शकुनि के कुशब्द | Suryaputra Karn वीडियो के लिए सबटाइटल्स डाउनलोड करें
शकुनि के कुशब्द सुनकर वासुदेव ने दी सजा दुर्योधन के उड़े होश || Suryaputra Karn
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वासुदेव आप तो आप तो सचमुच धन्य हैं।
मुझे मुझे स्मरण नहीं होता कि कितना समय
हो गया ऐसे शांतिपूर्ण वचन सुने हुए।
मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है वासुदेव कि
आपके मुख से शब्द नहीं फूल झड़ रहे हैं।
फूल
मैं अभिभूत हो गया वासुदेव और सच कहूं
वासुदेव मैं भी आपसे सहमत हूं।
मैं भी नहीं चाहता कि ये ये युद्ध हो। ना
श्री ये क्या कह रहे हैं आप?
हां दुर्योधन
वासुदेव बिल्कुल उचित कह रहे हैं।
हमें इस युद्ध को रोकने का पूरा प्रयास
करना चाहिए।
समझ गए? हां हां वासुदेव सबसे श्रेष्ठ
युद्ध वो है जो कभी हो ही नहीं।
और युद्ध की परिस्थिति उत्पन्न ना होने
देने का एक ही उपाय कि एक पक्ष दूसरे पक्ष
पर आक्रमण ना करें।
चलिए ठीक है। हम हम पांडवों पर आक्रमण
नहीं करेंगे। परंतु वासुदेव
द्वारकाधीश क्या आप ये आश्वासन दे सकते
हैं कि पांडव भी हम पर कभी भी आक्रमण नहीं
करेंगे।
कभी भी
गांधार नरेश
आप आक्रमण के संदर्भ में बात कर रहे हैं
और मैं यहां युद्ध की आवश्यकता को ही
समाप्त करने के विषय में बोल रहा हूं।
[हंसी]
अच्छा अच्छा ऐसा है। यदि ऐसा है वासुदेव
तो तो हम आपका प्रस्ताव सुनना चाहेंगे।
हां आप आप शांति दूत हैं तो संदेश तो लाए
ही होंगे
और हां ऊपर से आप शांति प्रस्थापित करना
चाहते हैं तो वासुदेव शांति प्रस्थापित
करने के लिए जिस समाधान [संगीत] की
आवश्यकता होती है वो समाधान भी लाए होंगे
आप है ना
बताइए क्या है इसका
समाधान प्रत्येक युद्ध की नीव में अन्याय
छिपा होता है गांधार
[संगीत]
और अन्याय का केवल एक ही समाधान है और वो
समाधान है न्याय
वो न्याय
जिस पर केवल पांडवों का अधिकार
उनसे किए गए वचनों को ना निभाने का न्याय
उनसे किए गए वचनों को ना पूर्ण करने का
न्याय।
इस भरी सभा में जो अधर्म हुआ,
जो अन्याय हुआ उसके प्रति न्याय।
महाराज धृतराष्ट्र
मैं यहां पांडवों की ओर से उनके साथ जो
अन्याय हुआ
उसका न्याय मांगने आया हूं।
कैसा अन्याय वासुदेव?
वो अन्याय।
जो एक धर्म सभा में एक अधर्म दत माध्यम से
हुआ
वो अन्याय
जो कुरुकुल के जष्ठ जनों के समक्ष
कुलवधू पांचाली के साथ
यदि उस अन्याय का त्राण हो
तो इस महायुद्ध को रोका जा सकता है।
[संगीत]
कुरकुल श्रेष्ठ महाराज धृतराष्ट्र
महामहिम भीष्म मैं पांडवों की ओर से उस
अन्याय के लिए न्याय मांगने आया हूं।
स्मरण रहे महाराज
यदि आपने पांडवों को न्याय नहीं दिया
या तो उसे वह पुण्य से अर्जित कर लेंगे
या फिर
उसे छीन लेंगे।
अब निर्णय आपका है।
वासुदेव
आप
यहां शांति प्रस्ताव लेकर आए हैं या
यहां यहां हमें धमकाने आए हैं?
ओ उस द में जो कुछ भी हुआ
सबकी
उपस्थिति मैं हुआ।
युधिष्ठिर की इच्छा से हुआ।
अरे वो वो हार गया। अपना राज्य हार गया।
वो उसका प्रारब्ध था।
छलबद्ध अन्याय को प्रारब्ध नहीं कहा जा
सकता। युवराज।
जिस प्रकार मंदिर में किया गया पाप पुण्य
नहीं बन जाता। उसी प्रकार धर्मवीरों की
उपस्थिति में सभा में किया गया अधर्म
धर्म नहीं बन जाता।
अरे धर्म अधर्म कौन सा धर्म? कौन सा धर्म?
कोई अधर्म नहीं हुआ।
नारी नारायणी होती है युवराज।
और भरी सभा में एक नारी का एक कुलवधू का
वस्त्र हरण
अधर्म नहीं।
यदि तुम्हें [संगीत] विश्वास नहीं
तो अपने जेष्ठों की
झुकी दृष्टि से पूछो दुर्योधन
उन वस्त्रों से पूछो
जो आपको आपके मन की नग्नता अनुभव कराने के
लिए आपके शरीर से दूर हो गए।
उन प्रतिज्ञाओं से पूछो
जो पांडवों ने अपने प्रातःओं के विनाश के
लिए मांगे।
ये प्रतीक्षा लेता हूं पर यही जंगल तोड़कर
तुम्हारा प्राण ले लूंगा। दुर्योधन
उस श्राप से पूछो जो द्रोपदी ने समस्त
कुरकुल को दिया।
इस सभा में उपस्थित वो हर व्यक्ति जिसने
मौन रहकर यह अधर्म होते हुए देखा
उन्हें उनके मौन रहने का दंड मिलेगा।
श्राप है ये अग्निसुता द्रोपदी का।
परंतु यदि आप सब चाहे तो पांडव अपनी
प्रतिज्ञा को त्याग देंगे।
द्रोपदी अपना श्राप वापस ले लेंगे।
बस
आप सबको अपनी भूल का अनुभव करके पांडवों
को केवल उनका अधिकार देना है।
सबको अपनी भूल का अनुभव करके पांडवों को
केवल उनका अधिकार देना है।
यह कैसा न्याय है वासुदेव?
संधि और शांति वार्ता में बराबर की बात
होती है। एक ओर से बंधन और शर्तें नहीं ला
दी जाती।
न्याय की मांग ना बंधन है।
ना शर्त है महाराज
केवल एक निवेदन है।
यदि ऐसा है तो मेरा निर्णय यह है कि
दुर्योधन
मौन रहो।
निर्णय लेना महाराज के हाथ में है।
तुम्हारे नहीं तुम
शांत रहो।
राजा होने के नाते मेरा कर्तव्य है
कि मैं सबकी बातें सुनूं। ताश्री
अपने मंत्रणाकारों का सम्मान करूं।
दुर्योधन युवराज है। हस्तिनापुर का भवी
महाराज है। इसलिए इस संदर्भ में मैं अपने
पुत्र
और हस्तिनापुर के युवराज दुर्योधन को अपना
निर्णय प्रस्तुत करने की अनुमति देता हूं।
धन्यवाद पिता श्री
हां तो सुनिए बात सुनिए ऐसा है कि कि उस
दूत में पांडव स्वयं
अपना अधिकार हार बैठे थे।
अब ना तो वो किसी भी राज्य का उनको अधिकार
है और ना ही राजा होने का।
[संगीत]
इसीलिए मैं
दुर्योधन
ये घोषणा करता हूं
कि हस्तिनापुर
आपका ये शांति प्रस्ताव
ठुकराता है।
[संगीत]
दुर्योधन
क्या तुम्हें इस बात का अनुमान भी है कि
शांति प्रस्ताव ठुकराने का अर्थ है युद्ध
को निमंत्रण
अपने निर्णय पर पुनः विचार कर लो।
बात बातबात पर विचार करना बंद कीजिए।
पितामह बात पर विचार कायर करते हैं।
योद्धा का जन्म ही
युद्ध के लिए होता है और मैं इस युद्ध के
लिए प्रस्तुत हूं।
मेरी दृष्टि में उन पांडवों को कुछ भी
देने का प्रश्न ही नहीं उठता।
बस
मैंने ये सभा समझौते के लिए रखवाई थी ना
कि अपने अपने ही अधिकार के त्याग के लिए।
ये मेरा अंतिम निर्णय है। मैं उन पांडवों
को
इंद्रप्रस्थ नहीं दूंगा
तो नहीं दूंगा।
मैं उन पांडवों को
इंद्रप्रस्थ नहीं दूंगा
तो नहीं दूंगा।
उचित है दुर्योधन तुम इंद्रप्रस्थ रख सकते
हो।
उसकी सेना भी रख लो, अस्त्र-शस्त्र रख लो,
लाखों गाय, अश्व, उसकी प्रजा भी रख लो।
कोटि-कोटि धन संपत्ति जो कुछ भी पांडवों
ने अपने परिश्रम से अर्जित किया था वो सब
रख लो दुर्योधन।
परंतु इस अन्याय के प्रतिकार स्वरूप
केवल एक कार्य कर
प्रतीक के रूप
पांचों पांडवों को पांच गांव दे दो।
इतना तो दे ही सकते हो दुर्योधन।
पांचों पांडव
वहां सुख से निवास करें।
और कुछ नहीं चाहेंगे।
इस युद्ध को टालने के लिए
केवल पांच गांव
देना स्वीकार है तुम्हें
धर्म लक्षणम
दशकम धर्म लक्षणम
वासुदेव वासुदेव वासुदेव
यदि दुर्योधन पांच गांव दे देता है तो
क्या आप वचन देंगे कि पांडव इंद्रप्रस्थ
[संगीत] की चाह में आक्रमण की चेष्टा नहीं
करेंगे।
हां गांधार नरेश
मैं वचन देता हूं
कि इस स्थिति में
पांडवों की ओर से कोई आक्रमण [संगीत] नहीं
होगा। वो हर परिस्थिति में संतुष्ट
रहेंगे।
हां कह दो दुर्योधन इससे अच्छा प्रस्ताव
कोई नहीं होगा।
महाराज मैं आपसे विनती करता हूं कि यही
अवसर है अंतिम अवसर।
आप इस प्रस्ताव को स्वीकार करके इसको यहीं
रोक दीजिए।
साक्षी का कहना उचित है। पुत्र हां कर दो।
इसी में सबका हित है।
मित्र
मैंने सदा इस युद्ध का पक्ष लिया है।
मैंने सदा अर्जुन से अपना अधूरा द्वंद
पूर्ण करना चाहा।
इस समय
पूरे भारतवर्ष को महाविनाश से बचाने की
आवश्यकता है।
हां कह दो मित्र
तुमने तो एक अनजान का मान रखने के लिए
उसे अंगराज बना दिया।
तो लाखों के प्राणों को बचाने के लिए
पांच गांव दे दो मित्र
देख रहे हैं वासुदेव
मेरे मित्र अंगराज
मेरे साथ है
और आपको तो अच्छे से ज्ञात है कि
कर्ण को अंगराज मैंने बनाया
उसे वो दिया है मैंने जो जो पांडव नहीं दे
पाए
ना पांडव,
ना पितामह।
और यह मेरा वचन है।
यदि मेरा
मेरा मित्र मुझसे प्राण भी मांगेगा
तो वो भी
मैं प्रसन्नता से दे दूंगा।
[संगीत]
परंतु
परंतु ऐसा सोचना भी मत कि मैं उन पांडवों
को कुछ भी देने वाला हूं।
पता है बचपन से मुझे
मुझे यही आभास कराया गया है कि
मेरा
किसी भी वस्तु में
कोई अधिकार नहीं ना अपने पिता के राज्य पर
ना सिंहासन पर जो भी मिले या तो या तो दे
दो या उन उन पांडवों के साथ में बांट लो
[संगीत]
और तुम अधिकार की बात करते हो वासुदेव तो
तो बताओ मुझे
मेरा अधिकार उन उन पांडवों ने मुझे कब
दिया कब
गुरु का प्रेम
महामहिम का वत्सल्य
किसी को मिला तो वो उन पांडवों को मुझे
नहीं
मेरे पिता के राजा होने पर युवराज पद पर
किसी का अधिकार था तो वो वो मिल रहा था
परंतु मुझे मुझे नहीं मिला वो मिला उस उस
युधिष्ठिर को
दुर्योधन की बात तक सम्मत है वासुदेव
युवराज
राजा का पुत्र ही बनता है और यही नीति है
आप तो कभी वास्तविक राजा थे ही नहीं
महाराज
आप तो आज भी हस्तिनापुर के केवल कार्यकारी
नरेश
[संगीत]
आपका का राज्य अभिषेक भी नहीं हुआ। और रही
बात नीति की
तो कुलवधू का वस्त्र हरण उसका अपमान कहां
की नीति है?
पांडवों को पक्ष लेना बंद करो ग्वाले।
मैंने उस उस द्रोपदी को धर्म पूर्वक युद्ध
में जीतकर उसे अपनी दासी बनाया।
उसका वस्त्र हरण करना मेरा अधिकार था।
क्योंकि क्योंकि जो दासी अपने स्वामी की
आज्ञा का पालन ना करे
वो दंड की अधिकारिणी होती है।
नारी केवल सम्मान की अधिकारिणी है।
दुर्योधन।
यूथ बनकर आए हो।
अपना संदेश
दे चुके हो। अब मेरा निर्णय सुनो। मैं उन
पांडवों को बाज का तो क्या? एक सुई की नोक
बराबर धरा भी नहीं दूंगा।
[संगीत]
तुम्हारा संदेश
भलीभांति समझ लिया है युवराज।
अब वही होगा
जो तुम चाहते हो दुर्योधन।
अब महा विनाश होगा।
महायुद्ध होगा महाभारत होगा नाम
प्रणपात [संगीत]
[संगीत]
रुकिए केशव
मित्र
एक बार और विचार कर लो।
हे मित्र राजा बलि की कथा स्मरण है
तुम्हें?
वो मायावी वामन मुझसे मुझे तीन पग मांगने
आया था।
तीन पग
तीन पग भूमि और उस तीन पग में उस
वामन ने ना केवल तीनों लोकनाप लिए
बल्कि इस उस बलि का नाश भी कर दिया।
अरे इस इस चलिया को पांचगांव दे दूंगा तो
तो ये हस्तिनापुर का अस्तित्व ही मिटा
देगा।
पाखंडी कृष्ण
तुम्हारी
मीठीमीठी बातों का प्रभाव इन पर पड़ सकता
है।
दुर्योधन पर नहीं
तो फिर मैं प्रस्थान करता हूं।
मैंने तुम्हें जाने की आज्ञा
[संगीत]
नहीं दी है अभी।
सब तुम्हारी माया से भयभीत हैं। कृष्ण
आज मैं
अपनी प्रजा और अपनी सेना के मन से तेरा भय
मिटा दूंगा। कृष्ण
तुम हस्तिनापुर से बाहर नहीं जाओगे।
मैं
धृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन
तुम्हें अभी
और इसी क्षण
वंदे बनाता हूं वासुदेव।
चलेगा
बंदी बनाओ इस
शरीर को
अपने पुत्र को सीमा में रहने का अर्थ
सिखाइए महाराज।
ये अनर्थ करने जा रहा है।
महामहिम बिल्कुल ठीक कह रहे हैं महाराज।
वासुदेव कृष्ण केवल हस्तिनापुर के संबंधी
नहीं इस समय वे एक शांति दूत हैं। और इस
बात का स्मरण रहे महाराज। एक शांतिदूत के
साथ इस तरह का व्यवहार उचित नहीं है।
आचार्य ठीक कह रहे हैं पुत्र। ऐसा अनर्थ
मत करो।
रावण ने भी यही मूर्खता की थी।
उसने भी दूध का अपमान किया था और उसकी
सोने की लंका जलकर भस्म हो गई। [हंसी]
मित्र
रावण मूर्ख था जो सामान्य रस्सी से हनुमान
को बांधने चला था। परंतु मैंने
मैंने इस विशेष दूत के लिए विशेष धातु की
श्रंखला बनवाई है।
[संगीत]
[संगीत]
कोई कुछ नहीं कहेगा।
मेरा आप सब से निवेदन है कि मेरे और
दुर्योधन के मध्य में ना आए
और साक्षी बने इस क्षण के इसे भान नहीं कि
यह क्या कर रहा है जिसके जन्म के पश्चात
जिसे बंदी ग्रह की बेड़ियां ना बांध सके
सैनिकों का पहरा ना रोक पाया
आज तुम उसे बांधने चले हो दुर्योधन
सामर्थ्य है तुम में तो बढ़ो आगे
हो सके तो साधो मुझे दुर्योधन
अपने इन श्रंखलाओं में बांधने का प्रयास
करो
[संगीत]
हो सके तो साधो मुझे दुर्योधन
अपने इन श्रंखलाओं में बांधने का प्रयास
करो।
[संगीत]
[संगीत]
उठाओ उस तेरे को।
[संगीत]
[संगीत]
[संगीत]
तुम्हें लगता है कि यह धातु श्रृंखला
मुझे बांधने के लिए पर्याप्त है। दुर्योधन
[संगीत]
[संगीत]
श्री कृष्ण गोविंद
हरे मुरारी
नाथ नारायण
[संगीत]
वासुदेवा
[संगीत]
[संगीत]
श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ
नारायण [संगीत]
वासुदेवा श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे
नाथ नारायण वासुदेवा [संगीत]
श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ
[संगीत] नारायण वासुदेवा
[संगीत]
जब तक अनंत आकाश को बांधने में सक्षम
श्रृंखला तुम्हारे पास ना हो तब तक ऐसी
मूर्खता
पुनः करने का प्रयत्न मत करना दुर्योधन।
ये ये ये छल ये माया यही है ना तुम्हारे
अस्त्र छल
परंतु मुझे तुमसे या तुम्हारे इस माया से
डर नहीं लगता
हर लूंगा मैं तुम्हारे और उन पांडवों के
प्राण
स्मरण रखना कि इस महायुद्ध में अंत करेगा
तुम्हारा और उन पांडवों का यह दुर्योधन
जो स्वयं मृत्यु के शिखर से गिरने वाला हो
उसे अपने अंत की चिंता करनी चाहिए मूर्ख
दुर्योधन
जिस सत्य को जिस भविष्य को मैं टालना
चाहता था उसे आज तुमने स्वयं आमंत्रण दे
दिया है
और सत्य यह
कि इस महायुद्ध के अंत में तुम्हारा
तुम्हारे पापों
और तुम्हारे पाप में भागीदार रहे प्रत्येक
का अंत होगा ये अंत होगा
अंत होगा ये अंत होगा अंत होगा
मेरे राज्य में मेरे ही सभा में आके मुझे
ही धमकी देता है छिए
तुम्हारा राज्य
तुम्हारी सभा सभा
इस राजसभा के समक्ष
कितना सा आकार है तुम्हारा दुर्योधन
और हस्तिनापुर के समक्ष कितनी सी है यह
सभा और इस पृथ्वी के सामने कितना सा है
हस्तिनापुर और इस ब्रह्मांड में क्या
स्थान रखती है यह पृथ्वी यदि मनुष्य का
अभिमान और तम उसके आकार से अधिक बड़ा हो
जाए
तो वही मनुष्य को स्वयं अपने बोझ से मार
डालता है और तुम्हारे अंत का कारण भी यही
अभिमान होगा दुर्योधन और तुम्हारा अंत भी
तुम्हारे इसी अभिमान से होगा दुर्योधन
धर्मस्या
भारत [संगीत]
[संगीत]
[संगीत]
[संगीत]
बनाया [संगीत]
[संगीत]
[संगीत]
खड़ा है काल बड़ा
जब नाश मनोज बन जाता है उसका विवेक मर
जाता है नृत्य करवाने को वो स्वयं नाश
बुलवाता है
आ
[हंसी]
ये सब
पितामा
है रे नहीं पा रहे
क्या होता है मैं मैं कहां हूं
मैं
मैं निकाल
[संगीत]
[संगीत]
मैं
मैत्रिका
असंभव है ये।
असंभव है ये।
इसे तुमने ही तो संभव बनाया है दुर्योधन।
महाकाल ब्रह्मांड को दुर्योधन लकारा है
विनाश दुर्योधन महा विनाश आता है नयन में
देख आज महा विनाश की बात ये दुर्योधन जो
आज भी हो ना सका जा
भीषण हुकार किया अपना स्वरूप विस्तार किया
का बोले अब महाविनाश गण बोले
है ये नगर जिसके
वश में जीवन मृत्यु जिसके मन में जिसको
[संगीत] छू ना सके सागर जिसके चरणों में
है जीवन के सारे चंद्र जिसमें सारे
वायु महेश जिसमें से है प्रवेश
इस युद्ध के जन्मदाता तुम ही हो।
ध्यान से देखो इसे।
यह कुरुक्षेत्र है।
ये तुम्हारे अहंकार का परिणाम है।
दुर्योधन।
तुम्हारे छल का निष्कर्ष है ये।
ये तुम्हारे मध का तुम्हारे कर्मों का फल
है दुर्योधन।
ये उस पाप का परिणाम है दुर्योधन। जो भरी
सभा में याज्ञसेनी के साथ हुआ।
ये श्राप का परिणाम है जो पांचाली के धकते
हृदय से निकला।
देखो मूर्ख
मृत्यु तुम्हें पराजित कर चुकी है और तुम
विजय का स्वप्न देख रहे हो।
[संगीत]
[संगीत]
[संगीत]
है ये सब
[संगीत]
माया है
माया नहीं दुर्योधन
तुम्हारे कर्मों की छाया है ये यही
तुम्हारा भविष्य है यही तुम्हारा प्रारब्ध
यही अंत है कुरुवंश का
युद्ध की चाह थी ना तुम्हें महाविनाश
देखने की इच्छा थी तुम्हें
ठीक है
युद्ध मिलेगा तुम्हें
महाविनाश देखोगे तुमसे
पहले भी बहुत अहंकारी है और उनका भी अंत
मैंने इसी प्रकार किया
मनुष्य क्या
मैं तो सौर मंडल का सृजन और विनाश करता
हूं
देखना चाहोगे
तो देखो
[संगीत]
श्री कृष्ण गोविंद
उधर देखो दुर्योधन [संगीत]
हे नाथ नारायण
वासुदेवा [संगीत]
हे कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण
[संगीत]
वासुदेवा
[संगीत]
हो
[संगीत]
आ
[संगीत]
ये ये
क्या हो रहा है?
ये ये [संगीत] सब सब मिथ्या है ये। ये ये
मिथ्या है ये।
मिथ्या तुम्हारा अहंकार है दुर्योधन।
मिथ्या ये सभा है। सत्य तो वो है जो तुम
कभी समझ ही नहीं पाए।
वो सत्य
जो मैंने अभी तुम्हें दिखाया। [संगीत]
[संगीत]
सत्य केवल मैं हूं दुर्योधन।
शेष सब मिथ्या। ये ये सब माया है। तुम
साधारण मनुष्य हो तो और कुछ नहीं हो।
आश्चर्य है।
परंतु इसमें तुम्हारा क्या दोष?
[संगीत] जब मनुष्य में अहंकार
तो वो सत्य केवल आकार से पहचानता है।
तो आकार देखो दुर्योधन।
[संगीत]
धर्मस्या
[संगीत]
आत्मा से जा
[संगीत]
[संगीत]
[संगीत]
[संगीत]
मैंने शांति दी दुर्योधन और तुमने स्वीकार
नहीं की।
मैंने मैत्री दी।
परंतु अपने अहंकार के आगे तुम्हें मैत्री
का मूल्य समझ नहीं आया।
मैं प्रेम लाया था
परंतु तुमने युद्ध मांगा दुर्योधन तो सुनो
अब युद्ध होगा।
मैं जीवन का संदेश लाया था। तुमने मृत्यु
का विकल्प चुना। तुम्हें मृत्यु दूंगा।
तुम्हें अनुमान नहीं दुर्योधन कि यह युद्ध
कितना भयंकर होगा।
महासंहार होगा।
पापियों के प्रत्येक भागीदार का अंत होगा
यह महाभारत।
श्री कृष्ण गोविंद [संगीत]
हरे मुरारी
हे नाथ नारायण
वासुदेवा [संगीत]
हे नाथ नारायण [संगीत]
वासुदेवा श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे
नाथ नारायण वासुदेवा [संगीत] श्री कृष्ण
गोविंद हरे मुरारी
बाण संधान करो बाल मुक्त करो राधे को हरे
हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा श्री
कृष्ण गोविंद [संगीत]
हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा
[संगीत]
सभा में इतनी शांति क्यों है?
कोई बताएगा मुझे आखिर हो क्या रहा है?
सत्य देखने के लिए तन की दृष्टि की नहीं
मन की दृष्टि की आवश्यकता होती है
धृतराष्ट्र।
नियति ने तुम्हें दृष्टि नहीं परंतु आज इस
क्षण के लिए मैं तुम्हें दृष्टि देता हूं।
कदाचित तन की दृष्टि से देखकर तुम मन की
दृष्टि का सत्य समझ पाओ धृतराष्ट्र।
आ
[संगीत]
नहीं चाहिए ये दृष्टि मुझे वापस ले लो ये
ये क्या अनर दिखा दिया मुझे वासुदेव
ले लो वापस ले हो [संगीत]
[संगीत]
जो सबने देखा
वही अंत है और वही नया प्रारंभ
परंतु यह
आप सबको स्मरण तब होगा जब यह वास्तविक में
आप सबके साथ घटित हो
[संगीत]
श्री कृष्ण [संगीत] गोविंद
हरे मुरारी
हे नाथ नारायण [संगीत]
वासुदेवा
श्री कृष्ण गोविंद
हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा
[संगीत]
मैं
वासुदेव
इस महा युद्ध
इस महाभारत की घोषणा करता हूं।
धर्मस्याती
[संगीत]
स्मरण रखना तुर्य
तुम्हारे इस अभिमान के साथ-साथ
तुम भी इस धरा पर ऐसे गिरोगे कि कभी उठ
नहीं पाओगे।
इस महाहिंसा
इस महाविनाश के उत्तरदायित्व का बोझ
तुम अपने साथ दूसरे लोक लेकर जाओगे तो
योद्धा
[संगीत] नारायणिता
[संगीत]
[संगीत]
[संगीत]
[संगीत]
[संगीत]
[संगीत]
केशव
[संगीत]
[संगीत]
मुझे सदा से भान था
कि आप साधारण मनुष्य नहीं है।
[संगीत]
परंतु आज जो मैंने देखा
उसके पश्चात
[संगीत]
मेरे साथ आओ मित्र।
ये स्थान अब वार्ता करने के लिए उचित नहीं
रहा।
यहां शब्दों का कोई मोल नहीं।
यहां शब्द केवल सुने जाते।
समझे [संगीत] नहीं जाते।
आओ मेरे साथ।
[संगीत]
केशव
[संगीत]
शांति [संगीत]
न्याय
एक बार आप मेरे सारथी बने थे [संगीत]
आज एक और मुझे दीजिए केशव
बुद्धि
कर
प्रीति में
तुम्हें सारथी के रूप में पाकर
गौरवान्वित तो मैं हो जाऊंगा मित्र
कृष्णा कहो या [संगीत]
कर्ण कहो है दोनों
एक [संगीत] समान
कृष्णा कहो या कर्ण [संगीत]
कहो है दोनों
एक समान
या
तो मित्र जो कुछ भी तुम्हारे मन में
आप ही पढ़ [संगीत] लीजिए ना केशव
क्या है मेरे मन में
मैं तुम्हारा मन पढ़ सकता हूं मित्र परंतु
जैसे कि मैंने पहले भी कहा था मुझे
तुम्हारे मुख से सुनना अच्छा लगता है
अब कह भी दो मिन
क्या है तुम्हारे मन में? इस समय जो मेरे
मन में चल रहा है
वो ये है कि
आपने मुझे पांडवों के पक्ष में आने का
प्रस्ताव दिया था।
हां।
और तुमने उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया
था।
हां।
परंतु मैंने कभी नहीं सोचा था।
कि मेरा यह निर्णय
मुझे आपके विपक्ष में खड़ा कर देगा। केशव
आपको तो युद्ध का परिणाम पता है ना केशव
किसी अनहोनी के होने से पहले
उसका ज्ञात हो जाता।
क्या वो आपको पीड़ा नहीं देता केशव।
मनुष्य संतोष से इसलिए जीता है
क्योंकि वो नहीं जानता कि अगले पल क्या
होने वाला है।
वो नहीं जानता
कि वो जीवित [संगीत] रहेगा या वो मर
जाएगा।
परंतु यदि
उसे ज्ञात हो जाए
कि अगले पल क्या [संगीत] होगा
या वो कब मर जाएगा तो आपको नहीं लगता कि
उसके आने वाले पल
भय और चिंता [संगीत] में बीतेंगे।
यह सोच पर निर्भर करता है अंगराज। यदि
मनुष्य को अपना अंत ज्ञात हो तो हर वो
क्षण जिसे [संगीत] हम व्यर्थ करते हैं
उन क्षणों को जिया भी जा सकता है। इस नदी
[संगीत] को देख रहे हो इस बहती नदी को पता
है कि अंततः इसे सागर में जाकर मिल जाना
अधिक ज्ञान पीड़ादाई नहीं होता। मित्र
अधिक ज्ञान उचित निर्णय लेने में सहायता
करता है। यदि तुम्हें भी भूत और भविष्य का
कुछ [संगीत] अधिक ज्ञान होता तो कदाचित
तुम भी अधिक न्याय पूर्वक निर्णय कर पाते।
आपका मंतव्य यही है ना
कि पांडव उचित है और दुर्योधन अनुचित
क्षमा कीजिएगा।
परंतु मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूं।
मुझे लगता है केशव
ये दोनों अपने-अपने स्थान पर दोषी हैं।
[संगीत]
और इसी कारण से
दोनों अपनी-अपनी [संगीत] दृष्टि में
निर्दोष और सही है।
यदि दोनों ही दोषी
तो तुम निष्पक्ष क्यों नहीं हो जाते
मित्र?
क्योंकि मुझे लगता है कि दुर्योधन
युधिष्ठिर से कहीं अधिक सक्षम शासक सिद्ध
होगा।
इतने अधर्म करने के पश्चात भी
हां
क्योंकि वो युधिष्ठिर की भांति धर्मराज
होने का ढोंग नहीं करता। आप ही बताइए
[संगीत] केशव कि जिसने स्वयं की पत्नी को
दांव पर लगा दिया हो।
जिसने युद्ध के कुचक्र से निकल कर
स्वयं को युद्ध में फिर से फंसा लिया हो।
वो कैसा धर्मराज?
युधिष्ठिर की असमर्थता [संगीत]
के कारण
राजकुमार युधिष्ठिर मेरे मेरे श की रक्षा
कर लीजिए।
मेरा अनुज
मृत्यु की भेंट चढ़ गया।
[संगीत]
जब मुझे सूत पुत्र कहकर
रंगभूमि की स्पर्धा में भाग लेने के लिए
अयोग्य घोषित कर दिया गया था। राजकुमार के
साथ द्वंद की अनुमति एक सूत पुत्र को नहीं
दी जा सकती।
जय सुपुत्र
तब भी धर्मराज का धर्म मौन था। ऐसे में
दुर्योधन ने मेरा हाथ धर्मा
जिसे आप अधर्मी कहते हैं।
आज मैं अंगराज हूं।
परिवर्तन के लिए खड़ा हूं।
[संगीत]
वो केवल दुर्योधन के कारण केशव मैंने कहा
था ना
यदि तुम्हें
तनिक अधिक ज्ञान होता तो तुम उचित निर्णय
ले पाते मित्र
मैं समझा नहीं
तुम सदा स्वयं को सूत पुत्र समझते आए हो
का
और यदि तुम्हारा यह ज्ञान
मिथ्या हुआ तो
मिथ्या
आकर
क्योंकि तुम्हें तो पता ही नहीं कि तुम
वास्तव में हो कौन
मुझे ज्ञात है कि मैं कौन हूं।
और मुझे गर्व है
कि मैं अधिरथ पुत्र करण हूं।
राधे पुत्र करण हूं।
सूत पुत्र करण
तुम राधे नहीं हो अंगराज
तुम अधरथ पुत्र नहीं हो
तुम सूत पुत्र नहीं हो
तुमने कभी यह नहीं सोचा कर्ण
कि एक सूत पुत्र के शरीर को
दिव्य स्वर्ण से मणित
कवच और कुंडल क्यों है?
[संगीत]
तुम्हारे मन में यह प्रश्न कभी नहीं उठा
कि एक साधारण से सारथी के पुत्र के पास ये
कवच और कुंडल क्यों है?
क्या तुम यह सोच कर कभी व्याकुल नहीं होते
कर्ण कि तुम शेष से इतने भिन्न क्यों हो?
तुम
सूर्य पुत्र कर्ण सूर्य पुत्र कर्ण सूर्य
पुत्र कर्ण सूर्य पुत्र
[संगीत]
स्वयं
सूर्य नारायण के अंश हो तुम करण
[संगीत]
यह सत्य है।
मेरे पिता अधीरथ हैं।
और और मेरी माता राधा
सत्य से भागो मत कर
और सत्य यही है [संगीत]
कि अधिरथ तुम्हारे पालक पिता हैं। तुम
उन्हें गंगा किनारे मिले थे। कभी सोचा
नहीं कि क्यों सूर्य का तेज तुम्हारे मुख
मंडल पर रहता है।
कभी अनुभव नहीं किया मित्र कि क्यों सूर्य
का ताप तुम्हारे शरीर पर स्निग्नता का
अनुभव कराता है। तब भी समझ नहीं आया
तुम्हें जब दिग्विजय करते समय पांचाल
युद्ध में क्यों शत्रु पक्ष पर सूर्यदेव
का ताप बरस रहा था। क्योंकि तुम अधीरथ
पुत्र नहीं।
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वासुदेव आप तो आप तो सचमुच धन्य हैं। मुझे मुझे स्मरण नहीं होता कि कितना समय हो गया ऐसे शांतिपूर्ण वचन सुने हुए। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है वासुदेव कि आपके मुख से शब्द नहीं फूल झड़ रहे हैं। फूल मैं अभिभूत हो गया वासुदेव और सच कहूं वासुदेव मैं भी आपसे सहमत हूं। मैं भी नहीं चाहता कि ये ये युद्ध हो। ना श्री ये क्या कह रहे हैं आप? हां दुर्योधन वासुदेव बिल्कुल उचित कह रहे हैं। हमें इस युद्ध को रोकने का पूरा प्रयास करना चाहिए। समझ गए? हां हां वासुदेव सबसे श्रेष्ठ युद्ध वो है जो कभी हो ही नहीं। और युद्ध की परिस्थिति उत्पन्न ना होने देने का एक ही उपाय कि एक पक्ष दूसरे पक्ष पर आक्रमण ना करें। चलिए ठीक है। हम हम पांडवों पर आक्रमण नहीं करेंगे। परंतु वासुदेव द्वारकाधीश क्या आप ये आश्वासन दे सकते हैं कि पांडव भी हम पर कभी भी आक्रमण नहीं करेंगे। कभी भी गांधार नरेश आप आक्रमण के संदर्भ में बात कर रहे हैं और मैं यहां युद्ध की आवश्यकता को ही समाप्त करने के विषय में बोल रहा हूं। [हंसी] अच्छा अच्छा ऐसा है। यदि ऐसा है वासुदेव तो तो हम आपका प्रस्ताव सुनना चाहेंगे। हां आप आप शांति दूत हैं तो संदेश तो लाए ही होंगे और हां ऊपर से आप शांति प्रस्थापित करना चाहते हैं तो वासुदेव शांति प्रस्थापित करने के लिए जिस समाधान [संगीत] की आवश्यकता होती है वो समाधान भी लाए होंगे आप है ना बताइए क्या है इसका समाधान प्रत्येक युद्ध की नीव में अन्याय छिपा होता है गांधार [संगीत] और अन्याय का केवल एक ही समाधान है और वो समाधान है न्याय वो न्याय जिस पर केवल पांडवों का अधिकार उनसे किए गए वचनों को ना निभाने का न्याय उनसे किए गए वचनों को ना पूर्ण करने का न्याय। इस भरी सभा में जो अधर्म हुआ, जो अन्याय हुआ उसके प्रति न्याय। महाराज धृतराष्ट्र मैं यहां पांडवों की ओर से उनके साथ जो अन्याय हुआ उसका न्याय मांगने आया हूं। कैसा अन्याय वासुदेव? वो अन्याय। जो एक धर्म सभा में एक अधर्म दत माध्यम से हुआ वो अन्याय जो कुरुकुल के जष्ठ जनों के समक्ष कुलवधू पांचाली के साथ यदि उस अन्याय का त्राण हो तो इस महायुद्ध को रोका जा सकता है। [संगीत] कुरकुल श्रेष्ठ महाराज धृतराष्ट्र महामहिम भीष्म मैं पांडवों की ओर से उस अन्याय के लिए न्याय मांगने आया हूं। स्मरण रहे महाराज यदि आपने पांडवों को न्याय नहीं दिया या तो उसे वह पुण्य से अर्जित कर लेंगे या फिर उसे छीन लेंगे। अब निर्णय आपका है। वासुदेव आप यहां शांति प्रस्ताव लेकर आए हैं या यहां यहां हमें धमकाने आए हैं? ओ उस द में जो कुछ भी हुआ सबकी उपस्थिति मैं हुआ। युधिष्ठिर की इच्छा से हुआ। अरे वो वो हार गया। अपना राज्य हार गया। वो उसका प्रारब्ध था। छलबद्ध अन्याय को प्रारब्ध नहीं कहा जा सकता। युवराज। जिस प्रकार मंदिर में किया गया पाप पुण्य नहीं बन जाता। उसी प्रकार धर्मवीरों की उपस्थिति में सभा में किया गया अधर्म धर्म नहीं बन जाता। अरे धर्म अधर्म कौन सा धर्म? कौन सा धर्म? कोई अधर्म नहीं हुआ। नारी नारायणी होती है युवराज। और भरी सभा में एक नारी का एक कुलवधू का वस्त्र हरण अधर्म नहीं। यदि तुम्हें [संगीत] विश्वास नहीं तो अपने जेष्ठों की झुकी दृष्टि से पूछो दुर्योधन उन वस्त्रों से पूछो जो आपको आपके मन की नग्नता अनुभव कराने के लिए आपके शरीर से दूर हो गए। उन प्रतिज्ञाओं से पूछो जो पांडवों ने अपने प्रातःओं के विनाश के लिए मांगे। ये प्रतीक्षा लेता हूं पर यही जंगल तोड़कर तुम्हारा प्राण ले लूंगा। दुर्योधन उस श्राप से पूछो जो द्रोपदी ने समस्त कुरकुल को दिया। इस सभा में उपस्थित वो हर व्यक्ति जिसने मौन रहकर यह अधर्म होते हुए देखा उन्हें उनके मौन रहने का दंड मिलेगा। श्राप है ये अग्निसुता द्रोपदी का। परंतु यदि आप सब चाहे तो पांडव अपनी प्रतिज्ञा को त्याग देंगे। द्रोपदी अपना श्राप वापस ले लेंगे। बस आप सबको अपनी भूल का अनुभव करके पांडवों को केवल उनका अधिकार देना है। सबको अपनी भूल का अनुभव करके पांडवों को केवल उनका अधिकार देना है। यह कैसा न्याय है वासुदेव? संधि और शांति वार्ता में बराबर की बात होती है। एक ओर से बंधन और शर्तें नहीं ला दी जाती। न्याय की मांग ना बंधन है। ना शर्त है महाराज केवल एक निवेदन है। यदि ऐसा है तो मेरा निर्णय यह है कि दुर्योधन मौन रहो। निर्णय लेना महाराज के हाथ में है। तुम्हारे नहीं तुम शांत रहो। राजा होने के नाते मेरा कर्तव्य है कि मैं सबकी बातें सुनूं। ताश्री अपने मंत्रणाकारों का सम्मान करूं। दुर्योधन युवराज है। हस्तिनापुर का भवी महाराज है। इसलिए इस संदर्भ में मैं अपने पुत्र और हस्तिनापुर के युवराज दुर्योधन को अपना निर्णय प्रस्तुत करने की अनुमति देता हूं। धन्यवाद पिता श्री हां तो सुनिए बात सुनिए ऐसा है कि कि उस दूत में पांडव स्वयं अपना अधिकार हार बैठे थे। अब ना तो वो किसी भी राज्य का उनको अधिकार है और ना ही राजा होने का। [संगीत] इसीलिए मैं दुर्योधन ये घोषणा करता हूं कि हस्तिनापुर आपका ये शांति प्रस्ताव ठुकराता है। [संगीत] दुर्योधन क्या तुम्हें इस बात का अनुमान भी है कि शांति प्रस्ताव ठुकराने का अर्थ है युद्ध को निमंत्रण अपने निर्णय पर पुनः विचार कर लो। बात बातबात पर विचार करना बंद कीजिए। पितामह बात पर विचार कायर करते हैं। योद्धा का जन्म ही युद्ध के लिए होता है और मैं इस युद्ध के लिए प्रस्तुत हूं। मेरी दृष्टि में उन पांडवों को कुछ भी देने का प्रश्न ही नहीं उठता। बस मैंने ये सभा समझौते के लिए रखवाई थी ना कि अपने अपने ही अधिकार के त्याग के लिए। ये मेरा अंतिम निर्णय है। मैं उन पांडवों को इंद्रप्रस्थ नहीं दूंगा तो नहीं दूंगा। मैं उन पांडवों को इंद्रप्रस्थ नहीं दूंगा तो नहीं दूंगा। उचित है दुर्योधन तुम इंद्रप्रस्थ रख सकते हो। उसकी सेना भी रख लो, अस्त्र-शस्त्र रख लो, लाखों गाय, अश्व, उसकी प्रजा भी रख लो। कोटि-कोटि धन संपत्ति जो कुछ भी पांडवों ने अपने परिश्रम से अर्जित किया था वो सब रख लो दुर्योधन। परंतु इस अन्याय के प्रतिकार स्वरूप केवल एक कार्य कर प्रतीक के रूप पांचों पांडवों को पांच गांव दे दो। इतना तो दे ही सकते हो दुर्योधन। पांचों पांडव वहां सुख से निवास करें। और कुछ नहीं चाहेंगे। इस युद्ध को टालने के लिए केवल पांच गांव देना स्वीकार है तुम्हें धर्म लक्षणम दशकम धर्म लक्षणम वासुदेव वासुदेव वासुदेव यदि दुर्योधन पांच गांव दे देता है तो क्या आप वचन देंगे कि पांडव इंद्रप्रस्थ [संगीत] की चाह में आक्रमण की चेष्टा नहीं करेंगे। हां गांधार नरेश मैं वचन देता हूं कि इस स्थिति में पांडवों की ओर से कोई आक्रमण [संगीत] नहीं होगा। वो हर परिस्थिति में संतुष्ट रहेंगे। हां कह दो दुर्योधन इससे अच्छा प्रस्ताव कोई नहीं होगा। महाराज मैं आपसे विनती करता हूं कि यही अवसर है अंतिम अवसर। आप इस प्रस्ताव को स्वीकार करके इसको यहीं रोक दीजिए। साक्षी का कहना उचित है। पुत्र हां कर दो। इसी में सबका हित है। मित्र मैंने सदा इस युद्ध का पक्ष लिया है। मैंने सदा अर्जुन से अपना अधूरा द्वंद पूर्ण करना चाहा। इस समय पूरे भारतवर्ष को महाविनाश से बचाने की आवश्यकता है। हां कह दो मित्र तुमने तो एक अनजान का मान रखने के लिए उसे अंगराज बना दिया। तो लाखों के प्राणों को बचाने के लिए पांच गांव दे दो मित्र देख रहे हैं वासुदेव मेरे मित्र अंगराज मेरे साथ है और आपको तो अच्छे से ज्ञात है कि कर्ण को अंगराज मैंने बनाया उसे वो दिया है मैंने जो जो पांडव नहीं दे पाए ना पांडव, ना पितामह। और यह मेरा वचन है। यदि मेरा मेरा मित्र मुझसे प्राण भी मांगेगा तो वो भी मैं प्रसन्नता से दे दूंगा। [संगीत] परंतु परंतु ऐसा सोचना भी मत कि मैं उन पांडवों को कुछ भी देने वाला हूं। पता है बचपन से मुझे मुझे यही आभास कराया गया है कि मेरा किसी भी वस्तु में कोई अधिकार नहीं ना अपने पिता के राज्य पर ना सिंहासन पर जो भी मिले या तो या तो दे दो या उन उन पांडवों के साथ में बांट लो [संगीत] और तुम अधिकार की बात करते हो वासुदेव तो तो बताओ मुझे मेरा अधिकार उन उन पांडवों ने मुझे कब दिया कब गुरु का प्रेम महामहिम का वत्सल्य किसी को मिला तो वो उन पांडवों को मुझे नहीं मेरे पिता के राजा होने पर युवराज पद पर किसी का अधिकार था तो वो वो मिल रहा था परंतु मुझे मुझे नहीं मिला वो मिला उस उस युधिष्ठिर को दुर्योधन की बात तक सम्मत है वासुदेव युवराज राजा का पुत्र ही बनता है और यही नीति है आप तो कभी वास्तविक राजा थे ही नहीं महाराज आप तो आज भी हस्तिनापुर के केवल कार्यकारी नरेश [संगीत] आपका का राज्य अभिषेक भी नहीं हुआ। और रही बात नीति की तो कुलवधू का वस्त्र हरण उसका अपमान कहां की नीति है? पांडवों को पक्ष लेना बंद करो ग्वाले। मैंने उस उस द्रोपदी को धर्म पूर्वक युद्ध में जीतकर उसे अपनी दासी बनाया। उसका वस्त्र हरण करना मेरा अधिकार था। क्योंकि क्योंकि जो दासी अपने स्वामी की आज्ञा का पालन ना करे वो दंड की अधिकारिणी होती है। नारी केवल सम्मान की अधिकारिणी है। दुर्योधन। यूथ बनकर आए हो। अपना संदेश दे चुके हो। अब मेरा निर्णय सुनो। मैं उन पांडवों को बाज का तो क्या? एक सुई की नोक बराबर धरा भी नहीं दूंगा। [संगीत] तुम्हारा संदेश भलीभांति समझ लिया है युवराज। अब वही होगा जो तुम चाहते हो दुर्योधन। अब महा विनाश होगा। महायुद्ध होगा महाभारत होगा नाम प्रणपात [संगीत] [संगीत] रुकिए केशव मित्र एक बार और विचार कर लो। हे मित्र राजा बलि की कथा स्मरण है तुम्हें? वो मायावी वामन मुझसे मुझे तीन पग मांगने आया था। तीन पग तीन पग भूमि और उस तीन पग में उस वामन ने ना केवल तीनों लोकनाप लिए बल्कि इस उस बलि का नाश भी कर दिया। अरे इस इस चलिया को पांचगांव दे दूंगा तो तो ये हस्तिनापुर का अस्तित्व ही मिटा देगा। पाखंडी कृष्ण तुम्हारी मीठीमीठी बातों का प्रभाव इन पर पड़ सकता है। दुर्योधन पर नहीं तो फिर मैं प्रस्थान करता हूं। मैंने तुम्हें जाने की आज्ञा [संगीत] नहीं दी है अभी। सब तुम्हारी माया से भयभीत हैं। कृष्ण आज मैं अपनी प्रजा और अपनी सेना के मन से तेरा भय मिटा दूंगा। कृष्ण तुम हस्तिनापुर से बाहर नहीं जाओगे। मैं धृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन तुम्हें अभी और इसी क्षण वंदे बनाता हूं वासुदेव। चलेगा बंदी बनाओ इस शरीर को अपने पुत्र को सीमा में रहने का अर्थ सिखाइए महाराज। ये अनर्थ करने जा रहा है। महामहिम बिल्कुल ठीक कह रहे हैं महाराज। वासुदेव कृष्ण केवल हस्तिनापुर के संबंधी नहीं इस समय वे एक शांति दूत हैं। और इस बात का स्मरण रहे महाराज। एक शांतिदूत के साथ इस तरह का व्यवहार उचित नहीं है। आचार्य ठीक कह रहे हैं पुत्र। ऐसा अनर्थ मत करो। रावण ने भी यही मूर्खता की थी। उसने भी दूध का अपमान किया था और उसकी सोने की लंका जलकर भस्म हो गई। [हंसी] मित्र रावण मूर्ख था जो सामान्य रस्सी से हनुमान को बांधने चला था। परंतु मैंने मैंने इस विशेष दूत के लिए विशेष धातु की श्रंखला बनवाई है। [संगीत] [संगीत] कोई कुछ नहीं कहेगा। मेरा आप सब से निवेदन है कि मेरे और दुर्योधन के मध्य में ना आए और साक्षी बने इस क्षण के इसे भान नहीं कि यह क्या कर रहा है जिसके जन्म के पश्चात जिसे बंदी ग्रह की बेड़ियां ना बांध सके सैनिकों का पहरा ना रोक पाया आज तुम उसे बांधने चले हो दुर्योधन सामर्थ्य है तुम में तो बढ़ो आगे हो सके तो साधो मुझे दुर्योधन अपने इन श्रंखलाओं में बांधने का प्रयास करो [संगीत] हो सके तो साधो मुझे दुर्योधन अपने इन श्रंखलाओं में बांधने का प्रयास करो। [संगीत] [संगीत] उठाओ उस तेरे को। [संगीत] [संगीत] [संगीत] तुम्हें लगता है कि यह धातु श्रृंखला मुझे बांधने के लिए पर्याप्त है। दुर्योधन [संगीत] [संगीत] श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी नाथ नारायण [संगीत] वासुदेवा [संगीत] [संगीत] श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण [संगीत] वासुदेवा श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा [संगीत] श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ [संगीत] नारायण वासुदेवा [संगीत] जब तक अनंत आकाश को बांधने में सक्षम श्रृंखला तुम्हारे पास ना हो तब तक ऐसी मूर्खता पुनः करने का प्रयत्न मत करना दुर्योधन। ये ये ये छल ये माया यही है ना तुम्हारे अस्त्र छल परंतु मुझे तुमसे या तुम्हारे इस माया से डर नहीं लगता हर लूंगा मैं तुम्हारे और उन पांडवों के प्राण स्मरण रखना कि इस महायुद्ध में अंत करेगा तुम्हारा और उन पांडवों का यह दुर्योधन जो स्वयं मृत्यु के शिखर से गिरने वाला हो उसे अपने अंत की चिंता करनी चाहिए मूर्ख दुर्योधन जिस सत्य को जिस भविष्य को मैं टालना चाहता था उसे आज तुमने स्वयं आमंत्रण दे दिया है और सत्य यह कि इस महायुद्ध के अंत में तुम्हारा तुम्हारे पापों और तुम्हारे पाप में भागीदार रहे प्रत्येक का अंत होगा ये अंत होगा अंत होगा ये अंत होगा अंत होगा मेरे राज्य में मेरे ही सभा में आके मुझे ही धमकी देता है छिए तुम्हारा राज्य तुम्हारी सभा सभा इस राजसभा के समक्ष कितना सा आकार है तुम्हारा दुर्योधन और हस्तिनापुर के समक्ष कितनी सी है यह सभा और इस पृथ्वी के सामने कितना सा है हस्तिनापुर और इस ब्रह्मांड में क्या स्थान रखती है यह पृथ्वी यदि मनुष्य का अभिमान और तम उसके आकार से अधिक बड़ा हो जाए तो वही मनुष्य को स्वयं अपने बोझ से मार डालता है और तुम्हारे अंत का कारण भी यही अभिमान होगा दुर्योधन और तुम्हारा अंत भी तुम्हारे इसी अभिमान से होगा दुर्योधन धर्मस्या भारत [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] बनाया [संगीत] [संगीत] [संगीत] खड़ा है काल बड़ा जब नाश मनोज बन जाता है उसका विवेक मर जाता है नृत्य करवाने को वो स्वयं नाश बुलवाता है आ [हंसी] ये सब पितामा है रे नहीं पा रहे क्या होता है मैं मैं कहां हूं मैं मैं निकाल [संगीत] [संगीत] मैं मैत्रिका असंभव है ये। असंभव है ये। इसे तुमने ही तो संभव बनाया है दुर्योधन। महाकाल ब्रह्मांड को दुर्योधन लकारा है विनाश दुर्योधन महा विनाश आता है नयन में देख आज महा विनाश की बात ये दुर्योधन जो आज भी हो ना सका जा भीषण हुकार किया अपना स्वरूप विस्तार किया का बोले अब महाविनाश गण बोले है ये नगर जिसके वश में जीवन मृत्यु जिसके मन में जिसको [संगीत] छू ना सके सागर जिसके चरणों में है जीवन के सारे चंद्र जिसमें सारे वायु महेश जिसमें से है प्रवेश इस युद्ध के जन्मदाता तुम ही हो। ध्यान से देखो इसे। यह कुरुक्षेत्र है। ये तुम्हारे अहंकार का परिणाम है। दुर्योधन। तुम्हारे छल का निष्कर्ष है ये। ये तुम्हारे मध का तुम्हारे कर्मों का फल है दुर्योधन। ये उस पाप का परिणाम है दुर्योधन। जो भरी सभा में याज्ञसेनी के साथ हुआ। ये श्राप का परिणाम है जो पांचाली के धकते हृदय से निकला। देखो मूर्ख मृत्यु तुम्हें पराजित कर चुकी है और तुम विजय का स्वप्न देख रहे हो। [संगीत] [संगीत] [संगीत] है ये सब [संगीत] माया है माया नहीं दुर्योधन तुम्हारे कर्मों की छाया है ये यही तुम्हारा भविष्य है यही तुम्हारा प्रारब्ध यही अंत है कुरुवंश का युद्ध की चाह थी ना तुम्हें महाविनाश देखने की इच्छा थी तुम्हें ठीक है युद्ध मिलेगा तुम्हें महाविनाश देखोगे तुमसे पहले भी बहुत अहंकारी है और उनका भी अंत मैंने इसी प्रकार किया मनुष्य क्या मैं तो सौर मंडल का सृजन और विनाश करता हूं देखना चाहोगे तो देखो [संगीत] श्री कृष्ण गोविंद उधर देखो दुर्योधन [संगीत] हे नाथ नारायण वासुदेवा [संगीत] हे कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण [संगीत] वासुदेवा [संगीत] हो [संगीत] आ [संगीत] ये ये क्या हो रहा है? ये ये [संगीत] सब सब मिथ्या है ये। ये ये मिथ्या है ये। मिथ्या तुम्हारा अहंकार है दुर्योधन। मिथ्या ये सभा है। सत्य तो वो है जो तुम कभी समझ ही नहीं पाए। वो सत्य जो मैंने अभी तुम्हें दिखाया। [संगीत] [संगीत] सत्य केवल मैं हूं दुर्योधन। शेष सब मिथ्या। ये ये सब माया है। तुम साधारण मनुष्य हो तो और कुछ नहीं हो। आश्चर्य है। परंतु इसमें तुम्हारा क्या दोष? [संगीत] जब मनुष्य में अहंकार तो वो सत्य केवल आकार से पहचानता है। तो आकार देखो दुर्योधन। [संगीत] धर्मस्या [संगीत] आत्मा से जा [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] मैंने शांति दी दुर्योधन और तुमने स्वीकार नहीं की। मैंने मैत्री दी। परंतु अपने अहंकार के आगे तुम्हें मैत्री का मूल्य समझ नहीं आया। मैं प्रेम लाया था परंतु तुमने युद्ध मांगा दुर्योधन तो सुनो अब युद्ध होगा। मैं जीवन का संदेश लाया था। तुमने मृत्यु का विकल्प चुना। तुम्हें मृत्यु दूंगा। तुम्हें अनुमान नहीं दुर्योधन कि यह युद्ध कितना भयंकर होगा। महासंहार होगा। पापियों के प्रत्येक भागीदार का अंत होगा यह महाभारत। श्री कृष्ण गोविंद [संगीत] हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा [संगीत] हे नाथ नारायण [संगीत] वासुदेवा श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा [संगीत] श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी बाण संधान करो बाल मुक्त करो राधे को हरे हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा श्री कृष्ण गोविंद [संगीत] हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा [संगीत] सभा में इतनी शांति क्यों है? कोई बताएगा मुझे आखिर हो क्या रहा है? सत्य देखने के लिए तन की दृष्टि की नहीं मन की दृष्टि की आवश्यकता होती है धृतराष्ट्र। नियति ने तुम्हें दृष्टि नहीं परंतु आज इस क्षण के लिए मैं तुम्हें दृष्टि देता हूं। कदाचित तन की दृष्टि से देखकर तुम मन की दृष्टि का सत्य समझ पाओ धृतराष्ट्र। आ [संगीत] नहीं चाहिए ये दृष्टि मुझे वापस ले लो ये ये क्या अनर दिखा दिया मुझे वासुदेव ले लो वापस ले हो [संगीत] [संगीत] जो सबने देखा वही अंत है और वही नया प्रारंभ परंतु यह आप सबको स्मरण तब होगा जब यह वास्तविक में आप सबके साथ घटित हो [संगीत] श्री कृष्ण [संगीत] गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण [संगीत] वासुदेवा श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा [संगीत] मैं वासुदेव इस महा युद्ध इस महाभारत की घोषणा करता हूं। धर्मस्याती [संगीत] स्मरण रखना तुर्य तुम्हारे इस अभिमान के साथ-साथ तुम भी इस धरा पर ऐसे गिरोगे कि कभी उठ नहीं पाओगे। इस महाहिंसा इस महाविनाश के उत्तरदायित्व का बोझ तुम अपने साथ दूसरे लोक लेकर जाओगे तो योद्धा [संगीत] नारायणिता [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] केशव [संगीत] [संगीत] मुझे सदा से भान था कि आप साधारण मनुष्य नहीं है। [संगीत] परंतु आज जो मैंने देखा उसके पश्चात [संगीत] मेरे साथ आओ मित्र। ये स्थान अब वार्ता करने के लिए उचित नहीं रहा। यहां शब्दों का कोई मोल नहीं। यहां शब्द केवल सुने जाते। समझे [संगीत] नहीं जाते। आओ मेरे साथ। [संगीत] केशव [संगीत] शांति [संगीत] न्याय एक बार आप मेरे सारथी बने थे [संगीत] आज एक और मुझे दीजिए केशव बुद्धि कर प्रीति में तुम्हें सारथी के रूप में पाकर गौरवान्वित तो मैं हो जाऊंगा मित्र कृष्णा कहो या [संगीत] कर्ण कहो है दोनों एक [संगीत] समान कृष्णा कहो या कर्ण [संगीत] कहो है दोनों एक समान या तो मित्र जो कुछ भी तुम्हारे मन में आप ही पढ़ [संगीत] लीजिए ना केशव क्या है मेरे मन में मैं तुम्हारा मन पढ़ सकता हूं मित्र परंतु जैसे कि मैंने पहले भी कहा था मुझे तुम्हारे मुख से सुनना अच्छा लगता है अब कह भी दो मिन क्या है तुम्हारे मन में? इस समय जो मेरे मन में चल रहा है वो ये है कि आपने मुझे पांडवों के पक्ष में आने का प्रस्ताव दिया था। हां। और तुमने उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। हां। परंतु मैंने कभी नहीं सोचा था। कि मेरा यह निर्णय मुझे आपके विपक्ष में खड़ा कर देगा। केशव आपको तो युद्ध का परिणाम पता है ना केशव किसी अनहोनी के होने से पहले उसका ज्ञात हो जाता। क्या वो आपको पीड़ा नहीं देता केशव। मनुष्य संतोष से इसलिए जीता है क्योंकि वो नहीं जानता कि अगले पल क्या होने वाला है। वो नहीं जानता कि वो जीवित [संगीत] रहेगा या वो मर जाएगा। परंतु यदि उसे ज्ञात हो जाए कि अगले पल क्या [संगीत] होगा या वो कब मर जाएगा तो आपको नहीं लगता कि उसके आने वाले पल भय और चिंता [संगीत] में बीतेंगे। यह सोच पर निर्भर करता है अंगराज। यदि मनुष्य को अपना अंत ज्ञात हो तो हर वो क्षण जिसे [संगीत] हम व्यर्थ करते हैं उन क्षणों को जिया भी जा सकता है। इस नदी [संगीत] को देख रहे हो इस बहती नदी को पता है कि अंततः इसे सागर में जाकर मिल जाना अधिक ज्ञान पीड़ादाई नहीं होता। मित्र अधिक ज्ञान उचित निर्णय लेने में सहायता करता है। यदि तुम्हें भी भूत और भविष्य का कुछ [संगीत] अधिक ज्ञान होता तो कदाचित तुम भी अधिक न्याय पूर्वक निर्णय कर पाते। आपका मंतव्य यही है ना कि पांडव उचित है और दुर्योधन अनुचित क्षमा कीजिएगा। परंतु मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूं। मुझे लगता है केशव ये दोनों अपने-अपने स्थान पर दोषी हैं। [संगीत] और इसी कारण से दोनों अपनी-अपनी [संगीत] दृष्टि में निर्दोष और सही है। यदि दोनों ही दोषी तो तुम निष्पक्ष क्यों नहीं हो जाते मित्र? क्योंकि मुझे लगता है कि दुर्योधन युधिष्ठिर से कहीं अधिक सक्षम शासक सिद्ध होगा। इतने अधर्म करने के पश्चात भी हां क्योंकि वो युधिष्ठिर की भांति धर्मराज होने का ढोंग नहीं करता। आप ही बताइए [संगीत] केशव कि जिसने स्वयं की पत्नी को दांव पर लगा दिया हो। जिसने युद्ध के कुचक्र से निकल कर स्वयं को युद्ध में फिर से फंसा लिया हो। वो कैसा धर्मराज? युधिष्ठिर की असमर्थता [संगीत] के कारण राजकुमार युधिष्ठिर मेरे मेरे श की रक्षा कर लीजिए। मेरा अनुज मृत्यु की भेंट चढ़ गया। [संगीत] जब मुझे सूत पुत्र कहकर रंगभूमि की स्पर्धा में भाग लेने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था। राजकुमार के साथ द्वंद की अनुमति एक सूत पुत्र को नहीं दी जा सकती। जय सुपुत्र तब भी धर्मराज का धर्म मौन था। ऐसे में दुर्योधन ने मेरा हाथ धर्मा जिसे आप अधर्मी कहते हैं। आज मैं अंगराज हूं। परिवर्तन के लिए खड़ा हूं। [संगीत] वो केवल दुर्योधन के कारण केशव मैंने कहा था ना यदि तुम्हें तनिक अधिक ज्ञान होता तो तुम उचित निर्णय ले पाते मित्र मैं समझा नहीं तुम सदा स्वयं को सूत पुत्र समझते आए हो का और यदि तुम्हारा यह ज्ञान मिथ्या हुआ तो मिथ्या आकर क्योंकि तुम्हें तो पता ही नहीं कि तुम वास्तव में हो कौन मुझे ज्ञात है कि मैं कौन हूं। और मुझे गर्व है कि मैं अधिरथ पुत्र करण हूं। राधे पुत्र करण हूं। सूत पुत्र करण तुम राधे नहीं हो अंगराज तुम अधरथ पुत्र नहीं हो तुम सूत पुत्र नहीं हो तुमने कभी यह नहीं सोचा कर्ण कि एक सूत पुत्र के शरीर को दिव्य स्वर्ण से मणित कवच और कुंडल क्यों है? [संगीत] तुम्हारे मन में यह प्रश्न कभी नहीं उठा कि एक साधारण से सारथी के पुत्र के पास ये कवच और कुंडल क्यों है? क्या तुम यह सोच कर कभी व्याकुल नहीं होते कर्ण कि तुम शेष से इतने भिन्न क्यों हो? तुम सूर्य पुत्र कर्ण सूर्य पुत्र कर्ण सूर्य पुत्र कर्ण सूर्य पुत्र [संगीत] स्वयं सूर्य नारायण के अंश हो तुम करण [संगीत] यह सत्य है। मेरे पिता अधीरथ हैं। और और मेरी माता राधा सत्य से भागो मत कर और सत्य यही है [संगीत] कि अधिरथ तुम्हारे पालक पिता हैं। तुम उन्हें गंगा किनारे मिले थे। कभी सोचा नहीं कि क्यों सूर्य का तेज तुम्हारे मुख मंडल पर रहता है। कभी अनुभव नहीं किया मित्र कि क्यों सूर्य का ताप तुम्हारे शरीर पर स्निग्नता का अनुभव कराता है। तब भी समझ नहीं आया तुम्हें जब दिग्विजय करते समय पांचाल युद्ध में क्यों शत्रु पक्ष पर सूर्यदेव का ताप बरस रहा था। क्योंकि तुम अधीरथ पुत्र नहीं।
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