5 सिंपल स्टेप्स में स्टॉक स्क्रीनिंग की पूरी प्रक्रिया
इस वीडियो में प्रांजल कामरा ने स्टॉक स्क्रीनिंग का एक पावरफुल और सिंपल फॉर्मूला बताया है जो 95% बैड स्टॉक्स को तुरंत एलिमिनेट कर देता है। यह प्रोसेस फिनोलॉजी टिकर नाम के फ्री स्टॉक स्क्रीनर पर काम करता है, लेकिन आप इसे किसी भी स्क्रीनर पर अप्लाई कर सकते हैं। अगर आप इस विधि को और विस्तार से समझना चाहते हैं, तो हमारी 5 सरल कदमों में स्टॉक स्क्रीनिंग: 95% खराब शेयरों को 1 मिनट में हटाएं गाइड देखें।
पहला फिल्टर: मार्केट कैप > 1000 करोड़ रुपए
- यह फिल्टर लगाने से 5000 में से लगभग 3500 कंपनियां (लगभग 70%) एलिमिनेट हो जाती हैं।
- क्यों जरूरी है?
- माइक्रो-कैप कंपनियों में सबसे ज्यादा नुकसान होता है।
- लगभग 46% माइक्रो-कैप कंपनियां अपने प्रॉफिट को ग्रो नहीं कर पातीं।
- ये बहुत वोलेटाइल होती हैं, इनमें सर्किट लगने, पंप एंड डंप और इनसाइडर ट्रेडिंग का खतरा ज्यादा होता है।
- लिक्विडिटी कम होने से एग्जिट मुश्किल हो सकती है।
- एक्सेप्शन vs नॉर्म: जबकि कुछ माइक्रो-कैप बड़े मल्टीबैगर्स बने हैं, ये एक्सेप्शन हैं, नॉर्म नहीं। बड़ी कंपनियों (जैसे BSE, CDSL, TVS, MRF) ने भी 10-20 गुना रिटर्न दिए हैं, साथ ही उनमें रिस्क कम है।
दूसरा फिल्टर: सेल्स ग्रोथ (5 साल का CAGR) > 10%
- कंपनी की एवरेज सेल्स ग्रोथ पिछले 5 साल में 10% या उससे ज्यादा होनी चाहिए।
- 10% ही क्यों?
- भारत की नॉमिनल GDP ग्रोथ (महंगाई समायोजित न करने पर) लगभग 10% है।
- कंपनियां अपनी सेल्स ग्रोथ में महंगाई को एडजस्ट नहीं करतीं, इसलिए तुलना नॉमिनल GDP से करना सही है।
- हमें ऐसी कंपनी चाहिए जो कम से कम देश की गति से तो बढ़े।
- एक-दो साल का उतार-चढ़ाव मान्य है, लेकिन 5 साल का एवरेज 10% से नीचे नहीं होना चाहिए।
तीसरा फिल्टर: रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) > 20% (5 साल एवरेज)
- ROE बताता है कि कंपनी शेयरहोल्डर्स के पैसे पर कितना रिटर्न कमा रही है।
- 20% ही क्यों (15% क्यों नहीं)?
- आमतौर पर निवेशक 15% से ज्यादा का रिटर्न चाहते हैं।
- अगर आप 25-30 स्टॉक्स का बास्केट बनाते हैं, तो उनमें से कुछ कंपनियां भविष्य में अच्छा प्रदर्शन नहीं करेंगी (डीरेल हो जाएंगी)।
- इसलिए 20% ROE का फिल्टर लगाने से 'मार्जिन ऑफ सेफ्टी' बनता है, ताकि पोर्टफोलियो लेवल पर रिटर्न 15% से ऊपर ही रहे।
चौथा फिल्टर: कैश फ्लो (CFO) / पैट (PAT) ≈ 1 या उससे ज्यादा
- यह बहुत जरूरी टेक्निकल फिल्टर है जो कंपनियों के 'बट्टे-खाते' के खेल को पकड़ता है।
- क्या देखता है? कि जितना प्रॉफिट (PAT) दिखाया गया है, उतना कैश बैंक में आया है या नहीं।
- क्यों जरूरी है?
- कई कंपनियां अपने डिस्ट्रीब्यूटर्स को टेगोला माल देकर सेल्स बढ़ा लेती हैं (जिसके लिए बिल बना दिए जाते हैं, लेकिन अगले महीने माल वापस आ जाता है)। इससे PAT बढ़ता दिखता है लेकिन असली कैश नहीं आता।
- ऐसी कंपनियां भविष्य में प्रॉविजन या रिफंड दिखाकर इस खेल को बंद कर देती हैं, जब तक निवेशक फंस चुके होते हैं।
- 5 साल के एवरेज पर यह रेशियो देखें (एक-दो साल का छोटा अंतर मान्य है)।
पांचवां फिल्टर: डेट टू इक्विटी रेशियो < 0.5
- कंपनी पर लोन बहुत कम या बिल्कुल नहीं होना चाहिए (ज़ीरो तो सबसे अच्छा)।
- क्यों इतनी सख्ती?
- एक निवेशक के तौर पर आप कंपनी के अंदर काम नहीं करते, इसलिए आपको सारी जानकारी नहीं होती (इंफॉर्मेशन एसिमिट्री)। इसलिए, किसी कंपनी के अंदरूनी (इनसाइडर) के लिए 2:1 का डेट इक्विटी रेशियो सही हो सकता है, लेकिन निवेशक के लिए यह बहुत रिस्की है।
- कंपनी बैंकरप्ट तब होती है जब वह कर्ज़ चुका नहीं पाती।
- उदाहरण: रिलायंस कम्युनिकेशन (₹800 से ₹2), विजय माल्या के ग्रुप, वीडियोकॉन - ये सभी हाई डेट की वजह से डूबे।
- अपवाद: 'बैंकिंग और वित्तीय कंपनियों' पर यह फिल्टर लागू नहीं होता, क्योंकि उनका धंधा ही कर्ज़ देना और लेना है।
सही कीमत पर खरीदें (Fair Valuation)
सिर्फ अच्छी कंपनी चुनना काफी नहीं, उसे सही कीमत पर खरीदना भी जरूरी है।
- DCF (डिस्काउंटेड कैश फ्लो) फेयर वैल्यू निकालने का एक अच्छा तरीका है।
- अगर आपको एक्सेल में DCF करना मुश्किल लगता है, तो फिनोलॉजी टिकर (₹600/माह प्रीमियम वर्जन) में बिल्ट-इन DCF कैलकुलेटर है। बस 3-4 इनपुट डालकर 10 सेकंड में स्टॉक की फेयर वैल्यू मिल जाती है।
अंतिम सुझाव: पोर्टफोलियो डायवर्सिफिकेशन
- 20-25 या अधिकतम 30 स्टॉक्स रखें (जब तक आप 20 साल के एक्सपर्ट नहीं हो)।
- यहां तक कि अच्छी स्क्रीनिंग के बाद भी कुछ कंपनियां फेल हो सकती हैं। डायवर्सिफिकेशन इसी जोखिम को कम करता है।
सहायक विकल्प: फिनोलॉजी 30
- अगर आप खुद एनालिसिस नहीं करना चाहते, तो फिनोलॉजी 30 एक क्यूरेटेड प्रोडक्ट है।
- इसमें हर 12 दिन में एक स्टॉक की सिफारिश दी जाती है, ताकि एक साल में 30 स्टॉक्स का एक बेहतरीन बास्केट बन जाए।
- यह तब खरीदने का सुझाव देता है जब स्टॉक सही वैल्यूएशन पर हो, न कि वह पहले से 30 स्टॉक्स की स्थिर लिस्ट देता हो।
[संगीत] 5000 स्टॉक्स हैं और आपके पोर्टफोलियो में होने चाहिए 20, 25 या 30। तो यह 5000 में
से 30 तक पहुंचने में ना स्टॉक स्क्रीनर्स बहुत काम आते हैं। इस वीडियो में मैं आपको बताऊंगा कि कैसे पांच सिंपल स्टेप्स में
मैं स्टॉक्स को स्क्रीन करता हूं और 95% बैड स्टॉक्स को एलिमिनेट कर देता हूं इन 1 मिनट। हेलो इन्वेस्टर्स, दिस इज प्रांजलल
कामरा। आज सीखते हैं हाउ टू स्क्रीन स्टॉक्स वि फिनोलॉजी द फाइनशियल फ्रीडम कंपनी। अब देखो जो पहला क्राइटेरिया मैं
यूज कर रहा हूं वो है मार्केट कैप 1000 करोड़ से ज्यादा का। यह मैं कहां यूज कर रहा हूं? यह मैं फिनोलॉजी टिकर पे यूज़ कर
रहा हूं। मुझे लगता है यह इजीिएस्ट टू यूज़ स्टॉक स्क्रीनर है लेकिन मैंने मेरी टीम ने बनाया है। तो आई माइट बी बायस्ड। तो आप
खुद ट्राई करके देख लेना। मैंने पिन कमेंट में सारे मेरे स्टेप्स हैं। आप कोई भी स्टॉक स्क्रीनर यूज़ करो। इसे डायरेक्ट
कॉपी पेस्ट मत करना। पहले पांचों पॉइंट्स का लॉजिक समझ लेना ताकि आप अपने हिसाब से ना थोड़ा बहुत फार्मूला ट्वीक भी कर सको।
मैंने ये जो फार्मूला डाला है एग्जैक्टली आप इसे डालोगे तो ये सिर्फ फिनोलॉजी टकर पे काम करेगा। अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स में
थोड़ा बहुत उनके स्क्रीनर यूज़ करने का तरीका अलग होता है। सो दिस वर्क्स ऑन फिनोलॉजी टकर। तो जब आप फिनोलॉजी टकर पे
जाओगे ऊपर यहां आपको स्क्रीन स्टक्स का ऑप्शन दिखेगा। उसको क्लिक करते ही कुछ ऐसा स्क्रीन खुलेगा। वंस यू आर लॉक्ड इन यू
कैन यूज़ इट। बिल्कुल फ्री है। यहां पे सबसे पहला क्राइटेरिया है मार्केट कैप मोर देन 1000 करोड़। इससे बेसिकली ना हम
माइक्रो कैप्स बहुत छोटी कंपनियों को एलिमिनेट कर रहे हैं। इसके दो-तीन कारण हैं। ज्यादातर जो लॉसेस होते हैं ना ये
इन्हीं तरह की कंपनियों में होता है। इनफैक्ट 5000 में से ना आप जैसे ही ये फिल्टर लगाओगे तो 35000 कंपनियां यानी 70%
कंपनीज़ एलिमिनेट हो जाएंगी। तो आपका मेजॉरिटी काम तो इसी फिल्टर से हो अब यह फिल्टर लगाना क्यों जरूरी है? जैसा मैंने
बताया ज्यादातर लॉस यहीं से होता है। कैसे? जो यह माइक्रोcैब कंपनियां है ना इसमें से 46% कंपनियां यानी लगभग आधी
कंपनियां अपने प्रॉफिट्स को ग्रो ही नहीं करती। बिल्कुल स्टैगेंट है या डिक्लाइनिंग है। तो यह कंपनियां है ना बहुत वोलेटाइल
होती है। अब इसमें हमेशा एक आर्गुमेंट यह आ सकता है कि जो बहुत बड़े मल्टीबैगर्स हैं वो भी यहां से निकलते हैं और लोग कुछ
एग्जांपल्स देते हैं। देखो जब आप एक बहुत ज्यादा एक्सपीरियंस्ड इन्वेस्टर नहीं हो तो आप ऐसी कंपनियों में क्यों इन्वेस्ट
करना चाहते हो जो स्टेबल नहीं है जिनका प्रूवन ट्रैक रिकॉर्ड नहीं है जिनमें ऑपरेटर स्कैम्स होने के इर्रेगुलरिटी होने
के चांसेस ज्यादा हैं। आप अपने आपको ज्यादा एक्सपोज क्यों करना चाहते हो? रिस्क की तरफ। इनमें इंसाइडर ट्रेडिंग हो
सकती है। पंप एंड डंप हो सकता है। ऑपरेटर्स को इस तरह की कंपनियां पसंद है। लिक्विडिटी कम होने के कारण सर्किट्स लग
सकते हैं और आपको एग्जिट नहीं मिल सकता है। इस तरह के बड़े रिस्क इन्हीं कंपनियों में होते हैं। एक दो आइसोलेटेड एग्जांपल
कि कैसे एक छोटी कंपनी बहुत बड़ी बन गई। ये ना स्क्यू करता है रिजल्ट्स को। एक्सेप्शन को नॉर्म आप नहीं मान सकते। और
दूसरी चीज़ बड़ी कंपनियों में भी ना बहुत अच्छे रिटर्न्स आते हैं। कितने सारे ऐसे एग्जांपल्स हैं बीएसई हो, सीडीएसएल हो,
TVS हो, एमआरएफ अनदर एग्जांपल मुझे याद आता है जो पिछले 10-15 सालों में मल्टीफोल्ड 10 गुना, 20 गुना 30 गुना
रिटर्न्स लाके दिए हैं। तो बड़े स्टॉक्स में वेल नोन कंपनियों में रिटर्न्स नहीं आते हैं। ऐसा भी नहीं है। इनमें रिस्क भी
कम होता है। तो अगर आपको लोअर रिस्क में हायर रिटर्न्स मिल रहे हैं, तो व्हाई वुड यू टेक एक्सेप्शनल रिस्क? इन छोटी
कंपनियों में 100 में से एक कंपनी अच्छा कर देती है। लेकिन वह एक्सट्रीम लक के साथ होता है। आप अपनी मेहनत की कमाई को वन इन
अ 100 चांस वाली कंपनियों के साथ गैंबल नहीं कर सकते। और यह है सेल्स ग्रोथ उस कंपनी की कम से कम ओवर द लास्ट फाइव इयर्स
ऑन एन एवरेज 10% से ज्यादा की होनी चाहिए। अब 10% ही क्यों? 5 8 12 या 15 क्यों नहीं? बहुत सिंपल रीजन है। देखो भारत में
ना अक्सर हम जीडीपी ग्रोथ नंबर देखते हैं जो 6.5% के आसपास होता है। यह जो है ना ये इनफ्लेशन एडजस्टेड नंबर है। अगर मैं
इनफ्लेशन को एडजस्ट ना करूं तो उसे हम नॉमिनल जीडीपी कहते हैं और उसकी ग्रोथ 10% के आसपास है। अब मैं इनफ्लेशन से एडजस्ट
क्यों नहीं कर रहा हूं? क्योंकि कंपनियां जो सेल्स ग्रोथ आपको रिपोर्ट करती है ईयर ऑन ईयर वो भी इनफ्लेशन से एडजस्ट नहीं
होती ना। वो तो उस कंपनी की लास्ट ईयर की ग्रोथ से कंपेयर होती है। यानी पिछले साल अगर किसी कंपनी ने 100 करोड़ का रेवेन्यू
किया और इस साल 110 करोड़ का रेवेन्यू किया तो हम कहते हैं कंपनी ने 10% की सेल्स ग्रोथ की। 6% इनफ्लेशन आ गई तो रियल
ग्रोथ 4 ही% हुई। ऐसा हम नहीं कहते। हम सेल्स ग्रोथ में इनफ्लेशन को एडजस्ट नहीं करते। इसलिए इसका कंपैरिजन भी जीडीपी से
होना चाहिए जो इनफ्लेशन से एडजस्टेड नहीं है। तो अगर मैं इनफ्लेशन से एडजस्ट ना करूं तो देश की जीडीपी लगभग 10% से ग्रो
करती है। तो अगर देश की जीडीपी 10% से ग्रो कर रही है तो मुझे कंपनी ऐसी चाहिए जो कम से कम देश की ग्रोथ से सिंक पे तो
रहे कि देश ज्यादा तेजी से ग्रो कर रहा है। ये कंपनी कम तो ऐसी कंपनियों को लेने का फायदा क्या हुआ? और वो भी इन द लास्ट
फाइव इयर्स सीएजीआर की मैं बात कर रहा हूं ऑन एन एवरेज। तो एक आध साल ऊपर नीचे मुझे एक्सेप्टेड है। लेकिन इन द लॉन्ग रन देश
की स्पीड से तो कोई कंपनी ग्रो करनी चाहिए। इसीलिए मैं चाहता हूं ऐसी कंपनियां लेना जिनकी सेल्स ग्रोथ कम से कम 10% या
उससे ज्यादा हो। थर्ड क्राइटेरिया इज़ कि वो कंपनी 5 साल में ऑन एन एवरेज रिटर्न ऑन इक्विटी 20% से ज्यादा का जनरेट करे। अब
20% रिटर्न ऑन इक्विटी क्यों? वो इसलिए कि अगर कोई कंपनी शेयर होल्डर से पैसा ले रही है तो उसको एम करना चाहिए कि वो उस पर 20%
का रिटर्न तो लाके दे। अगर कंपनी लगातार ऐसा करेगी और अगर आपने उससे फेयर वैल्यू पे लिया है तो कंपनी का रिटर्न यूजुअली
उसके शेयर होल्डर कैपिटल पे जो रिटर्न वो जनरेट कर रही है उससे सिंक में होना चाहिए। एग्जैक्टली नहीं लेकिन
एप्रोक्समेट। तो आपका जॉब है ऐसी कंपनियां लेना जिसका रिटर्न ऑन इक्विटी हाई हो लेकिन यहां से जहां काम खत्म नहीं होगा।
उसे फेयर वैल्यू पे भी लेना है। अब 20% ही क्यों? क्योंकि मैं जब स्टॉक्स में इन्वेस्ट कर रहा हूं तो मुझे मैं एटलीस्ट
एक्सपेक्ट कर रहा हूं कि मुझे 15% से ज्यादा का रिटर्न मिले। तो अगर मैं ऐसी कंपनियों का बास्केट बनाऊंगा जिनका रिटर्न
ऑन इक्विटी 20% का है और फिर उसमें से कुछ कंपनियां क्या होंगी? डीरेल होंगी। अच्छा नहीं करेंगी। तो मुझे 20% का मार्जिन ऑफ
सेफ्टी भी चाहिए। इसीलिए मैं 15% आरओई टारगेट ना करके 20% कर रहा हूं ताकि कई कंपनियां फ्यूचर में अच्छा ना भी करें। तो
जब मैं डायवर्सिफाई करूंगा 25-30 कंपनियां रखूंगा और कुछ कंपनियां अच्छा नहीं करेंगी तो भी पोर्टफोलियो लेवल पर मेरा रिटर्न
विल बी मोर देन 15% तो मार्जिन ऑफ सेफ्टी रखने के लिए मैं आरओई को 15 ना करके 20 का रख रहा हूं। अगला पॉइंट ना थोड़ा टेक्निकल
है। इसे मैं डिटेल में समझाऊंगा लेकिन बहुत जरूरी है। सीएफओ अपॉन पैट यानी कैश फ्लो फ्रॉम ऑपरेशंस बाय प्रॉफिट आफ्टर
टैक्स वन उसके आसपास या उससे ज्यादा होना चाहिए। ये इसलिए कि कई बार कंपनियां क्या करती हैं? बहुत एग्रेसिवली सेल्स दिखाती
हैं। जैसे मान लो मार्च आ रहा है, फाइनल क्वार्टर है। इस साल की सेल्स बैलेंस शीट में आएगी। तो मार्च में कई बार कंपनियां
अपने दुकानदारों को, डिस्ट्रीब्यूटर्स को बोल सकती हैं थोड़ा माल रख लो ना और हम आपके माल खरीदने पे बिल फाड़ देते हैं।
अप्रैल में 31 मार्च को इस साल के स्टेटमेंट्स क्लोज। अप्रैल में ना माल वापस कर देना। हम रिफंड कर देंगे। मेरे
मार्च की सेल्स अच्छी दिखा दो। को ईयर ऑन ईयर ग्रोथ दिखा के शेयर होल्डर्स को इंप्रेस करके उनको मुझे अपने शेयर्स
चिपकाने हैं। ऐसा कई कंपनियां कर रही होती हैं। ऐसा ना हो उसके लिए यह जरूरी है कि आप कैश फ्लो फ्रॉम ऑपरेशंस को कंपेयर करो
पैट से ओवर लास्ट फाइव इयर्स क्योंकि अगेन एकआध साल किसी कारण से ऐसा हो सकता है। तो हम ज्यादातर चीजें ना ओवर फाइव ईयर पीरियड
देखते हैं कंपनी को थोड़ा ग्रेस देने के लिए। तो आपको यह देखना है कि कंपनी ने जितना पैट दिखाया है कि प्रॉफिट आया वह
कैश सच में बैंक में आया कि नहीं। यानी जिसको सेल्स दिखाई उसने सच में पेमेंट की कि नहीं। इसीलिए सीएफओ अपॉन पैट या तो एक
हो एक के आसपास हो एक से ज्यादा हो तो और अच्छा है। एडवांस पेमेंट मिल रही है। तो ये रेशियो ना बहुत ज्यादा जरूरी है। बहुत
सारी स्कैमी कंपनियों से आप बच जाओगे अगर आप इस पे ध्यान दोगे। क्या है? कंपनियों को भी पता है कि इन्वेस्टर क्या देखता है।
इन्वेस्टर पैड ग्रोथ देखता है। इसलिए कई बार कंपनियां अग्रेसिवली पैड ग्रोथ दिखाती हैं। सेल्स करके जिनकी पेमेंट कभी आती ही
नहीं। बाद में उसका बैड डे बना के प्रोविजन दिखा के या रिफंड मान के उसको कैंसिल आउट करती हैं। तब तक आप शेयर में
फंस चुके होते हो। तो ऐसा मत करना। अगला है एंड प्लीज एज अ रिटेल इन्वेस्टर फोकस ऑन दिस। लालच में मत आना। डेप्ट इक्विटी
रेशियो ऑफ़ लेस देन 0.5 यानी ऐसी कंपनियां जिन पे डेप्ट कम हो। कई बार ना हम बिजनेस स्कूल्स में पढ़ते हैं कि आइडियल डेप्ट
इक्विटी रेशियो होता है 2:1 वह कंपनी के इंसाइडर के लिए है। जो कंपनी में जॉब कर रहा है जिसको कंपनी के रिटर्न्स
मैक्सिमाइज करने हैं। जब आप कंपनी के लिए काम कर रहे हो क्योंकि आपको कंपनी के बारे में सब कुछ पता है ना इनफेशन असिमिट्री
नहीं है। एज एन इन्वेस्टर मेरे को वैसे ही कई चीजें नहीं पता कंपनियों के बारे में। तो 2:1 डे इक्विटी रेशियो ना रिस्की हो
जाता है। देखो कोई कंपनी बैंककरप्ट कब होगी? बैंकरप्ट तब होगी जब उसने कर्जा लिया है और वो ईएमआई पटा नहीं पा रही। वो
लोन पटा नहीं पा रही। तो मैं यह रिस्क से खुद को एक्सपोज क्यों करूं? मेरे पास ना 5000 कंपनियां हैं चुनने के लिए और मुझे
चाहिए उसमें से 2530। तो मुझे तो बहाना चाहिए कंपनियों को रिजेक्ट करने का। तेरे में ये खराबी है जा नहीं करता इन्वेस्ट।
तेरे में ये खराबी है जा नहीं देता अपना पैसा। तो मुझे बहुत स्ट्रिक्ट रहना है अपने क्राइटेरिया में। मैं रिस्क क्यों
लूं? मैं तो रिस्क मिटिगेट करूंगा। इसीलिए डेप्ट इक्विटी रेशियो जीरो वो तो बहुत ही अच्छा है। लेकिन 0.5 से प्लीज कम रखना। ये
बैंकिंग कंपनियां, लेंडिंग कंपनियों पे अप्लाई नहीं होता है। उनका काम ही है लोन देना। उनका काम ही है डिपॉजिट्स लेना। तो
फाइनेंशियल बिजनेस में जो कंपनियां हैं उन पे इसको अप्लाई मत करना। इस रेशियो को हटा देना। लेकिन जनरली 95% कंपनियों पे ये
अप्लाई होता है। इसका ना मैं सिर्फ हवा में नहीं बोल रहा। डेप्ट का रिस्क बहुत ज्यादा है। आप ट्रैक रिकॉर्ड उठा के देख
लो। मैं आपको कुछ एग्जांपल्स देता हूं। Reliance कम्युनिकेशन याद है? 2008 में ना एक शेयर का प्राइस था लगभग ₹800। आज
प्राइस है ₹2। 2010 से 2016 के बीच इसका कर्जा ₹2,000 करोड़ से बढ़ के हुआ 45,000 करोड़। कंपनी का शेयर नेक्स्ट टू जीरो हो
गया। पेनी स्टॉक बन गया। क्यों? डेप्ट रीपे ना कर पाने के कारण। विजय मालिया वाले अभी पडकास्ट सेशंस बहुत वायरल हो रहे
हैं। बहुत उन्हें वाइट वाश किया जा रहा है। उनके साथ जो भी हुआ क्यों हुआ? बहुत सारा कर्जा लेके उसे रीपे ना कर पाने के
कारण। एज एन इन्वेस्टर आपको विजय माल्या से एंटरटेनमेंट नहीं चाहिए। एज एन इन्वेस्टर आपको यह ध्यान रखना है कि किस
तरह की कंपनियों को अवॉइड करो। आरकॉम में क्या हुआ? डेप्ट सर्विस ना कर पाना। वीडियोक में क्या हुआ? Zee ग्रुप में
प्रॉब्लम क्यों हो रही है? विजय मालिया से हमने क्या सीखा? हाई डेप्ट कंपनियों को एज एन इन्वेस्टर एज अ शेयर होल्डर मुझे अवॉइड
करना है। मेरा एक जॉब है एज एन इन्वेस्टर टू मिटिगेट रिस्क रिटर्न्स अपने आप आएंगे। देखो, अभी तक तो मैंने आपको बताया कि आप
कैसे स्टॉक्स को एलिमिनेट करोगे यह एनश्योर करने के लिए कि 95% खराब स्टॉक्स यू कैन एलिमिनेट। लेकिन अच्छे स्टॉक्स को
किसी भी प्राइस में यू कांट टेक। यू हैव टू बाय अ ग्रेट स्टॉक एट अ फेयर प्राइस। अब फेयर प्राइस लाने के बहुत सारे मेथड्स
हैं। जिसमें से एक बहुत अच्छा मेथड है डिस्काउंटेड कैश फ्लो। इस पे मैंने एक पूरा वीडियो भी बनाया है। इसे थ्योरिटिकली
तो लोग समझ जाते हैं। इस वीडियो से आप समझ जाओगे कांसेप्ट। लेकिन कई बार क्या होता है इसको एक्सेल में ना कर पाना और किसी भी
शेयर की फेयर वैल्यू निकाल पाना क्योंकि है ये एक सुपर पावर आप कई कंपनियों की 50% से ज्यादा कंपनियों का फेयर प्राइस निकाल
पाओगे कि आपको लेना चाहिए या नहीं जिस प्राइस में स्टॉक है लेकिन एक्सl में इसे कर पाना मुश्किल होता है तो फिनोलॉजी टकर
में ना अगर आप अपग्रेड करो और इसकी प्रीमियम मेंबरशिप लो जो ₹600 अ मंथ की है तो आप मोस्ट स्टॉक्स की फेयर वैल्यू निकाल
पाओगे बिना एक्सेल यूज़ किए बिना कॉम्प्लेक्स फार्मूले सीखे टिकर ही आपको बता देगा कि आपको क्या इनपुट फील्ड्स में
डालना चाहिए? कौन सी फिगर एक सजेस्टेड रेंज दे देगा। डालना चाहिए। आपको तीनचार इनपुट्स करने हैं। एंड तुरंत इन 10
सेकंड्स आपको स्टॉक की एक सजेस्टेड फेयर वैल्यू मिल जाएगी। इट हेल्प्स यू कि आप कोई स्टॉक को महंगे में ना खरीद लो लालच
करके। जब भी आप महंगे में खरीदोगे योर रिटर्न्स विल बी सबड्यूड। तो फिनोलॉजी वन सब्सक्रिप्शन जब आप लेते हो तो टिककर
अपग्रेड हो जाता है विद डीसीएफ कैलकुलेटर्स और ऐसे बहुत सारे फीचर्स के साथ। एक बात का ध्यान और रखना। आप चाहे
कितनी भी अच्छी स्टॉक स्क्रीनिंग करो, कितने भी अच्छे से आप डीसीएफ कैलकुलेटर यूज़ करो, बहुत कंसंट्रेटेड पोर्टफोलियो मत
रख लेना। पांच स्टॉक्स, 10 स्टॉक्स एक्सेप्ट करना कि आपको 20 साल का अनुभव नहीं है स्टॉक एनालिसिस का। आप प्रो
एक्सपर्ट लेवल इन्वेस्टर नहीं हो तो आपसे गलतियां हो सकती हैं। जिसको कंपनसेेट करने के लिए है ना पोर्टफोलियो को डवर्सिफाइड
रखना। कम से कम 20, 25 या मैक्सिमम 30 स्टॉक रखना। अब अगर आप यह सब कुछ नहीं करना चाहते हो, सेल्फ एनालिसिस नहीं करना
चाहते हो और आप चाहते हो कि आपको कोई असिस्ट कर दे टीम ऑफ एक्सपर्ट्स इन स्टॉक सिलेक्शन तो फिनोलॉजी 30 इज परफेक्ट फॉर
यू। यहां हम हर 12 दिन में आपके लिए एक स्टॉक पिक करेंगे और साल भर में हर 12 दिन एक नया स्टॉक देंगे ताकि इन एन ईयर 30
स्टॉक्स का एक वेल क्यूरेटेड बास्केट ऑफ स्टॉक्स आपके लिए क्रिएट हो जाए फॉर लॉन्ग टर्म इन्वेस्टिंग। यह स्टॉक्स ना हम एक
साथ ना देकर हर 12 दिन में देते हैं ताकि आपके पास जब भी फ्रेश फंड्स हो तो उस समय जो स्टॉक सही वैल्यू्यूएशन में है उसको आप
ले सको क्योंकि कई बार क्या होता है स्टैटिक स्टॉक रिकमेंडेशन प्रोडक्ट्स होते हैं जिसको आप लो तो आपको 30 स्टॉक्स मिल
जाते हैं जिसमें से कुछ को आप खरीद ही नहीं सकते वो ऊपर चले गए ऐसा ना हो इसलिए उस समय जो बेस्ट बाय है वो हम आपके साथ
शेयर करते हैं। तो इन एन ईयर आपके पास एक अच्छा बास्केट बन जाता है उन स्टॉक्स का जो अच्छे हैं और आपने सही प्राइस में
खरीदा है। फिनोलॉजी वन और फिनोलॉजी 30 दोनों का लिंक आपको ऊपर कार्ड में और वीडियो के डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा।
अगर यह वीडियो आपको हेल्पफुल लगा हो, पॉइंट्स लॉजिकल लगे हो, तो इस चैनल को सब्सक्राइब कर देना। मैं आगे इसी तरह के
फंडामेंटल एनालिसिस वीडियो आप तक लाता रहूंगा। ये वीडियो से अगर मैं वैल्यू ऐड कर पाया हूं तो इसे लाइक कर दीजिएगा। एक
और बात अगर आप अपने आसपास देखते हो ऐसे लोग जो खुद स्टॉक्स का एनालिसिस करते हैं लेकिन अक्सर गलत हो जाते हैं या उनकी
पोर्टफोलियो लॉस में है तो यह वीडियो आप उनके साथ शेयर कर दीजिएगा। इससे मुझे उम्मीद है कि उनकी डीआईवाई इन्वेस्टिंग
बेटर हो सकेगी। दिस इज़ प्रांजलल का कामरा साइनिंग ऑफ। बाई बाय।
मार्केट कैप फिल्टर से लगभग 70% कंपनियां खत्म हो जाती हैं, जिससे पोर्टफोलियो अधिक सुरक्षित हो जाता है। माइक्रो-कैप कंपनियों में वोलैटिलिटी, पंप एंड डंप और लिक्विडिटी की कमी जैसे जोखिम अधिक होते हैं, जबकि बड़ी कंपनियां कम जोखिम के साथ अच्छा रिटर्न दे सकती हैं।
10% भारत की नॉमिनल GDP ग्रोथ दर है, जिसमें महंगाई भी शामिल है। कंपनियां अपनी सेल्स ग्रोथ में महंगाई को एडजस्ट नहीं करतीं, इसलिए कम से कम देश की GDP जितनी ग्रोथ होनी चाहिए। हां, अस्थायी रूप से कुछ सालों में ग्रोथ कम हो सकती है, लेकिन 5 साल के एवरेज में यह 10% से कम नहीं होनी चाहिए।
निवेशक आमतौर पर 15% से ज्यादा रिटर्न चाहते हैं, लेकिन 5 में से कुछ स्टॉक्स भविष्य में खराब प्रदर्शन कर सकते हैं। 20% का फिल्टर एक सेफ्टी मार्जिन बनाता है, जिससे पोर्टफोलियो लेवल पर रिटर्न 15% से ऊपर बना रहे।
यह रेशियो बताता है कि कंपनी ने जितना प्रॉफिट (PAT) दिखाया है, उतना असली कैश (CFO) बैंक में आया है या नहीं। कई कंपनियां फर्जी सेल्स (जैसे स्टॉक पुशिंग) से PAT बढ़ाती हैं लेकिन असली कैश नहीं आता। इससे निवेशक भविष्य में फंस सकते हैं।
उच्च कर्ज से कंपनी के दिवालिया होने का खतरा अधिक होता है, जैसे रिलायंस कम्युनिकेशन, विजय माल्या ग्रुप और वीडियोकॉन में हुआ। निवेशकों को कंपनी के अंदरूनी जानकारी नहीं होती, इसलिए कर्ज का अनुपात कम रखना सुरक्षित है। लेकिन बैंकिंग और वित्तीय कंपनियों पर यह नियम लागू नहीं होता, क्योंकि उनका व्यवसाय ही कर्ज देने और लेने पर आधारित है।
डिस्काउंटेड कैश फ्लो (DCF) मॉडल का उपयोग करके फेयर वैल्यू का अनुमान लगाया जा सकता है। फिनोलॉजी टिकर जैसे टूल्स में बिल्ट-इन DCF कैलकुलेटर होता है, जिसमें सिर्फ 3-4 इनपुट डालने पर 10 सेकंड में स्टॉक की फेयर वैल्यू मिल जाती है।
20-25 या अधिकतम 30 स्टॉक्स का बास्केट बनाना चाहिए। यह डायवर्सिफिकेशन रिस्क को कम करता है, क्योंकि स्क्रीनिंग के बाद भी कुछ कंपनियां फेल हो सकती हैं। एक संतुलित पोर्टफोलियो में सफल कंपनियां असफल कंपनियों के नुकसान को कवर कर सकती हैं।
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