंपेयर किया। वहीं बेंथम, मार्क्स, कॉमटे, हेनरी मैन जैसे विचारकों ने भी कंपैरेटिव पॉलिटिक्स के डेवलपमेंट में बहुत बड़ी
भूमिका अभिनीत की। कंपैरेटिव पॉलिटिक्स का थर्ड फेज 20th सेंचुरी से प्रेजेंट तक चला हुआ है और यह एक ऐसा फेज है जो मॉडर्न है
कंप्रहेंसिव है और जिसने कंपेरेटिव पॉलिटिक्स के डेवलपमेंट में बहुत बड़ी भूमिका निभाई और इसमें अनेकों थिंकर्स आते
हैं जैसे जेम्स ब्राइस रॉबर्ट मिशल्स मैक्स बेबर फाइनर लासबेल आलमंड रॉबर्ट डाहल लिन ब्लम मॉरिस डबजे डेविड ईस्टन
हंटिंगटन लर्नर मार्शल बरबा पावेल कार्ल ड्यूस लिसफर्ट, लिपसेट, कार्डसो, टैड, रॉबर्ट गुर, जियोबेनी सार्थोरी, बेनेडिक्ट
एंडरसन, आर्नेस्ट गैलनर, रॉबर्ट पुटनम जैसे विचारक इसमें आते हैं। तो सबसे पहले अब हम बात कर लेते हैं जेम्स ब्राइस की।
जेम्स ब्राइस मॉडर्न डेमोक्रेसी नामक किताब लिखते हैं जो 1921 में पब्लिश होती है और इसको माना जाता है पहला ऐसा वर्क या
फिर कंपैटिव स्टडी डेमोक्रेटाइजेशन और डेमोक्रेसी के ऊपर। दूसरा नाम आता है रॉबर्ट मिशेल्सकी जो लिखते हैं पॉलिटिकल
पार्टीज और सोशियोलॉजिकल स्टडी ऑफ द ओलगार्किकल टेंडेंसीज ऑफ मॉडर्न डेमोक्रेसी और यह पब्लिश होती है 1915 में
और इन्होंने इसमें बात की सोशल ऑर्गेनाइजेशन की जिसमें यह कहते हैं कि सोशल ऑर्गेनाइजेशन डोमिनेट होते हैं
लीडर्स के द्वारा जिसको इन्होंने आयरन लॉ ऑफ़ ओलिगार्की की संज्ञा दी। अगला नाम आता है एम ऑस्ट्रोगोरस्काई और इन्होंने
इंपॉर्टेंट राइटिंग लिखी डेमोक्रेसी एंड द ऑर्गेनाइजेशन ऑफ पॉलिटिकल पार्टीज। यह 1902 में पब्लिश होती है और इन्होंने
कंपैरेटिव स्टडी की डेमोक्रेटिक सफरस की। खासतौर पे इन्होंने ब्रिटेन और यूएस का जो पार्टी सिस्टम है उसकी कंपैरेटिव स्टडी
की। अगला नाम आता है मैक्स बेबर का। इनकी प्रमुख राइटिंग है इकोनमी एंड सोसाइटी जो 1921 में पब्लिश होती है और इसमें
इन्होंने पॉलिटिकल जो फॉर्म्स होते हैं उसकी क्लासिफिकेशन की जिसको इन्होंने कहा सिस्टम्स ऑफ रूल और रूलरशिप और इन्होंने
तीन प्रकार की अथॉरिटी की बात की कैरिज्मैटिक लीगल एंड ट्रेडिशनल अथॉरिटी। वहीं अगला नाम आता है हरमन फाइनर का
जिन्होंने लिखी द थ्योरी एंड प्रैक्टिस ऑफ मॉडर्न गवर्नमेंट और यह 1932 में पब्लिश होती है। इन्होंने बात की गवर्नमेंटल
इंस्टीटशंस और प्रोसेससेस की और अगला नाम आता है हेराल्ड डिलासबेल का जिन्होंने लिखी पॉलिटिक्स हु गेट्स व्हाट व्हेन एंड
हाउ और यह राइटिंग बहुत ही इंपॉर्टेंट है। एग्जाम में कई बार इसे पूछा भी गया है। यह 1936 में पब्लिश होती है। और इस कृति में
इन्होंने आइडिया दिया पावर का और इन्होंने बोला कि जो पावर होती है उसका मैन्युपुलेशन होता है रूलिंग क्लास के
द्वारा। और इन्होंने इसमें काउंटर इलीट्स की भी बात की। अगला नाम आता है गीतानो मोस्का का। यह
लिखते हैं द रूलिंग क्लास जो कि 1939 में पब्लिश होती है और इसे इलीट थ्योरी पर लिखा गया सबसे अहम वर्क माना जाता है।
वहीं अगला नाम आता है कार्ल पोलाइनी और यह लिखते हैं द ग्रेट ट्रांसफॉर्मेशन 1944 में और इन्होंने बात की इसमें डेवलपमेंट
और मार्केट सोसाइटी की। वहीं अगला नाम आता है गब्रियल आलमंड का और गब्रियल आलमंड को तो आप सभी जानते हैं। इन्होंने लिखा
कंपैरेटिव पॉलिटिकल सिस्टम 1956 में पब्लिश होता है जिसमें इन्होंने बात की फोरफोल्ड क्लासिफिकेशन ऑफ पॉलिटिकल सिस्टम
की जिसमें यह बात करते हैं पहली द एंग्लो अमेरिकन। दूसरी यह बात करते हैं द कॉन्टिनेंटल यूरोपियन। तीसरी यह बात करते
हैं प्री इंडस्ट्रियल सोसाइटीज़ की और चौथी यह बात करते हैं द टोटलिटेरियन पॉलिटिकल सिस्टम। वहीं दूसरी राइटिंग में जो कि है
द पॉलिटिक्स ऑफ डेवलपिंग एरिया जो 1960 में पब्लिश होती है। इन्होंने स्ट्रक्चरल फंक्शनल एप्रोच को यूज़ किया कंपैरेटिव
पॉलिटिक्स में और इन्होंने इसमें थर्ड वर्ल्ड यानी कि तीसरी दुनिया के जो देश हैं उनकी कंपैरेटिव स्टडी की। वहीं अगला
नाम आता है लास्टबेल का। इन्होंने एक इंपॉर्टेंट राइटिंग लिखी जिसे एग्जाम में कई बार पूछा गया है पॉलिटिक्स हु गेट्स
व्हाट व्हेन एंड हाउ। यह 1936 में पब्लिश होती है और इसमें इन्होंने पावर का आईडिया दिया जिसमें इन्होंने कहा कि जो पावर का
आईडिया है उसे मैनपुलेट किया जाता है रूलिंग इलिट के द्वारा और जो काउंटर इलीट होता है। वहीं अगला नाम आता है एफएच
कॉर्डोसो का और कॉर्डोसो की अगर हम बात करें तो यह लिखते हैं डिपेंडेंसी एंड डेवलपमेंट इन लैटिन अमेरिका। यह दो
वॉल्यूम में पब्लिश होती है 1971 और 1979 में और इन्होंने इसमें लैटिन अमेरिका में डिपेंडेंसी थ्योरी की बात की और अगला नाम
आता है टैड रॉबर्ट गुर यह लिखते हैं व्हाई मैन रिबेल जो कि 1970 में पब्लिश होती है और इसमें यह बात करते हैं कि लोग क्यों
प्रोटेस्ट करते हैं? क्यों राज्य के अगेंस्ट रिबेलियन करते हैं? विद्रोह करते हैं। और अगले थिंकर का नाम आता है
लिसफोर्ड। और यह लिखते हैं डेमोक्रेसी इन प्लूरल सोसाइटीज़ अह कंपेरेटिव एक्सप्लोरेशन जो कि 1977 में पब्लिश होती
है। और इसमें यह बात करते हैं डेमोक्रेसी इन डिफरेंट सोसाइटीज़। अर्थात जो डिफरेंट-डिफरेंट सोसाइटीज़ होती है वहां पे
डेमोक्रेसी की क्या-क्या भूमिका है? किस तरह से अलग-अलग डेमोक्रेसी डिफरेंट-डिफरेंट सोसाइटीज़ में पाई जाती
है। अगले थिंकर का नाम है थडास्कॉकपॉल। और यह लिखते हैं स्टेट एंड सोशल रेवोलशंस अ कंपेरेटिव एनालिसिस ऑफ फ्रांस, रशिया एंड
चाइना जो कि 1979 में पब्लिश होती है और इसमें इन्होंने राज्यों के बीच कंपैरेटिव स्टडी की है यानी कि विभिन्न राज्यों का
इन्होंने तुलनात्मक अध्ययन किया है। अगला नाम आता है जियोबेनिस सारतोरीिका। यह लिखते हैं पार्टीज एंड पार्टी सिस्टम जो
कि 1976 में पब्लिश होती है और ऐसा माना जाता है कि यह कॉम्प्रहेंसिव एप्रोच है क्लासिफिकेशन ऑफ पार्टी सिस्टम का। वैसे
भी पार्टी सिस्टम और पॉलिटिकल जो पार्टीज होती है उनके ऊपर इनकी बहुत गहरी रिसर्च रही है। और अगला नाम आता है थडास कॉकपॉल
का। यह लिखते हैं स्टेट एंड सोशल रेवोलशंस अ कंपैरेटिव एनालिसिस ऑफ फ्रांस, रशिया एंड चाइना जो कि 1979 में पब्लिश होती है
और इसमें इन्होंने फ्रांस, रशिया और चाइना जैसे राज्यों का तुलनात्मक अध्ययन किया है। वहीं अगले विचारक का नाम आता है
बेनेडिक्ट एंडरसन जिन्होंने एक इंपॉर्टेंट राइटिंग लिखी इमेज एंड कम्युनिटीज़ रिफ्लेक्शंस ऑन द ओरिजिन एंड स्प्रेड ऑफ
नेशनलिज्म जो 1983 में पब्लिश होती है और इसमें इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया इमेजेंड
कम्युनिटी। अगले विचारक का नाम आता है आर्नेस्ट गैलनर जिन्होंने लिखी नेशंस एंड नेशनलिज्म जो कि
1983 में पब्लिश होती है और इसमें इन्होंने आर्गुमेंट दिया जिसमें यह कहते हैं कि नेशनलिज्म इज अ प्रोडक्ट ऑफ
इंडस्ट्रियलाइजेशन यानी कि विश्व में जो राष्ट्रवाद उदित हुआ है वो इंडस्ट्रियलाइजेशन की वजह से ही उदित हुआ
है। यह कहते हैं अर्नेस्ट गैलनर। वहीं अगले विचारक का नाम है सैमुअल पी हंटिंगटन। पहले भी हमने इनको डिस्कस किया
है। यह दूसरी राइटिंग में लिखते हैं द थर्ड वेव ऑफ़ डेमोक्रेटाइजेशन इन द लेट 20थ सेंचुरी जो 1991 में पब्लिश होती है और
जिसमें यह बात करते हैं डेमोक्रेटिक ट्रांजिशन की। यानी कि जो मिलिट्री रिजीम है या फिर मोनार्की जिन देशों में पाई
जाती है वह किस तरह से परिवर्तित होते हैं और लोकतंत्र को स्थापित करते हैं इसकी ये बात करते हैं और साथ में इन्होंने थ्री
वेव्स ऑफ डेमोक्रेसी की बात की। कंपैरेटिव पॉलिटिक्स की ट्रेडिशनल एप्रोचेस में सबसे पहला नाम आता है फिलोसोफिकल एप्रोच का और
इसको पॉलिटिकल साइंस की सबसे ओल्डेस्ट एप्रोच मानी जाती है। इसकी शुरुआत ग्रीक से होती है और ग्रीक में इसे शुरू किया
जाता है प्लेटो और एरिस्टोटलल के द्वारा और इसके प्रमुख थिंकर्स रहे हैं प्लेटो, एरिस्टोटलल, रूसो, हगल, कांट एंड
लियोस्ट्रोस। और यह 18थ सेंचुरी में काफी फ्लोरिश होती है। हालांकि यह शुरू एथेंस से हुई थी या फिर ग्रीक से हुई थी। लेकिन
18थ सेंचुरी में यह पूरी तरह से अपने पीक पर थी। इसने काफी फ्लोरिश किया। वहीं सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि यह फिलॉसोफी कहती
है कि कभी भी राजनीतिक विज्ञान से हम वैल्यूस को अलग नहीं कर सकते हैं। सेपरेट नहीं कर सकते हैं। और दूसरी इसकी मान्यता
यह रही है कि यह एथिकल है। यानी कि यह एथिक्स में विश्वास करती है। नॉर्मेटिव स्टडी करती है पॉलिटिकल साइंस की। यानी कि
जो भी मोरालिटी होती है, जो हमारे मानक होते हैं, रूढ़ियां होती है, परंपराएं होती है, उसको ये पॉलिटिक्स से अलग नहीं करती
है। और इसी वजह से इस अप्रोच को जाना जाता है मोरल, नॉर्मेटिव एंड आइडियलिस्टिक अप्रोच। पॉलिटिकल फिलॉसोफी के सबसे बड़े
विद्वान लियोस्ट्रोस को माना जाता है। इन्होंने 1957 में एक अपनी प्रमुख कृति लिखी जिसका नाम था व्हाट इज पॉलिटिकल
फिलॉसोफी। और इस महत्वपूर्ण कृति में इन्होंने कहा कि फिलॉसोफी विवेक की प्राप्ति के लिए एक खोज होती है, क्वेस्ट
होती है और पॉलिटिकल फिलॉसोफी राजनीतिक चीजों और गुड पॉलिटिकल ऑर्डर को जानने का एक वास्तविक प्रयास होता है। और सबसे
इंपॉर्टेंट बात यह है कि लियोस्ट्रोस को ही पॉलिटिकल फिलॉसोफी के जो रिसर्जन्स है या फिर पुनरुत्थान का श्रेय जाता है। और
सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने कहा कि पॉलिटिकल साइंस में या फिर पॉलिटिक्स में जो वैल्यूज़ होती है वह एक कोर होती है,
इनवाइटेबल होती है और इन्हें पॉलिटिक्स से अलग नहीं किया जा सकता है। दूसरी तरफ इन्होंने साइंटिफिक और इंपेरिकल एप्रोच की
पूरी तरह से आलोचना की। इन्होंने कहा कि इंपिरिकल और साइंटिफिक एप्रोच के अंतर्गत वैल्यूस और नॉर्म्स को पूरी तरह से
रिजेक्ट किया जाता है जो कि पॉलिटिक्स से कभी भी अलग नहीं हो सकता है। यानी कि वैल्यूस और जो नॉर्म्स है वह पॉलिटिक्स से
कभी भी अलग नहीं हो सकता है। इसी आधार पर इन्होंने साइंटिफिक और इंपिरिकल एप्रोच की आलोचना की। ट्रेडिशनल एप्रोचेस में दूसरी
इंपॉर्टेंट एप्रोच का नाम है हिस्टोरिकल एप्रोच। और यह रहती है 17 सेंचुरी में। यानी कि इसने 17 सेंचुरी में पॉलिटिकल
फिलॉसोफी को डोमिनेट किया और इसकी पहली मान्यता ये रही है कि अगर हमें डेवलपमेंट और इवोल्यूशन को समझना है तो वो सिर्फ हम
हिस्ट्री की मदद से ही समझ सकते हैं। हिस्ट्री का अध्ययन करके ही हम समझ सकते हैं। और इसकी दूसरी मान्यता ये रही है कि
अगर हमें पॉलिटिकल लाइफ को अच्छे से अंडरस्टैंड करना है। यानी कि जो राजनीति से जुड़ी हुई चीज़ें हैं, कोई
इंस्टीट्यूशंस है या किस तरह से डेमोक्रेसी का पॉलिटिक्स का उत्थान हुआ, स्टेट का इवोल्यूशन हुआ तो उसको सिर्फ़ हम
समझ सकते हैं हिस्ट्री की नॉलेज प्राप्त करके। और तीसरी इसकी आर्गुममेंट यह है कि यह बात करती है कि अगर हमें राजनीतिक
घटनाओं को अच्छे से समझना है तो हमें हिस्टोरिकल फैक्टर्स जैसे एज प्लेस सिचुएशन से ही उनको हम समझ सकते हैं। जैसे
कब, कहां और किन सिचुएशन में किस चीज का उदय हुआ, स्टेट का, पॉलिटिक्स का, गवर्नमेंट का, इमरजेंस हुआ या फिर
इवोल्यूशन हुआ। जैसे हम डेमोक्रेसी का एक उदाहरण ले लेते हैं। तो इसमें हम कहते हैं कि डेमोक्रेसी का जन्म कब हुआ? कहां हुआ?
किन सिचुएशंस में हुआ? तो इसको हम कहते हैं हिस्टोरिकल एप्रोच। मैक्यावली सेबाइन डनिंग सी फ्रीमैन
मॉन्टस्क्यू ऑश शॉट लिसे जैसे विचारक हिस्टोरिकल एप्रोच से जुड़े हैं। वहीं सेबाइन इस एप्रोच के सबसे महत्वपूर्ण
विचारक माने जाते हैं। इन्होंने अ हिस्ट्री ऑफ़ पॉलिटिकल थ्योरी लिखी जिनमें इन्होंने फोकस किया व्हाट आउट टू बी। यानी
कि इन्होंने कहा कि हिस्ट्री हमें यह सिखाती है कि क्या होना चाहिए, क्या करना चाहिए। यानी कि जब कोई इतिहास में घटना
घटती है तो वह हमें बताती है जब हम उसका रिसर्च करते हैं, हिस्टोरिकल इवैल्यूएशन करते हैं तो हमें बताती है कि व्हाट आउट
टू बी। और इसके साथ-साथ इन्होंने कहा कि पॉलिटिकल थ्योरी के तीन महत्वपूर्ण एस्पेक्ट होते हैं। पहला है फक्चुअल,
दूसरा है कैजुअल और तीसरा है इवैल्यूएशनल। कार्ल पॉपर ने अपनी दो प्रमुख कृतियां द ओपन सोसाइटीज एंड इट्स एनिमीज़ एंड द
पॉवर्टी ऑफ हिस्टोरिसिज्म में हिस्टोरिसिज्म का कांसेप्ट दिया और इसमें हिस्टोरिसिज्म को पूरी तरह से टारगेट किया
और साथ में इन्होंने प्लेटो हीगल एंड मार्क्स को मुक्त समाज का शत्रु कहा और इन्होंने हिस्टोरिसिज्म को परिभाषित करते
हुए लिखा कि जो भी हिस्ट्री बनती है या जो भी हिस्टोरिकल चेंजेस होते हैं यह बेसिकली होते हैं स्टैटिक सोशल नॉर्म्स और
ट्रेडिशन उनके द्वारा यानी कि समाज में जो भी नॉर्म्स पाए जाते हैं, वैल्यूस पाई जाती है, ट्रेडिशंस पाई जाती है, उनके
द्वारा ही हिस्ट्री बनाई जाती है और हिस्टोरिकल चेंजेस होते हैं। पॉपर ने प्लेटो को क्लोज सोसाइटी का थिंकर बताते
हुए प्लेटो की भरपूर आलोचना की और साथ में इन्होंने फाल्सिफिकेशन की थ्योरी दी जिसमें इन्होंने कहा कि साइंस ट्रुथ को
प्राप्त नहीं कर सकता है या फिर पता नहीं लगा सकता है। बल्कि जो भी स्कॉलर्स है या फिलॉसोफर्स है उनको पहले फाल्स या झूठ को
फाइंड करना होगा। और जब कोई भी चीज फाल्सिफाइड होती है यानी कि किसी भी चीज का फाल्सिफिकेशन किया जाता है तो जो शेष
बचता है वह ट्रुथ होता है। इस प्रकार से जो फाल्सिफिकेशन होता है वही ट्रुथ को पता लगाने का तरीका है। ट्रेडिशनल एप्रोच में
थर्ड एप्रोच आती है लीगल एप्रोच। और यह 19 सेंचुरी में तब शुरू होती है जब पॉलिटिक्स की स्टडी व रिसर्च में लॉज़ और लीगल सिस्टम
की स्टडी को भी शुरू किया गया था। और दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि लीगल एप्रोच कहती है कि पॉलिटिक्स को लॉज़ एंड
कॉन्स्टिट्यूशन के अनुसार ही समझा जा सकता है। यानी कि पॉलिटिक्स में लॉज़ और कॉन्स्टिट्यूशन की भी स्टडी होनी चाहिए,
समझ होनी चाहिए। क्योंकि कॉन्स्टिट्यूशन और लॉज़ की समझ के अनुसार ही पॉलिटिक्स को समझा जा सकता है। लीगल एप्रोच स्टेट को
लीगल इंस्टीटशंस और प्रोसेससेस के साथ लॉज़ का क्रिएटर या फिर एनफोर्सर समझती है। इसका मतलब यह है कि लीगल एप्रोच कहती है
कि राज्य लीगल इंस्टीट्यूशन के साथ लॉज़ को बनाती है और उनको लागू करती है। और दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इससे जुड़े प्रमुख
थिंकर्स हैं सिसरो डाइस जिन वो दिन थॉमस हॉक्स जर्मी बेंथम ऑस्टिन और सर हेनरी मैन। और वहीं नोट करने वाली बात यह है कि
डाइस जैसे विचारकों ने स्टेट को लीगल मैन कहा है। कंपैरेटिव पॉलिटिक्स की ट्रेडिशनल एप्रोचेस में एक फोर्थ इंपॉर्टेंट एप्रोच
आती है इंस्टीट्यूशनल एप्रोच और इसका जन्म होता है 19 सेंचुरी में। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि हिस्टोरिकल
एप्रोच और जो लीगल एप्रोच है उसके रिएक्शन में यह आई थी। यानी कि इसने हिस्टोरिकल और लीगल एप्रोच की आलोचना की थी। और नोट करने
वाली बात यह है कि ये इंस्टीट्यूशनल एप्रोच जो सरकार के फॉर्मल इंस्टीटशंस होते हैं जैसे लेजिस्लेचर एग्जीक्यूटिव
जुडिशरी इनकी ये कंपैरिजन करती है। इनकी स्टडी करती है और इनके क्या-क्या पावर्स होते हैं, क्या फंक्शनंस होते हैं, क्या
रोल होते हैं और इनके बीच क्या-क्या म्यूचुअल रिलेशन होता है, इसकी भी यह स्टडी करती है। और एक इंपॉर्टेंट बात यह
है कि यह डील करती है जो भी सरकार के या फिर राजनीति के पॉलिटिक्स के जो फ़ॉर्मल एस्पेक्ट्स होते हैं उनके साथ यह डील करती
है और यह जोर देती है जो भी पॉलिटिकल इंस्टीटशंस है या फिर स्ट्रक्चर्स हैं इनकी स्टडी पर यह जोर देती है और नोट करने
वाली बात यह भी है कि चाहे वैगहोट हो है लास्की बेंटले जेम्स ब्राइस कार्ल फेडरिक हरमन फाइनर मॉरिस डबरजे ये सभी के सभी
इंस्टिट्यूशनल एप्रोच के की थिंकर्स रहे हैं। और एक इंपॉर्टेंट बात आपको यह ध्यान में रखनी है कि इंस्टीट्यूशनल एप्रोच के
जितने भी थ्यरिस्ट रहे हैं, इन्होंने इंस्टीटशंस को ग्रोथ और डेवलपमेंट का कॉज देखा है। यानी कि यह मानते हैं कि एक
स्टेट की जितनी भी ग्रोथ होती है, जितना भी डेवलपमेंट होता है, उसके पीछे सबसे बड़ी वजह होती है इंस्टीटशंस।
इंस्टिट्यूशनल अप्रोच की शुरुआत कंपैरेटिव पॉलिटिक्स में एरिस्टोटल के द्वारा शुरू होती है। यानी कि एथेंस या फिर यूनान से
शुरू होती है। जब एरिस्टोटलल ने 158 संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन करके चाहे रेवोल्यूशन को बचाने के यानी कि
रेवोल्यूशन से बचने के उपायों की उन्होंने वहां पर बात की थी। या फिर सरकार के जो जो अंग होते हैं, ऑर्गन्स होते हैं
डिफरेंट-डिफरेंट उनकी भी इन्होंने आपस में तुलना की थी, कंपैरिजन किया था। तो बेसिकली हम यह कह सकते हैं कि भले ही
इंस्टीट्यूशनल एप्रोच 19 सेंचुरी में काफी डेवलप हुई थी लेकिन इसकी शुरुआत एरिस्टोटलल ने यूनान में या फिर एथेंस से
की थी जब उन्होंने 158 संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन किया था। नेक्स्ट इंपॉर्टेंट एप्रोच है कम्युनिकेशन एप्रोच
और इसे भी मॉडर्न एप्रोचेस में बहुत ही इंपॉर्टेंट एप्रोच मानी जाती है। तो इसकी शुरुआत इंटरनेशनल रिलेशंस में कार्ल ड्यूस
ने की थी। जब इन्होंने 1963 में अपनी महत्वपूर्ण कृति द नर्व्स ऑफ गवर्नमेंट लिखी थी। इसमें ही इन्होंने कम्युनिकेशन
एप्रोच को दिया था। हालांकि नोट करने वाली बात यह भी है कि इन्होंने इस कृति में पॉलिटिकल सिस्टम के तीन एलिमेंट्स बताए
थे। जिनमें पहला है इनोवेशन, दूसरा है ग्रोथ और तीसरा है चेंज। कंपैरेटिव पॉलिटिक्स में कम्युनिकेशन एप्रोच को
डेवलप किया था नोबर्ट विनर और रॉस एशब ने। इन्होंने दो इंपॉर्टेंट बुक्स लिखी जिनमें रॉबर्ट बिनर लिखते हैं साइबरनेटिक्स। वहीं
रॉस एशप लिखते हैं एन इंट्रोडक्शन टू साइबरनेटिक्स और इसी में इन्होंने साइबरनेटिक्स की बात की। तो बेसिकली
साइबरनेटिक्स को हम हिंदी में कहते हैं सूचना प्रभावी की और इसको हम एक ऐसी शब्दावली मान सकते हैं जिनमें मनुष्य व
अन्य प्राणियों की दिमाग की तुलना मशीन से की जाती है और उनका जो दिमाग है या फिर उनका जो स्वभाव है उसको एक इंजीनियरिंग की
भांति समझने की कोशिश की जाती है। और एक इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि कम्युनिकेशन थ्योरी को जाना जाता है साइबरनेटिक के रूप
में। पॉलिटिकल कम्युनिकेशन को हम इस तरह से समझ सकते हैं कि सोसाइटी में इंफॉर्मेशन किस
तरह से स्प्रेड होती है और उसका पॉलिटिक्स पॉलिसी मेकर्स न्यूज़ मीडिया एंड सिटीजंस पर किस तरह से प्रभाव पड़ता है। तो इस
प्रकार से हम पॉलिटिकल कम्युनिकेशन को डिफाइन कर सकते हैं कि यह एक प्रकार का कनेक्शन होता है पॉलिटिक्स एंड सिटीजंस के
बीच जिसके द्वारा पॉलिटिक्स और जो सिटीजंस होते हैं आपस में यह इंटरेक्शन करते हैं एक दूसरे के साथ। और इस प्रकार का जो
रिलेशनशिप है जाना जाता है पैथोस, इथोस एंड लोगोस। पैथोस का मतलब होता है इमोशन। यानी कि जब इमोशन के द्वारा लोगों के साथ
कम्यनिकेट किया जाता है तो उसको हम पैथोस बोलते हैं। वहीं इथोस का मतलब होता है एथिक्स। यानी कि जब एथिक्स के बेस पर
आर्गुमेंट या फिर कम्यनिकेट किया जाता है लोगों के साथ तो उसको इथोस कहते हैं। वहीं लोगोस का मतलब होता है लॉजिक यानी कि
लॉजिक या फिर रीजन के द्वारा जब लोगों के साथ कम्यनिकेट किया जाता है उनके साथ इंटरेक्शन किया जाता है तो उसको हम कहते
हैं लोगोस। हमारे पास एक और इंपॉर्टेंट मॉडर्न अप्रोच है नियो इंस्टिट्यूशनलिज्म अप्रोच और यह बहुत ही इंपॉर्टेंट अप्रोच
है। 1984 में जेम्स जी मार्स एंड जॉहन पी ऑलन एक इंपॉर्टेंट एस्स लिखते हैं जिसका नाम है द न्यू इंस्टीट्यूशनलिज्म
ऑर्गेनाइजेशनल बेसिस ऑफ पॉलिटिक्स। और इस एस्स में दोनों ने एक इंपॉर्टेंट टर्म को कॉइ किया था जिसे हम नियो
इंस्टीिट्यूशनलिज्म कहते हैं। हालांकि 1977 में नियो इंस्टीिट्यूशनलिज्म शब्दावली को दो इंपॉर्टेंट सोशियोलॉजिस्ट
जॉन मेयर एंड ब्रेन रवन ने यूज़ किया था और इन्होंने एक इंपॉर्टेंट एस्स लिखा था जिसका नाम है इंस्टीट्यूशनलाइज्ड
ऑर्गेनाइजेशंस फॉर्मल स्ट्रक्चर एज मिथ एंड सेरेमनी। चॉइस थ्योरी। दूसरी आती है कल्चरल नियो इंस्टिट्यूशनलिज्म जिसे हम
सोशियोलॉजिकल नियो इंस्टिट्यूशनलिज्म भी कहते हैं और तीसरी है स्ट्रक्चरल नियो इंस्टिट्यूशनलिज्म। तो चलिए अब हम इनको
एक-एक करके समझते हैं। सबसे पहली थ्योरी का नाम है रैशन चॉइस थ्योरी और इसको प्रतिपादित किया यानी कि प्रोपाउंडिट किया
मैनकर ऑल ने। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे पहला वर्क है द राइज़ एंड डिक्लाइन ऑफ नेशंस। दूसरा इंपॉर्टेंट
वर्क है पावर एंड प्रोस्पेरिटीज आउटगोइंग कम्युनिस्ट एंड कैपिटलिस्ट डिक्टेटरशिप और तीसरा है इनका इंपॉर्टेंट वर्क
डिक्टेटरशिप डेमोक्रेसी एंड डेवलपमेंट तो ये तीनों ही इंपॉर्टेंट वर्क है। इसीलिए मैंने यहां पे मेंशन किया है। रैशन चॉइस
थ्योरी बिलीव करती है कि ह्यूमन बीइंग एक रैशन क्रिएटर होता है। यानी कि ह्यूमन बीइंग के पास बुद्धि होती है, विवेक होता
है जिसके अनुसार ही वह अपने कार्य करता है। और दूसरी इंपॉर्टेंट विशेषता या फिर इसकी इंपॉर्टेंट बात यह है कि ह्यूमन
बीइंग हमेशा से अपने जो लाभ है यानी कि बेनिफिट्स है और इंटरेस्ट है उसको गेन करना चाहता है। और रैशन चॉइस थ्योरी यह
आर्गुममेंट देती है कि जो इंडिविजुअल की चॉइससेस होती है यानी कि उसकी जो एक पसंद होती है, चॉइससेस होती है, वे
इंस्टीट्यूशन से भी इफेक्टेड होती है, प्रभावित होती है। नियो इंस्टिट्यूशनलिज्म एप्रोच में दूसरी इंपॉर्टेंट एप्रोच आती
है कल्चरल नियो इंस्टिट्यूशनलिज्म जिसको हम सोशियोलॉजिकल नियो इंस्टिट्यूशनलिज्म भी कहते हैं। तो इसकी सबसे महत्वपूर्ण
मान्यता यह रही है कि अगर हमें इंस्टीटशंस को अच्छे से समझना है कि इंस्टीटशंस कैसे काम करते हैं, कैसे अपने फंक्शनंस करते
हैं? तो सबसे पहले हमें इस बात की समझ होनी चाहिए कि सोसाइटी क्या होती है? कल्चरर्स क्या होते हैं? और वैल्यूज़ क्या
होती है? और यह यह भी कहता है कि जो इंडिविजुअल का जो बिहेवियर होता है, वह सोशल वैल्यूस होती है, सोसाइटी होती है,
कल्चरर्स होते हैं, नॉर्म्स होते हैं, उससे भी यह इफेक्टेड होता है। तो, सबसे इंपॉर्टेंट बात जो आपको याद रखनी है, वो
यह है कि कल्चरल न्यू इंस्टीट्यूशनलिज्म का जो आईडिया है, उसको दिया था एलिनोर ऑस्ट्रो ने। तो यह सबसे इंपॉर्टेंट बात है
जो कि आपको अच्छे से याद रखनी है। ऑस्ट्रोम को 2009 में इकोनॉमिक्स के लिए नोबेल प्राइज मिला था और ऐसा करने वाली वे
पहली ऐसी वूमेन थी जिनको कि इकोनॉमिक्स में नोबेल प्राइज मिला था। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। आपको स्क्रीन पर
जितने भी वक्स दिखाई दे रहे हैं, यह इनके द्वारा लिखे गए हैं जो कि बहुत इंपॉर्टेंट है। इनको आप अच्छे से नोट कर लें। थर्ड है
स्ट्रक्चरल न्यू इंस्टिट्यूशनलिज्म और इसका आईडिया दिया थडा स्कॉकपॉल ने और इंपॉर्टेंट बात यह है कि थडास कॉकपॉल कहती
है कि अगर हमें पॉलिटिक्स को अच्छे से समझना है तो सबसे पहले हमें जो स्टेट के डिफरेंट-डिफरेंट स्ट्रक्चर्स होते हैं
उनकी नॉलेज होनी चाहिए। इनकी जानकारी होनी चाहिए। स्ट्रक्चर्स का मतलब है कि स्टेट के अंदर जो डिफरेंट-डिफरेंट ऑर्गेनाइजेशंस
होते हैं या फिर ऑर्गन्स होते हैं जैसे कि पॉलिटिकल पार्टीज, प्रेशर ग्रुप्स, जुडिशियरी, एग्जीक्यूटिव, लेजिसलेटिव
स्कूल्स, यूनिवर्सिटीज, चर्चेस, टेंपल्स ये सारे के सारे स्ट्रक्चर्स में आते हैं। तो थडा कहती है कि हमें स्ट्रक्चर्स की
स्टडी करनी है क्योंकि स्ट्रक्चर्स जितने मजबूत होंगे स्टेट उतना ज्यादा मजबूत होगा। थडा यह भी कहती है कि जो
स्ट्रक्चर्स है उनका स्ट्रांग होना बहुत जरूरी है अगर हमें अच्छा और स्टेबल या फिर स्ट्रांग स्टेट चाहिए और इन्होंने एक
एग्जांपल दिया जिसमें इन्होंने कहा कि 1991 में यूएसएसआर का पतन इसीलिए हुआ क्योंकि यूएसएसआर में जो स्ट्रक्चर्स थे
यानी कि पॉलिटिकल स्ट्रक्चर्स बहुत कमजोर थे और 1949 में चाइना का विघटन या फिर कोलैप्स चाइना का इसलिए नहीं हुआ क्योंकि
चाइना में स्ट्रांग पॉलिटिकल स्ट्रक्चर्स थे। इन्होंने 1979 में एक अपनी इंपॉर्टेंट कृति लिखी जिसका नाम है स्टेट्स एंड सोशल
रेवोलशंस और इस कृति की खास बात यह रही है कि इसमें इन्होंने फ्रेंच रशियन एंड चाइनीस रेवोल्यूशन की कंपैरेटिव स्टडी की।
इनके कुछ और इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे प्रोटेक्टिंग सोल्जर्स दूसरा है डिमिनिश्ड डेमोक्रेसी। तो ये दोनों ही
बहुत इंपॉर्टेंट वर्क है और स्टेट्स एंड सोशल रेवोल्यूशन तो सबसे इंपॉर्टेंट है ही। तो इनको अच्छे से याद कर लेना क्योंकि
एग्जाम में ये बार-बार पूछे जाते हैं। अब हम बात कर लेते हैं स्ट्रक्चरल फंक्शनल एप्रोच की। तो यह भी कंपैरेटिव पॉलिटिक्स
में एक बहुत ही इंपॉर्टेंट मॉडर्न एप्रोच है। तो जब हम बात करते हैं स्ट्रक्चरल फंक्शनल एप्रोच की तो इसको कंपैरेटिव
पॉलिटिक्स में आलमंड और पावेल जैसे विचारकों ने प्रतिपादित किया था। और वहीं इससे पहले सोशियोलॉजी में इसे टालकट
पार्शंस ने यूज़ किया था। वहीं रजनी कोठारी ने इसे इंडिया की जो पॉलिटिक्स है यानी कि इंडिया में जो पॉलिटिकल प्रोसेस पाया जाता
है उसकी स्टडी करने के लिए यूज किया था। तो बेसिकली जब हम बात करते हैं स्ट्रक्चरल फंक्शनल एप्रोच की तो यह जुड़ी है जो
डेवलपिंग नेशंस है उनकी स्टडी से यानी कि यह ज्यादा फिट बैठती है ऐसे देश या फिर ऐसे नेशंस जो अभी विकासशील हैं जो पिछड़े
हुए हैं। तो बेसिकली स्ट्रक्चरल फंक्शनल एप्रोच यह कहती है कि अगर हमें दुनिया के सभी पॉलिटिकल सिस्टम को अच्छे से समझना
है। उनकी अच्छे से स्टडी करनी है। यहां तक कि थर्ड वर्ल्ड जो पॉलिटिकल सिस्टम है अगर उनको अच्छे से समझना है तो सबसे पहले हमें
जो दुनिया में यानी कि डिफरेंट-डिफरेंट स्टेट्स में जो पॉलिटिकल सिस्टम पाए जाते हैं और उसके अंतर्गत जो स्ट्रक्चर्स है तो
उसको पहले समझना होगा और जो पॉलिटिकल सिस्टम या फिर स्ट्रक्चर के जो फंक्शनंस होते हैं उनको पहले समझना होगा कि
पॉलिटिकल सिस्टम के द्वारा कौन-कौन से फंक्शनंस किए जाते हैं। जब हम यह सभी समझेंगे उनकी स्टडी करेंगे तब जाकर ही हम
अच्छे तरीके से किसी भी पॉलिटिकल सिस्टम को समझ सकते हैं। आलमंड और पावेल कहते हैं कि किसी भी पॉलिटिकल सिस्टम में चार
प्रकार के इनपुट्स होते हैं और तीन प्रकार के आउटपुट्स होते हैं। तो यह है जो आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहा है। यह है
पॉलिटिकल सिस्टम। तो इसमें आलमंड और पावेल कहते हैं कि पहला जो इनपुट होता है यानी कि पहला जो फंक्शन होता है ये होता है
पॉलिटिकल सोशलाइजेशन एंड रिक्रूटमेंट। इसको हम हिंदी में कहते हैं राजनीतिक समाजीकरण व भर्ती। तो इसमें जो
स्ट्रक्चर्स होते हैं यानी कि इसमें जो स्ट्रक्चर्स महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ये होते हैं फैमिली चर्च, स्कूल एंड पीियर
ग्रुप्स। और दूसरा फंक्शन होता है इंटरेस्ट आर्टिकुलेशन। इसको हम हिंदी में कहते हैं हित समूहीकरण जिसका कि
महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं इंटरेस्ट ग्रुप्स। वहीं तीसरा होता है इंटरेस्ट एग्रीगेशन जिसको हम हिंदी में कहते हैं
हित स्पष्टीकरण और इसका जो काम है वह पॉलिटिकल पार्टीज के द्वारा किया जाता है। वहीं चौथा फंक्शन है पॉलिटिकल कम्युनिकेशन
यानी कि इसको कहते हैं हम राजनीतिक संचार जिसका काम मास मीडिया के द्वारा किया जाता है। तो इनको आप जितने भी चारों ये इनपुट
है यानी कि फंक्शनंस है। इनको आप क्रोनोलॉजिकल ऑर्डर में अच्छे से याद करना क्योंकि ये कई बार एग्जाम में पूछे जाते
हैं। वहीं दूसरी तरफ तीन प्रकार के आउटपुट्स यानी कि तीन प्रकार के फंक्शनंस की बात करते हैं आलमंड और पाबेल जिनमें
पहला है रूल मेकिंग यानी कि रूल बनाना। यह काम लेजिसलेटिव का है। वहीं दूसरा है रूल एप्लीकेशन। यह एग्जीक्यूटिव करती है। वहीं
तीसरा है रूल एडजुकेशन जो कि जुडिशरी करती है। तो यह बहुत ही एक इंपॉर्टेंट एप्रोच रही है। इसको आप अच्छे से समझ लें।
हालांकि डिटेल में आगे हम इसको आने वाली वीडियोस में करेंगे। अब हम बात कर लेते हैं पॉलिटिकल इकोनमी अप्रोच की। तो इस
शब्दावली को सबसे पहले यूज या फिर कॉइ किया फ्रेंच इकोनॉमिस्ट एंटिनियो डी मोटरजीियन। इन्होंने इस शब्दावली को 1615
में यूज़ किया यानी कि कॉइ किया और बाद में पॉलिटिकल इकोनमी शब्दावली को कुछ क्लासिकल लिबरलिस्ट जैसे एडम स्मिथ, थॉमस, माल्थस,
डेविड रिकार्डो ने भी पॉपुलराइज किया। हालांकि 19 सेंचुरी में कार्ल मार्क्स ने इस शब्दावली को काफी पॉपुलर किया। हालांकि
नोट करने वाली बात यह है कि इन्होंने यह कहा कि पॉलिटिक्स सेकेंडरी होती है और इकोनमी प्राइमरी होती है और इस आधार पे
इनकी आलोचना भी होती है। कुछ थिंकर्स यह कहते हैं कि इनकी ये जो एप्रोच है यह पॉलिटिकल इकोनमी नहीं है बल्कि इकोनॉमिकल
पॉलिटी एप्रोच है। 1960 के दशक में पॉलिटिकल इकोनमी को आगे डेवलप्ड किया जाता है कुछ लैटिन अमेरिकन मार्क्सिस्ट थिंकर्स
के द्वारा और इनमें प्रमुख थिंकर आते हैं एजी फ्रैंक रविश हंस सिंगर इमैनुअल बोलस्टीन सामिन आमीन। इनकी सबसे प्रमुख
मान्यता यह रही है कि मॉडर्नाइजेशन के अंतर्गत जितने भी कैपिटलिस्ट कंट्रीज है उन्होंने पूरी तरीके से पुअर कंट्रीज का
शोषण किया है और इतना ज्यादा शोषण किया है कि जो पुअर कंट्रीज है वह पूरी तरीके से डिपेंडेंट हो जाती है इंडस्ट्रियलाइज्ड
कंट्रीज या फिर कैपिटलिस्ट कंट्रीज के ऊपर और इसी को इन्होंने डिपेंडेंसी थ्योरी कहा है। यानी कि जो पुअर कंट्रीज है उनका इतना
ज्यादा एक्सप्लइटेशन या फिर शोषण हुआ है कि वह पूरी तरीके से एडवांस्ड या फिर कैपिटलिस्ट कंट्री के ऊपर डिपेंडेंट हो
जाती है और इसके अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं बचता है। की फिगर्स इन बिहेवलिज्म आपको स्क्रीन पर जितने भी
थिंकर जैसे ग्राम बालास, आर्थर बेंटले, चार्ल्स मेरियम, वीओके, जॉर्ज कैटलिन, हेराड लासबेल, डेविड ट्रूम, रॉबर्ट डाहल,
डेविड ईस्टन, गिविल आलमंड जितने भी आपको थिंकर यह दिखाई दे रहे हैं। अब हम एक-एक करके इनको पढ़ते हैं क्योंकि यह
बिहेवलिज्म के की फिगर माने जाते हैं। यानी कि बिहेवियरलिज्म से जुड़े यह महत्वपूर्ण थिंकर रहे हैं। तो सबसे पहले
हम बात कर लेते हैं ग्राम बालास की। ग्राम बालास इंग्लिश समाजवादी रहे हैं। यानी कि इंग्लिश सोशलिस्ट रहे हैं। और यह फेबियन
सोसाइटी के लीडर भी रहे हैं। इन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की स्थापना की थी जिसके यह कोफाउंडर रहे हैं। दूसरी
इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनकी प्रमुख कृति ह्यूमन नेचर इन पॉलिटिक्स 1908 में पब्लिश होती है और इसी की वजह से पॉलिटिकल साइंस
में कंपेरेटिव पॉलिटिक्स की शुरुआत होती है। साथ में बिहेवियरलिज्म को भी काफी सपोर्ट मिलता है। इस कृति में इन्होंने
बात की कि हमें पॉलिटिक्स में ह्यूमन बिहेवियर का अध्ययन भी करना चाहिए और किस तरह से राजनीति ह्यूमन बिहेवियर से
प्रभावित होती है और राजनीति से ह्यूमन बिहेवियर प्रभावित होता है। इसकी स्टडी हमें पॉलिटिकल साइंस में करनी चाहिए।
और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे द आर्ट ऑफ थॉट 1926, द ग्रेट सोसाइटी 1914, आवर सोशल हेरिटेज
1921। अब हम बात कर लेते हैं आर्थर बेंटले की। आर्थर बेंटले अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट
रहे हैं। और इन्होंने बिहेविरल मेथोडोलॉजी को पॉलिटिकल साइंस में विकसित किया। और दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनका
इंपॉर्टेंट वर्क द प्रोसेस ऑफ गवर्नमेंट रहा है जो 1908 में पब्लिश हुआ। इसमें इन्होंने पॉलिटिकल साइंस में या फिर
पॉलिटिकल प्रोसेस में किस तरह से प्रेशर ग्रुप्स, पॉलिटिकल पार्टीज, इलेक्शंस एंड पब्लिक ओपिनियन की भूमिका रहती है, इसके
बारे में इन्होंने इस महत्वपूर्ण कृति में चर्चा की। और इस महत्वपूर्ण कृति की एक और बात यह है कि इससे भी पॉलिटिकल साइंस में
कंपेरेटिव पॉलिटिक्स का जन्म माना जाता है। और सबसे बड़ी बात यह भी है कि ग्रुप
अप्रोच के यह अग्रदूत माने जाते हैं पॉलिटिक्स में। और इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग्स रही है। जैसे द प्रोसेस ऑफ
गवर्नमेंट 1908 जो कि इनकी अक्षय कृति मानी जाती है। नोइंग एंड द नॉन 1949 इंक्वायरी इनू इंक्वायर्स 1954
चार्ल्स मेरियम चार्ल्स मेरियम अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। और बिहेवियरल एप्रोच को पॉलिटिकल साइंस में इन्होंने
स्थापित किया। यानी कि इसके ये फाउंडर रहे हैं। और सबसे इंपॉर्टेंट बात है कि इन्होंने 1920 के दशक में शिकागो स्कूल ऑफ
पॉलिटिकल साइंस की स्थापना की। और एक और इंपॉर्टेंट बात यह है कि 1925 में इनकी इंपॉर्टेंट या फिर अक्षय कृति पब्लिश होती
है जिसका नाम है न्यू एस्पेक्ट्स ऑफ़ पॉलिटिकल साइंस। और इस महत्वपूर्ण कृति में इन्होंने एक तरफ़ यह कहा कि हमें
पॉलिटिकल साइंस में इंटरडिसिप्लिनरी स्टडी को महत्व दिया जाना चाहिए। यानी कि अंतर अनुशासनात्मक अध्ययन को फोकस किया जाना
चाहिए। और दूसरी तरफ इन्होंने कहा कि हमें वैज्ञानिकता यानी कि साइंटिफिक करैक्टर को भी पॉलिटिकल साइंस में स्थापित करना होगा।
और सबसे बड़ी बात यह है कि यह चैंपियन रहे हैं डेमोक्रेसी के। यानी कि डेमोक्रेसी की इन्होंने काफी वकालत की और इनकी कुछ
इंपॉर्टेंट राइटिंग्स रही है। जैसे न्यू एस्पेक्ट्स ऑफ़ पॉलिटिक्स 1925, सिस्टमैटिक पॉलिटिक्स 1945, पब्लिक एंड प्राइवेट
गवर्नमेंट 1944, द रूल ऑफ पॉलिटिक्स इन सोशल चेंज 1936। अब हम बात कर लेते हैं बीओ की जूनियर और
बीओ की अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं और पॉलिटिकल साइंस में ये इंपीरिकल स्टडी यानी कि अनुभवात्मक अध्ययन के लिए
जाने जाते हैं। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि यह बिहेवियरल जो मूवमेंट रहा पॉलिटिकल साइंस में या फिर पॉलिटिकल
स्टडीज में उसके ये काफी बड़े लीडर माने जाते हैं। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे पॉलिटिक्स, पार्टीज एंड
प्रेशर ग्रुप्स 1946, साउथर्न पॉलिटिक्स 1946, साउथर्न पॉलिटिक्स इन द स्टेट एंड नेशंस 1949, द रिस्पांसिबल इलेक्टोरेट
1966। अब हम बात कर लेते हैं जॉर्ज कैटलिन की। जॉर्ज कैटलिन इंग्लिश पॉलिटिकल साइंटिस्ट
और फिलॉसोफर रहे हैं। इनके इंपॉर्टेंट वर्क जो रहे हैं उनमें से सबसे प्रमुख हैं साइंस एंड मेथड ऑफ पॉलिटिक्स जो कि 1927
में पब्लिश हुआ और इस कृति में इन्होंने पॉलिटिक्स को रिगार्डेड किया एज द साइंस ऑफ पावर। यानी कि शक्ति के विज्ञान के रूप
में इन्होंने राजनीति को इस कृति में इस इंपॉर्टेंट कृति में माना। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने
वैल्यू फ्री प्योर साइंस पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इन्होंने कहा कि राजनीतिक विज्ञान में हमें वैल्यू फ्री प्योर साइंस
को स्थापित करना चाहिए। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे द साइंस एंड मेथड्स ऑफ पॉलिटिक्स 19 27,
द स्टडी ऑफ द प्रिंसिपल्स ऑफ पॉलिटिक्स 1930, न्यू ट्रेंड्स इन सोशलिज्म 1935, सिस्टमेटिक पॉलिटिक्स 1962।
अब हम बात कर लेते हैं हेराल्ड लासबेल की। हेराल्ड लासबेल अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं जो कि बहुत ही प्रमुख
विचारक रहे हैं और इन्होंने कम्युनिकेशन में भी अपना काफी वर्क किया और इनका एक प्रमुख वर्क रहा है पॉलिटिक्स
हु गेट्स व्हाट व्हेन एंड हाउ जो कि 1936 में यह किताब या फिर यह वर्क पब्लिश हुआ और इसमें इन्होंने पॉलिटिक्स को रिगार्डेड
किया पॉलिटिक्स एज द स्टडी एंड द एनालिसिस ऑफ़ पावर। यानी कि पॉलिटिक्स को इन्होंने अपनी इस महत्वपूर्ण कृति में पावर के रूप
में बिचारा। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। पॉलिटिक्स हु गेट्स व्हाट व्हेन एंड हाउ
1936 पावर एंड पर्सनालिटी 1948, द फ्यूचर ऑफ पॉलिटिकल साइंस 1962, द एनालिसिस ऑफ पॉलिटिकल पावर 1947।
अब हम बात कर लेते हैं डेविड ट्रूमैन की। डेविड ट्रूमैन अमेरिकन एकेडमिशियन और पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। और यह जाने
जाते हैं कंट्रीब्यूशन टू द थ्योरी ऑफ पॉलिटिकल प्लुरलिज्म एंड बिहेवियरल एप्रोच इन पॉलिटिकल साइंस। और 1951 में इन्होंने
इंपॉर्टेंट सेमिनल वर्क लिखा जिसका नाम है द गवर्नमेंटल प्रोसेस और यह बहुत ही इंपॉर्टेंट कृति इनकी मानी जाती है। इस
कृति में इन्होंने एनालिसिस किया फॉर्मेशन एंड एक्टिविटीज ऑफ रिप्रेजेंटेटिव इंटरेस्ट ग्रुप्स पर्टिकुलरली इन रिलेशन
टू द फॉर्मल इंस्टीटशंस ऑफ गवर्नमेंट। यानी कि सरकार जो होती है उसमें इन्होंने बात की किस तरह से जो इंटरेस्ट ग्रुप होते
हैं उनका प्रतिनिधित्व और उनकी एक्टिविटीज कैसे होती है इसकी बात इन्होंने इस महत्वपूर्ण कृति द गवर्नमेंटल प्रोसेस
1951 में की। अब हम बात कर लेते हैं रॉबर्ट दाहल। रॉबर्ट दाहल एक बहुत ही बड़े पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं और पॉलिटिकल
थ्यरिस्ट रहे हैं याले यूनिवर्सिटी के। और सबसे बड़ी बात यह है कि एक यह बहुलवादी विचारक या फिर प्लुरलिस्टिक थिंकर रहे
हैं। और इसी वजह से इनको जाना जाता है प्लूरलिस्टिक थ्योरी ऑफ डेमोक्रेसी और इन्होंने एक टर्म को गाड़ा जिसका नाम है
पॉलियार्की यानी कि बहुलतंत्र के या फिर बहुलवाद के यह प्रणेता रहे हैं। इस टर्म को इस शब्दावली को इन्होंने गढ़ा और सबसे
इंपॉर्टेंट बात यह है कि ये ओरिजनेटर रहे हैं इंपेरिकल थ्योरी के पॉलिटिकल साइंस में और ही इज बेस्ट नोन फॉर द एडवांसिंग
बिहेवियरलिस्ट कैरेक्टराइजेशनंस ऑफ पॉलिटिकल पावर और पॉलिटिकल पावर में इन्होंने बिहेवियरलिज्म से जुड़ी जो
विशेषताएं हैं उसको भी स्थापित किया एडवांस किया और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जैसे हु गवर्न्स 1961 1
पोलियार्की पार्टिसिपेशन एंड अपोजिशन 1971 डेमोक्रेसी एंड इट्स क्रिटिक्स 1989 ऑन डेमोक्रेसी 1998
डेविड ईस्टन की अब हम बात कर लेते हैं जो बिहेवियरलिज्म से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण विचारक रहे हैं। जिन्होंने 1953 में
बिहेवियरलिज्म को पूरी प्रगति या शिखर पर पहुंचा दिया था। तो डेविड ईस्टन कनेडियन बोर्न अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं
और यह जाने जाते हैं सबसे प्रसिद्ध जो थ्योरी रही है इनकी उसके लिए जिसका नाम है पॉलिटिकल सिस्टम थ्योरी और यह एक फोर
फ्रंट यानी कि सबसे प्रणेता या प्रमुख थिंकर रहे हैं बिहेवियरलिज्म के भी और पोस्ट बिहेवलिज्म रेवोल्यूशन के या फिर
मूवमेंट के भी क्योंकि इन्होंने ही 1953 में बिहेवियरलिज्म को शिखर पर पहुंचाया था और 1900 60 के दशकों के अंतिम वर्षों में
इन्होंने बिहेवियरलिज्म को रिजेक्ट करके पोस्ट बिहेवियरलिज्म की आधारशिला रखी थी। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे
द पॉलिटिकल सिस्टम 1953 और यह इनकी अक्षय कृति मानी जाती है। दूसरी है अ फ्रेमवर्क फॉर पॉलिटिकल एनालिसिस 1956। अगली है
सिस्टम एनालिसिस ऑफ़ पॉलिटिकल लाइफ 1965। और अगली है द एनालिसिस ऑफ पॉलिटिकल स्ट्रक्चर 1990।
1967 में डेविड ईस्टन का एक इंपॉर्टेंट एस्स पब्लिश होता है। जिसका नाम है द करंट मीनिंग ऑफ बिहेवियरलिज्म। और इस
इंपॉर्टेंट एस्स में डेविड ईस्टन ने बिहेवियरलिज्म के एट इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन स्टोन की बात की। जिसमें पहला है
रेगुलरिटीज। रेगुलरिटीज को हम हिंदी में कहते हैं नियमितताएं। यानी कि पॉलिटिकल साइंस में कुछ ऐसी नियमितताएं होती है
जिसके साथ वो दूसरे सब्जेक्ट के साथ जुड़ा होता है। तो उन्हीं नियमितताओं का हमें पॉलिटिकल साइंस में अध्ययन करना होता है
क्योंकि इससे पॉलिटिकल साइंस में शोध या फिर रिसर्च आसानी से की जा सकती है और एक विषय के दूसरे विषय के साथ संबंधों को भी
आसानी से जाना जा सकता है। जिसके द्वारा हम ह्यूमन बिहेवियर की पॉलिटिकल साइंस में स्टडी भी आसानी से कर सकते हैं। दूसरा है
वेरिफिकेशन। इसको हम हिंदी में कहते हैं सत्यापन। यानी कि पॉलिटिकल साइंस में सिर्फ हमें ऐसी चीजों का ही अध्ययन करना
चाहिए जिन्हें हम सत्यापित कर सकें या फिर वेरीफाई कर सकें। तीसरी इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन है टेक्निक्स यानी कि पॉलिटिकल
साइंस में ऐसी कौन-कौन सी विधियां है जो हम रिसर्च करने के लिए या फिर शोध करने के लिए अपनाते हैं। अगला है क्वांटिफिकेशन।
क्वांटिफिकेशन का मतलब होता है परिमापीकरण। यानी कि पॉलिटिकल साइंस में ऐसे कौन से विषय हैं जिनको हम माप सकते
हैं या कौन से ऐसे तथ्य हैं, कौन सी ऐसी चीजें हैं जिनको हम माप सकते हैं यानी कि क्वांटिफिकेशन कर सकते हैं, परिमापीकरण कर
सकते हैं। उसका भी अध्ययन हमें पॉलिटिकल साइंस में करना है। अगला इंटेलेक्चुअल स्टोन है वैल्यू फ्री स्टडी। यानी कि
डेविड ईस्टन ने भी बात की कि पॉलिटिकल साइंस में मूल्यों को या फिर वैल्यू्यूज को कोई जगह नहीं होनी चाहिए। राजनीतिक
विज्ञान में जो स्टडी होगी वह पूरी तरह से मूल्यों को पृथक रखकर की जाएगी। अगला है सिस्टमेटाइजेशन यानी कि पॉलिटिकल साइंस
में जितनी भी स्टडी होती है या फिर रिसर्च होती है वो व्यवस्थीकरण हो या फिर क्रमबद्धकरण के आधार पर हो। यानी कि कोई
भी हम रिसर्च करते हैं तो वो व्यवस्थित ढंग से हो क्रमबद्ध तरीके से हो। अगली है प्योर साइंस। इन्होंने बात की कि पॉलिटिकल
साइंस भी नेचुरल साइंस की तरह प्योर साइंस हो सकता है। यानी कि शुद्ध विज्ञान के रूप में स्थापित किया जा सकता है। अगर हम
साइंटिफिक स्टडी को बढ़ावा दें। और अगली विशेषता है इंटीग्रेशन जो कि डेविड ईस्टन ने बताई। इंटीग्रेशन का मतलब है एकीकरण।
और इसका मतलब यह है कि ऐसा नहीं है कि अगर हम पॉलिटिकल साइंस की स्टडी कर रहे हैं तो उसमें हम सिर्फ पॉलिटिकल साइंस का ही
अध्ययन करें। आज के जो विषय हैं वह सारे अंतर विषयक हैं। यानी कि इंटरडिसिप्लिनरी सब्जेक्ट हैं जो एक दूसरे के साथ जुड़े
हुए हैं। इसीलिए जब हम पॉलिटिकल साइंस का अध्ययन करते हैं तो उसके साथ इकोनॉमिक्स, हिस्ट्री, सोशियोलॉजी, पब्लिक
एडमिनिस्ट्रेशन जैसे विषयों का अध्ययन करना भी अनिवार्य है। अब हम बात कर लेते हैं गैब्रियल आलमंड की।
गैब्रियल आल्लमंड अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं और इनको जाना जाता है बेसिकली कंपैरेटिव पॉलिटिक्स में योगदान
के लिए। कंपैरेटिव पॉलिटिक्स में इन्होंने दो महत्वपूर्ण चीजों पर फोकस किया। पहला है पॉलिटिकल डेवलपमेंट और दूसरा है
पॉलिटिकल कल्चर। इन्होंने सिबी कल्चर की भी बात की। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे द अपील्स ऑफ कम्युनिज्म
1954, द पॉलिटिक्स ऑफ द डेवलपिंग एरियाज 1960, द सेबी कल्चर 1963। अगली है कंपैरेटिव पॉलिटिक्स और
डेवलपमेंटल एप्रोच 1966 और अगली है कंपेरेटिव पॉलिटिक्स टुडे जो कि 2013 में इनकी डेथ के बाद पब्लिश हुई।
इससे पहले कि हम पोस्ट बिहेवियरलिज्म को अच्छे से डिस्कस करें। सबसे पहले पोस्ट बिहेवियरलिज्म के जो फादर रहे हैं, जो
पाइनियर रहे हैं, डेविड ईस्टन के बारे में नर्सल में डिस्कस कर लेते हैं। तो डेविड ईस्टन कनेडियन बोर्न अमेरिकन पॉलिटिकल
साइंटिस्ट रहे हैं और इन्हें कंपैरेटिव पॉलिटिक्स के एक मेजर थिंकर के रूप में जाना जाता है। इनका जन्म 24 जून 1917 को
हुआ और इनकी डेथ 19 जुलाई 2014 को हुई। इन्होंने कुछ इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स दिए जिनको आपको अच्छे से याद रखना है क्योंकि
आपके एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी है। इन्होंने सिस्टम एप्रोच की बात की। इन्होंने सिस्टम एप्रोच में इनपुट आउटपुट
मेथड दिया और इन्होंने जो है फ्लो मॉडल दिया पॉलिटिकल साइंस का। इन्होंने गेट कीपिंग की बात की और ब्लैक बॉक्स की
अवधारणा दी। अगर आप इन सभी कांसेप्ट्स को अच्छे से समझना चाहते हैं, डिटेल में समझना चाहते हैं, तो इनके ऊपर मैंने
ऑलरेडी एक वीडियो बना रखी है। लिंक आपको डिस्क्रिप्शन बॉक्स में मिल जाएगा या फिर इस वीडियो के एंड में मिल जाएगा। स्क्रीन
पर आपको डेविड ईस्टन की जितनी भी बुक्स दिखाई दे रही है, इनको आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही
जरूरी है। यहां से एक बुक पूछी ही पूछी जाती है एग्जाम में। अब हम बात कर लेते हैं कि पोस्ट बिहेवियरलिज्म में कौन-कौन
से की फिगर रहे हैं। तो इनमें पहला नाम आता है डेविड ईस्टन का। दूसरा नाम आता है पीटर बेकराक का। तीसरा नाम आता है
क्रिश्चियन वेगा, चौथा नाम आता है मॉ्गनेंथाऊ का और पांचवा नाम आता है थियोडोर लोबी। अब हम पोस्ट बिहेवियरलिज्म
के मीनिंग को अच्छे से समझ लेते हैं। तो जब हम बात करते हैं पोस्ट बिहेवियरलिज्म की तो पोस्ट बिहेवियरलिज्म पॉलिटिकल साइंस
में बिहेवियरलिज्म के अगेंस्ट एक रिएक्शनरी मूवमेंट था। हालांकि नोट करने वाली बात यह है कि पोस्ट बिहेवियरलिज्म
बिहेवियरलिज्म का एंटायर रिजेक्शन नहीं करता है। यह बिहेवियरलिज्म में कुछ रिफॉर्म्स की बात करता है। अमेंडमेंट की
बात करता है, चेंज की बात करता है और रेवोल्यूशन की बात करता है। जैसा कि डेविड ईस्टन ने खुद भी कहा था कि पोस्ट
बिहेवियरलिज्म इज़ एन एक्चुअल रेवोल्यूशन नॉट काउंटर रेवोल्यूशन। तो पोस्ट बिहेवियरलिज्म को 1960 के दशक के अंतिम
वर्षों में डेविड ईस्टन के द्वारा शुरू किया गया था। अब हम सबसे बड़े क्वेश्चन कि पोस्ट बिहेवियरलिज्म को क्यों शुरू किया
गया था? इसको हम एनालाइज करते हैं। आखिर बिहेवियरलिज्म के साथ ऐसा क्या हुआ कि खुद 1969 में डेविड ईस्टन को पोस्ट
बिहेवियरलिज्म को शुरू करना पड़ा। तो इसके पीछे बहुत सारे कॉजेस थे। जिनमें पहला कॉज था इररेिलेवेंस ऑफ पॉलिटिकल साइंस।
क्योंकि बिहेवलिज्म के अंतर्गत जितनी भी वैल्यू्यूज होती है, लोगों की सेंटीमेंट होती है, बिहेवियर होता है, उसको रिजेक्ट
कर दिया था। और केवल साइंटिफिक जो स्टडी होती है, रिसर्च होती है, उसको ही फोकस किया गया था। जिसकी वजह से पॉलिटिकल साइंस
एक इररेिलेवेंट सब्जेक्ट बन गया था। इसकी दूसरी वजह थी ओवर एफेसिस ऑन साइंस। इसने केवल साइंस और जो साइंटिफिक स्टडी होती
है, रिसर्च होती है, उसको ही प्रायोरिटी दी। जिसकी वजह से जो पोस्ट बिहेवियरलिज्म है, उसको शुरू करना पड़ा। और इसका अगला
कॉज था कि इसने यानी कि बिहेवियरलिज्म ने जो वैल्यू्यूज होती है उसको निगेट कर दिया था। तो वैल्यूज़ के बिना पॉलिटिकल साइंस
कभी भी नहीं हो सकता है। जैसा कि बाद में खुद डेविड ईस्टन ने कहा भी था कि वी कांट शेड आवर वैल्यूज़ इन द वे वी रिमूव आवर
कोर्ट्स। यानी कि जो वैल्यूस होती है समाज में उनको हम इस तरह से नहीं नकार सकते हैं जिस तरह से हम एक अपने कोट को पहनते हैं
और पहनने के बाद उतारते हैं। यानी कि वैल्यूस की पॉलिटिकल साइंस में बहुत ही इंपॉर्टेंट भूमिका है। और इसका अगला कॉज
था कि एक्सट्रीम फोकस ऑन रिसर्च एंड स्टडी। यानी कि जो बिहेवियरलिज्म है, इसने केवल जो रिसर्च होती है, स्टडी होती है,
उसको ही फोकस किया। जो ह्यूमन जो वैल्यूस होती है, बिहेवियर होता है, सेंटीमेंट्स होती है, लोग किस तरह से पार्टिसिपेशन
करते हैं? लोगों के आइडियाज क्या होते हैं? इसको इसने रिजेक्ट कर दिया था। और इसका अगला कॉज था कि बिहेवियरलिज्म एक
स्टेटस को विषय था। यानी कि यह सिर्फ और सिर्फ यथास्थिति पर फोकस करता था। जो जैसा है उसको वैसा देखता था। यानी कि चेंज की
बात नहीं करता है। जबकि पॉलिटिकल साइंस हम जानते हैं कि एक डायनामिक सब्जेक्ट है। और अगला सबसे बड़ा कॉज था खुद डेविड ईस्टन।
क्योंकि डेविड ईस्टन को यह रियलाइज़ हो गया था कि पॉलिटिकल साइंस कभी भी वैल्यू फ्री नहीं हो सकता है। कभी भी जो है वह नॉर्म्स
के बिना मोरालिटी के बिना काम नहीं कर सकता है। यानी कि इसमें पीपल जो होते हैं उनकी वैल्यू्यूज होते हैं, नॉर्म्स होते
हैं, उसकी भीेंस होती है। 1969 को अमेरिकन पॉलिटिकल साइंस एसोसिएशन होता है। और इसे डेविड ईस्टन के द्वारा एड्रेस किया जाता
है। और खास बात यह है कि इस एड्रेस में डेविड ईस्टन ने दो इंपॉर्टेंट स्लोगंस दिए थे। और इन दोनों स्लोगंस को आपको अच्छे से
याद रखना है क्योंकि यह पोस्ट बिहेवियरलिज्म के दोनों ही कीवर्ड है। तो पहला स्लोगन था रेलेवेंस। इसका मतलब होता
है हिंदी में प्रासंगिकता। यानी कि कोई भी रिसर्चर जो रिसर्च करता है वो ऐसी होनी चाहिए जो समूचे समाज यानी कि एंटायर
सोसाइटी के लिए रेलेवेंस रखे। रेलेवेंट हो। और दूसरा स्लोगन था एक्शन। इसका मतलब यह है कि रिस्चर जो भी रिसर्च करता है, जो
भी स्टडी करता है, वह इस तरह से इंप्लीमेंट की जाए। यानी कि एक्शन में लाया जाए कि समूचे समाज के लिए बेनिफिशियल
हो, रेलेवेंट हो। 1969 को डेविड ईस्टन ने द न्यू रेवोल्यूशन इन पॉलिटिकल साइंस के नाम से एक एस्स लिखा जो कि द अमेरिकन
पॉलिटिकल साइंस रिव्यू में पब्लिश होता है। इस एस्स में ईस्टर ने पोस्ट बिहेवियरलिज्म की सेवन इंपॉर्टेंट फीचर्स
बताए जिनको हम कॉमनली प्रीडो ऑफ रेलेवेंस कहते हैं। इसको हम हिंदी में कहते हैं प्रासंगिकता का प्रमाण। तो जब हम बात करते
हैं क्रीडो ऑफ रेलेवेंस की तो इसका मतलब यह है कि डेविड ईस्टन कहते हैं कि जब एक रिसर्चर रिसर्च करता है या फिर स्टडी करता
है तो उसे इस बात को प्रमाणित करना होता है कि उसने जो रिसर्च की है वो लोगों के लिए कितना प्रासंगिक है कितना रेलेवेंट
है। एग्जांपल के लिए जैसे कोविड-19 हुआ उसके बाद डॉक्टर्स, प्रोफेसर्स और जो रिस्चरर्स होते हैं उन्होंने रिसर्च की और
वैक्सीन का निर्माण किया। तो उन्हें यह साबित करना होता है, यह प्रमाणित करना होता है कि जो वैक्सीन उन्होंने बनाई,
उसका लोगों के जीवन में क्याेंस है, क्या रेलेवेंस है? तो डेविड ईस्टन ने जो पोस्ट बिहेवियरलिज्म की सेवन फीचर्स बताई उनमें
पहली फीचर है सब्सटेंस ओवर टेक्निक्स। इसका मतलब यह है कि जिस तरह से बिहेवियरलिज्म में टेक्निक्स को
प्रायोरिटी दी जाती थी। अब पोस्ट बिहेवियरलिज्म में टेक्निक्स की जगह जो सब्सटेंस होगा यानी कि जो सारी चीजें
होंगी इंपॉर्टेंट चीजें होंगी जिससे लोगों के लिए फायदा होगा लोगों के लिए जो रेलेवेंट होगी पूरी सोसाइटी के लिए
रेलेवेंट होगी ऐसी रिसर्च करना ऐसी चीजें करना यानी कि इन चीजों की स्टडी करना और इसकी दूसरी फीचर थी चेंज ओरिएंटेड यानी कि
यह बिहेवियरलिज्म की तरह स्टेटोस्कोप नहीं है बल्कि यह चेंज में फोकस करता है। वैसे भी पॉलिटिकल साइंस एक ऐसा विषय है जो कि
डायनामिक है और इसकी अगली फीचर थी रिलेवेंट रिसर्च यानी कि रिलेवेंट रिसर्च की जाएगी रिस्चरर्स के द्वारा और
प्रोफेसर्स के द्वारा ऐसी रिसर्च की जाएगी जो उपयोगी है समाज के लिए प्रासंगिक है रिलेवेंट है और सबसे बड़ी विशेषता इसकी है
वैल्यू लेडन रिसर्च आप सभी को पता है कि बिहेवियरलिज्म में जो वैल्यूस है उनको रिजेक्ट कर दिया गया था लेकिन पोस्ट
बिहेवलिज्म में जो वैल्यूज़ है उसको दोबारा स्थापित किया गया था। तो पोस्ट बिहेवियरलिज्म कहता है कि जब रिसर्च होती
है उसमें वैल्यूज़ को भी जगह दी जानी चाहिए। और इसकी अगली विशेषता है फोकस ऑन क्रिटिकल इंटेलेक्चुअल। यानी कि जो
इंटेलेक्चुअल्स हैं, प्रोफेसर्स हैं, रिस्चरर्स हैं, वे क्रिटिकल रिसर्च करें। ऐसी रिसर्च करें जिससे क्रिटिकल एनालिसिस
हो सके और समाज के लिए फायदेमंद हो सके। और इसकी सिक्स्थ फीचर है एक्शन ओरिएंटेड रिसर्च। यह कहते हैं कि उस रिसर्च का तभी
फायदा है जब जो रिसर्च है उसको जो है इस तरह से इंप्लीमेंट किया जाए कि समूचे समाज के लिए लाभदायक हो। और अगला पॉइंट यानी कि
सातवीं विशेषता है पॉलिटिसाइजेशन ऑफ प्रोफेशन। इसका मतलब यह है कि जो प्रोफेसर्स यूनिवर्सिटीज में होते हैं,
रिस्चरर्स होते हैं, वे पॉलिटिक्स में पार्टिसिपेट करेंगे। और जो मास होते हैं, पीपल होते हैं उनको भी अवेयर करेंगे और जो
ग्रास रूट लेवल है वहां पर जाकर लोगों की प्रॉब्लम्स को समझेंगे। उनके ऊपर रिसर्च करेंगे। तो यह थी डेविड ईस्टन के द्वारा
पोस्ट बिहेवियरलिज्म के ऊपर दी गई सेवन इंपॉर्टेंट फीचर्स। अब हम इस लेक्चर के एंड में जो पोस्ट बिहेवियरलिज्म की ओवरऑल
फीचर्स है उनको हम देख लेते हैं। तो पहली इसकी फीचर है कि यह बिहेवलिज्म में रिफॉर्म्स की बात करता है। शुरू में ही
हमने डिस्कस किया था कि जो पोस्ट बिहेवलिज्म है यह बिहेवियरलिज्म में एक रिफॉर्म्स के रूप में आया था। यानी कि
बिहेवियरलिज्म के अंतर्गत जो कमियां थी जैसे इसने वैल्यूज़ को रिजेक्ट किया था। इसने साइंस और जो रिसर्च है उसको ज्यादा
फोकस किया था। ह्यूमन जो बिहेवियर है उसको रिजेक्ट किया था। इंपरसिज्म को इसने रिजेक्ट किया था। तो इन कमियों को दूर
करने के लिए ही जो पोस्ट बिहेवियरलिज्म है एक रिफॉर्म के रूप में आया था बिहेवियरलिज्म में। और इसकी दूसरी फीचर यह
है कि यह फोकस करता है रीस्टैब्लिशमेंट ऑफ वैल्यूस एंड इंपेरिसिज्म। इसने यह कहा कि जो वैल्यू्यूज है वो पॉलिटिकल साइंस में
बहुत ही जरूरी है। यानी कि पॉलिटिकल साइंस कभी भी वैल्यू फ्री सब्जेक्ट नहीं हो सकता है। और साथ में जो इंपेरिसिज्म है यानी कि
जो इंपेरिकल स्टडी है, अनुभव मूलक जो स्टडी होती है, अध्ययन होता है, उसकी भीेंस होती है पॉलिटिकल साइंस में। और
इसकी तीसरी विशेषता है कि यह फोकस करता है रेलेवेंस एंड एक्शन में। रेलेवेंस का मतलब यह है कि ऐसी रिसर्च होनी चाहिए जो समुचित
समाज के लिए उपयोगी है। रेलेवेंट है और एक्शन का मतलब यह है कि जो रेलेवेंट रिसर्च है उसको इस तरह से इंप्लीमेंट किया
जाना चाहिए या उसके ऊपर इस तरह का एक्शन लिया जाना चाहिए जो पूरे समाज के लिए उपयोगी हो और इसकी अगली विशेषता है कि यह
फोकस करता है इंस्टीटशंस में जैसे एग्जीक्यूटिव, जुडिशरी, लेजिसलेशन इस तरह के इंस्टीटशंस पे ये फोकस करता है, स्टडी
करता है। इसके अलावा कॉन्स्टिट्यूशन है, पॉलिटिकल पार्टीज़ है, प्रेशर ग्रुप्स है, लोगों का जो एटीट्यूड्स है, सेंटीमेंट्स
है, इन सभी के ऊपर भी यह फ़ोकस करता है। और इसकी अगली विशेषता है कि ये जो ऑल फैक्ट्स होते हैं और जो पॉलिटिकल साइंस की यानी कि
पॉलिटिक्स की रियलिटी होती है, उसकी भी स्टडी करता है। यानी कि पॉलिटिकल साइंस में जो कुछ होता है, चाहे लोगों की
पार्टिसिपेशन हो, लोगों का जो आइडिया हो, नॉर्म्स हो, वैल्यूज़ हो, उन सभी चीजों की स्टडी करता है। यानी ग्राउंड लेवल पर
स्टडी करता है। और इसकी अगली विशेषता है कि यह सोशल प्रॉब्लम्स और जो वैल्यू ओरिएंटेड स्टडी है उसको यह फोकस करता है।
लोगों के बीच जाकर रिसर्च होती है और जो सोशल प्रॉब्लम्स हैं उनको उठाया जाता है और जो वैल्यूस है उनको भी जो है स्टडी में
यानी कि रिसर्च में जगह दी जाती है। पोस्ट बिहेवियरलिज्म की अगली विशेषता है एम्फेसिस ऑन चेंजेस। यानी कि जो बदलाव
होते हैं, जो पॉलिटिकल साइंस में एक डायनामिज़्म होता है, उसके ऊपर यह फ़ोकस करता है। यह बिहेवियरलिज़्म की तरह जो
स्टेटस को है, उसके ऊपर फ़ोकस नहीं करता है। वैसे भी पॉलिटिकल साइंस एक डायनामिक विषय है, डायनामिक सब्जेक्ट है। जैसे अगर
हम आज देखेंगे तो आज की जो हमारी लाइफ है, वह 100 साल पुरानी जो लाइफ है, उसमें जमीन आसमान का फर्क है। एग्ज़ांपल के लिए जैसे
पहले हम स्टडी करते थे बुक से यानी कि ऑफ़लाइन मोड पे जो स्टडी होती थी उसको ज़्यादा फ़ोकस करते थे। लेकिन आज के जमाने
में क्योंकि बदलाव आ गया है। साइबर इरा का दौर है। तो आज हम स्टडी जो करते हैं वो करते हैं ऑनलाइन मोबाइल, लैपटॉप, इंटरनेट
के सहारे हम स्टडी करते हैं। तो इसको हम चेंज कहते हैं। बदलाव कहते हैं। यानी कि समय के अनुसार परिवर्तन करना। और इसकी
अगली विशेषता है कि फोकस ऑन व्हाट शुड बी यानी कि क्या होना चाहिए इस पर यह फोकस करता है। इसकी जगह कि क्या है? यानी कि
जैसे मान लीजिए कोई एक रिस्चर है सोशल स्टडी करता है। समाज में स्टडी करता है। मान लीजिए जेंडर इक्वलिटी पे स्टडी होती
है और स्टडी में यह पाया जाता है कि वुमेन के ऊपर अत्याचार होते हैं। वायलेंस होती है। तो जो वायलेंस होते हैं उसको किस तरह
से दूर किया जाना चाहिए। तो उसमें किया जाता है यानी कि क्वेश्चन किया जाता है कि क्या होना चाहिए जिससे जेंडर इक्वलिटी है
उसको इंप्रूव किया जा सके और इसका अगला जो पॉइंट है यानी कि फीचर है वो है कि पॉलिटिकल साइंस एक एक्शन साइंस है यानी कि
इसमें जो भी रिसर्च की जाती है उसको एक्शन में लाया जाता है। ऐसा नहीं है कि जो रिसर्च हुई है वह सिर्फ एक यूनिवर्सिटी या
एक लैब तक ही सीमित हो। वो समूचे समाज में इंप्लीमेंट की जानी चाहिए जिससे उसकी उपयोगिता को सिद्ध किया जा सके। और इसकी
अगली यानी कि लास्ट फीचर है कि जो इंटेलेक्चुअल्स होते हैं उनका इनवॉल्वमेंट होना चाहिए पॉलिटिकल साइंस में, पॉलिटिक्स
में, स्टडी में और साथ में जो प्रैक्टिकल जो पॉलिटिक्स है उसमें भी इनवॉल्वमेंट होना चाहिए। लोगों को अवेयर करें और
ग्राउंड लेवल पे यानी कि ग्रास रूट लेवल पे जाकर रिसर्च करें। लोगों को अवेयर करें। सबसे पहले हम डेविड ईस्टन के बारे
में जान लेते हैं। डेविड ईस्टन कनाडियन बोर्न अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं और इन्होंने पॉलिटिकल साइंस में पहली बार
सिस्टम एप्रोच को प्रतिपादित किया था और 1950 के दशक में शुरू हुआ बिहेवियरलिस्ट रेवोल्यूशन और 1970 के दशक में शुरू हुआ
पोस्ट बिहेवियरलिस्ट रेवोल्यूशन के ये अग्रत रहे हैं। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग्स रही है। जैसे द पॉलिटिकल सिस्टम
1953 अ फ्रेमवर्क फॉर पॉलिटिकल एनालिसिस 1956 सिस्टम एनालिसिस ऑफ पॉलिटिकल लाइफ 1965 द एनालिसिस ऑफ पॉलिटिकल स्ट्रक्चर
1990 और इन सभी राइटिंग्स में इन्होंने सिस्टम एप्रोच को व्याख्या किया है। सिस्टम एप्रोच का वर्णन या फिर जिक्र इन
सभी रचनाओं में किया है। लेकिन इनकी अक्षय कृति द पॉलिटिकल सिस्टम जो कि उन्होंने 1953 में लिखी रही है। 1967 में डेविड
ईस्टन का एक इंपॉर्टेंट एस्स पब्लिश होता है जिसका नाम है द करंट मीनिंग ऑफ़ बिहेवियरलिज्म और इस एस्स की खास बात यह
रही है कि इस एस्स में इन्होंने एट इंटेलेक्चुअल फाउंडेशंस स्टोंस की बात की है बिहेवियरलिज्म की जिसमें प्रमुख है
पहला है रेगुलरिटीज दूसरा है वेरिफिकेशन तीसरा है टेक्निक्स चौथा है क्वांटिफिकेशन पांचवा है वैल्यू फ्री स्टडी छठा है
सिस्टमेटाइजेशन सातवां है प्योर साइंस और आठवां है इंटीग्रेशन मैं आपको एक और बात बता देना चाहता हूं कि अगर आपने अभी तक
हमारी बिहेवियरलिज्म पर बनाई गई वीडियो को नहीं देखा है तो आप उसको देख लें क्योंकि मैंने ऑलरेडी बिहेवलिज्म पर वीडियो बनाई
है जिसमें मैंने डेविड ईस्टन के द्वारा दिए गए एट इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन स्टोंस की भी बात की है। तो आप डिटेल में उस
वीडियो में इन सभी चीजों को समझ सकते हैं। इससे पहले कि हम डेविड ईस्टन की सिस्टम एप्रोच को अच्छे से समझे या फिर पढ़ें। हम
एक-एक करके पॉलिटिकल सिस्टम और एप्रोच जैसे शब्दों को भी समझ लेते हैं। पॉलिटिकल पॉलिटिकल मींस रिलेटिंग टू द वे पावर इज
अचीव्ड एंड यूज्ड इन अ कंट्री और सोसाइटी। जब हम इस बात का अध्ययन करते हैं कि एक समाज में या फिर देश में शक्ति किस तरह से
प्राप्त की जाती है, कौन प्राप्त करता है और देश में या फिर सोसाइटी में समाज में किस तरह से इसे प्रयोग में लाया जाता है?
तो उसे हम सिंपल भाषा में पॉलिटिकल कहते हैं। यानी कि पॉलिटिकल शक्ति से जुड़ी हुई अवधारणा है। दूसरा हम यह भी कह सकते हैं
कि जो चीज राजनीति से जुड़ी है वो अपने आप में पॉलिटिकल होती है। सिस्टम की अगर हम बात करें सिस्टम मीन्स अ सेट ऑफ एलिमेंट्स
और पार्ट्स फंक्शनल और मटेरियल और बोथ व्हिच आर इंटररिलेटेड, इंटरडिपेंडेंट एंड इंटरेक्टेड। तो सिस्टम की अगर हम बात करें
तो ये सेट होता है कुछ एलिमेंट्स का, कुछ पार्ट्स का। और ये जो पार्ट्स होते हैं, एलिमेंट्स होते हैं, ये आपस में
इंटररिलेटेड होते हैं, इंटरडिपेंडेंट होते हैं और इंटरेक्टेड होते हैं। उदाहरण के लिए अगर हम बॉडी का ही उदाहरण ले लेते
हैं, तो बॉडी क्या है? एक सिस्टम है जिसमें अलग-अलग एलिमेंट्स होते हैं, पार्ट्स होते हैं और इन्हीं एलिमेंट्स और
पार्ट्स से बॉडी बनी होती है और ये जितने भी ऑर्गन है या फिर एलिमेंट्स है या पार्ट्स है ये आपस में इंटररिलेटेड है,
इंटरडिपेंडेंट है और इंटरेक्टेड है। एप्रोच की अगर हम बात करें, एप्रोच इज अ मेथड ऑफ डूइंग समथिंग ऑफ डीलिंग विद अ
प्रॉब्लम। हम कुछ काम कर रहे हैं और उस काम में कुछ समस्या आ जाती है तो उस समस्या से निपटने के लिए जो हम विधि
अपनाते हैं वह एक दृष्टिकोण कहलाता है या फिर एप्रोच कहलाता है। गब्रियल आलमंड कंपेरेटिव पॉलिटिक्स के एक महान विद्वान
रहे हैं। इन्होंने भी सिस्टम एप्रोच संबंधी एक महत्वपूर्ण परिभाषा को दिया है। ये कहते हैं अ सिस्टम एंप्ल्लाइस द
इंटरडिपेंडेंस ऑफ पार्ट्स एंड अ बाउंड्री ऑफ सम काइंड बिटवीन इट एंड इट्स एनवायरमेंट। तो यह कहते हैं कि सिस्टम में
जो इसके पार्ट्स होते हैं यानी कि अंग होते हैं उनकी अंतर निर्भरता होती है और सिस्टम और इसका जो एनवायरनमेंट होता है
उसमें कुछ या कई प्रकार की सीमाएं होती है। इस प्रकार से गैब्रियल आलमंड के द्वारा सिस्टम की दी गई परिभाषाओं के आधार
पर हम इसकी तीन विशेषताएं कह सकते हैं। पहला है वेरियस पार्ट्स। दूसरा है इंटरडिपेंडेंस ऑफ पार्ट्स बाउंड्रीज। तो
अगर हम उदाहरण के लिए एक बायोलॉजी का ही उदाहरण लें यानी कि बॉडी को एक सिस्टम माने तो बॉडी के एक वेरियस पार्ट्स होते
हैं। अंग होते हैं और इन्हीं अंगों की वजह से बॉडी एक सिस्टम के रूप में काम करती है और जितने भी हमारे अंग हैं चाहे वो आइज
हो, इयर्स हो कोई भी अंग हो इनकी आपस में अंतर निर्भरता होती है। वहीं कुछ सीमाएं भी होती है। जैसे आइज का काम देखना होता
है। नाक का काम सघना होता है। ऑक्सीजन लेना होता है। इयर्स का काम सुनना होता है। तो इनकी सीमाएं हैं। यानी कि
अपने-अपने काम हैं। अपनी-अपनी सीमाएं हैं। उदाहरण के लिए दूसरी तरफ अगर हम सिस्टम को पॉलिटिकल साइंस से जोड़ के देखें तो
गवर्नमेंट की जब हम बात करते हैं। गवर्नमेंट एक प्रकार का सिस्टम है जिसके कुछ वेरियस पार्ट्स हैं यानी कि अंग हैं।
जैसे कार्यपालिका, विधानपालिका, न्यायपालिका। और इन सभी अंगों की आपस में अंतर निर्भरता होती है। यानी कि
न्यायपालिका के बिना कार्यपालिका और विधानपालिका भी काम नहीं कर सकती है। और उसी तरह कार्यपालिका के बिना न्यायपालिका
और विधानपालिका भी काम नहीं कर सकती है। यानी कि ये सारे ऑर्गन या फिर पार्ट्स एक दूसरे के ऊपर जुड़े हुए हैं। उसी तरह से
इन अंगों की कुछ सीमाएं होती है। बाउंड्रीज होती है। उदाहरण के लिए न्यायपालिका अपने क्षेत्र में काम कर सकती
हैं। न्याय से संबंधित काम कर सकती है। विधानपालिका कानूनों का निर्माण कर सकती है और कार्यपालिका उन कानूनों को
क्रियान्वित कर सकती है। अब हम सिस्टम एप्रोच की कुछ हिस्टोरिकल ओवरव्यू को देख लेते हैं। सिस्टम एनालिसिस फर्स्टली यूज्ड
बाय द ऑस्ट्रेलियन कनेडियन बायोलॉजिस्ट कार्ल लुगिकबन व्टन फाई इन बायोलॉजी। तो सबसे पहले
सिस्टम अप्रोच यानी कि व्यवस्था उपागम को बायोलॉजी में सबसे पहले ऑस्ट्रेलियन कनाडियन बायोलॉजिस्ट कार्ल लुबिक बॉन
बटलनफाई ने यूज़ किया था। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि टेलकॉट पार्संस ने भी इसे सोशियोलॉजी में यूज़ किया था। और फिर बाद
में डेविड ईस्टन ऐसे पहले विचारक रहे हैं और प्रमुख विचारक रहे हैं जो अमेरिकन पॉलिटिकल थिंकर रहे हैं। जिन्होंने
पॉलिटिकल साइंस में पॉलिटिक्स की स्टडी करने के लिए सिस्टम एप्रोच को प्रतिपादित किया था। दूसरी बात यह है कि ईस्टर्न का
जो मॉडल है सिस्टम एप्रोच का यह संबंधित है जो विकसित देश हैं उनकी स्टडी से संबंधित हैं। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है
कि डेविड ईस्टन ने सिस्टम एप्रोच का प्रयोग सबसे पहले चाइना में जो पॉलिटिकल बिहेवियर है उसका अध्ययन करने के लिए किया
था। यह बात बहुत ही इंपॉर्टेंट है। नेट में कई बार इसको पूछा जा चुका है। तो, आपने इस बात का ध्यान रखना। और दूसरी
इंपॉर्टेंट बात यह है कि डेविड ईस्टन कहते हैं कि सिस्टम अप्रोच इज आल्सो द सिस्टम लाइक अदर अप्रोचेस। तो डेविडस्टन कहते हैं
कि जो सिस्टम अप्रोच है वह भी अपने आप में एक सिस्टम है। दूसरी दृष्टिकोणों की तरह या फिर दूसरे उपागमों या एप्रोचेस की तरह
है। डेविड ईस्टन ने अपने प्रमुख वर्क द पॉलिटिकल सिस्टम 1953 में सिस्टम एप्रोच
को प्रतिपादित सबसे पहले किया था। ईस्टर्न आर्ग्यू दैट एनी पर्टिकुलर सिस्टम हैस टू बी सम सब सिस्टम्स एंड दी आर
इंटरडिपेंडेंट एंड दी आर आल्सो हैव बाउंड्रीज। तो डेविड ईस्टन कहते हैं कि जो सिस्टम है सिस्टम में कुछ सब सिस्टम होते
हैं यानी कि उपप्र प्रणालियां होती है और ये सारी जितनी भी उपप्र प्रणालियां हैं ये एक दूसरे के ऊपर जुड़ी हुई है और इनकी कुछ
सीमाएं भी है बाउंड्रीज भी है। उदाहरण इन्होंने दिया है कि जैसे पॉलिटिकल सिस्टम और जो इकोनॉमिक सिस्टम है वो सोशल सिस्टम
का ही पार्ट है यानी कि उपप्रणालियां हैं। इन्होंने कहा कि पॉलिटिकल सिस्टम इज अ प्रोसेस टू चेंज इनपुट्स इनू आउटपुट्स। और
यह बहुत ही महत्वपूर्ण शब्दावली है या फिर परिभाषा है जिसमें डेविड ईस्टन कहते हैं कि पॉलिटिकल जो सिस्टम है वह अपने आप में
एक प्रक्रिया है यानी कि प्रोसेस है जिसमें इनपुट को हम आउटपुट में बदलते हैं। यानी कि आगत को हम निर्गत में बदलते हैं।
पॉलिटिकल सिस्टम डज़ कंटीन्यूसली वर्क। यह कहते हैं कि जो पॉलिटिकल सिस्टम होता है वह हमेशा से निरंतर लगातार काम करता रहता
है। दैट इज व्हाई ईस्टर्न सिस्टम एप्रोच इज आल्सो नोन एज फ्लो मॉडल ऑफ पॉलिटिकल सिस्टम। पॉइंट शुड बी नोटेड। ये बहुत ही
इंपॉर्टेंट पॉइंट है। ये कई बार नेट के एग्जाम में भी पूछा जा चुका है और आगे भी पॉसिबिलिटी है। क्योंकि डेविड ईस्टन का जो
सिस्टम अप्रोच है इस मॉडल को फ्लो मॉडल ऑफ पॉलिटिकल सिस्टम भी कहा जाता है। क्योंकि डेविड ईस्टन खुद कह रहे हैं कि पॉलिटिकल
सिस्टम कंटीन्यूअसली वर्क करता है। यानी कि पहले इनपुट होता है। लोगों की डिमांड होती है। इनपुट होता है, आउटपुट होता है।
फिर उसका फीडबैक जाता है। फिर एक लूप बन जाता है। इनपुट आउटपुट फिर डिमांड होती है। फिर पॉलिसीज बनती है, डिसीजंस बनते
हैं। फिर लोग उसे सपोर्ट ना करके इनपुट भेजते हैं। तो डेविड डिस्टन कहते हैं कि यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। यानी
कि पॉलिटिकल सिस्टम एक उस निरंतर बहती नदी की तरह जो हमेशा से मंद गति से बहती है। इसीलिए डेविड ईस्टन का जो सिस्टम अप्रोच
का मॉडल है उसको फ्लो मॉडल ऑफ पॉलिटिकल सिस्टम के नाम से भी जाना जाता है। डेविडस्टन की अब एक महत्वपूर्ण परिभाषा को
हम समझ लेते हैं और इस परिभाषा को आप ध्यान से समझिए। एक-एक शब्द को आराम से समझिए क्योंकि अगर आप यह समझ जाते हैं तो
आप सिस्टम एप्रोच को अच्छे से समझ पाएंगे। डेविड ईस्टन कहते हैं पॉलिटिकल सिस्टम इज दैट सिस्टम ऑफ इंटरेक्शन इन एनी सोसाइटी
थ्रू व्हिच बाइंडिंग एंड अथॉरिटेटिव एलोकेशन ऑफ वैल्यूज़ आर मेड एंड इंप्लीमेंट।
तो डेविड ईस्टन कहते हैं कि पॉलिटिकल सिस्टम एक ऐसा सिस्टम है जिसमें सोसाइटी में इंटरेक्शन होता है और जिसके द्वारा
बाइंडिंग एंड अथॉरिटेटिव एलोकेशन ऑफ वैल्यूस आर मेड एंड इंप्लीमेंटेड और यह कहते हैं कि पॉलिटिकल सिस्टम के द्वारा ही
समाज में बाइंडिंग का मतलब है बाध्यकारी एथरेटेटिव एलोकेशन ऑफ वैल्यू्यूज यानी कि जो मूल्य होते हैं पॉलिटिकल साइंस में जो
मूल्य होते हैं सांस्कृतिक सामाजिक राजनीतिक मूल्य हैं उनका का बंटवारा होता है और यह जो बंटवारा होता है यह बाध्यकारी
होता है और बाध्यकारी क्यों है क्योंकि अपने आप में यह अथॉरिटेटिव है यानी कि सत्ता के द्वारा बांटा जाएगा जो कि मानना
ही पड़ेगा लोगों को इसीलिए बाइंडिंग है यानी कि बाध्यकारी है और यह अथॉरिटेटिव एलोकेशन ऑफ वैल्यूस होगा यानी कि मूल्यों
को लोगों को मानना ही पड़ेगा और ऐसे मूल्यों को समाज में या सोसाइटी में पॉलिटिकल सिस्टम के द्वारा ही बनाए जाएंगे
उसे इंप्ली इंप्लीमेंट भी किया जाएगा। अब हम डेविड ईस्टन की सिस्टम अप्रोच को अच्छे से समझने की कोशिश करते हैं। लेकिन इससे
पहले कि मैं हर चीज को एक-एक करके आपको बताऊं। मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि आप इस डायग्राम को नोटबुक में अच्छे से नोट
कर लीजिए। बना लीजिए या फिर आप स्क्रीनशॉट लेकर बाद में भी इसे बना सकते हैं। क्योंकि इसी से आपको समझने में अच्छे से
मदद मिलेगी डेविड ईस्टन के सिस्टम एप्रोच को। तो अब हम एक-एक करके इसको समझने की शुरुआत करते हैं। सबसे पहले बात कर लेते
हैं इनपुट की। इनपुट की अगर हम बात करें तो इनपुट बेसिकली लोगों की डिमांड होती है जो राजनीतिक प्रणाली से करते हैं और यह
इनपुट लोगों की ही डिमांड होती है। इनपुट्स आर सच फैक्ट्स बाय व्हिच पॉलिटिकल सिस्टम कैन गेन पावर टू रन गवर्नेंस इन
एनी सोसाइटी। ईस्टर्न कहते हैं कि इनपुट्स वे फैक्ट होते हैं, वे तथ्य होते हैं जिससे पॉलिटिकल सिस्टम को शक्ति मिलती है
किसी भी सोसाइटी में शासन को चलाने के लिए। इनपुट्स के बारे में डेविड ईस्टन कहते हैं कि निवेश वह मांगे होती है जो
लोगों के समूह के द्वारा राजनीतिक प्रणाली से की जाती है। लोगों की मांगों के आधार पर राजनीतिक प्रणाली को कुछ कार्य करने
पड़ते हैं। अतः राजनीतिक कार्यों के संचालन के लिए मांगों का होना अति आवश्यक है।
डेविड ईस्टर ने चार प्रकार के इनपुट्स की बात की है। पहला है डिमांड्स फॉर एलोकेशन ऑफ गुड्स एंड सर्विसेस। इसमें यह बात करते
हैं कि लोग सरकार से या फिर पॉलिटिकल सिस्टम से ऐसी मांगे कर सकते हैं जो वेलफेयर से संबंधित हो, सेवाओं से संबंधित
हो। और दूसरी मांग है डिमांड्स फॉर द रेगुलेशन ऑफ बिहेवियर। यानी कि समाज में या फिर राज्य में लोगों का व्यवहार कैसा
हो, कैसे कानून हो, कैसे लॉज़ हो, लोगों के बिहेवियर को किस तरह से विनियमित किया जाए? इसकी मांग भी लोग कर सकते हैं। अगला
है डिमांड्स फॉर पार्टिसिपेशन इन द पॉलिटिकल सिस्टम। अर्थात अगर लोग राजनीतिक प्रणाली में बढ़-चढ़कर भागीदारी करना
चाहते हैं, चुनाव लड़ना चाहते हैं, मत देना चाहते हैं या इसके अलावा सरकारी नौकरी प्राप्त करना चाहते हैं तो उसमें
पार्टिसिपेशन की मांग भी लोग कर सकते हैं। अगला है डिमांड्स फॉर कम्युनिकेशन एंड इंफॉर्मेशन। और डेविड ईस्टन यह भी कहते
हैं कि लोग कम्युनिकेशन और इंफॉर्मेशन से संबंधित मांग भी राजनीतिक व्यवस्था से कर सकते हैं। क्योंकि कम्युनिकेशन और
इंफॉर्मेशन आज के जमाने में बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है और इसी को देखते हुए 2005 में भारत में भी राइट टू
इंफॉर्मेशन एक्ट पारित किया गया था। सपोर्ट इनपुट के बारे में डेविड ईस्टन कहते हैं कि निवेश समर्थन वे तथ्य हैं
जिनके द्वारा राजनीतिक प्रणाली को अपने कार्यों की पूर्ति के लिए बल या क्षमता प्राप्त होती है। कोई भी मशीन केवल कच्चे
माल के आश्रय से नहीं चल सकती है। अपितु उसको चलाने के लिए विद्युत रूपी शक्ति या किसी अन्य प्रकार की शक्ति का होना आवश्यक
है। और इसी शक्ति को डेविड ईस्टन ने सपोर्ट्स इनपुट की संज्ञा दी है। डेविड ईस्टन ने चार प्रकार के सपोर्ट्स की बात
की है पॉलिटिकल एप्रोच में और इसमें पहला है मटेरियल सपोर्ट। मटेरियल सपोर्ट का मतलब है कि जब लोग सरकार के द्वारा लगाए
गए टैक्स को सपोर्ट करते हैं यानी कि अच्छे तरीके से सरकार को टैक्स देते हैं, कर अदा करते हैं तो उसको मटेरियल सपोर्ट
कहते हैं। दूसरा है लीगल सपोर्ट। लीगल सपोर्ट में वही चीजें आती है जब सरकार के द्वारा या फिर पॉलिटिकल सिस्टम के द्वारा
बनाए गए लॉ है ऑर्डर है जब उसकी पालना लोगों के द्वारा बहुत अच्छे तरीके से की जाती है ईमानदारी से की जाती है तो उसे
लीगल सपोर्ट कहा जाता है और अगला है पार्टिसिपेटरी सपोर्ट पार्टिसिपेटरी सपोर्ट में जब लोग गवर्नमेंट को सपोर्ट
करते हैं सरकार की पॉलिसीज को सरकार के द्वारा दिए गए डिसीजन को अच्छा मानते हैं और सरकार के साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम
करते हैं तो उसको पार्टिसिपेटरी सपोर्ट कहा जाता है। और चौथा है सिंबॉलिक सपोर्ट। सिंबॉलिक सपोर्ट में वे तथ्य आते हैं जब
लोग सरकार की प्रशंसा करते हैं। सरकार के द्वारा कोई भी पॉलिसी बनाई जाती है। उसको काफी सराहते हैं। लोग सपोर्ट करते हैं। और
दूसरी तरफ देश का सम्मान करते हैं। देश का गुणगान करते हैं। चाहे Facebook हो, WhatsApp हो, Twitter हो उस पे अच्छे
ट्वीट करते हैं। देश के हित में ट्वीट करते हैं। राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत का सम्मान करते हैं तो उसको हम सिंबॉलिक
सपोर्ट कहते हैं। गेटकीपर्स। तो आपने बड़े शहरों में देखा होगा या फिर बड़े-बड़े घरों में देखा होगा कि घर के बाहर गेट में
गेटकीपर्स होते हैं या फिर सिक्योरिटी गार्ड होते हैं। तो कभी आपने ऑब्जर्व किया होगा कि उनका काम क्या होता है। उनका काम
होता है ऐसे लोगों को रोकना जिनका उस घर में रहने वाले से कोई मतलब नहीं है। जो काम के नहीं है। जो अनावश्यक लोग हैं उनको
रोकना। जिनके घर में अंदर जाने से अव्यवस्था फैल सकती है। तो उसी तरह से पॉलिटिकल सिस्टम में भी गेटकीपर्स का काम
होता है ऐसी मांगों को रोकना जो अनावश्यक है जो गवर्नमेंट को या फिर पॉलिटिकल सिस्टम को ओवर स्ट्रेस दे सकती है। ऐसी
मांगों को रोकना। गेट कीपिंग प्रिवेंट्स अनवांटेड डिमांड्स टू एंटर इनू पॉलिटिकल सिस्टम। तो डेविड
ईस्टन कहते हैं कि जो गेट कीपिंग की अवधारणा है वह ऐसी मांगों को पॉलिटिकल सिस्टम में जाने से रोकती है जो काम की
नहीं होती है। जिनका पॉलिटिकल सिस्टम में कोई ज्यादा मतलब नहीं होता है। यानी कि अनैच्छिक मांगों को गेट कीपिंग पॉलिटिकल
सिस्टम में जाने से रोकती है। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि गेट कीपिंग प्रिवेंट्स पॉलिटिकल सिस्टम फ्रॉम
ओवरस्ट्रेस और पॉलिटिकल सिस्टम में ओवर स्ट्रेस ना हो। यानी कि अत्यधिक मांगे मौजूद ना हो पॉलिटिकल सिस्टम में। यह
चीजें भी रोकती है गेट कीपिंग। यानी कि ओवरस्ट्रेस से पॉलिटिकल सिस्टम को रोकती है। इसीलिए हम कह सकते हैं कि गेट कीपिंग
इज बेसिकली अ काइंड ऑफ रेगुलेटरी मैकेनिज्म दैट सिक्योर्स एंटायर पॉलिटिकल सिस्टम। तो बेसिकली यह एक रेगुलेटरी
मैकेनिज्म होता है जो पूरा जो पॉलिटिकल सिस्टम है उसको सुरक्षित रखती है। डेविडस्टन ने पॉलिटिकल सिस्टम में तीन
प्रकार की गेट कीपिंग की बात की है। जिसमें पहला है स्ट्रक्चरल। इसमें आती है पॉलिटिकल पार्टीज और प्रेशर ग्रुप्स।
दूसरा है कल्चरल। कल्चरल में आता है द बिलीफ एंड ओरिएंटेशन ऑफ द पीपल। यानी कि लोग किस तरह से सोचते हैं? लोग की मान्यता
क्या होती है? और तीसरा है कम्युनिकेशन यानी कि गवर्नमेंट टूल टू कन्व देयर मैसेजेस। यानी कि जब कोई सरकार या
पॉलिटिकल सिस्टम नीतियां बनाती है, पॉलिसीज बनाती है, कुछ डिसीजंस देती है तो उनको बयान करने के लिए, उनको बताने के लिए
सरकार क्या यंत्र या फिर क्या साधन प्रयोग में लाती है, उसको हम कम्युनिकेशन कहते हैं।
मोस्ट इंपॉर्टेंट पॉइंट यहां पर यह है कि डेविड ईस्टन ने गवर्नमेंट को ब्लैक बॉक्स कहा है। यह एग्जाम में भी कई बार पूछा जा
चुका है। लेकिन सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि क्यों डेविड ईस्टन ने गवर्नमेंट को ब्लैक बॉक्स की संज्ञा दी है। तो ऐसा
इसलिए है क्योंकि डेविड ईस्टन कहते हैं कि जब लोग सरकार से या फिर पॉलिटिकल सिस्टम से या गवर्नमेंट से डिमांड करते हैं तो आम
जनता को इस बात का पता नहीं होता है कि गवर्नमेंट कौन सा डिसीजन देगी, कौन सी पॉलिसीज बनाएगी। यानी कि वह एक ब्लैक
बॉक्स की तरह है। जिसके अंदर क्या है यह कोई भी नहीं जानता है। इसीलिए डेविड ईस्टन ने गवर्नमेंट को ब्लैक बॉक्स की संज्ञा दी
है। अकॉर्डिंग टू डेविड ईस्टन आउटपुट्स आर कलेक्शन ऑफ सम डिसीजंस और पॉलिसीज दैट इज मेड बाय पॉलिटिकल सिस्टम टू गिव रिस्पांस
टू द पीपल डिमांड्स। तो डेविड ईस्टन कहते हैं कि आउटपुट्स ऐसे तथ्य होते हैं या फिर कुछ निर्णय और नीतियों का समूह होता है।
जो कि पॉलिटिकल सिस्टम के द्वारा लोगों की जो डिमांड है उसको रिस्पांस देने के लिए उसको जवाब देने के लिए बनाई जाती है। तो
ऐसे में यह आउटपुट्स कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि ईस्टर्न कहते हैं कि निकास हुए निर्णय
होते हैं जो निवेश मांगों को सामने रखकर राजनीतिक प्रणाली द्वारा किए जाते हैं। जब राजनीतिक प्रणाली से कुछ मांगे की जाती है
तो उन मांगों पर वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए यदि किसी देश में यदि मुद्रा का अवमूल्यन होता है तो उस देश
की राजनीतिक प्रणाली को लोगों के अथवा मजदूरों के वेतन में कुछ परिवर्तन करना पड़ेगा। जितने भी निर्णय राजनीतिक प्रणाली
द्वारा लोगों की निवेश मांगों को सम्मुख रखकर किए जाते हैं तो उसे ईस्ट ने निकास की संज्ञा दी है। यहां बात यह भी
उल्लेखनीय है कि निकास निवेशों को भी जन्म दे सकती है। यदि लोग राजनीतिक प्रणाली के कार्यों से संतुष्ट ना हो तो वे पुनः
निवेश की मांग कर सकते हैं। तो इस तरह से आप देख सकते हैं। इमेज में भी आप देख सकते हैं। लोग हैं। तो लोग राजनीतिक प्रणाली से
किसी भी चीज या किसी भी मुद्दे को लेकर मांग करते हैं तो ऐसी स्थिति में जब उस मुद्दे पर सरकार के द्वारा या राजनीतिक
प्रणाली के द्वारा डिसीजन दिए जाते हैं, निर्णय दिए जाते हैं या फिर पॉलिसीज बनाई जाती है तो उसको ही हम सामूहिक रूप में
आउटपुट्स कहते हैं। फीडबैक एश्यर्स द रिस्पांस ऑफ द पीपल। यानी कि फीडबैक एक ऐसी प्रणाली है जो लोगों का जो रिस्पांस
होता है, लोगों की जो प्रतिक्रिया होती है उसको यह सुनिश्चित करता है। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि फीडबैक आल्सो
एनश्यर्स दैट इनपुट एंड आउटपुट्स कंटीन्यूअसली ऑपरेट्स। और फीडबैक यह भी सुनिश्चित करता है कि जो इनपुट है या फिर
आउटपुट है क्या वो अच्छी तरीके से लगातार चल रहे हैं? और रिस्पांस ऑफ द पीपल टुवर्ड्स आउटपुट इज नोन एज फीडबैक। तो
लोगों का जो रिस्पांस होता है आउटपुट के प्रति उसे हम फीडबैक कहते हैं। फीडबैक एश्यर्स दैट कंटीन्यूअस फंक्शनिंग ऑफ द
सिस्टम। यानी कि किस तरह से सिस्टम का जो वर्क है वह लगातार चल रहा है उसी को सुनिश्चित करता है फीडबैक। एबीडस्टन यह भी
कहते हैं कि फीडबैक की जो व्यवस्था है वह प्रत्येक राजनीतिक प्रणाली में होनी चाहिए। क्योंकि इसी माध्यम से लोगों की
मांगे राजनीतिक प्रणाली तक पहुंचती है और राजनीतिक प्रणाली के निर्णय लोगों तक पहुंचते हैं। डेविड ईस्टर ने एनवायरमेंट
को दो भागों में बांटा है। पहला है एक्स्ट्रा सोसाइटल यानी कि आउट ऑफ द कंट्री। एक्स्ट्रा सोसाइटल वातावरण का
अर्थ उस वातावरण से है जो अंतरराष्ट्रीय संगठनों या अन्य देशों की राजनीतिक प्रणाली की प्रतिक्रियाओं के कारण अवश्य
ही पड़ता है। यानी कि मान लीजिए भारत अगर कोई पॉलिसी बना रही है तो दूसरे जो देश हैं यानी कि भारत के अलावा जो दूसरे देश
हैं उनका क्या प्रभाव पड़ता है भारत की उस नीति पर उस पॉलिसी पर उसे हम एक्स्ट्रा सोसाइटल एनवायरनमेंट में रखते हैं। और
दूसरा है इंट्रास सोसाइटल यानी कि भारत सरकार अगर कोई पॉलिसी बनाते हैं तो देश के अंदर जो लोग हैं उनके द्वारा उस पॉलिसी पर
क्या प्रभाव पड़ता है? लोग उसे किस तरह से एक्सेप्ट करते हैं या फिर डेविड ईस्टन के शब्दों में उसे किस तरह से सपोर्ट करते
हैं। तो हम यह कह सकते हैं कि इंट्रासोसाइटल वह वातावरण होता है जिसमें समाज में कार्य
कर रही अन्य प्रणालियों का प्रभाव मुख्य प्रणाली पर पड़ता है। अब हम पॉलिटिकल सोशलाइजेशन के की फिगर को देख लेते हैं।
तो इनमें पहला नाम आता है हरबर्ट हन का। यह अमेरिकन सोशियोलॉजिस्ट रहे हैं। और दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने
पॉलिटिकल सोशलाइजेशन शब्दावली को 1959 को कॉइन किया था। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क रहे हैं। जिनमें पहला वर्क आता है
पॉलिटिकल सोशलाइजेशन अ स्टडी इन द साइकोलॉजी ऑफ पॉलिटिकल बिहेवियर। अगले थिंकर का नाम आता है डेविड ईस्टन। तो
डेविड ईस्टन कनाडियन बोर्न अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं और इन्होंने कंपैरेटिव पॉलिटिक्स में सिस्टम एप्रोच
बिहेवियरल एप्रोच और पोस्ट बिहेवल थ्योरी को प्रोपाउंड किया था। खास बात यह है कि इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जो
आपको याद रखने हैं। तो इनका पहला वर्क आता है द पॉलिटिकल सिस्टम। दूसरा आता है एन एप्रोच टू द एनालिसिस ऑफ पॉलिटिकल
सिस्टम्स। तीसरा आता है एट सिटी स्टडी ऑफ चाइल्ड पॉलिटिकल सोशलाइजेशन। अगले थिंकर का नाम आता है गैब्रियल आल्मंड। तो यह
अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं और इनको जाना जाता है कंपेरेटिव पॉलिटिक्स, पॉलिटिकल डेवलपमेंट और पॉलिटिकल कल्चर में
योगदान देने के लिए। और खास बात यह है कि इनके भी कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। जिनमें प्रमुख आता है द सेबी कल्चर जो कि
इन्होंने बरबा के साथ लिखा। अगला आता है कंपैरेटिव पॉलिटिक्स और डेवलपमेंटल एप्रोच 1966 जो कि इन्होंने पावेल के साथ लिखा।
वहीं अगला वर्क आता है द पॉलिटिक्स ऑफ डेवलपिंग एरियाज और लास्ट इनका आता है द अपील्स ऑफ कम्युनिज्म। अगले थिंकर का नाम
आता है एलन आरबॉल। यह ब्रिटिश पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है
मॉडर्न पॉलिटिक्स एंड गवर्नमेंट। दूसरा आता है ब्रिटिश पॉलिटिकल पार्टीज और तीसरा आता है प्रेशर पॉलिटिक्स इन इंडस्ट्रियल
सोसाइटीज। तो अब हम बात कर लेते हैं गैब्रियल आलमंड की। इनका जन्म 1911 को हुआ था और इनकी डेथ 2002 को हुई थी। गैब्रियल
अब्राहम आलमंड वाज़ एन अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट। तो यह अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं और इनको जाना जाता है
कंपैरेटिव पॉलिटिक्स में, पॉलिटिकल डेवलपमेंट में और पॉलिटिकल कल्चर में काम करने के लिए, रिसर्च करने के लिए और
पॉलिटिकल कल्चर में इनका काफी बड़ा योगदान रहा है जिसको हम अभी धीरे-धीरे करके अच्छे से पढ़ेंगे और समझेंगे। वहीं दूसरी अगर हम
बात करें तो सिबिक कल्चर इनका सबसे प्रमुख वर्क रहा है जो इन्होंने 1963 में लिखा था। और यह वर्क इन्होंने लिखा था सिडनी
बरबा के साथ। और एक और इंपॉर्टेंट बात यह है जो आपको हमेशा याद रखनी है क्योंकि आपसे एग्जाम में इस तरह का प्रश्न पूछ
सकते हैं और यह है कि प्लूटोक्रेसी एंड पॉलिटिक्स इन न्यूयॉर्क सिटी किसका डॉक्टरल थीसिस रहा है? तो यह थीसिस
गब्रियल आलमंड का ही रहा है। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट यह है कि इन्होंने सोशल साइंस रिसर्च काउंसिल की जो कमेटी थी जो
कंपैरेटिव पॉलिटिक्स पर बनी थी उसकी इन्होंने कई सालों तक अध्यक्षता की और साथ में यह 1965 से 1966 तक अमेरिकन पॉलिटिकल
साइंस एसोसिएशन के प्रेसिडेंट भी रहे हैं। यह स्क्रीन पर आपको इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स दिखाई दे रहे हैं। आप वीडियो को पॉज़
करके या फिर स्क्रीनशॉट लेकर आप इन सारे कीवर्ड्स को नोट कर सकते हैं क्योंकि यह एग्ज़ाम की दृष्टि से बहुत ही इंपॉर्टेंट
है। अब हम बात कर लेते हैं सिडनी बर्बा की। सिडनी बर्बा का जन्म 1932 को हुआ था और इनकी डेथ अभी एक-दो साल पहले 2019 को
हुई थी। सिडनी बरबा की अगर हम बात करें तो यह भी अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। और दूसरी बात यह है कि इन्होंने
स्टडी की अमेरिकन पॉलिटिकल कल्चर की और साथ में कंपेरेटिव पॉलिटिक्स में भी इन्होंने काफी योगदान दिया है। दूसरी अगर
हम बात करें तो इन पॉलिटिकल कल्चर बोथ आलमंड एंड बरबा गव द स्लीपिंग डॉग्स थ्योरी। और इस स्लीपिंग डॉग्स थ्योरी को
हम बाद में अच्छे से पढ़ेंगे, समझेंगे। तो इन दोनों ने ही अर्थात आलमंड और बरबा ने ही स्लीपिंग डॉग्स थ्योरी को प्रतिपादित
किया है। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने एक इंपॉर्टेंट वर्क लिखा दबिक कल्चर 1963 में और जैसा कि मैंने आपको
पहले भी कहा कि आलमंड और बरबाद दोनों ने मिलकर इस इंपॉर्टेंट राइटिंग पर काम किया। और सबसे बड़ी बात यह है कि इनकी जो स्टडी
रही है यानी कि इन्होंने जो कंपैटिव पॉलिटिक्स और पॉलिटिकल कल्चर संबंधी स्टडी की उसका जो एसेंस है निचोड़ है वो रहा है
पार्टिसिपेशन यानी कि यह पार्टिसिपेशन की बात करते हैं। जैसे कि हमने देखा भी है कि यह दोनों ही पार्टिसिपेशन की बात करते
हैं। पैराकियल हो, सब्जेक्टिव हो या फिर पार्टिसिपेशन हो। तो इस तरह की बात ये करते हैं और ये कहते हैं कि पॉलिटिकल
पार्टिसिपेशन होनी चाहिए डिफरेंट-डिफरेंट ग्रुप्स में। यह है आपको स्क्रीन पर जो दिखाई दे रहे
हैं इनके इंपॉर्टेंट वर्क्स। आप स्क्रीनशॉट लेकर या फिर वीडियो को पॉज करके इनके सारे वर्क्स को नोट अच्छे से कर
लेना क्योंकि यह एग्जाम में कई बार पूछे जा चुके हैं और पूछे भी जाएंगे। 1956 में गैब्रियल आलमंड ने पहली बार
पॉलिटिकल कल्चर नामक शब्दावली को गढ़ा था और यह गढ़ा था इन्होंने अपने प्रमुख ऐसे कंपेरेटिव पॉलिटिकल सिस्टम। इसी वजह से
आलमंड को फादर ऑफ पॉलिटिकल कल्चर के रूप में जाना जाता है। और नोट करने वाली बात यह भी है कि आलमंड और बरबा ने सिबिक कल्चर
को सम टोटल ऑफ सब्जेक्टिव एंड पार्टिसिपेंट कल्चर के रूप में बिचारा है। अर्थात बरबा और आलमंड कहते हैं कि जो
सिबिक कल्चर होता है, वह सब्जेक्टिव और पार्टिसिपेंट कल्चर का मिश्रित रूप होता है। अर्थात सिबिक कल्चर जिसे हम हिंदी में
नागरिक संस्कृति या फिर शालीन संस्कृति कहते हैं। यह मिलकर बनती है सब्जेक्टिव और पार्टिसिपेंट कल्चर से। क्योंकि यह दोनों
ही कल्चर ऐसे होते हैं जहां पर लोग राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े होते हैं। सरकार की कार्यप्रणाली में भाग लेते हैं।
और यह यह भी कहते हैं कि सिबिक कल्चर जो है वह बहुत ही उपयुक्त है लिबरल डेमोक्रेसी के विकास के लिए। इसीलिए इसको
सिबिक कल्चर या फिर शालीन संस्कृति भी कहा जाता है। दूसरी एक और बात यह इंपॉर्टेंट है कि कंपैरेटिव पॉलिटिक्स में पॉलिटिकल
कल्चर को आलमंड और बरबा ने ही सबसे पहले यूज़ किया था। अर्थात इस तरह की शब्दावली को सबसे पहले आलमंड और बरबा ने ही यूज़
किया था। और दूसरी बात यह है जो सबसे इंपॉर्टेंट है और आपको याद रखना है क्योंकि यह नेट के एग्जाम में पहले भी
पूछा जा चुका है। इन्होंने सबसे इंपॉर्टेंट राइटिंग लिखी जिसका नाम है द सिबिक कल्चर पॉलिटिकल एटीट्यूड्स एंड
डेमोक्रेसी इन फाइव नेशंस। 1963 में ये राइटिंग्स लिखी और इन्होंने इस राइटिंग में यूके, यूएस, जर्मनी, इटली और मेक्सिको
में जो इन्होंने रिसर्च किया उसके रिसर्च के जो परिणाम थे इस राइटिंग में इन्होंने लिखा और इन्होंने लिखा कि इन दीज़ कंट्रीज
दे डिड इवोल्यूशन ऑफ स्टेबिलिटी एंड इनस्टेबिलिटी ऑफ़ डेमोक्रेसी एंड पॉलिटिकल कल्चर एज वेल। तो इस राइटिंग में इन्होंने
यूएस, यूके, जर्मनी, इटली, मेक्सिको जैसे देशों का अध्ययन किया और उसमें यह पता लगाने की कोशिश की कि डेमोक्रेसी में
स्टेबिलिटी अर्थात स्थिरता इनस्टेबिलिटी अर्थात अस्थिरता क्यों आती है, उसे किस तरह से दूर किया जा सकता है और किस तरह जो
पॉलिटिकल कल्चर होता है, वह अलग-अलग देशों में किस तरह का होता है। लोग वहां पर किस तरह का पार्टिसिपेशन करते हैं। अगर आप
आलमंड और बरबा के पॉलिटिकल कल्चर के कांसेप्ट को अच्छे से समझना चाहते हैं तो स्क्रीन पर जो आपको डायग्राम दिख रहा है
उसे अच्छे से समझना ही होगा क्योंकि तभी आप पॉलिटिकल कल्चर के कांसेप्ट को पूरा समझ सकते हैं। तो आलमंड और बरबा ने तीन
प्रकार के ओरिएंटेशन की बात की है। पहला है कॉग्निटिव जिसे हम हिंदी में कहते हैं संज्ञानात्मक। दूसरा है इफेक्टिव जिसे हम
हिंदी में कहते हैं प्रभावी और तीसरा है इवैलुएटिव जिसे हम हिंदी में कहते हैं मूल्यांकित। सबसे पहले अगर हम बात करें
कॉग्निटिव ओरिएंटेशन की तो इसमें ऐसे लोग होते हैं जिनके पास बहुत कम ज्ञान होता है राजनीतिक घटनाओं और समस्याओं के प्रति।
अर्थात उन्हें बहुत ही कम ज्ञान होता है कि वे कहां रहते हैं? उनकी सोसाइटी क्या है? देश क्या है? समाज क्या है? और राज्य
क्या है? सरकार क्या है? राजनीतिक व्यवस्था क्या है? दूसरा है इफेक्टिव ओरिएंटेशन। इफेक्टिव को हम हिंदी में कहते
हैं प्रभावी और इसमें राजनीतिक व्यवस्था के प्रति लोगों की कुछ भावनाएं, वफादारी और कुछ आंतरिक भावनाएं जुड़ी होती है।
हालांकि इस प्रकार के ओरिएंटेशन में भी लोगों का राजनीतिक प्रणाली में कोई योगदान नहीं होता है। कोई जुड़ाव नहीं होता है।
कोई पार्टिसिपेशन नहीं होती है। और तीसरा है इवैलुएटिव ओरिएंटेशन। इवैलुएटिव ओरिएंटेशन की अगर हम बात करें तो इसमें
लोगों के पास ना केवल नॉलेज होती है बल्कि जागरूकता अवेयरनेस भी होती है और इसी जागरूकता और ज्ञान के कारण लोग सरकार की
नीतियों निर्णयों की पूरी तरह से आलोचना करते हैं, मूल्यांकन करते हैं, डिमांड करते हैं। यानी कि लोग इसमें राजनीतिक
व्यवस्था और सरकार के द्वारा किए गए सारे कामों का मूल्यांकन करते हैं। इसमें वे आलोचना भी करते हैं, डिमांड भी करते हैं।
तो इसको थोड़ा सा हम और डिटेल में समझ लेते हैं। कॉग्निटिव ओरिएंटेशन में हम रखते हैं पैरोकिल कल्चर।
पैरोकिल को हम कहते हैं संकीर्ण क्योंकि इसमें लोग जो है बहुत कम ज्ञान उन्हें प्राप्त होता है। अर्थात वे एक प्रकार से
आदिकालीन समाज में रहते हैं। दूसरा है इफेक्टिव यानी कि यह होता है सब्जेक्टिव। इसमें लोग कुछ हद तक जुड़े होते हैं लेकिन
एक्टिवली नहीं होते हैं। पैसिवली होते हैं। और तीसरा है पार्टिसिपेंट जिसमें लोग पूरी तरह से पार्टिसिपेट करते हैं। सरकार
की नीतियों और निर्णयों का इवैल्यूएशन करते हैं। अब हम थोड़ा इसे और डिटेल में समझने की कोशिश करते हैं। सबसे पहले अगर
हम पैरोकियल कल्चर की बात करें तो इसमें इनपुट ना के बराबर होता है। क्योंकि लोग जब आदिकालीन समाज की तरह रहते हैं यानी कि
जब उन्हें यह पता नहीं है कि उनके अधिकार क्या है? कर्तव्य क्या है? देश क्या है? संविधान क्या है? सिटीजनशिप क्या है? उनके
राइट्स क्या है? जब उन्हें कुछ भी पता नहीं है तो इनपुट्स इनपुट्स मींस उनकी डिमांड ही नहीं होगी। उनकी मांगे ही नहीं
होगी। और जब मांगे ही नहीं होगी तो आउटपुट भी कैसे होंगे? यानी कि सरकार निर्णय या फिर डिसीजन कैसे बनाएगी? कैसे देगी?
निर्णय कैसे देगी? नीतियां कैसे बनाएगी? और सेल्फ सेल्फ भी इसमें बिल्कुल जीरो होता है क्योंकि लोग जब एक व्हेल ऑफ
इग्नोरेंस में रहते हैं यानी कि जिन्हें पता ही नहीं होता है किसी भी चीज के बारे में वे सिर्फ अपने एक छोटे लेवल पर जीते
हैं उन्हें राजनीति राज्य सरकार राजनीतिक व्यवस्था से कोई लेना देना नहीं होता है। तो सेल्फ का भी उसमें कोई रोल नहीं होता
है और सिस्टम एज अ होल का भी इसमें कोई रोल नहीं होता है क्योंकि इसमें ना तो सिस्टम कीेंस होती है ना ही सेल्फ की होती
है क्योंकि इसमें ना डिमांड होती है ना आउटपुट होता है। दूसरा इफेक्टिव या फिर सब्जेक्टिव में हम बात करें तो इसमें
इनपुट्स नो होता है क्योंकि लोग निष्क्रिय भागीदारी करते हैं। यानी कि चुनाव के टाइम थोड़ा बहुत अगर उन्हें याद आ गया तो वोट
डाल दिया बस काम हो गया। तो इनपुट इसमें नहीं होता है। हां, आउटपुट इसमें होता है क्योंकि सरकार लोगों की डिमांड्स के बिना
भी कुछ नीतियां कुछ निर्णय बनाती है, निर्णय देती है। हालांकि सेल्फ इसमें नो होता है। यानी कि सेल्फ इंडिविजुअल का कोई
रोल नहीं होता है। क्योंकि मैंने कहा कि इंडिविजुअल यानी कि लोग इलेक्शन के टाइम ही सक्रिय होते हैं। थोड़ा बहुत वोट दे
दिया बस काम हो गया। इसीलिए सेल्फ का भी इसमें ज्यादा रोल नहीं होता है। सिस्टम एज अ होल हम इसमें कह सकते हैं कि यस होता है
क्योंकि सिस्टम जो होता है वह काम करता रहता है। निर्णय बनाता है, पॉलिसीज बनाता है, अपने निर्णय देता है। इसीलिए सिस्टम
एज अ होल में हम यस को रेखांकित करते हैं। पार्टिसिपेंट में अगर बात करें हम तो यह पैरोकल का बिल्कुल उल्टा होता है।
पार्टिसिपेंट में क्योंकि लोग पूरी तरह से जागरूक होते हैं। लोगों के पास नॉलेज होती है। लोग पूरी तरह से सरकार में या फिर
राजनीतिक व्यवस्था में पार्टिसिपेट करते हैं। इसीलिए इनपुट होता है। इसमें आउटपुट भी होता है क्योंकि सरकार अच्छे निर्णय
बनाती है, निर्णय देती है, डिसीजंस देती है और कानून बनाती है यानी कि पॉलिसीज बनाती है और सेल्फ का भी इसमें रोल होता
है क्योंकि लोग पूरी तरह से पार्टिसिपेट करते हैं राजनीतिक प्रणाली में और सिस्टम एज अ होल भी होता है क्योंकि लोग और सरकार
या फिर लोग और राजनीतिक व्यवस्था मिलकर देश चलाते हैं। देश को आगे बढ़ाते हैं, भागीदारी करते हैं, अधिकार देते हैं और
कर्तव्य भी पूरा करते हैं। अब हम स्लीपिंग डॉग्स थ्योरी को अच्छे से समझ लेते हैं क्योंकि एग्जाम में यह कई
बार पूछी गई थ्योरी है जो कि आलमंड और बरबा ने ही दी थी। तो स्लीपिंग डॉग्स थ्योरी की अगर हम बात करें तो आलमंड एंड
बरबा सजेस्टेड अ स्लीपिंग डॉग्स थ्योरी ऑफ़ डेमोक्रेटिक कल्चर। तो डेमोक्रेटिक जो कल्चर होता है उसका अध्ययन करने के लिए या
फिर डेमोक्रेटिक कल्चर का विश्लेषण करने के लिए आलमंड एंड बरबा ने स्लीपिंग डॉग्स थ्योरी दी थी और यह थ्योरी इन्होंने
अमेरिकन डेमोक्रेटिक कल्चर के संदर्भ में दी थी। इन्होंने कहा था कि स्लीपिंग डॉग्स थ्योरी सजेस्ट दैट अमेरिकन पीपल पे लिटिल
अटेंशन टू पॉलिटिक्स अंटिल अराउज़्ड बाय स्कैंडल वॉर और इकोनॉमिक क्राइसिस देन दे वोट फॉर द पॉलिटिशियंस आउट। तो इन्होंने
कहा था कि अमेरिका में जो लोग होते हैं वे सिर्फ चुनाव के दौरान ही कार्य करते हैं। यानी कि पॉलिटिक्स में पार्टिसिपेट करते
हैं। लेकिन पूरे 5 साल या फिर 4 साल वे पार्टिसिपेशन नहीं करते हैं। यानी कि राजनीति को छोड़ के वे अपनी निजी लाइफ में
व्यस्त रहते हैं। लेकिन जैसे ही इलेक्शन आते हैं या फिर कोई स्कैंडल वॉर होता है, कोई भ्रष्टाचार का मामला आता है या
इकोनॉमिक क्राइसिस होता है, तो ऐसी स्थिति में लोग फिर से एक्टिवली पॉलिटिक्स में पार्टिसिपेट करते हैं और ऐसे पार्टिसिपेशन
से वे पॉलिटिशियंस को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। तो इस तरह की कल्पना अगर हम देखें या फिर तुलना हम देखें तो आलमंड और
बरबा ने एक सोए हुए कुत्ते से की है अमेरिकन डेमोक्रेटिक कल्चर की। यानी कि आलमंड और बरबा ने अमेरिका में जो
डेमोक्रेटिक कल्चर होता है उसकी तुलना की है एक सोया हुआ कुत्ता क्योंकि कुत्ता सोता तो है लेकिन वो बहुत ही तेज होता है
जागने में। तो अमेरिका के लोग भी ऐसे ही हैं कि जैसे ही इलेक्शन खत्म होंगे आराम से सोते हैं। मतलब अपने निजी जीवन में
व्यस्त रहते हैं। व्यतीत अपना जीवन अच्छे से करते हैं। राजनीति में नहीं पड़ते हैं। लेकिन जैसे ही इलेक्शन आते हैं या फिर कोई
स्कैंडल वॉर होता है, इकोनॉमिक क्राइसिस आता है तो लोग जल्दी से जल्दी पार्टिसिपेट करते हैं पॉलिटिक्स में और पॉलिटिशियंस को
सत्ता से बाहर कर देते हैं। क्वालिटी के आधार पर पॉलिटिकल कल्चर को एसई फाइनर ने भी चार भागों में बांटा है। पहला है
मैच्योर पॉलिटिकल कल्चर और यह पाया जाता है ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैंड्स में। एसई फाइनर कहते हैं कि मैच्योर
पॉलिटिकल कल्चर वो होता है जहां पर लोग पूरी तरह से जागरूक होते हैं। पार्टिसिपेट करते हैं पॉलिटिकल
सिस्टम में। सरकार के प्रति जिम्मेदार होते हैं। उन्हें ज्ञान होता है। अवेयरनेस होती है कि उनके राइट्स क्या है? कर्तव्य
क्या है? और इस तरह का कल्चर पाया जाता है ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैंड जैसे देशों में। दूसरा कल्चर इन्होंने बताया
डेवलप्ड पॉलिटिकल कल्चर। यह कहते हैं कि इस तरह का जो पॉलिटिकल कल्चर होता है वो डेवलप्ड होता है। यानी कि विकसित हो चुका
होता है। वहां के लोग भी राजनीतिक प्रणाली में काफी बड़ी मात्रा में पार्टिसिपेट करते हैं। अवेयर होते हैं। और इस तरह का
कल्चर पाया जाता है इजिप्ट, अल्जीरिया और क्यूबा में। तीसरे प्रकार के पॉलिटिकल कल्चर की बात की है इन्होंने लो पॉलिटिकल
कल्चर जिसमें लोग कम मात्रा में राजनीतिक प्रणाली के प्रति जानकारी रखते हैं, रुचि रखते हैं और पार्टिसिपेट करते हैं। इसमें
आता है वियतनाम, सीरिया और इंडोनेशिया जैसे देश और चौथा लास्ट बट नॉट लीस्ट इज़ मिनिमल पॉलिटिकल कल्चर। यह एक प्रकार से
नाम मात्र का पॉलिटिकल कल्चर होता है क्योंकि इसमें लोगों के पास कोई भी जानकारी नहीं होती है। कोई रुचि नहीं होती
है। कोई जागरूकता नहीं होती है राजनीतिक व्यवस्था के प्रति या सरकार के प्रति और एसई फाइनर कहते हैं कि ऐसी स्थिति या इस
प्रकार का कल्चर प्री फ्रेंच रेवोल्यूशन पाया जाता था यानी कि फ्रेंच रेवोल्यूशन से पहले का जो काल था उसमें मिनिमल
पॉलिटिकल कल्चर पाया जाता था। तो सबसे पहले हम इनकी लाइफ एंड बायोग्राफी को अच्छे से पढ़ लेते हैं, समझ लेते हैं।
इनका पूरा नाम था सैमुअल फिलिप्स हंटिंगटन। इनका जन्म 1927 को हुआ और इनकी डेथ 2008 को हुई और यह अमेरिका के बहुत
बड़े पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। एकेडमिशियन रहे हैं और हावर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोमिनेंट प्रोफेसर रहे हैं। और यह
जाने जाते हैं क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन के लिए जिसको हम बाद में अच्छे से पढ़ेंगे। वैसे तो पॉलिटिकल साइंस में इनका बहुत
बड़ा योगदान रहा है। लेकिन थ्री फील्ड्स में मुख्यत बहुत बड़ा योगदान रहा है। जैसे मिलिट्री पॉलिटिक्स, स्ट्रेटजी एंड सिविल
मिलिट्री रिलेशंस, यूएस एंड कंपेरेटिव पॉलिटिक्स एंड पॉलिटिक्स इन लेस डेवलप्ड सोसाइटीज।
इन्होंने 1991 में एक महत्वपूर्ण राइटिंग लिखी जिसका नाम है द थर्ड वेव डेमोक्रेटाइजेशन इन द लेट 20थ सेंचुरी और
इस थ्योरी में इन्होंने एक टर्म को गढ़ा जिसका नाम है वेव्स ऑफ डेमोक्रेटाइजेशन जिसमें इन्होंने लोकतंत्र की तीन लहरों की
बात की जिसमें पहली लहर 1828 दूसरी 1943 और तीसरी 1972 के बाद शुरू हुई। साथ में इन्होंने यह भी कहा
कि पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन एंड पॉलिटिकल इंस्टिट्यूशनलाइजेशन साथ में होना चाहिए। अर्थात पॉलिटिकल इंस्टिट्यूशनलाइजेशन
पिछड़ना नहीं चाहिए। क्योंकि अगर ऐसा होता है तो फिर डेवलपिंग कंट्रीज में क्या होता है कि गैप उत्पन्न हो जाता है जिसको
इन्होंने गैप हाइपोथेसिस कहा है और इसी गैप हाइपोथेसिस की वजह से फिर पॉलिटिकल डिक होता है यानी कि राजनीतिक ह्रास होता
है। अब हम बात कर लेते हैं इनकी इंपॉर्टेंट राइटिंग्स की। पहली द सोल्जर एंड द स्टेट। दूसरी कंजर्वेटिविज्म एज एन
आईडियोलॉजी। अगली है द कॉमन डिफेंस। एक अगली है चेंजिंग पैटर्न्स ऑफ मिलिट्री पॉलिटिक्स। अगली है जो कि बहुत ही
इंपॉर्टेंट है। पॉलिटिकल ऑर्डर इन चेंजिंग सोसाइटीज। अगली है जो कि और भी बहुत इंपॉर्टेंट है। क्राइसिस ऑफ़ डेमोक्रेसी।
और अगली एक है नो इजी चॉइस। और नेक्स्ट इज़ अमेरिकन पॉलिटिक्स द प्रॉमिस ऑफ़ डेमोक्रेसी। और इनकी इंपॉर्टेंट और रही है
द थर्ड वेव डेमोक्रेटाइजेशन इन द लेट 20थ सेंचुरी जो कि 1991 में इन्होंने लिखी और यह बहुत ही इंपॉर्टेंट है। अगली
इंपॉर्टेंट राइटिंग है पॉलिटिकल डेवलपमेंट एंड पॉलिटिकल डिके जो कि इन्होंने 1993 में लिखी। अगली है द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन
द रीमेकिंग ऑफ वर्ल्ड ऑर्डर 1996 और यह भी बहुत ही इंपॉर्टेंट है। अगली है वर्ल्ड 200 कॉन्फ्लिक्ट केओस एंड
सिविलाइजेशन कनाडियन स्ट्रेटेजिक फॉरकास्ट और अगली है कल्चर मैटर्स 2000 में लिखी और अगली है मेनी ग्लोबलाइजेशन जो कि 2004 में
इन्होंने लिखी और लास्ट बट नॉट लीस्ट हु आर बी द चैलेंजेस टू अमेरिकास नेशनल आइडेंटिटीज
तो अब हम बात कर लेते हैं इनकी की नोशंस और थ्योरीज की हम पढ़ेंगे मॉडर्नाइजेशन को पॉलिटिकल डेवलपमेंट पॉलिटिकल डके गैप
हाइपोथेसिस क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन और लास्ट में हम बात करेंगे डेमोक्रेटाइजेशन की। लेकिन इससे पहले कि हम एक-एक करके इन
थ्योरीज को पढ़ें। मैं आपको एक बात बता देना चाहता हूं कि इन्होंने डेवलपमेंट और मॉडर्नाइजेशन में किसी भी तरह का अंतर
नहीं किया। क्योंकि इनका मानना था कि मॉडर्नाइजेशन की वजह से डेवलपमेंट खुद हो जाता है। इसीलिए हमें इन शब्दावली को
अलग-अलग लेने की जरूरत नहीं है। तो अब बात कर लेते हैं पॉलिटिकल डिक की। तो इन्होंने जो अपनी स्टडी की वह की डेवलपिंग कंट्रीज
में और लेस डेवलप्ड कंट्रीज में। तो उन्हीं के संदर्भ में यह कहते हैं कि कभी कबभार इन देशों में मॉडर्नाइजेशन की होड़
की वजह से डिसऑर्डर स्थापित हो जाता है। और ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए है क्योंकि यह कहते हैं कि वहां पर जो इकोनॉमिक
डेवलपमेंट है और सोशल चेंज है वो तो हो जाता है लेकिन वहां की जो इंस्टीटशंस है जो डेवलप्ड कंट्रीज इन्होंने अडॉप की है
वो वहीं की वहीं रह जाती है। उनमें कोई चेंज नहीं हो पाता है। इसीलिए उसके बीच एक गैप उत्पन्न हो जाता है और उसी गैप की वजह
से यह कहते हैं कि फिर वहां पे पॉलिटिकल डिक होने लग जाता है। तो अब बात कर लेते हैं गैप हाइपोथेसिस की। तो गैप हाइपोथेसिस
बेसिकली यही है कि जब डेवलपिंग कंट्रीज में सोशियोइकोनॉमिक डेवलपमेंट तो तेजी से होता है। इसमें परिवर्तन होता है लेकिन
इन्होंने जो इंस्टीटशंस अडॉप की है उसका तेजी से विकास नहीं हो पाता है। वो पिछड़ जाती है। तो ऐसी स्थिति को इन्होंने गैप
हाइपोथेसिस कहा है। अब बात कर लेते हैं मॉडर्नाइजेशन की। तो यह कहते हैं कि मॉडर्नाइजेशन को हम चार
आधारों पर पता लगा सकते हैं कि किस कंट्री में किस हद तक मॉडर्नाइजेशन हुआ है। ये कहते हैं साइकोलॉजिकल लेवल, डेमोग्राफिक
लेवल, इंटेलेक्चुअल लेवल, सोशल एंड इकोनॉमिक लेवल। अगली हम बात कर लेते हैं पॉलिटिकल डेवलपमेंट की। ये कहते हैं कि
पॉलिटिकल डेवलपमेंट को हम चार भागों में बांट सकते हैं। और यह है एडप्टेशन, कॉम्प्लेक्सिटी, ऑटोनॉमी एंड कोहेरेंस।
एडप्टेशन का मतलब होता है अनुकूलन। यानी कि हमारा जो समाज है, दूसरे समाज जहां से हमने कुछ लिया है, कुछ इंस्टिट्यूशन लिए
हैं, उसके कितना अनुकूल है। कॉम्प्लेक्सिटी का मतलब होता है कि एक जो सोसाइटी होती है, उसमें कितनी
कॉम्प्लेक्सिटी है, कितनी जटिलता है, कितनी विविधता है। और ऑटोनॉमी का मतलब होता है स्वायत कि किसी समाज में लोग
कितने स्वायत है, कितनी उनको स्वायतता है और कोहेरेंस का मतलब होता है संसक्तता। यानी कि जुटना। यानी कि वहां के लोग किस
तरह से यूनाइट होते हैं। किस तरह से एक होते हैं। अब बात कर लेते हैं क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन की। तो क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन
का जो इन्होंने सिद्धांत दिया वो अपनी प्रमुख कृति द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस एंड द रीमेकिंग ऑफ वर्ल्ड ऑर्डर में दिया जो
कि इन्होंने 1996 में लिखी। तो यह हिस्टोरिकल आईडिया इन्होंने इसी कृति में प्रोपाउंड किया और इसमें यह लिखते हैं कि
जो फ्यूचर वॉर होंगे वो सिंपल वॉर नहीं होंगे। जैसे कि पहले हमने फर्स्ट वर्ल्ड वॉर देखा, सेकंड वर्ल्ड वॉर देखा बल्कि ये
लोगों के जो कल्चर है या फिर रिलीजियस जो आइडेंटिटीज है उसके मध्य ही या उनमें टकराव होने को लेकर ही होंगे। और 21
सेंचुरी में यही वॉर होने वाले हैं। और इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कोटेशन दी जिसमें यह कहते हैं कि फ्यूचर वॉर्स वुड बी फॉट
नॉट बिटवीन कंट्रीज बट बिटवीन कल्चरर्स। तो ये कहते हैं कि जो विश्व में या विश्व में जो फ्यूचर में जो युद्ध होने वाले हैं
वो कंट्रीज के मध्य नहीं होंगे। कल्चर के मध्य होंगे। और यह वाला पॉइंट बहुत ही इंपॉर्टेंट है। इसको अच्छे से आपने याद
रखना। और इन्होंने कहा कि ऐसी आठ सिविलाइजेशंस होने वाली है जिनके मध्य 21वीं शताब्दी में क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन
होगा। कौन सी आठ हैं? तो ये आठ हैं ये और द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन में ये आठ सिविलाइजेशन की बात करते हैं। और ये है जो
आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रही है। हिंदूइज़्म सिनिक। सनिक का मतलब होता है जो चाइनीज़ फंडामेंटलिज्म है। इस्लामिक
ऑर्थोडॉक्स हो गया। या ऑर्थोडॉक्स को बोलते हैं हम जो कम्युनिज्म जो विचारधारा है उससे रिलेटेड वेस्टर्न सिविलाइजेशन,
अफ्रीकन सिविलाइजेशन, जैपनीज़, लैटिन अमेरिकन। तो ये आठ प्रकार की जो सिविलाइजेशन हैं हंटिंगटन कहते हैं कि
इन्हीं आठ सिविलाइजेशन के मध्य 21वीं शताब्दी में टकराव होने वाला है। युद्ध होने वाला है। संघर्ष होने वाला है और यह
धार्मिक और सांस्कृतिक संघर्ष होने वाला है ना कि उस तरह का संघर्ष है जो या उस तरह का युद्ध है जो हमने फर्स्ट वर्ल्ड
वॉर या फिर सेकंड वर्ल्ड वॉर में देखा। नेशनलिज्म के की थिंकर्स में सबसे पहला नाम आता है बेनेडिक्ट एंडरसन का। तो
बेनेडिक्ट एंडरसन एंग्लो आइरिश पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं और यह जाने जाते हैं अपनी प्रसिद्ध किताब जिसका नाम था इमेजेंड
कम्युनिटी रिफ्लेक्शंस ऑन द ओरिजिन एंड स्प्रेड ऑफ नेशनलिज्म जो कि 1983 में पब्लिश होती है और इस किताब में इन्होंने
अपना एक प्रसिद्ध कांसेप्ट दिया था जिसका नाम है इमेजेंड कम्युनिटी और इसी कांसेप्ट के अंतर्गत यह कहते हैं कि जो नेशन होते
हैं यह कुछ भी नहीं होते हैं। बस इमेजिनेशन होती है। यानी कि लोगों ने जैसा सोचा उसी के बेस पे जो नेशन है या फिर
नेशनलिज्म का कांसेप्ट है वो उदित हुआ। आगे यह लिखते हैं कि नेशन एक इमेज कम्युनिटी है। यानी कि इमेजिनेशन के आधार
पर है। वह ऐसा इसलिए है क्योंकि जो नेशन के अंदर जो ग्रुप होते हैं यानी कि कम्युनिटी होती है उसके जो लोग हैं वे
अपने जो मेंबर है यानी कि उनके साथी है उनके पड़ोसी है उनके बारे में भी नहीं जानते हैं। इसीलिए जो नेशन है वह सिर्फ
इमेजिनेशन का परिणाम है। और दूसरा यह कहते हैं कि जो नेशनलिज्म या फिर नेशन की जो अवधारणा आई उसमें प्रिंट कैपिटलिज्म का भी
रोल रहा है। क्योंकि जो बड़े-बड़े इलीट रहे हैं उन्होंने प्रिंट मीडिया के सहारे ऐसे बहुत सारे लेख लिखे जिसकी मदद से
उन्हें फायदा मिला और नेशन और नेशनलिज्म का कांसेप्ट शुरू हुआ। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स भी रहे हैं जो आप स्क्रीन
पर देख रहे हैं। तो इनको आप अच्छे से नोट कर लीजिए। दूसरे थिंकर का नाम है एरिक हॉब्सम। तो यह बेसिकली ब्रिटिश हिस्टोरियन
लाइफ लॉन्ग मार्क्सिस्ट एंड सोशल थ्योरिस्ट एंड ऑथर रहे हैं। और इन्होंने एक प्रसिद्ध आईडिया दिया या फिर कांसेप्ट
दिया जिसका नाम है इनवेंटेड ट्रेडिशंस। तो इस इंपॉर्टेंट ट्रेडिशन के बारे में यह अपनी प्रमुख किताब द इन्वेंशन ऑफ ट्रेडिशन
जो कि 1983 में पब्लिश होती है। लिखते हैं और कहते हैं कि नेशंस आर इन्वेंटेड ट्रेडिशंस। यानी कि जो राष्ट्र की अवधारणा
है वह डेवलप्ड अवधारणा नहीं है बल्कि इन्वेंटेड है। इसे खोजा गया है और यह लिखते हैं कि नेशन और जो नेशनलिज्म है यह
प्रोडक्ट है सोशल इंजीनियरिंग के। यानी कि समाज के जो विद्वान हैं, इलीट लोग हैं, पढ़े लिखे लोग हैं, उन्होंने जो नेशन है
और नेशनलिज्म का कांसेप्ट है, उसको खोजा है, उसको इन्वेंट किया है। इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कोटेशन दी जिसमें यह लिखते हैं
कि नेशनलिज्म हैज़ क्रिएटेड नेशंस एंड नॉट द वाइसवरसा। मतलब जो राष्ट्रवाद की अवधारणा है उसने ही नेशन को यानी कि
राष्ट्रों को जन्म दिया है ना कि राष्ट्रों ने राष्ट्रवाद को जन्म दिया है। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट वक्स भी रही हैं।
जैसे कि आप स्क्रीन पर देख सकते हैं। तो आप इनको अच्छे से नोट कर लें। एग्जाम की दृष्टि से बहुत इंपॉर्टेंट है। अगले थिंकर
का नाम आता है आर्नेस्ट गैलनर। तो आर्नेस्ट गार्लनर एक ब्रिटिश चेक फिलॉसोफर एंड सोशल एंथ्रोपोलॉजिस्ट रहे हैं।
जिन्होंने नेशनलिज्म की अवधारणा में एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया जिसको कहा जाता है हाई कल्चर। तो जब हम बात करते हैं हाई
कल्चर तो इन्होंने इसके बारे में कहा है कि नेशनलिज्म इज नथिंग बट इंपोज़शन ऑफ हाई कल्चर ऑन सोसाइटी। मतलब यह कहते हैं कि
नेशनलिज्म नाम की कोई चीज नहीं होती है। सोसाइटी में जो कल्चरल वैल्यू्यूज होती है वही हाई कल्चर होता है जो कि सोसाइटी के
ऊपर इंपोज किया जाता है। अपनी एक प्रसिद्ध किताब जिसका नाम है नेशन एंड नेशनलिज्म जो कि 1983 में पब्लिश होती है। इसमें यह
लिखते हैं कि जो इंडस्ट्रियल सोसाइटीज है उसमें जो शेयरर्ड कल्चर होता है वह इंपॉर्टेंट हो जाता है। यानी कि जो कल्चरल
डायवर्सिटीज है वो इंपॉर्टेंट नहीं होती है बल्कि शेयरर्ड कल्चर जो लोग समान यानी कि कॉमन हिस्ट्री कॉमन लैंग्वेज कॉमन
कल्चर को शेयर करते हैं वो इंपॉर्टेंट हो जाता है और वही शेयरर्ड कल्चर हाई कल्चर है। तो नेशनलिज्म कुछ भी नहीं है। बस यही
हाई कल्चर है। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं जो आप स्क्रीन पर देख रहे हैं। तो इनको आप अच्छे से नोट कर लीजिए। नेक्स्ट
स्कॉलर आते हैं पार्थ चटर्जी। तो जब हम बात करते हैं पार्थ चटर्जी की तो इनका जन्म 1947 को होता है कोलकाता में और यह
सब अल्टन जो स्टडीज रही है उसके फाउंडर मेंबर भी रहे हैं। उनसे जुड़े भी रहे हैं। और पार्थ चटर्जी ने एक इंपॉर्टेंट
कांसेप्ट दिया जिसका नाम है डेरिवेटिव नेशनलिज्म। यह कहते हैं कि जो नॉन यूरोपियन कंट्रीज हैं उनका जो नेशनलिज्म
है यह बेसिकली डेरिवेटिव नेशनलिज्म है। क्योंकि इन्होंने जो यह नेशनलिज्म है यह वेस्टर्न कंट्रीज से लिया है। इनका अपना
नेशनलिज्म नहीं है बल्कि जो वेस्टर्न यानी कि जो यूरोपियन कंट्रीज है उनका जो नेशनलिज्म है उसको एज इट इज़ कॉपी किया है,
बोरो किया है। इसीलिए यह जो नेशनलिज्म है, यह बेसिकली डेरिवेटिव नेशनलिज्म है ना कि नॉन यूरोपियन कंट्रीज का खुद का नेशनलिज्म
है। स्क्रीन पर जो आपको इनकी कुछ इंपॉर्टेंट बुक्स दिखाई दे रही है, इनको भी आप अच्छे से नोट कर लें। अगले थिंकर का
नाम आता है पॉल आरब्रास। तो इनका जन्म होता है 1936 में। और खास बात यह है कि यह पॉलिटिकल साइंस और इंटरनेशनल रिलेशन में
जो यूनिवर्सिटी ऑफ पोशिंगटन है वहां से यह सेवानिवृत्त प्रोफेसर रहे हैं। और इन्होंने अपनी प्रमुख कृति जिसका नाम है
एथनिसिटी एंड नेशनलिज्म थ्योरी एंड कंपैरिजन जो 1991 में पब्लिश होती है। इसमें एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट देते हैं
जिसका नाम है इंस्ट्रूमेंटलिज्म। तो इस कांसेप्ट के अंतर्गत पॉल आर ब्रास लिखते हैं कि नेशनलिज्म कुछ भी नहीं है। यह
सिर्फ एक इंस्ट्रूमेंट है, एक टूल है। कहने का मतलब यह है कि यह कहते हैं कि जो नेशनल आइडेंटिटीज होती है या फिर जो
एथनिसिटी होती है या जो नेशनलिज्म होता है इसको टूल की तरह या फिर एक जो इंस्ट्रूमेंट है उसकी तरह यूज़ किया जाता
है किसी भी सोसाइटी में। जो इलीट लोग होते हैं, कंपटिनेंट जो इलीट लोग होते हैं, पावरफुल लोग होते हैं, ऐसे लोग जो सत्ता
चाहते हैं, पावर चाहते हैं, स्टेटस चाहते हैं, वेल्थ चाहते हैं ताकि उन्हें लोगों का सपोर्ट मिल सके। ऑल आर ब्रास के कुछ
इंपॉर्टेंट वक्स भी रहे हैं जो कि आप स्क्रीन पर देख सकते हैं। तो इनको भी आप अच्छे से नोट कर लें। अगले थिंकर का नाम
है एंथोनी डी स्मिथ। तो एंथोनी डी स्मिथ एक ब्रिटिश हिस्टोरिकल सोशियोलॉजिस्ट रहे हैं जो कि नेशनलिज्म और एथनिसिटी के लिए
बहुत जाने जाते हैं और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में यह पढ़ाते थे। अभी यह सेवानिवृत्त हो चुके हैं और साथ में इनकी
डेथ भी 2016 को हुई थी। और सबसे खास बात यह है कि यह जाने जाते हैं सिबिक एंड एथनिक टाइप जो नेशंस है और नेशनलिज्म है
उसके लिए जाने जाते हैं। उसके ऊपर इनका काफी काम रहा है और साथ में इन्होंने कहा कि जो नेशंस होते हैं यह प्री मॉडर्न
ओरिजिन है। यानी कि नेशनलिज्म कोई आधुनिक या मॉडर्न अवधारणा नहीं है बल्कि मॉडर्निज्म से पहले ही जो नेशनलिज्म है या
फिर जो नेशन है वह उदय हुई थी। यानी कि ओरिजिन हुआ था। स्क्रीन पर जो आपको इनके वक्स दिखाई दे रहे हैं, इनको भी आप अच्छे
से नोट कर लें क्योंकि एग्जाम की दृष्टि से बहुत ही इंपॉर्टेंट है। वहीं अगले थिंकर का नाम आता है टॉम नरन। यह बेसिकली
स्कॉटिश थ्यरिस्ट एंड एकेडमिशियन रहे हैं। और खास बात यह है कि जितने भी डिपेंडेंसी थ्योरी के थिंकर्स रहे हैं उनसे यह काफी
मात्रा में इंस्पायर रहे हैं। जैसे कि एजी फ्रैंक आमिर आमीन, इमैनुअल बोलस्टीन इन सभी विचारकों से यह काफी प्रभावित रहे
हैं। और इन्होंने 1977 में अपनी एक प्रसिद्ध किताब लिखी जिसका नाम है द ब्रेकअप ऑफ ब्रिटेन क्राइसिस एंड नियो
नेशनलिज्म। और इसमें इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया जिसका नाम है अनइवन डेवलपमेंट और इसी कांसेप्ट के
अंतर्गत यह कहते हैं कि भले ही जो कैपिटलिज्म का डेवलपमेंट हुआ यह प्रोग्रेसिव था यानी कि जो मॉडर्नाइजेशन
आया कैपिटलिज्म का जो डेवलपमेंट हुआ वो हो सकता है कि प्रोग्रेसिव हो लेकिन कहीं ना कहीं वर्ल्ड लेवल पे यह अनइवन था असामान्य
था अनइक्वल था और ऐसा इसलिए था क्योंकि जितनी भी यूरोपियन कंट्रीज रही है इन्होंने नॉन यूरोपियन कंट्रीज जैसे लैटिन
अमेरिका, एशियन, अफ्रीकन कंट्रीज इन सभी का शोषण किया और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स भी रहे हैं जो कि आप स्क्रीन पर देख सकते
हैं। तो इन सभी वक्स को आप अच्छे से नोट कर लें। अगले थिंकर का नाम है मेलकम एक्स और यह रहे हैं अफ्रीकन अमेरिकन मुस्लिम
मिनिस्टर और यह जाने जाते हैं ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट के लिए। यानी कि यह ह्यूमन राइट्स के बहुत बड़े एक्टिविस्ट
रहे हैं और साथ में जो ह्यूमन सिविल राइट्स है उस मूवमेंट से भी यह जुड़े हैं और साथ में इन्होंने एडवोकेसी की नेशन फॉर
इस्लाम और इन्होंने एक फेमस कोड दिया जिसमें यह कहते हैं कि इफ यू आर अफ्रेड ऑफ ब्लैक नेशनलिज्म यू आर अफ्रेड ऑफ
रेवोल्यूशन एंड इफ यू हैव लव रेवोल्यूशन यू लव ब्लैक नेशनलिज्म। कहने का मतलब यह है कि यह ब्लैक नेशनलिज्म से जुड़े हैं और
यह कहते हैं कि अगर आप भाई ब्लैक नेशनलिज्म से डरते हैं तो आप रेवोल्यूशन से डरते हैं और अगर आप रेवोल्यूशन से
प्यार करते हैं तो आप ब्लैक नेशनलिज्म से प्यार करते हैं। और इन्होंने वहीं दो इंपॉर्टेंट चीजों पर बल दिया। यानी कि
इन्होंने सबसे पहले तो ब्लैक रेवोल्यूशन की बात की। यानी कि जो काले लोग हैं, जो अफ्रीका में रहते हैं, लैटिन अमेरिका में
रहते हैं, उन लोगों के लिए उन लोगों के द्वारा एक रेवोल्यूशन होगी जो कि उनका पॉलिटिकल लिबरेशन होगा जिसको कि ब्लैक
रेवोल्यूशन कहा जाता है। वहीं इन्होंने दूसरी बात की ब्लैक नेशनलिज्म की यानी कि जो काले लोग हैं अफ्रीकन, लैटिन, अमेरिकन
या फिर एशियन जो लोग हैं उनके अंदर भी एक राष्ट्रवाद की भावना हो। यानी कि जो काले लोग हैं, वह आपस में मिलकर काम करें।
यूनिटी से रहे। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स भी रहे हैं जो कि आप स्क्रीन पर देख सकते हैं। तो इनको भी आप अच्छे से नोट कर लें।
अगले थिंकर का नाम है मार्कस गारबे जो कि एक जेमकन एक्टिविस्ट, पॉलिटिकल थ्यरिस्ट, एक्टिविस्ट एंड जर्नलिस्ट रहे हैं। और
सबसे बड़ी बात यह है कि ब्लैक नेशनलिज्म के यह की फाउंडर रहे हैं। और इन्होंने एक सबसे इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया जिसका नाम
है ब्लैक कॉन्शियसनेस। इस कांसेप्ट के अंतर्गत यह कहते हैं कि जो ब्लैक पीपल है उनके अंदर भी एक चेतना होती है और उनकी जो
चेतना होती है वो विकसित होनी चाहिए। यानी कि ऐसा नहीं है कि वो यह समझे कि वे वाइट पीपल से इनफीरियर है बल्कि वे भी यह समझे
कि वे सुपीरियर है। उनकी जो रेस है वो श्रेष्ठ है। वहीं इन्होंने दूसरा एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया जिसका नाम है
ब्लैक नेशनलिज्म। और इसके अंतर्गत यह जो ब्लैक नेशनलिज्म है यानी कि जो काले लोग हैं लैटिन अमेरिकन एशियन या फिर अफ्रीकन
वहां के जो लोग हैं उनको यह यूनाइट होने की बात करते हैं। वे बोलते हैं कि उन्हें यूनाइट रहना होगा और अपने अंदर एक देश
प्रेम यानी कि जो उनकी रेस है उसके प्रति उनको अच्छी भावना रखनी होगी। पॉजिटिव थिंकिंग रखनी होगी। इनके कुछ इंपॉर्टेंट
वर्क्स रहे हैं जो कि आप स्क्रीन पर देख सकते हैं। तो इनको भी आप अच्छे से नोट कर लें। आज की इस प्रेजेंटेशन के लास्ट थिंकर
का नाम है फ्रेडरिक मैनक और यह जर्मन नेशनलिस्ट हिस्टोरियन रहे हैं। और खास बात यह है कि यह जाने जाते हैं हिस्टोरिसिज्म
एंड पॉलिटिकल नेशनलिज्म के लिए और खास बात यह भी है कि जो मार्क्सियन नोशन रहा है नेशनलिज्म का उससे यह काफी प्रभावित रहे
हैं। यानी कि उन्होंने मार्क्स का जो नेशनलिज्म का नोशन है उसको काफी सपोर्ट किया है। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि
जो नेशन हैं उनको इन्होंने दो भागों में बांटा है। तो पहला आता है पॉलिटिकल नेशंस जिसके अंतर्गत इन्होंने कहा कि ग्रीकस,
जर्मंस, रशियंस, इंग्लिश जो लोग हैं या फिर आरिश है ये सारे के सारे पॉलिटिकल नेशंस में आते हैं। वहीं दूसरी तरफ यह बात
करते हैं कल्चरल नेशंस की जिसमें यह कहते हैं कि यूके, यूएसए, फ्रांस जैसे देश कल्चरल नेशंस के उदाहरण हैं। अब हम
मॉडर्नाइजेशन थ्योरी और पॉलिटिकल जो डेवलपमेंट है, पॉलिटिकल मॉडर्नाइजेशन है, उससे जुड़े जितने भी थिंकर्स हैं, उनको
एक-एक करके और उनके आइडियाज को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो इनमें पहला नाम आता है मैक्स वेबर का। तो जब हम बात करते
हैं मैक्स वेबर की, तो यह जर्मन सोशियोलॉजिस्ट रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि यह जाने जाते हैं डेवलपमेंट ऑफ
मॉडर्न वेस्टर्न सोसाइटी और यह फाउंडर रहे हैं मॉडर्न सोशियोलॉजी के। और सबसे बड़ी बात यह है कि जो मॉडर्नाइजेशन थ्योरी 1950
के दशक में शुरू हुई उसके ये पाइनियर माने जाते हैं और यह जाने जाते हैं एक इंपॉर्टेंट थीसिस के लिए जिसका टाइटल था
प्रोटेस्टेंट एथिक एनकरेजेस द डेवलपमेंट कैपिटलिज्म और खास बात यह भी है कि इन्होंने ब्यूरोक्रेसी का एनालिसिस किया
और इन्होंने पॉलिटिकल डेवलपमेंट को लीगल और जो एडमिनिस्ट्रेटिव डेवलपमेंट है उसके साथ लिंक किया। मैक्स बेबर के स्क्रीन पर
जितने भी आपको वक्स दिखाई दे रहे हैं, आप इनको नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी हैं। अगले थिंकर का नाम
आता है टालकट पार्संस। तो टालकट पार्संस की जब हम बात करते हैं तो सबसे पहले हमें यह जानना है कि यह अमेरिकन सोशियोलॉजिस्ट
रहे हैं। और यह जाने जाते हैं सोशल एक्शन थ्योरी और जो सोशियोलॉजी में स्ट्रक्चरल फंक्शनल एप्रोच है उसके लिए। और खास बात
यह भी है कि इन्होंने 1950 के दशक में जो मॉडर्नाइजेशन थ्योरी है इसको आगे डेवलप किया। और खास बात यह भी है कि जो 20थ
सेंचुरी में सोशियोलॉजी है उसके यह मोस्ट इनफ्लुएंशियल फिगर माने जाते हैं। और 1949 में अमेरिकन सोशियोलॉजिकल जो एसोसिएशन है
उसके ये प्रेसिडेंट इ होते हैं। और इन्होंने अपने प्रमुख एस्स ऑन द कांसेप्ट ऑफ पॉलिटिकल पावर प्रसीडिंग्स ऑफ द
अमेरिकन फिलॉसोफिकल सोसाइटी जो कि 1963 को पब्लिश होता है। इसमें इन्होंने एक कॉन्सेप्ट दिया जिसमें कहा पावर इज़ लाइक
मनी। यानी कि जो शक्ति होती है वह पैसे की तरह होती है। इन्होंने पावर की तुलना यानी कि शक्ति की तुलना मनी से की। तालकट
पार्संस के जितने भी आपको वर्क्स दिखाई दे रहे हैं, आप इनको भी अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए यह भी बहुत ही
जरूरी हैं। मॉडर्नाइजेशन थ्योरी के अगले थ्योरिस्ट आते हैं डेविड एप्टर। तो यह अमेरिकन सोशियोलॉजिस्ट और पॉलिटिकल
साइंटिस्ट रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि यह जाने जाते हैं इनके प्रमुख आईडिया सोशियोलॉजी ऑफ डेवलपिंग नेशंस और खास बात
यह है कि इनका जो वर्क रहा है द पॉलिटिक्स ऑफ मॉडर्नाइजेशन जो कि 1965 को पब्लिश होता है। इसमें इन्होंने डेवलपमेंट और
मॉडर्नाइजेशन को डिफरेंशिएट किया और इन्होंने घाना और इंग्लैंड के ऊपर स्टडी की और खास बात यह भी है कि जो अफ्रीकन
पॉलिटिक्स है उसके ऊपर इन्होंने एक्सटेंसिव रिसर्च किया और इन्होंने यह कहा कि अगर मॉडर्नाइजेशन को समझना है तो
तीन टर्म्स को समझना होगा। जिसमें पहली टर्म आती है द एनालिसिस ऑफ ट्रेडिशंस। यानी कि इसमें जो ट्रेडिशंस होती है,
परंपराएं होती है, उनका एनालिसिस किया जाता है। कैसे परंपराएं अस्तित्व में आई। फिर दूसरा आता है एन इनोवेशन सोशल सिस्टम
यानी कि जो इनोवेटिव सोशल सिस्टम है जिसमें इन्वेंशन होते हैं। फैमिलीज अस्तित्व में आती है, फैमिलीज़ बनती है।
उसमें यह आता है। फिर अगला आता है कि जो एडवांस टेक्नोलॉजी वर्ल्ड है उनके पास स्किल आती है, नॉलेज आता है, कैपिटल आता
है और एडवांस लेवल पे जो मॉडर्निटी है, वह राइज़ कर जाती है। डेविड एप्टर ने अपने प्रमुख वर्क द पॉलिटिक्स ऑफ मॉडर्नाइजेशन
में मॉडर्नाइजेशन की चार इंपॉर्टेंट स्टेजेस की बात की। जिनमें पहली स्टेज आती है स्टेज ऑफ कांटेक्ट एंड कंट्रोल। यह एक
ऐसी स्टेज है जहां से ग्लोबलाइजेशन की शुरुआत हुई। ट्रेड की शुरुआत हुई। एग्जांपल के लिए इंडिया में ईस्ट इंडिया
कंपनी आई। उसने सबसे पहले इंडिया में कांटेक्ट किया। उसके बाद इंडिया का जो एडमिनिस्ट्रेटिव पॉलिटिकल और जो
सोशियोइकोनॉमिक सिस्टम है उसको कंट्रोल किया और दूसरी स्टेज आती है स्टेज ऑफ रिएक्शन एंड काउंटर एक्शन यानी कि जो
कॉलोनाइज्ड कंट्री है जब इनका व्यापक मात्रा में एक्सप्लइटेशन हुआ बड़ी मात्रा में शोषण हुआ तो इन्होंने रिएक्शन किया
काउंटर एक्शन किया और तीसरी स्टेज आती है स्टेज ऑफ कंट्राडिक्शन एंड इमसिपेशन इसमें क्या होता है कि जो कॉलोनाइजर है और जो
कॉलोनाइज्ड है इनके बीच कंट्राडिक्शन होता है और जो कॉलोनाइज्ड कंट्री है इनके द्वारा अब इमसिपेशन के लिए नेशनल मूवमेंट
चलाए जाते हैं और इनको इमेंसिपेशन मिल जाती है। फ्रीडम मिल जाती है यानी कि डीलोनाइजेशन हो जाता है। लेकिन इसके बाद
फोर्थ स्टेज आती है पोस्ट इंडिपेंडेंस। यानी कि जब इन सभी देशों को इमसिपेशन मिल जाती है, आजादी मिल जाती है तो इन सभी
देशों के द्वारा अपने-अपने देशों में न्यू जनरेटिव सॉलशंस किए जाते हैं। यानी कि कुछ पॉलिसीज और प्रोग्राम्स को अपनाया जाता
है। फॉर एग्जांपल इंडिया ने अपने देश में आजादी के बाद सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ सोसाइटी अपनाया। लैंड रिफॉर्म्स किए,
एग्रीकल्चरल रिफॉर्म्स किए, फाइव ईयर प्लांस अपनाए। वहीं नोट करने वाली बात यह भी है कि डेविड एप्टर ने यह कहा कि
कमर्शियलाइजेशन, इंडस्ट्रियलाइजेशन, इनोवेशन और जो कॉलोनियलिज्म है, यह मॉडर्नाइजेशन के सबसे प्रमुख एलिमेंट रहे
हैं। इन्होंने मॉडर्नाइजेशन को लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इन्होंने अपने प्रमुख वर्क द पॉलिटिक्स ऑफ मॉडर्नाइजेशन
में इस आइडिया को रिजेक्ट किया, क्रिटिसाइज किया। जिसमें यह कहा गया था कि जो डेवलपिंग नेशंस हैं उनको भी वही रास्ता
डेवलप करने के लिए मॉडर्नाइज करने के लिए अपनाना पड़ेगा। जो वेस्टर्न नेशन है जो डेवलप हो चुके हैं ऑलरेडी उन्होंने अपनाया
था। डेविड एप्टर के जितने भी इंपॉर्टेंट वक्स आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं, आप इनको भी अच्छे से नोट कर लें क्योंकि
आपके एग्जाम के लिए यह भी बहुत ही जरूरी हैं। मॉडर्नाइजेशन थ्योरी के सबसे इंपॉर्टेंट थिंकर का नाम आता है वाल्ट
विटमैन। रोस्टब। तो जब हम इनकी बात करते हैं तो यह अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट और इकोनॉमिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है
कि इनको जाना जाता है स्टेजेस ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ के लिए और इनका जो इकोनॉमिक मॉडल है इसको जाना जाता है रुस्तोबियन टेक ऑफ मॉडल
और इन्होंने जो इनका इकोनॉमिक मॉडल है उसको कंपेयर किया फ्लाइट ऑफ एन एरोप्लेन के साथ और इन्होंने यह भी कहा कि जितनी भी
कंट्रीज है उनके पास यह पोटेंशियल था कि वे जो पॉवर्टी है उसके साइकिल को ब्रेक कर सके तोड़ सकें और खास बात यह भी है कि जो
इनका वर्क है द स्टेजेस ऑफ इकोनमिक ग्रोथ और नॉन कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो जो कि 1960 में पब्लिश होता है। इसमें इन्होंने
इकोनॉमिक ग्रोथ की फाइव स्टेजेस की बात की। अब हम डब्ल्यूडब्ल्यू रुस्तो के द्वारा इकोनॉमिक ग्रोथ की फाइव स्टेजेस को
देख लेते हैं। तो इनमें पहली स्टेज आती है ट्रेडिशनल सोसाइटी। इसकी कुछ इंपॉर्टेंट फीचर्स है। जिनमें पहली आती है कि उस समय
जो इकोनमी थी वह डोमिनेट की गई थी सब्सिस्टेंस एक्टिविटीज के द्वारा। उस समय बार्टर सिस्टम था और एग्रीकल्चर मोस्ट
इंपॉर्टेंट सेक्टर था और टेक्नोलॉजी ना के बराबर थी और जो फैमिली रिलेशनशिप है उसका डोमिनेंस था और हायरार्किकल सोशल
स्ट्रक्चर था। वहीं दूसरी स्टेज आती है प्री कंडीशन फॉर टेक ऑफ। इसमें यह होता है कि एग्रीकल्चर में रेवोल्यूशन आ जाती है
और जो प्रोडक्टिविटी है वह इनक्रीज हो जाती है और सबसे बड़ी बात यह है कि इस दौर में यानी कि इस फेज में ट्रेड का विकास
होता है। ट्रेड के लिए जो ट्रांसपोर्ट है उसका भी इमरजेंस हो जाता है और जो ट्रेड से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर है उसका भी
डेवलपमेंट होने लगता है। तीसरी स्टेज आती है टेक ऑफ। इसमें क्या होता है कि अर्बनाइजेशन और जो इंडस्ट्रियलाइजेशन है
उसकी शुरुआत होती है। कैपिटलिज्म का इमरजेंस हो जाता है और जो मार्केट्स है उनका एक्सपेंशन हो जाता है और जो
ट्रांसपोर्टेशन है उसका भी डेवलपमेंट हो जाता है। रेल, स्टील, कोल इंडस्ट्री इन सभी का डेवलपमेंट हो जाता है। वहीं अगली
फीचर आती है ड्राइव टुवर्ड्स मैच्योरिटी। इसकी कुछ इंपॉर्टेंट फीचर्स है। जैसे जो अर्बनाइजेशन है और इंडस्ट्रियलाइजेशन है
इसका और ज़्यादा डेवलपमेंट हो जाता है। और ज़्यादा एक्सपेंड हो जाता है। और इकोनमी जो है उसका डायवर्सिफिकेशन हो जाता है और जो
स्किल्स है उसका डेवलपमेंट हो जाता है। वर्कर्स की जो वेजेस हैं उसको भी इनक्रीज कर दिया जाता है। और सबसे बड़ी बात यह है
कि इसमें इकोनॉमिक जो ग्रोथ रेट है वह काफी बढ़ जाती है और जो पर्सनल और नेशनल इनकम है वह भी इनक्रीज हो जाती है। वहीं
इसकी लास्ट फीचर आती है द हाई मास कंसमशन जिसकी कुछ इंपॉर्टेंट फीचर्स है कि इसमें डोमिनेंस रहता है सेकेंडरी और जो टर्शरी
सेक्टर्स है उनका। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो इकोनमी है अब मूव कर जाती है मास कंजमशन की तरफ। और तीसरी बड़ी बात यह है
कि इसमें हाई लेवल इकोनॉमिक एक्टिविटीज होती है और जो मल्टीीनेशनल कंपनीज है उनका इमरजेंस हो जाता है और सबसे बड़ी बात यह
है कि जो सोशल वेलफेयर है उसमें जो इंटरेस्ट है वह इनक्रीस हो जाता है। स्क्रीन पर आपको इनके जितने भी वक्स दिखाई
दे रहे हैं आप इनको अच्छे से नोट कर लें। अगले थिंकर का नाम आता है सैमुअल पी हंटिंगटन। तो सैमुअल पी हंटिंगटन अमेरिकन
पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। इन्होंने अपनी रिसर्च में, अपनी स्टडी में कुछ इंपॉर्टेंट आइडियाज को क्रिएट किया।
जिनमें पहला आता है क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन। दूसरा आता है पॉलिटिकल डेवलपमेंट। तीसरा आता है पॉलिटिकल डिके। चौथा आता है गैप
हाइपोथेसिस। पांचवा आता है थ्री वेव्स ऑफ डेमोक्रेटाइजेशन और छठा आता है पॉलिटिकल मॉडर्नाइजेशन। अब हम सैमुअल पी हंटिंगटन
के द्वारा दी गई सबसे इंपॉर्टेंट थ्योरी जिसका नाम है पॉलिटिकल डेवलपमेंट। इसको समझ लेते हैं। तो इन्होंने अपने प्रमुख
वर्क द पॉलिटिकल डेवलपमेंट एंड पॉलिटिकल डीके जो कि 1993 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने पॉलिटिकल डेवलपमेंट का कांसेप्ट
दिया। और दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने पॉलिटिकल डेवलपमेंट को डिफाइन किया एज द इंस्टीट्यूशन ऑफ पॉलिटिकल
ऑर्गेनाइजेशन एंड प्रोसीजर्स। और तीसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने कहा कि अगर हम किसी सोसाइटी में पॉलिटिकल डेवलपमेंट का
पता लगाना चाहते हैं तो इसको हम मेजर कर सकते हैं बाय द डिग्री ऑफ इंस्टीट्यूशनलाइजेशन।
इसका मतलब यह है कि हमें यह देखना पड़ेगा कि किसी सोसाइटी में जो इंस्टीटशंस है उसका कितना डेवलपमेंट हुआ है। क्योंकि उसी
से हम पता लगा सकते हैं कि कोई सोसाइटी पॉलिटिकली कितनी डेवलप है। सैमुल पी हंटिंगटन ने अपने प्रमुख वर्क पॉलिटिकल
डेवलपमेंट एंड पॉलिटिकल डिकेड जो कि 1993 को पब्लिश होता है। इसमें इन्होंने मॉडर्नाइजेशन के पांच इंपॉर्टेंट फॉर्म्स
की बात की है। इसमें पहला फॉर्म आता है साइकोलॉजी लेवल। इसका मतलब यह है कि प्रायर जो इंडिविजुअल की वैल्यूज़ थी,
एटीट्यूड्स थे, एक्सपेक्टेशंस थे, उनका किस तरह से फंडामेंटल शिफ्ट होता है। यानी कि जब हम ट्रेडिशनल सोसाइटी में रहते थे,
तो उस समय जो हमारी वैल्यूज़ थी, एटीट्यूड्स थे या फिर एक्सपेक्टेशंस थी, उनका किस तरह से फंडामेंटल शिफ्ट हो जाता
है और हम जैसे-जैसे मॉडर्नाइज्ड हो जाते हैं, हमारी जो वैल्यूज़ है, एटीट्यूड्स हैं, एक्सपेक्टेशंस है, वह चेंज हो जाते
हैं। इसका दूसरा फॉर्म आता है इंटेलेक्चुअल लेवल। इसका मतलब यह है कि ग्रोथ ऑफ नॉलेज हो जाती है। एजुकेशन का
एक्सपेंशन हो जाता है। लिटरेसी रेट बढ़ जाता है। जो इंटेलेक्ट है और जो विज़डम है उसका भी एक्सपेंशन हो जाता है। और तीसरा
जो लेवल आता है, यह आता है डेमोग्राफिकल लेवल। इसका मतलब यह है कि जो लोगों के पैटर्न्स ऑफ लाइफ है वह चेंज हो जाते हैं।
हेल्थ जो है वह इनक्रीज हो जाती है। यानी कि अब लोग कम बीमार पड़ते हैं और अगर बीमार पड़ते हैं तो डेथ है वह कम हो जाती
है क्योंकि हेल्थ फैसिलिटीज इनक्रीस हो गई है। इसके अलावा जो लाइफ स्टैंडर्ड है वह इनक्रीज हो जाते हैं। साथ में जो है लोगों
का जो सोशल स्टेटस है या फिर जो इकोनॉमिक लाइफ है वह भी इनक्रीज हो जाती है। और अगला पॉइंट आता है सोशल सोशल का मतलब यह
है कि जो ट्रेडिशनल हमारा फैमिली स्टाइल था वह चेंज हो जाता है। जैसे हम पहले एक जो जॉइंट फैमिली थी उसमें रहते थे। लेकिन
अब हम मॉडर्नाइज हो गए हैं तो हमारा जो फैमिली स्ट्रक्चर है या सोशल लाइफ है वो भी चेंज हो जाती है। और अगली आती है
इकोनॉमिक। इसमें क्या होता है कि जो हमारा एग्रीकल्चर है वह शिफ्ट हो जाता है। अब वह मार्केट एग्रीकल्चर बन जाता है जो बिजनेस
के साथ जुड़ता है। ट्रेड के साथ जुड़ता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इस दौर में अब पैसा बहुत इंपॉर्टेंट हो जाता है। पैसा
काफी बढ़ जाता है। इंडस्ट्रीज का एक्सपेंशन हो जाता है। कॉमर्स बढ़ जाता है। ट्रेड बढ़ जाता है। तो इस तरह से जो
है इकोनॉमिक लाइफ भी अब लोगों की चेंज हो जाती है। सैमुल पी हंटिंगटन ने पॉलिटिकल मॉडर्नाइजेशन की कुछ इंपॉर्टेंट फीचर्स
बताई है। जिनमें पहली फीचर आती है अर्बनाइजेशन। दूसरी फीचर आती है इंडस्ट्रियलाइजेशन।
तीसरी फीचर आती है सेकुलराइजेशन। चौथी फीचर आती है डेमोक्रेटाइजेशन। पांचवी फीचर आती है एजुकेशन और छठी फीचर आती है
मीडिया पार्टिसिपेशन। आप इन सभी फीचर्स को अच्छे से याद कर लें। हम इसको डिटेल में डिस्कस नहीं करेंगे क्योंकि यह बेसिक
पॉइंट्स हैं और ऑलरेडी हमने इन सभी पॉइंट्स को डिस्कस किया है। सैमुअल पी हंटिंगटन ने अपने एक और प्रमुख वर्क जिसका
टाइटल था नो इजी चॉइस पिटिकल पार्टिसिपेशन इन डेवलपिंग कंट्रीज जो कि इन्होंने 1976 में नेल्सन के साथ पब्लिश किया। इसमें
हंटिंगटन ने मॉडर्नाइजेशन के पांच इंपॉर्टेंट मॉडल्स की बात की। जिनमें पहला मॉडल आता है लिबरल मॉडल। इसमें बेसिकली
आता है कि किस तरह से लिबरलाइजेशन आता है, इंडिविजुअलिज्म आता है, लिबरल जो वैल्यूस है उसकी शुरुआत कैसे होती है और जो
डेमोक्रेटाइजेशन है या फिर लिबरल डेमोक्रेसी है उसमें यह आता है। फिर अगला आता है डेवलपमेंटल मॉडल ऑफ वर्जुआजी। यानी
कि जो डेवलपमेंट होता है कैपिटलिज्म का वह कैसे होता है? वर्चुअ क्लास कैसे एग्जिस्टेंस में आती है? उनका किस तरह का
रोल रहता है? फिर अगला आता है डेस्पोटिक मॉडल यानी कि जो टिरमी है या फिर डिक्टेटरशिप है या मिलिट्री रिजीम है
उसमें हम इन सभी चीजों को डिस्कस करते हैं। फिर अगला आता है टेक्नोलॉजिकल मॉडल यानी कि जो टेक्नोलॉजी है उसका जन्म कैसे
होता है या फिर जो हम टेक्नोलॉजी है उसको किस तरह से डेवलपमेंट करते हैं। फिर अगला आता है पीपल्स पार्टिसिपेशन मॉडल कि लोग
किस तरह से जो है पार्टिसिपेशन करते हैं एनजीओस में, गवर्नमेंट में, पॉलिटिक्स में, इलेक्शंस होते हैं या फिर पॉलिसी
मेकिंग होती है। यह सभी की सभी चीजें पीपल्स पार्टिसिपेशन मॉडल में आती है। नोट करने वाली बात यह भी है कि सैमुअल पी
हंटिंगटन ने मॉडर्नाइजेशन को डिफाइन किया ए मल्टीफेज्ड प्रोसेस दैट इनवॉल्व्स चेंजेस इन ऑल एरियाज ऑफ ह्यूमन थॉट एंड
एक्टिविटी इन अ डेवलपिंग सोसाइटी। वहीं दूसरी तरफ सैमुअल पी हंटिंगटन ने अपने इसी प्रमुख वर्क पॉलिटिकल डेवलपमेंट एंड
पॉलिटिकल डिके जो कि 1993 को पब्लिश होता है। इसमें इन्होंने पॉलिटिकल डेवलपमेंट की चार इंपॉर्टेंट कैटेगरीज को डिस्कस किया
है। पहली कैटेगरी आती है रैशनलिज्म यानी कि किस तरह से लोग तर्क को डेवलप करते हैं। रीजन को डेवलप करते हैं। एजुकेशन का
डेवलपमेंट कैसे होता है। दूसरा इसमें आता है नेशनलिज्म यानी कि किस तरह से लोग एक नेशन के रूप में अपने आप को संगठित करते
हैं। नेशनलिज्म का इमरजेंस होता है और अगला पॉइंट आता है डेमोक्रेटाइजेशन। यानी कि लोग किस तरह से जो डेमोक्रेटिक वैल्यूज़
होती है उसको अडॉप्ट करते हैं। और अगला पॉइंट आता है मोबिलाइजेशन। जिसका मतलब यह है कि लोग किस तरह से पॉलिटिकल
पार्टिसिपेशन करते हैं। पॉलिटिकल साइंस में, पॉलिटिकल प्रोसेस में, एनजीओस के द्वारा, पॉलिटिकल पार्टीज के द्वारा और जो
प्रेशर ग्रुप्स हैं उनके द्वारा। अब हम सैमुअल पी हंटिंगटन के सबसे इंपॉर्टेंट कांसेप्ट को समझ लेते हैं जिसका नाम है
पॉलिटिकल डिके। तो पॉलिटिकल डके का जो कांसेप्ट है इसको इन्होंने दिया था अपने प्रमुख वर्क पॉलिटिकल डेवलपमेंट एंड
पॉलिटिकल डके जो कि 1993 को पब्लिश होता है। तो सबसे बड़ी बात यह है कि हंटिंगटन ने यह कहा कि जो डेवलपिंग नेशंस हैं उनके
बीच मॉडर्नाइजेशन की रेस लग जाती है जो कि कभी कबभार जो डेवलपिंग नेशंस हैं उनमें डिसऑर्डर पैदा कर देती है। और ऐसा इसलिए
है क्योंकि यह कहते हैं कि जो डेवलपिंग नेशंस हैं उनके बीच जो मॉडर्नाइजेशन की रेस है इकोनॉमिक और सोशल चेंज तो आता है
लेकिन दूसरी तरफ जो इंस्टीटशंस है वो डेवलपमेंट नहीं हो पाता है और जैसे ही डेवलपमेंट नहीं हो पाता है इंस्टीिटशंस का
तो जो पॉलिटिकल और सोशल चेंज है इकोनॉमिक चेंज है वह आगे निकल जाता है लेकिन जो इंस्टीटशंस है वह पिछड़ जाते हैं और इसी
को इन्होंने पॉलिटिकल डके कहा है एसपी हंटिंगटन के जितने भी वक्स आपको दिखाई दे रहे हैं, इनको भी आप अच्छे से नोट कर लें
या फिर स्क्रीनशॉट ले लें। नेक्स्ट थिंकर का नाम आता है लूजियन पाय। तो जब हम इनकी बात करते हैं तो सबसे पहले हमें यह जानना
है कि यह अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं और सिनोलॉजिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि कंपैरेटिव पॉलिटिक्स के
एक्सपर्ट रहे हैं। इनको चाइना के लीडिंग स्कॉलर के रूप में देखा जाता है जिन्होंने यूएस में जाकर स्टडी की। और दूसरी बड़ी
बात यह है कि यह जाने जाते हैं पॉलिटिकल कल्चर और जो पॉलिटिकल साइकोलॉजी है उसके लिए और इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट
दिया पॉलिटिकल डके का या आप यह भी कह सकते हैं डके ऑफ पॉलिटिकल डेवलपमेंट ऑन द बेसिस ऑफ़ स्टडी ऑफ़ इंग्लैंड्स पॉलिटिकल सिस्टम।
यह बहुत ही इंपॉर्टेंट पॉइंट है। इसको आप नोट कर लें। और यह भी इंपॉर्टेंट बात है कि इन्होंने कुछ डेवलपिंग नेशंस का जो
पॉलिटिकल सिस्टम है उसकी स्टडी की जिनमें नाम है चाइना, बर्मा, मलेशिया। लूजियन पाई का एक इंपॉर्टेंट वर्क पब्लिश होता है।
इसका टाइटल था एस्पेक्ट्स ऑफ पॉलिटिकल डेवलपमेंट और इन्होंने इसमें पॉलिटिकल डेवलपमेंट के तीन इंपॉर्टेंट डिटरमिनेंट्स
को डिस्कस किया था। जिनमें पहला आता है इक्वलिटी, दूसरा आता है कैपेसिटी और तीसरा आता है डिफरेंशिएशन। इक्वलिटी में हम बात
करते हैं पॉलिटिकल इक्वलिटी की। इसमें हम यह भी देखते हैं कि जो पार्टिसिपेशन का लेवल है यानी कि जो पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन
है वह कितना गहरा है। किसी सोसाइटी में लोग किस हद तक या किस सीमा तक पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन करते हैं। वहीं दूसरी तरफ
कैपेसिटी में आता है कि कैपेसिटी ऑफ द स्टेट यानी कि स्टेट की क्या कैपेसिटी है? वह किस तरह की पॉलिसीज प्रोग्राम बनाता
है? लॉ को किस तरह से मेंटेन करता है? ऑर्डर को किस तरह से मेंटेन करता है? और तीसरा आता है डिफरेंशिएशन जिसमें हम यह
देखते हैं कि जो इंस्टीटशंस होते हैं डिफरेंट-डिफरेंट उनके क्या फंक्शनंस होते हैं। दूसरा आता है कि जो स्पेशलाइज्ड बॉडी
होती है जिनके अलग-अलग अपने-अपने फंक्शनंस होते हैं उनका क्या रोल होता है? किस तरह के इनके फंक्शनंस होते हैं। वहीं दूसरी
तरफ लुसियन पाई ने पॉलिटिकल डेवलपमेंट के क्राइसिस की बात की। इन्होंने इसमें कुल मिलाकर छह इंपॉर्टेंट क्राइसिस की बात की
जो कि मॉडर्नाइजेशन और जो पॉलिटिकल डेवलपमेंट होता है उसमें आते हैं। तो पहला क्राइसिस आता है द आइडेंटिटी क्राइसिस।
दूसरा आता है द लेजिटिमेसी क्राइसिस। तीसरा आता है द पेनिट्रेशन क्राइसिस। चौथा आता है द पार्टिसिपेंट क्राइसिस। पांचवा
आता है द इंटीग्रेशन क्राइसिस। और छठा आता है द डिस्ट्रीब्यूशन क्राइसिस। लुसियन पाई के जितने भी बक्स आपको स्क्रीन पर दिखाई
दे रहे हैं, इनको आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी हैं। अगले थिंकर का नाम आता है एडवर्ड
शील्स। तो यह अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट और सोशियोलॉजिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने पॉलिटिकल डेवलपमेंट को
नेशन बिल्डिंग के साथ जोड़ के देखा और जितने भी इनके जो वर्क्स है आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं आप इनको अच्छे से नोट
कर लें। 1960 को एडवर्ड शील्ड्स का सबसे इंपॉर्टेंट वर्क पब्लिश होता है। इसका टाइटल था पॉलिटिकल डेवलपमेंट इन न्यू
स्टेट्स जिसमें इन्होंने पांच प्रकार के पॉलिटिकल सिस्टम्स की बात की। इसमें पहला आता है पॉलिटिकल डेमोक्रेसी। इसमें
बेसिकली यह होता है कि रूल ऑफ लॉ होता है और जो लॉ है वह लेजिस्लेचर के द्वारा बनाए जाते हैं। इसमें जो सिटीजंस होते हैं उनको
वेरियस राइट्स मिलते हैं। पीरियडिक इलेक्शंस होते हैं और इंडिपेंडेंट जुडिशरी होती है। वहीं दूसरा जो आता है वह आता है
ट्यूटलरी डेमोक्रेसी जिसको आप प्रोटेक्टिव या फिर अह दूसरा आता है इसमें ट्यूटिलरी डेमोक्रेसी
जिसको आप प्रोटेक्टेड डेमोक्रेसी भी कहते हैं। इसमें बेसिकली यह होता है कि जो एग्जीक्यूटिव होता है उसका डोमिनेंस होता
है और प्रेस जो होती है उसके ऊपर लिमिटेशंस होती है, चेकक्स होती है और जो इलीट्स होते हैं उनका कंट्रोल होता है
मासेस के ऊपर। बेसिकली यह इलीट डेमोक्रेसी होती है। यहां पर डेमोक्रेसी तो होती है लेकिन डेमोक्रेटाइजेशन या फिर जो प्योर
डेमोक्रेटिक रिजीम होता है वह नहीं होता है। तीसरा इसमें आता है मॉडर्नाइजिंग ओलगाकी। इसमें यह होता है कि जो पावर होती
है वह कुछ फ्यू जो सिविलियंस होते हैं उनके हाथ में होती है और उनके द्वारा जो रिजीम चलाया जाता है शासन चलाया जाता है
वह आर्म्ड फोर्सेस की मदद से चलाया जाता है। यहां पर जो लेजिस्लेचर होती है वह वीक होती है। जुडिशरी कमजोर होती है और टाइमली
कोई इलेक्शंस नहीं होते हैं। और अगला जो आता है इसका टाइटल है टोटलिटेरियन। वहीं नेक्स्ट आता है टोटिटेरियन ओलगार्की।
इसका मतलब यह होता है कि यहां पर डोमिनेंस होता है एक आईडियोलॉजी का और यहां पर कोई अपोजिशन नहीं होता है। लोगों को कोई
पॉलिटिकल राइट्स नहीं मिलते हैं। कोई सिविल राइट्स नहीं मिलते हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि यहां पर किसी भी तरह का
कोई पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन नहीं होता है। और पांचवा आता है ट्रेडिशनल ओलगार्की। इसमें यह होता है कि जो डायनेस्टिक रिजीम
आते हैं वहीं पांचवा आता है ट्रेडिशनल ओलगार्की। इसमें जो डायनेस्टिक रूलर्स होते हैं उनका
शासन होता है। इसमें जो मोनार्की होती है एंशिएंट टाइम में उसकी बात इसमें आती है। इसमें जो ट्रेडिशंस होती है और जो
रिलीजियस बिलीफ्स होते हैं उनको प्रायोरिटी दी जाती है और जो गवर्नमेंट होती है वह बहुत वीक होती है। अगले थिंकर
का नाम आता है ऑर्गन्स की। तो ऑर्गेंस्की इटालियन बोर्न अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि यह
जाने जाते हैं इनके एक प्रमुख आइडिया के लिए जिसका टाइटल था पावर ट्रांजिशन थ्योरी और इन्होंने अपने प्रमुख वर्क पावर
पॉलिटिक्स जो कि 1958 को पब्लिश होती है। इन्होंने इसमें एक अजीबोगरीब अवधारणा दी जिसमें इन्होंने यह कहा कि अगर बैलेंस ऑफ़
पावर की सिचुएशन होती है, तो वहां पर बहुत ज़्यादा पॉसिबिलिटी होती है वॉर होने की। और इन्होंने यह कहा कि अगर पीस को
एस्टैब्लिश करना है, तो इमंबैलेंस ऑफ़ पावर होना चाहिए। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जिनमें पहला आता है द स्टेजेज़ ऑफ़
पॉलिटिकल डेवलपमेंट। इसको तो आप अच्छे से याद कर लें। और दूसरा आता है वर्ल्ड पॉलिटिक्स। ऑर्गेंस्की ने अपने प्रमुख
वर्क जिसका टाइटल था द स्टेजेस ऑफ पॉलिटिकल डेवलपमेंट जो कि 1965 को पब्लिश होता है। इसमें इन्होंने पॉलिटिकल
डेवलपमेंट की फोर स्टेजेस की बात की थी जिसको कि जाना जाता है ऑर्गन्स की मॉडल और इसकी पहली स्टेज थी स्टेज ऑफ यूनिफिकेशन।
इसमें जो ट्रेडिशनल सोसाइटी होती है उनका यूनिफिकेशन होने लगता है। उनका इंटीग्रेशन होने लगता है। फिर दूसरी स्टेज आती है
स्टेज ऑफ इंडस्ट्रियलाइजेशन। इस दौर में इंडस्ट्रियलाइजेशन शुरू होता है। फैक्ट्रीज कैपिटलिज्म का इमरजेंस होता है।
फिर तीसरी जो स्टेज आती है जब कैपिटलिज्म आ जाता है तो फिर वेलफेयर के जो काम है वह शुरू होते हैं। लोगों के लिए सुविधाएं दी
जाती है। लाइब्रेरीज एजुकेशनल इंस्टीटशंस को डेवलप किया जाता है। सड़कें बनाई जाती है। रेलवेेज को क्रिएट किया जाता है। और
फिर अगला जो स्टेज आता है, वह आता है स्टेज ऑफ़ सफिशिएंसी। इसमें हर प्रकार की प्रचुरता होती है। यानी कि हर चीज होती
है। हाई लेवल की मॉडर्नाइजेशन होता है। टेक्नोलॉजी होती है। अगले थिंकर का नाम आता है लनार्ड बाइंडर। तो यह अमेरिकन
पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह जाने जाते हैं अपने एक इंपॉर्टेंट वर्क के लिए जिसका टाइटल था
क्राइसिस एंड सीक्वेंसेस इन पॉलिटिकल डेवलपमेंट जो कि 1971 को पब्लिश होता है। और इस महत्वपूर्ण वर्क में इन्होंने
पॉलिटिकल डेवलपमेंट के चार क्राइसिस की बात की है। जिनमें पहला आता है क्राइसिस ऑफ़ आइडेंटिटी। दूसरा आता है क्राइसिस ऑफ
कंसोलिडेशन। तीसरा आता है क्राइसिस ऑफ लेजिटिमेसी। चौथा आता है क्राइसिस ऑफ कलेक्शन ऑफ रिसोर्सेज। और नोट करने वाली
बात यह भी है कि इन्होंने यह कहा कि जो तीन इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है और नोट करने वाली बात यह भी है कि
इन्होंने यह कहा कि लुसियन पाई के पॉलिटिकल डेवलपमेंट रिगार्डिंग जो तीन इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है इक्वलिटी कैपेसिटी
एंड डिफरेंशिएशन इसको इन्होंने एज अ शॉर्टहड डिस्क्रिप्शन ऑफ द सिंड्रोम ऑफ मॉडर्निटी के रूप में विचारा। इनके कुछ
इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं जो आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं। मॉडर्नाइजेशन थ्योरी में अगला नाम आता है डेनियल लर्नर का जो
कि एक अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह जाने जाते हैं इनकी जो स्टडी रही है
मॉडर्नाइजेशन थ्योरी के ऊपर और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने मीडिया डेवलपमेंट और जो डेवलपमेंट कम्युनिकेशन है उसके ऊपर
काम किया। इनका जो वर्क रहा है द पासिंग ऑफ ट्रेडिशनल सोसाइटी मॉडर्नाइजिंग द मिडिल ईस्ट जो कि 1958 को पब्लिश होता है।
इसमें इन्होंने मॉडर्नाइजेशन थ्योरी को दिया और खास बात यह भी है कि इनका जो यह वर्क है ऐसा माना जाता है कि सोशल थ्योरी
ऑफ़ मॉडर्नाइजेशन के ऊपर फर्स्ट पब्लिश्ड वर्क है और इन्होंने जो मॉडर्नाइजेशन है उसको इन्होंने जो वेस्टर्न ग्रोथ मॉडल है
उसके साथ जोड़ के देखा और इन्होंने इसके चार इंपॉर्टेंट एस्पेक्ट्स बताए जिनमें पहला आता है पॉलिटिकल अर्बनिज्म दूसरा आता
है मास लिटरेसी तीसरा आता है मीडिया पार्टिसिपेशन और चौथा आता है पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन। दूसरी तरफ लर्नर यह कहते
हैं कि जो मॉडर्नाइजेशन है, यह न्यू टर्म है फॉर ओल्ड प्रोसेससेस। यानी कि इसमें यह मानते हैं कि शब्दावली चेंज हुई है।
प्रोसेस ओल्ड ही है। और ऐसा इसलिए है क्योंकि यह कहते हैं कि इसको यूरोपियनाइजेशन भी कहा जाता है। सेकंड
वर्ल्ड वॉर के बाद इसको अमेरिकनाइजेशन भी कहा गया और इसको वेस्टर्नाइजेशन भी कहा जाता है। और नोट करने वाली बात यह भी है
कि इन्होंने कल्चरल मैच्योरिटी का कांसेप्ट दिया जिसमें इन्होंने तीन पॉइंट बताए। पहला इसमें आता है ट्रेडिशनल फज़,
दूसरा आता है ट्रांजिशनल फज़ और तीसरा आता है मॉडर्न फज़। वहीं नोट करने वाली बात यह भी है कि इन्होंने कहा कि जो मास मीडिया
है यह हेल्प करता है साइकिक जो मोबिलिटी है उसको प्रमोट करने में। और इन्होंने यह भी कहा कि जो प्रोसेस ऑफ मॉडर्नाइजेशन है,
इसको लेस डेवलप्ड कंट्रीज में दो लेवल पर इंट्रोड्यूस किया जाना चाहिए। पहला आता है एमैथी इंडिविजुअल्स और दूसरा आता है
ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ सोसाइटी। नेक्स्ट थिंकर का नाम आता है शमल आइजस्टेड। तो यह इजराइली पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं और
सोशियोलॉजिस्ट रहे हैं। खास बात यह है कि जो सोशियोलॉजी की फील्ड है उसमें यह जाने जाते हैं सोशियोलॉजी ऑफ यूथ। और इससे भी
इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया जिसका नाम है पॉलिटिकल ब्रेकडाउन। और इन्होंने यह कहा
कि जो डेवलपिंग कंट्रीज होती है, यह मॉडर्नाइजेशन को इस उम्मीद में अपनाते हैं कि जो यूरोपियन कंट्रीज हैं, उनका जो
इंस्टीटशंस है, उनको हेल्प करेगा उनको मॉडर्नाइजेशन में। स्क्रीन पर आपको इनके जितने भी वक्स दिखाई दे रहे हैं, आप इनको
अच्छे से नोट कर लें। अब हम इनके कांसेप्ट पॉलिटिकल ब्रेकडाउन को अच्छे से समझ लेते हैं। तो यह कहते हैं कि जो मॉडर्नाइजेशन
है यह एक ऐसा प्रोसेस है जिसमें न्यू पैटर्न्स ऑफ सोशलाइजेशन और बिहेवियर को अपनाया जाता है। इस प्रकार यह कहते हैं कि
यह एक ऐसा प्रोसेस है जिसमें ओल्ड लॉयलिटीज, ओल्ड वैल्यूज़, ओल्ड ग्रुप्स और ओल्ड वे ऑफ़ लिविंग है, थिंकिंग है उसको नए
में चेंज किया जाता है। लेकिन दूसरी तरफ़ यह कहते हैं कि जो मोस्ट ऑफ़ द डेवलपिंग कंट्रीज है, सोसाइटीज़ है, यह इनकैपेबल
होती है इंस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क को प्रोवाइड कराने में। यानी कि वहां पर जो इंस्टीट्यूशनल डेवलपमेंट है वह नहीं हो
पाता है। जिसकी वजह से पॉलिटिकल ब्रेकडाउन हो जाता है। यानी कि राजनीतिक अंतराल आ जाता है। वहीं दूसरी तरफ इन्होंने अपने
प्रमुख वर्क जिसका टाइटल था मॉडर्नाइजेशन प्रोटेस्ट एंड चेंज जो कि 1966 को पब्लिश होता है। इसमें इन्होंने पॉलिटिकल
मॉडर्नाइजेशन की कुछ इंपॉर्टेंट फीचर्स बताई। जिनमें पहली आती है सोशल मोबिलाइजेशन। दूसरी फीचर आती है सोशल
डिफरेंशिएशन। तीसरी आती है इकोनॉमिक चेंज और चौथी आती है सोशल चेंज। अगले थिंकर का नाम आता है जेम्स कॉलमैन। तो यह अमेरिकन
पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने अपने प्रमुख वर्क जिसका टाइटल था द डेवलपमेंट सिंड्रोम
डिफरेंशिएशन इक्वलिटी एंड कैपेसिटी जो कि 1971 को पब्लिश होता है। इसमें इन्होंने डेवलपमेंट सिंड्रोम का कांसेप्ट दिया और
इनकी दो अन्य बुक रही है। जिनमें पहली आती है नाइजीरिया बैकग्राउंड टू नेशनलिज्म। दूसरी आती है एजुकेशन एंड पॉलिटिकल
डेवलपमेंट। इन्होंने डेवलपमेंट सिंड्रोम दिया जिसमें यह कहती हैं कि डेवलपमेंट में कुछ प्रॉब्लम्स आती है और उन्हीं
प्रॉब्लम्स को इन्होंने डेवलपमेंट सिंड्रोम कहा। अगले थिंकर का नाम आता है एफ डब्ल्यू रिग्स। तो एफ डब्ल्यू रिग्स
चाइनीस बोर्न अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि यह जाने जाते हैं पाइनियर ऑफ कंपेरेटिव
पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन। और इनके कुछ वर्क्स रहे हैं। जिनमें पहला वर्क आता है द इकोलॉजी ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन।
दूसरा वर्क आता है थाईलैंड द मॉडर्नाइजेशन ऑफ ब्यूरोक्रेटिक पॉलिटी और अगला इनका आता है डेवलपमेंटल डिबेट। रिग्स ने एक
इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया जिसका नाम था डेवलपमेंटल ट्रैप। तो इन्होंने अपने एक प्रमुख एस्से जिसका टाइटल था द राइज़ एंड
फॉल ऑफ़ पॉलिटिकल डेवलपमेंट जो कि 1973 को पब्लिश होता है। इसमें इन्होंने डेवलपमेंटल ट्रैप का कांसेप्ट दिया।
इन्होंने जो पाई का मॉडल था डेवलपमेंट का उसको रिवाइज़ किया और इन्होंने यह कहा कि जो इक्वलिटी और कैपेसिटी है उसके बीच
बैलेंस होना चाहिए। तब जाकर ही डेवलपमेंट हो सकता है। अगर इन दोनों के बीच इमंबैलेंस होगा तो ऐसी स्थिति में
डेवलपमेंटल ट्रैप हो जाता है। और खास बात यह भी है कि इन्होंने यह कहा कि अगर कोई पॉलिटिकल सिस्टम पॉलिटिकल ट्रैप की पकड़
में आ जाए तो ऐसी स्थिति में वहां पर पॉलिटिकल डिक हो जाता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने हंटिंगटन का जो
आर्गुमेंट है जिसमें उन्होंने कहा था इंस्टीट्यूशनलाइजेशन कुड सर्व एज अ सेफ गार्ड अगेंस्ट दिस ट्रैप इसको भी इन्होंने
नहीं माना है। वहीं दूसरी तरफ जेपी नेटल वियना बोर्न ब्रिटिश हिस्टोरियन रहे हैं और यह जाने जाते हैं बायोग्राफी ऑफ रोजा
अलेक्जमबर्ग यानी कि इन्होंने रोजा अलेक्जमबर्ग के ऊपर बायोग्राफी लिखी और खास बात यह है कि इन्होंने कहा कि
पॉलिटिकल डेवलपमेंट में जितने भी कांसेप्ट्स और जितनी भी टर्म्स यूज़ की जाती है यह वेस्टर्न टाइप ऑफ डेवलपमेंट को
दर्शाते हैं। और इन्होंने यह भी कहा कि जो पॉलिटिकल डेवलपमेंट है यह कनेक्ट होना चाहिए दोनों। यानी कि जो डेवलप्ड और दूसरी
तरफ जो डेवलपिंग नेशन है दोनों में कनेक्ट होना चाहिए। इनके कुछ वक्स रहे हैं जो भी आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं आप नोट
कर लें। वहीं दूसरी तरफ इन्होंने पॉलिटिकल डेवलपमेंट की चार इंपॉर्टेंट इंप्लिकेशंस बताई जिनको आप अच्छे से याद कर लें। तो
पहली आती है डेफिनेशनल प्रायोरिटीज। दूसरी आती है अ सेट ऑफ वैल्यूज़। तीसरी आती है इंटरकनेक्शन बिटवीन डेवलप्ड एंड डेवलपिंग
सोसाइटीज। और चौथी आती है रिकॉग्निशन ऑफ एन इंप्लसिट रैंक ऑर्डर ऑफ डेवलपमेंट। सीई ब्लैक ने अपने एक प्रमुख वर्क जिसका टाइटल
था द डायनामिक ऑफ मॉडर्नाइजेशन जो कि 1967 को पब्लिश होता है। इसमें इन्होंने मॉडर्नाइजेशन की चार प्रॉब्लम्स को
आइडेंटिफाई किया है। जिसमें पहली प्रॉब्लम आती है चैलेंजेस टुवर्ड्स मॉडर्नाइजेशन यानी कि सोसाइटी जैसे-जैसे मॉडर्नाइज हो
रही थी तो कुछ चैलेंजेस सामने आए जिसको इन्होंने चैलेंज के रूप में देखा। दूसरी आती है प्रॉब्लम्स ऑफ कंसोलिडेशन ऑफ
मॉडर्न लीडरशिप। जैसे ही मॉडर्न लीडरशिप का जन्म होता है उनको भी कंसोलिडेशन करने में प्रॉब्लम जाती है। फिर अगला आता है
इकोनॉमिक एंड सोशल ट्रांसफॉर्मेशन प्रॉब्लम। जैसे-जैसे सोसाइटी में जो सोशल इशूज़ है, इकोनॉमिक इशूज़ हैं उनका
ट्रांसफॉर्मेशन होता है तो उनको भी कुछ प्रॉब्लम्स फेस करनी पड़ती है। और फोर्थ आता है प्रॉब्लम ऑफ सोशल यूनिफिकेशन एंड
इंटीग्रेशन। जैसे ही सोसाइटी में यूनिफिकेशन होता है, सोशल इशूज़ इंटीग्रेट होते हैं, वैसे ही उनको भी कुछ प्रॉब्लम्स
फेस करनी पड़ती है। तो इस तरह से इन्होंने मॉडर्नाइजेशन की चार प्रॉब्लम्स को आइडेंटिफाई किया है। अगले थिंकर का नाम
आता है हेलियो जैगब। तो यह सबसे बड़ी बात यह है कि ब्राज़लियन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनका जो
की वर्क है इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल डेवलपमेंट जो कि 1968 को पब्लिश होता है। इसमें इन्होंने कांसेप्ट दिया पॉलिटिकल
मॉडर्नाइजेशन एंड इंस्टीट्यूशनलाइजेशन। इनके कुछ और वर्क रहे हैं जिनमें आता है पॉलिटिकल डेवलपमेंट अ जनरल थ्योरी एंड अ
लैटिन अमेरिकन केस स्टडी जो कि 1973 में पब्लिश होता है। वहीं दूसरी तरफ आलमंड एंड पावेल ने अपनी एक प्रमुख कृति जिसका टाइटल
था कंपैरेटिव पॉलिटिक्स और डेवलपमेंटल अप्रोच जो कि 1966 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने जो पॉलिटिकल डेवलपमेंट है
उसकी चार चैलेंजज़ को आइडेंटिफाई किया था। तो पहली चैलेंज आती है प्रॉब्लम ऑफ़ स्टेट बिल्डिंग। दूसरी प्रॉब्लम आती है प्रॉब्लम
ऑफ पार्टिसिपेशन। तीसरी प्रॉब्लम आती है प्रॉब्लम ऑफ नेशन बिल्डिंग। और अगली प्रॉब्लम आती है प्रॉब्लम ऑफ
डिस्ट्रीब्यूशन। वहीं नोट करने वाली बात यह भी है कि कार्ल ड्यूस ने डेवलपमेंट को बोला एक सोशल
प्रोसेस। और इन्होंने दूसरी तरफ़ यह भी कहा कि जो पॉलिटिकल डेवलपमेंट है इसको हम स्टेबिलिटी और जो ऑर्डरली चेंज है उसके
साथ जोड़ के देख सकते हैं। और दूसरी तरफ नोट करने वाली बात यह भी है कि मार्टिन लिपसेट ने कहा कि हम मॉडर्नाइजेशन को
डेमोक्रेसी के साथ जोड़ के देख सकते हैं। क्योंकि मॉडर्नाइजेशन की वजह से डेमोक्रेटाइजेशन हो सकता है। और इन्होंने
मॉडर्नाइजेशन के चार एस्पेक्ट्स की बात की। जिनमें आता है इंडस्ट्रियलाइजेशन, दूसरा आता है अर्बनाइजेशन, तीसरा आता है
वेल्थ और चौथा आता है एजुकेशन। वहीं नोट करने वाली बात यह भी है कि रोनाल्ड इंगलहार्ट और क्रिश्चियन वज़ल ने अपनी
प्रमुख कृति मॉडर्नाइजेशन कल्चरल चेंज एंड डेमोक्रेसी जो कि 2005 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने कोशिश की मॉडर्नाइजेशन
थ्योरी को रिवाइज करने की। वहीं दूसरी तरफ एडम प्रिजवस्की के द्वारा 2000 में डेमोक्रेसी एंड डेवलपमेंट पॉलिटिकल
इंस्टीटशंस एंड वेल बीइंग इन द वर्ल्ड के नाम से एक वर्क पब्लिश किया जाता है। जिसमें यह लिखते हैं कि डेमोक्रेसी
परफॉर्म एज वेल इकोनॉमिकली एज डू अथॉरिटेरियन रिजीम्स। दूसरी बड़ी बात यह है कि फ्रेडरिक निश्चय के द्वारा भी पूरी
तरीके से जो मॉडर्नाइजेशन है या जो मॉडर्निटी है उसको क्रिटिक किया जाता है। निश्चय ने द गे साइंस में इसको पूरी तरीके
से क्रिटिसाइज किया और जो मॉडर्न कल्चर है इसको इन्होंने बार-बारिक बताया और खास बात यह भी है कि इन्होंने जो एक्सेसिव
रैशनलिज्म है इगोइसिस्टिकल इंडिविजुअलिज्म है इसको भी क्रिटिक किया और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने बोला कि मॉडर्निटी एक
ट्रोमा है। इन्होंने कहा कि मॉडर्निटी एक लॉस है। मॉडर्निटी डेथ है और गॉड इज़ डेड। इसका भी इन्होंने कॉन्सेप्ट दिया। वहीं
अगले जो इसके क्रिटिक आते हैं यानी क्रिटिसिज्म किया जाता है वो किया जाता है जर्गन हेवमास के द्वारा। जर्गन हेवमास ने
अपनी प्रमुख कृति द फिलॉसोफिकल डिस्कोर्स ऑफ़ मॉडर्निटी। उसमें इन्होंने यह कहा कि मॉडर्निटी में इस तरह से जो व्यक्ति है वह
एलिनेशन का शिकार हो गया है। वन डायमेंशनल मैन हो गया है। वहीं मॉडर्नाइजेशन के क्रिटिसिज्म का अगला पॉइंट यह भी है कि
इसको क्रिटिसाइज किया जाता है इमायल दुर्खम के द्वारा। तो इमायल दुर्खम कहते हैं कि इसकी वजह से एनोमी की अवधारणा आ गई
है। एनोमी का मतलब है कि ब्रेकडाउन ऑफ सोशल ट्रेडिशंस एंड मोरल वैल्यूस। इसमें एलिनेशन होता है। व्यक्ति की जो सोचने
समझने की क्षमता है वह कुंठित हो जाती है। वह कुछ प्रोडक्टिव नहीं कर पाता है। वहीं दूसरी तरफ रूसो और गांधी के द्वारा भी
मॉडर्नाइजेशन को क्रिटिक किया जाता है। गांधी ने कहा कि जो मॉडर्न सिविलाइजेशन है यह शैतानी सभ्यता है। वहीं दूसरी तरफ रूसो
ने कहा नोवेल सेवेबेज। इन्होंने कहा कि टू नेचर। इन्होंने कहा कि जितने भी अपराध होते हैं, पाप होते हैं, वह मॉडर्नाइजेशन
की वजह से होते हैं। साइंस की वजह से होते हैं। वहीं दूसरी तरफ मॉडर्नाइजेशन थ्योरी की आलोचना की जाती है डिपेंडेंसी थ्यरिस्ट
के द्वारा। चिलकोटे जो कि डिपेंडेंसी थ्यरिस्ट रहे हैं। इन्होंने कहा कि मॉडर्नाइजेशन रिफ्लेक्टेड द कंजर्वेटिव
इंटेलेक्चुअल ट्रेडिशन। वहीं दूसरी तरफ इमैनुअल बोलस्टीन ने कहा कि जो मॉडर्नाइजेशन थ्योरी है यह डेड हो चुकी
है। और नोट करने वाली बात यह भी है कि जो डिपेंडेंसी थ्योरिस्ट ओसोबा और संकेल है इन्होंने जो कोर कंट्रीज है उनके द्वारा
जो इंटरवेंशन किया जाता है पेरिफेरी कंट्रीज में इसको क्रिटिसाइज किया। वहीं दूसरी तरफ नील गिलमिन जो कि पोस्ट
मॉडर्निस्ट थ्योरिस्ट रहे हैं। इन्होंने अपनी प्रमुख कृति स्टैगिंग ग्रोथ मॉडर्नाइजेशन डेवलपमेंट एंड द ग्लोबल
कोल्ड वॉर जो कि 2003 में पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने कहा कि जो मॉडर्नाइजेशन है यह कॉम्प्लेक्स है नेचर में। इसमें
आईडियोलॉजिकल रूट्स है और सबसे बड़ी बात यह है कि जो यूएस फॉरेन पॉलिसी है इसका इसके ऊपर कंट्रोल रहा है और जो
मॉडर्नाइजेशन है इसमें कंप्लीट सुपीरियरिटी है जो वेस्टर्न लाइफस्टाइल रहा है उसकी। अब हम डिपेंडेंसी थ्योरी के
जितने भी इंपॉर्टेंट थिंकर्स रहे हैं उनको डिस्कस कर लेते हैं। तो इनमें पहला नाम आता है र्विश का। तो रॉल ब्रेविश
अर्जेंटीना के इकोनॉमिस्ट रहे हैं और की डिपेंडेंसी थ्योरिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने डिपेंडेंसी थ्योरी
की फाउंडेशन रखी और 1950 में यह एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बन जाते हैं इकोनॉमिक कमीशन ऑफ लैटिन अमेरिका स्कूल
के। और खास बात यह है कि इन्होंने एक टर्म यूज़ की पेरिफेरल कैपिटलिज्म। और 1944 में इन्होंने दो इंपॉर्टेंट टर्म्स को पॉइंट
किया। जिनमें पहली टर्म आती है सेंटर। दूसरी आती है पेरफेरी। सेंटर का मतलब होता है डेवलप्ड कंट्रीज और पेरफेरी का मतलब
होता है डेवलपिंग कंट्रीज। और नोट करने वाली बात यह भी है कि रॉल प्र्रेविश को जाना जाता है फादर ऑफ डिपेंडेंसी थ्योरी।
र्पिश के कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। जिनमें पहला आता है चेंज एंड डेवलपमेंट। लैटिन अमेरिकास ग्रेट टास्क। दूसरा आता है
द इकोनॉमिक डेवलपमेंट ऑफ लैटिन अमेरिका एंड इट्स प्रिंसिपल प्रॉब्लम्स। और तीसरा आता है कमर्शियल पॉलिसी इन द अंडर
डेवलपमेंट कंट्रीज। दूसरे डिपेंडेंसी थ्यरिस्ट का नाम आता है एजी फ्रैंक। तो एजी फ्रैंक जर्मन अमेरिकन सोशियोलॉजिस्ट
रहे हैं। और दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने नोशन दिया डेवलपमेंट ऑफ अंडर डेवलपमेंट जिसको हम बाद में अच्छे से
समझेंगे। और इन्होंने अपने प्रमुख वर्क कैपिटलिज्म एंड अंडर डेवलपमेंट इन लैटिन अमेरिका जो कि 1976 को पब्लिश होता है।
इसमें इन्होंने चिले और ब्राजील की हिस्टोरिकल स्टडी की और इन्होंने दो प्रकार की कंट्रीज की बात की। जिनमें पहली
कंट्री आती है मेट्रोपॉलिस और दूसरी आती है सेटेलाइट। मेट्रोपॉलिस का मतलब होता है डेवलप्ड कंट्रीज ऑफ द वेस्ट। यानी कि जो
एडवांस्ड इंडस्ट्रियल कंट्रीज है यूरोप की। वहीं सेटेलाइट कंट्रीज में आता है जो अंडर डेवलप्ड कंट्रीज है जैसे लैटिन
अमेरिका, एशिया और अफ्रीका की। एजी फ्रैंक ने अपनी प्रमुख कृति कैपिटलिज्म एंड अंडर डेवलपमेंट इन लैटिन अमेरिका। इसमें
इन्होंने डेवलपमेंट ऑफ अंडर डेवलपमेंट का कांसेप्ट दिया। इसमें इन्होंने यह कहा कि जो अंडर डेवलपमेंट ऑफ थर्ड वर्ल्ड है यह
मैनिफेस्टेशन होता है अनकल पावर रिलेशंस जो कि ग्लोबल कैपिटलिस्ट स्ट्रक्चर में पाई जाती है। दूसरी तरफ इन्होंने यह कहा
कि जो मेट्रोपॉलिस यानी कि जो डेवलप्ड कंट्रीज होती है उसमें जो कैपिटल डेवलपमेंट हुआ है उससे सेटेलाइट यानी कि
जो पुअर कंट्रीज ऑफ लैटिन अमेरिका एशिया अफ्रीका है वहां पर अंडर डेवलपमेंट हुआ है। और इस तरह का जो डेवलपमेंट है यह
अनइक्वल है, इमंबैलेंस्ड है, डिपेंडेंट है। और सबसे बड़ी बात है कि इस तरह का जो डेवलपमेंट है, यह यूरोपियन यानी कि जो
वेस्ट यूरोपियन कंट्रीज हैं, उनके हित में है। तो, इसमें यह आगे कहते हैं कि जो मेट्रोपॉलिस कंट्रीज है, यह प्राइमरी
गुड्स को सेटेलाइट कंट्रीज को इंपोर्ट करते हैं सस्ते दामों पर और जो मैन्युफैक्चर गुड्स होती है, उनको
एक्सपोर्ट करते हैं हाई प्राइसेस पर जो पुअर कंट्रीज होती है। और इस तरह का जो डेवलपमेंट है यह एक्सप्लॉयटेटिव होता है,
डिपेंडेंट होता है और कोर कंट्रीज के हित में होता है। जिसे सिंपली डेवलपमेंट ऑफ अंडर डेवलपमेंट कहा जाता है। एजी फ्रैंक
ने अपनी प्रमुख कृति कैपिटलिज्म एंड अंडर डेवलपमेंट इन लैटिन अमेरिका में कहा था कि देयर इज अ डिफरेंस बिटवीन नॉन डेवलपमेंट
एंड अंडर डेवलपमेंट। डेवलपिंग कंट्रीज आर द विक्टिम ऑफ अंडर डेवलपमेंट। बेसिकली इसमें यह कह रहे हैं कि जो नॉन डेवलपमेंट
है और जो अंडर डेवलपमेंट है इसमें डिफरेंस होता है। इसमें अंतर होता है और जो विकासशील देश है यह बेसिकली अंडर
डेवलपमेंट से ग्रसित है। पीड़ित है। वहीं दूसरी तरफ एजी फ्रैंक ने अपनी एक प्रमुख कृति जिसका टाइटल है लंपेन बरगुआज़ एंड
लैंपेन डेवलपमेंट डिपेंडेंसी क्लास एंड पॉलिटिक्स इन लैटिन अमेरिका जो कि 1972 को पब्लिश होती है। जिसमें इन्होंने दो
इंपॉर्टेंट कांसेप्ट को पॉपुलराइज किया। पहला है लंपेन बरगुआज़ और दूसरा है लंपेन डेवलपमेंट। तो लंपेन बरगुआजी एक ऐसी टर्म
है जिसको कॉलोनियल सोशियोलॉजी में यूज की जाती है डिस्क्राइब करने के लिए मेंबर्स ऑफ द मिडिल क्लास एंड अपर क्लास जिसमें
आते हैं मर्चेंट्स लॉयर्स एंड इंडस्ट्रियलिस्ट्स जिनके पास लिटिल कलेक्टिव सेल्फ अवेयरनेस होती है इकोनॉमिक
बेस होता है और जो सपोर्ट करते हैं जो कॉलोनियल मास्टर्स होते हैं उनको हालांकि नोट करने वाली बात यह है कि इससे पहले भी
यह जो शब्दावली है इसको यूज किया जा चुका है ल्यूकस के द्वारा कोस्टलर के द्वारा सी डब्ल्यू मिल्स के द्वारा पॉल बैरन के
द्वारा और नोट करने वाली बात यह भी है कि इन्होंने यानी कि एजी फ्रैंक ने आगे डिस्कस किया कि किस तरह से जो लैंपन
डेवलपमेंट है लैटिन अमेरिका में वह होता है। एजी फ्रैंक के जितने भी वक्स आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं आप इनको
अच्छे से नोट कर लें। तीसरे थिंकर का नाम आता है सामिर आमिन। तो सामिर आमिन इजिपियन, फ्रेंच मार्क्सियन इकोनॉमिस्ट और
पॉलिटिकल साइंटिस्ट और वर्ल्ड सिस्टम एनालिसिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि 1988 को इन्होंने यूरोसेंट्रिज्म
शब्दावली को कॉइ किया और इन्होंने कुछ और इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स दिए जिनमें आता है अनकल एक्सचेंज एंड अनक्वल डेवलपमेंट। और
खास बात यह भी है कि इन्होंने कुछ और स्टूडेंट्स के साथ मिलकर एक मैगजीीन को पब्लिश किया जिसका टाइटल था एडटियंट्स
एंटी कॉलोनियलिस्टेस और 1957 में इन्होंने अपनी पीएचडी थीसिस को प्रेजेंट किया जिसका टाइटल था द ओरिजिन ऑफ अंडर डेवलपमेंट
कैपिटलिस्ट एक्यूमुलेशन ऑन अ वर्ल्ड स्केल और इस थीसिस में इन्होंने यह कहा कि जो अंडर डेवलप्ड कंट्रीज है या फिर जो
इकोनॉमीज़ हैं इनको कंसीडर्ड नहीं किया जाना चाहिए इंडिप इंडिपेंडेंट यूनिट के रूप में बल्कि यह जो है बिल्डिंग ब्लॉक के
रूप में भूमिका निभाते हैं जो वर्ल्ड लेवल पे कैपिटलिस्ट वर्ल्ड इकोनमी है और खास बात यह भी है कि इन्होंने इस्लामिक वर्ल्ड
में जो डिपेंडेंसी थ्योरी है इसको रिफाइंड किया। वहीं दूसरी तरफ सामर आमीन ने एशिया अफ्रीका और जो अरब वर्ल्ड की कंट्रीज रही
है उसकी कंप्रहेंसिव स्टडी की और इन्होंने जो पेरीफेरी कंट्रीज है उसकी इन्होंने दो प्रकार की डिपेंडेंसीज की बात की जिनमें
पहली डिपेंडेंसी आती है एक्सटर्नल डिपेंडेंसी और दूसरी आती है कमर्शियल डिपेंडेंसी। एक्सटर्नल डिपेंडेंसी में यह
बात आती है कि जो पुअर कंट्रीज है इनको अपनी जो प्राइमरी गुड्स हैं उनको सस्ते दामों पर जो रिच कंट्री होती है उनको देना
पड़ता है और उनसे मैन्युफैक्चर गुड्स को बड़ी उच्च कीमतों पर खरीदना पड़ता है। वहीं दूसरी तरफ जो कमर्शियल डिपेंडेंसी
है, इसमें यह होता है कि जो डेवलप्ड कंट्रीज है, यह जो कैपिटल होती है, यानी कि जो फ़ॉरेन कैपिटल होती है, उसको
इन्वेस्ट करते हैं पुअर कंट्रीज में और उससे जो भी बेनिफिट मिलता है, जो भी लाभ मिलता है, उसको वह अपने देशों में यानी कि
डेवलप्ड कंट्रीज में ले जाते हैं। जिसको कि सिंपली कमर्शियल डिपेंडेंसी कहा जाता है। अब हम सामर आमीन के एक इंपॉर्टेंट
कांसेप्ट को डिस्कस कर लेते हैं जिसका नाम है अनइक्वल एक्सचेंज एंड अनइक्वल डेवलपमेंट। तो यह जो कांसेप्ट है इसको
सामीर आमीन ने अपनी प्रमुख कृति एनएसए ऑन द सोशल फॉरमेशंस ऑफ पेरिफेरल कैपिटलिज्म जो कि 1976 को पब्लिश होती है इसमें दिया
था और अनइक्वल एक्सचेंज का मतलब होता है एक्यूमुलेशन ऑफ वेल्थ यानी कि जो संपत्ति है उसका संचय और दूसरी बड़ी बात यह है कि
जो अनइक्वल एक्सचेंज है यह बेस्ड है ग्लोबल लॉ ऑफ वैल्यू के ऊपर और दूसरी बड़ी बात यह है कि साम आमिर आमीन कहते हैं कि
जो ग्लोबल लॉ ऑफ वैल्यूस है यह क्रिएट करता है सुपर एक्सप्लइटेशन ऑफ द पेरीफेरी यानी कि जो पेरिफेरी कंट्रीज है इनका सुपर
यानी कि बहुत ज्यादा एक्सप्लइटेशन होता है और जो कोर कंट्रीज है इनकी मोनोपोली रहती है कुछ चीजों के ऊपर जैसे टेक्नोलॉजी
फाइनेंस मिलिट्री पावर आइडियोलॉजिकल और जो मीडिया प्रोडक्शन है और जो नेचुरल रिसोर्सेज है और दूसरी बड़ी बात यह भी है
कि आमीन ने एक इंपॉर्टेंट शब्दावली को यूज़ किया था जिसका नाम है डीलिंकिंग। इसका मतलब यह है कि जो वर्ल्ड कैपिटलिस्ट
इकॉनमी होती है उसमें से जो पुअर कंट्रीज है खुद को डीलिंक करें क्योंकि इसमें उनका शोषण होता है। एक्सप्लइटेशन होता है।
सामीर आमीन का अगला इंपॉर्टेंट कांसेप्ट आता है मोनोपोली कैपिटलिज्म। तो इस कांसेप्ट में यह कहते हैं कि जो
कैपिटलिज्म और जो इंपीरलिज्म रहा है यह तब रीच करता है जब 16th सेंचुरी में अमेरिका में कॉन्क्वेस्ट होता है और आज तक जो यह
रहा है इसको रेफर किया जाता है मोनोपोलिक कैपिटलिज्म और सबसे बड़ी बात यह है कि जो कोर और पेरिफेरी कंट्री के बीच जो
पोलराइजेशन हुआ है इसको एक फेनोमिनन यानी कि घटना माना जाता है हिस्टोरिकल कैपिटलिज्म में। और दूसरी बड़ी बात ये है
कि हिस्टोरिकली इन्होंने तीन इंपॉर्टेंट फेजेस की बात की है। जिनमें पहला आता है मर्केंटलिज्म, दूसरा आता है एक्सपेंशन और
तीसरा आता है मोनोपोली कैपिटलिज्म जो कि 1880 से आज तक रहा। और इन्होंने मोनोपोली कैपिटलिज्म को आगे दो कैटेगरीज में डिवाइड
किया जिसमें पहला आता है प्रॉपर मोनोपॉली कैपिटलिज्म। दूसरा आता है ओलगोपॉली फाइनेंस कैपिटलिज्म। सामिर आमीन का अगला
कांसेप्ट आता है यूरोसेंट्रिज्म। तो जब हम इस कांसेप्ट की बात करते हैं तो इन्होंने 1988 को इसको कॉइ किया था। दूसरी बड़ी बात
यह है कि यूरोसेंट्रिज्म का मतलब यह होता है कि एक ऐसा वर्ल्ड व्यू या फिर बिलीफ जिसमें यह माना जाता है कि यूरोप ही
प्राइमरी इंजन है। आर्किटेक्ट है वर्ल्ड हिस्ट्री का। होम ऑफ सिविलाइजेशन है। मॉडल ऑफ प्रोग्रेस एंड डेवलपमेंट है।
मॉडर्नाइजेशन भी यहीं से शुरू हुआ। रीजन साइंस और जो नॉलेज है वो भी इसी की देन है। जबकि सामिर आमीन ने इस मोशन को
रिजेक्ट किया और इन्होंने यह कहा कि यह जो एरिया है यानी कि जो वेस्टर्न यूरोप है या जो यूरोपियन सिविलाइजेशन है इसको कुछ
एक्सीडेंटल एडवांटेजेस थे। जिसकी वजह से यहां पर सबसे पहले कैपिटलिज्म का डेवलपमेंट हुआ। इन्होंने यह कहा कि अगर आप
यह मानते हैं कि जो यूरोप है यह हिस्टोरिकल सेंटर रहा है वर्ल्ड का तो यह बहुत बड़ा मिथ होगा मिस्टेक होगी क्योंकि
कैपिटलिस्ट जो पीरियड था उसी दौर में यूरोप डोमिनेटेड रहा है। सामीर आमीन की जितनी भी पब्लिकेशंस आपको स्क्रीन पर
दिखाई दे रही हैं आप इनको अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी हैं। अगले थिंकर का नाम आता है हंस
सिंगर। तो हंस सिंगर जर्मन बोर्न ब्रिटिश डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि यह जाने जाते हैं
प्रविश सिंगर थीसिस के लिए। जिसकी यह मान्यता रही है कि जो ट्रेड की टर्म्स होती है, यह अगेंस्ट होती है। जो प्राइमरी
गुड्स को प्रोड्यूस करते हैं। यानी कि जो पुअर कंट्रीज है, उनके द्वारा जो प्राइमरी गुड्स को प्रोड्यूस किया जाता है, उसके
अगेंस्ट ट्रेड की टर्म्स होती है। और खास बात यह भी है कि हंस सिंगर प्राइमरी फिगर रहे हैं हेट्रोडॉक्स इकोनॉमिक्स के और यह
एसोसिएटेड है इकोनॉमिक स्ट्रक्चरलिज्म के साथ। हंस सिंगर की जितनी भी पब्लिकेशन आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रही हैं, इनको
भी आप अच्छे से नोट कर लें। फिफ्थ थिंकर का नाम आता है एफ एच कोडोसो का। तो फर्नांडो हेनरी कॉडोसो ब्राज़लियन
सोशियोलॉजिस्ट रहे हैं। पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं, प्रोफेसर रहे हैं और पॉलिटिशियन रहे हैं। जिन्होंने ब्राजील के
34 प्रेसिडेंट के रूप में कार्यभार संभाला। और सबसे बड़ी बात यह है कि ये डिपेंडेंसी थ्योरी के मोस्ट इंपॉर्टेंट
थिंकर माने जाते हैं। जिनकी रिसर्च स्लेवरी और पॉलिटिकल थ्योरी के ऊपर रही है। और इन्होंने कांसेप्ट दिया डिपेंडेंट
डेवलपमेंट का जिसको हम अगली स्लाइड में डिस्कस करेंगे। अब हम डिपेंडेंट डेवलपमेंट को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो
कोडोसो और एंजोफेलेटो ने अपनी बुक डिपेंडेंसी एंड डेवलपमेंट इन लैटिन अमेरिका जो कि 1979 को पब्लिश होती है।
इसमें इन्होंने इस कांसेप्ट को दिया था। यह दोनों आर्ग्यू करते हैं कि किस तरह से पेरीफेरी कंट्रीज को चीप रेट पर प्राइमरी
गुड्स को कोर कंट्रीज को एक्सपोर्ट करना होता है और उनसे मैन्युफैक्चरर्ड गुड्स को हाई प्राइसेस पर बाय करना होता है। यह
वर्ल्ड को दो लेवल यानी कि नॉर्थ और साउथ में डिवाइड करते हैं और कहते हैं कि जो नॉर्थ नेशन है यह इकोनॉमिक पावर हाउस है।
जबकि साउथ में लैटिन अमेरिकन एज इन अफ्रीकन जो कि पुअर कंट्रीज है वह आती है। हालांकि डिपेंडेंसी थ्यरिस्ट्स इस बात को
मानते हैं कि लैटिन अमेरिकन जो कंट्रीज हैं इनका डेवलपमेंट यूरोपियन एक्सपेंशन और जो अमेरिकन कैपिटलिज्म है उसके साथ लिंक्ड
है। बट यह अनइवन डेवलपमेंट है। डिपेंडेंट डेवलपमेंट है जिसमें लैटिन अमेरिकन कंट्रीज को नॉर्थ कंट्रीज के ऊपर
डिपेंडेंट होना पड़ता है। कॉडोसo की जितनी भी स्क्रीन पर आपको पब्लिकेशंस दिखाई दे रही है इनको आप अच्छे से नोट कर लें। अगले
थिंकर का नाम आता है ओसोबाडो संकेल। तो ओसोबाडो संकेल सिलियन डिपेंडेंसी थ्योरिस्ट रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह
है कि इन्होंने वर्क किया लैटिन अमेरिकन इकोनॉमिक डेवलपमेंट के ऊपर और 1960-70 के दशक में ओसोबा संकेल डिपेंडेंसी थ्योरी से
जुड़े रहे। इनका इसमें इंटरेस्ट रहा और 1980 के दशक में इन्होंने कंट्रीब्यूट किया फाउंडिंग ऑफ लैटिन अमेरिकन नियो
स्ट्रक्चरिज्म में और खास बात यह है कि मॉडर्नाइजेशन थ्योरी को इन्होंने क्रिटिसाइज किया और इन्होंने जो
डिपेंडेंशिया है उसकी दो इंपॉर्टेंट फीचर्स की बात की। पहली फीचर आती है डिवीजन बिटवीन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट और
दूसरी तरफ जो अंडर डेवलप्ड और पुअर नेशन है उनके बीच डिवीजन पाया जाता है। यह कहते हैं और दूसरा यह कहते हैं कि डिफरेंशिएशन
पोलराइजेशन विद इन एन अंडर डेवलप्ड कंट्रीज यानी कि जो अंडर डेवलप्ड कंट्रीज होती है उनके बीच भी डिफरेंशिएशन पाया
जाता है। पोलराइजेशन पाया जाता है। ओसोबा संकल की जितनी भी पब्लिकेशंस आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रही है इनको आप अच्छे से नोट
कर लें। वहीं दूसरी तरफ कैसनोवा मैक्सियन सोशियोलॉजिस्ट रहे हैं, हिस्टोरियन रहे हैं और मैक्सिकन लॉयर रहे हैं। और
इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया जिसका नाम है इंटरनल कॉलोनियलिज्म। इसको हम अगली स्लाइड में अच्छे से डिस्कस
करेंगे और स्क्रीन पर जितनी भी आपको इनकी पब्लिकेशंस दिखाई दे रही है, आप इनको अच्छे से नोट कर लें। अब हम कैसनोवा के
इंटरनल कॉलोनियलिज्म को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो कैसनोवा ने मेक्सिको की स्टडी करते हुए टू डिफरेंट टाइप्स ऑफ
मेक्सिको को फाइंड आउट किया था। जिसमें एक तरह का मेक्सिको वो है जहां मेनली इंडियंस रहते हैं जिनको कैरेक्टराइज किया जाता है
डोमिनेशन एक्सप्लइटेशन एंड मर्जिनलाइजेशन के रूप में और दूसरी तरफ कैसनोवा ने एक ऐसे मेक्सिको को फाइंड आउट किया था जहां
स्पेनिश क्रियोल लेडिनोस ग्रुप्स पाए जाते हैं जो कि मर्जिनल सोसाइटी को डोमिनेट व एक्सप्लइट करते हैं जिसे इंटरनल
कॉलोनियलिज्म कहा जाता है। हम यह भी कह सकते हैं कि जो इंटरनल कॉलोनिज़्म है, यह एक इंटीग्रल फ़ेनोमिनन है जो कि
परिवर्तनशील है, चेंजज़ेबल है जो कि इंटरनेशनल से इंटरनल कैटेगरी तक पहुंचता है, चेंज होता है। और आगे इन्होंने टू
टाइप्स ऑफ इंटरनल कॉलोनियलिज्म की बात की थी। जिसमें पहला आता है फॉर्म ऑफ डोमिनेशन बाय अ डोमिनेंट सेंटर और मेट्रोपॉलिस और
दूसरा आता है फॉर्म ऑफ डोमिनेशन और एक्सप्लइटेशन बाय फ्यूडलिज्म स्लेवरी कैपिटलिस्ट एंड अर्बन सैलरीड पीपल।
नेक्स्ट थिंकर का नाम आता है एमसी डी एंड्रादे। तो मैनुअल कोरिया डी एंड्राडे ब्राजीलियन ज्योग्राफर और इकोनॉमिस्ट रहे
हैं। खास बात यह है कि इन्होंने भी इंटरनल कॉलोनियलिज्म की बात की है और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने
कांसेप्ट दिया पोल्स ऑफ़ डेवलपमेंट का जिसको हम नेक्स्ट स्लाइड में डिस्कस करेंगे। इनके कुछ वक्स रहे हैं जिनमें
पहला आता है स्पेस पोलराइजेशन एंड डेवलपमेंट। द थ्योरी ऑफ़ टू डेवलपमेंट पोल्स एंड द नॉर्थ ईस्टर्न रियलिटी। और
दूसरा आता है और रेवोल्यूशन ऑफ 30 फ्रॉम द ओल्ड रिपब्लिक टू द न्यू स्टेट। पोल्स ऑफ डेवलपमेंट का कांसेप्ट दिया था एमसी डी
एंड्रे ने। तो मैनुअल कोरिया डी एंड्रे ने इंट्रोड्यूस किया था कांसेप्ट ऑफ पोल्स ऑफ डेवलपमेंट इन डिपेंडेंशियल लिटरेचर। और
दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने ब्राजील की स्टडी करते हुए ब्राजील में कुछ इंपॉर्टेंट पोल्स ऑफ डेवलपमेंट को
आइडेंटिफाई किया था। हालांकि इन्होंने यह कहा था कि ब्राजील जैसे देश में डेवलपमेंट नहीं हुआ है। उसके पीछे यह है कि इस तरह
की कंट्रीज को डिपेंडेंट रहना पड़ता है। दूसरी जो एडवांस्ड इंडस्ट्रियल कंट्रीज है और खास बात यह भी है कि इन्होंने कहा कि
जो कॉज ऑफ डेवलपमेंट है इसकी वजह से अनइक्वल और जो अनइवन डेवलपमेंट है वह हुआ है। नाइंथ थिंकर का नाम आता है सेल्सो
फुटाडो। तो सेल्सो फुटाडो ब्राज़लियन इकोनॉमिस्ट थिंकर रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि इनको 20थ सेंचुरी के मोस्ट
इंटेलेक्चुअल थिंकर के रूप में देखा जाता है। और इनका जो वर्क रहा है यह फोकस करता है डेवलपमेंट एंड अंडर डेवलपमेंट के ऊपर
और इन्होंने र्विश के साथ इकोनॉमिक स्ट्रक्चरलिज्म को डेवलप किया। यानी कि जो स्ट्रक्चरल डेवलपमेंट थ्योरी है उसको
प्रोपाउंड किया। एक्सटर्नल डिपेंडेंसी को डिफाइन करते हुए सेल्स ऑफ फटाडो आर्ग्यूड दैट क्लास स्ट्रक्चर कंबाइंड विद कंज्यूमर
ओरिएंटेड इंपोर्ट सब्सीट्यूशन इंडस्ट्रियलाइजेशन पॉलिसीज प्रोड्यूस व्हाट ही डिस्क्राइब्स
एज पेरिफेरल कैपिटलिज्म व्हाट सच पेरिफेरल कैपिटलिज्म डिपेंड्स टू अ लार्ज एक्सटेंट ऑन आउटसाइडर्स फॉर ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ लोकल
इकोनमी एंड दिस इज व्हाट ही डिफाइन एक्सटर्नल डिपेंडेंस। इसका मतलब यह है कि फटाडो कहते हैं कि जो पेरिफेरल कैपिटलिज्म
है यानी कि जो पुअर कंट्रीज है उनका जो पूंजीवाद है, संपत्ति है वो डिपेंड करती है जो एक्सटर्नल डिपेंडेंसी होती है।
क्योंकि जो एक्सटर्नल कंट्रीज है वह लोकल जो कंट्रीज होती है यानी कि पुअर कंट्रीज है वहां पर कैपिटल को इन्वेस्ट करके जो
पैसा है वह सारा का सारा ट्रांसफॉर्म कर जाते हैं अपनी देश में अपनी कंट्री में जिसको इन्होंने एक्सटर्नल डिपेंडेंस कहा
है। डेवलपमेंट एंड अंडर डेवलपमेंट को डिफाइन करते हुए सेल्स फुटाडो ने फेमसली कहा था कि डेवलपमेंट एंड अंडर डेवलपमेंट
आर द पार्ट ऑफ द सेम हिस्टोरिकल प्रोसेस जस्ट डिफरेंट साइड्स ऑफ द सेम कॉइन ऑफ द ग्लोबल सिस्टम। फुटाडो की जितनी भी
राइटिंग्स आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रही है, आप इनको अच्छे से नोट कर लें। अगले थिंकर का नाम आता है आर एम मरीनी। तो रुई
मारो मरीनी ब्राजीलियन इकोनॉमिस्ट थिंकर रहे हैं। सोशियोलॉजिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनको इंटरनेशनलली जाना
जाता है क्रिएटर ऑफ डिपेंडेंसी थ्योरी और दूसरी बड़ी बात यह भी है कि इन्होंने लैटिन अमेरिका में इकोनॉमिक डेवलपमेंट के
ऊपर काम किया और इन्होंने कांसेप्ट दिया सब इंपीरियलिज्म का जिसको हम नेक्स्ट स्लाइड में डिस्कस करेंगे और इनका प्रमुख
वर्क रहा है द डलेक्टिक ऑफ डिपेंडेंसी। सब इंपीरियलिज्म के कांसेप्ट को दिया जाता है रुई माो मरीनी के द्वारा 1969 को और
इन्होंने इसको ब्राजील के संदर्भ में डेवलप करने की कोशिश की। इन्होंने यह कहा कि ब्राजील में जो मिलिट्री रूल
एस्टैब्लिश हुआ है, उसने ब्राज़लियन कैपिटलिज्म को सुपर एक्सप्लइटेटरी बना दिया है। और दूसरी तरफ यह कहते हैं कि जो
कैपिटल है, वह ऐसे लोगों के हाथों में संचित हो गया है जिनका मेन जो प्रोडक्शन के ऊपर कंट्रोल है, अधिकार है। और दूसरी
तरफ जो आम जनता है वह पॉवर्टी की शिकार है। जिसको इन्होंने सब इंपेरलिज्म कहा। और दूसरी तरफ फ्रैंक ने भी जो सब
इंपेरियलिज्म है इसको आइडेंटिफाई करने की कोशिश की कुछ डेवलपिंग कंट्रीज में जिनके नाम है इंडिया, ईरान और इजराइल। अगले
थिंकर का नाम आता है वाल्टर रडनी। तो वाल्टर रनी गुआज़ हिस्टोरियन पॉलिटिकल एक्टिविस्ट और एकेडमिशियन रहे हैं।
इन्होंने 1972 में एक इंपॉर्टेंट वर्क को पब्लिश किया जिसका टाइटल था हाउ यूरोप अंडर डेवलप्ड अफ्रीका जिसमें इन्होंने यह
बताने की कोशिश की कि अफ्रीका को किस तरह से यूरोपियन इंपलिस्ट के द्वारा एक्सप्लइट किया जाता है और इन्होंने यह कहा कि इसकी
वजह से अफ्रीका जैसे कॉन्टिनेंट में अंडर डेवलपमेंट का इमरजेंस हो गया है और इन्होंने अफ्रीका में जो अंडर डेवलपमेंट
है इसको भी क्वेश्चन किया। वहीं दूसरी तरफ गोल्डन फ्लोरस बेलो फिलीपेनो एकेडमिशियन रहे हैं। जिन्होंने सर्व किया मेंबर ऑफ द
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव ऑफ द फिलीपाइंस। और खास बात यह है कि इन्होंने स्टडी की ग्लोबलाइजेशन के ऊपर, डीग्लोबलाइजेशन के
ऊपर और ग्लोबल साउथ के ऊपर। इनके कुछ नोटेबल वक्स रहे हैं। जितने भी वर्क आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं। आप इनको
अच्छे से नोट कर लें। अगले थिंकर का नाम आता है पॉल स्विजी। तो पॉल स्विज यूएस मार्क्सिस्ट इकोनॉमिस्ट रहे हैं। दूसरी
बड़ी बात यह है कि यह जाने जाते हैं इनका जो कंट्रीब्यूशन रहा है इकोनॉमिक थ्योरी के रूप में और यह मिड 20थ सेंचुरी के
लीडिंग मार्क्सियन इकोनॉमिस्ट के रूप में जाने जाते हैं। और खास बात यह भी है कि इन्होंने कांसेप्ट दिया मोनोपोलाइज्ड
कैपिटलिज्म को और यह कांसेप्ट इन्होंने दिया पॉल बैरन के साथ। इनके जितने भी बॉक्स आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं,
आप अच्छे से नोट कर लें। डिपेंडेंसी थ्योरी में अगला नाम आता है कुवर्ड राफर का। तो यह डेवलपमेंट रिस्चर रहे हैं और
इन्होंने अनकल एक्सचेंज इन आईआर में कंट्रीब्यूशन दिया और डिपेंडेंसी थ्योरी में भी इन्होंने कंट्रीब्यूशन दिया। इनके
जितने भी वक्स आपको दिखाई दे रहे हैं, आप अच्छे से नोट कर लें। अगले थिंकर का नाम आता है रोनाल्ड चिलकोटे। तो यह यूएस
पॉलिटिकल इकोनॉमिस्ट रहे हैं और इन्होंने 1974 से सर्व किया एज मैनेजिंग एडिटर ऑफ द एकेडमिक जर्नल लैटिन अमेरिकन
पर्सपेक्टिव्स और खास बात यह भी है कि इनका मेन रिसर्च एरिया रहा है ब्राजील के ऊपर पोर्तुगल के ऊपर और जो फॉर्मर
पोर्तुगीज़ कॉलोनीज़ है अफ्रीका में उनके ऊपर साथ में इन्होंने कंपैरेटिव पॉलिटिक्स पॉलिटिकल इकोनमी एंड डेवलपमेंटल थ्योरी के
ऊपर भी काम किया। वहीं दूसरी तरफ चिलकोटे ने डिपेंडेंशियल लिटरेचर में चार इंपॉर्टेंट टेंडेंसीज को आइडेंटिफाई किया।
जिसमें पहला आता है डेवलपमेंट ऑफ अंडर डेवलपमेंट थीसिस जिसको कि एजी फ्रैंक ने दिया। दूसरा इसमें आता है डिपेंडेंट
डेवलपमेंट थीसिस जो कि कार्डोसो ने दिया। और तीसरा इसमें आता है न्यू डिपेंडेंसी थीसिस जिसको कि डॉस सटोस ने दिया। और
फोर्थ इसमें आता है इंपीरियलिज्म डिपेंडेंसी लिंकेजेस जिसको कि वेरन और स्विजी ने दिया। रोनाल्ड चिलकोटे के जितने
भी वक्स आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं आप इनको अच्छे से नोट कर लें। अगले थिंकर का नाम आता है डॉस सटोस जो कि ब्राजीलियन
इकोनॉमिस्ट और डिपेंडेंसी थ्योरिस्ट रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने कांसेप्ट दिया न्यू डिपेंडेंसी थ्योरी का
और इन्होंने सपोर्ट किया वर्ल्ड सिस्टम थ्योरी को। और खास बात यह भी है कि इन्होंने वर्क किया थ्योरी ऑफ़ इकोनॉमिक
साइंस के ऊपर द लॉन्ग टर्म डायनामिक्स ऑफ कैपिटलिज्म एंड द वर्ल्ड सिस्टम थ्योरी। और खास बात यह भी है कि इन्होंने एक
कांसेप्ट दिया जिसका टाइटल है प्लेरी सिविलाइजेशन। इनका प्रमुख वर्क रहा है क्राइसिस ऑफ कंटेंपररी कैपिटलिज्म जो कि
1976 को पब्लिश होता है। अब हम न्यू डिपेंडेंसी थ्योरी को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो इसको फॉर्मुलेट किया जाता है
डॉस सेंटोस के द्वारा। नियो डिपेंडेंसी थ्योरी यह कहती है कि जो डोमिनेशन है मल्टीलटरल कॉरपोरेशन का वो सेकंड वर्ल्ड
वॉर के बाद बढ़ गया था और यह थ्योरी यह भी कहती है कि जो ऑल कंट्रीज हैं इनको एक्सप्लइट किया जाता है ऑल मल्टीलटरल
कंपनीज़ के द्वारा और जो नियो डिपेंडेंसी थ्योरी है इसको जाना जाता है नियो कॉरपोरेटिज्म के रूप में डिपेंडेंसी
थ्योरी के लास्ट में अब लास्ट थिंकर का नाम आता है इमैनुअल बोलस्टीन का तो इमैनुअल वस्टिन अमेरिकन सोशियोलॉजिस्ट रहे
हैं और वर्ल्ड सिस्टम एनालिसिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने र्विश के जो आइडियाज हैं इनको रिवाइज किया और
इन्होंने कहा कि जो डेवलपिंग नेशंस हैं यह भी डेवलप्ड कंट्रीज के रूप में अपने आप को विकसित कर सकते हैं। यानी कि डेवलप्ड नेशन
की श्रेणी में आ सकते हैं। और खास बात यह भी है कि मार्क्सियन एप्रोच के अंतर्गत इन्होंने वर्ल्ड सिस्टम का एनालिसिस किया
और इन्होंने सोसाइटीज़ को दो भागों में बांटा। जिनमें पहला आता है ट्रेडिशनल सोसाइटी और दूसरा आता है मॉडर्न सोसाइटीज।
ट्रेडिशनल सोसाइटीज आती है प्री कैपिटलिस्ट मोड में और मॉडर्न सोसाइटीज आती है मॉडर्न कैपिटल मोड ऑफ प्रोडक्शन
में। वहीं दूसरी तरफ इमैनुअल बोलस्टीन ने जो कंट्रीज हैं इनको तीन कैटेगरीज में डिवाइड किया। पहली आती है कोर, दूसरी आती
है सेमी पेरिफेरी और तीसरी आती है पेरफेरी। कोर कंट्रीज की कुछ विशेषताएं हैं। जिनमें पहली विशेषता आती है वेलफेयर
स्टेट। दूसरी आती है डेमोक्रेटिक गवर्नमेंट। तीसरी आती है हाईली इंडस्ट्रियलाइज्ड। चौथी आती है
अर्बनाइजेशन। पांचवी आती है इंपोर्ट प्राइमरी गुड्स और छठी आती है एक्सपोर्ट मैन्युफैक्चर गुड्स। वहीं दूसरी तरफ जो
सेमी पेरिफेरी कंट्रीज हैं इनकी भी कुछ फीचर्स होती है जिनमें पहली आती है लो वेलफेयर। दूसरी आती है ऑथॉरिटेरियन
गवर्नमेंट। तीसरी आती है लेस इंडस्ट्रियलाइज्ड। चौथी आती है लेस अर्बनाइजेशन। पांचवी आती है एक्सपोर्ट एंड
इंपोर्ट ऑफ प्राइमरी गुड्स एंड मैन्युफैक्चर गुड्स। वहीं पेरीफेरी कंट्रीज की भी कुछ फीचर्स होती है। जिनमें
पहली आती है नो वेलफेयर। दूसरी आती है नॉन डेमोक्रेटिक गवर्नमेंट। तीसरी आती है नो इंडस्ट्रियलाइजेशन। चौथी आती है नो
अर्बनाइजेशन। पांचवी आती है एक्सपोर्ट प्राइमरी गुड्स और छठी आती है इंपोर्ट मैन्युफैक्चरर्ड गुड्स। अब हम इमैनुअल
बोलस्टीन की वर्ल्ड सिस्टम थ्योरी को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो इसको इन्होंने 1970 में प्रोफाउंड किया था।
वर्ल्ड सिस्टम थ्योरी में इमैनुअल वलस्टीन ने वर्ल्ड को थ्री कैटेगरीज में डिवाइड किया था। पहला आता है कोर, दूसरा आता है
सेमी पेरफेरी और तीसरा आता है पेरफेरी। कोर में डेवलप्ड नेशंस आते हैं। सेमी पेरफेरी में डेवलपिंग नेशंस आते हैं और
पेरीफेरी में अंडर डेवलप्ड नेशंस आते हैं। इसमें इमैनुअल वलस्टीन यह कहते हैं कि वर्ल्ड में कोर कंट्रीज के द्वारा दोनों
कंट्रीज से प्राइमरी गुड्स को इंपोर्ट करके उन्हें मैन्युफैक्चर किया जाता है और हाई प्राइसेस पर सेमी पेरीफेरी व पेरिफेरी
कंट्रीज को बेचा जाता है। इस तरह से कोर के द्वारा दोनों कंट्रीज को एक्सप्लइट किया जाता है। वहीं दूसरी तरफ सेमी
पेरीफेरी कंट्रीज के द्वारा पेरिफेरी से प्राइमरी गुड्स को इंपोर्ट किया जाता है और उन्हें मैन्युफैक्चर करके हाई प्राइसेस
पर पेरीफेरी कंट्रीज को बेचा जाता है। इस तरह से जो पेरिफेरी कंट्रीज है दोनों कोर और सेमी पेरफेरी के द्वारा एक्सप्लइट की
जाती है। इमैनुअल वलस्टीन के जितने भी आपको स्क्रीन पर वक्स दिखाई दे रहे हैं, आप इनको अच्छे से नोट कर लें। अब हम
डिपेंडेंसी थ्योरी को क्रिटिकली एनालाइज कर लेते हैं। तो इसके क्रिटिसिज्म का पहला पॉइंट यह बनता है कि इसको क्रिटिसाइज किया
जाता है बोथ मार्क्सिस्ट और नॉन मार्क्सिस्ट के द्वारा। फॉर एग्जांपल के लिए जो भी मार्क्सिस्ट और नॉन मार्क्सिस्ट
रहे हैं इन्होंने डिपेंडेंसी थ्योरी को थ्योरेटिकल पर्सपेक्टिव के लिए क्रिटिसाइज किया है। फॉर एग्जांपल के लिए विल वर्न ने
कहा था कि डिपेंडेंसी थिंकर्स हैव फेल टू रिकॉग्नाइज द हिस्टोरिकली प्रोग्रेसिव नेचर एज वेल एज रेवोल्यूशनरी डायनामिक्स
ऑफ कैपिटलिज्म। क्रिटिसिज्म का दूसरा पॉइंट यह आता है कि रॉन्ग इंटरप्रिटेशन ऑफ वर्ल्ड कैपिटलिस्ट इकोनमी डिपेंडेंसी
थ्योरी ने वर्ल्ड कैपिटलिस्ट इकॉनमी के बारे में गलत अवधारणा दी थी। इन्होंने यह कहा था कि डेवलपमेंट पॉसिबल नहीं है जो
वर्ल्ड कैपिटलिस्ट इकॉनमी है उसके अंडर। लेकिन इसको गलत प्रूव किया 1970ज और 80ज में साउथ कोरिया, ताइवान, हांगकांग और
सिंगापुर जैसी कंट्रीज ने जिन्होंने इंडस्ट्रियलाइजेशन को प्राप्त किया और इन साउथ एशियन कंट्रीज को जाना जाता है एशियन
टाइगर इकोनमीज़। क्रिटिसिज्म का तीसरा पॉइंट ये आता है कि जो डिपेंडेंसी थ्योरी है ये ए्बिगस आइडियोलॉजी है। इसके जो थॉट
है ये स्पष्ट नहीं है। यह पैराडॉक्सिकल है और ऐसा इसलिए है क्योंकि बहुत सारे थिंकर्स ये कहते हैं कि जो मान्यताएं
मॉडर्नाइजेशन थ्योरी ने रखी वही मान्यताएं इसकी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिस तरह से मॉडर्नाइजेशन ने ग्रोथ एंड डेवलपमेंट की
बात की थी। उसी तरीके से जो डिपेंडेंसी थ्योरी है यह भी ग्रोथ एंड डेवलपमेंट की बात करती है। डिपेंडेंसी थ्योरी के
क्रिटिसिज्म का अगला पॉइंट यह आता है क्वेश्चन मार्क ऑन सोशलिज्म एज एन अल्टरनेट फॉर ओवरकमिंग डिपेंडेंसी
सिचुएशन। बेसिकली पॉइंट यह है कि जो डिपेंडेंसी थ्योरी है, जो डिपेंडेंसी सिचुएशन है, इसके अल्टरनेट के रूप में यह
सोशलिज्म को देखता है। लेकिन यह फेल हो गए हैं। क्यों? क्योंकि इन्होंने यह नहीं बताया कि सोशलिज्म को इन कंट्रीज में जो
पुअर नेशन है कैसे एस्टैब्लिश करना है। फॉर एग्जांपल के लिए जो कोडोसो है उन्होंने भी स्ट्रगल की बात की, सोशल
मूवमेंट्स की बात की लेकिन इन्होंने यह नहीं बताया कि जो एक्सप्लइटेड क्लासेस हैं उनका क्या रोल होगा। वहीं दूसरी तरफ
फ्रैंक ने रेवोल्यूशनरी डिस्ट्रिक्शन ऑफ बरगवाज़ कैपिटलिज्म की बात की जिसको कि रिप्लेस किया जाएगा सोशलिस्ट डेवलपमेंट के
द्वारा। लेकिन प्रॉब्लम यह है कि इन्होंने जो है स्ट्रेटजी और जो ट्रांजिशन है सोशलिज्म को स्थापित करने की उसको नहीं
बताया। तो इस तरह से हम इसको जो है एक पैराडॉक्सिकल कह सकते हैं या आप आधी अधूरी कह सकते हैं। डिपेंडेंसी थ्योरी के
क्रिटिसिज्म का अगला पॉइंट आता है कि इसको क्रिटिसाइज किया जाता है जॉन टेलर के द्वारा। जॉन टेलर ने डेवलपमेंट को
एक्सप्लेन करने की कोशिश की लैटिन अमेरिका में इन टर्म्स ऑफ मोड्स ऑफ प्रोडक्शन एप्रोच। और दूसरी बड़ी बात यह है कि
इन्होंने डिपेंडेंसी थ्योरी को सोशियोलॉजिकल फेंटसी कहा। जबकि जो अंडर डेवलपमेंट है इसको इन्होंने बोथ इकोनॉमिक
एंड टिलियोलॉजिकल कहा। डिपेंडेंसी थ्योरी के क्रिटिसिज्म का अगला पॉइंट यह आता है कि इसने मॉडर्नाइजेशन थ्योरी को
क्रिटिसाइज किया जो कि गलत है। क्योंकि डिपेंडेंसी थ्यरिस्ट भी इस बात को गलत प्रूव नहीं कर पाए कि मॉडर्नाइजेशन की वजह
से जितनी भी डेवलपिंग और अंडर डेवलप्ड नेशन है इन पर मॉडर्नाइजेशन की प्राप्ति हुई। इनको जो है डेवलपमेंट की प्राप्ति
हुई। यानी कि एक ओर से जो सोशल इकोनॉमिक पॉलिटिकल ट्रांजिशन है वो हुआ डेवलपिंग और पुअर कंट्रीज में। अब हम डिपेंडेंसी
थ्योरी के रेलेवेंस को भी देख लेते हैं क्योंकि इसका कहीं ना कहीं रेलेवेंस भी रहा है। तो इसका पहला पॉइंट यह आता है कि
यह फोकस करता है एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की जितनी भी प्रॉब्लम्स रही हो, चाहे वह पॉवर्टी हो, अंडर डेवलपमेंट की
प्रॉब्लम हो, एक्सप्लॉयटेशन की प्रॉब्लम हो, कॉलोनियलिज्म की प्रॉब्लम हो, इन सभी को इसने हाईलाइट किया। दूसरा पॉइंट यह आता
है कि इसने हाईलाइट किया जो अनइक्वल पावर है ग्लोबल लेवल पर जिसमें यह देखा जाता है कि जो नॉर्थ की कंट्रीज है वह पावरफुल है
डेवलपमेंट है जबकि जो साउथ की कंट्रीज है इनके पास कोई पावर नहीं है। वहीं तीसरा पॉइंट यह आता है कि यह एक साइंटिफिक
इफेक्टिव एनालिसिस माना जाता है। जिसने कोर और पेरिफेरी के द्वारा यह समझाने की कोशिश की किस तरह से जो डेवलप्ड नेशन है
उनके द्वारा जो गरीब यानी कि जो लैटिन अमेरिका एशिया अफ्रीका के गरीब देश हैं उनको किस तरह से एक्सप्लइट किया जाता है।
और इसका फोर्थ पॉइंट यह आता है कि जो आईएमएफ हैज़ अ मनी है उसको भी यह चेक करने की कोशिश करता है क्योंकि आईएमएफ इन सभी
राष्ट्रों को विकास करने के लिए बड़ी उच्च कीमतों पर लोन देता है जिसकी वजह से न्यू हैजेमनी हो गई है या फिर न्यू डिपेंडेंसी
हो गई है। तो इस तरह से इसकी रेलेवेंस बढ़ जाती है। अब हम बात कर लेते हैं कॉलोनियलिज्म एंड डीलोनाइजेशन से जुड़े
कुछ इंपॉर्टेंट थिंकर्स। ऐसे थिंकर्स जिन्होंने कॉलोनियलिज्म और डीलोनाइजेशन के ऊपर बहुत कुछ लिखा। अपने लेख लिखे, अपनी
फिलॉसोफी दी। तो इनमें पहला नाम आता है फ्रांस फेनोन का। फेनोन ने कॉलोनियलिज्म के बारे में कहा कि कॉलोनियलिज्म एक
वायलेंस है। यानी कि जो उपनिवेशवाद है वह एक हिंसा है और इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति द रचड ऑफ द अर्थ जो कि 1961 में
पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने कहा कि अगर हमें डीलोनाइजेशन की प्राप्ति करनी है तो जो एक्टिविस्ट्स है उनको वायलेंस का
सहारा लेना होगा। वहीं इस किताब में इन्होंने यह भी कहा कि नेशनल लिबरेशन के लिए क्लास, रेस, नेशनल कल्चर, वायलेंस की
बहुत बड़ी भूमिका होती है। वहीं फेनोन ने अपनी इस प्रमुख कृति में कॉलोनियलिज्म और डीलोनाइजेशन के अलग-अलग प्रकारों की
व्याख्या की। जैसे इन्होंने कहा कि जो कॉलोनियलिज्म होता है वो साइकोलॉजी, हिस्ट्री, सोशियो कल्चर एंड पॉलिटिकल के
आधार पर होता है और साथ में इन्होंने यह भी कहा कि जो नेशनल लिबरेशन है उसकी प्राप्ति के लिए वायलेंस बहुत ही
महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी वजह से इन्होंने वायलेंट रेवोल्यूशन का सपोर्ट किया और इन्होंने इंटरनल कॉलोनियलिज्म जो
शब्दावली है इसको भी कॉइन किया था जिसको मैं ऑलरेडी एक्सप्लेन कर चुका हूं। गांधी जी ने भी कॉलोनियलिज्म की आलोचना की।
इन्होंने अपनी प्रसिद्ध किताब हिंदू स्वराज जो कि 1908 में पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने कॉलोनियलिज्म को
क्रिटिसाइज़ किया। लेकिन इन्होंने फेनोन से भिन्न फेनोन से अलग व्याख्या की। इन्होंने कहा कि अगर हमें स्वराज की प्राप्ति करनी
है, तो हमें नॉन वायलेंस का सहारा लेना होगा ना कि वायलेंस का सहारा लेना होगा। और साथ में इन्होंने यह भी कहा कि स्वराज
का मतलब दो रूपों में होता है। एक होता है पॉलिटिकल लिबरेशन दूसरा होता है स्पिरिचुअल लिबरेशन। यानी कि अगर कोई देश
गुलाम है तो उसकी जो मुक्ति है वो दो रूपों में होनी चाहिए। एक राजनीतिक रूप से दूसरी आध्यात्मिक रूप से और इन्होंने हिंद
स्वराज में जो मॉडर्नाइजेशन है और वेस्टर्न सिविलाइजेशन है उसकी भी भरपूर आलोचना की। बिपिन चंद्रा भी भारत के एक
बहुत बड़े हिस्टोरियन रहे हैं। जिन्होंने कॉलोनियलिज्म और इंडियन फ्रीडम स्ट्रगल के ऊपर बहुत लेख लिखे हैं। इन्होंने कॉलोनियल
रूल को लीगल ऑथॉरिटेरियन रूल के रूप में बिचारा। कहने का मतलब यह है कि जो ब्रिटिश पार्लियामेंट है वो लीगली भारतीयों के लिए
कानून बनाती थी। लेकिन यह ऐसे कानून थे जो मनमानी करते थे। यानी कि भारतीयों के हितों के प्रतिकूल थे, अनुकूल नहीं थे।
इसीलिए इन्होंने कहा कि जो कॉलोनियल रूल था भारत के लिए वह एक और से लीगल अथॉरिटेरियन रूल था। और इन्होंने अपनी
प्रसिद्ध कृति इंडियास कॉलोनियल लिगेसीज में कॉलोनाइजेशन की तीन स्टेजेस की बात की। जिनमें पहली आती है ट्रेड, दूसरी आती
है इंडस्ट्रियल और तीसरी आती है फाइनेंस। ट्रेड का मतलब यह है कि जब शुरू-शुर में कॉलोनियलिज्म शुरू हुआ था तो ट्रेड के साथ
हुआ था। इंडस्ट्रियल का मतलब यह है कि जब यूरोप में इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन आई तो फिर उसने क्या किया कि अपनी इंडस्ट्रियल
रेवोल्यूशन को सक्सेस बनाने के लिए इन कॉलोनाइज्ड कंट्री से कच्चा माल लिया और अपने देशों में चीजें बनाई। वहीं फाइनेंस
का मतलब है कि जब उन्हें यह लगा यानी कि ब्रिटेन जैसे देशों को यह लगा कि अब उनके हाथ में नहीं है कॉलोनीज़ को कंट्रोल करना
तो उन्होंने फिर वहां से जो मनी है उसको लेना यानी कि उसका ड्रेन करना शुरू किया। तो इस प्रकार से बिपिन चंद्रा ने तीन
स्टडीज बताई ट्रेड, इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंस। वहीं हमजा अलवी पाकिस्तानी मार्क्सिस्ट राइटर एंड एक्टिविस्ट रहे
हैं। और इन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण कांसेप्ट दिया जिसका नाम है ओवर डेवलप्ड पोस्ट कॉलोनियल स्टेट। इस शब्दावली से
इनका मतलब यह था कि जो कॉलोनाइज्ड सोसाइटी थी जो कि फ्री हो चुके थे, स्वतंत्र हो चुके थे। उन्होंने अब अपना विकास करने के
लिए डेवलपमेंट पर बहुत ज्यादा फोकस किया और जिस तरह से वेस्टर्न जो कंट्रीज है वह डेवलप हुई थी, उसी तरह से उन्होंने भी वह
रास्ता अपनाया। उदाहरण के लिए जैसे इंडिया ने भी आजादी के बाद लैंड रिफॉर्म्स किए, फाइव इयर्स प्लांस अपनाए,
इंडस्ट्रियलाइजेशन किया, ग्रीन रेवोल्यूशन लाई। उसी तरह से पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भी इस तरह के रिफॉर्म्स किए जिसको कि
अलवी ने ओवर डेवलप्ड पोस्ट कॉलोनियल स्टेट की संज्ञा दी। वहीं इन्होंने कुछ इंपॉर्टेंट बुक्स भी लिखी। जैसे इंडिया
एंड कॉलोनियल मोड ऑफ़ प्रोडक्शन। दूसरी लिखी इन्होंने बांग्लादेश एंड द क्राइसिस ऑफ़ पाकिस्तान। और अगली लिखी इन्होंने
इंट्रोडक्शन टू द सोशियोलॉजी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज। और एक इनकी इंपॉर्टेंट बुक रही है कैपिटलिज्म एंड कॉलोनियल प्रोडक्शन।
अगले थिंकर का नाम आता है चिनुआ एशबे जो कि एक नाइजीरियन पोएट थिंकर एंड कॉलोनियलिज्म के क्रिटिक रहे हैं।
जिन्होंने बड़ी मात्रा में कॉलोनियलिज्म की आलोचना की। इनका जो फर्स्ट नोवेल है वह था थिंग्स फॉल अपार्ट जो कि 1958 में
पब्लिश होता है और इसको कॉलोनियलिज्म के ऊपर एक लिखा बहुत ही महत्वपूर्ण नोवेल माना जाता है जिसमें इन्होंने
कॉलोनियलिज्म की आलोचना की। अगले थिंकर का नाम है जोसेफ कंडर्ड और जोसेफ कन्वर्ड एक पॉलिश ब्रिटिश राइटर रहे हैं। जिन्होंने
यूरोपियन जो डोमिनेटेड वर्ल्ड है उसके ऊपर नोवेल लिखे और साथ में इन्होंने इंपीरियलिज्म एंड कॉलोनियलिज्म को पूरी
तरह से क्रिटिसाइज किया। इन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण तरीके से कहा कि जो सिविलाइज्ड पीपल होते हैं और जिन्हें दूसरी तरफ सेबेज
डिस्क्राइब किया जाता है उसके बीच एक छोटा सा फर्क होता है। कोई बड़ा डिफरेंस नहीं होता है बल्कि यह कंस्ट्रक्टेड है कि कुछ
पीपल सिविलाइज्ड है और जो ईस्टर्न के लोग हैं वह सिविलाइज्ड नहीं है। वे सेवेबेजेस हैं जो कि वेस्टर्न पीपल है वह सिविलाइज्ड
हैं। तो इस तरह की जो चीजें हैं उन्होंने यह बताया कि इसमें बहुत ही कम डिफरेंस होता है और साथ में इनकी जो एक प्रमुख
कृति है हार्ट ऑफ डार्कनेस जो कि 1889 में पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने इंपेरलिज्म एंड रेसिज्म के ऊपर क्वेश्चन
मार्क किए। एडवर्ड सईद भी पोस्ट कॉलोनियलिज्म के एक बहुत बड़े विचारक रहे हैं। जिन्होंने कॉलोनियलिज्म की काफी
आलोचना की। यह पेलेस्टनियन बोर्न यूएस सिटीजन रहे हैं। एक पॉलिटिकल फिलॉसोफर प्रोफेसर ऑफ लिटरेचर इन कोलंबिया
यूनिवर्सिटी रहे हैं। और इन्होंने अपनी प्रमुख कृति जो कि 1978 में पब्लिश होती है जिसका नाम था ओरिएंटलिज्म। इसमें
इन्होंने कॉलोनियलिज्म को पूरी तरह से क्रिटिसाइज किया और साथ में इन्होंने कहा कि यूरोप के द्वारा जो ईस्टर्न कल्चर का
जो रिप्रेजेंटेशन किया जाता है वो गलत है। इसकी इन्होंने आलोचना की और इन्होंने साथ में दो इंपॉर्टेंट कांसेप्ट ऑक्सीडेंट एंड
ओरिएंट दिया। अपनी प्रमुख कृति ओरिएंटलिज्म में इन्होंने कहा कि जो ऑक्सीडेंट एंड ओरिएंट है यह एक
कंस्ट्रक्टिव है। यह जो वेस्टर्न लोग हैं उनके द्वारा बनाए गए कांसेप्ट है जिसमें वो ये समझते हैं कि जो ऑक्सीडेंट में है
यह जो देश है ये आते हैं पश्चिमी जो मॉडर्नाइज्ड हैं सिविलाइज्ड हैं। वहीं ओरिएंट समझा जाता है पूर्वी देश जो कि
पिछड़े हुए हैं अनसिविलाइज्ड हैं मॉडर्नाइज्ड नहीं हैं। अब हम डिपेंडेंसी थ्योरी एंड कॉलोनियलिज्म को अच्छे से समझ
लेते हैं। तो 1960 के दशक में डिपेंडेंसी थ्योरी का डेवलप होता है और इसका डेवलपमेंट किया जाता है कुछ लैटिन अमेरिकन
मार्क्सिस्ट थिंकर्स के द्वारा जिनमें नाम आते हैं एजी फ्रैंक रोल प्रबिश हंस सिंगर इमैनुअल बोलस्टीन एंड सामिर आमीन और नोट
करने वाली बात यह है कि इन्होंने मॉडर्नाइजेशन जो थ्योरी है जिसके अंतर्गत यह माना जाता था कि जो पश्चिमी देश है वे
सभ्य हैं। उनके पास साइंस है, टेक्नोलॉजी है और जो ईस्टर्न लोग हैं यानी कि जो एशियन अफ्रीकन और लैटिन अमेरिकन देश है वह
पिछड़े हैं। उनके पास साइंस नहीं है, टेक्नोलॉजी नहीं है। तो इस मॉडर्नाइजेशन थ्योरी की भी इन्होंने आलोचना की। साथ में
कॉलोनियलिज्म की भी इन्होंने आलोचना की। और एक बात नोट करने वाली है कि इन्होंने कहा कि जो मॉडर्नाइजेशन है और कॉलोनिज्म
है उसके अंतर्गत जो कॉलोनाइजर कंट्री होती है यह पूरी तरह से जो कॉलोनाइज्ड कंट्री होती है उनका शोषण करती है उनको जो है
सप्रेस करती है उनका दमन करती है और नोट करने वाली बात यह भी है कि इसी एक्सप्लइटेशन की वजह से जो पुअर कंट्रीज
होती है यानी कि कॉलोनाइज्ड कंट्री होती है वे पूरी तरह से जो कैपिटलिस्ट कंट्री है इंडस्ट्रियलाइज्ड कंट्री है या फिर
वेस्टर्न कंट्रीज है उनके ऊपर डिपेंडेंट हो जाती है। उनके ऊपर निर्भर हो जाती है। जिसको कि डिपेंडेंसी थ्योरी कहा जाता है।
वहीं डिपेंडेंसी थ्योरी में इमैनुअल बोलस्टी ने वर्ल्ड सिस्टम एनालिसिस को दिया जिसके अंतर्गत इन्होंने कहा कि जो
कॉलोनियलिज्म है उसके अंतर्गत जो कोर कंट्रीज है वह पेरिफेरी और सेमी पेरिफेरी कंट्रीज को एक्सप्लइट करती है। वहीं जो
सेमी पेरफेरी कंट्रीज है, वह एक्सप्लइट करती है पेरिफेरी कंट्रीज को। लेकिन सबसे पहले आपको यह समझना होता है कि कोर, सेमी
पेरफेरी एंड पेरिफेरी कंट्रीज कौन सी होती है? तो कोर में आती है ऐसी कंट्रीज जो काफी डेवलप होती है। पेरिफेरी में आती है
ऐसी कंट्रीज जो अल्पविकसित है जो पूरी तरह से पिछड़ी हुई है। वहीं सेमी पेरिफेरी में ऐसी कंट्रीज आती है जो पीस की है यानी कि
जो विकासशील है। अब हम एक डायग्राम के द्वारा कोर सेमी पेरफेरी एंड पेरिफेरी के रिलेशन को समझने की कोशिश करते हैं। जिसका
कांसेप्ट इमैनुअल बोलस्टीन ने दिया था। तो इमैनुअल बलस्टीन कहते हैं कि सबसे पहले क्या होता है कि जो कोर कंट्रीज है यह
पेरिफेरी कंट्रीज से यानी कि जो बहुत ही पिछड़ी हुई कंट्रीज है जो कि अल्पविकसित है उनसे क्या होता है कि यह कोर कंट्रीज
यानी कि विकसित देश सस्ते दामों पे लेबर लेते हैं और वहां से कच्चा माल लेते हैं और उसको फिर अपने देशों में बनाते हैं और
इन्हीं पेरिफेरी जो देश हैं इनको हाई मात्रा में यानी कि उच्च दामों में इनको भेजते हैं और इतना इतना ही नहीं जो कोर
कंट्रीज है यह सेमी पेरिफेरी देशों से भी वस्तुएं लेते हैं, लेबर लेते हैं और फिर इनको बेच देते हैं। और फिर आगे बोलस्टीन
लिखते हैं कि जो सेमी पेरिफेरी कंट्रीज है यानी कि जो विकासशील देश हैं, यह भी पेरिफेरी देशों का शोषण करते हैं। कैसे
करते हैं? यह भी कोर देशों की तरह पेरीफेरी देशों से कच्चा माल लेते हैं, लेबर लेते हैं और इनको फिर महंगे दामों
में बेचते हैं। तो, यह है डिपेंडेंसी थ्योरी का वर्ल्ड सिस्टम एनालिसिस जो कि इमैनुअल बोलस्टी ने दिया था। मुझे उम्मीद
है कि आपको समझ में आ गया होगा। इस लेक्चर के एंड में अब हम बात कर लेते हैं रॉयल लेनिन डिबेट की जो कि कॉलोनियल क्वेश्चन
के ऊपर हुई थी। कॉलोनियल क्वेश्चन का मतलब यहां पर यह है कि जो कॉलोनाइज्ड कंट्रीज थी या फिर जो कॉलोनीज़ थी उनकी जो समस्याएं
हैं या फिर उनकी जो लिबरेशन की प्रॉब्लम है डीलोनाइजेशन की प्रॉब्लम है उसको लेकर रॉय एंड लेनिन के बीच एक डिबेट हुई थी
बातचीत हुई थी डिस्कशन हुआ था तो यह जो डिबेट है सबसे पहले 19 जुलाई 1920 से लेकर 7 अगस्त 1920 के बीच होती है और यह जो
डिबेट है बेसिकली यह लेनिन ने ही बुलाई थी और इसका जो टाइटल था वह था नेशनल कॉलोनियल क्वेश्चन और दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है
कि रॉय ने जो लेनिन का आईडिया था कि नेशनलिज्म का और कॉलोनियलिज्म का उसको क्रिटिसाइज किया। इसी वजह से इसको रॉयल
लेनिन डिबेट भी कहा जाता है। और नोट करने वाली बात यह है कि लेनिन का एक प्रमुख आइडिया जिसमें इन्होंने यह कहा था कि जो
बोजवाजी डेमोक्रेटिक लिबरेशन मूवमेंट है उसमें जो कम्युनिस्ट पार्टी है उनका रोल होगा। तो इस बात को लेकर भी रॉय इनसे पूरी
तरह से डिसए्री थे। रॉयल लेनिन डिबेट को अब हम थोड़ा सा अच्छे से समझ लेते हैं। आसान भाषा में समझ लेते हैं। एक तरफ लेनिन
का यह मानना था कि रेवोल्यूशन की शुरुआत कॉलोनाइज्ड कंट्री से होनी चाहिए और जब रेवोल्यूशन लाई जाएगी तो उसमें वर्चुअ
क्लास महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यानी कि रेवोल्यूशन को वर्चुअ क्लास लीड करेगा। लेकिन दूसरी तरफ रॉय का यह मानना था कि
रेवोल्यूशन की शुरुआत कॉलोनाइज्ड कंट्री से होगी। इसमें तो कोई प्रॉब्लम नहीं है। लेकिन इस रेवोल्यूशन को वर्जुआ क्लास लीड
नहीं कर सकता है। क्योंकि भारत जैसे देशों में जो वर्जुआ क्लास है या फिर कैपिटलिस्ट क्लास है वह कॉलोनाइजर के साथ मिली होती
है जो अपने ही इंटरेस्ट को गेन करना चाहते हैं। इसीलिए रेवोल्यूशन की जो शुरुआत है वह वर्जुआ क्लास या फिर कैपिटलिस्ट क्लास
के द्वारा नहीं हो सकती है। बल्कि इस रेवोल्यूशन को लीड किया जाएगा। प्रोलिट्रेट क्लास और पेटीवर्जुआ क्लास के
द्वारा। वहीं दूसरी तरफ लेनिन का यह मानना रहा था कि जब रेवोल्यूशन आएगी तो रेवोल्यूशन को लाने में जो कम्युनिस्ट
पार्टी है वह महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी। लेकिन दूसरी तरफ रॉय कहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी रेवोल्यूशन को लाने में
मदद नहीं कर सकती है। क्योंकि जिन देशों में कम्युनिस्ट पार्टी नहीं है या फिर कम्युनिज्म नहीं है वहां पे कम्युनिस्ट
पार्टी किस तरह से रेवोल्यूशन को ला सकती है। वहीं तीसरी जो महत्वपूर्ण बात थी वो यह थी कि लेनिन कहते थे कि हमें इंटरनेशनल
लेवल पे कम्युनिज्म को स्थापित करना है। यानी कि यूरोप के पूरे जो देश है वहां पर भी कम्युनिज्म को स्थापित करना है। जबकि
दूसरी तरफ रॉय ने जो इस एक कॉन्फ़ेंस है इसमें जो भाग लिया था वह इंडिया के पर्सपेक्टिव से लिया था। यानी कि इंडिया
में जो कॉलोनाइजेशन की प्रॉब्लम थी या फिर रेवोल्यूशन की जो प्रॉब्लम थी, लिबरेशन की प्रॉब्लम थी, उसको लेकर ही इन्होंने इसमें
बातचीत की थी, डिबेट की थी, डिस्कशन किया था। दूसरी तरफ हॉब्स ने अपनी प्रमुख कृति लेवाइथान में राज्य की उत्पत्ति संबंधी
सोशल कॉन्ट्रैक्ट थ्योरी को दिया है। जिसमें इन्होंने कहा है कि स्टेट ऑफ नेचर की जो अवस्था थी वो बड़ी एनॉकिकल थी यानी
कि अराजकतापूर्ण थी। क्यों? क्योंकि वहां पर कोई राज्य नहीं था। कोई सरकार नहीं था। कोई ऐसी संस्था नहीं थी जो लोगों को
कंट्रोल कर सके। तो इस प्रकार से जो स्टेट ऑफ नेचर है वहां पर मैन एक उसकी जो लाइफ है वो सॉलिटरी थी, पुअर थी, नास्टी थी,
ब्रूटिश थी और शॉर्ट थी। और खास बात यह है कि स्टेट ऑफ जो नेचर था वहां पर माइट इज राइट की अवस्था थी। वहां पर किसी भी तरह
का पॉलिटिकल ऑर्डर नहीं था, लॉ नहीं था। इसीलिए सभी लोगों को एक अनलिमिटेड नेचुरल फ्रीडम थी। जिसके अंतर्गत वे कुछ भी कर
सकते थे। किसी को मार सकते थे, किसी को पीट सकते थे, दूसरे का बुरा कर सकते थे। तो इस प्रकार से लोग वहां पर एक दूसरे का
अहित करते थे, बुरा करते थे। और यह कहते हैं कि स्टेट ऑफ जो नेचर थी, वह बेसिकली एंडलेस वॉर ऑफ ऑल अगेंस्ट ऑल था। हॉब्स
आगे लिखते हैं कि स्टेट ऑफ नेचर की जो अवस्था थी, वह एक प्रकार से स्टेट ऑफ वॉर की अवस्था थी। क्योंकि वहां पर लोग एक
दूसरे के साथ लड़ते झगड़ते रहते थे। एक दूसरे को मारते थे। लेकिन हॉब्स कहते हैं कि अगर इंडिविजुअल आपस में एक सोशल
कॉन्ट्रैक्ट कर लेते हैं और अपनी सारी शक्तियां, सारी स्वतंत्रताएं, सारे अधिकार एक सोबवरन पावर को देते हैं तो ऐसी स्थिति
में उनकी जो इनसिक्योरिटी है या फिर जो एक वॉर की अवस्था है उसको दूर किया जा सकता है। तो हॉब्स आगे लिखते हैं कि लोगों ने
ऐसा ही किया। लोगों ने आपस में एक सोशल कॉन्ट्रैक्ट किया। जिसकी वजह से स्टेट अस्तित्व में आ जाता है। लेकिन हॉब्स कहते
हैं कि इस सोशल कॉन्ट्रैक्ट का किंग कोई हिस्सा नहीं था, कोई पार्ट नहीं था। और ऐसा इसलिए है क्योंकि राजा लोगों के प्रति
उत्तरदाई नहीं था बल्कि लोग राजा के प्रति उत्तरदाई थे। हॉब्स ने यह कहा था कि लोगों को सोशल कॉन्ट्रैक्ट करने से पहले दो
प्रकार की चॉइससेस थी। पहली थी स्टेट ऑफ नेचर जहां पर इनसिक्योरिटी मौजूद थी। और दूसरी जो चॉइस थी वह थी सोशल कॉन्ट्रैक्ट
यानी कि स्टेट की स्थापना जहां पर लोगों की जो लाइफ है उसको एब्सोल्यूट किंग के द्वारा सिक्यर्ड किया जाएगा। वहीं हॉब्स
आगे यह भी कहते हैं कि भले ही स्टेट की स्थापना हो चुकी है लेकिन फिर भी वहां पर कुछ अवस्थाओं में लोगों को रेसिस्ट या फिर
विद्रोह करने की आजादी है। राइट है। पहली है अगर सिविल वॉर होता है क्योंकि सिविल वॉर में फिर लोगों की हत्याएं होगी, मर्डर
होगी, किलिंग होगी। तो इस तरह से अगर सिविल वॉर होता है तो लोग रेसिस्ट कर सकते हैं और अगर इनसिक्योरिटी है यानी कि लोग
स्टेट की स्थापना होने के बावजूद भी इनसिक्योर फील करते हैं तो ऐसी स्थिति में लोग किंग के प्रति रेवोल्यूशन ला सकते हैं
और अगर लोग सुसाइड करते हैं क्योंकि राज्य या फिर राजा का प्रमुख कार्य लोगों के जीवन की रक्षा करनी है। सिक्योरिटी प्रदान
करना है। तो अगर लोग सुसाइड करते हैं तो ऐसी अवस्था में भी लोग रेसिस्ट कर सकते हैं या फिर रेवोल्यूशन ला सकते हैं। हॉब्स
ने एक इंपॉर्टेंट कोट भी किया है जिसमें इन्होंने लिखा है कि आई ऑथोराइजेस एंड गिव अप राइट ऑफ गवर्निंग मसेल्फ टू दिस और टू
दिस असेंबली ऑफ़ मैन ऑन दिस कंडीशन दैट यू गिव अप राइट्स टू हिम एंड ऑथराइज ऑल ह एक्शन इन लाइक मैनर। बेसिकली इसमें यह कह
रहे हैं कि जब लोग सोशल कॉन्ट्रैक्ट कर रहे थे तो वह एक दूसरे को कह रहे थे कि मैं अपना स्वयं शासन करने का अधिकार इस
सभा या इस मनुष्य को इस शर्त पर देता हूं कि तुम भी अपने अधिकार मेरी तरह इस व्यक्ति या सभा को दो। इस प्रकार से अगर
हम हॉब्स की बात करते हैं तो हॉब्स ने एब्सोल्यूट सोवनिटी का कांसेप्ट दिया। या फिर हम यह भी कह सकते हैं कि इन्होंने
एब्सोल्यूट मोनार्की का कांसेप्ट दिया और खास बात यह भी है कि इन्होंने कुछ इंपॉर्टेंट नेचुरल लॉज़ की बात की जिनका
उल्लेख मैंने यहां पर किया है। तो इनमें पहला लॉ आता है सर्च फॉर पीस। दूसरा आता है फॉरसेक ऑफ नेचुरल राइट्स। तीसरा आता है
रिस्पेक्ट टू द कॉन्ट्रैक्ट। वहीं नोट करने वाली बात यह भी है कि हॉब्स ने इन सभी नेचुरल लॉज़ को कहा लॉ ऑफ प्रूडेंस।
वहीं दूसरी तरफ जॉन लॉक ने अपनी प्रमुख कृति टू टिटाइज ऑफ गवर्नमेंट जिसका सेकंड एडिशन 1690 को पब्लिश होता है उसमें
इन्होंने सोशल कॉन्ट्रैक्ट को दिया था और इनके विचार हॉब्स से बिल्कुल उलट थे क्योंकि इनका मानना था कि जो स्टेट ऑफ
नेचर में मैन है वह हैप्पीनेस थे। उनके पास शांति थी। वे शांतिप्रिय नेचर वाले थे। वे एक और से सोशल एंड इरशनल बीइंग थे।
और खास बात यह है कि लॉक ने नेचुरल राइट्स की बात की। इन्होंने तीन प्रकार के नेचुरल राइट्स की बात की। जिनमें पहला आता है
राइट टू लाइफ़, दूसरा आता है राइट टू लिबर्टी और तीसरा आता है राइट टू प्रॉपर्टी। वहीं नोट करने वाली बात यह भी
है कि लॉक के अनुसार स्टेट ऑफ़ नेचर एक प्रकार से पीसफुल था, कोऑपरेटिव था। क्योंकि लोग शांतिप्रिय ढंग से रहते थे।
एक दूसरे को सहयोग करते थे। और लॉक आगे लिखते हैं कि इस प्रकार से जो लोग हैं स्टेट ऑफ नेचर में वे इक्वल नेचुरल राइट्स
को एंजॉय कर रहे थे। परंतु लॉक कहते हैं कि उस समय भी लोगों के पास तीन प्रकार की डिफिकल्टीज थी स्टेट ऑफ नेचर में जिसकी
वजह से लोगों ने सोशल कॉन्ट्रैक्ट किया जिसमें पहली आती है लैक ऑफ लेजिसलेटचिव। दूसरी आती है लैक ऑफ जुडिशियरी और तीसरी
आती है लैक ऑफ एग्जीक्यूटिव। बेसिकली लॉ कि कहते हैं कि वहां पर छोटे-मोटे कानून थे और उन कानूनों का लोग अपने ही मतलब के
लिए या फिर अपने ही फायदे के लिए उनका मीनिंग निकालते थे क्योंकि वहां पर कोई लेजिसलेटिव नहीं थी जो कानूनों को बना
सके। कोई जुडिशरी नहीं थी जो उनको अच्छे ढंग से व्याख्या कर सके और कोई एग्जीक्यूटिव भी नहीं थी जो अच्छे से उनको
इंप्लीमेंट कर सके। इसी वजह से लोगों को सोशल कॉन्ट्रैक्ट करना पड़ा। लॉक आगे लिखते हैं कि लोगों ने आपस में दो प्रकार
के समझौते किए। जिनमें पहला आता है सोशल कॉन्ट्रैक्ट। सोशल कॉन्ट्रैक्ट के द्वारा लोगों ने सिविल सोसाइटी की स्थापना की।
यानी कि जैसे ही लोगों ने सोशल कॉन्ट्रैक्ट किया तो उसकी वजह से सिविल सोसाइटी का ओरिजिन हो जाता है और लोगों ने
जो दूसरा कॉन्ट्रैक्ट किया वह है पॉलिटिकल कॉन्ट्रैक्ट। इसकी वजह से स्टेट का ओरिजिन हो जाता है। तो इस प्रकार से हम कह सकते
हैं कि लॉक ने दो प्रकार के सोशल कॉन्ट्रैक्ट या फिर कॉन्ट्रैक्ट की बात की जिनमें पहला है सोशल कॉन्ट्रैक्ट। दूसरा
है पॉलिटिकल कॉन्ट्रैक्ट। सोशल कॉन्ट्रैक्ट से सिविल सोसाइटी का ओरिजिन होता है और पॉलिटिकल कॉन्ट्रैक्ट से स्टेट
का ओरिजिन होता है। तो एग्जाम की दृष्टि से यह भी बहुत इंपॉर्टेंट है। इसको अच्छे से आप नोट कर लें। दूसरी तरफ अगर हम बात
करें जीकस रूसो की तो सबसे पहले हमें यह समझना है कि इन्होंने स्टेट ऑफ नेचर का जो मैन है उसको नोवेल सेवेबेज कहा है। नोबेल
सेवेबेज इन्होंने इसलिए कहा है क्योंकि यह बोलते हैं कि उस समय का जो आदमी है वह जंगलों में रहता है। कंदमूल खाता है। वहां
पर किसी तरह की कोई सिविलाइजेशन का इमरजेंस नहीं हुआ है। कोई एनलाइटनमेंट नहीं है। साइंस एंड टेक्नोलॉजी नहीं है।
मॉडर्निटी नहीं है। और दूसरी तरफ वो किसी के प्रति कोई घृणा नहीं रखता है। कोई कपट नहीं रखता है। किसी का अहित नहीं चाहता
है। बल्कि शांतिप्रिय ढंग से रहता है। प्यार से रहता है और सभी के प्रति अच्छी भावना रखता है। इसीलिए इन्होंने मैन को एक
नोवेल सेवस कहा। और दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि रूसो कहते हैं कि जो स्टेट ऑफ नेचर का मैन है वो सेल्फ सफिशिएंट है। और
यह कहते हैं कि उस समय मैन के पास यानी कि जो स्टेट ऑफ़ नेचर में लोग रहते थे, आदमी रहते थे, उनके पास नेचुरल लिबर्टी थी,
इक्वलिटी थी। और यह कहते हैं कि उस समय किसी भी प्रकार की कोई मॉडर्निटी नहीं थी, कोई सिविलाइजेशन नहीं थी। और इस एज को
रूसो ने गोल्डन एज की संज्ञा दी है। और इन्होंने गोल्डन एज इसीलिए कहा है क्योंकि वे बोलते हैं कि उस समय लोगों के अंदर
तेरा मेरा नहीं था। लोगों के अंदर किसी के प्रति घृणा नहीं थी, नफरत नहीं थी, लालच नहीं था। तो इस तरह से इन्होंने इस पीरियड
को एक गोल्डन एज कहा है। हालांकि रूसो ने दो प्रकार की इनकलिटी अर्थात विषमताओं को भी जिक्र किया है। जिनमें पहली आती है
नेचुरल इनकलिटी। नेचुरल का मतलब यह है कि जो कि प्रकृति से मिली है। जैसे आपकी बॉडी है या आपका कोई सेक्स है, जेंडर है तो इस
तरह की जो इनकलिटी है वो नेचुरल होती है। क्योंकि मान लीजिए आप अगर फीमेल है तो आप फीमेल से मेल नहीं बन सकते हैं। आपकी
स्किन का कलर अगर डार्क है, ब्लैक है तो फिर आप वाइट नहीं हो सकते हो। वहीं दूसरी जो इनकलिटी आती है उसका नाम है कन्वेंशनल
इनकलिटी। मतलब परंपरागत भी इसे हम कहते हैं या फिर जो कंस्ट्रक्टिव इनकलिटी है उसे हम यह भी कह सकते हैं। मतलब जो कहीं
ना कहीं सोसाइटी में रह के ह्यूमन बीइंग है वो बनाता है। जैसे आपका स्टेटस हो सकता है। आपकी वेल्थ हो सकती है। आज मान लीजिए
आप गरीब हो तो कल को आप अमीर बन सकते हो। या आप अगर आज अमीर हो तो हो सकता है कि आप के जो बिजनेस है, जॉब है उसमें मंदी आ जाए
और आप गरीब बन जाए। जीन जेकस रूसो आगे लिखते हैं कि धीरे-धीरे सिविलाइजेशन एंड मॉडर्निटी का उत्थान हो जाता है। यानी कि
जो मैन है वह सिविलाइजेशन और मॉडर्निटी में एंड कर जाते हैं। और इसके साथ-साथ राइज ऑफ कैपिटलिज्म एंड राइज ऑफ़ कांसेप्ट
ऑफ रिच एंड पुअर आ जाता है। यानी कि जैसे-जैसे कैपिटलिज्म बढ़ता है, मॉडर्निटी आती है, तो उसके साथ-साथ जो रिच एंड पुअर
का कांसेप्ट है, वह भी आ जाता है। तो इस तरह से रूसो आगे लिखते हैं कि ड्यू टू मॉडर्निटी सिविलाइजेशन एंड राइज ऑफ आर्ट
एंड कल्चर एंड साइंस एंड टेक्नोलॉजी इसकी वजह से जो ह्यूमन बीइंग है यानी कि उस समय का जो मैन है उसने अपनी जो हैप्पीनेस है
या फिर पीस है उसको खो दिया और जो उस समय की गोल्डन एज थी उसको भी लॉस्ट कर दिया और रूसो बात करते हैं पॉपुलर सोवनिटी की जो
कि रिप्रेजेंट करती है जनरल बिल को पॉपुलर सोवनिटी क्यों है क्योंकि उनकी जो वास्तव में शक्ति शक्तियां है वह पॉपुलर सोवनिटी
के पास है जो कि जनरल बिल यानी कि जो कॉमन पीपल की जो बिल होती है उसको रिप्रेजेंट करती है। रूसो ने फेमसली एक कोट दिया है
जिसमें इन्होंने लिखा है कि वह पहला व्यक्ति समाज का वास्तविक जन्मदाता था जिसने एक भूभाग को घेर कर यह कहा कि यह
मेरी भूमि है और जिसे उसके उस कथन के प्रति विश्वास करने वाले सरल व्यक्ति मिल गए। थॉमस हॉब्स ने अपनी प्रमुख कृति
लेबथान जो कि 1651 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने स्टेट को एक लेबथान के साथ कंपेयर किया है जो कि एक आर्टिफिशियल मैन
है लेकिन पावरफुल है। वहीं दूसरी तरफ ब्लंट कली ने अपनी प्रमुख कृति द थ्योरी ऑफ द स्टेट जो कि 1979 को पब्लिश होती है।
स्टेट को मैन के साथ और चर्च को वुमेन के साथ कंपेयर किया है। वहीं हरबर्ट स्पेंसर ने नेचुरल मैन और स्टेट मैन के बीच अंतर
स्थापित किया है। ऑर्गेनिक थ्योरी से जुड़े कुछ इंपॉर्टेंट स्कॉलर्स के नाम हैं। जिनमें पहला नाम आता है प्लेटो का।
उसके बाद एरिस्टोटल फिर आता है कौटिल्य। उसके बाद आता है शुक्राचार्य। फिर आता है मनु। मनु के बाद हॉब्स। हॉब्स के बाद
रूसो। रूसो के बाद बर्क। बर्क के बाद स्पेंसर। स्पेंसर के बाद ब्लस्टली। व स्टइक्स को भी इनमें शामिल किया जाता है।
और नोट करने वाली बात यह है कि बायोलॉजिकल स्कूल ने भी स्टेट की ऑर्गेनिक थ्योरी को दिया है। प्लेटो ने स्टेट को डिफाइन करते
हुए कहा था कि स्टेट इज द इंडिविजुअल रिटार्स अर्थात राज्य व्यक्ति का एक बहत रूप होता है। वहीं दूसरी तरफ एरिस्टोटल ने
स्टेट को परिभाषित करते हुए कहा था कि मैन इज बाय नेचर इज पॉलिटिकल मैन। वन हु लिव्स विदाउट स्टेट इज अ बीस्ट और अ गॉड। तो
बेसिकली एरिस्टोटल कहते हैं कि मनुष्य नेचर से ही एक राजनीतिक प्राणी होता है और जो बिना राज्य के रहता है वह या तो पशु
होता है या फिर भगवान होता है। वहीं दूसरी तरफ उरूसो ने फेमसली एक कोट किया था जिसमें इन्होंने लिखा था कि मनुष्य की तरह
राज्य भी इच्छा की शक्ति से प्रेरित होता है। वहीं दूसरी तरफ एडममंड वर्क ने कोट किया था। जिसमें यह लिखते हैं कि राज्य का
ऐतिहासिक विकास जीवित प्राणी की तरह ही है। कौटिल्य ने सप्तांग थ्योरी को दिया है जिसमें इन्होंने स्टेट के सेवन ऑर्गन्स की
बात की है। जिनमें पहला आता है किंग अर्थात स्वामी। दूसरा आता है मिनिस्टर्स जिनको हम अमात्य या फिर मंत्री कहते हैं।
तीसरा आता है ट्रीजर यानी कि कोष खजाना। चौथा आता है दंडा यानी कि पनिशमेंट देना। पांचवा आता है दुर्ग यानी कि राजधानी। छठा
आता है जनपद। वहीं सातवां आता है अलाइज यानी कि मित्र। तो कौटिल्य ने बेसिकली स्टेट के यह सेवन ऑर्गन्स की बात की है जो
कि स्टेट के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। इनमें से अगर एक भी ऑर्गन या फिर एक भी अंग ना हो तो स्टेट फिर अच्छे से काम नहीं
कर सकता है। वहीं दूसरी तरफ मनु ने भी सप्तांग थ्योरी की बात की है। अर्थात इन्होंने भी राज्य के सेवन एलिमेंट्स को
बताया है। जिसमें इन्होंने पहले एलिमेंट को कहा है किंग अर्थात स्वामी। दूसरा एलिमेंट इन्होंने बताया है मिनिस्टरर्स
यानी कि अमात्य जिन्हें हम मंत्री भी कहते हैं। और तीसरा एलिमेंट इन्होंने बताया ट्रीजर यानी कि कोष और चौथा एलिमेंट
इन्होंने बताया मिलिट्री यानी कि सेना। वहीं पांचवा एलिमेंट इन्होंने बताया दुर्ग यानी कि राजधानी। वहीं छठा एलिमेंट
इन्होंने बताया रियल जिसे हम जनपद भी कहते हैं। और सातवां एलिमेंट इन्होंने बताया अलाइस यानी कि मित्र। स्टेट को समझने की
अगली थ्योरी आती है एब्सोल्यूटिस्ट थ्योरी। तो जब हम बात करते हैं एब्सोल्यूटिस्ट थ्योरी की तो सबसे पहले
हमें यही समझना होता है कि यह बात करती है स्टेट की सुप्रीम अथॉरिटी की और साथ में यह बात करती है स्टेट की एब्सोल्यूट
सोवनिटी की यानी कि यह बताती है कि स्टेट अपने आप में सोवन होता है। उसके पास एब्सोल्यूट पावर्स होती है और खास बात यह
है कि इस थ्योरी का कोर आर्गुमेंट ये है कि ये स्टेट को मानती है एंड यानी कि स्टेट को ये लक्ष्य मानती है। स्टेट को ये
साध्य मानती है और इंडिविजुअल को ये मेन मानती है। इसका मतलब ये है कि ये थ्योरी बताती है कि जो इंडिविजुअल है यानी कि जो
लोग हैं वो स्टेट की प्रगति के लिए काम करेंगे। स्टेट के लिए काम करेंगे और जो स्टेट है वो इंडिविजुअल के लिए कोई काम
नहीं करेगा। बल्कि ये लोगों की जिम्मेदारी है। लोगों का काम है कि लोग स्टेट के लिए काम करें। उसकी प्रोग्रेस के लिए काम
करें। और हिटलर और मुसोलिनी ने एब्सोल्यूट इस थ्योरी को ही आगे बढ़ाया। उन्होंने इस थ्योरी को काफी अच्छा माना।
एब्सोल्यूटिस्ट थ्योरी से जुड़े कुछ इंपॉर्टेंट थिंकर्स के नाम हैं। जिनमें पहला नाम आता है मैक्याबली का। दूसरा नाम
आता है हेगल का। तीसरा नाम आता है हॉब्स का। चौथा नाम आता है मिच का। पांचवा नाम आता है हिटलर का और छठा नाम आता है
मुसोलिनी का। अब हम यह समझ लेते हैं कि मैक्यावली स्टेट के बारे में क्या कहते हैं। तो सबसे पहली बात यह है कि मैक्यावली
ने मॉडर्न जो स्टेट है उसकी शब्दावली को यूज़ किया और उनको मॉडर्न जो स्टेट है उसके जनक के रूप में भी उन्हें देखा जा
सकता है। क्योंकि इन्होंने पहली बार जो एथिक्स है उसको पॉलिटिक्स से बिल्कुल अलग किया और खास बात यह है कि इन्होंने
एब्सोल्यूट सोवनिटी की बात की। एब्सोल्यूट किंग की बात की और इनकी जो प्रमुख किताब है जिसका नाम द प्रिंस है जो कि 1531 में
पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने लिखा कि द पावर व्हिच हैज़ अथॉरिटी ओवर मैन। यानी कि स्टेट के बारे में इन्होंने कहा कि स्टेट
के पास ऐसी पावर होती है, ऐसी अथॉरिटी होती है जिसके द्वारा वह लोगों के ऊपर या फिर मैन के ऊपर भी उसका प्रयोग करता है।
वहीं दूसरी तरफ हगल ने कहा था कि स्टेट अपने आप में एक एंड होता है। यानी कि जो इंडिविजुअल है वो स्टेट के लिए ही काम
करेंगे। जबकि जो इंडिविजुअल है वह केवल मीन होते हैं। इसका मतलब यह है कि इन्होंने स्टेट को सर्वोपरि माना, सोवन
माना और एब्सोल्यूट माना। तो इन्होंने बेसिकली फेमसली कहा भी था कि स्टेट इज द मार्च ऑफ़ गॉड ऑन अर्थ। यह कहते हैं कि जो
राज्य है वह पृथ्वी पर ईश्वर का अवतार है। तो इससे साफ जाहिर होता है कि यह स्टेट को बहुत ज्यादाेंस देते हैं जो कि सोबवरन है
जो कि सब कुछ है। हगल ने सोशल एग्जिस्टेंस के तीन इंपॉर्टेंट मोमेंट्स की बात की जिनमें पहला आता है द फैमिली, दूसरा आता
है सिविल सोसाइटी और तीसरा आता है द स्टेट। तो जब हम बात करते हैं द फैमिली की तो इसमें हेगल कहते हैं कि यह पर्टिकुलर
अल्ट्रिज्म से जुड़ा होता है। पर्टिकुलर अल्टरज्म का मतलब होता है कि जो फैमिली होती है फैमिली के जो लोग होते हैं उनका
आपस में जो परोपकार होता है एक दूसरे की मदद करना होता है। इस भावना से ये जुड़ा होता है। और वही सिविल सोसाइटी में यह
कहते हैं यूनिवर्सल इगोइज़्म। इसमें बेसिकली यह कहते हैं कि एवरीवन शुड डू व्हाट इज इन हिज ओन इंटरेस्ट। यानी कि
लोगों के हित में जो है लोगों के लिए जो सामूहिक रूप से है उसका जो काम होता है वो होता है सिविल सोसाइटी में। वहीं द स्टेट
में यह कहते हैं यूनिवर्सल अल्ट्रिज्म। यानी कि यह कहते हैं कि जो स्टेट है वो बेसिकली यूनिवर्सल अल्टरिज्म को
रिप्रेजेंट करता है। यानी कि जो वैश्विक यानी कि ब्रह्मांड में जो परोपकार होता है उस भावना को यह रिप्रेजेंट करता है। तो
इसी संदर्भ में यह कहते हैं कि जो स्टेट है वो बेसिकली एक प्रोग्रेसिव इंस्टीट्यूशन होता है। क्योंकि यहीं पर
प्रोग्रेसिव सोशल रिलेशंस पाए जाते हैं। क्योंकि स्टेट अपने आप में कंप्लीट होता है। सर्वोच्च होता है। इसीलिए परोपकार की
यानी कि दूसरों के कल्याण की दूसरों की मदद की जो सर्वोच्च भावना है या जो सर्वोच्च अवसर है वो सिर्फ स्टेट में ही
पाए जाते हैं क्योंकि स्टेट यूनिवर्सल अल्टरिज्म को रिप्रेजेंट करता है। वहीं दूसरी तरफ हॉब्स ने अपनी प्रमुख कृति
लेवाइथान जो कि 1651 को पब्लिश होती है उसमें इन्होंने लिखा है कि स्टेबिलिटी एंड ऑर्डर कुड बी सिक्यर्ड ओनली थ्रू द
एस्टैब्लिशमेंट ऑफ एन एब्सोल्यूट एंड अल्टीमेट स्टेट। तो बेसिकली इसमें यह कह रहे हैं कि अगर हमें ऑर्डर या फिर
स्टेबिलिटी को एस्टैब्लिश करना है तो उसे स्थापित किया जा सकता है एब्सोल्यूट या फिर अल्टीमेट स्टेट में ही। वहीं दूसरी
तरफ फ्रेडरिक नित से लिखते हैं कि राज्य शक्ति का प्रतिरूप है। वह किसी ऐसे नियमों से नहीं बंधा है जो उसकी शक्ति के विस्तार
को रोक सके। वहीं यह आगे लिखते हैं कि युद्ध मानव जाति के लिए आवश्यक ही नहीं अपितु अभीष्ट भी है। तो इनके कोटेशन से
यही पता चलता है कि इन्होंने भी पूरी तरह से एब्सोल्यूटिस्ट जो थ्योरी है स्टेट की उसका समर्थन किया था। मैक्स बेबर ने अपनी
प्रमुख कृति पॉलिटिक्स एज़ वोकेशन में लिखा है कि स्टेट इज़ अ ह्यूमन कम्युनिटी दैट क्लेम्स द मोनोपोली ऑफ़ द लेजिटमेट यूज़ ऑफ
फिजिकल वायलेंस विद इन अ गिवन टेरिटरी। तो बेसिकली इसमें यह कह रहे हैं कि स्टेट एक ऐसी ह्यूमन कम्युनिटी होती है जो इस बात
का दावा करती है कि उसके पास मोनोपोली है कि वे अपनी जो जमीन है यानी कि जो उसको जो टेरिटरी प्राप्त है उसके ऊपर अपनी जो
फिजिकल फोर्स है उसका लेजिटमेट प्रयोग करें। स्टेट के फंक्शन की अगली थ्योरी आती है लीगल थ्योरी। तो जब हम बात करते हैं
लीगल थ्योरी की तो सबसे पहले हमें यही समझना है कि इसकी जो की आर्गुमेंट है वो यह है कि यह बताता है कि स्टेट एक लीगल
पर्सन की तरह भूमिका निभाता है। यानी कि जो वैधानिक व्यक्ति है उसकी तरह ही स्टेट होता है और यह कहता है कि स्टेट के प्रमुख
कार्य होते हैं लॉज़ को बनाना और जो लोगों के लीगल राइट्स हैं उनको सिक्योर करना। तो इस तरह से ये स्टेट को एक जरिडिकल पर्सन
के रूप में देखते हैं। यानी कि न्यायविद्ध की तरह स्टेट को देखते हैं और ये कहते हैं कि जो स्टेट है वह लॉज़ को बनाएगा और ये
स्टेट में रूल ऑफ लॉ की भी बात करता है। और इससे जुड़े कुछ प्रमुख थिंकर्स है जिनमें पहला नाम आता है ऑस्टिन का। दूसरा
नाम आता है बेंथम का और तीसरा नाम आता है ह्यूगोग ग्रोशियस का। लेकिन नोट करने वाली बात यहां पर यह है कि जर्मी बेंथम ने जहां
इंटरनेशनल लॉज़ की जो शब्दावली है उसको कॉइ किया था तो वहीं हगो ग्रुशियस को फादर ऑफ इंटरनेशनल लॉ के रूप में देखा जाता है।
जॉन ऑस्टिन ने कहा भी था कि अ लॉ इज द कमांड गिवन बाय सुपीरियर टू इंफीरियर। तो बेसिकली इसमें जॉन ऑस्टिन यह कह रहे हैं
कि जो कानून होता है वह उच्चतर के द्वारा निम्नतर को दिया गया एक आदेश होता है। यानी कि जो श्रेष्ठ लोग होते हैं जो
प्रभुत्वशाली लोग होते हैं उनके द्वारा जो कमजोर लोग हैं उनको दिया गया एक आदेश का नाम ही लॉ होता है। कानून होता है। स्टेट
के फंक्शनंस को समझने की अगली थ्योरी का नाम आता है मैकेनिस्टिक थ्योरी। तो मैकेनिस्टिक थ्योरी की कोर आर्गुमेंट यह
है कि यह बताती है कि स्टेट एक मशीन की तरह होता है। जिस तरह से लोगों ने अपनी काम की सुविधा को बढ़ाने के लिए मशीन को
बनाया है, उसी तरह से लोगों ने अपने इंटरेस्ट को गेन करने के लिए स्टेट को भी बनाया है। मैकेनिस्टिक थ्योरी का इमरजेंस
होता है 18th एंड 19थ सेंचुरी में। और यह ग्रीस एंड रोमन एंपायर में भी फाउंड की जा सकती है। और इसकी कोर आर्गुमेंट यह है कि
यह बताती है कि स्टेट इज एन आर्टिफिशियल इंस्टीट्यूशन नॉट अ नेचुरल इंस्टीट्यूशन। तो बेसिकली यह स्टेट को एक कृत्रिम संस्था
मानते हैं क्योंकि लोगों ने अपनी सुविधा के लिए स्टेट को बनाया है। इसीलिए स्टेट एक नेचुरल इंस्टीट्यूशन नहीं है और यह
स्टेट को एक मीन की तरह देखती है। जबकि इंडिविजुअल को एक एंड की तरह देखती है। यह थ्योरी बताती है कि स्टेट एक मीन होता है
क्योंकि लोगों ने अपने हितों की पूर्ति करने के लिए स्टेट को बनाया है और स्टेट लोगों की हितों की पूर्ति के लिए लोगों के
वेलफेयर के लिए ही काम करता है। और यह स्टेट को एक सोशल इंस्टीट्यूशन मानती है और यह स्टेट को एक मैनिफेस्टेशन ऑफ बिल के
रूप में देखती है और खास बात यह है कि यह कहती है कि स्टेट अस्तित्व में इसलिए आया है ताकि लोगों के जो इंटरेस्ट होते हैं
उसमें जो कॉन्फ्लिक्ट होते हैं उसको दूर किया जा सके। हब्स लॉक एंड रूसो ने भी मैकेनिस्टिक थ्योरी को दिया। जब इन्होंने
सोशल कॉन्ट्रैक्ट थ्योरी को स्थापित किया। इन्होंने कहा कि राज्य की जो स्थापना है वह लोगों के द्वारा सोशल कॉन्ट्रैक्ट से
हुई है। तो ऐसी स्थिति में उन्होंने भी मैकेनिस्टिक थ्योरी को यूज़ किया क्योंकि इन्होंने कहा कि जब लोगों को यह लगा कि
स्टेट ऑफ नेचर में उनका रहना मुश्किल हो गया है। उनके सामने कुछ कठिनाइयां आ गई है तो लोगों ने अपनी सुविधा के लिए स्टेट की
स्थापना की और बेंथम ने स्टेट को एक ऐसा साधन बताया जिससे ग्रेटेस्ट हैप्पीनेस ऑफ द ग्रेटेस्ट नंबर को बढ़ावा मिल सके। यानी
कि लोग अधिक से अधिक सुख प्राप्त कर सके। इस तरह के कार्य स्टेट को करने चाहिए। तो इस तरह से हम नर्सल में कह सकते हैं कि
स्टेट लोगों के द्वारा बनाया गया एक ऐसा साधन है जिससे लोग अधिक से अधिक सुख प्राप्त कर सके और अपने इंटरेस्ट को गेन
कर सकें। स्टेट के फंक्शन की अगली इंपॉर्टेंट थ्योरी का नाम है लिबरल इंडिविजुअलिस्टिक थ्योरी। तो इस थ्योरी का
जन्म होता है 18th सेंचुरी में और इसका कोर आर्गुमेंट ये रहा है कि यह बताता है कि स्टेट अपने आप में मीन है और
इंडिविजुअल अपने आप में एंड है यानी कि स्टेट साधन के रूप में काम करेगा लोगों के लिए और इसने मिनिमम स्टेट अर्थात पुलिस
स्टेट की बात की है। यानी कि ऐसा स्टेट जो कम से कम लोगों के कार्यों में हस्तक्षेप करेगा। केवल पुलिस के कार्य करेगा। जैसे
लोगों को सिक्योरिटी देना, शांति बनाए रखना। लॉ एंड ऑर्डर को एस्टैब्लिश करना और इसने स्टेट को एक नेसेसरी इवेल के रूप में
देखा है। यानी कि नेसेसरी है क्योंकि यह लोगों को सिक्योरिटी देता है। लॉ एंड ऑर्डर को एस्टैब्लिश करता है और इवेल
इसलिए है क्योंकि यह लोगों की जो स्वतंत्रता है उसको कम करती है। करेल करती है। और इस तरह से जो लिबरल थ्योरी है, वह
बात करती है मिनिमल गवर्नमेंट की, यानी कि जो शासन है, वह कम से कम हो। और दूसरी बात यह है कि यह बात करता है इंडिविजुअल
फ्रीडम की। और यह स्ट्रेस करता है लोगों की नेगेटिव फ्रीडम की। क्योंकि यह लोगों को जो चाहे करने की अनुमति देता है और इसी
तरह से थॉमस पेन ने कहा है कि स्टेट एक नेसेसरी इबल है। यानी कि आवश्यक बुराई है। और इस थ्योरी का कोर थीम है लेस फेयर यानी
कि अहस्तक्षेप की नीति यानी कि स्टेट व्यक्ति के कार्यों में कम से कम हस्तक्षेप करेगा। लिबरल इंडिविजुअलिस्टिक
थ्योरी के कुछ इंपॉर्टेंट थिंकर्स के नाम हैं। जिनमें पहला नाम आता है जॉन लॉक का। तो जॉन लॉक को फादर ऑफ लिबरलिज्म के रूप
में भी जाना जाता है। दूसरा नाम आता है एडम स्मिथ का। तीसरा नाम आता है जर्मी बेंथम का। चौथा नाम आता है हर्बर्ट
स्पेंसर का। पांचवा नाम आता है डेविड रिकार्डो का। छठा नाम आता है थॉमस पेन का। वहीं सातवां नाम आता है जेफरसन का। अब हम
यह समझ लेते हैं कि जॉन लॉक स्टेट के बारे में क्या कहते हैं। तो जॉन लॉक को फादर ऑफ लिबरलिज्म के रूप में जाना जाता है। और
दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने स्टेट को कहा नाइट वाचमैन स्टेट। यानी कि इन्होंने यह कहा कि जो स्टेट का प्रमुख
काम है वह सिर्फ लोगों की सुरक्षा करना है। और इन्होंने यह भी कहा कि गवर्नमेंटल अथॉरिटी इज इक्वल टू ट्रस्ट। यानी कि जो
सरकार है या फिर गवर्नमेंटल जो अथॉरिटी है उसको उन्होंने ट्रस्ट के साथ जोड़ा और खास बात यह है कि इन्होंने लोगों को राइट टू
रेसिस्टेंट का अधिकार दिया। यानी कि इन्होंने कहा कि अगर सरकार लोगों के हितों के लिए काम नहीं करती है, लोगों के
इंटरेस्ट को बढ़ावा नहीं देती है तो ऐसी स्थिति में जो लोग हैं वह रेसिस्टेंट कर सकते हैं यानी कि विद्रोह कर सकते हैं। और
इस तरह से लॉक ने तीन प्रकार के नेचुरल राइट्स को मेंशन किया जिनमें पहला आता है लाइफ, दूसरा आता है लिबर्टी और तीसरा आता
है प्रॉपर्टी। वहीं नोट करने वाली बात यह भी है कि जो थॉमस जेफरसन है उन्होंने तीन प्रकार के नेचुरल राइट्स की बात की।
जिनमें पहला आता है लाइफ, दूसरा आता है लिबर्टी और तीसरा आता है पर्स्यूट ऑफ हैप्पीनेस। लिबरल इंडिविजुअलिस्टिक थ्योरी
के अगले थिंकर का नाम है एडम स्मिथ। तो एडम स्मिथ को जाना जाता है फादर ऑफ इकोनॉमिक। और दूसरी खास बात यह है कि
इन्होंने स्टेट को कहा नाइट वॉचमैन स्टेट और इन्होंने इकोनॉमिक मैन का कांसेप्ट दिया। जिस तरह से एरिस्टोटल ने कहा था कि
जो व्यक्ति होता है वह पॉलिटिकल एनिमल होता है। क्यों? क्यों? क्योंकि वो पॉलिटिक्स से अलग नहीं हो सकता है। उसी
तरह से इन्होंने भी कहा कि जो व्यक्ति होता है वो इकोनॉमिक मैन होता है क्योंकि वो भी इकोनॉमिक्स या फिर ट्रेड से अलग
नहीं हो सकता है। बल्कि इकोनॉमिक्स या फिर ट्रेड उसकी परम आवश्यकता होती है। और इन्होंने कहा कि व्यक्ति में सहज रूप से
व्यापार करने या फिर ट्रेड करने की प्रवृत्ति पाई जाती है। और इन्होंने कहा कि व्यक्ति जो होता है उसको कुछ नेचुरल
लिबर्टी मिली होती है। जैसे फ्रीडम ऑफ कॉमर्स एंड ट्रेड जो है वह व्यक्ति के नेचुरल राइट के रूप में देखा जा सकता है।
और खास बात यह है कि इन्होंने भी लेसफेयर की बात की और इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया जिसका नाम है इनविज़िबल
हैंड। अगले थिंकर का नाम आता है बेंथम। तो बेंथम की जब हम बात करते हैं तो इनको जाना जाता है फादर ऑफ यूटिलिटेरियनिज्म यानी कि
उपयोगितावाद के इन्हें जनक के रूप में देखा जाता है। और इन्होंने यूटिलिटी की बात की। हेडोइज़्म की बात की। इन्होंने कहा
कि राज्य के ऐसे काम होने चाहिए जो व्यक्ति की उपयोगिता को बढ़ा सके। यूटिलिटी का मतलब होता है ऐसे कुछ काम
जिससे व्यक्ति की जो लाइफ है वो ब्लिसफुल हो सके, ग्लोरियस हो सके, सुख की प्राप्ति उसे हो सके। तो इस तरह से इन्होंने कहा कि
राज्य के काम इस तरह से होने चाहिए कि लोगों को यानी कि ग्रेटेस्ट हैप्पीनेस ऑफ द ग्रेटेस्ट नंबर की प्राप्ति हो सके।
यानी कि अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख की प्राप्ति हो सके और इन्होंने कहा कि राज्य के जो कानून है वे इस तरह से संचालित होने
चाहिए कि अधिक से अधिक व्यक्ति को हेडोइज्म की प्राप्ति हो यानी कि सुखवाद की प्राप्ति हो। उन्हें अधिक से अधिक सुख
मिले। बेंथम ने एक कोट किया है जिसमें इन्होंने लिखा है कि नेचर हैज़ प्लेस्ड अस अंडर टू सब्स। वन इज पेन एंड अनदर इज
प्लेजर। तो यह कहते हैं कि प्रकृति ने हमें दो संप्रभुताओं के अधीन रखा है। एक है सुख और दूसरा है दुख। अधिक से अधिक
व्यक्ति अधिक से अधिक सुख को प्राप्त करना चाहते हैं और कम से कम व्यक्ति कम से कम दुख को प्राप्त करना चाहते हैं। इसका मतलब
यह है कि हर व्यक्ति सुख प्राप्त करना चाहता है और दुख से बचना चाहता है। अगले स्कॉलर का नाम आता है हरबर्ट स्पेंसर। तो
जब हम बात करते हैं हरबर्ट स्पेंसर की तो इन्होंने भी मिनिमल गवर्नमेंट का कांसेप्ट दिया। यानी कि इन्होंने कहा कि राज्य को
कम से कम शासन करना चाहिए और शासन ऐसा हो जो व्यक्ति के मामले में कम से कम हस्तक्षेप करें और इन्होंने स्टेट को कहा
ऑर्गेनिज्म यानी कि स्टेट के साथ इन्होंने आंगिक थ्योरी को जोड़ा। ऑर्गेनिज्म थ्योरी को दिया। इन्होंने शरीर के साथ राज्य की
तुलना की और इनकी प्रमुख कृति द मैन वर्सेस द स्टेट जो कि 1884 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने एक इंपॉर्टेंट
कांसेप्ट दिया जिसका नाम है सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट यानी कि जो योग्य है, जो पावरफुल है, जो शक्तिशाली है उसको ही जीने का
अधिकार है। वैसे भी स्पेंसर के बारे में एक बात बहुत ही उल्लेखनीय है। इन्होंने कहा था कि समाज में जितने भी कमजोर लोग
होते हैं, अपंग होते हैं यानी कि फिजिकली चैलेंज्ड होते हैं। ऐसे लोगों को राज्य को सुविधाएं नहीं देनी चाहिए। उनके लिए
वेलफेयर नहीं करना चाहिए क्योंकि अगर ऐसा करता है राज्य तो उसके लिए वह विशेष रूप से निंदनीय होगा। स्टेट के फंक्शनंस को
समझने की अगली थ्योरी है मार्क्सिस्ट थ्योरी। तो मार्क्सिस्ट थ्योरी का जन्म होता है 19 सेंचुरी में और इसके पाइनियर
अर्थात अग्रदूत रहे हैं कार्ल मार्क्स। तो मार्क्सिस्ट थ्योरी की कुछ इंपॉर्टेंट विशेषताएं या फिर आर्गुममेंट हैं। जिनमें
पहली है कि स्टेट एक आर्टिफिशियल इंस्टीट्यूशन है। मार्क्सवाद से जुड़े जितने भी विचारक हैं उन्होंने यही कहा है
कि स्टेट एक आर्टिफिशियल इंस्टिट्यूशन है। यानी कि कृत्रिम संस्था है जिसे कैपिटलिस्ट क्लास के लोगों ने अपने फायदे
के लिए बनाया है। तो इसका मतलब यह हुआ कि राज्य कोई प्राकृतिक संस्था नहीं है। राज्य कोई ऐसी संस्था नहीं है जो कि
डिवाइन ऑर्डर के द्वारा स्थापित की गई हो और ना ही कोई राज्य ऐसी संस्था है जो एक वेलफेयर के काम करने के उद्देश्य से
अस्तित्व में आई हो। वहीं इसकी दूसरी आर्गुमेंट है कि इसको स्थापित किया गया था कैपिटलिस्ट क्लास के द्वारा। मार्क्स खुद
यह कहते हैं कि कैपिटलिस्ट क्लास ने ही अपने फायदे के लिए अपने इंटरेस्ट को गेन करने के लिए राज्य नामक एक्सप्लॉयटेटिव
इंस्टीट्यूशन की स्थापना की थी। वहीं इसकी अगली जो विशेषता है या फिर आर्गुमेंट है वो यही है कि स्टेट एक एक्सप्लॉयटेटिव
इंस्टीट्यूशन है। क्यों? क्योंकि यह कैपिटलिस्ट जो क्लास है उनके हाथों का टूल है जिसके द्वारा वे अपने से कमजोर वर्ग के
लोगों या फिर मजदूर लोगों का शोषण करते हैं। उनसे अतिरिक्त मूल्य लेते हैं। सरप्लस वैल्यू लेते हैं। वहीं अगली
विशेषता है कि यह एक अननेसेसरी इविल है। तो मार्क्सिस्ट थिंकर जितने भी रहे हैं वे स्टेट को एक अनावश्यक बुराई मानते हैं और
इनकी मान्यता यह रही है क्योंकि राज्य एक बुराई है और ऐसी बुराई है जिसका होना जरूरी नहीं है। इसीलिए यह एक अनावश्यक
बुराई है और इसको खत्म कर दिया जाना चाहिए। वहीं इसकी अगली मान्यता रही है कि स्टेट का जो जन्म हुआ है वो किसी सामाजिक
समझौते से नहीं हुआ है। भगवान की मर्जी से नहीं हुआ है। बल्कि यह क्लास स्ट्रगल का परिणाम है। मार्क्स ने खुद कहा है कि
इतिहास में दो क्लास पाए जाते हैं। एक कैपिटलिस्ट क्लास और दूसरा जो मजदूर क्लास है यानी कि जो प्रोलिट्रेट क्लास है। तो
उन दोनों के बीच इतिहास में संघर्ष रहा है। और उस संघर्ष के परिणाम स्वरूप ही कैपिटलिस्ट क्लास ने अपने इंटरेस्ट को गेन
करने के लिए राज्य जैसे एक्सप्लइटेटिव इंस्टीट्यूशन की स्थापना की। वहीं इसकी अगली विशेषता है कि ये वर्चुआ जो क्लास है
उनका टूल है यानी कि एक एग्जीक्यूटिव कमेटी की तरह काम करती है जो सिर्फ कैपिटलिस्ट क्लास या फिर वर्जुआ क्लास के
हितों के लिए ही काम करती है। और इसकी अगली इंपॉर्टेंट विशेषता है कि स्टेट हैज़ टू विदर अवे। यानी कि स्टेट को एक दिन
खत्म होना है। कार्ल मार्क्स ने खुद कहा है कि जो मार्क्सिज्म का या फिर जो अल्टीमेट उद्देश्य है वह है कम्युनिज्म की
स्थापना और कम्युनिज्म तभी स्थापित हो सकता है जब राज्य खत्म होगा। यानी कि क्लासलेस एंड स्टेटलेस सोसाइटी की स्थापना
होगी। तब जाकर कम्युनिज्म स्थापित होगा। वैसे तो मार्क्सिस्ट थ्योरी से जुड़े थिंकर्स बहुत सारे रहे हैं। लेकिन मैंने
मेनमेन जो थिंकर्स हैं उनके नाम यहां पर ऐड कर लिए हैं। जिनमें पहला नाम आता है कार्ल मार्क्स का। दूसरा नाम आता है
फ्रेडरिक एंजेल्स का। तीसरा नाम आता है लेनिन का। चौथा नाम आता है रोजा अलेक्जबर का। पांचवा नाम आता है ओलांतजा का और छठा
नाम आता है र्फ मिलवेन का। कार्ल मार्क्स ने अपनी प्रमुख कृति कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो जो कि 1848 को पब्लिश होती है।
उसमें कहा था कि स्टेट इज द एग्जीक्यूटिव कमिट ऑफ द कैपिटलिस्ट क्लास। यानी कि यह कह रहे हैं कि जो राज्य है वह पूंजीपति
वर्ग के लोगों की एक कार्यकारिणी समिति होती है। कार्ल मार्क्स ने राज्य संबंधी कुछ इंपॉर्टेंट बातें बताई हैं। जिनमें से
पहली बात इन्होंने कही है कि राज्य एक ऑप्रेसिव और एक्सप्लइटेटिव इंस्टीट्यूशन होता है। दूसरी बात इन्होंने कही कि राज्य
क्लास स्ट्रगल का परिणाम होता है। तीसरी बात इन्होंने कही कि राज्य कोई नेचुरल इंस्टिट्यूशन नहीं है। चौथी बात इन्होंने
कही कि राज्य पावर पर ही आधारित होता है। पांचवी बात इन्होंने कही थी कि जो स्टेट है उसको कैपिटलिस्ट क्लास के द्वारा अपने
इंटरेस्ट्स को गेन करने के लिए स्थापित किया जाता है। और लास्ट में इन्होंने कहा कि अंत में ऐसी अवस्था आएगी जब राज्य को
प्रॉलिट्रेट क्लास यानी कि जो सर्वहारा वर्ग के लोग हैं यानी कि मजदूर लोग हैं, उनके द्वारा राज्य को खत्म कर दिया जाएगा।
राज्य का अंत कर दिया जाएगा और कम्युनिज्म की स्थापना कर दी जाएगी। मार्क्सिस्ट थ्योरी के अगले थिंकर का नाम आता है
फ्रेडरिक एंजेल्स का। तो जब हम बात करते हैं फ्रेडरिक एंजेल्स की तो इन्होंने अपनी प्रमुख कृति द ओरिजिन ऑफ द फैमिली
प्राइवेट प्रॉपर्टी एंड द स्टेट जो कि 1884 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने स्टेट के बारे में बताया है और इन्होंने
इसमें कहा है कि जो राज्य है उसकी अवस्था से पूर्व यानी कि जब राज्य नहीं बना था तो उस अवस्था से पूर्व दुनिया में
मैट्रियाकिकल सोसाइटी पाई जाती थी। यानी कि मां के नाम पे वंश चलता था। मातृसत्तात्मक समाज था। और वहीं इन्होंने
कहा है कि राज्य एक एक्सप्लइटेटिव इंस्टीट्यूशन होता है जिसके द्वारा कैपिटलिस्ट जो क्लास के लोग हैं उनके
द्वारा मजदूर वर्ग के लोग यानी कि प्रोिट्रेट क्लास के जो लोग हैं उनका शोषण किया जाता है। अगले थिंकर का नाम आता है
लेनिन। तो जब हम बात करते हैं लेनिन की तो इन्होंने अपनी प्रमुख कृति द स्टेट एंड रेवोल्यूशन जो कि 1917 को पब्लिश होती है।
इस कृति में लिखा था कि राज्य धनवान वर्ग की कठपुतली है। राज्य सर्वहित या जन कल्याण का साधन नहीं हो सकता है। अगले
स्कॉलर का नाम आता है निकोस पोलंतजा। तो बेसिकली निकोस पोलंतजा ने राज्य के बारे में रिलेटिव ऑटोनोमी की थ्योरी दी है।
इन्होंने कहा है कि राज्य की एक सापेक्ष स्वायतता होती है। बेसिकली इन्होंने र्फ मिलवैन का जो आइडिया है जिनमें इन्होंने
इंस्ट्रूमेंटलिज्म की बात की थी और राज्य को एक ऐसा इंस्ट्रूमेंट बताया था जो कि कैपिटलिस्ट क्लास के हाथों में होता है और
उनके हितों के लिए काम करता है और वर्जुआ जो क्लास है उनके लिए ही काम करता है। जबकि जो प्रोरेट क्लास है उनका
एक्सप्लइटेशन करता है। तो बेसिकली इस थ्योरी में जो पोलांतजा है उन्होंने यह कहा था कि राज्य की एक सापेक्ष स्वायत्तता
होती है। राज्य दोनों वर्गों के लिए एक जैसा काम करता है। किसी एक वर्ग का ना तो एक्सप्लॉयटेशन करता है ना ही बेनिफिट करता
है किसी एक वर्ग का बल्कि दोनों ही क्लासेस चाहे प्रोिटरेट क्लास हो या फिर वर्जुआ क्लास हो दोनों के लिए ही काम करता
है। और ऐसा काम करने में वह बिल्कुल पूरी तरह से स्वतंत्र होता है। किसी एक वर्ग के हाथों में वह इंस्ट्रूमेंट या फिर उपकरण
की तरह नहीं होता है। स्टेट के फंक्शन की नेक्स्ट थ्योरी आती है सोशल डेमोक्रेटिक थ्योरी। तो इस थ्योरी का जन्म होता है 20थ
सेंचुरी में और 20थ सेंचुरी में यह काफी डेवलप हो जाती है। इसकी कुछ आर्गुमेंट्स रही है। जिनमें पहली आर्गुमेंट है सपोर्ट
टू वेलफेयर स्टेट। इसने कल्याणकारी राज्य को सपोर्ट दिया है। यानी कि यह बताया है कि कल्याणकारी राज्य लोगों के विकास के
लिए बहुत ही ज़रूरी है। जबकि इसके उलट जो लिबरल थ्योरी है उसने रिजेक्ट किया था वेलफ़ेयर स्टेट को और उसने पुलिस स्टेट की
बात की थी। वहीं इसकी अगली आर्गुमेंट है पॉजिटिव रोल ऑफ़ द स्टेट। पॉजिटिव का मतलब यह है कि स्टेट सिर्फ सिक्योरिटी या फिर
लॉ एंड ऑर्डर से रिलेटेड ही कार्य नहीं करेगा बल्कि लोगों के वेलफेयर से जुड़े कार्य करेगा। लोगों के डेवलपमेंट के लिए
कार्य करेगा। वहीं इसकी अगली विशेषता या फिर आर्गुमेंट है क्रिटिसिज्म ऑफ़ लेसफेयर। लेसफेयर अर्थात अहस्तक्षेप की जो नीति है
वो लिबरल्स की बहुत बड़ी विशेषता रही है। लेकिन इसने इस पॉलिसी को क्रिटिसिज्म किया है। क्यों किया है? क्योंकि यह बताता है
कि राज्य जितना ज्यादा हस्तक्षेप करेगा, उतना ही लोगों का वेलफेयर होगा, डेवलपमेंट होगा। इसकी अगली विशेषता रही है
क्रिटिसिज्म ऑफ लिबरल थ्योरी। इसने लिबरल थ्योरी को क्रिटिसाइज किया है क्योंकि लिबरल थ्योरी लिमिटेड है यानी कि स्टेट के
लिमिटेड रोल को बताती है और साथ में पुलिस स्टेट की बात करती है और वेलफेयर स्टेट को यह रिजेक्ट करती है। इसीलिए सोशल
डेमोक्रेटिक थ्योरी ने लिबरल थ्योरी की क्रिटिसिज्म की है। वहीं इसकी अगली आर्गुमेंट है सुपु टू सोशल डेमोक्रेसी। तो
यह सोशल डेमोक्रेसी की बात करती है। सोशल डेमोक्रेसी का मतलब यह है कि डेमोक्रेसी में कुछ ऐसे सोशलिज्म से जुड़े फैक्ट्स हो
जिसके आधार पे लोग समान हो। लोगों को समान रूप से अपोरर्चुनिटीज मिले। सोशल वैल्यूस हो। तो इसको बेसिकली हम सोशल डेमोक्रेसी
कहते हैं। तो जो सोशल डेमोक्रेटिक थ्योरी है, यह सपोर्ट करती है सोशल डेमोक्रेसी को। सोशल वेलफेयर थ्योरी से जुड़े कुछ की
थिंकर्स रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है टीएच ग्रीन का। दूसरा नाम आता है जेएस मिल का। तीसरा नाम आता है लॉस का। चौथा नाम
आता है हॉबस का। वहीं इंडियन ट्रेडिशन में या फिर इंडिया में भी नेहरू और अंबेडकर ने सपोर्ट किया था सोशल वेलफेयर थ्योरी को।
यानी कि इन्होंने सोशल वेलफेयरिज्म और सोशल वेलफेयर को इंडिया में अपनाने की कोशिश की थी और उस बात पर फोकस किया था।
स्टेट के फंक्शन को समझने की नेक्स्ट थ्योरी आती है पोस्ट कॉलोनियल स्टेट थ्योरी। तो इस थ्योरी का जन्म होता है मिड
20थ सेंचुरी में। और खास बात यह है कि यह एशियन अफ्रीकन एंड लैटिन अमेरिकन देशों की स्टडी करती है। और दूसरी इंपॉर्टेंट बात
यह भी है कि जो पोस्ट कॉलोनियल स्टेट्स रहे हैं वहां पर राष्ट्र निर्माण पे यह फोकस करती है। और पोस्ट कॉलोनियल स्टेट
ऐसे स्टेट होते हैं जो कभी ना कभी कॉलोनियलिज्म के अधीन रहे हैं। यानी कि जो यूरोपियन कंट्रीज के द्वारा कॉलोनाइज्ड
किए गए थे, गुलाम बनाए गए थे। और खास बात यह भी है कि वेस्टर्न वर्ल्ड की जो हैजेमनी है कि वेस्टर्न वर्ल्ड ही
सुपीरियर है। उसके पास ही मॉडर्निटी है, साइंस है, आर्ट है, कल्चर है। इस तरह की जो वेस्टर्न वर्ल्ड की हैज़ेमनी है, उसको
यह रिजेक्ट करती है। वहीं यह कॉलोनियलिज्म की क्रिटिसिज्म करती है। और किस तरह से जो कॉलोनियलिज्म के इफेक्ट पड़े हैं, जो
पोस्ट कॉलोनियल स्टेट्स हैं, उनकी भी स्टडी करती है। और खास बात यह है कि इसको जाना जाता है डेवलपमेंटल थ्योरी। क्यों?
क्योंकि यह फोकस करती है कि जो न्यूली फ्री कंट्रीज है या फिर थर्ड वर्ल्ड कंट्रीज है जिनको हम पोस्ट कॉलोनियल
स्टेट्स भी कहते हैं वहां पर यह डेवलपमेंटल की बात करती है। डेवलपमेंट के प्रश्न को उठाती है कि वहां पर या फिर उन
कंट्रीज में किस तरह से डेवलपमेंट किया जाए। पोस्ट कॉलोनियल थ्योरी के कुछ इंपॉर्टेंट थिंकर्स आते हैं। जिनमें पहला
नाम आता है फ्रांस फैनो का। दूसरा नाम आता है सईद का। तीसरा नाम आता है स्पीबेक का। चौथा नाम आता है भाबा का। पांचवा नाम आता
है एचबे का। छठा नाम आता है पार्थ चटर्जी का। सातवां नाम आता है स्टुअर्ट हॉल का। आठवां नाम आता है ईएम फोस्टर का। नाइंथ
नेम आता है रणजीत गुआ। फिर अगला नाम आता है अजीज अहमद। फिर अगला नाम आता है आर एस राजन। फिर आता है एन्या लुमबा। फिर आता है
चक्रवर्ती और लास्ट में आता है रवि कुमार। तो ये जितने भी थिंकर्स है या फिर स्कॉलर्स हैं ये पोस्ट कॉलोनियल स्टेट
थ्योरी से जुड़े हैं। अब हम फेनोन को समझ लेते हैं कि आखिर वे पोस्ट कॉलोनियल स्टेट के ऊपर क्या कहते हैं। तो फेनोन ने कहा है
कि जो कॉलोनाइज्ड पीपल है वे बेसिकली कॉलोनियल एलिनेशन के शिकार है। यानी कि जो मूल निवासी है या कॉलोनाइज्ड पीपल है वे
खुद की लैंग्वेज, खुद का कल्चर, सोशियोइकोनॉमिक जो कंडीशंस है उससे ही पराएपन के शिकार हो गए हैं। वे अपने देश
में रहते हुए भी जो वेस्टर्न वैल्यूस है, कल्चर है, नॉर्म्स है, उसी को फॉलो करते हैं। उसी को अपनाते हैं और अपने देश में
रहते हुए, अपनी संस्कृति के बीच, अपनी भाषा के बीच रहते हुए भी उसको अपनी लाइफ में नहीं उतार पाते हैं। जिसको फेनोन ने
कॉलोनियल एलिनेशन कहा है। इसके साथ-साथ इन्होंने डबल कॉन्शियसनेस का कांसेप्ट भी दिया है। जिसमें यह कहते हैं कि जो
कॉलोनाइज्ड पीपल है, जो मूल निवासी है, वे डबल कॉन्शियसनेस के शिकार हो गए हैं। क्योंकि एक तरफ तो उनकी अपनी वैल्यू्यूज
है, कल्चर है, नॉर्म्स है। दूसरी तरफ वेस्टर्न जो कल्चर है, रहन-सहन है, सोशल इकोनॉमिक स्टेटस है, उनकी लैंग्वेज है,
उसको अपना रहे हैं। तो इस तरह से जो कॉलोनाइज्ड पीपल है या मूल निवासी है उनके अंदर एक डबल कॉन्शियसनेस चालू हो गई है,
पैदा हो गई है। फेनोन ने डीलोनाइजेशन के लिए वलेंट रेवोल्यूशन का सहारा लिया है। यानी कि इन्होंने बोला है कि वलेंट
रेवोल्यूशन में ही हम जो कॉलोनाइज्ड कंट्री है वहां पर नए प्रकार का एक समाज स्थापित कर सकते हैं। वहां पर विकास कर
सकते हैं। और इन्होंने कहा है कि डिकॉलोनाइजेशन दो आधारों पर हो सकता है। पहला है फिजिकली और दूसरा है
साइकोलॉजिकली। फिजिकली लेवल पर यह कहते हैं कि जब जो अंग्रेज लोग हैं या फिर वेस्टर्न लोग हैं जो कॉलोनाइजर है जब उनको
मूल निवासियों की जमीन से भगा दिया जाएगा तो उसको फिजिकली कहते हैं। वहीं साइकोलॉजी कहते हैं जब जो मूल निवासी लोग हैं जबकि
उनकी दिमाग की जो हालत है उसको ठीक किया जाएगा। क्यों? क्योंकि उनके दिमाग में अभी भी इस तरह की बातें बैठी हुई है कि उनका
कल्चर पुअर है। उनकी लैंग्वेज साधारण है। वहां के जो लोग हैं वो साधारण है। वे इनफीरियर है। तो इस तरह की जो साइकोलॉजी
लेवल की जो समस्याएं हैं, प्रॉब्लम्स है जब उसको दूर किया जाएगा तो साइकोलॉजी लेवल पे भी जो मूल निवासी है या फिर जो
कॉलोनाइज्ड है वे डीलोनाइजेशन हो जाएंगे। यानी कि विपनिवेशवाद वे हो जाएंगे, फ्री हो जाएंगे, मुक्त हो जाएंगे, गुलाम नहीं
रहेंगे। तो इस तरह से इन्होंने डीलोनाइजेशन को दो भागों में बांटा है। एक है फिजिकली और दूसरा है साइकोलॉजी। फेनोन
कहते हैं कि जब यह दोनों चीजें हो जाएगी तब जाकर ही जो पोस्ट कॉलोनियल स्टेट है वहां पर डेवलपमेंट हो जाएगा और एक नए
प्रकार की सोसाइटी का निर्माण किया जा सकेगा। अब हम यह समझ लेते हैं कि एडवर्ड सैद पोस्ट कॉलोनियल स्टेट के बारे में
क्या कहते हैं। तो एडवर्ड सैद ने अपनी प्रमुख कृति ओरिएंटलिज्म जो कि 1978 को पब्लिश होती है। इसमें एक इंपॉर्टेंट
कांसेप्ट दिया ओरिएंटलिज्म का जिसमें इन्होंने जो ओरिएंट और ऑक्सीडेंट का जो कांसेप्ट है उसको क्रिटिसाइज किया है और
इसको इन्होंने बताया है स्टाइल ऑफ थॉट। देखिए ओरिएंट का मतलब होता है जो पूर्वी देश है जो पिछड़े देश हैं और ऑक्सीडेंट
ऐसे देशों के लोगों को समझा जाता है जो वेस्टर्न है जो सिविलाइज्ड है तो ओरिएंटलिज्म नामक जो इनकी कृति है इसमें
इन्होंने जो ओरिएंट और ऑक्सीडेंट का कांसेप्ट है उसको रिजेक्ट किया है क्योंकि इन्होंने कहा है कि यह सिर्फ आर्टिफिशियल
है जो कि यूरोपियन लोगों के द्वारा या फिर जो यूरोपियन स्कॉलर्स हैं यूरोपियन कंट्रीज है उनके द्वारा इसको बनाया गया है
ताकि अपने आप को वे सुपीरियर समझ समझ सके और जो पूर्वी देश है उनको इंफीरियर बता सके। तो इसको इन्होंने बेसिकली स्टाइल ऑफ
थॉट बताया है। यानी कि जो ओरिएंट और ऑक्सिडेंट का कांसेप्ट है यह सिर्फ एक विचार की संतान है। सिर्फ वैचारिक रूप में
ही यह विद्यमान है। रियलिटी से इसका कोई नाता नहीं है। अब हम बात कर लेते हैं इलेक्टोरल डेमोक्रेसी से जुड़े कुछ
इंपॉर्टेंट फैक्ट्स की। तो इनमें पहला फैक्ट यह है कि जर्मी बेंथम ने बात की थी वन वोट वन वैल्यू की। इन्होंने कहा था कि
समाज या फिर डेमोक्रेसी में चाहे लोग शिक्षित हो, अशिक्षित हो, उन्हें सिर्फ एक ही मत देने का अधिकार है। एक से अधिक मत
वे नहीं दे सकते हैं और उसकी वैल्यू भी एक ही होगी। वहीं दूसरी तरफ जेएस मिल ने कहा था कि वन वोट मेनी वैल्यूज़। यानी कि
इन्होंने कहा था कि समाज में जो शिक्षित लोग होते हैं, रिच लोग होते हैं, जिनके अंदर पॉलिटिकल कॉन्शियसनेस ज़्यादा होती
है, जिनके अंदर पॉलिटिकल पावर या फिर जिनके अंदर पॉलिटिकल समझ अवेयरनेस ज्यादा होती है, उनकी जो वोट होंगे, वह ज्यादा
होगी। उसकी वैल्यू ज्यादा होगी और वे एक से अधिक वोट दे सकते हैं। और इसी वजह से जे एस मिल को रिलक्टेंट डेमोक्रेट भी कहा
जाता है जिसको हम हिंदी में कहते हैं अनइच्छुक लोकतंत्रवादी। वहीं दूसरी बात अगर हम देखें तो इन्होंने कहा यानी कि
जेएसमिल ने कहा कि ट्यूनी ऑफ द मेजॉरिटी इन्होंने कहा कि जो बहुलतंत्र होता है उसकी तानाशाही होती है। इन्होंने कहा कि
डेमोक्रेटिक रिजम जो होता है उसमें जो बहुलतंत्र होता है यानी कि जो मेजॉरिटी होती है लोगों की उनकी तानाशाही होती है
और इसमें वे एग्जांपल देते हैं। यह कहते हैं कि मान लीजिए किसी एक मुद्दे के ऊपर एक डिस्कशन चल रहा हो और उस डिस्कशन के
पक्ष में नौ व्यक्ति अपना मत देते हैं और विपक्ष में एक व्यक्ति होता है। तो ऐसी स्थिति में क्या होगा कि जो मेजॉरिटी राय
है लोगों की वो कुचल देंगे यानी कि सरकार उनकी ही राय को मानेगी और जो एक व्यक्ति है जो अल्प में है उसको जो है कुचल दिया
जाएगा। उसको रिजेक्ट कर दिया जाएगा। तो ऐसी स्थिति में इन्होंने ट्यून ऑफ़ द मेजॉरिटी की बात की जिसको कि इन्होंने गलत
बोला क्योंकि इन्होंने कहा था कि चाहे माइनॉरिटी हो या फिर मेजॉरिटी हो दोनों को ही अपनी विचार अपनी अभिव्यक्ति अपनी राय
को रखने की पूर्ण स्वतंत्रता है। वहीं नोट करने वाली बात यह भी है कि सैमुल पी हंटिंगटन ने डेमोक्रेटाइजेशन की बात की
जिसमें इन्होंने थ्री वेव्स ऑफ डेमोक्रेसी की बात की। बेसिकली इसमें यह कह रहे हैं कि किस तरह से विश्व में या फिर दुनिया
में लोकतंत्र का आरंभ हुआ और डिफरेंट डिफरेंट तीन स्टेजेस आई जिसके माध्यम से देशों में लोकतंत्र की स्थापना हुई। लिबरल
डेमोक्रेसी की जब हम बात करते हैं तो यह डेमोक्रेटिक सिस्टम है एक गवर्नमेंट का जिसमें इंडिविजुअल राइट्स और फ्रीडम को
ऑफिशियली रिकॉग्नाइज्ड किया जाता है और उनको प्रोटेक्ट किया जाता है और खास बात यह है कि जो राजनीतिक शक्ति होती है यानी
कि पॉलिटिकल पावर होती है उसको रूल ऑफ लॉ के द्वारा लिमिटेड किया जाता है। हालांकि नोट करने वाली बात यह भी है कि जो लिबरल
डेमोक्रेसी होती है, उसका जो प्रमुख उद्देश्य है, वह लिमिटेड फ्रीडम होता है। अनलिमिटेड फ्रीडम नहीं होता है। यानी कि
जो स्वतंत्रता लोगों के विकास के लिए जरूरी है। उसकी स्वतंत्रता उन्हें दी जाती है। मनमानी करने का कोई अधिकार उन्हें
नहीं दिया जाता है। लिबरल डेमोक्रेसी के कुछ इंपॉर्टेंट थिंकर्स रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है जॉन लॉक का। दूसरा नाम
आता है जेमी बेंथम का। तीसरा नाम आता है जॉन स्टर्ट मिल का। चौथा नाम आता है टीएच ग्रीन का। पांचवा नाम आता है हेरोल्ड
लॉस्की का। और छठा नाम आता है ब्रटन रसेल का। तो ये जितने भी थिंकर्स है आप इनको अच्छे से नोट कर लें क्योंकि एग्जाम में
आपसे पूछ सकते हैं कि निम्नलिखित में से कौन सा विचारक या थिंकर लिबरल डेमोक्रेसी से जुड़ा है? अब हम यह समझ लेते हैं कि
जॉन लॉक के डेमोक्रेसी के ऊपर क्या विचार रहे हैं? तो बेसिकली जॉन लॉक ने फाउंडेशन रखी लिबरल डेमोक्रेसी की। जैसा कि आप
जानते भी हैं कि लॉक लिबरलिज्म के फादर माने जाते हैं। इन्होंने 17th सेंचुरी में लिबरल डेमोक्रेसी की नीव रखी और इन्होंने
तीन प्रकार के नेचुरल राइट्स की बात की। जिनमें पहला आता है लाइफ, दूसरा आता है लिबर्टी। तीसरा आता है प्रॉपर्टी। और नोट
करने वाली बात यह है कि प्रॉपर्टी को इन्होंने सबसे ज्यादा इंपॉर्टेंट नेचुरल राइट माना। और नोट करने वाली बात यह भी है
कि जॉन लॉक ने राइट टू रेसिस्टेंस का अधिकार दिया लोगों को। यानी कि इन्होंने यह बोला कि अगर सरकार लोगों के हित में
कार्य नहीं करती है, लोगों के लिए रिस्पांसिबल नहीं है तो लोग रेसिस्टेंस कर सकते हैं। तो इस प्रकार से इन्होंने
लिमिटेड गवर्नमेंट की बात की और खास बात यह भी है कि 1688 को जो इंग्लैंड में ग्लोरियस रेवोल्यूशन आई थी, इसको इन्होंने
काफी मात्रा में या फिर बड़ी मात्रा में सपोर्ट किया था। अब हम डेमोक्रेसी के ऊपर बेंथम के विचारों को समझ लेते हैं। तो
बेंथम की जब हम बात करते हैं तो यह एक बहुत बड़े एडवोकेटर रहे हैं वन वोट वन वैल्यू के जिसकी चर्चा अभी मैंने थोड़ी
देर पहले आपको की थी और इन्होंने लिबरल डेमोक्रेसी का आईडिया जो दिया है वो उपयोगिता यानी कि यूटिलिटी के आधार पर रखा
है। यानी कि इन्होंने बोला है कि लोकतंत्र तभी उपयोगी है लोगों के लिए जब वह लोगों की खुशी में वृद्धि करें। उसकी उपयोगिता
को बढ़ाए और 180910 में इन्होंने अपने आप को डेमोक्रेट माना और 1817 में इन्होंने पार्लियामेंट्री रिफॉर्म्स के लिए एक
व्यापक नीति यानी कि कॉम्प्रहेंसिव पॉलिसी लाई इंग्लैंड में और खास बात यह है कि इन्होंने यूनिवर्सल सफर रिप्रेजेंटेटिव
एंड रिस्पांसिव गवर्नमेंट की बात की और खास बात यह है जो आपको याद रखना है कि इन्होंने या फिर इनको इंटरनेशनल लॉज़ के
फादर के रूप में देखा जाता है। इन्होंने ही इंटरनेशनल लॉ जो शब्दावली है उसको पॉइंट किया था। जर्मी बेंथम की कुछ
इंपॉर्टेंट राइटिंग्स भी रही है जिनको आपको अच्छे से याद रखना है क्योंकि एग्जाम की दृष्टि से यह बहुत ही इंपॉर्टेंट है।
तो इनमें पहली आती है फ्रेगमेंट ऑन गवर्नमेंट। दूसरी आती है द इंट्रोडक्शन टू द प्रिंसिपल्स ऑफ मोरल एंड लेजिसलेशन।
तीसरी आती है द थ्योरी ऑफ पनिशमेंट्स एंड रिबार। चौथी आती है द कॉन्स्टिट्यूशनल कोड। और पांचवी आती है द प्रिंसिपल्स ऑफ
इंटरनेशनल लॉ। अब हम यह समझ लेते हैं कि मिल के डेमोक्रेसी के बारे में क्या विचार रहे हैं। तो बेसिकली मिल ने बात की है
रिप्रेजेंटेटिव डेमोक्रेसी की। डेमोक्रेसी का यह एक ऐसा रूप है जहां पर लोग अपने प्रतिनिधि चुनते हैं और उनके द्वारा चुने
गए प्रतिनिधि रूलर शासक या फिर प्रधानमंत्री का चुनाव करते हैं और इन्होंने अपनी प्रमुख कृति रिप्रेजेंटेटिव
गवर्नमेंट जो कि 1861 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने रिप्रेजेंटेटिव डेमोक्रेसी का कांसेप्ट दिया था और जैसा कि मैंने
पहले भी कहा कि इन्होंने वन वोट मेनी वोट्स या फिर वन वोट मेनी वैल्यूज़ का कांसेप्ट दिया और इन्होंने साथ में टर्नी
ऑफ़ द मेजॉरिटी की भी बात की और खास बात यह है कि इनको जाना जाता है रिलक्टेंट डेमोक्रेट्स। तो इनको बेसिकली रिलक्टेंट
डेमोक्रेट जाना जाता है। जिसकी कुछ वजह हैं, कुछ बातें हैं। इनमें इन्होंने पहला तर्क यह दिया कि यह कहते हैं कि लोकतंत्र
में टिरनी ऑफ़ द मेजॉरिटी होती है। यानी कि जो बहुल्य तंत्र के लोग होते हैं उनकी तानाशाही स्थापित हो जाती है। माइनॉरिटी
जो ओपिनियन है उसको कुचल दिया जाता है। दूसरा इन्होंने कहा कि अनजुकेटेडनेस होती है। यानी कि अशिक्षा होती है। जिसकी वजह
से लोकतंत्र में सही ढंग से काम नहीं हो पाता है। और तीसरा इन्होंने कहा था लैक ऑफ पॉलिटिकल कॉन्शियसनेस एंड लैक ऑफ पॉलिटिकल
अफेयरनेस। इसकी वजह से लोग सही मायने में डेमोक्रेटिक को पार्टिसिपेट नहीं कर सकते हैं। तो ऐसी स्थिति में यह लोकतंत्र के
प्रति ज्यादा इच्छुक नहीं थे और इसी वजह से इनको रिलक्टेंट डेमोक्रेट भी कहा जाता है। एलेक्स टी टॉक विले ने मिल से पहले एक
इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया जिसको जाना जाता है टर्नी ऑफ़ द मेजॉरिटी और इन्होंने अपनी प्रमुख कृति डेमोक्रेसी इन अमेरिका जो कि
1835 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने फ़ेमसली कोट किया था जिसमें कहा था इन अमेरिका द मेजॉरिटी रेज़ फ़मिटेबल बैरियर्स
अराउंड द लिबर्टी ऑफ़ ओपिनियन विद इन दीज़ बैरियर्स एंड ऑथर मे राइट व्हाट ही प्लीज़ व्हाट वो टू हिम इफ ही गोज़ बियड देम। वहीं
आगे जेएसमिल ने अपनी प्रमुख कृति ऑन लिबर्टी जो कि 1859 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने टर्नी ऑफ़ द मेजोरिटी के
कांसेप्ट को रयूज़ किया था। जिसमें इन्होंने कोट किया था डेमोक्रेटिक आइडियल्स मे रिजल्ट इन द टर्नी ऑफ द
मेजॉरिटी और नोट करने वाली बात यह भी है कि जो टर्नी ऑफ़ द मेजॉरिटी है ये बेसिकली टर्नी ऑफ़ द मासेस है जिसके बारे में मिल्स
ने कहा था कि जो टर्नी ऑफ़ द मासेस है या फिर जो मेजॉरिटी रूल है उसकी जगह रिप्रेजेंटेटिव गवर्नमेंट को स्थापित किया
जाना चाहिए क्योंकि टिनी ऑफ़ द मेजॉरिटी जो है वो माइनॉरिटी की जो ओपिनियन है उसको दबा देती है। उसको कुचल देती है। इसीलिए
इन्होंने रिप्रेजेंटेटिव गवर्नमेंट की वकालत की थी। अब हम बात कर लेते हैं पार्टिसिपेटोरी डेमोक्रेसी की। इसको हिंदी
में कहा जाता है सहभागिता पूर्ण लोकतंत्र। तो इसकी खास बात यह है या फिर हम यह कह सकते हैं कि पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी की
खास बात यह है कि यह बात करती है कि किस तरह से पॉलिसी मेकिंग एंड डिसीजन मेकिंग में लोग पार्टिसिपेट करें। यानी कि पॉलिसी
मेकिंग और डिसीजन मेकिंग में लोग बढ़-चढ़कर भागीदारी करें। यही वकालत या फिर एडवोकेसी पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी
करती है और पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी की शुरुआत सेवंथ एंड 18थ बीसीई सेंचुरी में एथेंस में होती है। तो इस प्रकार से हम यह
कह सकते हैं कि पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी की शुरुआत भी एथेंस से ही हुई थी। हालांकि नोट करने वाली बात यह भी है कि 322 बीसीई
में एथेनियन डेमोक्रेसी का कोलैप्स हो जाता है। एंड हो जाता है। और नोट करने वाली बात यह भी है कि करेंटली जो
पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी का प्योर फॉर्म पाया जाता है वो पाया जाता है स्विस कैंट्स में। पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी के
कुछ इंपॉर्टेंट टूल्स भी होते हैं। जिनमें पहला टूल है प्लिबसाइड। प्लिबिसाइड का मतलब होता है जनमत संघ है। यानी कि इसका
मतलब यह है कि यह लोगों की एक ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा कोई दूसरे देश के साथ बाउंड्री डिस्प्यूट है तो उसके ऊपर लोग
अपनी राय दे सकते हैं। वह यह कह सकते हैं कि उन्हें किस क्षेत्र में रहना है, किस देश में जाना है, कहां जाना है। तो आपने
देखा भी होगा कि जब भारत देश आजाद हुआ था उस समय कश्मीर का विलय करते समय यह बोला गया था कि बाद में कश्मीर में प्लिसाइड
यानी कि जनमत संग्रह करवाया जाएगा। वहीं पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी का दूसरा टूल आता है रेफरेंडम जिसका मतलब होता है लोकमत
संग्रह। यह बेसिकली अगर पार्लियामेंट के द्वारा कोई कानून बनाया जाता है या विधानपालिका के द्वारा कोई कानून बनाया
गया है तो उसके ऊपर लोगों की या फिर सिटीजंस की एक ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा लोग उस कानून को रद्द कर सकते हैं। अगर
देश हित में नहीं है, लोगों के हित में नहीं है या फिर उसको पास भी कर सकते हैं। अगर वे लोगों के हित में है, देश के हित
में है। तो बेसिकली प्लिबसाइड और रेफरेंडम में यही फर्क है कि प्लिबसाइड को लोगों के द्वारा यूज़ किया जाता है। लैंड बाउंड्री
जो डिस्प्यूट होता है दूसरे देशों के साथ उसके ऊपर और रेफरेंडम को यूज़ किया जाता है कंट्री के अंदर किसी बिल को पास करने के
लिए या फिर किसी बिल को डिसॉल्व करने के लिए खत्म करने के लिए। वहीं पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी का अगला जो टूल है वह है
इनिशिएटिव। इसका मतलब होता है पहल करना। यदि जनता यह चाहती है कि उनके देश के लिए कोई कानून बनना जरूरी है तो ऐसी स्थिति
में कानून बनाने के लिए प्रस्ताव पारित करके जनता पहल कर सकती है। वहीं इसका अगला टूल है रिकॉल। रिकॉल का मतलब है वापस
बुलाना। अगर जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि उनके लिए काम नहीं करें या फिर रिस्पांसिबल ना हो लोगों के प्रति तो ऐसी
स्थिति में उन्हें वापस बुला सकते हैं। यानी कि राजगद्दी से उनको हटा सकते हैं। और नोट करने वाली बात यह है कि
पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी स्विस कैंटोन में ही मौजूद है। यानी कि वहां पर डायरेक्ट डेमोक्रेसी पाई जाती है। और यह
जो चार टूल मैंने बताए यह पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी और डायरेक्ट डेमोक्रेसी के टूल हैं। पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी के कुछ
इंपॉर्टेंट थिंकर्स या फिर स्कॉलर्स रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है जीन जेकस क्रूसो का। दूसरा नाम आता है सीबी मैकफसन
का। तीसरा नाम आता है जॉन स्टर्ट मिल का। वहीं चौथा नाम आता है जीडीएच कॉल का। तो यह नाम भी आप याद रखें क्योंकि एग्जाम में
कई बार पूछा जाता है कि निम्नलिखित में से कौन से विचारक या फिर थिंकर पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी से नहीं जुड़े हैं या फिर
जुड़े हैं। अब हम यह जान लेते हैं कि रूसो के डेमोक्रेसी के बारे में क्या विचार रहे हैं। अर्थात किस तरह से उन्होंने
पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी की बात की है। तो रूसो की जब हम बात करते हैं तो इन्होंने पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी की बात
की। इसके यह अग्रदूत रहे हैं। और खास बात यह है कि रूसो के लिए डेमोक्रेसी एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपनी फ्रीडम
को अचीव करते हैं। ऑटोनोमी को अचीव करते हैं। और इन्होंने अपनी प्रमुख कृति सोशल कॉन्ट्रैक्ट जो कि 1762 को पब्लिश होती
है। इसमें इन्होंने लिखा था कि फॉर द इंपल्स ऑफ एपेटाइट अलोन इज स्लेबरी एंड ओबिडियंस टू द लॉ वन हैज़ प्रिस्क्राइब फॉर
वनसेल्फ इज फ्रीडम। वहीं रूसो ने आगे चलकर जनरल बिल को भी दिया है और जनरल बिल जो कि पूरे समुदाय के बिल है। सभी लोगों की
आदर्श इच्छाओं का योग है। इसीलिए इसको कम्युनिटी बिल और कलेक्टिव बिल भी कहा जाता है। और खास बात यह है कि इन्होंने
जेएस मिल के आईडिया रिप्रेजेंटेटिव डेमोक्रेसी को पूरी तरह से नकारा और इन्होंने अपनी प्रमुख कृति सोशल
कॉन्ट्रैक्ट जो कि 1762 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कोट दिया जिसमें इन्होंने कहा नो सिटीजन शैल
बी रिच इनफ टू बाय अनदर एंड नन सो पुअर एस टू बी फोर्स्ड टू सेल हिमसेल्फ। अगर हम पेट्रिमोनिज्म की गहराई से बात करें तो
सबसे पहले हमें यह जानना है कि मैक्स बेबर ही इसके प्रणेता रहे हैं। यानी कि मैक्स बेबर ने ही अपनी प्रमुख कृति इकोनमी एंड
सोसाइटी में फैक्ट्रीमोनलिज्म के कांसेप्ट को कॉइन किया था। उसमें दिया था और मैक्स वेबर ने कहा कि पेट्रिमोनलिज्म
जो फॉर्म होता है यह बेसिकली ट्रेडिशनल जो डोमिनेशन होता है उसी का यह रूप होता है उसी का यह फॉर्म होता है और खास बात यह है
कि मैक्स वेबर ने तीन प्रकार की ऑथॉरिटीज की बात की है जो कि आप जानते भी हैं। तो इनमें पहला अर्थ है ट्रेडिशनल और इसके
बारे में मैक्स वेबर कहते हैं कि यह पेट्रिमोनियलिज्म पर आधारित है। यानी कि पितृसत्तात्मक वाद जो है उसके ऊपर आधारित
है क्योंकि यह ट्रेडिशनल वे ऑफ़ पावर है। वहीं दूसरी आती है कर्मेटिक्स जो कि व्यक्ति की खुद की जो पर्सनालिटी है उसके
ऊपर डिपेंड करती है। और तीसरी जो लीगल रैशन है यह डिपेंड करती है मॉडर्न जो सोसाइटी है मॉडर्न जो पिटिकल रिजीम है
वहां पर यह पाई जाती है। मैक्स बेबर से पहले पेट्रिमोनलिज्म का आईडिया लुडबिक हलर ने भी दिया था और खास
बात यह है कि जब हम पेट्रिमोनलिज्म की बात करते हैं तो इनमें जो पावर होती है वह कुछ आधारों पर निर्धारित होती है। जैसे पर्सनल
लॉयलिटी ऑफ द रूलर यानी कि रूलर किस तरह से लॉयलिटी को बनाए रखते हैं। दूसरा है पेट्रोन क्लाइंट रिलेशंस। इसका मतलब
पेट्रोन का मतलब यहां पे होता है रूलर और क्लाइंट का मतलब होता है कि जो शासक है उसके अधिकारी यानी कि शासक और उनके
अधिकारी के बीच किस तरह के संबंध है कि वे लोगों को राजा की ओर आकर्षित करें। लोग राजा के प्रति या फिर रूलर के प्रति
निष्ठा बनाए रखें और पर्सनल एलगेंस जो राजा का होता है या फिर रूलर का होता है इसमें भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस
तरह से हम कह सकते हैं कि पेट्रिमोनियलिज्म एक जो पेट्रियािकल फैमिली होती है या फिर पेट्रियटिकल
सोसाइटी होती है उसका एक एक्सटेंडेड वर्जन होता है। यानी कि विस्तारित रूप होता है। और पेट्रिमोनियल रूलर जो होता है वह
बेसिकली फादर के रूप में अपनी पोजीशन को एस्टैब्लिश करता है। यानी कि जिस तरह से पेट्रियटिकल सोसाइटी में या फिर
पेट्रियािकल फैमिली में पिता का रोल होता है, फादर का रोल होता है, उसी तरह से पेट्रिमोनियलिज्म में भी जो रूलर होता है,
उसकी भूमिका उसी तरह से होती है। और खास बात यह भी है कि पब्लिक प्राइवेट जो स्फीयर होता है, उसमें कोई डिफरेंस नहीं
होता है। क्योंकि सब कुछ राजा का होता है, शासक का होता है। वहां पर सिर्फ प्राइवेट होता है जो कि राजा का ही सब कुछ होता है
और खास बात यह है कि वहां पर मेरिट जो रिक्रूटमेंट होती है उसको कोई स्पेस नहीं होता है क्योंकि राजा अपनी मर्जी के
अनुसार ही पदों की नियुक्ति करता है। जो उसे लगता है कि जो उसके लिए फायदेमंद है, जो उसके करीबी लोग हैं, जो उसकी बात मानते
हैं, उनको ही रिक्रूट करता है। राजाना के गुणों के आधार पे स्किल के आधार पे रिक्रूटमेंट होती है। मैक्स बेबर ने
पेट्रिमोनियलिज्म के कुछ एग्जांपल्स दिए हैं। जिसमें इन्होंने कहा है कि एंशिएंट इजिप्ट, चाइनीस एंपायर और जारिस जो रशा है
वो ऐसे शासन थे जिनको कि हम पेट्रिमोनलिज्म के उदाहरण के रूप में देख सकते हैं। तो बेसिकली हम यही कह सकते हैं
कि मैक्स वेबर ने एंशिएंट इजिप्ट चाइनीस एंपायर जस्ट रिया को पेट्रिमोनलिज्म के एग्जांपल के रूप में देखा। वहीं नोट करने
वाली बात यह भी है कि हन्ना आरंट ने अपनी प्रमुख कृति द ओरिजिन ऑफ टोटल जो कि 1951 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने नाजी
जर्मनी और सोवियत यूनियन को टोटिटेरियनिज्म का एक परिचायक बताया। यानी कि उसे सर्वसत्तावाद कहा और बड़ी मात्रा
में इसकी आलोचना की। वहीं दूसरी तरफ कार्ल पॉपर ने अपनी प्रमुख कृति द ओपन सोसाइटी एंड इट्स एनिमीज़ जो कि 1945 को पब्लिश
होती है। उसमें इन्होंने सर्वसत्तावाद यानी कि टोटली टेररिनिज्म को क्रिटिसाइज किया और प्लेटो मार्क्स एंड हेगल को ओपन
सोसाइटी के एनिमीज़ कहा यानी कि मुक्त समाज के शत्रु कहा। कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म के इस लेक्चर में अब हम डिस्कस कर लेते हैं
हिस्ट्री ऑफ़ कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म को। तो इसमें सबसे पहला नाम आता है ग्रीक कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म का। प्लेटो ने अपनी
प्रमुख कृति द लॉज़ में सबसे पहले द रूल ऑफ लॉ का कांसेप्ट दिया था। जिसे बाद में एरिस्टोटलल ने भी यूज़ किया था। और नोट
करने वाली बात यह है कि बाद में प्रोफेसर डाइसी ने जो रूल ऑफ लॉ का कांसेप्ट है उसको काफी डेवलप किया, पॉपुलराइज किया। और
नोट करने वाली बात यह भी है कि एरिस्टोटल को जाना जाता है फादर ऑफ कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म।
क्यों? क्योंकि इन्होंने 158 कॉन्स्टिट्यूशन का जो कंपैरेटिव एनालिसिस है या फिर कंपैरेटिव स्टडी है उसको किया
था। इस वजह से इनको जाना जाता है फादर ऑफ कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म। वहीं नोट करने वाली बात यह भी है कि इन्होंने मिक्स्ड
कॉन्स्टिट्यूशन की अवधारणा दी जिसे इन्होंने पॉलिटी कहा और नोट करने वाली बात यह भी है कि एरिस्टोटलल ने ही सबसे पहले
जो कॉन्स्टिट्यूशनल गवर्नमेंट है उसका नोशन दिया था। और इन्होंने एक कोर्ट भी दी थी जिसमें इन्होंने कहा था कि द
कॉन्स्टिट्यूशन इज द फॉर्म ऑफ द स्टेट। यानी कि जो संविधान होता है, वह राज्य का एक रूप होता है। और नोट करने वाली बात यह
भी है कि इन्होंने कहा था कि जो लॉ होता है, यह डिस्पैशनेट रीजन होता है। यानी कि सर्वोच्च तर्क होता है। क्योंकि जो भी
कानून स्टेट में होता है वह अनेकों बुद्धिमान लोगों के द्वारा उनकी बुद्धिमता उनके तर्क के आधार पर बनाया जाता है।
कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म की हिस्ट्री में दूसरा नाम आता है रोमन कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म का। तो इसमें कुछ
इंपॉर्टेंट थिंकर्स रहे हैं जिनमें पहला नाम आता है पॉलीवियस का दूसरा नाम आता है सिस्रो का तीसरा नाम आता है सेनेका का
चौथा नाम आता है ऑगस्टाइन का पांचवा नाम आता है थॉमस एक्वनास का और छठा नाम आता है निकोलो मैकबली का रोमन ट्रेडिशन भी फोकस
करती है मिक्स्ड फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट में यानी कि सिस्रो ने भी एरिस्टोटल की तरह मिक्स्ड कॉन्स्टिट्यूशन की बात की है और
इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति डीलेजवस जिसको जिसको हम अंग्रेजी भाषा में द लॉज़ कहते हैं। इसमें सिस्रो ने लिखा है कि
बिना कानून के कोई भी स्टेट, कोई भी गवर्नमेंट नहीं हो सकती है। और इन्होंने दो इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिए। पहला है
इक्वलिटी बिफोर लॉ और दूसरा है यूनिवर्सल लॉ। यानी कि इन्होंने कहा कि जो लॉज़ होते हैं वह यूनिवर्सल होते हैं, सार्वभौमिक
होते हैं। और इन्होंने कहा कि जो मिक्स्ड फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट होता है, इसमें तीन सरकारों का मिश्रण होता है। जिसमें प्रमुख
होता है मोनार्की प्लस एरिस्टोक्रेसी प्लस डेमोक्रेसी। यानी कि इन तीनों फॉर्म ऑफ जो गवर्नमेंट है उससे जो भी मिक्स्ड
कॉन्स्टिट्यूशन बनेगा वही सर्वश्रेष्ठ होता है। और इन्होंने कहा कि जो राज्य की उत्पत्ति होती है यह लोगों की सहमति से
होती है। यानी कि राज्य कंसेंट ऑफ द पीपल पर आधारित होता है। और इन्होंने कहा कि स्टेट एक नेचुरल इंस्टीट्यूशन नहीं है
बल्कि लोगों के बीच एक लीगल कॉन्ट्रैक्ट है। और खास बात यह भी है कि सिस्रो ने लॉ के बारे में कहा कि लॉ हाईएस्ट रीजन होता
है स्टेट का। रोमन कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म में अगला नाम आता है निकोलो मैक्यावली का। तो निकोलो मैक्यावली ने अपनी प्रमुख कृति
डिस्कोर्सेस ओनलीबी जो कि 1531 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने रिपब्लिकनिज्म एंड कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म की बात की और साथ
में इन्होंने यह भी कहा कि जो रिपब्लिक होता है यह आइडियल फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट होता है। यानी कि इन्होंने इसमें यह कहा
कि जो रिपब्लिक होता है यह सरकार का आदर्श रूप होता है। जो कि ऐसे राज्य के लिए उपयुक्त होता है जहां के लोग अच्छे चरित्र
वाले हो। जिनके अंदर नैतिकता हो और जो राज्य की भलाई के बारे में सोचते हो। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने रोमन
एंपायर को एप्रिशिएट किया। इसकी प्रशंसा की और खास बात यह भी है कि इन्होंने अपनी इस कृति में लोगों के जो अधिकार हैं यानी
कि राइट्स है और जो लोगों के इंटरेस्ट्स हैं उसकी वकालत की और एक बड़ी बात यह भी है कि इन्होंने एरिस्टोटलल की तरह मिक्स्ड
फॉर्म ऑफ कॉन्स्टिट्यूशन की बात की जिसमें इन्होंने एक तरफ मोनार्की की बात की तो दूसरी तरफ रिपब्लिकनिज्म की बात की और
अगली बात यह भी है कि इन्होंने पॉपुलर जो रूल होता है और जो पीपल्स पार्टिसिपेशन होती है। उसकी भी इन्होंने बात की
रिपब्लिकनिज्म के अंतर्गत। तो इस तरह से अगर हम मैक्यावली के थॉट्स को देखें तो यह साफ हमें दिखाई पड़ता है कि इन्होंने भी
जो रोमन कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म है उसको काफी बढ़ावा दिया। कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म की हिस्ट्री में अगला नाम आता है ब्रिटिश
कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म का। तो पहली बात यह है कि ब्रिटिश कॉन्स्टिट्यूशन को जाना जाता है अनकडिफाइड कॉन्स्टिट्यूशन। जिसका
मतलब यह है कि ब्रिटेन का कॉन्स्टिट्यूशन रिटन कॉन्स्टिट्यूशन नहीं है बल्कि विकसित संविधान है। इसकी दूसरी बात यह है कि
यूनाइटेड किंगडम को कंसीडर्ड किया जाता है कॉन्स्टिट्यूशनल मोनार्की। और अगली बात यह है कि 1215 में मेघनाका को इंट्रोड्यूस
किया जाता है इंग्लैंड के किंग जॉन के द्वारा। और इससे भी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इसका कोर थीम था लिबर्टी एंड ह्यूमन
राइट्स। इस बात को आपने अच्छे से याद रखना क्योंकि एग्जाम में इसे पूछा जाता है और अगली बात यह है कि मैग्नाका को एक
कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म के कोर एग्जांपल के रूप में देखा जाता है और 1628 में इंग्लैंड में पिटीशन ऑफ राइट्स को इशू
किया जाता है। वहीं 1642 से 1649 में ब्रिटिश सिविल वॉर होता है और 1688 में ग्लोरियस रेवोल्यूशन इंग्लैंड में होती
है। और अगली बात यह है कि 1689 यानी कि 1689 को विल ऑफ राइट्स इंग्लैंड में लाया जाता है। तो जितनी भी यह घटनाएं आपको
स्क्रीन पर दिखाई दे रही है, इन्होंने ब्रिटिश कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म में बहुत बड़ा रोल प्ले किया। ब्रिटिश
कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म में पहला नाम आता है थॉमस हॉब्स का। तो थॉमस हॉब्स ने सोशल कॉन्ट्रैक्ट की थ्योरी दी और इन्होंने
इंडिविजुअल राइट्स और लिबर्टी की बात की और खास बात यह भी है कि इन्होंने सबसे पहले मिल और आइजलिया बर्लिन से भी पहले
नेगेटिव लिबर्टी की बात की और दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने स्टेट ऑफ नेचर में नेचुरल लॉस की बात की और खास बात यह भी है
कि जहां हॉब्स एक तरफ एब्सोल्यूटिस्ट थिंकर थे वहीं दूसरी तरफ इंडिविजुअलिस्टिक थिंकर भी थे और सेबाइन ने इनके बारे में
लिखा है कि लेबथान इज बेस्ड ऑन टू प्रिंसिपल्स। फर्स्ट इज लॉज़ एंड ऑर्डर एंड सेकंड इज़ इंडिविजुअलिज्म। इसका मतलब यह है
कि थॉमस हॉब्स ने जिस तरह से लेबथान में लॉज़ और ऑर्डर की बात की है, इंडिविजुअलिज्म की बात की है, तो उनके
आधार पर हम कह सकते हैं कि इन्होंने ब्रिटिश कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म को काफी सपोर्ट किया, काफी बढ़ावा दिया। वहीं अगले
थिंकर का नाम आता है जॉन लॉक। तो जॉन लॉक ने ग्लोरियस रेवोल्यूशन जो कि 1688 को हुई थी उसको काफी सपोर्ट किया। काफी समर्थन
किया। और दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने लिमिटेड एंड कॉन्स्टिट्यूशनल गवर्नमेंट की वकालत की और इनको जाना जाता
है फादर ऑफ लिबरलिज्म। और खास बात यह भी है कि इन्होंने लाइफ लिबर्टी एंड प्रॉपर्टी को नेचुरल राइट्स के रूप में
कंसीडर किया। और दूसरी बड़ी बात यह भी है कि इन्होंने कहा कि अगर कोई गवर्नमेंट लोगों के हितों में काम नहीं करती है,
लोगों की खुशी के लिए, लोगों के डेवलपमेंट के लिए काम नहीं करती है, तो ऐसी स्थिति में लोगों के पास अधिकार है। यानी कि राइट
टू रेवोल्यूशन है। और खास बात यह भी है कि ये एक ऐसे फर्स्ट मॉडर्न थिंकर रहे हैं जिन्होंने ओपनली लिमिटेड गवर्नमेंट और जो
कॉन्स्टिट्यूशनल गवर्नमेंट है उसका सपोर्ट किया वो भी ओपनली। थर्ड थिंकर का नाम आता है जेरेमी बेंथम। तो जेरेमी बेंथम की जब
हम बात करते हैं तो इन्होंने जो सोशल कॉन्ट्रैक्ट है और जो नेचुरल राइट्स है उसको क्रिटिसाइज किया और इन्होंने नेचुरल
राइट्स को कंसीडर किया एज एनार्किकल फैलेसी एंड सिंपली नॉनसेंस अपॉन स्टिल्ट्स। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनको
जाना जाता है न्यूटन ऑफ जरिस प्रूडेंस। और अगली बात यह है कि इन्होंने इंटरनेशनल लॉज़ की जो शब्दावली है उसको कॉइं किया था। और
खास बात यह भी है कि इन्होंने वन वोट वन वैल्यू का कांसेप्ट दिया था जो कि आज के लोकतंत्र का कोर सिद्धांत है। कोर वैल्यू
है। तो जिस तरह से आप स्क्रीन पर इनके जो कांसेप्ट्स देख रहे हैं उसके बेस पे हम कह सकते हैं कि इन्होंने भी ब्रिटिश जो
कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म है उसको काफी विकसित किया। काफी डेवलप किया। अगला नाम आता है जे एस मिल का। तो जे एस मिल रहे हैं
चैंपियन ऑफ नेगेटिव लिबर्टी। और दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने अपनी प्रमुख कृति द सब्जेक्शन ऑफ वुमेन जो कि 1869 को
पब्लिश होती है। इस कृति में इन्होंने वुमेन के राइट्स की वकालत की और तीसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने प्रोपोर्शनल
रिप्रेजेंटेशन और जो प्लूरल वोटिंग है उसकी बात की थी। जिसके अंतर्गत इन्होंने यह कहा था कि जो प्रोफेसर्स होते हैं,
इंटेलेक्चुअल होते हैं उनको दो या दो से अधिक मत देने का अधिकार होगा। और खास बात यह भी है कि इन्होंने तीन प्रकार की जो
इंडिविजुअल लिबर्टी है उसकी बात की है। जिनमें पहली आती है फ्रीडम टू थॉट एंड एक्सप्रेशन। दूसरी आती है फ्रीडम टू वर्क
और तीसरी आती है फ्रीडम टू क्रिएट यूनियन। वहीं दूसरी तरफ थॉमस जेफरसन ने भी तीन प्रकार के नेचुरल राइट्स की बात की थी।
जिनमें पहला आता है लाइफ, दूसरा आता है लिबर्टी और तीसरा आता है पर्स्यूट ऑफ हैप्पीनेस। हालांकि इससे पहले जॉन लॉक ने
भी तीन प्रकार के नेचुरल राइट्स की बात की थी। जिनमें इन्होंने बताया था लाइफ, लिबर्टी एंड प्रॉपर्टी। तो प्रॉपर्टी की
जगह थॉमस जेफरसन ने पर्स्यूट ऑफ हैप्पीनेस की बात की थी। और नोट करने वाली बात यह भी है कि यूएस में जुडिशियल रिव्यू पाया जाता
है। और इसको यूएस में ऐड किया गया था। 1803 का जो प्रमुख केस था जिसका नाम है मार्वरी वर्सेस मेडिसन। तो इस केस के
द्वारा ही यूएस में जुडिशियल रिव्यू को ऐड किया गया था। अगला नाम आता है चार्ल्स मैकलबेन का। चार्ल्स मैकलबिन अमेरिकन
हिस्टोरियन और पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। इन्होंने अपनी प्रमुख कृति कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म
एंड द चेंजिंग वर्ल्ड जो कि 1939 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने कहा था कि द मेन प्रॉब्लम ऑफ द टुडेेज एरा इज द
प्रॉब्लम ऑफ कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म। यानी कि इसमें इन्होंने यह कहा कि आज के युग की प्रमुख समस्या संविधानवाद की समस्या है।
क्योंकि कॉन्स्टिट्यूशन के जो नॉर्म्स होते हैं, वैल्यूस होती है, कॉन्स्टिट्यूशन में जो प्रोविजंस किए गए
हैं, उसको फॉलो नहीं किया जा रहा है। जिस वजह से जो कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म है, उसका क्राइसिस हो गया है। यानी कि
कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म एक प्रमुख समस्या के रूप में उभर कर आई है। दूसरी तरफ कार्ल लोवेस्टीन जर्मन फिलॉसोफर और पॉलिटिकल
साइंटिस्ट रहे हैं। और इनको 20th सेंचुरी के जो कॉन्स्टिट्यूशनल लॉज़ है उसके प्रोमिनेंट फिगर के रूप में देखा जाता है।
यानी कि इन्होंने कॉन्स्टिट्यूशनल लॉज़ के ऊपर काफी स्टडी की और इनके कुछ वर्क्स रहे हैं। जिनमें पहला आता है पॉलिटिकल
रिकंस्ट्रक्शन और दूसरा आता है पॉलिटिकल पावर एंड द गवर्नमेंटल प्रोसेस। वहीं सबसे प्रमुख बात यह है कि कार्ल लॉबिनस्टीन ने
कॉन्स्टिट्यूशन को टू कैटेगरीज़ में रखा। एक है नॉमिनल कॉन्स्टिट्यूशन और दूसरा है नॉर्मेटिव कॉन्स्टिट्यूशन। जब हम बात करते
हैं नॉमिनल कॉन्स्टिट्यूशन की तो यह पाया जाता है डेवलपिंग सोसाइटीज में। ऐसे देश जो विकासशील है जो कभी ना कभी कॉलोनाइज्ड
रहे हैं और इन देशों ने जो कॉन्स्टिट्यूशन है वह बोरो किया था दूसरे जो डेवलप्ड नेशन हैं वहां से। वहीं दूसरी तरफ जो नॉर्मेटिव
कॉन्स्टिट्यूशन है यह पाए जाते हैं डेवलप्ड सोसाइटीज में यानी कि जिन्होंने कंट्रीज को कॉलोनाइज्ड किया यानी कि
कॉलोनाइजर देश। वहीं दूसरी तरफ जब हम बात करते हैं नॉमिनल कॉन्स्टिट्यूशन की तो इसके एग्जांपल्स हम देखते हैं एशियन
अफ्रीकन लैटिन अमेरिकन कंट्रीज को क्योंकि इन्होंने ही जो कॉन्स्टिट्यूशनंस है उनको बोरो किया डेवलप्ड नेशन से। वहीं दूसरी
तरफ जो नॉर्मेटिव कॉन्स्टिट्यूशन है इसके एग्जांपल हम देख सकते हैं। यूएस, कनाडा, जापान और ऑस्ट्रेलिया यहां का जो
कॉन्स्टिट्यूशन होता है इन्होंने खुद कॉन्स्टिट्यूशन को बनाया। इन्होंने बोरो नहीं किया। इसीलिए इनके जो कॉन्स्टिट्यूशन
है उसको नॉर्मेटिव कॉन्स्टिट्यूशन कहा जाता है। नॉर्मेटिव का मतलब होता है मानकीय यानी कि जिसको सब लोग मानते हैं,
फॉलो करते हैं। अब हम फ्रेंच कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म को अच्छे से समझ लेते हैं। तो जब हम बात करते हैं फ्रेंच
रेवोल्यूशन की तो यह होती है 1789 को। और फ्रेंच रेवोल्यूशन के तीन इंपॉर्टेंट आइडियल्स रहे हैं। जिनमें पहला आता है
इक्वलिटी, दूसरा आता है लिबर्टी और तीसरा आता है फ्रेटरनिटी। वहीं दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि फ्रेंच रेवोल्यूशन ने
कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म के डेवलपमेंट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। और एक प्रमुख बात यह है कि रूसो ने भी फ्रेंच
रेवोल्यूशन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। फ्रेंच रेवोल्यूशन के प्रणेता जीन जेकस रूसो ने सोशल कॉन्ट्रैक्ट का
सिद्धांत दिया था। जिसमें इन्होंने कहा था कि राज्य की उत्पत्ति लोगों के बीच हुए एक सामाजिक समझौते से हुई है। वहीं इन्होंने
पॉपुलर सोवनिटी का कांसेप्ट दिया जिसमें इन्होंने कहा कि जो संप्रभुता होती है यानी कि पावर होती है, शक्ति होती है,
सत्ता होती है वो लोगों के हाथ में होती है। और दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने कहा कि जब लोग प्राकृतिक अवस्था में रहते
थे तो वे प्राकृतिक रूप से स्वतंत्र थे। जिसको इन्होंने नेचुरल लिबर्टी कहा और अगली प्रमुख बात यह है कि रूसो को जाना
जाता है कम्युनिटी थिंकर क्योंकि इन्होंने कहा कि जो जनरल बिल है वह समस्त कम्युनिटी की बिल होती है इच्छा होती है और इन्होंने
जो कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म है और जो फ्रेंच रेवोल्यूशन है उसके डेवलपमेंट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। दूसरी तरफ
मॉन्टेस्क्यू भी फ्रेंच के पॉलिटिकल फिलॉसोफर और जरिस्ट रहे हैं। इन्होंने अपनी प्रमुख कृति द स्पिरिट ऑफ लॉज़ जो कि
1748 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने सेपरेशन ऑफ पावर का कांसेप्ट दिया और इन्होंने कहा कि व्हेन द लेजिसलेटिव एंड
एग्जीक्यूटिव पावर्स आर यूनाइटेड इन द सेम पर्सन और इन द सेम बॉडी और मैजिस्ट्रेट्स देयर कैन बी नो लिबर्टी। इसका मतलब यह है
कि इन्होंने कहा कि जब एक ही व्यक्ति के पास लेजिसलेटिव और एग्जीक्यूटिव पावर्स आ जाती है यानी कि इन सभी शक्तियों के ऊपर
एक ही व्यक्ति का कंट्रोल होता है तो वहां पर जो लिबर्टी है वह खत्म हो जाती है। स्वतंत्रता नाम की कोई चीज नहीं रह जाती
है। इंडियन कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म में पहला नाम आता है डॉ. बी आर अंबेडकर का और इनको जाना जाता है फाउंडर ऑफ द इंडियन
कॉन्स्टिट्यूशन। इन्होंने कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी का कांसेप्ट दिया और खास बात यह है कि यह कांसेप्ट इन्होंने ग्रहण किया
जॉर्ज ग्रोट से और इन्होंने अपनी प्रमुख स्पीच ग्रामर ऑफ एनार्की में जो कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी का कांसेप्ट है
उसको दिया और इन्होंने कहा कि कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी इज नॉट अ नेचुरल सेंटीमेंट इट हैज़ टू बी कल्टीवेटेड। वी
मस्ट रियलाइज़ दैट आवर पीपल हैव येट टू लर्न इट। डेमोक्रेसी इन इंडिया इज ओनली अ टॉप ड्रेसिंग ऑन एन इंडियन सोइल व्हिच टू
एसेंशियली अनडेमोक्रेटिक। इसमें यह कह रहे हैं कि जो कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी होती है ना यह कोई नेचुरल सेंटीमेंट नहीं होती
है। इसे कल्टीवेट करना होता है। इसे बनाना होता है। इसे निर्मित करना होता है। और जो कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी है ये इंडिया के
लोगों को सीखना अभी बाकी है। तो कॉन्सिट्यूशनल मोरालिटी का मतलब सिंपली यह होता है कि जो कॉन्स्टिट्यूशनल लॉज़ होते
हैं, वैल्यूस होती है, नॉर्म्स होते हैं, कॉन्स्टिट्यूशन में जो प्रोविजंस किए गए हैं, जब लोग उनको फॉलो करते हैं, उनको
मानते हैं, उनका अनुसरण करते हैं, तो उसको हम सिंपल भाषा में कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी कहते हैं। दूसरा नाम आता है
ग्रनविले ऑस्टिन का। तो ग्रनविले ऑस्टिन इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन के अमेरिकन हिस्टोरियन रहे हैं। और दूसरी बड़ी बात यह
है कि इन्होंने कहा कि इंडिया का जो फेडरलिज्म है यह कोऑपरेटिव फेडरलिज्म है। क्योंकि इंडिया में जो सेंटर है और
स्टेट्स है यह मिलकर काम करते हैं। और तीसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने इंडिया के जो डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ स्टेट
पॉलिसी है उसको इन्होंने कंसाइंस कहा। यानी कि इन्होंने यह बोला कि यह सोशल फिलॉसोफी ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन है और साथ
में इन्होंने यह भी कहा कि जो स्टेट डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स है यह सोल ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन है। जिन्होंने सोशल
रेवोल्यूशन को इंडिया में लाया है। और खास बात यह भी है कि इन्होंने यह कहा कि नेहरू, पटेल, प्रसाद, आजाद यह
कॉन्स्टिटुएंट जो असेंबली थी उसमें यह ओलगार्किकल एग्जांपल थे। इसका मतलब यह है कि कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली में इन चार
लीडर्स का बहुत प्रभुत्व था और यह चारों जो इलीट फैमिली है वहां से बिलोंग करते थे और खास बात यह भी है कि इन्होंने इंडिया
का जो कॉन्स्टिट्यूशन है उसको सेमलेस वेब कहा जिसको हम हिंदी में कहते हैं अखंड जाल और इसका मतलब यह है कि ग्रनविले ऑस्टिन यह
कहते हैं कि इंडिया के कॉन्स्टिट्यूशन ने जो इंडिया है पूरा का पूरा उसको यूनाइट किया है जिसकी वजह से इन्होंने इसे अखंड
जाल कहा है यानी कि सेमलेस डेब कहा है। और दूसरा फैक्टर यह है कि यह कहते हैं कि जो इंडिया का कॉन्स्टिट्यूशन है इसने इंडिया
में सोशल रेवोल्यूशन को लाया है। जिस वजह से भी इन्होंने इंडिया का जो कॉन्स्टिट्यूशन है उसको सीमलेस वेब कहा
है। ग्रेनविले ऑस्टिन ने एक फेमस कोर्ट दिया जिसमें इन्होंने कहा द कॉन्स्टिटुएंट असेंबली वाज़ अ वन पार्टी बॉडी इन एन
एसेंशियली वन पार्टी कंट्री। द असेंबली वाज़ द कांग्रेस एंड कांग्रेस वाज़ इंडिया। इसका सिंपल मतलब यह है कि जो आईएसी थी,
कांग्रेस थी, उसका कॉन्स्टिटुएंट असेंबली में काफी डोमिनेंट रोल था। कांग्रेस के द्वारा ही सारे के सारे डिसीजंस लिए जाते
थे। तो इसी के आधार पर इनका जो यह कोड है वह आधारित है। ग्रेनविले ऑस्टिन के कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। तो स्क्रीन पर
जितने भी आपको वक्स दिखाई दे रहे हैं इनको आप अच्छे से नोट करें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी है। अगला नाम आता है
सुनील खिलनानी का। तो सुनील खिलनानी भी अशोका यूनिवर्सिटी जो कि इंडिया में है उसके पॉलिटिक्स एंड हिस्ट्री के प्रोफेसर
रहे हैं और इनको जाना जाता है एक प्रमुख किताब के ऑथर के लिए जिसका नाम है द आइडिया ऑफ इंडिया जो कि 1997 को पब्लिश
होती है और खास बात यह है कि यह बीबीसी रेडियो की जो फोर सीरीज है उसके प्रेजेंटर रहे हैं जिसका टाइटल था इंकारेशंस इंडिया
इन 50 लाइव्स जो कि बाद में 2016 में एक बुक के रूप में पब्लिश हुआ और खास बात यह है कि इन्होंने इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन और
कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म के ऊपर काफी काम किया है। वहीं सुनील खिलनानी अपनी प्रमुख कृति इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन एंड डेमोक्रेसी जो
कि 2000 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन के जो एग्जिस्टेंस है उसके तीन फैक्टर्स की बात
की है। पहला है फॉरेन या फिर एलियन रूल। जैसे कि इंडिया में ब्रिटिश शासन था। तो उसकी वजह से इंडिया में डेमोक्रेसी और
कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म को स्थापित किया गया। दूसरा है डिवाइन एंड हेवनली ऑर्डर। यानी कि इंडिया एक ऐसा देश रहा है जो ईश्वर या
फिर स्पिरिचुअलिटी में विश्वास रखता है। तो उसकी वजह से सुनील खिलनानी यह कहते हैं कि यह डिवाइन या फिर ईश्वर का आदेश था कि
इंडिया में डेमोक्रेसी और कॉन्स्टिट्यूशन को स्थापित किया जाए। और तीसरा फैक्टर था डेमोक्रेटिक सोल या फिर डेमोक्रेटिक फॉर्म
ऑफ़ सोसाइटी। भले ही इंडिया में प्रिंसली स्टेट्स थे 1947 से पहले या मोनार्की थी लेकिन कहीं ना कहीं इंडिया में
डेमोक्रेटिक फॉर्म ऑफ सोसाइटी पाई जाती थी जिसकी वजह से इंडिया में डेमोक्रेसी और कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म को स्थापित किया गया।
नोट करने वाली बात यह भी है कि इन्होंने अपनी प्रमुख कृति द आइडिया ऑफ़ इंडिया जो कि 1997 को पब्लिश हुई थी। उसमें इन्होंने
कहा था कि इंडिया में जब 1947 के बाद डेमोक्रेसी को एस्टैब्लिश किया गया, कॉन्स्टिट्यूशन को बनाया गया तो यह
अमेरिकन और फ्रेंच रेवोल्यूशन के बाद दुनिया का सबसे बड़ा एक्सपेरिमेंट था। वहीं दूसरी तरफ केवेयर ने अपनी प्रमुख
कृति मॉडर्न कॉन्स्टिटशंस में कॉन्स्टिट्यूशन की सिक्स ओल्ड क्लासिफिकेशन की बात की। जिनमें पहला आता
है रिटन एंड अनरिटन कॉन्स्टिट्यूशन। दूसरा आता है रिजिड एंड फ्लेक्सिबल। तीसरा आता है सुप्रीम एंड सबऑर्डिनेट। चौथा आता है
फेडरल एंड यूनिटरी। पांचवा आता है सेपरेटेड पावर एंड फ्यूज्ड पावर। और छठा आता है रिपब्लिकन एंड मोनार्किकल।
पॉलिटिकल पार्टीज के थिंकर में अब हम सबसे पहले डिस्कस कर लेते हैं मॉरिस डबर्जर की। तो मॉरिस डबर्जर एक बहुत ही बड़े थिंकर
रहे हैं जो कि फ्रेंच जरिस्ट रहे हैं, सोशियोलॉजिस्ट रहे हैं, पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं और साथ में एक
पॉलिटिशियन भी रहे हैं। और खास बात यह है कि मॉरिस डवर्जर को जाना जाता है कोरिलेशन बिटवीन फर्स्ट पास द पोस्ट इलेक्शन सिस्टम
एंड द फॉर्मेशन ऑफ अ टू पार्टी सिस्टम जिसको जाना जाता है डवर्जर्स लॉ। और डवर्जर्स लॉ क्या है? इसको हम बाद में
अच्छे से डिस्कस करेंगे। और इन्होंने पॉलिटिकल सिस्टम जो फ्रांस का है उसको इन्होंने एनालाइज्ड किया और इन्होंने एक
इंपॉर्टेंट टर्म सेमी प्रेसिडेंशियल सिस्टम को कॉइ किया और खास बात यह है कि इन्होंने पॉलिटिकल सिस्टम की क्लासिफिकेशन
के लिए वेस्टर्न यूरोपियन कंट्रीज का अध्ययन किया। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स भी रहे हैं जो कि आपको याद रखने हैं
क्योंकि एग्जाम की दृष्टि से यह बहुत ही इंपॉर्टेंट है। तो इनका पहला वर्क आता है द आइडिया ऑफ पॉलिटिक्स द यूजज़ ऑफ़ पावर इन
सोसाइटी। दूसरा वर्क आता है द स्टडी ऑफ़ पॉलिटिक्स। अगला वर्क आता है पॉलिटिकल पार्टीज देयर ऑर्गेनाइजेशन एंड एक्टिविटी
इन द मॉडर्न स्टेट। और अगला वर्क आता है द फ्रेंच पॉलिटिकल सिस्टम। वहीं अगला वर्क आता है पार्टी पॉलिटिक्स एंड प्रेशर
ग्रुप्स। और लास्ट में जो इनका वर्क है जो कि बहुत इंपॉर्टेंट है वह है मॉडर्न डेमोक्रेसी इकोनॉमिक पावर वर्सेस पॉलिटिकल
पावर। अब हम डबर्जर लॉज़ को अच्छे से समझ लेते हैं कि मॉरिस डबर्जर इस लॉ के बारे में
क्या कहते हैं। तो मॉरिस डबर्जर यह कहते हैं कि जो इलेक्टोरल सिस्टम होता है और सिस्टम ऑफ़ पॉलिटिकल पार्टीज होता है उसके
बीच एक डायरेक्ट रिलेशनशिप पाई जाती है। इसके मायने यह है कि यह कहते हैं कि अगर कोई इलेक्ट्रोरल सिस्टम है और वहां पर अगर
फर्स्ट पोस्ट द पावर सिस्टम पाया जाता है तो वहां पर जो मल्टी पार्टी सिस्टम होगा वो टू पार्टी सिस्टम में कन्वर्ट हो
जाएगा। एग्जांपल के लिए जैसे अभी हाल ही में यूपी में इलेक्शन हुए। वहां पर भी हमने ऐसा ही देखा था और उससे पहले वेस्ट
बंगाल में जो इलेक्शन हुए थे वहां पर भी जो डवर्जर लॉ है वह फिट बैठता है। यानी कि इसका मतलब यह है कि इसके अंतर्गत जो थर्ड
पार्टी है वह गायब हो जाएगी। क्योंकि मॉरिस डबर्जर यह कहते हैं कि लोग स्ट्रेटेजिकली भी वोट करते हैं और वोटर्स
जो है थर्ड पार्टी जो है उसको हराने के लिए इस तरह से वोट करते हैं कि वह सत्ता से बाहर हो जाए और इस तरह से जो एक मल्टी
पार्टी सिस्टम है वह टू पार्टी सिस्टम में कन्वर्ट हो जाता है जिसको कि डवर्ज लॉ कहा जाता है। मॉरिस ड्यूबरजन ने दल यानी कि
पार्टी का ऑर्गेनाइजेशन के बेस पे चार आधारों पर क्लासिफिकेशन किया है। जिनमें पहला आता है काकस दल, दूसरा आता है ब्रांच
दल, तीसरा आता है सेल दल और चौथा आता है मिलीजिया। तो सबसे पहले जब हम बात करते हैं काकस दल की तो यह एक ऐसी पार्टी है या
फिर ऐसी पार्टीज होती है जो स्पेसिफिक पीपल की पार्टी होती है जो केवल इलेक्शन के दौरान ही एक्टिव रहती है और इसका बेस्ट
एग्जांपल है यूएसए और इसी आधार पर आलमन ने यूएसए के संदर्भ में स्लीपिंग डॉग्स थ्योरी दी थी। दूसरा है ब्रांच दल। तो यह
बेसिकली मास पार्टी होती है जो कि यह लक्ष्य रखती है कि अधिक से अधिक मेंबरशिप हो यानी कि अधिक से अधिक लोग जुड़े और यह
हमेशा एक्टिव रहती है और इसका जो एग्जांपल है वह है इंडिया एंड ब्रिटेन। तीसरा है सेल दल। तो बेसिकली जो सेल दल होता है यह
यूनाइट करता है ऑल पार्टी वर्कर्स और इसके मेंबर्स। और यह जो फार्मर्स होते हैं, वर्कर्स होते हैं, उनके सपोर्ट पर यह
ध्यान देता है। और इसका जो बेस्ट एग्जांपल है, वह है कम्युनिस्ट पार्टीज। और वहीं चौथा है मिलीजिया। तो यह एक प्रकार से
प्राइवेट आर्मी के जो मेंबर्स होते हैं उनको एनरोल करता है। उनको अपने साथ जोड़ता है। जैसे कि मिलिट्री लाइंस पे होता है।
आप इसके नाम से भी इसका पता लगा सकते हैं। तो इसके एग्जांपल है नाज़ पार्टी जर्मनी में रेड आर्मी माओ की और वहीं स्टम
ट्रूप्स हिटलर के। तो यह इसके बेस्ट एग्जांपल्स हैं। एरिया के आधार पर मॉरिस डवर्जन ने दो प्रकार की पॉलिटिकल पार्टीज
की क्लासिफिकेशन की है। जिनमें पहली आती है कैडर पार्टी और दूसरी आती है मास पार्टी। जब हम बात करते हैं कैडर पार्टी
की तो यह बेसिकली एक पार्टी ऑफ नोवेल्स है। यानी कि जो नोवेल पीपल है उनकी पार्टी है जो कि चॉइस में बिलीव करती है। इलेक्शन
में बिलीव नहीं करती है। और इसको गाइडेड किया जाता है जो इलीट प्रोफेशनल्स होते हैं उनके द्वारा और यह केवल इलेक्शन में
ही एक्टिविज्म करती है और आईडियोलॉजी की इसमें रहती है। और खास बात यह है कि जो यूनिवर्सल सफेस था उससे पहले यह पाई जाती
थी। यानी कि जो 19 सेंचुरी है उससे पहले यह पाई जाती थी। और दूसरी बात यह है कि इसको जाना जाता है इलीट एंड कैकस पार्टी
के रूप में। और मॉरिस डबर्जन ने इसे कहा है बिग एक्सप्रेशन यानी कि जो कमजोर अभिव्यक्ति है उसको इन्होंने कैडर पार्टी
के रूप में देखा है। और इसके अगर हम एग्जांपल्स की बात करें तो इसमें एग्जांपल हैं ब्रिटिश एंड कनाडियन कंजर्वेटिव
पार्टीज। वहीं नेजी पार्टीज, फासिस्ट पार्टीज, लेफ्टिस्ट एंड यूएस जो पॉलिटिकल पार्टीज है उनको भी हम कैडर पार्टी के रूप
में जानते हैं। वहीं दूसरी तरफ जब हम बात करते हैं मास पार्टी की तो यह पार्टी ऑफ़ द पीपल है यानी कि लोगों की पार्टी है और
दूसरी बात यह है कि यह इलेक्शन में विश्वास रखती है चॉइस में नहीं। और इसमें व्यापक मात्रा में मेंबरशिप होती है और
लोगों की इसमें पार्टिसिपेशन होती है हमेशा होती है और हायर पीपल पार्टिसिपेशन होती है। लोगों का एक्टिविज्म होता है और
इसी वजह से डवर्जन ने मास पार्टी को कहा है स्ट्रांग एक्सप्रेशन यानी कि ताकतवर अभिव्यक्ति कहा है। और अगर हम इसके
एग्जांपल्स देखें तो आईएसी इंडिया में जो आजादी के बाद रही है। शुरू के दो-तीन दशक में रही है। और लेबर पार्टी इन यूके को जो
है हम मास पार्टी कह सकते हैं। मॉरिस डबरजर ने पॉलिटिकल पार्टीज को डिफाइन करते हुए कहा है कि पॉलिटिकल पार्टीज एक ऐसे
ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप होते हैं जिनका प्रमुख उद्देश्य पॉलिटिकल सिस्टम के अंतर्गत पावर को एक्सरसाइज करना है। उसको अचीव करना है।
यानी कि पावर को प्राप्त करना है और उसका प्रयोग करना है। जिसे इन्होंने पॉलिटिकल पार्टीज कहा है। पॉलिटिकल पार्टीज के अगले
थिंकर का नाम आता है जियोबेनी सटोरी। तो जब हम बात करते हैं सटोरी की तो यह एक इटालियन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं।
जिन्होंने कई चीजों जैसे कि डेमोक्रेसी, पॉलिटिकल पार्टीज, कंपैटिव पॉलिटिक्स के ऊपर काफी काम किया। इनकी काफी
स्पेशलाइजेशन रही है। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जिनमें पहला आता है पार्टीज एंड पार्टी सिस्टम, अ
फ्रेमवर्क ऑफ एनालिसिस। दूसरा वर्क आता है डेमोक्रेटिक थ्योरी। अगला वर्क आता है द थ्योरी ऑफ डेमोक्रेसी रिवजिटेड। और अगला
वर्क आता है द टाइपोलॉजी ऑफ पॉलिटिकल सिस्टम। तो यह इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जिनको आपको अच्छे से नोट करना है।
जियोबेनी सार्टोरी ने एक इंपॉर्टेंट थ्योरी दी जिसे कि स्पेशल थ्योरी कहा जाता है। तो जब हम बात करते हैं स्पेशल थ्योरी
की तो यह एक प्रकार से वोटिंग की एक ऐसी थ्योरी है जो इस बात की वगारत करती है या फिर इस विचार पर आधारित है कि लोग जो वोट
देते हैं वे सेल्फ इंटरेस्टेड चॉइस के आधार पर वोट देते हैं। यानी कि उनकी अपनी इच्छा होती है। और इसमें दूसरी बात यह है
कि वोटर्स जो होते हैं वे अपना वोट इस आधार पर कास्ट करते हैं, देते हैं कि जो एक कैंडिडेट होते हैं या फिर जो पॉलिटिकल
पार्टी होती है उनका इवैल्यूएशन करते हैं कि उनकी क्या एप्रोच है? उनकी क्या स्किल है? उनका मैनिफेस्टो क्या है? उनकी
पॉलिसीज क्या-क्या है? तो उसके आधार पर ही जो है वह अपना वोट कास्ट करते हैं। सारोरी ने अपनी प्रमुख कृति द टाइपोलॉजी ऑफ
पार्टी सिस्टम में पॉलिटिकल पार्टीज को क्लासिफिकेशन दिया है तीन आधारों पर। अर्थात इन्होंने तीन आधारों पर पॉलिटिकल
पार्टीज की क्लासिफिकेशन की बात की है। जिनमें पहली आती है नंबर ऑफ पॉलिटिकल पार्टीज यानी कि किसी देश की दलीय
व्यवस्था में कौन-कौन सी या कितनी मात्रा में पार्टीज पाई जाती है? एक दो तीन या इससे अधिक। दूसरा है आइडियोलॉजी ऑफ़
पॉलिटिकल पार्टीज़। यानी किसी देश की जो दलीय व्यवस्था है वहां पर जो पॉलिटिकल पार्टीज है उनकी विचारधाराएं क्या है?
क्या राइटिस्ट है, लेफ्टिस्ट है या फिर सेंट्रिस्ट है? वहीं तीसरे प्रकार का जो क्लासिफिकेशन है वह है द अमाउंट ऑफ
फ्रेगमेंटेशन इन द पार्टीज। यानी कि जो पार्टीज होती है उसमें जो फ्रेगमेंटेशन होता है, विखंडन होता है, उसकी मात्रा
कितनी है? वहीं दूसरी तरफ सटोरी ने पार्लियामेंट्री सिस्टम में जो मल्टी पार्टी सिस्टम है
उसको दो आधारों पर क्लासिफाइड किया है और इसके लिए इन्होंने वेस्टर्न यूरोप का रेफरेंस दिया है। तो इनमें दो प्रकार की
है जिनमें पहली है मॉडर्न प्लूरलिस्टिक सिस्टम। वहीं दूसरा है पोलराइज्ड प्लूरलिस्टिक सिस्टम। तो जब हम बात करते
हैं मॉडर्न प्लूरलिस्टिक सिस्टम की तो इसमें यह देखा जाता है कि जो पॉलिटिकल पार्टीज होती है वह बड़ी संख्या में होती
है। दूसरा पॉइंट यह है कि फॉर्मेशन ऑफ स्टेबल गवर्नमेंट्स बाय म्यूचुअल एग्रीमेंट्स। तो इसमें क्या होता है कि
स्टेबल गवर्नमेंट की स्थापना की जाती है पार्टीज के द्वारा आपस में म्यूचुअल एग्रीमेंट के द्वारा। और खास बात यह है कि
इसमें पब्लिक इंटरेस्ट पहले आता है और पार्टी जो इंटरेस्ट है वह बाद में आता है और लैक ऑफ आईडियोलॉजिकल फनेटिसिज्म इसमें
देखा जाता है। यानी कि जो एक वैचारिक कट्टरता होती है इसकी इसमें कमी पाई जाती है। वहीं दूसरी तरफ पोलराइज्ड
प्लुरलिस्टिक सिस्टम में अगर हम देखें तो इसमें दो राजनीतिक दल होते हैं मुख्यत और छोटे-छोटे दूसरे दल होते हैं। और खास बात
यह है कि इसमें इनस्टेबल गवर्नमेंट्स पाई जाती है क्योंकि इसमें कोई म्यूचुअल एग्रीमेंट नहीं होता है पॉलिटिकल पार्टी
के बीच और खास बात यह है कि इसमें पार्टी पहले आती है और जो पब्लिक इंटरेस्ट है वह बाद में आता है और इसमें आइडियोलॉजिकल
फनेटिसिज्म पाया जाता है यानी कि इसमें वैचारिक कट्टरता पाई जाती है क्योंकि इसमें प्रमुखतया दो दल होते हैं जिनके बीच
वैचारिक लड़ाई होती है। वहीं दूसरी तरफ़ जोसेफ लॉ कोलंबरा एंड मायरन विनर ने भी पॉलिटिकल पार्टीज के ऊपर काफ़ी काम किया।
इन्होंने संयुक्त रूप से एक इंपॉर्टेंट बुक लिखी जिसका नाम है पॉलिटिकल पार्टीज एंड पॉलिटिकल डेवलपमेंट जिसमें इन्होंने
टू टाइप्स ऑफ पॉलिटिकल पार्टीज एंड कंपेटिव सिस्टम की बात की। तो, यह दो प्रकार से हैं। पहला है टर्नओवर एंड
हैज़मोनिक। टर्नओवर एंड हैेजेमनिक पार्टी ऐसी होती है जिनकी पूरी सोसाइटी में दबदबा होता है जहां पर ओपन कंपेरेटिव सिस्टम
नहीं पाया जाता है और कोई विरोधी दल नहीं पाया जाता है। एग्जांपल के लिए नाजी, फासिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी
इसमें शामिल होती है। वहीं दूसरी तरफ आईडियोलॉजिकल एंड प्रगमेटिक पार्टी ऐसी होती है जिनकी विशेष विचारधारा होती है जो
व्यवहारिकता पर बल देती है। यहां पर ओपन कंपेरेटिव सिस्टम पाया जाता है। यानी कि पॉलिटिकल पार्टीज आपस में खुले रूप में
प्रतियोगिता करती है और यह जो डेमोक्रेटिक या फिर पार्लियामेंट्री सिस्टम जहां पर होता है वहां पर अधिकतर देखी जाती है।
जैसे कि यूके में, यूएसए में, इंडिया में। पॉलिटिकल पार्टीज के अगले थिंकर का नाम है गैब्रियल आलमंड। तो गैब्रियल आलमंड ने
अपनी प्रमुख कृति पॉलिटिक्स ऑफ डेवलपिंग एरियाज में चार प्रकार की पॉलिटिकल पार्टीज के बारे में बात की है। जिनमें
पहली आती है एथॉरिटेरियन पार्टी सिस्टम। तो यह एक ऐसे प्रकार का पार्टी सिस्टम होता है जहां पर पूरी अथॉरिटी एक ही
पार्टी के हाथ में होती है और कोई भी विरोधी दल नहीं पाया जाता है और पूरे सोसाइटी में एक ही पार्टी का कंट्रोल होता
है। एग्जांपल के लिए कम्युनिस्ट पार्टी, नाजी पार्टी और फासिस्ट पार्टी। वहीं दूसरे प्रकार का पार्टी सिस्टम है
डोमिनेंट नॉन अथॉरिटेरियन पार्टी सिस्टम। यहां पर डेमोक्रेटिक रिजीम होते हुए भी बहुत सारी पार्टीज पाई जाती है। लेकिन एक
ही पार्टी का दबदबा होता है, डोमिनेंस होता है। जैसे कि इंडिया में पोस्ट इंडिपेंडेंस कांग्रेस सिस्टम पाया जाता
था। जिसको कि रजनी कोठारी ने कहा था। यानी कि कांग्रेस पार्टी का ही दबदबा था जिसे मॉरिस जों्स ने वन डोमिनेंस पार्टी सिस्टम
कहा। वहीं तीसरा है कंपिटिटिव टू पार्टी सिस्टम। इसमें दो ही दल प्रमुखता पाए जाते हैं किसी भी देश में और उनकी ही लड़ाई
होती है सत्ता की प्राप्ति के लिए। एग्जांपल के लिए यूएसए में डेमोक्रेटिक एंड रिपब्लिकन पार्टी। वहीं यूके में लेबर
पार्टी एंड कंजर्वेटिव पार्टी। वहीं अगला है कंपिटिटिव मल्टी पार्टी सिस्टम। यह ऐसा सिस्टम होता है जहां पर बहुत सारी यानी कि
बहुदलीय प्रणाली होती है। बहुत सारे दल आपस में सत्ता की प्राप्ति के लिए लड़ते हैं। पॉलिटिकल पार्टीज के अगले स्कॉलर का
नाम है एलएन आर बॉल। तो एलएन आर बॉल ने अपनी प्रमुख कृति ब्रिटिश पॉलिटिकल पार्टीज द इमरजेंस ऑफ मॉडर्न पॉलिटिकल
पार्टीज में सात प्रकार की पॉलिटिकल पार्टीज की बात की है। जिनमें पहली आती है अनक्लियर टू पार्टी सिस्टम। यानी कि यहां
पर दो दल तो होते हैं, लेकिन इसके साथ-साथ दूसरे भी छोटे-मोटे दल होते हैं। जिसकी वजह से इसको अनक्लियर टू पार्टी सिस्टम
कहा जाता है। वहीं अगला है क्लियर टू पार्टी सिस्टम। यानी कि जहां पर क्लियर जो है यानी कि साफ-साफ दो दल दिखाई पड़ते
हैं। जैसे कि यूएसए में डेमोक्रेटिक एंड रिपब्लिकन पार्टी है। वहीं अगला है वर्किंग मल्टी पार्टी सिस्टम। यानी कि
जहां पर बहुत सारे दल काम करते हैं। जैसे इंडिया में हमने देखा। वहीं अगला है अनस्टेबल मल्टी पार्टी सिस्टम। यानी कि
किसी एक ऐसे देश में जहां पर राजनीतिक दल तो बहुत ज्यादा पाए जाते हैं लेकिन अस्थिर सरकारें बनती है। यानी कि वहां पर
पॉलिटिकल स्टेबिलिटी नहीं रहती है। जैसा कि इंडिया में हमने 1990 के डिकेट में देखा था। वहीं अगला है इफेक्टिव पार्टी
सिस्टम। इसमें जो पार्टीज़ होती हैं, चाहे द्विदलीय हो या फिर बहुदलीय हो। यहां पर इफेक्टिव सरकार बनती है। यानी कि यहां पर
लोग पार्टिसिपेट करते हैं। स्थिर सरकारें बनती है। और अगला है वन पार्टी सिस्टम यानी कि जहां पर केवल एक ही दल पाया जाता
है। विरोधी दल नहीं होते हैं। जैसा कि कम्युनिस्ट रिजीम में होता है। यानी कि कम्युनिस्ट पार्टी इसका एग्जांपल हो सकता
है। वहीं अगला है टोटलिटेरियन पार्टी सिस्टम। यानी कि जहां पर दल का संपूर्ण नियंत्रण होता है। इसमें नाजी पार्टी या
फिर फास्टिस्ट रिजीम में जो फास्टिस्ट पार्टी है उसको हम इसमें रख सकते हैं। पॉलिटिकल पार्टीज के अगले स्कॉलर का नाम
है जीन ग्लडेल। तो इन्होंने अपनी प्रमुख कृति पिटिकल पार्टीज अ जेन्युइन केस फॉर डिस्कंटेंट जो कि 1978 में पब्लिश होती
है। इसमें इन्होंने फाइव टाइप्स ऑफ पॉलिटिकल पार्टीज की बात की है। जिनमें पहली आती है वन पार्टी सिस्टम यानी कि
जहां पर केवल एक ही दल पाया जाता है। कोई विरोधी दल नहीं पाया जाता है। जैसे कि कम्युनिस्ट टूरिज्म में कम्युनिस्ट पार्टी
होती है। वहीं दूसरा है टू पार्टी सिस्टम यानी कि जहां पर दो दलीय व्यवस्था पाई जाती है। जैसे कि यूके में या फिर यूएसए
में। वहीं तीसरा है 2 एंड हाफ पार्टी सिस्टम। इसमें क्या होता है कि टू पार्टी तो मेजरली इसमें डोमिनेट करती है पार्टी
सिस्टम को। लेकिन तीसरी जो पार्टी होती है उसका रोल भी काफी ज्यादा होता है क्योंकि कभी कबभार वो भी बहुत ज्यादा सीट्स को गेन
कर लेती है। इसीलिए इसको 2 एंड हाफ पार्टी सिस्टम कहा जाता है। जैसा कि जीन ब्लंड ने जर्मनी की जो दलीय व्यवस्था है उसको 2 एंड
हाफ पार्टी सिस्टम कहा है। और नोट करने वाली बात यह है कि कभी कबभार यूएसए की जो पार्टी सिस्टम है उसको भी टू एंड हाफ
पार्टी सिस्टम कहते हैं। वहीं अगली है वन पार्टी डोमिनेंस यानी कि जहां पर बहुत सारे दल होते हैं लेकिन एक ही दल का
प्रभुत्व होता है, डोमिनेंस होता है। जैसा कि हमने इंडिया में पोस्ट इंडिपेंडेंस में देखा था जहां पर कांग्रेस पार्टी की ही
हैज़मोनी थी, डोमिनेंस था। और अगला है इवन मल्टी पार्टी सिस्टम। इसमें यह होता है कि दल तो बहुत सारे होते हैं लेकिन इसमें यह
होता है कि जितने भी दल है उनके समान आइडियोलॉजिकल व्यूज होते हैं। ओरिएंटेशन होता है। यानी कि जो पॉलिटिकल ओरिएंटेशन
है वो एक समान होता है। उनकी वैल्यूस उनके नॉर्म्स एक समान होते हैं। एटीट्यूड एक समान होता है। उनका जो मैनिफेस्टो है वो
भी एक समान होता है। यानी कि कोई ज्यादा आईडियोलॉजिकल डिफरेंस नहीं होते हैं। तो इसको इवन मल्टी पार्टी सिस्टम कहा जाता
है। अगले स्कॉलर का नाम है ऑटो क्रिरचाइमर। तो जब हम बात करते हैं ऑटो किरचाइमर की तो यह जर्मन जरिस्ट रहे हैं
जो कि जस एनसेेस्टर रहे हैं। यानी कि जस वंश के यह रहे हैं। और यह पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं फ्रैंकफुट स्कूल के।
जहां पर इन्होंने स्टेट थ्योरी और कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म और पॉलिटिकल पार्टीज पे काफी काम किया था।
इन्होंने एक कोट दी जिसमें इन्होंने कहा है कि आफ्टर द सेकंड वर्ल्ड वॉर द आइडियोलॉजिकल एंड थ्योरिटिकल डिवीजन अमंग
ऑल पार्टीज इन यूरोप इज बिकमिंग मिनिमल पार्टीज आर गिविंग अप आइडियोलॉजिकल टिकेटोरी टू अट्रैक्ट मोर एंड मोर वोटर्स।
तो बेसिकली इसमें यह कह रहे हैं कि यूरोपियन जो कंट्रीज है वहां पर सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद पॉलिटिकल पार्टीज के
बीच जो आईडियोलॉजिकल एंड थ्योरिटिकल डिवीजन है वो खत्म हो गए हैं। बहुत कम हो गए हैं। और ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि
वहां की जो पॉलिटिकल पार्टीज है लोगों को लुभाने के लिए अधिक से अधिक वोटर्स को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए जो एक
वैचारिक मतभेद होता है उसको त्याग रहे हैं। नोट करने वाली बात यह है कि ऑटो किरचाइमर ने एक इंपॉर्टेंट शब्दावली को
कॉइं किया था जिसका नाम है कैचोल पार्टीज। तो जब हम बात करते हैं कैचोल पार्टी की तो यह एक प्रकार की ऐसी पार्टीज होती है जो
यह कोशिश करती है कि समाज के सभी सेक्शन या फिर क्लास से अधिक से अधिक वोटर्स को प्राप्त किया जाए। यानी कि वोटर्स का
सपोर्ट लिया जाए और अधिक से अधिक वोट्स प्राप्त किए जाए। तो इस प्रकार से इस थ्योरी को विग टेंट थ्योरी भी कहा जाता
है। आपने इंडिया के संदर्भ में सुना ही होगा कि आईएसी को शुरू-शुर में पामर और पार्केंस ने अंब्रेला ऑर्गेनाइजेशन कहा
था। क्योंकि कांग्रेस के साथ उस समय विभिन्न धर्मों, विभिन्न जातियों के लोग जुड़े थे। विभिन्न वर्गों के लोग जुड़े
थे। तो इस वजह से उसको भी अंब्रेला ऑर्गेनाइजेशन कहा जाता था। अगले स्कॉलर का नाम आता है सिगमंड न्यूमेन। तो सिगमैन
न्यूमेन एक जर्मन पॉलिटिकल फिलॉसोफर रहे हैं, साइंटिस्ट रहे हैं और सोशियोलॉजिस्ट रहे हैं। और खास बात यह है कि इन्होंने
पॉलिटिकल पार्टीज की जो बात की है, उसमें इन्होंने दो तरह की पॉलिटिकल पार्टीज की बात की है। जिनमें पहली आती है
रिप्रेजेंटेशनल पार्टीज। इसकी खास बात यह है कि यह केवल इलेक्शन के टाइम ही एक्टिव रहती है और इसमें डिस्क्लोज़र ऑफ पब्लिक
ओपिनियन होता है। यानी कि लोगों को इसमें राय देने का ज्यादा कोई अवसर नहीं होता है। एग्जांपल के लिए यूएसए हैं। वैसे भी
यूएसए के संदर्भ में आलमंड ने एक इंपॉर्टेंट थ्योरी दी थी जिसका नाम है स्लीपिंग डॉग्स थ्योरी और इसके जो की
सपोर्टर रहे हैं वह है श्रमपेटर डाहल एंड एंथोनी डाउंस। वहीं दूसरी तरफ जब हम बात करें इंटीग्रेटेड पार्टीज की तो इसकी खास
बात यह है कि यह ऑलवेज एक्टिव रहती है इलेक्शंस में। यानी कि कुछ समय के लिए यह एक्टिव ना रहकर हमेशा एक्टिव रहती है और
इसमें पब्लिक ओपिनियन को अधिमान दिया जाता है। यानी कि क्रिएशन ऑफ पब्लिक ओपिनियन होता है। एग्जांपल के लिए इंडिया और
ब्रिटेन इसके बहुत बड़े एग्जांपल माने जाते हैं। यानी कि इंडिया में इंटीग्रेटेड जो पार्टीज है उस तरह के लक्षण दिखाई देते
हैं। वहीं दूसरी तरफ कारस्ट्रोम ने भी तीन प्रकार की पॉलिटिकल पार्टीज के बारे में बात की है। यानी कि तीन आधारों पर तीन
प्रकार की पॉलिटिकल पार्टीज होती है। जैसे पहली है ऑफिस सीकिंग यानी कि ऐसी पॉलिटिकल पार्टीज जो हमेशा प्रयास करती है कि
उन्हें ऑफिस मिले यानी कि राजगद्दी मिले। दूसरी है वोट सीकिंग यानी कि ऐसी पार्टी जो अधिक से अधिक वोट प्राप्त करना चाहती
है और तीसरी जो पॉलिटिकल पार्टीज है वह ऐसी है जो सत्ता में आने के बाद पॉलिसी बनाना चाहती है यानी कि पॉलिसी का निर्माण
करना चाहती है। लोगों के लिए सुविधाएं पॉलिसीज देना चाहती है बनाना चाहती है। अगले इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम आता है
कार्ड्स एंड मेयर। तो जब हम बात करते हैं कार्ड्स एंड मेयर की तो इन्होंने अपने प्रमुख एस्स जिसका नाम है चेंजिंग मॉडल्स
ऑफ पार्टी ऑर्गेनाइजेशन एंड पार्टी डेमोक्रेसी द इमरजेंस ऑफ द कार्टल पार्टी जो कि 1995 में पब्लिश होती है। इसमें
कार्ड्स और मेयर ने एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया जिसका नाम है कार्टल पार्टी और इन्होंने इस कृति में चार प्रकार की
पॉलिटिकल पार्टीज के बारे में जिक्र किया है। जिनमें पहली आती है इलीट पार्टी। दूसरी आती है मास पार्टी। तीसरी आती है
कैच ऑल पार्टी और चौथी आती है कार्टल पार्टी। तो अब हम एक-एक करके इन चार प्रकार की पार्टीज को अच्छे से समझने की
कोशिश करते हैं। पहली प्रकार की पॉलिटिकल पार्टी आती है इलीट पार्टी। तो इसकी जब हम बात करते हैं तो इसका उद्भव होता है 19
सेंचुरी में। और राइट टू सफरस की अगर हम बात करें तो इसमें किसी भी प्रकार का कोई मताधिकार नहीं था लोगों को। और खास बात यह
है कि इसमें जो पॉलिटिकल डिस्ट्रीब्यूशन है वह हाईली रेस्ट्रिक्ट होते थे। लोगों को किसी भी तरह से पार्टिसिपेशन या
ओपिनियन रखने की आजादी नहीं थी। अगर हम बात करें पॉलिटिक्स के प्रिंसिपल गोल की तो इसमें डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ प्रिविलजेस
था। यानी कि जो इलीट लोग थे उनको ही विशेषाधिकार थे। बेसिस ऑफ़ पार्टी कंपटीशन की अगर हम बात करें तो इसमें एस्क्राइब्ड
स्टेटस था। यानी कि जो इलीट पार्टी के लोग हैं उनका ही स्टेटस था। और अगर हम इलेक्शन कंपटीशन के पैटर्न की बात करें तो यह
मैनेज था। यानी कि इलीट पार्टी के द्वारा ही मैनेज्ड किया जाता था। लोगों तक इसकी कोई पहुंच नहीं थी। अगर हम बात करें
कैरेक्टर ऑफ मेंबरशिप की तो स्माल था, इलिटिस्ट था क्योंकि यह इलीट लोगों की ही पार्टी थी और पार्टी चैनल ऑफ कम्युनिकेशन
की बात करें तो इसमें इंटरपर्सनल नेटवर्क होता था। यानी कि लोगों तक किसी भी प्रकार के कम्युनिकेशन की पहुंच नहीं थी। केवल
इलीट लोग ही आपस में कम्युनिकेशन करते थे। पार्टिसिपेशन करते थे। और अगर बात करें हम रेप्रेजेंटेटिव स्टाइल की तो यह ट्रस्टी
के रूप में भूमिका निभाती थी। क्योंकि इसका कोई विशेष या फिर गहन रूप से कोई क्षेत्र या फिर ऐसा दायरा नहीं था जहां पर
लोगों की पहुंच हो सके। लोग एक्सेस कर सके चीजों को लोग पार्टिसिपेट कर सकें। दूसरे प्रकार की पॉलिटिकल पार्टी आती है मास
पार्टी। तो इसका जो इमरजेंस है वह होता है 1880 से 1960 के बीच में। अगर हम बात करें राइट टू सफरस की तो इसमें लोगों को
एनफ्रेंचाइजमेंट और मास सफर जरूर दिया गया था। और अगर हम बात करें डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ पॉलिटिक्स यानी कि पॉलिटिकल जो
पार्टिसिपेशन तो इसमें जरूर लोगों को पार्टिसिपेशन के अधिकार दिए गए थे। प्रिंसिपल गोल ऑफ अगर पॉलिटिक्स की अगर हम
बात करें तो इसमें सोशल रिफेशन था और बेसिस ऑफ़ पार्टी कंपटीशन की अगर हम बात करें तो रिप्रेजेंटेटिव कैपेसिटी थी और
वहीं पैटर्न ऑफ़ इलेक्ट्रोल कंपटीशन की बात करें तो मोबिलाइज़ेशन थी। यानी कि लोग इसमें काफ़ी हद तक जुड़ते थे। पूरे के पूरे
जो लोग हैं सोसाइटी में अधिक से अधिक जुड़ते थे। और अगर हम बात करें कैरेक्टर ऑफ मेंबरशिप की तो इसमें जो मेंबरशिप है
वह लार्ज मात्रा में थे। होमोजनियस जो पीपल है वह काफी मात्रा में जुड़े होते थे। और पार्टी चैनल ऑफ कम्युनिकेशन की अगर
हम बात करें तो यह जो कम्युनिकेशन का चैनल है लोगों को यह प्रोवाइड करता था। यानी कि लोग भी पार्टिसिपेट कर सकते थे।
कम्युनिकेट कर सकते थे। अपने विचार रख सकते थे। और अगर हम बात करें रिप्रेजेंटेटिव स्टाइल की तो यह डेलीगेट
था। यानी कि यहां पर जो लोग हैं वह मिलते थे, बैठ के करते थे। अपना जो प्रतिनिधि है इसमें चुनते थे। अगले प्रकार की पॉलिटिकल
पार्टी आती है कैचल पार्टी की। तो जब हम बात करते हैं कैचल पार्टी की तो इसका उद्भव होता है पोस्ट 1945।
और अगर हम बात करें इसके राइट टू सफरस की तो इसमें लोगों को जरूर मताधिकार दिया गया था। लेवल ऑफ डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ़ पॉलिटिकली
रेस्ट्रिक्टेड की अगर हम बात करें तो लेस कंसंट्रेटेड थी। यानी कि इसमें पॉलिटिकल रेस्ट्रिक्शन जो है वह बहुत कम थी। नाम
मात्र थी और वहीं अगर बात करें हम प्रिंसिपल गोल ऑफ पॉलिटिक्स की तो सोशल एमलरेशन थे। यानी कि समाज के जो विभिन्न
वर्ग है वहां तक इसकी पहुंच होना। बेसिस ऑफ पार्टी कंपटीशन की अगर हम बात करें पॉलिसी इफेक्टिवनेस थी। पैटर्न ऑफ
इलेक्ट्रोरल कंपटीशन की अगर हम बात करें तो बड़ी मात्रा में यहां पर कंपटीशन होता था। कैरेक्टर ऑफ़ मेंबरशिप की अगर बात करें
तो ओपन टू ऑल था एनकरेज था। यानी कि यहां पर सभी लोग जो है वह जुड़ सकते थे। सभी लोग पॉलिटिकल पार्टी से जुड़ सकते थे।
पार्टी चैनल ऑफ कम्युनिकेशन की बात करें तो पार्टी कमट्स फॉर एक्सेस टू नॉन पार्टी चैनल्स ऑफ कम्युनिकेशन। यानी कि इसमें
कम्युनिकेशन बड़ी मात्रा में था। पार्टीज जो है वह कम्युनिकेट कर सकती थी लोग और लोग भी पार्टी के साथ कम्युनिकेशन के
द्वारा जुड़ सकते थे। पार्टिसिपेशन कर सकते थे। और अगर हम बात करें रिप्रेजेंटेटिव स्टाइल तो इसका जो
रिप्रेजेंटेटिव स्टाइल था वो एंटरप्रेन्योर था यानी कि उद्यमी के रूप में इसकी भूमिका थी क्योंकि यह समाज के
जितने भी वर्ग है चाहे वो कास्टेज हो चाहे वो क्लासेस हो उनको अपने साथ जोड़ने की बात करता है। नेक्स्ट टाइप की पॉलिटिकल
पार्टी आती है कार्टेल पार्टी। तो कार्ड्स एंड मेयर ने 2018 में अपनी एक बुक लिखी डेमोक्रेसी एंड द कार्टलाइजेशन ऑफ़
पॉलिटिकल पार्टीज। हालांकि इससे पहले 1992 में इन दोनों ने अर्थात कार्ड्स एंड मेयर ने जो शब्दावली है कार्टल पार्टी उसको कॉइ
किया था और खास बात यह है कि जो कार्टल पार्टी है उसको कंडक्ट किया जाता है प्रोफेशनल पॉलिटिशियंस जो कि एक व्यापारिक
संघ की तरह इसमें रोल प्ले करते हैं। यानी कि जो स्टेट का जो फाइनेंशियल सपोर्ट है या फिर जो स्टेट के रिसोर्सेज है उसके
द्वारा ही यह पार्टी चलाई जाती है। उसके द्वारा ही यह पार्टी अपनी एक्टिविटीज को करती है। और खास बात यह भी है कि यह फोकस
करती है कोऑपरेशन पर एंड कोजन पर ना कि कंपटीशन पर जिस तरह से मास पार्टी में किया जाता है। तो इसका मतलब यह है कि यह
जो कैचोल पार्टीज है उसका एक मॉडिफाइड फॉर्म है। एक इसका जो है एक अगला फॉर्म है। यानी कि कैचोल पार्टी जो थी उसको
रिफॉर्म करके इसको एक मॉडिफाई करके कार्टल पार्टी का कांसेप्ट कार्ड्स एंड मेयर के द्वारा दिया गया था। वैसे भी अगर हम
कार्ड्स एंड मेयर की बात करें तो इन्होंने यूरोपियन पार्टीज के बारे में कहा भी था कि वहां पर जो पॉलिटिकल पार्टीज में
पार्टिसिपेशन या फिर जो पॉलिटिकल एक्टिविटीज है वो डिक्लाइन हो रही है और जिस वजह से जो मास पार्टीज है उनका
रिलेवेंस कम हो रहा है। तो उस वजह से जो कार्टल पार्टी है वह एमर्ज हो रही है। तो कार्टल पार्टी के बारे में नोट करने वाली
बात यह है कि एक व्यवसायिक संघ की तरह काम करती है जो कि कंपटीशन में ज्यादा फोकस ना करके कोपरेशन या फिर कलज पर ज्यादा फोकस
करती है। पॉलिटिकल पार्टी के अगले थिंकर का नाम आता है लेनिन। तो लेनिन ने अपने प्रमुख वर्क जिसका नाम है व्हाट इज टू बी
डन जो कि 1902 में पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने कहा था कि आइडियोलॉजी जो है वह प्रोलिट्रेट
क्लास के लिए बहुत ही जरूरी है। क्योंकि आइडियोलॉजी प्रोलिट्रेट क्लास की मुक्ति के लिए और उनके गोल को अचीव करने के लिए
एक बहुत बड़ा टूल साबित हो सकता है। और इन्होंने फ़ेमसली कहा भी था कि प्रोलिट्रेट क्लास हैव टू नीड ऑफ़ कम्युनिस्ट
आईडियोलॉजी ऐज़ मच ऐज़ वर्जुआज़ हैव नीड टू कैपिटलिस्ट आईडियोलॉजीज़। तो इसमें बेसिकली ये कह रहे हैं कि जिस तरह से जो
कैपिटलिस्ट आईडियोलॉजी होती है, उसकी जरूरत वर्जुआ क्लास को पड़ती है, उसी तरह से जो कम्युनिस्ट आईडियोलॉजी है, उसकी
जरूरत पड़ती है प्रोलिट्रेट क्लास को। वहीं नोट करने वाली बात यह भी है कि लेनिन ने अपने 1905 के जो पार्टी ऑर्गेनाइजेशन
के जो कैंपेन था उसमें इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया जिसका नाम है डेमोक्रेटिक सेंट्रिसिज्म। तो इसमें
बेसिकली यह कहते हैं कि जो पार्टीज है या फिर पार्टी पॉलिटिक्स है वहां पर डेमोक्रेसी तो होगी लेकिन वहां पे क्योंकि
कम्युनिस्ट पार्टी का रोल होगा। इसीलिए वहां पे डेमोक्रेटिक सेंट्रिसिज्म होगा। यानी कि पार्टी का जो लीडर है वह चुना तो
लोगों के द्वारा पार्टी के अंदर चुना जाएगा। लेकिन वहां पर कम्युनिस्ट पार्टी का ही रोल होगा। यानी कि सभी मेंबर्स के
लिए कम्युनिस्ट पार्टी का जो ऑर्डर है या फिर आदेश है वह बाध्यकारी होगा। और दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि लेनिन ने रोल
ऑफ कम्युनिस्ट पार्टी की बात की है। इन्होंने कहा है कि जो कम्युनिस्ट पार्टी होगी उसका बहुत बड़ा रोल होगा। क्योंकि
कम्युनिस्ट पार्टी ही प्रोलिट्रेट क्लास के जो लोग हैं उनके अंदर एक क्लास कॉन्शियसनेस विकसित करेगी। इस प्रकार से
जो क्लास कॉन्शियसनेस है वो मार्क्स की तरह अंदर से नहीं आएगी बल्कि बाहर से आएगी और उसको बाहर से लाने का काम कम्युनिस्ट
पार्टी करेगी। कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर जो लीडर होंगे वे करेंगे। पॉलिटिकल पार्टीज के अगले स्कॉलर का नाम आता है
रॉबर्ट मिशल्स। तो रॉबर्ट मिशल्स जर्मन बोर्न इटालियन पॉलिटिकल स्कॉलर रहे हैं। पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। पॉलिटिकल
सोशियोलॉजिस्ट रहे हैं। जिन्होंने इललीट थ्योरी में काफी कंट्रीब्यूट किया और इन्होंने यह बताने का प्रयास किया कि जो
इंटेलेक्चुअल इलीट्स होते हैं उनका पॉलिटिकल बिहेवियर कैसा रहता है। और खास बात यह भी है कि यह इटालियन स्कूल ऑफ
इलिटिज्म से जुड़े रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कॉन्सेप्ट दिया जिसका नाम है आयरन लॉ ऑफ़
ओलिगार्की। तो इस लॉ में बेसिकली यह कहते हैं कि शासन का चाहे कोई भी रूप हो चाहे डेमोक्रेसी हो, मोनार्की हो,
एरिस्टोक्रेसी हो या फिर कोई भी फॉर्म ऑफ़ गवर्नमेंट हो, वहां पर केवल गिने-चुने लोगों का ही शासन रहता है। उनकी ही सत्ता
रहती है। और यह जो गिने-चुने लोग होते हैं, यह इलीट लोग होते हैं। पावरफुल लोग होते हैं। और इसी को इन्होंने आयरन लॉ ऑफ़
ओलिगा की कहा है और खास बात यह भी है कि इन्होंने अपना जो अध्ययन है यानी कि स्टडी है पॉलिटिकल पार्टीज की उसको करने के लिए
इन्होंने केस स्टडी की जर्मन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की। अब हम बात कर लेते हैं कि पॉलिटिकल पार्टीज के क्या-क्या
फंक्शनंस होते हैं। ऐसे कौन-कौन से कार्य हैं जो पॉलिटिकल पार्टीज करती है? तो इनमें पहला जो काम होता है वह यह होता है
कि पॉलिटिकल पार्टीज लोकमत का निर्माण करती है और लोगों के अंदर जो कॉन्शियसनेस होती है चेतना होती है यानी कि राजनीतिक
जो चेतना होती है जिसको हम पॉलिटिकल कॉन्शसनेस कहते हैं उसको विकसित करना होता है। दूसरा जो इसका काम होता है वो फाइट
इलेक्शंस होता है यानी कि चुनाव को लड़ना। तीसरा जो इसका काम होता है वह होता है हित समूहन यानी कि लोगों के जो हित होता है
उनको समझना है। उनको सरकार के सामने रखना होता है। वहीं अगला है पॉलिटिकल सोशलाइजेशन एंड मॉडर्नाइजेशन। यानी कि लोग
किस तरह से पॉलिटिकल नॉर्म्स को देखते हैं, वैल्यूज़ को देखते हैं या एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ग्रहण करते हैं। यह जो
भावना है, यह भी पॉलिटिकल पार्टीज ही पैदा करती है और साथ में जो पॉलिटिकल मॉडर्नाइजेशन है यानी कि चुनाव के नए-नए
तरीके हैं, पार्टिसिपेशन के नए-नए तरीके हैं, उसको भी लाना, उसके अंदर भी जागृति पैदा करना जो काम है वो पॉलिटिकल पार्टीज
ही करती है। वहीं इसका अगला जो काम है वो है रिक्रूटिंग पॉलीटिकल लीडर्स। यानी कि जो पॉलिटिकल लीडर्स होते हैं उनकी
नियुक्ति करना, उनको रिक्रूट करना भी पॉलिटिकल पार्टीज का ही काम है। वहीं इसका अगला जो काम है वो है फॉर्मेशन ऑफ
गवर्नमेंट यानी कि मेजॉरिटी करके लोगों का समर्थन प्राप्त करके सरकार की स्थापना करना भी इसका काम होता है। वहीं इसका जो
अगला काम होता है, वह होता है लिंक बिटवीन पीपल एंड गवर्नमेंट। यानी कि जो गवर्नमेंट है, जो ऐसे विपक्षी दल है, वे लोगों और
सरकार के बीच एक लिंक का काम करेगा, ब्रिज का काम करेगा। यानी कि जो सरकार की पॉलिसीज है वह लोगों तक पहुंचाने का काम
करेगा और जो लोगों की डिमांड है उनको गवर्नमेंट तक पहुंचाने का काम करेगा। तो यह है पॉलिटिकल पार्टीज के कुछ इंपॉर्टेंट
फंक्शनंस। वीओकी ने अपनी प्रमुख कृति जिसका नाम है पॉलिटिक्स पार्टीज एंड प्रेशर ग्रुप्स जो
कि 1964 में फिफ्थ एडिशन के रूप में पब्लिश होती है। उसमें इन्होंने पॉलिटिकल पार्टीज के तीन प्रमुख कार्य का जिक्र
किया। जिनमें पहला आता है पार्टी इन द इलेक्टोरेट, दूसरा आता है पार्टी इन गवर्नमेंट और तीसरा आता है पार्टी इन
ऑर्गेनाइजेशन की। तो जब हम बात करते हैं पार्टी इन इलेक्टोरेट की तो इसमें यह कहते हैं कि जो पार्टीज होती है उनका प्रमुख
कार्य चुनाव लड़ना होता है। चुनाव कैंपेन करना होता है और दूसरा है पार्टी इन गवर्नमेंट जिसमें कि पार्टीज इलेक्शन लड़
के सरकार बनाने का प्रयास करती है और कार्यपालिका के रूप में कार्य करती है। वहीं तीसरा है पार्टी इन ऑर्गेनाइजेशन।
इसमें यह एक ऑर्गेनाइजेशन के रूप में लोगों के लिए एक ओपिनियन का काम करती है। यानी कि पब्लिक ओपिनियन क्रिएट करती है।
लोगों को रिप्रेजेंट करती है। लोगों का जो हित समूहन है उसका प्रतिनिधित्व करती है और साथ में जो सिटीजंस हैं और गवर्नमेंट
है उनके बीच एक नेगोशिएशन एक कम्युनिकेशन चैनल के रूप में काम करती है। अब हम सबसे पहले बात कर लेते हैं इसके
हिस्टोरिकल बैकग्राउंड की। इसमें पहला नाम आता है संजू का। संजू चाइनीज़ जनरल, स्ट्रेटज़िस्ट, राइटर और फिलॉसोफर रहे हैं।
इनके बारे में खास बात यह है कि इनकी कृति द आर्ट ऑफ वॉर रही है जिसमें कुल मिला के 13 चैप्टर है जो कि मिलिट्री स्ट्रेटजी के
ऊपर बात करती है। दूसरा महत्वपूर्ण पॉइंट यह है कि यह महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है रियलिज्म के ऊपर जिसने अपनी छाप आईआर के
ऊपर भी छोड़ी। तो इसमें मिलिटरी स्ट्रेटजी के बारे में डिस्कस किया गया है। अगर आप बात करें सुजू को तो इसको क्लासिकल
रियलिस्ट थ्योरिस्ट के रूप में जाना जाता है। तो जितने भी सारे फैक्ट्स हैं आप इनको अच्छे से याद रखें। आपके एग्जाम के लिए
बेहद इंपॉर्टेंट है। दूसरे थिंकर का नाम इसमें आता है थसीडाइडस जो कि एथेनियन, हिस्टोरियन और जनरल रहे हैं। इनकी
महत्वपूर्ण कृति का नाम आता है द हिस्ट्री ऑफ द पेपोनेशियन वॉर। खास बात यह है कि यह रियलिज्म की महत्वपूर्ण कृति मानी जाती
है। अगर आप बात करें इस कृति के कंटेंट की तो इसमें इन्होंने स्पार्ट और एथेंस के बीच जो पेपनेशन वॉर हुआ था उसको डिस्कस
किया है। वहां पर युद्ध किस तरह से हुआ? उसकी स्ट्रेटजी क्या थी? वॉर क्या होता है? वॉर में किस तरह की स्ट्रेटजी होती
है? इन सभी चीजों को इसमें थूसी डाइडस ने डिस्कस किया है। अगर आप बात करें इनकी तो यह भी क्लासिकल रियलिस्ट थ्यरिस्ट रहे
हैं। की क्लासिकल थ्योरिस्ट माने जाते हैं रियलिज्म के। तीसरे थिंकर का नाम आता है कौटिल्य जिनको एंशिएंट इंडियन पॉलिटिकल
फिलॉसोफर, इकोनॉमिस्ट, पॉलिटिकल स्ट्रेटेजिस्ट और क्लासिकल रियलिस्ट थिंकर के रूप में जाना जाता है। इनके दो और नाम
है विष्णुगुप्त और चाणक्य। इनकी प्रमुख कृति रही है अर्थशास्त्र जो कि एक ट्रीटी मानी जाती है। एक ट्रिटाइज मानी जाती है
एंशिएंट इंडियन पॉलिटिकल थॉट के ऊपर, गवर्नेंस के ऊपर, एडमिनिस्ट्रेशन के ऊपर और फॉरेन पॉलिसी के ऊपर और यह मौर्यन
एंपायर के रॉयल एडवाइजर रहे हैं। खासतौर पे चंद्रगुप्त मौर्या के और इनकी एक प्रमुख थ्योरी रही है इंटरनेशनल रिलेशन
में जिसने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की जिसकी आज भी आईआर में वैल्यू मानी जाती है। उस थ्योरी का नाम है मंडला थ्योरी।
अगर आप मंडल थ्योरी की बात करें तो इन्होंने अर्थशास्त्र में इसको डिस्कस किया है और यह प्रोवाइड कराती है एक
स्ट्रेटेजिक फ्रेमवर्क फॉर इंटरनेशनल रिलेशंस। तो यह थ्योरी क्या है? इसको हम आगे आने वाले रियलिज्म लेक्चर में अच्छे
से डिस्कस करेंगे। वहीं दूसरी तरफ जर्मी बेंथम ने ही सबसे पहले इंटरनेशनल रिलेशंस शब्दावली को यूज़ किया था 1789 में। जब
1789 में इनकी प्रमुख कृति एन इंट्रोडक्शन टू द प्रिंसिपल्स ऑफ मोरल्स एंड लेजिसलेशन पब्लिश होती है। इससे भी महत्वपूर्ण बात
यह है कि जर्मी बेंथम इंग्लिश फिलॉसोफर रहे हैं। यह बात आपने नोट रखनी है और इन्होंने इसी कृति में 1789 में इंटरनेशनल
लॉ जो शब्दावली है इसको कॉइन किया था। तो यह फैक्ट भी आपने याद रखना है और इससे भी महत्वपूर्ण फैक्ट यह है कि ह्यूगोगशियस को
ही फादर ऑफ इंटरनेशनल लॉ के रूप में जाना जाता है। दोनों चीजों के बीच आपने कंफ्यूज नहीं करना है। अल्फर्ट जमरान का
कंट्रीब्यूशन बहुत ज्यादा रहा था फर्स्ट चेयर ऑफ आईआर को सेटअप करने में। इसीलिए यह ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बुड्रू
विल्सन चेयर ऑफ इंटरनेशनल पॉलिटिक्स एट द यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेल्स को होल्ड किया था। अगर हम बात करें इनकी कुछ और फैक्ट्स की
या कुछ और चीजों की तो इसमें पहला पॉइंट यह आता है कि अर्ली डेवलपमेंट जो आईआर का हुआ था उसके ये की फिगर माने जाते हैं
पर्टिकुलरली विद इन द आइडियलिस्ट स्कूल। तो यह पॉइंट आपने याद रखना है। इन्होंने इंटरनेशनल कोऑपरेशन रूल ऑफ लॉ न्यू वर्ल्ड
ऑर्डर को एस्टैब्लिश करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। और 1935 में इनकी एक पब्लिश होती है जिसका टाइटल था द लीग ऑफ
नेशंस एंड द रूल ऑफ लॉ। तो यह जितने भी सारे फैक्ट्स मैंने आपको बताए आप अच्छे से नोट कर लें। आइडियलिज्म के मेजर थिंकर्स
में पहला नाम आता है इमैनुअल कांट का जो कि जर्मन फिलॉसफर रहे हैं। खास बात यह है कि यह एनलाइटनमेंट थिंकर रहे हैं। तो
दोनों बातें आपने अच्छे से याद रखनी है। तीसरा पॉइंट इसमें यह आता है कि इमैनुअल कांट ने दो इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिए
जिसमें पहला इन्होंने यह दिया कि जो पीस होती है वह परपेचुअल होती है, स्थाई होती है। और दूसरा कासेप्ट इन्होंने
डेमोक्रेटिक पीस थ्योरी को दिया जो आगे चलकर माइकल डयोल जैसे आईआर के इंपॉर्टेंट थिंकर्स ने अडॉप किया। उसको आईआर में
दिया। अगर आप बात करें इनके वर्क्स की तो वैसे तो इनके बहुत सारे वर्क्स है लेकिन तीन इंपॉर्टेंट वर्क्स है जिसमें पहला
वर्क आता है क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन। दूसरा वर्क इसमें आता है व्हाट इज एनलाइटनमेंट। तीसरा वर्क आता है परपेचुअल पीस और
फिलोसोफिकल स्केच। तो यह तीनों वक्स आप अच्छे से याद रखें क्योंकि एग्जाम के लिए बेहद इंपॉर्टेंट है। इमैनुअल कांट का अगला
एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट आता है जो कि आइडियलिज्म से जुड़ा है और इस कांसेप्ट का नाम है ट्रांसिडेंटल आइडियलिज्म। तो अगर
आप बात करें ट्रांसिडेंटल आइडियलिज्म की। देखने में आपको लग रहा होगा कि यह बहुत कुछ बड़ा सा कांसेप्ट है जिसको आप समझ
नहीं सकते हैं। लेकिन यह बेहद आसान है। इसका मतलब यह है कि यह कहता है कि जो हमारे मन की जो अवधारणाएं हैं जो हमारे मन
में किसी चीज को लेके इमेज क्रिएट होती है। हमारे माइंड में जो स्ट्रक्चर्स बनते हैं उसी के द्वारा हम दुनिया को जान सकते
हैं। समझ सकते हैं। दूसरे शब्दों में आप यह भी कह सकते हैं कि कांट यह कहते हैं कि जो हम दुनिया को जानते हैं, वह सिर्फ और
सिर्फ हमारी माइंड की क्रिएशन होती है। माइंड के ऊपर डिपेंडेंट होती है। जिसको कि इन्होंने फेनोमिनल वर्ल्ड कहा। जिसके
अंतर्गत इमैनुअल कांट यह कहते हैं कि जो फेनोमिनल वर्ल्ड है उसको आप फिजिक्स के द्वारा समझ सकते हैं। लेकिन दूसरी तरफ यह
कहते हैं कि जो दूसरा वर्ल्ड है जिसको इन्होंने न्यूमोना कहा है यानी कि थिंग्स इन देमसेल्व कहा है उसको आप नहीं जान सकते
हैं क्योंकि वह हमारे माइंड से परे हैं। फिजिक्स से परे हैं। अगर आप उस वर्ल्ड को जानने की कोशिश करोगे तो भटकते रहोगे।
इसीलिए इस वर्ल्ड यानी कि न्यूमोना वर्ल्ड को जानने की जरूरत नहीं है। तो ये कांसेप्ट बेहद इंपॉर्टेंट है। हो सकता है
आपसे एग्जाम में यह पूछे कि ट्रांसिडेंटल आइडियलिज्म का कांसेप्ट किसने दिया? तो आप अच्छे से नोट करें क्योंकि ये बेहद
इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है। आई होप आपने ट्रांसिडेंटल आइडियलिज्म को समझ लिया होगा। इसमें यह भी कहते हैं इमैनुअल कांट
कि जो फेनोमिनल वर्ल्ड है उसको तो हम माइंड के द्वारा जान सकते हैं। माइंड के हिसाब से जो हमारे स्ट्रक्चर्स होते हैं
उस हिसाब से हम अंडरस्टैंड करते हैं। लेकिन जो रियल वर्ल्ड है जिसको इन्होंने न्यूमोना कहा है उसको हम इसलिए भी नहीं
जान सकते हैं क्योंकि हमारी जो नॉलेज है वह बेहद लिमिटेड होती है। इसीलिए हम इसको दूसरे प्रकार का जो वर्ल्ड है उसको हम
नहीं जान सकते हैं। अगर आप बात करें इसके सोर्सेस की तो एंड्र्यू हेवुड ने ग्लोबल पॉलिटिक्स में इमैनुअल कांड के बारे में
एक पैराग्राफ में इंपॉर्टेंट चीजों को मेंशन किया है। जिसमें इन्होंने यह कहा कि जो कांड का पॉलिटिकल थॉट है इसको शेप किया
जाता है। सेंट्रलेंस ऑफ मोरालिटी एंड इज़ क्लोजली एसोसिएटेड विद एनलाइटनमेंट थिंकिंग एंड यूनिवर्सलिस्ट क्लेम्स अबाउट
आवर राइट्स एंड ऑब्लिगेशंस। तो यह पॉइंट बेहद इंपॉर्टेंट है। साथ में यह बात भी इंपॉर्टेंट है कि इसी पैराग्राफ में सबसे
नीचे इन्होंने इमैनुअल कांड की राइटिंग्स को मेंशन किया है जो कि अगेन आपके एग्जाम के लिए बेहद इंपॉर्टेंट है। तो यह सारे
फैक्ट्स सारी चीजें आप याद रखें क्योंकि यह एग्जाम फैक्ट है और एग्जाम में यहां से क्वेश्चन बनता है। अगर आप बात करें दूसरे
सोर्स की तो इसमें जो स्टीव स्मिथ और वैलीज की जो किताब है द ग्लोबलाइजेशन ऑफ वर्ल्ड पॉलिटिक्स उसमें भी इन्होंने अच्छे
से मेंशन किया है कांड के बारे में इनके कुछ-कुछ इंपॉर्टेंट थॉट्स के बारे में। जैसे इन्होंने यह लिखा है कि जो कांड की
लिगेसी है उसको आगे बढ़ाया माइकल डयोल ने और इन्होंने इमैनुअल कांड की जो डेमोक्रेटिक पीस थ्योरी है इसको इन्होंने
आगे बढ़ाया और इसको रीयूज किया। तो इस तरह से आप देख सकते हैं कि कितनी इंपॉर्टेंट दोनों यह बुक्स है आपके एग्जाम के लिए।
अगले थिंकर का नाम आता है मार्क्यूस डी कंडोरसेट। तो यह इंटरनेशनल रिलेशंस में आइडियलिज्म के पाइनियर माने जाते हैं।
इनकी प्रमुख कृति का नाम था स्केच फॉर अ हिस्टोरिकल पिक्चर ऑफ द प्रोग्रेस ऑफ द ह्यूमन माइंड जो कि 1795 को पब्लिश हुई
थी। खास बात यह है कि इन्होंने इस कृति में एडवोकेट किया इकोनॉमिक फ्रीडम को, रिलीजियस टोलरेशन को, लीगल एंड एजुकेशनल
रिफॉर्म्स को और इससे भी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने इस कृति में स्लेवरी को एवोल्यूशन की बात की और वुमस सफरेज की बात
की। तो, आप देख सकते हैं कि इनके विचार उस समय भी कितने रेवोल्यूशनरी थे। अगर आप बात करें इसके रिसोर्सेज की तो आपको जो बेसिक
बुक है आपकी उसमें आपको इनके बारे में ज्यादा इंफॉर्मेशन नहीं मिलेगी। इसीलिए ब्रिटेनिका जो वेबसाइट है वहां पर आप इनके
बारे में पढ़ सकते हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपको और ज्यादा इंफॉर्मेशन गैदर करना है। आइडियलिज्म के अगले इंपॉर्टेंट थिंकर
का नाम आता है बुड्रो विल्सन। तो इनके बारे में खास बात यह है कि यूएस के 28थ प्रेसिडेंट रहे हैं 1913 से 1921 तक। तो
यह फैक्ट बेहद इंपॉर्टेंट है। आप इसको अच्छे से याद रखें। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि यूनाइटेड स्टेट्स में जो
प्रोग्रेसिव मूवमेंट हुआ था, उसके यह की फिगर माने जाते हैं और इनको याद रखा जाता है कि इनका जो टर्म था, वह तब हुआ था जब
दुनिया में फर्स्ट वर्ल्ड वॉर हुआ था। खास बात यह भी है कि इन्होंने फेडरल रिजर्व को यूएस में एस्टैब्लिश किया था और इन्होंने
लीग ऑफ नेशन को भी सपोर्ट किया था और 14 पॉइंट प्रोग्राम भी इन्होंने लाया था। तो यह जितनी भी सारी चीजें मैंने यहां पर
मेंशन की आपको बताई यह सारी की सारी चीजें आप याद रखें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बेहद इंपॉर्टेंट है। अगर आप बात करें इनके
वर्क्स की तो इनके वर्क्स भी रहे हैं जिसमें पहला वर्क आता है कांग्रेशनल गवर्नमेंट जो कि 1885 को पब्लिश हुई थी।
दूसरा इनका वर्क आता है अ हिस्ट्री ऑफ़ द अमेरिकन पीपल। 1902 को यह पब्लिश होती है। तीसरा इनका वर्क आता है द न्यू फ्रीडम
1913 को यह पब्लिश हुई थी। और चौथा वर्क आता है द स्टडी ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन जो कि इनका बेसिकली एक आर्टिकल था और यह 1887 को
यानी कि 1887 को पब्लिश हुआ था। यह पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के ऊपर लिखा गया एक महत्वपूर्ण वर्क माना जाता है। इसीलिए ना
केवल इस वर्क को बल्कि जो चारों वर्क स्क्रीन पर आपको दिखाई दे रहे हैं इनको आप अच्छे से नोट करें क्योंकि यहां से
क्वेश्चन बनता है। अब हम इनके बारे में कुछ और फैक्ट्स को देख लेते हैं विद रेफरेंसेस और सोर्सेस। तो इसमें पहला
पॉइंट यह आता है कि वुड्रो विल्सन यूएस के 28थ प्रेसिडेंट रहे थे। 1913 से 1921 इनका टर्म रहा था। इनका जन्म हुआ था 28 दिसंबर
1856 को और इनकी डेथ हुई थी 3 फरवरी 1924 को। तो, आप यह चीज अच्छे से याद रखें। साथ में सबसे इंपॉर्टेंट फैक्ट यह भी माना
जाता है कि यह किस पार्टी से जुड़े थे। आपसे हो सकता है कि टेस्टिंग एजेंसी यह पूछ ले कि बुड्रो विल्सन कौन सी पार्टी से
यूएस के प्रेसिडेंट इ हुए थे? तो आपने यह फैक्ट याद रखना है कि यह डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े थे। वहीं इनकी एक कोर्ट
भी थी जिसमें इन्होंने कहा था कि द वर्ल्ड मस्ट बी मेड सेफ फॉर डेमोक्रेसी। इट्स पीस मस्ट बी प्लांटेड अपॉन द टेस्टेड
फाउंडेशंस ऑफ पॉलिटिकल लिबर्टी। तो यह फैक्ट भी इंपॉर्टेंट है और यह कोटेशन भी इंपॉर्टेंट है। इसके अलावा अगर आप और
इंफॉर्मेशन चाहते हैं, कुछ फैक्ट चाहते हैं, तो यह रहे आपके स्क्रीन पर जिसमें पहला फैक्ट यह है कि इन्हीं के कार्यकाल
में 1917 में यूनाइटेड स्टेट्स फर्स्ट वर्ल्ड वॉर में एंटर करता है। 1918 में इन्होंने 14 पॉइंट्स प्रोग्राम दिया था
ताकि दुनिया में पीस को एस्टैब्लिश किया जा सके। 1919 को खास बात यह है कि इनको नोबेल प्राइज मिलता है पीस को सेटअप करने
के लिए। 1920 में इन्हीं के कार्यकाल में यूएस में 19थ अमेंडमेंट लाया जाता है। जिसके द्वारा ही 1920 में यूएस में वुमेन
को राइट टू वोट दिया जाता है। तो यह फैक्ट बेहद इंपॉर्टेंट है। इसको भी आप अच्छे से नोट करें और खास बात यह है कि 1921 में यह
प्रेसिडेंट के टर्म को पूरा कर लेते हैं। वहीं दूसरी तरफ एंड्र्यू हेवुड ने ग्लोबल पॉलिटिक्स में भी इनके बारे में
इंफॉर्मेशन दे रखी है। जैसा कि आप स्क्रीन पर देख रहे हैं। तो ये फैक्ट जितने ग्लोबल पॉलिटिक्स में एंड्र्यू हेवड ने दे रखे
हैं। कुछ इंफॉर्मेशन जो आपको दिखाई दे रही है, इसको भी आप अच्छे से पढ़ लें। अगले थिंकर का नाम
आता है जे ए हॉबसन। तो खास बात यह है कि यह ना केवल आइडियलिज्म बल्कि आईआर के एक महत्वपूर्ण थिंकर के रूप में जाने जाते
हैं। तो इनके बारे में आपने सबसे पहला फैक्ट यह याद रखना है कि यह इन्फ्लुएंशियल ब्रिटिश इकोनॉमिस्ट रहे। दूसरा पॉइंट आपने
यह याद रखना है कि इन्होंने इंपीरियलिज्म को क्रिटिसाइज़ किया और अंडर कंसमशन थ्योरी दी अपनी प्रमुख कृति जिसका टाइटल था
इंपीरियलिज्म ऑफ स्टडी जो कि 1902 को पब्लिश हुई थी और इसी कृति को पढ़ने के बाद लेनिन और की जैसे विचारक भी इनसे काफी
इंस्पायर हुए थे। दूसरी तरफ अगर आप बात करें इनके वर्क्स की तो इनके बहुत ज्यादा वर्क्स रहे हैं जो कि आप स्क्रीन पर देख
सकते हैं। जिसमें पहला वर्क आता है फिजियोलॉजी ऑफ इंडस्ट्री। दूसरा वर्क इसमें आता है प्रॉब्लम्स ऑफ पॉवर्टी।
तीसरा वर्क इसमें आता है द इवोल्यूशन ऑफ मॉडर्न कैपिटलिज्म। चौथा वर्क इसमें आता है द प्रॉब्लम ऑफ द अनइंप्लॉयमेंट। पांचवा
वर्क इसमें आता है जॉन रस्किन और सोशल रिफॉर्मर। छठा वर्क इसमें आता है इंपीरियलिज्म स्टडी जो कि अगेन बेहद
इंपॉर्टेंट है। सातवां वर्क इसमें आता है अ मॉडर्न आउटलुक जो कि 1910 को पब्लिश हुआ था और आठवां वर्क इनका आता है द साइंस ऑफ
वेल्थ। तो ये जितने भी सारे वक्स हैं इनको आप अच्छे से पढ़ लें। हालांकि रिवाइज करना, मेमोराइज करना बहुत मुश्किल होता है
इस तरह के फैक्ट्स को। लेकिन आप इतना जरूर पढ़ लें कि अगर ऑप्शन में यह सवाल आपसे पूछा जाता है तो आप इसको आसानी से क्रैक
कर लें। अगर हम बात करें इनके बारे में रिसोर्सेज और इंफॉर्मेशन की तो एक इंपॉर्टेंट बुक है जो आपको स्क्रीन पर
दिखाई दे रही है जिसका टाइटल है 50 की थिंकर्स इन इंटरनेशनल रिलेशंस। तो इसको लिखा गया मार्टिन ग्रिफिथ, स्टीवन सी रोच
और एम स्कॉट सोलमन के द्वारा। तो यह बेहद इंपॉर्टेंट बुक है। हालांकि इसकी लैंग्वेज थोड़ी सी टफ हो सकती है, लेकिन यह
इंपॉर्टेंट बुक है। तो इसी बुक में इन्होंने कुछ फैक्ट्स दिए हैं। जैसा कि आप स्क्रीन पर देख सकते हैं। इन्होंने ऑप्शन
के बारे में, इनकी लाइफ के बारे में डिस्कस किया है। इनकी थ्योरी के बारे में डिस्कस किया है और इनसे जुड़े जितने भी
इवेंट्स रहे उनके बारे में डिस्कस किया है। जैसा कि आप देख सकते हैं इन्होंने इसमें जॉन मिनार्ड किंस को डिस्कस किया
है। साथ में यह भी इन्होंने इसमें डिस्कस किया है कि हॉबसन क्या आइडियलिस्ट थे और केनेथ व्ट ने किस तरह से अपनी प्रमुख कृति
मैन द स्टेट और वॉर में क्रिटिसाइज किया जे ए हॉबसन को। इसके अलावा और भी आप इंफॉर्मेशन देख सकते हैं। जैसा कि आपको
स्क्रीन पे दिखाई दे रही है। तो यह बुक बेहद इंपॉर्टेंट है। इस चैप्टर को या फिर इस थिंकर को आप इस बुक में जरूर पढ़ें।
अगर आप डिटेल में इंफॉर्मेशन चाहते हैं तो अगले थिंकर का नाम आता है जॉन मिनार्ड कंस का जो कि हाईली इनफ्लुएंशियल ब्रिटिश
इकोनॉमिस्ट रहे हैं। इन्होंने मॉडर्न मैकइकोनॉमिक्स को रेवोल्यूशन किया और इन्होंने क्लासिकल थ्योरी को चैलेंज किया।
खास बात यह है कि इनका इंपॉर्टेंट वर्क रहा है द जनरल थ्योरी ऑफ़ एंप्लॉयमेंट इंटरेस्ट एंड मनी जो कि 1936 को पब्लिश
हुआ था। इन्होंने ग्रेट डिप्रेशन वॉर 1928 को देखा था और इन्होंने गवर्नमेंट इंटरवेंशन को भी सपोर्ट किया था ताकि
इकोनमी को स्टेबलाइज किया जा सके। दूसरा इंपॉर्टेंट पॉइंट यह है कि इसी कृति में इन्होंने यह कहा कि एक्टिविस्ट जो
गवर्नमेंट पॉलिसी होती है उसको होना चाहिए। यानी कि इन्होंने थ्योरेटिकल जस्टिफिकेशन दी फॉर एक्टिविस्ट गवर्नमेंट
पॉलिसी को। दूसरे शब्दों में आप यह कह सकते हैं कि इन्होंने इकोनॉमिक क्षेत्र में यानी कि इकोनॉमिक रियल में इन्होंने
गवर्नमेंट के इंटरवेंशन को सपोर्ट किया और इन्होंने फेमसली यह कहा कि डिमांड नॉट सप्लाई गवर्न्स इकोनॉमिक एक्टिविटी। जिसका
मतलब यह है कि डिमांड ही गवर्न करती है इकोनॉमिक एक्टिविटी को ना कि सप्लाई। दूसरा पॉइंट इनके बारे में यह इंपॉर्टेंट
है कि अगेन 1923 को इनकी फेमस बुक पब्लिश होती है जिसका टाइटल था अट्रैक्ट ऑन मॉनिटरी रिफॉर्म्स जिसमें इन्होंने फेमसली
यह कहा कि इन द लॉन्ग रन वी आर ऑल डेड जिसका मतलब यह है कि इन्होंने इसमें हाईलाइट किया अर्जेंट नीड फॉर डिसीसिव
गवर्नमेंट एक्शन और इनके बारे में यह भी इंपॉर्टेंट बात है कि इनकी लिगेसी यह रही कि फादर ऑफ ऑफ़ मैइकोनॉमिक्स के रूप में
जाने जाते हैं। आइडिया ऑन मैनेजिंग डिमांड इनका कंट्रीब्यूशन रहा और इनका इन्फ्लुएंस यह रहा कि इन्होंने फंडामेंटल टू मेन
स्ट्रीम इकोनॉमिक्स थ्योरी को दिया। तो इनके बारे में जितने भी इंफॉर्मेशनेशंस है उनको आप अच्छे से नोट करें क्योंकि यह
सारे के सारे एग्जाम फैक्ट है और अगर आप बात करें सोर्सेज और रेफरेंसेस की तो एंड्र्यू हेव की ग्लोबल पॉलिटिक्स में
अच्छे से इनके बारे में इंफॉर्मेशन दी हुई है। जैसा कि आप स्क्रीन पर देख सकते हैं। जहां इन्होंने दूसरी तरफ इनके मेजर वक्स
को भी डिस्कस किया है। जिसमें इनका मेजर वर्क आता है द जनरल थ्योरी ऑफ़ एंप्लॉयमेंट इंटरेस्ट एंड मनी। अगले इंपॉर्टेंट थिंकर
का नाम आता है डेविड हेल्ड। तो, यह ब्रिटिश पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। इनका स्पेशलाइजेशन रहा पॉलिटिकल थ्योरी और
इंटरनेशनल रिलेशंस के ऊपर। इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनका एक फेमस आईडिया रहा जिसको आपको अच्छे से याद रखना है क्योंकि एग्जाम
में इसे पूछा जा सकता है। तो, इनके आइडिया का नाम था कॉस्मोपॉलिटन मॉडल ऑफ डेमोक्रेसी। तो, यह पॉइंट आप अच्छे से याद
रखें। इनके बारे में कुछ और इंपॉर्टेंट बातें यह है कि इनका कंट्रीब्यूशन रहा कॉस्मोपॉलिटन डेमोक्रेसी और ग्लोबल
गवर्नेंस के ऊपर और इन्होंने यह कहा कि जो ग्लोबलाइजेशन है अगर हमें उसको अंडरस्टैंड करना है तो हमें ग्लोबलेंस और
कॉस्मोपॉलिटन डेमोक्रेसी जैसी वैल्यूस को अडॉप्ट करना पड़ेगा। और खास बात यह है कि इन्होंने इंट्रोड्यूस किया फ्रैंकफोर्ड
स्कूल की जो क्रिटिकल थ्योरी है क्योंकि ये इंग्लिश के प्रोफेसर भी रह चुके थे तो इन्होंने इंग्लिश स्पीकिंग जो ऑडियंस है
उसको भी इन्फ्लुएंस किया टारगेट किया। अगला पॉइंट यह आता है कि इनके कुछ वर्क्स रहे हैं जिनको आपको अच्छे से याद रखना है।
जिसमें इनका पहला वर्क आता है मॉडल्स ऑफ़ डेमोक्रेसी। यह तो इनका सेमिनल वर्क माना जाता है। इसको आप विद डेट याद रखें। अगला
इनका वर्क आता है डेमोक्रेसी एंड द ग्लोबल ऑर्डर। अगला वर्क आता है ग्लोबलिज्म एंटीग्लोबलाइजेशन
और लास्ट इनका वर्क आता है कॉस्मोपॉलिटनिज्म आइडियल्स एंड रियलिटीज। तो इनके चारों
बक्स आप अच्छे से मेमोराइज़ करें क्योंकि एग्ज़ाम फैक्ट यह आते हैं। यानी कि एग्ज़ाम में इस तरह के फैक्ट्स पूछे जा सकते हैं।
एंड्रू हेवुड ने अपनी प्रमुख कृति ग्लोबल पॉलिटिक्स में इनके बारे में अच्छे से डिस्कस किया है। जैसा कि आप स्क्रीन पर
देख सकते हैं। इनके बारे में इंपॉर्टेंट इंफॉर्मेशन जहां एक तरफ इन्होंने दी हुई है। दूसरी तरफ इन्होंने इनके जो मेजर वक्स
है उसको भी डिस्कस किया है। तो इस तरह की इंफॉर्मेशन के लिए आप ग्लोबल पॉलिटिक्स को पढ़ना ना भूलें। अगर आपके पास समय नहीं है
तो आप सार सक्सेस की इस तरह की वीडियो देख सकते हैं क्योंकि हम जितने भी यह लेक्चर बनाते हैं इन्हीं बेसिक बुक और स्टैंडर्ड
बुक्स की हेल्प से ही हम क्रिएट करते हैं ताकि आपको एग्जाम में ज्यादा से ज्यादा बेनिफिट हो सके। अब हम आइडियलिज्म के
अंतर्गत एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट को भी समझ लेते हैं जिसका नाम है न्यू आइडियलिज्म। तो अगर हम बात करें इस कांसेप्ट की तो यह
इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है जो कि यह कहता है कि ग्लोबलाइजेशन के साथ कुछ चैलेंजेस जुड़ी
हुई है जिसको हम एड्रेस कर सकते हैं थ्रू द डेमोक्रेटाइजेशन एंड द एस्टैब्लिशमेंट ऑफ रोबस्ट इंटरनेशनल इंस्टीटशंस। कहने का
मतलब यह है कि जो ग्लोबलाइजेशन से जुड़ी हुई प्रॉब्लम्स हैं, चैलेंजेस हैं, उनको हम एड्रेस कर सकते हैं। अगर हम
डेमोक्रेटाइजेशन को सेटअप करें और इंटरनेशनल इंस्टीटशंस को हम सेटअप करें। दूसरा इंपॉर्टेंट पॉइंट यह आता है कि इसके
की फिगर रहे हैं दो इंपॉर्टेंट थिंकर्स जिनका नाम है डेविड हेल्ड और रिचर्ड एफक। मैं फिर से नोट कर रहा हूं कि नियो
आइडियलिज्म के दो इंपॉर्टेंट थिंकर्स है डेविड हेल्ड एंड रिचर्ड ए फोक। खास बात यह भी है कि रिचर्ड ए फोक ने ग्लोबलाइजेशन के
ऊपर अपना एक पर्सपेक्टिव दिया और बॉटम अप एप्रोच को दिया जिसके अंतर्गत इन्होंने यह कहा कि सिविल सोसाइटी बहुत इंपॉर्टेंट है
ग्लोबल लेवल पे जिसको आप कह सकते हैं ग्लोबल सिविल सोसाइटी। आइडियलिज्म के अगले थिंकर का नाम आता है नॉर्मन एंजेल का। तो
यह इंग्लिश जर्नलिस्ट रहे हैं, ऑथर रहे हैं, पॉलिटिशियन रहे हैं। खास बात यह भी है कि 1933 को इनको नोबेल पीस प्राइज
मिलता है। इनका जो सेमिनल वर्क रहा था, उसमें जो इन्होंने कंट्रीब्यूशन दिया था, उसके लिए और इनके वर्क का नाम था द ग्रेट
इल्लुजन। तो ये जितने भी सारे फैक्ट्स मैंने आपको बताए यह आपको याद रखना है। इस बुक की खास बात यह भी है कि इसमें
इन्होंने यह कहा कि जो यूरोपियन कंट्रीज है, यूरोपियन नेशंस है उनके बीच अब इकोनॉमिक इंटरडिपेंडेंस
बढ़ गया है। तो अगर आप बात करें द ग्रेट इल्लुजन बुक की तो इसकी खास बात यह है कि इसमें इन्होंने यह कहा कि जो कंट्रीज है
खासतौर पे यूरोपियन नेशंस है वहां पर अब एडवांस हो चुका है। इकोनॉमिक इंटरडिपेंडेंस जिसकी वजह से यूरोप में वॉर
इररेिलेवेंट हो गया है या फिर वॉर का कोई अब रिलेवेंस नहीं रहा है क्योंकि अब सारी की सारी कंट्रीज नेशंस आपस में इकोनॉमिकली
इंटरडिपेंडेंट हो गए हैं। अगर आप बात करें इनके वर्क्स की तो इनके बहुत सारे वर्क्स रहे हैं जो कि आपके एग्जाम के लिए बेहद
इंपॉर्टेंट है। तो इसमें पहला वर्क आता है द ग्रेट इल्ल्यूजन जो कि 1910 को पब्लिश हुआ था। दूसरा इनका वर्क इसमें आता है
यूरोप्स ऑप्टिकल इल्लुजन। तीसरा वर्क इसमें इनका आता है द पॉलिटिक्स ऑफ द पीपल। और चौथा इनका वर्क आता है द फ्रूट्स ऑफ
विक्ट्री। और पांचवा इनका वर्क आता है द अनसीन असेसंस जो कि 1932 को पब्लिश हुआ था। तो जितने भी इनके वक्स है यह जो आपको
स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं, यह बेहद इंपॉर्टेंट है खासतौर पे आपके एग्जाम के लिए क्योंकि इस तरह के फैक्ट्स ही
ज्यादातर एग्जाम में पूछे जाते हैं। रही बात रिसोर्सेज की, तो आपको स्क्रीन पर जो बुक दिखाई दे रही है, इसमें सारी की सारी
इंफॉर्मेशन आपको इनके बारे में दिखाई देगी। जैसा कि आप अंडरलाइन और हाईलाइट देख सकते हैं। सारी की सारी इंफॉर्मेशन आपको
दी गई है। जैसा कि आप स्क्रीन पर देख रहे हैं। तो इन सभी चीजों को आपने अच्छे से पढ़ना है। अगर आप डिटेल में पढ़ना चाहते
हैं तो आइडियलिज्म के अगले कोर थिंकर का नाम आता है लनार्ड वुल्फ का। तो यह ब्रिटिश पॉलिटिकल थ्यरिस्ट रहे, ऑथर रहे
और पब्लिशर रहे। सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनकी शादी हुई थी एक इंपॉर्टेंट की और कोर ऑथर से जिनका नाम था वर्जिनिया
वुल्फ और यह एक फर्बेंट यानी कि उत्साही समाजवादी थे। फरवेंट सोशलिस्ट थे और इनकी थ्योरीज एंटी इंपीरियलिस्ट रही। सबसे बड़ी
बात यह है कि इनका जो कंट्रीब्यूशन रहा उसी की वजह से लीग ऑफ नेशन को एस्टैब्लिश किया जाता है। तो इनके कंट्रीब्यूशन को आप
इग्नोर नहीं कर सकते हैं। दूसरा पॉइंट इसमें यह आता है कि वुल्फ फेबियन सोसाइटी से जुड़े थे। लेबर पार्टी के यह मेंबर रहे
और इन्होंने इंटरनेशनल अफेयर्स के ऊपर काफी लिखा। कॉलोनियल पॉलिसी के ऊपर भी इन्होंने कई लेख लिखे। सबसे बड़ी बात यह
है कि इनकी जो बुक रही इंटरनेशनल गवर्नमेंट और जो 1916 की इनकी फिबिन रिपोर्ट्स रही उसी के इन्फ्लुएंस से लीग
ऑफ नेशन को एस्टैब्लिश किया जाता है। तो यह सारे के सारे फैक्ट्स भी आप याद रखें क्योंकि यह एगम फैक्ट है। अगर आप बात करें
इनके वक्स की इनकी बहुत सारी कृतियां हैं, वक्स हैं। जिनमें पहला नाम इसमें आता है द विलेज इन द जंगल। दूसरा नाम इसमें आता है
द वाइज वर्ज अ स्टोरी ऑफ वर्ड्स ओपिनियंस एंड अ फ्यू इमोशंस। तीसरा वर्क इसमें आता है इंटरनेशनल गवर्नमेंट। चौथा वर्क का नाम
है इकोनॉमिक इंपीरियलिज्म। पांचवा वर्क इसमें आता है एंपायर एंड कॉमर्स इन अफ्रीका। छठा वर्क इसमें आता है सोशलिज्म
एंड कोऑपरेशन। सातवां वर्क इसमें आता है आफ्टर द डेलयुग। और आठवां वर्क इसमें आता है द वॉर फॉर पीस। तो यह जितने भी सारे
वर्क्स हैं इनको इस तरह से जरूर पढ़ें कि अगर ऑप्शन में आपके पास इस तरह की चीजें आती है तो आप उसको इजीली क्रैक कर सकें।
रही बात इसके सोर्सेस की तो आपको स्टैंडर्ड बुक में इनके बारे में ज्यादा इंफॉर्मेशन नहीं मिलेगी। इसीलिए अगर आप
डिटेल में पढ़ना चाहते हैं इनके बारे में तो जो ब्रिटेनिका वेबसाइट है वहां पर आप विजिट करें और इस तरह की इंफॉर्मेशन आपको
इनके बारे में जरूर मिलेगी। अगले थिंकर का नाम आता है अल्फ्रेड जिमरान का। तो खास बात यह है कि यह की फिगर माने जाते हैं
अर्ली डेवलपमेंट ऑफ आईआर। खासतौर पे जो आईआर का आइडियलिस्ट स्कूल है उसके यह बहुत बड़े थिंकर माने जाते हैं और यह चैंपियन
रहे हैं इंटरनेशनल कॉरपोरेशन के रूल ऑफ लॉ एंड न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के 1936 में इनका वर्क पब्लिश होता है जो कि इनका सेमिनल
वर्क माना जाता है। इनका टाइटल था द लीग ऑफ नेशंस एंड द रूल ऑफ लॉ। इसमें इन्होंने लीग ऑफ नेशंस के बारे में डिस्कस किया।
रूल ऑफ लॉ के बारे में डिस्कस किया और इन्हीं के प्रयासों से इससे पहले 1919 में लीग ऑफ नेशन को एस्टैब्लिश किया जाता है।
इससे भी इंपॉर्टेंट बात यह मानी जाती है कि जिमरान ही ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बुड्रू विल्सन चेयर ऑफ
इंटरनेशनल पॉलिटिक्स को सबसे पहले होल्ड किया था। जिसको एस्टैब्लिश किया गया था यूनिवर्सिटी ऑफ़ बेल्स के एवरस्ट विद में।
तो यह बात भी विचारणीय है। आप इसको अच्छे से नोट कर सकते हैं। अल्फ्रेड जिमरान एक बहुत बड़े राइटर भी रहे हैं। इनके कुछ
इंपॉर्टेंट वर्क्स हैं जो आपके एग्जाम के लिए बेहद इंपॉर्टेंट है। तो इसमें पहला वर्क इनका आता है द लीग ऑफ नेशंस एंड द
रूल ऑफ लॉ। दूसरा वर्क इनका आता है द प्रोस्पेक्ट्स ऑफ सिविलाइजेशन और तीसरा इनका वर्क आता है द अमेरिकन रो टू वर्ल्ड
पीस। इसके अलावा इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कोटेशन दी जिसमें इन्होंने यह कहा कि इंटरनेशनल लॉ इन द एब्सेंस ऑफ एनफोर्समेंट
वाज़ मेयरली एन एरे ऑफ़ बिग्स एंड गाउंस वैसिफरेटिंग इन एंप्टीनेस। तो यह कोटेशन आपको बड़ी भारी लग रही होगी। लेकिन इसका
मतलब सिंपली यह है कि जो इंटरनेशनल लॉ होते हैं, वह तब तक ही बढ़िया होते हैं, कारगर होते हैं जब तक हम उनको एनफोर्समेंट
करते हैं यानी कि लागू करते हैं। अगर हम एनफोर्स नहीं कर रहे हैं, तो इंटरनेशनल लॉ उस तरह से होते हैं जैसे एंप्टी एरे ऑफ़
बिग्स होते हैं और गाउंस वैसिफ्रेटिंग होते हैं। यानी कि कहने का मतलब सिर्फ इतना सा है कि हमें इंटरनेशनल लॉ को अब हम
क्लासिकल रियलिज्म के की थिंकर्स को डिस्कस कर लेते हैं। तो इसमें पहला नाम आता है सुंजू का। दूसरा नाम आता है
थसीडाइडस का। तीसरा नाम आता है कौटिल्य का। चौथा नाम मैकेवली का आता है। अगला नाम इसमें आता है थॉमस हॉब्स का। नेक्स्ट नेम
आता है ईएच कार का। इनके बाद आता है हंस मॉर्गनथाऊ का नाम। फिर इसमें नाम आता है जॉर्ज एफकेनन का। अगला नाम इसमें आता है
हेनरी किसिंजर का। इसके बाद नाम आता है रोनाल्ड नेबुर का। अगला नाम इसमें आता है रेमंड एरो का और लास्ट इंपॉर्टेंट नाम आता
है निकोलस स्पाइकमैन का। तो यह जितने भी थिंकर्स हैं इनके नाम आप अच्छे से याद रखें क्योंकि हो सकता है कि आपकी टेस्टिंग
एजेंसी आपसे यह पूछे कि निम्नलिखित में से कौन से क्लासिकल रियलिस्टिक थिंकर हैं तो आपके पास कोई भी इनमें से आ सकते हैं
ऑप्शन में। इसीलिए आप इन सभी क्लासिकल रियलिस्ट्स के नाम याद रखें। की थिंकर्स में पहला नाम आता है सुनजू का। इनके बारे
में खास बात यह है कि यह एंशिएंट चाइनीज़ जनरल रहे हैं, स्ट्रेटजिस्ट रहे हैं, राइटर और फिलॉसोफर रहे हैं। दूसरी
इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनकी प्रमुख कृति रही है द आर्ट ऑफ़ वॉर जिसमें टोटल 13 चैप्टर्स हैं जो कि मिलिट्री स्ट्रेटजी की
बात करते हैं। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट यह आता है कि इनका जो यह बुक है, इसको वन ऑफ़ द अर्लियस्ट और मोस्ट इनफ्लुएंशियल बुक
मानी जाती है रियलिज्म के ऊपर और मिलिट्री स्ट्रेटजी के ऊपर। और सबसे इंपॉर्टेंट पॉइंट जिसे आपने याद रखना है कि सुंजू
क्लासिकल रियलिस्ट थ्योरिस्ट माने जाते हैं जो कि चाइना से बिलोंग करते थे। तो यह जितनी भी सारी बातें हैं आप इनको अच्छे से
नोट करें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए सारे फैक्ट्स इंपॉर्टेंट है। सुनजू ने द आर्ट ऑफ वॉर में कुछ इंपॉर्टेंट थ्योरीज और
प्रिंसिपल्स दिए। जैसा कि इन्होंने आर्ट ऑफ वॉर में यह कहा कि जो क्लासिकल रियलिज्म है यह फोकस करता है पावर के ऊपर,
सिक्योरिटी के ऊपर और कॉन्फ्लिक्ट के ऊपर और इन्होंने स्टेट सेंट्रिक पर्सपेक्टिव दिया आईआर का। इन्होंने यह कहा कि आईआर
में एनाकी पाई जाती है और सबसे बड़ी बात यह है कि स्टेट सर्वाइवल रहता है आईआर में सेल्फ हेल्प के द्वारा और जो क्लासिकल
रियलिज्म है जिसमें हम सुनजू की बात कर रहे हैं। इन्होंने यह कहा कि जो ह्यूमन नेचर होता है वह सेल्फ इंटरेस्टेड होता
है। पावर हंगरी होता है और जिसकी वजह से ही आईआर में वॉरफेयर होता है या आप कहें कि कॉन्फ्लिक्ट रहते हैं। वॉर होते हैं,
टेंशनंस होती है। तो इनका जो कोर आईडिया है इसको आप अच्छे से याद रख सकते हैं। अगर आप संजू के बारे में डिटेल में पढ़ना
चाहते हैं, स्टडी करना चाहते हैं, तो स्क्रीन पर जो आपको बुक दिखाई दे रही है अवनीत सिंह की, इसको आप आराम से पढ़ सकते
हैं। क्योंकि इसमें कुछ इंपॉर्टेंट बातें दे रखी है। जैसा कि आप स्क्रीन पर भी देख सकते हैं। जिसमें यह कहा गया है कि
इनफैक्ट सुनू रिजेक्टेड द आइडिया ऑफ़ द यूज़ ऑफ़ फ़ोर्स इन फ़ॉर्म ऑफ़ वॉर बट एडवांस द आइडिया ऑफ़ वॉरफेयर बाय डिसेप्शन। द बेसिक
लॉजिक ऑफ़ वॉरफेयर ऑफ़ डिसेप्शन वाज़ टू सबड्यू द एनिमी विदाउट फाइटिंग। तो इन्होंने यह कहा कि हमें वॉर में फ़ को यूज़
नहीं करना है बल्कि डिसेप्शन को यूज़ करना है। और ऐसा इसलिए है यानी कि डिसेप्शन का जो लॉजिक है वॉरफेयर में वह इसलिए है
क्योंकि डिसेप्शन के द्वारा हम जो अपने एनिमी है उनको बिना किसी वॉर के बिना किसी लड़ाई के हम हरा सकते हैं। तो उसमें फिर
हमारा नुकसान नहीं होता और हम आराम से जीत सकते हैं। जैसे कि आपने पढ़ा होगा मराठा भी इसी तरह के युद्ध किया करते थे जिसको
आप गोरिल्ला वॉरफेयर कहते हैं। तो इस तरह की बातें इन्होंने कही जो कि आपको अच्छे से याद रखनी है। नेक्स्ट थिंकर का नाम आता
है थसी डाइडस जो कि एथेनियन हिस्टोरियन और जनरल रहे हैं। इनके बारे में ख़ास बात यह है जो आपको याद रखनी है कि इनकी प्रमुख
कृति का नाम था द हिस्ट्री ऑफ़ द पैलोपोनिशियन वॉर जिसमें इन्होंने एथेंस और स्पार्ट के बीच जो युद्ध हुआ था 411
ईसा पूर्व उसको इन्होंने डिस्कस किया। उसके कॉजेस क्या सिचुएशंस थी? थसिडाइडस ट्रैप क्या होता है? इन सभी चीजों को
इन्होंने इसमें डिस्कस किया और इनके बारे में आपको ये याद रखनी है कि ये भी क्लासिकल रियलिस्ट थ्योरिस्ट रहे हैं। तो
आपको यह पॉइंट भी अच्छे से याद रखना है। आई होप इस स्लाइड में जितने भी की पॉइंट्स हैं आप अच्छे से समझ गए होंगे, मेमोराइज
कर गए होंगे। थसीडाइडस के नाम से एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट जुड़ा है जिसका नाम है थूसीडाइडस ट्रैप। यह कांसेप्ट आपके
एग्जाम के लिए और कॉनंसेप्चुअल क्लेरिटी के लिए बेहद इंपॉर्टेंट है। इसीलिए आप इसको अच्छे से समझे। तो अगर आप बात करें
इस ट्रैप की तो यह इंस्पायर्ड होता है थसी डाइडस का जो अकाउंट रहा था पैलोपोनेशन वॉर का जो कि स्पार्ट और एथेंस के बीच फिफ्थ
सेंचुरी बीसीई में हुआ था। तो यह फैक्ट आपको अच्छे से याद रखना है जो कि बेहद इंपॉर्टेंट है। जैसा कि थसीडाइडस ने खुद
कहा है कि इट वाज़ द राइज़ ऑफ़ एथेंस एंड द फियर इट इंस्टिल्ड इन स्पाटा दैट मेड वॉर इनवाइटेबल। जिसका मतलब यह है कि अगर आप
एंशिएंट ग्रीस में देखें तो दो इंपॉर्टेंट सिटी स्टेट थे। एक था एथेंस दूसरा था स्पाटा। स्पाटा ऑलरेडी पावरफुल स्टेट था।
वहीं एथेंस एक एम पावरफुल सिटी स्टेट बन रहा था। तो एथेंस का शक्ति के रूप में उभरना स्पार्ट के लिए बहुत हानिकारक था।
उसके बीच इनसिक्योरिटी हो गई थी। फेयर हो गया था। जिसकी वजह से दोनों सिटी स्टेट के बीच कहीं ना कहीं कॉन्फ्लिक्ट चले और लंबे
समय तक वॉर चला और इसी पोजीशन को इसी स्थिति को कहीं ना कहीं थुसिडाइडस ने एक ट्रैप कहा जो कि आगे चलकर पॉपुलराइज हुआ
जिसे कि थसीडाइडस ट्रैप कहा जाता है। अगर आप बात करें इस कांसेप्ट की मॉडर्न फॉर्म में यानी कि मॉडर्न पॉपुलराइजेशन की तो
ग्रहम टी एलिसन ने इस शब्दावली को 2012 के आर्टिकल और 2017 की बुक डेस्टाइन फॉर वॉर में काफी मात्रा में या बड़ी मात्रा में
पॉपुलराइज किया या इस शब्दावली को यूज़ किया। खास बात यह है कि इन्होंने हार्व वेलफेयर सेंटर में 16 हिस्टोरिकल केसेस
किए यानी कि रिसर्च की और 500 सालों में जितनी बार इस तरह की सिचुएशन आई उसमें इन्होंने यह कहा कि 12 बार ऐसा हुआ कि बोर
हुए यानी कि जबजब इस तरह की सिचुएशन आई इस ट्रैप की तो 16 में से 12 बार कहीं ना कहीं दो स्टेट के बीच या दो देशों के बीच
युद्ध हुए। तो इस तरह से इस ट्रैप को इन्होंने कहीं ना कहीं पॉपुलराइज किया। दूसरी तरफ अगर आप बात करें मॉडर्न
एप्लीकेशन की तो यूएस और चाइना के रूप में इसे देखा जा सकता है क्योंकि दोनों ही देशों के बीच जो स्ट्रेटेजिक रिबलरी है एक
एस्टैब्लिश्ड पावर जो कि यूएस है और राइजिंग पावर जो कि चाइना है उनके फॉर्म में देखा जा सकता है क्योंकि एक तरफ अगर
आप बात करें तो चाइना है जो कि बहुत बड़ी इकोनॉमिक मिलिट्री पावर है। दूसरी तरफ अगर आप देखें तो यूएस है जो कि ऑलरेडी
एस्टैब्लिश्ड पावर है। तो जिस तरह से चाइना इकोनॉमिक मिलिट्री के रूप में एक पावरफुल स्टेट के रूप में इमर्ज कर रहा है
या फिर चाइना का जो ताइवान स्टेटस है चाइना की जो मिलिट्री प्रेजेंस है पेसिफिक में और जो साइबर एक्टिविटीज है उसकी वजह
से कहीं ना कहीं यूएस के अंदर फियर हो रहा है या आप कहें कि इनसिक्योरिटी है जिसकी वजह से कॉन्फ्लिक्ट तो बढ़ते ही बढ़ते
हैं। साथ में एक ऐसे वॉर की भी पॉसिबिलिटी बनती है जो कि लंबे समय तक चल सकता है और इसी को आप मॉडर्न फॉर्म में थसीडाइडस
ट्रैप कहते हैं। अगर आप थोड़ा सा और इसको डिटेल में समझें या आप इसके अवेयरनेस की बात करें तो चाहे यूएस हो चाहे चाइनीस हो
दोनों ही लीडर ने इस कांसेप्ट को एकनॉलेज किया है। खासतौर पर जब आप बात करते हैं चाइनीस प्रेसिडेंट शी जिनपिंग की तो
इन्होंने वर्न किया है कि इस ट्रैप में हमें नहीं फंसना है। अगर आप दूसरी तरफ देखें तो ग्रहम टी एलिसन ने भी यह कहा कि
जो इसके प्रति अवेयरनेस है वह बेहद इंपॉर्टेंट है और इस तरह की अवेयरनेस हमें पैदा करनी है और हम इस ट्रैप में ना फंसे
इसके लिए दो तरीके हैं। पहला है डिप्लोमेसी और दूसरा है नेगोशिएशन। दोनों कंट्री के बीच डिप्लोमेटिक बातचीत करनी
पड़ेगी, नेगोशिएशन करनी पड़ेगी। तभी जाके हम इस ट्रैप में नहीं फंसते हैं। क्योंकि अगर हम इस ट्रैप में एक बार फंस गए तो फिर
वॉर का होना, कॉन्फ्लिक्ट का होना बेहद इंपॉर्टेंट है। आई होप आपने इस कांसेप्ट को बहुत अच्छे तरीके से समझ लिया होगा
क्योंकि यह कांसेप्ट बेहद इंपॉर्टेंट है आपके एग्जाम के लिए और आपकी कॉनसेप्चुअल क्लेरिटी के लिए। क्लासिकल रियलिज्म में
अगला इंपॉर्टेंट नाम आता है कौटिल्य का। कौटिल्य एंशिएंट इंडिया के पॉलीमैथ, एक टीचर, ऑथर, स्ट्रेटजिस्ट, फिलॉसोफर,
इकोनॉमिस्ट, जरिस्ट और मौर्यन एंपायर के रॉयल एडवाइजर रहे हैं। इनको जाना जाता है इंडियन मैकावली के रूप में। और खास बात यह
है कि यह ऐसे फर्स्ट रियलिस्टिक थिंकर माने जाते हैं जिन्होंने थ्योरी ऑफ इंटरनेशनल सिस्टम दिया। बैलेंस ऑफ पावर की
बात की और पावर ऑफ पॉलिटिक्स की बात की। इन्होंने अपनी प्रमुख कृति अर्थशास्त्र में मंडल थ्योरी को दिया। जिसे आज भी
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बहुत ही महत्वपूर्ण थ्योरी माना जाता है। इन्होंने चार प्रकार के साधनों की बात की जिससे हम
अपना एंड प्राप्त कर सकते हैं। साम, दाम, दंड और भेद। वहीं इन्होंने सिक्स फोल्ड पॉलिसी की बात की जिसमें शामिल आता है
संधि, विग्रह, आसना, यान, संश्रय और द्वेदी भाव। इन सभी चीजों को मैंने इंडियन फॉरेन पॉलिसी के क्रैश कोर्स में अच्छे से
डिस्कस किया है। आप वहां पर जाकर देख सकते हैं। जर्मन सोशियोलॉजिस्ट मैक्स बेबर ने अपनी प्रमुख कृति पॉलिटिक्स एज अ वोकेशन
में कौटिल्य की तुलना मैक्यावली से करते हुए कहा था कि ट्रूली रेडिकल मैक्यावेलियनिज्म कंपेयर टू इट। मैक्यावली
इज़ द प्रिंस इज़ हार्मलेस। इसमें बेसिकली इन्होंने यह कहा कि जो मैक्यावली की द प्रिंस है और उसमें जो मैक्यावली के थॉट्स
है वह कौटिल्य का जो अर्थशास्त्र है उसमें उग्र है। यानी कि मैक्यावली से ज्यादा उग्र कौटिल्य के थॉट हैं। क्लासिकल
रियलिज्म के अगले इंपॉर्टेंट थिंकर है मैकायावली। तो यह इटालियन डिप्लोमेट, ऑथर, फिलॉसोफर एंड हिस्टोरियन रहे हैं।
जिन्होंने रेनेसा के टाइम अपने जीवन को जिया था। यानी कि रेनेसा को करीब से देखा था। इन्होंने दो इंपॉर्टेंट कृति लिखी
जिनमें पहली आती है द प्रिंस और दूसरी आती है द आर्ट ऑफ वॉर और खास बात यह है कि इन्होंने कहा कि जो लायन और फॉक्स की
पॉलिसी है यानी कि पावर और जो डिसेप्शन है इसको इन्होंने फॉरेन पॉलिसी के लिए अनिवार्य एलिमेंट बताया। इन्होंने कहा कि
वॉर स्टेट की सुदृढ़ता के लिए यानी कि स्ट्रांग स्टेट के लिए आवश्यक है। और इन्होंने क्लासिकल रियलिज्म की फोर
वैल्यूज को मेंशन किया। जिनमें पहली है पॉलिटिकल एजिलिटी, दूसरा है अपॉर्चुनिटी एंड सिक्योरिटी और तीसरा है इसमें
पॉलिटिकल सर्वाइवल और चौथा इसमें आता है सिबिक कल्चर। थॉमस हॉब्स को भी क्लासिकल रियलिज्म के एक महत्वपूर्ण स्कॉलर या फिर
थिंकर के रूप में देखा जाता है। थॉमस हॉब्स इंग्लिश फिलॉसोफर रहे हैं और रियलिस्टिक थिंकर रहे हैं। और इनको जाना
जाता है फादर ऑफ ब्रिटिश रियलिज्म। और खास बात यह है कि इनको कंसीडर किया जाता है एक ऐसा थिंकर जिन्होंने मॉडर्न पॉलिटिकल
फिलॉसोफी की नीव रखी। इन्होंने अपनी प्रमुख कृति लेवाइथान को 1651 में लिखा और इन्होंने कहा कि जो स्टेट्स होते हैं उनके
बीच परमानेंट पीस स्थापित नहीं हो सकती है। और इन्होंने क्लासिकल रियलिज्म की फोर वैल्यूज़ को डिस्कस किया। जिनमें पहली आती
है पॉलिटिकल बिल। दूसरी आती है सिक्योरिटी डायलेमा और तीसरी आती है पॉलिटिकल सर्वाइवल और चौथी आती है पीस एंड
फेलिसिटी। वहीं दूसरी तरफ कंटेंपररी रियलिज्म में भी कुछ इंपॉर्टेंट थिंकर्स आते हैं। जिनमें पहला नाम आता है ईएसकार
का। दूसरा नाम आता है मॉ्गनथाऊ का। हालांकि मॉ्गन थाऊ को क्लासिकल रियलिस्ट के रूप में जाना जाता है क्योंकि इनके जो
विचार है वह क्लासिकल जितने भी रियलिस्ट रहे हैं उनसे मिलते जुलते हैं और खास बात यह है कि इन्होंने क्लासिकल रियलिज्म को
रिवाइज किया। तीसरे थिंकर का नाम आता है जॉर्ज कैनोन। चौथे थिंकर का नाम आता है रेमंड एरो। पांचवें थिंकर का नाम आता है
हेनरी केसिंजर। छठे थिंकर का नाम आता है रनोल्ड नेवरुर। और सातवें थिंकर का नाम आता है निकोलस स्पाइकमैन। अब हम सबसे पहले
ईएसकार को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो ईएसकार ब्रिटिश हिस्टोरियन, डिप्लोमेट, जर्नलिस्ट और इंटरनेशनल रिलेशंस थ्योरिस्ट
रहे हैं। और खास बात यह है कि फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के बाद ईएसकार ने अपनी एक प्रसिद्ध किताब लिखी जिसका नाम है 20 ईयर
क्राइसिस जो कि 1939 को पब्लिश होती है और इस किताब को रियलिज्म यानी कि जो मॉडर्न रियलिज्म है उसके ऊपर लिखी गई पहली किताब
मानी जाती है। और इसी किताब यानी कि जो इएसकार हैं इन्होंने ही मॉडर्न रियलिज्म की आधारशिला रखी। और इनका जो किताब है 20
ईयर क्राइसिस जो कि 1939 को पब्लिश होता है। इसे आप अच्छे से याद रखें। रियलिज्म के सबसे इंपॉर्टेंट थिंकर का नाम है हंस
जे मोर्गनथव और यह जर्मन अमेरिकन जरिस्ट और पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। खास बात यह है कि इनको क्लासिकल रियलिस्ट के नाम
से जाना जाता है और मैंने पहले भी कहा कि क्यों इनको क्लासिकल रियलिस्ट कहा जाता है और क्यों यह कंटेंपरेरी रियलिज्म में आते
हैं। इनको फादर ऑफ 20थ सेंचुरी रियलिज्म और कंटेंपरेरी रियलिज्म के रूप में जाना जाता है। और यह इंटरनेशनल रिलेशन में ऐसे
पहले रियलिस्टिक थिंकर रहे हैं जिन्होंने आईआर में जो रियलिज्म है उसको थ्योरीज़ दी। और खास बात यह भी है कि इनको इंटरनेशनल
पॉलिटिक्स के पोप के रूप में जाना जाता है। इन्होंने जो न्यूक्लियर एरा है इसको गोल्डन एज ऑफ़ बैलेंस ऑफ़ पावर के रूप में
देखा और इन्होंने एक इंपॉर्टेंट टर्म दी जिसका नाम है एनिमस डोमिनेंडी जिसका मतलब होता है लस्ट फॉर पावर। यानी कि जो
स्टेट्स होते हैं उनके बीच हमेशा से पावर के लिए एक लस्ट होती है। स्ट्रगल चलता रहता है। और इनका जो रियलिज्म है इसको
ट्रांसिडेंटल रियलिज्म भी कहा जाता है। क्योंकि इसका मतलब यह होता है कि जो नेशनल इंटरेस्ट्स हैं ये इंपॉर्टेंट होते हैं सब
स्टेट्स के लिए और इसमें मोरालिटी के लिए कोई स्पेस नहीं है। कोई जगह नहीं है। अब हम हंस मॉर्गनथाऊ की कुछ इंपॉर्टेंट
कोर्ट्स को भी देख लेते हैं। तो पहली कोट यह है कि यह कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति शक्ति के लिए संघर्ष होता है।
दूसरा कोट यह देते हैं कि मनुष्य इसलिए नहीं लड़ते हैं कि उनके पास हथियार होते हैं। बल्कि वे हथियार इसीलिए इकट्ठा करते
हैं क्योंकि वे लड़ना चाहते हैं। वहीं इनकी अगली कोटेशन यह है कि जो पावर है उसका मतलब होता है कि जो दूसरे होते हैं
उनका जो माइंड और जो एक्शंस होता है उनको कंट्रोल करना ही शक्ति कहलाता है। वहीं जी ए गोसावी ने कहा है कि जो रियलिज्म और
मोर्गनथाऊ है उनमें कोई अंतर नहीं है। और नोट करने वाली बात यह भी है कि मोर्गनथाऊ ने तीन प्रकार की फॉरेन पॉलिसी के बारे
में बताया है। जिनमें पहला यह कहते हैं स्टेटस को यानी कि एक ऐसी विदेश नीति जो यथास्थिति में विश्वास रखती है। यानी कि
जैसा है उस पर ही बल देती है। कोई बदलाव नहीं करती है। वहीं दूसरी प्रकार की है रिवीजनिस्ट यानी कि जो समय के अनुसार अपने
में बदलाव लाते हैं। अपने जो एकशंस, पॉलिसीज, विदेश नीति है उसको बदलते हैं। वहीं तीसरा है इंपीरियलिस्ट। इसका मतलब यह
होता है कि कोई स्टेट अपने स्टेट को पावरफुल बनाने के लिए, बड़ा करने के लिए, एक्सपेंड करने के लिए इंपीरियलिस्टिक जो
पॉलिसी है उसको अपनाते हैं। मॉ्गनेंथाऊ के स्क्रीन पर जितने भी आपको वक्स दिखाई दे रहे हैं, इनको आप अच्छे से नोट कर लें
क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही इंपॉर्टेंट है। अब हम हंस मॉ्गनेंथ्यू के सिक्स प्रिंसिपल्स को अच्छे से देख लेते
हैं। तो पहला प्रिंसिपल यह कहता है कि जो पॉलिटिक्स है उसको ऑब्जेक्टिव लॉ के द्वारा गवर्न किया जाता है और उन
ऑब्जेक्टिव लॉज़ की जो जड़े हैं मानवीय स्वभाव में पाई जाती है क्योंकि मानव हमेशा से शक्ति को चाहता है। सिक्योरिटी
को चाहता है और सेल्फ हेल्प में विश्वास करता है। वहीं दूसरा प्रिंसिपल यह कहता है कि जो राष्ट्रीय हित होते हैं उनको
राष्ट्रीय शक्ति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। क्योंकि शक्ति के द्वारा ही अपने हितों की पूर्ति कोई भी स्टेट करता
है। अगला प्रिंसिपल यह कहता है कि जो इंटरेस्ट होते हैं वह डायनामिक होते हैं, बदलते रहते हैं। वहीं अगला प्रिंसिपल यह
है कि जो मोरल प्रिंसिपल्स हैं उनको पॉलिटिक्स में लागू नहीं किया जा सकता है। यानी कि मोरालिटी की अंतरराष्ट्रीय
राजनीति में कोई जगह नहीं है। वहीं अगला कहता है कि जो एक स्टेट की मोरल एस्पाइरेशन होती है और जो यूनिवर्सल मोरल
प्रिंसिपल होते हैं उनमें डिफरेंस होता है। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मोरालिटी को कोई जगह नहीं है। जबकि जो
स्टेट होता है, नेशन होता है, उसकी जो डोमेस्टिक लेवल है, वहां पर एक अलग तरह की मोरालिटी होती है। और अगला प्रिंसिपल कहता
है कि जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति है वह स्वायत होती है। दूसरे विषयों से अलग होती है। उनके अधीन नहीं होती है। आपको और भी
कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग्स याद रखनी है। जैसे हेनरी किसिंजर लिखते हैं डिप्लोमेसी। वहीं रेमंड एरो लिखते हैं पीस एंड वॉर। और
वहीं दूसरी तरफ रनो नेबर लिखते हैं मोरल मैन एंड इमोरल सोसाइटी। वहीं निकोलस स्पाइकमैन लिखते हैं अमेरिका स्ट्रेटजी इन
वर्ल्ड पॉलिटिक्स। रियलिज्म का अगला प्रकार आता है क्लासिकल रियलिज्म। तो जब हम बात करते हैं क्लासिकल रियलिज्म की तो
इसके फाउंडर यानी कि सबसे बड़े थिंकर माने जाते हैं फरीद जकारिया को। और जो नियो क्लासिकल रियलिज्म शब्दावली है इसको 1998
को वर्ल्ड पॉलिटिक्स रिव्यू आर्टिकल में गिडन रोज ने कॉइ किया था। और जब हम बात करते हैं नियो क्लासिकल रियलिज्म की तो यह
नियो रियलिस्टिक जो थ्योरीज है और जो क्लासिकल रियलिस्ट थ्योरीज है उसका एक कॉम्बिनेशन रूप है यानी कि मिलाजुला रूप
है और नियो क्लासिकल रियलिज्म कहता है कि जो फॉरेन पॉलिसी होती है वो प्रोडक्ट होता है इंटरनेशनल जो स्ट्रक्चर्स होते हैं
डोमेस्टिक इन्फ्लुएंस होते हैं और जो कॉम्प्लेक्स रिलेशन पाए जाते हैं दो कंट्रीज के बीच उसका ही फ्रूट उसका ही
नतीजा फॉरेन पॉलिसी होती है और इसके कुछ इंपॉर्टेंट अदर थिंकर्स रहे हैं जैसे रेंडल स्क्वेलर रॉबर्ट जर्विस एंडर्स
बाइबेल कोिन ड्यूक जेफरी तेलिया फोरो स्टीवन लोबेल एशले तोजे निकोलस किचन एंड रॉबर्ट विशाट रियलिज्म का अगला प्रकार आता
है स्ट्रक्चरल रियलिज्म तो इसको सबसे पहले प्रोपाउंड किया था रूजो ने अपनी प्रमुख कृति द स्टेट ऑफ वॉर में और खास बात यह है
कि यह बोलता है कि जो ह्यूमन नेचर होता है वह कोई एना एनार्किक नहीं होता है। यानी कि केओटिक नहीं होता है। जबकि जो एनार्की
होती है ह्यूमन के अंदर जैसे फियर, चिलसी, डाउट इस तरह की जो चीजें हैं वो ह्यूमन नेचर को क्रिएट करती है। और 1970 के दशक
में कैनथ वाल्ट ने जो स्ट्रक्चरल रियलिज्म है उसको नियो रियलिज्म के रूप में प्रोपाउंड किया, रिवाइज्ड किया था।
रियलिज्म का अगला प्रकार है क्रिश्चियन रियलिज्म। तो क्रिश्चियन जो रियलिज्म है इसके जो फादर है उनको जाना जाता है
रिनोल्ड नेबर को और खास बात यह है कि जो क्रिश्चियन रियलिज्म है ये एक पॉलिटिकल थियोलॉजी है क्रिश्चियन ट्रेडिशन में यानी
कि इंटरनेशनल रिलेशन में और खास बात यह भी है कि इसमें जो रियलिज्म है उसको थियोक्रेसी यानी कि धर्मतंत्र के साथ
जोड़ा जाता है और इसकी तीन इंपॉर्टेंट एजम्पशनंस है। पहली सिनफुलनेस ऑफ ह्यूमैनिटी, दूसरी फ्रीडम ऑफ ह्यूमैनिटी
और तीसरी है वैलिडिटी एंड सीरियसनेस ऑफ द ग्रेट कमेंडमेंट। वहीं दूसरी तरफ स्ट्रेटेजिक रियलिज्म जो शब्दावली है इसको
कॉइ किया था थॉमस शेलिंग ने। यह भी रियलिज्म का एक बहुत ही बड़ा प्रकार है। थॉमस शेलिंग ने अपनी प्रसिद्ध कृति जिसका
नाम है द स्ट्रेटजी ऑफ कॉन्फ्लिक्ट जो कि 1960 को पब्लिश होती है। इसमें लिखा था कि जो लीडर्स होते हैं वे स्ट्रेटेजिकली
सोचते हैं। यानी कि जो उनके डिप्लोमेटिक और मिलिट्री इशज़ होते हैं, उसके साथ लॉजिकली डील करते हैं। और जो रियलिज्म है,
यह मेनली फोकस करता है कि फॉरेन पॉलिसी में किस तरह से डिसीजन मेकिंग होती है। और थॉमस शेलिंग कहते हैं कि जो लीडर्स होते
हैं ये डिप्लोमेटिक और मिलिट्री प्रॉब्लम्स इस तरह से सॉल्व करें कि उसमें वे तर्क यानी कि लॉजिक को इंक्लूड करें और
जो अपनी एक्टिविटीज है उसको सक्सेस करें और इस तरह से हम कह सकते हैं कि जो स्ट्रेटेजिक रियलिज्म है यह फोकस करता है
कि जो फॉरेन पॉलिसी होती है उसमें डिसीजंस किस तरह से लिए जा सकें जिससे पर्टिकुलर जो स्टेट है उसको फायदा हो। नेक्स्ट
प्रकार का जो रियलिज्म है, इसका नाम है लॉजिकल चॉइस रियलिज्म। तो, इस आइडिया को दिया था जॉन ग्रीको एंड स्टेफन डेजनर ने।
तो, सबसे बड़ी बात यह है कि जो लॉजिकल चॉइस रियलिज्म है, यह बोलता है कि स्टेट बिहेव करता है लॉजिकली। यानी कि जो स्टेट
होता है वो तर्क पूर्ण सोचता है। अपना फायदा और जो नफा है उसके बारे में अच्छे से विचार करता है क्योंकि स्टेट के पास भी
रीजन होता है, लॉजिक होता है, तर्क होता है। अब हम ऑफेंसिव और डिफेंसिव रियलिज्म को अच्छे से समझ लेते हैं। तो सबसे पहले
अब हम बात कर लेते हैं ऑफेंसिव रियलिज्म की। तो जो ऑफेंसिव रियलिज्म का आईडिया है इसको दिया था जॉन मरसाइमर ने अपनी
प्रसिद्ध कृति जिसका नाम है द ट्रेजडी ऑफ ग्रेट पावर पॉलिटिक्स जो कि 2001 को पब्लिश होती है। तो वहीं ऑफेंसिव जो
रियलिज्म है यह बात करता है पावर मैक्सिमाइजर की यानी कि स्टेट को अधिक से अधिक शक्ति को गेन करना चाहिए। यह
सिक्योरिटी मैक्सिमाइजर नहीं है। वहीं दूसरे प्रकार का रियलिज्म आता है डिफेंसिव रियलिज्म। तो जो डिफेंसिव रियलिज्म का
आईडिया है इसको दिया था मिशल मास्टिन ड्यूनो ने और खास बात यह है कि इन्होंने लिखी यूनपोलर पॉलिटिक्स रियलिज्म एंड
स्टेट स्ट्रेटजीस आफ्टर द कोल्ड वॉर जो कि 1999 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने कहा कि जो स्टेट होता है वह सिक्योरिटी
मैक्सिमाइजर होता है। उसको अपनी सुरक्षा को अधिक से अधिक सुनिश्चित किया जाना चाहिए। पावर मैक्सिमाइजर की यह बात नहीं
करता है। वहीं जो दूसरा नियोरियलिज्म है, इसको हम चैप्टर फोर में डिस्कस करेंगे। अब हम नियोरियलिज्म के तीन इंपॉर्टेंट प्रकार
को देख लेते हैं। तो इनमें पहला आता है ऑफेंसिव रियलिज्म। दूसरा इसमें आता है डिफेंसिव रियलिज्म और तीसरा इसमें आता है
स्ट्रेटेजिक रियलिज्म। ऑफेंसिव रियलिज्म के जनक रहे हैं जॉन मरमर। स्ट्रेटेजिक रियलिज्म के जनक रहे हैं थॉमस शेलिंग।
वहीं डिफेंसिव रियलिज्म के जनक रहे हैं मास्टिन ड्यूनो। वहीं जब हम बात करें ऑफेंसिव रियलिज्म की तो यह पावर को अधिक
से अधिक चाहता है। स्ट्रेटेजिक रियलिज्म बात करता है कि अगर लीडर्स के सामने कुछ प्रॉब्लम आती है तो उसको वे रणनीतिक तरीके
से सॉल्व करते हैं। वहीं डिफेंसिव रियलिज्म बात करता है कि स्टेट्स अधिक से अधिक सिक्योरिटी चाहते हैं। अब हम
नियोरियलिज्म के कुछ इंपॉर्टेंट थिंकर्स को देख लेते हैं। तो इनमें पहला नाम आता है केनेथ वाल्ट का। दूसरा नाम आता है
जोसेफ ग्रीको का। तीसरा नाम आता है वेरी वजान का और चौथा नाम आता है ग्रहम टी एलिजन का पांचवा नाम आता है सुसेन
स्ट्रेंज का छठा नाम आता है जॉन मरशाइमर का और सातवां नाम आता है मस्टन ड्यूनो का नियोरियलिज्म के थिंकर्स में सबसे पहला
नाम आता है किनेथ वाल्ट का तो किनेथ वाल्ट अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं और खास बात यह है कि यह नियोरियलिज्म के सबसे
महत्वपूर्ण थिंकर रहे हैं और इन्होंने रियलिज्म जो है उसको रिवाइज किया और न्यू रियलिज्म यानी कि स्ट्रक्चरल रियलिज्म को
आईआर में दिया और खास बात यह है कि इन्होंने कहा कि जो बायपोलर सिस्टम होता है वह अधिक स्टेबल होता है पीसफुल होता है
मल्टीपोलर सिस्टम की अपेक्षा और खास बात यह है कि इन्होंने एक कांसेप्ट दिया जिसका नाम है पेरिशियस लाइफ्स ऑफ द बिग स्टेट्स
जिसका मतलब यह है कि जो कमजोर स्टेट होते हैं अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह हमेशा से एनार्की स्थापित करते हैं अव्य
व्यवस्था स्थापित करते हैं अंतरराष्ट्रीय राजनीति में। क्योंकि इनके लिए जो बड़े-बड़े स्टेट्स होते हैं, वह संघर्ष
चलता है आपस में। और खास बात यह भी है कि इन्होंने जो न्यूक्लियर वेपंस है, इसको जरूरी बताया स्टेबिलिटी के लिए और
इन्होंने अपनी जो प्रमुख कृति है जिसका नाम है मैन, द स्टेट एंड वॉर जो कि 1979 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने आईआर
के तीन इमेजज़ की बात की। जिनमें पहला आता है द इंडिविजुअल, दूसरा आता है द स्टेट और तीसरा आता है द इंटरनेशनल सिस्टम।
इन्होंने यह कहा कि जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति है इन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तीनों ही जो इमेज हैं चाहे इंडिविजुअल हो,
स्टेट हो या फिर इंटरनेशनल सिस्टम हो इन तीनों की इक्वल इंपोर्टेंस होती है। किनेथ वाल्ट की जो थ्योरीज है उसकी तीन
इंपॉर्टेंट विशेषताएं रही है। जिनमें पहली जो विशेषता है उसका नाम है एनार्की। यानी कि यह कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति
में एनआरकी पाई जाती है। दूसरी विशेषता है कि यह बोलते हैं कि जो स्टेट्स होते हैं अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इनकी फंक्शनल
इक्वलिटी होती है। यानी कि सभी स्टेट का जो प्राइमरी गोल है वो यही होता है कि अपने आप को सुरक्षित रखें। अपनी
सिक्योरिटी को मैक्सिमाइज कर सके। और तीसरा फंक्शन है डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ कैपेबिलिटीज। यानी कि जो अंतरराष्ट्रीय
राजनीति में जो पावर्स होती है उनको समान रूप से डिस्ट्रीब्यूट किया जाता है। सभी जो है वह रिलेटिव गेंस को प्राप्त करते
हैं। आपको स्क्रीन पर किनेथ वाल्ट के जितने भी वक्स दिखाई दे रहे हैं इनको आप अच्छे से नोट करें क्योंकि आपके एग्जाम के
लिए बहुत ही इंपॉर्टेंट हैं। न्यूरियलिज्म के अगले थिंकर का नाम आता है वैरी वजान और इनके बारे में खास बात यह है कि यह
इंटरनेशनल रिलेशंस के जो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स है उसके एमेरिटस प्रोफेसर यानी कि सेवानिवृत्त प्रोफेसर रहे हैं और खास
बात यह भी है कि आईआर का जो कॉपेन हेगन स्कूल है उससे यह जुड़े हैं और इस बात को आपको अच्छे से याद रखना है और खास बात यह
भी है कि इन्होंने कॉम्प्लेक्स सिक्योरिटी का एक कांसेप्ट दिया जिसमें यह कहते हैं कि सभी स्टेट्स के जो सिक्योरिटी है वह
बहुत ही इंपॉर्टेंट होती है। लेकिन आजकल के दौर में यह कहते हैं कि जो सिक्योरिटी है वह कॉम्प्लेक्स हो गई है। क्योंकि कुछ
ऐसी नेचुरल बैरियर्स आ गई है जैसे ओशियंस, डेजर्ट्स, माउंटेन जो रेंजेस होती है उसकी वजह से जो सिक्योरिटी है वो कॉम्प्लेक्स
हो गई है। और स्क्रीन पर आपको जितने भी इनके वर्क्स दिखाई दे रहे हैं, इनको आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम
के लिए यह भी बहुत ही इंपॉर्टेंट है। न्यूरियलिज्म में अगले थिंकर का नाम आता है ग्रेहेम टी एलिजन। तो यह अमेरिकन
पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं और न्यूरियलिस्टिक थिंकर रहे हैं। इन्होंने एक इंपॉर्टेंट थिंकर दिया न्यूरियलिज्म के
अंतर्गत जिसका नाम है ब्लैक बॉक्स। यह कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्टेट्स के द्वारा जो भी एक्टिविटीज जो भी
एक्शन किए जाते हैं उसको हम नहीं जान पाते हैं क्योंकि वे एक ब्लैक बॉक्स की तरह होते हैं। जिस तरह से ब्लैक बॉक्स के अंदर
जो कुछ होता है हमें दिखाई नहीं पड़ता है उसी तरह से जो स्टेट्स के एक्शंस होते हैं, पॉलिसीज होती हैं, स्टेप्स होते हैं
उनको हम नहीं जान पाते हैं। हमारे लिए वे अननोएबल होते हैं। तो, इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स भी रहे हैं। जिनमें
पहला आता है एसेंस ऑफ़ डिसीजंस। दूसरा आता है रीमेकिंग फॉरेन पॉलिसी और तीसरा आता है अवॉयडिंग न्यूक्लियर एनाखी। अगले थिंकर का
नाम आता है सुसेन स्ट्रेंज। तो सुसेन स्ट्रेंज ब्रिटिश स्कॉलर और आईआर के थ्योरिस्ट रहे हैं। खास बात यह है कि वे
अपने आप को एक न्यू रियलिस्टिक थिंकर कहती है। और इनके कुछ आइडियाज है जो आपको याद रखने हैं। जैसे इंटरनेशनल पॉलिटिकल
इकोनमी, स्ट्रक्चरल पावर, बेस्ट फेलियर और कैज़िनो कैपिटलिज्म। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स भी है। जैसे कैजिनो कैपिटलिज्म,
दूसरा है स्टेट्स एंड मार्केट्स। तीसरा है द रिट्रीट ऑफ द स्टेट और चौथा है मैडमनी। तो इनके जितने भी वक्स हैं उनको आप अच्छे
से याद कर लें। अब हम बात कर लेते हैं जॉन मरमर की। तो इनका जन्म होता है 14 दिसंबर 1947 को और जॉन मरमर यूएस पॉलिटिकल
साइंटिस्ट रहे हैं। और खास बात यह है कि यह ऑफेंसिव रियलिस्टिक थिंक कर रहे हैं नियोरियलिज्म के अंतर्गत और इन्होंने जो
कैनेथ वाल्ट है उसको एक डिफेंसिव रियलिस्ट के नाम से जाना। यानी कि इन्होंने बताया कि जो कैनथ वाल्ट के विचार है वे डिफेंसिव
रियलिज्म से मिलते जुलते हैं। इसीलिए कैनथ वाल्ट एक डिफेंसिव रियलिस्ट हैं। इनके कुछ वर्क्स रहे हैं जिनमें शामिल है पहला द
ट्रेजडी ऑफ द ग्रेट पावर पॉलिटिक्स। दूसरा आता है कन्वेंशनल डिटरेंस। अब हम कंस्ट्रक्टिविज्म के बारे में कुछ की
पॉइंट्स को भी देख लेते हैं जो आपके एग्जाम के लिए बहुत ही इंपॉर्टेंट है। तो इसका डेवलपमेंट होता है 1980 में और खास
बात यह है कि यह एक पोस्ट पॉजिटिविज्म नोशन है आईआर में और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि जो कंस्ट्रक्टिविज्म की टर्म है
इसको कॉइ किया था निकोलस होनफ ने और जो निकोलस होनफ है और जो एलेक्जेंडर वेंड है इनको आईआर में जो कंस्ट्रक्टिविज्म है
उसके की थ्यरिस्ट के रूप में जाना जाता है और कंस्ट्रक्टिविज्म एक रिएक्शन है जो नियो रियलिज्म और जो नियो लिबरलिज्म रहा
है उसके प्रति और कंस्ट्रक्टिविज्म को एक सोशल कंस्ट्रक्टिविज्म यानी कि सामाजिक रचनावाद के रूप में जाना जाता है।
कंस्ट्रक्टिविज्म के सबसे प्रमुख और सबसे पहले थिंकर का नाम आता है निकोलस ओनफ। इनका जन्म होता है 1941 को और यह यूएस के
कंस्ट्रक्टिविस्ट स्कॉलर रहे हैं आईआर में। और खास बात यह है कि इन्होंने अपनी प्रमुख कृति वर्ल्ड ऑफ आवर मेकिंग में
1989 को कंस्ट्रक्टिविज्म नामक शब्दावली को गढ़ा। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जिनमें पहला आता है वर्ल्ड ऑफ आवर
मेकिंग। दूसरा आता है मेकिंग सेंस मेकिंग वर्ल्ड्स कंस्ट्रक्टिविज्म इन सोशल थ्योरी एंड इंटरनेशनल रिलेशंस। और तीसरा आता है
नेशंस मार्केट्स एंड वॉर। कंस्ट्रक्टिविज्म के दूसरे इंपॉर्टेंट थिंकर का नाम है एलेक्जेंडर वंड। इनका
जन्म होता है 1954 को और यह भी यूएस के कंस्ट्रक्टिविस्ट थिंकर रहे हैं आईआर में। और खास बात यह है कि जहां एक तरफ निकोलस
ऑनफ ने कंस्ट्रक्टिविज्म को कॉइन किया। दूसरी तरफ इन्होंने यानी कि वंड ने अपनी प्रमुख कृति सोशल थ्योरी ऑफ़ इंटरनेशनल
पॉलिटिक्स में कंस्ट्रक्टिविज्म को पॉपुलराइज किया। और इन्होंने फेमसली कहा भी था एनार्की इज व्हाट स्टेट्स मेक ऑफ
इट। यानी कि अराजकता वह होती है जो स्टेट स्वयं ही इसे बनाते हैं। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जिनमें पहला
आता है एनआरकी इज़ व्हाट स्टेट्स मेक ऑफ इट। द सोशल कंस्ट्रक्शन ऑफ़ पावर पॉलिटिक्स। यह 1992 में इनका बेसिकली एक
एस्स था। वहीं इनकी दूसरी राइटिंग है सोशल थ्योरी ऑफ इंटरनेशनल पॉलिटिक्स जो कि इनकी अक्षय कृति है जो 1999 को पब्लिश होती है।
अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो वेंड है इन्होंने अपनी प्रमुख कृति जो सोशल थ्योरी ऑफ़ इंटरनेशनल पॉलिटिक्स है जो 1999
को पब्लिश होती है। ये इन्होंने वाल्ट की जो प्रमुख कृति है अ थ्योरी ऑफ इंटरनेशनल पॉलिटिक्स उसको रिस्पांस करने के लिए
इन्होंने अपनी प्रमुख कृति लिखी थी और इन्होंने जो वाल्ट की थ्योरी है इसको एक ओवर मटेरियलिज्म के रूप में क्रिटिसाइज
किया। यानी इनका मानना यह था कि वाल्ट ने अपनी थ्योरी में जो मटेरियलिज्म है उसको ज्यादा फोकस किया। इस वजह से इन्होंने
क्रिटिसाइज किया। और यह आगे लिखते हैं अपनी इस कृति में कि एनार्की वो नहीं है जो नियोरिलिस्टिक्स कहते हैं कि किसी एक
जो गवर्नमेंट है या फिर जो संस्था है उसके अभाव में अनारकी होती है बल्कि यह कहते हैं कि अनारकी जो स्टेट की वैल्यू्यूज
होती है, आइडियाज होता है या फिर बिलीव्स होते हैं उसके द्वारा बनाया जाता है। और आगे ये लिखते हैं कि जो इवन इंटरेस्ट होते
हैं, आइडेंटिटी होती है या फिर स्टेट की जो पावर होती है उसको भी आइडिया के द्वारा कंस्ट्रक्ट किया जाता है, क्रिएट किया
जाता है। इस प्रकार से जो एनार्की होती है वो स्टेट के द्वारा ही क्रिएट की जाती है जो स्टेट खुद बनाते हैं। एनार्की कोई
एब्सेंस ऑफ वर्ल्ड गवर्नमेंट नहीं है। और खास बात यह है कि एलेक्जेंडर वेंड ने जो एनार्की है उसके तीन कल्चर इन्होंने बताए
हैं। जिनमें पहला है हॉब्सियन कल्चर, दूसरा है लोकियन कल्चर और तीसरा है कांटियन कल्चर। यह बोलते हैं कि इन्हीं के
विचारों से हमें अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जो एनार्की है उसका पता चलता है। उसके विकास का जो पता है वो हमें मालूम पड़ता
है। कंस्ट्रक्टिविज्म के अगले प्रमुख थिंकर है फ्रेडरिक क्रेटोस बिल। तो जब हम बात करते हैं इनकी तो इनका जन्म होता है
1944 को और यह भी एक जर्मन इंटरनेशनल पॉलिटिकल थिंकर रहे हैं और खास बात यह है कि ये भी जो कंस्ट्रक्टिविज्म है उसके
प्रमुख रिप्रेजेंटेटिव रहे हैं इंटरनेशनल रिलेशंस में। इनके कुछ प्रमुख वक्स है जिनमें पहला आता है रूल्स नॉर्म्स एंड
डिसीजंस। दूसरा आता है द पज़ल्स ऑफ पॉलिटिक्स। और खास बात यह भी है कि इंटरनेशनल रिलेशंस में इन्होंने दो प्रकार
के जो रूल होते हैं या फिर नॉर्म्स होते हैं उसकी बात की। जिनमें पहला आता है कंट्रोलिंग रूल। इसके द्वारा ये होता है
कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसे रूल्स या नॉर्म्स बने होते हैं जिसके द्वारा स्टेट की जो एक्टिविटी है उसको कंट्रोल
किया जाता है ताकि कुछ स्टेट की हैजेमनी विश्व पर ना हो। वही दूसरा है कंस्ट्रक्टिंग रूल। इसके द्वारा ऐसे रूल्स
होते हैं जिनके द्वारा दुनिया में कुछ कंस्ट्रक्ट किया जाता है। इंस्टीट्यूशन, स्टेट इन सभी को बनाया जाता है।
कंस्ट्रक्ट किया जाता है सोशली और पॉलिटिकली। अब हम लिबरलिज्म के तीन इमेजज़ को डिस्कस कर लेते हैं। तो इसमें पहला
इमेज आता है ह्यूमन नेचर। यानी कि लिबरलिज्म का जो फर्स्ट इमेज है, यह बात करता है मानव स्वभाव की। तो खास बात यह है
कि इसको दिया गया था मिड 19 सेंचुरी में रिचर्ड कॉबडन के द्वारा और यह फोकस करता है इंडिविजुअल लिबर्टी के ऊपर, फ्री ट्रेड
के ऊपर, प्रोस्पेरिटी एंड इंटरडिपेंडेंस के ऊपर। वहीं दूसरी खास बात यह है कि जो इसका सेकंड इमेज है यह बात करता है द
स्टेट की यानी कि राज्य की यह बात करता है और खास बात यह है कि इसको दिया गया था बुड्रो विल्सन के द्वारा और इसको जो दिया
गया था यह 20थ सेंचुरी के अर्ली पीरियड में दिया गया था और खास बात यह भी है कि यह फोकस करता है नेचुरल सेल्फ डिटरमिनेशन
के ऊपर ओपन गवर्नमेंट के ऊपर पब्लिक ओपिनियन एंड कलेक्टिव सिक्योरिटी की भी यह बात करता है। वहीं लिबरलिज्म का जो थर्ड
इमेज है, यह बात करता है स्ट्रक्चर्स की। यानी कि आईआर में जो संरचनाएं होती है, उसके ऊपर अपना ध्यान केंद्रित करता है और
इसको दिया गया था जे ए हॉबसन के द्वारा अर्ली 20थ सेंचुरी में। और खास बात यह भी है कि यह फोकस करता है वर्ल्ड गवर्नमेंट
के ऊपर। बैलेंस ऑफ पावर सिस्टम के ऊपर। क्लासिकल लिबरलिज्म का इमरजेंस होता है 17th सेंचुरी में। और यह फोकस करता है
फ्रीडम कोपरेशन पीस एंड प्रोग्रेस के ऊपर। इसके की थिंकर्स रहे हैं लॉक, स्मिथ, कांट एंड बेंथम। और खास बात यह है कि इसकी तीन
इंपॉर्टेंट कोर वैल्यूज़ है। यानी कि क्लासिकल लिबरलिज्म तीन इंपॉर्टेंट वैल्यूज़ के ऊपर फोकस करता है। जिसमें पहली
वैल्यू है ह्यूमन प्रोग्रेस। यह कहता है कि ह्यूमन जो प्रोग्रेस है यानी कि मानव की उन्नति है, वह संभव है। क्यों है?
क्योंकि मानव के पास रीजन होता है, तर्क होता है और जब तर्क होता है तो इसका मतलब यह है कि ह्यूमन एक दूसरे के साथ कोपरेशन
करते हैं और जब कोऑपरेशन करेंगे तो ह्यूमन प्रोग्रेस होना स्वाभाविक है। लिबरलिज्म में पहले थिंकर का नाम आता है जॉन लॉक और
यह ब्रिटिश यानी कि इंग्लिश फिलॉसोफर रहे हैं और इनको जाना जाता है फादर ऑफ लिबरलिज्म के रूप में। और खास बात यह है
कि इन्होंने कहा कि जो लिबरल स्टेट्स होते हैं उनको रूल ऑफ लॉ की पालना करनी चाहिए जिसको आप डच भाषा में रेफ्थ स्टार कहते
हैं। और खास बात यह भी है कि इन्होंने कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स लिखे जिनमें पहला वर्क आता है एनएसए कंसर्निंग ह्यूमन
अंडरस्टैंडिंग और दूसरा आता है टू प्रिट ऑफ सिविल गवर्नमेंट। वहीं दूसरे थिंकर का नाम आता है एडम स्मिथ। तो एडम स्मिथ की जब
हम बात करते हैं, यह स्कॉटिश इकोनॉमिस्ट एंड फिलॉसोफर रहे हैं। और इन्होंने बात की कमर्शियल लिबरलिज्म की जिसमें कि फ्री
ट्रेड और इकोनॉमिक फ्रीडम को बढ़ावा दिया जाता है। और इनके प्रमुख वर्क का नाम है द वेल्थ ऑफ नेशन जो कि 1776 को पब्लिश होती
है। इमैनुअल कांट का जन्म होता है 1724 को और इनकी डेथ होती है 1804 को और इमैनुअल कांट जर्मन फिलॉसोफर रहे हैं और एक
एनलाइटनमेंट थ्योरिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनको जाना जाता है फाउंडर ऑफ रिपब्लिकन लिबरलिज्म और
इन्होंने फेमसली कहा भी था कि डेमोक्रेटिक स्टेट्स डू नॉट मेक वॉर्स। यानी कि जो लोकतांत्रिक राज्य हैं यह कभी भी युद्ध
नहीं करते हैं। और इन्होंने दो इंपॉर्टेंट नोशंस दिए जिनमें पहला नोशन आता है परपेचुअल पीस। इन्होंने कहा कि जो पीस है
उसको हम स्थाई रूप में स्थापित कर सकते हैं। यानी कि जो परपेचुअल पीस है उसको पॉसिबल किया जा सकता है। कैसे पॉसिबल किया
जा सकता है? तो इन्होंने अपने दूसरे सिद्धांत में कहा कि डेमोक्रेसी के द्वारा ही परपचुअल पीस को स्थापित किया जा सकता
है। यानी कि लोकतंत्र ही ऐसा शासन है या ऐसी शासन प्रणाली है जहां पर हम स्थाई रूप में शांति को स्थापित कर सकते हैं। इनके
कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन दूसरा व्हाट इज एनलाइटनमेंट।
तीसरा परपेचुअल पीस ऑफ फिलॉसोफिकल स्केच। अब हम डेमोक्रेटिक पीस थ्योरी को अच्छे से समझ लेते हैं। तो डेमोक्रेटिक पीस थ्योरी
कहती है कि जो लोकतंत्र होता है उसके द्वारा ही परपेचुअल पीस यानी कि पीस को स्थापित किया जाता है। और जो डेमोक्रेटिक
स्टेट्स होते हैं, यह कभी भी एक दूसरे के साथ युद्ध नहीं करते हैं। बल्कि इसके उल्टा जो डेमोक्रेटिक स्टेट्स होते हैं,
उनके द्वारा ही परपेचुअल पीस को स्थापित किया जाता है। और खास बात यह है कि डेमोक्रेटिक जो पीस थ्योरी है, इसके कुछ
इंपॉर्टेंट थिंकर्स रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है इमैनुअल कांट का। दूसरा नाम आता है माइकल डॉयल का और तीसरा नाम आता है
ब्रूस एम रसेट। ब्रूस एम रसेट याले यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस एंड इंटरनेशनल रिलेशंस एंड
एरिया स्टडीज के प्रोफेसर रहे हैं। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जिनमें पहला वर्क आता है ट्रेंड्स इन वर्ल्ड
पॉलिटिक्स। दूसरा वर्क आता है ग्रेस्पिंग द डेमोक्रेटिक पीस। वहीं दूसरी तरफ गुड्रो विल्सन यूएस पॉलिटिशियन रहे हैं। और खास
बात यह भी है कि इन्होंने यूएसए को 28थ प्रेसिडेंट के रूप में सर्व किया और इन्होंने लिबरलिज्म का सेकंड इमेज दिया
जिसे द स्टेट कहा जाता है जिसको हमने पहले ही डिस्कस किया है। और खास बात यह भी है कि इन्होंने 8 जनवरी 1918 को लिबरल
ट्रेडिशन में 14 प्रिंसिपल्स दिए फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के बाद। अगले स्कॉलर का नाम आता है माइकल डॉयल। माइकल डॉयल अमेरिकन
इंटरनेशनल रिलेशन थ्योरिस्ट रहे हैं। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने डेमोक्रेटिक पीस थ्योरी को दिया जो कि
इन्होंने इमैनुअल कांड से बोरो किया। और इससे भी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने लिबरल ज़ोन ऑफ पीस थ्योरी दी। जिसके
अंतर्गत इन्होंने कोट किया पीस इज पॉसिबल ओनली इन अ डेमोक्रेसी। डेमोक्रेटिक स्टेट्स शेयर कॉमन मोरल वैल्यूस। इसका
मतलब यह है कि जो पीस है वह केवल पॉसिबल है डेमोक्रेसी के अंतर्गत। क्योंकि डेमोक्रेसी में ही जोन ऑफ पीस को
एस्टैब्लिश किया जा सकता है। क्योंकि डेमोक्रेटिक जो स्टेट्स होते हैं यह कॉमन मोरल वैल्यूस को शेयर करते हैं, साझा करते
हैं। माइकल डॉयल के कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स है जो कि आपको याद रखने हैं क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी है। तो इनका
पहला वर्क आता है एंपायर्स। दूसरा आता है वेज़ ऑफ वॉर एंड पीस। तीसरा आता है मेकिंग वॉर एंड बिल्डिंग पीस। अगला आता है
स्ट्राइकिंग फर्स्ट और अगला आता है लिबरल पीस और अगला इनका जो एस्स है वह है लिबरलिज्म एंड वर्ल्ड पॉलिटिक्स। अगले
थिंकर का नाम आता है फ्रांसिस फुकयामा। फ्रांसिस फुकयामा यूएस पॉलिटिकल साइंटिस्ट एंड आईआर थ्योरिस्ट रहे हैं। जिन्होंने दो
इंपॉर्टेंट नोशंस दिए। जिनमें पहला नोशन आता है एंड ऑफ हिस्ट्री। इसके अंतर्गत इन्होंने कहा कि जो कोल्ड वॉर हुआ था दो
विचारधाराओं के बीच कम्युनिज्म और कैपिटलिज्म के बीच उसका अंत हो गया है क्योंकि लिबरल जो डेमोक्रेसी है यानी कि
जो कैपिटलिज्म है उसकी जीत हो गई है और जो कम्युनिज्म है वह कोलैप्स कर गया है। वहीं इनका दूसरा नोशन था डेमोक्रेटिक पीस थीसिस
जिसमें इन्होंने कहा कि जो डेमोक्रेसी है उसी के द्वारा पीस को एस्टैब्लिश किया जा सकता है। यानी कि जो लिबरल डेमोक्रेसी है
उसी के ऊपर यानी कि उसी के बेस पे पीस को स्थापित किया जा सकता है। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स भी रहे हैं। जिनमें
पहला वर्क आता है द एंड ऑफ़ हिस्ट्री एंड द लास्ट मैन। दूसरा वर्क आता है पॉलिटिकल ऑर्डर एंड पॉलिटिकल डिके। तीसरा वर्क आता
है द ग्रेट डिसररप्शन। और अगला वर्क आता है लिबरलिज्म एंड इट्स डिस्कंटेंट्स। लिबरलिज्म का अगला प्रकार आता है
इंटरडिपेंडेंस लिबरलिज्म। तो जब हम बात करते हैं इंटरडिपेंडेंस लिबरलिज्म की तो यह शुरू होता है 1970 एंड 1980 में। और
दूसरी खास बात यह है कि यह बात करता है कॉम्प्लेक्स इंटरडिपेंडेंस अमंग स्टेट्स। यानी कि यह कहता है कि जो राज्य होते हैं
उनके बीच जटिल अंतरनिर्भरता पाई जाती है। आपस में जुड़े होते हैं और खास बात यह भी है कि यह बोलता है कि इकोनॉमिक कोपरेशन के
द्वारा ही पीस यानी कि शांति को स्थापित किया जा सकता है। और खास बात यह भी है कि जो इंटरडिपेंडेंस लिबरलिज्म है, यह बात
करता है राइज ऑफ लोअर पॉलिटिक्स। अब लोअर पॉलिटिक्स क्या होती है? हायर पॉलिटिक्स क्या होती है? इसको हम बाद में अच्छे से
डिस्कस करेंगे। लेकिन दूसरी बड़ी बात यह है कि इंटरडिपेंडेंस लिबरलिज्म के दो इंपॉर्टेंट की थिंकर्स रहे हैं। जिनमें
पहला नाम आता है रॉबर्ट कोहन और दूसरा नाम आता है जोसेफ नाई। रॉबर्ट कोहन ने बात की थी एक इंपॉर्टेंट टर्म की जिसका नाम है
रेवोल्यूशन इन मिलिट्री अफेयर्स। यह कहते हैं कि जो मिलिट्री अफेयर्स होते हैं उनमें रेवोल्यूशन आनी चाहिए, क्रांति आनी
चाहिए। वहीं जोसेफ नाय ने एक टर्म को कॉइन किया था जिसका नाम है सॉफ्ट पावर। यह कहते हैं कि जो स्टेट्स होते हैं उनके द्वारा
डिप्लोमेसी में सॉफ्ट पावर को यूज किया जाता है। अब सॉफ्ट पावर क्या होती है? इसमें पावर यानी कि जो मिलिट्री या फिर
वेपंस होते हैं, उसकी जगह जो कल्चरल हेरिटेज होती है, सोशल इकोनॉमिक नॉर्म्स होते हैं, उसके द्वारा वर्ल्ड लेवल पे
हैज़ेमनी स्थापित की जाती है किसी भी कंट्री के द्वारा। जैसे इंडिया के लिए योगा एक सॉफ्ट पावर है। वहीं यूएस के लिए
हॉलीवुड एक सॉफ्ट पावर के रूप में दर्शाता है। अब हम हायर पॉलिटिक्स एंड लोअर पॉलिटिक्स में भी डिफरेंस को देख लेते
हैं। तो रॉबर्ट कोहन एंड जोसेफ नाइन ने लोअर पॉलिटिक्स एंड हायर पॉलिटिक्स की बात की। तो एक तरफ हायर पॉलिटिक्स है, दूसरी
तरफ लोअर पॉलिटिक्स है। हायर पॉलिटिक्स फोकस करता है वॉर, पावर, पीस, सिक्योरिटी एंड मिलिट्री के ऊपर। वहीं लोअर पॉलिटिक्स
फोकस करता है इकोनॉमिक्स, ट्रेड, एनवायरमेंट, सोशियो कल्चरल नॉर्म्स के ऊपर। वहीं हायर पॉलिटिक्स कहता है कि इसके
एक्टर्स स्टेट्स होते हैं। वहीं लोअर पॉलिटिक्स कहता है कि इसके एक्टर्स नॉन स्टेट एक्टर्स होते हैं। वहीं हायर
पॉलिटिक्स कहता है कि यह रियलिज्म के साथ जुड़ा है। यानी कि हायर पॉलिटिक्स रियलिज्म के साथ जुड़ा है। यह रियलिज्म की
अवधारणा है। वहीं लोअर पॉलिटिक्स जुड़ा है लिबरलिज्म के साथ। वहीं दूसरी तरफ हायर पॉलिटिक्स बात करता है कि आईआर में हमेशा
से एनाकी पाई जाती है, अराजकता पाई जाती है और एंडलेस वॉर होते हैं। वहीं लोअर पॉलिटिक्स कहता है कि स्टेट के बीच
क्योंकि इकोनॉमिक कोपरेशन पाया जाता है। इस वजह से स्टेट के बीच कॉम्प्लेक्स इंटरडिपेंडेंस पाई जाती है। अब हम रॉबर्ट
कोहन एंड जोसेफ नाई को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो यह यूएस लिबरलिस्ट्स एंड आईआर थ्योरिस्ट रहे हैं जो कि बात करते
हैं लोअर एंड हायर पॉलिटिक्स की जिसको हमने अच्छे से डिस्कस कर लिया है और खास बात यह भी है कि इन्होंने कांसेप्ट दिया
कॉम्प्लेक्स इंटरडिपेंडेंस का और इस नोशन के अंतर्गत यह कहते हैं कि जो इकोनॉमिक कोपरेशन है डेवलप्ड हो चुका है वेस्टर्न
यूरोपियन कंट्रीज के बीच 1980 और 90 के दशक में और इसी को कोहेन एंड नाइन ने कॉम्प्लेक्स इंटरडिपेंडेंस कहा और खास बात
यह भी है कि इन्होंने आगे लिखा कि जो वेस्टर्न यूरोपियन कंट्रीज है वहां पर हायर पॉलिटिक्स की जगह अब लोअर पॉलिटिक्स
एस्टैब्लिश हो चुकी है क्योंकि इनके बीच इकोनॉमिक रिलेशनशिप को अच्छे से समझा जा सकता है यानी कि डेवलप हुआ है और इसी को
इन्होंने कॉम्प्लेक्स इंटरडिपेंडेंस कहा और खास बात यह भी है कि जोसेफ नाइन ने पॉलिटिकल एंड इकोनॉमिक जो ऑर्गेनाइजेशन है
खासतौर पे जो रीजनल पॉलिट पोलिटिकल एंड इकोनॉमिक ऑर्गेनाइजेशन है। उनको इतनी ज्यादाेंस दी कि इन्होंने इसे कहा आईआर का
पावर आइलैंड। कोहेन एंड नाई के कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जिनमें पहला वर्क आता है पावर एंड इंटरडिपेंडेंस
वर्ल्ड पॉलिटिक्स एंड ट्रांजिशन। दूसरा आता है आफ्टर हैज़ेमनी। तीसरा आता है न्यू रियलिज्म एंड इट्स क्रिटिक्स। अगला आता है
सॉफ्ट पावर द मीन्स टू सक्सेस इन वॉल्व पॉलिटिक्स। और अगला आता है स्मार्ट पावर। और अगला आता है न्यूक्लियर एथिक्स और
लास्ट आता है द फ़्यूचर ऑफ़ पावर। तो, यह जितने भी वक्स हैं, इनको आप अच्छे से याद कर लें। आपके एग्जाम के लिए बहुत ही
इंपॉर्टेंट है। लिबरलिज्म का अगला प्रकार आता है सोशियोलॉजिकल लिबरलिज्म। तो, यह स्टार्ट होता है 1970 में। और खास बात यह
है कि यह फोकस करता है स्टेट के बीच ट्रांस नेशनल रिलेशंस के ऊपर। यानी कि जो स्टेट्स होते हैं, वह एक दूसरे के साथ
संबंध स्थापित करते हैं। और खास बात यह भी है कि यह आईआर में प्लूरलिज्म यानी कि बहुलवाद पर फोकस करता है। जिसमें यह कहता
है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सभी राज्यों की प्रधानता होती है। सभी राज्य अंतरक्रियाएं करते हैं। ना कि रियलिज्म की
तरह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ ही स्टेट्स पाए जाते हैं या उनकी प्रधानता होती है। ऐसा यह रिजेक्ट करता है। और अगला
पॉइंट यह है कि यह फोकस करता है कि स्टेट्स के बीच इंटरडिपेंडेंस पाई जाती है क्योंकि सभी स्टेट एक दूसरे के ऊपर निर्भर
करते हैं और साथ में सभी स्टेट्स एक दूसरे को कोऑपरेशन करते हैं। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह कहता है कि अंतरराष्ट्रीय
राजनीति में एनार्के यानी कि अराजकता होती है। लेकिन साथ में स्टेट्स पीस और सिस्टम को भी चाहते हैं। उसको स्थापित करने का
प्रयास करते हैं। और खास बात यह भी है कि इसके जो थिंकर्स रहे हैं उनमें पहला नाम आता है जेम्स रोजनाऊ दूसरा नाम आता है जॉन
वटन तीसरा नाम आता है कार्ल ड्यूस और चौथा नाम आता है रिचर्ड कॉब्डन जेम्स रोजन्यू यूएस पॉलिटिकल साइंटिस्ट एंड इंटरनेशनल
अफेयर स्कॉलर रहे हैं और इन्होंने इंटरनेशनल स्टडीज एसोसिएशन के प्रेसिडेंट के रूप में काम किया 1984 से 1985 तक और
खास बात यह है कि रोजनिय ने पोस्ट कोल्ड वॉर को फज़ ऑफ़ पोस्ट इंटरनेशनल पॉलिटिक्स के रूप में बताया। और सबसे इंपॉर्टेंट बात
यह है कि इन्होंने एक कोट दिया जिसमें इन्होंने कहा एनार्की इज नॉट एंटायरली डेड। ट्रेडिशनल इंटरनेशनल पॉलिटिक्स वाज़
बेस्ड ऑन बिलियाड बॉल मॉडल। व्हाइल मॉडर्न इंटरनेशनल पॉलिटिक्स इज़ बेस्ड ऑन कॉबे मॉडल। इसके अंतर्गत इन्होंने यह कहा कि जो
एनाकी है, जो अराजकता है, वह पूरी तरह से डेड नहीं हुई है, मृत नहीं हुई है बल्कि अभी भी जीवित है। और इन्होंने कहा कि जो
ट्रेडिशनल इंटरनेशनल पॉलिटिक्स है, यह आधारित है विलियार्ड वॉल मॉडल के ऊपर जो कि रियलिज्म की देन है। साथ में इन्होंने
यह कहा कि जो मॉडर्न इंटरनेशनल पॉलिटिक्स है यह बेस्ड है कॉब मॉडल के ऊपर जो कि न्यू लिबरलिज्म के साथ जुड़ा हुआ है जो कि
बात करता है कॉम्प्लेक्स इंटरडिपेंडेंस की। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है द साइंटिफिक स्टडी
ऑफ़ फॉरेन पॉलिसी। दूसरा आता है द स्टडी ऑफ़ ग्लोबल इंटरडिपेंडेंस। अगला आता है रेस इन इंटरनेशनल पॉलिटिक्स। अगला आता है
टर्बुलेंस इन वर्ल्ड पॉलिटिक्स और अगला आता है द स्टडी ऑफ वर्ल्ड पॉलिटिक्स और लास्ट आता है थिंकिंग थ्योरी थोली। अगले
थिंकर का नाम आता है जॉन ब्रूटन। तो जॉन ब्रूटन ऑस्ट्रेलियन थिंकर ऑथर डिप्लोमेट एंड एकेडमिशियन रहे हैं। दूसरी बड़ी बात
यह है कि इन्होंने आईडिया दिया कॉन्फ्लिक्ट रेसोल्यूशन का और तीसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने कॉब मॉडल ऑफ आईआर
दिया। साथ में इन्होंने ह्यूमन नीड्स थ्योरी की बात की और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं जिनमें पहला आता है
इंटरनेशनल रिलेशन और जनरल थ्योरी दूसरा आता है वर्ल्ड सोसाइटी तीसरा आता है इंटरनेशनल पॉलिटिक एंड चौथा आता है
कॉन्फ्लिक्ट ह्यूमन नीड्स थ्योरी तो जितने भी इनके वर्क्स है इनको अच्छे से आप नोट कर लें क्योंकि एग्जाम के लिए बहुत ही
इंपॉर्टेंट है। अब हम कॉब मॉडल को अच्छे से समझ लेते हैं। तो इसको दिया था जॉन ब्रन ने। तो जब हम बात करते हैं कॉब वेब
मॉडल की तो सबसे पहली बात यह है कि यह फोकस करता है कि नेशन स्टेट के बीच मल्टीपल रिलेशन पाए जाते हैं। दूसरी बड़ी
बात यह कहता है कि जो ट्रांसनेशनल रिलेशन है वह भी पाए जाते हैं स्टेट्स के बीच। और तीसरी बात यह कहता है कि जो इंटरनेशनल
रिलेशन है, यह एक डोमेस्टिक पॉलिटिक्स के रूप में उभर रहा है। क्यों उभर रहा है? क्योंकि स्टेट के बीच कॉम्प्लेक्स
इंटरडिपेंडेंस हो गई है। और अगली बात यह कहता है कि जो नेशनल सिक्योरिटी है अब इसकी जगह वेलफेयर ऑफ द पीपल ने जगह ली है।
यानी कि नेशनल सिक्योरिटी को अब रिप्लेस किया है। वेलफेयर ऑफ द पीपल। जो नेशनल सिक्योरिटी इशू था। खासतौर पे जो रियलिज्म
है उसका कोर सिद्धांत था उसको अब रिप्लेस कर लिया है वेलफेयर ऑफ द पीपल की अवधारणा ने। और दूसरी बड़ी बात यह है कि इसके कुछ
आधारभूत स्तंभ है यानी कि की आइडियाज हैं जैसे इंटरडिपेंडेंस कोऑपरेशन इंटीग्रेशन ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स और खास बात यह भी है कि
यह बोलता है कि आईआर में जो इकोनॉमिक चीजें हैं इकोनॉमिक इशूज़ है और ट्रेड है उसकी काफी ज्यादाेंस है और जो मिलिट्री
फोर्सेस है या आप यह भी कह सकते हैं कि जो हायर पॉलिटिक्स है उसका अब बहुत ही कम इंपॉर्टेंट रोल रह गया है। वहीं दूसरी तरफ
रिचर्ड कॉबडेन 19th सेंचुरी के लिबरल इंग्लिश फिलॉसोफर रहे हैं। जिन्होंने सोशियोलॉजिकल लिबरलिज्म को डिफाइन किया एज
अ लिटिल इंटरकोर्स बिटवीन द गवर्नमेंट्स एज मच कनेक्शन एज पॉसिबल बिटवीन द नेशंस ऑफ द वर्ल्ड। इसका मतलब यह है कि इन्होंने
कहा कि जो सोशियोलॉजिकल लिबरलिज्म होता है ये जो डिफरेंट-डिफरेंट गवर्नमेंट्स होती है उनके बीच इंटरकोर्स और जो नेशंस होते
हैं दुनिया के उनके बीच जो कनेक्शन होता है उसको इन्होंने सोशियोलॉजिकल लिबरलिज्म की संज्ञा दी। लिबरलिज्म के अगले प्रकार
का नाम आता है कमर्शियल लिबरलिज्म। तो कमर्शियल लिबरलिज्म फोकस करता है फ्री ट्रेड के ऊपर और इकोनॉमिक फ्रीडम के ऊपर।
दूसरी बड़ी बात यह है कि यह लिबरलाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन के ऊपर भी फोकस करता है और यह कहता है कि जो स्टेट्स होते हैं
उनके बीच फ्री ट्रेड होना चाहिए यानी कि मुक्त व्यापार होना चाहिए और जो ट्रेड यानी कि व्यापार से जुड़े जो बैरियर्स है
उनको रिमूव कर देना चाहिए। उनको हटा देना चाहिए। और इसके प्रमुख दो इंपॉर्टेंट थिंग कर रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है एडम
स्मिथ का और दूसरा नाम आता है डेविड रिकार्डो का। न्यू लिबरलिज्म में अब हम डिस्कस करेंगे लिबरल इंस्टीट्यूशनलिज्म
को। तो इसमें हम दो इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स को डिस्कस करेंगे। जिसमें पहला कांसेप्ट आता है फंक्शनलिज्म और दूसरा कांसेप्ट आता
है नियो फंक्शनलिज्म। तो जब हम बात करते हैं फंक्शनलिज्म की तो इसको दिया था डेविड वेटनी ने। वहीं दूसरी तरफ नियो
फंक्शनलिज्म को दिया था अर्नेस्ट विहास ने। अब हम फंक्शनलिज्म को अच्छे से और डिटेल में समझ लेते हैं। तो जैसा कि मैंने
पहले भी आपको कहा था कि जो आइडिया ऑफ फंक्शनलिज्म है इसको दिया था डेविड मैट्रॉनी ने और दूसरी बड़ी बात यह है कि
फंक्शनलिज्म फोकस करता है क्रिएशन ऑफ रीजनल ऑर्गेनाइजेशंस। यानी कि यह कहता है कि जो क्षेत्रीय संगठन है उनको क्रिएट
किया जाना चाहिए। वहीं अगला पॉइंट यह है कि फंक्शनलिज्म कहता है कि जो नॉन स्टेट एक्टर्स होते हैं उनके बीच कोपरेशन पाया
जाता है और आप सभी जानते हैं कि नॉन स्टेट एक्टर्स ऐसे एक्टर्स होते हैं आईआर में जिनकी आईआर में बड़ी भूमिका होती है जो
स्टेट्स के अलावा होते हैं और आईआर में इंपॉर्टेंट भूमिका प्ले करते हैं। जैसे कि सिविल सोसाइटीज हैं, एनजीओस हैं, रीजनल
एंड इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन हैं या फिर मल्टीलटरल कंपनीज़ हैं। वहीं इसका अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट यह है कि यह फोकस करता
है पीस एंड कोऑपरेशन के ऊपर और खास बात यह है कि यह बोलता है कि जो कॉनंसेप्ट ऑफ नेशन है यह अब रिलेवेंट नहीं रहा है।
क्यों रिलेवेंट नहीं रहा है? क्योंकि जो नॉन स्टेट एक्टर्स होते हैं उनके बीच कोपरेशन पाया जाता है और नॉन स्टेट जो
एक्टर्स होते हैं उनकी रिलेवेंस बढ़ रही है और इसी वजह से यह कहता है कि जो इकोनॉमिक टेक्नोलॉजी सोशल और कल्चरल
एरनाज़ हैं उनमें स्टेट के बीच फंक्शनल कोपरेशन पाया जाता है और खास बात यह भी है कि यह कहता है कि जो पॉलिटिकल इंस्टीटशंस
हैं यह अब रेलेवेंट नहीं रहे हैं क्योंकि इनकी जगह अब नॉन स्टेट एक्टर्स ले रहे हैं। इसीलिए यह पॉलिटिकल इंस्टीटश के
साथ-साथ जो पॉलिटिकल या नेशनल जो सोवनिटी है उसको भी डिनाई करता है। अब हम नियो फंक्शनलिज्म को डिटेल में समझ लेते हैं।
तो सबसे पहली और सबसे बड़ी बात यह है कि नियो फंक्शनलिज्म की जो शब्दावली है इसको दिया था अर्नेस्ट बीहास ने। दूसरी बड़ी
बात यह है कि नियो फंक्शनलिज्म फोकस करता है इंटीग्रेशन ऑफ द स्टेट्स। यानी कि जो राज्य होते हैं उनका एकीकरण हो। इस बात पर
यह फोकस करता है। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि जो नियो फंक्शनलिज्म है यह दोनों ही इकोनॉमिक और पॉलिटिकल इंस्टीटशंस के ऊपर
फोकस करता है। तीसरी बड़ी बात यह है कि यह नेशनल सोवनिटी के ऊपर भी फोकस करता है। और खास बात यह है कि यह बोलता है कि जब
स्टेट्स के बीच रीजनल इंटीग्रेशन होगा। यानी कि क्षेत्रीय जो एकीकरण होगा तब जाकर ही हम पूरे वर्ल्ड के ऊपर यानी कि वर्ल्ड
के लेवल पर इंटीग्रेशन कर पाएंगे। और इसके लिए नियो फंक्शनलिज्म सबसे पहले यह कहता है कि सबसे पहले जो स्टेट होगा वो वंटरली
यानी कि स्वैच्छिक रूप से पॉलिटिकल पावर को फोरसेक करेगा, त्याग करेगा रीजनल लेवल पे। फिर उसके बाद वर्ल्ड के लेवल पे
करेगा। तब जाकर ही जो वर्ल्ड यूनिटी है यानी कि यूनिफिकेशन है वर्ल्ड का वह पूरा हो पाएगा। और खास बात यह भी है कि जो नियो
फंक्शनलिज्म है यह फोकस करता है स्पिल ओवर एंड हाइपर स्पिल ओवर थ्योरी के ऊपर जिसको हम बाद में समझेंगे। तो ये दो इंपॉर्टेंट
फॉर्म्स की बात करता है। जिनमें पहला फॉर्म आता है फंक्शनल हाइपर स्पिलओवर जिसमें यह कहता है कि जो स्टेट्स के जो
कार्य होते हैं फंक्शनंस होते हैं उनमें यूनिफिकेशन हो और दूसरा यह कहता है कि जो स्टेट्स के पॉलिटिकल फंक्शनंस होते हैं,
पॉलिटिकल पावर होती है, उनमें भी यूनिटी हो, यूनिफिकेशन हो और सबसे पहले जो भी यूनिटी होगी, वह रीजनल लेवल पे होगा। अब
हम आर्नेस्ट बीहास को अच्छे से समझ लेते हैं। तो पहली बड़ी बात यह है कि यह जर्मन अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं।
दूसरी बड़ी बात यह है कि इनको जाना जाता है फादर ऑफ नियो फंक्शनलिज्म इन आईआर। और तीसरी सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने
नियो फंक्शनलिज्म के अंतर्गत स्पिल ओवर एंड हाइपरस्पिल ओवर के नोशंस दिए। तो अब हम इनको ही समझ लेते हैं। तो जब हम बात
करते हैं स्पिल ओवर की तो हम कह सकते हैं कि जो एक इंडिविजुअल होता है, पर्सन होता है, उसके जो एप्रोचेस होते हैं, इमोशंस
होते हैं, स्किल्स होती है, बिहेवियर होता है। जब उन सभी चीजों का एक डोमेन से यानी कि एक एरिया से दूसरे एरिया में या फिर
दूसरे डोमेन में नेगेटिव या पॉजिटिव इंपैक्ट पड़ता है तो आप उसको स्पिल ओवर कहते हैं। वहीं दूसरी तरफ़ जब हम स्पिल ओवर
की बात करते हैं नियो फंक्शनलिज्म इन आईआर में तो हम कह सकते हैं कि जो स्टेट के बीच इकोनॉमिक रिलेशंस होते हैं जब उनका
इंपैक्ट दूसरे जो डोमेनस होते हैं चाहे वो पॉलिटिकल हो चाहे वो सोशल हो कल्चरल हो तो आप उसको स्पिल ओवर कहते हैं। और वहीं
दूसरी तरफ अगर आप हाइपरस्पिल ओवर की बात करें तो इसमें क्या होता है कि जब बड़ी मात्रा में जो एक डोमेन होता है यानी कि
जैसे इकोनॉमिक डोमेन है उसके भी जब स्टेट में कोपरेशन पाया जाता है, रिलेशंस पाए जाते हैं, इंटीग्रेशन पाया जाता है। जब
उसका बड़ी मात्रा में दूसरे जो डोमेन है जैसे पॉलिटिकल या फिर सोशियो कल्चरल उसके ऊपर जब पॉजिटिव इंपैक्ट पड़ता है तो उसको
आप हाइपर स्किल ओवर कहते हैं। तो इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स भी रहे हैं जिनमें पहला आता है द यूनाइटिंग यूरोप जो कि बहुत ही
इंपॉर्टेंट है। दूसरा आता है बिय्ड द नेशन स्टेट। यह भी बहुत ही इंपॉर्टेंट है। और अगला आता है नेशनलिज्म, लिबरलिज्म एंड
प्रोग्रेस। इंग्लिश स्कूल के सबसे पहले थिंकर का नाम आता है हेड लेबल। तो हेडलेबल ऑस्ट्रेलियन आईआर थ्यरिस्ट रहे हैं और
इंग्लिश स्कूल के की थिंकर रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनका सबसे प्रमुख वर्क द एनार्किकल सोसाइटी जो कि 1977 को पब्लिश
होता है। इसमें इन्होंने सिस्टम ऑफ स्टेट्स और जो सोसाइटी ऑफ स्टेट्स है उसमें डिफरेंस स्थापित किया। इन्होंने कहा
कि सिस्टम ऑफ स्टेट्स रियलिज्म के साथ जुड़ा हुआ है। जबकि सोसाइटी ऑफ स्टेट सीधा का सीधा इंग्लिश स्कूल के साथ जुड़ा हुआ
है। दूसरी प्रमुख बात यह है कि इन्होंने थ्योरी एंड प्रैक्टिस की नियो ग्रोशन अप्रोच को दिया और अगली सबसे बड़ी बात यह
है कि इन्होंने इंटरनेशनल सोसाइटी का कांसेप्ट दिया जिसमें इन्होंने कहा कि जो सोवन स्टेट्स है आईआर में वे आपस में
कंप्रेशन करते हैं। आपस में इंटरेक्शन करते हैं और ऐसी स्थिति में उनकी जो सोसाइटी होती है वो इंटरनेशनल सोसाइटी बन
जाती है क्योंकि इस तरह की जो सोसाइटी होती है वह प्लुरलिस्टिक इन नेचर होती है। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं जिनमें
पहला नाम आता है द कंट्रोल ऑफ द आर्म्स रेस। दूसरा आता है द एनारकिकल सोसाइटी। तीसरा आता है जस्टिस इन इंटरनेशनल
रिलेशंस। और चौथा आता है हगो ग्रुशियस एंड इंटरनेशनल रिलेशंस। इंग्लिश स्कूल के अगले इंपॉर्टेंट थिंकर का नाम आता है मार्टिन
वाइट। तो जब हम बात करते हैं मार्टिन वाइट की तो यह इंपॉर्टेंट ब्रिटिश स्कॉलर रहे हैं आईआर के। दूसरी बड़ी बात यह है कि
इन्होंने आईआर में थ्री आवर्स का कांसेप्ट दिया जिसको हम बाद में अच्छे से डिटेल में डिस्कस करेंगे। और सबसे बड़ी बात यह है कि
इन्होंने इसके अंतर्गत यह कहा कि जो इंटरनेशनल सोसाइटी है वह ना तो केटिक और वायलेंट होती है जैसा कि रियलिज्म कहता है
और ना ही ब्लिसफुल या फिर पीसफुल होती है जैसा कि लिबरलिज्म कहता है। तो सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने तीन इंपॉर्टेंट
ट्रेडिशन की बात की आईआर में जिनको हम बाद में अच्छे से डिटेल में डिस्कस करेंगे। तो ये तीन ट्रेडिशंस है जिनमें रियलिज्म आता
है, रैशनलिज्म आता है एंड रेवोल्यूशनलिज्म आता है। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जिनमें पहला नाम आता है पावर
पॉलिटिक्स। दूसरा आता है इंटरनेशनल थ्योरी द थ्री ट्रेडिशंस। बहुत ही इंपॉर्टेंट वर्क है। अगला आता है व्हाई इज देयर नो
इंटरनेशनल सोसाइटी जो कि एस्स है इनका। और अगला वर्क आता है सिस्टम्स ऑफ स्टेट्स। अब हम मार्टिन बाइट के द्वारा आईआर की दी गई
तीन इंपॉर्टेंट ट्रेडिशंस को डिस्कस कर लेते हैं। तो इसमें पहली आती है रियलिज्म, दूसरी आती है रैशनलिज्म और तीसरी आती है
रेवोल्यूशनलिज्म। तो सबसे पहले जब हम रियलिज्म की बात करते हैं तो इसमें हम डिस्कस करते हैं एनाकी
पावर पॉलिटिक्स, कॉन्फ्लिक्ट, वॉरफेयर एंड पैसिमिज्म। वहीं रैशनलिज्म में हम डिस्कस करते हैं सोसाइटी, इवोल्यूशनरी चेंज,
पीसफुल को एकिस्टेंस, होप विदाउट इल्लुजन। वहीं रेवोल्यूशन में हम डिस्कस करते हैं ह्यूमैनिटी रेवोल्यूशनरी चेंज एंड स्टेट
एंड यूटोकनिज्म। वहीं अगले थिंकर का नाम आता है एडम बॉटसन। तो एडमम बॉटसन ब्रिटिश इंटरनेशनल रिलेशन थ्यरिस्ट रहे हैं। और यह
इंग्लिश स्कूल के फाउंडिंग मेंबर रहे हैं। इनके कुछ वक्स है जिनमें पहला आता है डिप्लोमेसी द डायलॉग बिटवीन स्टेट्स।
दूसरा आता है द इवोल्यूशन ऑफ इंटरनेशनल सोसाइटी और अगला आता है द लिमिट्स ऑफ इंटरडिपेंडेंस।
बिहेवियरलिज्म में अब हम सबसे पहले डिस्कस कर लेते हैं मॉर्टन केप्लन को। तो मॉर्टन केप्लन यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में
पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर रहे हैं जो कि अब एमिरेटर्स प्रोफेसर हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि मॉर्न केप्लन ने जो
ट्रेडिशनलिज्म वर्सेस बिहेवियरलिज्म अप्रोच थी उसको द ग्रेट डिबेट के नाम से पुकारा। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने
कम्युनिज्म और जो सोवियत यूनियन की पॉलिसीज रही है इसकी आलोचना की और इसकी आलोचना करने के लिए 1979 में इन्होंने एक
लेख लिखा जिसका नाम था द मेनी फेजेस ऑफ कम्युनिज्म और नोट करने वाली बात यह भी है कि मार्टिन केप्लन ने जो आईआर है यानी कि
इंटरनेशनल रिलेशंस है उसकी स्टडी करने के लिए एक न्यू एनालिटिकल टूल दिया जिसको आप सिस्टम एनालिसिस कह सकते हैं। तो इसी वजह
से जो है इन्होंने आईआर में सिस्टम थ्योरी को दिया यानी कि सिस्टम अप्रोच को दिया। मार्टिन केप्लन के स्क्रीन पर जितने भी
आपको वक्स दिखाई दे रहे हैं इनको आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी है। मार्टिन केप्लन ने
सिस्टम एप्रोच में छह प्रकार के सिस्टम्स की बात की है। जिनमें पहला आता है पावर बैलेंस सिस्टम। तो यह एक ऐसा सिस्टम है
जिसमें जो नेशन होते हैं वह इंटरनेशनल एक्टर के रूप में रोल प्ले करते हैं। यह बेसिकली एक हिस्टोरिकल मॉडल है जो कि 18थ
और 19थ सेंचुरी में प्रचलित था। इसमें पांच से छह नेशंस एक एक्टर के रूप में काम करते थे। एग्जांपल के लिए ब्रिटेन,
फ्रांस, इटली, ऑस्ट्रिया, हंगरी जैसे जो नेशंस थे उन्होंने इंटरनेशनल एक्टर्स के रूप में रोल प्ले किया था। इन सभी देशों
के बीच जो पावर्स है उनका इक्वल डिस्ट्रीब्यूशन होता था। और जो दूसरा सिस्टम है इसका नाम है लूज बायपोलर
सिस्टम। इसमें क्या होता है कि बहुत सारे एक्टर्स होते हैं जो कि आईआर को इन्फ्लुएंस करते हैं और यहां पर जो
परफेक्ट बैलेंस ऑफ पावर है वह नहीं हो पाता है क्योंकि बहुत सारे नेशंस होते हैं। हालांकि जो दो सुपर पावर है वो दूसरे
नेशंस की वजह से या उनके सहयोग से जो है बैलेंस ऑफ़ पावर को क्रिएट करने की कोशिश करते हैं। एग्जांपल के लिए कोल्ड वॉर में
जिस तरह से नेम ने रोल प्ले किया था वैलेंस ऑफ़ पावर को क्रिएट करने में वह हम देख सकते हैं इसमें। हालांकि इसमें
परफेक्ट बैलेंस ऑफ पावर नहीं होता है। थर्ड सिस्टम आता है टाइट बायपोलर सिस्टम जिसकी खास बात यह है कि इसमें केवल टू
सुपर पावर्स परफॉर्म करती है। बाकी जो नेशंस होते हैं या तो वह न्यूट्रल होते हैं या फिर अलायंस के द्वारा दोनों गुटों
के साथ जुड़ते हैं। तो इसकी खास बात यह है कि इसमें वर्ल्ड दो भागों में बंट जाता है। जैसा कि जोसेफ स्टालिन ने कहा भी था
कि या तो आप हमारे साथ हैं और अगर आप हमारे साथ नहीं है तो फिर आप हमारे शत्रु हैं। वहीं तीसरा इसका जो पॉइंट आता है वो
आता है यूनिवर्सल इंटरनेशनल सिस्टम। इसकी खास बात यह है कि पूरे वर्ल्ड को एक यूनिवर्सल जो संस्था है या इंस्टीट्यूशन
है या पावर है उसके द्वारा कंट्रोल किया जाता है। जैसे कि यूनाइटेड नेशंस है। इसमें जो स्टेट्स होते हैं वह पीसफुल
तरीके से अपने जो ऑब्जेक्टिव्स होते हैं उनको पूरा करने की कोशिश करते हैं। क्योंकि यू एनओ के द्वारा या फिर जो
इंटरनेशनल जो इंस्टीट्यूशन है जो सर्वोपरि है उसके द्वारा उनके ऊपर सेक्स लगाए जाते हैं। रेस्ट्रिकशंस लगाए जा सकते हैं। आईआर
की सिस्टम अप्रोच का जो अगला मॉडल आता है, इसका नाम है द हायरार्किकल मॉडल और इसकी खास बात यह है कि यह एक प्रकार का
मल्टीपोलर सिस्टम होता है यूनिपोलर सिस्टम के अंतर्गत। यानी कि बाद में यह यूनिपोलर बन जाता है क्योंकि एक नेशन या फिर एक देश
के पास इतनी सारी शक्ति आ जाती है कि वो सुपर पावर बन जाता है और जो दूसरे नेशंस होते हैं यह फॉलोअ हो जाते हैं। यहां तक
कि जो यूनिवर्सल एक्टर है यानी कि यूएनओ है ये भी अपने जो फंक्शनंस है वो सुपर पावर के निर्देश में ही करता है। और अगला
जो मॉडल यानी कि सिस्टम है इसका नाम है द यूनिट वीटो सिस्टम। तो इसकी खास बात यह है कि सभी देशों के पास इसमें न्यूक्लियर
बॉम्ब्स होते हैं। सभी समान रूप से शक्तिशाली होते हैं और जो यूनिवर्सल एक्टर है उसकी रेलेवेंस खत्म हो जाती है। यानी
कि यू एनओ अब रेलेवेंट नहीं रहता है। और खास बात यह है कि इसकी तुलना आप हॉब्स का जो स्टेट ऑफ नेचर था उससे तुलना कर सकते
हैं। जहां पर वायलेंस थी, मारकाट था। तो खास बात यह है और दूसरी बात यह है कि इसमें P5 जो नेशन है जो जिनके पास
न्यूक्लियर पावर है जिनके पास यूएओ में वीटो है उनमें आप इसको रख सकते हैं। 1991 में यूएसएसआर के कोलैप्स के बाद मॉर्टन
कैप्लनलर ने आईआर के चार नए सिस्टम्स दिए जिनमें मॉर्टन कैप्लर ने पहला दिया ओवर लूज बायपोलर सिस्टम जिसमें बायपोलर जो
सिस्टम होता है वह बहुत ही ढीला ढाला होता है। दूसरा इन्होंने जो दिया, इसका नाम है अनस्टेबल ब्लॉक सिस्टम। इसमें क्या होता
है कि जो ब्लॉक से जुड़े नेशन है, वह एक दूसरे ब्लॉक को छोड़कर आते जाते रहते हैं अपने हितों की पूर्ति के लिए। दूसरा
इन्होंने दिया जिसमें दो गुटों के बीच पीसफुल रिलेशन होते हैं। और अगला जो इन्होंने दिया वो दिया इनएट न्यूक्लियर
नॉन प्रोलीिफ्रेशन सिस्टम। जिसमें क्या होता है कि जो P5 नेशंस होते हैं यानी कि जिनके पास न्यूक्लियर पावर है वे अन्य
देशों को न्यूक्लियर बम बनाने से रोकते हैं। लेकिन फिर भी भारत हो गया या फिर पाकिस्तान हो गया, नॉर्थ कोरिया हो गया।
ऐसे देश फिर भी जो न्यूक्लियर वेपंस है या न्यूक्लियर बम्ब्स है वो बना लेते हैं। बिहेवियरलिज्म की अगली थ्योरी का नाम आता
है कम्युनिकेशन थ्योरी। तो कम्युनिकेशन थ्योरी को सबसे पहले मैथमेटिक्स में यूज़ किया था नॉबर्ट विनर ने। इन्होंने अपनी
प्रमुख कृति साइबरनेटिक्स और कंट्रोल एंड कम्युनिकेशन इन द एनिमल एंड द मशीन जो कि 1948 को पब्लिश होती है। इसमें
साइबरनेटिक्स शब्दावली को कॉइन किया था। और वहीं दूसरी तरफ रॉस एसबे ने भी मैथमेटिक्स में कम्युनिकेशन थ्योरी को
दिया था और कम्युनिकेशन थ्योरी एक मेथड है जो कि आईआर में डिसीजन कैसे लिया जाए इसकी वकालत करती है। दूसरी बड़ी बात यह है कि
इसको पॉलिटिकल कम्युनिकेशन के रूप में भी जाना जाता है और पॉलिटिकल साइंस में कार्ल ड्यूस ने कम्युनिकेशन थ्योरी को दिया था।
दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि जो कम्युनिकेशन थ्योरी है यह बताती है कि पॉलिटिक्स और गवर्नमेंट सिर्फ यह ही
प्रॉब्लम ऑफ पावर नहीं है बल्कि यह प्रॉब्लम ऑफ स्टीयरिंग जो है उससे भी जुड़ी है। उदाहरण के लिए जैसे एक व्हीकल
होता है उसमें पुरजे होते हैं जो वाहन की गति को कंट्रोल करते हैं। उसी तरीके से जो पॉलिटिक्स एंड गवर्नमेंट है वह इस बात से
भी जुड़े हैं कि जो पावर है उसको कैसे कंट्रोल किया जाए। अब हम कम्युनिकेशन अप्रोच में कार्ल ड्यूस को अच्छे से
डिस्कस कर लेते हैं। तो कार्ल ड्यूस जैक सोशल एंड पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। इन्होंने जो आईआर का सोशियोलॉजिकल
लिबरलिज्म स्कूल है इसके डेवलपमेंट में कंट्रीब्यूशन दिया। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने पॉलिटी सिस्टम की जगह
पॉलिटिकल कम्युनिकेशन शब्दावली को यूज़ किया। और अगली इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि इन्होंने कहा कि जो स्टीयरिंग है वह
पॉलिटिकल सिस्टम का कोर एलिमेंट है। और दूसरी बड़ी बात यह भी है कि इन्होंने जो पॉलिटिकल सिस्टम है इसकी तुलना मशीन से की
जबकि गवर्नमेंट की तुलना स्टीयरिंग ऑफ शिप से की। दूसरी बड़ी बात यह भी है कि कार्ल डश ने यह कहा कि जो ट्रांस नेशनल रिलेशंस
होते हैं नेशंस के बीच उसकी वजह से पीसफुल रिलेशनशिप स्थापित किए जा सकते हैं। जिसको कि कार्ल ड्यूस ने सिक्योरिटी कम्युनिटी
कहा। तो इन्होंने सिक्योरिटी कम्युनिटी का इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया। आप इसको अच्छे से याद रखें। और नोट करने वाली बात यह भी
है कि ड्यूस ने पॉलिटिकल सिस्टम के तीन इंपॉर्टेंट एलिमेंट्स को बताया जिनमें आता है इनोवेशन, ग्रोथ एंड चेंज। अब हम कार्ल
ड्यूस के द्वारा बताई गई कम्युनिकेशन थ्योरी के कुछ इंपॉर्टेंट फीचर्स या फिर उससे जुड़े की कांसेप्ट्स को देख लेते
हैं। तो इसका पहला जो फीचर है वो है साइबरनेटिक्स। जिसका मतलब होता है नियंत्रण व संतुलन। यानी कि जो
कम्युनिकेशन है उसको किस तरह से बैलेंस्ड किया जाता है। किस तरह से कंट्रोल किया जाता है। दूसरी इसकी फीचर है रिसेप्टर।
इसका मतलब यह है कि जो सूचना प्राप्त करने वाला है कौन है? कैसी वह सूचना प्राप्त कर रहा है? यानी कि जो सूचना प्राप्त करता
है। तीसरा आता है इफेक्टर्स यानी कि जो इंफॉर्मेशन है, सूचना उससे कौन प्रभावित हो रहे हैं। अगला आता है चैनल यानी कि
सूचना यानी कि कम्युनिकेशन का जो मीडियम है वह क्या है? अगली फीचर आती है लोड यानी कि भार की मात्रा कितनी है? किस लेवल पर
या किस हद तक कम्युनिकेशन किया जा रहा है? कितना जो है वह चैनल के ऊपर भार है? और अगला आता है लोड कैपेसिटी। इसका मतलब यह
है कि जो चैनल है मीडियम है उसकी कितनी क्षमता है? वह कितने भार को उठा सकता है? कितने कम्युनिकेशन को उठा सकता है?
कम्युनिकेशन थ्योरी की अगली विशेषता आती है फीडबैक। तो फीडबैक को कार्ल ड्यूस ने दो भागों में बांटा है। एक है पॉजिटिव
फीडबैक, दूसरा है नेगेटिव फीडबैक। तो नेगेटिव जो फीडबैक है, इसको कार्ल ड्यूस ने कम्युनिकेशन थ्योरी की सोल कहा है।
आत्मा कहा है। और खास बात यह भी है कि नेगेटिव फीडबैक के चार एलिमेंट बताए हैं कार्ल ड्यूस ने। जिनमें पहला आता है लोड।
लोड का मतलब होता है कि सूचना की मात्रा कितनी है और दूसरा जो आता है वह लैग जिसका मतलब होता है प्राप्त सूचना यानी कि कितनी
सूचना प्राप्त हुई है और इसके ऊपर कार्यवाही में कितनी देरी हुई है। वहीं अगला जो आता है इसका नाम है गेन यानी कि
सूचना निर्णय के प्रति जो अनुक्रिया है यानी कि रिस्पांस है इसमें हम गेन में शामिल कर सकते हैं। और जो अगला आता है वह
है लीड जिसका मतलब होता है अग्रता यानी कि जो निर्णय हैं उनके जो क्रियान्वयन है यानी कि उनको जो लागू किया गया है उससे
पहले जो भावी परिणाम है उनका पता लगाना यानी कि जो फ्यूचर में कॉन्सिक्वेंसेस होने वाले हैं रिजल्ट होने वाले हैं उनका
पता लगाना लीड में आता है। कम्युनिकेशन थ्योरी की अगली विशेषता आती है रिकॉल। तो रिकॉल का जो मतलब है वह यह है कि जो
डिसीजन मेकिंग आप करते हैं यानी कि जो डिसीजन आप लेते हैं उसको करने के लिए जब आप पहले वाले यानी कि जो पुराने
एक्सपीरियंसेस है आपको जब आप काम में लेते हैं तो उसको आप रिकॉल कहते हैं। वहीं अगला आता है गोल चेंजिंग यानी कि जो आपको
फीडबैक मिलता है खासतौर पे जो नेगेटिव फीडबैक मिलता है उसके अनुसार गोल में परिवर्तन करना चेंज करना ही गोल चेंजिंग
कहलाता है। और लास्ट आता है एनकोडिंग यानी कि जो एनकोडर होता है उसके द्वारा लास्ट में इसको एनकोड किया जाता है। तो यह
कम्युनिकेशन थ्योरी के जितने भी फीचर्स थे या कांसेप्ट्स थे इनको आप याद कर लें क्योंकि बहुत ही इंपॉर्टेंट है
कम्युनिकेशन थ्योरी को अंडरस्टैंड करने के लिए। कार्ल ड्यूस के कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है द नर्व्स
ऑफ गवर्नमेंट जो कि 1968 को पब्लिश होता है। दूसरा आता है कम्युनिकेशन मॉडल एंड डिसीजन सिस्टम जो कि 1967 को पब्लिश होता
है। बिहेवियरलिज्म में अगली थ्योरी आती है डिसीजन मेकिंग थ्योरी। तो डिसीजन मेकिंग थ्योरी को पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में दिया
था हरबर्ट साइमन ने। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि आईआर में जो डिसीजन मेकिंग थ्योरी है इसको दिया था रिचर्ड सी स्नाइडर
ने एच डब्ल्यू ब्रक और ब्रटन सापिन ने। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने एक इंपॉर्टेंट वर्क लिखा था जिसका नाम है
फॉरेन पॉलिसी डिसीजन मेकिंग एन एप्रोच टू द स्टडी ऑफ द इंटरनेशनल पॉलिटिक्स जो कि 1957 को पब्लिश होता है और यह जो एप्रोच
है यह कहती है कि जो फॉरेन पॉलिसी होती है उसमें इंटरनेशनल सिचुएशंस क्रूशियल नहीं होती है बल्कि जो इंडिविजुअल्स होते हैं
और जो लीडर्स होते हैं वे इंपॉर्टेंट होते हैं क्योंकि जो डिसीजंस है वह लीडर्स के द्वारा लिए जाते हैं। तो इस तरह से जो
डिसीजन मेकिंग थ्योरी है यह कहती है कि जो लीडर्स है वह फॉरेन पॉलिसी में की एक्टर्स होते हैं बजाय नेशंस के। स्नाइडर ने
डिसीजन मेकिंग थ्योरी के कुछ इंपॉर्टेंट एलिमेंट्स बताए हैं। जिनमें पहला आता है पर्सनालिटी। दूसरा इसमें आता है प्रोसेस
ऑफ डिसीजन मेकिंग और तीसरा इसमें आता है एनवायरमेंट। वहीं प्रोसेस ऑफ जो डिसीजन मेकिंग है इसके आगे चलकर तीन एलिमेंट है।
जिनमें पहला आता है कैपेबिलिटी ऑफ़ लीडर। दूसरा आता है रिलायबल इंफॉर्मेशन यानी कि इंफॉर्मेशन कितनी सही है और तीसरा आता है
लीडर्स मोटिवेशन यानी कि जो लीडर्स है वह अपने आप को कितना मोटिवेट रखता है क्या उसका मोटिवेशन का सोर्स है अब हम डिसीजन
मेकिंग थ्योरी को प्रोपाउंड करने वाले थिंकर जिनका नाम रिचर्ड सी स्नाइडर है इनको डिस्कस कर लेते हैं तो यह अमेरिकन
पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं जिनका स्पेशलाइजेशन फॉरेन पॉलिसी में रहा है। दूसरी बड़ी बात यह है कि स्नाइडर ने कहा
कि नेशंस इंपॉर्टेंट नहीं होते हैं बल्कि जो लीडर्स हैं वह इंपॉर्टेंट होते हैं क्योंकि डिसीजंस नेशंस के द्वारा नहीं लिए
जाते हैं बल्कि लीडर्स के द्वारा लिए जाते हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने यह कहा कि डिसीजंस बहुत ही इंपॉर्टेंट टूल
होते हैं किसी भी देश की फॉरेन पॉलिसी में और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जो आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं। इनको
आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी है। बिहेवियरलिज्म में अब हम डिस्कस करते हैं
गेम थ्योरी को। तो गेम थ्योरी मैथमेटिक्स की ब्रांच रही है। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह डिसीजन मेकिंग से जुड़ी एक थ्योरी
है और यह डिस्कस करती है यानी कि स्टडी करती है कि सिचुएशन ऑफ कॉन्फ्लिक्ट में किस तरह से एक्टर्स या फिर नेशंस के
द्वारा डिसीजंस लिए जाते हैं। और अगली इंपॉर्टेंट बात यह है कि जो ग्रुप्स होते हैं या एक्टर्स होते हैं, इंडिविजुअल्स
होते हैं जो कॉन्फ्लिक्ट में इनवॉल्व होते हैं उनके द्वारा किस तरह की स्ट्रेटजीज़ बनाई जाती है या फिर किस तरह के स्टेप्स
उठाए जाते हैं। तो इस तरह से हम रियल लाइफ जो गेम्स हैं उनकी तुलना हम कर सकते हैं आईआर से। जैसे क्रिकेट है, फुटबॉल है, चेस
है। क्योंकि इन सभी गेम्स में भी प्लेयर्स होते हैं। कंपटीशन होता है और हर प्लेयर यानी कि हर टीम जीतना चाहती है। उसी तरह
से आईआर में भी जो स्टेट्स हैं, वह कंपटीशन करते हैं, वॉर करते हैं। अपने इंटरेस्ट गेन करते हैं और साथ में पॉलिसीज
बनाते हैं, स्ट्रेटजीज़ बनाते हैं। और अगली इंपॉर्टेंट बात यह है कि 1932 में पीजी कैंब्रे ने एक इंपॉर्टेंट बुक को पब्लिश
किया जिसका नाम था द गेम ऑफ पॉलिटिक्स और स्टडी ऑफ द प्रिंसिपल्स ऑफ ब्रिटिश पॉलिटिकल स्ट्रेटजीज़। और सबसे इंपॉर्टेंट
बात यह है कि गेम थ्योरी के ऊपर फर्स्ट सिस्टेटिक वर्क 1944 को पब्लिश किया जाता है जॉन वॉन न्यूमेन और ऑस्कर मॉ्गनस्टन के
द्वारा। जिसका टाइटल था थ्योरी ऑफ़ गेम्स एंड इकोनॉमिक बिहेवियर। और नोट करने वाली बात यह है कि गेम थ्योरी को आईआर के
स्कॉलर्स के द्वारा आईआर में स्टार्ट किया जाता है 1950 और 1960 के दशक में। वहीं दूसरी तरफ गेम थ्योरी के दो इंपॉर्टेंट
पार्ट होते हैं। पहला पार्ट जीरो सम गेम है और दूसरा नॉन जीरो सम गेम है। तो जब हम बात करते हैं जीरो सम गेम की तो इसमें
क्या होता है कि एक साइड यानी कि एक प्लेयर या एक स्टेट कंप्लीटली जीत अर्जित करता है। दूसरी तरफ जो दूसरा प्लेयर या
फिर दूसरा एक्टर है या दूसरा स्टेट है उसका कंप्लीटली लॉस होता है। और इसका मतलब यह है कि अगर एक साइड किसी की विन हुई है
तो दूसरी साइड लॉस हुआ है तो उससे एक बैलेंस क्रिएट हो जाता है। वहीं दूसरी तरफ नॉन ज़ीरो सम गेम में क्या होता है कि
इसमें दोनों ही प्लेयर जीत भी सकते हैं एक समय में या दोनों ही जो प्लेयर है या एक्टर है या स्टेट है एक ही समय पे दोनों
हार सकते हैं। और खास बात यह भी है कि अगर किसी को कोई प्लेयर है या कोई एक्टर है या स्टेट है उसको गेन हुआ है उसको कोई फायदा
हुआ है तो इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरे को लॉस ही होगा। वहीं दूसरी तरफ गेम थ्योरी के दो इंपॉर्टेंट मॉडल है। जिनमें
पहला मॉडल आता है प्रिजनर्स डलेमा और दूसरा आता है गेम ऑफ चिकन। तो एक तरफ जब हम बात करते हैं प्रिजनर्स डलेमा की तो
इसमें हम डिस्कस यह करते हैं कि इसके थिंकर्स रहे हैं अल्बर्ट डब्ल्यू टकर और थॉमस शेलिंग। और खास बात यह है कि जो यह
मॉडल है यह वहां पर यूज़ किया जाता है या फिर ऐसी सिचुएशन को डिस्क्राइब करने के लिए किया जाता है जहां पर दो इंडिविजुअल्स
और ग्रुप रैशन डिसीजंस लेते हैं, चॉइससेस लेते हैं ताकि उन्हें अधिक से अधिक या फिर बेस्ट से बेस्ट आउटकम प्राप्त हो सके।
हालांकि उन्हें ऐसा आउटकम यानी कि अच्छा आउटकम उनके हित में नहीं मिलता है क्योंकि उन्हें एक दूसरे के ऊपर फेथ नहीं होता है।
ट्रस्ट नहीं होता है। एग्जांपल इसका कोल्ड वॉर है क्योंकि कोल्ड वॉर में लैक ऑफ ट्रस्ट की वजह से दोनों ग्रुप्स ने इतने
हथियार बना लिए थे। इतने न्यूक्लियर वेपंस बना लिए थे कि कई बार तो न्यूक्लियर वॉर होने का खतरा भी मर्डरा गया था। और अगर आप
इस लेक्चर को यानी कि प्रिजनर्स डलेमा को डिटेल में पढ़ना चाहते हैं तो मैंने ऑलरेडी इसके ऊपर लेक्चर बना रखा है। आप
इसको प्लेलिस्ट में जाकर देख सकते हैं या फिर वीडियो के एंड में आपको इसका लिंक मिल जाएगा। वहीं दूसरी तरफ जब आप बात करते हैं
गेम ऑफ चिकन की तो इसको दिया था यानी कि इसके प्रोपाउंडर रहे हैं आर डंकन लुईस। और गेम ऑफ चिकन
यह बताती है कि सर्वाइवल इंपॉर्टेंट होता है किसी भी एक्टर के लिए। किसी भी स्टेट के लिए ना कि विक्ट्री। जब एक स्टेट को या
एक एक्टर को यह लगता है कि उसकी हार होने वाली है तो ऐसी स्थिति में वो हार को कबूल कर लेता है। कंप्रोमाइज कर लेता है
क्योंकि उसे लगता है कि उसके लिए सर्वाइवल इंपॉर्टेंट है। तो ऐसी स्थिति में क्या होता है कि उसकी आईआर में तो जो छवि है वह
धूमिल हो जाती है। यानी कि उसका जो इमेज है वह डाउन हो जाता है। लेकिन वह सर्वाइव कर पाता है। तो यहां पर जो चिकन है वह
बेसिकली सर्वाइवल का सिंबल है। क्योंकि खाना सर्वाइव करने के लिए इंपॉर्टेंट रहता है। और इसका बेस्ट एग्जांपल यह है कि
क्यूबा मिसाइल जो संकट हुआ था यानी कि क्राइसिस जो है क्यू1 मिसाइल क्राइसिस है वो 1962 में होता है। इसका बेस्ट एग्जांपल
है जहां न्यूक्लियर वॉर होते-होते बच गया था। इसको आप न्यूक्लियर ब्रकनशिप भी कहते हैं। और दूसरी बड़ी बात यह है कि जो गेम
ऑफ चिकन है इसको लिमिटेड वॉर या फिर डिसआर्मामेंट में यूज़ किया जाता है। तो हम गेम थ्योरी में कुछ इंपॉर्टेंट
थ्योरिस्ट भी पढ़ेंगे यानी कि थिंकर्स को हम डिस्कस करेंगे जिनमें पहला नाम आता है जॉन बन न्यूमेन दूसरा नाम आता है ओ
मॉर्गनस्टन तीसरा नाम आता है मार्टिन शुबिक चौथा नाम आता है विलियम रिककर और पांचवा इंपॉर्टेंट नाम आता है थॉमस शेलिंग
अब हम सबसे पहले थॉमस शेलिंग को डिस्कस कर लेते हैं। तो थॉमस शेलिंग अमेरिकन इकोनॉमिस्ट एंड प्रोफेसर ऑफ फॉरेन पॉलिसी
रहे हैं। और खास बात यह है कि जो यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैरीलैंड है उसके कॉलेज पार्क में जो स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी है
वहां पर इन्होंने नेशनल सिक्योरिटी न्यूक्लियर स्ट्रेटजी एंड आर्म्स कंट्रोल के ऊपर काफी टीच किया काफी रिसर्च की और
दूसरी बड़ी बात यह भी है कि जो इकोनॉमिक फील्ड है उसमें जो हैविंग एनहांस आवर अंडरस्टैंडिंग ऑफ कॉन्फ्लिक्ट एंड
कोऑपरेशन थ्रू गेम थ्योरी एनालिसिस इसके लिए इनको 2005 में नोबेल प्राइज दिया गया। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो मैंने पहले भी
कहा कि यह गेम थ्योरी के प्रणेता रहे हैं। यानी कि गेम थ्योरी के सबसे इंपॉर्टेंट स्कॉलर माने जाते हैं आईआर में। और खास
बात यह भी है कि इन्होंने बारगेनिंग थ्योरी दी। स्ट्रेटेजिक रियलिज्म दिया। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स भी रहे हैं।
जिनमें पहला आता है द स्ट्रेटजी ऑफ़ कॉन्फ्लिक्ट। दूसरा आता है आर्म्स एंड इन्फ्लुएंस। तीसरा आता है माइक्रोोटिव्स
एंड मैक बिहेवियर। अब हम डिस्कस कर लेते हैं स्ट्रेटेजिक रियलिज्म को। तो जो स्ट्रेटेजिक रियलिज्म का आईडिया है इसको
दिया था थॉमस सेलिंग ने। इन्होंने अपनी एक प्रसिद्ध कृति जिसका नाम है द स्ट्रेटजी ऑफ कॉन्फ्लिक्ट जो कि 1960 को पब्लिश होती
है। इसमें इन्होंने लिखा था कि जो स्टेट के लीडर्स होते हैं यह स्ट्रेटेजिकली यानी कि रणनीतिक तरीके से सोच विचार करते हैं,
सोचते हैं। और खास बात यह है कि जो लीडर्स होते हैं, जो डिप्लोमेटिक या फिर मिलिट्री इशज़ होते हैं, उसके साथ लॉजिकली डील करते
हैं। और स्ट्रेटेज़िक रियलिज्म मेनली फोकस करता है कि फ़ॉरेन पॉलिसी में जो लीडर्स होते हैं उनके द्वारा किस तरह से डिसीजन
मेकिंग की जाती है। और शेलिंग यह भी कहते हैं कि जो स्टेट लीडर हैं जब यह डिप्लोमेटिक एंड मिलिट्री प्रॉब्लम्स को
फेस करते हैं तो यह स्ट्रेटेजिकली सोचते हैं ताकि वह इसमें सक्सेसफुल तरीके से जो अपने गोल हैं उनको अचीव कर सके। और नोट
करने वाली बात यह भी है कि स्ट्रेटेजिक रियलिज्म जो है यह मेनली फोकस करता है फॉरेन पॉलिसी में डिसीजन मेकिंग के ऊपर।
वहीं दूसरी थ्योरी आती है बारगेनिंग थ्योरी। तो जब हम बात करते हैं बारगेनिंग थ्योरी की तो इसका जो आईडिया है सबसे पहले
दिया गया था कार्ल वॉन क्लॉविज के द्वारा युद्ध को डिफाइन करने के लिए। और दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने यह कहा कि जो
वॉर होते हैं उनकी अपने आप में कोई वैल्यू नहीं होती है। वैल्यू युद्ध की तभी होती है जब जो स्टेट्स होते हैं या फिर एक्टर्स
होते हैं, लीडर्स होते हैं उनका युद्ध के पीछे कुछ एक बहुत बड़ा गोल होता है। यानी कि लार्जर गोल होता है। इनके कुछ
इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं जिनमें आते हैं ऑन वॉर प्रिंसिपल्स ऑफ वॉर, द रशियन कैंपेन ऑफ 1812 ऑन द नेचर ऑफ़ वॉर एंड
विक्ट्री एंड डिफीट। और उसके बाद थॉमस स्टेलिंग ने आईआर में बार्गेनिंग थ्योरी को रिबिल्ड किया। और इन्होंने जो वारगेंस
है उसको दो तरीके से बांटा। पहला इन्होंने कहा टेस्टिट एग्रीमेंट्स। दूसरा इन्होंने कहा एक्सप्लसिट नेगोशिएशंस। तो टेस्टिट
एग्रीमेंट का मतलब होता है जो आप इनडायरेक्ट एग्रीमेंट करते हैं। गोपनीय तरीके से करते हैं और एक्सप्लसिट
नेगोशिएशंस का मतलब होता है जब आप डायरेक्टली बातचीत करते हैं। अगली थ्योरी का नाम आता है टू लेवल गेम थ्योरी। तो
इसकी खास बात यह है कि इसको ओरिजिनली इंट्रोड्यूस किया गया था 1988 में रॉबर्ट पुटनम के द्वारा अपनी एक इंपॉर्टेंट
पब्लिकेशन में जिसका टाइटल था डिप्लोमेसी एंड डोमेस्टिक पॉलिटिक्स द लॉजिक ऑफ टू लेवल गेम्स और खास बात यह है कि यह एक ऐसा
पॉलिटिकल मॉडल है जो कि गेम थ्योरी से जुड़ा है जो कि यह बताता है कि किस तरह से स्टेट्स डोमेस्टिक एंड इंटरनेशनल
इंटरेक्शंस करते हैं और दूसरी बड़ी बात यह है कि यह बताता है कि जो इंटरनेशनल नेगोशिएशंस है जो डिफरेंट-डिफरेंट स्टेट्स
के बीच होती है उसमें दो तरह की डिस्कशन होती है या नेगोशिएशंस होती है या आप यह भी कह सकते हैं कि जो नेगोशिएशंस होती है
वह दो लेवल पे होती है। तो पहला जो लेवल है इसका नाम है द इंटरनेशनल लेवल जो कि डिफरेंट-डिफरेंट गवर्नमेंट्स हैं उनके बीच
होता है और दूसरा है द इंट्राशनल लेवल जो कि डोमेस्टिक लेवल पे होता है। वहीं दूसरी तरफ विलियम ब्रेकर अमेरिकन पॉलिटिकल
साइंटिस्ट रहे हैं जो कि गेम थ्योरी में काफी प्रसिद्ध रहे हैं। यानी कि इनका गेम थ्योरी में योगदान रहा और इन्होंने
मैथमेटिक्स को पॉलिटिकल साइंस में इंट्रोड्यूस किया और खास बात यह भी है कि पॉलिटिकल साइंस में जो सेंटर ऑफ बिहेवल
रेवोल्यूशन है जो कि यूनिवर्सिटी ऑफ़ रोचेस्टर में स्थापित किया गया था। उसको स्थापित करने में इनका बहुत बड़ा योगदान
था। दूसरी बड़ी बात यह है कि पॉजिटिव पॉलिटिकल थ्योरी से भी यह जुड़े रहे हैं और इनके कुछ वक्स रहे हैं जो आपको स्क्रीन
पर दिखाई दे रहे हैं। आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी हैं। वहीं दूसरी तरफ क्वीनसी राइट
अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। जिन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो में इंटरनेशनल लॉज़ इंटरनेशनल रिलेशंस
सिक्योरिटी स्टडी के ऊपर काफी काम किया। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जो आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं। आप
इनको अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी है। इस प्रेजेंटेशन के लास्ट चैप्टर में अब हम
डिस्कस करेंगे क्रिटिकल थ्योरीज को। तो क्रिटिकल थ्योरीज में अब हम सबसे पहले यह समझ लेते हैं कि क्रिटिकल थ्योरीज क्या
होती है? तो जब हम बात करते हैं क्रिटिकल थ्योरीज की तो सबसे पहले हमें यह समझना है कि क्रिटिकल थ्योरीज फ्रैंकफोर्ड स्कूल से
जुड़ी है। जहां पर इंटर डिसिप्लिनरी ग्रुप ऑफ थिंकर्स जो कि इंस्टट्यूट ऑफ सोशल रिसर्च वहां से जुड़े थे। उनका एक स्कूल
था जो कि जर्मनी के फ्रैंकफोर्ड में 1930 के दशक में शुरू हुआ था। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो क्रिटिकल थ्योरीज है यह
बेसिकली एक फिलॉसोफिकल स्कूल ऑफ थॉट है जो कि जो एनलाइटनमेंटल आइडियल्स है और जो मार्क्सियन इंटरप्रिटेशन है या फिर
मार्क्स के जो आइडियाज है उनके साथ डिसइल्यूजनमेंट करता है यानी कि निराशा रखता है मोह भंग करता है और उसी मोह भंग
की वजह से यानी कि डिसइल्यूजनमेंट की वजह से अस्तित्व में आयािकल थ्योरीज की शब्दावली है इसको कॉइन किया था 1937 में
मैक्स हॉर्कमर के द्वारा। अब हम क्रिटिकल थ्योरीज की कुछ इंपॉर्टेंट एजमशंस को देख लेते हैं। तो, इसकी पहली एजमशन यह है कि
जो ऑर्थोडॉक्स मार्क्सिज्म का जो डिटरमिनिज्म है और जो साइंटिफिक टेंडेंसीज है, उसकी यह आलोचना करता है। उसको
क्रिटिसाइज करता है। इसकी दूसरी इंपॉर्टेंट फीचर या अजंपशन यह है कि मार्क्स का जो नोशन रहा है, इनवाइटेबल
कोलैप्स ऑफ़ कैपिटलिज्म, उसको यह क्रिटिसाइज़ करता है। यानी कि जो मार्क्स की अवधारणा रही है कि एक ऐसा वक्त आएगा जब
कैपिटलिज़्म का क्लैप्स हो जाएगा। स्टेटलेस एंड क्लासलेस सोसाइटी हो जाएगी। तो उसको यह बिल्कुल भी नहीं मानता है। और अगली
इंपॉर्टेंट अजमशन यह है कि यह आइडियोलॉजी के ऊपर सबसे ज्यादा फोकस करता है ना कि मटेरियलिज्म के ऊपर फोकस करता है। और इसकी
अगली इंपॉर्टेंट विशेषता या एजमशन यह है कि जो वर्किंग क्लास है, इसको यह सिर्फ एक रेवोल्यूशनरी एजेंट नहीं बोलता है। यह
बोलता है कि वर्किंग जो क्लास है, उसका सिर्फ एक ही काम नहीं है कि सोसाइटी में या स्टेट में रेवोल्यूशन लाना है। और इसकी
अगली इंपॉर्टेंट फ़ीचर यह भी है कि जो समाज में सोशल प्रैक्टिससेस है खासतौर पे जो नेगेटिव है जिनका सोसाइटी के ऊपर नेगेटिव
इंपैक्ट पड़ता है उनको यह क्रिटिसाइज करता है और यह सोसाइटी में चेंज लाना चाहता है। अब हम फ्रैंकफुट स्कूल को अच्छे से डिस्कस
कर लेते हैं क्योंकि फ्रैंकफोर्ड स्कूल क्रिटिकल थ्योरीज के साथ सीधा-सीधा जुड़ा हुआ है। तो इसकी पहली बात यह है कि इसको
एस्टैब्लिश किया जाता है 1923 में। दूसरी इंपॉर्टेंट बात जो कि मैंने पहले भी कहा कि यह क्रिटिकल थ्योरीज के साथ जुड़ा है
और अगली इंपॉर्टेंट बात यह है कि 1933 में इसको न्यूयॉर्क में शिफ्ट किया जाता है। क्योंकि जो फ्रैंकफर्ट है वहां पर हिटलर
की कुछ ऐसी नेगेटिव एक्टिविटीज रही थी जिसकी वजह से इसको न्यूयॉर्क में शिफ्ट करना पड़ा। वहीं अगली इंपॉर्टेंट बात यह
है कि 1953 में अगेन इसको जर्मनी के फ्रैंकफोर्ड में शिफ्ट किया जाता है और 1969
में इसको कंप्लीटली डिॉल्व किया जाता है। और इसके कुछ इंपॉर्टेंट स्कॉलर्स रहे हैं यानी कि थ्योरिस्ट रहे हैं जिनको आपको याद
रखना है। इनके नाम है ओडोर्नो बेंजामिन, एरिक फ्रॉम, जर्गन हेवमास और खाइमर, हरबर्ट मार्क्यूजे। और इंपॉर्टेंट बात यह
भी है कि क्रिटिकल थ्योरीज है जो उससे जुड़ा है। यानी कि यह चीजों को क्रिटिसाइज करता है। और खास बात यह है कि जो मार्क्स
के थॉट है उसको रिवाइज करता है विद न्यू आइडियाज, न्यू फिलॉसोफी एंड न्यू मेथड। और अगली इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि जो
फ्रैंकफुट स्कूल है यह यंग मार्क्स के साथ जुड़ा है। उसके आइडियाज को डिस्कस करता है, मानता है और जो हेगेलियन थॉट है उनको
भी मानता है। और नोट करने वाली बात यह भी है कि जो न्यूमार्क्सिज्म है उसके साथ यह जुड़ा हुआ है। अब हम आईआर में क्रिटिकल
थ्योरीज को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो इसमें कुछ इंपॉर्टेंट की थ्योरिस्ट रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है रॉबर्ट कॉक्स
का। दूसरा नाम आता है एंड्र्यू लिंकलेटर का। तीसरा नाम आता है रिचर्ड के ऐश और चौथा नाम आता है स्टेफन गिल का। आईआर
क्रिटिकल थ्योरीज में पहला नाम आता है रॉबर्ट कॉक्स का। तो रॉबर्ट कॉक्स कनेडियन इंटरनेशनल पॉलिटिकल स्कॉलर रहे हैं और यह
ग्रहमशी से काफी इंस्पायर रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने ग्रहमशियन जो थ्योरी है आईआर की उसको दिया और तीसरी
बड़ी बात यह है कि इन्होंने ग्रहमशी की टर्म उसको यूज़ किया जिसका नाम था इंपीरियलिज्म इज सस्टेन बाय कंसेंट। यानी
कि जो साम्राज्यवाद है वो सहमति के द्वारा कायम रहता है। और अगली इंपॉर्टेंट बात यह है कि कॉक्स ने प्रॉब्लम सॉल्विंग थ्योरी
और जो क्रिटिकल थ्योरीज होती है उनके बीच डिफरेंस स्थापित किया। और दूसरी बड़ी बात यह भी है कि इन्होंने आईआर में हिस्टोरिकल
स्ट्रक्चर्स की बात की और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने एक टर्म दिया जिसका नाम है हाइपर लिबरल ग्लोबलाइजिंग
कैपिटलिज्म। रॉबर्ट कॉक्स ने अपनी प्रमुख किताब जिसका नाम है सोशल फोर्सेस स्टेट्स एंड वर्ल्ड ऑर्डर्स बिय्ड इंटरनेशनल
रिलेशंस थ्योरी जो कि 1981 में पब्लिश होती है। उसमें इन्होंने लिखा था कि थ्योरी इज ऑलवेज फॉर सम मोर एंड सम पर्पस।
रॉबर्ट कॉक्स के कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स भी रहे हैं। जिनमें पहला वर्क आता है द एनाटॉमी ऑफ़ इन्फ्लुएंस। दूसरा आता है सोशल
फ़ोर्सेज़ स्टेट्स एंड वर्ल्ड ऑर्डर्स बिय्ड इंटरनेशनल रिलेशंस थ्योरी और अगला आता है इंटरनेशनल पॉलिटिकल इकोनमी अंडरस्टैंडिंग
ग्लोबल डिसऑर्डर। वहीं अगला आता है इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन वर्ल्ड पॉलिटिक्स। दूसरे इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम आता है
स्टीफन गिल। तो स्टीफन गिल यॉर्क यूनिवर्सिटी जो कि कनाडा के टोरंटो में स्थापित है। वहां के पॉलिटिकल साइंस में
आईआर के प्रोफेसर रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में जो नियो ग्रहमशिन आईडिया है उसको यूज़
किया और उसके यह रिनो प्रोफेसर रहे हैं। और एक इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने ग्रामशी के जो कांसेप्ट्स हैं उनको यूज़
किया। जैसे अमेरिकन हैज़ेमनी, कल्चरल हैज़ेमनी, हिस्टोरिक ब्लॉक्स, ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल्स, स्टेट सिविल सोसाइटी, सो
ऑन। स्टीफन गिल के जितने भी आपको स्क्रीन पर वक्स दिखाई दे रहे हैं, इनको आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए
बहुत ही जरूरी हैं। आईआर की क्रिटिकल थ्योरीज में अगला नाम आता है एंड्र्यू लिंक लेटर का। तो यह इंटरनेशनल थ्यरिस्ट
रहे हैं और क्रिटिकल थ्योरीज के फोरमोस्ट थिंकर रहे हैं। इनके कुछ इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स आते हैं जिनमें पहला कांसेप्ट
है कॉस्मोपॉलिटन सिटीजनशिप। दूसरा कांसेप्ट आता है फिलॉसोफिकल हिस्ट्री। इसमें इन्होंने कांड का जो एथिकल
कॉस्मोपॉलिटनिज्म है उसको इन्होंने इसमें रिवाइज करने की कोशिश की। वहीं इसमें तीसरा जो कांसेप्ट है वह है पॉलिटिकल
कम्युनिटी। जिसमें इन्होंने तीन प्रकार की पॉलिटिकल कम्युनिटी की ट्रांसफॉर्मेशन की बात की। जिनमें आता है मोर यूनिवर्सल, लेस
यूनिवर्सल, मोर सेंसिटिव डिफरेंसेस। एंड्र्यू लिंक लेटर के कुछ इंपॉर्टेंट वक्स भी रहे हैं जो आपको स्क्रीन पर दिखाई
दे रहे हैं। इनको आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी हैं। आईआर की क्रिटिकल थ्योरीज में अगला
नाम आता है रिचर्ड ऐशले का। तो रिचर्ड ऐशले पोस्ट मॉडर्निस्ट स्कॉलर रहे हैं इंटरनेशनल रिलेशंस के। दूसरी बड़ी बात यह
है कि इन्होंने आईआर में बैलेंस ऑफ पावर के ऊपर काम किया। साथ में क्रिटिकल थ्योरीज के ऊपर काम किया। और सबसे बड़ी
बात यह है कि यह जाने जाते हैं पोस्ट मॉडर्निस्ट इंटरनेशनल रिलेशंस के लिए। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं।
जिनमें पहला आता है ग्रोथ, रिवुरी एंड बैलेंस। दूसरा आता है द पॉलिटिकल इकोनमी ऑफ़ बोर एंड पेस। अगला आता है द पॉवर्टी ऑफ
न्यू रियलिज्म। वहीं अगला आता है यूनाइटिंग द सोवन स्टेट और लास्ट आता है लिविंग ऑन बॉर्डर लाइंस। अब हम इंटरनेशनल
रिलेशंस में मार्क्सिज्म को डिस्कस कर लेते हैं। लेकिन इससे पहले कि हम मार्क्सिज्म को डिटेल में डिस्कस करें।
सबसे पहले मार्क्सिज्म की हम कुछ इंपॉर्टेंट एजम्पशनंस को देख लेते हैं। तो मार्क्सिज्म की पहली जो एजम्पशन है वो है
क्रिटिसिज्म ऑफ कैपिटलिज्म। यानी कि जो पूंजीवाद है उसकी मार्क्सिज्म आलोचना करता है। आईआर के लेवल पर भी यह बोलता है कि जो
कैपिटलिज्म है उसका कोलैप्स हो जाएगा। और इसकी जो दूसरी विशेषता है या अजम्शन है वो है क्रिटिसिज्म ऑफ इंपीरियलिज्म। यानी कि
यह साम्राज्यवाद का भी क्रिटिसिज्म करता है। और इसकी अगली इंपॉर्टेंट फीचर है वर्ल्ड सोशलिज्म। यह बोलता है कि पूरे
वर्ल्ड के लेवल पे समाजवाद को स्थापित किया जाएगा। वहीं इसकी अगली इंपॉर्टेंट फीचर यह है कि यह नेशनल सेल्फ डिटरमिनेशन
की बात करता है। जिसमें यह कहता है कि जो प्रत्येक नेशंस हैं उनको अपने स्वयं के अधिकार हैं। यानी कि वे खुद अपने जो काम
है वह कर सकते हैं। वह फ्री है, सोवन है। वहीं अगला इसका इंपॉर्टेंट पॉइंट या एजमशन यह है कि यह पॉलिट्रेट इंटरनेशनलिज्म की
बात करता है। यह बोलता है कि जो विश्व के मजदूर हैं उनके द्वारा ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वर्ल्ड सोशलिज्म की स्थापना की
जाएगी। यानी कि पूरे के पूरे जो मजदूर है या आप यह कह सकते हैं कि पॉलिट्रेट क्लास है उनके द्वारा ही वर्ल्ड सोशलिज्म की
स्थापना की जाएगी। और इसका जो लास्ट एजमशन है या पॉइंट है वह है पीसफुल कोएस्टेंस। यह बोलता है कि आईआर में भी पीसफुल
कोएस्टेंस को स्थापित किया जाएगा। जब वर्ल्ड सोशलिज्म की स्थापना की जाएगी। जब ना कोई क्लास रहेगी, जब ना कोई स्टेट
रहेगा। इंटरनेशनल रिलेशंस में हम दो प्रकार के मार्क्सिज्म को पढ़ते हैं। यानी कि इसके दो टाइप्स पढ़ते हैं। जिनमें पहला
टाइप आता है थ्योरी ऑफ इंपीरियलिज्म और दूसरा आता है डिपेंडेंसी थ्योरी। तो जब हम बात करते हैं थ्योरी ऑफ इंपीरियलिज्म तो
इसमें हम कुछ इंपॉर्टेंट थिंकर्स को डिस्कस करते हैं जिनमें पहला नाम आता है रोजा अलेक्जेंबर का दूसरा आता है लेनिन का
तीसरा आता है कार्ल कॉस्की का और चौथा आता है विल वारेन का वहीं दूसरी तरफ जब हम बात करते हैं डिपेंडेंसी थ्योरी की तो इसमें
हम कुछ इंपॉर्टेंट थिंकर्स को डिस्कस करते हैं जिनमें पहला नाम आता है रॉल प्रविस का अगला नाम आता है हंस सिंगर का फिर अगला
नाम आता है फनेड कॉर्डोसो का। इसमें हम एजी फ्रैंक को भी पढ़ते हैं। डोस सटोस को भी पढ़ते हैं। एंड्रिक कॉडोजो को भी पढ़ते
हैं। एडल व्ट टॉरेस रिवर्स को भी पढ़ते हैं। साथ में हम सामिर आमिन और इमैनुअल बोलस्टीन को भी डिस्कस करते हैं। थ्योरी
ऑफ़ इंपीरियलिज्म में पहला नाम आता है रोजा लग्जबर्ग का। तो रोजा लग्जबल पॉलिश रेवोल्यूशनरी पॉलिटिकल थरिस्ट रही है।
एंटी वॉर एक्टिविस्ट रही है। लिबर्टेरियन मार्क्सिस्ट रही है। दूसरी बड़ी बात यह है कि 28 की उम्र में जर्मनी की न्यूट्रलाइज
सिटीजन बन जाती है। और तीसरी बड़ी बात यह है कि इनके कुछ इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स रहे हैं जिनको बस आपको याद करने हैं। तो पहला
कांसेप्ट यह है कि इन्होंने हर प्रकार के नेशनलिज्म की आलोचना की है। दूसरा कांसेप्ट यह है कि यह बिल ऑफ पावर की बात
करती है। तीसरा कासेप्ट यह है कि इन्होंने कासेप्ट ऑफ रिफॉर्म्स एंड रेवोल्यूशन दिया है। अगला इनका कांसेप्ट है रोल ऑफ
कम्युनिस्ट पार्टी और अगला इनका कांसेप्ट है पिरामिड ऑफ़ पावर जिसमें इन्होंने यह बताने की कोशिश की है कि किस तरह से
यूएसएसआर में ब्यूरोक्रेसी पावरफुल हो जाती है। यानी कि यूएसएसआर में ब्यूरोक्रेसी का इमरजेंस कैसे होता है और
कैसे पावरफुल बनती है। इस पिरामिड ऑफ़ पावर के कांसेप्ट में इन्होंने बताया है। रोजा लग्जर के कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। तो
जितने भी आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं, बस आप इनको अच्छे से नोट कर लें या फिर स्क्रीनशॉट ले लें क्योंकि आपके
एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी हैं। अगला नाम आता है बलादमीर लेनिन का। तो लेनिन रशियन रेवोल्यूशनरी रहे हैं, पॉलिटिशियन
रहे हैं, पॉलिटिकल थ्यरिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह फॉर्मर सोवियत यूनियन के प्रिमायर रहे हैं, नेता रहे
हैं, लीडर रहे हैं। और यह बात भी इंपॉर्टेंट है कि इनका जन्म रशिया के उलनवस्क में होता है। 1870 में इनकी डेथ
हो जाती है 1924 को। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने एक कांसेप्ट दिया यानी कि फोकस किया रोल ऑफ आइडियोलॉजी के ऊपर।
इन्होंने कहा कि जिस तरह से वर्जुआ क्लास की आईडियोलॉजी होती है, उसी तरह से प्रोलिट्रेट क्लास की भी आईडियोलॉजी होती
है। और इनके कुछ और इंपॉर्टेंट नोशंस या फिर आइडियाज रहे हैं। जिनमें पहला आता है वैनगार्ड ऑफ द प्रोलिट्रेट। दूसरा आता है
इंपीरियलिज्म इज द लास्ट स्टेज ऑफ़ कैपिटलिज्म। और अगला आता है डेमोक्रेटिक सेंट्रिसिज्म। और अगला आता है सोशलिस्टिक
प्रोग्राम। अब हम डिस्कस कर लेते हैं लेनिन की इंपीरियलिज्म थ्योरी। तो इसकी सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने अपनी
प्रमुख कृति इंपीरियलिज्म इज द हाईएस्ट स्टेज ऑफ कैपिटलिज्म जो कि 1917 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने इंपीरियलिज्म का
नोशन दिया। जिसमें इन्होंने बेसिकली जो इंपीरियलिज्म है यानी कि साम्राज्यवाद है उसको क्रिटिसाइज़ किया था। इन्होंने इसमें
कहा था कि जो सोशलिज़्म है वह सिर्फ़ कैपिटलिज़्म का विरोधी नहीं होना चाहिए। कैपिटलिज्म का एंटी नहीं होना चाहिए।
बल्कि जो सोशलिज्म है वह इंपीरियलिज्म यानी कि साम्राज्यवाद का विरोधी होना चाहिए। एंटी होना चाहिए। क्यों? क्योंकि
इंपीरियलिज्म जो कैपिटलिज्म है उसकी उच्चतरा अवस्था है। हायर स्टेज है। तो इसीलिए इन्होंने कहा कि जो सोशलिज्म है वो
दोनों का विरोधी होना चाहिए। कैपिटलिज्म का भी और इंपीरियलिज्म का भी। इस तरह से इन्होंने कहा कि जो कैपिटलिज्म की
एक्सपेंशनिस्ट पॉलिसी है वह इंपीरियलिज्म को बढ़ावा देती है इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में। बलादमीर लेनिन के जितने भी आपको
वर्क्स दिखाई दे रहे हैं इनको आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी हैं। अगला नाम आता है कार्ल
कॉटस्की का। तो कार्लकस्की का जन्म होता है 1854 को जैक के पराग में और इनकी डेथ होती है 1938 में नीदरलैंड्स के एमर्स डैम
में। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह जैक ऑस्ट्रियन फिलॉसोफर और मार्क्सिस्ट थ्योरिस्ट रहे हैं। और खास बात यह है कि
एंजेल की डेथ के बाद इनको ऑर्थोडॉक्स मार्क्सिज्म के बहुत बड़े थिंकर माने जाते हैं। और इनके कुछ आइडियाज रहे हैं। जिनमें
पहला आईडिया आता है हाइपर इंपीरियलिज्म। दूसरा आता है क्लास कॉन्फ्लिक्ट। तीसरा आता है कोलैप्स ऑफ कैपिटलिज्म। अगला आता
है इवोल्यूशनरी एपिस्टेमोलॉजी। और अगला आता है फोकस ऑन पार्लियामेंट्री रोड टू सोशलिज्म एंड क्रिटिसाइज टू द
रेवोल्यूशनरी रोड टू सोशलिज्म। और अगला आता है क्रिटिसिज्म टू द डिक्टेटरशिप ऑफ द प्रोिट्रेट एंड सुपर टू द पार्लियामेंट्री
डेमोक्रेसी। कार्ल कॉस्की के जितने भी वक्स आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं, आप इन सबको अच्छे से नोट कर लें क्योंकि
एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी हैं। अब हम बात कर लेते हैं बिल बोरेन की। तो विलबरेन ब्रिटिश कम्युनिस्ट थिंकर रहे हैं और यह
जो ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी रही है या फिर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ ग्रेट ब्रिटेन रही है उसके यह मेंबर रहे हैं। दूसरी बड़ी
बात यह है कि इनको जाना जाता है एक प्रसिद्ध किताब के लिए जिसका टाइटल है इंपीरियलिज्म पायनियर ऑफ कैपिटलिज्म जो कि
1980 को पब्लिश होती है। और इनका दूसरा इंपॉर्टेंट जो वर्क है वह है एडवांस्ड कैपिटलिज्म एंड बैकवर्ड सोशलिज्म जो कि
1975 को पब्लिश होती है। और इनकी जो प्रमुख कृति है जिसका नाम इंपीरियलिज्म्स पायनियर ऑफ कैपिटलिज्म इसमें इन्होंने
इंपीरियलिज्म का कांसेप्ट दिया। अब हम मार्क्सिज्म के सेकंड पार्ट यानी कि डिपेंडेंसी थ्योरी को डिस्कस कर लेते हैं।
तो डिपेंडेंसी थ्योरी की शुरुआत होती है 1960 के दशक में तब जब लैटिन अमेरिकन मार्क्सिस्ट जिनके नाम थे एजी फ्रैंक
र्बिश हंस सिंगर इमैनुअल बोलस्टीन और सामिर आमीन के द्वारा 1960 के दशक में पॉलिटिकल इकोनमी को डेवलप किया जाता है।
और नोट करने वाली बात यह है कि इन सभी जितने भी मार्क्सिस्ट यह रहे हैं, इन्होंने मॉडर्नाइज़ेशन थ्योरी को पूरी
तरीके से क्रिटिसाइज़ किया और इन्होंने यह कहा कि जो मॉडर्नाइज़ेशन है उसके अंतर्गत कैपिटलिस्ट कंट्रीज के द्वारा पुअर
कंट्रीज को एक्सप्लइट किया जाता है। और जो पुअर कंट्रीज है यानी कि वैकुवर्ड कंट्रीज है यह एंटायरली डिपेंडेंट रहती है
कैपिटलिस्ट या फिर इंडस्ट्रियलाइज़ कंट्रीज के ऊपर जिसको कि डिपेंडेंसी थ्योरी कहा जाता है। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि
डॉस सटोस ने अपनी प्रमुख कृति जिसका नाम है क्राइसिस ऑफ़ कंटेंपरेरी कैपिटलिज्म जो कि 1976 को पब्लिश होती है। इसमें
इन्होंने न्यू डिपेंडेंसी थ्योरी दी जिसमें इन्होंने यह कहा कि जितनी भी मल्टीलटरल कंपनीज़ होती है उनके द्वारा सभी
नेशंस का शोषण किया जाता है, एक्सप्लइटेशन किया जाता है। जिसको न्यू कॉरपोरेटिज्म भी कहा जाता है और न्यू डिपेंडेंसी थ्योरी भी
कहा जाता है। डिपेंडेंसी थ्योरी में कुछ इंपॉर्टेंट थ्योरिस्ट्स आते हैं। जिनमें पहला नाम आता है एजी फ्रैंक का। अगला नाम
आता है रॉल प्रविस का। फिर आता है सामिया आमीन का। अगला आता है इमैनुअल बोलस्टीन का। अगला नाम आता है रोनाल्ड चिलकोटे का।
फिर अगला नाम आता है ऑसवल्डो सोंगल। फिर अगला नाम आता है हंसा सिंगर और लास्ट नाम आता है डोस सटोस। इन सभी थिंकर्स के नाम
आप अच्छे से याद रख लें क्योंकि एग्जाम में यह पूछे जाते हैं। अब हम वर्ल्ड सिस्टम थ्योरी के कांसेप्ट को अच्छे से
समझ लेते हैं। तो इसको दिया था इमैनुअल बोलस्टीन ने। दूसरी बड़ी बात यह है कि इमैनुअल बोलस्टीन कहते हैं कि जो वर्ल्ड
सिस्टम है इसको आप वर्ल्ड इकोनमी भी कह सकते हैं और वर्ल्ड जो इकोनमी है इसको आप कैपिटलिस्ट या फिर मार्केट इकोनमी कह सकते
हैं। और दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने आईआर में वर्ल्ड सिस्टम थ्योरी जो मॉडल दिया इसके अंतर्गत इन्होंने कहा कि जो कोर
कंट्रीज होती है उनके द्वारा पेरिफेरी और जो सेमी पेरिफेरी कंट्रीज होती है उनको एक्सप्लइट किया जाता है। यानी कि जो पुअर
कंट्रीज है और जो विकासशील देश हैं या फिर जो अल्प विकसित देश हैं इनको एक्सप्लइट किया जाता है। जो कैपिटलिस्ट रिच या फिर
इंडस्ट्रियलाइज्ड कंट्रीज है और इतना ही नहीं जो सेमी पेरिफेरी की कंट्रीज है उनके द्वारा जो पेरीफेरी यानी कि अल्पविकसित
देश है इनको भी एक्सप्लइट किया जाता है। तो इस तरह से यह एक चैन बनती है जिसके अंतर्गत इमैनुअल बोलस्टीन ने यह सारी
बातें कही। इमैनुअल बोलस्टीन के कुछ इंपॉर्टेंट वक्स हैं जिनमें पहला आता है द मॉडर्न वर्ल्ड सिस्टम। दूसरा आता है
जियोपॉलिटिक्स एंड जियोकल्चर। अगला आता है आफ्टर लिबरलिज्म। वहीं अगला इंपॉर्टेंट आता है द एंड ऑफ वर्ल्ड एज वी नो इट। और
लास्ट आता है अफ्रीका द पॉलिटिक्स ऑफ इंडिपेंडेंस एंड यूनिटी। वर्ल्ड सिस्टम थ्योरी को अब हम एक डायग्राम के थ्रू
समझने की कोशिश करते हैं। तो एक साइड है कोर के नेशंस, दूसरी साइड है पेरिफेरी के और बीच में है सेमी पेरफेरी। कोर में ऐसे
नेशंस आते हैं जो रिच है। एडवांस्ड इंडस्ट्रियल सोसाइटीज है या फिर कैपिटलिस्ट नेशंस है। सेमी पेरफेरी में
डेवलपिंग नेशंस आते हैं और पेरफेरी में अंडर डेवलप्ड नेशन आते हैं जो काफी गरीब और पिछड़े हैं। तो कहानी यहां से शुरू
होती है जब कोर के जो नेशंस हैं इनके द्वारा जो पेरीफेरी नेशंस हैं वहां से लो वेज लेबर लिया जाता है। कच्चा माल लिया
जाता है। और इस कच्चे माल से वस्तुएं बनाई जाती है और पेरिफेरी के जो नेशंस हैं इनको उच्च कीमतों पर बेची जाती है। इस तरह से
कोर के जो नेशंस हैं उनके द्वारा पेरिफेरी के नेशंस का एक्सप्लइटेशन किया जाता है। और इतना ही नहीं जो कोर के नेशंस हैं इनके
द्वारा सेमी पेरिफेरिक नेशन से भी कच्चा माल लिया जाता है। यानी कि लो वेज लेबर लिया जाता है और इनको उच्च कीमतों पर बेचा
जाता है। और इतना ही नहीं बल्कि जो सेमी पेरिफेरी के नेशंस हैं उनके द्वारा जो पेरीफेरी के नेशंस हैं उनसे कच्चा माल
लिया जाता है और इनको उच्च कीमतों पर बेचा जाता है। तो इस तरह से हम यह कह सकते हैं कि जो कोर के नेशंस हैं इनके द्वारा सेमी
पेरिफेरी और पेरिफेरी के नेशंस दोनों का ही एक्सप्लॉयटेशन किया जाता है। और जो सेमी पेरिफेरी के नेशंस हैं इनके द्वारा
पेरिफेरी के नेशंस का एक्सप्लइटेशन किया जाता है। इंटरनेशनल रिलेशंस की फ़ेमिनिस्ट थ्योरी की कुछ इंपॉर्टेंट थिंकर्स रही है।
जिनमें पहला नाम आता है जे एन टिकनर का। दूसरा नाम आता है सिंथिया एनलॉय का। तीसरा नाम आता है कैरोल कॉन का। चौथा नाम आता है
वेल हुक्स का। अगला नाम आता है स्पाइक पीटरसन का। अगला नाम आता है क्रिस्टाइन सेलवेस्टर का। और अगला नाम आता है सिंथिया
बेबर का। जे एन टिफनर एंग्लो अमेरिकन पॉलिटिकल थरिस्ट रही है और फेमिनिज्म की आईआर में सबसे बड़ी थिंकर मानी जाती है।
दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने आईआर में फेमिनिज्म के मुद्दे को उठाया यानी कि फेमिनिज्म को स्टार्ट किया, हाइट तक
पहुंचाया और जेंडर इशू को इंटरनेशनल या फिर ग्लोबल पॉलिटिक्स में पहुंचाया। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जिनमें
पहला आता है सेल्फ रिलायंस वर्सेस पावर पॉलिटिक्स। दूसरा आता है जेंडर इन इंटरनेशनल रिलेशंस। तीसरा आता है जेंडरिंग
वर्ल्ड पॉलिटिक्स और अगला आता है अ फेमिनिस्ट वयाग थ्रू इंटरनेशनल रिलेशंस और लास्ट आता है फेमिनिस्ट पर्सपेक्टिव ऑन
91। इसके साथ-साथ जे एन टिकनर का एक इंपॉर्टेंट एस्स पब्लिश होता है 1988 में जिसका टाइटल था हंस मॉर्गनथाउस
प्रिंसिपल्स ऑफ पॉलिटिकल रियलिज्म अ फेमिनिस्ट रिफॉर्मुलेशन। इसमें इन्होंने कहा कि जो इंटरनेशनल पॉलिटिक्स है यह मैनस
का वर्ल्ड है। यानी कि मैन के द्वारा ही इंटरनेशनल पॉलिटिक्स को कंट्रोल किया जाता है और जितने भी पावर कॉन्फ्लिक्ट के इशू
है या फिर वॉरफेयर के इशू है वहां पर पुरुषों को ही प्रायोरिटी दी जाती है। साथ में इन्होंने यह भी कहा कि जो डिप्लोमेसी
है या फिर मिलिट्री सर्विज है या साइंस है या पॉलिटिक्स है आईआर में उनमें भी मेल का ही डोमिनेंस रहा है। यानी कि एक ऐसे डोमेन
है जहां पर पुरुषों का ही दबदबा रहा है। दूसरी तरफ जे एन टिकनर ने हंस मॉर्गनथ्यू के द्वारा दिए गए रियलिज्म के सिक्स
प्रिंसिपल को क्रिटिसाइज किया एज मैस्कुलिन ओरिएंटेड और इन्होंने हंस मॉ्गनथ्यू के जो सिक्स प्रिंसिपल्स है
इसको जो है इन्होंने फेमिनिस्टिक पर्सपेक्टिव से रिफॉर्मुलेट किया। तो इनमें पहला जो प्रिंसिपल आता है जे एंड
टिकनर का वो है ऑब्जेक्टिविटी इज कल्चरली डिफाइंड एंड इट इज एसोसिएटेड विद मैस्कुलिनिटी। तो जे एन टिकनर कहती है कि
जो ऑब्जेक्टिविटी होती है वो कल्चरली डिफाइन है और यह जुड़ी है मैस्कुलरिटी के साथ यानी कि पुरुष के साथ जुड़ी होती है
क्योंकि जितने भी कल्चर नॉर्म्स बनाए जाते हैं वह पुरुषों के द्वारा ही बनाए जाते हैं। कल्चरली कंस्ट्रक्टेड है। दूसरा जो
थ्योरी है यानी कि दूसरा जो प्रिंसिपल है यह है कि नेशनल इंटरेस्ट इज मल्टीडमेंशनल एंड डायनामिक। यह कहती है कि जो राष्ट्र
के हित होते हैं, वह मल्टीडायमेंशनल होते हैं। डिफरेंट-डिफरेंट आयाम होते हैं और डायनामिक होते हैं। यानी कि बदलते रहते
हैं। और अगला जो मॉडल है यानी कि प्रिंसिपल है वो है कि इन्होंने पावर को एक डोमिनेशन के रूप में देखा जिसमें
पुरुषों को प्रायोरिटी दी जाती है। यानी कि पुरुष जो है उसको पावर को एक टूल का इस्तेमाल करते हैं। यानी कि टूल के रूप
में यूज़ करते हैं। तो इस तरह से जो पावर है वह एक डोमिनेशन के रूप में है। अगला प्रिंसिपल यह है कि जितने भी पॉलिटिकल
एकशंस होते हैं इनका मोरल सिग्निफिकेंस होता है और दूसरी बड़ी बात इसमें यह आती है कि टिकनर कहती है कि मोरालिटी एंड
पॉलिटिक्स को कभी भी एक दूसरे से सेपरेट नहीं किए जा सकते हैं। इसका मतलब यह है कि पॉलिटिक्स और मोरालिटी एक दूसरे के साथ
जुड़े हुए हैं। और अगला प्रिंसिपल यह आता है कि यह कहती है कि ऐसी बहुत सारी पॉसिबिलिटी होती है कि पावर को एक
कलेक्टिव एंपावरमेंट के रूप में भी इंटरनेशनल एरेना में यूज किया जा सकता है। और लास्ट प्रिंसिपल यानी कि सिक्स्थ
प्रिंसिपल है रिजेक्शन ऑफ ऑटोनोमी ऑफ़ पॉलिटिक्स। यह कहती है कि जो पॉलिटिक्स है उसकी ऑटोनॉमी नहीं होती है। स्वाधता नहीं
होती है। आईआर की फेमिनिस्ट थ्योरीज में दूसरा इंपॉर्टेंट नाम आता है सिंथिया एनलॉय का। तो सिंथिया एनलॉय अमेरिकन
पॉलिटिकल साइंटिस्ट रही है। फेमिनिस्ट राइटर रही है। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह जानी जाती है आईआर में जेंडर और
मिलिटरिज्म के ऊपर स्टडी करने के लिए। इन्होंने फेमिनिस्ट जो थ्योरी है आईआर की उसमें काफी ज्यादा कंट्रीब्यूशन किया और
सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने अपनी प्रमुख कृति बनाना विचेस एंड बेसिस मेकिंग फेमिनिस्ट सेंस ऑफ इंटरनेशनल
पॉलिटिक्स जो कि 1990 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने एक इंपॉर्टेंट क्वेश्चन उठाया जिस क्वेश्चन का टाइटल था वेयर द
वुमेन इन आईआर यानी कि आईआर में वुमेन कहां है? उनकी पोजीशन कहां है? इनके कुछ और इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जिनमें आता
है द क्यूरियस फेमिनिस्ट सर्चिंग फॉर वुमेन इन द न्यू एज ऑफ़ एंपायर। अगला आता है जेंडर इज़ नॉट इनफ। द नीड फॉर फेमिनिस्ट
कॉन्शियसनेस। और अगला आता है निमोज़ वॉर एमाज़ वॉर मेकिंग फेमिनिस्ट सेंस ऑफ द इराक वॉर। और अगला आता है द बिग बुश एक्सपोजिंग
एंड चैलेंजिंग द पर्सिस्टेंस ऑफ़ पेट्रियरकी। और अगला आता है मेनवर द इंटरनेशनल पॉलिटिक्स ऑफ मिलिटराइजिंग वुमस
लाइफ्स। अगले थिंकर का नाम आता है कैरोलक। तो यह अमेरिकन राइटर और फेमिनिस्ट थिंकर रही है। इनकी खास बात यह है कि इन्होंने
जेंडर इशूज़ को इंटरनेशनल रिलेशन में काफी उठाया, एड्रेस किया और इन्होंने जो कॉन्फ्लिक्ट और सिक्योरिटी इशूज़ है, उसके
ऊपर भी काफी काम किया। स्क्रीन पर जितने भी आपको इनके वक्स दिखाई दे रहे हैं आप इनको अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके
एग्जाम के लिए बहुत जरूरी हैं। वहीं अगला नाम आता है सिंथिया बेबर का तो सिंथिया बेबर यूएसआईआर फेमिनिस्ट स्कॉलर रही है।
पॉलिटिकल साइंटिस्ट रही है। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने रेगुलरली कंट्रीब्यूट किया बीबीसी रेडियो फ़ वुमस आर
और इससे भी बड़ी बात यह है कि यह जानी जाती है सिलेक्शन ऑफ 14 फिल्म्स जिसको जाना जाता है आई एम एन अमेरिकन वीडियो
पोर्ट्रेट्स ऑफ पोस्ट 91 यूएस सिटीजंस इनके जितने भी वक्स आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं आप अच्छे से नोट कर लें। वहीं
स्क्रीन पर जो आपको कुछ अदर इंपॉर्टेंट वर्क्स दिखाई दे रहे हैं, इनको भी आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि एग्जाम में
वर्क्स काफी पूछे जाते हैं। लास्ट में अब हम डिस्कस कर लेते हैं पोस्ट स्ट्रक्चरलिज्म इन आईआर को। तो सबसे पहले
अब हम यह समझ लेते हैं कि व्हाट इज पोस्ट स्ट्रक्चरलिज्म? तो जब हम बात करते हैं पोस्ट स्ट्रक्चरलिज्म की तो सबसे पहले
हमें यह समझना है कि पोस्ट स्ट्रक्चरलिज्म एमर्ज होता है मार्क्सिज्म की आलोचना के रूप में। दूसरी बड़ी बात यह है कि जैकेस
डेरिडा और मिशेल फ्रूको पोस्ट स्ट्रक्चरिज्म के दो इंपॉर्टेंट थ्योरिस्ट रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह भी है कि जो
पोस्ट स्ट्रक्चरिस्ट थिंकर हैं इन्होंने लैंग्वेज मीनिंग के ऊपर फोकस किया है जिसे फको ने डिस्कोर्स कहा जो कि पॉलिटिकल पावर
का प्रमुख डिटरमिनेंट है। दूसरी बड़ी बात यह भी है कि जो पोस्ट स्ट्रक्चरलिज्म है यह शुरू होता है 1966 में तब जब डेरिडा ने
स्ट्रक्चर साइन एंड प्ले की स्टडी की ह्यूमन साइंस में एक डिस्कोर्स के रूप में और अगली इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि जो
पोस्ट स्ट्रक्चरलिस्ट है यह इन्फ्लुएंस होते हैं जो लिंग्विस्टिक्स ऑफ़ फील्ड है जिसको आप सिमोएटिक्स कहते हैं जिसकी
प्रमुख बात यह है कि यह स्टडी करता है साइंस और मीनिंग मेकिंग की यानी कि किस इस तरह से साइंस काम करता है और मीनिंग को
क्रिएट किया जाता है, बनाया जाता है तो उससे यह इन्फ्लुएंस होकर शुरू होता है। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि जो
सिमोटिक्स है इसके प्रमुख थिंकर रहे हैं रोनाल्ड बार्स। और इन्होंने काफी स्टडी की रोल ऑफ कम्युनिकेशन के ऊपर, सिंबल के ऊपर,
साइंस और मीनिंग के ऊपर कि किस तरह से मीनिंग से नॉलेज को प्रोड्यूस किया जाता है। अब हम जैकस डेरेडा को अच्छे से डिस्कस
कर लेते हैं। तो जैकस डेरेडा फ्रेंच फिलॉसोफर रहे हैं। पोस्ट स्ट्रक्चरिस्ट थिंकर रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि
इन्होंने लैंग्वेज के ऊपर फोकस किया है और वेस्ट को क्रिटिसाइज किया है। और खास बात यह है कि इन्होंने यह कहा कि जो पावर और
लैंग्वेज है यह आइडिया से पहले आती है जो कि कल्चरली प्रोड्यूस होती है। दूसरी बड़ी बात यह भी है कि इन्होंने कहा कि जो नॉलेज
होती है वह सिस्टम के द्वारा क्रिएट की जाती है। यानी कि जो सिस्टम होता है उसकी मुट्ठी में होती है। दूसरी बड़ी बात यह भी
है कि इन्होंने फेमसली कहा देयर इज नथिंग आउटसाइड द टेक्स्ट। इसके अलावा उन्होंने एक और स्टेटमेंट दी जिसमें इन्होंने कहा द
एंड ऑफ द बुक एंड द बिगिनिंग ऑफ राइटिंग। और सबसे बड़ी बात यह भी है कि इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्ब्स हैं जिनको आप अच्छे से
याद कर लें। तो पहला वर्ब है राइटिंग एंड डिफरेंस। दूसरा है मार्जिनस ऑफ फिलॉसोफी एंड तीसरा है स्पेक्टर्स ऑफ मार्क। जैकिस
डेरिडा के कुछ इंपॉर्टेंट कॉन्सेप्ट्स भी रहे हैं जिनमें पहला कॉन्सेप्ट आता है डीकंस्ट्रक्शन जिसको हमने डिस्कस किया है।
दूसरा आता है डिफरेंस। इन्होंने डिफरेंस का भी कांसेप्ट दिया और तीसरा आता है बाइनरी अपोजिशंस। तो नोट करने वाली बात यह
है कि जेकस डेरडा ने यह कहा कि जो वेस्टर्न एपिस्टेमोलॉजी है उसका जो पूरा का पूरा क्रिएशन है यह बाइनरी अपोजिशन है।
फॉर एग्जांपल इन्होंने कहा जैसे स्पीच है तो स्पीच का उल्टा राइटिंग होता है। इन्होंने कहा प्रेजेंस का उल्टा एब्सेंस
होता है। नेचुरल का उल्टा कल्चरल होता है और कॉज का उल्टा इफेक्ट्स होता है। तो इन्होंने यह कहा कि जो वेस्टर्न
एपिस्टेमोलॉजी है उसका जो एंटायर क्रिएशन है वह बाइनरी अपोजिशन है। तो इन सभी चीजों को आप अच्छे से नोट कर लें। एग्जाम के लिए
बहुत ही जरूरी है। पोस्ट स्ट्रक्चरलिज्म में अगले थिंकर का नाम आता है मिशेल फुगो। तो मिशेल फुगो फ्रेंच फिलॉसफर एंड पोस्ट
मॉडर्निस्ट और पोस्ट स्ट्रक्चरिस्ट थिंकर रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह जुड़े हुए हैं फॉर्म्स ऑफ नॉलेज के साथ।
यानी कि जो नॉलेज के फॉर्म्स है और जो नॉलेज एंड पावर रिलेशनशिप है उसके ऊपर इन्होंने काफी काम किया। दूसरी बड़ी बात
यह भी है कि इन्होंने कहा कि ट्रुथ ऑलवेज बीइंग अ सोशल कंस्ट्रक्ट। यानी कि इन्होंने कहा कि जो ट्रुथ क्रिएट किया
जाता है वो सोशली कंस्ट्रक्ट है। और दूसरी बड़ी बात यह भी है कि इन्होंने यह कहा कि जो पावर और नॉलेज है उसमें एक रिलेशनशिप
पाया जाता है। जिसको कि यूज़ किया जाता है सोशल इंस्टीट्यूशन में सोशली कंट्रोल करने के लिए। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स भी
रहे हैं। जिनमें पहला आता है मैडनेस एंड सिविलाइजेशन। दूसरा आता है द वर्थ ऑफ द क्लनिक। अगला आता है द ऑर्डर ऑफ थिंग्स।
और अगला आता है डिसिप्लिन एंड पनिश। वहीं अगला आता है द हिस्ट्री ऑफ सेक्सुअलिटी। मिशल फूको के कुछ इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स
भी हैं जिनको आपको अच्छे से याद रखना है। तो पहला कांसेप्ट है बाय पावर जिसको बायोपॉलिटिक्स भी कहा जाता है। दूसरा
कांसेप्ट है हिस्ट्री ऑफ़ आइडियाज। तीसरा कांसेप्ट है लैंग्वेज गेम थ्योरी। और अगला कांसेप्ट है जीनियोलॉजी। वहीं अगला
कांसेप्ट है पावर नॉलेज रिलेशनशिप। और अगला कांसेप्ट आता है गवर्नमेंटिटी। तो इसमें पहला नाम आता है बुड्रो विल्सन
का जो कि अमेरिकन पॉलिटिशियन एकेडमिक रहे हैं और इन्होंने 1913 से 1921 तक अमेरिका के 28वें राष्ट्रपति के रूप में काम किया
था। इनकी खास बात यह है कि 1887 में इनकी बुक पब्लिश होती है। जिसका टाइटल था द स्टडी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन और यहीं से
शुरुआत होती है इस पहले फेज की। इनकी खास बात यह है कि इसमें इन्होंने यह लिखा कि पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन एक ट्रेड स्कोप है
और इन्होंने इसी बुक में पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन को पॉलिटिक्स से सेपरेट किया और इनको जाना जाता है फादर ऑफ पब्लिक
एडमिनिस्ट्रेशन। बुड्रो विल्सन की खास बात यह भी रही कि इन्होंने अपने लेख द स्टडी ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन में पब्लिक
एडमिनिस्ट्रेशन को साइंस ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन के रूप में प्रतिष्ठित किया। ऑनर किया। इनकी दूसरी महत्वपूर्ण
बात यह भी रही कि इन्होंने पॉलिटिकल एडमिनिस्ट्रेटिव डाइकटॉमी के ऊपर लिखा कि इट इज़ इजी टू कॉन्स्टिट्यूट अ
कॉन्स्टिट्यूशन बट इट इज़ वेरी डिफिकल्ट टू रन इट। जिसका मतलब यह है कि संविधान को बनाना कॉन्स्टिट्यूट करना आसान है लेकिन
उसको चलाना उतना ही मुश्किल है और यह वाला जो पॉइंट है यह बहुत इंपॉर्टेंट है। पहले भी एग्जाम में इसे पूछा जा चुका है। अगला
पॉइंट आता है कि विल्सन ने पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की लीगल एप्रोच को सपोर्ट किया। और खास बात यह भी है कि मोहित
भट्टाचार्य ने विल्सन को कहा फादर ऑफ कंपेरेटिव पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन। अगले थिंकर का नाम आता है लना डिवाइट जो कि
अमेरिकन हिस्टोरियन और अमेरिका में जो पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन है वहां पर स्पेशलाइज्ड रहे हैं। इनकी खास बात यह भी
है कि 1926 को इनकी एक इंपॉर्टेंट बुक पब्लिश होती है जिसका टाइटल था इंट्रोडक्शन टू द स्टडी ऑफ़ पब्लिक
एडमिनिस्ट्रेशन और यह इस फेज की लास्ट बुक मानी जाती है। और खास बात यह भी है कि यह पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की होलिस्टिक
अप्रोच के साथ जुड़े हुए हैं। तो, इसमें पहले विचारक का नाम आता है हेनरी फायल जिनको जाना जाता है फादर ऑफ़
एडमिनिस्ट्रेटिव और मैनेजमेंट थ्योरीज़ का। और इनकी दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनकी जो थ्योरी है मैनेजमेंट की इसको जाना
जाता है पॉक यानी कि प्लानिंग, ऑर्गेनाइजिंग, कमांडिंग, कोऑर्डिनेटिंग और कंट्रोलिंग। और इनकी सबसे बड़ी बात यह भी
है कि यह पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के नैरोअ व्यू के साथ जुड़े हुए हैं। इनको जाना जाता है फादर ऑफ क्लासिकल थ्योरी ऑफ
पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन और इन्होंने 14 प्रिंसिपल दिए एडमिनिस्ट्रेशन के और फाइव एलिमेंट्स की बात की एडमिनिस्ट्रेशन के और
सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने एक नोशन दिया जिसको कि गैंग प्लैंक के रूप में यानी कि लेवल जंपिंग के रूप में जाना जाता
है। इन सभी थ्योरीज और नोशन को हम आगे चलकर यानी कि आने वाले जो लेक्चर्स हैं उनमें एक-एक करके डिस्कस करेंगे। हेनरी
फेयल के अनेक वक्स रहे हैं जो कि आपके एग्जाम के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। तो इसमें पहला वर्क आता है जनरल प्रिंसिपल्स
ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन। दूसरा आता है जनरल एंड इंडस्ट्रियल मैनेजमेंट। तीसरा आता है द एडमिनिस्ट्रेटिव थ्योरी ऑफ़ द स्टेट और
चौथा आता है द रिफॉर्म ऑफ पब्लिक सर्विसेस। अगले इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम आता है गुलिक एंड उर्बिक। इन्होंने पेपर्स
ऑन द साइंस ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन बुक लिखी जो कि 1937 को पब्लिश होती है। इस किताब में इन्होंने 4p फार्मूला और नोशन ऑफ पोस्ट
कोर्ब दिया। इसकी खास बात यह है कि 4P में आता है पपस प्रोसेस पर्संस एंड प्लेस। जबकि पोस्ट कोर्ब में आता है प्लानिंग,
ऑर्गेनाइजिंग, स्टाफिंग, डायरेक्टिंग, कोऑर्डिनेटिंग, रिपोर्टिंग एंड बजटिंग। वहीं सबसे बड़ी बात यह है कि यह दोनों
क्लासिकल थ्योरिस्ट्स रहे हैं। और खास बात यह भी है कि यह दोनों जुड़े हैं पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की नैरोअर एप्रोच के साथ।
उर्बिक ने फेमसली कहा कि इन जनरल प्रोफेसर्स टीच व्हाट दे वांट टू टीच नॉट व्हाट स्टूडेंट्स वांट टू लर्न। इसका मतलब
यह है कि प्रोफेसर्स वही पढ़ाते हैं जो पढ़ाना चाहते हैं ना कि उसे पढ़ाना चाहते हैं जो विद्यार्थी सीखना चाहते हैं। अगले
स्कॉलर का नाम आता है विलोवी। तो विलोवी ऑथर रहे हैं पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के। खासतौर पर इनका वर्क रहा है वटिंग के ऊपर।
दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनकी एक इंपॉर्टेंट बुक जिसका टाइटल था प्रिंसिपल्स ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन
1927 को पब्लिश होती है जिसमें इन्होंने यह कहा था कि एडमिनिस्ट्रेशन इज द फोर्थ पिलर ऑफ द गवर्नमेंट अर्थात प्रशासन सरकार
का चौथा स्तंभ है। अगले थिंकर का नाम आता है मैरी पारकर फोलेट जो कि अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रही हैं। इनको जाना
जाता है मदर ऑफ़ मॉडर्न मैनेजमेंट और पीटर ड्रकर ने इन्हें कहा प्रॉफ़ेट ऑफ़ मैनेजमेंट और खास बात यह है कि इन्होंने इंडस्ट्रियल
डेमोक्रेसी की बात की। इन्होंने हन्ना आर्यन को भी काफी इंपैक्ट किया। काफी प्रभावित किया। दूसरी बड़ी बात यह है कि
इन्होंने कुछ इंपॉर्टेंट आइडियाज दिए। जिनमें पहला आईडिया आता है कंस्ट्रक्टिव कॉन्फ्लिक्ट। जिसमें इन्होंने यह कहा कि
किसी भी ऑर्गेनाइजेशन में कॉन्फ्लिक्ट को सुलझाने के तीन तरीके होते हैं। डोमिनेशन, कंप्रोमाइज और इंटीग्रेशन। और सबसे बड़ी
बात यह है कि इन्होंने कहा कि इंटीग्रेशन ही सबसे अच्छा तरीका होता है कॉन्फ्लिक्ट को सुलझाने का। एमपी फोलेट का सेकंड
कांसेप्ट आता है न्यू कांसेप्ट ऑफ पावर जिसमें इन्होंने दो प्रकार की शक्तियों अर्थात पावर की बात की है। पहला है पावर
ओवर दूसरा है पावर विद। पावर ओवर का मतलब यह है कि जब आप किसी को अपनी इच्छा से दूसरे की इच्छा के बिना काम करने के लिए
मजबूर करते हैं। वहीं पावर विद का मतलब यह है कि जब आप पावर को कॉमनली यूज़ करते हैं और दूसरे व्यक्ति की समस्याओं का कॉमनली
समाधान करते हैं तो उसको पावर विद कहा जाता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि हन्ना आरंट ने यहीं से प्रभावित होकर पावर के
कांसेप्ट को लिया। एमपी फोलेट ने पावर को डिफाइन करते हुए बहुत सुंदर शब्दों में कहा कि पावर इज द एबिलिटी टू मेक थिंग्स
हैपन टू इनिशिएट चेंज। जिसका मतलब यह है कि शक्ति उस एबिलिटी का नाम है। उस योग्यता का नाम है जिससे आप चीजों को करते
हैं, काम को करते हैं ताकि इनिशिएट किया जा सके चेंज के लिए। एमपी फॉलट के कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। जिनमें पहला आता
है द न्यू स्टेट, दूसरा आता है क्रिएटिव एक्सपीरियंस, तीसरा आता है डायनामिक एडमिनिस्ट्रेशन और चौथा आता है फ्रीडम एंड
कोऑर्डिनेशन। इन्होंने लीडरशिप का भी कांसेप्ट दिया जिसमें इन्होंने कहा कि लीडरशिप का मतलब सिर्फ दूसरों को प्रभावित
करना नहीं होता है बल्कि दूसरों से स्वयं को प्रभावित करना भी होता है। इसी वजह से लीडरशिप के इनके कांसेप्ट को जाना जाता है
सर्कुलर रिस्पांस। और खास बात यह भी है कि इन्होंने तीन प्रकार के लीडरशिप की बात की। लीडरशिप ऑफ पोजीशन, लीडरशिप ऑफ
पर्सनालिटी, लीडरशिप ऑफ फंक्शन। अगले स्कॉलर्स का नाम आता है मुने एंड्रेले का जो कि यूएसए में फर्स्ट रहे हैं।
जिन्होंने 1931 को क्लासिकल थ्योरी को फॉर्मुलेट किया। इनकी खास बात यह रही है कि इन्होंने द प्रिंसिपल ऑफ ऑर्गेनाइजेशन
में फोर इंपॉर्टेंट थ्योरीज को फॉर्मुलेट किया। जिसमें पहली थ्योरी आती है स्केलर प्रिंसिपल्स जिसमें इन्होंने हायरार्की को
स्केलर चेन कहा। दूसरा इनका कांसेप्ट आता है जिसका नाम है स्टाफ एंड लाइन प्रिंसिपल और तीसरा इनका आता है फंक्शनल डिफरेंशिएशन
और चौथा कांसेप्ट आता है कोऑर्डिनेशन। तो जितने भी आपको इनके कांसेप्ट्स दिखाई दे रहे हैं या की पॉइंट्स दिखाई दे रहे हैं
आप अच्छे से नोट करें क्योंकि यहां से क्वेश्चन तो बनता है। अगले स्कॉलर का नाम आता है रॉबर्ट डेहल जो कि रिग्स और फेरल
हडी के साथ कंपेरेटिव पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के साथ जुड़े हुए हैं। इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति द साइंस ऑफ
पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के बारे में कहा कि यह साइंस नहीं है, विज्ञान नहीं है। इन्होंने
डेमोक्रेसी की प्लूरलिस्टिक थ्योरी दी और इन्होंने कहा कि डेमोक्रेसी इलेक्टिव पोलार्की होती है। इन्होंने अपने प्रमुख
वर्क द साइंस ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन थ्री प्रॉब्लम्स में कहा कि पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की तीन प्रॉब्लम होती है
वैल्यूज़ बिहेवियर एंड कल्चर। अगले स्कॉलर का नाम आता है चेस्टर बरनाड जो कि अमेरिकन बिजनेस एग्जीक्यूटिव और पब्लिक
एडमिनिस्ट्रेटर रहे हैं। इनको जाना जाता है स्पिरिचुअल फादर ऑफ सोशल सिस्टम स्कूल और साथ में इनको जाना जाता है फादर ऑफ
मैकेनिकल थ्योरी और साथ में इनको जाना जाता है फादर ऑफ मॉडर्न ऑर्गेनाइजेशनल थ्योरी। इनकी खास बात यह है कि इन्होंने
दो इंपॉर्टेंट वर्क लिखे। पहला द फंक्शनंस ऑफ द एग्जीक्यूटिव और दूसरा ऑर्गेनाइजेशन एंड मैनेजमेंट। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह
है कि इन्होंने आइडिया दिया पॉजिटिव एंड नेगेटिव डिसीजंस का और इन्होंने कम्युनिकेशन थ्योरी दी ऑर्गेनाइजेशन में
जिसमें इन्होंने कहा कि ऑर्गेनाइजेशन के तीन इंपॉर्टेंट एलिमेंट होते हैं। कम्युनिकेशन, विलिंगनेस, टू वर्क एंड कॉमन
पर्पस। अगले स्कॉलर का नाम आता है डॉयड वाल्डो जो कि अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं और पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन खासतौर
पे मॉडर्न पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मेजर फिगर माने जाते हैं और इन्होंने फेमसली कहा था कि एट प्रेजेंट द सेपरेशन बिटवीन
पॉलिटिक्स एंड एडमिनिस्ट्रेशन हैज़ बिकम अ बोर्न आउट प्लेटफार्म जिसका मतलब यह है कि वर्तमान समय में जब हम बात करते हैं
राजनीति व प्रशासन के बीच अलगाव की तो हम कह सकते हैं कि यह एक घिसा पिटा मंच बन बन चुका है। इनका फेमस वर्क रहा है द
एडमिनिस्ट्रेटिव स्टेट जो कि 1948 को पब्लिश हुआ। जिनमें पहला नाम आता है क्रिस आरगिस का। इन्होंने कांसेप्ट दिया
इमैच्योरिटी टू मैच्योरिटी थ्योरी और इन्होंने बात की फ्यूज़ प्रोसेस की और इन्होंने टी ग्रुप ट्रेनिंग की बात की और
इनका इंपॉर्टेंट वर्क रहा है पर्सनालिटी एंड ऑर्गेनाइजेशन द कॉन्फ्लिक्ट बिटवीन सिस्टम एंड द इंडिविजुअल। अगले थिंकर का
नाम आता है डॉगस एमसी ग्रेगर। तो इन्होंने मोटिवेशन थ्योरी में एक्स व थ्योरी दी और इनकी खास बात यह रही कि इनका वर्क रहा द
ह्यूमन साइड ऑफ एंटप्राइजेज और इनका अगला वर्क रहा लीडरशिप एंड मोटिवेशन। तो जितने भी कांसेप्ट है, फैक्ट है आप इनको अच्छे
से याद कीजिए। मैं बार-बार आपको कह रहा हूं कि इन सभी कांसेप्ट को, इन सभी थिंकर्स को हम डिटेल में अच्छे से
एक्सप्लेन करेंगे आने वाले लेक्चर्स में। अगले थिंकर का नाम आता है अब्राहम मैस्लो का। तो इनके कुछ इंपॉर्टेंट नोशंस रहे
हैं। हायरार्की ऑफ नीड्स, सेल्फ एक्चुअलाइजेशन, पीक एक्सपीरियंसेस। और इनके कुछ वर्क्स भी रहे हैं। जिनमें पहला
वर्क आता है मोटिवेशन एंड पर्सनालिटी। दूसरा आता है और थ्योरी ऑफ़ ह्यूमन मोटिवेशन और तीसरा आता है रिलीजन वैल्यूज़
एंड पीक एक्सपीरियंसेस। अगले थिंकर का नाम आता है फ्रेडरिक हर्जबर्ग। तो इनके भी कुछ इंपॉर्टेंट आइडियाज रहे हैं। जैसे हजीन,
मोटिवेशन, थ्योरी, जॉब, एनरचमेंट, जॉब लोडिंग और इनके कुछ वर्क्स भी रहे हैं। जिनमें पहला वर्क आता है द मोटिवेशन टू
वर्क। दूसरा आता है वर्क एंड द नेचर ऑफ़ मैन और तीसरा आता है मैनेजरियल चॉइस। अगले थिंकर का नाम आता है रेंसिस लाइक। तो अगर
हम बात करें इनकी तो इनके नोशंस रहे हैं मैनेजमेंट सिस्टम वन टू फोर लिंकिंग पिन मॉडल और इनके कुछ वर्क्स रहे हैं जिनमें
पहला वर्क आता है द न्यू पैटर्न्स ऑफ़ मैनेजमेंट दूसरा आता है द ह्यूमन ऑर्गेनाइजेशन और तीसरा आता है न्यू वेज़ ऑफ़
मैनेजिंग कॉन्फ्लिक्ट। इसमें पहले थिंकर का नाम आता है फेरल हिडी का जो कि वन ऑफ द मेजर फाउंडर रहे हैं कंपैरेटिव पब्लिक
एडमिनिस्ट्रेशन के। इनकी खास बात यह भी रही कि इन्होंने 1960 के दशक में कंपैरेटिव एडमिनिस्ट्रेशन मूवमेंट की
गोल्डन एज के रूप में देखा और इनका मेजर वर्क रहा है पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन और कंपैरेटिव पर्सपेक्टिव। अगले मेजर थिंकर
का नाम आता है एफ डब्ल्यू रिग्स का। तो इनके बारे में सबसे बड़ी बात यह है कि इनको जाना जाता है फादर ऑफ कंपेरेटिव
पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन और यह पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में इनको पाइनियर माना जाता है और
इन्होंने फिलीपाइंस, थाईलैंड और इंडिया में इंपेरिकल स्टडी की और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने थर्ड वर्ल्ड कंट्रीज की
स्टडी करने के लिए इकोलॉजिकल एप्रोच को यूज़ किया। और सबसे बड़ी बात यह भी है कि इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क रहे हैं जो कि
आपके एग्जाम के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। तो इसमें पहला आता है द इकोलॉजी ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन। दूसरा आता है
एडमिनिस्ट्रेशन इन डेवलपिंग कंट्रीज द थ्योरीज ऑफ़ प्रिज़्मेटिक सोसाइटी। तीसरा आता है प्रिज़्मेटिक सोसाइटी रिवज़िटेड। और
लास्ट आता है मॉडल्स इन द कंपैरेटिव स्टडी ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन एडवर्ड वेडनर जो कि अमेरिका के बहुत बड़े एजुकेटर और
पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन थिंकर रहे हैं। स्कॉलर रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने कहा कि जो एडमिनिस्ट्रेशन
होता है यह एक्शन ओरिएंटेड होता है। गोल ओरिएंटेड होता है। इसीलिए इसको डेवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन कहा जाता है। और इनका मेजर
वर्क रहा है डेवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन और न्यू फोकस फॉर अ रिसर्च जो कि 1982 को पब्लिश होता है। पहले थिंकर इसके आते हैं
फ्रैंक मरीनी। फ्रैंक मरीनी की अगर हम बात करें तो इनका वर्क रहा है जो बहुत मेजर रहा है टुवर्ड अ न्यू पब्लिक
एडमिनिस्ट्रेशन द मिनो ब्रुक पर्सपेक्टिव जो कि 1971 को पब्लिश हुआ था और इसी वर्क के साथ एनपीए अपनी पीक पर पहुंचा था। अगला
इंपॉर्टेंट पॉइंट यह है कि इसमें फ्रैंक मैरिनी ने एनपीए की पांच इंपॉर्टेंट एलिमेंट्स की बात की जिसमें आता है
रिलेवेंस चेंज सोशल इक्विटी वैल्यूस एंड कंज्यूमर ओरिएंटेड। अब हम एल्टन मेो को थोड़ा सा डिटेल में समझ लेते हैं। यह
ऑस्ट्रेलियन बोर्न यूएस साइकोलॉजिस्ट, इंडस्ट्रियल रिसर्चर एंड ऑर्गेनाइजेशनल थ्योरिस्ट रहे हैं। और इनके नेतृत्व में
ही हॉरर्थोन एक्सपेरिमेंट शिकागो यानी कि यूएस के हॉरथोन नामक जगह में हुए थे। और खास बात यह है कि यह जो एक्सपेरिमेंट हुए
थे, यह वेस्टर्न इलेक्ट्रिक फैक्ट्री ऑफ़ हारवर्ड बिजनेस स्कूल के द्वारा आयोजित करवाए गए थे। और मेयो ने थ्योरी ऑफ ह्यूमन
रिलेशन दी 1930 के दशक में। और इन्होंने कहा कि जो वर्कर्स होते हैं वह मशीन नहीं होते हैं, आदमी होते हैं, प्राणी होते हैं
और इसी वजह से इनको जो है फादर ऑफ ह्यूमन रिलेशन थ्योरी के नाम से जाना जाता है। इन्होंने इकोनॉमिक मैन की जगह सोशल मैन की
बात की और इन्होंने कुछ इंपॉर्टेंट बुक्स लिखी है। जिनमें पहली आती है ह्यूमन प्रॉब्लम्स ऑफ एन इंडिविजुअल सिविलाइजेशन।
दूसरी लिखी है द सोशल प्रॉब्लम्स ऑफ एन इंडस्ट्रियल सिविलाइजेशन और तीसरी लिखी है द पॉलिटिकल प्रॉब्लम्स ऑफ एन इंडस्ट्रियल
सिविलाइजेशन। अब हम पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की फेजेस को अच्छे से देख लेते हैं। तो जो आईडिया है
फेजेस का यानी कि पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की जो फेजेस है उसका आईडिया दिया गया था निकोलस हेनरी के द्वारा और हम इसमें मेनली
फाइव फेस को डिस्कस करेंगे। जिनमें पहला फेज आता है पॉलिटिकल डाइकटॉमी जो कि 1887 से लेकर 1936 तक चलता है और इसके जो की
थिंक कर रहे हैं उनमें आते हैं विल्सन गुडनब एंड एल्डि अब हम बुड्रो विल्सन को डिस्कस कर लेते
हैं। इन्होंने कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग लिखी जिनमें से प्रमुख है द स्टडी ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन जिसमें इन्होंने
कहा कि जो पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन है यह ट्रेड स्कोप का विषय है। यानी कि व्यापार का विषय है और इन्होंने पब्लिक
एडमिनिस्ट्रेशन को पहली बार पॉलिटिक्स से अलग किया और इसी वजह से इनको जाना जाता है फादर ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन। वहीं
दूसरे थिंकर का नाम आता है फ्रैंक जॉनसन गुडनोब और इन्होंने लिखा है पॉलिटिक्स एंड एडमिनिस्ट्रेशन जो कि 1900 में पब्लिश
होता है और इनको जाना जाता है फादर ऑफ अमेरिकन पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन और यह फर्स्ट प्रेसिडेंट रहे हैं अमेरिकन
पॉलिटिकल साइंस एसोसिएशन के। अगले थिंकर का नाम आता है एलडी वाइट। इनका सबसे प्रमुख वर्क रहा है इंट्रोडक्शन टू द
स्टडी ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन जो कि 1926 में पब्लिश होता है और इस किताब की खास बात यह है कि इसको पब्लिक
एडमिनिस्ट्रेशन की पहली बुक मानी जाती है और एलडी वाइट होलिस्टिक जो अप्रोच है पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की उससे जुड़े हैं।
पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की अगली जो फेज है वह आता है क्रिएशन ऑफ प्रिंसिपल्स ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन जो कि 1927 से 1937
तक रहती है। इसमें हम मेनली छह थिंकर्स को पढ़ते हैं। जिनमें पहला नाम आता है हेनरी फयल का। दूसरा नाम आता है बिलोबी का।
तीसरा नाम आता है एमपी फोलट का। चौथा नाम आता है मुने एंडले का। पांचवा नाम आता है लूथर गुलिक का और छठा नाम आता है उर्बिक
का। तो सबसे पहले अब हम डिस्कस कर लेते हैं हेनरी फयल को। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जिनमें पहला आता है जनरल
प्रिंसिपल्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन। दूसरा आता है जनरल एंड इंडस्ट्रियल मैनेजमेंट। तीसरा आता है द एडमिनिस्ट्रेटिव थ्योरी ऑफ द
स्टेट। और नोट करने वाली बात यह भी है कि जो पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की नैरोअर एप्रोच रही है, उसके साथ यह जुड़े हैं। और
इनको जाना जाता है फादर ऑफ क्लासिकल थ्योरी ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन। इन्होंने पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन यानी कि
एडमिनिस्ट्रेशन के 14 प्रिंसिपल्स दिए और एडमिनिस्ट्रेशन के पांच एलिमेंट्स की बात की और इन्होंने एक इंपॉर्टेंट नोशन दिया
गैंग प्लैंक जिसको हम लेवल जंपिंग भी कहते हैं। इनको आप डिटेल में समझ लीजिए क्योंकि हमारी जो वीडियो है यह यह रिवीजन के
पर्सपेक्टिव से बनाई गई है। इसमें हम हर कांसेप्ट को डिटेल में डिस्कस नहीं कर सकते हैं। वहीं दूसरा जो नाम आता है वह है
विलियम एफ बिलोबिका। इन्होंने लिखी प्रिंसिपल्स ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन जो कि 1927 में पब्लिश होती है। इसमें
इन्होंने कहा एडमिनिस्ट्रेशन इज द फोर्थ पिलर ऑफ द गवर्नमेंट। यानी कि जो प्रशासन है वह सरकार का चौथा पिलर होता है। चौथा
स्तंभ होता है। अगले थिंकर का नाम आता है मैरी पार्कर फोलेट। यह अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। और इनको जाना जाता है
मदर ऑफ मॉडर्न मैनेजमेंट। पीटर ड्रकर ने इनके बारे में कहा है कि यह प्रॉफिट ऑफ मैनेजमेंट है और इन्होंने इंडस्ट्रियल
डेमोक्रेसी की बात की। लेकिन इससे भी इंपॉर्टेंट बात यह है कि हन्ना आरंट इनसे काफी प्रभावित हुई। पावर एंड डोमिनेशन का
जो कांसेप्ट है हन्ना आरंट ने इन्हीं से ग्रहण किया और इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग्स रही है। जिनमें आता है द न्यू
स्टेट क्रिएटिव एक्सपीरियंस, डायनामिक एडमिनिस्ट्रेशन, फ्रीडम एंड कोऑर्डिनेशन। वहीं दूसरी तरफ इनके कुछ इंपॉर्टेंट
आइडियाज भी रहे हैं। जिनमें सबसे पहला और इंपॉर्टेंट है वो है कंस्ट्रक्टिव कॉन्फ्लिक्ट। इसमें इन्होंने कहा है कि
अगर किसी ऑर्गेनाइजेशन में कॉन्फ्लिक्ट हो जाता है उसको तीन तरीके से दूर किया जा सकता है। पहला है डोमिनेशन, दूसरा है
कंप्रोमाइज, तीसरा है इंटीग्रेशन। लेकिन इन्होंने कहा कि जो इंटीग्रेशन है, वह सबसे इंपॉर्टेंट और सबसे बढ़िया तरीका है
कॉन्फ्लिक्ट को सॉल्व करने का। और इसी को कंस्ट्रक्टिव कॉन्फ्लिक्ट कहा जाता है। अब हम फलट के न्यू कांसेप्ट ऑफ पावर को समझ
लेते हैं। तो इन्होंने कहा है कि जो पावर है वह दो प्रकार की होती है। पहली पावर ओवर दूसरी होती है पावर विद। पावर ओवर का
मतलब यह है कि अगर एक व्यक्ति की कुछ बिल है, कुछ इच्छाएं हैं तो जब वह बल के आधार पर उनको ग्रहण करता है, उनको पूरा करता है
तो उसको पावर ओवर कहते हैं। वहीं पावर विद का मतलब यह है कि अगर आपकी कुछ विल है या आपकी कुछ कॉन्फ्लिक्ट है तो उनको दोनों के
द्वारा शांतिपूर्वक तरीके से कॉमनली उनको पूरा करना, सुलझाना। और पहले भी मैंने कहा कि हन्ना आरंट इनसे इतनी प्रभावित थी कि
उन्होंने इनसे पावर एंड डोमिनेशन का कांसेप्ट लिया। इन्होंने कहा भी है कि पावर इज द एबिलिटी टू मेक थिंग्स हैपन टू
इनिशिएट चेंज। यानी कि पावर उस योग्यता का नाम है जब हम परिवर्तन लाने के लिए चीजों को पूरा करते हैं। अब हम फेट का जो अगला
इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है लीडरशिप उसको हम समझ लेते हैं। तो इसमें इन्होंने कहा है कि जो लीडर होता है और जो लीडरशिप होती है
वह केवल अदर्स यानी कि जो एनवायरमेंट होता है उसको ही प्रभावित नहीं करता है बल्कि जो लीडर है और जो लीडरशिप है वह भी दूसरे
लोगों से और एनवायरमेंट से प्रभावित होता है। और इसको इन्होंने सर्कुलर रिस्पांस कहा है। मतलब एक दायरे में होता है। जहां
एक तरफ लीडर प्रभावित होता है दूसरे लोगों से। वहीं दूसरे लोग जो है वह लीडर से प्रभावित होते हैं। तो इन्होंने तीन
प्रकार की लीडरशिप की बात की है। जिनमें पहली आती है लीडरशिप ऑफ पोजीशन। दूसरी आती है लीडरशिप ऑफ पर्सनालिटी। तीसरी आती है
लीडरशिप ऑफ फंक्शन। लीडरशिप ऑफ पोजीशन का मतलब यह है कि पद को प्राप्त करने के लिए लीडरशिप करना। लीडरशिप ऑफ पर्सनालिटी का
मतलब यह है कि अपना जो व्यक्तित्व है उसको बनाने के लिए नेतृत्व करना। और तीसरा है लीडरशिप ऑफ फंक्शन। इसका मतलब यह है कि
लोगों के लिए कुछ अच्छे कार्य करने के लिए लीडरशिप करना। अगले दो थिंकर का नाम है मुने एंड्रेले। तो ये यूएसए के क्लासिकल
थ्योरिस्ट रहे हैं। जिन्होंने यूएसए में पहली बार क्लासिकल थ्योरी को 1931 में फॉर्मुलेट किया। और इनका सेमिनल वर्क है द
प्रिंसिपल ऑफ़ ऑर्गेनाइजेशन जिसमें इन्होंने चार थ्योरीज दी। जिनमें पहला है स्केलर प्रिंसिपल जिसमें इन्होंने कहा कि
जो हायरार्की होती है वह एक स्केलर चेन की तरह होती है। दूसरा कांसेप्ट है स्टाफ एंड लाइन प्रिंसिपल। तीसरा है फंक्शनल
डिफरेंशिएशन और चौथा है कोऑर्डिनेशन। तो इन सभी कांसेप्ट्स को आप अच्छे से याद कर लीजिए क्योंकि एग्जाम के लिए बहुत ही
इंपॉर्टेंट है। अगले दो थिंकर का नाम आता है गुलिक एंड उर्बिक। तो यह भी बहुत इंपॉर्टेंट स्कॉलर रहे हैं। जिनके प्रमुख
वर्क का नाम है पेपर्स ऑन द साइंस ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन जो कि 1937 को पब्लिश होता है। इसमें इन्होंने फोर पी फार्मूला और
पोस्ट कोर का नोशन दिया है। फोर पी का मतलब है कि ऑर्गेनाइजेशन में चार चीजें होती है। प्रोसेस पर्पस पर्सन एंड प्लेस।
दूसरा पोस्ट कोर में कुछ चीजें आती है। जैसे पी से प्लानिंग, ओ से ऑर्गेनाइजिंग, एस से स्टाफिंग, बी से डायरेक्टिंग, सीओ
से कोऑर्डिनेटिंग, आर से रिपोर्टिंग, बी से बजटिंग। और यह दोनों क्लासिकल थ्यरिस्ट रहे हैं। और खास बात यह है कि दोनों ही यह
पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की जो नैरोअच है उससे जुड़े हैं। और उर्बिक ने भी एक इंपॉर्टेंट वर्क लिखा है जिसका नाम है द
एलिमेंट्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन जो कि 1944 को पब्लिश होती है। थर्ड फज़ का नाम है एरा ऑफ चैलेंजेस जो कि 1938 से 1947 तक चलता
है। इसमें हम मेनली फोर थिंकर्स को डिस्कस करेंगे। जिनमें पहला नाम आता है हरबर्ट साइमन का। दूसरा नाम आता है एल्टन मेयो
का। तीसरा नाम आता है रॉबर्ट डेहल का और चौथा नाम आता है चेस्टर बरनाड का। तो सबसे पहले हम बात कर लेते हैं हरबर्ट साइमन की।
इन्होंने जो है क्लासिकल थ्योरी है पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की उसको प्रोवर्ब्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन कहा। यानी कि मजाक उड़ाकर
इसे कहावतें कहा। इनके कुछ इंपॉर्टेंट नोशंस है जैसे नोशन ऑफ मैनेजरियल लॉजिकल पॉजिटिविज्म गैबबाइन सेटिस्फेक्शन
बिहेवियर बॉडेड रैशनलिटी जोन ऑफ एक्सेप्टेंस इंपेरिकल मेथड प्रिंसिपल ऑफ स्पेशलाइजेशन स्ट्रक्चरल एप्रोच एंड
एडमिनिस्ट्रेटिव मैन तो जितने भी इनके नोशन है इनको आप अच्छे से याद कर लीजिए। अभी हम डिटेल में इनको डिस्कस नहीं कर
सकते हैं। अब आप हरबर्ट साइमन के इंपॉर्टेंट वर्क्स को भी रिवाइज कर लीजिए। तो इनमें पहला आता है एडमिनिस्ट्रेटिव
बिहेवियर और स्टडी ऑफ़ डिसीजन मेकिंग प्रोसेससेस इन एडमिनिस्ट्रेटिव ऑर्गेनाइजेशन। और यह इनकी सबसे महत्वपूर्ण
कृति है। दूसरा है ऑर्गेनाइजेशंस। तीसरा है द न्यू साइंस ऑफ मैनेजमेंट डिसीजन। चौथा है द साइंसेस ऑफ द
आर्टिफिशियल। पांचवा है ह्यूमन प्रॉब्लम सॉल्विंग। छठा है मॉडल्स ऑफ बाउंडेड टू रैशनलिटी। वहीं सातवां है एडमिनिस्ट्रेटिव
बिहेवियर। अगले इंपॉर्टेंट थिंकर का नाम आता है एल्टन मेो। इनको हम इस स्लाइड में डिस्कस नहीं करेंगे क्योंकि हमने पहले ही
इनको डिस्कस किया है। इसीलिए अगले थिंकर का नाम आता है रॉबर्ट डेहल। और यह रिग्स और फेरल हडी के साथ कंपेरेटिव पब्लिक
एडमिनिस्ट्रेशन के साथ जुड़े हुए हैं। और इनके प्रमुख वर्क का नाम है द साइंस ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन जो कि 1947 को
पब्लिश होती है। जिसमें इन्होंने कहा था कि पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन कोई विज्ञान नहीं है। कोई साइंस नहीं है और इन्होंने
डेमोक्रेसी की प्लूरलिस्टिक थ्योरी को दिया क्योंकि यह बहुलवादी विचारक रहे हैं। इन्होंने कहा कि जो डेमोक्रेसी है वह एक
इफेक्टिव पोलार्की है और इनकी जो प्रमुख कृति रही है द साइंस ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन थ्री प्रॉब्लम्स जो कि
1947 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की तीन प्रॉब्लम्स को डिस्कस किया। जिनमें पहली आती है
वैल्यूस, दूसरी आती है बिहेवियर, तीसरी आती है कल्चर। नेक्स्ट थिंकर का नाम आता है चेस्टर बरनाड। तो यह अमेरिकन बिजनेस
एग्जीक्यूटिव रहे हैं। पब्लिक एडमिनिस्ट्रेटर रहे हैं। तो इनको जाना जाता है स्पिरिचुअल फादर ऑफ सोशल सिस्टम
स्कूल और इतना ही नहीं इनको जाना जाता है फादर ऑफ मैकेनिकल थ्योरी। और इसके साथ-साथ इनको जाना जाता है फादर ऑफ मॉडर्न
ऑर्गेनाइजेशनल थ्योरी। और इनके दो इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। जिनमें पहला आता है द फंक्शनंस ऑफ द एग्जीक्यूटिव। दूसरा
आता है ऑर्गेनाइजेशन एंड मैनेजमेंट। और इन्होंने एक इंपॉर्टेंट आईडिया दिया जिसको जाना जाता है पॉजिटिव एंड नेगेटिव
डिसीजंस। और इन्होंने कहा कि जो कम्युनिकेशन थ्योरी है वो ऑर्गेनाइजेशन में होनी चाहिए। यानी कि इन्होंने
ऑर्गेनाइजेशन में कम्युनिकेशन की थ्योरी दी और इन्होंने कहा कि एक ऑर्गेनाइजेशन में तीन प्रकार के एलिमेंट्स होते हैं
जिनमें कम्युनिकेशन, विलिंगनेस टू वर्क एंड कॉमन पर्पस शामिल है। वहीं दूसरी तरफ चेस्टर बरनार्ड ने कुछ इंपॉर्टेंट आइडियाज
भी दिए जिनको आप फिलहाल याद कर लीजिए। तो पहला इसमें आता है एक्सेप्टेंस थ्योरी ऑफ़ अथॉरिटी। दूसरा आता है जोन ऑफ इंडिफेंस।
तीसरा आता है कंट्रीब्यूशन सेटिस्फेक्शन इक्विलिब्रियम और चौथा आता है फंक्शनंस ऑफ द एग्जीक्यूटिव। फोर्थ फेज में आता है एरा
ऑफ आइडेंटिटी एंड क्राइसिस। और इस एरा में यानी कि इस फेज में हम टू इंपॉर्टेंट स्कॉलर्स को डिस्कस करेंगे। जिनमें पहला
नाम आता है एफ डब्ल्यू रिग्स और दूसरा नाम आता है एमसी ग्रेगर। तो सबसे पहले अब हम बात कर लेते हैं एफ डब्ल्यू रिग्स की। तो
इनको जाना जाता है फादर ऑफ कंपेरेटिव पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन और खास बात यह है कि यह पॉलिटिकल साइंटिस्ट और पब्लिक
एडमिनिस्ट्रेशन के ये बहुत बड़े थिंकर रहे हैं, अग्रदूत रहे हैं। इन्होंने इंपेरिकल स्टडी की फिलीपाइंस, थाईलैंड एंड इंडिया
जैसी डेवलपिंग नेशन की और इन्होंने अपना अध्ययन करने के लिए यानी कि थर्ड वर्ल्ड कंट्री का अध्ययन करने के लिए इकोलॉजिकल
एप्रोच को अपनाया। इनके इंपॉर्टेंट वक्स हैं जिनमें पहला आता है द इकोलॉजी ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन दूसरा आता है
एडमिनिस्ट्रेशन इन डेवलपिंग कंट्रीज द थ्योरीज ऑफ प्रिज्मेटिक सोसाइटी तीसरा आता है प्रिज्मेटिक सोसाइटी रिवजिटेड और अगला
आता है मॉडल्स इन द कंपेरेटिव स्टडी ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन रिग्स की कुछ इंपॉर्टेंट थ्योरीज रही है जो कि आपके
एग्जाम के लिए बहुत ही इंपॉर्टेंट है। तो इनमें पहली थ्योरी आती है साला मॉडल और इसकी तीन इंपॉर्टेंट फीचर इन्होंने बताई
है जिसमें पहला आता है हेटेजे दूसरा आता है फॉर्मलिज्म और तीसरा आता है ओवरलैपिंग। वहीं इनकी अगली थ्योरी का नाम है बाजार
कैंटीन मॉडल और अगली थ्योरी का नाम है फ्यूज्ड प्रिज्मेटिक डिफ्लेक्टेड मॉडल। अगले थिंकर का नाम आता है एमसी ग्रेगर और
इन्होंने एक इंपॉर्टेंट थ्योरी को प्रोपाउंड किया जिसका नाम है ह्यूमन मोटिवेशन थ्योरी और इसको पॉपुलरली जाना
जाता है थ्योरी एक्स एंड थ्योरी व इनकी दो इंपॉर्टेंट बुक्स है जिनमें पहली आती है द ह्यूमन साइड ऑफ़ एंटरप्राइजेस दूसरी आती है
लीडरशिप एंड मोटिवेशन और इनकी जो थ्योरी है यानी कि थ्योरी एक्स और थ्योरी व है इसमें एक्स को यह बताते हैं कि इसमें जो
लोगों की नेगेटिव चीजें होती है उसको यह बताती है जैसे लोग ऑर्गेनाइजेशन में किसी काम को नापसंद करते हैं, डिसलाइक करते
हैं। उनके अंदर क्रिएटिविटी नहीं होती है। चेंज की कोई भावना नहीं होती है। और लोग खुद के लिए ही काम करते हैं। पैसे के लिए
काम करते हैं और उनके जो गोल्स होते हैं, वह बहुत लोअर लेवल के होते हैं। वहीं दूसरी तरफ जो थ्योरी व है, यह पॉजिटिव है
क्योंकि लोग इसमें काम को पसंद करते हैं। उनके पास क्रिएटिविटी होती है। उनके पास न्यू टेक्नोलॉजी होती है। सेंस और
ट्रांजिशन में यह विश्वास रखते हैं और ऑर्गेनाइजेशन के लिए यह काम करते हैं और इनके जो गोल होते हैं वह हायर होते हैं।
लास्ट फज़ का नाम है न्यू पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन और इसके दो इंपॉर्टेंट स्कॉलर या फिर थिंकर रहे हैं जिनका पहला
नाम है ड्वेड बाल्डो और दूसरा नाम है फ्रैंक मरीनी। तो 1970 के दशक में एनपीए का जन्म होता है। फर्स्ट जो मिनोबुक
कॉन्फ्रेंस हुई थी 1968 में उसकी वजह से डइड वाल्डो लिखते हैं पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन इन द टाइम ऑफ टर्बुलेंस।
वहीं इन्होंने कुछ और किताबें लिखी है जैसे द एडमिनिस्ट्रेटिव स्टेट द स्टडी ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन। और वहीं फ्रैंक
मरीनी ने भी एक इंपॉर्टेंट बुक लिखी जिसका नाम है टूवर्ड्स अ न्यू पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन द मिनोबुक पर्सपेक्टिव। और
इस किताब में फ्रैंक मैरीनी ने एनपीए के पांच एलिमेंट्स की बात की है। जिनमें है रेलेवेंस, चेंज, सोशल इक्विटी, वैल्यूस
एंड कंज्यूमर ओरिएंटेड। दूसरी तरफ अब हम एनपीए की कुछ इंपॉर्टेंट फीचर्स को देख लेते हैं। जिनमें पहली आती है क्लाइंट
फोकस्ड एडमिनिस्ट्रेशन, डेमोक्रेटिक डिसीजन मेकिंग। अगली आती है डिसेंट्रलाइजेशन ऑफ एडमिनिस्ट्रेटिव
प्रोसेस। अगली आती है फोर एलिमेंट्स की। की यह बात करती है जैसे रेलेवेंस, चेंज, सोशल इक्विटी एंड वैल्यूज़ और यह
पॉजिटिविज़्म को नकारता है। पोस्ट पॉजिटिविज़्म में बिलीव करता है। डेमोक्रेटिक सिटीजनशिप की यह बात करता है।
इन्वेंशन एंड मोरालिटी की बात करता है। डी ब्यूरोक्रेटाइजेशन की यह बात करता है। एफिशिएंसी एंड स्किल की यह बात करता है।
और प्लुरालिटी यानी कि बहुलवाद में विश्वास रखता है। और पब्लिक पॉलिसी एंड इंटरेस्ट की यह बात करता है। दूसरी तरफ
आपको फोर डी ऑफ एनपीए यानी कि एनपीए में जो फोर डी होते हैं उनको अच्छे से याद करना है। एग्जाम में ये पूछे जाते हैं। तो
ये है डेमोक्रेटाइजेशन, डीसेंट्रलाइजेशन, डीब्यूरोक्रेटाइजेशन एंड डेलीगेशन। अब हम मैक्स वेबर की जो आइडियल टाइप
ब्यूरोक्रेसी रही है, उसकी कुछ इंपॉर्टेंट फीचर्स को देख लेते हैं। जिनमें पहली आती है डिवीजन ऑफ लेबर, दूसरी आती है
प्राइवेसी ऑफ़ रूल्स एंड रेगुलेशन। तीसरी आती है हायरार्की ऑफ अथॉरिटी। अगली आती है वेल ट्रेंड एंप्लाइज। अगली आती है
मैनेजेरियल डडीिकेशन। अगली आती है इंपार्शियलिटी ऑफ मैनेजमेंट। दूसरी अगली जो आती है यह आती है बेस्ड ऑन लीगल रैशन
अथॉरिटी। अगली आती है डेवलपमेंट एज करियर सर्विस। और यह सपोर्ट करता है पॉलिटिक्स एडमिनिस्ट्रेटिव डाइकटॉमी को। और यह बात
करता है कि मेरिट स्किल, नॉलेज और जो एबिलिटी है उसके बेस पर ही रिक्रूटमेंट और प्रमोशन होगी और एफिशिएंसी एंड
इंपर्सनालिटी की यह बात करता है। ब्यूरोक्रेटिक थ्योरी में अगले थिंकर का नाम आता है एफएम मार्क्स और इनका
इंपॉर्टेंट वर्क रहा है एलिमेंट्स ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन जो कि 1960 को पब्लिश होती है और इन्होंने जो
ब्यूरोक्रेसी है इसको चार भागों में बांटा है। गार्डियन ब्यूरोक्रेसी जो कि चाइना और परशिया में पाई जाती थी। दूसरा है कास्ट
ब्यूरोक्रेसी जो कि एंशिएंट इंडिया में पाई जाती थी। अगला है पेट्रोनेज ब्यूरोक्रेसी और अगली है मेरिट
ब्यूरोक्रेसी। और इन्होंने एक इंपॉर्टेंट वर्क और भी लिखा जिसका नाम है द एडमिनिस्ट्रेटिव स्टेट एंड इंट्रोडक्शन टू
ब्यूरोक्रेसी। अब हम ब्यूरोक्रेसी से जुड़े कुछ इंपॉर्टेंट फैक्ट्स देख लेते हैं। तो पहला
फैक्ट यह है कि जो ब्यूरोक्रेसी शब्दावली है इसको सबसे पहले 1745 में विंस्टेंट बी गारने ने कॉइ किया था जिसमें इन्होंने कहा
था कि जो ब्यूरोक्रेसी है वह एक इलनेस यानी कि बीमारी के रूप में है। इन्होंने कोट भी किया था जिसमें कहा था देयर इज अ
डिजीज इन फ्रांस दैट इज रिवेजिंग अस दिस डिजीज इज कॉल्ड ब्यूरोनोमिया। और थॉमस कर्लाइल ने जो ब्यूरोक्रेसी है इसको
कॉन्टिनेंटल न्यूज़ेंस कहा और अर्लियर यानी कि शुरू शुरू में जो ब्यूरोक्रेसी है इसको फ्रांस में यूज़ किया गया। बाद में यूके
में यह मॉडर्न वे पे काफी डेवलप हुई। और जो अपनी प्रमुख कृति है ब्यूरोक्रेसी एंड पॉलिटिकल डेवलपमेंट इसमें जोसेफ ला
कोलंबरा ने डेवलपमेंटल ब्यूरोक्रेसी की बात की है और अपनी प्रमुख कृति द न्यू डेस्पोटिज्म जो कि 1929 को पब्लिश होती
है। लॉर्ड हब ने ब्यूरोक्रेसी को एक न्यू डेस्पोटिज्म के रूप में व्याख्या किया है। अब हम सबसे पहले बात कर लेते हैं फर्स्ट
मेनो ब्रुक कॉन्फ्रेंस की। तो यह 1968 को होती है और जो सरेकस यूनिवर्सिटी है ऑन ब्लू माउंटेन लेक इन द एडियन डेक माउंटेंस
न्यूयॉर्क वहां पर यह हुई थी मिनोबुक नामक जगह पे इसको अभी मिनोबुक के नाम से जाना जाता है और इसको हेड किया था डार्ड वाल्डो
ने इसी की वजह से एनपीए की शुरुआत हुई थी और इस पे चार चीजों पे फोकस किया गया था जो आपको याद रखना है चेंज रेलेवेंस सोशल
इक्विटी एंड वैल्यूस और डिवाइड वाल्डो ने लिखा था द पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन इन द टाइम ऑफ टर्बुलेंस और इन्होंने और भी लिखा
था जैसे द एडमिनिस्ट्रेटिव स्टेट द स्टडी ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन और फ्रैंक मरीनी ने भी इंपॉर्टेंट रोल प्ले किया था इस
फर्स्ट मिनोबुक कॉन्फ्रेंस में और इन्होंने बुक लिखी थी टुवर्ड्स अ न्यू पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन द मिनो ब्रुक
पर्सपेक्टिव। वहीं दूसरी तरफ सेकंड मिनोबुक कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाती है 1988 को और इसकी लोकेशन भी वही रही थी।
यानी कि जो सारकस यूनिवर्सिटी ऑन ब्लू माउंटेन लेक इन द एडरनक माउंटेंस ऑफ न्यूयॉर्क है जिसको अभी मिनोबुक लोपेंस इन
न्यू विंडो के नाम से जाना जाता है। वहां पर आयोजित की गई थी। इसको हेड किया था जॉर्ज फ्रेडरिकसन ने। इसकी खास बात यह रही
कि इसकी वजह से एनपीएम यानी कि न्यू पब्लिक मैनेजमेंट का 1990 के दशक में आगाज हुआ। इसने फोकस किया एलपीजी एंड एनपीएम पे
और खास बात यह भी है कि इसकी वजह से ही पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन का कमर्शियलाइजेशन हो जाता है। और टू इंपॉर्टेंट स्कॉलर
जिनके नाम है रिचर्ड टी मेयर एंड टीमी बेले। यह एक इंपॉर्टेंट बुक पब्लिश करते हैं जिसका नाम है पब्लिक मैनेजमेंट इन द
इंटरकनेक्टेड वर्ल्ड एस इन द मिनो ब्रुक ट्रेडिशन। वहीं दूसरी तरफ थर्ड मिनो ब्रुक कॉन्फ्रेंस को आयोजित किया जाता है 2008
में और इसकी लोकेशन यानी कि जहां यह आयोजित की गई थी तो यह भी आयोजित की गई थी मिनोबुक लोस इन न्यू विंडो पे और इसको हेड
किया था रोजमरी और लीरी ने और इसका जो फोकस पॉइंट था वह था ग्लोबल कंसर्न्स जैसे टेररिज्म इकोनमी इमंबैलेंस और इसने जो
थ्री ईज़ है उस कांसेप्ट को बल दिया यानी कि उसकी वजह से थ्री ई कांसेप्ट जैसे इकोनमी एफिशिएंसी और इफेक्टिवनेस जैसी जो
चीजें हैं कांसेप्ट है वो एमर्ज हुए और इसने कंपेरेटिव जो स्टडी है पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मैनेजमेंट में
ऑर्गेनाइजेशन पे उसके ऊपर भी फोकस किया। अब हम साइंटिफिक मैनेजमेंट थ्योरी को थोड़ा सा डिटेल में समझ लेते हैं।
साइंटिफिक मैनेजमेंट थ्योरी के फादर जाने जाते हैं एफ डब्ल्यू टेलर को और इन्होंने 1915 की बजाय 1911 में अपनी प्रमुख किताब
द प्रिंसिपल ऑफ साइंटिफिक मैनेजमेंट में साइंटिफिक थ्योरी दी थी और इसको जाना जाता है टेलरिज्म और जो टर्म है साइंटिफिक
मैनेजमेंट की उसको कॉइ किया गया था 1910 में लुईस बर्नडीज के द्वारा और जो साइंटिफिक मैनेजमेंट थ्योरी है वो पर्सन
को सोशल मैन नहीं बल्कि इकोनॉमिक मैन के रूप में देखती है और मैनेजमेंट के बारे में यह कहता है कि यह साइंस है। कोई थंब
ऑफ रूल नहीं है। डिवीजन ऑफ लेबर की बात करता है। हालांकि जो वर्कर्स है उनको एक मशीन की तरह देखते हैं। और जो सिलेक्शन
होगी वह साइंटिफिक सिलेक्शन होगी, ट्रेनिंग होगी, डेवलपमेंट होगा वर्कर्स का और यह कहते हैं कि मैनेजमेंट डायनामिक है।
टेलर के कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स है जिन्हें आपको अच्छे से याद करना है। तो पहला है प्रिंसिपल्स ऑफ साइंटिफिक मैनेजमेंट।
दूसरा है अ पीस रेट सिस्टम। तीसरा है शॉप मैनेजमेंट। चौथा है आर्ट ऑफ कटिंग मैटल्स। वहीं नोट करने वाली बात यह भी है कि
इन्होंने मैनेजमेंट के चार प्रिंसिपल्स की बात की जिनमें साइंस, ट्रेनिंग, कोऑपरेशन एंड डिवीजन ऑफ वर्क आता है। टेलर ने कुछ
इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स भी दिए जो कि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही इंपॉर्टेंट है। बस आप किसी भी तरह से इनको याद कर लीजिए। तो
पहला कांसेप्ट है मेंटल रेवोल्यूशन। दूसरा है फंक्शनल फॉर्मशिप। तीसरा आता है पीस रेट सिस्टम। चौथा आता है पिग आयरन
एक्सपेरिमेंट। पांचवा आता है शॉप एंड टाइम मैनेजमेंट। और छठा आता है प्रिंसिपल्स ऑफ मैनेजमेंट। अब हम डेवलपमेंट
एडमिनिस्ट्रेशन को थोड़ा सा डिटेल में समझ लेते हैं। तो अपनी प्रमुख कृति जिसका नाम है द स्ट्रक्चर ऑफ डेवलपमेंट
एडमिनिस्ट्रेशन इन इंडिया जो 1955 को पब्लिश होती है। इस कृति में यूएल गोस्वामी ने डेवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन
शब्दावली को पहली बार पॉइंट किया और एफ डब्ल्यू रिग्स भी जुड़े हैं डेवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन से। जोसेफ ला पलंबरा ने भी
डेवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेटिव या फिर डेवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन शब्दावली को यूज किया। वहीं दूसरी तरफ जॉर्ज गांड को जाना
जाता है फादर ऑफ डेवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन। एडवर्ड बेडनर भी डेवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन के बहुत बड़े
प्रवक्ता रहे हैं। एडवोकेटर रहे हैं। इन्होंने अपनी प्रमुख कृति जिसका नाम है डेवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन एंड एनप्टेड
बिबिलियोग्राफी। इसमें कहा कि जो डेवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन है यह एक्शन ओरिएंटेड होता है, चेंज ओरिएंटेड होता है
और गोल ओरिएंटेड होता है। वहीं जॉर्ज गंट ने भी दूसरी तरफ डेवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन की तीन फीचर्स बताई है। जिनमें पहली है
चेंज एंड इनोवेशन, दूसरी है अकाउंटेबिलिटी टू पीपल और तीसरी है पॉजिटिव एंड इनोवेटिव। अब हम मोटिवेशन थ्योरीज को
थोड़ा सा डिटेल में समझ लेते हैं। हायरार्की ऑफ़ नीड्स की जो थ्योरी है, इसे दिया अब्राहम मैस्लो ने। थ्योरी एक्स एंड
थ्योरी व की बात करते हैं एमसी ग्रेगर और टू फैक्टर थ्योरी की बात करते हैं फ्रेडरिक हर्जबर्ग। अब हम अब्राहम मैस्लो
के बारे में थोड़ा सा समझ लेते हैं। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं जैसे अ थ्योरी ऑफ़ ह्यूमन मोटिवेशन। दूसरा है
मोटिवेशन एंड पर्सनालिटी। और अगला है रिलीजन वैल्यूस एंड पीक एक्सपीरियंस। और अगला है थ्योरी जेड। और इनके कुछ
इंपॉर्टेंट नोशन रहे हैं। जिनमें से प्रमुख है हायरार्की ऑफ नीड्स जिसको जाना जाता है थ्योरी ऑफ मोटिवेशन और नीड
प्रायोरिटी थ्योरी। अगले थिंकर का नाम आता है फ्रेडरिक हर्जबर्ग। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स है जिनमें पहला आता है
द मोटिवेशन टू वर्क। दूसरा आता है वर्क एंड द नेचर ऑफ मैन। तीसरा आता है द मैनेजरियल चॉइस। वहीं इनके कुछ आइडियाज भी
रहे हैं जिनमें प्रमुख है टू फैक्टर थ्योरी जिसको जाना जाता है हजीन मोटिवेशन थ्योरी और इसमें हर्जबर्ग ने कहा है कि
ऑर्गेनाइजेशन में दो तरह के लोग मिलते हैं जो काम करते हैं। पहला है हजीन सीकर यानी कि हजीन पे जो ज्यादा बल देते हैं। जैसे
इसमें आता है रेस्ट सैलरी पॉलिसी ऑफ़ कंपनी। दूसरा है मोटिवेशन सीकर जो इंसेंटिव्स, रिकॉग्निशन, पार्टिसिपेशन पर
ज्यादा फोकस करते हैं। अब हम न्यू पब्लिक मैनेजमेंट को अच्छे से समझ लेते हैं। तो एनपीएम का विकास होता है 1990 के दशक में
जो सेकंड मिनोबुक कॉन्फ्रेंस 1988 को हुई थी, उसकी वजह से और इसके की डेवलपर्स रहे हैं ऑस्मोन एंड गैबियर। यह सिटीजन को
देखता है एज अ कस्टमर। और यह पॉलिटिक्स एंड जो एडमिनिस्ट्रेशन डाइकटॉमी है इसके ऊपर दोबारा से ध्यान केंद्रित करता है और
एनपीएम मार्केट एंड प्राइवेट सेक्टर ओरिएंटेशन की बात करता है यानी कि उस तरफ अपना ध्यान केंद्रित करता है। गवर्नमेंट
को यह एक ओर से स्टीयरिंग यानी कि फैसिलिटेटर जो सुविधाएं देती है उसके रूप में देखता है। 1992 को ऑस्बोर्न एंड
गैबियर ने एक इंपॉर्टेंट वर्क लिखा जिसका नाम है रीइन्वेंटिंग गवर्नमेंट जिसकी वजह से एनपीएम का उदय हुआ और फोलेट ने एनपीएम
को कहा है मैनेजमेंटलिज्म वहीं ऑस्बोन एंड गैबियर ने एनपीएम के बारे में कहा है यानी कि इसको देखा है एंटरप्रेन्योरियल
गवर्नमेंट और जो टॉम है एनपीएम उसको कॉइ किया था क्रिस्टोफर हुड ने अपनी एक प्रमुख बुक जिसका नाम है अ पब्लिक मैनेजमेंट फॉर
फॉर ऑल सीजंस और इन्होंने और भी बुक लिखी जैसे द आर्ट ऑफ द स्टेट द लिमिट्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन।
इंडियन पॉलिटिकल स्कॉलर्स में पहला नाम आता है रजनी कोठारी का और जब हम बात करते हैं रजनी कोठारी की तो सबसे पहले हम यही
कह सकते हैं कि यह भारतीय राजनीति के पितामह रहे हैं। इनको जाना जाता है फोरमोस्ट इंडियन पॉलिटिकल साइंटिस्ट के
रूप में और 1963 में कोठारी ने सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज यानी कि सीएसडीएस
जिसको जाना जाता है कोठारी सेंटर इसकी स्थापना की। वहीं 1980 में इन्होंने शुरू किया लोकायन जिसका प्रमुख उद्देश्य था जो
आम जनता है मास है या फिर एक्टिविस्ट्स है और जो इंटेलेक्चुअल यानी कि जो बौद्धिक वर्ग है उनके बीच एक संवाद या फिर
इंट्रोडक्शन शुरू करना था और वहीं 1985 में इन्होंने राइट लाइवलीहुड अवार्ड को प्राप्त किया और खास बात यह भी है कि
कोठारी पीपल्स यूनियन सिविल लिबर्टीज से जुड़े रहे हैं जिसकी स्थापना या फिर जिसको फाउंड किया था जेपी नारायण ने वहीं एक
इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि स्क्रीन पर जितने आपको वर्क्स दिखाई दे रहे हैं, इनको आप अच्छे से नोट कर लें। जैसे पॉलिटिक्स
इन इंडिया, कास्ट इन इंडियन पॉलिटिक्स, स्टेट अगेंस्ट डेमोक्रेसी, रिथिंकिंग डेवलपमेंट, पॉलिटिक्स एंड द पीपल,
कम्युनलिज्म इन इंडियन पॉलिटिक्स। वहीं रिथिंकिंग डेमोक्रेसी जो कि 2005 में पब्लिश होती है। तो ये सारे वर्क्स आप
अच्छे से नोट कर लें। और नोट करने वाली बात यह भी है कि 1984 में इन्होंने गोविंदा मुखोट के साथ मिलकर एक एस्स लिखा
जिसका नाम था हुबर द गिल्टी। यानी कि 1984 के जो सिख विरोधी दंगे हुए थे उसके बारे में इन्होंने एक रिसर्च की थी जिसमें
इन्होंने यह क्वेश्चन फ्रेम किया था कि 1984 के जो सिख विरोधी दंगे हुए हैं उसका दोषी कौन था? और नोट करने वाली बात यह भी
है कि इन्होंने अपनी स्टडी, अपनी रिसर्च में स्ट्रक्चरल फंक्शनल अप्रोच को यूज किया था। अब हम सबसे पहले रजनी कोठारी की
कुछ इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स को अच्छे से समझ लेते हैं। तो पहला कांसेप्ट आता है पॉलिटिसाइजेशन ऑफ कास्ट। यानी कि रजनी
कोठारी कहते हैं कि कास्ट ने भारतीय राजनीति में एक इंपॉर्टेंट एवं पॉजिटिव भूमिका प्ले की है। यानी कि यह कहते हैं
कि कास्ट हमेशा से ही पॉजिटिव रूप में भारतीय राजनीति में रहा है। क्योंकि कास्ट ने जो है भारतीय राजनीति को काफी विकसित
किया है। यानी कि भारतीय राजनीति का राजनीतिकरण किया है। और ये कहते हैं कि कास्ट की वजह से ही भारत में इकोनॉमिक
डेवलपमेंट हुआ है। लोगों की पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन हुई है। और खासतौर पर जो डेमोक्रेसी है वह अधिक डीप हुई है, गहरी
हुई है। और इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कोठारी कहते हैं कि भारत में कास्ट के तीन फॉर्म रहे हैं। जिनमें पहला फॉर्म आता है
द सेकुलर फॉर्म। सेकुलर फॉर्म का मतलब होता है लौकिक रूप। यानी कि जो कास्ट है वो लोगों से जुड़ी है। आम जनता से जुड़ी
है और इससे लोकीकरण हुआ है। और दूसरा जो मतलब है वो है इंटीग्रेशन फॉर्म। यानी कि इसकी वजह से यानी कि कास्ट की वजह से भारत
में एकीकरण हुआ है। आपस में जितने भी वर्गों के लोग हैं, कास्ट के लोग हैं, धर्मों के लोग हैं, वह आपस में एक हुए
हैं। और तीसरा यह कहते हैं कि अवेयरनेस यानी कि जो कास्ट है, कास्ट ने अवेयरनेस लाने का भी बहुत ही महत्वपूर्ण काम किया
है। कोठारी का दूसरा कांसेप्ट है कास्ट एज प्रेशर ग्रुप। यानी कि रजनी कोठारी कहते हैं कि इन वेस्टर्न वर्ल्ड प्रेशर ग्रुप्स
प्लेड एन इंपॉर्टेंट रोल व्हाइल इन इंडिया कास्ट प्लेड एन इंपॉर्टेंट रोल इन इंडियन पॉलिटिक्स। इसका मतलब यह है कि भारत में
रजनी कोठारी कास्ट को एक प्रेशर ग्रुप की तरह देखते हैं। यह कहते हैं कि जिस तरह से पश्चिमी देशों में जो प्रेशर ग्रुप्स होते
हैं वे पॉलिटिक्स में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उसी तरह से जो कास्ट होती है इंडिया में वो इंडिया में या फिर
इंडिया की जो पॉलिटिक्स है उसमें प्रेशर ग्रुप की तरह ही एक भूमिका निभाती है। यानी कि एक रोल प्ले करती है। तो इस तरह
से रजनी कोठारी कास्ट को एक प्रेशर ग्रुप की तरह देखते हैं। कोठारी का नेक्स्ट कांसेप्ट आता है कांग्रेस सिस्टम। यानी कि
कोठारी ने 1947 से 1967 तक का जो कांग्रेस का पीरियड रहा है जिसमें कांग्रेस की हैज़ेमनी रही थी उसको कांग्रेस सिस्टम कहा
है कोठारी ने। और ऐसा इसलिए क्योंकि कोठारी कहते हैं कि इस दौर में यानी कि 1947 से लेके 67 तक कांग्रेस का ही
डोमिनेशन था इंडियन पॉलिटिक्स के ऊपर और इंडिया की जो सरकार है उसके ऊपर। और कोठारी यह भी कहते हैं कि क्योंकि इस समय
के दौरान जो कांग्रेस थी वो एक सिस्टम डिफाइनिंग पार्टी थी। यानी कि पूरा का पूरा जो देश का सिस्टम चलता है उसको
कांग्रेस के द्वारा ही चलाया जाता था। कांग्रेस ही उसे निर्धारित करती थी। इसीलिए कांग्रेस का जो रूल रहा है 1947 से
लेके 67 तक इसको कोठारी ने कांग्रेस सिस्टम कहा है। रजनी कोठारी का अगला कंसेप्ट आता है नॉन पार्टी पॉलिटिकल
सिस्टम। इसमें यह कहते हैं कि इंडिया में जो पॉलिटिकल पार्टीज है वह काफी करप्ट हो गई हैं। उन्होंने कम्युनलिज्म और रायट्स
को काफी बढ़ावा दिया है। इसीलिए इंडिया के लिए यही जरूरी है कि इंडिया में नॉन पार्टी पॉलिटिकल सिस्टम हो। तो बाद में
इन्होंने भी गांधी की तरह विनोबा भावे, एमएन रॉय और जेपी नारायण की तरह पार्टीलेस डेमोक्रेसी में विश्वास किया। क्योंकि
इनका यह मानना था कि इन्हीं पार्टीज की वजह से भारत में कम्युनलिज्म और रायट्स काफी इनक्रीस हुए हैं। और इसी वजह से
इन्होंने इंडिया में 1980 के बाद खुद को पॉलिटिक्स से अलग कर लिया था। रजनी कोठारी का अगला इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा है
पॉलिटिकल सोसाइटी। तो इंडियन जो सोसाइटी रही है उसको रजनी कोठारी पॉलिटिकल सोसाइटी कहते हैं। और ऐसा वह इसलिए कहते हैं
क्योंकि यह कहते हैं कि इंडिया में पॉलिटिसाइजेशन ऑफ कास्ट हुआ है। लोगों का पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन रहा है। पॉलिटिकल
मॉडर्नाइजेशन हुआ है। तो जितनी भी सारी ये चीजें हुई है इन्हीं चीजों की वजह से जो इंडियन सोसाइटी है वह एक पॉलिटिकल सोसाइटी
में बदल गई है। कोठारी का अगला इंपॉर्टेंट कांसेप्ट आता है सोशल मूवमेंट्स एज नॉन पार्टी पॉलिटिकल फॉर्मेशन। जी हां,
इन्होंने सोशल मूवमेंट्स को कहा है कि सोशल मूवमेंट्स इंडिया में नॉन पार्टी पॉलिटिकल फॉर्मेशन रहे हैं। कैसे रहे हैं?
यह कहते हैं कि जो इंडिया में सोशल मूवमेंट्स रहे हैं, यह नॉन पॉलिटिकल फॉर्मेशन है। क्यों? क्योंकि यह कहते हैं
कि इंडिया में जितने भी सोशल मूवमेंट्स हुए हैं, इन्होंने इंडियन पॉलिटिक्स में एक एक्टिव रोल निभाया है और पॉलिटिक्स को
बहुत बड़ी मात्रा में इंडिया में स्प्रेड किया है, फैलाया है और लोगों में जन जागृति का काम किया है। लोगों की चेतना को
विकसित किया है। लेकिन जितने भी ये सोशल मूवमेंट्स रहे हैं, इन्होंने कभी भी पावर सत्ता के लिए संघर्ष नहीं किया है। बल्कि
आम जनता की भलाई के लिए और लोगों की चेतना और जागरूकता को विकसित करने के लिए काम किया है। इसीलिए इन्होंने सोशल मूवमेंट्स
को कहा है कि यह नॉन पार्टी पॉलिटिकल फ़ॉर्मेशन रहे हैं। रजनी कोठारी ने एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट जेनस लाइक मॉडल दिया
है जो कि बड़ा विचित्र है। तो चलिए इसको भी हम समझ लेते हैं। अपनी प्रमुख कृति पॉलिटिक्स इन इंडिया जो कि 1970 में
पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने इंडिया के रिगार्डिंग एक जेनस लाइक मॉडल दिया है। अब यह मॉडल क्या है? इससे पहले हमें यह समझना
होगा कि जेनस एक रोमन मेथोडोलॉजी में एक गॉड है जिसके दोनों तरफ यानी कि आगे भी और पीछे भी आइज लगी होती है जो कि उसकी मदद
से पास्ट को भी देख सकता है और फ्यूचर को भी देख सकता है। इस तरह से जो रोमन का जो ये गॉड है जेनस यह बेसिकली ट्रांजिशन का
देवता है या फिर जो बिगिनिंग होती है लाइफ स्टार्ट होती है लाइफ एंड होती है सृष्टि कैसे बनती है कैसे उसका डिस्ट्रॉय होता है
इन सभी का देवता उसे माना जाता है जो कि एक ही समय में प्रेजेंट फ्यूचर और पास्ट को देख सकता है तो इस तरह से रजनी कोठारी
ने इस गॉड की तुलना भारतीय राजनीति से की है। क्यों? क्योंकि रजनी कोठारी कहते हैं कि भारत में भी एक ही समय पे मॉडर्निटी और
ट्रेडिशनलिज्म पाया जाता है। यानी कि इंडियन पॉलिटिक्स की खास बात यह रही है कि इसमें एक ही समय में मॉडर्निटी और
ट्रेडिशनलिज्म पाया जाता है। रजनी कोठारी का मॉडर्निटी से मतलब है कि भारत में डेमोक्रेसी, लैंड रिफॉर्म्स,
इंडस्ट्रियलाइजेशन इस तरह की जो मॉडर्न चीजें हैं वह पाई जाती है। वहीं दूसरी तरफ ट्रेडिशनलिज्म जो
है वह इंडिया में पाया जाता है। यानी कि जैसे कास्ट, कम्युनलिज्म जैसी चीजें पाई जाती है या फिर लिंगज़्म जैसी चीजें पाई
जाती है। तो इस तरह से रजनी कोठारी ने जो जेनस गॉड है रोमन का उसकी तुलना भारतीय राजनीति से की है। दूसरे स्कॉलर का नाम
आता है मॉरिस जॉन्स। तो जब हम बात करते हैं मॉरिस जॉन्स की तो यह ब्रिटिश पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। और खास बात
यह है कि इन्होंने भारतीय राजनीति का अध्ययन करने के लिए इंस्टीट्यूशनल एप्रोच को यूज़ किया था। और इससे भी इंपॉर्टेंट
बात यह है कि इन्होंने प्री और पोस्ट इंडिपेंडेंट जो इंडिया है या फिर इंडिया का जो इंस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क है उसकी
स्टडी करने के लिए एक ब्रिज के तौर पे काम किया। एक लिंक प्रोवाइड किया। यानी कि इन्होंने जो प्री इंडिया है और जो पोस्ट
इंडिपेंडेंस इंडिया है उन दोनों का अध्ययन किया और उनमें एक कोऑर्डिनेशन एक तालमेल बनाया और खास बात यह भी है कि मॉरिस जों्स
ने जहां इंडिया की स्टडी तो की ही लेकिन साथ में इन्होंने अफ्रीकन नेशंस की भी स्टडी की और स्क्रीन पर जितने भी आपको
इनके मेजर वक्स दिखाई दे रहे हैं इनको आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि एग्जाम के लिए बहुत ही इंपॉर्टेंट है और नोट करने
वाली बात यह भी है कि इन्होंने ने इंस्टीट्यूशनल अप्रोच को यूज किया अपना रिसर्च करने के लिए इंडियन पॉलिटिक्स की
स्टडी करने के लिए। अब हम बात कर लेते हैं मॉरिस जॉन्स के कुछ इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स की। तो इनमें पहला कांसेप्ट आता है वन
डोमिनेंस पार्टी सिस्टम। जी हां, मॉरिस जॉन्स ने वन डोमिनेंस पार्टी सिस्टम की बात की है। यानी कि यह कहते हैं कि आजादी
के बाद से ले 1967 का जो इंडिया में काल रहा है, उसको इन्होंने वन डोमिनेंस पार्टी सिस्टम कहा है। और ऐसा इसलिए है क्योंकि
इनकी मान्यता रही है कि उस समय भी इंडिया में मल्टीपल पार्टी सिस्टम था। लेकिन कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी थी जिसका पूरा
वर्चस्व था इंडिया की पॉलिटिक्स के ऊपर। जिस तरह से रजनी कोठारी ने इसे कांग्रेस सिस्टम कहा है, उसी तरह से इन्होंने इसे
वन डोमिनेंस पार्टी सिस्टम कहा है। और नोट करने वाली बात यह भी है कि मॉरिस जों्स ऐसे पहले स्कॉलर रहे हैं जिन्होंने
कांग्रेस का जो डोमिनेंस है उसको वन डोमिनेंस पार्टी सिस्टम कहा है। और नोट करने वाली बात यह भी है कि इन्होंने
कांग्रेस जो पार्टी है इसको एक ओपन पॉलिटिकल पार्टी कहा है। और ऐसा इसलिए है क्योंकि इनकी यह मान्यता रही है कि
कांग्रेस पार्टी एक ऐसी पार्टी थी जिसमें कोई भी व्यक्ति चाहे किसी कास्ट का हो, क्लास का हो, जेंडर का हो वह कांग्रेस में
आ सकता था, वोट दे सकता था, पार्टिसिपेट कर सकता था। इसीलिए इन्होंने कांग्रेस पार्टी को एक ओपन पॉलिटिकल पार्टी कहा।
मॉरिस जों्स का अगला कांसेप्ट आता है थ्री आइडियम्स ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स। जी हां, इन्होंने बात की है थ्री आइडियम्स ऑफ
इंडियन पॉलिटिक्स यानी कि भारतीय राजनीति के इन्होंने तीन मुहावरों की बात की है और यह है इसमें जो पहला आता है वह आता है
ट्रेडिशनल। दूसरा आता है मॉडर्न तीसरा आता है सेंटली। ट्रेडिशनल की जब हम बात करते हैं तो इसमें यह कहते हैं कि कास्टिज्म,
कम्युनलिज्म एंड लिंग्वुइज्म भारतीय जो पॉलिटिक्स है यानी कि भारतीय राजनीति है उसकी प्रमुख विशेषताएं हैं। यानी कि जो
ट्रेडिशनल इंडिया है उसकी तीन प्रमुख विशेषताएं हैं। जातिवाद, संप्रदायवाद और भाषावाद। वहीं दूसरे नंबर पे आता है
मॉडर्न। तो मॉडर्न में जो आती है वो आती है इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन, इंडियन पार्लियामेंट, इंडियन जुडिशरी, इंडियन
ब्यूरोक्रेसी एंड पॉलिटिकल पार्टीज एंड मीडिया। यह कहते हैं कि जितनी भी यह सारी चीजें मॉडर्न में आती है, यह इंडिया ने जो
वेस्टर्न कंट्रीज है, वहां से फॉलो किया है। वहां से लिया है। इसीलिए जो यह मॉडर्न इंडिया है, उसकी यह प्रमुख विशेषताएं हैं।
वहीं सेंटली में यह बताते हैं कि जैसे लैंड डोनेशन जो मूवमेंट चलाया गया था गांधी एंड भावे के द्वारा उसमें यह आता है
जो कि आधारित था लव, सैक्रिफाइस एंड पॉलिटी विदाउट पावर। यानी कि इसमें यह था कि संत सुलभ इच्छाएं थी। यानी कि संतों
वाले जो काम होते हैं, महान काम होते हैं, इसमें ये चीजें आती है। तो बेसिकली मॉरिस जों्स ये कहते हैं कि अगर हमें भारतीय
राजनीति को समझना है तो यह जो तीन चीजें हैं यानी कि ट्रेडिशनल, मॉडर्न एंड जो सेंटली आइडिडम है इसको हमें समझना होगा।
मॉरिस जॉन्स का अगला कांसेप्ट आता है बार्गेनिंग फेडरलिज्म। जी हां, इन्होंने जो इंडिया का फेडरलिज्म है उसको बोला है
कि भाई इंडिया का जो फेडरलिज्म है वह एक बारगेनिंग यानी कि सौदेबाजी संघवाद है और इस तरह की जो शब्दावली है उन्होंने यूज की
है प्लानिंग कमीशन के संदर्भ में। इनकी यह मान्यता रही है कि जब प्लानिंग कमीशन की स्थापना इंडिया में की गई थी तो उसमें जो
भी स्टेट्स आते थे वे उसमें सौदेबाजी करते थे। यानी कि संघर्ष करते थे कि अधिक से अधिक उनके ही जो स्टेट हैं उनका डेवलपमेंट
हो। उनके हितों की पूर्ति हो जिसको कि इन्होंने बारगेनिंग फेडरलिज्म की संज्ञा दी है और साथ में इन्होंने पंचायती राज जो
इंडिया में रहा है इसको साइलेंट रेवोल्यूशन के रूप में बिचारा है। मॉरिस जों्स का अगला कांसेप्ट आता है मिडिएटिंग
फ्रेमवर्क। जैसा कि मैंने पहले भी बताया था कि मॉरिस जों्स ऐसे स्कॉलर रहे हैं जिन्होंने जो प्री इंडिपेंडेंस इंडिया है
और जो पोस्ट इंडिपेंडेंस इंडिया है उसकी जो इंस्टीट्यूशनल स्टडी है या फिर इंडियन पॉलिटिक्स की जो स्टडी है उसको करने के
लिए एक लिंक के रूप में एक ब्रिज के रूप में काम किया था और इसी लिंक को इसी ब्रिज को एक मीडिएटिंग फ्रेमवर्क कहा जाता है।
तो मॉरिस जों्स कहते हैं कि जो इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन रहा है, इंडियन पार्लियामेंट रही है या फिर इंडियन
जुडिशरी रही है, इन तीनों ने ही एक मीडिएटिंग फ्रेमवर्क के रूप में काम किया है इंडिया में इंडिया की पॉलिटिक्स में।
लेकिन किसके बीच मीडिएटिंग फ्रेमवर्क का काम किया है? तो यह है एक पहली तरफ है गवर्नमेंट और दूसरी तरफ है मूवमेंट। यानी
कि मॉरिस जॉन्स कहते हैं कि इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन, इंडियन पार्लियामेंट और इंडियन जो जुडिशरी है इन्होंने इंडिया की
जो गवर्नमेंट है और जो इंडिया में जो मूवमेंट्स रहे हैं उसके बीच एक मीडिएटिंग फ्रेमवर्क का काम किया है ताकि जो मूवमेंट
और गवर्नमेंट है उनके बीच क्लैश ना हो। अगले इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम आता है मायरन विनर। तो सबसे पहले हमें यह समझना
होता है कि मायरन विनर एक अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं। जिन्होंने इंडिया सहित साउथ एशिया की स्टडी की काफी
रिसर्च की और 1962 में यह द पॉलिटिक्स ऑफ स्कर्सिटी पब्लिक प्रेशर एंड पॉलिटिकल रिस्पांस इन इंडिया नामक टाइटल में पीएचडी
थीसिस लिखते हैं जो कि इनकी एक महत्वपूर्ण रचना भी मानी जाती है। इन्होंने पॉलिटिकल कल्चर एप्रोच को अपनी राइटिंग्स में यूज़
किया और इन्होंने साउथ एशियन कंट्रीज की काफ़ी स्टडी की और खास बात यह है कि इन्होंने इंडिया में जो रीजनल मूवमेंट्स
रहे हैं उसको इन्होंने एथेनिक एंड नेटिविस्ट मूवमेंट कहा। एथनिक इसलिए कहा क्योंकि यह जातीय संघर्ष पर आधारित थे। और
नेटिव मूवमेंट इसलिए कहा क्योंकि यहां के जो मूल निवासी हैं उनके द्वारा ही इस तरह के रीजनल या फिर एथनिक मूवमेंट चलाए गए
थे। और आपको स्क्रीन पर जितनी भी यह राइटिंग्स दिखाई दे रही हैं, इनको अच्छे से आप नोट कर लें क्योंकि एग्जाम की
दृष्टि से यह बहुत ही इंपॉर्टेंट है। अब हम बात कर लेते हैं विनर के कुछ इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स की। तो इनमें सबसे
पहला जो कांसेप्ट आता है उसका नाम है टू पॉलिटिकल कल्चरर्स। तो इन्होंने बेसिकली भारत में दो प्रकार की राजनीतिक
संस्कृतियों की बात की है। जिनमें पहला जो आता है वो है इलीट पॉलिटिकल कल्चर और दूसरा है मास पॉलिटिकल कल्चर। तो सबसे
पहले जब हम बात करते हैं इलीट पॉलिटिकल कल्चर की तो यह कहते हैं कि यह अर्बन इंडिया अर्थात दिल्ली जैसे शहरों में पाया
जाता है। जहां के जो अमीर लोग हैं, इलीट लोग हैं, वह पॉलिटिक्स में पार्टिसिपेट करते हैं। वहीं यह दूसरी तरफ कहते हैं कि
मास जो पॉलिटिकल कल्चर है, यह विलेज इंडिया यानी कि गांव का जो भारत है यानी कि जो ग्रामीण भारत है वहां पर दिखाई देता
है। वहां के जो आम नागरिक गांव के नागरिक खेतीबाड़ी मजदूरी करते जो लोग हैं वहां पर यह पाया जाता है। तो इस हिसाब से मायरन
बीनर कहते हैं कि भारत में दो प्रकार के पॉलिटिकल कल्चर पाए जाते हैं। एक इललीट पॉलिटिकल कल्चर और दूसरा मास पॉलिटिकल
कल्चर। वहीं मायरन विनर का जो दूसरा कांसेप्ट रहा है इसका नाम है पॉलिटिक्स ऑफ स्कार्सिटी। यह कहते हैं कि इंडिया में जो
है वह पॉलिटिक्स ऑफ स्कार्सिटी रही है। खासतौर पर 1980 का जो दशक है वहां पर हमें अभाव की राजनीति दिखाई देती है। कैसे
दिखाई देती है? तो इसमें यह कहते हैं कि 1980 के दशक में इंडिया में इकोनॉमिक क्राइसिस हुआ। वहीं राइज ऑफ कम्युनलिज्म,
रायट्स, वायलेंस यह चीजें हमने देखी और वहीं यह कहते हैं कि इनस्टेबिलिटी एंड कोलीजन गवर्नमेंट इंडिया में हुई। जिसकी
वजह से इंडिया में 1980 और 90 के दशक में पॉलिटिक्स ऑफ स्कार्सिटी पाई गई यानी कि अभाव की राजनीति पाई गई। वहीं इनका एक
इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा है इंडियन पैराडॉक्स। तो इसमें यह कहते हैं कि भाई इंडिया की जो राजनीति है या फिर लोकतंत्र
है उसमें हमें एक पैराडॉक्स यानी कि विरोधाभास दिखाई देता है। कैसे? तो यह कहते हैं कि एक तरफ तो हमें यह लगता
है कि इंडिया की जो डेमोक्रेसी है वह सक्सेस हुई है। पॉलिटिकल मॉडर्नाइजेशन हुआ है। इकोनॉमिक रिफॉर्म्स हुए हैं। लेकिन यह
कहते हैं कि दूसरी तरफ जब हम इंडियन पॉलिटिक्स को या फिर डेमोक्रेसी को देखते हैं तो वहां पर हमें पॉलिटिकल
इनस्टेबिलिटी नजर आती है। जेंडर इनकलिटी नजर आती है। पॉवर्टी और अनइंप्लॉयमेंट जैसी कुरीतियां या फिर जो नेगेटिव चीजें
हैं वह हमें दिखाई देती है। तो इसी फाइट को इसी मुकाबले को यानी कि दोनों तरफी चीजों को इन्होंने इंडियन पैराडॉक्स कहा
है। अगले स्कॉलर का नाम आता है पार्थ चटर्जी। पार्थ चटर्जी का जन्म 1947 कोलकाता में होता है और इनकी जो हायर
एजुकेशन होती है वह बीए पॉलिटिकल साइंस में होती है जो कि कोलकाता यूनिवर्सिटी से होती है। वहीं 1972 में इन्होंने अपनी
पीएचडी कंप्लीट की यूनिवर्सिटी ऑफ रॉकचेस्टर न्यूयॉर्क से और खास बात यह भी है कि पार्थ चटर्जी सब अल्टन स्टडीज
कलेक्टिव के फाउंडर मेंबर रहे हैं और यह सब अल्टन स्टडीज से जुड़े रहे हैं। स्क्रीन पर जितने भी आपको इनके बॉक्स
दिखाई दे रहे हैं, इनको आप अच्छे से नोट कर लीजिए क्योंकि एग्जाम के लिहाज से यह बहुत इंपॉर्टेंट है। अब हम पार्थ चटर्जी
के जो इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहे हैं उसको भी हम देख लेते हैं। तो पहला जो कांसेप्ट आता है वह आता है पॉलिटिकल सोसाइटी की।
पार्थ चटर्जी ने भारत में या फिर इंडिया जैसे जो पोस्ट कॉलोनियल देश है वहां पर पॉलिटिकल सोसाइटी की बात की है। तो यह
कहते हैं कि इंडिया जैसे जो पोस्ट कॉलोनियल सोसाइटी है वहां पर दो प्रकार की सोसाइटी पाई जाती है। पहली सिविल सोसाइटी
और दूसरी पॉलिटिकल सोसाइटी। तो सिविल सोसाइटी में यह कहते हैं कि जो अर्बन मिडिल क्लास है या फिर कैपिटलिस्ट क्लास
है, परमानेंट जो सिटीजन है वे मिलकर सिविल सोसाइटी का निर्माण करते हैं क्योंकि यह न्यू सोशल मूवमेंट या फिर मूवमेंट्स जो
होते हैं उनको चलाते हैं। एक्टिव्म करते हैं और सिविल सोसाइटी के रूप में अपने आप को ऑर्गेनाइज्ड करते हैं। वहीं दूसरी तरफ
यह कहते हैं कि पॉलिटिकल सोसाइटी में भारत जैसे देश में रूरल पीपल या फिर अर्बन जो पुअर पीपल होते हैं और जो नॉन परमानेंट
सिटीजन होते हैं यह होते हैं यह पॉलिटिकल सोसाइटी को बढ़ावा देते हैं। और ऐसा इसलिए है क्योंकि यह वोट बैंक के लिहाज से या
फिर वोट के हिसाब से यह बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि इनके अंदर इतनी चेतना नहीं होती है। इतनी
पॉलिटिकल कॉन्शियसनेस नहीं होती है कि यह सिविल सोसाइटी के रूप में अपने आप को संगठित करें। वहीं पार्थ चटर्जी का अगला
इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा है डेरिवेटिव नेशनलिज्म। तो इसमें बेसिकली यह कहते हैं कि भारत जैसे जो देश है इनका जो नेशनलिज्म
है यह बेसिकली डेरिवेटिव है यानी कि डिराइव किया हुआ है यानी कि दूसरे देशों से लिया हुआ है। भारत का जो नेशनलिज्म है
वह खुद का नेशनलिज्म नहीं है क्योंकि इन्होंने जो यूरोपियन कंट्रीज रही है वहां से लिया है और साथ में यह अपने जो प्रमुख
एस्स जिसका नाम है हुज इमेज एंड कम्युनिटी इसमें इन्होंने बेनेडिक्ट एंडरसन का जो कांसेप्ट है इमेज एंड कम्युनिटी है उसको
भी इन्होंने क्रिटिसाइज किया है जिसमें कि बेनेडिक्ट एंडरसन ने कहा था कि जो कम्युनिटी होती है वे अपने बारे में या
फिर अपने जो साथी है वह यह नहीं जानते हैं कि वे कौन है वे उनके क्या लगते हैं बस जो नेशनलिज्म हो तो सिर्फ एक इमेजन है, एक
कल्पना है। तो, उसको भी यह पूरी तरह से क्रिटिसाइज़ करते हैं। नेक्स्ट स्कॉलर्स का नाम आता है रुडोल्फ और रुडोल्फ। तो, यह
बेसिकली दोनों मैरिड कपल रहे हैं जिन्होंने साथ में मिलकर इंडियन पॉलिटिक्स के ऊपर काफी लिखा। तो, जब हम बात करते हैं
रुडोल्फ एंड रुडोल्फ की, तो सबसे पहले हमें यही समझना होता है कि यह अमेरिकन ऑथर, पॉलिटिकल ऑथर एंड पॉलिटिकल थिंक कर
रहे हैं अमेरिका से। जिन्होंने भारतीय राजनीति पर बहुत कुछ लिखा। 1952 में यह एक दूसरे के साथ शादी कर लेते हैं और 2014
में इन्हें भारत का तीसरा सबसे हाईएस्ट सिविलियन अवार्ड मिलता है जिसका नाम है पद्मा भूषण और इन्होंने अपनी स्टडी करने
के लिए अपने वर्क में रिसर्च करने के लिए पॉलिटिकल सोशियोलॉजिकल अप्रोच को यूज किया था और खास बात यह भी है कि इन्हें इंडिया
अब्रॉड फ्रंट ऑफ इंडिया अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। स्क्रीन पर आपको जितने भी इनके बॉक्स दिखाई दे रहे
हैं, इनको आप नोट कर लीजिए क्योंकि यह भी एग्जाम की दृष्टि से बहुत ही इंपॉर्टेंट है। अब हम बात कर लेते हैं रुडोल्फ एंड
रुडोल्फ के कुछ इंपॉर्टेंट की कंसेप्ट्स की। तो इनमें पहला जो कांसेप्ट आता है वो आता है ट्रेडिशन वर्सेस मॉडर्निटी।
रुडोल्फ एंड रुडोल्फ कहते हैं कि जो भारतीय समाज है या फिर जो इंडियन सोसाइटी है उसकी प्रमुख विशेषता यह है कि यहां पर
ट्रेडिशन और मॉडर्निटी एक साथ दोनों ही चीजें पाई जाती है। इसका मतलब यह हुआ कि यह भी कोठारी और इकबाल की तरह यही कहते
हैं कि इंडिया में जो ट्रेडिशन है और मॉडर्निटी है उसके बीच एक बैलेंस पाया जाता है। तो इस तरह से रुडोल्फ कहते हैं
कि जो इंडिया की जो ट्रेडिशनल वैल्यू्यूज है वो तीन प्रकार की वैल्यू्यूज है जिनमें आता है। कास्ट, कैरिज्मेटिक लीडरशिप एंड
लीगल कल्चर। तो इस तरह से यह जो कास्ट है या फिर कैरिज्मेटिक लीडरशिप है जैसे गांधी की जो लीडरशिप थी उसको भी हम कैरिज्मेटिक
कह सकते हैं और जो लीगल कल्चर है इसको इन्होंने बेसिकली जो ट्रेडिशनल इंडिया है इसकी विशेषताएं बताई है। तो इस तरह से
बेसिकली संक्षेप में हम यही कह सकते हैं कि जो रुडोल्फ है एंड रुडोल्फ है। कोठारी की तरह यही मानते हैं कि इंडिया में दो
तरह की चीजें हैं। यानी कि ट्रेडिशनल इंडिया है और मॉडर्निटी यानी कि मॉडर्न इंडिया है। ट्रेडिशनल इंडिया हम यह भी कह
सकते हैं कि यह गांव का भारत है यानी कि विलेज इंडिया है और जो मॉडर्न इंडिया है वह बेसिकली अर्बन इंडिया है। रुडोफ्स का
अगला जो कांसेप्ट है उसका नाम है इंडिया एज अ स्ट्रांग एंड वीक स्टेट। अब ये एक कंट्राडिक्टेटरी या फिर जो विरोधाभासी
कांसेप्ट है उसको देते हैं। क्यों ऐसा? ऐसा इसलिए क्योंकि यह कहते हैं कि भारत एक तरफ तो स्ट्रांग स्टेट है। दूसरी तरफ वीक
है। अब ये किस आधार पे कहते हैं? तो इसको तो हमें समझना ही होगा। तो रुडोल्फ्स कहते हैं कि भाई भारत एक वीक स्टेट है और
स्ट्रांग है। क्यों है? तो यह कहते हैं कि एक तरफ भारत एक स्ट्रांग स्टेट है, दूसरी तरफ वीक है। स्ट्रांग कहते हैं यह क्योंकि
यह कहते हैं कि जब हम इंडिया की पॉलिटिक्स और डेमोक्रेसी की बात करते हैं तो उसमें लार्ज मात्रा में इंडस्ट्रीज की स्थापना
हुई है। क्रिएशन हुई है। लेस पॉलिटिकल कॉन्फ्लिक्ट रहे हैं। इकोनॉमिक रिफॉर्म्स हुए हैं और सक्सेसफुल इलेक्शंस रहे हैं।
तो रुडोल्फ्स कहते हैं कि जितनी भी ये चारों चीजें हैं यह भारत को एक स्ट्रांग स्टेट बनाते हैं। लेकिन दूसरी तरफ यह कहते
हैं कि भाई भारत जो है ना वो एक वीक स्टेट भी है। और वीक स्टेट क्यों है? क्योंकि इंडिया में कुछ ऐसी चीजें हैं जो वीक करती
है। जैसे फेलियर ऑफ रूरल डेवलपमेंट यानी कि गांव का बिल्कुल भी विकास नहीं हुआ है। और इंदिरा गांधी के टाइम में जो कांग्रेस
है उसने डीशनालाइजेशन को बढ़ावा दिया था। यानी कि मीडिया और जुडिशरी है इसके ऊपर काफी पाबंदी लगाई थी। वहीं इंडिया में अन
ऑफिशियल जो सिविल वॉर्स है वो होते रहते हैं। कास्ट के नाम पे, क्लास के नाम पर लड़ाईयां होती रहती है। और यह कहते हैं कि
इंडिया में जो रिलीजियस फंडामेंटलिज्म है वो भी काफी इनक्रीज हुआ है। यानी कि संप्रदायवाद काफी बड़ा है। तो इस तरफ
रुडोल्फ्स कहते हैं कि एक तरफ इंडिया स्ट्रांग स्टेट है। दूसरी तरफ इंडिया एक वीक स्टेट है। रुडोल्फ एंड रुडोल्फ का
अगला जो कांसेप्ट है वो है डिमांड एंड कमांड पॉलिटी। यह कहते हैं कि भाई जो इंडिया जैसा देश है वहां की जो पॉलिटी है
उसमें जो डिमांड पॉलिटी और कमांड पॉलिटी है उनके बीच एक टसल पाई जाती है। टकराव पाया जाता है। तो रुडोल्फ एंड रुडोल्फ
कहते हैं कि जो इंडियन पॉलिटी है उसमें एक तरफ कमांड पॉलिटी है। दूसरी तरफ डिमांड पॉलिटी है। कमांड पॉलिटी में यह कहते हैं
कि इसमें होता यह है कि जो स्टेट की हैज़ेमनी होती है यानी कि स्टेट की जो पावर होती है वह सोसाइटल जो डिमांड होती है
यानी कि लोगों की जो मांगे होती है डिमांड्स होती है उसके ऊपर हैज़मनी कर देती है। यानी कि कमांड पॉलिटी में क्या होता
है कि जो स्टेट की पावर होती है वो श्रेष्ठ होती है। सुपीरियर होती है लोगों की मांगों से यानी कि सोसाइटल डिमांड से।
वहीं दूसरी तरफ डिमांड पॉलिटी में यह कहते हैं कि इसमें जो सोसाइटल डिमांड होती है यानी कि लोगों की जो डिमांड होती है,
मांगे होती है वो डोमिनेट करती है स्टेट को यानी कि स्टेट अंडर होता है लोगों की डिमांड के अंतर्गत। तो यह कहते हैं कि
बेसिकली इंडियन पॉलिटी में ऐसा अक्सर देखा गया है कि कभी-कभी जो कमांड पॉलिटी होती है वो हावी हो जाती है। यानी कि जो स्टेट
है वह हावी हो जाता है लोगों के ऊपर। और कभी-कभी जो लोग होते हैं या उनकी जो डिमांड्स होती है वो हावी हो जाते हैं
स्टेट के ऊपर जिसको इन्होंने डिमांड पॉलिटी कहा है। तो यह कहते हैं कि बेसिकली इंडिया जैसे देश में जो कमांड पॉलिटी और
डिमांड पॉलिटी है उसके बीच हमेशा से टकराव रहता है। टसल रहती है। रुडोल्फ एंड रुडोल्फ का अगला इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है
बुल ऑफ कैपिटलिज्म। इन्होंने भारत का जो कैपिटलिज्म है या फिर इकोनमी है इसको बुल ऑफ कैपिटलिज्म कहा है। इनकी यह मान्यता
रही है कि ग्रीन रेवोल्यूशन के बाद भारत में बुलॉक कैपिटलिस्ट क्लास जो है वह एमर्ज होती है और यह काफी पावरफुल रही थी
क्योंकि इनकी एक तरफ जहां संख्या बहुत ज्यादा थी वहीं दूसरी तरफ इनके पास काफी जमीन थी। इसीलिए जो भारत का पूंजीवाद या
फिर इकोनमी है इसके ऊपर इनका काफी प्रभाव पड़ा। क्योंकि यह एक ऐसी क्लास रही है जिसने बैलगाड़ी की मदद से जो सामान है
उसको एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना, बिजनेस करना, व्यापार करना शुरू किया जिससे कि भारत की जो इकोनमी है उसको
काफी बल मिला। तो इस तरह से इन्होंने कहा कि जो भारत की इकोनमी है उसको जो है यह जो बैलगाड़ी चलाने वाले लोग हैं या फिर
कैपिटलिस्ट है उन्होंने काफी शेप दिया। काफी रिच किया। तो इसी वजह से इन्होंने भारत की जो इकोनमी है या फिर जो
कैपिटलिज्म है उसको ब्लॉक कैपिटलिज्म कहा। योगेंद्र यादव का जन्म 1963 को हरियाणा में होता है और योगेंद्र यादव एक इंडियन
एक्टिविस्ट, शेफोलॉजिस्ट, पॉलिटिकल साइंटिस्ट, पॉलिटिशियन एंड पॉलिटिकल थ्यरिस्ट रहे हैं। और 2016 में इन्होंने
प्रशांत भूषण के साथ मिलकर स्वराज इंडिया की स्थापना की। और खास बात यह भी है कि यह स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज के सीनियर
फेलो रहे हैं। जिसकी स्थापना रजनी कोठारी ने की थी और यह यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के फॉर्मर मेंबर भी रहे हैं। और खास
बात यह है कि इन्होंने कहा कि नेशनल इलेक्शंस इन इंडिया आर डेरिवेटिव। यानी कि भारत में जो राष्ट्रीय चुनाव होते हैं,
नेशनल इलेक्शंस होते हैं, वे डेरिवेटिव है, डिराइव किए हुए हैं। यानी कि दूसरे देशों से पश्चिमी देशों से भारत ने लिया
है। और स्क्रीन पर जितने भी आपको वक्स इनके दिखाई दे रहे हैं, इनको आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि यह भी एग्जाम के लिए
बहुत ही इंपॉर्टेंट है। अब हम बात कर लेते हैं योगेंद्र यादव के कुछ इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स की। तो, इनमें सबसे पहला
कांसेप्ट आता है पोस्ट कांग्रेस पॉलिटी। तो योगेंद्र यादव कहते हैं कि जो थर्ड इलेक्ट्रोरल सिस्टम रहा 1990 के दशक में
उसकी सबसे प्रमुख विशेषता पोस्ट कांग्रेस पॉलिटी थी। क्योंकि इसमें योगेंद्र यादव कहते हैं कि इसकी खास बात यह रही है कि
जिन स्टेट्स में कांग्रेस का थोड़ा बहुत वर्चस्व था या जहां पर कांग्रेस का जो एक कंपटीशन होता था दूसरी पार्टीज के साथ
वहां पर भी जो कांग्रेस है वो एक ऐसी पार्टी रही जिसका कि गवर्नेंस से जो है वो हाथ जाता रहा। यानी कि शासन पर उसकी इतनी
पकड़ नहीं रही है। तो इसी कांसेप्ट को इन्होंने पोस्ट कांग्रेस पॉलिटी कहा है। यानी कि कांग्रेस के बाद जो कांग्रेस का
शासन है वह उतना एफिशिएंट या फिर उतना कुशल नहीं रहा। उतना हैज़ेमोनिक नहीं रहा जो कि नेहरू या फिर इंदिरा के पीरियड में
था। योगेंद्र यादव का सेकंड इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा है सेकंड डेमोक्रेटिक अफसर्स। तो इसमें यह लिखते हैं कि जो
सेकंड डेमोक्रेटिक अफसर्स है यानी कि दूसरा जो लोकतांत्रिक अभ्युत्थान है वह इंडिया में 1980 के दशक में शुरू होता है।
क्योंकि 1980 के दशक में इंडिया में जो खास बात रही थी वो यह रही थी कि जो पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन है लोअर क्लासेस का
जैसे एससी, एसटी, ओबीसी उनका काफी मात्रा में बढ़ा और इसी को इन्होंने जो है वह सेकंड डेमोक्रेटिक अपसर्च कहा है। और यह
कहते हैं कि जो इस तरह का जो पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन था वह जो इंडिया में पॉलिटिक्स रही, उसको काफी हद तक जो है
बढ़ाया गया। यानी कि यह जो क्लासेस रही है जैसे कि एससी, एसटी, ओबीसी इन तक भी जो इंडियन पॉलिटिक्स की पहुंच है, वह काफी
बढ़ गई। या फिर हम ये भी कह सकते हैं कि जो ये एससी, एसटी और ओबीसी क्लासेस रही है ये काफी जो है इंडियन पॉलिटिक्स से जुड़े।
इन्होंने काफी मात्रा में पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन किया जिसको इन्होंने सेकंड डेमोक्रेटिक ऑफिसर्स कहा। योगेंद्र यादव
का थर्ड इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा है थर्ड इलेक्टोरल सिस्टम। तो इस कांसेप्ट को इन्होंने अपनी प्रमुख कृति जिसका नाम है
इलेक्टोरल पॉलिटिक्स इन द टाइम ऑफ सेंस इंडियास थर्ड इलेक्ट्रोरल सिस्टम। तो इसमें यह कांसेप्ट देते हैं और कहते हैं
कि इंडिया में 1989 के बाद थर्ड इलेक्ट्रोरल सिस्टम पाया जाता है। तो यादव कहते हैं कि इंडिया में जो फर्स्ट
इलेक्ट्रोल सिस्टम है वह 1952 से 1967 के बीच रहता है। वहीं दूसरा जो इलेक्ट्रोल सिस्टम है वह 1967 से 1989 के बीच। वहीं
इंडिया में जो थर्ड इलेक्ट्रोरल सिस्टम है वह 1989 के बाद शुरू होता है। और इस थर्ड इलेक्ट्रोरल सिस्टम की खास बात यह है कि
यहां से ही राइज ऑफ 3 एम हुआ। यानी कि तीन एम का उत्थान हुआ। कौन-कौन से 3 एम थे? पहला था मंडल। मंडल का मतलब है कि जो
ओबीसी के लिए रिजर्वेशन की मांग है वह काफी उठी। यानी कि दिया गया रिजर्वेशन उनको। और दूसरा है मंदिर। मंदिर का मतलब
है कि बीजेपी ने राम रथ यात्रा शुरू की 1990 के दशक में और तीसरा जो एम है वह है मार्केट। मार्केट का मतलब है कि इंडिया ने
जो है वह एलपीजी को बढ़ावा दिया। कंचन चंद्रा की जब हम बात करते हैं तो कंचन चंद्रा एक प्रमुख राइटर रही हैं। पॉलिटिकल
साइंटिस्ट रही हैं। और खास बात यह है कि यह वर्तमान समय में पॉलिटिकल साइंस या फिर पॉलिटिक्स की प्रोफेसर हैं न्यूयॉर्क
यूनिवर्सिटी में। और खास बात यह भी है कि 2005 में इन्होंने अपनी पीएचडी की डिग्री हारबर्ड यूनिवर्सिटी से प्राप्त की। तो
स्क्रीन पर जितने भी आपको बक्स दिखाई दे रहे हैं इनको भी आप नोट कर लें क्योंकि एग्जाम में यह भी पूछे जाते हैं। कंचन
चंद्रा का सबसे इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा है पेट्रोनेज डेमोक्रेसी की। इन्होंने 2013 में एक अपना एस्स लिखा जिसका नाम है
पेट्रोनेज डेमोक्रेसी एंड एथेनिक पॉलिटिक्स इन इंडिया और इस एस्स में इन्होंने लिखा कि इंडिया की जो डेमोक्रेसी
है यह बेसिकली पेट्रोनेज टाइप की डेमोक्रेसी है। यानी कि एक संरक्षण लोकतंत्र है। संरक्षण लोकतंत्र या फिर
पेट्रोनेज डेमोक्रेसी वो होती है जहां पे जो स्टेट होता है या फिर गवर्नमेंट होती है वो एक गार्डियन की तरह एक संरक्षक के
रूप में कार्य करता है और जो गुड्स एंड सर्विसेज होती है उसमें स्टेट या फिर गवर्नमेंट की मोनोपोली रहती है और वह
लोगों के अमंग जो गुड्स एंड सर्विज होती है उसको डिस्ट्रीब्यूट करता है जिससे सरकार को भी फायदा होता है वोट के रूप में
तो इसी तरह से कंचन चंद्रा ने कहा कि इंडिया में भाई एक ओर से पेट्रोनेज डेमोक्रेसी पाई जाती है यानी कि इंडिया का
जो लोकतंत्र है वह संरक्षी लोकतंत्र है। तो जब हम बात करते हैं प्रणव वर्धन की तो प्रणव वर्धन इनका पूरा नाम प्रणव कुमार
वर्धन रहा है जो कि एक इंडियन इकोनॉमिस्ट रहे हैं। और खास बात यह है कि जो यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया रही है उसके
ये सेवानिवृत्त प्रोफेसर रहे हैं इकोनॉमिक्स के। और दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कोटेशन
दी जिसमें इन्होंने कहा कि इंडियन फेडरलिज्म इज अ होल्डिंग टुगेदर फेडरेशन नॉट अ कमिंग टुगेदर फेडरेशन। और खास बात
यह भी है कि इंडिया में जो ग्रीन रेवोल्यूशन थी उसकी इन्होंने भरपूर आलोचना की। इन्होंने कहा कि इंडिया में जो ग्रीन
रिवॉल्यूशन है वह सफल नहीं रही थी बल्कि असफल रही थी। और इसकी खास बात यह थी कि यह बड़ी लिमिटेड थी। यह सिर्फ वेस्टर्न,
यूपी, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों तक ही सीमित थी। जिसकी वजह से इन्होंने इसकी आलोचना की और स्क्रीन पर जितने भी आपको
इनके बॉक्स दिखाई दे रहे हैं, इनको भी आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि यह भी एग्जाम की दृष्टि से बहुत ही इंपॉर्टेंट है। अब
हम बात कर लेते हैं इनके सबसे इंपॉर्टेंट कांसेप्ट जिसका नाम है डोमिनेंट क्लास कोजन। इन्होंने ही अपनी प्रमुख कृति
पॉलिटिकल इकोनमी ऑफ डेवलपमेंट इन इंडिया जो कि 1984 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने कहा कि इंडिया में डोमिनेंट
क्लास कोजन पाया जाता है। और इस प्रकार से इन्होंने इंडिया में तीन प्रकार की डोमिनेंट क्लासेस की बात की जिनमें पहली
आती है द कैपिटलिस्ट, दूसरी आती है रिच फार्मर्स और तीसरी आती है ब्यूरोक्रेसी। तो यह कहते हैं कि जो यह तीनों क्लासेस है
इनका इंडियन पॉलिटिक्स में काफी दबदबा रहता है। यानी कि इंडियन पॉलिटिक्स इन थ्री डोमिनेंट क्लासेस से काफी प्रभावित
रहती है। काफी इफेक्टिव रहती है। अब बारी आती है क्रिस्टोफ जेफ लॉ की। तो जब हम बात करते हैं क्रिस्टोफ जेफ लॉ की तो यह
फ्रेंच पॉलिटिकल फिलॉसोफर रहे हैं। जिनका जन्म 1964 को फ्रांस के पॉइंसी में हुआ था। और यह एक फ्रेंच फिलॉसफर, पॉलिटिकल
साइंटिस्ट, इंडोलॉजिस्ट रहे हैं। खासतौर पर इन्होंने साउथ एशिया वो भी इंडिया और पाकिस्तान में काफी स्टडी की और खास बात
यह भी है कि यह साउथ एशियन पॉलिटिक्स और हिस्ट्री जो कि साइंस फो पेरिस में स्थित है, वहां के यह प्रोफेसर हैं। और यह एक
पॉलिटिकल कमेंटेटर भी रहे हैं। तो स्क्रीन पर जो भी आपको इनके बॉक्स दिखाई दे रहे हैं इनको आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि
एग्जाम की दृष्टि से बहुत ही इंपॉर्टेंट है। अब बात कर लेते हैं हम इनके सबसे इंपॉर्टेंट कांसेप्ट जिसका नाम है साइलेंट
रेवोल्यूशन। तो यह कहते हैं कि इंडिया में 1980 और 90 के दशक में एक साइलेंट रेवोल्यूशन हुई थी। तो यह बेसिकली कहते
हैं कि इसके अंतर्गत क्या हुआ कि जो पावर है वह अपर कास्ट जो इलीट है यानी कि उच्च घराने के जो इलीट लोग हैं संपत्तिशाली लोग
हैं उनके हाथों से जो पावर है वो लोअर जो मिडिल क्लास के जो लोग हैं मिडिल क्लास या फिर जो लोअर कास्टीज है उनके जो लोग हैं
उनके हाथों में पावर आ गई। यानी कि जो दलित्स है उनका पॉलिटिक्स में अब प्रभुत्व रहा। उनके हाथों में भी अब पावर आने लगी
और इसी को इन्होंने इंडिया में साइलेंट रेवोल्यूशन कहा है और इन्होंने इसका एग्जांपल देते हुए कहा कि जैसे कि जो
इंडिया के मोस्ट पॉपुलर स्टेट्स है जैसे यूपी बिहार तो उसमें हमने यह देखा है कि वहां के जो लोअर कास्ट लीडर है तो
उन्होंने जो है अपने हाथों में पावर गेन की है। उनके हाथों में सत्ता आई है। अथॉरिटी आई है और इन्होंने कहा कि इसी को
ही ट्रू डेमोक्रेटाइजेशन यानी कि सच्चा लोकतंत्र डेमोक्रेटाइजेशन या फिर साइलेंट रेवोल्यूशन के रूप में इंडिया में देखा जा
सकता है। अगले स्कॉलर का नाम आता है पॉल आर ब्रास। तो जब हम बात करते हैं पॉल आर ब्रास की तो सबसे पहले हमें यह समझना होता
है कि पॉल आर ब्रास एक जो यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन है वहां के यह पॉलिटिकल साइंस एंड इंटरनेशनल रिलेशन के एक सेवानिवृत्त
प्रोफेसर रहे हैं। और खास बात यह है कि इन्होंने कहा कि जो इंडियन नेशनल मूवमेंट था उसमें तीन तरह की आइडियोलॉजीस पाई जाती
थी। जिनमें पहली थी हिंदू नेशनलिज्म, दूसरी थी मुस्लिम सेपरेशन और तीसरी थी सेकुलरिज्म। हिंदू नेशनलिज्म का मतलब है
कि जो हिंदू विचारधारा में या फिर हिंदूइज़्म में अधिक बल देते थे, फोकस करते थे। और मुस्लिम सेपरेशन का मतलब है कि जो
जिन्ना जैसे विचारकों के साथ मिले थे जो यह चाहते थे कि पाकिस्तान के लिए अलग नेशन हो, अलग लैंड हो और सेकुलरिज्म का मतलब है
कि जो हिंदूइज़्म एंड मुस्लिम दोनों को समान रूप से देखते थे। आपको स्क्रीन पर जो इनकी कुछ इंपॉर्टेंट बुक्स दिखाई दे रही
है, इसको आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि यह भी एग्जाम की दृष्टि से बहुत इंपॉर्टेंट है। अब हम बात कर लेते हैं
ब्रास के इंपॉर्टेंट कांसेप्ट की जिसका नाम है इंस्ट्रूमेंटलिज्म। तो अपनी प्रमुख कृति जिसका नाम है एथनिसिटी एंड नेशनलिज्म
थ्योरी एंड कंपैरिजन जो कि 1991 में पब्लिश होती है। इसमें यह इंस्ट्रूमेंटलिज्म का कांसेप्ट देते हैं
और कहते हैं कि जो इंस्ट्रूमेंटलिज्म है वो एक ऐसी अवधारणा है जिसके अंतर्गत यानी कि जो एथनिसिटी है या फिर जो नेशनल
आइडेंटिटीज है वे जो कंपैटिंग इलिट लोग होते हैं, पावरफुल लोग होते हैं सोसाइटी में उनके हाथ में एक टूल होता है। यानी कि
जो एथनिसिटी और नेशनल आइडेंटिटीज है उनके हाथ में यह एक इंस्ट्रूमेंट की तरह होता है, टूल की तरह होता है। और इन्हीं
एथनिसिटी और नेशनल आइडेंटिटी की वजह से यह जो लोग हैं यानी कि पावरफुल इलिट लोग हैं यह लोगों का सपोर्ट प्राप्त करते हैं,
वेल्थ प्राप्त करते हैं, स्टेटस प्राप्त करते हैं और पावर को गेन करते हैं। अगले थिंकर का नाम आता है जेम्स मैनर। तो जेम्स
मैनर एक ब्रिटिश एमेरेटस प्रोफेसर रहे हैं जो कि कॉमनव्थ स्टडीज से जुड़े हैं और यह ससेक्स यूनिवर्सिटी जो कि इंग्लैंड में
मौजूद है वहां से यह सेवानिवृत्त हुए हैं। दूसरी सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनको ऐसा पहला थिंकर माना जाता है जिन्होंने
इंडिया में स्टडी ऑफ स्टेट पॉलिटिक्स इन इंडिया को पहली बार किया। और इन्होंने यह भी कहा कि भारत में लिबरल डेमोक्रेसी नाम
की कोई चीज नहीं पाई जाती है। क्योंकि भारत में बीजेपी पार्टी के जो नेता है वह भारत में एक नए प्रकार के नेशन या फिर
स्टेट को बना रहे हैं जो कि एक एग्जांपल माना जाता है कंपिटिटिव अथॉरिटेरियनिज्म का। जो स्क्रीन पर आपको इनके वक्स दिखाई
दे रहे हैं। इनको आप अच्छे से नोट कर लें। अब हम बात कर लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट कांसेप्ट की जिसका नाम है डेमोक्रेटिक
डेवलपमेंट स्टेट। यानी कि इन्होंने भारत जैसे देश को डेमोक्रेटिक डेवलपमेंटल स्टेट कहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह कहते हैं
कि जब भारत देश आजाद हुआ उसके बाद जो भारत में डेमोक्रेसी का इंस्टॉलमेंट हुआ, इलेक्शंस हुए वो काफी सक्सेस रहा और इसके
साथ-साथ यह कहते हैं कि भारत में जिस तरह से नेहरू की अध्यक्षता में भारत ने सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ सोसाइटी अपनाया,
लैंड रिफॉर्म्स किए, एलपीजी को बढ़ावा दिया, फाइव इयर्स प्लांस को लागू किया। वहीं सबसे बड़ी बात है कि पंचायती राज की
स्थापना की गई। इसकी वजह से भारत एक डेमोक्रेटिक डेवलपमेंट स्टेट माना जा सकता है। अगले स्कॉलर का नाम आता है सुब्रता के
मित्रा। तो यह बेसिकली डायरेक्टर एंड रिसर्च प्रोफेसर रहे हैं इंस्टट्यूट ऑफ साउथ एज स्टडीज में जो कि नेशनल
यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में लोकेटेड है। और इन्होंने एक कोटेशन दी है जिसमें इन्होंने कहा कि इन इंडिया रिलीजन हैज़
एमर्ज्ड एस द नर्सरी ऑफ द नेशन विद पॉजिटिव रिजल्ट्स फॉर द कोहिजन एंड लेजिटिमेसी ऑफ द नेशन। तो आप चाहे तो इस
कोटेशन को याद कर सकते हैं और आपको स्क्रीन पर जितने भी इनके वर्क्स दिखाई दे रहे हैं इनको आप अच्छे से नोट कर लें। अब
हम बात कर लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट कांसेप्ट की। तो पहला कांसेप्ट आता है कंटेंशियस डेमोक्रेसी जिसको हम हिंदी में
कहते हैं विवादास्पद लोकतंत्र। तो बेसिकली इन्होंने भारत के लोकतंत्र को एक विवादास्पद यानी कि कंटेंशियस डेमोक्रेसी
कहा है। यह कहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र में या फिर पॉलिटिक्स में कभी कबभार कम्युनलिज्म, पॉलिटिकल वायलेंस, जेंडर
इनकलिटी, डिफेक्शन जैसे मुद्दे दिखाई देते हैं जो कि भारत के लोकतंत्र को एक विवादास्पद लोकतंत्र या फिर कंटेंशियस
डेमोक्रेसी बना देते हैं। अगले स्कॉलर का नाम आता है सुदीपता कविराज। तो जब हम बात करते हैं सुदीपता कविराज की तो सबसे पहले
हमें यह पता चलता है कि यह साउथ एज इन पॉलिटिक्स एंड इंटेलेक्चुअल हिस्ट्री के एक बहुत बड़े स्कॉलर रहे हैं। और खास बात
यह है कि यह पोस्ट कॉलोनियल स्टडीज एंड सब अल्टर्न स्टडीज से जुड़े हैं। और खास बात यह भी है कि इन्होंने भी प्रणवर्धन की तरह
डोमिनेंट क्लास मॉडल को यूज़ किया। और इन्होंने ग्रामशी का जो एक इंपॉर्टेंट नोशन रहा है जिसका नाम है पैसिव
रेवोल्यूशन उसको भी यूज करते हुए इसे ब्लॉग्ड डायलेक्टिक कहा और साथ में इन्होंने यह भी कहा कि भारत जैसे देशों
में पैसिव रेवोल्यूशन पाई जाती है। स्क्रीन पर जितने भी आपको इनके वक्स दिखाई दे रहे हैं इन्हें भी आप नोट कर लें। अब
हम बात कर लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स की जिनमें पहला कांसेप्ट आता है रिवीजनिस्ट थ्योरी ऑफ़ मॉडर्निटी।
इन्होंने जो है रिवीजनिस्ट थ्योरी ऑफ मॉडर्निटी दी। इन्होंने 2005 में अपना एक एस्स लिखा जिसका नाम है एन आउटलाइन ऑफ
रिवीजनिस्ट थ्योरी ऑफ मॉडर्निटी जिसमें इन्होंने कहा कि जो मॉडर्निटी या फिर मॉडर्नाइजेशन की जो थ्योरी है यह डिमांड
करती है रिवीजन की। क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि जिस तरह की मॉडर्निटी यूरोपियन देशों में आई उसी तरह से नॉन यूरोपियन
सोसाइटीज में भी मॉडर्निटी आई है या फिर काम करेगी। इस तरह से ये कहते हैं कि हमें जो यूरोपियन देशों की मॉडर्निटी है वो
हमें लागू नहीं करनी है नॉन यूरोपियन सोसाइटीज में। अगले महान स्कॉलर का नाम आता है अमृतसेन। तो अमृतसेन का जन्म 1933
को बंगाल में होता है और 1998 में यह इकोनॉमिक साइंस में अपना योगदान देने के लिए नोबेल प्राइज को प्राप्त कर लेते हैं
और खास बात यह है कि इन्होंने एसडीआई अर्थात ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में भी काफी मदद की है और 2012 में यह ऐसे पहले
नॉन अमेरिकन बन जाते हैं जो नेशनलिस्ट या फिर नेशनल ह्यूमनिस्टिक अवार्ड को प्राप्त करते हैं और खास बात यह है कि इन्होंने
कहा कि अगर हमें पॉवर्टी को परिभाषित करना है तो इसका मतलब होता है लैक ऑफ इनकम। यानी कि लोगों के पास अगर इनकम नहीं है,
बहुत इनकम है या फिर इनकम के साधन नहीं है तो उसको हम पॉवर्टी के रूप में परिभाषित कर सकते हैं। स्क्रीन पर आपको जितने भी
इनके वक्स दिखाई दे रहे हैं, इनको आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि यह सारे एग्जाम की दृष्टि से बहुत इंपॉर्टेंट है
और कई बार एग्जाम में पूछे भी गए हैं। अब हम बात कर लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स की। तो पहला कांसेप्ट आता है
डेवलपमेंट एज फ्रीडम यानी कि विकास को इन्होंने स्वतंत्रता के रूप में देखा है। यह कहते हैं कि लोगों के लिए फ्रीडम का
होना बहुत जरूरी है। अगर देश का या फिर स्टेट का और लोगों का डेवलपमेंट करना है। और यह कहते हैं कि यह बात बिल्कुल गलत है
कि जब हम यह कहते हैं कि इकोनॉमिक जो डेवलपमेंट होता है उसी से ही डेमोक्रेसी का डेवलपमेंट होता है और लोगों को फ्रीडम
मिलती है। यह कहते हैं कि जो फ्रीडम है उसका जो मीनिंग है वह ब्रॉड है। यानी कि फ्रीडम में कुछ बातें शामिल होती है। जैसे
पहला है हेल्थ केयर, दूसरा है एजुकेशन, तीसरा है इक्वलिटी, चौथा है पॉलिटिकल डिसेंट और पांचवा है इकोनॉमिक मार्केट।
यानी कि जो ये पांच बातें हैं, इन्हीं पांच बातों से मिलकर फ्रीडम बनती है। तो, लोगों के लिए फ्रीडम का होना बहुत जरूरी
है। तभी जाके डेवलपमेंट हो सकती है। अमृत्य सेन का दूसरा इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है आईडिया ऑफ़ जस्टिस। और यह कहते हैं कि
जो जस्टिस का विचार है वह दो चीजों से मिलकर बनता है। पहला है नीति, दूसरा है न्याय। नीति का मतलब है रूल्स एंड
इंस्टीटश। यानी कि जो इंस्टीटशंस होते हैं, जुडिशियल इंस्टीटशंस होते हैं, उनके द्वारा जो रूल्स बनाए जाते हैं, लॉज़ बनाए
जाते हैं, उसे हम नीति कहते हैं। और न्याय का मतलब होता है कि जो रियलाइजेशन ऑफ रूल्स है यानी कि जब लोग यह समझते हैं कि
रूल्स और लॉज़ उनके लिए बने हैं तो उसे हम न्याय कहते हैं। तो, बेसिकली यह कहते हैं कि भाई जो जस्टिस है, वह तभी पॉसिबल है
अगर हम कुछ चीजों को रिमूव कर देते हैं सोसाइटी से। जैसे अगर अनकल एक्सेस ऑफ रिसोर्सेज हो रहा है तो उसको हमें रिमूव
करना होगा। पॉवर्टी है उसको हमें रिमूव करना होगा और हमारा जो अनजस्ट वर्ल्ड है उसको हमें कम से कम अनजस्ट करना होगा।
यानी कि उसे जस्ट बनाना होगा। जब यह सारी चीजें होगी तभी जाकर जो जस्टिस है वह कायम रहेगा। ना केवल एक स्टेट के अंदर बल्कि
ओवर द वर्ल्ड। अमृत्य सेन का अगला इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है आइडिया ऑफ कैपेसिटी। तो बेसिकली अमृत सेन कहते हैं
कि जो कैपेसिटी की अप्रोच है या मान्यता है या दृष्टिकोण है यह बेसिकली अपने अंतर्गत एक नैतिक मान्यता को रखता है यानी
कि मोरालिटी के बेस पे है और यह कहते हैं कि अगर हमें कैपेबिलिटी को समझना है तो दो तरीकों से समझ सकते हैं। पहला है कि एक तो
कि जो फ्रीडम है वह इंपॉर्टेंट होती है वेल बीइंग के लिए यानी कि लोगों के कल्याण के लिए जिसकी कि मोरलेंस होती है। और
दूसरा यह कहते हैं कि जो वेल बीइंग है उसको जो है हमें जो लोगों की कैपेबिलिटीज है और लोग किस तरह से फंक्शन करते हैं,
कार्य करते हैं उसके अनुसार हमें समझना चाहिए। और कैपेबिलिटीज का इनका मतलब यह है कि जब लोगों की लाइफ इंप्रूव होती है यानी
कि लोग अच्छे तरीके से लाइफ जीते हैं। वेलविंग होता है। उनकी लिटरेसी रेट बढ़ती है और उनके पास आय या फिर इनकम के जो
सोर्सेज है वह काफी बढ़ते हैं। अच्छे तरीके से वे इनकम प्राप्त करते हैं। तो ऐसी स्थिति को ही जो अमृत्य सेन है
उन्होंने आइडिया ऑफ कैपेबिलिटी कहा है। इनका अगला इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है इंस्ट्रूमेंटल फ्रीडम। यानी कि यह कहते
हैं कि जो फ्रीडम है वह एक इंस्ट्रूमेंट के रूप में यानी कि एक औजार के रूप में एक साधन के रूप में काम करता है। और इन्होंने
कहा है कि जो फ्रीडम होती है वह पांच प्रकार की होती है। जिनमें पहली आती है पॉलिटिकल फ्रीडम। दूसरी आती है इकोनॉमिक
फ्रीडम, तीसरी आती है सोशल अपॉर्चुनिटीज। चौथी आती है ट्रांसपेरेंसी और पांचवी आती है प्रोटेक्टिव सिक्योरिटी। तो यह कहते
हैं कि यह जो पांच चीजें हैं यह मिलकर ही फ्रीडम को पूरा करती हैं। तो इस प्रकार से जो फ्रीडम होती है वो बेसिकली
इंस्ट्रूमेंट यानी कि साधन के रूप में काम करती है। वहीं अगला इनका इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है वुमेन एंपावरमेंट। तो बेसिकली
अमृत्य सेन कहते हैं कि महिलाओं की कैपेबिलिटी को भी हमें इंप्रूव करना होगा। यानी कि जो जेंडर इक्वलिटी है उसको बढ़ावा
देना होगा। इक्वल अपॉर्चुनिटीज की यह बात करते हैं और यह कहते हैं कि जो वुमेन लिटरेसी रेट है उसको भी हमें बढ़ाना होगा
और साथ में जो पॉलिटिक्स है या फिर जो पॉलिसी मेकिंग या डिसीजन जो मेकिंग प्रोसेस है उसमें भी महिलाओं की
पार्टिसिपेशन को बढ़ाना होगा। इसी प्रकार से इन्होंने फेमसली कहा भी था जिस कोटेशन को आपको अच्छे से याद रखना है। तो यह कहते
हैं कि मोर देन 1 मिलियन वुमेन आर मिसिंग ओवर द वर्ल्ड। मतलब 100 मिलियन से ज्यादा महिलाएं पूरी दुनिया में मिस है, गायब है।
मिसिंग का मतलब यहां पर यह है कि 100 मिलियन से ज्यादा महिलाएं ऐसी है जो घर के कामकाज तक सीमित है। जिनकी पब्लिक स्फेयर
में, जॉब में, डिसीजन मेकिंग में कोई भी या किसी भी प्रकार की पार्टिसिपेशन नहीं है। अगले महान स्कॉलर का नाम आता है एमए
श्रीनिवास। तो जब हम इनकी बात करते हैं तो यह एक बहुत बड़े इंडियन सोशियोलॉजिस्ट रहे हैं। एंथ्रोपोलॉजिस्ट रहे हैं और यह जाने
जाते हैं कास्ट पर रिसर्च करने के लिए, कास्ट सिस्टम का अध्ययन करने के लिए, सोशल स्ट्रेटिफिकेशन के लिए, संस्कृटाइजेशन,
वेस्टर्नाइजेशन और इनकी प्रमुख थ्योरी डोमिनेंट कास्ट के लिए। 1977 में इन्हें पद्मा भूषण मिलता है जो कि भारत का थर्ड
नंबर का सिविल अवार्ड माना जाता है और खास बात यह भी है कि इन्होंने कर्नाटका के एक विलेज जिनका नाम रामपुरा है वहां पर
इन्होंने कास्ट सिस्टम की केस स्टडी की जो कि बाद में द रिमेंबर्ड विलेज के रूप में पब्लिश हुआ और स्क्रीन पर जितने भी आपको
इनके बक्स दिखाई दे रहे हैं इनको आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि एग्जाम की दृष्टि से बहुत ही इंपॉर्टेंट है। अब हम बात कर
लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट कांसेप्ट की। तो सबसे पहला कांसेप्ट आता है डोमिनेंट कास्ट। इन्होंने यह कहा है कि जो
ब्राह्मणस है वह एक डोमिनेंट कास्ट है क्योंकि यह इकोनॉमिकली स्पिरिचुअली और पॉलिटिकली दूसरी जो कास्टेज है इंडिया में
उनसे काफी रिच है काफी सुपीरियर है और दूसरी बात यह है कि जो ब्राह्मण है वह डोमिनेंट कास्ट इसलिए है क्योंकि विलेज और
जो विलेज सिस्टम है वो उन्हीं कास्टज यानी कि जो ब्राह्मणस हैं उनके द्वारा ही रन किया जाता है। विलेज जो सिस्टम है या फिर
विलेज जो व्यवस्था है उसको चलाया जाता है। मेंटेन किया जाता है। वहीं एमए श्रीनिवास का दूसरा इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा है
संस्कृटाइजेशन। इनकी प्रमुख रचना जो कि 1971 में पब्लिश होती है जिसका नाम है सोशल चेंज इन मॉडर्न इंडिया। उसमें यह
कहते हैं कि संस्कृटाइजेशन एक ऐसा प्रोसेस है जिसके अंतर्गत जो लोअर कास्टीज है वे कलेक्टिवली यानी कि सामूहिक रूप से जो अपर
कास्टीज है यानी कि जो ब्राह्मण है उनकी जो प्रैक्टिससेस होती है उनके जो नॉर्म्स बिलीफ होते हैं उनको अडॉप्ट करते हैं। इस
प्रकार से हम कह सकते हैं कि संस्कृटाइजेशन एक ऐसा प्रोसेस है जिसके द्वारा जो लोअर कास्टेज है या फिर ट्राइबल
जो कम्युनिटी है लो कास्टेज है वह क्या करती है कि अपनी जो चीजें हैं उनको चेंज कर देती है। अपने जो उनके पर्सनल लॉज़ होते
हैं, ट्रेडिशंस होती है, उसको चेंज करके जो हायर कास्टीज होती है, हाई कास्ट होती है, खासतौर पे जो ब्राह्मणस हैं, उनके
कस्टम्स, रिचुअल्स, आईडियोलॉजीस और वे ऑफ़ लाइफ को अपनाते हैं। जिस तरह से हाई कास्ट अपनाती है, उसी तरह उनको भी फॉलो करती है।
वहीं एमए श्रीनिवास का अगला इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा है वेस्टर्नाइजेशन। तो इसमें यह कहते हैं कि वेस्टर्नाइजेशन बेसिकली एक
ऐसी शब्दावली है जिसके अंतर्गत जो ब्रिटिश लोग हैं उन्होंने भारत की जो सोसाइटी और कल्चर है उसको चेंज किया और
अपनी जो सोसाइटी है यानी कि उनके जो वैल्यूस है कल्चर है उसको इंडिया में अडॉप किया और अपनी तरह ही उन्होंने बनाने की
कोशिश की। यह कहते हैं कि टेक्नोलॉजी के द्वारा, इंस्टीटशंस के द्वारा, आईडियोलॉजीस एंड वैल्यूस को थोप कर इंडिया
में जो वेस्टर्न वैल्यू्यूज है, कल्चर है, उसको थोप कर इंडिया को भी वेस्टर्न देशों की तरह ही बनाने का प्रयास किया गया जिसे
हम वेस्टर्नाइजेशन कहते हैं। अगले स्कॉलर का नाम आता है जी एस घुरिए। तो यह इंडियन सोशलिस्ट रहे हैं और खास बात यह है कि
इनको इंडियन जो सोशियोलॉजी है या फिर सोशियोलॉजी इन इंडिया है उसके फाउंडर या फिर फादर के रूप में रिगार्ड किया जाता है
और खास बात यह भी है कि 1924 में यह ऐसे दूसरे पर्सन बने जिन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ़ बॉम्बे की जो सोशियोलॉजी डिपार्टमेंट है
उसको हेड किया। स्क्रीन पर आपको जितने भी इनके वक्स दिखाई दे रहे हैं इनको आप अच्छे से नोट कर लें। अब हम बात कर लेते हैं
इनके इंपॉर्टेंट कांसेप्ट की। तो इनका इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा है कास्ट पेट्रियटिज्म। यानी कि यह कहते हैं कि
इंडिया में कास्ट पेट्रिएटिज्म पाया जाता है। यानी कि लोग जिस कास्ट से बिलोंग करते हैं, उसके प्रति उनकी जो पेट्रिएटिज्म है,
वह देखी गई है। जो कि उनके अंदर एक कास्ट सॉलिडेरिटी की भावना को बढ़ाता है। जिस तरह से इन्होंने कोट भी किया है। यह कहते
हैं कि इट इज द स्पिरिट ऑफ कास्ट पेट्रिएटिज्म व्हिच एनजेंडर्स अपोजिशन टू अदर कास्टज एंड क्रिएट्स एन अनहेल्ी
एटमॉस्फियर फॉर द ग्रोथ ऑफ नेशनल कॉन्शियसनेस। तो यह जो कास्ट पेट्रटिज्म है या फिर जो कास्ट सॉलिडेरिटी है इसको
बेसिकली नेगेटिव रूप में देखते हैं। अगले स्कॉलर का नाम आता है सुभाष पालशीकर। तो जब हम इनकी बात करते हैं तो यह एक इंडियन
एकेडमिक सोशल एंड पॉलिटिकल थ्योरिस्ट रहे हैं। और खास बात यह है कि जो पुणे में जो यूनिवर्सिटी है जिसका नाम सावित्रीबाई
फुले पुणे यूनिवर्सिटी उसके पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में यह प्रोफेसर हैं। और खास बात यह भी है कि जो स्टडीज इन
इंडियन पॉलिटिक्स रही है उसके ये चीफ एडिटर भी रहे हैं। और खास बात यह भी है कि जो लोकनीति प्रोग्राम है ऑन कंपेरेटिव
पॉलिटिक्स जिसको हम सीएसडीएस के नाम से भी जानते हैं। उसके को डायरेक्टर रहे हैं। स्क्रीन पर आपको जो इनके बक्स दिखाई दे
रहे हैं, इनको भी आप अच्छे से नोट कर लें। अब हम बात कर लेते हैं इनके कांसेप्ट की। तो पहला कांसेप्ट आता है पॉलिटिक्स ऑफ
कंसेंससेस यानी कि डेमोक्रेटिक कंसेंससेस। तो बेसिकली ये इंडिया में बात करते हैं कि भाई पॉलिटिक्स या फिर जो डेमोक्रेसी है
उसमें कंसेंससेस पाया जाता है। तो यह कहते हैं कि इंडिया में क्योंकि मास पार्टिसिपेशन बढ़ा है इसीलिए डेमोक्रेटिक
या फिर पॉलिटिकल कंसेंससेस पाया जाता है। यह कहते हैं कि इंडिया में जो मास पार्टिसिपेशन है वह दोनों ही लेवल अर्थात
पॉलिटिकल एजेंडा के रूप में पॉलिटिकल एजेंडा का मतलब यह है कि जो वोट बैंक के रूप में भी लोगों का पार्टिसिपेशन होता है
और दूसरा है डिसीजन मेकिंग प्रोसेस के रूप में भी लोग पार्टिसिपेट करते हैं। तो इस तरह से बेसिकली यह कहते हैं कि इंडिया में
डेमोक्रेटिक कंसेंस या फिर पॉलिटिक्स ऑफ कंसेंसस पाई जाती है। इनका दूसरा इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा है डेरिवेटिव
नेशनल इलेक्शन। यानी कि यह भी यादव की तरह यही कहते हैं कि भारत का जो नेशनल इलेक्शन का प्रोसेस है वह अपना नहीं है बल्कि यह
डिराइव किया हुआ है। लिया हुआ है। यानी कि यह वेस्टर्न वर्ल्ड से डिराइव की हुई अवधारणा है। वहीं इनका तीसरा इंपॉर्टेंट
कांसेप्ट रहा है डोमिनेंट पॉलिटी ऑफ़ द बीजेपी। यह कहते हैं कि जो आज की जो पॉलिटी है भारत की उसको कहीं ना कहीं
बीजेपी डोमिनेट कर रही है और यह कहते हैं कि जो मोदी के अंडर है बीजेपी ने इंडियन पॉलिटिक्स को काफी डोमिनेट किया है और यह
कहते हैं कि जो अभी छ साल जो बीजेपी के हुए हैं जिसके अंतर्गत मोदी ने देश का नेतृत्व किया है। उसने काफी हद तक जो है
भारतीय राजनीति को डोमिनेट किया है। जिसको कि हम मोदी रिजीम कह सकते हैं। और खास बात यह भी है कि यह कहते हैं कि बीजेपी ने
इंडिया में पॉपुलिज्म यानी कि लोक लिवनवाद और ऑथोरिटेटरिज्म यानी कि सत्तावाद को काफी बढ़ावा दिया है। यानी कि जिस मास
रिजीम की या फिर जो डायरेक्ट डेमोक्रेसी पीपल डेमोक्रेसी की बात हम करते हैं वह कहीं ना कहीं इंडिया में अभाव में रही है
मोदी के राज में या फिर बीजेपी की गवर्नमेंट में। अब हम बात कर लेते हैं जोया हसन की। तो जोया हसन बेसिकली इंडियन
एकेडमिक पॉलिटिकल साइंटिस्ट रही है जो कि जेएनयू यानी कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में फॉर्मर डीन ऑफ स्कूल ऑफ
सोशल साइंस रही है और फॉर्मर पॉलिटिकल साइंस की प्रोफेसर रही है। इनकी एजुकेशन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से हुई है और
खास बात यह है कि इन्होंने बीजेपी को एक एथेनिक पार्टी माना है जो कि हिंदू एथनिसिटी एंड नेशनलिज्म को ही बढ़ावा देती
है। स्क्रीन पर आपको जितने भी इनके वक्स दिखाई दे रहे हैं, आप इनको अच्छे से नोट कर लें क्योंकि एग्जाम के लिए यह भी बहुत
ही इंपॉर्टेंट है। अब हम बात कर लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स की। तो, पहला कांसेप्ट आता है हिंदू अथॉरिटेरियनिज्म।
यानी कि यह कहते हैं कि जो बीजेपी का जो रूल है, शासन है मोदी के नेतृत्व में वो बेसिकली हिंदू अथॉरिटेरियनिज्म है यानी कि
हिंदू सत्तावाद है जिसमें बीजेपी अपनी मनमानी करती है। इसमें इन्होंने लिखा भी है कि अब्रोगेशन ऑफ आर्टिकल 370 एंड
आर्टिकल 35 एंड इनेक्टमेंट ऑफ द सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट 2019 इज अ विज़ ऑफ हिंदू स्टेट। इसका मतलब यह है कि यह ब्लेम कर
रही है कि बीजेपी ने जो आर्टिकल 370 को हटाया और 3 5 ए को हटाया और साथ में जो सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट है उसको लागू
किया। वह बेसिकली एक ऐसा विज़ है बीजेपी का जिसके अंतर्गत वे भारत को एक हिंदू स्टेट बनाना चाहते हैं। अगले स्कॉलर का नाम आता
है नीरा चंदोक। तो बेसिकली इनका जन्म 1947 को होता है और यह प्रोफेसर रही है पॉलिटिकल साइंस की यूनिवर्सिटी ऑफ दिल्ली
में और खास बात यह भी है कि यह जानीमानी फेलो रही है सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज न्यू दिल्ली में और यह भी एक इंपॉर्टेंट
बात है कि यह डायरेक्टर रही है डेवलपिंग कंट्रीज रिसर्च सेंटर एट द यूनिवर्सिटी ऑफ़ दिल्ली और इन्होंने जो रिसर्च किया और जिस
रिसर्च में इन्होंने स्टडी की वो है सिविल सोसाइटी डेमोक्रेसी एंड राइट्स। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं जिन्हें आप अच्छे
से याद कर लें क्योंकि यह कई बार एग्जाम में पूछे गए हैं। तो, आप स्क्रीनशॉट लेके या फिर वीडियो को पॉज करके आप इन्हें नोट
कर सकते हैं। नीराचंदो का एक इंपॉर्टेंट की कांसेप्ट रहा है जिसका नाम है रिटन ऑफ द वन डोमिनेंस पार्टी। इन्होंने 17 जून
2014 को एक इंपॉर्टेंट आर्टिकल लिखा जो कि जेएस स्टोर में पब्लिश होता है जिसका नाम है इंडिया 2014 रिटन ऑफ द वन पार्टी
डोमिनेंट सिस्टम। तो बेसिकली इस आर्टिकल में यह कहती है कि जिस वन डोमिनेंस पार्टी सिस्टम की शुरुआत आजादी के बाद कांग्रेस
ने शुरू की थी वह 2014 में बीजेपी के रूप में वापस रिटर्न हुआ है। यानी कि बीजेपी मोदी के नेतृत्व में सत्ता में आने से
भारत में फिर से एक बार वन डोमिनेंस पार्टी सिस्टम हुआ है। तो बेसिकली यही इसमें यह कहना चाह रही है कि जो नेशनल
इलेक्शन हुए थे 2014 के उसमें बीजेपी ने जो एक महान या फिर विशालकाय जीत प्राप्त की वह दर्शाता है कि इंडिया में वन
डोमिनेंस पार्टी सिस्टम की शुरुआत हुई है। क्योंकि दूसरी जो पार्टीज थी कांग्रेस जैसी पार्टीज उनका बुरा हाल हुआ। बुरी तरह
से पराजय हुए जिसको कि इन्होंने बताया कि इंडिया में 2014 के इलेक्शन में वन डोमिनेंस पार्टी सिस्टम की शुरुआत हुई है।
अगले स्कॉलर का नाम आता है गुनर मेडल का। तो यह बेसिकली स्वीडिश इकोनॉमिस्ट रहे हैं और इनके बारे में खास बात यह है कि 1974
में इन्हें फ्रेडरिक हायक के साथ नोबेल प्राइज दिया गया था और यह दिया गया था। इन्होंने मनी एंड जो इकोनॉमिक थ्योरी है
यानी कि इकोनॉमिक फील्ड और मनी की फील्ड में योगदान देने के लिए इन्हें यह नोबेल प्राइज दिया गया था। तो स्क्रीन पर आपको
जितने भी इनके इंपॉर्टेंट वक्स दिखाई दे रहे हैं, इनको आप अच्छे से नोट कर लें। यह भी एग्जाम की दृष्टि से बहुत इंपॉर्टेंट
है। अब हम बात कर लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट कांसेप्ट की। तो, पहला कांसेप्ट आता है सॉफ्ट स्टेट। यह कहते हैं
कि इंडिया एक सॉफ्ट स्टेट रहा है और ऐसा इसलिए है क्योंकि यह कहते हैं कि जब भारत को आजादी मिली तो उसके बाद भारत ने अपना
डेवलपमेंट करने के लिए कुछ सॉफ्ट रिफॉर्म किए। यानी कि ग्रेजुअल जो रिफॉर्म्स है वो किए। इवोल्यूशनरी रिफॉर्म किए। जैसे फाइव
ईयर प्लांस, लैंड रिफॉर्म्स, ग्रीन रेवोल्यूशन, इंडस्ट्रियलाइजेशन, एलपीजी। तो ये जितने भी ये रिफॉर्म्स थे या स्टेप
थे ये इवोल्यूशनरी थे यानी कि सॉफ्ट रिफॉर्म थे ना कि रेवोल्यूशनरी रिफॉर्म थे चाइना की तरह। तो इस वजह से इन्होंने कहा
कि भारत एक सॉफ्ट स्टेट माना जा सकता है। अगले की स्कॉलर का नाम आता है ग्रनविले ऑस्टिन। तो ग्रैंडन बिले ऑस्टिन बेसिकली
अमेरिकन हिस्टोरियन रहे हैं। जिसके आधार पर इन्होंने इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन की काफी स्टडी की और 2011 में इसी इनके एफर्ट
को देखते हुए भारतीय सरकार ने पद्मश्री अवार्ड से इन्हें सम्मानित किया जिसे कि इंडिया का फोर्थ हाईएस्ट सिविलियन ओनर के
रूप में माना जाता है। इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कोट दिया जिसमें इन्होंने कहा कि द कॉन्स्टिटुएंट असेंबली वाज़ वन पार्टी
बॉडी इन एन एसेंशियली वन पार्टी कंट्री। द असेंबली वाज़ द कांग्रेस एंड कांग्रेस वाज़ इंडिया। तो, यह कोटेशन बेसिकली बहुत
इंपॉर्टेंट है। कई बार एग्जाम में पूछी भी गई है और पूछी भी जा सकती है। इसीलिए इसको अच्छे से नोट कर लें। साथ में इन्होंने यह
भी कहा कि नेहरू, पटेल, प्रसाद एंड आजाद यह ओलगार्गिकल एग्जांपल रहे हैं। असेंबली में यानी कि जो कॉन्स्टिटुएंट असेंबली थी
उसमें नेहरू, पटेल, प्रसाद और आजाद एक और से अल्पतंत्र यानी कि इलीट फैमिली से आते हैं। ओगार्किकल एग्जांपल रहे हैं। और साथ
में इन्होंने स्टेट डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स को कहा सॉल्व ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन। और इन्होंने एक कोट दी
जिसमें इन्होंने कहा कि इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन इज द डॉक्यूमेंट ऑफ द सोशल रेवोल्यूशन। यानी कि जो भारतीय संविधान है
उसकी वजह से भारत में सामाजिक क्रांति आ सकती है। यानी कि उसका एक बहुत बड़ा ये डॉक्यूमेंट है दस्तावेज है। और इन्होंने
एक इंपॉर्टेंट कोटेशन दी जिसमें इन्होंने कहा कि डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ स्टेट पॉलिसी आर द कंसाइन ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन
व्हिच एंबडी द सोशल फिलॉसोफी ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन। यह कोटेशन भी बहुत इंपॉर्टेंट है। इसको आप अच्छे से याद रख
लें। आपको जो स्क्रीन पर इनके वक्स दिखाई दे रहे हैं, इनको भी आप अच्छे से नोट कर लें।
अब हम बात कर लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट कांसेप्ट की। तो पहला कांसेप्ट आता है कोऑपरेटिव फेडरलिज्म। तो बेसिकली इन्होंने
कहा है कि इंडिया में कोऑपरेटिव फेडरलिज्म पाया जाता है और ऐसा इसलिए है क्योंकि इंडिया में जो यूनियन और स्टेट्स हैं उनके
बीच बड़ी मात्रा में कोऑपरेशन पाया जाता है। सहयोग पाया जाता है। इसीलिए इन्होंने कहा कि भारत का जो फेडरलिज्म है संघवाद है
वो एक बेसिकली कोऑपरेटिव या फिर सहयोगात्मक संघवाद है। वहीं इनका दूसरा इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा है जिसमें यह
कहते हैं कि जो इंडिया का कॉन्स्टिट्यूशन है वह एक सीमलेस वेब है यानी कि अखंड जाल है। तो बेसिकली जो ऑस्टिन है वो यह कहते
हैं कि भारत का कॉन्स्टिट्यूशन एक सीमलेस वेब है और ऐसा इसलिए है क्योंकि जो इंडिया का कॉन्स्टिट्यूशन है इसने पूरे भारत को
कंसोलिडेशन यानी कि एकीकृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। और साथ में जो इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन है यह सोशल
रेवोल्यूशन का इंडिया में एक बहुत बड़ा डॉक्यूमेंट है। बहुत बड़ा सोर्स है। तो इसी तरह से इन्होंने कहा कि भारतीय जो
संविधान है उसके बेसिकली तीन गोल है। पहला नेशनल यूनिटी, दूसरा डेमोक्रेसी और तीसरा सोशल रेवोल्यूशन। तो इन्हीं तीन जो गोल है
उसी की वजह से जो इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन है उसको सीमलेस वेब के रूप में देखा जा सकता है। अगले स्कॉलर का नाम आता है
आशुतोष बासने जिनका जन्म 1957 को होता है। तो बेसिकली आशुतोष बासने पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर रहे हैं ब्राउन यूनिवर्सिटी
में जो कि अभी भी कार्यरत हैं। और दूसरी खास बड़ी बात यह है कि इन्होंने कहा कि जो आफ्टर इंडिपेंडेंस है जो इंडिया है उसने
जो पॉवर्टी को रिमूव किया उसको दो-तीन तरीकों से रिमूव किया। जैसे पहला जो है वो हैवी इंडस्ट्रीज यानी कि भारत ने
इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन की शुरुआत की जिसके अंतर्गत भारत ने जो बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज है उसको स्थापित किया। दूसरा
फ़ॉरेन ऐड मतलब विदेशों से भारत ने सहायता ली और तीसरा है हाई टैक्सेशन। यानी कि भारत ने आजादी के बाद रिफॉर्म करने के
लिए, डेवलपमेंट करने के लिए, पॉवर्टी को दूर करने के लिए हाई टैक्सेशन लगाया। वहीं खास बात यह भी है कि इन्होंने कहा है कि
इंडिया इज बिकमिंग मोर डेमोक्रेटिक। यानी कि यह कहते हैं कि इंडिया में जो नेशनल इलेक्शंस है वह काफी सक्सेसफुल रहे हैं।
जिसकी वजह से इंडिया मोर डेमोक्रेटिक हो रहा है। और खास बात यह भी है कि इन्होंने यह कहा है कि भारत में अगर नेशन बिल्डिंग
करना है या राष्ट्र निर्माण करना है तो उसके दो विचार हैं। पहला जो आईडिया है वह है मेल्टिंग पॉट और दूसरा जो आईडिया है वह
है सैलेड पॉट। तो यह कहते हैं कि मेल्टिंग पॉट में जो चीजें होती है यानी कि जितनी भी डायवर्सिटीज होती हैं वह ज्यादा देर तक
नहीं रहती है और वहां पर सिर्फ एक ही जो आइडेंटिटी होती है वह अस्तित्व में रहती है। जबकि दूसरी तरफ जो सेलेड पॉट है उसमें
सभी डायवर्सिटीज यानी कि विविधताएं साथ में अस्तित्व में रहती है। तो यह कहते हैं कि जब हम भारत की बात करते हैं तो भारत के
लिए जो सेकंड ऑप्शन है यानी कि सेलेड पोर्ट का जो मॉडल है वह काफी कारगर साबित हो सकता है क्योंकि भारत एक विविधतामई देश
है जहां पर अनेकों जातियां अनेकों धर्म पाए जाते हैं। इसीलिए भारत जैसे देश के लिए सेलेट पॉट काफी इंपॉर्टेंट है। वहीं
यह यह भी कहते हैं कि इंडिया में लीडरशिप क्राइसिस रहा है। यानी कि इंडिया के पास अच्छे नेता का अभाव पाया गया है। आपको
स्क्रीन पर इनके जो भी इंपॉर्टेंट वक्स दिखाई दे रहे हैं, इनको आप अच्छे से नोट कर लें क्योंकि एग्जाम के लिए यह भी जरूरी
है। अगले इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम है सुनील खिलनानी जिनका जन्म 1960 को होता है। यह बेसिकली प्रोफेसर रहे हैं पॉलिटिकल
साइंस के और डायरेक्टर रहे हैं किंग्स कॉलेज लंदन इंडिया इंस्टीट्यूट के जो कि अभी वर्तमान समय में भी है। और खास बात यह
है कि यह जाने जाते हैं एक इंपॉर्टेंट आईडिया के लिए जिसका नाम है द आइडिया ऑफ इंडिया। और 2005 में इंडियन गवर्नमेंट ने
इन्हें भारतीय प्रवासी सम्मान यानी कि प्रवासी भारतीय सम्मान से नवाजा सम्मानित किया। और खास बात यह है कि इन्होंने कहा
है कि विलेज ऑर्डर वाज चेंज्ड। यानी कि आजादी के बाद पोस्ट इंडिपेंडेंस भारत का जो विलेज ऑर्डर रहा है वो काफी चेंज हुआ
है। वहां पर काफी मॉडर्नाइजेशन काफी चेंज आया है। और सबसे बड़ी बात यह है कि जो आपको वक्स दिखाई दे रहे हैं इनको आपको
अच्छे से याद रखना है क्योंकि सारे के सारे वर्क्स ये बहुत ही इंपॉर्टेंट है। तो बेसिकली अब हम इनके कुछ इंपॉर्टेंट
आइडियाज को डिस्कस कर लेते हैं। जिनमें पहला आईडिया आता है द आइडिया ऑफ इंडिया। तो बेसिकली जो इनकी प्रमुख कृति है द
आईडिया ऑफ इंडिया जो कि 1997 में पब्लिश होती है। इसमें यह लिखते हैं कि एस्टैब्लिशमेंट ऑफ डेमोक्रेसी इन
इंडिया इज द ग्रेट एक्सपेरिमेंट आफ्टर अमेरिकन एंड फ्रेंच रेवोल्यूशन। और इसी कोटेशन के ऊपर जो इनका आइडिया है आइडिया
ऑफ इंडिया वह आधारित है। और इसमें यह जो आगे चलकर कहते हैं कि जो डेमोक्रेसी है यानी कि डेमोक्रेसी इज मोस्ट इफेक्टिव
व्हेन इट प्रेजेंटेड इनू आवर सोशल स्ट्रक्चर। तो बेसिकली यह कहते हैं कि भाई जब सोशल स्ट्रक्चर में डेमोक्रेसी आती है
यानी कि जो समाज के लोग हैं जब वहां तक लोकतंत्र की पहुंच होती है तब जाकर ही मोस्ट इफेक्टिव होती है प्रभावशाली होती
है डेमोक्रेसी या फिर लोकतंत्र और साथ में इन्होंने यह भी कहा है कि जो भारत में आइडिया है यानी कि द इंडिया द आइडिया ऑफ
इंडिया है उसकी खास बात यह रही है कि इंडिपेंडेंस के बाद भारत ने इसी सोशल स्ट्रक्चर को गेन किया है यानी कि समाज के
जो वर्ग हैं, डिफरेंट-डिफरेंट जो तबके हैं, वर्ग है, उन्होंने बढ़-चढ़कर डेमोक्रेसी में पार्टिसिपेट किया है। तो
इन्होंने अपनी जो दूसरी प्रमुख कृति है इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन एंड डेमोक्रेसी जो कि 2000 में पब्लिश होती है। इसमें भी
इन्होंने कहा था कि इंडिया में ऐसे तीन फैक्टर्स है जिसकी वजह से इंडिया में कॉन्स्टिट्यूशन जो है वह एग्जिस्ट करता
है। तो इनमें पहला जो आईडिया है वह है फॉरेन रूल। यानी कि भारत में जो विदेशी लोग आया उन्होंने ही इंडिया में
कॉन्स्टिट्यूशन की प्रेरणा दी जिसकी वजह से इंडिया में कॉन्स्टिट्यूशन आया यानी कि बनाया गया। दूसरा है डिवाइन ऑर्डर यानी कि
भगवान या देवी का आदेश था जिसकी वजह से इंडिया में मोनार्की को खत्म करके डेमोक्रेसी स्थापित की गई और
कॉन्स्टिट्यूशन बनाया गया। वहीं तीसरी बात यह कहते हैं डेमोक्रेटिक सोल यानी कि भारत के जो नेता हैं स्वतंत्रता सेनानी हैं
संविधान सभा में जो नेता रहे हैं उनकी कहीं ना कहीं यह सोल थी कि उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों को भारत में लागू
करना है। वैसे भी अंबेडकर जैसे नेता विदेशों से ही पढ़ के आए थे नेहरू जैसे नेता। तो कहीं ना कहीं जो उनकी सोल थी,
आत्मा थी, वह डेमोक्रेटिक हो चुकी थी। वहीं आगे खिलनानी लिखते हैं कि इंडिया की जो सबसे मोस्टेंट अचीवमेंट रही है वह सोशल
स्ट्रक्चर रही है और इंडिपेंडेंस के बाद इंडिया ने जो है वह काफी हद तक गेन किया है। लेकिन साथ में यह भी बात यह कहते हैं
कि इंडिया में कुछ कमियां भी रही है जिसमें इंडिया बहुत कुछ गेन नहीं भी कर पाया है। जैसे कम्युनल इलेक्टोरेट रहे हैं
1909, 1919 और 1935 में। खासतौर पर आजादी से पहले जो इंडिया में प्रिंसली स्टेट जो हुआ करते थे उनका जो नॉमिनेशन होता था तो
उसकी वजह से इंडिया जो है वह पहले ज्यादा कुछ गेन नहीं कर पाया था और यह कहते हैं कि जो उस समय है राइट टू वोट वो बहुत
लिमिटेड था और जो माइनॉरिटी राइट है या फिर रिप्रेजेंटेशन है वह काफी कम था और बनना सिस्टम उस समय मौजूद था। हालांकि आज
भी है लेकिन उस समय बहुत रिजिड था जो कि स्टेटस पावर एंड वेल्थ के आधार पर था और इन्होंने साथ में गांधी को एक ऑटोक्रेटिक
यानी कि एक ऐसा तानाशाही वाला व्यक्ति कहा है क्योंकि गांधी जी बेसिकली जो अनशन है व्रत है और इस तरह का जो एक विरोध करना उस
तरह की जो चीजें हैं उससे अपनी बातें मनवाते थे। इसीलिए इन्होंने गांधी को एक ऑटोक्रेटिक कहा है और साथ में इन्होंने जो
हिंदू महासभा है आरएसएस है उसको जो है एंटी डेमोक्रेटिक पार्टी के रूप में बिचारा है। वहीं इनका दूसरा इंपॉर्टेंट
कांसेप्ट माना जाता है नॉन अलाइनमेंट 2.0 तो बेसिकली यह जो टर्म है इन्होंने ही गढ़ी थी और यह बेसिकली भारत की एक ऐसी
फॉरेन एंड स्ट्रेटेजिक पॉलिसी मानी जाती है 21 सेंचुरी की जिसमें कि भारत एक लीडिंग प्लेयर है अंतरराष्ट्रीय राजनीति
में। तो बेसिकली सुनील खिलनानी के साथ राजीव कुमार, प्रताप भानु मेहता, प्रकाश मेनन, श्रीनाथ रघावन, श्याम सरन जैसे
लेखकों ने एक डॉक्यूमेंट लिखा था जिसका नाम है नॉन अलाइनमेंट 2.0 अ फॉरेन एंड स्ट्रेटेजिक पॉलिसी फॉर इंडिया इन द 21
सेंचुरी। तो इसी डॉक्यूमेंट में इन्होंने नेम 2.0 की बात की थी जिसमें इन्होंने भारत को एक ऐसा लीडिंग प्लेयर देखा वर्ल्ड
अफेयर्स में 21 सेंचुरी का जो कि एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा अंतरराष्ट्रीय मामलों में। अगले स्कॉलर का नाम आता है
अतुल कोहली जो कि 1949 में जन्म लेते हैं। और खास बात यह है कि यह पॉलिटिकल साइंस एंड इंटरनेशनल अफेयर्स के प्रोफेसर रहे
हैं बुड्रो विल्सन स्कूल ऑफ पब्लिक एंड इंटरनेशनल अफेयर्स प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी में। और खास बात यह भी है कि इन्होंने
2004 में एक इंपॉर्टेंट किताब लिखी जिसका नाम है स्टेट डायरेक्टिव डेवलपमेंट जिसमें इन्होंने इंडिया, नाइजीरिया एंड ब्राजील
जैसे देशों की कंपैरेटिव स्टडी की और खास बात यह भी है कि इन्होंने कहा कि इंडिया में तीन प्रकार के स्टेट के मॉडल पाए जाते
हैं। जिनमें पहला है नियोपेट्रीमोनियल स्टेट जिसके उदाहरण यह यूपी और बिहार बताते हैं। दूसरा यह कहते हैं कि सोशल
डेमोक्रेटिक रिजीम जिसमें ये कहते हैं कि वेस्ट बंगाल एंड केरला आते हैं। वहीं तीसरा यह कहते हैं कि डेवलपमेंटल स्टेट जो
कि केरला एंड कर्नाटका के रूप में दिखाई देते हैं। तो इस तरह से बेसिकली इन्होंने इंडिया में जो अलग-अलग स्टेट है उसके मॉडल
दिए हैं। वहीं आपको स्क्रीन पर जितने भी इनके वक्स दिखाई दे रहे हैं इनको आप अच्छे से नोट कर लें। अब हम बात कर लेते हैं
इनके इंपॉर्टेंट कांसेप्ट की। तो पहला जो कांसेप्ट है वह है क्राइसिस ऑफ गवर्ननेबिलिटी। यानी कि भारत में यह बोलते
हैं कि भारत में प्रशासकीयता का संकट छा गया है। इन्होंने 1990 में अपनी एक प्रमुख कृति लिखी जिसका नाम है डेमोक्रेसी एंड
डिस्कंटेंट इंडियास ग्रोइंग क्राइसिस ऑफ गवर्ननेबिलिटी। तो इसमें कहते हैं कि भाई भारत में क्राइसिस ऑफ गवर्नेबिलिटी पाया
जाता है। क्यों पाया जाता है? क्योंकि यह कहते हैं कि इंडिया में एब्सेंस ऑफ एंड्यूरिंग कोशंस है। यानी कि जो अच्छे
कोिएशंस है जिसकी वजह से सरकारें टिक सकती है, देश चल सकता है उसकी एब्सेंस है। दूसरा यह कहते हैं कि इंडिया में जो
पॉलिसी बनाई तो जाती है लेकिन इन इफेक्टिवनेस होती है। यानी कि ग्राउंड लेवल पर उनको इंप्लीमेंट नहीं किया जाता
है। और तीसरा यह कहते हैं कि इनक्रीज वायलेंस एंड पॉलिटिकल कॉन्फ्लिक्ट्स। यह कहते हैं कि भारत में काफी मात्रा में
वायलेंस बढ़ी है और पॉलिटिकल कॉन्फ्लिक्ट्स चलते रहते हैं। जिसकी वजह से गवर्नेबिलिटी का क्राइसिस होता है और
यह कहते हैं कि पॉलिटिकल इनस्टेबिलिटी भी काफी पाई जाती है इंडिया में जिसकी वजह से इंडिया में क्राइसिस ऑफ गवर्ननेबिलिटी हो
गया है। इनका दूसरा जो इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है वह है टू ट्रैक डेमोक्रेसी। बेसिकली यह बोलते हैं कि इंडिया में दो
प्रकार की डेमोक्रेसी यानी कि दो प्रकार के लोकतंत्र पाए जाते हैं। जिनमें पहला जो लोकतंत्र है वो है ड्यूरिंग इलेक्शन और
दूसरा जो लोकतंत्र पाया जाता है वो है आफ्टर इलेक्शन। यानी कि इंडिया की जो डेमोक्रेसी है दो रास्तों पे चलती है। टू
ट्रैक पे चलती है। पहला जब इलेक्शन होते हैं। दूसरा जब इलेक्शन खत्म हो जाते हैं। तो बेसिकली यह कहते हैं कि जो जब इलेक्शन
होते हैं उस समय इंडिया की जो डेमोक्रेसी बहुत अच्छी दिखती है। लोग पार्टिसिपेट कर रहे हैं। वोट दे रहे हैं। राजनीति के बारे
में चर्चाएं कर रहे हैं। नेता लोग बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं। मैनिफेस्टो इंप्लीमेंट कर रहे हैं। बता रहे हैं लोगों
को। वहीं इलेक्शन के बाद जो इंडिया की डेमोक्रेसी है वह बड़ी गंदी दिखती है क्योंकि उसके बाद जो नेता लोग हैं वह
लोगों को पूछते तक भी नहीं है कि उनके लिए क्या दिक्कतें हैं? क्या समस्या है? उनकी क्या डिमांड्स है। जैसा कि इन्होंने कहा
भी है। यह कहते हैं कि इंडियन पॉलिटिक्स लुक्स शाइनिंग ड्यूरिंग इलेक्शन बट आफ्टर इलेक्शन इंडियन डेमोक्रेसी लुक्स वेरी
बैड। तो यह अपने आप में बता देते हैं कि किस तरह से इंडिया में टू ट्रैक डेमोक्रेसी पाई जाती है। आशीष नंदी का
जन्म होता है 1941 में। यह बेसिकली इंडियन पॉलिटिकल साइकोलॉजिस्ट, सोशल थ्यरिस्ट एंड क्रिटिक
रहे हैं। और खास बात यह है कि इन्होंने यूरोपियन कॉलोनियलिज्म, यूरोपियन मॉडर्निटी, यूरोपियन सेकुलरिज्म एंड साइंस
एंड टेक्नोलॉजी को पूरी तरह से आलोचना की है। और खास बात यह भी है कि यह फॉर्मर डायरेक्टर एंड सीनियर फेलो रहे हैं। सेंटर
फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज। और स्क्रीन पर आपको जितने भी इनके वक्स दिखाई दे रहे हैं, इनको आप अच्छे से नोट कर लें
क्योंकि यह भी कई बार इनमें से कई वक्स पूछे गए हैं। आशीष नंदी का एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा है जिसका नाम है थर्ड
डेमोक्रेटिक अफसर्स। बेसिकली यह कहते हैं कि इंडिया में 2010 के बाद थर्ड डेमोक्रेटिक अफसर शुरू हुआ है। जिसकी यह
कहते हैं कि कुछ इंपॉर्टेंट विशेषताएं हैं। जैसे यह बोलते हैं कि यह आधारित है प्रिंसिपल ऑफ सर्वाइवल ऑफ द अब्लेस्ट।
मतलब जो सक्षम है, जो व्यक्ति योग्य है, उसके सिद्धांत पर यह आधारित है। दूसरी बात यह कहते हैं कि यह रिप्रेजेंट करता है
कंपेटिव इलेक्ट्रोरल मार्केट इन इंडिया। वहीं तीसरी बात यह कहता है कि यह जो थर्ड डेमोक्रेटिक अफसर्स है, यह एलपीजी यानी कि
लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन के इरा में 1990 के दशक में शुरू हुआ। इसीलिए इसकी वजह से इंडिया में
कंपिटिटिव मार्केट सोसाइटी का इमरजेंस हुआ है और खास बात यह भी है कि यह बोलता है कि यूथ यानी कि जो युवा लोग हैं उनकी
पार्टिसिपेशन हो और साथ में इसकी कुछ और इंपॉर्टेंट बातें यह रही है कि यह शिफ्ट की बात करता है। यानी कि जो इलेक्ट्रोल
मार्केट का जो शिफ्ट है इंडिया में उसकी बात करता है। जैसे स्टेट टू मार्केट फ्रॉम गवर्नमेंट टू गवर्नेंस। वहीं स्टेट जो एक
कंट्रोलर होता है उससे शिफ़्ट होता है स्टेट ऐज़ अ फैसिलिटेटर यानी कि इस थर्ड डेमोक्रेटिक अफसर्स में स्टेट अब कंट्रोलर
के रूप में भूमिका नहीं निभाएगा बल्कि एक फैसिलिटेटर के रूप में भूमिका निभाएगा। साथ में यह बात करता है कि एक्टिविज्म
होगा अर्बन मिडिल क्लास का और यह बोलता है कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन मूवमेंट भी इसी दौर में आया था। तो इस तरह से आशीष नंदी
थर्ड डेमोक्रेटिक ऑफिसर्स की बात करते हैं इंडिया में। अगले स्कॉलर का नाम आता है अचिन विनायक जिनका जन्म होता है 1941 में।
यह बेसिकली एक राइटर सोशल एक्टिविस्ट रहे हैं और यह फॉर्मर प्रोफेसर रहे हैं पॉलिटिकल साइंस के यूनिवर्सिटी ऑफ दिल्ली
में। और खास बात यह भी है कि यह फाउंडर रहे हैं सोसाइटी फॉर मार्क्सिस्ट स्टडीज। और यह फॉर्मर एडिटर रहे हैं टाइम्स ऑफ
इंडिया के। और खास बात यह भी है कि इनकी जो रिसर्च है वह हुई है न्यूक्लियर डिस आर्मामेंट में इंडियन सिक्योरिटी फॉरेन
पॉलिसी एंड इंडियन कम्युनलिज्म पे और स्क्रीन पर आपको जितने भी इनके वक्स दिखाई दे रहे हैं इनको आप अच्छे से नोट कर लें।
यह भी एग्जाम की दृष्टि से बहुत इंपॉर्टेंट है। अब हम बात कर लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट कांसेप्ट की। तो इनका जो
कांसेप्ट है वह है हिंदू अथॉरिटेरियनिज्म। यानी कि इन्होंने भी हिंदू अथॉरिटेरियनिज्म की बात की है। तो इनकी
प्रमुख कृति जो कि 2017 में पब्लिश होती है जिसका नाम है द राइज ऑफ हिंदू अथॉरिटेरियनिज्म सेुलर क्लेम्स कम्युनल
रियलिटीज। इसमें यह बात करते हैं यानी कि जो बीजेपी का रूल है शासन है उसको हिंदू अथॉरिटेरियन यानी कि हिंदू सत्तावाद के
रूप में दिखाते हैं और यह बोलते हैं कि जो हिंदुत्व का राइज हुआ है मोदी गवर्नमेंट में बीजेपी के शासन में वो एक ओर से
इंडियन फासिज्म का प्रकार है। यानी कि जो बीजेपी का रूल है उसकी तुलना इन्होंने फासिज्म से की है। जिसको इन्होंने इंडियन
फासिज्म कहा है। और वहीं इन्होंने यह भी कहा है कि जो हिंदुत्व फोर्सेस हैं वे कोशिश कर रही हैं अपना जो प्रोजेक्ट है
गोल है कि इंडिया को जो है एक हिंदू राष्ट्र के रूप में स्थापित किया जाए। वहीं इनका दूसरा इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा
है डोमिनेंट कोलीजन मॉडल। यानी कि इन्होंने भी प्रणव वर्धन की तरह यह बोला है कि इंडिया में डोमिनेंट कोलेशन मॉडल
पाया जाता है। यह कहते हैं कि इंडिया में पिजेंट्री आर्टिशियन और जो पेटी प्रोड्यूसर्स होते हैं यानी कि छोटी-छोटी
चीजों का उत्पादन करते हैं। इनका इंडिया में एक डोमिनेंट कोलेशन रहा है जो कि बोट बैंक के हिसाब से काफ़ी इंपॉर्टेंट क्लासेस
है और यही क्लासेस इंडिया में पॉलिटिकल सोसाइटी का निर्माण करते हैं। तो इस तरह से जो है यह जो क्लासेस हैं इंडिया में एक
डोमिनेंट कोलेशन का निर्माण करते हैं जो कि इंडियन पॉलिटिक्स के लिए बहुत ही इंपॉर्टेंट है। अगले स्कॉलर का नाम आता है
रशीदुद्दीन खान और इनके बारे में खास बात यह है कि यह इंडियन राइटर एंड पार्लियामेंटेरियन रहे हैं और यह
कम्युनिस्ट पॉलिटिशियन रहे हैं और जेएनयू में यह प्रोफेसर रहे हैं पॉलिटिकल साइंस के और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि
डॉक्टर जाकिर हुसैन के नेफ्यू रहे हैं। तो स्क्रीन पर आपको जितने भी इनके वक्स दिखाई दे रहे हैं इनको आप अच्छे से नोट कर लें।
तो अब हम बात कर लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट कांसेप्ट की जिसमें आता है टोटल स्टेट यानी कि जो इंडिया है इसको इन्होंने टोटल
स्टेट कहा है। खासतौर पे जब इंदिरा गांधी ने 1975 में नेशनल इमरजेंसी को लागू किया इंपोज किया तो उस समय की जो कंडीशंस है
उसको इन्होंने टोटल स्टेट कहा है। तो इस प्रकार से इंडिया का उदाहरण देते हुए इन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी के टाइम में
इंडिया एक टोटल स्टेट था। इस प्रेजेंटेशन के लास्ट स्कॉलर है डीएल शेठ। तो यह बेसिकली इंडियन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे
हैं और आउटस्टैंडिंग थ्योरिस्ट रहे हैं। और खास बात यह है इनके बारे में कि यह सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी के
फाउंडिंग फादर रहे हैं। और इससे भी इंपॉर्टेंट बात यह है कि लोकायन के भी यह फाउंडिंग मेंबर रहे हैं। जिनकी स्थापना एक
डायलॉग के रूप में की गई पीपल यानी कि जो पीपल और जो इंटेलेक्चुअल लोग थे वे किस तरह से इंटरेक्शन करेंगे किस तरह से विचार
विमर्श करेंगे उसके लिए इसकी स्थापना की गई थी और इनका प्रमुख जो वर्क है वह है एट होम विद डेमोक्रेसी और थ्योरी ऑफ इंडियन
पॉलिटिक्स जो कि इनकी डेथ के बाद 2017 में अभी कुछ साल पहले पब्लिश हुआ था। तो अब हम बात कर लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट कांसेप्ट
की। तो इन्होंने दिया है सेकुलराइजेशन ऑफ कास्ट का कांसेप्ट। तो इसमें बेसिकली यह कहते हैं कि जो इंडिया में कास्ट है वो
काफी चेंज हो गई है और नए प्रकार की जो एक स्ट्रेटिफिकेटरी सिस्टम है उसका इमरजेंस हुआ है। यह बोलते हैं कि जो कास्ट सिस्टम
है वह अब पहले वाला जो कास्ट सिस्टम था यानी कि जो रिचुअल स्टेटस हायरार्की थी उससे काफी चेंज हुआ है और इन्होंने यह भी
कहा है कि इंडिया में जो कास्ट का जो एक डायमेंशन हुआ है जिसको हम सेकुलराइजेशन कहते हैं वह दो तरीकों से हुआ है। जिनमें
पहला है डीरिचुअलाइजेशन यानी कि जो रिचुअल्स है उससे अब अलगाव हो गया है कास्ट का और दूसरा है पॉलिटिसाइजेशन। यानी
कि कास्ट के साथ अब पॉलिटिसाइजेशन हुई है। यानी कि जैसे कि रजनी कोठारी भी बात करते हैं पॉलिटिसाइजेशन ऑफ़ कास्ट की। तो इस तरह
से इन्होंने सेकुलराइजेशन ऑफ कास्ट का कांसेप्ट दिया है।
इस पुनरावलोकन में ऐतिहासिक और आधुनिक राजनीतिक विचारकों के सिद्धांत, राजनीतिक विचारधारा, राजनीतिक प्रक्रिया, और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें क्लासिकल थिंकर्स से लेकर फेमिनिस्ट, अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विचारकों, और भारतीय राजनीतिक विचारकों के योगदान शामिल हैं।
प्लेटो ने न्याय और आदर्श राज्य (कैलीपोलिस) एवं फिलॉसफर किंग की अवधारणा प्रस्तुत की। मैक्यावली ने वास्तविक राजनीति और शक्ति के व्यावहारिक नियमों पर जोर दिया। रूसो ने सामाजिक करार, जनरल विल और प्राकृतिक स्वतंत्रता के विचार दिए। ये विचार आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की नींव हैं।
हिस्टोरिकल अप्रोच राजनीतिक सोच के विकास को समझने में मदद करता है, साइंटिफिक अप्रोच राजनीति को सांख्यिकी और वैज्ञानिक विधियों से विश्लेषित करता है, जबकि फिलॉसॉफिकल अप्रोच राजनीतिक न्याय, नैतिकता और दार्शनिक आधारों पर चर्चा करता है। इन दृष्टिकोणों से राजनीतिक सिद्धांत की गहन समझ संभव होती है।
फेमिनिस्ट विचारकों जैसे मैरी वॉलस्टोन क्राफ्ट, साइमन डी बोवौर और एंथ्रोपोज़ ने महिला अधिकार, शिक्षा, और जेंडर समानता पर महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ में स्त्री-पुरुष समानता के लिए तर्क दिए जो आज भी प्रासंगिक हैं।
डॉ. बी आर अंबेडकर ने जातिवाद के खिलाफ संघर्ष कर लोकतंत्र और संविधान की नींव रखी। रजनी कोठारी ने जाति और कंसेंसस विषयों पर विश्लेषण किया, जबकि योगेंद्र यादव व कंचन चंद्रा ने राजनीतिक दलों और सामाजिक आंदोलनों की समझ विकसित की, जिससे भारतीय राजनीति के विविध पहलुओं को समझने में मदद मिली।
लोकतंत्र के प्रतिनिधित्वात्मक, सहभागी और लोकमत संग्रह स्वरूपों की चर्चा की गई है। भारत में कांग्रेस की सत्ता और बहुदलीय व्यवस्था का विश्लेषण किया गया है जो भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं को समझने में सहायक है।
राजनीतिक सिद्धांत लोकतांत्रिक प्रशासन के सिद्धांत और व्यवहार को समझने में मदद करता है। विल्सन से लेकर मुन और डहल तक के लेखकों ने प्रशासनिक विज्ञान, भ्रष्टाचार, सामाजिक न्याय और विकास मॉडल पर व्यापक अध्ययन किया है, जिससे बेहतर सार्वजनिक नीति निर्माण संभव होता है।
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