परिचय
यह लेक्चर 500 से अधिक प्रमुख राजनीतिक विचारकों और उनके योगदानों को समग्र रूप में प्रस्तुत करता है। यह विस्तारपूर्वक राजनीतिक सोऽच, नीति, सिद्धांत और उनके विकास पर केंद्रित है।
इतिहासिक राजनीतिक विचारक और उनकी अवधारणाएँ
क्लासिकल विचारक
- प्लेटो: न्याय, आदर्श राज्य (कैलीपोलिस), फिलॉसफर किंग की अवधारणा (Understanding Plato: Concepts, Philosophy, and Importance for UPSC)
- मैक्यावली: वास्तविक राजनीति, राज्य और शक्ति के व्यावहारिक नियम
- रूसो: सामाजिक करार, जनरल बिला, प्राकृतिक स्वातंत्र्य
आधुनिक राजनीतिक विचारक
- कार्ल मार्क्स: वर्ग संघर्ष, राज्य का अन्त, कम्युनिज्म का लक्ष्य
- जेएस मिल: व्यक्तिगत स्वतंत्रता, बहुलवाद, टिरनी ऑफ मेजॉरिटी
- स्वामी विवेकानंद: आध्यात्मिक राष्ट्रवाद, मानवतावाद
राजनीतिक सिद्धांत के विविध दृष्टिकोण
मतभेद और विमर्श
- हिस्टोरिकल अप्रोच: राजनीतिक विचारों का इतिहासिक विकास
- साइंटिफिक अप्रोच: राजनीति का विज्ञान और सांख्यिकीय विश्लेषण
- फिलॉसॉफिकल अप्रोच: राजनीतिक न्याय, नैतिकता, और दार्शनिक आधार
पोस्ट बिहेवियरलिज्म और क्रिटिकल थ्योरी
- प्रासंगिकता और कार्रवाई पर जोर, समाज में अन्तरविष्लेषण
- फ्रैंकफर्ट स्कूल और मार्क्सियन परंपरा से प्रभावित आलोचना
राजनीतिक विचारकों का योगदान
फेमिनिस्ट विचारक
- मैरी वॉलस्टोन क्राफ्ट: महिला अधिकार और शिक्षा की वकालत
- साइमन डी बोवौर: स्त्री-पुरुष समानता, द्वितीय सेक्स
- एंथ्रोपोज़: अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संदर्भ में जेंडर
इंटरनेशनल रिलेशन और रियलिज्म
- सुंजू, थसीडाइडस, मॉर्गनथाऊ: शक्ति, संघर्ष और सुरक्षा दृष्टिकोण
- किनेथ वाल्ट: संरचनात्मक रियलिज्म, द्विध्रुवीयता सिद्धांत
सामाजिक और राजनीतिक भारतीय विचारक
- डॉ. बी आर अंबेडकर: जातिवाद का प्रतिरोध, लोकतंत्र और संविधान (भारतीय संविधान का भाग 1: यूनियन और उसके क्षेत्रीय संगठन की समझ)
- रजनी कोठारी: भारतीय राजनीति में कास्ट और कंसेंसस
- योगेंद्र यादव, कंचन चंद्रा: आधुनिक भारतीय राजनीतिक दल और सामाजिक आंदोलन
आधुनिक राजनीतिक प्रक्रियाएँ और व्यवस्थाएँ
लोकतंत्र के स्वरूप
- प्रतिनिधित्वात्मक, सहभागी, और लोकमत संग्रह के प्रकार
- भारत में पार्टी प्रणाली: कांग्रेस सत्ता और बहुदलीय व्यवस्था
पब्लिक प्रशासन और नीति
- विल्सन से लेकर मुन और डहल तक: प्रशासनिक विज्ञान और लोकतांत्रिक अभ्यास
- भ्रष्टाचार, सामाजिक न्याय, और विकास के मॉडल
निष्कर्ष
यह व्यापक व्याख्यान राजनीतिक सिद्धांत के विभिन्न आयामों का समुचित पुनरावलोकन कराता है। यह न केवल ऐतिहासिक और आधुनिक थिंकर्स के विचारों को स्पष्ट करता है, बल्कि उनके सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक पहलुओं को भी उजागर करता है। इसका अध्ययन उम्मीदवारों के लिए गहन ज्ञान और परीक्षा सफलता का मार्ग प्रशस्त करेगा।
सुझाव:
- इस लेक्चर को बार-बार सुनें और नोट्स बनाएं।
- प्रमुख कृतियों और थ्योरिस्ट्स के नामों को याद रखें।
- विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के तुलनात्मक अध्ययन पर ध्यान दें।
- भारतीय राजनीतिक विचारकों के योगदान और सिद्धांतों को समझना विशेषतः महत्वपूर्ण है (Comprehensive Guide to Constitution of India: BTech Third Year Unit 1 Summary)।
इस व्यापक विषय-आधारित समीक्षा के साथ आपकी राजनीतिक विज्ञान की समझ और परीक्षा योग्यता निश्चित रूप से सुदृढ़ होगी।
सार सक्सेस में आप सभी का स्वागत है। आज का यह लेक्चर रिवीजन बेस्ड बिग मैराथॉन टाइप लेक्चर है। जिसमें हम 500 प्लस
पॉलिटिकल साइंस के थिंकर्स को डिस्कस करेंगे। यह लेक्चर मैंने जितने भी सारे लेक्चर्स मैंने पहले अपलोड किए हैं या नए
लेक्चर हैं, पुराने हैं, उन सभी को कंपाइल करके आपकी रिवीजन को देखकर तैयार किया है। तो, यह लेक्चर आपके लिए बेहद इंपॉर्टेंट
होने वाला है। इस लेक्चर को आप पूरा देखें, सुने और अच्छे से अपनी रिवीजन करें और अगर आप इस लेक्चर को पूरा देखते हैं,
सुनते हैं तो आपका जेआरएफ होना पक्का है। लेकिन इससे पहले कि हम इस लेक्चर को अच्छे से डिस्कस करें, रिवाइज़ करें। मैं अपने
सभी स्टूडेंट्स को हैप्पी न्यू ईयर 2026 की बहुत-बहुत शुभकामनाएं देना चाहता हूं। और मैं गॉड से यह प्रे करता हूं कि आपका
इस साल ना केवल जेआरएफ हो बल्कि जॉब लगे। अधिक से अधिक आप खुशियों को गेन करें। यही मैं चाहता हूं और यही गॉड से प्रे करता
हूं। सबसे इंपॉर्टेंट पॉइंट यह है कि जो हिस्टोरिकल अप्रोच है पॉलिटिकल थ्योरी में
इसके जनक रहे हैं जॉर्ज सेबाइन और यह पॉइंट आपको याद रखना है। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह जाने जाते हैं अपनी प्रमुख
कृति और हिस्ट्री ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी के लिए जो कि 1937 को पब्लिश हुई थी। और खास बात यह है कि इसमें इन्होंने प्लेटो से
लेकर आधुनिक समय में जो फासिज्म है और नाजिज्म है उसके जितने भी पॉलिटिकल थॉट्स रहे हैं उनका किस तरह से डेवलपमेंट हुआ।
इन सभी चीजों का इन्होंने इसमें पता लगाया है। और खास बात यह भी है कि इनकी कुछ और कृतियां रही है। जिनमें पहला आता है व्हाट
इज पॉलिटिकल थ्योरी और दूसरी आती है द प्रगमेटिक अप्रोच टू पॉलिटिकल साइंस जो कि 1930 को पब्लिश होती है। कि लियोस्ट्रोस
फिलॉसोफिकल अप्रोच से जुड़े हैं। और दूसरी बड़ी बात यह है कि लियोस्ट्रोस ने कहा था कि पॉलिटिकल थ्योरी एज फिलॉसोफी इज एन
अटेमप्ट टू रिप्लेस ओपिनियन और अजमशन अबाउट द नेचर ऑफ पॉलिटिकल थिंग्स एंड द राइट्स और द गुड पॉलिटिकल ऑर्डर। इसका
मतलब यह है कि दर्शन के रूप में राजनीतिक सिद्धांत, राजनीतिक चीजों की प्रकृति और अधिकारों या अच्छे राजनीतिक व्यवस्था के
बारे में जो राय होती है, ओपिनियन होती है या फिर कांसेप्ट होता है, उसको बदलने का एक प्रयास है, एफर्ट है। लियोस्ट्रोस के
कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। तो, स्क्रीन में जितने भी आपको इनके वक्स दिखाई दे रहे हैं, आप अच्छे से याद कर लें
क्योंकि आपके एग्जाम के लिए यह वर्क बहुत ही इंपॉर्टेंट है। यह अक्सर एग्जाम में पूछे जाते हैं। तीसरा पॉइंट आता है
पॉलिटिकल थ्योरी एज अ साइंस। तो जब हम पॉलिटिकल थ्योरी को साइंस के रूप में समझते हैं, अंडरस्टैंड करते हैं तो हम यही
कह सकते हैं कि यह एक विज्ञान है क्योंकि इसकी मेथोडोलॉजी, इसकी एप्रोच और जो इसका एनालिसिस होता है, वह साइंटिफिक होता है
क्योंकि इसके जितने भी कंक्लूजंस है, यह निकाले जाते हैं डीप स्टडी के द्वारा, ऑब्जरवेशन के द्वारा और एक्सपेरिमेंट के
द्वारा। दूसरी बड़ी बात यह है कि इसके कुछ इंपॉर्टेंट स्कॉलर्स रहे हैं, विचारक रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है आर्थर बेंटले
का। इनकी प्रसिद्ध कृति रही है द प्रोसेस ऑफ गवर्नमेंट। दूसरे थिंकर का नाम आता है जॉर्ज कैटलिन। इनकी प्रसिद्ध कृति रही है
द साइंस एंड मेथड ऑफ पॉलिटिक्स। और तीसरे थिंकर का नाम आता है डेविड ईस्टन। इनकी प्रसिद्ध कृति रही है द पॉलिटिकल सिस्टम।
और चौथे विचारक आते हैं रॉबर्ट देहल जिनकी प्रसिद्ध कृति रही है मॉडर्न पॉलिटिकल एनालिसिस जो कि 1963 को पब्लिश होती है।
अल्फर्ड कॉबन ही ऐसे पहले व्यक्ति रहे हैं जिन्होंने पॉलिटिकल साइंस में पॉलिटिकल थ्योरी के कोलैप्स डिक्लाइन की बात की।
दूसरी बड़ी बात यह है कि इनके आर्टिकल जो कि इनकी अपनी कृति पॉलिटिकल साइंस क्वार्टरली 1953 में पब्लिश हुआ उसमें
इन्होंने लिखा कि इन कंटेंपररी सोसाइटी पॉलिटिकल थ्योरी हैज़ नो रिलेवेंस आइदर इन कैपिटलिस्ट सिस्टम और इन कम्युनिस्ट
सिस्टम। तो इसमें यह कह रहे हैं कि जो पॉलिटिकल थ्योरी है समकालीन समय में उसका कोई रिलेवेंस नहीं रहा है। ना तो उसका जो
रिलेवेंस है वो कैपिटलिस्ट सोसाइटी में रहा ना ही कम्युनिस्ट सोसाइटी में रहा। अल्फ्रेड कॉबन ने डिक्लाइन ऑफ पॉलिटिकल
थ्योरी के पीछे तीन इंपॉर्टेंट फैक्टर्स की बात की है। जिनमें पहला फैक्टर यह बताते हैं कि राज्य की जो गतिविधियां है
उसका जो दायरा है उनमें कोई रेस्ट्रिक्शन नहीं है। कोई चेक्स नहीं है। जिसकी वजह से जो राज्य है वह तानाशाही कर देता है।
डिक्टेटरशिप कर देता है। जिसकी वजह से पॉलिटिकल थ्योरी का जो डिक्लाइन है वह हो गया। दूसरा फैक्टर इन्होंने बताया कि
राज्य में जो समाज है, समाज की जितनी भी गतिविधियां है, वहां पर नौकरशाही का इमरजेंस हो गया और उसी का नियंत्रण हो
गया। उसी की जो सत्ता है, वो स्थापित हुई। अधिनायकवादी नियंत्रण हो गया। उदाहरण के लिए जैसे इन्होंने कहा कि जो कम्युनिस्ट
कंट्री है वहां पर इस तरह की नौकरशय का जन्म हुआ। जिसकी वजह से जो पॉलिटिकल थ्योरी है, उसका डिक्लाइन हो गया। और
तीसरा इंपॉर्टेंट फैक्टर है बड़े पैमाने पर जो सैन्य संगठन है उनका निर्माण यानी कि क्रिएशन ऑफ लार्ज स्केल मिलिटरी
ऑर्गेनाइजेशन जिसकी वजह से जितने भी राजनीतिक वैल्यू है चाहे डेमोक्रेसी हो राइट्स हो लिबर्टी हो उनको हम किया गया और
जितने भी ऑर्गेनाइजेशन है चाहे एनजीओस हो सिविल सोसाइटी ऑर्गेनाइजेशन हो या फिर न्यू सोशल मूवमेंट हो इनको भी गहरा आघात
लगा शॉक लगा अल्फर्ड कॉबन की कुछ इंपॉर्टेंट बुक्स भी रही है जिनने में पहला नाम आता है पॉलिटिकल साइंस
क्वार्टरली। दूसरा नाम आता है रूसो एंड द मॉडर्न स्टेट और तीसरा नाम आता है द डिक्लाइन ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी। 1953 में
डेविड ईस्टन ने डिक्लाइन ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी की बात की। डेविड ईस्टन कनेडियन बोर्न अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे
हैं। डेविड ईस्टन ने कंपैरेटिव पॉलिटिक्स में सिस्टम एप्रोच बिहेवल एप्रोच पोस्ट बिहेवल थ्योरी को दिया था। और इनके कुछ
इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जिनमें पहला वर्क आता है द पॉलिटिकल सिस्टम। दूसरा आता है एन एप्रोच टू द एनालिसिस ऑफ पॉलिटिकल
सिस्टम्स। और तीसरा आता है एट सिटी स्टडी ऑफ चाइल्ड पॉलिटिकल सोशलाइजेशन। डेविड ईस्टन ने अपने जर्नल ऑफ पॉलिटिक्स
में चार इंपॉर्टेंट ऐसे फैक्टर्स की बात की जिनकी वजह से पॉलिटिकल थ्योरी का डिक्लाइन हुआ। तो पहला फैक्टर आता है
हिस्टोरिसिज्म जिसको आप हिंदी में कहते हैं इतिहासवाद। तो जब हम बात करते हैं इस फैक्टर यानी कि हिस्टोरिसिज्म की तो डेविड
ईस्टन कहते हैं कि राजनीतिक सिद्धांत आज मुख्य रूप से विचारों के इतिहास में रुचि रखता है। यानी कि जो पॉलिटिकल थ्योरी है
उसमें केवल जो इतिहास है यानी कि जो हिस्टोरिकल फैक्ट्स है आइडियाज है उसको ही स्टडी किया जाता है। जिसकी वजह से जो
पॉलिटिकल थ्योरी है उसका कोलैप्स डिक्लाइन हो गया। दूसरा इंपॉर्टेंट पॉइंट ये है कि जो ऐतिहासिकता है यानी कि जो
हिस्टोरिसिज्म है उसकी इंपॉर्टेंट भूमिका बढ़ रही है जिसकी वजह से पॉलिटिकल थ्योरी का डिक्लाइन हुआ पतन हुआ और अगला ये
फैक्टर बताते हैं इसी के अंदर कि जो रिस्चरर्स हैं जितने भी शोधकर्ता हैं उन्होंने अपनी जो स्टडी है उसमें केवल
वैल्यूस को ही डिस्कस किया और जो इतिहास में जो वैल्यूस रही वैल्यूुएबल फैक्ट्स रहे उसको ही स्टडी किया जिसकी वजह से जो
क्लासिकल पॉलिटिकल थ्योरी है उसका रिलेवेंस खत्म हो गया और डिक्लाइन हो गया। तो इस तरह से डेविड ईस्टन कहते हैं कि
ऐतिहासिक जो विश्लेषण है यानी कि हिस्टोरिकल जो एनालिसिस है उसी की वजह से पॉलिटिकल थ्योरी का कोलैप्स हुआ, डिक्लाइन
हुआ। जैसा कि डेविड ईस्टन ने लिखा भी है कि द रूट कॉज ऑफ द डिक्लाइन ऑफ़ पॉलिटिकल थ्योरी इज़ द मेन हिस्टोरिकल थिंकर्स डनिंग
लिनसे और मैकलवेन। इसमें डेविड ईस्टन कहते हैं कि राजनीतिक सिद्धांत के पतन का मूल कारण जो इतिहासवादी विचारक है डनिंग
सेबाइन लिंसे मैकलविन उनकी जो इतिहासवादी अवधारणा है उसी की वजह से इसका पतन हुआ। दूसरा इंपॉर्टेंट फैक्टर आता है मोरल
रिलेटिविटी जिसका मतलब होता है नैतिक सापेक्षता। इसके अंतर्गत यह माना जाता है कि पॉलिटिकल साइंस से मूल्यों को बाहर
निकाल देना चाहिए। क्योंकि पॉलिटिकल साइंस या फिर जो पॉलिटिकल थ्योरी है उसमें वैल्यूस की कोई जगह नहीं है। इस प्रकार यह
पॉलिटिकल साइंस और जो पॉलिटिकल थ्योरी है उसमें वैल्यूस के निगेशन की बात करता है। दूसरी बड़ी बात यह है कि मिड 20थ सेंचुरी
में पॉलिटिकल साइंस को साइंस में बदलने के लिए इंपेरिकल साइंस पर बल दिया गया। जिसकी वजह से पॉलिटिकल थ्योरी का डिक्लाइन हो
गया। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो इंपेरिकल साइंस है इसका मुख्य सिद्धांत है वैल्यू न्यूट्रलिटी यानी कि ये वैल्यूस को नहीं
मानता है और खास बात यह भी है कि जो नैतिक सापेक्षता यानी कि वैल्यू न्यूट्रलिटी का कांसेप्ट है इसको ईस्टन से पहले मैक्स
बेबर और ऑगस्ट कॉमटे के द्वारा भी दी गई थी। जैसा कि डेविड ईस्टन ने लिखा भी है कि द पॉलिटिकल साइंटिस्ट इज नॉट ओनली एन
एनालिस्ट ऑफ वैल्यूस बट आल्सो अ क्रिएटर ऑफ वैल्यूस। जिसका मतलब यह है कि जो राजनीतिक वैज्ञानिक होता है जब वो स्टडी
करता है तो केवल मूल्यों का विश्लेषण नहीं करता है एनालिसिस नहीं करता है बल्कि वो मूल्यों को क्रिएट करता है। यानी कि वह
मूल्यों का निर्माता है। थर्ड इंपॉर्टेंट फैक्टर आता है कंफ्यूजन बिटवीन साइंस एंड थ्योरी यानी कि विज्ञान और सिद्धांत के
बीच भ्रम। तो राजनीतिक सिद्धांत के पतन का सबसे प्रमुख कारण यह भी था कि राजनीतिक विज्ञान को जितने भी स्कॉलर्स रहे या फिर
थिंकर्स रहे इन्होंने इसको विज्ञान बनाने के लिए इसका जो साइंटिफिक स्टेटस है उसको उठाने के लिए जितने भी साइंटिफिक मेथड्स
थे उनके ऊपर डिपेंडेंसी स्थापित की यानी कि अत्यधिक निर्भरता स्थापित की जिसकी वजह से पॉलिटिकल थ्योरी का कोलैप्स हो गया।
वहीं दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि शोध कार्यों में ठीक है कि वैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग किया जा सकता है। परंतु
सिर्फ साइंटिफिक मेथड्स के ऊपर डिपेंडेंट रहना किसी भी चीज को पतन कर सकता है। जैसा कि पॉलिटिकल थ्योरी के साथ भी हुआ। और एक
इंपॉर्टेंट बात यह है कि आधुनिक राजनीतिक वैज्ञानिक किसी भी विषय पर जानकारी इकट्ठा करने के लिए केवल साइंटिफिक जो मेथड हैं,
उनका ही उपयोग करते थे। और उन सभी कारकों को नेगलेक्ट करते थे, अनदेखा करते थे जो घटना के पीछे काम कर रहे हो। उदाहरण के
लिए 1928 में ग्रेट इकोनॉमिक डिप्रेशन आया तो वहां पर सिर्फ साइंटिफिक मेथड ही काम नहीं कर सकते हैं। बल्कि उन वजह उन
फैक्टर्स को भी देखना पड़ेगा जिनकी वजह से 1928 में ग्रेट डिप्रेशन यानी कि जो इकोनॉमिक ग्रेट डिप्रेशन है वो आई।
पॉलिटिकल थ्योरी के डिक्लाइन का अगला फैक्टर आता है हाइपरफक्चुअलिज्म जिसको आप हिंदी में कहते हैं अति तथ्यवाद।
तथ्यों पर बहुत अधिक भरोसा किया गया और थ्योरीज यानी कि सिद्धांतों का निर्माण किया गया। दूसरा इंपॉर्टेंट पॉइंट यह है
कि पॉलिटिकल थ्योरिस्ट के द्वारा केवल उन्हीं समस्याओं, उन्हीं प्रॉब्लम्स के ऊपर रिसर्च किया गया जिन पर आसानी से
रिसर्च किया जा सकता था। उन सभी जितने भी पॉलिटिकल साइंटिस्ट रहे हैं, थ्यरिस्ट रहे हैं, उनको रिसर्च की सीमाएं पता नहीं थी।
वे तो सिर्फ फैक्ट को जुटाने में व्यस्त थे। और अगला इंपॉर्टेंट फैक्टर यह भी आता है कि उनके पास कोई सैद्धांतिक झुकाव नहीं
था। इसीलिए उनके पास भरोसा करने के लिए कोई ठोस आधार नहीं था क्योंकि वे सिर्फ फैक्ट को ढूंढने में व्यस्त थे। और अगला
इंपॉर्टेंट पॉइंट इसमें यह भी आता है कि कुछ खास दृष्टिकोणों से आगे वे नहीं देख पाते थे क्योंकि उनमें उद्देश्यों की कमी
थी। उनके पास जो बना बनाया था, जो थ्योरीज उनके पास पहले से मौजूद थी, जो दृष्टिकोण पहले से मौजूद थे, उसमें ही वे सिमटे रहे।
हाइपरफक्चुअलिज्म में अगला पॉइंट आता है कि जो पॉलिटिकल थ्योरिस्ट रहे हैं, उनके पास साइंटिफिक दृष्टिकोण नहीं था।
सिद्धांत निर्माण के लिए आम जनता की राय आवश्यक है। लेकिन उसे अनुसंधान यानी कि रिसर्च और जो क्रिएशन ऑफ न्यू थ्योरी है
उसका आधार बनाना गलत था। और दूसरा सबसे इंपॉर्टेंट पॉइंट जिसको आपको याद रखना है कि डेविड ईस्टन ने इस स्थिति को देखा है
थ्योरेटिकल माल न्यूट्रिशन एंड सरफेट ऑफ फैक्ट्स। यानी कि डेविड ईस्टन ने इसे सैद्धांतिक कुपोषण और तथ्यों के खुलासे के
रूप में देखा है। जिसका मतलब यह होता है कि जो थ्योरीज है, जो सिद्धांत है उसका कुपोषण हो गया। क्यों हो गया? क्योंकि
इसमें सिर्फ और सिर्फ वैल्यूज़ और जो फैक्ट्स हैं उनकी ही स्टडी की गई। उनके ऊपर ही ध्यान दिया गया। जितने भी पॉलिटिकल
थ्योरिस्ट रहे थे। दंते जर्मिनो ने अपनी प्रसिद्ध कृति बियों्ड आईडियोलॉजी द रिवाइवल ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी जो कि 1967 को
पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने कहा कि 19वीं शताब्दी का अधिकांश समय और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में पॉलिटिकल जो थ्योरी
है उसके पतन के उसके डिक्लाइन के दो इंपॉर्टेंट कॉजेस थे। तो इसमें पहला जो कॉज था वो था अगस्ट कॉमटेक का पॉजिटिविज्म
और दूसरा कॉज इसमें था हैज़ेमनी ऑफ़ पॉलिटिकल आईडियोलॉजी। तो अगस्त कॉमटे का जो प्रत्यक्षवाद है उसमें साइंटिफिक और जो
इंपेरिकल स्टडी है उसके ऊपर फोकस किया गया जिसकी वजह से पॉलिटिकल थ्योरी का डिक्लाइन हुआ। वहीं दूसरी तरफ हैज़ेमनी ऑफ़ पॉलिटिकल
आइडियोलॉजी में दंते जर्मिनो कहते हैं कि डीट्रेसी ने जो आईडियोलॉजी है उसको बढ़ावा दिया। जिसकी वजह से जो पॉलिटिकल थ्योरी है
उसकी तरफ लोगों का यानी कि जो रिस्चर है जो थिंकर्स हैं उनका ध्यान नहीं रहा बल्कि उन्होंने अब आइडियोलॉजी की तरफ अपना झुकाव
किया और पिछले जो 100 से 150 साल रहे हैं उसमें जितनी भी रिसर्च हुई वो सिर्फ आइडियोलॉजी के बेस पे हुई और इसमें जितनी
भी विचारधाराएं हैं खासतौर पे मार्क्सिज्म आइडियलिज्म उनका बहुत बड़ा रोल रहा जिसने पॉलिटिकल थ्योरी को कोलैप्स किया और इस
घटना को दते जर्मिनो ने आइडियोलॉजिकल रिडक्शनिज्म कहा है। यानी कि वैचारिक अपचयनवाद कहा है। वहीं दूसरी तरफ पीटर
लासलेट और रॉबर्ट डाहल ने कहा कि पॉलिटिकल थ्योरी इज डेड यानी कि राजनीतिक सिद्धांत की मृत्यु हो चुकी है। पीटर लासलेट ने कहा
कि पॉलिटिकल थ्योरी इज डेड। और इन्होंने यह 1956 में अपनी प्रसिद्ध कृति फिलॉसोफी पॉलिटिक्स एंड सोसाइटी में कहा। वहीं
दूसरी तरफ रॉबर्ट डहल ने कहा कि पॉलिटिकल थ्योरी इज डेड और इन्होंने 1958 में अपनी प्रसिद्ध कृति पॉलिटिकल थ्योरी ट्रुथ एंड
कॉन्शियसनेस में कहा। वहीं दूसरी तरफ एसएम लिपसेट ने अपनी प्रसिद्ध कृति पॉलिटिकल मैन द सोशल बेसिस ऑफ़ पॉलिटिक्स जो कि 1959
को पब्लिश हुई। इसमें इन्होंने कहा कि वी हैव नो नीड फॉर पॉलिटिकल थ्योरी बिकॉज़ द वैल्यूस हैव ऑलरेडी बीन डिटरमाइंड इन द
सोसाइटी। इसमें ये कह रहे हैं कि हमें राजनीतिक सिद्धांत की अब कोई जरूरत नहीं है। कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि समाज
में जो भी मूल्य है वो पहले से ही निर्धारित किए जा चुके हैं। पहले से ही बनाए जा चुके हैं। इसलिए हमें पॉलिटिकल
थ्योरी की अब बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। अगले थिंकर का नाम आता है कार्ल पॉपर। कार्ल पॉपर ने अपनी प्रसिद्ध कृति द लॉजिक
ऑफ साइंटिफिक डिस्कवरी जो कि 1934 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने लॉजिकल पॉजिटिविज्म के आईडिया को चुनौती दी और
इन्होंने यह कहा कि जो वैज्ञानिक कथन है उसकी कसौटी पर सत्यपन्यता नहीं बल्कि मिथ्यापन्यता आता है। इसका मतलब यह है कि
जो रिस्चर होते हैं जो स्कॉलर होते हैं वो पहले ट्रुथ को ना खोजें बल्कि फाल्स को खोजें। क्योंकि फाल्स से ही फाल्स के
आइडेंटिफिकेशन से ही सत्य की खोज की जा सकती है। और दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने अपने कुछ अन्य वक्स जैसे द
पॉवर्टी ऑफ़ हिस्टोरिसिज्म जो कि 1936 को पब्लिश होता है। और दूसरा द ओपन सोसाइटीज एंड इट्स एनिमीज़ जो कि 1945 को पब्लिश
होता है। इसमें इन्होंने हिस्टोरिसिज्म को अटैक किया है। अगले थिंकर का नाम आता है नील रिमर का। तो इन्होंने कहा कि पॉलिटिकल
थ्योरी इज इन डॉग हाउस अर्थात राजनीतिक सिद्धांत गर्त में है। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं जिनमें पहला आता
है पॉलिटिकल साइंस एंड इंट्रोडक्शन टू पॉलिटिक्स। दूसरा आता है कार्ल मार्क्स एंड प्रोफेटिक पॉलिटिक्स। तीसरा आता है द
न्यू वर्ल्ड ऑफ पॉलिटिक्स एंड इंट्रोडक्शन टू पॉलिटिकल साइंस। और लास्ट आता है द चैलेंज ऑफ पॉलिटिक्स। अगले थिंकर का नाम
आता है ब्राइन बेरी का। तो इन्होंने कहा कि पॉलिटिकल फिलॉसोफी हैज़ डेड अ ड्रामेटिक डेथ। जिसका मतलब यह है कि राजनीतिक दर्शन
की नाटकीय तरीके से मृत्यु हो गई है। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जिनमें पहला वर्क आता है पॉलिटिकल आर्गुमेंट।
दूसरा आता है डेमोक्रेसी पावर एंड जस्टिस। और तीसरा आता है द लिबरल थ्योरी ऑफ़ जस्टिस। और चौथा आता है लिबर्टी एंड
जस्टिस। और पांचवा आता है जस्टिस एज इंपार्शियलिटी। और छठा आता है भाई सोशल जस्टिस मैटर। तो यह जितने भी वक्स हैं
इनको आप अच्छे से याद करें। अगले थिंकर का नाम आता है जॉन र्स जिन्होंने 1971 में एक अपनी बहुत चर्चित कृति को लिखा जिसका
टाइटल था अ थ्योरी ऑफ़ जस्टिस। इस पुस्तक में इन्होंने जो डिक्लाइन ऑफ़ पॉलिटिकल थ्योरी की डिबेट थी उसको रिजेक्ट कर दिया
और इन्होंने पॉलिटिकल थ्योरी में जो नॉर्मेटिव थ्योरी है इसको एस्टैब्लिश किया। जिसकी वजह से जो पॉलिटिकल थ्योरी है
वह डेथ से बच गया। जॉन र्स ने लिखा कि द कांसेप्ट ऑफ द डिक्लाइन ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी हैज़ बिकम टोटली इररिलेवेंट। इसका
मतलब यह है कि जो बहुत सारे विचारक यह कहते रहे कि पॉलिटिकल थ्योरी डिक्लाइन कर गई है, पतन हो गया है, यह बिल्कुल
इररिलवेंट हो गया है, अप्रासंगिक हो गया है। जॉन र्स अमेरिकन पॉलिटिकल फिलॉसोफर रहे हैं। यह पॉलिटिकल साइंस में जो लिबरल
ट्रेडिशन है, उसके महान राजनीतिक विचारक रहे हैं। इनकी अनेक कृतियां रही है। जिनमें पहली आती है अ थ्योरी ऑफ़ जस्टिस।
दूसरी आती है जस्टिस एज फेयरनेस। तीसरी आती है पॉलिटिकल लिबरलिज्म। चौथी आती है द लॉ ऑफ़ पीपल। पांचवी आती है जस्टिस एज
फेयरनेस और रीस्टेटमेंट। अगले थिंकर का नाम आता है इजाया बर्लिन का। तो इजाइया वर्लिन कहते हैं कि राजनीतिक सिद्धांत के
पतन का प्रमुख कारण जो वेस्टर्न में डेमोक्रेटिक सोशल रेवोल्यूशन है उसकी विजय होना है। दूसरा तर्क बर्लिन देते हैं कि
जो लिबरल डेमोक्रेसी है उसको दुनिया के सभी देशों के द्वारा एक्सेप्ट किया गया है। जिसकी वजह से जो डिबेट है पॉलिटिकल
थ्योरी के डिक्लाइन की वो खत्म हो जाती है। वह समाप्त हो जाती है। और अगला तर्क देते हैं बर्लिन जिसमें ये कहते हैं कि
यदि शास्त्रीय यानी कि जो क्लासिकल पॉलिटिकल थ्योरी है मर गया है तो उसके पीछे कॉज ये है कि जो डेमोक्रेसी है उसकी
जीत हो गई है। और अगला पॉइंट ये बताते हैं कि राजनीतिक सिद्धांत ना तो कभी मरा था ना ही पतन की स्थिति में। बल्कि यह कहते हैं
कि राजनीतिक दर्शन के बिना कोई भी युग नहीं हो सकता है। बर्लिन ने तर्क दिया कि जब तक तर्कसंगत जिज्ञासा मौजूद है यानी कि
जो थ्यरिस्ट है उनके अंदर रैशन क्यूरोसिटी है तब तक राजनीतिक सिद्धांत ना तो मरेगा और ना ही गायब होगा ना ही उसका डिक्लाइन
होगा। ईसाया बर्लिन रशियन ब्रिटिश सोशल पॉलिटिकल थरिस्ट फिलॉसफर और हिस्टोरियन रहे हैं। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स है
जिनमें पहला वर्क आता है टू कांसेप्ट्स ऑफ लिबर्टी। दूसरा आता है डज पॉलिटिकल थ्योरी स्टिल एकिस्ट। तीसरा आता है फोर एस्स ऑन
लिबर्टी। चौथा इसमें आता है वीको एंड हर्डर। पांचवा आता है कार्ल मार्क्स। और छठा आता है कांसेप्ट्स एंड कैटेगरीज। अगले
थिंकर का नाम आता है जॉर्ज सेवाइन का तो इन्होंने कहा था कि अगर राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक समस्याओं की सिस्टमेटिक या फिर
डिसिप्लिन इन्वेस्टिगेशन करता है तो यह कहना मुश्किल होगा कि 1950 और 60 के दशक में राजनीतिक सिद्धांत मर चुका था और इनकी
अगली मान्यता यह रही है कि हन्ना आरंट ऑक्स लियोस्ट्रोस जॉन र्स रॉबर्ट नोजिक हरबर्ट मार्क्यूजे एरिक बोगलिन जैसे
विचारकों ने अपने कार्यों में राजनीतिक िक सिद्धांत को जीवित रखा। यानी कि राजनीतिक सिद्धांत की डेथ नहीं हुई थी। उसका
डिक्लाइन नहीं हुआ था। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। जिनमें पहला आता है अ हिस्ट्री ऑफ़ पॉलिटिकल थ्योरी। दूसरा
आता है व्हाट इज पॉलिटिकल थ्योरी। अगले इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम आता है हन्ना आरंट जो कि जर्मन अमेरिकन हिस्टोरियन और
पॉलिटिकल फिलॉसफर रही है। हन्ना आरंट ने इतिहास में छिपी और गुमनाम ताकतों के विचार को खारिज किया। राजनीतिक सिद्धांत
के पुनरुद्धार में जो अन्य प्रमुख विद्वानों की भूमिका रही है उसी तरह आरंट की भी रही है और इन्होंने विचारधारा और जो
राजनीतिक सिद्धांत है उसके बीच जो आवश्यक असंगति होती है यानी कि इनकंफर्टेबिलिटी होती है उसकी तरह भी संकेत किया और सबसे
इंपॉर्टेंट बात यह है कि हन्ना आरंट ने अपनी राइटिंग्स में अपने चिंतन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता यानी कि इंडिविजुअल
फ्रीडम और जो मानवीय गरिमा होती है यानी कि ह्यूमन डिग्निटी होती है उस पर काफी बल दिया जिसकी वजह से राजनीतिक सिद्धांत के
जो रिवाइवल है या फिर रिसर्जेंस है उसमें महत्वपूर्ण रोल रहा। हन्ना आर्यन बहुत बड़ी लेखिका भी रही है। इनकी अनेक कृतियां
रही है जिनमें पहला वर्क आता है टोटलिटेरियनिज्म। दूसरा आता है द ओरिजंस ऑफ टोटलीनिज्म।
तीसरा आता है द ह्यूमन कंडीशन। चौथा आता है बिटवीन द पास्ट एंड फ्यूचर। और अगला आता है ऑन रेवोल्यूशन। और लास्ट आता है ऑन
वायलेंस। अगले इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम आता है लियोस्ट्रोसका जो कि अमेरिकन पॉलिटिकल फिलॉसफर और पॉलिटिकल थ्योरिस्ट
रहे हैं। इनका प्रमुख वर्क है व्हाट इज पॉलिटिकल फिलॉसोफी जो कि 1957 को पब्लिश हुआ। और खास बात यह है कि लियोस्ट्रोस ने
कहा था कि एंशिएंट पॉलिटिकल जो फिलॉसोफी है वह सुपीरियर है मॉडर्न पॉलिटिकल फिलॉसोफी के मुकाबले। क्योंकि संपूर्ण
राजनीतिक जीवन के जो समस्त पक्ष है उसका विवेचन केवल जो क्लासिकल पॉलिटिकल फिलॉसोफी है वो करती है और खास बात यह भी
है कि लियोस्ट्रोस ने जो क्लासिकल पॉलिटिकल थ्योरी है उसको आधुनिक समय के संकट के उपचार के रूप में बिचारा है और
सबसे बड़ी बात यह है कि लियोस्ट्रोस ने दोनों जो पॉजिटिविज्म और बिहेवियरलिज्म है दोनों की आलोचना की है। लियोस्ट्रोस ने
कहा कि फिलॉसोफी सर्व्ड ट्रुथ व्हिच वाज नॉट डिटरमाइंड बाय इट्स हिस्टोरिकल सेटिंग जिसका मतलब यह होता है कि जो फिलॉसोफी
होती है वो सत्य की सेवा के लिए काम करता है जो इसकी ऐतिहासिक सेटिंग से निर्धारित नहीं होता है। इसका मतलब यह है कि
इन्होंने भी हिस्टोरिसिज्म की आलोचना की। अगले थिंकर का नाम आता है माइकल ऑक्सड का जो कि इंग्लिश फिलॉसोफर और पॉलिटिकल
थ्योरिस्ट रहे हैं। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। जिनमें पहला आता है रैशनलिज्म इन पॉलिटिक्स। दूसरा आता है ऑन
ह्यूमन कंडक्ट। तीसरा आता है वॉइस ऑफ लिबरल लर्निंग। चौथा आता है इंट्रोडक्शन टू लेबथान। और पांचवा आता है रिलीजन
पॉलिटिक्स एंड द मोरल लाइफ। और छठा आता है व्हाट इज हिस्ट्री। अगले थिंकर का नाम आता है इरिक बोगलिन का जो कि जर्मन अमेरिकन
पॉलिटिकल फिलॉसोफर रहे हैं और इनकी यह मान्यता रही है कि पॉलिटिकल थ्योरी और जो पॉलिटिकल साइंस है यह इनसेपरेबल है यानी
कि कभी भी अलग नहीं हो सकते हैं क्योंकि एक दूसरे के बिना संभव नहीं है और खास बात यह है कि इन्होंने कहा कि व्यवहारवाद के
प्रभाव में पुराने राजनीतिक सिद्धांत का पतन हो गया है। यह विचार सही नहीं है। इनके कुछ वर्क रहे हैं जिनमें पहला आता है
न्यू साइंस ऑफ़ पॉलिटिक्स और दूसरा आता है साइंस पॉलिटिक्स एंड इग्नोस्टिसिज्म। अगले इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम आता है बर्टन
डीजवेनल का जो कि फ्रेंच फिलॉसफर पॉलिटिकल इकोनॉमिस्ट और फ्यूचरिस्ट रहे हैं। और खास बात यह है कि इन्होंने कंट्रीब्यूट किया
रिसर्जेंस और पॉलिटिकल थ्योरी में और इन्होंने नियो कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म की अवधारणा दी। इनके कुछ वक्स रहे हैं जिनमें
पहला आता है ऑन पावर। दूसरा आता है सोवनिटी और तीसरा आता है द प्योर थ्योरी ऑफ़ पॉलिटिक्स। और खास बात यह भी है कि
इन्होंने प्योर थ्योरी ऑफ़ पॉलिटिक्स में इन्होंने राजनीतिक सिद्धांत की परंपरा को एक नया रूप दिया जिसे नव प्रत्यक्षवादियों
ने मृत घोषित किया था। अगले थिंकर का नाम आता है हरबर्ट मार्क्यूजे का। हरबर्ट मार्क्यूजे जर्मन अमेरिकन फिलॉसोफर सोशल
क्रिटिक एंड पॉलिटिकल थ्योरिस्ट रहे हैं जो कि फ्रैंकफर्ट स्कूल के साथ जुड़े हुए हैं जो कि क्रिटिकल थ्योरी का एक
महत्वपूर्ण स्कूल था। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने अपने वर्क वन डायमेंशनल मैन जो कि 1961 को पब्लिश होता है। इसमें
इन्होंने बहुत सारे नए सिद्धांत और अवधारणाएं दी। इन सभी ने राजनीतिक सिद्धांत के पुनरुद्धार में मदद की और खास
बात यह है कि इन्होंने एक घरेलू मनुष्य की अवधारणा और मुक्ति का सिद्धांत दिया। इन्होंने आधुनिकता और पूंजीवाद की भी
आलोचना की। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है जिनमें आती है इरोस एंड सिविलाइजेशन। दूसरी आती है वन डायमेंशनल
मैन और तीसरी आती है मार्क्सिज्म रेवोल्यूशन एंड यूटोपिया। अब हम कुछ और कंट्रीब्यूटर्स को देख लेते हैं। तो
जिनमें पहला नाम आता है शेल्डन एस बोलिन का। इन्होंने अपने प्रमुख कृति पॉलिटिक्स एंड विज़न कंटिन्यूटी एंड इनोवेशन इन
वेस्टर्न पॉलिटिकल थॉट जो कि 1960 को पब्लिश होती है। कहा कि परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत अत्यधिक महत्वपूर्ण है जिसकी
अवहेलना नहीं की जा सकती है। वहीं अगले कंट्रीब्यूटर का नाम आता है थॉमस सैमुअल कुन काका। इन्होंने अपनी प्रमुख कृति द
स्ट्रक्चर ऑफ साइंटिफिक रेवोल्यूशन जो कि 1962 को पब्लिश होती है। लिखा कि प्रत्येक समाज में समस्याओं के समाधान का तरीका
अलग-अलग होता है। इसलिए सभी समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान संभव नहीं है। तो इसमें पहला नाम आता है
एंटिन्यूडेट्रेसी का। जिन्होंने यह कहा कि आईडियोलॉजी का मतलब होता है साइंस ऑफ आइडियाज अर्थात विचारों का विज्ञान जो कि
एक विचार विज्ञान है। वहीं दूसरा नाम इसमें आता है मिशल फुको का जिन्होंने यह कहा कि आइडियोलॉजीस आर रिजीम्स ऑफ ट्रुथ
अर्थात विचारधाराएं सत्य का शासन होता है। वहीं अगला इसमें नाम आता है कार्ल मार्क्स का जिन्होंने यह कहा कि आइडियोलॉजी
डल्यूजन और मिस्ट्रीफिकेशन होती है। अर्थात भ्रम और रहस्य होता है। वहीं खास बात यह है कि कार्ल मार्क्स ने कहा कि ऑल
आइडियोलॉजी एक्सेप्ट मार्क्सिज्म आर ओपियम फॉर द पीपल। जिसका मतलब यह है कि मार्क्सवाद को छोड़कर दूसरी जितनी भी
आईडियोलॉजीस विचारधाराएं होती है वो लोगों के लिए एक अफीम की तरह हैं नशे की तरह हैं। वहीं अगला नाम आता है इनके परम मित्र
फ्रेडरिक एंजेल्स का जिन्होंने यह कहा कि आईडियोलॉजी फाल्स कॉन्शियसनेस होती है। मिथ्या चेतना होती है। वहीं अगला नाम
इसमें आता है एसएम ड्रकर का जिन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति द पॉलिटिकल यूज़ज़ ऑफ़ आइडियोलॉजी जो कि 1974 को पब्लिश होती है।
इसमें इन्होंने कहा कि आईडियोलॉजी इज द करेक्शन ऑफ आइडियाज अबाउट सोसाइटी। अर्थात विचारधारा समाज के बारे में विचारों का
सुधार है। वहीं अगला नाम इसमें आता है डेविड मैकलेन का जिन्होंने 1995 में कहा कि विचारधारा संपूर्ण सामाजिक विज्ञानों
में सबसे भ्रामक अवधारणा है। अर्थात आइडियोलॉजी इज द मोस्ट इल्यूसिव कांसेप्ट इन द होल ऑफ द सोशल साइंसेस। वहीं सीबी
मैकफर्सन ने आईडियोलॉजी के बारे में कहा कि मैं विचारधारा को कमोबेश प्रकृति, समाजशास्त्र और इतिहास में मनुष्यों के
स्थान के बारे में विचारों का एक व्यवस्थित समूह मानता हूं जो राजनीतिक परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण संख्या में
लोगों की प्रतिबद्धता को प्रेरित कर सकता है। अब हम आईडियोलॉजी के बैकग्राउंड को अच्छे से समझ लेते हैं। तो इसमें पहला नाम
आता है एंटिनियो डीट्रेसी का जिन्होंने फ्रेंच रेवोल्यूशन के दौरान 1796 में आईडियोलॉजी टर्म को काइंड किया था और
इन्होंने आईडियोलॉजी के बारे में कहा था न्यू साइंस ऑफ आइडियाज खास बात यह भी है कि इन्होंने आईडियोलॉजी को क्वीन ऑफ द
साइंसेस के रूप में देखा। इन्होंने यह कहा कि आने वाले समय में जो विचारधारा है उसको क्वीन ऑफ द साइंसेस के रूप में जानी
जाएगी। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो प्रेसी है इनके आईडियोलॉजी के मीनिंग कुछ निम्नलिखित बातों के तहत निकाल सकते हैं।
जिनमें पहला यह है कि यह बोलते हैं कि आइडियोलॉजी साइंस ऑफ आइडियाज है। अर्थात विचारों का विज्ञान है। वहीं दूसरा पॉइंट
यह है कि इन्होंने बोला कि जो आइडियोलॉजी है वह वास्तविकता को समझने में यूज़फुल होती है। तीसरा पॉइंट यह है कि इन्होंने
कहा कि जो आइडियाज है वह सिस्टमैटिक स्टडी के लिए आवश्यक हैं। और इन्होंने कहा कि जो आईडियोलॉजी होती है यह प्रोग्राम ऑफ एक्शन
है। यानी कि जब भी कोई हम कार्यवाही करना चाहते हैं तो उसका यह कार्यक्रम सुनिश्चित करता है। डी ट्रेसी का यह मानना है कि
उन्होंने जो आईडियोलॉजी की जो एपिस्टेमोलॉजी है वह उन्होंने दार्शनिक जॉन लॉक और 18 बोनट डी कॉडिलिक का जो
एपिस्टेमोलॉजी है वहां से लिया जिनके लिए सभी मानव ज्ञान विचारों का ज्ञान था। दूसरी बड़ी बात यह है कि 19वीं सदी में जो
कार्ल मार्क्स है उनके लेखन में सबसे ज्यादा आईडियोलॉजी के ऊपर बल दिया गया। हालांकि इन्होंने आईडियोलॉजी को नेगेटिवली
कनोट किया। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि इटालियन पॉलिटिकल फिलॉसफर निकोलो मैक्यावली मॉडर्न आईडियोलॉजीस के परिक्षण
माने जाते हैं। अग्रदूत माने जाते हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि मैक्यावली ने ही सबसे पहले जो आईडियोलॉजी है उसको टेरर से
जोड़ा। और खास बात यह भी है कि जो 17th सेंचुरी इंग्लैंड है वहां पर सबसे ज्यादाेंस आइडियोलॉजी को दी गई। अर्थात
आईडियोलॉजी का अच्छा खासा इतिहास रहा। जहां पर लॉक की टू ट्रीटीज ऑफ गवर्नमेंट जो कि 1690 को पब्लिश होती है। उसमें
इन्होंने लिबरलिज्म की फाउंडेशन रखी। जहां पर इन्होंने जो टिरनी है उसके खिलाफ जो इंडिविजुअल राइट्स है उनको प्रायोरिटी दी।
अब हम आईडियोलॉजी के ऊपर डिफरेंट-डिफरेंट व्यूज को अच्छे से समझ लेते हैं। तो पहला व्यू आता है मार्क्सिस्ट व्यूज ऑन
आईडियोलॉजी। तो कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंजेल ने अपनी प्रसिद्ध कृति द जर्मन आईडियोलॉजी में कहा कि आइडियोलॉजी डल्यूजन
होती है, मिस्ट्रीफिकेशन होती है और आईडियोलॉजी लीड करती है फाल्स कॉन्शियसनेस को। खास बात यह भी है कि आइडियोलॉजी को
इन्होंने क्लास सिस्टम के साथ जोड़ के देखा। और दूसरी बड़ी बात यह भी है कि इन्होंने कहा कि आईडियोलॉजी पावर की
मैनिफेस्टेशन होती है। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि कार्ल मार्क्स ने कहा कि जैसे ही स्टेटलेस और क्लासलेस सोसाइटी की
स्थापना हो जाएगी तो जो आईडियोलॉजी है वह भी खत्म हो जाएगी। क्योंकि कम्युनिज्म में किसी भी तरह की आईडियोलॉजी नहीं होती है।
हालांकि कार्ल मार्क्स ने यह कहा था कि केवल मार्क्सिज्म ही एक बढ़िया आईडियोलॉजी है। बाकी जितनी भी आईडियोलॉजी है वह सारी
की सारी ओपीएम है लोगों के लिए। बलादमीर लेनिन ने अपनी प्रसिद्ध कृति व्हाट इज टू बी डन जो कि 1902 को पब्लिश होती है।
इसमें इन्होंने कहा कि जो प्रोिट्रेट क्लास के आइडियाज होते हैं वो सोशलिस्ट आइडिया और मार्क्सिस्ट आईडियोलॉजी के साथ
जुड़े होते हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इस तरह की जो धारणा लेनिन ने दी वह मार्क्स के लिए बिल्कुल भी सही नहीं थी।
और खास बात यह भी है कि लेनिन और बाद के जितने भी मार्क्सिस्ट रहे हैं इन्होंने कहा कि विचारधारा का मतलब होता है जो
विशेष सामाजिक वर्ग यानी कि पर्टिकुलर सोशल जो क्लास होती है उनके विचारों से होता है और यह ऐसे विचार होते हैं जो अपनी
वर्ग स्थिति की परवाह नहीं करते हैं और अपने इंटरेस्ट को आगे बढ़ाते हैं। लेनिन ने अपनी प्रसिद्ध कृति व्हाट इज टू बी डन
जो कि 1902 को पब्लिश होती है। इस कृति में इन्होंने कहा था कि आइडियोलॉजी इज अनडाउटेडली एन एक्सप्रेशन ऑफ क्लास
इंटरेस्ट। जिसका मतलब यह है कि विचारधारा निसंदेह वर्ग हित की अभिव्यक्ति होती है, आवाज होती है। एक तरफ जहां मार्क्स के लिए
आइडियोलॉजी मिथ है, वहीं दूसरी तरफ लेनिन के लिए आइडियोलॉजी बहुत आवश्यक है। क्योंकि इन्होंने कहा कि प्रोिट्रेट क्लास
के लिए भी आईडियोलॉजी होना बहुत जरूरी है। इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति व्हाट इज टू बी डन जो कि 1902 में पब्लिश होती है।
इसमें इस बात की वकालत की कि प्रोलिट्रेट क्लास के लिए भी कम्युनिस्ट आईडियोलॉजी का होना आवश्यक है। ठीक उसी तरह से जिस तरह
से वर्चुअ क्लास के पास कैपिटलिस्ट आईडियोलॉजी होती है। एंटोनियो ग्रामशी ने ही कार्ल मार्क्स के बाद आईडियोलॉजी की
मार्क्सिस्ट थ्योरी को सबसे ज्यादा प्रोपाउंड किया। इन्होंने यह कहा कि जो कैपिटलिस्ट क्लास सिस्टम होती है इसमें ना
केवल जो अनकल इकोनॉमिक और पॉलिटिकल पावर है उससे ही केवल पूंजीवादी जो वर्ग व्यवस्था है कायम रहती है बल्कि जो
वर्जुआजी थॉट्स होते हैं आइडियाज होते हैं और जो इनकी डॉक्ट्रिंस होती है उससे भी जो इनकी हैज़मनी होती है उससे कायम रहती है
जिसे इन्होंने वैचारिक आधिपत्य कहा यानी कि इन्होंने इसे आइडियोलॉजिकल हैज़ेमनी कहा। एंटोनियो ग्रमशी ने ही कार्ल मार्क्स
के बाद मार्क्सिस्ट थ्योरी ऑफ़ आईडियोलॉजी को अच्छे से डेवलप किया। इन्होंने यह कहा कि जो कैपिटलिस्ट क्लास सिस्टम होता है,
इसमें केवल जो अनकल इकोनॉमिक और पॉलिटिकल पावर होती है, इससे ही हैज़ेमनी कायम नहीं होती है। बल्कि जो वर्जुआजी क्लास होते
हैं, उनके आइडियाज और उनकी जो डॉक्ट्रिंस होती है, उससे भी जो हैज़ेमनी है, वह कायम रहती है। जिसे इन्होंने वैचारिक आधिपत्य
कहा यानी कि आइडियोलॉजिकल हैज़ेमनी कहा। ग्रामशी के आइडियोलॉजी के कांसेप्ट को हम तीन तरीके से समझ सकते हैं। पहला यह है कि
इन्होंने हैजेमनी की बात की। इन्होंने कहा कि जो शासक वर्ग है उसके द्वारा चुमास यानी कि जो लेबर क्लास होती है उसके ऊपर
हैजेमनी दबदबा अर्थात प्रभुत्व स्थापित किया जाता है। वहीं दूसरा पॉइंट यह है कि यह कहते हैं कि जो शासक वर्ग है इनकी
हैजेमनी का मुकाबला करने के लिए काउंटर हैज़ेमनी को भी क्रिएट करना पड़ेगा। और तीसरा कांसेप्ट इन्होंने यह दिया कि जो
आइडियोलॉजी होती है उसकी अंडरस्टैंडिंग होना बहुत जरूरी है। क्योंकि आइडियोलॉजी के द्वारा ही जो रूलिंग क्लास है वो मास
के ऊपर लेबर क्लास के ऊपर एक्सप्लइटेशन करती है। हैजेमनी स्थापित करती है। अतः जो आईडियोलॉजी है उसको अंडरस्टैंड करना बहुत
जरूरी है। हरबर्ट मार्क्यूजे जो कि एक जर्मन अमेरिकन फिलॉसोफर रहे हैं। इन्होंने आइडियोलॉजी को कहा टोटलरियन थ्योरी अर्थात
इन्होंने यह कहा कि जो विचारधारा है यह अधिनायकवादी सिद्धांत है। इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति जिसका टाइटल था वन
डायमेंशनल मैन जो कि 1964 को पब्लिश होती है। इसमें तर्क दिया कि एडवांस्ड इंडस्ट्रियल सोसाइटी हैज़ डेवलप्ड अ
टोटलिटेरियन कररेक्टर थ्रू द कैपेसिटी ऑफ़ इट्स आइडियोलॉजी टू मैनपुलेट थॉट एंड डिनाई एक्सप्रेशन टू अपोजिशनल ओब्यूज।
इसका मतलब यह है कि जो उन्नत औद्योगिक समाज है उसने विचारों में हेरफेर करने और विरोधी विचारों को अभिव्यक्ति से वंचित
करने की अपनी विचारधारा की क्षमता के माध्यम से एक अधिनायकवादी चरित्र विकसित किया है। अब हम आइडियोलॉजी के नॉन
मार्क्सिस्ट व्यू को अच्छे से समझ लेते हैं। तो इसके सबसे बड़े विचारक रहे हैं कार्ल मैनहम जो कि जर्मन सोशियोलॉजिस्ट
रहे हैं। खास बात यह है कि इन्होंने कार्ल मार्क्स की तरह इस बात को एक्सेप्ट किया कि लोगों के विचार उनकी सोशल सिचुएशंस के
अनुसार बदलते रहते हैं, आकार लेते हैं। हालांकि मार्क्स के विपरीत इन्होंने विचारधारा को इसके नकारात्मक प्रभाव से
मुक्त कराने का एफर्ट किया। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने अपनी अक्षय कृति आईडियोलॉजी एंड यूटोपिया में
विचारधाराओं के विचार प्रणालियों के रूप में चित्रित किया जो एक विशेष सामाजिक व्यवस्था की रक्षा के लिए काम करती है और
जो मोटे तौर पर इसके प्रमुख या शासक समूह के हितों को व्यक्त करती है। कार्ल मैनहम ने एक इंपॉर्टेंट कोट दी जिसमें इन्होंने
यह कहा कि आइडियोलॉजीस आर मेंटल फ़िक्शन यूज्ड टू कंसील द रियल नेचर ऑफ पर्टिकुलर सोसाइटी जिसका हिंदी में मतलब होता है कि
विचारधाराएं मानसिक कल्पनाएं होती है। जिनका उपयोग किसी विशेष समाज की वास्तविक प्रकृति को छिपाने के लिए किया जाता है।
इस तरह से कार्ल मैनहम के लिए आइडियोलॉजी का मतलब होता है इंटरेस्ट ऑफ द डोमिनेंट क्लास। जबकि यूटोपिया का मतलब होता है
इंटरेस्ट ऑफ द डिप्रेस्ड क्लास। अगले थिंकर का नाम आता है हन्ना आरेंट जो कि जर्मन अमेरिकन हिस्टोरियन और फिलॉसोफर रही
है। इन्होंने यह कहा कि जो आईडियोलॉजी है यह सोशल ऑर्डर का एक इंस्ट्रूमेंट होता है जिसके द्वारा कंपैलेंस और सबऑर्डिनेशन को
सुनिश्चित किया जाता है। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति द ओरिजंस ऑफ टोटलीटेरियनिज्म जो कि 1951
को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने कहा कि आइडियोलॉजी टोटलीज्म का इंस्ट्रूमेंट होता है। तो जब हम इनके टोटोिटेरियनिज्म को
समझते हैं तो इसमें दो रूप आते हैं। पहला फासिज्म और दूसरा स्टनिज्म। और वहीं इन्होंने यह भी कहा कि जो थर्ड वर्ल्ड है
यह कोई रियलिटी नहीं है बल्कि आइडियोलॉजी है जिसके तहत जो थर्ड वर्ल्ड कंट्रीज है उनको इनफीरियर समझा जाता है। हन्ना आरंट
और कार्ल पपर दोनों ने आइडियोलॉजी के बारे में कहा कि आइडियोलॉजी इज फाउंड इन टोटलिटेरियन सोसाइटीज। आइडियोलॉजी देयर
फॉर सब्स एज अ टूल ऑफ टोटलिटेरियनिज्म। जिसका मतलब यह है कि आरेंट और पॉपर दोनों ने ही विचारधारा के बारे में कहा कि यह
अधिनायकवादी समाज में पाई जाती है। अतः विचारधारा सर्वसत्तावाद के उपकरण के रूप में इंस्ट्रूमेंट के रूप में काम करती है।
एंथोनी गिडिस ने अपनी प्रसिद्ध कृति बिय्ड लेफ्ट एंड राइट जो कि 1994 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने इस बात का तर्क दिया
कि ग्लोबलाइजेशन के डेवलपमेंट से जो सोशियोलॉजिकल डेवलपमेंट है इसने जो लेफ्ट और राइट का कॉ कासेप्ट है उनके बीच जो
आईडियोलॉजिकल लड़ाई होती है आईडियोलॉजिकल ट्रेडिशंस होती है इसको खत्म कर दिया है और खास बात यह भी है कि इन्होंने यह कहा
कि आज की जो राजनीति है पॉलिटिक्स है वह लेफ्ट और राइट से आगे निकल गई है। इस प्रकार से इन्होंने लेफ्ट और राइट का जो
कांसेप्ट है इसको इन्होंने खत्म बताया एंड बताया अपनी प्रमुख कृति जिसका नाम है बिय्ड लेफ्ट एंड राइट। अब हम कंजर्वेटिव्स
के व्यू को आइडियोलॉजी के ऊपर समझते हैं। तो कंजर्वेटिव्स यह मानते हैं कि जो ट्रेडिशनली है वह आइडियोलॉजी एक
मैनिफेस्टेशन है एोगेंस ऑफ रैशनलिज्म का। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह कहते हैं कि जो आईडियोलॉजी हैं, यह एक ऐसी विस्तृत
प्रणालियां हैं जो खतरनाक और अविश्वसनीय हैं। यानी कि इनके ऊपर विश्वास नहीं किया जा सकता है। यह डेंजरस है क्योंकि इनका
वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता है और यह ऐसे सिद्धांत और लक्ष्य स्थापित करती है जो वास्तविक नहीं होते हैं जो व्यक्ति
को दमन की ओर ले जाती है और फिर जो लक्ष्य होते हैं उनको प्राप्त नहीं किया जा सकता है। और यह कहते हैं कि इस दृष्टि से जो
सोशलिज्म है और जो लिबरलिज्म है यह भी आइडियोलॉजिकल है। और खास बात यह है कि माइकल ऑक्शॉट ने अपनी प्रसिद्ध कृति जिसका
टाइटल है रैशनलिज्म इन पॉलिटिक्स जो कि 1962 को पब्लिश होती है। इस कृति में इन्होंने तर्क दिया कि आइडियोलॉजी एज एन
एब्स्ट्रैक्ट सिस्टम ऑफ़ थॉट सेट ऑफ़ आइडियाज व्हिच डिस्टोर्ट पॉलिटिकल रियलिटीज़। इसमें यह कहते हैं कि जो
विचारधारा है यह एक अमूर्त विचार प्रणाली है। अर्थात विचारों का एक ऐसा समूह है जो राजनीतिक वास्तविकताओं को विकृत करता है।
अर्थात जो पॉलिटिकल रियलिटीज होती है उसको खंडित करता है, कोलैप्स करता है, खत्म कर देता है। माइकल ऑक्शॉट ने अपनी प्रसिद्ध
कृति रैशनलिज्म इन पॉलिटिक्स में तर्क दिया कि इन पॉलिटिकल एक्टिविटी मैन सेल अ बाउंडलेस एंड बॉटमलेस सी। जिसका मतलब यह
है कि राजनीतिक गतिविधि में लोग एक असीम और अथाह समुद्र में यात्रा करते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि माइकल ऑकशॉट कह रहे हैं कि
विचारधारा एक हठधर्मिता के बराबर है अर्थात डॉग्मैटिज्म के बराबर है जो कि निश्चित या सिद्धांतवादी विश्वास है जो
वास्तविक दुनिया की जटिलताओं से अलग होता है। अब हम इस बात को डिस्कस कर लेते हैं कि फेमिनिस्ट थिंकर आइडियोलॉजी के बारे
में क्या सोचते हैं? तो जब हम बात करते हैं फेमिनिस्ट्स की खासतौर पे जो मार्क्सिस्ट फेमिनिस्ट रही हैं तो यह कहती
है कि जो आईडियोलॉजी है यह पेट्रियिकल सोसाइटी के लिए काम करती है और ऐसी सोसाइटी में जब महिलाओं का सबऑर्डिनेशन
होता है एक्सप्लइटेशन होता है तो उसको यह लेजिटमेट करता है। अर्थात जो आईडियोलॉजी है यह पुरुषों को ही फायदा देता है।
महिलाओं को तो उनके अधिकार छीनने में, उनकी सबऑर्डिनेशन में और एक्सप्लइटेशन में भूमिका निभाती है। इस तरह से जो
आईडियोलॉजी है इसका कैरेक्टर सेक्सिस्ट है अर्थात लिंगवादी है जो केवल पुरुषों को ही फायदा करता है। अब हम सबसे इंपॉर्टेंट
कांसेप्ट द एंड ऑफ आईडियोलॉजी जिसे हिंदी में विचारधारा का अंत कहा जाता है। इसको अच्छे से समझ लेते हैं। तो, यह जो
कांसेप्ट है, यह 1950 और 60 के दशक में एमर्ज होता है। जब 1960 में डेनियल बेल ने अपनी प्रसिद्ध कृति जिसका टाइटल था एंड ऑफ़
आईडियोलॉजी लिखी। इस कृति में इन्होंने तर्क दिया कि आफ्टर सेकंड वर्ल्ड वॉर पॉलिटिक्स इन द वेस्ट वाज़ कैरेक्टराइज्ड
बाय ब्रॉड एग्रीमेंट अमंग मेजर पॉलिटिकल पार्टीज एंड द एब्सेंस ऑफ़ आइडियोलॉजिकल डिवीज़ और डिबेट। जिसका मतलब यह है कि जो
सेकंड वर्ल्ड वॉर है उसके बाद जो वेस्टर्न कंट्रीज है वहां की जो पॉलिटिक्स है उसकी प्रमुख विशेषता ये रही कि वहां के जो
पॉलिटिकल पार्टीज है उनमें जो व्यापक सहमति होती है कंसेंसस होता है और जो वैचारिक विभाजन होता है यानी कि
आइडियोलॉजिकल डिवीजन होता है और जो डिबेट होती है वह खत्म हो गई थी। खास बात यह भी है कि डेनियल बेल ने अपनी इसी कृति में यह
कहा कि फासिज्म और जो कम्युनिज्म है इन दोनों ने अपनी जो क्रेडिबिलिटी है उसको लॉस्ट कर दिया है और बाकी के जो दल है
इन्होंने भी इस बात पर सहमति नहीं जताई है कि वह किस विचारधारा की पालना करें ताकि वे आर्थिक विकास को सुनिश्चित कर सके और
सबसे बड़ी बात यह भी है कि यह कहते हैं कि अर्थशास्त्र यानी कि जो इकोनॉमिक्स है वह बहुत इंपॉर्टेंट हो गया है राजनीति के
बजाय और इकोनॉमिक्स ने पॉलिटिक्स के ऊपर जीत अर्जित कर ली है। अब यह लोग सोचते हैं कि राजनीति से कैसे समृद्धि प्राप्त की
जाए। इस प्रकार से डेनियल बेल कहते हैं कि जो विचारधारा है वह अब रिलेवेंट नहीं रही। अर्थात अप्रासंगिक हो गई है। इररेिलेवेंट
हो गई है। एंड ऑफ आईडियोलॉजी के कुछ इंपॉर्टेंट सुपुटर भी रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है एसएम लिप्सट का। दूसरा
आता है रेमंड एरो का। तो एसएम लिपसेट की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है जिनमें पहला नाम आता है पॉलिटिकल मैन द सोशल
बेसिस ऑफ पॉलिटिक्स। दूसरी कृति रही है हुज हु इन डेमोक्रेसी। वहीं रेमंड एरो की प्रमुख कृति है द ओपियम ऑफ द
इंटेलेक्चुअल्स और दूसरी इनकी है डेमोक्रेसी एंड टोटलिटेरियनिज्म। दूसरा नाम आता है ऑगस्टाइन हिपो का।
इन्होंने एक इंपॉर्टेंट राइटिंग लिखी जिसका नाम है द सिटी ऑफ़ गॉड। और इसमें इन्होंने दो तरह की सिटीज में डिफरेंस
किया। पहली सिटी है सिटी ऑफ गॉड और दूसरी है अर्थली सिटी। तो इसको भी यूटोपियनिज्म से जोड़ के देखा जा सकता है। क्योंकि इनका
जो एनविज़ है वह भी पूरी तरह से प्लेटो से मिलताजुलता है। यानी कि जिस तरह से प्लेटो ने आइडियल स्टेट की बात की। उसी तरह से
इसमें ऑगस्टाइन हिपो ने भी सिटी ऑफ़ गॉड की बात की जो कि यूटोपियन या फिर काल्पनिक नजर आता है। अब बात कर लेते हैं कि
यूटोपियन सोशलिज्म क्या है? तो बेसिकली यूटोपियन जो सोशलिज्म है उसकी नींव थॉमस मुरे ने डाली थी जिनको कि फाउंडेशन ऑफ
यूटोपियन सोशलिज्म के रूप में देखा जाता है। तो इन्होंने 1516 ईस्वी में एक इंपॉर्टेंट राइटिंग लिखी जिसका नाम है
यूटोपिया जिसमें इन्होंने एक ऐसी सोसाइटी की स्थापना की या उसकी वकालत की जो कि यूटोपियन बेस्ड सोसाइटी थी और यह एक और से
फिक्शनल आइसलैंड सोसाइटी थी जिसमें इन्होंने एक काल्पनिक तौर पर इस बात की वकालत की कि वहां पर किस तरह का कल्चर
सोशल स्टेटस लोगों का रहन-सहन पाया जाता है और इन्होंने ही यूटोपिया शब्दावली को गाड़ा था और नोट करने वाली बात यह है कि
सेंट साइमन, रॉबर्ट ओबेन, चार्ल्स फुरियर को यूटोपियन सोशलिस्ट के रूप में जाना जाता है। और यूटोपियन सोशलिस्ट इनको कहा
है कार्ल मार्क्स ने। मार्क्स ने कहा कि इनके जो विचार है अर्थात साइमन, ओविन और फुरियर के जो विचार है वह साइंटिफिक नहीं
है। काल्पनिक है। क्योंकि इन्होंने सोशलिज्म से संबंधित यूटोपियन विचार दिए। ऐसे विचार दिए जो वैज्ञानिक नहीं है। इसी
वजह से कार्ल मार्क्स ने इनको यूटोपियन सोशलिस्ट कहा। अब हम एक-एक करके कार्ल मार्क्स, एंजेल्स, ट्रॉट्सकी, कॉर्स्की,
लेनिन, रोजा लग्जमबर्ग, स्टारलिन, एडवर्ड बर्नस्टिन, निकोस पोलंतजा, माउसडोंग जैसे अनेकों मार्क्सिस्ट विचारकों को पढ़ लेते
हैं। उनकी फिलॉसोफी, उनके वक्स, उनके कोर्ट्स को अच्छे से समझ लेते हैं। तो इनमें सबसे पहला नाम आता है कार्ल मार्क्स
का। कार्ल मार्क्स, जर्मन फिलॉसफर, इकोनॉमिस्ट, पॉलिटिकल थिंकर रहे हैं। इनको जाना जाता है फादर ऑफ द 20थ सेंचुरी
कम्युनिज्म और इनका जन्म 1818 को जर्मनी के ट्रायर नगर में हुआ था और इन्होंने कैपिटलिज्म को पूरी तरह से खंडित किया
यानी कि क्रिटिसिज्म किया कैपिटलिज्म का और इन्होंने 1842 में गायनुस जायरन नामक अखबार जो कि एक जर्मन अखबार था उसके यह
एडिटर बने। यानी कि संपादक का जिम्मा इन्होंने संभाला। और अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ कोर्ट्स की। पहला कोर्ट्स है
जिसमें यह कहते हैं कि विचारधाराएं झूठ होती है, मिथ होती है और यह कहते हैं कि संपत्ति जो है वह पूंजीवाद का आधार होता
है। आगे यह कहते हैं कि जो पूरा का पूरा इतिहास है वो क्लास स्ट्रगल का इतिहास रहा है। और एक इंपॉर्टेंट कोटेशन यह देते हैं
जिसमें यह कहते हैं कि आज तक जितने भी फिलॉसोफर्स रहे हैं, उन्होंने अलग-अलग तरीके से दुनिया को व्याख्यात किया है।
लेकिन अब मुद्दा है इसे चेंज करने का। यानी कि अब टाइम आ गया है कि इसे चेंज करना है। इस दुनिया को चेंज करना है।
परिवर्तन लाना है। अगली कोट यह देते हैं जिसमें यह कहते हैं कि जो रेवोल्यूशन होती है वह इनिडिस्पेंसिबल मिडवाइफ होती है
सोशल चेंज की। यानी कि इंपॉर्टेंट मेन माध्यम होता है सामाजिक परिवर्तन का। और अगली कोटेशन यह देते हैं जिसमें यह कहते
हैं कि राज्य कैपिटलिस्ट्स अर्थात पूंजीपतियों की एक एग्जीक्यूटिव कमेटी अर्थात कार्यकारी समिति होती है। और यह
कहते हैं कि राज्य एक माध्यम होता है शोषण का यानी कि एक शोषण का यंत्र होता है। और आगे एक कोटेशन मार्क्स देते हैं जिसमें
कहते हैं कि केवल लेबर ही एक ऐसा एलिमेंट है तत्व है जो समाज में वैल्यू्यूज को पैदा करता है। और इन्होंने लास्ट कोटेशन
दी है जिसमें ये कहते हैं कि आईडियोलॉजी रिप्रेजेंट करता है फाल्स कॉन्शियसनेस को। अर्थात यह मिथ्या चेतना को रिप्रेजेंट
करता है और दूसरी तरफ यह कहते हैं कि जो फैटिसिज्म ऑफ कमोडिटीज है वह रिप्रेजेंट करता है फाल्स सोशल रिलेशनशिप। तो नोट
करने वाली बात यह है कि जहां एक तरफ यह कहते हैं कि आईडियोलॉजी मिथ्या चेतना को बढ़ावा देता है। वहीं दूसरी तरफ यह कहते
हैं कि जो फैटिसिज्म है यानी कि अंधभक्ति वस्तुओं की जो अंधभक्ति है जिसे हम अंग्रेजी में कहते
हैं फैटिसिज्म ऑफ कमोडिटीज वह रिप्रेजेंट करता है। झूठे सामाजिक संबंधों को। कार्ल मार्क्स के सबसे प्रमुख नोशंस में पहला
नोशन आता है यंग मार्क्स। और यंग मार्क्स कार्ल मार्क्स के अर्लियर थॉट्स हैं जो कि इनकी प्रमुख कृति इकोनॉमिक एंड फिलॉसोफिक
मैनुस्क्रिप्ट ऑफ 1844 में पाए जाते हैं। इसमें इन्होंने बात की थी ह्यूमन फ्रीडम, एलिनेशन, फैटिसिज्म ऑफ कमोडिटीज कांसेप्ट
ऑफ प्रैक्टिस। तो इन्हीं जितने भी कांसेप्ट है इन्हीं सभी को यंग मार्क्स कहा जाता है। यानी कि इस कृति में जितने
भी ये विचार पाए गए हैं उसको सामूहिक रूप से यंग मार्क्स कहा गया है। इनका दूसरा नोशन आता है डायलेक्टिकल मटेरियलिज्म
जिसको कि हिस्टोरिकल मटेरियलिज्म भी कहा जाता है। तो ये दो शब्दों के मेल से बना है। डायलेक्टिकल प्लस मटेरियलिज्म।
डायलेक्टिकल वर्ड मार्क्स ने हगल से ग्रहण किया था। हालांकि डायलेक्टिकल वर्ड उनसे पहले भी अर्थात हेगल से पहले भी सॉक्रेट
और प्लेटो ने इसे यूज किया था। प्रयोग में लाया था। वहीं दूसरी तरफ मार्क्स ने मटेरियलिज्म शब्द को फायर वाहक से ग्रहण
किया था। तो इस तरह से डायलेक्टिकल मटेरियलिज्म दो शब्दों का एक मेल है जिसमें कार्ल मार्क्स कहते हैं कि जो
मटेरियलिज्म है यानी कि जो भौतिक वस्तुएं हैं वे ही सृष्टि का सार है। जब भौतिक वस्तुओं में या फिर मटेरियलिज्म में चेंज
आता है तो दुनिया में भी चेंज आता है। दूसरी तरफ हेगल कहते हैं कि आइडिया या फिर कॉन्शियसनेस ही सृष्टि का सार है। उन्हीं
की वजह से सृष्टि चलायमान होती है। तो इसको एक और उदाहरण के द्वारा हम अच्छे से समझ सकते हैं जो कि आपको इमेज में या फिर
डायग्राम के रूप में दिखाई दे रहा है। तो कार्ल मार्क्स बात करते हैं डइलेक्टिक मटेरियलिज्म की जिसमें यह बात करते हैं
थीसिस, एंटीथीसिस एंड सिंथेसिस की। तो मार्क्स ने माना है कि जो वर्जुआ क्लास है वो है थीसिस। और जो प्रोिट्रेट है वो है
एंटीथीसिस। क्यों है? क्योंकि सबसे पहले वर्जुआ क्लास एमर्ज होती है और अपने हितों की पूर्ति के लिए वह पूंजीवाद को बढ़ावा
देती है और जो छोटे-छोटे या फिर गरीब लोग हैं उनको एक्सप्लइट करती है। तो ऐसी स्थिति में जो प्रोिट्रेट क्लास है वो
एंटीथीसिस बन जाती है क्योंकि इन दोनों के बीच संघर्ष चलता है। जब डायलक्ट होता है, द्वंद होता है, तो उन दोनों के संघर्ष के
परिणाम स्वरूप एक सिंथेसिस निकलता है जिसको कि कार्ल मार्क्स ने कहा है कम्युनिज्म। यानी कि जब दोनों क्लासेस आपस
में टकराएंगी, लड़ाई होंगी, रेवोल्यूशन आएगी तो रेवोल्यूशन के परिणाम स्वरूप जो सिंथेसिस होगा वो होगा क्लासलेस एंड
स्टेटलेस सोसाइटी जिसे कार्ल मार्क्स ने कम्युनिज्म कहा है। कार्ल मार्क्स का अगला सिद्धांत या फिर अगला नोशन आता है नेगेशन
ऑफ द नेगेशन। जिसको कि हिंदी में कहा जाता है नकार का नकार और इसको प्रतिपादित इन्होंने किया था अपनी इंपॉर्टेंट कृति
दास कैपिटल में जिसमें इन्होंने बात की थी एवोल्यूशन ऑफ द प्राइवेट प्रॉपर्टी। कार्ल मार्क्स कहते हैं कि नेगेशन ऑफ द नेगेशन
का जो सिद्धांत है वो हमेशा से पाया जाता है क्योंकि इतिहास हमेशा से वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है जिसमें दो क्लासेस पाई
जाती है वर्जुआ एंड प्रोलिट्रेट। तो कार्ल मार्क्स कहते हैं कि सबसे पहले वर्जुआ रेवोल्यूशन आती है। जिसमें कि जो इलीट
क्लास के लोग हैं यानी कि कैपिटलिस्ट क्लास के लोग हैं वे संपत्ति की स्थापना कर देते हैं। कैपिटल प्राइवेट प्रॉपर्टी
स्टेट जैसे इंस्टिट्यूशन की स्थापना कर देते हैं और मजदूरों का शोषण करते हैं अपने फायदे के लिए अपने हितों की प्राप्ति
के लिए। लेकिन मार्क्स कहते हैं कि जैसे ही एक्सप्लइटेशन बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो जो प्रोडट क्लास के जो लोग हैं उनके
अंदर एक चेतना विकसित हो जाती है। क्लास कॉन्शियसनेस विकसित हो जाती है और दुनिया भर के जो मजदूर हैं वह इकट्ठे होकर प्रोडट
रेवोल्यूशन लाते हैं जिसके अंतर्गत यह कैपिटलिज्म, प्राइवेट प्रॉपर्टी और स्टेट जैसे इंस्टीट्यूशन को खत्म करके क्लासलेस
एंड स्टेटलेस सोसाइटी की स्थापना करते हैं। अर्थात कम्युनिज्म की स्थापना करते हैं। तो इस तरह से कार्ल मार्क्स कहते हैं
कि यह जो नेगेशन ऑफ द नेगेशन है यानी कि नकार का नकार सिद्धांत है वह पाया जाता है। क्योंकि दोनों ही जो क्लासेस है एक
दूसरे को नकारती है। एक दूसरे से संघर्ष करती है। अगला इनका नोशन है एलिनेशन और यह बहुत ही इंपॉर्टेंट नोशन है। इस नोशन को
इन्होंने अपनी प्रमुख कृति इकोनॉमिक एंड फिलॉसोफिक मैनुस्क्रिप्ट ऑफ 1844 में दिया है जिसमें इन्होंने चार प्रकार के
एलिनेशंस की बात की है। कार्ल मार्क्स कहते हैं कि मजदूरों का इतना ज्यादा शोषण होता है कि हर तरह से यानी कि चार प्रकार
से जो मजदूर है, लेबर है, वर्कर्स है वो अलग हो जाते हैं, पराए हो जाते हैं। तो पहले होते हैं लेबर से और वर्क से। क्यों
होते हैं? क्योंकि उनके पास अब जो है वह इतना टाइम नहीं होता है और वे सिर्फ लेबर से और वर्क से जुड़े रहते हैं और उसके
बावजूद भी लेबर का उन्हें कोई फल नहीं मिलता है। कोई मूल्य नहीं मिलता है। उनका जो सारा मूल्य है वह पूंजीपतियों को ही
मिल जाता है। दूसरा यह कहते हैं कि फैमिली एंड सोसाइटी। मार्क्स कहते हैं कि उनके पास इतना भी टाइम नहीं होता है कि फैमिली
के साथ रहे। समाज में रहे और तीसरा होता है नेचर से। मार्क्स कहते हैं कि नेचर के साथ रहने और उसके साथ समय व्यतीत करने का
भी उनके पास टाइम नहीं होता है। और मार्क्स कहते हैं कि लास्ट में खुद से भी जो वर्कर्स है वह अलग हो जाते हैं क्योंकि
खुद के लिए भी इनके पास टाइम नहीं होता है। मार्क्स का अगला नोशन है क्लासलेस एंड स्टेटलेस सोसाइटी जिसको कि कम्युनिज्म कहा
जाता है। मार्क्स के फिलॉसोफी का जो उद्देश्य था या फिर अल्टीमेट जो एम था वो कम्युनिज्म को स्थापित करना था। लेकिन
मार्क्स कहते हैं कि कम्युनिज्म की स्थापना सिर्फ और सिर्फ प्रोिट्रेट रेवोल्यूशन से ही की जा सकती है। कार्ल
मार्क्स ने अगला नोशन दिया है थ्योरी ऑफ़ क्लास स्ट्रगल जिसमें कार्ल मार्क्स कहते हैं कि इतिहास हमेशा से क्लास स्ट्रगल का
इतिहास रहा है जिसमें वर्जुआ और पॉलिट्रेट क्लास के बीच हमेशा से संघर्ष चला रहता है। अगला इनका नोशन है थ्योरी ऑफ सरप्लस
वैल्यू। तो कार्ल मार्क्स बेसिकली कहते हैं कि जो कैपिटलिस्ट क्लास है वह मजदूरों से एक्स्ट्रा काम करवाते हैं। एक्स्ट्रा
घंटे काम करवाते हैं और उसका जो वैल्यू है, मूल्य है, वह मजदूरों को दिया जाना चाहिए था। लेकिन वे मजदूरों को ना देकर,
वर्कर्स को ना देकर अपने जेब में रखते हैं। जिसको कि कार्ल मार्क्स ने थ्योरी ऑफ़ सरप्लस वैल्यू कहा है। अगला इनका नोशन है
क्लासिकल मार्क्सिज्म। तो, बेसिकली इसका जो कोर आईडिया है, वो है द मार्क्सिज्म ऑफ़ मार्क्सिज्म। यानी कि ये मार्क्स के जितने
भी विचार है, फिलॉसोफी है, उसी पर आधारित है। इसको ऑर्थोडॉक्स मार्क्सिज्म से भी जोड़कर देखा जा सकता है। हालांकि बाद में
लेनिन भी इससे जुड़े। तो बेसिकली अगर हम देखें तो क्लासिकल जो मार्क्सिज्म है वो कार्ल मार्क्स की जो दो प्रमुख कृतियां
हैं दास कैपिटल एंड कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो उन पर इन्होंने जितने भी विचार दिए, फिलॉसोफी दी, आइडियाज दी, उसको सामूहिक
रूप से क्लासिकल मार्क्सिज्म कहा जाता है। इनका अगला नोशन रहा है साइंटिफिक सोशलिज्म। इनकी जितनी भी विचारधारा है या
फिलॉसोफी है, दर्शन है, आईडिया है, उसको साइंटिफिक सोशलिज्म कहा जाता है। क्यों? क्योंकि मार्क्स ही ऐसे पहले फिलॉसोफर या
फिर विद्वान रहे हैं जिन्होंने यह पता लगाने की कोशिश की कि स्टेट क्यों एमर्ज होता है? स्टेट क्यों एक्सप्लइटेटिव
इंस्टीट्यूशन है? क्यों क्लास स्ट्रगल होता है? क्यों स्टेट को खत्म करना चाहिए? क्यों कैपिटलिज्म के इमरजेंस से इनक्वल या
फिर अनइक्वल जो सोसाइटी है इनकलिटी है वह बढ़ी। तो इस तरह से कार्ल मार्क्स ने इन सभी चीजों का एनालिसिस किया। इसी वजह से
इनका जो सोशलिज्म है उसको साइंटिफिक सोशलिज्म कहा जाता है। जबकि इनसे पहले का जो सोशलिज्म था उसको यूटोपियन सोशलिज्म
कहा जाता है। अगला इनका नोशन है फाल्स कॉन्शियसनेस। तो मार्क्स ने आइडियोलॉजीज़ यानी कि जितनी भी प्रकार की विचारधाराएं
होती है उनको मिथ्या चेतना कहा है। फाल्स कॉन्शसनेस कहा है। अगला इनका नोशन है क्लास कॉन्शियसनेस। तो मार्क्स कहते हैं
कि बेसिकली जब एक्सप्लॉयटेशन बहुत अधिक बढ़ जाता है तो दुनिया भर के जितने भी वर्कर्स हैं वे इकट्ठे हो जाते हैं।
यूनाइट हो जाते हैं। उनके अंदर एक जागरूकता आ जाती है और इस प्रकार से वे एक होकर एक क्रांति लाते हैं जिसे कि
प्रोिट्रेट रेवोल्यूशन कहा जाता है। जिसके बाद दुनिया भर में क्लासलेस एंड स्टेटलेस सोसाइटी की स्थापना की जाएगी और फिर
कम्युनिज्म की स्थापना की जाएगी और इसका प्रमुख उदाहरण हम 1917 की जो रशियन रेवोल्यूशन रही है उसको दे सकते हैं।
कार्ल मार्क्स की सभी राइटिंग्स को आपको क्रोनोलॉजिकल ऑर्डर में अच्छे से याद रखना है। इनकी पहली राइटिंग है फिलॉसोफिकल
मैनिफेस्टो ऑफ द हिस्टोरिकल स्कूल ऑफ लॉ 1842 में। दूसरी है क्रिटिक ऑफ हीगल्स फिलॉसोफी ऑफ़ राइट। अगली है ऑन द जस
क्वेश्चन। अगली है नोट्स ऑन जेएस मिल। अगली है इकोनॉमिक एंड फिलॉसोफिक मैनुस्क्रिप्ट्स ऑफ 1844। और अगली है द
होली फैमिली। नेक्स्ट है थीसिस ऑन फायर वार्क। अगली है जर्मन आईडियोलॉजी। अगली है द प्रॉपर्टी ऑफ़ फिलॉसोफी। और अगली है वेज़
लेबर एंड कैपिटल। और अगली है कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो जो कि इनकी बहुत ही इंपॉर्टेंट कृति है। और अगली राइटिंग है इनकी क्लास
स्ट्रगल इनफेंस। अगली है द 18थ ब्रूमेयर ऑफ लुईस नेपोलियन। और अगली है अ कंट्रीब्यूशन टू द क्रिटिक्स ऑफ लुईस
नेपोलियन। और अगली है ग्रैंड्री से। और अगली है राइटिंग्स ऑन द यूएस क्रिटिक ऑफ़ पॉलिटिकल इकोनमी। अगली है राइटिंग्स ऑन द
यूएस सिविल वॉर। और अगली है थ्योरीज़ ऑफ़ सरप्लस वैल्यूज़। और अगली है वैल्यू प्राइस एंड प्रॉफिट। नेक्स्ट है दास कैपिटल जो कि
तीन वॉल्यूम में पब्लिश हुई थी। 1867, 1885, 1894। यह भी इनकी अक्षय कृति है। और अगली है इनकी सिविल वॉर इन फ्रांस।
नेक्स्ट है क्रिटिक ऑफ द गोथा प्रोग्राम। और नेक्स्ट है नोट्स ऑन एडोल्फ बोगनर। तो यह जितनी भी इनकी राइटिंग्स है आप सभी को
इन सभी राइटिंग्स को क्रोनोलॉजिकल ऑर्डर्स में अच्छे से याद करना है। दूसरे की मार्क्सिस्ट थिंकर आते हैं फ्रेडरिक
एंजेल्स और फ्रेडरिक एंजेल्स जर्मन फिलॉसफर कम्युनिस्ट सोशल साइंटिस्ट रहे हैं। जो कि कार्ल मार्क्स के एक लंगोटिया
यार अर्थात बेस्ट फ्रेंड रहे हैं। और इनको जाना जाता है फाउंडर ऑफ द सोशियोलॉजिकल फेमिनिज्म।
और इनके कुछ इंपॉर्टेंट आइडियाज हैं। जैसे एलिनेशन एंड एक्सप्लइटेशन ऑफ द वर्कर्स। दूसरा आईडिया है हिस्टोरिकल मटेरियलिज्म।
तो जो विचार कार्ल मार्क्स के एलिनेशन के ऊपर, एक्सप्लइटेशन के ऊपर, हिस्टोरिकल मटेरियलिज्म के ऊपर है, वही विचार इनके भी
है। क्योंकि इन दोनों दोस्तों ने मिलकर ही एलिनेशन, हिस्टोरिकल मटेरियलिज्म, एक्सप्लॉयटेशन से संबंधित विचार दिए थे।
इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग्स हैं। जैसे द कंडीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड। दूसरी है प्रिंसिपल ऑफ कम्युनिज्म। अगली
है द पीजेंट्स बोर इन जर्मनी। अगली है सोशलिज्म यूटोपियन एंड साइंटिफिक। अगली है द ओरिजिन ऑफ फैमिली प्राइवेट प्रॉपर्टी
एंड द स्टेट जो कि 1884 में इन्होंने लिखी। और यह इनकी बहुत ही इंपॉर्टेंट कृति मानी जाती है। एटलीस्ट इस राइटिंग को आपने
अच्छे से याद रखना। और इनकी कुछ ऐसी राइटिंग्स है जो इन्होंने मार्क्स के साथ मिलकर लिखी थी। और यह
राइटिंग्स बहुत ही इंपॉर्टेंट है। एग्जाम में कई बार पूछी गई है। तो यह राइटिंग्स है द होली फैमिली 1845, द जर्मन
आईडियोलॉजी 1845, द कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो 1848। तो ये तीनों राइटिंग्स को आपने अच्छे से याद रखना है। क्यों? क्योंकि
एंजेल्स ने कार्ल मार्क्स के साथ ही यह राइटिंग्स मिलकर लिखी थी। ट्रॉ्सकी यूक्रेनियन रशियन मार्क्सिस्ट
रेवोल्यूशनरी और थरिस्ट रहे हैं। जिन्होंने रशियन रेवोल्यूशन के दौरान लेनिन के साथ फोर्सेस को भी ज्वॉइ किया
था। हालांकि लेनिन की डेथ के बाद इनको स्टालिन के द्वारा कत्ल कर दिया गया, मार दिया गया और इन्होंने वर्कर्स का जो
इंटरनेशनलिज्म है उसके ऊपर फोकस किया और यह स्टालिन विरोधी भी रहे हैं। स्टालिन और स्टालिन की नीतियों का भी इन्होंने विरोध
किया था और नोट करने वाली बात यह है कि इन्होंने जो मार्क्सिज्म है, मार्क्स के विचार है, फिलॉसोफी है, इसको आगे बढ़ाया।
हालांकि इन्होंने इसमें कुछ नयापन लाया, नए तरीके से व्याख्या किया जिसको कि ट्रोट्सकीज्म भी कहा जाता है। अब हम बात
कर लेते हैं इनके नोशन की। तो इनका पहला नोशन है डस्टबिन ऑफ हिस्ट्री जिसको कि ऐश हिप ऑफ हिस्ट्री भी कहा जाता है। तो इसमें
बेसिकली यूज़ किया जाता है या फिर जो डस्टबिन ऑफ हिस्ट्री है इसको यूज़ किया जाता है जब
रशियन रेवोल्यूशन के दौरान बोलशविक और मैनशेविक की एक मीटिंग हो रही थी। तो उसमें जब मॉनशविक ने वक आउट किया मीटिंग
से उठकर चले गए तो उसमें ट्रोस्की ने कहा मॉनशविक को कि दैट्स राइट गेट आउट ऑफ हियर सही है यहां से निकल जाइए यू आर बर्थस तुम
बेकार हो गोयर यू बिलोंग नाउ तुम वहां जाइए जहां से तुम आते हो इनू द डस्टबिन ऑफ हिस्ट्री यानी कि कूड़ेदान के इतिहास में
जाइए जहां से तुम आते हो। तो इस फ्रेज को बेसिकली ट्रस्की ने यूज किया था जिसे कि डस्टबिन ऑफ हिस्ट्री या फिर ऐश हिप ऑफ
हिस्ट्री कहा जाता है। इसको गार्बेज हिप ऑफ हिस्ट्री और लैंडफ ऑफ हिस्ट्री के नाम से भी जाना जाता है। और पॉइंट शुड बी
नोटेड कि इसके बाद जो रोनाल्ड रिगन है उन्होंने भी इस शब्दावली को यूज़ किया था। जिसके अंतर्गत इन्होंने कहा था कि सोवियत
यूनियन लेनिज्म मार्क्सिज्म जो है वह ज्यादा लंबे समय तक नहीं टिकेगा। इसका कोलैप्स हो जाएगा। लोग इनको भुला देंगे।
और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इससे पहले भी ऐश हिप ऑफ हिस्ट्री जैसे शब्दों का यूज़ किया जा चुका है। 14 सेंचुरी में
पैट्राक जैसे विचारकों ने इसको यूज़ में लाया था जब वे रोम आए थे और रोम को इन्होंने रबिश हिप ऑफ़ हिस्ट्री के रूप में
बताया था या फिर देखा था। दूसरा इनका कांसेप्ट है परमानेंट रेवोल्यूशन जो कि बहुत ही इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है। इसमें यह
बात करते हैं कि जो भी बैकवर्ड कंट्रीज है उनके लिए जरूरी नहीं है कि उसी रास्ते से होकर अपना विकास करें जिस रास्ते से होकर
एडवांस कंट्री ने किया है। अलग-अलग कंट्रीज के अलग-अलग तरीके होते हैं। अलग-अलग उनका जो एक एनवायरनमेंट होता है,
उसी के हिसाब से उनको गुजरना चाहिए। और यह बात करते हैं कि रशिया में कोई जरूरत नहीं है कि इसी आधार पर यानी कि जो वर्जुआ
स्टेज ऑफ डेवलपमेंट है उसी के आधार पर रेवोल्यूशन लाएं। और इन्होंने कहा कि जो स्टालिन और स्टालिन के जो साथी है उनका जो
कांसेप्ट है सोशलिज्म इन वन कंट्री उसकी भी जरूरत नहीं है। क्योंकि इनका सपना था कि
वर्ल्ड कम्युनिज्म को बढ़ावा दिया जाए। यानी कि कम्युनिज्म को धीरे-धीरे पूरी दुनिया में स्थापित किया जाए। लेकिन उस
तरीके से नहीं जिस तरीके से स्टालिन ने स्थापित करना चाहा बल्कि धीरे-धीरे करके इसी को इन्होंने परमानेंट रेवोल्यूशन कहा।
ट्रोट्सकी ने कुछ इंपॉर्टेंट वक्स भी लिखे जैसे हिस्ट्री ऑफ द रशियन रेवोल्यूशन, द परमानेंट रेवोल्यूशन 1930, द रेवोल्यूशन
बेट्रियार्ड 1936, द ट्रांजिशनल प्रोग्राम फॉर सोशलिस्ट रेवोल्यूशन 1938। तो ये इनकी कुछ इंपॉर्टेंट की राइटिंग्स हैं। इनको
आपने अच्छे से याद रखना क्योंकि एग्जाम की दृष्टि से बहुत ही इंपॉर्टेंट है। अब हम बात कर लेते हैं लेनिन की। तो लेनिन रशियन
रेवोल्यूशनरी पॉलिटिशियन एंड पॉलिटिकल थ्यरिस्ट रहे हैं। और यह फॉर्मर जो सोवियत यूएसएसआर रहा है, सोवियत यूनियन रहा है,
उसके प्रीमियर यह रहे हैं। यानी कि राष्ट्रपति यह रहे हैं। और इनका जो जन्म है, वह रशिया में 1870 को होता है। 1924
में इनकी डेथ हो जाती है रशिया में। और सबसे बड़ी बात है कि इन्होंने फोकस किया था रूल ऑफ आईडियोलॉजी। जबकि मार्क्स ने
पूरी तरह से नेगलेक्ट किया था। तो यही मार्क्स और लेनिन में डिफरेंस भी आ जाता है। तो अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ
इंपॉर्टेंट कांसेप्ट्स की। तो पहला जो कांसेप्ट है वो है बैनगार्ड ऑफ द प्रोलिट्रेट। तो यह कहते हैं कि जो
प्रोलिट्रेट होते हैं यानी कि सर्वहारा जो वर्कर्स क्लास होती है उनको एक कवज की जरूरत होती है। और कवज कौन है? आइडियोलॉजी
है। क्योंकि जिस तरह से कैपिटलिस्ट क्लास के पास भी एक आईडियोलॉजी होती है, उसी तरह से जो प्रोलिट्रेट क्लास है, उनके पास भी
एक आईडियोलॉजी होनी चाहिए। दूसरा कांसेप्ट है इंपीरियलिज्म इज़ द लास्ट स्टेज ऑफ़ कैपिटलिज्म। जो इनकी एक राइटिंग भी रही
है। इसमें यह कहते हैं कि जो इंपीरियलिज्म होता है यानी कि साम्राज्यवाद होता है वह कैपिटलिज्म यानी कि पूंजीवाद का हाईएस्ट
स्टेज होता है। उच्च स्तर होता है। और अगला कांसेप्ट है डेमोक्रेटिक सेंट्रिसिज्म। यानी कि इन्होंने बात की थी
कि डेमोक्रेसी तो होनी चाहिए। लेकिन इन्होंने ऐसी डेमोक्रेसी की बात की थी जो सेंट्रलिज़्म हो। जहां पर सेंट्रलिज़्म हो।
यानी कि जहां पर जो सारी शक्तियां है, अथॉरिटी है, वो कम्युनिस्ट पार्टी के हाथों में केंद्रित हो। ऐसे लोकतंत्र की
इन्होंने बात की थी। अगला नोशन है सोशलिस्टिक प्रोग्राम। तो इन्होंने कई तरह के सोशलिस्टिक प्रोग्राम भी चलाए ताकि
समाजवाद को अधिक से अधिक बढ़ावा दिया जा सके। और इन्होंने बात की वन पार्टी कम्युनिस्ट स्टेट। इन्होंने कहा कि हर तरह
के जितने भी कम्युनिस्ट स्टेट है वहां पर एक ही पार्टी होगी यानी कि कम्युनिस्ट पार्टी होगी। उसी की ही अथॉरिटी होगी और
उसी की ही आईडियोलॉजी होगी जो कि प्रोिट्रेट क्लास यानी कि जो वर्कर्स हैं उनके हित के लिए काम करेगी। और अगला नोशन
है इनका बैनगार्ड ऑफ द प्रोफेशनल रेवोल्यूशन। तो इसमें यह बात करते हैं कि जो व्यवसाय क्रांतिकारी होते हैं उनको भी
जो है वह क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का मौका दिया जाना चाहिए। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे प्रोफेशनल
होते हैं। वे जहां क्रांति को लाने में मदद करते हैं, वहीं वे दूसरी तरफ लोगों को जागरूक करने में भी मदद करते हैं। अब हम
बात कर लेते हैं लेनिन के कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की। तो लेनिन का पहला वर्क है द डेवलपमेंट ऑफ कैपिटलिज्म। दूसरा है व्हाट
टू बी डन। तीसरा है वन स्टेप फॉरवर्ड टू स्टेप बैक। चौथा है टू टैिक्स ऑफ सोशल डेमोक्रेसी इन द रेवोल्यूशन। नेक्स्ट है
मटेरियलिज्म एंड इंपीरियो क्रिटिसिज्म। नेक्स्ट है द राइट ऑफ नेशंस टू सेल्फ डिस्क्रिमिनेशन। अगला है द अप्रैल थीसिस।
नेक्स्ट है द स्टेट एंड रेवोल्यूशन। नेक्स्ट है इंपीरियलिज्म इज़ द हाईएस्ट स्टेज ऑफ कैपिटलिज्म। और नेक्स्ट है लेफ्ट
विंग कम्युनिज्म एंड इनफेंटाइल डिसऑर्डर। अब हम बात कर लेते हैं लेनिन के कुछ कोड्स की। तो पहला कोड है विदाउट डाउट
आईडियोलॉजी इज़ द एक्सप्रेशन ऑफ़ क्लास इंटरेस्ट। तो यह कहते हैं कि बिना किसी शंका के जो विचारधारा होती है वो क्लास
इंटरेस्ट की एक्सप्रेशन होती है। अभिव्यक्ति होती है। अगली कोटेशन यह देते हैं कि इंपीरलिज्म इज द हाईएस्ट स्टेज ऑफ़
कैपिटलिज्म। अगली कोटेशन यह देते हैं कम्युनिस्ट आइडियोलॉजी इज़ वेरी एसेंशियल टू डू फाइट विद कैपिटलिस्ट आईडियोलॉजी। तो
ये कहते हैं कि जिस तरह से कैपिटलिस्ट क्लास के पास एक आईडियोलॉजी होती है उसी तरह से जो प्रोलिट्रेट क्लास है उनके पास
भी एक आईडियोलॉजी होनी चाहिए और उस आईडियोलॉजी को कहा जाता है कम्युनिस्ट आईडियोलॉजी और ये आईडियोलॉजी फाइट करेगी
कैपिटस्ट कैपिटलिस्ट आईडियोलॉजी के साथ। अगला इनका कोर्ट है इंपीरियलिज्म इज द एनिमी ऑफ़
सोशलिज्म। यह कहते हैं कि जो साम्राज्यवाद होता है वह समाजवाद का दुश्मन होता है। और सबसे इंपॉर्टेंट इंपॉर्टेंट जो नोशन इनका
रहा है वो है सोशलिज्म में इन्होंने कहा कि फ्रॉम ईच अकॉर्डिंग टू हिज एबिलिटी। यानी कि सोशलिज्म में सभी को उनकी योग्यता
के अनुसार और सभी को उनके काम के अनुसार मिलता है। परंतु जब कम्युनिज्म की हम बात करते हैं तो लेनिन कहते हैं कि सभी को
उनकी योग्यता के अनुसार मिलता है और सभी को उनकी नीड के अनुसार यानी कि जरूरत के हिसाब से मिलता है। तो यह डिफरेंस है
क्योंकि सोशलिज्म में मिलता है एबिलिटी और काम के अनुसार। लेकिन कम्युनिज्म में सभी को मिलता है एबिलिटी और जरूरत के हिसाब से
नीड के हिसाब से। कार्ल कॉस्की का जन्म होता है 1854 को जैक में। वहीं इनकी डेथ होती है 1938 को नीदरलैंड में। और यह जैक
ऑस्ट्रियन फिलॉसोफर रहे हैं। मार्क्सिस्ट थ्योरिस्ट रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि कार्ल मार्क्स और एंजेल्स की डेथ
होने के बाद इनको ऑर्थोडॉक्स कम्युनिज्म या फिर मार्क्सिज्म के मोस्ट अथोरेटिव थिंकर्स के रूप में जाना जाता है। अब हम
बात कर लेते हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स की। तो पहला है थॉमस मोरे एंड हिज इटोपिया। दूसरा है क्लास स्ट्रगल। तीसरा
है फॉर्च्यूंस ऑफ मॉडर्न सोशलिज्म। चौथा है द एग्रेरियन क्वेश्चंस। पांचवा है एथिक्स एंड द मटेरियलिस्ट कॉनसेप्शन ऑफ
हिस्ट्री। छठा है सोशलिज्म एंड कॉलोनियल पॉलिसी। अगला है फाउंडेशन ऑफ द क्रिश्चियनिटी। नेक्स्ट है द रो टू पावर।
नेक्स्ट इज टेररिज्म एंड कम्युनिज्म। और 10th है द लेबर रेवोल्यूशन। और 11थ है आर द जज और रेस। और 12 है सोशल डेमोक्रेसी
वर्सेस कम्युनिज्म। और 13 है द डिक्टेटरशिप ऑफ द प्रोलिट्रेट। तो, यह है इनके इंपॉर्टेंट वर्क्स। हो सके, तो इसको
क्रोनोलॉजिकल ऑर्डर में अच्छे से याद करना। अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट नोटेबल आइडियाज की। पहला है
इवोल्यूशनरी एपिस्टोमोलॉजी। इसमें यह बात करते हैं कि किस तरह से ह्यूमन बीइंग का इवोल्यूशन होता है।
मॉडर्नाइजेशन और कैपिटलिज्म का इमरजेंस होता है और किस तरह से समाज में नॉलेज की ग्रोथ होती है। वहीं दूसरा है सोशल
इंस्टिंक्ट। सोशल इंस्टिंक्ट में यह बात करते हैं कि किस तरह से मोरालिटी का इवोल्यूशन होता है। ह्यूमन बिहेवियर और
कल्चर का इवोल्यूशन होता है। वहीं एक इंपॉर्टेंट टर्म यह कॉइन करते हैं जिसका नाम है हाइपर रियलिज्म। इसको यह 1914 में
गढ़ते हैं। जिसमें यह बात करते हैं कि जो देश है इंटरनेशनल रिलेशन में या स्टेट्स है उनके बीच जो आर्थिक हित है उसके गेन
करने के लिए उसकी प्राप्ति के लिए उनके बीच होड़ लगेगी जो कि इंपीरियलिज्म का भी एक बाप होगा। मतलब हाइपर इंपीरियलिज्म
होगा जो कि बहुत ही खतरनाक होगा जो कि इंपीरलिज्म से भी उच्च कोटि का होगा। जिसको इन्होंने हाइपर इंपीरलिज्म कहा।
वहीं अगला इनका कांसेप्ट है कोलैप्स ऑफ कैपिटलिज्म। इन्होंने कहा कि जिस तेजी से कैपिटलिज्म बढ़ रहा है वो धीरे-धीरे खुद
ही कोलैप्स हो जाएगा उसका। यानी कि कैपिटलिज्म के कोलैप्स के लिए प्रोिट्रेट रेवोल्यूशन को लाने की जरूरत नहीं है।
अगला कांसेप्ट है क्लास कॉन्फ्लिक्ट। इन्होंने कहा कि क्लास में हमेशा से कॉन्फ्लिक्ट होते रहेंगे और उसी की वजह से
जो कैपिटलिज्म है उसका भी खंडन होगा। वहीं इनका एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा है फोकस ऑन पार्लियामेंट्री रोड टू सोशलिज्म। तो
इन्होंने कहा कि अगर सोशलिज्म को स्थापित करना है तो हमें पार्लियामेंट्री का जो रास्ता है यानी कि संसदीय रास्ता है
जिसमें लोकतंत्र, समानता, इक्वलिटी, न्याय जैसे तत्वों को अपनाना होगा और इन्होंने जो रेवोल्यूशनरी रोल टू सोशलिज्म रहा है,
जो मार्क्स का आईडिया रहा है, उसको पूरी तरह से इन्होंने रिजेक्ट किया। और अगला इनका कांसेप्ट रहा है कि जो डिक्टेटरशिप
ऑफ द प्रोिट्रेट है उसकी इन्होंने आलोचना की और इन्होंने सपोर्ट किया पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी क्योंकि इनकी
यह मान्यता रही है कि हम पार्लियामेंट्री जो रोड है यानी कि पार्लियामेंट्री जो तरीके हैं उसकी मदद से ही अगर हम सोशलिज्म
की स्थापना करेंगे तो वह अधिक लंबा चलेगा। रेवोल्यूशनरी सोशलिज्म अधिक लंबा नहीं चलेगा।
रोजा लग्जमबर्ग पॉलिश रेवोल्यूशनर थ्यरिस्ट रही है। पॉलिटिकल थ्योरिस्ट रही है और लिबेटेरियन मार्क्सिस्ट रही है। और
28 की उम्र में वे न्यूट्रलाइज जर्मन सिटीजन बन जाती है। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट आइडियाज रहे हैं। जैसे पहला है
क्रिटिसिज्म ऑफ एनी टाइप ऑफ नेशनलिज्म। ये कोई भी या किसी भी तरह का चाहे यूरोपियन हो चाहे नॉन यूरोपियन नेशनलिज्म हो उसका
ये पूरी तरह से खंडन करती है। वहीं इन्होंने बात की बिल ऑफ द पीपल और अगला इनका कांसेप्ट है जो बहुत ही इंपॉर्टेंट
है पिरामिड ऑफ़ पावर जिसमें यह बात करती है कि यूएसएसआर में जो ब्यूरोक्रेसी है वह अधिक से अधिक पावरफुल हो रही है। यानी कि
सारी शक्ति सारी अथॉरिटी यूएसएसआर में ब्यूरोक्रेसी के पास जा रही है। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स हैं। जैसे सोशल
रिफॉर्म्स एंड रेवोल्यूशन, द मास स्ट्राइक, द पॉलिटिकल पार्टी एंड द ट्रेड यूनियन। द एक्यूमुलेशन ऑफ कैपिटल बहुत ही
इंपॉर्टेंट राइटिंग है। अगली है द क्राइसिस इन द जर्मन सोशल डेमोक्रेसी। और अगली इंपॉर्टेंट राइटिंग है सोशलिज्म एंड
बारबेरिज्म जो कि 1916 में इन्होंने लिखी। इसमें यह बात करती है कि जो वर्जुआ सोसाइटी है वह अब बदल रही है। यानी कि
उसका ट्रांजिशन हो रहा है सोशलिज्म में। और दूसरी सबसे इंपॉर्टेंट राइटिंग इनकी है द लेटर्स ऑफ रोजा लग्जबर्ग जो कि बाद में
इनकी डेथ के बाद पब्लिश होती है 1978 में। माओ जेडोंग चाइनीस कम्युनिस्ट रेवोल्यूशनरी रहे हैं। फॉर्मर चेयरमैन ऑफ
द पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना रहे हैं। और नोट करने वाली बात यह है कि पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना जो कि 1949 में लाल
क्रांति के बाद बना था। उसके यह फाउंडिंग फादर रहे हैं। इन्होंने कुछ इंपॉर्टेंट कोटेशंस दी जिनमें पहली है यह कहते हैं कि
शक्ति बंदूक की नली से निकलती है। और दूसरी कोटेशन यह देते हैं बेसिकली एक इनका आईडिया रहा है। इनका स्लोगन रहा है जिसमें
यह कहते हैं कि हमें 3 साल के लिए हार्ड वर्क करना है। और अगर हम ऐसा करते हैं तो आने वाले जो 10,000 साल होंगे वह हमारी
खुशहाली के होंगे। और इन्होंने कहा कि रेवोल्यूशन कोई डिनर पार्टी नहीं होती है। इनके कुछ इंपॉर्टेंट आइडियाज रहे हैं।
जिनमें पहला है कल्चरल रेवोल्यूशन। कल्चरल रेवोल्यूशन बेसिकली चाइना में इन्होंने 1966 से लेके 1977 में शुरू की थी। यह एक
बेसिकली सोशियोपॉलिटिकल मूवमेंट था जिसे सामूहिक रूप में कल्चरल रेवोल्यूशन कहा गया। और इसका जो गोल था वो था प्रिजर्वेशन
ऑफ चाइनीस कम्युनिज्म। दूसरा इनका जो इंपॉर्टेंट कांसेप्ट रहा वो है लॉ ऑफ कंट्राडिक्शन। ये इन्होंने अपनी
इंपॉर्टेंट कृति ऑन कंट्राडिक्शन में दिया था जिसमें ये कहते हैं कि चाहे हमारी लाइफ हो या स्टेट में कोई घटना होती हो या
हमारी लाइफ से कोई जुड़ा हुआ इंसिडेंट होता है वो कंट्राडिक्शन का परिणाम होता है। उदाहरण के लिए अगर हम कम्युनिज्म की
बात करें तो कम्युनिज्म जो स्थापित हुआ वो तभी हुआ जब दो क्लासेस के बीच कंट्राडिक्शन हुआ। दो क्लासेस आपस में
संघर्ष करती रही। तो यह कहते हैं कि कोई भी घटना इंसिडेंट या फिर लाइफ कंट्राडिक्शन का परिणाम होता है। अगली
नोशन या फिर अगली आईडिया यह देते हैं डॉक्ट्रिन ऑफ़ पार्लियामेंट्री रेवोल्यूशन जिसमें यह बात करते हैं कि अगर हमें
सोशलिज्म को स्थापित करना है पूरी दुनिया में तो हमें पार्लियामेंट्री रेवोल्यूशन लानी होगी। यानी कि जो पार्लियामेंट्री
टूल्स मींस होते हैं उन्हें यूज़ में लाना होगा ना कि हमें जो ब्लडी रेवोल्यूशन होती है उसे हमें यूज करना होगा। जैसे कि कार्ल
मार्क्स ने बात की थी। अगला नोशन है इंटेलेक्चुअल लेबर जिसमें यह बात करते हैं कि हमें इंटेलेक्चुअल लेबर पे भी फोकस
करना होगा। अब हमें अगर चाइना को उठाना है, चाइना को एक महाशक्ति बनाना है, सुपर पावर बनाना है तो इंटेलेक्चुअल लेबर पर भी
फोकस करना होगा। यानी कि दिमाग से जो काम होता है, दिमाग का जो श्रम होता है, दिमाग से जो काम किया जाता है, उसको
इंटेलेक्चुअल लेबर कहा जाता है। और इनका अगला प्रोग्राम कह सकते हैं या फिर आईडिया कह सकते हैं लेट अ 100 फ्लावर्स प्लुसोम।
इसमें बेसिकली यह जो एक कैंपेन था या स्लोगन इन्होंने दिया जो 19 56 से लेके 57 तक रहा। इसमें बेसिकली इनका यह टारगेट था
कि जितने भी चाइना में इंटेलेक्चुअल्स है उनको इकट्ठा करना और डिबेट करवाना उनसे और क्रिटिक करना पॉलिटिकल सिस्टम की।
अब हम बात कर लेते हैं माओ के कुछ इंपॉर्टेंट वक्स की। तो इनमें पहला आता है पीपल्स वॉर 1928 में। बेसिकली यह जो
आधारित था वो था माओस्ट जो मिलिट्री स्ट्रेटजी है उस पर यह आधारित था। अगला है ऑन कंट्राडिक्शन 1937 और इसमें इन्होंने
लॉ ऑफ कंट्राडिक्शन का नियम दिया था जिसकी बात मैंने अभी की थी थोड़ी देर पहले और इनकी अगली राइटिंग रही है ऑन प्रैक्टिस
एंड कंट्राडिक्शन 1937 ऑन गोरिल्ला वॉरफेयर अगला है ऑन पीपल्स डेमोक्रेटिक रूल अगला है ऑन प्रैक्टिकल
वॉर और नेक्स्ट है न्यू डेमोक्रेसी 1967 और अगला है क्रिटिक ऑफ सोवियत इकोनमी 1967 एडवर्ड बर्नस्टीन का जन्म जन्म होता है
1850 को जर्मनी के बर्लिन में और उनकी डेथ होती है 1932 को बर्लिन में। यह प्रशियन जो कि अब जर्मनी कहा जाता है उसके
मार्क्सिस्ट फिलॉसोफर और पॉलिटिशियन रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि मार्क्स और एंजेल्स के यह काफी करीबी दोस्त रहे
हैं। और इन्होंने जो मार्क्स का नोशन है मटेरियलिस्टिक थ्योरी ऑफ़ हिस्ट्री उसको चेंज किया। इसी वजह से इनको रिवीजनिस्ट भी
कहा जाता है। तो इनके कुछ इंपॉर्टेंट आइडियाज रहे हैं जिनमें पहला आता है सोशल डेमोक्रेसी की। ये बात करते हैं सोशल
डेमोक्रेसी की। ये बोलते हैं कि अगर हमें सोशलिज्म को एस्टैब्लिश करना है तो सोशलिज्म को बढ़ावा देना है तो सोशल
डेमोक्रेसी को स्थापित करना होगा। यानी कि हमें डेमोक्रेटिक और सोशल के जो दोनों वैल्यूज़ होते हैं, नॉर्म्स होते हैं, उसको
स्थापित करना होगा। उसी वजह से हम सोशलिज्म को कायम कर सकते हैं ना कि रेवोल्यूशनरी तरीके से। और दूसरी यह बात
करते हैं रिवीजनिज्म की क्योंकि इन्होंने रिवीजन की मार्क्स का जो हिस्टोरिकल थ्योरी है या फिर मटेरियलिस्टिक थ्योरी ऑफ
हिस्ट्री है उसमें इन्होंने रिवीजन किया और अगला इनका इंपॉर्टेंट कांसेप्ट या फिर आईडिया है न्यू इंटरप्रिटेशन ऑफ
मार्क्सिज्म जीनोइज़्म यानी कि जो क्लासिकल मार्क्स रहा है जिनमें लेनिन और मार्क्स के जो विचारों का प्रभाव है एंजेल के
विचारों का प्रभाव है। दास कैपिटल और कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो पे जो उनके विचार है उसकी इन्होंने नई व्याख्या दी। इसी वजह
से इनको रिवीजनिस्ट थिंकर भी कहा जाता है मार्क्सिज्म का। अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की जिनमें
पहला इंपॉर्टेंट वर्क आता है इवोल्यूशनरी सोशलिज्म। तो ये रेवोल्यूशनरी सोशलिज्म की जगह यूज़ करते हैं इवोल्यूशनरी सोशलिज्म।
तो इनकी राइटिंग का पूरा नाम है इवोल्यूशनरी सोशलिज्म ऑफ क्रिटिसिज्म एंड अफ़मेशन जो कि 1898 में यह लिखते हैं।
इसमें बेसिकली यह बात करते हैं कि हिस्ट्री जो है वो दो क्लासेस की नहीं है। यह बोलते हैं कि जिस तरह से मार्क्स ने
वकालत की कि हिस्ट्री तो सिर्फ जो दो वर्गों के बीच क्लास स्ट्रगल रहा है उसकी ही उपज है। तो ये इस मान्यता को बिल्कुल
रिजेक्ट कर देते हैं और यह कहते हैं कि क्लास स्ट्रगल जो है वो लंबे समय तक जीवित नहीं रहेगा। इफेक्टिव नहीं रहेगा। क्यों?
क्योंकि जो मिडिल क्लास है, वह इंक्रीजिंग हो रही है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है। इसको अच्छे से याद रखना। और दूसरी बड़ी
बात यह है कि इस सेमिनल वर्क में यह बात करते हैं कि जो फोर्सिबल रेवोल्यूशन होती है यानी कि रेवोल्यूशनरी जो होता है,
रेवोल्यूशन जो होती है, जिसमें ब्लड होता है, उसका यह खंडन करते हैं और साथ में यह खंडन करते हैं डिक्टेटरशिप ऑफ द
प्रोलिट्रेट। और इन्होंने इसी में बात की सोशल डेमोक्रेसी की। और अगला इनका इंपॉर्टेंट वर्क है प्री कंडीशंस ऑफ द
सोशलिज्म। और नेक्स्ट वर्क है इनका क्रोम्बेल एंड कम्युनिज्म 1930 में। अब हम बात कर लेते हैं निकोस पोलंतजा की। तो
निकोस पोलंतजा का जन्म 1936 में हुआ था। ग्रीक के एथेंस में हुआ था और 1979 पेरिस में जो कि फ्रांस की राजधानी है डेथ
हुई थी। और यह ग्रीक फ्रेंच मार्क्सिस्ट पॉलिटिकल सोशियोलॉजिस्ट और फिलॉसोफर रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने
एक इंपॉर्टेंट आईडिया दिया जिसको कि द रिलेटिव ऑटोनोमी ऑफ द स्टेट कहा जाता है। जिसमें इन्होंने बात की कि जो राज्य है वह
स्वायत होना चाहिए। ऑटोनॉमस होना चाहिए। रूलिंग क्लास। यानी कि अब जो रूलिंग क्लास है उसी का बोलबाला उसी का वर्चस्व राज्य
पे नहीं होना चाहिए। बल्कि वो रूलिंग क्लास से ऑटोनॉमस होता है और होना चाहिए। और यह जो नोशन है यह आधारित है स्ट्रक्चरल
पोजीशन पर। इन्होंने जो है र्फ मिलवैंड का जो आईडिया है या मॉडल है इंस्ट्रूमेंटलिस्ट का उसको भी इन्होंने
पूरी तरह से इसमें क्रिटिसाइज किया। अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की। तो पहला वर्क है
पॉलिटिकल पावर एंड सोशल क्लासेस 1968 में। अगला है फासिज्म एंड डिक्टेटरशिप। द थर्ड इंटरनेशनल
एंड द प्रॉब्लम ऑफ़ फासिज्म। अगला है क्लास इन कंटेंपरेरी कैपिटलिज्म। और अगला है द क्राइसिस ऑफ डिक्टेटरशिप। अगला है स्टेट
पावर एंड सोशलिज्म। कोलांतजा एक इंपॉर्टेंट आइडिया या फिर नोशन देते हैं जिसे कहा जाता है रिलेटिव
ऑटोनोमी ऑफ द स्टेट फ्रॉम द कैपिटलिस्ट क्लास। इसके अंतर्गत यह कहते हैं कि जो राज्य होता है, वह सापेक्षता स्वायत होता
है कैपिटलिस्ट क्लास से। यानी कि राज्य एक उपकरण या फिर इंस्ट्रूमेंट नहीं होता है कैपिटलिस्ट क्लास का। और इसी आधार पे
जितने भी इंस्ट्रूमेंटलिस्टिक मार्क्सिस्ट रहे हैं जैसे र्फ मिलीबैंड है उनको ये पूरी तरह से क्रिटिसाइज करते हैं। क्योंकि
र्ल्फ मिलीबैंड ने अपनी प्रसिद्ध कृति द स्टेट इन कैपिटलिस्ट डेमोक्रेसी में यह कहा था कि जो राज्य होता है वह कैपिटलिस्ट
एंटिटी होती है। यानी कि जो कैपिटलिस्ट क्लास है उनके हाथों में एक इकाई या फिर उपकरण के रूप में होती है जो कि
कैपिटलिस्ट मोड ऑफ प्रोडक्शन को बढ़ावा देता है और जो वर्कर्स होते हैं उनका शोषण करता है। लेकिन इस मान्यता को पूरी तरह से
निकोस पोंदजा ने खंडित किया जिसे कि द रिलेटिव ऑटोनोमी ऑफ द स्टेट फ्रॉम द कैपिटलिस्ट क्लास कहा जाता है। यह
कांसेप्ट एग्जाम की दृष्टि से बहुत इंपॉर्टेंट है। इसीलिए इसको अच्छे से याद रखना। स्टालिन का जन्म होता है 1878 को
जॉर्जिया गोरी में। वहीं इनकी डेथ होती है 1953 को कुंचतेवा ढक्का में और यह जॉर्जियन रेवोल्यूशनरी रहे हैं। सोवियत
पॉलिटिशियन रहे हैं। जिन्होंने सोवियत यूनियन को 1925 से लेकर 1953 तक रूल किया। वहीं यह कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल
सेक्रेटरी के रूप में भी रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि यह सोवियत यूनियन के प्रीमायर भी रहे हैं। अब बात कर लेते हैं
इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की। तो इनका पहला वर्क है मार्क्सिज्म एंड द नेशनल क्वेश्चन। दूसरा है फाउंडेशंस ऑफ
लेनिनिज्म। अगला है द रोड टू पावर। अगला है डलेक्टिकल एंड हिस्टोरिकल मटेरियलिज्म। नेक्स्ट इज इकोनॉमिक प्रॉब्लम्स ऑफ
सोशलिज्म इन द यूएसएसआर। अब हम बात कर लेते हैं जॉर्ज प्लेनोब की। जॉर्ज प्लेनोब का जन्म रशिया में होता है 1856 में। इनकी
डेथ भी 1918 को रशिया में ही होती है और यह रशियन रेवोल्यूशनरी रहे हैं और यह फिलॉसोफर मार्क्सिस्ट एंड थ्यरिटिशियन रहे
हैं। अगर हम बात करें तो यह फाउंडर रहे हैं सोशियो डेमोक्रेटिक मूवमेंट जो कि रशिया में हुआ था और सबसे इंपॉर्टेंट बात
यह है कि यह ऐसे पहले व्यक्ति रहे हैं जिन्होंने रशिया के पहले मार्क्सिस्ट के रूप में खुद को आइडेंटिफाइड किया था। अब
हम बात कर लेते हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की। तो पहला वर्क है एनार्किज्म एंड सोशलिज्म। दूसरा है द वर्चुअल
रेवोल्यूशन। अगला है द डेवलपमेंट ऑफ द मोनिस्ट व्यू ऑफ हिस्ट्री। अगला है द रोल ऑफ इंडिविजुअल इन हिस्ट्री। नेक्स्ट इज़
यूथोपियन सोशलिज्म ऑफ द 19 सेंचुरी। और नेक्स्ट इज़ द मटेरियलिस्ट कांसेप्ट ऑफ हिस्ट्री। क्लासिकल लिबरलिज्म के प्रमुख
थिंकर आते हैं। जिनको हम एक-एक करके डिस्कस करेंगे। इनमें पहला नाम आता है जॉन लॉक का। दूसरा आता है एडम स्मिथ का। तीसरा
आता है डेविड रिकार्डो का। चौथा नाम आता है हरबर्ट स्पेंसर का। पांचवा नाम आता है थॉमस पेन का। छठा नाम आता है थॉमस जेफरसन
का। सातवां नाम आता है जर्मी बेंथम का। आठवां नाम आता है रिचर्ड कॉबिन का। नाइंथ नेम आता है जॉन ब्राइट का और 10वां नाम
आता है इमैनुअल कांट का। क्लासिकल लिबरलिज्म में पहला नाम आता है जॉन लॉक का। तो जॉन लॉक इंग्लिश फिलॉसोफर रहे हैं।
जिनको कि एनलाइटनमेंट थिंकर के रूप में जाना जाता है। और खास बात यह है कि इनको फादर ऑफ लिबरलिज्म के रूप में जाना जाता
है। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने नेचुरल राइट्स का सिद्धांत दिया जिनमें इन्होंने लाइफ, लिबर्टी एंड प्रॉपर्टी तीन
प्रकार के नेचुरल राइट्स की बात की। और इनके कुछ वर्क रहे हैं जो आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं। आप इनको अच्छे से नोट
कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत ही जरूरी है। जॉन लॉक के कुछ इंपॉर्टेंट नोशंस भी रहे हैं जिनमें पहला नोशन आता है
अ ग्रेट सुपर ऑफ ग्लोरियस रेवोल्यूशन। 1688 को इंग्लैंड में ग्लोरियस रेवोल्यूशन की शुरुआत होती है जो कि बहुत ही ऐतिहासिक
रूप से चर्चित रेवोल्यूशन मानी जाती है क्योंकि इसी रेवोल्यूशन की वजह से इंग्लैंड में जो एब्सोल्यूट मोनार्की है
उसको अबोलिश किया जाता है और कॉन्स्टिट्यूशनल मोनार्की की स्थापना की जाती है और ऐसा माना जाता है कि इस
रेवोल्यूशन को लाने में ना केवल जॉन लॉ का हाथ था बल्कि उन्होंने इस रेवोल्यूशन को बड़ी मात्रा में सपोर्ट किया। इनका दूसरा
जो प्रमुख नोशन है, इसका नाम है फादर ऑफ लिबरलिज्म। क्योंकि जॉन लॉक को फादर ऑफ लिबरलिज्म के रूप में जाना जाता है। जैसा
कि प्रोफेसर वॉन ने स्पष्ट भी किया था कि लॉक इज द लीडर ऑफ इंडिविजुअलिस्ट। एवरीथिंग इन लॉक सिस्टम रिवोल्व्स अराउंड
द इंडिविजुअल। एवरीथिंग इज डिस्पोज्ड सो एस टू एनश्योर द सोवनिटी ऑफ द इंडिविजुअल। इसका मतलब यह है कि जो लॉक है वो
व्यक्तिवादियों के शिरोमणि है। लीडर ऑफ द इंडिविजुअलिस्ट है। और दूसरी बड़ी बात यह है कि लॉक का जो सिस्टम है वो सब कुछ
इंडिविजुअल के इर्द-गिर्द घूमता है। चारों तरफ घूमता है और इनका जो सिस्टम ऑफ थॉट है इस तरह से इसको स्थापित किया गया है कि
जिसमें इंडिविजुअल की जो सोवनिटी है उसको सुनिश्चित किया जा सके। सीबी मैकफर्सन ने अपनी प्रमुख कृति द पॉलिटिकल थ्योरी ऑफ़
पज़ेसिव इंडिविजुअलिज्म जो कि 1962 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने लिखा कि इंडीड लॉक वाज़ द फंडामेंटल सोर्स ऑफ
इंग्लिश लिबरलिज्म यानी कि वास्तव में लॉक अंग्रेजी उदारवाद का मूल स्त्रोत था। क्योंकि उन्हीं के बाद से जो अंग्रेज यानी
कि जो ब्रिटिश लिबरलिज्म है उसका जन्म होता है। उसका बर्थ होता है। जॉन लॉक का अगला कांसेप्ट आता है प्रॉपर्टी और लेबर
का कांसेप्ट। तो जब हम बात करते हैं इनके इस कांसेप्ट की तो इन्होंने कहा है कि जो इंडिविजुअल है उसको अपनी जो प्रॉपर्टी है
उसके ऊपर अनलिमिटेड राइट है और इन्होंने यह कहा कि अगर व्यक्ति अपने लेबर से या फिर अपनी कैपेबिलिटी से संपत्ति को अर्जित
करता है तो उसके ऊपर उसका अनलिमिटेड राइट है और स्टेट उस मामले में यानी कि जो उसकी संपत्ति है उसके ऊपर इंटरवीन नहीं कर सकता
है। उसके ऊपर कोई टैक्स नहीं लगा सकता है। उसकी संपत्ति को वह किसी को भी नहीं दे सकता है। और दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि
इसी वजह से जो सीवी मैकफर्सन है इन्होंने अपनी प्रमुख कृति द पॉलिटिकल थ्योरी ऑफ़ पज़ेसिव इंडिविजुअलिज्म में लॉक के बारे
में कहा कि लॉक पज़ेसिव इंडिविजुअलिस्ट रहे हैं। स्पोक्समैन ऑफ़ बर्जुआज़ डिक्टेटरशिप रहे हैं। और खास बात यह है कि जो
कैपिटलिस्ट स्पिरिट है इसको इन्होंने रिप्रेजेंट किया है। जॉन लॉक के कुछ अदर इंपॉर्टेंट नोशंस भी रहे हैं जिनकी वजह से
इनका जो लिबरलिज्म का कंसेप्ट है उसको हम और अधिक गहराई से समझ सकते हैं तो इनका पहला कांसेप्ट आता है लिमिटेड गवर्नमेंट
जॉन लॉक ऐसे थिंक कर रहे हैं जिन्होंने लिमिटेड गवर्नमेंट की बात की क्योंकि जो शासक वर्ग है उनके ऊपर भी कुछ चेकक्स और
कुछ रेस्ट्रिकशंस थी यानी कि राजा अपना शासन तभी चला सकते थे जब वे लोगों के हित में काम करें। दूसरा कांसेप्ट था राइट टू
कंसेंट और रेवोल्यूशन। इसका मतलब यह था कि एक ऐसी सरकार हो जो लोगों की सहमति पर बनी हो और अगर शासक लोगों के लिए काम ना करें।
उनके हित में काम ना करें तो लोग ऐसी स्थिति में जो रूलर हैं उसके विरुद्ध रेवोल्यूशन भी ला सकते हैं। और तीसरा आता
है एडवोकेसी टू वुमेन राइट्स। इसका मतलब यह है कि जॉन लॉक ने कहीं ना कहीं महिलाओं के अधिकारों की भी वकालत की। अगले
क्लासिकल लिबरलिस्ट थिंकर का नाम आता है थॉमस जेफरसन जो कि यूएस पॉलिटिशियन राइटर और नेचुरल राइट्स के बहुत बड़े एडवोकेटर
रहे हैं। खास बात यह है कि इन्होंने अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति के रूप में काम किया और जो अमेरिकन डिक्लेरेशन ऑफ
इंडिपेंडेंस है उस डॉक्यूमेंट के प्रिंसिपल ऑथर रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने लिमिटेड गवर्नमेंट और लेसर
अफेयर को सपोर्ट किया और इनका प्रमुख तर्क रहा कि वह सरकार सबसे अच्छी होती है जो कम से कम शासन करती है। खास बात यह है कि
इन्होंने तीन प्रकार के नेचुरल राइट्स की बात की जिसमें पहला आता है लाइफ, दूसरा आता है लिबर्टी और तीसरा इसमें आता है
पर्स्यूट ऑफ हैप्पीनेस। खास बात यह है कि इन्होंने लॉ की तरह राइट टू प्रॉपर्टी को नेचुरल राइट्स नहीं माना। जबकि इन्होंने
कहा कि जो पर्स्यूट ऑफ़ हैप्पीनेस होता है अर्थात प्रत्येक व्यक्ति का खुश रहना या फिर खुशी की तलाश करना ही व्यक्ति का
नेचुरल राइट्स होता है। अगले थिंकर का नाम आता है थॉमस पेन जो कि अमेरिकन पॉलिटिकल फिलॉसोफर, एक्टिविस्ट और पॉलिटिकल
थ्यरिस्ट रहे हैं। खास बात यह है कि इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कोट दिया जो कि क्लासिकल लिबरलिज्म का बेस या फिर कोर
माना जा सकता है। तो इन्होंने कहा था कि स्टेट इज अ नेसेसरी इवल। इसका मतलब यह है कि राज्य आवश्यक बुराई है। आवश्यक राज्य
इसलिए है क्योंकि राज्य कम से कम नाइट वॉचमैन के रूप में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। और इवल यानी कि बुराई इसलिए है
क्योंकि यह अनावश्यक रूप से जो इंडिविजुअल है उसके कार्यों में इंटरवेंशन करता है। उसके जो फ्रीडम है, लिबर्टी है, उसको कम
करता है, चेकक्स करता है। थॉमस पेन के कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जिनमें पहला वर्क आता है कॉमन सेंस। दूसरा आता है द
अमेरिकन क्राइसिस। तीसरा आता है द राइट्स ऑफ़ मैन। चौथा आता है द एज़ ऑफ़ रीजन। और पांचवा आता है एग्रेरियन जस्टिस। नेक्स्ट
थिंकर का नाम आता है एडम स्मिथ। एडम स्मिथ स्कॉटिश इकोनॉमिस्ट फिलॉसोफर रहे हैं। खास बात यह है कि इनको जाना जाता है पाइनियर
ऑफ पॉलिटिकल इकोनमी और स्कॉटिश एनलाइटनमेंट के यह प्रमुख व्यक्तित्व रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनको जाना
जाता है फादर ऑफ इकोनॉमिक्स एंड मार्केट इकोनॉमिक्स और इन्होंने एक प्रमुख आईडिया दिया जिसका नाम है इनविज़िबल हैंड। इनके
कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं जिनमें पहला आता है द इनविज़िबल हैंड। दूसरा आता है द थ्योरी ऑफ मोरल सेंटीमेंट्स और तीसरा आता
है द वेल्थ ऑफ नेशंस और चौथा आता है लेक्चर्स ऑन जरिसूडेंस। वहीं दूसरी तरफ डेविड रिकार्डो ब्रिटिश पॉलिटिकल
इकोनॉमिस्ट रहे हैं और इनको रिकॉग्नाइज्ड किया जाता है मोस्ट इन्फ्लुएंशियल क्लासिकल इकोनॉमिस्ट और इनके साथी रहे हैं
थॉमस माल्थस, एडम स्मिथ एंड जेम्स मिल। इनकी प्रमुख कृति रही है जिसका टाइटल है ऑन द प्रिंसिपल्स ऑफ पॉलिटिकल इकोनमी एंड
टैक्सेशन जो कि 1817 को पब्लिश होती है। अगले थिंकर का नाम आता है हरबर्ट स्पेंसर जो कि इंग्लिश पॉलीमैथ फिलॉसोफर
साइकोलॉजिस्ट बायोलॉजिस्ट, सोशियोलॉजिस्ट और एंथ्रोपोलॉजिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने थ्योरी ऑफ़ सोशल
इवोल्यूशन दी और जिसमें इन्होंने बात की सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट जिसको आप हिंदी में कहते हैं योग्यतम के जीवित रहना और खास
बात यह है कि इन्होंने अपने सबसे प्रमुख वर्क जिसका टाइटल है द मैन वर्सेस द स्टेट जो कि 1884 को पब्लिश होता है। इसमें
हरबर्ट स्पेंसर ने लेस फेयर का कांसेप्ट दिया और ऑर्गेनिक थ्योरी ऑफ़ द स्टेट की बात की। इनके कुछ इंपॉर्टेंट अन्य वक्स
रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है सोशल स्टैटिक्स और दूसरा नाम आता है द प्रिंसिपल ऑफ सोशियोलॉजी। इमैनुअल कांट
जर्मन फिलॉसोफर और एनलाइटनमेंट के प्रमुख थिंकर रहे हैं। खास बात यह है कि इन्होंने नोशन दिया परपेचुअल पीस का और डेमोक्रेटिक
पीस थ्योरी का जो कि इनकी अंतरराष्ट्रीय राजनीति और पॉलिटिकल साइंस में बहुत बड़ी देन मानी जाती है। दूसरी खास बात यह है कि
इन्होंने कांसेप्ट दिया मोरल फ्रीडम का यानी कि जो मोरालिटी है, जो नैतिकता है, इसको इन्होंने लिबर्टी फ्रीडम के साथ
जोड़ा। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है जिनमें पहला नाम आता है क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन दूसरा नाम आता है व्हाट इज
एनलाइटनमेंट और तीसरा नाम आता है परपेचुअल पीस और फिलॉसोफिकल स्केच जेरेमी बेंथम ब्रिटिश फिलॉसोफर रहे हैं लीगल रिफॉर्मर
रहे हैं जिनको जाना जाता है फाउंडर ऑफ यूटिलिटेरियनिज्म अर्थात उपयोगितावाद के संस्थापक के रूप में जाने जाते हैं। दूसरी
बड़ी बात यह है कि बेंथम ने मोरल एंड फिलॉसोफिकल सिस्टम को एस्टैब्लिश किया जो कि इस मान्यता पर आधारित था कि जो ह्यूमन
बीइंग्स होते हैं वे रैशनली सेल्फ इंटरेस्टेड क्रिएचर होते हैं। अर्थात अपने बारे में सब कुछ जानते हैं कि उनका हित
क्या होता है और खास बात यह है कि जो इंडिविजुअल है ये यूटिलिटी मैक्सिमाइजर होते हैं। यानी कि अपना अधिक से अधिक भला
चाहते हैं। अपने लिए ऐसी यूटिलिटी चाहते हैं जिससे उनकी सुखों में वृद्धि हो। खास बात यह है कि इन्होंने जो जनरल यूटिलिटी
है उस प्रिंसिपल को यूज किया और इन्होंने कांसेप्ट दिया द ग्रेटेस्ट हैप्पीनेस फॉर द ग्रेटेस्ट नंबर जिसमें इन्होंने यह कहा
कि जो लेस अफेयर इकोनॉमिक्स होती है और जो कॉन्स्टिट्यूशनल रिफॉर्म्स होते हैं और जो पॉलिटिकल डेमोक्रेसी होती है उसको
एस्टैब्लिश किया जाए ताकि बड़ी संख्या में जो लोग हैं उनको बड़ी मात्रा में खुशी प्राप्त हो। हैप्पीनेस प्राप्त हो। इनके
कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स भी रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है अ फ्रेगमेंट ऑन गवर्नमेंट और दूसरा नाम आता है एन इंट्रोडक्शन टू द
प्रिंसिपल्स ऑफ मोरल्स एंड लेजिसलेशन। अगले प्रमुख थिंकर का नाम आता है रिचर्ड कॉबडन जो कि ब्रिटिश रेडिकल पॉलिटिशियन और
लिबरल पॉलिटिशियन रहे हैं। इन्होंने भी लिबरलिज्म के डेवलपमेंट में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। खास बात यह है कि यह जाने
जाते हैं इनका जो रिसर्च रहा है डिफेंस ऑफ फ्री ट्रेड और पीस के ऊपर उसके लिए इनका प्रमुख वर्क है जिसका टाइटल रहा है हाउ
वॉर्स आर गॉट अप इन इंडिया द ओरिजिन ऑफ द बर्मीज वॉर वहीं लास्ट स्कॉलर का नाम आता है जॉन ब्राइट जो कि ब्रिटिश रेडिकल और
लिबरल स्टेट्समैन रहे हैं। खास बात यह है कि इन्होंने रिचर्ड कॉप्टन के साथ रिसर्च किया और इन्होंने फाउंड किया एंटी कॉर्न
लॉ लीग को। मॉडर्न लिबरलिज्म के कुछ इंपॉर्टेंट थिंकर्स रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है जेएस मिल का। दूसरा नाम इसमें
आता है टीएस ग्रीन का। तीसरा नाम आता है हेरोल्ड लॉस्की का। और चौथा नाम आता है जे ए हॉब्सन का। पांचवा नाम आता है एलटी हॉबस
का और छठा नाम आता है जॉन रोल्स का। मॉडर्न लिबरलिज्म में पहला नाम आता है जेएस मिल का। जेएस मिल ब्रिटिश फिलॉसोफर,
इकोनॉमिस्ट और पॉलिटिशियन रहे। खास बात यह है कि इनके जो आइडियाज है इनको जाना जाता है हार्ट ऑफ लिबरलिज्म। और ऐसा इसलिए है
क्योंकि इन्होंने जो क्लासिकल लिबरलिज्म है और जो मॉडर्न लिबरलिज्म है इसके बीच एक पुल का काम किया। एक ब्रिज का काम किया।
और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि मिल भी एक यूटिलिटेरियन थिंकर रहे हैं। और इन्होंने जेरमी बेंथम का जो
यूटिलिटेरियनिज्म है इसको रिवाइज किया। और सबसे बड़ी बात यह है जो याद रखने वाली बात है कि जेएस मिल ने इंडिविजुअल की जो
लिबर्टी है उसके ऊपर एक्सट्रीम फोकस किया और इन्होंने यह कहा कि जो इंडिविजुअल है उसे पूरी तरीके से स्वतंत्रता होनी चाहिए
और इन्होंने इस प्रकार से जो लिबर्टी है इसको नेगेटिव कनोटेशन दी। अब हम जेएसमिल के लिबर्टी के ऊपर क्या विचार रहे हैं?
इसको डिस्कस कर लेते हैं। तो जेएसमिल ने अपनी प्रमुख कृति ऑन लिबर्टी जो कि 1859 को पब्लिश होती है। इस कृति में लिबर्टी
के ऊपर अपने विचारों को अभिव्यक्त किया है। खास बात यह है कि इन्होंने अपने इस प्रमुख वर्क में कहा है कि अ पर्सन इज द
मास्टर ऑफ हिज ओन माइंड एंड बॉडी। जिसका मतलब यह है कि व्यक्ति स्वयं अपने मन और शरीर का स्वामी है। इसका मतलब यह है कि जो
इंडिविजुअल होता है उसका अपने मन और शरीर पर अपना अधिकार है। कोई भी दूसरा व्यक्ति उसका मन और उसका जो शरीर है उसके ऊपर
अधिकार नहीं कर सकता है। जॉन स्टथ मिल ने अपनी प्रमुख कृति ऑन लिबर्टी जो कि 1859 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने तीन
प्रकार की लिबर्टी की बात की जिसमें पहली आती है फ्रीडम ऑफ़ वर्क। दूसरी आती है फ्रीडम ऑफ़ थॉट एंड एक्सप्रेशन और तीसरी
आती है फ्रीडम ऑफ़ एसोसिएशन। तो जो फ्रीडम ऑफ़ वर्क है इसको इन्होंने दो भागों में बांटा है। जिनमें पहला आता है सेल्फ
रिलेटेड वर्क। ऐसे काम जिनको व्यक्ति अपनी मनमानी से कर सकता है जो उससे स्वयं से जुड़े हैं। और दूसरा आता है अदर रिलेटेड
वर्क्स जो कि हार्म प्रिंसिपल मिल इसमें बताते हैं। जिसका मतलब यह है कि कोई भी व्यक्ति ऐसे काम नहीं कर सकता है जो
दूसरों से जुड़े हुए हो। क्योंकि ऐसी स्थिति में दूसरों का नुकसान हो सकता है। दूसरों की जो फ्रीडम है, लिबर्टी है, उसका
हार्म हो सकता है, नुकसान हो सकता है। जेएसमिल ने अपनी प्रसिद्ध कृति ऑन लिबर्टी में एक प्रमुख कोर्ट को दिया जिसे अक्सर
एग्जाम में पूछा जाता है। यह कोर्ट यह है कि यह कहते हैं कि पुटिंग रेस्ट्रिकशंस ऑन द फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन ऑफ ह्यूमन बीइंग्स
इज लाइक द रबिंग द प्रेजेंट एंड फ्यूचर जनरेशन। जिसका मतलब यह है कि जो जेएसमिल है जो व्यक्ति की विचार और अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता है उसको बहुत अधिक मानते हैं और यह कहते हैं कि अगर किसी भी व्यक्ति की जो विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
होती है अगर उसके ऊपर रेस्ट्रिकशंस लगाई जाए, प्रतिबंध लगाया जाए तो इसका सीधा मतलब यह होता है कि जो वर्तमान और जो
भविष्य की हमारी जनरेशंस होती है, नस्लें होती है, उसको लूटने के समान है। जेएसमिल की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां भी रही है।
जिनमें पहला नाम आता है ऑन लिबर्टी का। दूसरा नाम आता है यूटिलिटेरियनिज्म का। तीसरा आता है कंसीडरेशंस ऑन
रिप्रेजेंटेटिव गवर्नमेंट। और चौथा आता है द सब्जेक्शन ऑफ वुमेन। मॉडर्न लिबरलिज्म के अगले प्रमुख थिंकर का नाम आता है टीएच
ग्रीन जो कि ब्रिटिश फिलॉसोफर, सोशल रिफॉर्मिस्ट और आइडियलिस्टिक थिंकर रहे हैं। इनके बारे में सबसे बड़ी इंपॉर्टेंट
बात यह है कि 1885 को इनका प्रमुख वर्क पब्लिश होता है। जिसका टाइटल था लेक्चर्स ऑन द प्रिंसिपल ऑफ़ पॉलिटिकल ऑब्लिगेशन
जिसमें इन्होंने तर्क दिया कि लिबर्टी एक सकारात्मक अवधारणा है और इसका मतलब होता है ऐसे कार्यों को करने या फिर ऐसी
फैसिलिटीज को उपभोग करने की स्वतंत्रता जो करने योग्य और भोगने योग्य होते हैं। इसका मतलब यह है कि टी एस ग्रीन कह रहे हैं कि
लिबर्टी बहुत अच्छी पॉजिटिव धारणा है जो कि हमें इस बात की स्वतंत्रता देती है कि अगर कोई काम करने योग्य है या फिर भोगने
योग्य है तो उसको अवश्य ही किया जाए और भोगा जाए। दूसरी सबसे प्रमुख बात यह है कि टीएच ग्रीन ने बड़ी शिद्दत से यानी कि
बड़े जोर से यह कहा कि जो राज्य होता है उसको कल्याणकारी कार्य करने चाहिए और उन्होंने तर्क भी दिया था कि द स्टेट
रिमूव्स द ऑब्सकल्स दैट कम इन द पाथ ऑफ द इंडिविजुअल। इसका मतलब यह है कि टीएच ग्रीन कह रहे हैं कि राज्य का प्रमुख काम
व्यक्ति के मार्ग में आने वाली बाधाओं को बाधित करना होता है। टी एच ग्रीन ने अपने प्रमुख वर्क लेक्चर्स ऑन द प्रिंसिपल ऑफ
पॉलिटिकल ऑब्लिगेशन में कॉमन गुड का कांसेप्ट दिया। तो कॉमन गुड को एक्सप्लेन करते हुए इन्होंने कहा था कि राज्य एक ऐसी
संस्था है जिसका प्रमुख उद्देश्य जो कॉमन गुड है उसको बढ़ावा देना है। अतः जो राज्य है वह वहीं तक कानून बना सकता है। लॉज़ बना
सकता है जहां तक कॉमन गुड को बढ़ावा मिले। उसको प्रोत्साहन मिले। दूसरी बड़ी बात यह है कि पीएस ग्रीन ने यह भी कहा कि कानून
की पालना कोई भी व्यक्ति वहीं तक कर सकता है जहां तक किसी भी व्यक्ति का जो कॉमन गुड होता है उसके अकॉर्डिंग हो उसके
अनुरूप हो और टीएस ग्रीन यह भी कहते हैं कि जो सामान्य हित की धारणा है वह मनुष्य को कहीं ना कहीं जो उसकी ऑब्लिगेशंस है जो
कर्तव्य है उसको करने की प्रेरणा देती है। ईएस ग्रीन की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है जिनमें पहला नाम आता है प्रोलेगमना टू
एथिक्स और दूसरा नाम आता है लेक्चर्स ऑन द प्रिंसिपल्स और पॉलिटिकल ऑब्लिगेशंस। अगले थिंकर का नाम आता है लॉस्की। तो लॉस्की
इंग्लिश पॉलिटिकल थ्यरिस्ट और इकोनॉमिस्ट रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो लिबरल थ्योरी है इसके डेवलपमेंट में
इन्होंने बहुत बड़ा योगदान दिया। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि लॉस्की ने क्राइसिस ऑफ कैपिटलिज्म की बात की। और खास
बात यह भी है कि लॉस्की ने वेलफेयर स्टेट की वकालत की और इन्होंने यह कहा कि जो स्टेट होता है वह कहीं ना कहीं मीन होता
है साधन होता है जिससे जो इंडिविजुअल होता है उसका डेवलपमेंट होता है। हेराल्ड लॉस्की ने अपनी प्रसिद्ध कृति अ ग्रामर ऑफ़
पॉलिटिक्स जो कि 1925 को पब्लिश होती है। इसमें स्टेट का गुणगान किया और इन्होंने यह कहा कि राज्य जो समाज रूपी मेहराब होती
है, उसकी बुनियाद होती है, उसकी फाउंडेशन होती है और ये कहते हैं कि राज्य को असंख्य लोगों की जो नियति होती है, किस्मत
होती है, उसके निर्माण का कार्य सौंपा गया है। स्टेट ही उन सभी लोगों के जीवन को आकार देता है, शेप देता है और उनमें एसेंस
भरता है। लॉस्की की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है। जिनमें पहला नाम आता है अथॉरिटी इन द मॉडर्न स्टेट। दूसरा नाम आता
है द फाउंडेशंस ऑफ सोवनिटी एंड अदर एस्स। तीसरा नाम आता है अ ग्रामर ऑफ़ पॉलिटिक्स जो कि बहुत इंपॉर्टेंट है। चौथा नाम आता
है लिबर्टी इन द मॉडर्न स्टेट। और पांचवा नाम आता है एन इंट्रोडक्शन टू पॉलिटिक्स। छठा नाम आता है द स्टेट इन थ्योरी एंड
प्रैक्टिस। और लास्ट नाम आता है द राइज़ ऑफ यूरोपियन लिबरलिज्म। अगले थिंकर का नाम आता है जे ए हॉबसन जो कि इंग्लिश
इकोनॉमिस्ट और सोशल साइंटिस्ट रहे हैं। खास बात यह है कि यह जुड़े हुए हैं लिबरल सोशलिज्म स्कूल के साथ और इससे भी
इंपॉर्टेंट बात यह है कि यह जाने जाते हैं अपनी इंपीरियलिज्म के ऊपर राइटिंग के लिए। जिसकी वजह से जो ब्लादमीर लेनिन है वह
काफी इन्फ्लुएंस्ड हुए थे। और खास बात यह भी है कि यह जाने जाते हैं अपनी थ्योरी ऑफ अंडर कंजमशन के लिए। और सबसे बड़ी बात यह
है कि जो इंपीरलिज्म की इनकी स्टडी है उसने कहीं ना कहीं हॉबसन को अंतरराष्ट्रीय ख्याति रेपुटेशन दिलाई और जिसकी वजह से
बहुत सारे नोटेबल थिंकर्स है वह इनसे इंस्पायर हुई। जिनके नाम है लेनिन लन ट्रोट्सकी और ह्ना आरंट। हन्ना आरंट ने द
ओरिजंस ऑफ टोटल टेररिनिज्म जो कि 1951 को पब्लिश होती है। इनसे इंस्पायर होकर ही लिखी थी। हॉबसन की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां
रही है। जिनमें पहला नाम आता है द इवोल्यूशन ऑफ मॉडर्न कैपिटलिज्म। दूसरा नाम आता है प्रॉब्लम्स ऑफ पॉवर्टी। तीसरा
नाम आता है द साइकोलॉजी ऑफ जिंगज़्म। चौथा नाम आता है इंपीरियलिज्म ऑफ स्टडी। और पांचवा नाम आता है द क्राइसिस ऑफ
लिबरलिज्म जो कि बहुत ही इंपॉर्टेंट कृति है इनकी। अगले इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम आता है एलटी हॉबस का जो कि इंग्लिश लिबरल
पॉलिटिकल थ्योरिस्ट और सोशियोलॉजिस्ट रहे हैं। खास बात यह है कि इन्होंने सोशल प्रोग्रेस को बढ़ावा देने के लिए
लिबरलिज्म और जो कलेक्टिविज्म है उसको रिकंसाइल करने की कोशिश की। अर्थात सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश की। और
सबसे प्रमुख बात यह है कि इन्होंने जो आईडिया है लेसफेयर का उसको रिजेक्ट किया क्योंकि इन्होंने कहा कि जो सर्टेन डिग्री
ऑफ़ यूनिवर्सल कोपरेशन है उसकी बहुत आवश्यकता है नेसेसरी है क्योंकि इसी से जो इंडिविजुअल होते हैं व्यक्ति होते हैं
उनकी जो पोटेंशियलिटीज है उसको फुलफिल किया जा सकता है। एलटी हॉबस की प्रमुख कृतियां रही है। जिनमें पहला नाम आता है द
थ्योरी ऑफ़ नॉलेज। दूसरा नाम आता है डेवलपमेंट एंड पर्पज। तीसरा नाम आता है द मेटाफिजिकल थ्योरी ऑफ द स्टेट। चौथा नाम
आता है द रैशन गुड। पांचवा नाम आता है द एलिमेंट्स ऑफ सोशल जस्टिस। छठा नाम आता है सोशल डेवलपमेंट। अगले मोस्ट इंपॉर्टेंट
स्कॉलर का नाम आता है जॉन र्स जो कि अमेरिकन पॉलिटिकल एथिकल फिलॉसोफर रहे हैं। और खास बात यह है कि यह जाने जाते हैं
इगैलिटेरियन जो लिबरलिज्म है उसके लिए जिसकी व्याख्या इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति और थ्योरी ऑफ़ जस्टिस में की जो कि
1971 को पब्लिश होती है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने फ़ेमसली कहा भी था कि ननंद द वॉर इज़ नॉट जस्ट वॉर। अर्थात कोई
भी युद्ध न्यायोचित नहीं होता है। क्योंकि किसी भी युद्ध से मानवता का नाश होता है। 1971 को जॉन र्स की एक प्रमुख कृति पब्लिश
होती है। जिसका टाइटल था अ थ्योरी ऑफ़ जस्टिस। इस कृति में इन्होंने जस्टिस एज फेयरनेस की बात की। जिसका मतलब यह है कि
जो न्याय यानी कि जस्टिस का जो प्रोसेस है वो सही होना चाहिए, निष्पक्ष होना चाहिए। अब हम जॉन र्स के पॉलिटिकल लिबरलिज्म के
कांसेप्ट को अच्छे से समझ लेते हैं। तो 1993 को जॉन र्स की प्रमुख कृति पॉलिटिकल लिबरलिज्म पब्लिश होती है। इस कृति में
इन्होंने पॉलिटिकल कांसेप्ट और जो वेल ऑर्डर्ड सोसाइटी है उसकी अवधारणा दी। उसको प्रतिपादित किया और दूसरी बड़ी बात यह है
कि इन्होंने पॉलिटिकल कांसेप्ट ऑफ जस्टिस को इस कृति में प्रोपाउंड किया। जॉन र्स ने एक इंपॉर्टेंट कोट दी जिसके अंतर्गत
इन्होंने यह कहा था कि द राइट इज प्रायर टू द गुड और द सेल्फ इज द प्रायर टू इट्स एंड जिसका मतलब यह है कि जो अधिकार होता
है वह गुड से पहले आता है। शुभ से पहले आता है और या इसका दूसरा मतलब यह भी है कि जो आत्मन है यानी कि जो सेल्फ है जो
व्यक्ति खुद है वह साध्य से पहले आता है। जॉन रोल्स के मेजर वक्स रहे हैं। जिनमें पहला आता है अ थ्योरी ऑफ़ जस्टिस जो कि
इनका सबसे इंपॉर्टेंट वर्क है। दूसरा आता है जस्टिस एज फेयरनेस। तीसरा आता है पॉलिटिकल लिबरलिज्म जो कि बहुत ही
इंपॉर्टेंट है। चौथा आता है द लॉ ऑफ पीपल जो कि बहुत ही इंपॉर्टेंट है। पांचवा आता है लेक्चर्स ऑन द हिस्ट्री ऑफ़ मोरल
फिलॉसोफी। और छठा आता है जस्टिस एज फेयरनेस और ईस्टमेंट। थर्ड प्रकार का लिबरलिज्म आता है नियोलिबर जो कि मिड 20थ
सेंचुरी में शुरू हुआ। खास बात यह है कि इसे जाना जाता है लिबर्टेरियनिज्म अर्थात इसे स्वेच्छा तंत्रवाद के रूप में जाना
जाता है और यह जो टर्म है नियोलिबर इसको ओरिजिनली कॉइ किया गया था 1938 को जर्मन स्कॉलर एलेग्जेंडर रुस्तोब के द्वारा। और
सबसे बड़ी बात यह है कि हायक को जाना जाता है फादर ऑफ न्यूलिबरलिज्म जिन्होंने 1944 को एक इंपॉर्टेंट बुक लिखी थी जिसका टाइटल
था रोड टू सर्फडम और खास बात यह भी है कि जो नियोलिबरलिज्म है यह एक्चुअली 1970 में डेवलप हुई थी और सबसे बड़ी बात यह है कि अ
ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ नियोलिबरलिज्म कृति 2005 में डेविड हार्वे के द्वारा लिखी गई और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि जो न्यू
लिबरल है इसका प्रमुख गोल है रोल बैक द फ्रंटियर ऑफ द स्टेट जिसका मतलब यह है कि जो राज्य हैं उसकी सीमाओं को पीछे ले जाना
है। यानी कि राज्य की कोई अब ज्यादा इतनीेंस नहीं है। उसके इतने ज्यादा काम नहीं है। क्योंकि इसकी यह मान्यता रही है
कि अगर स्टेट जो कैपिटलिज्म है और जो मार्केट कैपिटलिज्म है उसमें इंटरवेंशन नहीं करेगा तो ऐसी स्थिति में एफिशिएंसी
आएगी, डेवलपमेंट होगा और ग्रोथ होगी। इससे पहले कि हम नियोलिबर को डिटेल में समझे, सबसे पहले हम यह डिस्कस कर लेते हैं कि
किनेजियनिज्म क्या है? तो जब हम बात करते हैं किनेजनिज्म तो इस अवधारणा को दिया था जॉन मिनार्ड कंस ने अपनी प्रमुख कृति द
जनरल थ्योरी ऑफ़ एंप्लॉयमेंट इंटरेस्ट एंड मनी और इसमें इन्होंने कहा था कि जो क्लासिकल इकोनॉमिक थिंकिंग है उसका कोई
महत्व नहीं है और इन्होंने रिजेक्ट किया था सेल्फ रेगुलेटिंग मार्केट को। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि जो किजिनिज्म है
यह जॉन जो किस है उनकी आर्थिक नीतियों को बताता है दिखाता है और अगर हम व्यापक रूप में कहें तो हम कह सकते हैं कि कीस के
द्वारा दी गई कुछ इकोनॉमिक पॉलिसीज की श्रंखला है जो कि इन सिद्धांतों से प्रभावित है जिसमें इन्होंने कहीं ना कहीं
जो क्लासिकल इकोनॉमिक थिंकिंग है और जो सेल्फ रेगुलेटिंग मार्केट है उसको रिजेक्ट किया। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो
किजियनिज्म है यह जो नियो क्लासिकल इकोनॉमिक्स है उसका विकल्प प्रदान करता है। उसका अल्टरनेट ढूंढता है। और सबसे
बड़ी बात यह है कि जो लेसफेयर कैपिटलिज्म है उसकी जो एनार्की है यानी कि जो इकोनॉमिक एनार्की है लेसफेयर कैपिटलिज्म
की उसकी कहीं ना कहीं यह आलोचना करता है। किनेजनिज्म की कुछ इंपॉर्टेंट एजमशन रही है। जिनमें पहला पॉइंट यह है कि इन्होंने
वेलफेयर स्टेट की बात की। इन्होंने एक ऐसे राज्य की बात की जिसमें जो मॉनिटरी सिस्टम है उसके द्वारा स्टेट के द्वारा कहीं ना
कहीं जो एंप्लॉयमेंट है उसको सुनिश्चित किया जाएगा। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने इसमें कुछ बातें बताई। जैसे पहला
पॉइंट यह है कि यह कहते हैं कि गवर्नमेंट सिर्फ एक नाइट बॉशमैन नहीं है बल्कि एक वेलफेयर स्टेट है जो कि लोगों के विकास के
लिए एंप्लॉयमेंट के लिए काम करता है। दूसरा पॉइंट यह है कि जो मार्केट है वह सेल्फ रेगुलेटरी नहीं है। यानी कि स्टेट
का इंटरवेंशन मार्केट में जरूरी है। और तीसरी बड़ी बात यह है कि जो मॉडर्न कैपिटलिज्म है उसको जरूरत है कंट्रोल की
और राज्य के द्वारा कंट्रोल किया जाएगा। सबसे इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि ग्रेट डिप्रेशन के बाद 1930 के दशक में रुजवेल्ट
के द्वारा कहीं ना कहीं यूएसए में जो उदार कल्याणवाद है यानी कि लिबरल वेलफेयरिज्म है उसको अपनाया गया और 1960 के दशक में
जॉन एफ कनेडी के द्वारा न्यू फ्रंटियर नीतियों और जो लिंडन जॉनसन है उन्होंने कहीं ना कहीं जो ग्रेट सोसाइटी कार्यक्रम
है उसके द्वारा यूएसए में लिबरल पॉलिसी को अपनाने की कोशिश की। 1942 को बेबेज रिपोर्ट पब्लिश होती है। जिसने दुनिया में
जो पांच इंपॉर्टेंट परेशानियां हैं, समस्याएं हैं, उसको उजागर किया था। तो जो बेबेज रिपोर्ट है, यह 1942 में विलियम
बेबिज के द्वारा पेश की जाती है। जिसने पांच इंपॉर्टेंट जो परेशानियां हैं, समस्याएं हैं, उसको उजागर किया था। जिससे
पूरा जो दुनिया है, पूरा वर्ल्ड है, वह परेशान है या फिर पीड़ित है। तो इसमें पहली थी आइडलनेस, आलस्य, दूसरी इसमें थी
इग्नोरेंस यानी कि अज्ञानता, तीसरी इसमें थी डिजीज यानी कि बीमारी और चौथी इसमें थी स्क्वेलर यानी कि गंदगी और पांचवी इसमें
थी वांट अभाव यानी कि स्क्सिटी। अब हम यह भी समझ लेते हैं कि मॉनट पेरिन सोसाइटी क्या थी? क्योंकि जो माउंट पैलेरिन
सोसाइटी है यह सीधी की सीधी नियोलिबर के साथ जुड़ी थी और इसको स्थापित किया गया था 1947 में और इसके फाउंडिंग मेंबर्स थे
फ्रेडिक हायग मिल्टन फ्रेडमैन कार्ल पॉपर जॉर्ज स्टिगलर और लुडविक वॉन मिसेस। दूसरी बड़ी बात यह है कि इसको जाना जाता है न्यू
लिबरल इसकी जो आइडियोलॉजिकल ओरिएंटेशन है उसमें और इसका जो हेड क्वार्टर स्थापित था यह था टेक्सस टेक यूनिवर्सिटी जो कि लुबॉक
यूएस में स्थापित है और सबसे बड़ी बात यह है कि जो सोसाइटी है यह बात करती है फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन की फ्री मार्केट
इकोनॉमिक पॉलिसीज की और जो ओपन सोसाइटी है उसमें पॉलिटिकल वैल्यूस की भी यह बात करती है। अब हम यह समझ लेते हैं कि न्यू
लिबरलिज्म क्या है? तो जब हम बात करते हैं नियोलिबर की तो हम कह सकते हैं कि नियो लिबरलिज्म क्लासिकल लिबरलिज्म की एक
रीस्टेटमेंट है और जो क्लासिकल लिबरलिज्म है उसका एक अपडेटेड वर्जन है। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि जो
नियोलिबर है यह बताता है कि जो स्टेट है उसकी कोईेंस नहीं रही है। अर्थात रोल बैक ऑफ द स्टेट स्टेट को वापस लो। और दूसरी
सबसे बड़ी बात यह है कि यह फोकस करता है फ्री मार्केट एंड फ्री ट्रेड में जिसको कि जोड़ के हम देख सकते हैं फ्री मार्केट
कैपिटलिज्म के साथ और सबसे प्रमुख बात यह है कि यह कहता है कि जो मार्केट है वह अच्छा है स्टेट बुरा है और यह कहता है कि
प्राइवेट अच्छा है लेकिन पब्लिक बैड है। अब हम यह समझ लेते हैं कि नियो लिबरलिज्म में आखिर नया क्या है? तो एक तरफ है
लिबरलिज्म और दूसरी तरफ है न्यू लिबरलिज्म। लिबरलिज्म जहां प्रमोट करता है इक्वलिटी को वहीं दूसरी तरफ न्यू
लिबरलिज्म डिफेंड करता है इनकलिटी को। पहली तरफ जो लिबरलिज्म है, यह बोलता है कि जो वेलफेयर स्टेट है, वह होना जरूरी है।
क्योंकि लिबरलिज्म के अंतर्गत हम मॉडर्न लिबरलिज्म को भी पढ़ते हैं जो कि वेलफेयर स्टेट की बात करता है। वहीं न्यू
लिबरलिज्म पूरी तरीके से जो वेलफेयर स्टेट है उसको रिजेक्ट करता है। वहीं लिबरलिज्म जो है यह बात करता है फ्रीडम ऑफ स्पीच की,
सिविल राइट्स की, फ्रीडम ऑफ रिलीजन की इन सभी की। वहीं दूसरी तरफ जो न्यू लिबरलिज्म है यह केवल जो मार्केट इकोनॉमी है उसके
ऊपर ही ध्यान केंद्रित करता है। यानी कि जो फ्री इकोनमी है उसके ऊपर ही ध्यान केंद्रित करता है। अब हम न्यू लिबरलिज्म
के कोर थीम को समझ लेते हैं तो जब हम बात करते हैं न्यू लिबरलिज्म की तो इसका पहला थीम आता है रोल बैक ऑफ द स्टेट जिसका मतलब
यह है कि स्टेट की कोई बहुत बड़ी भूमिका नहीं है। इसके बहुत ज्यादा फंक्शनंस नहीं है। इसका हद से ज़्यादा जो फंक्शन है, वह
सिर्फ नाइट वॉचमैन के रूप में है। दूसरी बड़ी बात यह है कि यह बात करता है फ्री मार्केट एंड फ्री ट्रेड की और सबसे
इंपॉर्टेंट बात यह है कि यह बोलता है कि प्राइवेट अच्छा है और जो पब्लिक है वह बुरा है। इसीलिए यह बोलता है कि जो रोल है
प्राइवेट सेक्टर का वह बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट यह है कि जो एलपीजी है अर्थात लिबरलाइजेशन,
प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइज़ेशन है उसका राइज़ हो जाता है। उसका इमरजेंस हो जाता है 1990 के दशक में। इंडिया में भी हमने देखा
कि एनईपी को अपनाया। एलपीजी का इमरजेंस इंडिया में भी 1990 के दशक में हुआ। अगला पॉइंट आता है सेमी एनाकिज़्म। क्योंकि
नोजिक जैसे विचारकों ने यह कहा कि राज्य ना के बराबर भूमिका रखता है। राज्य की कोईेंस नहीं है। इसीलिए इनको सेमी
एनार्किस्ट भी कहा जाता है। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट आता है कि यह कहता है कि प्राइवेट अच्छा है और जो पब्लिक है वह
बुरा है। और अगला पॉइंट यह आता है कि जो इकोनॉमिक ऑटोनोमी है वह होनी चाहिए। क्योंकि जितनी भी निजी कंपनियां हैं,
व्यक्ति हैं, उनको आर्थिक क्षेत्र में पूरी तरीके से स्वतंत्रता होनी चाहिए, स्वायत्तता होनी चाहिए। और लास्ट पॉइंट
आता है कि यह बात करता है लेस फेयर इकोनॉमी की यानी कि जो देन कहीं ना कहीं क्लासिकल लिबरलिज्म की है जिन्होंने यह
कहा था कि अहस्तक्षेप होना चाहिए राज्य का। तो इसमें जो न्यू लिबरलिज्म है यह भी बोलता है कि ऐसी अर्थव्यवस्था की स्थापना
होनी चाहिए जहां पे स्टेट लेस अफेयर करता हो और हस्तक्षेप करता हो। अब हम यह भी समझ लेते हैं कि वाशिंगटन कंसेंसस क्या था?
क्योंकि यह सीधा का सीधा न्यू लिबरलिज्म के साथ जुड़ा हुआ है। दूसरी बड़ी बात यह है कि जो वाशिंगटन कंसेंसस है यह जाना
जाता है नव उदारवाद के रूप में और इसको 1989 में जॉन विलियमसन के द्वारा प्रमोट किया गया था। जिसका प्रमुख उद्देश्य यह था
कि जो वर्ल्ड बैंक है, आईएमएफ है और जो यूएस गवर्नमेंट है उसके द्वारा जो भी नीति सलाह दी जाती थी उसको रिप्रेजेंट करना है।
और खास बात यह भी है कि जो वाशिंगटन कंसेंसस है इसमें 10 इंपॉर्टेंट पॉइंट्स बताए गए थे जिसमें नियो जो लिबरल
गाइडलाइंस है वो दी गई थी पूरी दुनिया के देशों के लिए ताकि वहां पर लिबरल इकोनॉमिक रिफॉर्म्स को किया जा सके। तो इसके कुछ
इंपॉर्टेंट पॉइंट्स थे जिनमें आते हैं प्राइवेट प्रॉपर्टी राइट्स। दूसरा आता है मार्केट प्राइसेस। तीसरा आता है इकोनॉमिक
ओपननेस यानी कि फ्री ट्रेड एंड एफडीआई और चौथा आता है पॉलिटिकल रिफॉर्म्स। और पांचवा आता है पॉवर्टी रिडक्शन। ऐसे भी
बहुत सारे लीडर्स रहे हैं जिन्होंने नियोलिबर की जो वैल्यूज़ है उसको अपनी कंट्री में अडॉप करने की कोशिश की। तो
इनमें पहला नाम आता है रोनाल्ड रिगन का। रिगन ने यूएस में 1980 के दशक में कुछ लिबरल वैल्यूज़ को एस्टैब्लिश करने की
कोशिश की। जिसको कि सामूहिक रूप में रिगनिज्म कहा जाता है। दूसरा नाम आता है मार्गेट थेचर का। तो इन्होंने भी यूके में
1975 से 1990 के बीच कुछ न्यू लिबरल पॉलिसीज को अपनाने की कोशिश की। जिसको कि सामूहिक रूप में थेचरिज्म के नाम से जाना
जाता है। और तीसरा नाम आता है डेंगशिया ओपिंग का जिन्होंने 1978 में चाइना में ओपन डोर पॉलिसी की स्थापना की। इस तरह से
चीन में भी जो नियोलिबर की पॉलिसीज है उसको एस्टैब्लिश किया गया था। नियोलिबरलिज्म के कुछ इंपॉर्टेंट थिंकर्स
रहे हैं। जिनमें पहला नाम आता है ईसा या बर्लिन का। दूसरा नाम इसमें आता है रॉबर्ट नोजिक का। तीसरा नाम आता है फ्रेडरिक हायक
का और चौथा नाम आता है मिल्टन फ्रेडमैन का। अब हम एक-एक करके न्यू लिबरलिज्म के की थिंकर्स को डिस्कस कर लेते हैं। जिनमें
पहला नाम आता है फ्रेडरिक हयाक का। तो फ्रेडरिक हयाक ऑस्ट्रियन ब्रिटिश एकेडमिशियन रहे हैं। जिन्होंने इकोनॉमिक्स
पॉलिटिकल फिलॉसोफी साइकोलॉजी और इंटेलेक्चुअल हिस्ट्री में अपना रोल प्ले किया। दूसरी बड़ी बात यह है कि 1974 में
इन्हें गुनार मृदेल के साथ नोबेल मेमोरियल प्राइज दिया गया था। इन्होंने इकोनॉमिक्स साइंस के क्षेत्र में जो योगदान दिया था
उसके लिए इन्हें नोबेल प्राइज मिला था। और दूसरी बड़ी बात यह है कि जो हायक है इनको जाना जाता है फादर ऑफ न्यू लिबरलिज्म के
रूप में। और खास बात यह है कि इन्होंने तीन इंपॉर्टेंट आर्गुमेंट दी जिसमें इन्होंने पहला यह कहा कि एब्सेंस ऑफ
रेस्ट्रेंट्स जिसका मतलब यह है कि जो प्रतिबंध होते हैं उसका अभाव। दूसरा इन्होंने कहा कि नो रेस्टोरेंट्स ऑन रियल
फ्रीडम। यानी कि जो वास्तविक स्वतंत्रता है उसके ऊपर कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। और तीसरा इन्होंने कहा कि सामाजिक
जो न्याय होता है यानी कि जो सोशल जस्टिस होता है उसके नाम की कोई चीज नहीं होती है। इसी वजह से इन्होंने जो सामाजिक न्याय
है उसको मृग मरीचिका कहा था यानी कि भ्रम कहा था। फ्रेडरिक हाया की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है। जिनमें पहला नाम आता है द
प्योर थ्योरी ऑफ़ कैपिटल। दूसरा नाम आता है द रो टू सरफडम। तीसरा नाम आता है द कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ लिबर्टी। चौथा नाम आता
है द इंटेलेक्चुअल्स एंड सोशलिज्म। पांचवा नाम आता है लॉ लेजिसलेशन एंड लिबर्टी। छठा नाम आता है द मेरेज ऑफ सोशल जस्टिस। और
सातवां नाम आता है व्हाई आई एम नॉट अ कंजर्वेटिव। अगले प्रमुख थिंकर का नाम आता है इसाया बर्लिन जो कि रशियन ब्रिटिश
फिलॉसोफर रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति टू कांसेप्ट्स ऑफ लिबर्टी जो कि 1958 को
पब्लिश होती है। इसमें तर्क दिया था कि राज्य केवल व्यक्ति की जो नकारात्मक स्वतंत्रता होती है उसकी रक्षा करेगा। और
जो नेगेटिव लिबर्टी है या फिर जो नेगेटिव फ्रीडम है उसका मतलब यह होता है कि व्यक्ति को अपने विवेक के अनुसार कार्य
करना चाहिए और उसे ऐसा करने से नहीं रोका जाना चाहिए और खास बात यह है कि इन्होंने यह कहा कि राज्य को व्यक्ति की जो
स्वनिर्धारित गतिविधियां होती है एक्टिविटीज होती है उसके ऊपर कोई रेस्ट्रिकशंस या फिर प्रतिबंध नहीं लगाना
चाहिए। ईसाया बर्लिन ने अपनी प्रमुख कृति जिसका टाइटल था टू कांसेप्ट्स ऑफ लिबर्टी। इसमें इन्होंने दो प्रकार की लिबर्टीज की
बात की है। तो पहली लिबर्टी का नाम आता है पॉजिटिव लिबर्टी। दूसरी लिबर्टी का नाम आता है नेगेटिव लिबर्टी। तो जब हम बात
करते हैं पॉजिटिव लिबर्टी की तो इसमें इन्होंने कहा कि एबिलिटी टू सेल्फ मास्टर यानी कि जो आत्म नियंत्रण है उसकी क्षमता
का विकास होता है पॉजिटिव लिबर्टी में और नेगेटिव लिबर्टी में इन्होंने कहा कि एब्सेंस ऑफ ऑल रेस्ट्रिकशंस यानी कि स्टेट
के द्वारा जितने भी प्रतिबंध लगाए जाते हैं उसका अभाव पाया जाता है। यानी कि किसी भी प्रकार के रेस्ट्रिकशंस नहीं होने
चाहिए। बर्लिन की प्रमुख कृतियां हैं। जिनमें पहला नाम आता है हैजहग एंड द दूसरा आता है टू कांसेप्ट्स ऑफ लिबर्टी।
तीसरा आता है द रूट्स ऑफ रोमांटिसिज्म। चौथा आता है फॉर एस ऑन लिबर्टी। और पांचवा आता है वीको एंड हर्डर। अगले थिंकर का नाम
आता है मिल्टन फ्रायडमैन का जो कि अमेरिकन इकोनॉमिस्ट और स्टैटिस्टिशियन रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनका प्रमुख वर्क
1962 में पब्लिश होता है जिसका टाइटल था कैपिटलिज्म एंड फ्रीडम। इसमें इन्होंने इस बात का तर्क दिया कि सरकार को केवल उन
क्षेत्रों में हस्तक्षेप करना चाहिए, इंटरवेंशन करना चाहिए जहां जो मार्केट सिस्टम है वह कंट्रोल करने में विफल रह
जाती है, फेल हो जाती है। और इन्होंने यह कहा कि जो कंट्रोल प्राइस होते हैं, वेलफेयर होता है, रेवोल्यूशन होता है या
फिर जो सपोर्ट प्राइस होते हैं, वेजेस होते हैं, इंटरेस्ट एंड रेंट होते हैं, इंपोर्ट एंड एक्सपोर्ट होते हैं। इन सभी
के जो काम है वो स्टेट के दायरे में नहीं आते हैं। इसका मतलब यह है कि मिल्टन फ्रेडमैन कहते हैं कि लॉ एंड ऑर्डर
प्रोटेक्ट प्राइवेट प्रॉपर्टीज, इकोनॉमिक गेम कंपटीशन और जो मोनेरी फंक्शनंस होते हैं, रूल्स होते हैं और जो टेक्निकल
मोनोपोलीज़ होती है, यह सारे के सारे काम ही केवल राज्य के क्षेत्र में आते हैं और राज्य को केवल इन कार्यों को करना चाहिए।
फ्राइडमैन की कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है। जिनमें पहला नाम आता है कैपिटलिज्म एंड फ्रीडम का। दूसरा नाम आता है प्राइस
थ्योरी का और तीसरा नाम आता है फ्री टू चूस। लास्ट बट सबसे इंपॉर्टेंट थिंकर का नाम है रॉबर्ट नोजिक जो कि अमेरिकन
फिलॉसोफर रहे हैं। इनके बारे में खास बात यह है कि यह जाने जाते हैं अपनी प्रसिद्ध कृति एनाकी स्टेट एंड यूटोपिया जो कि 1974
में पब्लिश होती है। इस कृति में इन्होंने जो जॉन र्स की कृति रही है और थ्योरी ऑफ़ जस्टिस उसको इन्होंने लिबर्टेरियन आंसर
दिया था। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि रॉबर्ट नोजिक को जाना जाता है सेमी एनाकिस्ट। रॉबर्ट नोजिक ने यह भी कहा कि
जो स्टेट है इसके पास इस तरह का कोई भी राइट नहीं है कि जो व्यक्ति है उसकी प्रॉपर्टी को ट्रांसफर करें,
रिीस्ट्रीब्यूट करें या फिर उसके ऊपर टैक्स लगाएं। और एक इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि रॉबर्ट नोजिक ने यह कहा कि स्टेट के
तीन ही प्रकार के कार्य होते हैं। और यह कार्य हैं प्रोटेक्शन, जस्टिस एंड सिक्योरिटी। नॉजिक के कुछ इंपॉर्टेंट वक्स
रहे हैं। जिनमें पहला आता है एनार्की स्टेट एंड यूटोपिया। दूसरा इसमें आता है द एकमाइन लाइफ। तीसरा आता है द नेचर ऑफ
रैशनलिटी। चौथा इसमें आता है सोक्रेटिक पज़ल्स और पांचवा आता है इनवेरियंसेस। अब हम कंजर्वेटिविज्म के की थिंकर्स को
अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। जिसमें पहला नाम आता है रिचर्ड हुकर का जो कि चर्च ऑफ इंग्लैंड के इंग्लिश प्राइस रहे हैं और
इन्फ्लुएंशियल थियोलॉजियन रहे हैं। अगली इंपॉर्टेंट बात यह आती है कि यह 16वीं शताब्दी के इंग्लिश थियोलॉजियन रहे हैं।
और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने एक किताब लिखी जिसका शीर्षक था ऑफ द लॉजेस ऑफ एक्लेक्सिस्टिकल
पॉलिटी। इस किताब की खास बात यह है कि इन्होंने जो चर्च ऑफ इंग्लैंड है इसको डिफेंड किया और जो रोमन कैथोलिसिज्म है और
जो प्यूरिटिनिज्म है उसकी इन्होंने आलोचना की और सबसे बड़ी बात यह है कि जो एंग्लिकन ट्रेडिशन है इसकी इन्होंने काफी प्रशंसा
की और इन्होंने बाइबल चर्च और जो रीजन है इसको इन्होंने इंग्लिश ट्रेडिशन की तीन इंपॉर्टेंट डोरियां बताई जो कि बहुत मजबूत
है। अगले इंपॉर्टेंट स्कॉलर का नाम आता है एडममंड वर्क का जो कि ब्रिटिश स्टेट्समैन, पार्लियामेंट्री ऑडिटर और कंजर्वेटिव
पॉलिटिकल थिंकर रहे हैं। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने अपनी प्रमुख कृति रिफ्लेक्शंस ऑन द रेवोल्यूशन इन फ्रांस जो
कि 1790 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने जहां एक तरफ जैकोविनिज्म की आलोचना की उसको अपोज किया। वहीं दूसरी तरफ
इन्होंने कंजर्वेटिविज्म को काफी प्रज़ किया। अगली इंपॉर्टेंट बात यह आती है कि इन्होंने इसी महत्वपूर्ण कृति में यह कहा
कि रेवोल्यूशन सही नहीं होती है क्योंकि रेवोल्यूशन के द्वारा जो गुड सोसाइटी होती है स्टेट की और जो ट्रेडिशनल इंस्टीटशंस
होते हैं उसका जो फैब्रिक है उसको डिस्ट्रॉय किया जाता है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह कंजर्वेटिव जो फैक्शन है उसकी
जो विग पार्टी थी उसके यह सदस्य रहे थे। हालांकि इनके विरोध में और एक पार्टी थी जिसका नाम था प्रो फ्रेंच रेवोल्यूशन न्यू
विग्स जो कि चार्ल्स जेम्स फोक्स के द्वारा लीड की गई थी। अगले थिंकर का नाम आता है थॉमस हॉब्स जो कि इंग्लिश फिलॉसोफर
रहे हैं और यह जाने जाते हैं अपनी प्रमुख कृति लेबाइथान के लिए जो 1651 को पब्लिश होती है। दूसरी सबसे अहम बात यह है कि इसी
कृति में इन्होंने सोशल कॉन्ट्रैक्ट थ्योरी को दिया था और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इनको मॉडर्न पॉलिटिकल
फिलॉसोफी के फाउंडर के रूप में जाना जाता है। और एक खास बात यह है कि इनको ट्रेडिशनली माना जाता है एक कंजर्वेटिव
थ्यरिस्ट। तो इनके कुछ वक्स रहे हैं। तो स्क्रीन पर जितने भी वर्क आपको दिखाई दे रहे हैं आप इनको अच्छे से नोट कर लें।
अगले थिंकर का नाम आता है जॉन लॉक जो कि अगेन इंग्लिश पॉलिटिकल फिलॉसोफर रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि इनको मोस्ट
इन्फ्लुएंशियल एनलाइटनमेंट थिंकर के रूप में जाना जाता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इनको फादर ऑफ लिबरलिज्म के रूप में
जाना जाता है। नेक्स्ट पॉइंट यह आता है कि लॉक ने यह कहा कि राइट्स आर वांटेड बाय सोशल ड्यूटीज एंड ऑब्लिगेशन। और खास बात
यह भी है कि जॉन लॉक को जाना जाता है फादर ऑफ क्लासिकल लिबरलिज्म और सबसे बड़ी बात यह है कि इनको पाइनियर माना जाता है
कंजर्वेटिव थॉट का। तो इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क रहे हैं जो आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रहे हैं। आप इनको अच्छे से
नोट कर लें क्योंकि आपके एग्ज़ाम के लिए बहुत ही जरूरी है। कंजर्वेटिवज्म के नेक्स्ट थिंकर का नाम आता है माइकल ऑश जो
कि अगेन ब्रिटिश फिलॉसोफर रहे हैं और कंजर्वेटिव पॉलिटिकल थिंकर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने यह कहा कि जो
ट्रेडिशन और जो एक्सपीरियंस होती है, हिस्ट्री होती है, यह अनलिमिटेड होती है और इन्होंने इन सभी चीजों के ऊपर बहुत
ज्यादा फोकस किया। अगली महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कोट दी जिसमें इन्होंने यह कहा कि इन पॉलिटिकल
एक्टिविटी मैन सेल ऑफ़ बाउंडलेस एंड बॉटमलेस सी। तो, यह कोट आपके एग्जाम के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। इसको आप अच्छे से
नोट कर लें। वहीं इन्होंने कंजर्वेटिज्म को डिफाइन करते हुए एक लंबी चौड़ी कोट दी जिसको मैं हिंदी में पढ़ रहा हूं। तो
इन्होंने यह कहा कि रूढ़िवादी होने का अर्थ है अज्ञात के स्थान पर परिचित को प्राथमिकता देना। अपर्युक्त के स्थान पर
परीक्षित को प्राथमिकता देना। रहस्य के स्थान पर तथ्य को प्राथमिकता देना। संभव के स्थान पर वास्तविक को प्राथमिकता देना।
असीम के स्थान पर सीमित को प्राथमिकता देना। दूरस्थ के स्थान पर निकट को प्राथमिकता देना। प्रचुर के स्थान पर
पर्याप्त को प्राथमिकता देना। पूर्ण के स्थान पर सुविधाजनक को प्राथमिकता देना। काल्पनिक आनंद के स्थान पर वर्तमान जो
खुशी होती है, हंसी होती है, उसको प्राथमिकता देना। इसी का मतलब कंजर्वेटिज्म है। यह माइकल ऑक्स ने कहा।
तो एग्जाम के पॉइंट ऑफ व्यू से यह कोट हालांकि लंबी चौड़ी है लेकिन बहुत इंपॉर्टेंट है। इसको आप ज़हन में यानी कि
अपने माइंड में अच्छे से बिठा लें। वहीं इनकी कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां भी रही है जो आपको स्क्रीन पर दिखाई दे रही है। आप
अच्छे से इनको याद कर लें। कंजर्वेटिज्म के अगले थिंकर का नाम आता है डेविड ह्यूम जो कि स्कॉटिश फिलॉसोफर हिस्टोरियन
इकोनॉमिस्ट रहे हैं और एसेस्ट रहे हैं जिनकी खासतौर पे फिलॉसोफिकल जो इंप्रिसिज्म है और जो स्केप्टिसिज्म है
उसमें काफी रुचि रही। दूसरी बड़ी बात यह है कि ह्यूम ने एक इंपॉर्टेंट नोशन यानी कि एक आइडिया दिया जिसका नाम था
सिविलाइज्ड मोनाकी। तो इन्होंने सिविलाइज्ड मोनार्की को डिफाइन करते हुए कहा कि ऐसी मोनार्की को हम सिविलाइज्ड कह
सकते हैं जहां पर राजा रूल ऑफ लॉ के अधीन काम करता है ना कि रूल ऑफ लॉ को अपने हिसाब से चलाता है। दूसरे शब्दों में हम
यह भी कह सकते हैं कि जो मोनार्क है यानी कि किंग है जब अपने आप को लिमिट करता है ब्रेक द रूल ऑफ लॉ के लिए तो उसको आप
सिविलाइज्ड मोनाकी कहते हैं। अगली महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जो इनका कंजर्वेटिवज़्म है, यह एनलाइटनमेंट के जो
मटेरियल्स है, उससे काफ़ी ज़्यादा कंस्ट्रक्टेड था, निर्मित था। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क रहे हैं जो आपको स्क्रीन
पर दिखाई दे रहे हैं। आप इनको अच्छे से नोट कर लें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। अगले थिंकर का नाम
आता है एलेक्स डी टोकेबिले का जो कि फ्रेंच एरिस्टोक्रेट, डिप्लोमेट, सोशियोलॉजिस्ट, पॉलिटिकल
साइंटिस्ट, पॉलिटिकल फिलॉसोफर और हिस्टोरियन रहे हैं। खास बात यह है कि यह जाने जाते हैं डेमोक्रेसी इन अमेरिका की
बुक के लिए जो कि 1835 को पब्लिश होती है। इनकी एक और महत्वपूर्ण कृति रही है जिसका टाइटल था द ओल्ड रिजीम एंड द रेवोल्यूशन।
खास बात यह भी है कि यह 20थ सेंचुरी में जो अमेरिका में कंजर्वेटिव राइड था उसके बहुत बड़े फिलॉसोफर यह रहे हैं और
इन्होंने अपनी प्रमुख कृति डेमोक्रेसी इन अमेरिका में पॉलिटिकल कंजर्वेटिविज्म के जो सेंट्रल किनेट्स है यानी कि विशेषताएं
हैं पहलू है उसकी इन्होंने चर्चा की। खास बात यह भी है कि अमेरिका में जो कंजर्वेटिव राइट रहा उसके जितने भी
थिंकर्स रहे वह कहीं ना कहीं किसी ना किसी रूप में एलेक्स डिटॉकविले के पॉलिटिकल थॉट से इंस्पायर रहे। अगले इंपॉर्टेंट थिंकर
का नाम आता है रसेल क्रिक जो कि अगेन अमेरिकन पॉलिटिकल फिलॉसोफर, मोरलिस्ट, हिस्टोरियन, सोशल क्रिटिक, लिटरेरी
क्रिटिक और ऑथर रहे हैं। और खास बात यह है कि 20थ सेंचुरी में जो अमेरिकन कंजर्वेटिज्म है उसके ऊपर इनका काफी
इन्फ्लुएंस रहा। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इनकी 1953 में द कंजर्वेटिव माइंड नाम से एक बुक पब्लिश होती है। जिसमें
इन्होंने जो अमेरिका है उसमें जो कंजर्वेटिव मूवमेंट है उसको प्ले करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। और खास बात
यह है कि जो एंग्लो अमेरिकन ट्रेडिशन है उसके डेवलपमेंट में जो कंजर्वेटिव थॉट है उसको इन्होंने काफी विकसित किया था। काफी
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अगले थिंकर का नाम आता है टैड हन्रेक का जो कि कनेडियन बोर्न ब्रिटिश फिलॉसोफर रहे हैं।
इनकी खास बात यह है कि 1990 में यह एक कंजर्वेटिविज्म के नाम से बुक लिखते हैं। जिसमें इन्होंने जो ब्रिटिश कंजर्वेटिज़्म
है और जो अमेरिकन कंजर्वेटिविज़्म है उसके बीच अंतर को इन्होंने इस बुक में दिखाया और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने यह
कहा इस बुक में कि किस तरह से जो अमेरिकन पॉलिटिक्स और ब्रिटिश पॉलिटिक्स है उसमें जो कंजर्वेटिविज्म के बीच एक आइडियोलॉजिकल
जो अंतर है उसको इन्होंने इस कृति में दिखाया। अगले थिंकर का नाम आता है जोसेफ डी मेस्त्रे जो कि फ्रेंच पॉलीमिकल ऑथर,
मोरलिस्ट और डिप्लोमेट रहे हैं। इनकी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 1789 की जो फ्रेंच रेवोल्यूशन है उसके बाद इन्होंने
कंजर्वेटिव ट्रेडिशन में काफी योगदान दिया। इसके बहुत बड़े एक्सप्पोनेंट बन जाते हैं। इनको फोरफादर ऑफ कंजर्वेटिविज्म
के रूप में जाना जाता है। और इन्होंने फ्रेंच रेवोल्यूशन के बाद सोशल हायरार्की और मोनार्की की वकालत की। इनके कुछ
इंपॉर्टेंट वर्क भी रहे हैं। जिनमें पहला आता है कंसीडरेशन ऑन फ्रांस और दूसरा इसमें आता है द जनरेटिव प्रिंसिपल ऑफ
पॉलिटिकल कॉन्स्टिट्यूशन। अगले थिंकर का नाम आता है फ्रेडरिक हयाक जो कि ऑस्ट्रियन बोर्न ब्रिटिश एकेडमिक रहे हैं। इन्होंने
पॉलिटिकल इकोनमी पॉलिटिकल फिलॉसोफी और इंटेलेक्चुअल हिस्ट्री में बड़ी मात्रा में कंट्रीब्यूट किया। इनकी खास बात यह भी
रही है कि यह इंडिविजुअलिज्म के ऊपर बहुत बड़ी आस्था रखते थे। यानी कि फॉर्म बिलीवर थे। इन्होंने मार्केट ऑर्डर को भी काफी
प्रज़ किया और इन्होंने सोशलिज्म को काफी मात्रा में यानी कि बड़ी मात्रा में क्रिटिसाइज किया। इनकी खास बात यह भी है
कि इन्होंने अपनी महत्वपूर्ण कृति जिसका शीर्षक था द रो टू सॉफडम जो कि 1944 को पब्लिश होती है। इसमें इन्होंने डिफेंस
किया लेसेस फेयर जो पॉलिसी है उसका और इन्होंने इकोनॉमिक इंटरवेंशन के ऊपर भी काफी अटैक किया। इन्होंने इसको
टोटोलिटेरियन के फॉर्म के रूप में देखा। इनकी खास बात यह भी है कि यह 1960 में द कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ लिबर्टी लिखते हैं।
जबकि 1979 में इनकी बुक लॉ लेजिसलेशन एंड लिबर्टी पब्लिश होती है। और इसमें इन्होंने जो मॉडिफाइड फॉर्म है
ट्रेडिशनलिज्म का उसको इन्होंने सपोर्ट किया और इन्होंने एंग्लो अमेरिकन जो वर्जन है कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म का उसको काफी प्रज़
किया जो कि लिमिटेड गवर्नमेंट के ऊपर फोकस करता है। इन तीन वक्स के अलावा इनके कुछ अन्य वक्स भी रहे हैं। जिनमें पहला आता है
प्योर थ्योरी ऑफ कैपिटल। अगला इसमें आता है द इंटेलेक्चुअल्स एंड सोशलिज्म। अगला आता है द मिरेज ऑफ सोशल जस्टिस और अगला
आता है इसमें व्हाई आई एम नॉट अ कंजर्वेटिव। अगले थिंकर का नाम आता है रॉबर्ट नोजिक जो कि अगेन अमेरिकन पॉलिटिकल
फ़िलॉसोफर रहे हैं। इनकी खास बात यह है कि इन्होंने जॉन र्स के आइडियाज को रिस्पांस करने के लिए चैलेंज करने के लिए इन्होंने
राइट बेस्ड लिबर्टेरियनिज्म को डेवलप किया। इनकी एक इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि यह जॉन लॉक से काफी इंस्पायर रहे। इसके
अलावा अमेरिका के जो इंडिविजुअलिस्ट रहे 19th सेंचुरी के उनसे भी यह काफी ज्यादा इंप्रेस रहे। काफी ज्यादा इंस्पायर हुए और
इन्हीं के विचारों से प्रभावित होकर इन्होंने यह कहा कि प्रॉपर्टी के मामले में जो इंडिविजुअल्स हैं इनको बड़ी मात्रा
में राइट्स होने चाहिए और स्टेट को कोई भी हक नहीं होगा कि इंडिविजुअल की जो प्रॉपर्टी है उसके ऊपर इंटरवेंशन करें। बस
शर्त इतनी है कि जो इंडिविजुअल की प्रॉपर्टी है वह लीगली अर्नड हो। अगर किसी भी इंडिविजुअल की प्रॉपर्टी लीगली अर्नड
है तो इसमें स्टेट इंटरवेंशन नहीं कर सकता है। उसकी प्रॉपर्टी के ऊपर टैक्स नहीं लगा सकता है या फिर दूसरे को ट्रांसफर नहीं कर
सकता है। इनकी खास बात यह भी रही कि इनकी प्रमुख कृति एनआरकी स्टेट एंड यूटोपिया जो कि 1974 को पब्लिश होती है। इसमें
इन्होंने वेलफ़ेरिज्म और जो रिस्ट्रीब्यूशन है जिसकी वकालत जॉन रोल्स ने की थी उसको इन्होंने रिजेक्ट किया और इन्होंने मिनिमल
गवर्नमेंट और मिनिमल टैक्सेशन की बात की। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स भी रहे हैं जो आपको याद रखने हैं। तो इसमें पहला आता है
एनार्की स्टेट एंड यूटोपिया। दूसरा आता है फिलॉसोफिकल एक्सप्लेनेशंस। तीसरा इसमें आता है द नॉर्मेटिव थ्योरी ऑफ़ इंडिविजुअल
चॉइस। इसमें अगला आता है द एग्जामाइन लाइफ। इसमें नेक्स्ट आता है द नेचर ऑफ रैशनलिटी। अगला इसमें आता है सोक्रेटिक
पजल्स और लास्ट इसमें आता है इनका एक एस्स जो कि नेट के एग्जाम में भी पूछा गया था। इसका टाइटल था द जिगजैग ऑफ पॉलिटिक्स।
अगले थिंकर का नाम आता है हन्ना आरंट जो कि अगेन जर्मन अमेरिकन हिस्टोरियन और फिलॉसोफर रही हैं। इनके बारे में खास बात
यह है कि इनको 20थ सेंचुरी की मोस्ट इनफ्लुएंशियल पॉलिटिकल थ्योरिस्ट मानी जाती है। और इनकी खास बात यह भी है कि
इनका वर्क इनकी रिसर्च नेचर ऑफ वेल्थ पावर इविल पॉलिटिक्स डायरेक्ट डेमोक्रेसी अथॉरिटी ट्रेडिशन एंड टोटली टेररिनिज्म के
ऊपर रही है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इनको जाना जाता है कंट्रोवर्सी जिस कंट्रोवर्सी का नाम था ट्रायल ऑफ़ एडोल्फ
आयुष्मान। खास बात यह है कि इन्होंने इसमें यह बताने की कोशिश की कि जो टोटलिटेरियन सिस्टम है उसके अंतर्गत
साधारण से साधारण ऑर्डिनरी से ऑर्डिनरी पीपल भी कैसे एक्टर बन जाते हैं। और इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया
जिसका नाम था द बेनेलिटी ऑफ़ इविल। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जिनको आपको याद करना है। तो इसमें इनका पहला आता है द
ओरिजंस ऑफ टोटलिटेरियनिज्म। अगला इसमें आता है द ह्यूमन कंडीशन। नेक्स्ट आता है बिटवीन पास्ट एंड फ्यूचर। अगला इसमें आता
है ऑन रेवोल्यूशन। नेक्स्ट आता है आयुष्मान इन जेरूशलम और लास्ट इसमें आता है ऑन वायलेंस। अगले थिंकर का नाम आता है
इरविन क्रिस्टोल जो कि अमेरिकन जर्नलिस्ट और राइटर रहे हैं। इनकी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इनको न्यू कंजर्वेटिज्म के
गॉड फादर के रूप में जाना जाता है। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट कृतियां रही है। जिनमें पहली आती है ऑन द डेमोक्रेटिक आइडिया इन
अमेरिका और दूसरी आती है टू चेयर्स फॉर कैपिटलिज्म। अगर आप यह वीडियो पूरी देखते हो तो स्क्रीन पर जितनी भी आपको फेमिनिस्ट
थिंकर दिखाई दे रही है इनके बारे में आप डिटेल में जानेंगे। इनकी राइटिंग्स, इनकी फिलॉसोफी और इनकी बायोग्राफी के बारे में।
तो चलिए सबसे पहले हम बात कर लेते हैं मैरी वस्टन क्राफ्ट की और इनकी इंपॉर्टेंट कोटेशन के साथ। इन्होंने कहा आई डू नॉट
विश वुमेन टू हैव पावर ओवर मैन बट ओवर देमसेल्व। इसमें यह कहती है कि मैं कभी भी यह नहीं चाहती हूं कि महिलाओं को पुरुषों
के ऊपर शक्ति प्राप्त हो जाए। बस मैं तो सिर्फ इतना चाहती हूं कि महिलाओं को खुद के ऊपर शक्ति प्राप्त हो जाए क्योंकि
महिलाएं हमेशा से शोषण का शिकार रही है, दासता का शिकार रही है। इसीलिए मैं तो सिर्फ इतना चाहती हूं कि महिलाओं को खुद
के ऊपर शक्ति प्राप्त हो जाए। यह इंग्लिश राइटर रही है और फिलॉसोफर रही है और ऐसी पहली थिंकर रही है जिन्होंने वूमस के राइट
की एडवोकेसी की। इनका जन्म 27 अप्रैल 1759 को इंग्लैंड में हुआ और इनकी डेथ 10 सितंबर 1797 को इंग्लैंड में हुई थी। इनके
पति का नाम विलियम गॉडविन था जिनसे इन्होंने 1797 में शादी की थी। इनके दो बच्चे मैरीशली और नैनी इमली थे। और इनको
फर्स्ट वेव ऑफ फेमिनिज्म की फाउंडर भी माना जाता है। मैरी वालस्टोन क्राफ्ट रूसो के डेमोक्रेटिक रेडिकलिज्म का जो आईडिया
था उससे काफी प्रभावित रही और इसी वजह से इनको फर्स्ट सिस्टमैटिक फेमिनिस्ट क्रिटिक के रूप में भी देखा जाता है और साथ में
इनको रिपब्लिकन थिंकर भी माना जाता है और यह रूसो के रिपब्लिकन आइडियाज से काफी प्रभावित रही और सबसे बड़ी बात यह है कि
इनका जो जीवन है या फिर लाइफ है। बड़ी स्ट्रगल में रही। इनकी जो लाइफ है वह बड़ी अनहै रही। जिसकी वजह से इन्होंने अपने आप
को सुसाइड्स के लिए भी कमिटेड किया। और नोट करने वाली बात यह है कि यह ऐसी पहली पॉलिटिकल थिंकर रही है जिन्होंने पहली बार
वुमस के पॉलिटिकल राइट्स की एडवोकेसी की वकालत की। और यह रही है इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग्स। और जिनमें सबसे
इंपॉर्टेंट है अंडिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमेन विद स्ट्रिक्चर्स ऑन द पॉलिटिकल एंड मोरल सब्जेक्ट्स। यह बहुत ही इंपॉर्टेंट
राइटिंग है। इसी राइटिंग में इनकी पूरी फिलॉसफी पाई जाती है और एग्जाम की दृष्टि से यह राइटिंग बहुत ही इंपॉर्टेंट है
क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से लगातार इस राइटिंग्स को एग्जाम में पूछा जा रहा है। इस राइटिंग को इन्होंने 1792 में लिखा।
बाकी जो कुछ अन्य राइटिंग्स रही है इनको आप स्क्रीनशॉट लेकर या फिर वीडियो को पॉज करके नोट कर सकते हो। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट
राइटिंग्स और रही है जैसे मैरी अफिक्शन अ प्लेट मेमोरीज और मेमोरीज इनकी एक बायोग्राफी रही है जिसको कि इनके पति
विलियम गॉडविन के द्वारा इनकी डेथ के बाद 1798 ईस्वी में लिखा गया था। हालांकि इस बायोग्राफी की काफी निंदा भी की जाती है
क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस बायोग्राफी में विलियम गॉडविन ने अपनी पत्नी मैरी वस्टन क्राफ्ट के बारे में
काफी नकारात्मक टिप्पणियां की जिसकी वजह से यह काफी चर्चित रही और काफी चर्चा का विषय रही। अगली इनकी इंपॉर्टेंट राइटिंग
रही है एन हिस्टोरिकल एंड मोरल व्यू ऑफ़ द फ्रेंच रेवोल्यूशन। अगली रही है ऑन पोएट्री एंड आवर रेलिश फॉर द ब्यूटीज़ ऑफ़
नेचर। और लास्ट बट नॉट लीस्ट इज़ द केव ऑफ़ फैंसी जो कि 1787 में इन्होंने लिखी थी। हालांकि इसको पब्लिश 1798 में इनके पति
विलियम गॉडविन के द्वारा इनकी डेथ के बाद किया गया था। साइमन दी बुआ इनकी सबसे इंपॉर्टेंट कोट रही है जिसके अंतर्गत
इन्होंने कहा वुमेन आर मेड दे आर नॉट बोर्न। जी हां, इन्होंने कहा कि महिलाओं की जो आज हमारे समाज में पोजीशन है उसके
अंतर्गत महिलाओं को बनाया गया है। क्योंकि महिलाओं को हमेशा से यह सिखाया गया है कि तेरा काम सजना है, सवरना है, पुरुषों को
खुश करना है, घर के कामकाज करना है, तेरे पास कम दिमाग है। इसलिए तू पॉलिटिक्स में पार्टिसिपेट नहीं कर सकती है, बिजनेस नहीं
कर सकती है, एजुकेशन नहीं कर सकती है। तो यह कहती है कि महिलाओं को बनाया गया है। इसीलिए महिलाएं पैदा नहीं हुई है। साइमन
दी बुआ फ्रेंच राइटर रही है, इंटेलेक्चुअल रही है, फिलॉसोफर, पॉलिटिकल एक्टिविस्ट, फेमिनिस्ट एंड सोशल थ्योरिस्ट रही है।
इनका जन्म 1908 में हुआ और इनकी डेथ 1986 को हुई और ये जीन पॉल शास्त्री के साथ लंबे समय तक काम करती रही। एक साथ
इन्होंने काफी काम किया। खासतौर पे पॉलिटिकल साइंस में और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने 1949 में द सेकंड
सेक्स नामक सबसे इंपॉर्टेंट कृति लिखी जिसमें इन्होंने एक तरफ यह कहा कि लाइक मैन वुमेन इज अ ह्यूमन बीइंग। जी हां,
इन्होंने कहा कि पुरुषों की तरह महिलाएं भी ह्यूमन बीइंग है। इसीलिए उनके साथ अच्छा ट्रीट होना चाहिए। दूसरी तरफ
इन्होंने समाज में जो पेटियार्किकल सोसाइटी है या फिर जिस तरह का जो सामाजिक ढांचा बनाया गया है जहां पर महिलाओं को
भोग विलासिता की वस्तु और घर के कामकाज तक ही सीमित माना जाता है उसकी भी आलोचना की और द सेकंड सेक्स नामक कृति में इन्होंने
कहा कि महिलाओं को हमेशा सेकंड सेक्स समझा जाता है क्योंकि फर्स्ट सेक्स पुरुषों को समझा जाता है। इसीलिए महिलाओं के साथ
दुर्व्यवहार होता है या फिर महिलाओं के साथ एक्सप्लॉयटेशन किया जाता है। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग्स रही है।
जैसे द ब्लड ऑफ अदर्स, ऑल मैन आर मल, द एथिक्स ऑफ एंबग्विटी, द सेकंड सेक्स। सबसे इंपॉर्टेंट राइटिंग ये इनकी रही है जो कि
1949 में लिखी। द मंदारिंस, मेमोरीज ऑफ ब्यूटीफुल डॉटर्स, फोर्स ऑफ सरकमस्ट्ससेस, लेस बैललेस इमेजज़, द कमिंग ऑफ एज, द वुमेन
डिस्ट्रॉयड। यह भी इंपॉर्टेंट राइटिंग रही है लेटर्स टू शास्त्रे और कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जैसे व्हेन थिंग्स ऑफ द
स्पिरिट कम फर्स्ट अमेरिका डे बाय डे मस्ट बी बर्न सेड द लॉन्ग मार्च व्हाट इज एकिस्टेंशियलिज्म
द इंडिपेंडेंट वुमेन एक्सट्रैक्ट्स फ्रॉम द सेकंड सेक्स 1949 और यह इनका बेसिकली एस्स रहा है। तो यह इनकी इंपॉर्टेंट
राइटिंग थी जो कुछ बहुत ही इंपॉर्टेंट है एग्जाम की दृष्टि से। अब हम बात कर लेते हैं बै फ्राइडन की। बैफ फ्राइडन का जन्म
1921 ईवी को हुआ था। इनकी डेथ 2006 ईस्वी को हुई थी। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनको सेकंड वेव ऑफ फेमिनिज्म की फाउंडर
माना जाता है। और इससे भी इंपॉर्टेंट बात यह है कि यह यूएसए की पॉलिटिकल एक्टिविस्ट रही है और पॉलिटिशियन रही है। जिनको कि
मदर ऑफ वुमेन लिबरेशन के नाम से जाना जाता है। जी हां, इनको मदर ऑफ वुमेन लिबरेशन अर्थात नारी मुक्ति की मां के रूप में
जाना जाता है। और एक इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि 1966 में इन्होंने नेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर वुमेन को अमेरिका में
एस्टैब्लिश किया और बाद में यह इसकी प्रेसिडेंट भी चुनी गई। और एक इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि 1963 में इन्होंने द
फेमिनिन मिस्टेक नामक कृति लिखी जिसमें इन्होंने एक चर्चित स्लोगन दिया जिसका नाम है द प्रॉब्लम विद नो नेम। अब बात कर लेते
हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की। इनके इंपॉर्टेंट वर्क्स है जैसे द फेमिनाइन मिस्टिक 1963 जो इनका सबसे इंपॉर्टेंट
वर्क रहा है। प्रॉब्लम दैट हैज़ नो नेम द सेकंड स्टेज यह भी इनकी इंपॉर्टेंट कृति रही है। द फाउंटेन ऑफ एज इट चेंज्ड माय
लाइफ लाइफ सो फॉर बिय्ड जेंडर मिथोस आफ्टर। तो यह इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग्स रही है और नोट करने वाली बात यह
भी है कि 1963 में इन्होंने अपनी प्रमुख कृति द फेमिनाइन मिस्टेक में कुछ इंपॉर्टेंट आर्गुमेंट दिए। जैसे इन्होंने
कहा नो पार्टिसिपेशन ऑफ वुमेन इन पब्लिक लाइफ। इन्होंने कहा कि अभी तक पब्लिक लाइफ़ में पब्लिक लाइफ़ का मतलब होता है एजुकेशन,
बिज़नेस, पॉलिटिक्स, टीचिंग यानी कि घर के बाहर से जो काम होते हैं उसको हम पब्लिक लाइफ कहते हैं। तो इन्होंने कहा कि अभी तक
महिलाओं को पब्लिक लाइफ में किसी भी तरह के अधिकार नहीं मिले हैं। महिलाओं की किसी भी तरह की पार्टिसिपेशन पब्लिक लाइफ में
नहीं हुई है। दूसरी इंपॉर्टेंट बात इन्होंने कही कि इस प्रकार की अजंपशन या फिर मान्यताएं कि महिलाएं डोमेस्टिक वर्क
यानी कि जो फ़ैमिली के कामकाज होती है उसको एंजॉय करती है। यह मिथ है। यह झूठ है क्योंकि महिलाएं घर के कामकाज पसंद नहीं
करती है। इसीलिए इन्होंने कहा कि महिलाओं को केवल घरेलू कामकाज तक जोड़ना एक मिथ है। एक और इंपॉर्टेंट बात इन्होंने कही कि
वुमेन आर अनहैपी डिसएपॉइंटेड एंड अनफुलफिल्ड एज अ मदर एंड वाइफ। इन्होंने कहा कि हमारी समाज में जो एक औरत को मां
के रूप में या फिर पत्नी के रूप में जो रोल दिया गया है उससे महिलाएं पूरी तरह से नाख रहती है, उदास रहती है और इनका जीवन
नीरस रहता है। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट है शी आल्सो आर्ग्यूड दैट वुमेन आर अप्रेस्ड। इन्होंने कहा कि जिस तरह का हमारा
पेट्रियकिकल सोसाइटी का ढांचा है उसमें महिलाओं का हमेशा से दमन होता है। महिलाएं हमेशा अप्रेस्ड होती है। और एक इंपॉर्टेंट
बात इन्होंने कही कि इसी वजह से हमें महिलाओं के अधिकारों की वकालत करनी चाहिए। महिलाओं की इक्वलिटी, इक्वल अपॉर्चुनिटी
और महिलाओं को इक्वल एजुकेशनल राइट्स होने चाहिए। तो यह रही इनकी की आर्गुममेंट्स जो आपको अच्छे से याद रखनी है। केट मिलेट केट
मिलेट का जन्म 1934 को हुआ। इनकी डेथ 2017 को अभी हाल ही में हुई और केट मिलेट अमेरिकन फेमिनिस्ट राइटर रही है। आर्टिस्ट
और एक्टिविस्ट रही है। जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए बहुत ज्यादा संघर्ष किया। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि
1970 ईवी में इन्होंने अपनी अक्षय कृति सेक्सुअल पॉलिटिक्स लिखी जिसमें इन्होंने एक कोटेशन दी जो बहुत ही फेमस है।
इन्होंने कहा अ सेक्सुअल रेवोल्यूशन बिगिंस विद द इमसिपेशन ऑफ़ वुमेन हु आर द चीफ विक्टिम्स विक्टिम्स ऑफ़ पैथर्की एंड
आल्सो विद द एंडिंग ऑफ़ होमोसेक्सुअल ऑपरेशन। तो यह कहती है कि अगर भाई हमें लैंगिक क्रांति लानी है तो वह तभी होगी जब
हम महिलाओं को पूरी तरह से मुक्त करेंगे जो कि हमारे समाज में जो पेटियािकल सोसाइटी है उसकी सबसे ज्यादा पीड़ित रही
है और इन्होंने यह भी कहा कि इसके साथ-साथ इसके साथ जो होमोसेक्सुअल ऑपरेशन है उसका भी अंत होगा। तो अब हम बात कर लेते हैं
इनके वर्क्स की। तो सेक्सुअल पॉलिटिक्स जो कि इन्होंने 1970 ईस्वी में लिखी। इसमें इन्होंने दो इंपॉर्टेंट आर्गुमेंट दी
जिसमें इन्होंने कहा मेल शैल डोमिनेट फीमेल। तो इन्होंने कहा कि हमारी समाज में पेट्रियटिकल स्ट्रक्चर इस तरह का है
जिसमें पुरुष महिलाओं को डोमिनेट करते हैं। यानी कि एक ओर से पुरुषों की ही हैज़मानी होती है हमारे समाज में, हमारी
फैमिली में। और दूसरा पॉइंट इन्होंने दिया कि इतना ही नहीं है कि केवल पुरुष ही महिलाओं को डोमिनेट करते हैं बल्कि एल्डर
मेल शैल डोमिनेट यंगस्टर। और इन्होंने कहा कि एक हमारे समाज में या फिर हमारी फैमिली में जो बड़े-बड़े पुरुष होते हैं, जो एज
में ज्यादा होते हैं, वे अपने यंगस्टर यानी कि अपने से कम उम्र के लोगों को भी डोमिनेट करते हैं। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट
राइटिंग्स रही है। जैसे फ्लाइंग 1974, द पॉलिटिक्स ऑफ रियलिटी मदर मिलेट सीता द बेसमेंट द प्रॉस्टिट्यूशन पेपर्स। अब हम
बात कर लेते हैं जीन बेथक एलस्टेन की। इनका जन्म 1941 को हुआ। इनकी डेथ 2013 को हुई थी। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि
यह अमेरिकन फेमिनिस्ट राइटर रही है। पॉलिटिकल फिलॉसफर, एथिस्ट एंड एक्टिविस्ट रही है। और इन्होंने 1973 में वुमेन एंड
पॉलिटिक्स नामक केसिस लिखा जो कि बहुत चर्चित रहा और सबसे इंपॉर्टेंट बात जिसको आपको अच्छे से याद रखना है कि इन्होंने
जस्ट वॉर थ्योरी दी और यह इनकी सेमिनल थ्योरी रही है और नोट करने वाली बात यह है कि जस्ट वॉर थ्योरी को इन्होंने वुमेन
पर्सपेक्टिव से दी। अब हम बात कर लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट वर्क्स की। तो 1987 में इन्होंने वुमेन एंड वॉर नामक एक
महत्वपूर्ण कृति लिखी जिसमें इन्होंने कुछ इंपॉर्टेंट बातें कही। जैसे इन्होंने कहा कि हम पुरुषों को जस्ट वॉरियर के रूप में
दर्शाते हैं। अर्थात केवल पुरुष ही युद्ध लड़ सकते हैं। पुरुष ही युद्ध कर सकते हैं। और महिलाएं तो ब्यूटीफुल सोलर होती
है। यानी कि महिलाओं का काम तो सिर्फ सजना और सवरना होता है। इसके बारे में एलस्टेन कहती है कि यह सिर्फ एक मिथ है। क्योंकि
महिलाएं भी युद्ध कर सकती है। महिलाएं भी वॉरियर हो सकती है। योद्धा हो सकती है। सैनिक की तरह लड़ाई कर सकती है। महिलाएं
सिर्फ सजने सवरने वाली वस्तुएं नहीं होती है या फिर उनका काम सिर्फ सौंदर्य नहीं होता है। सजना सवरना नहीं होता है। तो
इन्होंने बेसिकली यह कहा कि कि पुरुष जस्ट वॉरियर होते हैं। यानी कि पुरुष ही युद्ध लड़ सकते हैं और महिलाएं तो सिर्फ सजने
सवरने तक या फिर घरेलू कामों तक सीमित होती है। यह एक प्रकार का मिथ है। अगली इंपॉर्टेंट राइटिंग इनकी रही है
डेमोक्रेसी ऑन ट्रेल और अगली इंपॉर्टेंट राइटिंग रही है जस्ट वॉर अगेंस्ट टेरर जो कि इन्होंने 2003 में लिखी और इस
महत्वपूर्ण कृति में इन्होंने जहां एक तरफ जस्ट वॉर थ्योरी दी वहीं दूसरी तरफ इन्होंने इस कृति में वॉर ऑन टेरर की भी
बात की। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग रही है। जैसे सोवनिटी गॉड स्टेट एंड सेल्फ अगस्टाइन एंड द लिमिट्स ऑफ पॉलिटिक्स हु
आर बी क्रिटिकल रिफ्लेक्शन एंड होपफुल पॉसिबिलिटीज। मिडिएटेशन ऑन मॉडर्न पिटिकल थॉट पावर
ट्रिप्स एंड अदर जर्नीज एस्स इन फेमिनिज्म एस सिविक डिस्कोर्स फैमिली इन पॉलिटिकल डिस्कोर्स न्यू वाइन एंड ओल्ड वाटर्स रियल
पॉलिटिक्स एट द सेंटर ऑफ एवरीडे लाइफ डेमोक्रेटिक अथॉरिटी एट सेंचुरीज एंड सीबीसी मेसी लेक्चर सीरीज डेमोक्रेसी ऑन
ट्रेल 2011 में यह राइटिंग लिखी पीस इन यूरो पीस इन द वर्ल्ड वेज़ ऑफ़ पीस ग्लोबल पॉलिटिक्स आफ्टर 91 द डेमोक्रेटिया
इंटरव्यूज। यह राइटिंग इन्होंने 2007 में लिखी। अब मैं आपको एक इंपॉर्टेंट बात बताने जा
रहा हूं। इसको थोड़ा सा ध्यान से सुनना। इन्होंने 1981 में एक इंपॉर्टेंट राइटिंग लिखी। पब्लिक मैन एंड प्राइवेट वूमेन।
पहले तो आपको इस राइटिंग को अच्छे से याद रखना है क्योंकि यह एग्जाम में बहुत बार पूछा गया है और पॉसिबिलिटी हमेशा से ही
पूछने की रहती है और दूसरा पॉइंट यह कि आपको इस कृति में जो बातें हैं वह भी अच्छे से याद रखना है। तो इसी कृति में
इन्होंने एक इंपॉर्टेंट चीज बताई जिसमें यह कहती है कि पब्लिक जो वर्ल्ड होता है यानी कि पब्लिक स्फेयर में जितने भी काम
होते हैं वह पुरुषों के द्वारा डोमिनेट किया जाता है। जबकि दूसरी तरफ जो प्राइवेट वर्ल्ड होता है यानी कि फैमिली अफेयर्स
होते हैं, फैमिली रियल होता है उसको महिलाओं के द्वारा डोमिनेट किया जाता है। आप इसको चित्र के द्वारा और डायग्राम के
द्वारा अच्छे से समझ सकते हैं। एक तरफ आप देख सकते हैं पब्लिक मैन और दूसरी तरफ आप देख सकते हैं प्राइवेट वुमेन। बेसिकली
एलस्टेन ने पुरुषों के लिए पब्लिक मैन कहा और महिलाओं के लिए प्राइवेट वुमेन कहा। ऐसा इसलिए है क्योंकि इनका मानना है कि
पब्लिक स्फीयर जो होता है। यानी कि पॉलिटिक्स, आर्ट, एजुकेशन, लिटरेचर और करियर में पुरुषों की ही हैज़ मनी होती है।
पुरुषों का ही दबदबा होता है। और दूसरी तरफ जब हम बात करते हैं प्राइवेट स्फीयर की अर्थात फैमिली की, केयरिंग की, कुकिंग
की, क्लीनिंग की, चाइल्ड रेयरिंग की। तो ये जितने भी काम हैं इनको महिलाओं के द्वारा ही किया जाता है। आप इमेज में भी
देख सकते हैं। तो इस तरह से इन्होंने पुरुषों के लिए पब्लिक मैन कहा और महिलाओं को इन्होंने प्राइवेट वुमेन की संज्ञा दी।
एंड्रिया डॉर्किन इनका जन्म 1946 को हुआ था। इनकी डेथ 2005 को हुई थी। और इनका पूरा नाम एंड्रिया रीता डॉर्किन था। और यह
अमेरिकन रेडिकल फेमिनिस्ट राइटर एंड एक्टिविस्ट रही है। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनको जाना जाता है एनालिसिस
ऑफ पोर्नोग्राफी एंड एंटी पोर्नोग्राफी मूवमेंट एंड एंटी प्रॉस्टिट्यूशन मूवमेंट के लिए भी इनको काफी मात्रा में जाना जाता
है। अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ वर्क्स की। इन्होंने कुछ इंपॉर्टेंट वर्ब्स लिखे हैं। जैसे वुमेन हेडिंग, आवर
ब्लड, द न्यू वुमस ब्रोक हार्ट, पोर्नोग्राफी, मैन पोसेसिंग वुमेन, राइट बीइंग वुमेन, आइस एंड फायर इंटरकोर्स। और
यह लिखा है इन्होंने 1987 में लेटर्स फ्रॉम अ वॉर जोन पोर्नोग्राफी एंड सिविल राइट्स और न्यू डे फॉर वुमस इक्वलिटी। कुछ
और रहे हैं जैसे मर्स 1990 लाइफ एंड डेथ हार्ट ब्रेक 2002 बेलहक्स
बेलहक्स का जन्म 1952 को हुआ अभी तक इनकी डेथ नहीं हुई है और इनका रियल नाम रहा है ग्लोरिया जीन बॉटकिंस और इनको सामान्यता
जाना जाता है इनके पेन नेम से बेलहक्स और यह अमेरिकन ऑथर फेमिनिस्ट और सोशल एक्टिविस्ट रही है
और खासतौर पे यह ब्लैक फेमिनिज्म से जुड़ी रही है जिसको हम अगली वीडियो में अच्छे से डिस्कस करेंगे।
अब हम बात कर लेते हैं इनके इंपॉर्टेंट वर्क्स की। इनके बहुत सारे वक्स रहे हैं। जैसे फेमिनिस्ट थ्योरी फ्रॉम मार्जिन टू
सेंटर टॉकिंग बैक थिंकिंग फेमिनिस्ट थिंकिंग ब्लैक इयरिंग इयर्निंग बिलोंगिंग द कल्चर ऑफ प्लेस
ब्लैक लुक्स अ वुमस मोरिंग सॉन्ग आउट लॉ कल्चर टीचिंग टू ट्रांस ग्रेस किलिंग ग्रेस एंडिंग रेसिज्म बोर्न ब्लैक मेमोरीज
ऑफ गर्लहुड ऑल अबाउट लव न्यू विजन हैप्पी टू बी नेपी रिमेंबर रैप्चर वेयर वी स्टैंड क्लास
मैटर्स फेमिनिज्म इज फॉर एवरीबॉडी सेल्वेशन ब्लैक पीपल एंड लव बी बॉय बज कम्युनियन द फीमेल सर्च फॉर लव होममेड लव
बी रियल कूल ब्लैक मैन एंड मैस्कुलिनिटी कुछ और रहे हैं जैसे द विल टू चेंज स्किन अगेन सोल सिस्टर वुमेन फ्रेंडशिप एंड
फुलफिलमेंट वी लव बेबी लव 2007 तो यह थे कुछ इनके इंपॉर्टेंट वक्स जर्मेन ग्रियर जर्मेन ग्रियर का जन्म 1939 को हुआ था और
यह ऑस्ट्रेलियन राइटर पब्लिक इंटेलेक्चुअल रहे हैं और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनको सेकंड वेव ऑफ़ फेमिनिस्ट मूवमेंट के
मेजर बॉयस या फिर प्रमुख नारीवादी विचारक माना जाता है। और इन्होंने एक इंपॉर्टेंट कोट दी जो बहुत ही प्रसिद्ध है जिसमें यह
कहती है वुमेन हैव वेरी लिटिल आईडिया ऑफ़ हाउ मच मैन हेट देम। यह कहती है कि महिलाओं को इस बात का बहुत कम अंदाजा होता
है कि पुरुष किस हद तक या फिर पुरुष महिलाओं से कितनी नफरत करते हैं। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे द फीमेल
इनंच द ऑब्सकल रेस सेक्स एंड डेस्टिनी द मेड वुमेन अंडर क्लोथ्स शेक्सपियर्स द चेंज द होल वुमेन
द ब्यूटीफुल बॉय पो्स फॉर गार्डनर्स द फ्यूचर ऑफ फेमिनिज्म यह भी इनकी अक्षय कृति रही है ऑन रेज 2010 एंड लास्ट बट नॉट
लीस्ट ऑन रेज 2018 अब हम बात कर लेते हैं सिंथिया एनलॉय की। इनका जन्म 1938 को हुआ था और यह एक बहुत
बड़ी फेमिनिस्ट राइटर और पॉलिटिकल थ्योरिस्ट रही है। जिनको कि जेंडर एंड मिलिट्री के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता
है। क्योंकि जेंडर एंड मिलिट्री पर इनका काफी वर्क रहा है। काफी काम रहा है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने
इंटरनेशनल रिलेशन में भी फेमिनिज्म में काफी कंट्रीब्यूट किया। अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स की।
एथेनिक कॉन्फ्लिक्ट एंड पॉलिटिकल डेवलपमेंट बनानाज़, बीसीस एंड बेसिस, द मॉर्निंग आफ्टर सेक्सुअल पॉलिटिक्स एट द
एंड ऑफ द कोल्ड वॉर मेने द इंटरनेशनल पॉलिटिक्स ऑफ मिलिटराइजिंग वुमस लाइफ्स, द को द क्यूरियस फेमिनिस्ट ग्लोबलाइजेशन एंड
मिलिटरिज्म। अब बात कर लेते हैं शैला रबाथम। इनका जन्म 1943 को हुआ था। और सबसे
इंपॉर्टेंट बात यह है कि जहां एक तरफ यह ब्रिटिश फेमिनिस्ट रही है और सोशलिस्ट फेमिनिस्ट थ्योरिस्ट और हिस्टोरियन रही
है। वहीं सबसे बड़ी बात यह भी है कि सोशलिस्टिक फेमिनिज्म जो रहा है उस ट्रेडिशन से उस विचारधारा से यह बिलोंग
करती है। यानी कि इन्होंने फेमिनिज्म का सोशलिस्टिक मेन स्ट्रीम जो है या फिर पर्सपेक्टिव है उससे संबंधित इन्होंने
अपने विचार दिए। अब हम बात कर लेते हैं इनके कुछ वक्स की। तो, यह इनके कुछ वक्स रहे हैं। जैसे वुमस लिबरेशन एंड द न्यू
पॉलिटिक्स, वुमेन रेसिस्टेंस एंड रेवोल्यूशन, वुमस कॉन्शियसनेस एंड मैनस वर्ल्ड, हिडन फ्रॉम हिस्ट्री। यह भी इनकी
काफी अक्षय कृति रही है। जिसमें यह कहती है कि समाज में महिलाओं की इस तरह की पोजीशन रही है कि हमें इतिहास में महिलाओं
का कहीं नाम नहीं दिखाई देता है। यानी कि महिलाएं इतिहास से पूरी तरह से हिडन है, छुपी हुई है। क्योंकि महिलाओं को हमेशा घर
की चार दीवारी तक रखा गया और कुकिंग, क्लीनिंग और केयरिंग जैसे कामों तक ही सीमित रखा गया। इसीलिए महिलाएं हिडन फ्रॉम
हिस्ट्री है। अगली इनकी राइटिंग है अ न्यू वर्ल्ड ऑर्डर फॉर वुमेन सोशलिज्म एंड द न्यू लाइफ ब्यूटीफुल डॉटर्स बिय्ड द
फ्रेगमेंट्स ड्रीम्स एंड डायलेमाज़ और कुछ और राइटिंग्स है जैसे न्यू पॉलिटिक्स
वुमेन इन मूवमेंट और सेंचुरी ऑफ़ वुमेन प्रॉमिस ऑफ अ ड्रीम। तो यह रही है इनकी इंपॉर्टेंट राइटिंग्स जो एग्जाम की दृष्टि
से और आपकी नॉलेज की दृष्टि से बहुत ही ज्यादा इंपॉर्टेंट है। नसी चदो इनका जन्म 1943 को हुआ और नसी जूलिया चौरो अमेरिकन
सोशियोलॉजिस्ट रही है। प्रोफेसर रही है और साइको एनालिटिकल फेमिनिस्ट रही है। इसका मतलब यह है कि इनको जाना जाता है साइको
एनालिटिकल फेमिनिज्म के लिए। यानी कि इन्होंने नारीवाद का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण दिया। अब हम बात कर लेते हैं
इनके इंपॉर्टेंट वर्क्स की। इनका सबसे प्रमुख कार्य रहा है द रिप्रोडक्शन ऑफ मदरिंग जो कि इन्होंने 1978 में लिखा। कुछ
और है जैसे फेमिनिज्म एज साइको एनालिटिकल थ्योरी 1989 इंडिविजुअलाइजिंग जेंडर एंड सेक्सुअलिटी थ्योरी एंड प्रैक्टिससेस 2012
द पावर ऑफ फीलिंग्स 1999 फेमिनिटीज, मैस्कुलिनिटीज एंड सेक्सुअलिटीज 1994।
अब हम बात कर लेते हैं मैरी एस्टेल की। यह बहुत पुरानी नारीवादी विचारक रही हैं। इनका जन्म इंग्लैंड में हुआ था 1666 ईस्वी
में और इनकी डेथ 1731 ईवी को हुई थी। यह इंग्लिश प्रोफेसर एंड फेमिनिस्टिक थिंकर रही है। जिन्होंने पहली बार महिलाओं के
लिए समान रूप से शैक्षिक अवसरों की वकालत की। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इनको जाना जाता है द फर्स्ट इंग्लिश फेमिनिस्ट
विचारक। तो इनको पहले इंग्लिश नारीवादी विचारक के रूप में जाना जाता है। इनकी कुछ इंपॉर्टेंट राइटिंग्स रही है। जैसे अ
सीरियस प्रपोजल टू द लेडीज 1694 सम रिफ्लेक्शंस अपॉन मैरिजेस 1700 द फर्स्ट इंग्लिश फेमिनिस्ट रिफ्लेक्शन ऑन मैरिज
1996 86 1986 तो यह बाद में जाकर 1986 में पब्लिश हुई थी। जुदित बटलर इनका जन्म 1956
को हुआ था और यह अमेरिकन फिलॉसफर जेंडर थ्योरिस्ट रही है। जिनके वक्स की वजह से पॉलिटिकल फिलॉसोफी काफी मात्रा में
प्रभावित हुई। खासतौर पे फेमिनिज्म काफी प्रभावित हुआ। और एक इंपॉर्टेंट बात यह है कि यह थर्ड वेव ऑफ़ फेमिनिज्म से जुड़ी रही
है। और थर्ड वेव ऑफ़ फेमिनिज्म को हमने लास्ट वीडियो में डिस्कस किया था। अगर आपने अभी तक वह वीडियो नहीं देखी है तो आप
उसको भी देख सकते हैं। और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि इन्होंने दो इंपॉर्टेंट आइडियाज दिए और यह है जेंडर एज सोशल
कंस्ट्रक्शन। इन्होंने कहा कि जब हम जेंडर की बात करते हैं तो यह कोई प्राकृतिक नहीं है क्योंकि जेंडर को हमारे जो सामाजिक
नॉर्म्स है उसके द्वारा बनाया गया है। यानी कि जेंडर सोशली और कल्चरली कंस्ट्रक्टेड है जिसमें केवल पुरुषों को
हीेंस दी जाती है। यानी कि पुरुषों को ही फायदा मिलता है और महिलाओं की हमेशा शोषण होता है या फिर महिलाओं का हमेशा दमन किया
जाता है। और दूसरी बात इन्होंने की जेंडर परफॉर्मेंसिविटी की जिसमें यह कहती है कि जेंडर का जो निर्माण किया गया है वह
परफॉर्मेंस के आधार पे किया गया है। जिसमें यह कहती है कि पुरुषों को केवल इस आधार पर श्रेष्ठ बनाया गया है कि ऐसा लगता
है कि उनकी जो परफॉर्मेंस है वह पब्लिक स्फीयर में दिखाई देती है। यानी कि पुरुष पढ़ने में अच्छे हैं। उनके पास दिमाग
अच्छा है। बिजनेस कर सकते हैं। एजुकेशन प्राप्त कर सकते हैं। पॉलिटिक्स में भाग ले सकते हैं। वहीं महिलाओं को उनके
परफॉर्मेंस अर्थात उनके गुणों के आधार पर कि महिलाएं सेंसिटिव होती है, सुंदर होती है। इसीलिए उनका काम सजना सवरना है। घर के
काम करने हैं। तो ये दो इंपॉर्टेंट कांसेप्ट इन्होंने दिए जिनको आपको अच्छे से याद रखना है। अब हम बात कर लेते हैं
इनके वर्क्स की। तो इन्होंने सबसे इंपॉर्टेंट कृति लिखी जेंडर ट्रबल 1990 में। जिसको कि थर्ड वेव ऑफ फेमिनिज्म की
अक्षय कृति मानी जाती है। इसीलिए आपने इसको अच्छे से याद रखना। बॉडीज दैट मैटर यह भी इंपॉर्टेंट राइटिंग है। ऑन द
डिस्कर्सिव लिमिट्स ऑफ सेक्स अनडूइंग जेंडर द फोर्स ऑफ नॉन वायलेंस एंड एथिकोपिलिटिकल माइंड सब्जेक्ट्स ऑफ डिजायर
नोट्स टवर्ड्स ऑफेटिव थ्योरी ऑफ असेंबली सेंसेस ऑफ द सब्जेक्ट कैरोल पैटमैन इनका जन्म 1940 ईवी को हुआ
और यह एक बहुत बड़ी फेमिनिस्ट थिंकर रही है थ्यरिस्ट रही है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह जानी जाती है क्रिटिक ऑफ लिबरल
डेमोक्रेसी। इन्होंने उदार लोकतंत्र की आलोचना की जिसकी वजह से यह काफ़ी प्रसिद्ध है और फ़ेमिनिस्ट थिंकर तो यह रही ही है।
इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं जैसे द सेक्सुअल कॉन्ट्रैक्ट 1997 पार्टिसिपेशन एंड डेमोक्रेटिक थ्योरी 1970 कॉन्ट्रैक्ट
एंड डोमिनेशन 2007 द डिसऑर्डर ऑफ वुमेन द प्रॉब्लम ऑफ पॉलिटिकल ऑब्लिगेशंस डेमोक्रेसी फ्रीडम एंड स्पेशल राइट्स। तो
यह रहे हैं इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स। कैरोल गिलगन इनका जन्म 1936 ईवी को हुआ था। और कैरोल गिलगन अमेरिकन फेमिनिस्ट
पॉलिटिकल थ्योरिस्ट एंड सबसे बड़ी बात यह है कि यह एथिकल कम्युनिटी के साथ एसोसिएटेड रही है। और इनके बहुत सारे
इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे इन अ डिफरेंट वॉइस 1982 और यह सबसे इंपॉर्टेंट वर्क इनका यह रहा है। जॉइनिंग द
रेसिस्टेंस व्हाई डज़ पेट्रियाकी पर्सिस्ट 2018 में इन्होंने हाल ही में यह वर्क लिखा। अ बर्थ ऑफ प्लेजर और न्यू मैप ऑफ लव
डार्कनेस नाउ वििबल पेट्रिय्कीस रिसर्जेंस एंड फेमिनिस्ट रेसिस्टेंस 2018 बर्थ ऑफ प्लेजर प्रूफ 2002 तो यह रहे हैं इनके कुछ
इंपॉर्टेंट वक्स कैरोल हेनिस्ट इनका जन्म 1970 में हुआ और कैरोल हेनिस्ट रेडिकल फेमिनिस्ट थिंकर रही
है और पॉलिटिकल थ्यरिस्ट रही है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह न्यूयॉर्क रेडिकल वुमेन एंड रेड स्टॉकिं्स की सदस्य रही है
जो कि अमेरिका में बहुत प्रसिद्ध ऑर्गेनाइजेशन रहा है और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने एक इंपॉर्टेंट
फेमस प्रेज दिया जिसका नाम है पर्सनल इज पॉलिटिकल 1970 के दशक में इन्होंने यह बहुत ही इंपॉर्टेंट स्लोगन बहुत ही
इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया। अगर आपने अभी तक इस कांसेप्ट को नहीं समझा है तो आप हमारी लास्ट की वीडियो देख सकते हैं। उस
वीडियो में मैंने अच्छे से समझाया है। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं। जैसे पॉलिटिक्स ऑफ द गिफ्ट्स 1969
फाइट ऑन सिस्टर्स एंड अदर सॉन्ग्स फॉर लिबरेशन विदाउट अपोलॉजी द अबॉर्शन स्ट्रगल नाउ।
सुसन मोलर ओकिन इनका जन्म 1946 को हुआ था और इनकी डेथ 2004 को हुई थी। यह न्यूजीलैंड बोर्न यूएस लिबरल फेमिनिस्ट
थिंकर रही है। पॉलिटिकल फिलॉसफर एंड ऑथर रही है। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे जस्टिस जेंडर एंड द फैमिली
1989 और यह इनका प्रमुख वर्क रहा है। इज मल्टील्चरलिज्म बैड फॉर वुमेन? 1999 और यह तो इनका बहुत ही इंपॉर्टेंट वर्क रहा है
और यह एग्जाम में भी कई बार पूछा गया है। वुमेन इन वेस्टर्न पॉलिटिकल थॉट 1979 जॉन स्टवरर्ट मिल द सब्जेक्शन ऑफ वुमेन भी
इनकी एक महत्वपूर्ण कृति रही है। आइरिस मेरियन यंग इनका जन्म 1949 को हुआ था और इनकी डेथ 2006 को हुई थी। यह अमेरिकन
पॉलिटिकल थरिस्ट रही हैं और सोशलिस्टिक फेमिनिस्ट थिंकर रही है। इसका मतलब यह है कि यह सोशलिस्टिक फेमिनिज्म से जुड़ी एक
महत्वपूर्ण नारीवादी विचारक रही है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने नेचर ऑफ जस्टिस एंड सोशल डिफरेंसेस जैसे मुद्दों
पर इन्होंने अपना रिसर्च किया, फोकस किया। यानी कि जो सोशल डिफरेंसेस होते हैं हमारी सोसाइटी में जहां पर महिलाओं को कमेंस
होती है और पुरुषों का दबदबा होता है। ऐसे डिफरेंसेस पर इन्होंने ज्यादा फोकस किया। इनके कुछ इंपॉर्टेंट वर्क्स रहे हैं। जैसे
जस्टिस एंड द पॉलिटिक्स ऑफ डिफेंस 1990, इंट इंटरसेक्टिंग वॉइसेस 1997 इल्ल्यूजन एंड डेमोक्रेसी यह भी इनकी एक महत्वपूर्ण
कृति रही है जो कि इन्होंने 2000 में लिखी रिस्पांसिबिलिटी फॉर जस्टिस 2011 ऑन फीमेल बॉडी एक्सपीरियंस 2004
अब हम कन्फशियस की लाइफ को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो इसमें पहला पॉइंट यह आता है कि यह चीन के बहुत बड़े फिलॉसफर
रहे हैं जो कि गौतम बुद्धा और स्वामी महावीर के कंटेंपररी माने जाते हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि इनका जन्म होता है
चाइना के स्टेट ऑफ लू के गुफों में। कन्फ्यूस के फादर का नाम था कंगघही और इनकी माता का नाम था यान जंगजाई। अगली
महत्वपूर्ण बात यह है कि इनका रियल नेम था कंगफूजी जिसका मतलब होता है अ मास्टर कंग। अगली महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यह
चाइनीज़ फिलॉसोफर रहे, पॉलिटिशियन रहे, टीचर रहे जिनको वाइडली रिगार्ड किया जाता है वन ऑफ द मोस्ट इन्फ्लुएंशियल थिंकर इन
[संगीत] चाइनीस हिस्ट्री। इनकी अगली बात यह भी इंपॉर्टेंट है कि इनको चाइना के फर्स्ट टीचर के रूप में जाना जाता है और
अपने थॉट्स अपने आइडिया को जनरेट करने के लिए आगे बढ़ाने के लिए इन्होंने रूस स्कूल ऑफ थॉट की स्थापना की जो कि चाइना में एक
प्रकार का इंपॉर्टेंट स्कूल था जिसकी वजह से ही इनके जो आइडियाज है उसको कन्फ्यूशनिज्म कहा जाता है। अगली
इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि यह ह्यूमनिस्ट थिंकर थे जिसके अंतर्गत इन्होंने पीस और काइंडनेस की बात की और सबसे महत्वपूर्ण
बात यह है कि इनकी जितनी भी टीचिंग्स रही है इसको कलेक्टिवली जाना जाता है कन्फ्यूजनिज्म जिसके अंतर्गत इन्होंने
पर्सनल एंड गवर्नमेंटल मोरालिटी की बात की। करेक्टनेस ऑफ सोशल रिलेशनशिप की बात की। जस्टिस और सिंसियरिटी की बात की।
कन्फ्यूशियस ने जैसे ही अपनी एजुकेशन को कंप्लीट किया तो सबसे पहले इन्होंने [संगीत] मैजिस्ट्रेट के रूप में जॉब की।
फिर इसके बाद इन्होंने असिस्टेंट मिनिस्टर ऑफ पब्लिक वक्स के रूप में काम किया। फिर इन्होंने स्टेट ऑफ लू के मिनिस्टर ऑफ
जस्टिस के रूप में काम किया। अगली इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि इनके आइडियाज ह्यूमनिटेरियन थे। जबकि दूसरी तरफ स्टेट
ऑफ लू बिलीव करता था बोर और अनाकी के ऊपर जिसकी वजह से इनके [संगीत] डिसअपॉइंटमेंट या फिर क्लैशेस हो गए स्टेट ऑफ लू के साथ
और इनको स्टेट ऑफ लू को छोड़ना पड़ा और 12 वर्ष के दौरान इन्होंने चाइना में डिफरेंट-डिफरेंट प्लेसेस को विजिट किया और
जैसे ही कन्फ्यूशियस 68 वर्ष की अवस्था में अपने नेटिव होम स्टेट ऑफ लू आते हैं तो यह एक मजे हुए व्यक्ति थे। यानी कि
इनको एक प्रकार से एनलाइटनमेंट प्राप्त हो गया था। जिसकी वजह से इन्होंने अपनी फिलॉसोफी को शुरू किया और [संगीत]
इन्होंने फाउंडेशन रखी चाइनीस फिलॉसोफी की जिसको कि कलेक्टिवली जाना जाता है कन्फ्यूशनिज्म। अब हम कन्फ्यूशियस के
लिटरेचर को अच्छे से समझ लेते हैं क्योंकि आपके एग्जाम के लिए इनके लिटरेचर को जानना, इनके वर्क्स को जानना बेहद
इंपॉर्टेंट है। तो इसमें इनका पहला वर्क आता है एनालेक्ट्स ऑफ कन्फशियस। जिसकी खास बात यह है कि यह एक प्रकार का कलेक्शन है
जो इनकी सेइंग्स रही है, टीचिंग्स रही है, डायलॉग्स रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि इस वर्ब को माना जाता है मोस्ट रिलायबल
सोर्स ऑफ कन्फशियस थॉट। अगली इनकी वर्क यानी कि राइटिंग [संगीत] आती है मेंशियस जिसमें इन्होंने मेंशियस के साथ और इनके
जो स्टूडेंट रहे हैं, ग्रैंड सन रहे हैं, वेरियस रूलर्स रहे हैं, स्कॉलर्स [संगीत] रहे हैं, जितने भी इनके डायलॉग्स रहे इनके
साथ उनका यह कलेक्शन है। अगला इनका वर्क आता है द ग्रेट लर्निंग जिसका मतलब यह है कि इसके अंतर्गत इन्होंने गाइडेंस [संगीत]
दी लोगों को अपने स्टूडेंट्स को कि किस तरह से स्वयं को कल्टीवेट करना है, खुद को क्रिएट करना है और दूसरों के ऊपर गवर्न
करना है, रूल करना है। अगला इनका वर्क आता है द डॉक्ट्रिन ऑफ द मीन। इसके अंतर्गत इन्होंने कहीं ना कहीं मिडिल वे या फिर
गोल्डन मीन का कांसेप्ट दिया जिसको बाद में एरिस्टोटल ने भी दिया था। जिसके अंतर्गत इन्होंने यह कहा कि हमें बीच का
रास्ता अपनाना चाहिए क्योंकि वही हमारे लिए बेहतर होता है। कन्फशियस का अगला वर्क आता है द बुक ऑफ हिस्ट्री। यह बेसिकली
कलेक्शन है हिस्टोरिकल डॉक्यूमेंट का जिसके अंतर्गत इन्होंने बहुत सारी स्पीशीज दी। और अगला इनका वर्क आता है द बुक ऑफ
पोएट्री। यह एक बेसिकली कलेक्शन है इनकी पोएम्स का, इनकी पोएट्री का और अगला इनका वर्क आता है द बुक ऑफ चेंजेस [संगीत]
जिसके अंतर्गत इन्होंने फ्यूचर में क्या होगा, क्या होना चाहिए, क्या-क्या चेंजेस होंगे? इसके बारे में फिलॉसोफी दी है और
इनका लास्ट वर्क आता है जिसका नाम है द स्प्रिंग एंड ऑटम एनल्स। और यह हिस्टोरिकल टेक्स्ट माना जाता है और इसको सबसे
इंपॉर्टेंट बुक मानी जाती है इनकी। अब हम कन्फ्यूशियस की फिलॉसोफी को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं। तो इसमें इनकी पहली
थ्योरी आती है द थ्योरी ऑफ डिवाइन ओरिजिन ऑफ द स्टेट जिसको आप हिंदी में कहते हैं राज्य की दैवीय उत्पत्ति [संगीत] का
सिद्धांत। तो सबसे पहली बात यह है कि कन्फ्यूशियस ने मोनार्की को सपोर्ट किया और इन्होंने फुडलिज्म को भी सपोर्ट किया
क्योंकि इनके समय में चीन में बड़ी मात्रा में मोनार्की थी। फ्यूडलिज्म था। लेकिन विचारणीय बात यह भी है कि इन्होंने
ऑटोक्रेटिक मोनार्की और एक्सप्लॉयटेटिव फुडलिज्म की बड़ी मात्रा में आलोचना की। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि
इन्होंने यह कहा कि तीन इंपॉर्टेंट पावर्स होती है जिसमें पहली आती है ईश्वर की यानी कि गॉड की। दूसरी पावर इसमें आती है स्टेट
की और तीसरी पावर इसमें आती है पीपल की। इसका मतलब यह हुआ कि जहां कन्फ्यूशियस ने एक तरफ गॉड की बात की है, गॉड की पावर की
बात की है, वहीं दूसरी तरफ इन्होंने स्टेट की सोवनिटी की भी बात की है और साथ में इन्होंने पीपल की सोवनिटी की भी बात की
है। कन्फ्यूशियस ने महत्वपूर्ण कोट दिया जिसमें इन्होंने यह कहा कि अनजस्ट रूल इज मोर डेंजरस देन अ [संगीत] लायन। जिसका
मतलब यह है कि अन्यायपूर्ण शासन शेर से भी भयानक होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शेर केवल बॉडी को खा जाता है। लेकिन जहां पर
अनजस्ट रूल होता है वहां लोगों की आत्मा को खाया जाता है। उनकी चेतना को मारा जाता है। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन्होंने
कौटिल्य की तरह यह कहा एज द किंग सो आर द सब्जेक्ट्स। जिसका मतलब यह है कि यथा राजा तथा प्रजा अर्थात जिस राज्य में जैसा राजा
होगा वैसी ही प्रजा होगी। अगली इंपॉर्टेंट बात यहां पर यह भी आती है कि इन्होंने यह कहा कि किंग गॉड का रिप्रेजेंटेटिव होता
है और दूसरी बड़ी बात यह भी है कि इन्होंने कहा कि स्ट्रांग सेंट्रल गवर्नमेंट होनी चाहिए और ऐसा इसलिए है
क्योंकि इनके समय में चीन डिफरेंट-डिफरेंट प्रोविंसेस में बटा हुआ था। तो उसको यूनाइट रखने के लिए एकजुट रखने के लिए
इन्होंने स्ट्रांग सेंट्रल गवर्नमेंट की बात की। कन्फ्यूशियस का अगला कांसेप्ट आता है आइडियल स्टेट। तो इनकी खास बात यह है
कि इन्होंने यह कहा कि जो ऑफिशियल्स होते हैं और पब्लिक होती है उनको हमेशा अपने जीवन में मोरल रूल्स और ड्यूटी को फॉलो
करना चाहिए। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इन्होंने यह कहा कि जो [संगीत] आइडियल स्टेट होता है इसके फाइव कोर प्रिंसिपल्स
होते हैं। जिसमें पहला आता है रेन जिसको आप हिंदी में कहते हैं परोपकार और इंग्लिश में कहते हैं वेनवुलेंस। इसकी खास बात यह
है कि इन्होंने कहा कि जब आप दूसरों को ट्रीट करते हैं तो उसमें काइंडनेस होनी चाहिए, कंपैशन होना चाहिए, एंपैथी होनी
चाहिए। अगला कांसेप्ट आता है ई जिसका मतलब होता है राइटियसनेस जिसको आप धार्मिकता कहते हैं। इसका मतलब यह है कि जो भी आप
काम करते हैं, उसको आप धर्म के अनुसार करें। सही रूप से करें, जस्ट के साथ करें। हालांकि यह काम करना डिफिकल्ट होता है।
अगला कांसेप्ट इसमें आता है ली जिसको आप एटीिक्वेट कहते हैं यानी कि शिष्टाचार कहते हैं। इसका मतलब यह है कि आपको सोशल
नॉर्म्स को फॉलो करना होता है और दूसरों के साथ आप अच्छा व्यवहार रखें। अगला कांसेप्ट आता है शिन। इसका मतलब है
इंटेग्रिटी [संगीत] यानी कि ईमानदारी या फिर सत्य निष्ठा के साथ कार्य करना। दूसरों के प्रति आप हमेशा से ट्रू रहें,
फेथफुल रहें और आप अपने जीवन में प्रमाणिक रूप से रहें। ईमानदारी से अच्छे से काम करें। और लास्ट इसमें आता है जी जिसका
मतलब होता है विज़डम बुद्धि। इसका मतलब यह है कि कन्फिशियस कहते हैं कि इंसान को हमेशा नॉलेज को कल्टीवेट करना होगा।
अंडरस्टैंडिंग को इंक्रीस करना होगा और डिसर्नमेंट को बढ़ाना होगा। यानी कि विवेक को विकसित [संगीत] करना होगा। विज़डम को
इनक्रीस करना होगा। अगली इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि कन्फशियस कहते हैं कि किंग को टिट फॉर टैट की पॉलिसी अपनानी चाहिए।
जिसका मतलब यह है कि कन्फ्यूशियस कहीं ना कहीं रियलिस्टिक थिंकर थे ना कि आइडियलिस्टिक थिंकर थे। अगली महत्वपूर्ण
बात यह भी आती है कि कन्फ्यूसियस ने हायरार्किकल सोशल सिस्टम की बात की जिसके अंतर्गत इन्होंने यह कहा कि समाज में
हायरार्की और इनकलिटी [संगीत] पाई जाती है जो कि नेचुरल है क्योंकि यह गॉड गिवन है और अगली इंपॉर्टेंट बात यह भी रही कि
इन्होंने कहीं ना कहीं पब्लिक एजुकेशन के ऊपर भी बड़ी मात्रा में जोर दिया। एक तरफ जहां कन्फ्यूशियस ने यह कहा कि स्टेट किंग
की फैमिली का रिटलार्ज होता है। अर्थात राज्य के परिवार का ही विस्तृत रूप होता है। बृहत रूप होता है। यह कन्फ्यूशियस ने
कहा। वहीं दूसरी तरफ प्लेटो ने कहा कि स्टेट [संगीत] इज एन इंडिविजुअल रिटलार्ज। जिसका मतलब यह है कि राज्य व्यक्ति का
बृहत रूप होता है। तो इन दोनों पॉइंट को आप अच्छे से याद रखें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है।
[संगीत] अब हम कन्फ्यूशियस के एजुकेशन की स्कीम को अच्छे से समझ लेते हैं। तो इनकी एजुकेशन
की स्कीम की पहली बात यह है कि इन्होंने कहा कि जो एजुकेशन होता है वह पर्सनल डेवलपमेंट का मीन होता है। सोशल मोबिलिटी
और मोरल कल्टीिवेशन एजुकेशन के द्वारा होना चाहिए। ऐसी मान्यता कन्फ्यूशियस की रही है। अगला पॉइंट यह है कि इनकी जो
फिलॉसोफी ऑफ़ एजुकेशन रही है, इसके इन्होंने तीन आधार बताए हैं। तीन बातें बताई हैं। जिसमें पहला इसमें आता है सेल्फ
कल्टीिवेशन यानी कि एजुकेशन ऐसी होनी चाहिए जिसके द्वारा आप सेल्फ कल्टीिवेशन कर सके, स्वाध्याय कर सकें। अगला मेथड
इसमें आता है मोरल एजुकेशन। यानी कि आपकी जो एजुकेशन है उसके अंदर मोरालिटी होनी चाहिए। और तीसरा आता है इंटेलेक्चुअल
क्यूरियोसिटी। [संगीत] जिसका मतलब यह है कि आपके अंदर कहीं ना कहीं इस बात की जिज्ञासा होनी चाहिए।
क्यूरियोसिटी होनी चाहिए [संगीत] कि आप कौन हैं? आपके अंदर जो कॉन्शियसनेस है, जो आत्मा है, वह क्या है? आप क्या हो? आपका
जन्म क्यों हुआ है? यह जितने भी सारे इंटेलेक्चुअल क्वेश्चंस हैं, वह आपके अंदर होने चाहिए और इनका जवाब लेने की क्षमता
आपके अंदर होने चाहिए। यानी कि जिज्ञासा होनी चाहिए। कन्फशियस ने एजुकेशन के तीन इंपॉर्टेंट मेथड्स की बात की है। जिसमें
पहला मेथड आता है क्वेश्चनिंग और डायलॉग। इसका मतलब यह है कि आप क्वेश्चनिंग [संगीत] कर सकते हैं, प्रश्न कर सकते हैं
और दूसरों के साथ डायलॉग कर सकते हैं। जब आप क्वेश्चनिंग करते हैं, डायलॉग करते हैं तो आप एजुकेशन यानी कि लर्निंग को प्राप्त
करते हैं। इसका दूसरा मेथड आता है स्टोरी टेलिंग और एनालॉजीस। इसका मतलब यह है कि जो कहानियां होती है, उपमाएं होती है,
उससे भी आप एजुकेशन को गेन [संगीत] कर सकते हैं। और इसमें तीसरा मेथड आता है प्रैक्टिकल एप्लीकेशन। जिसका मतलब यह है
कि जो आप सीख रहे हैं, जिस नॉलेज को आप प्राप्त कर रहे हैं, उसको प्रैक्टिकली अप्लाई करना। और सबसे बड़ी बात यह है कि
इन्होंने एजुकेशन के तीन इंपॉर्टेंट गोल्स की बात की। जिसमें पहला गोल आता है पर्सनल डेवलपमेंट। दूसरा गोल आता है सोशल
मोबिलिटी और तीसरा गोल इसमें आता है सर्विस टू सोसाइटी। कन्फशियस ने ऐसे तीन तरीके बताए हैं जिनकी वजह से आप नॉलेज को
गेन कर सकते हैं। या आप यह भी कह सकते हैं कि कन्फशियस के अनुसार तीन प्रकार की नॉलेज होती है। तो इसमें पहली नॉलेज
[संगीत] आती है रिफ्लेक्शन प्रतिबिंबित नॉलेज जिसको आप कहते हैं। इसकी खास बात यह है कि यह सबसे नोवेलेस्ट वे होता है विज़डम
को प्राप्त करने का और इसकी खास बात यह है कि यह कहते हैं कि जो रिफ्लेक्शन होता है वो मेडिटेशन के द्वारा आता है जब आप सत्य
को एज इट इज़ देखते हैं। जैसे किसी मिरर के ऊपर लाइट पड़ती है तो वह रिफ्लेक्ट होती है एज इट इज़। उसी तरीके से मेडिटेशन से भी
सत्य एज इट इज आपको दिखाई देता है। आपको यह पता चलता है कि अल्टीमेटली आप कौन हैं? तो इसमें आपको फर्स्ट हैंड नॉलेज मिलती
है। इसीलिए इसको विज़डम को, नॉलेज को गेन करने का सबसे नवेलेस तरीका माना जाता है। इसमें दूसरा तरीका आता है इमिटेशन जिसको
आप नकल करना, कॉपी करना कहते हैं। तो, इसकी खास बात यह है कि इसमें आप दूसरों के एक्सपीरियंसेस सीखते हैं और इसको नॉलेज को
प्राप्त करने का सबसे इजीिएस्ट तरीका माना जाता है। क्योंकि इसमें आप दूसरों की नकल करते हैं। उदाहरण के लिए सोसाइटी में
एक्सपर्ट्स हैं या बहुत ग्रेट माइंड्स हैं, एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी पीपल हैं। उनके एक्सपीरियंस से आप सीखते हैं। वहां से आप
नकल करते हैं, कॉपी करते हैं, इमिटेशन करते हैं। इसके अलावा बुक्स हैं, पोस्ट हैं या फिर बायोग्राफीज़ हैं, पडकास्ट है,
इंटरव्यूज है। इन सभी से आप सीखते हैं, वहां से नकल करते हैं। इसीलिए इसको आप नकल करना कहते हैं और इसको आप सबसे इजीिएस्ट
तरीका मानते हैं नॉलेज को गेन करने का। इसमें तीसरा आता है एक्सपीरियंस यानी कि अनुभव। इसकी खास बात यह है कि आप दूसरों
के एक्सपीरियंस के बाद अब आप खुद के एक्सपीरियंसेस सीखते हैं। और इसको कन्फ्यूशियस ने बिट्रेस्ट वे माना है।
यानी कि सबसे कड़वा तरीका माना है नॉलेज को प्राप्त करने का। और ऐसा इसलिए है क्योंकि कन्फशियस कहते हैं कि जो तीसरा
तरीका है यानी कि एक्सपीरियंस है यह विटरेस्ट होता है क्योंकि इसमें काफी समय लग जाता है। टाइम कंज्यूमिंग होता है और
इसमें आपको काफी हार्ड वर्क करना होता है क्योंकि आपको खुद के एक्सपीरियंस से होकर गुजरना होता है। तब जाकर कहीं आपको नॉलेज
गेन होती है। [संगीत] अब हम कन्फशियस के कॉमनव्थ के आईडिया को
अच्छे से समझ लेते हैं। तो इसमें पहली बात यह है कि इन्होंने कहा कि सोसाइटी का वेलफेयर होना चाहिए ना कि इंडिविजुअल का
वेलफेयर होना चाहिए। और ऐसा इसलिए है क्योंकि इन्होंने कहा कि अगर सोसाइटी में वेलफेयर होगा तो हारमोनियस सोशल ऑर्डर को
स्थापित किया जाना पॉसिबल हो जाएगा। वहीं इन्होंने अपनी प्रमुख कृति बुक ऑफ राइट्स में कॉमनव्थ के नोशन को दिया। और अगली
महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने कॉमनव्थ की कुछ इंपॉर्टेंट फीचर्स बताई। जिनमें पहली आती है सोशल हार्मोनी। दूसरी आती है
कलेक्टिव गुड। तीसरी आती है पीस एंड ऑर्डर और चौथी इसमें आती है गुड गवर्नेंस और पांचवी इसमें आती है मल्टीचरलिज्म। और छठी
इसमें आती है ग्रेट लर्निंग। इसका मतलब यह है कि जो छह विशेषताएं हैं, यह किसी भी कॉमनव्थ में होनी चाहिए क्योंकि यह
कॉमनव्थ के कोर बेसिस है, आधार हैं। अब हम कन्फ्यूशियस के कुछ अन्य कांसेप्ट्स को देख लेते हैं जो कि आपके एग्जाम के लिए
बहुत इंपॉर्टेंट है। तो, इसमें पहला कांसेप्ट आता है द गोल्डन मीन जिसका मतलब यह है कि स्वर्णिम मध्यम मार्ग। इन्होंने
यह कहा कि हमें हमेशा से 20 का रास्ता अपनाना चाहिए। मिडिल वे अपनाना चाहिए। इसके बाद अरिस्टोटल ने भी इस कांसेप्ट को
दिया और वहीं इंडिया में गौतम बुद्धा ने भी इस कांसेप्ट को दिया था। इसमें इन्होंने यह कहा था कि डू नॉट डू टू अदर्स
व्हाट यू वुड नॉट हैव देम टू डू यू। इसका मतलब यह है कि दूसरों के साथ वैसा व्यवहार मत करो जैसा तुम नहीं चाहते हैं कि वे
तुम्हारे साथ करें। अगला कांसेप्ट इसमें आता है द फाइव रिलेशनशिप्स। इसका मतलब यह है कि इन्होंने पांच संबंधों की बात की।
जैसे रूलर, सब्जेक्ट, फादर, सन, [संगीत] एल्डर, यंगर, ब्रदर, हस्बैंड, वाइफ एंड फ्रेंड, फ्रेंड। और अगला इनका कांसेप्ट
आता है द फाइव वर्चूज़। इसका मतलब यह है कि इन्होंने रेन, ई, ली, शिन और जी इन सभी पांच सद्गुण की इन्होंने बात की जिनको
हमने पहले ही अच्छे से डिस्कस किया है। और अगला इनका कांसेप्ट आता है द सिक्स आर्ट्स। इन्होंने उस समय चीन में छह
इंपॉर्टेंट आर्ट्स यानी कि कलाओं की बात की जिसमें पहली आती है राइट्स, दूसरी आती है म्यूजिक, तीसरी आती है आर्चरी, चौथी
आती है चैरियट ड्राइविंग, पांचवी आती है कैलग्राफी और छठी आती है अर्थमैटिक। अब हम कन्फ्यूशियस के इस चैप्टर को सम अप कर
लेते हैं यानी कि कंक्लूड कर लेते हैं। तो इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कन्फ्यूशियस ने यह कहा कि जो हमारी सोल
होती है वह कभी मरती नहीं है। रादर यह ट्रांसफॉर्म होती है एक बॉडी से दूसरी बॉडी में। इसका मतलब यह हुआ कि आत्मा के
बारे में कन्फशियस के विचार हिंदू फिलॉसोफी से मिलते जुलते हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने
काइंडनेस, बेनोबलेंट और पीस के ऊपर फोकस किया। इसको इन्होंने परिभाषित करते हुए यह कहा कि हवन सेंड्स डाउन इट्स गुड और इविल
सिंबल्स एंड वाइज मैन [संगीत] एक्ट अकॉर्डिंगली जिसका मतलब यह है कि इन्होंने कहा कि स्वर्ग अपने अच्छे या बुरे प्रतीक
भेजता है और जो बुद्धिमान व्यक्ति होते हैं वे उसी के अनुसार अपना कार्य करते हैं फंक्शनंस करते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण
बात यह है कि माओ जेडोंग ने रिजेक्ट किया कन्फ्यूशनिज्म को चाइना में। इन्होंने यह कहा कि हम काइंडनेस के द्वारा, वेनोवलेंट
के द्वारा, ह्यूमैनिटी के द्वारा, पीस के द्वारा चाइना में कभी भी डेवलपमेंट और प्रोग्रेस को अचीव नहीं कर सकते हैं। अब
हम सबसे पहले प्लेटो की लाइफ को डिस्कस कर लेते हैं। तो, इनके बारे में पहली इंपॉर्टेंट बात यह है कि यह एंशिएंट ग्रीक
ग्रेट पॉलिटिकल फिलॉसोफर रहे हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि प्लेटो का जन्म होता है एथेंस में। इनके [संगीत] पिता का
नाम था एरिस्टन यानी कि एरिस्टोक्लीज़ और इनकी माता का नाम था पेरिक्टोन। खास बात यह है कि इनकी माता सिस्टर रही है चामोडीज
की और क्रिटियाज़ की कजिन रही है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि प्लेटो के तीन भाई थे जिनमें पहला नाम आता है ग्लूकोन
का। दूसरा नाम आता है एंटीफोन का और तीसरा नाम आता है एडिमेंटस का। और इनकी एक सिस्टर थी जिनका नाम था पोटॉन। तो जितने
भी यह फैक्ट्स हैं आप इनको अच्छे से याद करें क्योंकि एग्जाम [संगीत] में पूछे जा सकते हैं। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट आता है
कि यह सोक्रेटीज जो कि महान फिलॉसोफर रहे हैं ग्रीक के उनके यह स्टूडेंट रहे हैं। और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि
इन्होंने द एकेडमी को एस्टैब्लिश किया था 387 बीसीई में जो कि इनका बहुत बड़ा स्कूल था। खासतौर पे इनकी फिलॉसोफी का बहुत बड़ा
स्कूल था। अगला पॉइंट यह आता है कि इनका रियल नेम था एरिस्टोक्लीज जो कि इनके फादर से ही इनको मिला हुआ था और इनका निक नेम
था प्लेटो जिसका मतलब होता है ब्रॉड या फिर बाइड। ऐसा माना जाता है कि यह हष्टपुष्ट शरीर वाले थे। यानी कि इनका
शरीर बहुत हेल्दी था। इनके कंधे चौड़े थे। जिस वजह से इनको प्लेटो नाम मिला [संगीत] और इनको अफलातून के नाम से भी जाना जाता
है। खास बात यह है कि इनकी जो माता है उनका वंश एथेंस में सोलोन से संबंधित था जो कि अगेन बहुत एरिस्टोक्रेट यानी कि रिच
फैमिली थी जो कि फेमस लॉ मेकर्स थे, पोएट थे। पैलोपोनेशियन वॉर प्लेटो की लाइफ का एक बेहद [संगीत] इंपॉर्टेंट फेज माना जा
सकता है। तो जब हम बात करते हैं पैलोपोनेशियन वॉर की तो हम कह सकते हैं कि यह सीरीज ऑफ कॉन्फ्लिक्ट्स है जो कि एथेंस
और स्पाता के बीच 431 ईसा पूर्व से 404 ईसा पूर्व के बीच लड़ा गया था। इसकी दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस वॉर में बहुत
सारे सिटी स्टेट्स ने भाग लिया था। पार्टिसिपेट किया था ताकि जो ग्रीक वर्ल्ड है उसको कंट्रोल किया जा सके। अगली
महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें 404 ईसा पूर्व में एथेंस ने सरेंडर किया था और स्पार्टंस की इसमें जीत होती है और इसी के
साथ यह वॉर 404 ईसा पूर्व में खत्म हो जाता है। और अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि तुसी डाइडस ने द हिस्ट्री ऑफ द पैलोपोनेशन
वॉर लिखी थी। जिसको कि क्लासिकल [संगीत] रियलिज्म के ऊपर लिखी गई सेकंड इंपॉर्टेंट बुक मानी जाती है। क्योंकि इससे कुछ ही
साल पहले सुनजू ने द आर्ट ऑफ वॉर लिखी थी। प्लेटो की लाइफ की सबसे महत्वपूर्ण घटना यह है कि प्लेटो को [संगीत] पैलोपोनेशियन
वार के बाद उस समय जो 30 ट्राय्स थे जो एथेंस को रूल कर रहे थे। उन्होंने पेशकश [संगीत]
की थी कि प्लेटो इस 30 ट्राय्स में शामिल हो जाए। लेकिन प्लेटो ने पूरी तरह से सख्ती के साथ मना कर दिया था। अगला पॉइंट
यह आता है कि प्लेटो उस समय के बहुत बड़े मैथमेटिशियन और फिलॉसोफर पाइथागोरस से काफी प्रभावित थे। यह भी बात विचारणीय है
कि प्लेटो ने अपनी पूरी लाइफ में कोई शादी नहीं की थी। और इससे भी महत्वपूर्ण बात है कि प्लेटो 407 बीसीई में सोक्रेटीज से
मिलते हैं और उस समय इनकी एज थी 20 साल और इसके बाद प्लेटो सोक्रेटीज से काफी प्रभावित हो जाते हैं और यह सोक्रेटीज
[संगीत] के स्टूडेंट बन जाते हैं। प्लेटो की लाइफ तब पूरी तरह से बदल जाती है जब 399 बीसीई [संगीत] में 30 ट्राय्स ऑफ
एथेंस के द्वारा जो कि उस समय एक नाम मात्र डेमोक्रेटिक रूल को एस्टैब्लिश कर रहे थे या फिर चला रहे थे उन्होंने
सॉक्रेटीज को देशद्रोह और यूथ को भड़काने के मामले में ट्रायल चला दी और उनको मौत की सजा दे दी। इसके बाद प्लेटो को
डेमोक्रेसी से काफी घृणा हो गई थी और उनकी पूरी लाइफ बदल गई थी। सोक्रेटीज का लास्ट डायलॉग क्रिटो [संगीत] के साथ हुआ था जो
कि बाद में प्लेटो के द्वारा लिखा गया था और यह एक प्रकार से इमोर्टल बना था। हालांकि विचारणीय बात यह है कि प्लेटो
बीमारी [संगीत] के चलते इस डायलॉग में भाग नहीं ले पाए थे। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सोक्रेटीज की डेथ के [संगीत] बाद
प्लेटो काफी परेशान थे। तो इन्होंने एथेंस को छोड़ दिया था और 12 वर्षों तक अनेकोंने डिफरेंट-डिफरेंट कंट्रीज की यात्राएं की।
जिनमें प्रमुख थे मेगारा, सिरेज, साइरिन, मिस्र, सिसली, इटली और भारत। हालांकि यह बात विवाद का रहा है और अनुमान पर आधारित
है कि प्लेटो ने भारत की यात्रा [संगीत] की होगी क्योंकि बहुत सारे विद्वानों के द्वारा इस बात पर जोर दिया जाता है या फिर
अनुमान लगाया जाता है कि उस समय भारत पर भी सिस्टमैटिक कास्ट सिस्टम था जो कि प्लेटो इंस्पायर हुए थे वहां से और प्लेटो
ने इसीलिए फिलॉसोफर, सोल्जर्स और आर्टिजन नाम के तीन क्लासेस का जिक्र इन्होंने किया था। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि
प्लेटो 12 साल बाद 40 साल की अवस्था में एथेंस लौट आते हैं। अब हम प्लेटो की द एकेडमी को डिस्कस कर लेते हैं। तो सबसे
पहली बात यह है कि प्लेटो एथेंस को लौट आते हैं 387 बीसी में। जहां पर इन्होंने द एकेडमी को 387 बीसीई में एस्टैब्लिश किया
था। अगली विचारणीय बात यह है कि प्लेटो की जो एकेडमी थी यह एक प्रकार का फिलॉसोफिकल स्कूल था एंशिएंट ग्रीस में और इसको
प्लेटो ने 387 बीसीई में एस्टैब्लिश किया था। अगली इंपॉर्टेंट बात यह भी है कि इस यूनिवर्सिटी को यानी कि जो प्लेटो की जो
एकेडमी है इसको वेस्टर्न वर्ल्ड की पहली यूनिवर्सिटी मानी जाती है। और विचारणीय बात यह भी है कि जो एकेडमी था यह एक
प्रकार का प्लेस था जहां पर इंटेलेक्चुअल डिस्कशन होता था। एक्सरसाइजज़ होती थी और रिलीजियस एक्टिविटीज होती थी। वहीं दूसरी
बात जो आपको याद रखनी है कि यह एथेंस के बाहर एक एकेडमिया नामक जगह थी। वहां पर इसको एस्टैब्लिश किया गया था। इसीलिए इसको
द एकेडमी कहा गया था। वहीं अगली बात यह भी विचारणीय है प्लेटो की द एकेडमी उनकी पूरी लाइफ में निशुल्क रही थी। यानी कि चार्ज
फ्री रही थी। द एकेडमी में स्टूडेंट्स फिलॉसोफी, मैथमेटिक्स, एस्ट्रोनॉमी और पॉलिटिक्स को स्टडी करते थे। जबकि
एरिस्टोटल इस एकेडमी [संगीत] के सबसे मोस्ट फिलॉसोफर रहे हैं हिस्ट्री में। और यह द एकेडमी के प्रसिद्ध स्टूडेंट रहे।
प्लेटो के यह स्टूडेंट रहे थे। जबकि विचारणीय बात यह भी है कि एरिस्टोटल ने द एकेडमी पर तब तक स्टडी की जब तक इन्होंने
अपना खुद [संगीत] का स्कूल द लाइसियम नहीं खोला था। और विचारणीय बात यह भी है कि प्लेटो ने अपने जीवन के लास्ट जो वर्ष है
वह इसी एकेडमी में स्पेंड किए। यहां पर इन्होंने स्टूडेंट्स को पढ़ाया, इंस्ट्रक्ट किया। लेकिन 347 बीसी में इस
महान ग्रीक फिलॉसोफर की डेथ हो जाती है। अब हम प्लेटो के वक्स को अच्छे से डिस्कस कर लेते हैं क्योंकि आपके एग्जाम के लिए
बेहद इंपॉर्टेंट है। तो अगर हम बात करें प्लेटो की राइटिंग्स की तो इनका जो लिटरेचर है वह बहुत ही व्यापक रहा है।
इनके वॉक्स में 35 डायलॉग और 13 लेटर्स आते हैं जो कि आपको याद रखने हैं। हम आगे चलकर इनको अच्छे से डिस्कस करेंगे। दूसरी
बड़ी बात यह है कि प्लेटो ही पॉलिटिकल साइंस की हिस्ट्री में ऐसे फिलॉसोफर रहे हैं जिन्होंने रिटन फॉर्म में सबसे पहले
डायलेक्टिक मेथड का प्रयोग किया था। हालांकि इनसे पहले इनके गुरु सोक्रेटीज ने भी डायलक्टिक [संगीत] मेथड का प्रयोग किया
था लेकिन उन्होंने रिटन फॉर्म में नहीं किया था। अगली विचारणीय बात यह है कि प्लेटो की जितनी भी बुक्स रही है वह
डायलॉजिकल स्टाइल में रही है और जो द लॉज़ है उसको छोड़कर इनकी जितनी भी राइटिंग्स रही है उसके नायक यानी कि हीरो मेन
कैरेक्टर सोक्रेटीज हैं। प्लेटो का पहला डायलॉग आता है द अपोलॉजी। इसकी खास बात यह है कि इसको प्लेटो का पहला डायलॉग माना
जाता है और इसे जाना जाता है एपोलॉजी ऑफ सोक्रेटीज के नाम से। यह बेसिकली एक सोक्रेटिक डायलॉग है जिसमें प्लेटो ने
वर्णन किया [संगीत] है कि किस तरह से सोक्रेटीज ने 399 बीसी पूर्व में जो उनके ऊपर मुकदमा चलाया गया था और जो वहां पर
अधर्म था, भ्रष्टाचार था उसके खिलाफ किस तरह से इन्होंने बोला था। इन सभी बातों का वर्णन इस डायलॉग में प्लेटो ने किया था।
वहीं इसमें प्लेटो कहीं ना कहीं अपने गुरु के प्रति क्षमा यासना करते हैं। अपोलॉजी करते हैं कि वे अपने गुरु को नहीं बचा
पाए। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्लेटो का पहला डायलॉग तो माना ही जाता है। साथ में यह पहली बुक भी मानी जाती है
[संगीत] जो सोक्रेटीज के डेथ से रिलेटेड है। वहीं अगली एक विचारणीय बात यह भी है कि इसमें सोक्रेटीज का जो डिस्कशन हुआ था
क्रिटो के साथ, फायदों के साथ, इथोप्रो के साथ उसको प्लेटो ने अच्छे से वर्णन किया है, एक्सप्लेन [संगीत] किया है। महात्मा
गांधी ने द अपोलॉजी को गुजराती में ट्रांसलेट [संगीत] किया एज अ सत्यवीर की कथा और इन्होंने इस कृति में सोक्रेटीज को
कहा सत्यवीर। अब हम प्लेटो के सेमिनल वर्क्स को डिस्कस कर लेते हैं। तो इसमें पहला वर्क आता है द रिपब्लिक। तो जब हम
बात करते हैं रिपब्लिक की तो पहला पॉइंट यह आता है कि हमें सबसे पहले यह समझना है कि द रिपब्लिक का थीम क्या है? विषय क्या
है? [संगीत] तो यह क्वेश्चन बहुत अहम हो जाता है क्योंकि लॉन्ग में भी या फिर सब्जेक्टिव में भी इसे एग्जाम में पूछा
जाता है। तो पहला पॉइंट यह है कि जो द रिपब्लिक है यह प्लेटो [संगीत] का सेमिनल वर्क है। फंडामेंटल वर्क माना जाता है
पॉलिटिकल फिलॉसोफी के ऊपर और द रिपब्लिक बेसिकली एक सोक्रेटिक डायलॉग है। प्लेटो के द्वारा इसे अराउंड 380 बीसी में लिखा
गया था। और सबसे बड़ी बात यह है कि इसका फुल टाइटल है कंसर्निंग जस्टिस यानी कि न्याय से संबंधित। तो दूसरा पॉइंट यहां पर
यह आता है कि द रिपब्लिक में 10 चैप्टर्स हैं और जो द रिपब्लिक है इसको पॉलिटिकल फिलॉसोफी और पॉलिटिकल थ्योरी के ऊपर बोथ
इंटेलेक्चुअली और हिस्टोरिकली फंडामेंटल वर्क माना जाता है। यानी कि मोस्ट इनफ्लुएंशियल वर्क माना जाता है। प्लेटो
ने द रिपब्लिक में हाईलाइट किया है कैलीपॉलिस को जो कि प्लेटो के द्वारा बताया गया एक यूटोपियन सिटी स्टेट है यानी
कि काल्पनिक [संगीत] नगर राज्य है। हाइपोथेटिकल सिटी स्टेट है जिसको कि फिलॉसोफर किंग के द्वारा रूल किया जाएगा।
दूसरी अहम बात यह है कि इस सेमिनल वर्क में प्लेटो ने डिस्कस किया है [संगीत] थ्योरी ऑफ फॉर्म्स को, इम्मोर्टलिटी ऑफ द
सोल को और इन्होंने इसमें यह भी बताया कि सोसाइटी में फिलॉसोफर्स की क्या भूमिका होती है। लेकिन इन सबसे भी बढ़कर प्लेटो
ने इस कृति में यह बताया कि व्हाट इज जस्टिस? अर्थात न्याय क्या है? यही प्लेटो की द रिारी पब्लिक का मूलभूत प्रश्न
[संगीत] है। अगला पॉइंट यह आता है कि यह जो बुक है यह मेनली डिस्कस करती है एथिक्स [संगीत] एंड पॉलिटिक्स को और इन्होंने यह
भी बताने की इसमें कोशिश की कि फिलॉसोफर्स कौन होते हैं? उनकी ड्यूटीज क्या होती है? और सबसे बड़ी बात यह भी है कि ग्रीक
लैंग्वेज में रिपब्लिक का मतलब होता है पॉलिथिया अर्थात पॉलिटिकल सिस्टम जिसको आप हिंदी में कहते हैं राज व्यवस्था।
प्रोफेसर डनिंग ने प्लेटो के आइडियल स्टेट को रोमांस कहा। वहीं दूसरी तरफ रूसो ने द रिपब्लिक को कहा अ ग्रेट ट्रिटाइज ऑन
एजुकेशन और यहां से इन्होंने इंस्पायर होकर द इमाइल नामक बुक रूसो ने लिखी थी। अगली महत्वपूर्ण बात यह है कि इंडिया के
फॉर्मर प्रेसिडेंट डॉ. जाकिर हुसैन ने द रिपब्लिक को उर्दू में ट्रांसलेट किया एज रियासत। तो जितने भी यह सारे फैक्ट्स हैं
आप इनको अच्छे से याद करें क्योंकि आपके एग्जाम के लिए बेहद इंपॉर्टेंट है। अपनी प्रमुख कृति जिसका टाइटल था अ हिस्ट्री ऑफ
वेस्टर्न फिलॉसोफी जो कि 1945 को पब्लिश होती है। इस कृति में ब्रिटेन रसेल ने द रिपब्लिक के तीन इंपॉर्टेंट पार्ट्स की
डिस्कस की। यानी कि इन्होंने तीन पार्ट्स में द रिपब्लिक को आइडेंटिफाई किया। जिसमें पहला पार्ट आता है बुक एक से बुक
पांच तक। तो इसमें बेसिकली इन्होंने एक ऐसी आइडियल [संगीत] कम्युनिटी जो कि एक यूरोपियन है उसकी चर्चा की है। साथ में
इन्होंने इसमें गार्डियंस का जो एजुकेशन है उसकी चर्चा की है और लास्ट में इन्होंने जस्टिस को भी इसमें डिफाइन करने
की कोशिश की है। वहीं दूसरा पार्ट आता है बुक छ से आठ। तो इसकी खास बात यह है कि इन्होंने इसमें फिलॉसोफर्स को डिफाइन किया
है कि जो फिलॉसोफर्स है वो किस तरह से इस तरह की जो कम्युनिटी है खासतौर पे जो यूटोपियन कम्युनिटी है उसके आइडियल रूलर्स
कैसे होते हैं इसको इन्होंने इसमें चर्चित [संगीत] किया है यानी कि डिस्कशन किया है। वहीं तीसरा पार्ट आता है बुक नाइन और 10।
इसमें इन्होंने डिस्कस किया है कि जो प्रैक्टिकल फॉर्म्स [संगीत] ऑफ़ गवर्नमेंट होती है उसके प्रोज़ और क्स क्या-क्या होते
हैं। प्लेटो की अगली कृति का नाम आता है द स्टेट्समैन। तो जब हम बात करते हैं इस कृति की तो [संगीत] इसकी सबसे अहम सबसे
इंपॉर्टेंट बात यह है कि इसमें प्लेटो ने स्टेट्स को क्लासिफाई [संगीत] किया है। यानी कि राज्यों का वर्गीकरण किया है।
जिसको बाद में एरिस्टोटल ने भी एक्सेप्ट किया था, स्वीकार किया था। दूसरी इसकी अहम बात यह है कि इसमें प्लेटो ने स्टेट्समैन
की डेफिनेशंस दी थी और रूल ऑफ लॉ की बात की [संगीत] थी। इसका मतलब यह है कि इन्होंने इस कृति में यह समझाने की यह
बताने की कोशिश की थी कि जो राजनेता होते हैं, राजमर्मज्ञ होते हैं, स्टेट्समैन होते हैं, कौन होते हैं? उनके काम क्या
होते हैं? और साथ में इन्होंने रूल ऑफ लॉ यानी कि कानून के शासन को भी डिफाइन किया। अगली अहम बात यह भी है कि जो द स्टेट्समैन
है इसमें इन्होंने यह बताया कि जो स्टेट्समैन होता है यानी कि राजनेता होता है उसके पास एक स्पेशल नॉलेज होनी चाहिए
जिसके द्वारा वह रूल को जस्ट तरीके से चला सके और लोगों के हित में काम कर सके और सबसे बड़ी बात यह है कि उनके पास इस तरह
की नॉलेज होना अनिवार्य है। तब जाकर ही लोगों के हित में रूल को चलाया जा सकता है। गवर्न किया जा सकता है। वहीं दूसरी
तरफ प्लेटो का अगला वर्ब आता है द लॉज़। तो द लॉज़ की पहली बात यह है कि यह प्लेटो का लास्ट और लॉन्गेस्ट डायलॉग माना जाता है।
दूसरी बड़ी बात यह है कि इस कृति में प्लेटो ने यह कहा था कि लॉ इज अ प्रोडक्ट ऑफ माइंड। इसका मतलब यह है कि जो कानून है
वह मन की उपज है। मन के द्वारा ही कानूनों का निर्माण होता है। अगली महत्वपूर्ण बात यह आती है कि यह जो सेमिनल वर्क है प्लेटो
का इसमें इन्होंने नक्सर्नल काउंसिल की अवधारणा दी थी जिसको आप हिंदी में कहते हैं श्रेष्ठ परिषद। कि [संगीत] जो यह
नक्सर्नल काउंसिल होती थी प्लेटो ने द लॉज़ में इसको मेंशन किया है। जिनका प्रमुख काम यह होता था कि जो रिसर्च होती थी
रिगार्डिंग नेचर ऑफ लॉ उसके लिए यह काम करती थी। यानी कि इसको फिलॉसोफिकल तरीके से रिसर्च करनी होती थी नेचर ऑफ लॉ के रूप
में। और कई बार यह जो काउंसिल है यह एडवाइस करती थी कि किस तरह से मैग्नीशिया में जो रूल ऑफ लॉ है यानी कि लॉज़ है उनको
इंप्लीमेंट करना है। अब हम प्लेटो की तीनों ही बुक का नटशेल में एक कंपैरिजन कर लेते हैं। तो द रिपब्लिक में इन्होंने ऐसे
स्टेट की बात की है जो यूटोपियन है यानी कि आइडियल स्टेट है। वहीं दूसरी तरफ इन्होंने द [संगीत] स्टेट्समैन में ऐसे
स्टेट की चर्चा की है जो पॉसिबल स्टेट है यानी कि संभावित राज्य हैं। वहीं इन्होंने द लॉज़ में ऐसे स्टेट [संगीत] की बात की है
जो बेसिकली रियल स्टेट है यानी कि जो वास्तविक राज्य होता है। अब हम प्लेटो के कुछ अदर इंपॉर्टेंट वर्क्स को डिस्कस कर
लेते हैं। तो इसमें पहला वर्क आता है सोक्रेटिक डायलॉग। तो इसको लिखा था प्लेटो और जेनोफेन ने। इसकी खास बात यह है कि
इसमें सोक्रेटीज के आइडियाज और उनकी फिलॉसोफी है जो उन्होंने अपने स्टूडेंट्स के साथ डिस्कस किया था। प्लेटो का अगला
इंपॉर्टेंट वर्क आता है चारमडीज। तो, इसकी सबसे बेहद इंपॉर्टेंट बात यह है कि इसमें [संगीत] प्लेटो ने सोक्रेटीज और चारडीज के
बीच हुई डिस्कशन को मेंशन किया है। जिसमें इन्होंने दो इंपॉर्टेंट कांसेप्ट की बात की है। जिसमें [संगीत] पहला आता है नो
योरसेल्फ यानी कि स्वयं को जानो। तुम्हारे जीवन का पर्पज होना चाहिए स्वयं को जानना। और दूसरा कांसेप्ट दिया है सेल्फ नॉलेज
यानी कि आत्मज्ञान। यानी कि तुम्हें स्वयं का पता होना चाहिए कि तुम कौन हो। तो यह दोनों कांसेप्ट इन्होंने सोक्रेटीज ने जो
चामंडीज के साथ शेयर किए थे, प्लेटो ने इसमें चर्चा की है। प्लेटो के अगले इंपॉर्टेंट वर्क का नाम आता है मेनो। तो
इसकी सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि इसमें प्लेटो ने सोक्रेटीज और मेनो के बीच हुए डिस्कशन को मेंशन किया है। इसकी खास बात
यह है कि इसमें इन्होंने वर्चू और नॉलेज का कांसेप्ट [संगीत] दिया है। जिसके अंतर्गत इन्होंने यह कहा कि वर्चू नॉलेज
होती है। यानी कि सद्गुण ही ज्ञान है। जिसका मतलब यह है कि जो सद्गुण होता है यानी कि वर्चू होता है वह हाई मोरल
स्टैंडर्ड होता है। जिसको नॉलेज के द्वारा ही गेन किया [संगीत] जाता है और यह आत्मा की आवाज होती है। इसीलिए वर्चू नॉलेज होता
है क्योंकि नॉलेज के द्वारा ही वर्चू को कल्टीवेट किया जाता है। प्लेटो की अगली इंपॉर्टेंट किताब का नाम आता है द
सिंपोजियम। तो इसकी इंपॉर्टेंट बात यह है कि इसमें प्लेटो ने सोक्रेटीज और उनके दो फेमस स्टूडेंट्स जिनके नाम थे अल्कवाइडीज
और एरिस्टोफेन उनके बीच जो लव और जो दूसरा ब्यूटी है उसके बीच जो डिस्कशन हुआ था उसको मेंशन किया है। प्लेटो की अगली किताब
का नाम है क्रिटो। तो इस किताब की खास बात यह है कि इस किताब में प्लेटो ने सोक्रेटीज की डेथ को मेंशन किया है और
इसमें सोक्रेटीज का जो क्रिटो के साथ लास्ट डिस्कशन था उसको भी मेंशन किया है। परमंडीज भी प्लेटो का एक इंपॉर्टेंट वर्क
रहा है। जिसमें प्लेटो ने सोक्रेटीज और उनके दो प्रमुख शिष्य जिनके नाम थे जेनो और परमंडीज उनके साथ थ्योरी ऑफ आइडिया के
ऊपर डिस्कशन किया है। प्लेटो की अगली किताब का नाम आता है फाइदो। तो इस किताब की खास बात यह है कि इसमें प्लेटो [संगीत]
ने सोक्रेटीज की डेथ को एक्सप्लेन किया है। वहीं दूसरा पॉइंट यह है कि इसमें सोक्रेटीज का जो लास्ट डिस्कशन रहा सोल
एंड कांसेप्ट के ऊपर इसकी भी प्लेटो ने इसमें चर्चा की है। वहीं विचारणीय बात यह है कि इस किताब में प्लेटो ने सॉक्रेटीज
का जो थीवंस सीव्स और सिमियास [संगीत] के साथ इमोटलिटी ऑफ सोल के ऊपर जो डिस्कशन हुआ था उसकी इन्होंने डिटेल में चर्चा की
है। वहीं प्लेटो का अगला वर्क आता है टीमियस। [संगीत] तो इस किताब की खास बात यह है कि इसमें सोक्रेटीज का जो डिस्कशन
हुआ था कीमियस और क्रिटियास के साथ ओरिजिन ऑफ लाइफ एंड यूनिवर्स के ऊपर उसको इन्होंने इसमें मेंशन किया है। प्लेटो के
अगले इंपॉर्टेंट वर्क का नाम है फिलेबस। तो इस कृति की खास बात यह है कि इसमें प्रोटार्कस नाम का एक कैरेक्टर है जिसके
साथ सोक्रेटीज डिस्कस [संगीत] करते हैं नेचर ऑफ प्लेजर विज़डम एंड गुड के ऊपर। प्लेटो की नेक्स्ट किताब आती है फाइदेरस।
तो इस किताब की खास बात यह है कि इसको प्लेटो के द्वारा लिखा गया एक महत्वपूर्ण डायलॉग माना जाता है जिसमें प्लेटो ने
चर्चा की है सोक्रेटीज और फाइदेरस के बीच हुए डायलॉग [संगीत] या फिर डिस्कशन की। इसको 370 बीसी में तब लिखा गया था जब
प्लेटो [संगीत] ने द रिपब्लिक और सिंपोजियम जैसी महान कृतियों का सृजन किया था। इसकी खास बात यह है कि इसमें प्लेटो
[संगीत] ने जो इरोटिक लव है और आर्ट ऑफ रेटोरिक है उसको एक्सप्लेन किया है। मतलब जब आपका लव फिजिकली ज्यादा रहता है या फिर
लस्टफुल रहता है तो उसको आप इरोटिक लव कहते हैं। वहीं दूसरी तरफ आर्ट ऑफ रेटोरिक की जब आप बात करते हैं तो इसमें आपके पास
बोलने की ऐसी कला होती है कि लोगों को आप अपने शब्दों से लुभाते हैं, इंप्रेस करते हैं। इसमें दूसरा पॉइंट प्लेटो ने यह
डिस्कस किया [संगीत] कि मैटम साइकोसिस जो होता है यानी कि ग्रीक ट्रेडिशन ऑफ़ जो रीइकारनेशन है उसको इन्होंने इसमें
[संगीत] कहीं ना कहीं डिस्कस किया है। जैसा कि आप इंडिया में भी इस कांसेप्ट को देख सकते हैं। और तीसरा इसमें जो आत्मा की
अमरता होती है यानी कि नेचर ऑफ द ह्यूमन सोल होता है जो कि फेमसली चैरियट एलेगरी के द्वारा इसको दर्शाया गया है। रूपक रूप
में समझाया गया है। जैसा कि आपने महाभारत में अर्जुन और श्री कृष्ण के बीच भी इस तरह की चीज देखी थी। वही चीज कहीं ना कहीं
आपको सोक्रेटीज और फाइदरस के बीच दिखाई पड़ती है। प्लेटो की नेक्स्ट किताब का नाम आता है क्रिटलस। तो इस किताब की खास बात
यह [संगीत] है कि प्लेटो की यह एकमात्र ऐसी किताब है जो कहीं ना कहीं एक्सक्लूसिवली लैंग्वेज के ऊपर और इसके जो
रिलेशंस [संगीत] होते हैं रियलिटी के साथ उसके ऊपर यह लिखी गई है। तो इसका जो स्पेसिफिक टॉपिक है वो
है करेक्टनेस ऑफ नेम्स यानी कि जो नाम होते हैं उसकी जो करेक्टनेस होती है उसके ऊपर यह लिखी गई है। अगली महत्वपूर्ण बात
यह है कि जो यह डायलॉग है इसमें सोक्रेटीज दो लोगों के साथ जिनके नाम थे क्रिटेलस और हार्मोन जींस उनके [संगीत] साथ यह डिस्कस
करते हैं और दोनों जो यह स्टूडेंट हैं इनके यह सोक्रेटीज से पूछते हैं कि जो नाम [संगीत] होते हैं यह कन्वेंशनल होते हैं
या फिर नेचुरल होते हैं और इनकी रियलिटी के साथ क्या संबंध होते हैं? क्या इनका रोल होता है? इस तरह का डिस्कशन कहीं ना
कहीं इन दोनों छात्रों का [संगीत] सोक्रेटीज के साथ होता रहता है। प्लेटो का अगला डायलॉग आता है [संगीत] यूथ डेमस। तो
यह भी प्लेटो का एक इंपॉर्टेंट डायलॉग है जिसे 384 बीसी में लिखा गया था और इसमें प्लेटो ने प्रेजेंट किया है लॉजिकल फैलेसी
ऑफ द सोफिस्ट्स। यानी कि जो सोफिस्ट्स हैं उनकी जो लॉजिकल फैलेसीज रही है उनको इस कृति में प्लेटो ने मेंशन किया हुआ है।
प्लेटो का अगला वर्क आता है थिएटेटस। तो यह भी अगेन प्लेटो का फिलॉसोफिकल वर्क माना जाता है जिसमें प्लेटो ने नेचर ऑफ
नॉलेज को इन्वेस्टिगेट करने की कोशिश की है और इस कृति को फाउंडिंग वर्क माना जाता है एपिस्टेमोलॉजी के ऊपर। दूसरी अहम बात
यह है कि यह डायलॉग रहा है सोक्रेटीज और थिएटर्स के बीच में जिसके अंतर्गत डेफिनेशन दी गई है एपिस्टीम की और नॉलेज
की और डिस्कस किया गया है थ्री डेफिनेशन ऑफ नॉलेज को जिसमें पहली डेफिनेशन यह आती है कि नॉलेज एज नथिंग बट परसेप्शन यानी कि
ज्ञान धारणा के अलावा कुछ भी नहीं है। दूसरी इसमें आती है कि नॉलेज एज अ ट्रू जजमेंट। यानी कि जो नॉलेज होता है वो एक
सच्चे निर्णय के रूप में होता है और तीसरा कि नॉलेज [संगीत] एज अ ट्रू जजमेंट होती है विद एन अकाउंट। प्लेटो का लास्ट वर्क
आता है क्रिटियाज़। तो इस किताब की खास बात यह है कि इसमें प्लेटो ने जो आइसलैंड किंगडम अटलांटीज है [संगीत] और उनका जो
अटेमप्ट रहा था एथेंस को कॉनकर करने का उस युद्ध को इन्होंने इसमें डिस्कस किया है। हालांकि जो अटलांटिज है वो फेल रहा था
एथेंस पर विजय [संगीत] पाने के लिए। इसीलिए प्लेटो कहते हैं कि ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि उस समय एथेंस में सुव्यवस्थित
सामाजिक व्यवस्था थी। यानी कि वेल ऑर्डर सोसाइटी थी। जिसकी वजह से इसमें एथेंस जीता था। जबकि किंगडम ऑफ जो अटलांटिज है
वह हार गया था। यानी कि एथेंस के ऊपर विजय प्राप्त नहीं कर पाया था। दूसरी बड़ी बात यह है कि इस डायलॉग के मेन कररेक्टर्स
[संगीत] आते हैं क्रिटियाज, डीमियस और हर्मोक्रेट्स। ह्ना आरेंट ने प्लेटो को फिलॉसोफर ऑफ फासिस्ट कहा। वहीं मैक्सी ने
प्लेटो को फर्स्ट यूटोपियन थिंकर कहा। और कार्ल पॉपर ने अपनी प्रसिद्ध कृति द ओपन सोसाइटी एंड इट्स एनिमीज़ में हगल और
मार्क्स के साथ प्लेटो को मुक्त समाज का शत्रु कहा। तो सबसे पहले हम बात कर लेते हैं प्लेटो से जुड़े कुछ की फैक्ट्स की।
प्लेटो क्लासिकल ग्रीस के एक महान फिलॉसोफर रहे हैं। जिन्होंने 386 बीसी में एथेंस में द एकेडमी को एस्टैब्लिश किया
था। और द एकेडमी को यूरोप की फर्स्ट यूनिवर्सिटी के रूप में जाना जाता है। वहीं प्लेटो को फादर ऑफ एंशिएंट पॉलिटिकल
फिलॉसोफी के रूप में जाना जाता है। और समटाइ प्लेटो के बारे में कहा जाता है कि प्लेटो इज़ फिलॉसोफी एंड फिलॉसोफी इज
प्लेटो। अर्थात प्लेटो ही दर्शन है और दर्शन ही प्लेटो है। और प्लेटो को फादर ऑफ आइडियलिज्म के रूप में जाना जाता है।
क्योंकि सबसे पहले प्लेटो ने ही आइडिया और कॉन्शियसनेस की बात की थी। और आगे चलकर उनसे कांट और हीगल जैसे विचारकों ने
प्रेरणा लेते हुए आइडियलिज्म को आगे बढ़ाया था। वहीं इन्होंने डेमोक्रेसी को ओपनली क्रिटिसाइज किया क्योंकि इनका मानना
था कि डेमोक्रेसी फैक्शनलिज्म को बढ़ावा देता है। वहीं इन्होंने यह भी कहा कि डेमोक्रेसी की वजह से ही उनके महान गुरु
सोक्रेट्स की हत्या कर दी गई थी। और इन्होंने कहा कि आइडिया यूनिवर्स का सार होता है। क्योंकि आईडिया की वजह से ही यह
यूनिवर्स यह दुनिया चलायमान हैं। और इन्होंने कहा कि हमें एक फिलॉसोफर किंग की जरूरत पड़ती है क्योंकि फिलॉसोफर किंग ही
गुड सोसाइटी को या फिर अच्छी सोसाइटी को बढ़ावा देता है। इसी वजह से इन्होंने मोनार्की को एडवोकेट किया था। जिसमें
इन्होंने कहा कि मोनार्की एक फिलॉसोफर किंग के द्वारा ही चलायमान की जानी चाहिए। इनकी एक इंपॉर्टेंट कोटेशन रही है जिसमें
यह कहते हैं कि द स्टेट इज रिटलार्ज ऑफ इंडिविजुअल। इसमें यह कहते हैं कि राज्य व्यक्ति का एक बहत रूप होता है। अर्थात
राज्य व्यक्तियों से ही मिलकर बना होता है। और इन्होंने कहा कि मुझे एक सिटी ऑफ हेवेंस चाहिए अर्थात स्वर्ग की नगरी चाहिए
जिसके लिए इन्होंने एक आइडियल स्टेट की अवधारणा दी जो कि इन्होंने सॉक्रेट से ग्रहण की और इन्होंने एक इंपॉर्टेंट
कांसेप्ट दिया जिसे इन्होंने सॉक्रेट से ही ग्रहण किया था जिसका नाम है वर्चू इज नॉलेज अर्थात सद्गुण ही ज्ञान है और इनका
जो रूल है या फिर जो गवर्न सिस्टम है उसको कहा जाता है रीज़नेबल अथॉरिटेरियन इन्होंने कहा कि स्टेट क्राफ्ट इज एन
आर्ट। अर्थात जो शासन कला होती है, वह वास्तव में एक कला होती है जो कि केवल फिलॉसोफर किंग के पास ही मौजूद होती है।
और प्लेटो को फर्स्ट सिस्टेटिक थिंकर के रूप में भी जाना जाता है और प्लेटो ने एक इंपॉर्टेंट कोट दी जिससे आप यह अंदाजा लगा
सकते हैं कि वे डेमोक्रेसी से कितनी नफरत करते थे। इन्होंने कहा कि टिरनी नेचुरली अराइज़ेस आउट ऑफ डेमोक्रेसी। अर्थात जो
तानाशाह है या फिर निरंकुशता है वह प्राकृतिक रूप से डेमोक्रेसी से ही निकल कर आती है। यानी कि खुद ब खुद डेमोक्रेसी
से निरंकुशता प्रकट हो जाती है। ऐसा मानना प्लेटो का था। और मैक्सी जैसे विचारकों ने प्लेटो को
फर्स्ट यूटोपियन थिंकर कहा है। अपने इंपॉर्टेंट वर्क द ओपन सोसाइटी एंड इट्स एनिमीज़ में कार्ल पॉपर लिखते हैं कि
प्लेटो मुक्त समाज के दुश्मन हैं। अकॉर्डिंग टू पॉपर प्लेटो, हगल और मार्क्स फ्री सोसाइटीज के दुश्मन हैं। इसी वजह से
प्लेटो को कंसीडर किया जाता है फोरमोस्ट थिंकर ऑफ ऑथॉरिटेरियनिज्म। यानी कि सर्वसत्तावाद के इनको अग्रदूत के रूप में
देखा जाता है। और कार्ल पॉपर ने इनको अर्थात प्लेटो को फर्स्ट फास्टिस्ट थिंकर इन द वर्ल्ड भी कहा है। वहीं हन्ना आरंट
ने इनको फिलॉसोफर ऑफ फासिस्ट कहा है। और डनिंग ने प्लेटो के स्टेट को रोमांस कहा है। वहीं सेबाइन ने प्लेटो के स्टेट को
यूटोपिया कहा है। वहीं सेबाइन ने प्लेटो के फिलॉसोफर किंग को एनलाइटन टिरनी कहा है। और एनलाइटन टिरनी क्यों कहा है?
क्योंकि प्लेटो का जो फिलॉसोफर किंग है वह पूरी तरह से एनलाइटन है। अर्थात वह सच को जानता है। रियलिटी को जानता है। वह यह भी
जानता है कि न्याय क्या है? अन्याय क्या है? सत्य क्या है? शुभ क्या है? इसीलिए वह पूरी तरह से जागृत है। यानी कि एनलाइटन
है। और टिरनी इसलिए है क्योंकि वह सर्वोच्च है। वह अपनी मनमर्जी कर सकता है। तानाशाह स्थापित कर सकता है। इसी वजह से
सेवाइन जैसे विचारकों ने प्लेटो के फिलॉसफर किंग को एनलाइटन टिनी कहा। वहीं जे जे रूसो ने कहा कि रिपब्लिक इज अ
ट्रीटी नॉट ऑन गवर्नमेंट बट ऑन एजुकेशन। तो इन्होंने कहा कि जो रिपब्लिक है वो एक ट्रीटी है। एक समझौता है लेकिन वो सरकार
पर नहीं एजुकेशन पर है। और सेबाइन ने कहा कि एन आइडियल स्टेट इज प्लेटोस सेकंड बेस्ट। अर्थात आइडियल जो स्टेट है वह
प्लेटो का दूसरा सबसे प्रसिद्ध या फिर दूसरा सबसे अच्छा राज्य है। प्लेटो ने डिडक्टिव मेथड अपनी फिलॉसोफी में यूज़
किया। डिडक्टिव का मतलब होता है कि जो कॉमन से जो है स्पेसिफिक की तरफ आना। अर्थात जो चीज जनरलाइज्ड हो चुकी है वहां
से कॉमन की तरफ आना। और इसका उदाहरण देते हुए प्लेटो ने खुद कहा था कि मान लीजिए इस संसार में सारे लोग मर जाते हैं। मनुष्य
जाति का नाश हो जाता है तो प्लेटो भी तो मर जाएगा ना। प्लेटो जिंदा नहीं रहेगा। तो इन्होंने इस प्रकार से डिडक्टिव मेथड का
एक एग्जांपल दिया था। प्लेटो ने कहा कि राजा डॉग सोल्जर की भूमिका निभाएगा। और प्लेटो ने यह भी कहा कि उसका जो राजा होगा
वह एक प्रकार से पायलट होगा। यानी कि लोगों को लीड करेगा। जैसे कि हमारे देश में राष्ट्रपति भी होता है। राष्ट्रपति
देश का पहला नागरिक होता है और प्लेटो को माना जाता है कि उन्होंने सबसे पहले डायलेक्टिक मेथड का यूज किया था द
रिपब्लिक में। हालांकि यह विधि इन्होंने सबसे पहले सॉक्रेट से ही ग्रहण की थी क्योंकि सॉक्रेट ने ही इसे उनसे पहले यूज़
किया था। जब सॉक्रेट्स अपने स्टूडेंट्स के साथ मिलकर डायलॉग करते थे, डिस्कशन करते थे। वहीं इन्होंने टिलियोलॉजिकल मेथड और
एनालॉजी जैसी विधि का भी प्रयोग किया। टिलियोलॉजी का मतलब होता है उद्देश्यवाद। अर्थात जब आप किसी उद्देश्य तक पहुंचने के
लिए मोरालिटी या फिर रियलिटी, नॉलेज जैसे तत्वों का सहारा लेते हैं तो उसे हम टिलियोलॉजिकल मेथड कहते हैं। और एनालॉजी
का मतलब होता है जब दो समान चीजों के बीच हम तुलना करते हैं तो उसे हम एनालॉजी कहते हैं। जैसे उदाहरण के लिए अगर किसी लड़की
का चेहरा बहुत सुंदर होता है तो उसकी तुलना हम चांद से कर देते हैं। तो उसी प्रकार से
प्लेटो ने भी एथेंस में एक ऐसे आइडियल स्टेट की कल्पना की थी जिसकी तुलना एक सिटी ऑफ हवन या फिर जो ह्यूबन स्टेट है
उससे की जा सके और इन्होंने नॉर्मेटिव स्कूल ऑफ पॉलिटिकल फिलॉसोफी को स्थापित किया और इन्होंने दो
प्रकार के वर्ल्ड की बात की। पहला है वर्ल्ड ऑफ आइडियाज और दूसरा है मटेरियलिस्टिक वर्ल्ड। वर्ल्ड ऑफ आइडियाज
बेसिकली एक ऐसी दुनिया है जहां पर रियलिटी होती है। जहां पर ऐसे लोग रहते हैं जो सच को जानते हैं। रियलिटी को जानते हैं जो
आत्मा से जुड़ते हैं और मटेरियलिस्टिक जो दुनिया है उससे कट जाते हैं। और मटेरियलिस्टिक वर्ल्ड का मतलब है कि जब हम
इस दुनिया में रहते हैं जो हमें दिख रही होती है जो रियलिटी नहीं है। जिसमें हम परिवार के साथ हम फैमिली के साथ रहते हैं।
हम मटेरियलिस्टिक चीजों को लेते हैं, देते हैं तो उसे मटेरियलिस्टिक वर्ल्ड कहा जाता है। और इन्होंने कहा कि आइडिया इज
परमानेंट अर्थात जो विचार है वो अमर है। वो हमेशा रहता है। लाइक मनु इन्होंने भी वर्क स्पेशलाइजेशन की थ्योरी दी। और सबसे
बड़ी बात यह है कि इन्होंने द लॉस में एक नटर्नल काउंसिल की बात की जो कि लॉ से जुड़ी हुई है और इनकी जो थ्योरी है वो
इंडिविजुअल के अगेंस्ट मानी जाती है क्योंकि इन्होंने हमेशा अपनी फिलॉसोफी में ड्यूटीज की बात की फंक्शनंस की बात की
राइट्स की बात नहीं की। और सबसे बड़ी बात यह है कि जो दालज है वह ग्रीक भाषा के शब्द डिकायासून से मिलकर बना है। जिसका
नाम या फिर जिसका मतलब होता है राइटियसनेस। और इन्होंने डॉक्टर्स और लॉयर्स जो
इंस्टीटशंस है या फिर पद है उसकी इन्होंने पूरी तरह से निंदा की। इन्होंने बोला कि हमें एक ऐसा राज्य बनाना है जहां पर कोई
लोग रोग से पीड़ित ना हो। जहां पर कोई अन्याय ना हो। जहां पर लोग आपस में लड़े ना। इसीलिए हमें डॉक्टर्स और लॉयर्स की भी
जरूरत नहीं है। प्लेटो के वक्स को हम मेनली तीन भागों में बांटते हैं। पहला पार्ट है इनके कुछ सेमिनल वक्स जैसे द
रिपब्लिक, द लॉज़, द स्टेट्समैन। वहीं दूसरी कैटेगरी में आते हैं इनके कुछ सोक्रेटिक डायलॉग्स। यह डायलॉग्स ऐसे हैं
जो सुकरात और उनके शिष्यों के बीच हुए हैं जिन्हें प्लेटो ने लिखा है। इनमें प्रमुख आते हैं एपोलॉजी, क्रिटो, चारमडीज, लेक्स,
एथिप्रो, लाइसिस एंड प्रोटागोरस। वहीं तीसरी कैटेगरी में आते हैं इनके कुछ अदर वक्स जैसे सिमपोजियम, यूथिमस, पेहडो,
गॉर्जियस, मिनो, टाइमियस, फिलवस, मिनेक्सनस एंड हाइपियस। तो ये कुछ इनके इंपॉर्टेंट वक्स रहे हैं जो कि एग्जाम के
दृष्टि से बहुत ही इंपॉर्टेंट हैं। अब हम बात कर लेते हैं इनकी थ्योरी ऑफ टाइप्स ऑफ गवर्नमेंट। बेसिकली इन्होंने छह प्रकार के
गवर्नमेंट्स की बात की हैं। जिनमें सबसे पहली आती है मोनार्की, दूसरे में आती है ओलगार्की, तीसरे में आती है
एरिस्टोक्रेसी, चौथे में आती है प्लूटोक्रेसी और पांचवें में आती है टिरनी और छठे में आती है डेमोक्रेसी। अगर हम बात
करें मोनार्की की तो मोनार्की को इन्होंने सबसे बेस्ट फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट कहा है क्योंकि इन्होंने बोला कि मोनार्की जिसको
हम हिंदी में राजतंत्र कहते हैं ये फिलॉसोफर किंग के द्वारा रूल्ड होगा जहां पर आइडियल स्टेट की स्थापना की जाएगी।
वहीं अगर हम बात करें डेमोक्रेसी की तो डेमोक्रेसी को इन्होंने वर्स्ट फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट कहा है। इन्होंने बोला है कि
डेमोक्रेसी सबसे खराब और गंदा शासन होता है। और ऐसा इन्होंने इसलिए बोला क्योंकि इन्होंने बोला कि जो डेमोक्रेसी होती है
वो मूर्खों का शासन होती है। गधों या फिर सूअरों का शासन होता है। इसी वजह से इन्होंने डेमोक्रेसी की आलोचना की और
डेमोक्रेसी की आलोचना इन्होंने इस वजह से भी क्यों? क्योंकि उनका मानना था कि सुकरात जैसे महान फिलॉसफर को डेमोक्रेसी
की वजह से ही मृत्यु के घाट उतार दिया गया था। तो अब हम बात कर लेते हैं प्लेटो की एक इंपॉर्टेंट थ्योरी जिसका नाम है
एलिगोरी ऑफ द केव। लेकिन अगर आप इस वीडियो को डिटेल में समझना चाहते हैं तो आप इस वीडियो को जरूर देख सकते हैं क्योंकि
मैंने इस वीडियो को पहले ही बनाया है। आप आई बटन पर क्लिक करके या फिर वीडियो के एंड में लिंक प्राप्त करके इस वीडियो को
देख सकते हैं। तो प्लेटो ने ही एक प्रमुख थ्योरी एलिगरी ऑफ़ द केव दी है। जिसमें प्लेटो यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि
केव जो है वह वास्तव में एक ऐसी पोजीशन है जहां पर हम अंधकार में रहते हैं। जहां पर हम रियलिटी को नहीं देख पाते हैं। तो इस
थ्योरी के माध्यम से प्लेटो ने केव को एक संकेत दिया है। यानी कि केव के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि जो केव है
वो इल्यूजन की दुनिया है। भ्रम की दुनिया है। यानी कि जो केव में जब हम रहते हैं यानी कि अंधकार में जब हम रहते हैं तो उसी
पोजीशन में जब हम रहते हैं तो उसको ही हम सब कुछ समझ लेते हैं और रियलिटी को महसूस नहीं कर पाते हैं। तो प्लेटो कहते हैं कि
जो केव है बेसिकली एक उपमा है। यानी कि केव के माध्यम से हमें अपनी पोजीशन समझनी है। किस तरह से हम अंधकार में रहते हैं।
प्लेटो कहते हैं कि जो केव है वह बेसिकली हमारी जो दुनिया में जो बिलीफ होते हैं और ओपिनियन होते हैं उसका एक नाम है और यह
कहते हैं कि यह ऐसी दुनिया है जहां पर हमारी जो लाइफ है कंफर्टेबल है और उस कंफर्टेबल लाइफ से हम बाहर नहीं निकलना
चाहते हैं। क्योंकि हमें ये लगता है कि जिस केव में या फिर जिस इग्नोरेंस की पोजीशन में हम रह रहे हैं वही हमारे लिए
सब कुछ है। लेकिन प्लेटो कहते हैं कि अगर हमें इस रियलिटी को जानना है यानी कि बाहर की दुनिया को हमें जानना है कि बाहर भी
दुनिया है, सूर्य हैं, धरती है, सुंदर नदी, नाले, झरने हैं। यानी कि इस दुनिया की रियलिटी को देखना है। तो प्लेटो कहते
हैं कि एक आदमी को फोर्सफुली बाहर निकालना होगा या फिर एक आदमी को बाहर आना होगा। लेकिन प्लेटो कहते हैं कि ऐसा कौन करेगा
और कैसे होगा? तो प्लेटो कहते हैं कि ऐसा एजुकेशन के द्वारा होगा। जब एजुकेशन एक फिलॉसोफर के द्वारा दी जाएगी तो ऐसी
स्थिति में जो लोग हैं यानी कि जो केवर्स हैं जो अंधकार में रह रहे हैं वो धीरे-धीरे बाहर आने लगेंगे। तो प्लेटो आगे
कहते हैं कि जब एक आदमी बाहर आएगा या उसे फोर्सफुली बाहर लाया जाएगा तो वो रियलिटी को नहीं देख पाएगा। यानी कि बाहर की जो
दुनिया है उसको नहीं देख पाएगा। क्यों? क्योंकि वह हमेशा से अंधकार में रहा है और उसकी आंखें उस लाइट उस हरीभरी दुनिया को
नहीं देख पाएगी। लेकिन प्लेटो यह कहते हैं कि धीरे-धीरे उसकी जो आंखें हैं वह एडजस्ट कर लेगी और वह रियलिटी को देख पाएगा। ऐसी
स्थिति में प्लेटो यह भी कहते हैं कि फिर वह अब क्या करेगा कि वह अब केवर्स के जो आदमी हैं उनके पास जाएगा। उनको रियलिटी
बताने की कोशिश करेगा। लेकिन प्लेटो कहते हैं कि वे लोग उसका कहना नहीं मानेंगे बल्कि उसे उल्टा मारने लगेंगे। तो प्लेटो
कहते हैं कि ऐसी स्थिति में जो वो व्यक्ति जिसने रियलिटी को देखा है वह अब व्यक्ति नहीं बल्कि वो फिलॉसोफर बन गया है। तो
प्लेटो कहते हैं कि ऐसी स्थिति में वो फिलॉसोफर अब प्यार से उन्हें नहीं समझाएगा बल्कि उनके ऊपर फोर्स का प्रयोग करेगा और
ऐसा इसलिए है क्योंकि प्लेटो ये कहते हैं कि अगर वो प्यार से उन्हें समझाने की कोशिश करेगा तो उल्टा उसके साथ वो होगा जो
एथेंस में सॉकेट के साथ हुआ था। इसीलिए प्लेटो कहते हैं कि अब वो जो फिलॉसोफर है वो उनके ऊपर फोर्स का प्रयोग करके उन्हें
उस अंधकार से या फिर केव से बाहर निकालेगा और रियलिटी दिखाएगा। तो ऐसी स्थिति में वो जो फिलॉसोफर है अब वो फिलॉसोफर नहीं है
बल्कि वो अब फिलॉसोफर किंग बन जाता है। फिलॉसोफर इसलिए क्योंकि वो रियलिटी को जानता है। वो सच को जानता है कि रियलिटी
क्या है और किंग इसलिए क्योंकि उसके पास अब पावर है। वह फोर्स का प्रयोग करके लोगों को कंट्रोल कर सकता है। अब हम बात
कर लेते हैं प्लेटो की जस्टिस थ्योरी की। लेकिन प्लेटो कहते हैं कि इससे पहले कि हम यह बताएं कि न्याय क्या है? जस्टिस क्या
है? हमें इससे पहले यह समझना होगा कि न्याय क्या नहीं है यानी कि व्हाट इज नॉट जस्टिस। तो इसके लिए प्लेटो सबसे पहले
ट्रेडिशनल थ्योरी ऑफ जस्टिस लेते हैं। जिन्हें कि सैफल्स और उनके पुत्र पॉलीमार्कस ने प्रतिपादित किया था। तो
इसमें सबसे पहले सैफल्स कहते हैं कि जस्टिस लाइ इन स्पीकिंग द ट्रुथ एंड पेइंग योर डेप्स। तो पहले सैफल्स कहते हैं कि
न्याय का मतलब है सच बोलना और अपने कर्जों को यानी कि ऋण को चुकाना। और दूसरी यह परिभाषा देते हैं गिविंग एवरीवन व्हाट
ड्यू टू हिम। यानी कि यह कहते हैं कि न्याय प्रत्येक व्यक्ति को उसका भाग या फिर हक देने में है। और वहीं पॉलीमार्कस
कहते हैं कि जस्टिस लाइ इन डूइंग गुड टू वंस फ्रेंड एंड हार्म टू वंस एनिमी। तो पॉलीमार्कस कहते हैं कि न्याय एक ऐसी
अवधारणा है जिसमें हम मित्रों के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और जो दुश्मन होते हैं उनके साथ बुरा व्यवहार करते हैं।
लेकिन प्लेटो इसको पूरी तरह से रिजेक्ट कर देते हैं। प्लेटो कहते हैं कि अगर हम न्याय को इस तरह से देखें तो यह न्याय
नहीं बल्कि अन्याय है। क्योंकि इसमें विरोधी कार्य की संभावना बनी रहती है और सबसे बड़ी बात है कि इस तरह का न्याय
अनुभव के द्वारा अर्जित नहीं है। और प्लेटो यह भी कहते हैं पॉलीमार्कस के विचार के बारे में कि मित्र तथा शत्रु की
पहचान करना बहुत ही कठिन है। और यह भी कहते हैं प्लेटो कि इसमें बुरे को और अत्यधिक बुरा बनाया जाता है। और यह एक
राज्य का न्याय ना होकर व्यक्तिवादी है। जो कि न्याय कभी भी व्यक्तिवादी नहीं होता है। न्याय तो सिर्फ एक अंतरात्मा की आवाज
है जो स्वाभाविक है जो नैतिक है। प्लेटो अगला सिद्धांत लेते हैं प्रगमेटिक थ्योरी ऑफ जस्टिस जिसे ग्लूकॉन ने दिया है। तो
ग्लूकोन कहते हैं कि जस्टिस इज द इंटरेस्ट ऑफ द वीकर यानी कि न्याय हमेशा से कमजोर वर्ग का हित होता है। यह बात ग्लूकॉन करते
हैं। लेकिन प्लेटो इसको भी रिजेक्ट करते हैं क्योंकि प्लेटो कहते हैं कि न्याय किसी भी समझौते का परिणाम नहीं होता है और
ना ही न्याय समाज पर कोई लादी गई वस्तु है बल्कि प्लेटो यह कहते हैं कि न्याय अंतरात्मा की आवाज होती है और न्याय ना ही
भय की उपज होती है और ना ही न्याय की पालना भय के कारण की जाती है बल्कि न्याय तो स्थाई है और परिवर्तनशील भी नहीं है
बल्कि अपरिवर्तनशील है क्योंकि इससे पहले ग्लूकोन ने यह कहा था कि जस्टिस इज़ अ सोशल कॉन्ट्रैक्ट दैट इमर्ज बिटवीन पीपल हु आर
रफली इक्वल इन पावर। सो नो वन इज़ एबल टू ऑप्रेस द अदर्स सिंस द पेन ऑफ सफरिंग इन जस्टिस आउटवेट्स द बेनिफिट ऑफ कमिटिंग इट।
तो ग्लूकोन कहते हैं कि न्याय की जो स्थापना हुई है वह सोशल कॉन्ट्रैक्ट के द्वारा हुई है। जिसमें दो ऐसे लोग या फिर
दो ऐसे वर्ग जिनके पास बराबर शक्ति है जो एक दूसरे का ऑपरेस या फिर दमन नहीं कर सकते हैं उनके बीच हुआ ताकि वे उस
इनजस्टिस से या फिर अन्याय से होने वाले नुकसान से बच सके। लेकिन प्लेटो इन सभी को रिजेक्ट कर देते हैं। न्याय से जुड़ी हुई
तीसरी अवधारणा दी है थ्रेसीमक्स ने जिसे हम कहते हैं रेडिकल थ्योरी ऑफ जस्टिस। थसीमक्स कहते हैं कि जस्टिस इज ऑलवेज द
इंटरेस्ट ऑफ द स्ट्रांगर। अर्थात न्याय हमेशा से ही शक्तिशाली लोगों का हित होता है। दूसरी कोटेशन यह देते हैं जिसमें यह
कहते हैं कि इनजस्टिस इज बेटर देन जस्टिस। यानी कि अन्याय न्याय से अच्छा होता है। लेकिन प्लेटो इसको भी पूरी तरह से रिजेक्ट
कर देते हैं। प्लेटो कहते हैं कि न्याय कभी भी शक्तिशाली लोगों का हित नहीं होता है। क्योंकि अगर ऐसा होगा तो फिर जो कमजोर
लोग हैं उनका क्या होगा? वहीं प्लेटो यह भी कहते हैं कि यह समाज का सिद्धांत नहीं है जो सिद्धांत थ्रेसीमक्स ने दिया है।
वहीं प्लेटो यह भी कहते हैं कि अन्याय न्याय से अच्छा नहीं हो सकता है क्योंकि अन्याय के बिना कोई भी राज्य विकास नहीं
कर सकता है। आइडियल स्टेट की स्थापना नहीं की जा सकती है। तो इन सभी या फिर इन तीनों थ्योरीज को प्लेटो ने पूरी तरह से रद्द
किया है। प्लेटो द रिपब्लिक में जस्टिस का आईडिया देते हुए पहले वाले जो नोशंस थे न्याय के बारे में उनको रिजेक्ट करते हैं
और कहते हैं कि जस्टिस इज नॉट द रिजल्ट ऑफ सोशल कॉन्ट्रैक्ट यानी कि न्याय सामाजिक समझौते का परिणाम नहीं है और प्लेटो कहते
हैं कि न्याय स्ट्रांगर का इंटरेस्ट नहीं होता है अर्थात शक्तिशाली लोगों का हित नहीं होता है। प्लेटो कहते हैं कि न्याय
भय की उपज भी नहीं है और कभी भी अन्याय न्याय से बेहतर नहीं हो सकता है। तो प्लेटो कहते हैं कि जस्टिस अंतरात्मा की
आवाज होती है जो कि नेचुरल है, मोरल है और प्लेटो कहते हैं कि जस्टिस आइडियल स्टेट का वर्चू होता है यानी कि सद्गुण होता है
और बिना न्याय के आदर्श राज्य काम नहीं कर सकता है। अस्तित्व में नहीं रह सकता है। तो अब जो मैं आपको बताने जा रहा हूं इसको
थोड़ा सा ध्यान से सुनिए क्योंकि इसको बिना समझे और सुने आप प्लेटो के जस्टिस के कांसेप्ट को अच्छे से नहीं समझ सकते हैं।
प्लेटो तीन प्रकार की क्लासेस की बात करते हैं जिनमें रूलर, सोल्जर और आर्टिशंस आते हैं। प्लेटो कहते हैं कि रूरल के पास अनेक
मेटल, वर्चू और सोल जैसे चीजें होती है। जिनमें रूलर की अगर हम बात करें तो इनकी जो मेटल होती है वो होती है गोल्ड। यानी
कि जिस तरह से गोल्ड की हाई क्वालिटी या फिर कीमत होती है उसी तरह से जो रूलर होते हैं वे गोल्ड के मेटल से बने होते हैं। और
इनके पास वर्चू होती है विज़डम यानी कि विवेक और सोल होती है रैशन। यानी कि इनके पास तार्किकता होती है। अच्छे बुरे की समझ
होती है और इनके पास आइडिया होता है गुड। वहीं सोल्जर की अगर हम बात करें तो प्लेटो कहते हैं कि यह सिल्वर मेटल से बने होते
हैं। जिनके पास करज यानी कि साहस होता है। इनके पास स्पिरिट होती है और इनके पास ऑनर यानी कि सम्मान का आईडिया होता है। और
आर्टिशंस की अगर हम बात करें तो इनके पास कॉपर का गुण होता है। यानी कि ये कॉपर मेटल से बने होते हैं। इनके पास टेंपपरेंस
होता है। और सोल की अगर हम बात करें तो इनके पास एपटीट्यूड होता है यानी कि शुद्धा यानी कि भूख होता है। और इसके लिए
ये इनके पास जो आईडिया होता है वो मनी का होता है। यानी कि ये पैसे के लिए ही काम करते हैं, व्यापार करते हैं, कृषि करते
हैं। तो अगर आप प्लेटो के इस कांसेप्ट को थोड़ा सा ध्यान से देखो तो ये हिंदू फिलॉसोफी से भी मिलता-जुलता है। क्योंकि
मनु की अगर हम बात करें या फिर हिंदू फिलॉसोफी की अगर हम बात करें, तो उसमें भी यह मान्यता है कि जो हिंदू फ़िलॉसोफी में
चार वर्ण हैं, उसमें ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से निकले हैं। क्षत्रिय भुजाओं से निकले हैं। वहीं जो वैश्य हैं वो झंघा से
निकले हैं और शूद्र पांव से निकले हैं। तो उसी तरह का जो मिलताजुलता दोनों का कांसेप्ट है जो कि बहुत ही इंपॉर्टेंट है
एग्जाम की दृष्टि से। प्लेटो का जस्टिस का कांसेप्ट तीन प्रिंसिपल्स पर आधारित है। जिनमें प्रमुख है नॉन इंटरफेरेंस, वर्क
स्पेशलाइजेशन और हार्मोनी। नॉन इंटरफेरेंस में प्लेटो कहते हैं कि इसमें कोई भी वर्ग यानी कि तीनों वर्ग में से एक दूसरे के
कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। वर्क स्पेशलाइजेशन का मतलब यह है कि तीनों वर्ग अपने-अपने काम में ही निपुण होंगे। अर्थात
जिनका जिस काम में स्किल है वह वर्ग या फिर उस वर्ग से संबंधित लोग वही काम करेंगे। और हार्मोनी का मतलब है कि राज्य
में सामंजस्य बनाया रखा जाएगा। यानी कि लोग आपस में मेल मिलाप से रहेंगे। दुश्मनी से नहीं रहेंगे। एकता की भावना से रहेंगे।
प्लेटो के जस्टिस की कुछ इंपॉर्टेंट विशेषताएं हैं। जैसे इंटरनल यानी कि प्लेटो का जो जस्टिस है वह आंतरिक है।
आत्मा से जुड़ा हुआ है। दूसरा है वर्क स्पेशलाइजेशन। यानी कि जिस-जिस काम में जिस व्यक्ति की स्पेशलाइजेशन है यानी कि
स्किल है वही काम व्यक्ति करेगा। फिर प्लेटो कहते हैं कि नॉन इंटरफेरेंस यानी कि कोई भी व्यक्ति एक दूसरे के कार्य में
हस्तक्षेप नहीं करेगा। वही प्लेटो के लिए न्याय है। और अगला है हार्मोनी एंड यूनिटी। यानी कि पूरा समाज सामंजस्य पूर्ण
भावना से रहेगा। मेल मिलाप से रहेगा। एकता की भावना से रहेगा। वहीं अगला है बेस्ड ऑन मोरालिटी। यानी कि जो न्याय है वो नैतिकता
के सिद्धांत पर आधारित है। और दूसरी सबसे इंपॉर्टेंट बात है कि जो न्याय का कांसेप्ट है वो इंडिविजुअल के अगेंस्ट है।
क्यों? क्योंकि प्लेटो ने हमेशा से ड्यूटीज पर फोकस किया है। इंडिविजुअल के जो राइट्स है उनके ऊपर फोकस नहीं किया है।
फिलॉसोफर किंग यानी कि सबसे बड़ी बात है कि जस्टिस फिलॉसोफर किंग के बिना नहीं हो सकता है। क्योंकि फिलॉसोफर किंग के साथ ही
आइडियल स्टेट की उत्पत्ति होती है और आइडियल स्टेट में ही केवल न्याय संभव है। थ्योरी ऑफ़ कम्युनिज्म यानी कि जस्टिस तभी
होगा जब कम्युनिज्म की थ्योरी होगी। यानी कि राजा और जो सैनिक है वो प्रॉपर्टी और वाइब्स यानी कि पत्नियों से और घर परिवार
से दूर रहेंगे। वहीं अगला है डिसेंट्रलाइज्ड पावर यानी कि शक्तियों का बंटवारा होगा। राजा के पास यानी कि जो
रूलर क्लास है उनके पास अलग शक्तियां होंगी। मिलिट्री जो मैन है उनके पास अलग पावर्स होंगी और जो आर्टिशियन क्लास है
उनके पास अलग पावर होंगी। अगला है इक्वल राइट टू वुमेन। और ये सबसे इंपॉर्टेंट कांसेप्ट माना जाता है। और इसी वजह से
प्लेटो को फेमिनिस्ट या फिर फर्स्ट फेमिनिस्ट थिंकर भी माना जाता है। क्योंकि इन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति चाहे वो
पुरुष हो या फिर महिला हो दोनों में से फिलॉसफर किंग बन सकता है। सोल्जर बन सकते हैं। आर्टिजन बन सकते हैं। बस शर्त इतनी
है कि उनके अंदर अलग-अलग क्लास में बनने के लिए या फिर राजा या फिर आर्टिजन या फिर सोल्जर बनने के लिए अलग-अलग योग्यताएं
होनी चाहिए। और अगला नोशन है बेस्ड ऑन ड्यूटीज क्योंकि यह कर्तव्यों पर आधारित है। और अगला है कंसर्न विद ऑल एस्पेक्ट्स
ऑफ लाइफ। यानी कि प्लेटो का जो जस्टिस है, न्याय है वो जिंदगी के हर पहलुओं से चाहे वह राजनीतिक हो, सामाजिक हो, आर्थिक हो,
सांस्कृतिक हो, आध्यात्मिक हो, नैतिक हो, सभी पहलुओं से जुड़ा है। अब हम बात कर लेते हैं प्लेटो और मनु के जो क्लास के
बारे में या फिर वर्णना के बारे में जो विचार रहे हैं, उसका हम एक दृष्टि में कंपेयर करते हैं कि मनु वर्णना के बारे
में क्या कहते हैं और प्लेटो क्लास सिस्टम के बारे में क्या कहते हैं। तो बेसिकली मनु ने चार प्रकार की क्लासेस या फिर
वर्णास की बात की है जिसमें प्रमुख है ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रा। वहीं दूसरी तरफ प्लेटो ने बात की है तीन
प्रकार के क्लासेस की जिनमें आते हैं रूलर्स, सोल्जर्स, आर्टिशंस एंड वर्कर्स। वहीं अगर मनु की हम दूसरी तरफ बात करें तो
मनु का जो बनना सिस्टम है वो जन्म पर आधारित है। यानी कि स्किल और फंक्शनंस पर आधारित नहीं है। वहीं प्लेटो की अगर हम
बात करें क्लास सिस्टम की तो ये स्किल्स और फंक्शन पर आधारित है। और दूसरी सबसे इंपॉर्टेंट बात जो मनु की दृष्टि से वर्णन
सिस्टम के बारे में वह यह है कि इनका जो वर्णन सिस्टम है वह बहुत ही रिजिड यानी कि कठोर है क्योंकि नॉन चेंजबल है। इसको बदला
नहीं जा सकता है। यहां तक कि लोग अपने वर्ण को अपनी स्किल और एजुकेशन के द्वारा भी नहीं बदल सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ अगर
हम प्लेटो की बात करें तो यह बहुत कम कठोर है यानी कि लेस रिजिड है। क्यों? क्योंकि यह चेंजबल है। लोग अपनी स्किल और एजुकेशन
के द्वारा अपने क्लास को बदल सकते हैं। यानी कि अगर किसी व्यक्ति के पास स्किल है तो वह राजा भी बन सकता है। किसी के पास
लड़ने की स्किल है तो वह सोल्जर बन सकता है। किसी के पास व्यापार या फिर काम करने की स्किल है तो वह आर्टिस्ट बन सकता है।
वहीं मनु की अगर हम बात करें तो यह स्ट्रेंथन करता है सोसाइटी को। ऐसा मानना मनु का है और ये धर्म को बनाए रखता है।
यानी कि जो धर्म होता है उसको मेंटेन रखता है क्योंकि इस तरह से सामाजिक जो व्यवस्था है वो सुचारू रूप से चलती है और लोग आपस
में मिश्रित नहीं होते हैं। इसी वजह से जो सोशल सिस्टम है वो बनाए रहता है और धर्म की स्थापना विद्यमान रहती है। वहीं दूसरी
तरफ प्लेटो की अगर हम बात करें तो प्लेटो कहते हैं कि अगर अच्छे तरीके से क्लास सिस्टम होगा यानी कि तीनों कैटेगरी के लोग
अपने-अपने काम करेंगे। हस्तक्षेप नहीं करेंगे तो ऐसी स्थिति में आइडियल स्टेट बहुत व्यापक मात्रा में फलेगा फूलेगा यानी
कि स्ट्रांग होगा और जस्टिस जो है हमेशा से स्थापित किया जाएगा। तो यह है एक छोटा सा कंपेयर मनु का वर्णना सिस्टम और प्लेटो
का क्लास सिस्टम। प्लेटो ने एक आइडियल स्टेट की अवधारणा दी है जिसे ग्रीक भाषा में कैलिपोलिस कहा जाता है। कैलिपोलिस
ग्रीक शब्द है जो कि ग्रीक के दो शब्दों के मेल से बना है। कैलस कैलोस का मतलब होता है ब्यूटी अर्थात सौंदर्य और पॉलिश
का मतलब होता है सिटी स्टेट। यानी कि कैलीपॉलिस एक ऐसा राज्य है, एक ऐसा सिटी स्टेट है जो बहुत ही सुंदर है, ब्यूटीफुल
स्टेट है या फिर एक आइडियल स्टेट है। तो प्लेटो कहते हैं कि कैलपोलिस को इसीलिए स्थापित करना जरूरी है क्योंकि करप्टेड जो
एथेंस है उसको आइडियल सिटी में बदलना है। वहीं प्लेटो ने यह भी कहा कि आइडियल स्टेट की स्थापना के लिए हमें तीन प्रकार की
रेवोलशंस को लाना पड़ेगा। जिनमें प्रमुख है इक्वल राइट्स टू वुमेन कम्युनिज्म ऑफ प्राइवेट प्रॉपर्टी एंड फैमिली रूल ऑफ द
फिलॉसोफर किंग। वहीं द रिपब्लिक में प्लेटो यह भी कहते हैं कि एक आदर्श राज्य के चार बेसिस या फिर फोर एलिमेंट्स होते
हैं। जिनमें प्रमुख है जस्टिस, एजुकेशन, कम्युनिज्म ऑफ प्रॉपर्टी एंड वाइब्स एंड फिलॉसफर किंग। वहीं प्लेटो ने एक
इंपॉर्टेंट कोटेशन दी है या फिर अपना एक मत दिया है जिसमें प्लेटो कहते हैं कि एन आइडियल स्टेट विल रूल ओनली बाय द फिलॉसोफर
किंग यानी कि आदर्श राज्य को एक फिलॉसफर किंग के द्वारा ही शासित किया जाएगा। प्लेटो ने स्टेट के बारे में एक
इंपॉर्टेंट कोटेशन दी जिसमें कहते हैं कि द स्टेट इज रिट लार्ज ऑफ इंडिविजुअल। यानी कि जो राज्य है वह व्यक्ति का बृहत रूप
होता है। व्यक्तियों के मेल से ही राज्य बनता है। इस प्रकार से राज्य व्यक्तियों का एक विशालतम रूप होता है। तो अब हम
प्लेटो के आइडियल स्टेट की कुछ इंपॉर्टेंट फीचर्स को भी देख लेते हैं। तो पहली फीचर है रूल्ड बाय द फिलॉसफर किंग। यानी कि
प्लेटो का जो आदर्श राज्य होगा उसको फिलॉसफर किंग के द्वारा रूल्ड किया जाएगा। दूसरी विशेषता है स्टेट कंट्रोल एजुकेशन
यानी कि राज्य ही शिक्षा का प्रबंध करेगा और तीसरी विशेषता है कि राज्य ही आर्ट और लिटरेचर का भी प्रबंध करेगा। चौथी विशेषता
है कि स्टेट एक प्राकृतिक इंस्टीट्यूशन प्लेटो बताते हैं और इन्होंने ऑर्गेनिक थ्योरी ऑफ़ द आइडियल स्टेट दी। इन्होंने
कहा कि जिस प्रकार से हमारी बॉडी डिफरेंट-डिफरेंट ऑर्गन्स के मेल से बनती है, उसी प्रकार स्टेट भी बनता है। अर्थात
इन्होंने भी मनु की तरह या फिर कौटिल्य की तरह यह कहा या फिर एरिस्टोटल की तरह यह कहा कि स्टेट एक उस तरह से बनता है जिस
तरह से एक बॉडी डिफरेंट-डिफरेंट अंगों से मिलके बनती है। ऑर्गन से मिलकर बनती है। तो इन्होंने कहा कि जस्टिस हो गया,
फिलॉसोफर किंग हो गया या फिर सोल्जर हो गए, आर्टिशंस हो गए। ये डिफरेंट-डिफरेंट क्लासेस है जिनके मेल से ही एक आइडियल
स्टेट बनता है। छठा है स्टेट इज अ मोरल इंस्टीट्यूशन। नैतिक संस्था है। अगली इनकी विशेषता है इक्वल राइट्स टू वुमेन। यानी
कि इन्होंने पुरुषों के समान महिलाओं को भी अधिकार दिए। इसी वजह से कभी कभार इनको फर्स्ट फेमिनिस्ट थिंकर के नाम से भी जाना
जाता है। और इन्होंने वर्क स्पेशलाइज़ेशन की बात की। इन्होंने कहा कि तीनों वर्गों को अपने-अपने क्षेत्र में काम करना होगा।
जिसजिस में वे कुशलता प्राप्त करते हैं। यानी कि इनके पास स्किल है। अगला है सोवनिटी ऑफ द किंग। इन्होंने कहा कि राजा
संप्रभु होगा। और अगली विशेषता है कम्युनिज्म ऑफ प्रॉपर्टी एंड वाइब्स। यानी कि जो आर्मी मैन है या फिर जो किंग है
यानी कि गार्डियंस है वे अपनी पत्नियों से दूर रहेंगे। प्रॉपर्टी और परिवार से दूर रहेंगे। और इन्होंने कहा कि कानून और
पनिशमेंट के लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि इनका स्टेट आइडियल स्टेट होगा। जहां पर सिर्फ न्याय होगा जहां पर लोग सदाचार से
रहेंगे। इसीलिए वहां पर ना कानूनों की जरूरत पड़ेगी, ना पनिशमेंट की जरूरत पड़ेगी, ना डॉक्टर की जरूरत पड़ेगी और ना
ही वकीलों की जरूरत पड़ेगी। और लास्ट विशेषता आइडियल स्टेट की है। जस्टिस इज पॉसिबल इन द आइडियल स्टेट। और ये कहते हैं
कि जो जस्टिस है वो केवल और केवल आइडियल स्टेट में ही पॉसिबल है। यानी कि आदर्श राज्य में ही संभव है। अब हम प्लेटो के
आइडियल स्टेट के ऊपर कुछ कमेंट्स को देख लेते हैं। तो सबसे पहले डनिंग कहते हैं कि प्लेटो का जो स्टेट है वो रोमांस है। वहीं
सेबाइन कहते हैं कि प्लेटो का स्टेट यूटोपिया है। और सेबाइन ने तो यह भी कहा कि एन आइडियल स्टेट इज प्लेटोस सेकंड
बेस्ट। अब बात कर लेते हैं प्लेटो के फिलॉसोफर किंग की। तो प्लेटो ने द रिपब्लिक के छठे यूनिट में फिलॉसोफर किंग
की बात की है। तो प्लेटो सबसे पहले हमें यह बताते हैं कि हमें फिलॉसोफर किंग की जरूरत क्यों है? तो प्लेटो कहते हैं कि
हमें फिलॉसोफर इन की तीन वजह से जरूरत है। पहली वजह है कि जो करप्टेड एथेंस था उसको एक आइडियल सिटी में बदलना है और ऐसा काम
सिर्फ और सिर्फ फिलॉसफर किंग ही कर सकता है। दूसरा तथ्य इन्होंने दिया एस्टैब्लिशमेंट ऑफ द आइडियल स्टेट यानी कि
कैलीपॉलिस की स्थापना करनी है और कैलीपॉलिस को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका फिलॉसफर किंग ही निभा सकता है। और
तीसरी बात इन्होंने की एस्टैब्लिशमेंट ऑफ़ स्ट्रांग एंड स्टेबल मोनार्किक रिज़म यानी कि एक ऐसे राजतंत्र की स्थापना करना जो
स्ट्रांग तो है लेकिन साथ में स्थिर भी है और स्थिर भी होगा और स्ट्रांग भी होगा अगर फिलॉसोफर किंग के द्वारा ही ऐसा मोनार्किक
रिजीम रूल्ड किया जाएगा। तो प्लेटो ने एक इंपॉर्टेंट कोटेशन दी जिसमें यह कहते हैं कि रूलर इज़ द
एंबोडीमेंट ऑफ द ह्यूमन माइंड। तो यह कहते हैं कि मानवीय आत्मा का प्रतीक राजा होता है, शासक होता है।
तो इनकी एक और इंपॉर्टेंट कोटेशन रही है जिसमें यह कहते हैं कि अ वॉशरमैन एंड कॉबलर कांट बी अ किंग। यह कहते हैं कि कोई
धोबी और मोची राजा नहीं बन सकता है। राजा अपनी योग्यता, अपनी स्किल और हायर एजुकेशन के आधार पर ही बनेगा।
तो अब प्लेटो यह सवाल करते हैं कि फिर कौन फिलॉसफर किंग होगा? यानी कि ऐसी कौन सी विशेषताएं एक व्यक्ति में एक फिलॉसोफर में
होगी जो उसे एक फिलॉसोफर किंग बनाएगा। तो प्लेटो मनु की तरह कहते हैं कि स्टेट रूल्ड बाय द फिलॉसफर किंग इज अ डिवाइन
इंस्टीट्यूशन। यानी कि राजा के द्वारा जो स्टेट रूल्ड किया जाता है, शासित किया जाता है, वह बेसिकली ऐसा इंस्टीट्यूशन एक
डिवाइन इंस्टिट्यूशन होता है। दैय संस्था होती है। क्यों? क्योंकि राजा खुद दैय गि गुणों का प्रतीक होता है। इसीलिए प्लेटो
मनु की तरह कहते हैं कि जो स्टेट या जो राज्य एक राजा के द्वारा शासित किया जाएगा वो अपने आप में एक डिवाइन इंस्टीट्यूशन
होगा। तो प्लेटो ने एक राजा की या फिर फिलॉसोफर किंग की कुछ क्वालिटीज का जिक्र किया है। जैसे लवर ऑफ विज़डम। दूसरा
इन्होंने कहा फॉलोअर ऑफ ट्रुथ यानी कि सत्य को चाहने वाला हो। फिर इन्होंने कहा सेल्फ कंट्रोल उसके अंदर आत्मनियंत्रण हो
यानी कि मोह माया में वह ना पड़े। आगे कहा लवर ऑफ जस्टिस यानी कि न्यायप्रिय होना चाहिए और फ्री फ्रॉम सेल्फिशनेस और
इन्होंने कहा कि काम नेचर भी एक राजा का होना चाहिए। और इन्होंने कहा कि राजा के पास विज़डम यानी कि अच्छी मेमोरी होनी
चाहिए। और इन्होंने कहा कि कम्युनिज्म ऑफ वाइब्स एंड प्रॉपर्टी। तो अगर आप ध्यान से देखो शुरू के जो सात विशेषताएं एक राजा के
लिए फिलॉसफर किंग के लिए जो प्लेटो ने बताई वह बिल्कुल कौटिल्य और मनु से मिलती है। हां आठवां जो पॉइंट है कम्युनिज्म ऑफ
वाइब्स एंड प्रॉपर्टी यह हिंदू फिलॉसोफी या फिर जो मनु के विचार है या फिर कौटिल्य के विचार है उससे डायरेक्टली नहीं मिलती
है। हालांकि इनडायरेक्टली जरूर मिलता है क्योंकि मनु भी और कौटिल्य भी यह कहते हैं कि राजा भोग विलासी ना हो।
प्लेटो का जो एजुकेशन प्रोसेस है वह बहुत ही लंबा है। प्लेटो कहते हैं कि एक जो राजा होगा जब उसको एजुकेशन दी जाएगी तो
उसको हम चार भागों में बांटते हैं। पहली होगी प्राइमरी एजुकेशन जो कि 0 साल से 20 साल के बीच होगी। उसके बाद हायर एजुकेशन
होगी जो 20 से 30 साल के बीच चलेगी और उसके बाद फाइनल एजुकेशन होगी जो 30 से 35 वर्षों के बीच चलेगी और फिर लास्ट में
ट्रेनिंग होगी जो कि 35 से 50 साल के बीच होगी। तो सबसे पहले प्लेटो बात करते हैं प्राइमरी एजुकेशन की। तो यह कहते हैं कि
प्राइमरी एजुकेशन का उद्देश्य कैरेक्टर बिल्डिंग होगा। वहीं यह कहते हैं कि फिजिकल एजुकेशन बॉडी के लिए दी जाएगी और
माइंड के लिए म्यूजिक दिया जाएगा। प्लेटो कहते हैं कि 18 से 20 साल के बीच व्यक्ति को या फिर लोगों को जो एजुकेशन प्राप्त कर
रहे हैं उनको मिलिट्री ट्रेनिंग दी जाएगी। और फिर प्लेटो कहते हैं कि 20 साल की उम्र में एक एलिमिनेशन टेस्ट होगा। जो इस टेस्ट
में फेल होगा उसे वॉरियर या फिर प्रोड्यूसर क्लास में काम करना होगा और जो पास होगा उसे आगे की हायर एजुकेशन के लिए
भेज दिया जाएगा। तो प्लेटो कहते हैं कि जो 20 साल का का की अवस्था में जो एलिमिनेशन टेस्ट होता है उसमें जो पास होगा उसे फिर
आगे की जो हायर एजुकेशन है उसके लिए भेज दिया जाएगा। और प्लेटो कहते हैं कि इस अवस्था में यानी कि एलिमिनेशन टेस्ट को
पास करने के बाद हायर एजुकेशन में उसे मैथ्स, मोरल साइंस, एस्ट्रोलॉजी एंड फिलॉसोफी जैसी शिक्षा दी जाएगी। और प्लेटो
कहते हैं कि 30 की अवस्था में फिर दूसरा एक एलिमिनेशन टेस्ट होगा। और जो इस टेस्ट में फेल होगा उसे फिर ऑर्डिनरी ऑफिसर्स
बना दिया जाएगा। यानी कि ब्यूरोक्रेट्स वगैरह छोटे-छोटे जो ऑफिसर्स होते हैं उन्हें बना दिया जाएगा।
और प्लेटो कहते हैं कि जो इस दूसरे एलिमिनेशन टेस्ट में पास होगा उसे फाइनल एजुकेशन के लिए भेज दिया जाएगा। तो प्लेटो
कहते हैं कि जो फाइनल एजुकेशन होगी वह सबसे इंपॉर्टेंट है क्योंकि इसी एजुकेशन की वजह से कोई एक व्यक्ति फिलॉसफर बनता
है। क्यों? क्योंकि ऐसी एजुकेशन में उसे जस्टिस, लॉजिक, फिलॉसोफी, एजुकेशन ऑफ डायलेक्टिक्स जैसी अनेकों शिक्षाएं दी
जाती है और इन्हीं शिक्षा की वजह से वो सत और शुभ का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। यानी कि रियलिटी को जान लेता है। सच को देख
लेता है और इस प्रकार से वह इस दुनिया की जो अल्टीमेट रियलिटी है उसको जान लेता है और वह फिलॉसोफर बन जाता है। तो लास्ट में
प्लेटो कहते हैं कि फिर 35 से 50 की अवस्था के बीच अब एक जो फिलॉसोफर है उसको राजा बनने की ट्रेनिंग दी जाएगी। उसे शासन
चलाना सिखाया जाएगा। और प्लेटो कहते हैं कि उसे प्रैक्टिकल नॉलेज भी दी जाएगी। शासन की राज्य की या फिर वर्ल्डली जो
अफेयर है उसको उसे प्रैक्टिकल नॉलेज से अवगत कराया जाएगा। और प्लेटो कहते हैं कि 50 की उम्र आते-आते ही एक जो फिलॉसोफर है
वह फिलॉसफर किंग बनेगा और रूल को चलाएगा। प्लेटो ने कहा है कि फिलॉसोफर किंग कैन बी मेक ओनली थ्रू द हाई एंड गुड क्वालिटी ऑफ
एजुकेशन सिस्टम। तो प्लेटो कहते हैं कि जो फिलॉसफर किंग है वह केवल अच्छी और उच्च क्वालिटी की जो एजुकेशन सिस्टम है, उसके
द्वारा ही बनाया जा सकता है। यह कोई धोबी और मोची कोई फिलॉसफर किंग नहीं बन सकता है। यह बात प्लेटो करते हैं। तो प्लेटो ने
बेसिकली जो एक फिलॉसोफर किंग होता है उनके तीन फंक्शनंस की बात की है। जिनमें पहला है टू मैनेज क्लास फंक्शनंस एंड जस्टिस।
यानी कि जो डिफरेंट-डिफरेंट क्लासेस होती है उनके कार्य और न्याय को बनाए रखना। एक राजा का काम होता है। एक फिलॉसफर किंग का
सबसे पहला फंक्शन होता है। दूसरा फंक्शन है टू मैनेज एन आइडियल एजुकेशन सिस्टम फॉर अपकमिंग रूलर्स। यानी कि जो आने वाले जो
शासक हैं जो भविष्य में जिनका निर्माण होना है उनके लिए भी एक अच्छा एजुकेशन सिस्टम तैयार करना। और तीसरा फंक्शन है एक
फिलॉसफर किंग का कंट्रोल ओवर द रिलीजियस फेथ। यानी कि जो धार्मिक मामले होते हैं उनके ऊपर भी एक राजा या फिलॉसोफर किंग
नियंत्रण स्थापित करेगा। अब बात कर लेते हैं कि प्लेटो का जो फिलॉसोफर किंग है उसकी क्या पोजीशन है? तो
अगर पोजीशन की बात हम करें तो प्लेटो का जो फिलॉसोफर किंग है वो टिरनी होता है। यानी कि उसके पास तानाशाह होती है। उसके
पास असीमित शक्तियां होती है। इसी वजह से सेबाइन ने प्लेटो के फिलॉसोफर किंग को कहा एनलाइटन टिरनी। एनलाइटन का मतलब होता है
प्रबुद्ध। यानी कि वो रियलिटी को जानता है। इसीलिए एनलाइटन है। सत्य को वो जानता है। और टिरनी क्यों है? क्योंकि उसके पास
बल है, शक्ति है। इसीलिए वो सेबाइन के शब्दों में एनलाइटन टिरनी है। वहीं प्लेटो का जो रूल है और गवर्न सिस्टम है उसको
जाना जाता है रीज़नेबल अथॉरिटेरियन। और कार्ल पॉपर जैसे विद्वानों ने प्लेटो को फर्स्ट फासिस्ट इन द वर्ल्ड कहा है। वहीं
हना आरंट ने भी उसे फिलॉसफर ऑफ फासिस्ट कहा है। और दूसरा पॉइंट है अनलिमिटेड पावर्स ऑफ द फिलॉसफर किंग। क्योंकि
फिलॉसोफर किंग के पास असीमित शक्तियां होती है। इसीलिए उसकी जो पोजीशन है वो तानाशाह वाली होती है। इसी वजह से ह्ना
आरंट ने उसे फिलॉसोफर ऑफ फास्टेस्ट कहा। अब हम प्लेटो की स्कीम ऑफ एजुकेशन को थोड़ा सा डिटेल में पढ़ लेते हैं, समझ
लेते हैं। और इसके लिए हमें दो मॉडल लेने हो गए। पहला एथेनियन मॉडल और दूसरा स्पार्टन मॉडल। और इन दोनों मॉडल्स की
हमें आपस में तुलना करनी है। अर्थात प्लेटो के अकॉर्डिंग एथेंस में किस तरह की एजुकेशन सिस्टम था और स्पार्ट में किस तरह
का एजुकेशन सिस्टम था। इसमें हमें कंपैरेटिवली स्टडी करनी है। तो सबसे पहले अगर हम बात करें एथेनियन मॉडल की तो यह
फैमिली कंट्रोलोल्ड एजुकेशन सिस्टम था। यानी कि परिवार के द्वारा ही नियंत्रित एजुकेशन सिस्टम था। दूसरी तरफ स्पार्टन
अगर मॉडल की हम बात करें तो वहां पर स्टेट कंट्रोलोल्ड एजुकेशन सिस्टम था। एथेन मॉडल में कोई स्टेट का कोई इंटरफेरेंस नहीं था।
वहीं स्पार्टन में फैमिली का किसी भी तरह का कोई इंटरफेरेंस नहीं था। उदाहरण के लिए हम यह समझ सकते हैं कि एथेंस में जो
एजुकेशन है वह फैमिली के द्वारा निर्धारित की जा सकती थी। वहीं स्पार्ट में जो एजुकेशन सिस्टम है, वह राज्य के द्वारा
निर्धारित किया जाता था। दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि एथेंस में जो सिलेबस था वह बड़ा कंप्रहेंसिव था। प्राइमरी एजुकेशन छ
से 14 साल के बीच थी। मिडिल एजुकेशन 14 से 18 साल के बीच थी और वहां पर कंपलसरी मिलिट्री जो एजुकेशन थी वो 2 साल के लिए
थी 18 से 20 वर्ष के बीच। वहीं स्पटा के दूसरी तरफ अगर हम बात करें तो सिलेबस बड़ा लिमिटेड था। प्राइमरी एजुकेशन छ से 14,
मिडिल एजुकेशन 14 से 18 और कंपलसरी मिलिट्री ट्रेनिंग वहां पर थी 7 साल के लिए और 18 से 20 साल की जो अवस्था है वह
वहां पर कंपलसरी मिलिट्री ट्रेनिंग थी। लेकिन एक व्यक्ति को 7 साल के लिए अनिवार्य रूप से मिलिट्री सेवा देनी पड़ती
थी और यह दोनों ही मैन और वुमेन के लिए कंपलसरी था। दूसरी तरफ अगर हम बात करें एथेन मॉडल ऑफ
एजुकेशन की तो वहां पर एजुकेशन का एम जो है वह सिक्योरिटी ऑफ द स्टेट नहीं था लेकिन स्पार्ट में एजुकेशन का एम
सिक्योरिटी ऑफ द स्टेट था। रूसू लिखते हैं कि रिपब्लिक इज अ ट्रीटी नॉट ऑन गवर्नमेंट बट ऑन एजुकेशन। रिपब्लिक एक संधि है। एक
समझौता है सरकार के ऊपर नहीं बल्कि एजुकेशन के ऊपर, शिक्षा के ऊपर। वहीं प्लेटो लिखते हैं कि एजुकेशन इज़ द
प्राइमरी फंक्शन ऑफ द स्टेट। तो प्लेटो का जो एजुकेशन मॉडल है उसकी अनेकों विशेषताएं हैं। पहली विशेषता है लाइफ लॉन्ग प्रोसेस
यानी कि जीवन भर चलने वाला प्रोसेस है। जीरो साल से ले 50 साल तक एक व्यक्ति को एजुकेशन ही प्राप्त करनी होती है। तब जाके
वह फिलॉसोफर बनता है। दूसरी विशेषता है स्टेट कंट्रोल। प्लेटो चाहते थे कि जो शिक्षा है वह राज्य के द्वारा नियंत्रित
हो। तीसरी विशेषता है ओवरऑल डेवलपमेंट। यानी कि एक जो व्यक्ति है उसका बहुमुखी और चुमुखी विकास हो। अगली विशेषता है एनहांस
स्टेट सिक्योरिटी यानी कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे राज्य की जो सुरक्षा है उसको बढ़ोतरी मिले। उसको बल मिले। डिवीजन ऑफ
एजुकेशन इन्होंने एजुकेशन का बंटवारा किया दो भागों में। एलिममेंट्री एजुकेशन छ से 20 साल और दूसरी हायर एजुकेशन 20 से 35
वर्ष। प्लेटो कहते हैं कि एक सिस्टमेटिक एजुकेशन सिस्टम होना चाहिए। प्लेटो यह भी कहते हैं
कि जो एजुकेशन है वह सभी के लिए कंपलसरी है क्योंकि शिक्षा से ही लोगों में सद्गुण और ज्ञान की प्राप्ति होती है और प्लेटो
कहते हैं कि इक्वल टू बोथ मैन एंड वुमेन यानी कि एजुकेशन महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए बराबर रूप से उपलब्ध होनी चाहिए।
एम ऑफ एजुकेशन इज जस्टिस। और सबसे इंपॉर्टेंट पॉइंट प्लेटो देते हैं कि एजुकेशन का जो ऐ होता है वो न्याय को
बढ़ावा देना है। सत्य की प्राप्ति करना है। रियलिटी की प्राप्ति करना है। और प्लेटो कहते हैं कि मैनेज्ड बाय द
फिलॉसोफर किंग। यानी कि जो एजुकेशन है वो मैनेज की जाएगी फिलॉसोफर किंग के द्वारा। अब हम बात कर लेते हैं प्लेटो की स्कीम ऑफ
कम्युनिज्म ऑफ वाइब्स एंड प्रॉपर्टी। और यह सबसे अजीबोगरीब धारणा रही है इनकी। जहां एक तरफ प्लेटो कहते हैं कि एजुकेशन
इज द प्राइमरी फंक्शन ऑफ स्टेट। यानी कि सबसे पहला कर्तव्य राज्य का एजुकेशन को प्रोवाइड कराना है। वहीं दूसरी तरफ कहते
हैं कि एक राज्य के लिए राजाओं का और जो वॉरियर क्लास है उनके लिए कम्युनिज्म ऑफ वाइब्स और प्रॉपर्टी करना भी बहुत जरूरी
है। तो प्लेटो का जो स्कीम है कम्युनिज्म ऑफ वाइब्स एंड प्रॉपर्टी उसकी अनेकों विशेषताएं हैं। जिनमें पहली विशेषता है
गार्डियन एंड ऑगिलरी क्लास विल नॉट हैव एनी प्राइवेट प्रॉपर्टी। जो गाइड गार्डियन है या फिर संरक्षक वर्ग है या फिर जो हायर
क्लास के लोग हैं, मिलिट्री क्लास के लोग हैं उनके पास प्रॉपर्टी जैसी कोई चीज नहीं होगी। दूसरी विशेषता यह है कि दे विल
आल्सो हैव नॉट एनी फैमिली। और उनके पास किसी भी तरह का कोई परिवार नहीं होगा। वे अपना परिवार नहीं बनाएंगे। और प्लेटो कहते
हैं कि इंस्टीट्यूशन ऑफ फैमिली अबोलिश्ड फॉर गार्डियन एंड वॉरियर क्लास। और ये कहते हैं कि जो राजा होता है, संरक्षक
वर्ग होता है, योद्धा की जो क्लास होती है, सैनिक होते हैं, उनके पास भी किसी तरह की कोई फैमिली की इंस्टिट्यूशन नहीं होगी।
यानी कि परिवार से वो पूरी तरह से दूर रहेंगे। और प्लेटो सबसे इंपॉर्टेंट धारणा देते हैं यूजेनिक्स की। और यह कहते हैं कि
यूजेनिक्स की तरह ही लोग रहेंगे। यानी कि यूजेनिक्स की धारणा की पालना लोग करेंगे। बेसिकली यूजेनिक्स एक ऐसी धारणा है जिसमें
जो लोग हैं लोगों की जो जेनेटिक क्वालिटी है उसको सुधारने का प्रयत्न किया जाता है जिसमें हष्टपुष्ट बुद्धिमान स्त्री पुरुष
मिलके आपस में संभोग करते हैं या फिर फिजिकल एक्टिविटी करके संतानों को जन्म देते हैं। वहीं प्लेटो यह भी कहते हैं कि
बेस्ट ऑफ मैन मेड टू मेड विद बेस्ट ऑफ वुमेन यानी कि जो अच्छा पुरुष होगा जिसके पास अच्छी बुद्धि होगी जिसका शरीर
हष्टपुष्ट होगा और दूसरी तरफ जो महिला विवेकपूर्ण होगी जिसके पास अच्छी बॉडी होगी अच्छा शरीर होगा वे आपस में मिलेंगे
फिजिकल एक्टिविटीज करके बच्चे को जन्म देंगे और यह प्लेटो कहते हैं कि स्टेट विल फिक्स मीटिंग सीजन और प्लेटो कहते हैं कि
ऐसा जो सीजन है यानी कि स्त्री पुरुष का मिलने का जो समय है उसका अधिकार सिर्फ राज्य को है। राज्य ही यह तय करेगा कि कौन
सा पुरुष किस स्त्री के साथ संभोग स्थापित करेगा। फिजिकल रिलेशन बनाएगा और बच्चों को जन्म देगा। कब किस मौसम में किस दिन
स्त्री पुरुष आपस में मिलेंगे। यह सारा का सारा जो टाइम है, यह स्टेट ही फिक्स करेगा। और लास्ट में प्लेटो कहते हैं कि
सक्सेसफुल वॉरियर्स एंड रूलर्स मेड टू हैव एज मेनी चाइल्डन एज पॉसिबल। और यह कहते हैं कि जो वॉरियर होते हैं उनके पास भी
साहस होता है और जो राजा होता है उसके पास विवेक होता है, नॉलेज होती है, रियलिटी होती है। यानी कि उनकी जो बुद्धि है वे
बहुत ही स्ट्रांग होती है। उनके पास विज़डम होती है और बॉडी उनकी शक्तिशाली होती है। इसीलिए राजा और जो वॉरियर क्लास के जो लोग
हैं वे जहां तक संभव हो सके अधिक से अधिक बच्चे पैदा करेंगे ताकि राज्य में हष्टपुष्ट और बुद्धिमान बच्चे पैदा हो। द
प्रिंस निकोलो मैक्यावली द्वारा लिखित एक ऐसी बेहद इंपॉर्टेंट कृति है जिसको क्लासिकल रियलिज्म की एक आधारशिला और
मुख्य कृति मानी जाती है। लेकिन इससे पहले कि हम द प्रिंस और निकोलो मैकावली के बारे में विस्तारपूक पढ़ें। स्क्रीन पर जो आपको
कोटेशन दिखाई दे रही है, इसको थोड़ा सा डेप्थ में पढ़ लेते हैं, समझ लेते हैं। यह कहते हैं मनुष्य अपने पिता के हत्यारे को
क्षमा कर सकता है, परंतु अपनी संपत्ति छीनने वालों को नहीं। इसका मतलब यह है कि यह मनुष्य स्वभाव का नेगेटिव एक्सप्लेनेशन
करते हैं और कहते हैं कि मनुष्य स्वभाव से ही लोभी होता है, स्वार्थी होता है, लालची होता है और इतना ज्यादा होता है कि वह
अपने पिता के हत्यारे को भूल सकता है। लेकिन अगर कोई उसकी संपत्ति को छीने तो उसको कभी वह क्षमा नहीं कर सकता है। इसलिए
यह कोटेशन आपको याद रखना और समझना बहुत ही जरूरी है। ना केवल इसलिए कि यह एग्ज़ाम में बार-बार पूछी जाती है बल्कि इसलिए भी इस
कोटेशन को समझना आपके लिए बहुत ही जरूरी हो जाता है क्योंकि यह कोटेशन आपको द प्रिंस और मैकेवली के विचारों को समझने
में बहुत ज्यादा मदद कर सकती है। तो अब हम इनकी बायोग्राफी एंड लाइफ को थोड़ा सा समझ लेते हैं। यह इटली के रेनेसामैन,
डिप्लोमेट, फिलॉसोफर, राइटर और पॉलिटिकल फिलॉसोफर रहे हैं। और इनका जन्म 3 मई 1469 को इटली के फ्लोरेंस में हुआ था। और इनकी
डेथ 21 जून 1527 को इटली के फ्लोरेंस में हुई। और इनका पूरा नाम था निकोलो दाई बरनादो दाई मैकावली। और इनकी पिता का नाम
था बरनादो दाई निकोलो मैकावली। और इनकी माता का नाम था बारतोलो मया दाई स्टेफानो नैली और डनिंग ने इनको कहा है कि
मैक्यावली अपने हालात का बच्चा है और ऐसा इन्होंने इसलिए कहा क्योंकि तत्कालीन जो इटली की परिस्थितियां थी उसका इनके जीवन
पर और इनकी फिलॉसोफी पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा। चाहे वो रेनेसा हो या फिर वहां के गवर्नमेंट्स हो या फिर वहां की
दूसरी परिस्थितियां हो। इन सभी चीजों का मैक्यावली के जीवन पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा। जिसकी वजह से डनिंग ने कहा कि
मैक्यावली अपने हालात का बच्चा है। इनकी पत्नी का नाम मैरिता कोरसेनी था जिससे इन्होंने 1502 ईस्वी में शादी की और
निकोलो मैकावली को क्लासिकल रियलिज्म और क्लासिकल रिपब्लिकन से भी जोड़ा जा सकता है क्योंकि इनकी दो महत्वपूर्ण कृति पहली
द प्रिंस क्लासिकल रियलिज्म के बारे में बताती है। दूसरी द डिस्कोर्सेस क्लासिकल रिपब्लिकन के बारे में बताती है। और कई
बार इनको फ़ादर ऑफ मॉडर्न पॉलिटिकल फिलॉसोफी और मॉडर्न पॉलिटिकल साइंस भी जाना जाता है। और 29 वर्ष की अवस्था में
इन्होंने एज अ चांसलर जॉब की। उसके बाद ये 10 ऑफ़ वॉर कमेटी के मेंबर बने और ई कमेटी ऐसी थी जिसने इनकी दिशा और दशा को पूरी
तरह से परिवर्तित कर दिया और उसके बाद इन्होंने एज अ डिप्लोमेट 14 वर्षों के लिए काम किया। जहां से इन्होंने बहुत सारी
बातें सीखी और इनके चिंतन पर इस एक्सपीरियंस का इस अनुभव का बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा।
लेकिन 1513 में इटली में मेडिसी गवर्नमेंट वापस आती है और इनको जॉब से निकाल दिया जाता है और कॉनस्परेसी के केस में इनको
जेल में डाल दिया जाता है और इनको बहुत टॉर्चर किया जाता है। हालांकि बाद में इन्हें छोड़ दिया जाता है। लेकिन एक
कंडीशन तय की जाती है। इनको कहा जाता है कि वह कभी भी पब्लिक लाइफ में भाग नहीं लेंगे, हिस्सा नहीं लेंगे। तब जाकर ही
इनको छोड़ा जाता है। उसके बाद यह फिर अपने नेटिव विलेज में आ जाते हैं और वहां पर 1513 ईस्वी में द प्रिंस और द डिस्कोर्सेस
को लिखना शुरू कर देते हैं और यही दोनों कृतियां इनकी अक्षय कृतियां मानी जाती है। इनको फर्स्ट मॉडर्न थिंकर भी कहा जाता है
और इन्होंने एथिक्स को पॉलिटिक्स से पूरी तरह से अलग कर दिया। इनकी कोटेशन भी आप देख सकते हो जिसमें इन्होंने कहा है
पॉलिटिक्स हैव नो रिलेशन विद मोरल्स जिसमें यह कहते हैं कि राजनीति का मोरल्स अर्थात नैतिकता के साथ किसी भी प्रकार का
कोई संबंध नहीं है। अब हम इनके वक्स देख लेते हैं। सबसे पहली अक्षय कृति इनकी है द प्रिंस जो कि इन्होंने 1513 ईस्वी में
लिखनी शुरू कर दी थी और 1532 ईसवी को यह पब्लिश हुई थी। इसका वैसे तो कंटेंट अगर देखा जाए बहुत ही व्यापक रहा है। लेकिन
इसमें यह मूल प्रश्न करते हैं कि क्यों वंशीय राजतंत्र बेस्ट फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट है। वैसे इन्होंने इस कृति में प्रिंस को
कुछ टिप्स भी दिए हैं, कुछ सुझाव भी दिए हैं जिनको हम बाद में चलकर आगे डिस्कस करेंगे। इसके बाद इन्होंने एक और
महत्वपूर्ण कृति लिखी द डिस्कोर्सेस ऑन लिबी 1531 ईवी में और यह गणतंत्र के बारे में बता दी
है। इसका मूल प्रश्न यह है कि क्यों रिपब्लिक अर्थात किन परिस्थितियों में रिपब्लिक बेस्ट फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट है।
इसके बाद इन्होंने एक और महत्वपूर्ण कृति लिखी जिसका नाम है द आर्ट ऑफ वॉर और ये 1521 में पब्लिश हुई। इसके बाद इन्होंने
एक और राइटिंग लिखी जिसका नाम है फ्लोरेंटाइन हिस्ट्रीज। 1532 में पब्लिश हुई और इसमें इन्होंने फ्लोरेंस नगर जो है
उसकी इतिहास अर्थात हिस्ट्री के बारे में इसमें वर्णन किया है और एक और इनकी कृति रही है जिसका नाम है लाइफ ऑफ टेस्टको
टेस्टाकनी जो कि 1520 में पब्लिश हुई। तो ये थी इनकी महत्वपूर्ण कृतियां जो आपको याद रखनी है। आप इसका स्क्रीनशॉट लेके या
फिर पॉज करके आप इनको नोट कर सकते हैं। अब हम द प्रिंस की फिलॉसोफी का एनालिसिस कर लेते हैं।
तो द प्रिंस को इन्होंने 1513 ईवी में लिखना शुरू कर दिया था और 1532 ईस्वी में यह पब्लिश हुई थी। इस किताब को द आर्ट ऑफ
स्टेट क्राफ्ट के नाम से जाना जाता है क्योंकि यह शासन कला पर लिखी गई थी कि शासन को कैसे चलाया जा सकता है। इसी वजह
से इसको द आर्ट ऑफ़ स्टेट क्राफ्ट के नाम से जाना जाता है। और यह प्रेजेंट करती है थ्योरी ऑफ़ प्रिज़र्वेशन ऑफ़ स्टेट। अर्थात
यह बताती है कि स्टेट को राज्य को किस तरह से सुरक्षित रखा जा सके, संरक्षित रखा जा सके। और इसमें मैक्यावली प्रिंस को कुछ
सुझाव देता है कि पावर को कैसे गेन किया जाए, उसको स्टेबलाइज कैसे किया जाए, स्थिर कैसे रखा जाए?
और इसको बेसिकली जाना जाता है अ हैंडबुक ऑफ रियल पॉलिटिक अर्थात वास्तविक राजनीति क्या होती है? एक राजा किस तरह से राजनीति
बनाए रखता है? राजनीति या राज्य को कायम रखता है, प्राप्त करता है, शक्ति को इसके बारे में यह बताती है। इसीलिए इसको
बेसिकली अ हैंड बुक ऑफ रियल पॉलिटिक भी कहा जाता है। और यह कुछ ऐसी बुराइयों को सपोर्ट करती है। जैसे वलेंस है या फिर
कनिंगनेस है, डिसेप्शन है। इनको यह मानती है। अर्थात यह बताती है कि हिंसा, धोखेबाजी, छल यह जरूरी हैं। राज्य की पावर
को सुरक्षित रखने के लिए, राज्य को हमेशा स्थिर बनाए रखने के लिए, शक्ति को गेन करने के लिए चाहे वह हिंसा हो, धोखेबाजी
हो, छल हो। ये सारी जितनी भी ईवेल है, वह बहुत ही जरूरी है। और यह बेसिकली जो किताब है, यह क्लासिकल रियलिज्म का एक मूल आधार
है, मूल किताब है। तो, मैक्यावली ने द प्रिंस में ह्यूमन नेचर को बताया है। जिसमें वह कहते हैं कि
मनुष्य स्वभाव से ही सेल्फिश है, फिकल है, इगोस्टिक है, रन अवे फ्रॉम डेंजर है,
एग्रेसिव एंड पजेसिव है। इसका मतलब यह है कि मनुष्य स्वभाव से ही लालची है, स्वार्थी है, लोभी है, अत्याचारी है,
अहमवादी है, इगोइसिस्टिक है। और वह हमेशा डेंजर यानी कि खतरों से दूर रहना चाहता है। हमेशा कंफर्ट ज़ोन में रहना चाहता है।
एग्रेसिव है, पज़ेसिव है। अर्थात दूसरों को वह दबाना चाहता है। आक्रामक है। और मैक्यावली कहते हैं कि इन परिस्थितियों की
वजह से ही मनुष्य एक एनार्किकल सिचुएशन में फंसा होता है और कंफ्लिक्ट और कंपटीशन की भावना स्टेट या
सोसाइटी में होती है। यह कहते भी हैं कि आदमी अपने बाल बच्चों की अपेक्षा संपत्ति को ही अधिक चाहता है। तो यह दर्शाता है कि
वे ह्यूमन नेचर के बारे में नेगेटिव वर्णन करते हैं। नेगेटिव बताते हैं और यह कहते हैं कि इसी ह्यूमन नेचर की वजह से
क्फ्लिक्ट और कंपटीशन बढ़ता है और क्फ्लिक्ट और कंपटीशन की वजह से ही सिक्योरिटी और सर्वाइवल जो होता है वो
खतरे में पड़ जाती है। और जब सिक्योरिटी एंड सर्वाइवल खतरे में पड़ जाता है तो वहां पे एनार्किकल सिचुएशन हो जाती है।
अर्थात समाज में या फिर राज्य में अव्यवस्था फैल जाती है। अराजकता फैल जाती है। एनार्किकल स्थापित हो जाती है। और
मैक्यावली द प्रिंस में कहते हैं कि इसी एनार्की को दूर करने के लिए हमें एक प्रिंस एक राजकुमार की आवश्यकता होती है।
जरूरत होती है। अब जान लेते हैं कि मैक्यावली स्टेट के बारे में क्या विचार देते हैं। मैक्यावली
कहते हैं कि स्टेट में दो प्रकार के शासन पाए जा सकते हैं। एक है मोनार्की दूसरा है रिपब्लिक। वह कहते हैं कि मोनार्की में
हमेशा प्रिंस शासन करेगा। अर्थात उनका जो राजकुमार है उसका ही रूल होगा। दूसरी तरफ रिपब्लिक में पॉपुलर रूल होगा। यानी कि
लोग ही वास्तव में शासन करेंगे। लेकिन ये कहते हैं कि मोनार्की में जो शासन होगा वो राजकुमार करेगा। लेकिन वो वंशानुक्रम के
आधार पर नियुक्त होगा। फॉर एग्जांपल जैसे मैं एक राजा हूं तो मेरे बाद मेरा बेटा बैठेगा। फिर मेरा मेरे बेटे बेटे के बाद
फिर मेरा पोता राजकुमार बनेगा। तो इस तरह से जो है वह मोनार्की में अकॉर्डिंग टू मैक्यावली शासन चलता है। दूसरी तरफ वह
कहते हैं कि रिपब्लिक में लोगों की पार्टिसिपेशन होती है। अर्थात सारे लोग ही मिलकर शासन को चलाते हैं। पार्टिसिपेट
करते हैं। तो ये है मैक्यावली की सिद्धांत स्टेट के बारे में जिसमें यह कहते हैं द प्रिंस में कहते हैं कि मोनार्की होगी।
प्रिंस का शासन होगा और ये वंशानुक्रम जो है प्रिंस चुना जाएगा, इ होगा, नियुक्त होगा। दूसरी तरफ यह कहते हैं डिस्कोर्सेस
ऑन लेबी में कि रिपब्लिक में पॉपुलर रूल होगा। इसमें लोगों की पार्टिसिपेशन होगी। तो ये है मैक्यावली के द प्रिंस में स्टेट
के बारे में विचार। अब हम जान लेते हैं कि मैक्यावली गवर्नमेंट के बारे में क्या कहते हैं? अर्थात गवर्नमेंट के बारे में
इनके क्या विचार रहे हैं। तो ये कहते हैं कि गवर्नमेंट दो प्रकार की होती है। पहली है मोनार्की दूसरी है रिपब्लिक। और ये
कहते हैं कि मोनार्की हमेशा से प्रैक्टिकल फॉर्म होती है और रिपब्लिक दूसरी तरफ आइडियल फॉर्म होती है। ऐसा क्यों है? यह
कहते हैं कि प्रैक्टिकल मोनार्की इसलिए है क्योंकि मनुष्य स्वभाव से स्वार्थी होता है, लालची होता है, भ्रष्टाचारी होता है,
धोखेबाज होता है। इसीलिए मोनार्की प्रैक्टिकल फॉर्म है और यह वहां पर सबसे ज्यादा उपयुक्त है जहां के लोग स्वार्थी
हो, लालची हो, भ्रष्टाचारी हो ताकि उन पर लगाम लगाई जाए। दूसरी तरफ यह कहते हैं कि रिपब्लिक एक आइडियल अर्थात आदर्श फॉर्म है
और यह ऐसे लोगों के लिए उपयुक्त है जो लोग सदाचारी हो, सहयोगी हो, भ्रष्टाचारी ना हो जिनका गुड मैनर हो। तो कुल मिला के द
प्रिंस में मैक्यावली कहते हैं कि गवर्नमेंट दो तरह की होती है। तो अब हम देख लेते हैं कि द प्रिंस में मैकबली अपने
राजकुमार को क्या-क्या टिप्स देते हैं। क्या-क्या सजेशंस देते हैं? तो वे पहली सजेशन देते हैं कि प्रिजर्वेशन ऑफ हिज
स्टेट। अर्थात राजकुमार का पहला कार्य यह होगा कि वह अपने राज्य को सुरक्षित रखेगा। कैसे रखेगा? इसके लिए मैक्याबली कहते हैं
कि सबसे पहले उसे अपने राज्य में ऑर्डर एंड स्टेबिलिटी बनाए रखना है। उसके बाद उसे अपने लैंड से प्यार भी होना बहुत ही
जरूरी है। उसके बाद वह लोगों की केयर करेगा, सुरक्षा करेगा और लोगों की जो प्रॉपर्टी होगी, लाइफ होगी उसको भी वह
सुरक्षित रखेगा। जब राजा यह काम कर लेगा तब जाके ही उसके राज्य का प्रिजर्वेशन अर्थात उसका राज्य सुरक्षित हो सकता है।
गेटल ने कहा भी है मैक्यावली का राजदर्शन राज्य का सिद्धांत ना होकर राज्य की सुरक्षा का सिद्धांत है। इसमें गेटल यह कह
रहे हैं कि मैक्यावली का जो राजदर्शन है वह यह नहीं बताता है कि राज्य क्या है बल्कि यह बताता है कि राजकुमार को अपना
राज्य किस तरह से सुरक्षित रखा जाना चाहिए। दूसरी टिप्स वे देते हैं कि राजा के पास क्वालिटी ऑफ ब्रिटि होनी चाहिए।
ब्रिटि एक प्रकार का गुण है जिसमें राजा के पास लीडरशिप की क्वालिटी होती है। पावर होती है और जिसके द्वारा वह पावर को गेन
कर सकता है। राज्य को स्टेबलाइज रख सकता है। अगली टिप्स शो देता है कि राजा के पास रूलर्स शुड हैव वर्चू यानी कि वर्चू होनी
चाहिए। सद्गुण होना चाहिए। सद्गुण का मतलब यह है कि उन्हें सत और शुभ का ज्ञान हो। सत और शुभ का मतलब यहां पे यह है कि क्या
चीज उनके राज्य के लिए सही है और क्या चीज उनके राज्य के लिए गलत है। अर्थात उन्हें यह समझ होनी चाहिए कि कौन सी चीजें उनके
राज्य को पावरफुल बना सकती है, सुरक्षित रख सकती है और कौन सी नहीं और उन दो चीजों के आधार पर ही उन्हें अर्थात राजकुमार को
कार्य करने चाहिए। अगली टिप्स वे देते हैं। वे कहते हैं कि प्रिंस मस्ट बी फियरलेस एंड कोजियस। यानी कि जो प्रिंस
है, राजकुमार है, उनके अंदर भय नहीं होना चाहिए और उनके अंदर हमेशा साहस कूट-कूट के भरा होना चाहिए। वे कहते हैं कि ही मस्ट
नेवर बी हेटेड बाय द पीपल। और वह कहते भी हैं कि लोग उससे कभी भी नफरत ना करें। डरे लेकिन नफरत ना करें। अर्थात लोगों के दिल
में उसके लिए भय हो, प्यार हो लेकिन नफरत ना हो। और अगली वो बात कहते हैं कि कीप पीपल सेटिस्फाइड एंड स्टुफिफाइड। वे कहते
हैं कि राजा के अंदर ऐसी क्वालिटी होनी चाहिए। राजकुमार के अंदर ऐसी क्वालिटी होनी चाहिए कि हमेशा लोगों को वो
सेटिस्फाई रखें जिसकी वजह से लोग उसके विरुद्ध क्रांति ना लाए और लोगों को वो मूर्ख भी बनाएं। लोगों को वो पागल भी
बनाएं यानी कि अंधविश्वास में या धोखे में रखें। उनको पागल करें। ऐसी क्वालिटी एक राजकुमार या राजा के अंदर होनी चाहिए। और
इसके लिए वे कहते हैं कि द प्रिंस में वह कहते हैं कि द रिलेशन बिटवीन प्रिंस एंड पीपल शुड बी बेस्ड ऑन फियर। तो
वो कहते हैं द प्रिंस में कि जो लोग और राजकुमार के बीच रिलेशन है वो डर के आधार पर होना चाहिए। बिकॉज़ लव इज़ टेंपरेरी बट
फियर इज़ परमानेंट। वे कहते हैं कि लव टेंपरेरी होता है। यानी कि अस्थाई होता है लेकिन फ़ियर स्थाई होता है। परमानेंट होता
है। द बॉन्ड ऑफ़ लव कैन बी ईज़ली ब्रोकन एट वंस विल बट फियर ऑफ़ पनिशमेंट ऑलवेज रिमेंस। तो वह कहते हैं कि जो प्यार का
संबंध है वह कभी भी तोड़ा जा सकता है। लेकिन जो फ़ियर है वह हमेशा दिल में रहती है। हमेशा वह उसका जो डर है वह रहता है।
इसीलिए इन्होंने कहा कि फियर लव से ज्यादा इंपॉर्टेंट होता है। और इसके लिए लोगों के दिल में भय होना चाहिए। लेकिन लोगों को
साथ में प्रिंस पागल भी करें। यानी कि उन्हें धोखे में भी रखें। उन्हें प्यार देने का उनके लिए काम करने का वह उन्हें
एहसास दिलाएं। भले ही वह धोखे से दिलाए। तो इसमें द प्रिंस में यह मैक्यावली कह रहे हैं। इन्होंने एक कोटेशन भी दी है
जिसमें इन्होंने कहा इट इज़ बेटर टू बी फियर्ड देन लव्ड इफ यू कांट बी बोथ। तो इन्होंने कहा कि अगर एक राजकुमार दोनों
नहीं कर सकता है। यानी कि लोगों का दिल नहीं जीत सकता है और लोगों को डर नहीं दे सकता है तो दोनों में से अच्छा है कि
लोगों में उसके लिए भय हो। भय पैदा करें। यानी कि लोग उस राजकुमार से राजा से डरें। अगली सजेशन इन्होंने दी है कि प्रिंस शुड
बी इकोनॉमिकल। यानी कि जो राजकुमार है वह मिथितय होना चाहिए। ज्यादा खर्च ना करें। फिजूल के खर्च ना करें क्योंकि इससे राज्य
की जो अर्थव्यवस्था है उसको फायदा हो सकता है अगर प्रिंस इकोनॉमिकल होगा यानी कि मिथितव्य होगा। अगला इंपॉर्टेंट है प्रिंस
मस्ट हैव मोरालिटी। यानी कि नैतिकता भी होनी चाहिए। लेकिन इन्होंने कहा कि नैतिकता दो प्रकार की होनी चाहिए। एक
अच्छी अच्छी जो उसके लिए खुद के लिए अच्छी है। बैड का मतलब यह है कि उसे नैतिकता को दिखावा करना चाहिए। जिससे लोग यह समझे कि
राजा उसके हित के लिए काम कर रहा है। राजा लोगों से प्रेम करता है। तो इस तरह से उसने मोरालिटी को दो भागों में बांटा। एक
गुड और दूसरा बैड। प्रिंस शुड बी अपॉर्चुनिस्टिक। यानी कि राजा जो है वह अवसरवादी होना चाहिए। यानी कि मौकों को
देखकर वह अपने वायदे तोड़ सकता है, तोड़ने वाला होना चाहिए। इसके बारे में भी इन्होंने द प्रिंस में कहा। अगली इन्होंने
सलाह दी कि स्किल ऑफ आर्ट ऑफ वॉर। इन्होंने कहा कि स्किल होनी चाहिए। आर्ट ऑफ वॉर होनी चाहिए। यानी कि उसे हमेशा
युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए। वो कुशल योद्धा होना चाहिए। द आर्ट ऑफ वॉर जो कि 1521 में पब्लिश हुई। इसमें इन्होंने कहा
भी कि प्रिंस के पास स्किल होनी चाहिए और आर्ट होनी चाहिए युद्ध की। अगर शांति का समय है तब भी हमेशा राजा को युद्ध के लिए
प्रेफर रहना चाहिए। उसे तैयारी करनी चाहिए। लेकिन यहां पे नोट करने वाली बात यह है कि मैक्यावली ने द प्रिंस में और द
आर्ट ऑफ़ वॉर जो कि 1521 में पब्लिश हुई उसमें इन्होंने कहा कि सिटीजन आर्मी राजा के पास होनी चाहिए। यानी कि जो भाड़े के
टट्टू है जिसको भाड़े के सोल्जर कहते हैं जो किराए के जो सोल्जर होते हैं उनको कभी भी नहीं रखना चाहिए क्योंकि वह कभी भी
धोखा दे सकते हैं। तो इन्होंने कहा कि सिटीजन आर्मी होनी चाहिए क्योंकि लोगों को अपने देश से अपने नेशन से प्यार होता है।
वे ज्यादा वफादारी कर सकते हैं। इसीलिए राजा को सिटीजन आर्मी रखनी चाहिए ना कि उन्हें किराए के सैनिक रखने चाहिए।
तो डनिंग ने इनके बारे में कहा भी है कि उसकी विचारधारा शासन की कला का अध्ययन है ना कि राज्य का सिद्धांत है। प्रिंस
शासितों के लिए लिखी नहीं गई है बल्कि शासकों के लिए लिखी गई है। तो गैटल इसमें कह रहे हैं कि उनकी जो द प्रिंस है वो यह
बताती है कि शासन एक कला है। स्टेट क्राफ्ट है। यह शासितों के लिए नहीं लिखी गई है। बल्कि यह लिखी गई है शासकों के लिए
कि शासक जो है यानी कि प्रिंस राजकुमार उसको क्या करना चाहिए? वह क्या कर सकता है? जिससे राज्य स्थिर रहे, स्टेबल रहें,
राज्य प्रगति करें, पावर को अधिक से अधिक गेन करें। तो द प्रिंस में मैकवली लिखते हैं कि पीपल
फियर फ्रॉम प्रिंस नॉट हेट्रिड। तो यह कहते हैं कि लोग प्रिंस से राजकुमार से डरें, भय करें लेकिन घृणा ना करें। अगली
सजेशन वह देते हैं कि पॉपुलरिटी अमंग पीपल। राजा लोगों के मध्य बहुत फेमस होना चाहिए, प्रसिद्ध होना चाहिए। भले ही इसके
लिए उसे साम दाम दंड भेद अपनाना पड़े। लोगों को उसे जो है झूठ बोलना पड़े, छल करना पड़े लेकिन वो किसी भी हाल में लोगों
के मध्य पॉपुलर होना चाहिए, प्रसिद्ध होना चाहिए। इसके साथ-साथ वे कहते हैं कि प्रिंस मस्ट बी एक्सपेंशनिस्ट। यानी कि
राजा जो है वह महत्वाकांक्षी होना चाहिए, विस्तारवादी होना चाहिए। उसके दिमाग में हमेशा से यह होना चाहिए कि वह अधिक से
अधिक अपने राज्य का विस्तार कर सकें। और वे कहते हैं कि पॉलिसी ऑफ एंड लायन। और ये बेहद इंपॉर्टेंट पॉलिसी है इनकी
जिसमें यह कहते हैं कि राजा में हमेशा दो गुण होने चाहिए। एक है फॉक्स एंड दूसरा है लायन का। यानी कि राजा फॉक्स की तरह चालाक
होना चाहिए, छलिया होना चाहिए और लायन की तरह पावरफुल होना चाहिए। मैक्यावली ने एक कोटेशन दी भी है। आप स्क्रीन पर देख भी
रहे होंगे। ये कहते हैं राज्य की स्थापना के लिए बल की जरूरत होती है। बल का मतलब है लायन और परंतु राज्य को कायम रखने के
लिए छल की जरूरत होती है और छल का मतलब है फॉक्स यानी कि फॉक्स की तरह चालाक होना चाहिए और लायन की तरह बलवान होना चाहिए।
पावरफुल होना चाहिए। तो इसमें यह कहते हैं कि ही शुड बी कोजियस एंड स्ट्रांग लाइक अ लायन। अर्थात शेर की तरह ही वह कोजियस
होना चाहिए और स्ट्रांग होना चाहिए। दूसरी तरफ यह कहते हैं कि ही शुड आल्सो बी कनिंग लाइक अ फॉक्स। और वो चालाक होना चाहिए,
छलियां होना चाहिए लोमड़ी की तरह। तो इस तरह से ये एक बेहद इंपॉर्टेंट पॉइंट है। इन्होंने कहा कि राजकुमार के पास दोनों ही
गुण होने चाहिए। अर्थात फोकस का भी और लयन का भी। यानी कि छलिया भी और बलिया भी। अगली इंपॉर्टेंट पॉइंट जो इन्होंने बताया
है या फिर टिप्स दी है राजकुमार को वो यह है कि इन्होंने कहा कि राजा के पास हमेशा पॉलिसी ऑफ़ इक्वलिटी, मनी, पनिशमेंट एंड
डिस्क्रिमिनेशन होनी चाहिए। जिसको हम यह भी कह सकते हैं कि इन्होंने कौटिल्य की तरह ही कहा कि राजा को चार थिंग्स अपनानी
चाहिए। अपने फायदे के लिए, राज्य की सुदृढ़ता के लिए, राज्य के स्थिरता के लिए, राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिए एक
राजा को, प्रिंस को चारों चीजों को अपनाना चाहिए अगर जरूरत हो। और चार चीजें क्या है वो? साम, दाम और दंड भेदा। और इसकी बात
कौटिल्य ने भी पहले ही की है। और इन्होंने कहा कि स्टेट इज जस्ट एन एंड। इन्होंने कहा कि राज्य अपने आप में एंड है यानी कि
उद्देश्य हैं, लक्ष्य हैं। और इसके लिए इन्होंने कहा कि एन एंड जस्टिफाइज़ मीन। और इन्होंने कहा कि जो उद्देश्य है यानी कि
एंड है वही मेन जो हमारा मीन है यानी कि हमारा जो साधन है उसको औचित्यपूर्ण बताता है। ओनली एन एंड मस्ट बी राइट। और
इन्होंने कहा कि एंड यानी कि हमारा उद्देश्य सही होना चाहिए। अगर हमारा उद्देश्य सही है तो हमारा जो मीन है वो
खुद सही होता हो जाता है। माइट इज राइट। और इन्होंने इसमें यह भी कहा कि जिसकी लाठी उसकी भैंस हमें अपनानी चाहिए। अर्थात
बल हो, हिंसा हो, क्रूरता हो, साम, दाम, दंड भेद जो भी कुछ हो उन सभी पॉलिसीज को हमें अपनाना चाहिए। अपने फायदे के लिए,
अपने राज्य के फायदे के लिए, शक्ति को अधिक से अधिक गेन प्राप्त करने के लिए। रूसो का जन्म 28 जून 1712 ईस्वी को हुआ था
और इनकी मृत्यु 2 जुलाई 1778 को हुई थी। और यह फ्रेंच फिलॉसोफर रहे हैं। हालांकि इनका जो जन्म है वह स्विट्जरलैंड के
जेनेवा में हुआ था। इसी वजह से इनको जेनेवन फिलॉसोफर भी कहा जाता है। वहीं इनको थिंकर ऑफ पैराडॉक्स कहा जाता है और
ये फ्रेंच रेवोल्यूशन के अग्रदूत भी रहे हैं क्योंकि फ्रेंच रेवोल्यूशन इनकी प्रेरणा से ही शुरू हुई थी और सफल हुई थी।
वहीं इन्होंने रिप्रेजेंटेटिव डेमोक्रेसी की बड़ी मात्रा में आलोचना की। वहीं डायरेक्ट डेमोक्रेसी का इन्होंने सपोर्ट
किया। यह लिबरल्स, सोशलिस्ट, डेमोक्रेट्स और टोटलिटेरियंस जितने भी थिंकर रहे हैं उनके लिए भी यह प्रेरणा का स्त्रोत रहे
हैं। और इन्होंने एक फेमस नोशन दिया जिसको कहा जाता है नोवेल सेबेज। यह बेसिकली ऐसा नोशन है जो इन्होंने प्राकृतिक अवस्था में
या फिर आदिकालीन जो मानव है उसके लिए इन्होंने प्राकृतिक अवस्था में प्रयुक्त किया था। वहीं इन्होंने एक इंपॉर्टेंट
स्लोगन दिया जिसका नाम है बैक टू द नेचर। और इस स्लोगन से महात्मा गांधी बड़ी मात्रा में प्रभावित हुए थे। और इनको
यूटोपियन आइडियलिस्ट थिंकर भी कहा जाता है। और दूसरी इंपॉर्टेंट बात यह है कि जे एल टॉलमैन एक बहुत बड़े विचारक हुए
जिन्होंने रूसो के बारे में लिखा कि वे इंटेलेक्चुअल पाइनियर ऑफ द 20थ सेंचुरीज टोटलनिज्म रहे हैं। इसका मतलब यह है कि जो
20वीं शताब्दी का जो सर्वसत्तावाद रहा है, उसके बौद्धिक अग्रदूत रूसो रहे हैं। और उनकी जनरल जो बिल है इसको जाना जाता है
पैराडॉक्स ऑफ फ्रीडम। वहीं रूसो ने एक इंपॉर्टेंट कोट दी मैन कैन बी फोर्स्ड टू बी फ्रीडम। अर्थात व्यक्ति को स्वतंत्र
रहने के लिए बाध्य किया जा सकता है। और रूसो ऐसे पहले विचारक रहे हैं जिन्होंने बड़ी मात्रा में मॉडर्निटी सिविलाइजेशन,
साइंस, आर्ट, प्राइवेट प्रॉपर्टी एंड एनलाइटनमेंट को पूरी तरह से नकारा। उसकी आलोचना की।
रूसो के वक्स को हम तीन भागों में बांटते हैं। पहला है इनके एस्स, दूसरा है इनके फंडामेंटल वक्स और तीसरा है इनके अपनी खुद
की ऑटोबायोग्राफीज़। तो सबसे पहले हम बात कर लेते हैं एस्स की। पहला एस्स इनका डिस्कोर्स ऑन साइंसेस एंड
आर्ट्स जो कि 1750 ईस्वी में इन्होंने लिखा। दूसरा एस्स द स्टेट ऑफ़ बोर। यह भी इन्होंने 1750 में लिखा। और तीसरा
इंपॉर्टेंट एस्स रहा है डिस्कोर्सेज ऑफ द ओरिजिन ऑफ इनकलिटी 1755 ईस्वी में। और इनके कुछ इंपॉर्टेंट वक्स हैं द इमाइल जो
कि 1762 में इन्होंने लिखी और शिक्षा पर लिखी गई सबसे इंपॉर्टेंट कृति इसको माना जाता है। दूसरी है सोशल कॉन्ट्रैक्ट जो कि
1762 में ही इन्होंने लिखी और इसको सबसे इंपॉर्टेंट पॉलिटिकल फिलॉसोफी पर लिखी गई किताब मानी जाती है जिसमें इन्होंने सोशल
कॉन्ट्रैक्ट स्टेट गवर्नमेंट पॉपुलर सोवनिटी जैसे कांसेप्ट्स दिए। वहीं तीसरी एक इंपॉर्टेंट राइटिंग रही है इनकी न्यू
हेलोसिस और यह भी बहुत ही इंपॉर्टेंट मानी जाती है और यह है तीन इनकी ऑटोबायोग्राफीज़ कनंफेशन डायलॉग एंड रिब्रीज
रूसो की फिलॉसोफी बहुत ही व्यापक रही है। मैंने पहले भी कहा कि रूसो से उदारवादी, लोकतंत्रवादी, सर्वसत्तावादी और समाजवादी
सभी तरह के विचारक प्रभावित रहे। और रूसो ने एक फेमस कोट दी जो कि उनकी पूरी फिलॉसोफी का आधार है। और इन्होंने कहा कि
मैन इज बोर्न फ्री बट ही इज एवरीवेयर इन चेंज्स। इन्होंने कहा कि मनुष्य जब पैदा होता है वह बिल्कुल स्वतंत्र होता है
क्योंकि उसे किसी भी कानून की समझ नहीं होती है। पारिवारिक दायित्व राज्य के कानूनों में वो किसी तरह से बंधा नहीं
होता है। परंतु जैसे-जैसे व्यक्ति समाज में रहता है, राज्य के कानून समझता है, वैसे-वैसे वो बंधनों में जकड़ा जाता है।
ये बात रूसो कहते हैं। तो, रूसो की फिलॉसोफी को अब हम समझ लेते हैं। और उनकी फिलॉसोफी को समझने के लिए हम उनके दो
इंपॉर्टेंट वर्क्स लेंगे। पहला डिस्कोर्स ऑन द ओरिजिन ऑफ इनकलिटी और दूसरा है द सोशल कॉन्ट्रैक्ट। तो डिस्कोर्स ऑन द
ओरिजिन ऑफ इनकलिटी में रूसो कहते हैं स्टेट ऑफ नेचर के बारे में और इवोल्यूशन ऑफ सोसाइटी के बारे में। वहीं द सोशल
कॉन्ट्रैक्ट में यह कहते हैं जनरल बिल के बारे में और पॉपुलर सोवनिटी के बारे में। तो रूसो की जब हम फिलॉसफी को समझते हैं तो
हम अलग-अलग फॉर्म में इनको समझते हैं। जैसे पहले नेचर ऑफ स्टेट फिर स्टेट ऑफ वॉर फिर सोशल कॉन्ट्रैक्ट। तो नेचर ऑफ स्टेट
की पहले बात कर लेते हैं। रूसो कहते हैं कि नेचर ऑफ स्टेट में जो व्यक्ति थे या आदिकालीन समाज में जो व्यक्ति रहते थे वे
शांत प्रिय थे। पीस थी। फीलिंग ऑफ कोऑपरेशन थी। सहयोग की भावना थी। स्टेट ऑफ ब्लिस थी। आनंदपूर्ण भावना से रहते थे।
म्यूट थे। शांत रहते थे और पृथक रहते थे। झुंडों में नहीं रहते थे। समाज में नहीं रहते थे। नो वरी अबाउट फ्यूचर। और उन्हें
भविष्य की कोई चिंता भी नहीं होती थी। रूसो आगे कहते हैं कि स्टेट ऑफ नेचर में एक ऐसी चीज थी व्यक्ति के पास जो उसे
एनिमल से या फिर पशुओं से अलग करती थी और वो थी फ्रीडम एंड कंपेशन कंपैशन। यानी कि पीटी की भावना दया या फिर सहानुभूति की
भावना और फ्रीडम की भावना स्वतंत्रता की भावना। और इंडिविजुअल जो स्टेट ऑफ नेचर में रहता था रूसो ने उसको कहा है नोवेल
सेबेज। नोवेल सेबेज मींस शांत है वो कोपरेशन करता है। वो किसी का बुरा नहीं चाहता है। इसलिए वो नोवेल है और सेबेज है
क्योंकि वो जंगलों में रहता है। इसीलिए इन्होंने इसको नोबेल सेबेज कहा यानी कि सभ्य जंगली कहा और स्टेट ऑफ़ बोर की जब हम
बात करते हैं तो रूसो कहते हैं कि इसमें कंडीशन ऐसी हो गई थी कि प्राइवेट प्रॉपर्टी अस्तित्व में आई। उसकी वजह से
फिर क्या हुआ कि सोसाइटी की शुरुआत हुई और जैसे ही सोसाइटी की शुरुआत हुई फिर ओरिजिन ऑफ इनकलिटी हुई और जैसे ही इनकलिटी आई
उसके बाद फिर पूरी जो बुरी चीजें हैं वो शुरू होने लगी। जैसे डिपेंडेंसी यानी कि लोगों की अब डिपेंडेंसी बढ़ती गई।
आत्मनिर्भरता पूरी तरह से खत्म हो गई। इमोर प्रोपरे यानी कि यह बेसिकली फ्रेंच वर्ड है जिसमें यह कहते हैं कि दूसरों से
लोगों की यह एक्सपेक्टेशंस बढ़ गई कि लोग उनकी रिस्पेक्ट करेंगे। उनका समाज में स्टेटस बढ़ेगा और इमोर दे सोई का मतलब है
कि लोग उनसे प्यार करेंगे। उनकी ऐसी इस तरह की एक्सपेक्टेशंस बढ़ती गई और ग्रीड एंड फेम और उनके अंदर लालच की भावनाएं भी
पैदा हो गई और फेम की भावनाएं भी पैदा हो गई। तीसरा जो स्टेज आता है वो है सोशल कॉन्ट्रैक्ट। जैसे ही सोशल कॉन्ट्रैक्ट
हुआ तो स्टेट ऑफ वॉर खत्म हुआ। सोशल कॉन्ट्रैक्ट अस्तित्व में आया। जिसकी वजह से हुआ क्या कि स्टेट अस्तित्व में आया।
जनरल विल अस्तित्व में आई। पॉपुलर सोवनिटी अस्तित्व में आई और गवर्नमेंट भी अस्तित्व में आई।
अब रूसो की जो ह्यूमन बिल रही है उसको हम थोड़ा सा और समझ लेते हैं। रूसो कहते हैं कि ह्यूमन बिल को हम दो भागों में बांट
सकते हैं। पहला है इंडिविजुअल दूसरा है कम्युनिटी। रूसो कहते हैं कि इंडिविजुअल पर्टिकुलर बिल को रिप्रेजेंट करता है।
वहीं कम्युनिटी जनरल बिल को रिप्रेजेंट करता है। रूसो कहते हैं कि पर्टिकुलर बिल को आगे चलकर हम दो भागों में इसको बांट
सकते हैं। एक है एक्चुअल बिल जिसको हम हिंदी में कहते हैं यथार्थ इच्छा और दूसरी है रियल बिल जिसको हम कहते हैं आदर्श
इच्छा। तो एक्चुअल बिल में बहुत सारी विशेषताएं आती है। जैसे सेल्फ इंटरेस्ट, लोअर सेल्फ, नो रीजन, शॉर्ट प्लेजर, लोअर
सेटिस्फेक्शन और ट्रांसाइन। तो ये इसकी विशेषताएं हैं। वहीं रियल बिल की कुछ विशेषताएं हैं। जैसे इंस्पाइरेशन फ्रॉम
कॉमन गुड, हायर सेल्फ, अल्टीमेट, रियल एंड सेल्फलेसनेस, सोशल वेलफेयर एंड एक्सप्रेशन ऑफ रियल
फ्रीडम। और सबसे इंपॉर्टेंट बात जो आपको ध्यान में रखनी है वो ये है कि जनरल बिल इज द सम टोटल ऑफ रियल बिल। ध्यान से सुनिए
इस बात को क्योंकि ये एग्जाम में कई बार पूछा गया है और लोग बड़े कंफ्यूज होते हैं इसमें। जनरल जो बिल है अर्थात जो सामान्य
इच्छा है वो सभी आदर्श इच्छाओं का योग है। जनरल बिल इज द सम टोटल ऑफ रियल बिल। यानी कि जनरल बिल
केवल रियल बिल का ही योग है। एक्चुअल बिल इसमें शामिल नहीं होती है। एक्चुअल बिल ऑलरेडी बाहर है क्योंकि रियल बिल ही
कम्युनिटी को या फिर कॉमन गुड को रिप्रेजेंट करती है। इसीलिए रियल बिल ही जनरल बिल का पार्ट है या फिर योग है। या
हम यह भी कह सकते हैं कि जनरल बिल इज द सम टोटल ऑफ रियल बिल। अब हम बात कर लेते हैं रूसो के द्वारा दिए गए इंपॉर्टेंट नोशंस
की। पहला नोशन है पॉपुलर सोवनिटी। पॉपुलर प्लस सोवनिटी। इसका मतलब यह है कि रूसो कहते हैं कि जो संप्रभुता होगी वह लोगों
में होगी। क्यों? क्योंकि सारी जो शक्तियां है वो जनरल बिल के पास है। और जनरल बिल रिप्रेजेंट करती है लोगों को,
लोगों की इच्छा को और पूरी कम्युनिटी को। इसीलिए इनकी जो सोवनिटी है उसको पॉपुलर सोवनिटी कहा जाता है। दूसरा कांसेप्ट है
पॉपुलर डेमोक्रेसी। पॉपुलर प्लस डेमोक्रेसी यानी कि ऐसा लोकतंत्र जिसमें लोगों का शासन होगा। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए
है क्योंकि पहले तो रूसो ने डायरेक्ट डेमोक्रेसी को सपोर्ट किया है और दूसरा इसीलिए है कि रूसो कहते हैं कि सभी को
राइट्स होंगे। सभी के पास शक्तियां होगी क्योंकि जो लोगों की इच्छा है सामान्य इच्छा है वो कम्युनिटी को रिप्रेजेंट करती
है। और इसी वजह से इन्होंने अगला एक इंपॉर्टेंट कांसेप्ट दिया जिसका नाम है माइनॉरिटी ओपिनियन। इसमें यह कहते हैं कि
लोगों के पास माइनॉरिटी ओपिनियन का अधिकार होना चाहिए। अर्थात जो माइनॉरिटी है उनको भी अधिकार होना चाहिए। उन्हें भी बहुत
सारे राइट्स होने चाहिए। जैसे पॉलिटिकल इकोनॉमिक सोशल एंड एक्सप्रेशन ऑफ राइट्स यानी कि अभिव्यक्ति और विचार प्रकट करने
का भी उन्हें अधिकार होना चाहिए माइनॉरिटी पीपल को। अगला इंपॉर्टेंट नोशन है रूसोस पैराडॉक्स।
