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शकुनि के कुशब्द सुनकर वासुदेव ने दी सजा दुर्योधन के उड़े होश || Suryaputra Karn

शकुनि के कुशब्द सुनकर वासुदेव ने दी सजा दुर्योधन के उड़े होश || Suryaputra Karn

Karn In Mahabharat

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[00:00]

वासुदेव आप तो आप तो सचमुच धन्य हैं।

[00:06]

मुझे मुझे स्मरण नहीं होता कि कितना समय

[00:11]

हो गया ऐसे शांतिपूर्ण वचन सुने हुए।

[00:17]

मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है वासुदेव कि

[00:20]

आपके मुख से शब्द नहीं फूल झड़ रहे हैं।

[00:24]

फूल

[00:29]

मैं अभिभूत हो गया वासुदेव और सच कहूं

[00:32]

वासुदेव मैं भी आपसे सहमत हूं।

[00:42]

मैं भी नहीं चाहता कि ये ये युद्ध हो। ना

[00:47]

श्री ये क्या कह रहे हैं आप?

[00:49]

हां दुर्योधन

[00:51]

वासुदेव बिल्कुल उचित कह रहे हैं।

[00:55]

हमें इस युद्ध को रोकने का पूरा प्रयास

[00:58]

करना चाहिए।

[01:00]

समझ गए? हां हां वासुदेव सबसे श्रेष्ठ

[01:07]

युद्ध वो है जो कभी हो ही नहीं।

[01:10]

और युद्ध की परिस्थिति उत्पन्न ना होने

[01:13]

देने का एक ही उपाय कि एक पक्ष दूसरे पक्ष

[01:17]

पर आक्रमण ना करें।

[01:22]

चलिए ठीक है। हम हम पांडवों पर आक्रमण

[01:26]

नहीं करेंगे। परंतु वासुदेव

[01:30]

द्वारकाधीश क्या आप ये आश्वासन दे सकते

[01:32]

हैं कि पांडव भी हम पर कभी भी आक्रमण नहीं

[01:38]

करेंगे।

[01:40]

कभी भी

[01:41]

गांधार नरेश

[01:44]

आप आक्रमण के संदर्भ में बात कर रहे हैं

[01:48]

और मैं यहां युद्ध की आवश्यकता को ही

[01:51]

समाप्त करने के विषय में बोल रहा हूं।

[01:53]

[हंसी]

[01:55]

अच्छा अच्छा ऐसा है। यदि ऐसा है वासुदेव

[01:59]

तो तो हम आपका प्रस्ताव सुनना चाहेंगे।

[02:06]

हां आप आप शांति दूत हैं तो संदेश तो लाए

[02:10]

ही होंगे

[02:13]

और हां ऊपर से आप शांति प्रस्थापित करना

[02:16]

चाहते हैं तो वासुदेव शांति प्रस्थापित

[02:20]

करने के लिए जिस समाधान [संगीत] की

[02:22]

आवश्यकता होती है वो समाधान भी लाए होंगे

[02:25]

आप है ना

[02:28]

बताइए क्या है इसका

[02:32]

समाधान प्रत्येक युद्ध की नीव में अन्याय

[02:36]

छिपा होता है गांधार

[02:39]

[संगीत]

[02:41]

और अन्याय का केवल एक ही समाधान है और वो

[02:45]

समाधान है न्याय

[02:54]

वो न्याय

[02:56]

जिस पर केवल पांडवों का अधिकार

[02:59]

उनसे किए गए वचनों को ना निभाने का न्याय

[03:03]

उनसे किए गए वचनों को ना पूर्ण करने का

[03:06]

न्याय।

[03:10]

इस भरी सभा में जो अधर्म हुआ,

[03:14]

जो अन्याय हुआ उसके प्रति न्याय।

[03:18]

महाराज धृतराष्ट्र

[03:21]

मैं यहां पांडवों की ओर से उनके साथ जो

[03:24]

अन्याय हुआ

[03:27]

उसका न्याय मांगने आया हूं।

[03:29]

कैसा अन्याय वासुदेव?

[03:31]

वो अन्याय।

[03:33]

जो एक धर्म सभा में एक अधर्म दत माध्यम से

[03:37]

हुआ

[03:41]

वो अन्याय

[03:43]

जो कुरुकुल के जष्ठ जनों के समक्ष

[03:47]

कुलवधू पांचाली के साथ

[03:53]

यदि उस अन्याय का त्राण हो

[03:56]

तो इस महायुद्ध को रोका जा सकता है।

[04:00]

[संगीत]

[04:05]

कुरकुल श्रेष्ठ महाराज धृतराष्ट्र

[04:08]

महामहिम भीष्म मैं पांडवों की ओर से उस

[04:12]

अन्याय के लिए न्याय मांगने आया हूं।

[04:18]

स्मरण रहे महाराज

[04:21]

यदि आपने पांडवों को न्याय नहीं दिया

[04:24]

या तो उसे वह पुण्य से अर्जित कर लेंगे

[04:28]

या फिर

[04:30]

उसे छीन लेंगे।

[04:42]

अब निर्णय आपका है।

[04:44]

वासुदेव

[04:46]

आप

[04:48]

यहां शांति प्रस्ताव लेकर आए हैं या

[04:51]

यहां यहां हमें धमकाने आए हैं?

[04:56]

ओ उस द में जो कुछ भी हुआ

[05:01]

सबकी

[05:03]

उपस्थिति मैं हुआ।

[05:04]

युधिष्ठिर की इच्छा से हुआ।

[05:09]

अरे वो वो हार गया। अपना राज्य हार गया।

[05:12]

वो उसका प्रारब्ध था।

[05:14]

छलबद्ध अन्याय को प्रारब्ध नहीं कहा जा

[05:16]

सकता। युवराज।

[05:19]

जिस प्रकार मंदिर में किया गया पाप पुण्य

[05:22]

नहीं बन जाता। उसी प्रकार धर्मवीरों की

[05:25]

उपस्थिति में सभा में किया गया अधर्म

[05:28]

धर्म नहीं बन जाता।

[05:30]

अरे धर्म अधर्म कौन सा धर्म? कौन सा धर्म?

[05:33]

कोई अधर्म नहीं हुआ।

[05:34]

नारी नारायणी होती है युवराज।

[05:37]

और भरी सभा में एक नारी का एक कुलवधू का

[05:42]

वस्त्र हरण

[05:44]

अधर्म नहीं।

[05:51]

यदि तुम्हें [संगीत] विश्वास नहीं

[05:54]

तो अपने जेष्ठों की

[05:56]

झुकी दृष्टि से पूछो दुर्योधन

[06:00]

उन वस्त्रों से पूछो

[06:02]

जो आपको आपके मन की नग्नता अनुभव कराने के

[06:05]

लिए आपके शरीर से दूर हो गए।

[06:11]

उन प्रतिज्ञाओं से पूछो

[06:13]

जो पांडवों ने अपने प्रातःओं के विनाश के

[06:16]

लिए मांगे।

[06:18]

ये प्रतीक्षा लेता हूं पर यही जंगल तोड़कर

[06:23]

तुम्हारा प्राण ले लूंगा। दुर्योधन

[06:26]

उस श्राप से पूछो जो द्रोपदी ने समस्त

[06:30]

कुरकुल को दिया।

[06:31]

इस सभा में उपस्थित वो हर व्यक्ति जिसने

[06:34]

मौन रहकर यह अधर्म होते हुए देखा

[06:38]

उन्हें उनके मौन रहने का दंड मिलेगा।

[06:43]

श्राप है ये अग्निसुता द्रोपदी का।

[06:48]

परंतु यदि आप सब चाहे तो पांडव अपनी

[06:51]

प्रतिज्ञा को त्याग देंगे।

[06:56]

द्रोपदी अपना श्राप वापस ले लेंगे।

[07:00]

बस

[07:02]

आप सबको अपनी भूल का अनुभव करके पांडवों

[07:05]

को केवल उनका अधिकार देना है।

[07:13]

सबको अपनी भूल का अनुभव करके पांडवों को

[07:16]

केवल उनका अधिकार देना है।

[07:17]

यह कैसा न्याय है वासुदेव?

[07:20]

संधि और शांति वार्ता में बराबर की बात

[07:22]

होती है। एक ओर से बंधन और शर्तें नहीं ला

[07:26]

दी जाती।

[07:26]

न्याय की मांग ना बंधन है।

[07:29]

ना शर्त है महाराज

[07:32]

केवल एक निवेदन है।

[07:34]

यदि ऐसा है तो मेरा निर्णय यह है कि

[07:37]

दुर्योधन

[07:38]

मौन रहो।

[07:44]

निर्णय लेना महाराज के हाथ में है।

[07:46]

तुम्हारे नहीं तुम

[07:50]

शांत रहो।

[07:54]

राजा होने के नाते मेरा कर्तव्य है

[07:58]

कि मैं सबकी बातें सुनूं। ताश्री

[08:01]

अपने मंत्रणाकारों का सम्मान करूं।

[08:03]

दुर्योधन युवराज है। हस्तिनापुर का भवी

[08:07]

महाराज है। इसलिए इस संदर्भ में मैं अपने

[08:11]

पुत्र

[08:12]

और हस्तिनापुर के युवराज दुर्योधन को अपना

[08:16]

निर्णय प्रस्तुत करने की अनुमति देता हूं।

[08:28]

धन्यवाद पिता श्री

[08:32]

हां तो सुनिए बात सुनिए ऐसा है कि कि उस

[08:37]

दूत में पांडव स्वयं

[08:40]

अपना अधिकार हार बैठे थे।

[08:44]

अब ना तो वो किसी भी राज्य का उनको अधिकार

[08:48]

है और ना ही राजा होने का।

[08:53]

[संगीत]

[08:57]

इसीलिए मैं

[08:59]

दुर्योधन

[09:00]

ये घोषणा करता हूं

[09:03]

कि हस्तिनापुर

[09:06]

आपका ये शांति प्रस्ताव

[09:09]

ठुकराता है।

[09:16]

[संगीत]

[09:23]

दुर्योधन

[09:24]

क्या तुम्हें इस बात का अनुमान भी है कि

[09:28]

शांति प्रस्ताव ठुकराने का अर्थ है युद्ध

[09:31]

को निमंत्रण

[09:33]

अपने निर्णय पर पुनः विचार कर लो।

[09:36]

बात बातबात पर विचार करना बंद कीजिए।

[09:38]

पितामह बात पर विचार कायर करते हैं।

[09:46]

योद्धा का जन्म ही

[09:50]

युद्ध के लिए होता है और मैं इस युद्ध के

[09:53]

लिए प्रस्तुत हूं।

[10:01]

मेरी दृष्टि में उन पांडवों को कुछ भी

[10:04]

देने का प्रश्न ही नहीं उठता।

[10:07]

बस

[10:12]

मैंने ये सभा समझौते के लिए रखवाई थी ना

[10:16]

कि अपने अपने ही अधिकार के त्याग के लिए।

[10:20]

ये मेरा अंतिम निर्णय है। मैं उन पांडवों

[10:25]

को

[10:27]

इंद्रप्रस्थ नहीं दूंगा

[10:30]

तो नहीं दूंगा।

[10:47]

मैं उन पांडवों को

[10:50]

इंद्रप्रस्थ नहीं दूंगा

[10:54]

तो नहीं दूंगा।

[11:01]

उचित है दुर्योधन तुम इंद्रप्रस्थ रख सकते

[11:04]

हो।

[11:07]

उसकी सेना भी रख लो, अस्त्र-शस्त्र रख लो,

[11:11]

लाखों गाय, अश्व, उसकी प्रजा भी रख लो।

[11:15]

कोटि-कोटि धन संपत्ति जो कुछ भी पांडवों

[11:18]

ने अपने परिश्रम से अर्जित किया था वो सब

[11:20]

रख लो दुर्योधन।

[11:23]

परंतु इस अन्याय के प्रतिकार स्वरूप

[11:29]

केवल एक कार्य कर

[11:33]

प्रतीक के रूप

[11:35]

पांचों पांडवों को पांच गांव दे दो।

[11:49]

इतना तो दे ही सकते हो दुर्योधन।

[11:52]

पांचों पांडव

[11:54]

वहां सुख से निवास करें।

[11:57]

और कुछ नहीं चाहेंगे।

[12:00]

इस युद्ध को टालने के लिए

[12:03]

केवल पांच गांव

[12:06]

देना स्वीकार है तुम्हें

[12:08]

धर्म लक्षणम

[12:11]

दशकम धर्म लक्षणम

[12:16]

वासुदेव वासुदेव वासुदेव

[12:21]

यदि दुर्योधन पांच गांव दे देता है तो

[12:25]

क्या आप वचन देंगे कि पांडव इंद्रप्रस्थ

[12:28]

[संगीत] की चाह में आक्रमण की चेष्टा नहीं

[12:31]

करेंगे।

[12:32]

हां गांधार नरेश

[12:34]

मैं वचन देता हूं

[12:39]

कि इस स्थिति में

[12:42]

पांडवों की ओर से कोई आक्रमण [संगीत] नहीं

[12:44]

होगा। वो हर परिस्थिति में संतुष्ट

[12:47]

रहेंगे।

[12:52]

हां कह दो दुर्योधन इससे अच्छा प्रस्ताव

[12:55]

कोई नहीं होगा।

[12:58]

महाराज मैं आपसे विनती करता हूं कि यही

[13:03]

अवसर है अंतिम अवसर।

[13:07]

आप इस प्रस्ताव को स्वीकार करके इसको यहीं

[13:10]

रोक दीजिए।

[13:11]

साक्षी का कहना उचित है। पुत्र हां कर दो।

[13:15]

इसी में सबका हित है।

[13:17]

मित्र

[13:19]

मैंने सदा इस युद्ध का पक्ष लिया है।

[13:22]

मैंने सदा अर्जुन से अपना अधूरा द्वंद

[13:25]

पूर्ण करना चाहा।

[13:36]

इस समय

[13:38]

पूरे भारतवर्ष को महाविनाश से बचाने की

[13:40]

आवश्यकता है।

[13:45]

हां कह दो मित्र

[13:52]

तुमने तो एक अनजान का मान रखने के लिए

[13:56]

उसे अंगराज बना दिया।

[14:02]

तो लाखों के प्राणों को बचाने के लिए

[14:06]

पांच गांव दे दो मित्र

[14:10]

देख रहे हैं वासुदेव

[14:12]

मेरे मित्र अंगराज

[14:16]

मेरे साथ है

[14:22]

और आपको तो अच्छे से ज्ञात है कि

[14:25]

कर्ण को अंगराज मैंने बनाया

[14:28]

उसे वो दिया है मैंने जो जो पांडव नहीं दे

[14:32]

पाए

[14:34]

ना पांडव,

[14:36]

ना पितामह।

[14:42]

और यह मेरा वचन है।

[14:45]

यदि मेरा

[14:47]

मेरा मित्र मुझसे प्राण भी मांगेगा

[14:52]

तो वो भी

[14:56]

मैं प्रसन्नता से दे दूंगा।

[15:01]

[संगीत]

[15:06]

परंतु

[15:11]

परंतु ऐसा सोचना भी मत कि मैं उन पांडवों

[15:14]

को कुछ भी देने वाला हूं।

[15:21]

पता है बचपन से मुझे

[15:26]

मुझे यही आभास कराया गया है कि

[15:29]

मेरा

[15:31]

किसी भी वस्तु में

[15:34]

कोई अधिकार नहीं ना अपने पिता के राज्य पर

[15:39]

ना सिंहासन पर जो भी मिले या तो या तो दे

[15:44]

दो या उन उन पांडवों के साथ में बांट लो

[15:49]

[संगीत]

[15:51]

और तुम अधिकार की बात करते हो वासुदेव तो

[15:55]

तो बताओ मुझे

[15:58]

मेरा अधिकार उन उन पांडवों ने मुझे कब

[16:02]

दिया कब

[16:06]

गुरु का प्रेम

[16:10]

महामहिम का वत्सल्य

[16:12]

किसी को मिला तो वो उन पांडवों को मुझे

[16:17]

नहीं

[16:19]

मेरे पिता के राजा होने पर युवराज पद पर

[16:23]

किसी का अधिकार था तो वो वो मिल रहा था

[16:27]

परंतु मुझे मुझे नहीं मिला वो मिला उस उस

[16:33]

युधिष्ठिर को

[16:37]

दुर्योधन की बात तक सम्मत है वासुदेव

[16:41]

युवराज

[16:42]

राजा का पुत्र ही बनता है और यही नीति है

[16:47]

आप तो कभी वास्तविक राजा थे ही नहीं

[16:50]

महाराज

[16:52]

आप तो आज भी हस्तिनापुर के केवल कार्यकारी

[16:56]

नरेश

[17:00]

[संगीत]

[17:01]

आपका का राज्य अभिषेक भी नहीं हुआ। और रही

[17:03]

बात नीति की

[17:06]

तो कुलवधू का वस्त्र हरण उसका अपमान कहां

[17:10]

की नीति है?

[17:15]

पांडवों को पक्ष लेना बंद करो ग्वाले।

[17:18]

मैंने उस उस द्रोपदी को धर्म पूर्वक युद्ध

[17:22]

में जीतकर उसे अपनी दासी बनाया।

[17:27]

उसका वस्त्र हरण करना मेरा अधिकार था।

[17:33]

क्योंकि क्योंकि जो दासी अपने स्वामी की

[17:36]

आज्ञा का पालन ना करे

[17:40]

वो दंड की अधिकारिणी होती है।

[17:42]

नारी केवल सम्मान की अधिकारिणी है।

[17:45]

दुर्योधन।

[17:58]

यूथ बनकर आए हो।

[18:01]

अपना संदेश

[18:04]

दे चुके हो। अब मेरा निर्णय सुनो। मैं उन

[18:08]

पांडवों को बाज का तो क्या? एक सुई की नोक

[18:14]

बराबर धरा भी नहीं दूंगा।

[18:26]

[संगीत]

[18:28]

तुम्हारा संदेश

[18:31]

भलीभांति समझ लिया है युवराज।

[18:35]

अब वही होगा

[18:38]

जो तुम चाहते हो दुर्योधन।

[18:44]

अब महा विनाश होगा।

[18:48]

महायुद्ध होगा महाभारत होगा नाम

[19:07]

प्रणपात [संगीत]

[19:22]

[संगीत]

[19:28]

रुकिए केशव

[19:31]

मित्र

[19:33]

एक बार और विचार कर लो।

[19:37]

हे मित्र राजा बलि की कथा स्मरण है

[19:40]

तुम्हें?

[19:41]

वो मायावी वामन मुझसे मुझे तीन पग मांगने

[19:45]

आया था।

[19:46]

तीन पग

[19:48]

तीन पग भूमि और उस तीन पग में उस

[19:55]

वामन ने ना केवल तीनों लोकनाप लिए

[20:01]

बल्कि इस उस बलि का नाश भी कर दिया।

[20:10]

अरे इस इस चलिया को पांचगांव दे दूंगा तो

[20:13]

तो ये हस्तिनापुर का अस्तित्व ही मिटा

[20:15]

देगा।

[20:22]

पाखंडी कृष्ण

[20:25]

तुम्हारी

[20:26]

मीठीमीठी बातों का प्रभाव इन पर पड़ सकता

[20:30]

है।

[20:33]

दुर्योधन पर नहीं

[20:37]

तो फिर मैं प्रस्थान करता हूं।

[21:11]

मैंने तुम्हें जाने की आज्ञा

[21:14]

[संगीत]

[21:15]

नहीं दी है अभी।

[21:24]

सब तुम्हारी माया से भयभीत हैं। कृष्ण

[21:29]

आज मैं

[21:31]

अपनी प्रजा और अपनी सेना के मन से तेरा भय

[21:35]

मिटा दूंगा। कृष्ण

[21:43]

तुम हस्तिनापुर से बाहर नहीं जाओगे।

[21:52]

मैं

[21:54]

धृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन

[22:00]

तुम्हें अभी

[22:03]

और इसी क्षण

[22:07]

वंदे बनाता हूं वासुदेव।

[22:23]

चलेगा

[22:26]

बंदी बनाओ इस

[22:29]

शरीर को

[22:37]

अपने पुत्र को सीमा में रहने का अर्थ

[22:39]

सिखाइए महाराज।

[22:42]

ये अनर्थ करने जा रहा है।

[22:47]

महामहिम बिल्कुल ठीक कह रहे हैं महाराज।

[22:50]

वासुदेव कृष्ण केवल हस्तिनापुर के संबंधी

[22:52]

नहीं इस समय वे एक शांति दूत हैं। और इस

[22:57]

बात का स्मरण रहे महाराज। एक शांतिदूत के

[23:00]

साथ इस तरह का व्यवहार उचित नहीं है।

[23:04]

आचार्य ठीक कह रहे हैं पुत्र। ऐसा अनर्थ

[23:07]

मत करो।

[23:09]

रावण ने भी यही मूर्खता की थी।

[23:13]

उसने भी दूध का अपमान किया था और उसकी

[23:16]

सोने की लंका जलकर भस्म हो गई। [हंसी]

[23:23]

मित्र

[23:26]

रावण मूर्ख था जो सामान्य रस्सी से हनुमान

[23:31]

को बांधने चला था। परंतु मैंने

[23:35]

मैंने इस विशेष दूत के लिए विशेष धातु की

[23:40]

श्रंखला बनवाई है।

[24:03]

[संगीत]

[24:10]

[संगीत]

[24:16]

कोई कुछ नहीं कहेगा।

[24:26]

मेरा आप सब से निवेदन है कि मेरे और

[24:30]

दुर्योधन के मध्य में ना आए

[24:34]

और साक्षी बने इस क्षण के इसे भान नहीं कि

[24:39]

यह क्या कर रहा है जिसके जन्म के पश्चात

[24:45]

जिसे बंदी ग्रह की बेड़ियां ना बांध सके

[24:48]

सैनिकों का पहरा ना रोक पाया

[24:52]

आज तुम उसे बांधने चले हो दुर्योधन

[24:57]

सामर्थ्य है तुम में तो बढ़ो आगे

[25:03]

हो सके तो साधो मुझे दुर्योधन

[25:06]

अपने इन श्रंखलाओं में बांधने का प्रयास

[25:09]

करो

[25:12]

[संगीत]

[25:20]

हो सके तो साधो मुझे दुर्योधन

[25:24]

अपने इन श्रंखलाओं में बांधने का प्रयास

[25:26]

करो।

[25:30]

[संगीत]

[25:37]

[संगीत]

[25:44]

उठाओ उस तेरे को।

[25:56]

[संगीत]

[26:04]

[संगीत]

[26:11]

[संगीत]

[26:16]

तुम्हें लगता है कि यह धातु श्रृंखला

[26:21]

मुझे बांधने के लिए पर्याप्त है। दुर्योधन

[26:32]

[संगीत]

[26:39]

[संगीत]

[26:51]

श्री कृष्ण गोविंद

[26:54]

हरे मुरारी

[26:58]

नाथ नारायण

[27:00]

[संगीत]

[27:01]

वासुदेवा

[27:05]

[संगीत]

[27:12]

[संगीत]

[27:17]

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ

[27:21]

नारायण [संगीत]

[27:22]

वासुदेवा श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे

[27:27]

नाथ नारायण वासुदेवा [संगीत]

[27:30]

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ

[27:33]

[संगीत] नारायण वासुदेवा

[27:38]

[संगीत]

[27:54]

जब तक अनंत आकाश को बांधने में सक्षम

[27:57]

श्रृंखला तुम्हारे पास ना हो तब तक ऐसी

[28:01]

मूर्खता

[28:02]

पुनः करने का प्रयत्न मत करना दुर्योधन।

[28:05]

ये ये ये छल ये माया यही है ना तुम्हारे

[28:11]

अस्त्र छल

[28:14]

परंतु मुझे तुमसे या तुम्हारे इस माया से

[28:19]

डर नहीं लगता

[28:21]

हर लूंगा मैं तुम्हारे और उन पांडवों के

[28:25]

प्राण

[28:32]

स्मरण रखना कि इस महायुद्ध में अंत करेगा

[28:36]

तुम्हारा और उन पांडवों का यह दुर्योधन

[28:40]

जो स्वयं मृत्यु के शिखर से गिरने वाला हो

[28:44]

उसे अपने अंत की चिंता करनी चाहिए मूर्ख

[28:46]

दुर्योधन

[28:48]

जिस सत्य को जिस भविष्य को मैं टालना

[28:52]

चाहता था उसे आज तुमने स्वयं आमंत्रण दे

[28:55]

दिया है

[28:57]

और सत्य यह

[28:59]

कि इस महायुद्ध के अंत में तुम्हारा

[29:04]

तुम्हारे पापों

[29:07]

और तुम्हारे पाप में भागीदार रहे प्रत्येक

[29:10]

का अंत होगा ये अंत होगा

[29:15]

अंत होगा ये अंत होगा अंत होगा

[29:24]

मेरे राज्य में मेरे ही सभा में आके मुझे

[29:28]

ही धमकी देता है छिए

[29:30]

तुम्हारा राज्य

[29:33]

तुम्हारी सभा सभा

[29:35]

इस राजसभा के समक्ष

[29:38]

कितना सा आकार है तुम्हारा दुर्योधन

[29:42]

और हस्तिनापुर के समक्ष कितनी सी है यह

[29:46]

सभा और इस पृथ्वी के सामने कितना सा है

[29:50]

हस्तिनापुर और इस ब्रह्मांड में क्या

[29:53]

स्थान रखती है यह पृथ्वी यदि मनुष्य का

[29:56]

अभिमान और तम उसके आकार से अधिक बड़ा हो

[30:00]

जाए

[30:01]

तो वही मनुष्य को स्वयं अपने बोझ से मार

[30:04]

डालता है और तुम्हारे अंत का कारण भी यही

[30:08]

अभिमान होगा दुर्योधन और तुम्हारा अंत भी

[30:13]

तुम्हारे इसी अभिमान से होगा दुर्योधन

[30:28]

धर्मस्या

[30:34]

भारत [संगीत]

[30:42]

[संगीत]

[30:48]

[संगीत]

[30:56]

[संगीत]

[31:03]

बनाया [संगीत]

[31:09]

[संगीत]

[31:23]

[संगीत]

[31:35]

खड़ा है काल बड़ा

[31:39]

जब नाश मनोज बन जाता है उसका विवेक मर

[31:42]

जाता है नृत्य करवाने को वो स्वयं नाश

[31:46]

बुलवाता है

[32:07]

[32:33]

[हंसी]

[32:46]

ये सब

[32:58]

पितामा

[33:01]

है रे नहीं पा रहे

[33:09]

क्या होता है मैं मैं कहां हूं

[33:15]

मैं

[33:20]

मैं निकाल

[33:23]

[संगीत]

[33:38]

[संगीत]

[33:40]

मैं

[33:43]

मैत्रिका

[34:04]

असंभव है ये।

[34:06]

असंभव है ये।

[34:08]

इसे तुमने ही तो संभव बनाया है दुर्योधन।

[34:17]

महाकाल ब्रह्मांड को दुर्योधन लकारा है

[34:22]

विनाश दुर्योधन महा विनाश आता है नयन में

[34:26]

देख आज महा विनाश की बात ये दुर्योधन जो

[34:31]

आज भी हो ना सका जा

[34:35]

भीषण हुकार किया अपना स्वरूप विस्तार किया

[34:39]

का बोले अब महाविनाश गण बोले

[34:44]

है ये नगर जिसके

[34:48]

वश में जीवन मृत्यु जिसके मन में जिसको

[34:52]

[संगीत] छू ना सके सागर जिसके चरणों में

[34:55]

है जीवन के सारे चंद्र जिसमें सारे

[35:00]

वायु महेश जिसमें से है प्रवेश

[35:13]

इस युद्ध के जन्मदाता तुम ही हो।

[35:16]

ध्यान से देखो इसे।

[35:19]

यह कुरुक्षेत्र है।

[35:25]

ये तुम्हारे अहंकार का परिणाम है।

[35:28]

दुर्योधन।

[35:31]

तुम्हारे छल का निष्कर्ष है ये।

[35:34]

ये तुम्हारे मध का तुम्हारे कर्मों का फल

[35:38]

है दुर्योधन।

[35:41]

ये उस पाप का परिणाम है दुर्योधन। जो भरी

[35:44]

सभा में याज्ञसेनी के साथ हुआ।

[35:48]

ये श्राप का परिणाम है जो पांचाली के धकते

[35:52]

हृदय से निकला।

[35:54]

देखो मूर्ख

[35:57]

मृत्यु तुम्हें पराजित कर चुकी है और तुम

[36:03]

विजय का स्वप्न देख रहे हो।

[36:09]

[संगीत]

[36:14]

[संगीत]

[36:19]

[संगीत]

[36:23]

है ये सब

[36:25]

[संगीत]

[36:29]

माया है

[36:30]

माया नहीं दुर्योधन

[36:32]

तुम्हारे कर्मों की छाया है ये यही

[36:36]

तुम्हारा भविष्य है यही तुम्हारा प्रारब्ध

[36:41]

यही अंत है कुरुवंश का

[36:45]

युद्ध की चाह थी ना तुम्हें महाविनाश

[36:48]

देखने की इच्छा थी तुम्हें

[36:51]

ठीक है

[36:53]

युद्ध मिलेगा तुम्हें

[36:56]

महाविनाश देखोगे तुमसे

[36:59]

पहले भी बहुत अहंकारी है और उनका भी अंत

[37:03]

मैंने इसी प्रकार किया

[37:06]

मनुष्य क्या

[37:09]

मैं तो सौर मंडल का सृजन और विनाश करता

[37:11]

हूं

[37:13]

देखना चाहोगे

[37:17]

तो देखो

[37:22]

[संगीत]

[37:25]

श्री कृष्ण गोविंद

[37:28]

उधर देखो दुर्योधन [संगीत]

[37:32]

हे नाथ नारायण

[37:35]

वासुदेवा [संगीत]

[37:38]

हे कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण

[37:43]

[संगीत]

[37:43]

वासुदेवा

[37:57]

[संगीत]

[38:09]

हो

[38:15]

[संगीत]

[38:32]

[38:38]

[संगीत]

[38:40]

ये ये

[38:41]

क्या हो रहा है?

[38:44]

ये ये [संगीत] सब सब मिथ्या है ये। ये ये

[38:49]

मिथ्या है ये।

[38:50]

मिथ्या तुम्हारा अहंकार है दुर्योधन।

[38:56]

मिथ्या ये सभा है। सत्य तो वो है जो तुम

[39:01]

कभी समझ ही नहीं पाए।

[39:05]

वो सत्य

[39:07]

जो मैंने अभी तुम्हें दिखाया। [संगीत]

[39:14]

[संगीत]

[39:15]

सत्य केवल मैं हूं दुर्योधन।

[39:19]

शेष सब मिथ्या। ये ये सब माया है। तुम

[39:23]

साधारण मनुष्य हो तो और कुछ नहीं हो।

[39:26]

आश्चर्य है।

[39:29]

परंतु इसमें तुम्हारा क्या दोष?

[39:33]

[संगीत] जब मनुष्य में अहंकार

[39:36]

तो वो सत्य केवल आकार से पहचानता है।

[39:40]

तो आकार देखो दुर्योधन।

[39:48]

[संगीत]

[39:50]

धर्मस्या

[40:04]

[संगीत]

[40:05]

आत्मा से जा

[40:17]

[संगीत]

[40:22]

[संगीत]

[40:32]

[संगीत]

[40:41]

[संगीत]

[40:44]

मैंने शांति दी दुर्योधन और तुमने स्वीकार

[40:47]

नहीं की।

[40:50]

मैंने मैत्री दी।

[40:52]

परंतु अपने अहंकार के आगे तुम्हें मैत्री

[40:56]

का मूल्य समझ नहीं आया।

[41:05]

मैं प्रेम लाया था

[41:08]

परंतु तुमने युद्ध मांगा दुर्योधन तो सुनो

[41:13]

अब युद्ध होगा।

[41:22]

मैं जीवन का संदेश लाया था। तुमने मृत्यु

[41:26]

का विकल्प चुना। तुम्हें मृत्यु दूंगा।

[41:37]

तुम्हें अनुमान नहीं दुर्योधन कि यह युद्ध

[41:40]

कितना भयंकर होगा।

[41:42]

महासंहार होगा।

[41:45]

पापियों के प्रत्येक भागीदार का अंत होगा

[41:48]

यह महाभारत।

[42:00]

श्री कृष्ण गोविंद [संगीत]

[42:03]

हरे मुरारी

[42:06]

हे नाथ नारायण

[42:10]

वासुदेवा [संगीत]

[42:28]

हे नाथ नारायण [संगीत]

[42:30]

वासुदेवा श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे

[42:35]

नाथ नारायण वासुदेवा [संगीत] श्री कृष्ण

[42:39]

गोविंद हरे मुरारी

[42:42]

बाण संधान करो बाल मुक्त करो राधे को हरे

[42:46]

हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा श्री

[42:51]

कृष्ण गोविंद [संगीत]

[42:52]

हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा

[42:59]

[संगीत]

[43:02]

सभा में इतनी शांति क्यों है?

[43:06]

कोई बताएगा मुझे आखिर हो क्या रहा है?

[43:09]

सत्य देखने के लिए तन की दृष्टि की नहीं

[43:13]

मन की दृष्टि की आवश्यकता होती है

[43:14]

धृतराष्ट्र।

[43:17]

नियति ने तुम्हें दृष्टि नहीं परंतु आज इस

[43:22]

क्षण के लिए मैं तुम्हें दृष्टि देता हूं।

[43:26]

कदाचित तन की दृष्टि से देखकर तुम मन की

[43:30]

दृष्टि का सत्य समझ पाओ धृतराष्ट्र।

[43:48]

[43:52]

[संगीत]

[44:16]

नहीं चाहिए ये दृष्टि मुझे वापस ले लो ये

[44:21]

ये क्या अनर दिखा दिया मुझे वासुदेव

[44:25]

ले लो वापस ले हो [संगीत]

[44:33]

[संगीत]

[44:41]

जो सबने देखा

[44:44]

वही अंत है और वही नया प्रारंभ

[44:49]

परंतु यह

[44:51]

आप सबको स्मरण तब होगा जब यह वास्तविक में

[44:56]

आप सबके साथ घटित हो

[45:18]

[संगीत]

[45:23]

श्री कृष्ण [संगीत] गोविंद

[45:26]

हरे मुरारी

[45:29]

हे नाथ नारायण [संगीत]

[45:33]

वासुदेवा

[45:36]

श्री कृष्ण गोविंद

[45:37]

हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा

[45:41]

[संगीत]

[45:45]

मैं

[45:47]

वासुदेव

[45:49]

इस महा युद्ध

[45:52]

इस महाभारत की घोषणा करता हूं।

[46:06]

धर्मस्याती

[46:08]

[संगीत]

[46:12]

स्मरण रखना तुर्य

[46:15]

तुम्हारे इस अभिमान के साथ-साथ

[46:20]

तुम भी इस धरा पर ऐसे गिरोगे कि कभी उठ

[46:22]

नहीं पाओगे।

[46:26]

इस महाहिंसा

[46:28]

इस महाविनाश के उत्तरदायित्व का बोझ

[46:32]

तुम अपने साथ दूसरे लोक लेकर जाओगे तो

[46:35]

योद्धा

[46:37]

[संगीत] नारायणिता

[46:44]

[संगीत]

[46:51]

[संगीत]

[46:57]

[संगीत]

[47:20]

[संगीत]

[47:28]

[संगीत]

[47:36]

[संगीत]

[47:48]

केशव

[47:52]

[संगीत]

[48:06]

[संगीत]

[48:06]

मुझे सदा से भान था

[48:11]

कि आप साधारण मनुष्य नहीं है।

[48:18]

[संगीत]

[48:20]

परंतु आज जो मैंने देखा

[48:24]

उसके पश्चात

[48:34]

[संगीत]

[48:43]

मेरे साथ आओ मित्र।

[48:46]

ये स्थान अब वार्ता करने के लिए उचित नहीं

[48:49]

रहा।

[48:51]

यहां शब्दों का कोई मोल नहीं।

[48:55]

यहां शब्द केवल सुने जाते।

[49:00]

समझे [संगीत] नहीं जाते।

[49:04]

आओ मेरे साथ।

[49:08]

[संगीत]

[49:17]

केशव

[49:20]

[संगीत]

[49:25]

शांति [संगीत]

[49:27]

न्याय

[49:30]

एक बार आप मेरे सारथी बने थे [संगीत]

[49:34]

आज एक और मुझे दीजिए केशव

[49:38]

बुद्धि

[49:41]

कर

[49:43]

प्रीति में

[49:45]

तुम्हें सारथी के रूप में पाकर

[49:49]

गौरवान्वित तो मैं हो जाऊंगा मित्र

[49:53]

कृष्णा कहो या [संगीत]

[49:56]

कर्ण कहो है दोनों

[50:01]

एक [संगीत] समान

[50:04]

कृष्णा कहो या कर्ण [संगीत]

[50:08]

कहो है दोनों

[50:11]

एक समान

[50:17]

या

[50:36]

तो मित्र जो कुछ भी तुम्हारे मन में

[50:40]

आप ही पढ़ [संगीत] लीजिए ना केशव

[50:44]

क्या है मेरे मन में

[50:48]

मैं तुम्हारा मन पढ़ सकता हूं मित्र परंतु

[50:51]

जैसे कि मैंने पहले भी कहा था मुझे

[50:54]

तुम्हारे मुख से सुनना अच्छा लगता है

[50:57]

अब कह भी दो मिन

[51:00]

क्या है तुम्हारे मन में? इस समय जो मेरे

[51:04]

मन में चल रहा है

[51:06]

वो ये है कि

[51:10]

आपने मुझे पांडवों के पक्ष में आने का

[51:12]

प्रस्ताव दिया था।

[51:13]

हां।

[51:15]

और तुमने उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया

[51:18]

था।

[51:21]

हां।

[51:24]

परंतु मैंने कभी नहीं सोचा था।

[51:27]

कि मेरा यह निर्णय

[51:30]

मुझे आपके विपक्ष में खड़ा कर देगा। केशव

[51:33]

आपको तो युद्ध का परिणाम पता है ना केशव

[51:37]

किसी अनहोनी के होने से पहले

[51:42]

उसका ज्ञात हो जाता।

[51:46]

क्या वो आपको पीड़ा नहीं देता केशव।

[51:50]

मनुष्य संतोष से इसलिए जीता है

[51:54]

क्योंकि वो नहीं जानता कि अगले पल क्या

[51:56]

होने वाला है।

[51:58]

वो नहीं जानता

[52:01]

कि वो जीवित [संगीत] रहेगा या वो मर

[52:03]

जाएगा।

[52:06]

परंतु यदि

[52:08]

उसे ज्ञात हो जाए

[52:11]

कि अगले पल क्या [संगीत] होगा

[52:15]

या वो कब मर जाएगा तो आपको नहीं लगता कि

[52:19]

उसके आने वाले पल

[52:22]

भय और चिंता [संगीत] में बीतेंगे।

[52:30]

यह सोच पर निर्भर करता है अंगराज। यदि

[52:33]

मनुष्य को अपना अंत ज्ञात हो तो हर वो

[52:36]

क्षण जिसे [संगीत] हम व्यर्थ करते हैं

[52:39]

उन क्षणों को जिया भी जा सकता है। इस नदी

[52:43]

[संगीत] को देख रहे हो इस बहती नदी को पता

[52:46]

है कि अंततः इसे सागर में जाकर मिल जाना

[52:51]

अधिक ज्ञान पीड़ादाई नहीं होता। मित्र

[52:55]

अधिक ज्ञान उचित निर्णय लेने में सहायता

[52:59]

करता है। यदि तुम्हें भी भूत और भविष्य का

[53:03]

कुछ [संगीत] अधिक ज्ञान होता तो कदाचित

[53:06]

तुम भी अधिक न्याय पूर्वक निर्णय कर पाते।

[53:12]

आपका मंतव्य यही है ना

[53:16]

कि पांडव उचित है और दुर्योधन अनुचित

[53:24]

क्षमा कीजिएगा।

[53:27]

परंतु मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूं।

[53:36]

मुझे लगता है केशव

[53:39]

ये दोनों अपने-अपने स्थान पर दोषी हैं।

[53:42]

[संगीत]

[53:47]

और इसी कारण से

[53:50]

दोनों अपनी-अपनी [संगीत] दृष्टि में

[53:53]

निर्दोष और सही है।

[53:59]

यदि दोनों ही दोषी

[54:01]

तो तुम निष्पक्ष क्यों नहीं हो जाते

[54:03]

मित्र?

[54:07]

क्योंकि मुझे लगता है कि दुर्योधन

[54:10]

युधिष्ठिर से कहीं अधिक सक्षम शासक सिद्ध

[54:14]

होगा।

[54:17]

इतने अधर्म करने के पश्चात भी

[54:20]

हां

[54:23]

क्योंकि वो युधिष्ठिर की भांति धर्मराज

[54:25]

होने का ढोंग नहीं करता। आप ही बताइए

[54:27]

[संगीत] केशव कि जिसने स्वयं की पत्नी को

[54:30]

दांव पर लगा दिया हो।

[54:33]

जिसने युद्ध के कुचक्र से निकल कर

[54:36]

स्वयं को युद्ध में फिर से फंसा लिया हो।

[54:41]

वो कैसा धर्मराज?

[54:50]

युधिष्ठिर की असमर्थता [संगीत]

[54:52]

के कारण

[54:53]

राजकुमार युधिष्ठिर मेरे मेरे श की रक्षा

[54:56]

कर लीजिए।

[54:57]

मेरा अनुज

[54:59]

मृत्यु की भेंट चढ़ गया।

[55:04]

[संगीत]

[55:06]

जब मुझे सूत पुत्र कहकर

[55:10]

रंगभूमि की स्पर्धा में भाग लेने के लिए

[55:11]

अयोग्य घोषित कर दिया गया था। राजकुमार के

[55:14]

साथ द्वंद की अनुमति एक सूत पुत्र को नहीं

[55:17]

दी जा सकती।

[55:18]

जय सुपुत्र

[55:24]

तब भी धर्मराज का धर्म मौन था। ऐसे में

[55:28]

दुर्योधन ने मेरा हाथ धर्मा

[55:30]

जिसे आप अधर्मी कहते हैं।

[55:34]

आज मैं अंगराज हूं।

[55:37]

परिवर्तन के लिए खड़ा हूं।

[55:40]

[संगीत]

[55:41]

वो केवल दुर्योधन के कारण केशव मैंने कहा

[55:44]

था ना

[55:46]

यदि तुम्हें

[55:48]

तनिक अधिक ज्ञान होता तो तुम उचित निर्णय

[55:52]

ले पाते मित्र

[55:58]

मैं समझा नहीं

[56:01]

तुम सदा स्वयं को सूत पुत्र समझते आए हो

[56:04]

का

[56:06]

और यदि तुम्हारा यह ज्ञान

[56:10]

मिथ्या हुआ तो

[56:12]

मिथ्या

[56:15]

आकर

[56:17]

क्योंकि तुम्हें तो पता ही नहीं कि तुम

[56:20]

वास्तव में हो कौन

[56:24]

मुझे ज्ञात है कि मैं कौन हूं।

[56:27]

और मुझे गर्व है

[56:31]

कि मैं अधिरथ पुत्र करण हूं।

[56:34]

राधे पुत्र करण हूं।

[56:38]

सूत पुत्र करण

[56:44]

तुम राधे नहीं हो अंगराज

[56:48]

तुम अधरथ पुत्र नहीं हो

[56:54]

तुम सूत पुत्र नहीं हो

[57:00]

तुमने कभी यह नहीं सोचा कर्ण

[57:04]

कि एक सूत पुत्र के शरीर को

[57:07]

दिव्य स्वर्ण से मणित

[57:09]

कवच और कुंडल क्यों है?

[57:14]

[संगीत]

[57:16]

तुम्हारे मन में यह प्रश्न कभी नहीं उठा

[57:20]

कि एक साधारण से सारथी के पुत्र के पास ये

[57:24]

कवच और कुंडल क्यों है?

[57:31]

क्या तुम यह सोच कर कभी व्याकुल नहीं होते

[57:34]

कर्ण कि तुम शेष से इतने भिन्न क्यों हो?

[57:40]

तुम

[57:42]

सूर्य पुत्र कर्ण सूर्य पुत्र कर्ण सूर्य

[57:46]

पुत्र कर्ण सूर्य पुत्र

[57:54]

[संगीत]

[58:00]

स्वयं

[58:02]

सूर्य नारायण के अंश हो तुम करण

[58:09]

[संगीत]

[58:15]

यह सत्य है।

[58:18]

मेरे पिता अधीरथ हैं।

[58:23]

और और मेरी माता राधा

[58:26]

सत्य से भागो मत कर

[58:29]

और सत्य यही है [संगीत]

[58:33]

कि अधिरथ तुम्हारे पालक पिता हैं। तुम

[58:36]

उन्हें गंगा किनारे मिले थे। कभी सोचा

[58:39]

नहीं कि क्यों सूर्य का तेज तुम्हारे मुख

[58:44]

मंडल पर रहता है।

[58:48]

कभी अनुभव नहीं किया मित्र कि क्यों सूर्य

[58:51]

का ताप तुम्हारे शरीर पर स्निग्नता का

[58:55]

अनुभव कराता है। तब भी समझ नहीं आया

[58:58]

तुम्हें जब दिग्विजय करते समय पांचाल

[59:02]

युद्ध में क्यों शत्रु पक्ष पर सूर्यदेव

[59:05]

का ताप बरस रहा था। क्योंकि तुम अधीरथ

[59:08]

पुत्र नहीं।

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