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TMC Crisis, POK Protest, Cockroach Janta Party Rally & Great Parda Debate | Teen Taal S2 Ep 160
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पीताल प्रेजेंटेड बाय धर्म
आई लव यू भी ना कह रही मासू बात भी ना
करनी छोड़ रही
तानाशाही नहीं चलेगी नहीं चलेगी नहीं
चलेगी
टिटू मेरी बहन कितते है
हॉट लोग होते हैं बहुत कूल
थैंक्स थैंक यू ताऊ मेरे लिए तारीफ की
आपने
सर सब सब लोग सबकी साले अपने दिमाग में
पिक्चर चल रही है जब तक जनीमा है
अगर पर्दा है
तो राज है
तो राज है
तो सिमरन भी होगी तो सिमरन भी होगी
जया पर्दा भी हो सकती है
जया पर्दा
तो तुमने मुझे नंगा देखा है
ये घूसा और घूसंड में क्या फर्क है घूसा
जो होता है मेरे ख्याल से थोड़ा ऊपर तक
मारा घूसण जो होता है घुसा करके मारा जाता
है मर्द की अकल पे जो पर्दा पड़ा है बहुत
पहले पड़ गया फिर भी किस किस टाइम में
पड़ा होगा कुछ पता नहीं आप इतने उसे कह
रहे हैं
बहुत सही फिर भी किस टाइम खूब पर्दा है कि
चिलमन से लगे बैठे हैं। वहीं पर्दा है।
वहीं बैठे हैं पकड़ के समझे। अरे अरे क्या
एक्सप्रेशन दे रहे हो?
अरे मैं खो रहा हूं।
क्लोज अप देके
चरमराती खाट थी सो है खड़ी खाड़े खाड़े
तुम भी खड़खड़ाओ मत। आपकी जीवन में कुछ
नहीं घट रहा।
एक तो जब आप हमको देख के बोलते हैं, हमको
अपने ऊपर डाउट।
अरे आपके मोमेंट्स, जीवन क्या है?
नहीं तो इनके जीवन में कुछ घट नहीं रहा
है। इनके जीवन में सब बढ़ रहा है। क्या
बढ़ रहा है भाई? अरे दिन
ब्या भाई ब्या
थोड़ा सा पर्दे से बाहर आइए
चुराने ले चेहरे की नूर ए मेरे हम नवाज
ऐ मेरे हुजूर
तीन ताल प्रेजेंटेड बाय धर्म
तीन ताल कैसे प्रारंभ हुआ कथा सुनिए तो
हुआ यह कि एक आश्रम था जिसमें वे लोग आते
थे तो जो जीवन में बहुत दौड़ चुके थे और
अब बैठने का कोई वैचारिक कारण खोज रहे थे।
आश्रम के मुख्य द्वार पर बड़े अक्षरों में
लिखा था अति कर्म से बचो विश्राम ही परम
तत्व है। अंदर प्रवेश करते ही बाई ओर
झमाझम संहिता का विशाल अदृश्य ग्रंथालय
था। वहां साधक किताबों के बीच सिर रखकर के
दिन रात ऊंघते थे। सुस्तोपनिषद के पूरा
पूरे 18 खंड सोह कर आश्रम के आचार्य
समुसकानंद
के चेहरे पर ऐसी शांति थी जैसे उन्होंने
वर्षों से किसी निर्णय को अंतिम रूप दिया
ही ना हो। उनके शिष्य धकेल कांत सुबह शाम
खुरखुंद महामंत्र का जाप करवाते थे। खुर्र
खुर्र खुरखुंदाय नमः आश्रम में कई विभाग
थे जिसमें झन्नाट साधना केंद्र सबसे
प्रतिष्ठित था। वहां साधक किसी काम को
शुरू करने का संकल्प लेते और फिर वर्षों
तक उसी संकल्प की महानता पर विचार करते
रहते। दक्षिण दिशा में झौसाचार पीठ था।
झौसाचार हां वहां सिखाया जाता था कि
व्यस्त दिखने की कला क्या होती है। आश्रम
के महंत टुनटुनेश्वर जी ठलुवेंद्र युग के
अंतिम ज्ञाता माने जाते थे क्योंकि वह
कनबतिया काल की पुरानी इमारत में विद्वान
साधुओं के कान में घंटों फुसफुसाते रहते
और फिर घोषणा करते कि आज नया ज्ञान
प्राप्त हुआ। जब पूछा जाता कि क्या ज्ञान
मिला तो वह कहते कि अभी शोधाधीन है।
रिसर्च का सब्जेक्ट सब्जेक्ट टू रिसर्च
है।
आश्रम में एक विचित्र साधु भी था। उसका
नाम था झबर घोंच। उसकी जटाएं इतनी विचित्र
थी कि तीन कबूतर, दो गिलहरियां और एक खोई
हुई पतंग उनमें स्थाई निवास कर जाए। लोग
उन्हें चलता फिरता पारिस्थिकी तंत्र भी
कहते थे। संध्या होते ही पूरा आश्रम मुख्य
प्रांगण में एकत्र होता। समुसकानंद, धकेल
कांत और टुनटुनेश्वर महात्मा एक स्वर में
घोषणा करते। जो काम आज हो सकता है वह कल
भी हो सकता है। जो कल हो सकता है उसके लिए
परसों बना ही है और फिर शंखनाद के साथ सभा
समाप्त हो जाती। कालांतर में उदारीकरण,
वैश्वीकरण, डिजिटलीकरण, स्टार्टअपीकरण,
एल्गोरिद्मीकरण और प्रायोजकीकरण की
आंधियां चली। बड़े-बड़े आश्रम उखड़े, कई
मठ कंटेंट बन गए। अनेक गुरु थंबनेल हो गए
और शिष्य नोटिफिकेशन।
झमाझम आश्रम भी समय की इस प्रचंड धारा से
अछूता ना रहा और झन्नाट साधना केंद्र ने
घोषणा की कि अब संकल्प लेने के बजाय उस पर
चर्चा की जाएगी। धीरे-धीरे आश्रम की विशाल
परिधि लाल दीवारों के बीच समा गई।
कन्वतिया काल की पुरानी इमारत अब स्टूडियो
कहलाने लगी। घंटों कान में फुसफुसाकर
शोधाधीन ज्ञान देने वाले टुनटुनेश्वर जी
के स्थान पर माइक के चौंगे आ गए और संध्या
सभा का नाम पड़ गया तीन ताल। शुरू करते
हैं सीजन दो एपिसोड 160 प्रेजेंटेड बाय
थर्माकूल कूलर्स ऋषि कमलेश ताऊ, आचार्य
आसिफ खान शाह और महंत कुलदीप सरदार की
पावन उपस्थिति में। जय हो जय हो जय हो
बहुत खूब यार
प्रणाम नमस्कार
जीत
ये लाल दीवाने थोड़ी सी सिकुड़ गई लेकिन
कमफी लगती है
हम
वैसे थोड़ा सा एक
सिकुड़ गई मतलब
कम छोटा बड़ा था ना अपनी प्रॉपर्टी
पूर्वजों का
हां अच्छा वैसे
फिर आंधियां चली ना बहुत सारी उदारीकरण
वैश्वीकरण
अभी भी आंधी चल सकती है
चल रही
यही हुआ है
थर्मोकल है
जो खोला गया था उसको कहते हैं ना ओपनिंग
अप दी इकॉनमी मी
हम
जैसे खोला गया ना वैसे सब कुछ बंद होता
गया चारों तरफ से
थोड़ा कैसा रहा आपका वीक
मेरा तो बहुत स्ट्रांग रहा
अच्छा
8%
नहीं मैंकि एथेनॉल का सेवन ना अपने लिए ना
अपनी गाड़ी के लिए अच्छा मानता हूं
हम
तो मैं
पर आपके पास विकल्प ही क्या है अब
नहीं पर वीकेंड क्या था कि वीकेंड में जो
है
दिल्ली में एक हलचल सी हुई
हम हम
सैटरडे को
हां कॉकरोच चों का आगमन हुआ हम
जो मुख्य कॉकरोच था
सीधा लैंड किया
हां
अभिजीत दीप के
उसका पदार्पण हुआ हमारे दिल्ली के
एयरपोर्ट पर और जो गलती
प्रधानमंत्री ने की थी उसे गृह मंत्री ने
ठीक कर दिया
मतलब शिक्षा मंत्री ने की थी प्रधानमंत्री
ने की थी पूरे सरकार ने की थी
उसको परमिशन दे दी कॉकरोच जनता पार्टी को
परमिशन दे दी गई
अरे जिस दिन
लीक हुआ था
क्वेश्चन पेपर नीट का पता चल गया था जिस
दिन
उस दिन इसको गंभीरता से लेते हुए श्री
धर्मेंद्र प्रधान जी को मतलब
मंत्री प्रधान को अगर प्रधानमंत्री से
नहीं हो
तो मंत्री प्रधान को आ जाना था टीवी पर और
कहना था
कि हम इसको बहुत सीरियसली ले रहे हैं। हद
हो गई है हर साल 2 साल में यहां वहां
परीक्षा पत्र लीक होते हैं। इसका सॉलिड
इंतजाम करेंगे। एक महीना दीजिए। इसके बाद
हम ऐसा ठोक बजा के ठीक कर देंगे कि कभी यह
शिकायत नहीं आएगी। यह बोलना था जिम्मेदारी
लेते हुए रिजाइन करने की जरूरत नहीं थी।
पर नहीं ये होता है ना कि कारपेट के अंदर
डालो ढको ढको जब तक खींच पाता है खींच लो।
बोलने में ही उन्होंने काफी समय ले लिया।
पहली बार दो या तीन दिन
चक्कर में जो है मंत्री प्रधान के चलते
प्रधानमंत्री तक बात पहुंच गई।
हम
और कॉकरोच आ गए। पर वो अच्छा डिसीजन हुआ
कि
अलव किया गया उनको कि जाने दो। दिन का
टाइम है।
ऐसा ही कॉकरोच नहीं निकलेगा।
बहुत गर्मी भी थी।
गर्मी बहुत ज्यादा थी।
पर वहां जैसे
ये तो स्पष्ट हुआ एक कि लेफ्ट के छात्र
संगठनों ने समर्थन दिया।
दीपांकर भट्टाचार्य भी पहुंचे। वहां पे
नेता सोनम
नफली वाले पहुंचे। जो आजादी मांगते हैं वो
पहुंचे।
सोनम वांगचुक भी पहुंचे। हालांकि वह किसी
राजनीतिक पार्टी से जुड़े नहीं है। पर यह
तो स्पष्ट हुआ कि मतलब
इस मसले पर लेफ्ट के समर्थन से सीजेपी को
गुरेज नहीं है। मतलब वो उनको अछूत नहीं
समझती है अपने कॉज के लिए। जैसे और
अंबेडकर को ले की वो लेकर के पुस्तक
अभिजीत दीप के आए दिखाते हुए
उसको ऑटोबायोग्राफी लेके आए। हम जो कभी
लिखी नहीं अंबेडकर ने
एक बंदा संविधान भी लेके आया
हम
और उसको खोला तो उसकी डायरी थी उसने कहा
ये मैंने लिख रखा है ये मेरा जिसमें मैंने
आर्टिकल लिखे हैं
कई रंग रूट भी आए थे अच्छे
बहुत अच्छे-अच्छे सुंदर
कॉपरेज का कपड़ा कोई बाली पहन के टिकिया
लगा के
वो 90% लोग जैसे देश के युवा हैं 90%
क्लूलेस थे हमारा समाज है 10% बहुत शार्प
थे उनके विचार बहुत मजबूत थे इस बारे में
कि अपने को कुछ तो करना पड़ेगा
हम् हम
लेकिन दीपके ने ऐसा सोचा नहीं होगा ना कि
इतना बड़ा बड़ा नहीं मतलब इतना
हालांकि प्रोटेस्ट ये एक बड़ा ये ये एक
ऐसा विषय है ना क्या कहा जाए इस प्रोटेस्ट
को क्या हम एक सफल और बड़ा प्रोटेस्ट कह
सकते हैं या नहीं
सफल और छोटा
हां शुरुआत तो ठीक ही की उन्होंने
नहीं नहीं शुरुआत तो उन्होंने बहुत खराब
की
उसको कंपेयर उससे कर रहे हैं
भारी बेइज्जती का कारण था पर प्रोटेस्ट
सफल हुआ सफलता क्या होता है आपका
ऑब्जेक्टिव क्या था पहला
धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें
उसमें नहीं वो तो जो रियल इशू है वो है कि
पेपर लीक की तरफ पूरे राष्ट्र का ध्यान
आकर्षित करना हो गया ना
एक दिन के लिए सारे लोग इसके बारे में बात
करने लगे ना कि करना पड़ेगा धर्मेंद्र
प्रधान को जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए
पर वो अब और भी शहरों में अलग-अलग शहरों
में पुणे में करेंगे और जगहों पे
नहीं वो तो ऑब्वियसली करना चाहेंगे
हम
पर दिल्ली में अगर इतना बड़ा पहला वाला
नहीं कर पाए तो दूसरा वाला शायद सीक्वल का
चलना बहुत मुश्किल होता है।
इन्होंने एक एक मुझे लगता था जैसे सोशल
मीडिया पे पार्टी शुरू हुई पूरे देश के
लोग जुड़ गए। इतने फॉलोअ हो गए। उस दिन
मुझे लग रहा था इनको हर शहर में बोलना
चाहिए था कि इतने बजे ऑनलाइन जुड़िए। थ्रू
वीडियो कॉल वो उससे भी बड़ा हो सकता था।
हर शहर से बड़े-बड़े
उसको संभालना बड़ा क्या?
क्यों? हर जगह पे लोग खड़े रहते हैं यार।
उनको डालना था कि हर शहर से जुड़िए। वही
तो भारत में इस वही सड़क पर उतरे बिना
प्रेशर बनता नहीं है। ऑनलाइन मान लीजिए
लोग ऑनलाइन को अपनी जगह पे निर्धारित
कीजिए एक जगह जहां जितने लोग इकट्ठा हो
सकते हैं युवा वो जुड़े ताकि दिखता कि
यहां पूरे एक नेशनल लेवल पे आपका
प्रोटेस्ट हुआ सिर्फ जंतरमंतर पे नहीं
उतना दुर्गा तो बाहर रहता ही है दिन भर
उतना हां उतने जो ये जनरेशन जेंजी जनरेशन
है उतना टाइम ऑनलाइन रहती ही है वो
Instagram लाइव
बेस्ट है सुबह सुबह अगर आप 8:30 9 बजे
देखते तो सिर्फ मीडिया वाले ही दिख रहे थे
फ्रेम में
हम में एक बात है
आप बढ़िया से वेल पब्लिसाइज करके कोई भी
कार्यक्रम करो 300 आप पहुंचोगे 500 मीडिया
पहुंच
800 हो गया
भीड़ में काउंट तो वो भी होंगे वो भी आए
थे
हमारी
अच्छा है संख्या बढ़ाने
हमारी एक साथी रिपोर्ट
ऐसा था यार मीडिया वाले एक दूसरे का
इंटरव्यू कर रहे थे
मतलब एक यूट्यूबर दूसरे का इंटरव्यू कर
रहा था
क्योंकि उनको आता ही नहीं था
उनको माइलेज चाहिए अपना नंबर चाहिए
एक बंदा बहुत गुस्सा था उसने कहा कि हमको
जंतरमंतर में परमिशन दिया है फिर भी हमको
सड़क से सड़क पे करवा रहे हैं तो उसको
रिपोर्टर ने कहा कि यहीं पे करते हैं।
उसके अंदर नहीं करते।
उसके अंदर नहीं जाते हैं।
इतने मतलब इतना ज्ञान लेके लोग आए हुए थे।
बहुत सारे मैंने तो देखे ना
पहली बार की सर उनका एक्सपोज़र नहीं है। 18
19 साल के बच्चे हैं। पहली बार देख रहे
हैं जंतर पहली बार गए होंगे।
मतलब उनको भी थोड़ा लेट लेट अस कट देम सम
स्लैक।
ये नहीं मैं तो चाहता हूं यार क्योंकि अपन
ने उस उम्र में जो है प्रोटेस्ट किए हैं
मार खाया है। वो सब करना ही चाहिए उस उम्र
में। तो वो प्रोसेस ना जब तक अंटिल ट्रायल
बाय फायर नहीं हुआ हम
हां तो वो
धूप में है कोल्ड ड्रिंक पी रहे हैं कोल्ड
कॉफी लाते मंगवा रहे हैं आइस्ट उसमें नहीं
होता प्रोटेस्ट
ये सरकार भी बहुत बेरहम होती है इस बात
प्रोटेस्ट जो है आपको एकदम जी जान लगा के
करना चाहिए दौड़ना चाहिए फिर जब पहला लाठी
बरसता है ना
पहले तो पुलिस वाले दोनों में धक्कामुक्की
होती है थोड़ी-थोड़ी
बैरिकेटिंग लेके
उसके बाद जब बजना शुरू होता है ना
देन यू रन एंड देन यू फॉल
समटाइम्स यू डोंट नो नो व्हाट टू डू तो आप
दीवार फाकर पीछे चले जाते हो
पता चलो वही पुलिस वाले
कभी कभी प्रिटेंड करते हो कि मैं पुलिस के
साथ हूं मैं उनके साथ नहीं हूं ये सब कौन
सिखाएगा बच्चों को
ऑनलाइन है आप नहीं सीख सकते ये मारियो
नहीं है भाई साहब
वो ग्राउंड पे जाके एक्सपीरियंस करना होता
है
तो बच्चों को हमेशा प्रोटेस्ट में आगे आना
चाहिए
कॉलेज के बच्चों को स्कूल के बच्चों को
नहीं कॉलेज के बच्चों को आगे आना चाहिए और
आपको फिर सीखोगे नहीं तो बड़े हो के जब
पुलिस मारेगी तो आपको बेइज्जती भी महसूस
होगी और दर्द भी
और ऐसे बड़े होकर पुलिस मारती है ना
तो आपको दर्द नहीं होता है। बेइज्जती होती
है।
किसी कॉज में मारा तो आपको दर्द होता है।
सिर्फ बेइज़्ज़ती नहीं प्राउड होता है कि
हमने खाया था डंडे। बच्चों को बताओगे यार।
आई थिंक
लेकिन सरकार बहुत बेरहम थी उस दिन।
मतलब कैनन वाटर ही मारते यार। मतलब
थोड़ा ठंडक मिल जाता।
हम
गर्मी
वहां पे रहता है हमेशा।
नहीं मारे इस बार की जान।
अरे ये लोग किया नहीं ना कुछ।
तड़पाया भी। हां। नहीं तो अरे पीसफुल
पीसफुल प्रोटेस्ट रखना भी एक सफलता थी कि
यह मेक श्योर करना कि अराजकता है
वो असफलता थी। देखो यह पहली बार किया।
पीसफुल प्रोटेस्ट रखा नहीं गया था। उनसे
हो ही नहीं पाता कुछ। यह देखो हकीकत को
मैं मानता हूं यह प्रोटेस्ट सक्सेसफुल रहा
क्योंकि इसने देश एक बहुत जरूरी मुद्दे की
ओर देश का ध्यान आकर्षित किया। सफल रहे
उसमें। ठीक है? धर्म धर्मेंद्र प्रधान
इस्तीफा दें ना दें। क्योंकि इस्तीफा
देंगे तो कोई दूसरा बनेगा ना। क्या ही
फर्क पड़ता है वो थोड़ी ना परीक्षा लेता
है। वो थोड़े पेपर लीक करवाते हैं। पेपर
लीक तो कोई शिक्षक करता है ना। हां मतलब
या सिस्टम से जुड़ा हुआ कोई व्यक्ति जो
कोई जनरली शिक्षा ही करता है।
ठीक है? और गुरु जो है देवता भगवान मतलब
गुरु गोविंद दो दाऊ काको लागे पाव
ताको लागो पाए बलिहारी
बलिहारी गुरु आपने गोविंद बताए
पेपर दियो
ठीक है तो सब धर्मेंद्र प्रधान की ओर बता
देते हैं और बलिहारी गुरु तो आपने थे ना
जिन्होंने सेट किया उन्होंने लीक किया जो
ले रहे हैं वो करवा रहे हैं आप बजट बनाती
हैं मैडम उनके पहले भी लोग बनाते थे सारे
लोगों को क्योंकि क्योंकि भारत एक 90% वो
है। समझ रहे हो ना?
नहीं।
हां समझ गए।
हां।
समझ गए ना?
हां।
जस्टिस काजू।
हां। तो वो क्या करते हैं? बजट एक ऐसा
डॉक्यूमेंट है जिसको लीक नहीं होना चाहिए।
सबको एक बिल्डिंग में ले जाया जाता है।
सबके फोन रख लिए जाते हैं। ठीक है? और फिर
वो वहीं रहते हैं। वहीं खाना बनता है।
वहीं खाते हैं। लास्ट डे में हलवा
हलवा बनाते हैं। स्वीट डिश क्यों? फाइनल।
अब कहते हैं कि अब हम उधर जा रहे हैं संसद
में। तुम लोग जाओ अपने घर। नीट की परीक्षा
है। आप जानते हो इतना इंपॉर्टेंट है। कोई
ना कोई कहीं ना कहीं विकेंद्रित है सब
कुछ। कर ही देगा।
सबको बिठाओ एक कमरे में।
फोन ले लो।
और कहो चलिए सेट कीजिए आप लोग। सेट हो गया
आप वहीं रह जब तक एग्जाम नहीं होता आप
कहीं नहीं जाएंगे। ठीक है? पूरे देश के
सेंटरों में यार बैलेट का पूरा आप बैटरी
और क्या है? पूरा इंतजाम ले जाते हो ना
विद सीसीटीवी आल्सो
हम
ईवीएम एंड ऑल
इतना बढ़िया टेलीकम्युनिकेशन नेटवर्क है।
अभी बस 11:00 बजे परीक्षा है। 10:00 बजे
सबको
भेज दिया जाए। प्रिंट कमांड यहीं से देना
है। सब जगह प्रिंट हो जाएगा। दे दो सब।
आईडिया अच्छा है। यह
पहुंचेगा ही नहीं। जो जो इतना टाइमली मैनर
में पहुंचाना है ना कि 10:00 बजे 11:00
बजे परीक्षा 10:00 बजे भेजना है।
हम
वो पहुंचने के सिस्टम ही फ्लॉप हो जाएंगे।
इतने सेंटर्स हैं। नंबर ऑफ सेंटर्स 25 लाख
लोग देते हैं।
अरे तो यहां से प्रिंट कमांड दूंगा मैं।
अरे हम फिजिकल लेके जा रहे हैं। इतना होने
के बाद भी वायु सेना के हेलीकॉप्टर्स हैं।
फिजिकल मतलब फिजिकल वही तो बोल रहा हूं।
आप तो गलत कर रहे हो ना? हां
आप चाहो तो हर सेंटर पे एक प्रिंटिंग मशीन
रख दो बस
वही कि क्या वो सारे सेंटर्स डिजिटली
इंटरनेट से एक वायबल कनेक्शन
तो करना पड़ेगा नहीं वही
नहीं अब क्या है
जहां पर भी मोबाइल फोन का सिग्नल जाता है
वो कनेक्टेड है
ऐसी जगहों पे एग्जाम ही मत करवाओ और मेरे
हिसाब से होता भी नहीं होगा नीट का एग्जाम
जहां मोबाइल फोन का सिग्नल नहीं है असंभव
सा है
हां पर मान लीजिए 1 घंटे पहले टेक्निकल
इशू आ जाएगा।
नहीं नहीं एक घंटे पहले लीक हो गया।
डिजिटल कॉपी को फॉरवर्ड करना
बहुत ही आसान है। हार्ड कॉपी मेरे पास एक
ही कॉपी है।
मैं तो दे ही नहीं रहा हूं ना।
मैं हार्ड ही कॉपी दे रहा हूं आपको।
प्रिंट कमांड दे रहे हो तो फैक्ट से
निकलेगा।
नहीं प्रिंट
प्रिंटिंग मशीन है।
वहां पे दूसरी जगह।
हर सेंटर में प्रिंटिंग मशीन।
उसके भी ज़ेरॉक्स हो सकता है।
अब इतना
निकाल तो निकाल ही लेंगे लोग।
पौ:45 बजे अगर ज़ेरॉक्स निकाल लिया है तो
निकाल लिया है।
फिर उसको अवार्ड देना चाहिए। वह तो 11:00
बजे ऐसे भी जब छात्र को देते हो तो लीक हो
ही जाता है ना।
हम्।
15 मिनट में क्या ही कर लेगा कोई?
आप अभी जो ले जा रहे हो हेलीकॉप्टर से
क्या हर सेंटर पे हेलीकॉप्टर से लेकर
जाओगे?
हां वो तो खैर एक बड़े सेंटर पे ले जाएंगे
और
फिर वहां से अलग-अलग जगहों पे जाते हैं।
पर एक बात है।
कहीं दंगा हो रहा है आर्मी बुला लो। युद्ध
हो रहा है आर्मी बुला लो। बाढ़ आ गई आर्मी
बुला लो। एयरफोर्स वाले को रेस्क्यू करने
के लिए बुला लो। डिफेंस फर्सेस हमने रखे
ही यही है। हम
घरेलू इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है।
हां खाली बैठे हो। चलो परीक्षा
गिर गया है। चलो आर्मी वाला बना दो।
मास्टर बना रखा है आपने। हम्। फिर पश्चिम
बंगाल में बढ़िया
माहौल बना हुआ है। तो लिस्ट
अभी तो जब हम लोग यह रिकॉर्ड कर रहे हैं
बुधवार को तो एक लिस्ट भी आ गई है उन
सांसदों की जिन्होंने सूची
बागी सांसद
हां फिर साइन करके दिए हैं कि भ हमारा
सिंग अरेंजमेंट अलग हो जाए और ये लोग
मोस्ट लाइकली एनडीए के पक्ष में जाने वाले
हैं। और उसमें कई चौंकाने वाले नाम भी
हैं। मसलन शत्रुघ्न सिन्हा जो पहले बीजेपी
के साथ ही हुआ करते थे। फिर लंबे समय से
टीएमसी में थे और सायुनी घोष जो इस चुनाव
में जिनके भाषण और मीडिया इंटरव्यूज बड़े
चर्चित रहे और हिंदू मुस्लिम एकता और
सेकुलरिज्म की मजबूत मिसाल के तौर पर उनको
पेश किया गया था चुनाव से पहले कि देखो ये
ना डिगने वाली महिला
उनके भी दस्तखत हैं। तो
युसूफ पठान युसूफ पठान युसूफ पठान हालांकि
कोई आईडियोलॉजिकल
अह मतलब युसूफ पठान ने कभी ऐसा जाहिर नहीं
किया कि इनमें से किसी ने भी बताने में
जैसे आयानी घोष ने जाहिर किया है। पर
इतनी बड़ी टूट की अपेक्षा टीएमसी में थी
आपको मतलब जैसे क्या आपको यह लगता है कि
यह टूट इसलिए हो गई क्योंकि टीएमसी
वैचारिक तौर पे कहीं स्टैंड नहीं करती है।
एक यह आर्गुमेंट आता है बार-बार कि यार
कोई भी पार्टी बने। इसीलिए ठोस वैचारिकी
का उसके पीछे होना जरूरी है। आम आदमी
पार्टी का इसी आधार पर बड़ा क्रिटिसिज्म
होता रहा कि यह पार्टी कभी भी टूट सकती
है। इनकी एक आईडियोलॉजी नहीं है। लेफ्ट आज
बुरी हालत में पर उसकी एक क्लियर
आईडियोलॉजी है। कांग्रेस
इसी वजह से
उसकी बहुत अच्छी खा हालत नहीं है। लेकिन
उसकी एक आईडियोलॉजी है जो ऐसे मौकों पे
शायद
प्रिवेंट करती होगी इस तरह की सिचुएशन को।
पर एक्चुअली कर पाती है या नहीं या यह एक
अ क्या बोलते हैं जो सिद्धांतवादी लोग हैं
उनका गढ़ा हुआ एक मिथ है कि आईडियोलॉजी
कोई शील्ड नहीं है जो इन चीजों से बचा सके
क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की अपॉर्चुनिटी
अपॉर्चुनिज्म में प्रत्येक व्यक्ति की
आस्था जो है वो किसी भी आईडियोलॉजी को
ट्रांसेंट कर सकती है। अवसरवादिता जो है
वो ज्यादा बड़ी चीज है क्योंकि प्रत्येक
व्यक्ति अपना भविष्य बनाने आया है।
व्यक्ति केंद्रित पार्टी में जो व्यक्ति
कहे वही सही होता है। उसकी कोई आईडियोलॉजी
नहीं होती। तृणमूल जो है ममतावादी पार्टी
थी। ममता कहे वही संविधान है। हमारा वचन
ही हमारा शासन है।
तो ऐसी पार्टियों में यह खतरा हमेशा रहेगा
कि जब केंद्र
टूट जाएगा
तो फिर बिखर जाएगा।
भाजपा में
लीडर आए गए।
नरेंद्र मोदी भी एक दिन लीडर नहीं रहेंगे।
भाजपा रहेगी क्योंकि भाजपा
विचारधारा के साथ चलती है।
एक आईडियोलॉजी है इनकी। कांग्रेस में भी
है। कांग्रेस रहेगी। बहुत दिनों से मतलब
परिवार के नियंत्रण में हो तो भी कांग्रेस
की एक आईडियोलॉजी है। एक इतिहास है। जिन
पार्टियों का इतिहास उस व्यक्ति के द्वारा
कुछ भी हो। पहले अटल बिहारी वाजपेयी जी के
साथ थी। फिर अह दूसरे यूपीए में आ गई।
पहले एनडीए में थी, फिर यूपीए में आ गई।
फिर वह इंडिया अलायंस बन रहा है तो उसमें
थी। फिर नहीं थी। फिर नीतीश कुमार बनने
लगे तो उन्होंने विरोध कर दिया। कांग्रेस
और वो साथ नहीं लड़ते। कम्युनिस्टों के
साथ इंडिया अलायंस में थी। क्योंकि वह था
कि ममता बनर्जी डिसाइड करेंगी, पार्टी का
क्या होगा। जब वह कमजोर पड़ जाएंगी, वह
अपना सीट हार जाएंगी, उनकी पार्टी बुरी
तरह से हार जाएगी, तो बाकी लोगों को कोई
डर नहीं रहेगा ना। और अभिषेक बनर्जी का जो
कहिए
का पंजा जो था कस के रख सबको जोड़ के रखा
था क्योंकि
उस पार्टी में किसी को भी टिकट दे दिया
जाता था, वह जीत जाते थे। ऐसी मशीनरी थी
उनकी। आपने जिसको टिकट दे दिया, वह जीत
जाएंगे। जिनको राज्यसभा भेजना है भेज दो।
महाराष्ट्र का एक पुलिस ऑफिसर का बेटा जो
तरह-तरह के आरोपों से घिरा हुआ था। उसको
उन्होंने कहा कि तू सोशल मीडिया पे पॉपुलर
है। इसको एमपी बना देते हैं।
तो वो मर्जी वाली बात थी कि मीम तुमको भी
बना देते हैं। जून तुमको भी बना देते हैं।
जिस चीज को
एक्ट्रेस ऐसा तुम भी बन जाओ। तुम भी बन
जाओ। तुम लोग खुश रहो। इधर-उधर एंटरटेन
करते रहो लोगों को। हमारा भी एंटरटेनमेंट
करते रहो। दैट इज ऑल। यही था उनका कीर्ति
आजाद हां
मतलब क्या है
व्हाट इज योर क्लेम टू फेम
क्रिकेट
1983 वर्ल्ड कप
एक्सक्ट्ली क्योंकि पापा मुख्यमंत्री थे
टीम में हम थे बनाया क्या था भाई किया
क्या था टीम में
रन वगैरह बनाए थे वो ऐसी बात नहीं
क्या कितने बनाए थे भाई
14 बनाए होंगे
सात रन बनाए होंगे
उनका एक पीसी में उन्होंने
14 रन बनाए होंगे
हम
पूरे टूर्नामेंट में कितने रन बनाए थे
मुझे क्रिकेट में कोई इंटरेस्ट नहीं भाई
नहीं है ना हम
1983 में वही होता है ना कि भाई सपोज़ करो
यार कि 2011 वाले में
तेजस्वी उस समय खेलते थे
हम
खेलते
अगर फिट कर दिया गया होता उनको
हम
और काफी लोग हैं ना जो उठाते हैं वो कप
उसमें से सभी थोड़े ना खेलते
एक्स्ट्रा जो होते हैं वो भी पकड़ के खड़े
हो जाते हैं। कीर्ति आजाद के पापा
मुख्यमंत्री थे भाई और उस समय जमाना अलग
था
उनको वो बीजेपी में रहे उनकी पत्नी आम
आदमी पार्टी में रही कांग्रेस में रहे
तृणमूल में कहा ठीक है तुमको बना देते हैं
पिता के बड़े पद पे होने का फायदा तो
मिलता है
हां बिल्कुल मिलता है
वो तो हमारे यहां एक नॉर्म है ये
एक्सेप्शन नहीं है तो और मुझे लगता है ये
स्वीकार्य भी हो गया
उस जमाने में बहुत होता था अभी तो थोड़ी
आवाज भी उठती ना?
हां।
हालांकि अभी भी वह आवाज उठा के क्या कर
लेते हैं।
हां, मतलब क्रिकेट प्रशासक के तौर पर जयशा
बहुत सफल प्रशासकों में गिने जाएंगे। उनके
दौर में
कुछ रिफॉर्म्स भी हुए हैं और
पद पे होने का कारण तो उनके पिताजी हैं
ना।
हां।
उनके पिताजी जो हैं वो अध्यक्ष थे। गुजरात
क्रिकेट एसोसिएशन के।
हम
यह भी बने। तभी तो आप कम्पीट कर पाते हो।
हम
तो है तो
पर एक बात बताइए जैसे यह जो पार्टी हॉपिंग
है एक पार्टी
यह हॉप नहीं कर रहे
हां मतलब ठीक है स्विच कर रहे हैं
स्विच भी नहीं कर रहे
एनडीए में तो जा रहे हैं
साफ होने
नहीं नहीं ये
एनडीए को समर्थन देंगे बिल्स पर
इनका कहना है कि हम तृणमूल कांग्रेस हम
हैं।
अब जैसे राज्यसभा का की सांसद हैं
सुष्मिता देव ठीक है। उन्होंने इस्तीफा
दिया है। राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया है।
अब कोई भी वहां से वो पार्टी तय करेगी कि
वो किसको खड़ा करेंगे। सुष्मिता को ही
खड़ा
राज्यसभा में उनके नंबर टूटने वाले नहीं
है।
वही मैं बता रहा हूं कि
उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
उसको अब आप टेक्निकली पार्टी हॉपिंग मत
कहिए। बट इट इज स्विचिंग साइड्स। ठीक है?
टीएमसी तो छोड़ ही रहे हैं या यूपीए तो
छोड़ ही रहे हैं। ये क्लियर है। तो ऐसे
में ये थोड़ा सा अजीब कई बार नहीं होता
होगा। जैसे पार्टी बीजेपी के कार्यकर्ताओं
के लिए उन्होंने साइनी घोष का बहुत
क्रिटिसिज्म किया है। उनकी वैचारिकी का
उसी चीज का जिससे वह दूसरी तरफ स्टैंड
करती थी। या शत्रुघ्न सिन्हा ने के के
बारे में बीजेपी के नेता कार्यकर्ताओं ने
क्या बोला है? बट अभी वही
शत्रुघ्न सिन्हा ने क्या-क्या बोला है।
हां हां
बट तो ऐसे आदमी को क्या भारतीय जनता
पार्टी जब विजय रथ पर सवार है और आप मानते
हैं कि यह व्यक्ति हमारी विचारधारा के
एकदम उलट काम कर रहा था 5 साल में। आपको
आवश्यकता क्या है और क्यों है?
तो इसलिए तो नहीं आ रहे हैं बीजेपी में।
समर्थन तो देंगे ही बिल पर
तो दो
इसमें आप यह मत कहिए उसमें आम ट्विस्टिंग
शामिल नहीं है। ये तो
इस इसमें बीजेपी की जीत है।
कि जो आपको परसों तक गरिया रहा था वो
दरबान बना बैठा है। और वो उनके लिए बहुत
दुर्भाग्यपूर्ण है पर वो करेंगे क्या?
इसमें तो नहीं इसमें इसमें
फाइल का ही मसला नहीं है। फाइल का भी
दिल्ली में दिल्ली में आपने नहीं सबके लिए
फाइल का मसला नहीं है।
दिल्ली में
आपने उनके घर देखे हैं। उनकी लाइफ स्टाइल
एक लेवल पर पहुंच गई है। आप रहेंगे सांसद
ही। आप अपने क्षेत्र जाएंगे। आपके क्षेत्र
में कोई काम नहीं होगा।
हम्म। क्योंकि आपकी पार्टी में
आपके जितने गुरे थे कूटे जा चुके हैं
बढ़िया से
या उधर जा चुके हैं
नहीं कूटे जा चुके हैं बहुत बुरी तरह से
जो गुरे थे आपके मजबूत
आपके क्षेत्र में वहां पर सरकार बदल गई
आपको रेलेवेंट रहना है अगर अपने लोकसभा
चुनाव क्षेत्र में
तो आप कैसे रहेंगे साथ दे के
कि भाई हमारा अब उनसे कोई लेना देना नहीं
है अब हम हम आपको गाली नहीं देंगे। अब हम
आपकी प्रशंसा करेंगे।
हमारी सुविधाओं को
तभी टिकट की तो गारंटी नहीं है। अगली बार
सर्वाइव तो कर जाएगा।
टिकट चांस तो है।
चांस तो है कि 18 अगर शिफ्ट होते हैं
उसमें से चार को मिल जाए।
क्योंकि बीजेपी अपने को गरियाने वाले
कितने लोगों को टिकट दे चुकी है।
बिल्कुल।
है ना? कभी गाली दी थी।
हेमंता विश्व शर्मा मुख्यमंत्री हेमंत
विश्व शर्मा मुख्यमंत्री
हैं।
क्या दिक्कत है?
शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री हैं।
एक्सैक्टली तो उनमें से कुछ लोगों को टिकट
मिलेगा। कुछ को नहीं मिलेगा पर दो-ती साल
आराम से तो गुजर जाएगा।
क्योंकि अगर वो तृणमूल में रहते तो तृणमूल
उनको टिकट दे देती।
वही है कि
पर जीतते कैसे?
ऐसे में ये भी बात है कि इसमें यू लुक फॉर
अ बेटर डील रादर देन इलेक्शन से पहले कही
गई आपकी या बातें या जो बातें हैं कि हम
यू नो इसके खिलाफ लड़ रहे हैं। देश में ये
होना हम इन सिद्धांतों में यकीन रखते हैं।
जब कोई नेता ऐसा कहता है ये फिर से वही
मिसाल है कि उसके फेस वैल्यू पे कैसे हम
ले लें? उसको कैसे उसका यकीन कर लें। चाहे
किसी भी पक्ष का हो। अगर वह चुनाव के बाद
यह देखेगा कि मेरे करियर के लिए बेटर डील
क्या है? है और इस आधार पर फैसले लेगा तो
यह एक बड़ा राजनीति का बड़ा वैसा
विरोधाभास है कि व्यक्ति राजनी जिसको अपना
प्रतिनिधि समझता है चुनना चाहता है उससे
वो सम सॉर्ट ऑफ
सिद्धांतवादी होने की अपील करता है थोड़ा
सा प्रिंसिपल ड्रिवन होने की अपील अपेक्षा
करता है कि यार ये आदमी कुछ चीजों पे
स्टैंड लेगा या कम से कम जो बोलता है उस
पे खरा रहे
है ना ये नहीं कि बोले कुछ और करे कुछ
थोड़ा बहुत तो सब लोग
कुछ लोग हैं जो खरे रहते पर इससे नेताओं
के कहे हुए का
मान उसकी वैल्यू और कम नहीं होगी क्या?
बिल्कुल होगी। मान
क्या बोलते कुछ भी रहिए आप करोगे क्या?
मान था क्या? जनता के भी तो कहे हुए
का मान कहां है?
कम मान नहीं है ना? आपने हमको लोकसभा में
जिताया
और फिर सब बीजेपी को दे दिया वोट।
इसका मतलब आप पलट गए। जब आप पलट गए तो
मेरी ड्यूटी बनती है ना कि मैं पलटूं।
मैं आपकी साइड हूं ना मैं जनता।
अरे यार देखो मैं आपने जो है आपने मुझे
वोट देकर लोकसभा भेजा।
हां।
मैं लोकसभा उम्मीदवार के उम्मीदवार नहीं
लोकसभा में आपका प्रतिनिधि होने के नाते
मैंने चार विधानसभा के लिए चार
उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया खूब। यह
सोचकर कि पिछली बार आपने मुझे वोट दिया था
तो आप इन्हें भी वोट देंगे। आपने उनको
नहीं दिया।
हमने जिसको नहीं देने के लिए बोला था उसको
दे दिया।
ठीक? इसका मतलब आपका मन बदल गया है
तो मेरा भी बदल सकता।
एम आई योर ट्रू रिप्रेजेंट रिप्रेजेंटेटिव
नाउ।
हम भी बदलेंगे भाई।
नहीं हूं ना फिर।
आप बदल चुके हो। मैं आप मैं तो पुराना
वाला हूं। सपोज़ करो आपने कहा के हमारा
फेवरेट रंग पीला है।
ठीक? तो मैं पीला लेके चला क्योंकि मैं
आपका प्रतिनिधि हूं। मेरी मजबूरी है। मुझे
नीला पहचान दो पर मैं पीला लेके चल रहा
हूं।
कल को अगर आप सब ने नारंगी ये गुलाबी थाम
लिया तो मैं पीला ले जाऊंगा तो आप मुझे
कूटेंगे ना कि तुम तो पीले यार हम लोग
नारंगी हो चुके हैं या गुलाबी हो चुके हैं
तो
सबसे बड़ी बात है
ये वाला
जब ये भी डिस्कशन करते हैं ना अपन ये भूल
जाते हैं ये सब मनुष्य भी हैं इनके अंदर
भी एक दिल धड़कता है
नहीं पर ये धड़ ज्यादा दिल विपक्ष वालों
का ही क्यों धड़कता है भारतीय जनता पार्टी
में किसका दिल धड़क रहा है या कौन मेरा
मतलब उस संदर्भ में जिस संदर्भ में आप कह
रहे हैं कि चुनाव बाद आपकी लोकसभा से
विधानसभा के अच्छे परिणाम नहीं आते जहां
से आप सांसद हैं उन सांसद उस सांसद
क्षेत्र में आने वाली विधानसभा में भारतीय
जनता पार्टी अच्छा नहीं करती। उत्तर
प्रदेश से कितने सांसदों के मन बदल गए?
बिकॉज़ द सेंटर होल्ड्स।
यही तो है। मुख्य बात तो यही है ना असली।
सेंटर से मेरा मतलब केंद्र नहीं है।
हम
केंद्र सरकार नहीं है।
हां हां
पार्टी में एक जो
सेंटर होल्ड्स
हम
लीडरशिप
सेंटर कोलैप्स करेगा ना सब कुछ भरभरा के
चला जाएगा। कोई किसी को नहीं पूछता है।
इसीलिए कहता हूं कि मनुष्य हैं सब।
हम
जब भी इन लोगों को देखो मनुष्य की तरह
देखो। इनकी तमन्नाएं, इनकी कुलबुलाहटें
वैसी ही होती है जैसे आपके दिल में है। मन
मार के बहुत लोग बैठे हुए हैं। बहुत सारे
लोग बीजेपी में भी मन मार के बैठे हुए
हैं।
उनका दिल में आग है।
मैं रेफरेंस समझ मैं पूछना चाह रहा हूं उस
व्यक्ति तक। एक सवाल मेरा यह हर जगह होता
है। एक सवाल मेरा तुमसे भी है कुलदीप और
ताऊ से भी कि हर पार्टी में आप देखते हैं
जैसे रिसेंटली आम आदमी पार्टी देखो चड्डा
साहब छोड़ के चले गए साथ में और भी लोग
चले गए हेमंत विश्वा कांग्रेस की थे
शिवेंदु अधिकारी बीजेपी में अगर आप पूरे
20 साल उठा के देखिए और उससे पीछे भी तो
शायद दो-तीन लोगों भारती गई थी वो भी वापस
आ गई शंकर सिंह बघेला थे इसके अलावा कोई
नाम नहीं इस पार्टी को छोड़ के गया हो ऐसा
क्या है इस पार्टी में शंकर सिंह वाघेला
गए थे और अभी भी
बाहरी हैं।
बाहर ही हैं। मतलब मेरा वही कहने का मतलब
है उमा भारती
त्याग लगता है भाई उसमें त्याग
क्या है ऐसा बीजेपी में?
बीजेपी में ऐसा कुछ नहीं है।
पार्टी में कुछ तो होगा ना ये तो छोड़ के
पावर सत्ता
बट कई साल वो पावर से भी दूर रहेंगे।
मैं नेता क्यों बनता हूं
पावर?
पावर के लिए
पावर का क्या करता हूं?
भोगता है कई लोग। कई लोग दुरुपयोग
हां सदुपयोग तो होते कभी नहीं देखा।
और जनता की सेवा
हम
हां मतलब क्योंकि नेता नहीं रहोगे ना खाली
दुरुपयोग करोगे तो जनता की सेवा कैसे
करूंगा मैं?
जनता ने बोला मेरा यहां पे एक टावर लगवा
दीजिए।
और क्या होता है? सड़कें बनवा दो, पानी दे
दो।
कैसे बनवाऊंगा मैं? अगर पावर नहीं है तो
कैसे करूंगा? बीजेपी के पास पावर है।
कांग्रेस के पास भी पावर था। समाजवादी
पार्टी के पास पावर था। बहुत सारे लोगों
के पास पावर होता है। जिसके पास पावर होता
है, लोग उधर जाते हैं।
या या ऐसे भी
ममता बनर्जी की पार्टी को छोड़कर शुभेंदु
गया था ना। हम्म।
एक दो लोग ऐसी स्थिति में भी जाते हैं जब
उनको उनके हिस्से का माल नहीं मिलता है।
उनको
उनको लगता है कि मैं ज्यादा डिर्व करता
हूं। कम मिल रहा है। बाहर जाऊंगा थोड़ा
संघर्ष करूंगा। एक दिन आई विल कम बैक।
शुभेंदु सत्ता के लिए नहीं आया था।
शुभेंदु
इस दिन को देखकर आया था। एक दिन ऐसा आएगा।
ऐसे भी लोग संघर्ष करते हैं। कुछ लोगों का
वह दिन आता ही नहीं है। शंकर सिंह वाघेला
का आया ही नहीं। हम
पर एक बात तो है कि पिछले 101 साल में ताऊ
ऐसा नहीं है कि
दल बदल पार्टी बदलना
की घटनाएं बढ़ गई हैं। ज्यादा स्वीकार्य
भी हो गया है जनता के बीच। पहले भी होती
थी। मैं ये नहीं कह रहा हूं होती नहीं थी।
पर उनकी फ्रीक्वेंसी बढ़ गई है। ये ऐसा
लगता है हमेशा। जैसे अभी लगता है कि
बेरोजगारी बहुत ज्यादा है।
महंगाई भी बहुत ज्यादा है। टेंपरेचर भी
बहुत हाई है। ऐसा तो कभी दिल्ली में इतना
हाई टेंपरेचर इतनी गर्मी कभी पड़ी नहीं
यार।
हां एक
मच्छर बहुत ज्यादा हो गए हैं। मैंने अपने
जीतेजीते इतना मच्छर नहीं देखा है। ऐसा ही
लगता है। पर दल बदल ये सब भाई आया राम गया
राम टाइप था। सुबह इधर शाम उधर एक डाटा
है। मैं अभी खोज के निकालता हूं। 300 या
350 से ज्यादा
एमएलए प्लस एमपीज स्विच कर चुके हैं
बीजेपी की तरफ
बीजेपी की तरफ पिछले पांच आठ सालों का वो
बात
यस यस
तो वो कंपेयर करेंगे अगर किसी भी 5 साल के
वफे में आई डोंट नो किसी एक पार्टी की ओर
इतना स्विच हुआ होगा
वैसे जब कांग्रेस पावर में थी तब भी नहीं
हुआ होगा इतना
जिस तरीके से
अब कांग्रेस से बहुत टूट-टूट कर क्षेत्रीय
दल थे उस समय लोग छोड़ कर के भी कांग्रेस
गए थे आए भी होंगे पर इतनी बड़ी संख्या
में नहीं हुआ अभी तो जैसे क्या है ना
आप जितने भी
अभी ऑर्गेनिक भी नहीं है जैसे
जितने भी लोग हैं ना
सब कांग्रेस से ही निकले हुए हैं। हां वो
तो है। है ना?
मतलब कितनी बार टूटे होंगे।
कितने जख्म लगे होंगे कांग्रेस के बदन पे
कि इतने सारे कमल खिल गए हैं देश में।
मतलब एक बीजेपी की बात नहीं कर रहा हूं
मैं।
तो एक पार्टी थी जनता पार्टी।
हम
उसके कितनी पार्टियां हुई?
जयप्रकाश नारायण ने एक आंदोलन को लीड
किया। उससे लालू यादव, शरद यादव, रामविलास
पासवान, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव
यस
है ना
सब राज्य में हम
है ना बीजेपी भी कह लो एक तरह से
सब ने पार्टियां बनाई
सब नेता निकले नेता ऐसे निकलते हैं और ऐसे
निकलना चाहिए अभी आपको लग रहा है कि
क्योंकि अपन 10 साल से देख रहे हैं ना
देखो नीट में क्या होता है आप एक बच्चे को
होश कब आता है छ सात साल
राइट हम
जो परीक्षा दे रहे हैं नीट का उनकी क्या
उम्र होती होगी?
17 20 मान लीजिए 1820 के बीच में
है ना
उन्होंने अपनी जिंदगी में बीजेपी के अलावा
कुछ देखा ही नहीं है। हम
वो जब हॉस्पिटल से निकल रहे थे तो सामने
मोदी जी की तस्वीर थी।
हम
स्वच्छ भारत
आयुष्मान भारत टाइप से।
ठीक है।
और अभी परीक्षा देके निकल रहा है। वहां पे
भी उनकी तस्वीर है। क्योंकि उन्होंने देखा
नहीं। उनको ये लगता है कि यार एक ही
पार्टी है,
एक ही प्रधानमंत्री है। आपने दो-तीन देखे
होंगे।
तुमने
मैंने थोड़े ज्यादा देख लिए हैं।
बट दैट इज
अटल बिहारी वाजपेई किस तरह से होश संभा
पीछे भी हमने देवगड़ा और आई के गुजराल
वगैरह भी देखे हैं।
मतलब देखे तो होंगे पर होश नहीं था। तो
अटल बिहारी वाजपेयी से होश
14 में पैदा हुए।
98
आठ में पैदा होते मोदी जी देख रहे होते।
यह सामान्य है।
ऐसा रिएक्शन सामान्य है। दलबदल पहले भी
होता था। अभी थोड़ा ज्यादा मोह है क्योंकि
एक पार्टी बहुत शक्तिशाली है। बाकी लोगों
की शक्तियां क्षीण हो गई हैं। बहुत
ज्यादा। आप देख लो मुख्य विपक्ष विपक्षी
दल जो है और बाकी लोग हैं वह एक भी नहीं
हो पाते हैं। ऐसी हालत में भी डीएमके ने
कहा है कि मुझे कांग्रेस से दूर बैठना है।
टीएमसी के ये लोग कह रहे हैं कि हम टीएमसी
के साथ नहीं बैठेंगे। समाजवादी पार्टी और
ये लोग सब एक साथ थे तो दो पुराने वाले
नहीं थे।
आम आदमी पार्टी नहीं थी। आम आदमी पार्टी
जो है वो कांग्रेस के बिल्कुल खिलाफ है
क्योंकि पंजाब में इलेक्शन है।
है ना? बहुत कॉम्प्लिकेशन है आम आदमी
कांग्रेस देखो राहुल गांधी
सबसे मजबूत नेता हैं अभी विपक्ष में
विपक्ष में हम
वो नीड के खिलाफ बोले
मैं नहीं मानता हूं कि वोकि मैच्योर
पार्टी है उन्होंने ये जायज नहीं समझा कि
हम रैली करेंगे और धूप में निकलेंगे।
हालांकि एनएसयूआई इत्यादि ने किए हैं
प्रदर्शन।
राहुल गांधी ने स्वयं
डिमांड किया कि धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा
दें। हम एक्चुअली एनएसयूआई के प्रोटेस्ट
में वह
वाटर कैनन
वाटर कैनन भी चला है ना उनके प्रोटेस्ट
में इनके प्रोटेस्ट से ज़्यादा लोग थे
हम
कॉकरोच पार्टी से ज्यादा
वो डंडे भी खाए
इनको बस ये था कि उनकी सोशल मीडिया का गेम
जो है वो कमजोर था इन्होंने सोशल मीडिया
गेम किया
हम
बढ़िया लेकिन क्या आम आदमी आम आदमी पार्टी
ने समर्थन दिया उनको
मुद्दा तो एक ही था ना
नीट
धर्मेंद्र प्रधान जी इस्तीफा दें
तो आपने सब सपोर्ट किया उसको आपने ने
सीजेपी को सपोर्ट किया। आप सभी मिलके अगर
राहुल गांधी के डिमांड का सपोर्ट करते तो
हो सकता है ना यही प्रेशर ग्रुप बड़ा हो
जाता।
सब लोग कहने लगे देखो सीजेपी एक प्रेशर
ग्रुप बन के आया है।
बहती गंगा में हाथ धो लो।
क्यों भाई?
ये इनको दिखानी पड़ेगी एकता। व्हाट यू से
शुड बी व्हाट यू मीन?
वो नहीं हो रहा है। हम लोग विपक्षी एकता
हम सरकार को हिला देंगे। चूल्हे हिला
देंगे इनकी। कैसे हिलाओगे आप? जब पंजाब
में अलग-अलग लड़ोगे तो हां, सारा इंतजाम
जो पंजाब में लड़ने के लिए हुआ हो रहा है
ना तो कल एक दूसरे पे बहुत गंभीर आरोप लगा
रहे हैं।
कांग्रेस को जो है उल्टा सीधा सुना रहे
हैं। कांग्रेस वाले भी आपको उल्टा सीधा
सुना रहे हैं। बट दैट इज हाउ इट इज़। बट ये
गेम तो चलता रहेगा ना आपके सामने। यह सब
कुछ नया नहीं हो रहा है।
खानशाह आप पक्ष में हो कि विरोध में?
नीट के नीट के।
विरोध में रहेगा आदमी यार।
नीट अपने आप में तुमको पता है कि कड़वा
होता है सच नीट तो नीट पे बात मत करो जाने
दो
नहीं और लीक के
फिर तो बेकार है लीक के भी विरोध में लीक
के भी विरोध में बेकार है फिर
हां
कोई भी चीज लीक हो जाए ना तो खराब मानो
उसको
तो खराब है वो
पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर में बगावत हो
रही है तो देखे आपने विजुअल्स वहां जो है
पुलिस और उनकी जो है रेंजर्स मिलके गोली
चला चला रहे हैं बेकसूर लोगों पे। पूरी
दुनिया में ह्यूमन राइट्स का पार्ट पढ़ाने
के बाद
ब्रिटेन के सांसदों ने चिट्ठी लिखी है
अपने प्राइम मिनिस्टर को कि इस पे कुछ
कीजिए जो है
ये बड़ा अच्छा लगता है यार।
नहीं अपने मतलब नहीं चिट्ठी-वट्टी लिखो
उठा के।
ब्रिटेन को चिंता रहती है ना। वो लोग
थोड़ी चिट्ठी-टि
मर्मस्पर्शी टाइप के हैं ना एमथी से भरे
हुए। वो पिक्चर में किसी बेहोश होश
किसी भी चीज पे वो बोलते हैं। हालांकि
अपने लिए तो अच्छा ही है। पाकिस्तान के
खिलाफ चिट्ठी लिखी जा रही है तो और लिखी
जाए।
ब्रिटेन में मीरपुर के लोग बहुत रहते हैं।
ब्रिटेन में एक बड़ा जो समुदाय है
पाकिस्तानी मुसलमानों का जो पाकिस्तानी
मुसलमान कहलाते हैं।
वो मीरपुरी समुदाय से आते हैं।
वो 30 तो नहीं होंगे। एमपी
नहीं 30 नहीं होगा।
प्रेशर ग्रुप होगा। प्रेशर होता है ना आप
ब्रिटेन के एमपी हमारे एमपी जैसे नहीं है
हां मतलब वो
कि वो बोलेंगे कि कुछ पैसा दो
तब
व्हाट इज द कॉस्ट माइट
सिमरनजीत सिंह ₹400 ले देते
तो वो नहीं है वो लोग लिख देते हैं अपना
कॉन्स्टिट्यूएंसी का 10 लोग चला जाएगा तो
लिख देंगे
पर उनका जो पॉलिटिकल स्ट्रक्चर है पीओके
का बड़ा अजीब टाइप का मतलब वो कहने को
स्वायत्ता ऑटोनोमी टाइप की दे रखी बट जो
उनकी विधान उनका अपना प्रधानमंत्री और यह
सब होता है। उनकी जो विधानसभा है उसमें
रिफ्यूजी सीटें होती हैं 12 या 14
और वो रिफ्यूजी सीटें उनके लिए सुरक्षित
हैं जो इंडिया से आए थे। मतलब जो रिफ्यूजी
थे। वो किसी जमाने में आए थे 47 में और वो
सब अब वो फैमिलीज लाहौर और कराची में
शिफ्ट हो के बढ़िया वो कर चुकी हैं।
एक्चुअली अब वो रिफ्यूजी सीट्स पर
पाकिस्तान किस में इस्लामाबाद में जो
गवर्नमेंट है वो अपने लोगों को
नॉमिनेट कर देती है। तो इससे क्या है कि
वो वहां के पावर स्ट्रक्चर में रीजनल
रिप्रेजेंटेशन रहता नहीं है। और आप इसको
ऐसे देखेंगे ना जब इस्लामाबाद में पीटीआई
की सरकार थी तब पीओजेके में अह की
विधानसभा में पीटीआई का बहुमत था। जब
इस्लामाबाद में मुस्लिम नून की सरकार थी
नवाज शरीफ वाली तब यहां मुस्लिम नून का
बहुमत था। जब भुट्टो की सरकार थी तब इनका
पीपीपी का यहां पे था। जिसकी केंद्र में
रहती है उसी की। इसका यह मतलब है कि वो एक
ऑन पेपर ऑटोनोमी है पर वो पूरी तरह से
इस्लामाबाद के कंट्रोल में है।
भाई वो हमेशा से मिलिट्री कंट्रोल में रहा
है।
हम और वहां कुछ विकास नहीं। वहां हाइड्रो
पावर के प्रोजेक्ट्स हैं। हाइड्रो पावर के
प्रोजे उनकी मांग जो है ना
उनकी बिजली उनको नहीं दी जाती।
जिसकी बिजली नहीं मिलती सारी बिजली भेजते
हैं। लाहौर और कराची।
उनका आजाद कश्मीर बोलते हैं वो लोग।
हां। हम
हमारे यहां जिस रफ्तार से विकास हुआ है उस
तरफ नहीं हो रहा है। वो करना भी नहीं
चाहते। हम
एक तो गवर्नमेंट के पास पाकिस्तान में
उतना रिसोर्स नहीं है।
हम
और दूसरा वो चाहते भी नहीं।
उनकी जो मांगे हैं ना जिसके लिए इतना बड़ा
आंदोलन हुआ है वो एवरेज टाइप मांगे हैं।
लेकिन आटा चाहिए। हम
यह भी उनकी मांगों में है।
आटा है।
हम
ठीक है।
आटा बिजली
हां
हम
बिजली सड़कें
हम
वो यहां पे देख रहे हैं कि वो जोजिला टनल
बन रहा है।
हम
दुनिया का सबसे ऊंचा पुल बन गया।
हम
हॉस्पिटल हैं। सारे एजुकेशनल इंस्टट्यूट
हैं।
श्रीनगर की लाइफ अलग है।
तो उनको तो ये लगता है ना कि अपन पीछे तो
नहीं छूट रहे। हम
हमको आजादी का लॉलीपॉप देके
कब तक खुश रखा जा सकता है? दूसरा यह भी है
कि हमारे कश्मीर में डेमोग्राफिक चेंज
नहीं हुआ है।
हम
हमने उनके वहां के जनसंख्या पर हावी होने
का प्रयास नहीं किया है। वहां के कश्मीर
यहां पे यहां के कश्मीर में आप बस नहीं
सकते थे। हम
और 370 ये सब हटने के बाद भी आप वहां पे
ऐसा नहीं है कि आप बच सकते हैं बहुत सारे
लोग ऐसा कोई इनकरेज भी नहीं किया
गवर्नमेंट ने
कश्मीरी पंडित वापस नहीं जा पाए हैं बाकी
लोगों की तो छोड़ो
हम
जबकि पाकिस्तान वाले हिस्से में जो
ऑक्यूपाइड है
उसमें मिलिट्री के सारे रिटायर्ड लोग घर
बनाते हैं वहां क्योंकि मौसम अच्छा है
वेदर अच्छा है और सारे पंजाब प्रांत के
मुख्यतः लोग वहां जाकर के बस गए हैं और
उनकी जो जो आबादी का अनुपात है
उस पे भी असर डाल रहे हैं। उससे भी उसका
भी उनके अंदर एक उत्साह है।
लेकिन डाटा तो बहुत बेसिक चीज़ है। अब तो
मतलब उसके दाम और कीमत और उसके उसको लेकर
के
रोड बिजली
38 मांगे थी उसमें ये भी है आटा बिजली
पिटिकल स्ट्रक्चर चेंज करने की बात थी।
जेएसी है ना वहां पे वो
इनफैक्ट वो जो प्रोटेस्ट हुए जिसमें
इन्होंने लोग मारे थे। उस प्रोटेस्ट को
ऑर्गेनाइज मतलब वो शुरू ही ऐसे हुआ कि उस
उन पर टेररिस्ट वाले जो कानून होते हैं वो
लगा दिए और अब वो आरोपियों को ढूंढ रहे
उसी हिसाब से खोज रहे हैं जिसको क्या
बोलते हैं मैन हंट हम
खोज खोज के गोली मार देंगे टाइप
पर वहां पर ये पहली बार नहीं हुआ है।
हां इसके पहले भी हुआ था 25 में
फ्रीक्वेंटली होता है वहां पर और उसका दमन
कर दिया जाता है
क्योंकि वो खुल के गोलियां मारते हैं।
पाकिस्तानी आर्मी अपने लोगों पे काफी
क्रूर है। हम
वो चाहे वो केपीके हो ऐसे रीजंस में सिंध
में भी कभी-कभी बलचिस्तान में भी खुल के
खेलते हैं वो
कोई राइट्स नहीं होता वहां
बलूच से याद आया कि रिवेंज आ गई है
धुरंधर की रिवेंज
Netflix पे आ गई है
Jio स्टार पे
हां Jio स्टार पे आई है
पर आप अब तो देख चुके हैं ना
दो बार और देख लिया
अच्छा
है पिक्चर मतलब
अपेरेंटली एक्सटेंडेड कट टाइप का है
हां थोड़ा कुछ-कुछ मैंने डायलॉग जो है
ज्यादा बड़े हुए हां
कुछ-कुछ बढ़े हुए हैं खुल गाली गलौज भी
इसमें
गाली में बीप लगा था इसमें बीप हटा दिया
तो मैं ज्यादा एंजॉय कर पा रहा हूं। अच्छा
अच्छा अच्छा अच्छा
आपकी तो प्रायोरिटीज ही अलग है मतलब
गाली धुरंधर में गालियों को बीप बहुत
स्मार्टली
एंड वाला फस हल्का सा बीप मार
नहीं वो पहले पार्ट में जो है
हम
आधा हमारे गालियों के दो हिस्से होते हैं
हम
ठीक है
हम
तो क्या बोलते हैं संधि
संधि
जो भी है
उपसर्ग और प्रत्यय कह लीजिए संधि विच्छेद
कर
पहले वाले में उन्होंने फर्स्ट पार्ट को
किया था दूसरे वाले में सेकंड पार्ट को
कंप्लीट किया तो आप दोनों को मिला के
हां फर्स्ट सेकंड में मिला के आप जोड़ लो
कि क्या
बहुत बढ़िया
यस
ये सोचा नहीं था मैंने
नहीं नहीं ये देखना गौर करने की बात
ये ताऊ ने मुझे बोला था तो मैंने ध्यान से
देखा तो
क्योंकि कई सारे जो गाली का जो गाली के दो
हिस्सों में एक हिस्सा
अह किसी पारिवारिक संबंध का होता है और एक
हिस्सा अश्लील होता है।
हम्म
तो आश्चर्यजनक रूप से अश्लील वाले को छोड़
दिया गया था।
अच्छा
एक हिस्सा में
टारगेट ऑफ द गाली को हटा दिया गया था।
पिछले वाले में टारगेट ऑफ द गाली थी।
अश्लील वाला हटा दिया था। वाले में दोनों
हटा
माइंड ब्लोइंग पीक डिटेलिंग बोलते हैं ना
अच्छा हां पीक डिटेलिंग
घर की वो नहीं सीन घर की याद नहीं आई तुझे
जस्सी
हां है ना या
लेकिन इसका बहुत मीम बने हैं
तो पहला यार वो जो उसका रोल किया है सर
टिटू मेरी बहन कित है
अरे वो जो नाम मेरे बीमारी लग गई है यार
समील जमाली
नहीं नहीं जो यूपी के गैंगस्टर जिसको
अच्छा अतिथी
अतीक अहमद
क्या एक्टिंग किया उस आदमी ने भाई
लहजा अच्छा पकड़ा है।
बहुत बढ़िया।
चेहरा भी पकड़ा है। चेहरा तो
चेहरा बॉडी सब वैसे ही
मजा आया। मैं इसको दो बार और देख चुका
हूं। मतलब एक बार में नहीं
हम
जैसे आधे घंटे रात में नींद आ रही लगा
लिया
हम
तो मजा आ रहा है।
घर में अलाउड है।
अकेला हो ना अभी घर पे लोग है नहीं। सो
अलाउड है। क्यों पूछा आपने?
नहीं नहीं धुरंधर जैसी पिक्चर देखना जो है
हां फैमिली के साथ थोड़ा दिक्कत है।
गाली गलौज
गाली गलौज से ज्यादा खून खराब है।
खून खराब है। बहुत भयानक खैर। अच्छा आप
उसमें पर्सनल व्यूइंग उसका पहला ही पर्सनल
व्यू नहीं है ना आपके ड्राइंग रूम में
ब्लड गिरेगा आपको अच्छा लगेगा सिनेमा हॉल
में रहता है कि दूसरे गायब मैं तो निकल
जाऊंगा यहां से
नहीं तो
नहीं इसमें इसमें क्या बोलते हैं
टीवी पे थोड़ी देखते होंगे ये लैपटॉप या
उस पे देखते होंगे
नहीं टीवी पे देखते
नहीं लैपटॉप पे सही कह रहे हैं
लैपटॉप पे पिक्चरें देखते हो
नहीं जैसे अभी आप
मेरे घर में मैं टीवी यू फिल्म यूज़ ही
नहीं होती है फिल्में देखने के लिए बड़े
शौक से
लैपटॉप पे कैसे देखते हो देखता हूं मैं
हेलीकॉप्टर गिर रहा उतर रहा है एक 52
मंजिला बिल्डिंग पे छोटे से लैपटॉप में
कैसे फिगर आउट करते हो कि 52 मंजिला है यह
अरे दिया सलाई की तरह होगा वो उसके ऊपर एक
नहीं गिर रहा होगा
आदत पड़ गई मुझे
साइज तो होना चाहिए ना पिक्चर का
नहीं वैसे मुझे हेलीकॉप्टर के नीचे उतरते
चक्कर आने लगता है तो मैं उसको स्किप मार
देता हूं या चेहरा घुमा लेता हूं कुछ
लैपटॉप भी हाइट का प्रॉब्लम है मुझे
वर्टिगो
क्या प्रॉब्लम है लाइफ
यू नीड अ रिफिल
हम्म चाय कहां है नहीं यार अभी चाय प्लीज
ठीक है। तो आज हम लोग पर्दे पर बात
करेंगे। पर्दा ऑल काइंड ऑफ़ कर्टेंस एंड
स्क्रीन भी एक पर्दा है ना।
बड़े पर्दे पर लगी फिल्म छोटे पर्दे पर
पर्दों पर बात होगी जो
पर्दा उठेगा।
हां
तो
पर्दाफाश भी होगा।
तो मतलब जिस-जिस रूप में हमने पर्दे का
इस्तेमाल किया देखा। घरों में पर्दा कैसे
आया?
थिएटर पर्दा क्या होता था? पर्दा कैसे शहर
में आके कर्टन बन गया या
हां हां
चीक वगैरह बन गया
हां तो अलग-अलग तरह के पदे भाई साहब तो
पहले तो घरों में साड़ियों से सिलेले जाते
थे हमें याद है
और पूजा घरों के पर्दे अलग होते थे
आओ जल्दी अभी यहीं का बता रहे हो
उस पे बात होगी और फिर बाजार खबर में सपना
गुर्जर जी आएंगी साक्षात मतलब खबर में
आएंगी यहां नहीं आएंगी और फिर प्राणों से
प्रिय तीन तालियों की चिट्ठियां तो हैं ही
पर पहले एक छोटा सा ब्रेक का
पायलट्स पड़े थे पानी में और उनको
रेस्क्यू किसने किया एक ड्रोन बोट में
सेकंड वर्ल्ड वर्ल्ड वॉर में भी ड्रोन
दिखते हैं।
आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। सरकार के एक
बहुत सीनियर ऑफिशियल थे। सिक्योरिटी
एडवाइस की वजह से उनके ऑफिस को हटाया गया।
वहां से एक अलग जगह पे लगाए क्योंकि उनको
यह डर था कि कोई ड्रोन उड़ा के मतलब
सीनियर लीडरशिप को टारगेट कर सकते हैं।
लीजिए तीन ताल देखो सुन रहे हैं आप। आज तक
रेडियो पर ताऊ खानचा सरदार के साथ
प्रेजेंटेड बाय थर्मकूल कूलर्स
बुजुर्गों की दवा बुजुर्गों की दवा और
थर्मोकूल की हवा
दिल की यार इस टाइप के मुझसे क्यों नहीं
लिखवाते हैं स्लोगन
बहुत अच्छा
मैं भी लिख सकता हूं मेरे ये एडवरटाइजिंग
में जाने का मन था मेरा एक बार ऐसे पंच
लाइंस लिखूं
यार एक बात मुझे समझ में नहीं आती
थर्मोकूल में जो है ना एक चीज है जब भी
थर्मो आता है ना तो एक हॉटनेस की की
फीलिंग आती है।
थर्मल है ना थर्मस आदमी को लगता है कि
हां हां ठंड आती है आदमी अपने थर्मल
मैं विचार कर रहा था कि यार थर्मोक कूल ये
दोनों चीज एक साथ कैसे हो सकता है फिर
मुझे लगा
कि जो हॉट लोग होते हैं बहुत कूल
कूल
थैंक्स थैंक यू ताऊ मेरे लिए तारीफ की
आपने
सर सब लोग सबकी साले अपने दिमाग में
पिक्चर चल रही है
जब तक जनीमा आए हम
तो मुझे लगा कि नहीं
दैट इज वै कूल
हम
हॉट इज कूल
हां
कूल
पहले ये जैसे अब तो ये खैर थर्मोकूल
कंपेरेटिवली थोड़ा साइलेंट कम आवाज करने
वाला कूलर है हमारे वो वाले जो कूलर हुआ
करते थे वाले
उनका एक बड़ा फायदा था उस आवाज का कि घर
के झगड़े कभी बाहर नहीं आते थे
आवाज
पड़ोसियों को पता नहीं लगता था कि कूलर
चला दिया आपने और फिर आप झगड़िए इसलिए कई
झगड़ा शुरू हो जाता था तो हम लोग समझते थे
यार घर में झगड़ा हो रहा है माता-पिता के
भी तो कूलर चला देते थे जल्दी से लेकिन
झगड़े की वजह क्या होती थी दिमाग का गर्म
होना थर्मोकूल आपको ठंडा करके रखता है
झगड़े की कोई गुंजाइश
अरे आवाज जब कूलर कम करता है ना तो आपके
घर की तृणमूल के अंदर कल कलह है
हम
किसी को पता चलता पहले चलता था
नहीं
हैं आदमी पार्टी तोड़ लेता था तब पता चलता
था
बिकॉज़ कूलर चल रहा होता था गर्मी लग रही
होती थी जैसे-जैसे गर्मी बढ़ी पार्टी के
अंदर
वैसे-वैसे कूलर हवा तेज तीन से चार चार से
पांच पे कर दिया। बाहर किसी को खबर ही
नहीं है। पार्टी टूटने वाली है।
अच्छा इनकी कूलर की भी कोई विचारधारा नहीं
होती। वैसे आप देखो तो
कूलर की
क्योंकि लेफ्ट और राइट स्विंग होता रहता
है।
और नहीं पता सेंटर में भी रोक दो आप।
हां नहीं रुकता नहीं है। रोक
सेंटर में रोक सकते हैं।
अच्छा स्विंग को रोक दीजिए।
या तो रुकेगा तो सेंटर में वरना
कहीं पे भी रोक सकते हैं। आप चाहे तो
लेफ्ट राइट भी कर रहे हैं।
सेंटर में भी रोक दीजिए।
मनुष्य को लेफ्ट और राइट के बीच में
स्विंग करते रहना चाहिए। हम
यह ध्यान रखना काहे के लिए अगर आप राइट लो
हम
फिर राइट लो फिर राइट लो
तो आप गोल चक्कर घूमते रह जाओगे और आपका
डिस्प्लेसमेंट जीरो हो जाएगा डिस्टेंस
बढ़ता जाएगा फिजिक्स की बात
मूवमेंट इज नॉट ऑलवेज प्रोग्रेस
तो क्या करें
कभी लेफ्ट लो कभी राइट लो
वाह
बेसिस मुद्दा
राइट
है ना
कभी भी लेफ्ट जो है 30 30 साल तक लेफ्ट
लेते रहो
हम
फिर राइट राइट ले लो हम
आगे से राइट
हां फिर लेफ्ट ले लो ओवरऑल एवरेज आपका
सेंटर में रहेगा हम
कभी भी हां
तो मुझे लगता है कमजोर
इनका ऐसा नहीं है कि विचारधारा नहीं है
मतलब कूलर की ये लोहियावादी हैं
लोहे के आते थे ना पहले
लोहियावादी
और इसीलिए हवा के वितरण में भी समाजवादी
हैं।
हां
वाह
पॉइंट
और जो ऊपर जाता है ना वही नीचे आता है।
मोटर लगा है नीचे।
हम्।
पानी आ रहा है ऊपर।
ठीक है। वही है विचार और धारा।
हां। ठीक है?
वाह।
यह ध्यान रखना।
विचारधारा।
विचारधारा हमेशा चलायमान रहे। नहीं तो
उसमें मच्छर
पनप
हो जाते हैं। जिससे डेंगू और मलेरिया हो
सकता है।
हम
है ना? तो विचारधारा बनाए रखने के लिए
थर्मोकूल
में एक मोटर लगाएं।
हम हैं।
क्या विचार है आपका?
इसके बारे में। कमजोर हो गई तृणमूल
पावरफुल है थर्मकोल
सारा पावर धारा का धारा रह गया
पर मुझे अभी भी हनीकॉम बोलते हैं ना इसको
ये जो टेक्नोलॉजी गत्ते उसकी जगह
जो खस की जगह पर
हां मुझे इसके इसके नोमेनक्लेचर पे अभी भी
मैं मैंने सोचा था मैं रिसर्च करूंगा
पढूंगा है क्या चीज
तुम हर बार यही कहता हूं मैं
मैं नहीं कर पाया अब मैं क्या है
वो जो मधुम
उसको बोलते हैं ना वो उसको भी क्यों बोलते
हैं
नहीं नहीं उस तरह की डिजाइन है इसका
कॉम्ब क्या क्या है उसमें?
कौम है?
कंघी नहीं है ना उसमें?
हनी है उसमें। हनी स्टोरेज होता है।
में हनी होता है ना।
इसका जो डिजाइन है ना गत्ते का वो उस
छत्ते की तरह है। वो ये कहते हैं।
नहीं वो तो है ही नहीं है।
इसमें गत्ता नहीं है। छत्ता है।
छत्ता नहीं ये गत्ता है। छत्ता नहीं है।
छत्ता है भाई। गत्ता तो गत्ता होता है।
गत्ता छत्ते की तरह है।
ओरिजिनल छत्ता नहीं है। नहीं समझे तुम।
मुझे कुछ पत्ता नहीं है भाई।
जो भी है कूलर बहुत जानदार है।
सत्ते पे सत्ता है।
सत्ते पे सत्ता है।
और इस पे शहर में
है।
कपड़ा लगता है।
शहर तोलकाता है।
तो तृणमूल वालों का शहर हुआ करता था।
अभी भी है। वहां रह तो रहे ना वो।
लेकिन कुछ ये जो शहर होता है ना
उसमें क्या होता है जब आप उसको वो शहर ना
सेंटेंस में रूप बदलता है। जैसे आप
कलकत्ते जा रहे हो। हम्म।
है ना? आप पटने जा रहे हैं।
पटने जा रहे हैं।
आप गए हो कभी? पटने?
कुछ शहरों में ये है।
बोलते बोलते रुक गए कुछ। हां।
मैं पटने जा रहा हूं।
लेकिन आप दिल्ली में नहीं मैं दिल्ली जा
रहा हूं। नहीं कह सकते आप।
हम्म।
दिल्ली से पटने की सीधी फ्लाइट है।
हां।
हम्म।
लेकिन पटने से दिल्ली गई है।
हम आई लव कोलकाता।
आई लव कोलकाता। कैसे हो गया? क्या आपका?
गालिब ने कहा था यार।
अच्छा वो पेंशन लेने जाते थे ना हम
दिल्ली से पेंशन लेने जाते थे।
कल एक तीन टू ने मारा हाय हाय
वो लेकिन वो भी बड़ा ऐसे देखें तो बहुत
घटिया पर काफी पोएटिक मैं फोनेटिक्स शब्द
इस्तेमाल कर लूं। फिर किया तुमने आज
महीना तुम्हारा पूरा नहीं
तो वो पटना बहाने वो हो जाएगा एक बार हां
पटना बहाने वो चाहेगा सटना
हम
ये भी बढ़िया वो है
इसके गहरे अर्थ हैं मतलब उसमें देखो तो आप
बिल्कुल
है ना मतलब छोटे बिहार अविभाजित बिहार के
छोटे शहर से अगर कोई आपको पटना लेकर के जा
रहा हो तो बड़े उसको आपसे हां
और सटना शब्द भी बहुत आंचलिक है। मैं तो
पहली बार अपने किसी बिहार के रूममेट से एक
बार सुना था कि यार पोस्टर साटे हो।
हां साटना बोलते हैं।
मैंने कहा मतलब बनाए हो बनाने का
पोस्टिना।
हां आई नो बाद में पता चला। वो साटना जो
है
हम
बढ़िया वो भी शब्द है चिपकाने के लिए।
साटना सुपाटा
चलो खैर अब बढ़े।
पर्दे की ओर बढ़े। इस वैसे जैसे हर एक चीज
पर हमने 90ज के मध्यवर्गीय घरों में
धूल और इत्यादि गंदगी से बचाने के लिए
कवर्स बनाए थे ना फ्रिज कवर आप या तो हम
बनाते थे या वो बिकते थे टीवी का कवर
इनफैक्ट टीवी का तो पर्दा भी होता था
हां टीवी का तो लकड़ी वाला भी होता था
लकड़ी वाला पर्दा एक तो होता था इनके यहां
वो नहीं होता था तो एक वो रस्सी वाला भी
होता था एक पर्दा जिसको बाकायदा खुला घर
में बना होता था वो ये मान्यता थी कि
स्क्रीन को धूल नहीं जमने देगा वरना
स्क्रीन साफ करनी पड़ती।
स्क्रीन के आगे एक स्क्रीन होनी चाहिए।
हां हां वही वही पर्दे से फीलिंग आती थी।
आपने यह पर्दा हटाया। फिर हम
देखो सिनेमा हॉल में भी जो जिस पर्दे पे
पिक्चर दिखाई जाती थी उसके आगे एक पर्दा
पर्दा होता था।
हमें हमेशा नाटक
या कहानियां देखने की जो आदत रही है वो दो
पर्दों के बीच के स्पेस में रही है। तो
टीवी कितना भी छोटा रहा ब्लैक एंड वाइट
वाला उसमें हमने एक पर्दा लगा लिया आपने
सुनाई।
वो तो होता है कि
घूंघट जो है ना हटता भी है तो दोनों तरफ
रहता है।
हम
हम
सर इधर रहता है।
साइड में रहता है।
तो आप जो देखते हो ना आपको दोनों तरफ जो
है पैरेलल एक पर्दा जो कभी भी बंद हो सकता
है। का एहसास बना रहना चाहिए। हम
ऐसी कोई भी बहुमूल्य चीज सुंदर चीज
पर्दा हटने के बाद भी पर्दे का एहसास नहीं
हटना
वो बना रहता है कि पर्दा है
इसीलिए घूंघट के पट खोल तब मिलेगी मुक्ति
हम
गोपालदास नीरज ने कहा है
पट मतलब दरवाजा
पर्दा दरवाजा भी होता है
नहीं
पट मतलब पर्दा और पटना मतलब मतलब
पर्दा हो जाना
पर्दाना
सेट हो जाना
यानी पटना यानी खुला शहर है पर्दा
अच्छा मुझे पटना मतलब पटाने वाला
पाटन था वो
पहले पाटन था
पाटन मतलब
पाट जो है ना वो
जहां राज्य का केंद्र होता था वो राजपाट
संभालना
अच्छा अच्छा अच्छा
मतलब राज्य और राजधानी
पाटलिपुत्र
पाटलिपुत्र जो है वो वो हम
उसी से आया पाट पाटन है राजस्थान गुजरात
में वो कभी उसकी राजधानी हुआ करती थी हम
तो पाटन पटना जो है वो पाटली पुत्र पाटन
था फिर
पाटना पाटन पटना हो गया
पर्दा जो है वो पट
हम
पर ये
चित्रपट
चित्रपट
हां ये आप सही कहा
सिनेमा का पर्दास वो पहला पर्दास
सिल्वर स्क्रीन
यस
अंग्रेजी में उसको सिल्वर स्क्रीन कहते
हैं पर पहले कोई सिल्वर होता था
कपड़े का नहीं
कपड़े नहीं होता था
जिसमें लाइट नहीं होती थी इतनी ना
सिल्की सिल्की कपड़े होते थे वो
प्रोजेक्शन में इतनी लाइट नहीं होती थी तो
सिल्वर एलुमिनियम टाइप का कुछ होता था
नहीं कपड़े होते थे सिल्की वो
तो उसका कलर सिल्वर होता था वाइट नहीं
होता था
इसलिए उसको सिल्वर स्क्रीन
ब्राइटनेस ज्यादा देता था वो
पर वो तो चला गया फिर वाइट वाला हो गया
लेकिन नाम एक बार रखा जाता है ना
सिल्वर स्क्रीन पे देखिए
तो फिर रखा जाता पहले अनाउंसमेंट होता था
सिल्वर स्क्रीन पे देखिए आज की फिल्म
हम
जो भी फिल्म का नाम होता था
और सिनेमा सिनेमा को हम बोलते हैं
ब्लॉकबस्टर सिनेमा है
हम
ब्लॉकबस्टर युद्ध की चीज है
हम
जैसे अभी बंकर बस्टर होता है ना
हम
बंकर को तोड़ देता है वो तो एक बॉम्ब होता
था जो ब्लॉकबस्टर मतलब एक ब्लॉक मोहल्ले
का एक ब्लॉक को उड़ा देगा भाई एक घर नहीं
बल्कि एक ब्लॉक उड़ा देगा
सिनेमा में ही नाम क्यों
तो उस बॉम्ब को कहते थे ब्लॉकबस्टर
हम
अरे जो हिला के रख दिया उसको ब्लॉकबस्टर
किसी ने कह दिया तो अब जो है वो चला रहा
है।
ब्लॉकबस्टर हो गया है।
हम
तो बंकर बस्टर का
पूर्वज है वो।
पूर्वज है वो।
पर जैसे
अपने ख्याल का रूपला पर्दा बहुत अच्छा था
यार। आई लव दैट ट्रांसलेशन है ना रुपहला
पर्दा।
रुपह पहले पर्दे पर देखिए।
नहीं नहीं रजतप भी बोलते थे।
क्या बात कर रहे हैं?
हां भाई। रजतपट भी बोलते थे। पत्रिकाओं
में
यानी जागरण वगैरह नहीं किया था।
पत्रिकाओं में सिल्वर स्क्रीन के लिए रजत
पट यूज किया जाता था।
फिर बाद में वो चित्रपट तो खैर
जैसे मुझे एक अनुवाद बड़ा मजेदार लगता था।
वैसे आज अनुवाद की चर्चा नहीं है पर
एलबीडब्ल्यू का पग बाधा
हम
सिंपल क्लीन
पग बाधा
लेकिन पर्दा जो है ना
हम
उसके पहले का पर्दा है
पर्दा प्रथा
उसके भी पहले जाइए तो जो कार्विंग
गुफा की दीवार पे हमारे पूर्वज कर रहे थे
हिरन बना रहे थे
केव पेंटिंग बोलते थे उसे
नहीं वो तो पेंटिंग नहीं उकेर करके कुछ जो
हां
चित्र
वो तो वो भी एक किस्म का मतलब विजुअल जैसे
पर्दा अभी जो स्क्रीन जो है मतलब
कैनवस था वो
हां
हां हां कैनवस
कैनवस था
हां
पर्दा नहीं था पर्दा जो है ना प्रथा है
जो
आपके
सभी समाजों में एक तरह से
हम
महिलाओं को सुरक्षित रखने के लिए
हम
क्योंकि महिलाओं को प्रॉपर्टी के रूप में
देखा जाता था तो उनको दूसरों से आप जैसे
बहुमूल्य चीजें जो होती हैं वो छुपा लेते
हो
तो उनको छुपाने के लिए था पर्दा
घूंघट
यहां पे उतना प्रचलित नहीं था बिकॉज़ यहां
पे प्रचुर मात्रा में सब कुछ उपलब्ध थी
लूट पार्ट जो है उस तरह का नहीं होता था
पर जब आपको बाहर से लोग आए खास करके
अरब और सेंट्रल एशिया से
हम
उनके पास ऑलरेडी एक पर्दा दा का सिस्टम था
जो
बुर्का वगैरह जो होते थे
वो सब तो बाद के इनोवेशन है। तरह डिफरेंट
संस्कृतियों से आई हैं। कहीं पे बुर्का
था, कहीं पे नकाब था, कहीं पे हिजाब था,
कहीं पे
थोड़ा और भी कम था। पर्दा लेकिन एक था।
पर्दा का मतलब क्या बोले? एक दो दो लोगों
के बीच में एक स्क्रीन हम
स्क्रीन ही है वो
और वो
एक व्यवस्था थी जो कि यहां पे लोगों ने
फिर यहां के राजा लोगों ने खास करके अपने
घर में लागू किया कि भाई कोई लोग आएंगे तो
रानी साहिबा उनकी
सहेलियां जो थी
वो जो हैं सहेलियां नहीं
दासी
दासियां भी
इनके फिल इन द ब्लैंक्स में गेस मरते रहते
मजा आता है ना रानियां या उनके परिवार के
लोग जो है वो एक तो जनाना महिलाओं के लिए
जो एक कॉर्नर है उधर रहेंगी अगर
सामने आएंगी तो उनके चेहरे पे
एक स्क्रीन रहेगा आपके और मेरे बीच में एक
स्क्रीन रहेगा वो पर्दा
जो है फिर विक्टोरियन टाइम में
चेहरा तो खुला था पर और भी बदन जो है वो
फुल ढकने का
वो भी एक पर्दे का
का ही सिस्टम था कि
ब्रिटेन में हम
हमारे यहां
जब इलेक्शन होता हम लोग बोलते हैं उसको
मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट हम
मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट बोलते हैं।
पहली बार वाला जो आपने बोला वो गृह मंत्री
जी की तरह बोला एकदम ऐसे ही बोलते हैं।
दूसरा वाला तो सही था। पहले वाला
एमसीसी लागू होता है हमारे यहां। ब्रिटेन
में पर्दा लागू होता है।
ब्रिटेन में उसको पर्दा बोलते हैं।
कि पर्दा इज एन इफेक्ट।
मतलब जिस दिन के बाद से अब जब चुनाव की
घोषणा हो गई है और नई सरकार बनने तक पर्दा
प्रथा जो है वहां
लागू हो जाए। लागू होती है पी ए आर डी ए
पी यू आर डी
पी यू आर डी
डी एच
यहीं से गया है वो शब्द
हम
क्योंकि भारत उनका उनके साम्राज्य का एक
बहुत बड़ा हिस्सा
ये तो हमारे यहां भी जैसे चुनाव होता है
हाथी वाती सबको पर्दा कर देते हैं ना
हां हां जितने
तो वहां पे पर्दा सिस्टम लागू होता है अब
वहां पे इसका विरोध हो रहा है कि भाई
सिस्टम का नाम जो है ना
कुछ हां आयातित ही नहीं एक ऐसी प्रथा से
जुड़ा है जो कंजर्वेटिव मानी जाती है जो
जो हां जो सेक्सिस्ट है थोड़ा
ओल्ड फैशन है कह लीजिए
रिजिड है और फ्रीडम के थोड़ा अगेंस्ट है
तो वहां पर कुछ-कुछ जगहों पर उसका नाम
कुछ-कुछ डिपार्टमेंट्स ने चेंज कर दिया
और उसको पर्दा कहते हैं वो लोग
भारतीय प्रेम का आधा इतिहास जो है पर्दा
हटाने में ही गया है। जैसे आप देखिए चिलमन
जो शब्द है
सही जगह लेना चिलमन
आपका मन चिल है अभी इस समय कि नहीं
ये जो चिलमन है गेसू है क्या है वो आप लोग
बताइए ना आपके जमाने में
जो दुश्मन है दुश्मन है हमारी हां
कितनी सुंदर दुल्हन है हमारी इस टाइप का
ही कुछ गाना है ना वो
मेरे ख्याल से हैं
तो वही है भावार्थ वही है
कितनी शर्मीली दुल्हन है हमारी ऐसा ही
मोहम्मद रफी का है शायद
मोहम्मद रफी साहब ने गाया है
और एक वो ये होता था उस समय जो कि इस
चिलमन से
बिल्कुल पर्दा ही है
हम
बिल्कुल पर्दा है वो
हम
हां हां बिल्कुल
कि तुम मुझसे जो छुपा रहे हो पर्दा कर रहे
हो
इस चिलमन से वो झांके और इस चिलमन से वंके
इसको चिलमन ही कहते हैं जो घूंघट को ऐसे
पकड़ के रखते हैं
इस चिलमन से वो झांके और उस चिलमन से वो
झांके तो ये एक शायर थे वो तीन बार इसको
दोहराते हैं इस चिलमन से वो झांके और उस
चिलमन से वो आग झांके तो कोई खड़ा हो के
सुनने वालों में से बोलता है लगाओ आग
चिलमन को न ये झांके
सुना होगा ये तो आपने नहीं
सुना है बहुत दिनों पहले
हां
पर ये चिलमन का कांसेप्ट इंटरेस्टिंग था
उसमें आप देखिए कितने गीत लिखे गए हैं इधर
प्रेमी खड़ा है इधर प्रेमिका और बीच में
चिलमन रूपी दीवार है अब प्रेमी प्रेमिका
को झलक देख पा रहा है चिलमन कई बार उस तरह
का थोड़ा पारदर्शी होता है कि कोई खड़ा है
यह पता चल जाए पर वो झलक ही है चेहरा नहीं
देख पा रहा है और फिर वो लिख रहा है या गा
रहा छन छन के दीदार होता है ना? हां वही
वही यस लाइटिंग अगर अच्छी हो पीछे से तो
उसका बहुत
छिछला सा वो पर्दा होता है चिलमन जो होता
है जिसमें आप हल्का-हल्का दिख रहे हो
झनी झनी टाइप होता है
ट्रांसपेरेंट टाइप से होता है जिसमें आपको
हुस्न छन छन के बाहर निकलता रहे
हां
आगे
अजीज मियां को याद करो
सब याद आ जाएगा
तो ये
छान कर लेते हैं भाई
बहुत सारे लोग होते हैं उनको पसंद आता पता
है ऐसे ही हम
नहीं ये बात सच है वैसे मतलब
आप लोग खैर थोड़ा बेहतर बताएंगे पर कलाई
देख ली प्रेमिका की तीन दिन तक मस्त है हम
है ना
वही इश्क होता है
कि उस समय
चेहरा देखना तो बहुत बड़ी बात थी छत पर
उसकी एक झलक मिल गई
और यहां आपने देखा और आपने देखा कि
Instagram पे डीपी नहीं लगाई है। आप फॉलो
रिक्वेस्ट एक्सेप्ट नहीं करते हैं। वो ये
इस जनरेशन में वो पेशेंस नहीं है कि
झलक अगर सीमित भी है तब भी खूबसूरत है।
अधिक की चाह पर पिछली बार बात हुई थी ना
कि
पूरा देख लेने की जो ऑब्सेशन है ना कि यार
दिख जाए एक बार वो चेहरा भी दिख जाए। वो
पहले नहीं था। पहले तो हम हमारे पिता माता
की जो शादियां हुई हैं तो बिना एक दूसरे
का चेहरा देखे हुई हैं।
पहले कहते थे ना कि आंखें चार हो गई।
बस
हां आंख मिल गई बस ठीक है।
और वो
शर्म इतनी थी ना
खिड़की से
खिड़की से आंखें चार हो गई। यहां तो वोट
डालेंगे।
हां।
हालांकि खिड़की में हमारे यहां पर्दा भी
होता है।
हम्म
दरवाजों में भी पर्दा होता है।
हर जगह पर्दा ही पर्दा था पहले। बल्कि
पखानों में पर्दे होते थे। जिनके दरवाजे
नहीं होते थे।
हां हां। हां
अभी भी है
क्योंकि वो जो अपना स्वच्छ भारत अभियान है
शौचालय वाला
दरवाजा लगाना
उसमें दरवाजा नहीं आया है
पर्दा है
तो उसमें जैसे
पर्दा बाय द वे बेटर है
हवा चल गई तो
नहीं हवा चली गई वो अंदर ईंट ऐसे दबा के
रखते हैं नीचे ऐसे उसका लेकिन उसका हवा चल
गई तो क्या
नहीं नहीं वो हो सकता है ना
अंदर ईंट रहती
अरे भाई वो आदमी खेत में रहता था कल
हम
हवा ही हवा थी
क्या हवा चल गई
लेकिन उसका फंडा
उसको तो खेत से उसमें किया गया है
नहीं वो पर्दा गिरा के कर रहा है। यही
काफी है।
यही काफी है। और उसमें एक फंडा है। जब वो
बिजी होगा वो टॉयलेट तो पर्दा ढका रहेगा।
जब वो खाली होगा तो हटा रहेगा।
बस समझ गए? उल्टा है।
ओ जैसे ओपन क्लोज्ड होता है बाहर विदेश
के।
नॉक करने की जरूरत नहीं है।
करोगे काम।
नॉक करने की जरूरत नहीं है। नॉक करने की
जगह नहीं है। नहीं तो इमेजिन करो।
स्पेस किधर है?
इमेजिन करो कि अतुल उस इस वाले टॉयलेट में
पर्दे वाले में बैठ के अपना काम कर रहे
हो। हम तुम लड़ रहे हैं फिजिकली। हां
और बह जाओ उसी में दोनों लोग।
सपोर्ट ही नहीं मिलेगा ना तुम्हें।
हां पर्दे के साथ तो बाहर आ जाएंगे।
खतरनाक है।
यार ये टॉयलेट वहां होते हैं जहां दो
लोगों के लड़ने की संभावना नहीं होती।
क्योंकि जगह ही नहीं होती। दो बैल लड़
सकते हैं।
ठीक है?
वो हम ऐसा इमेजिन करते हैं ना हम फ्लैट
में रहते हैं जिसमें कि अटैच्ड बाथरूम
होता है। तो हमको लगता है कि सर वहां पे
दूर-दूर तक कुत्ता हो सकता है झांक के
गुजर जाए कि क्या हो रहा है इधर?
क्वार्टर की जो हम बात करते थे रहने वाले
वहां कुछ ऐसे क्वार्टर थे जिनमें टॉयलेट
में पर्दे लगते थे। दरवाजे का पैसा ही
नहीं था। उसके बाद क्योंकि सस्ता भी था वो
₹300 ₹200 महीने में क्या मिलेगा आपको? हम
तो वो भी रहता था। पर चिलमन के साथ आई आई
सपोज कि चिलमन का जो दृश्य होता होगा उसके
साथ भारी कल्पनाशीलता की जरूरत
पहले इमेजिनेशन करके ही आदमी खुश रहता था
जीता था प्रेम के लिए इमेजिनेशन की बहुत
जरूरत है वही प्रेम
वो उर्वर प्रेम माना जाता है जिसमें
इमेजिनेशन अनंत हो और टाइम पास भी अच्छा
होता हो
तसवुर
तसवुर
तसवुर और तखल
तखयु
तखयु के करिश्मे हैं बुलंदी है ना बस्ती
वो होता था। अब तो आप किसी को देखते हैं।
Instagram में प्रोफाइल चेक कर रहे हैं।
Facebook पे जाके देख रहे हैं। हर जगह
ढूंढ रहे हैं। 36 फोटो 36000 फोटो देख
लिया। टैग-वैग करके देख लिया कि कहां-कहां
टैग होगा। लेकिन आप मानते थे जैसे दिखा जो
हां हां दिखा दिखा। उसकी मां थी। उसकी
छोटी बहन थी। बड़ी बहन थी। चाची की लड़की।
जैसे हम लोगों को भालू दिखा था और हमने
माना कि मानना है।
नहीं भालू दिखा था।
हां आप मानते ही थे ना। जानते तो नहीं थे
कि भालू है।
नहीं जानते थे तब आपको कैसे? वो उसी को
मानना कहते हैं।
किसी दिन भालू आएगा ईश्वर है। ये आप मानते
हैं।
किसी दिन भालू आएगा बोलेगा हां ताऊ हम
इन्हें दिखे थे। आप यकीन मान लो आपने वो
सुना है फरीद अयाज वाला सुना ही होगा।
हमने बेपर्दा तुझे माह जभी देख लिया।
याद है अब ना कर पर्दा के
भी देख लिया।
फिर क्या है? लोग देखेंगे वहां। हमने यहीं
देख लिया।
ठीक होता था।
ऐसा माना जाता है। तेरे दीदार की थी
तमन्ना तब हमको, लोग देखेंगे वहां हमने
यहीं देख लिया।
ऐसा माना जाता है कि वहां जो अर्श पे बैठे
हुए साहब हैं
द बिग बॉस
उनके और आपके बीच एक पर्दा है।
जिसको आप वहां जाकर के देखोगे पर आपने
यहां देख लिया।
हां। तो कुछ लोग ये कहेंगे हमने तुम्हें
स्पिरिचुअल जर्नी जो है वो एक हर लहजा
बशक्ले बुते अयार बरामद।
हर लहजा बशक्लेर
बनाबत और यह
के ना तू खुदा है ना मेरा तू खुदा है ना
मेरा इश्क फरिश्तों जैसा
दोनों इंसान हैं
तो हां हां
तो इतने क्यों इतने हिजाबों में मिले
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले
हां तो
हमको ये लगता है कि जो खुदा है और हमारे
बीच में एक हिजाब एक पर्दा है
हम
और वो पर्दे में छुपा हुआ है वह हमको को
उस दिन दर्शन देगा जिस दिन हमारा हिसाब
करेगा। मतलब ऑर्डर ऑर्डर फिर
मतलब मर के जो ऊपर जाएंगे
नहीं नहीं मर के ऊपर नहीं जाता कोई
तो हिजाब कहां करेंगे
हश्र के दिन होगा यहां कबर में अजाब आएगा
पहले और वो बिलियंस ऑफ इयर्स हो सकता है
बंदे का मूड नहीं सुनने का अभी इतने लोग
मर गए नहीं सुन रहे केस जो है उसका नहीं
सुनते तो यहीं पे रहोगे अंदर और यहां पे
बहुत रोज चलेगा रोज
जबकि जजमेंट नहीं हो रहा है। अंडर ट्रायल
हो आप।
हां, यह यहां पे भी सिस्टम है भाई। जो
हिसाब
अंडर ट्रायल को जेल में कैदी की तरह रखा
जाता है।
लेकिन ये गलत है।
ये गलत है। आप मर गए आपका हिसाब किताब
फ़ौरन करो।
नहीं पर ये तो होता नहीं है। एक्चुअली
फास्ट ट्रैक चाहते हो आप।
मानने की बात है। नहीं नहींस्ट ट्रैक कुछ
लोगों ने कहा कि नहीं नहीं अगर तुम किसी
को मार के चले जाओगे तो तुमको फास्ट ट्रैक
मिल जाएगा।
हम
ठीक है। इसके चलते बहुत सारे लड़के जो हैं
वो
घोर वाले चक्कर में
हां अरे इतने वतने के चक्कर में लग जाते
हैं। वो भी गलत है। कुछ नहीं होता। अभी
आपका इनडेफिनेट पीरियड के लिए एप्लीकेशन
पेंडिंग है तो उसमें होता है कि आप पर्दा
जो है उसी दिन उठेगा एक दिन उठेगा
फिर भेद
तब तक आप देख नहीं पाओगे
उसी दिन भेद खुलेगा
हां
उसी दिन भेद खुलेगा पर्दा जो उठ गया तो
भेद वो खुल जाएगा
पूछो हां ये भी तो था पर्दा जो उठ गया तो
भेद खुल जाएगा आगे अल्लाह मेरी तौबा
हां
एक पर्दा होता है मर जाना
हम हैं
पर्दा कर गए
पर्दा कर गए हैं?
हां। मतलब अब हमारे उनके बीच में एक
स्क्रीन है। मतलब मरे नहीं।
हो
आदमी स्वीकार नहीं कर सकता ना। हमारे वाले
मर गए।
यह बड़ा अच्छा है वैसे। ये सम्मानजनक भी
है। और मतलब ये
अरे अंग्रेजी में है ना कि ही पास्ड अवे।
हां।
ये नहीं बोलेंगे कि ही इज डाइड।
पास्ड अवे। मतलब निकले हैं।
अभी आ जाएंगे।
हां। हां। उर्दू में है इंतकाल।
हां।
इंतकाल हो गया उनका।
इंतकाल का मतलब मर गए ना? ट्रांसफर ओ
इंतकाल का मतलब अरे म्यूटेशन करवाते हो
जाके वहां पे कागज जमीन वमीन तो इंतकाल
होता है ना
हां
इंतकाल का मतलब होता है कि यहां से उधर
चले गए
सोचो एक आईएएसएस ऑफिसर का
आप जीवन में कितनी बार इंतकाल
इंतकाल पे इंतकाल हो रहा है
और जो वो जला दिए जाते हैं वो भी कहते हैं
कि बैकुंठ चले गए
हां हम
परलोक की यात्रा
परलोक की यात्रा
सिधार गए
श्री हरि के चरणों में चले गए
ठीक है
श्री हरि तो यहां बैठे हैं
हम मान हम मानने को ही तैयार नहीं है कि
हम एक दिन नहीं रहेंगे। ठीक है?
नहीं है तब भी मान रहे हैं।
हां ये ये पर्दा हमने अपने आंखों पे डाला
है। वो कहते हैं ना कि वो क्या हुआ? आपका
वो आपका पर्दा क्या हुआ? तो उन्होंने कहा
कि अक्ल पे मर्दों को पड़ गया। तो मर्द
औरत जा जानवर मतलब जिनको थोड़ी सेंस है।
सबका यही पर्दा है कि हम पर्दा कर लेंगे
आपसे एक दिन। हम
ठीक है। पर हम जाएंगे नहीं।
अच्छा मान लो
आपके छाती पे मूंग द लेंगे। हम
जैसे मान लो कंपनी ट्रांसफर कर दे मेरा
मुंबई
इंतकाल हुआ वो
तो मेरा इंतकाल हो गया लोग तो रोना पीटना
मचा देंगे इंतकाल करके लेकिन यह नहीं
सोचेंगे खुद बोल रहा है तो वो एक वायरल है
क्लिप जिसमें एक बच्चा अपने बाप को फ़ करता
है कि अब्बू
हां
हुए नहीं रहे
वो नहीं वो खत्म हो गए
वो खत्म हो गए
कौन
अंगूर अंगूर खत्म हो गए
उसके बाद उसके पिताजी उसको सुनाते हैं
हां तो ये जो है ना पर्दे का सिस्टम अपना
अपना दुनिया में ऐसे ही बना हुआ है।
भाई पर्दा है
चांद से पर्दा कीजिए
कहीं चुरा चुरा ना ले चे सही है।
कहीं आता है
ये आदमी सही है। इस मामले में
यार तुम गाने के कहीं है। अच्छा मुझे लगा
कहीं
कहीं चुरा ना ले चेहरे पे नूर।
ए मेरे हमसफर
पर सूरज से पर्दा जरूर कीजिए। अभी जिस समय
जिस तरह का नूर सूरज
उसके लिए भाई
चेहरे का नूर चुरा लेगा। इसीलिए उसको
स्क्रीन कहते हैं।
हम
वो भी एक पर्दा है।
वही तो है
आपका आपकी चमड़ी जो आपके लिए एक पर्दा है
उस पर एक पर्दा है।
पर्दा है।
वरना रोस्ट हो जाएंगे आप। वो
पर्दे के ऊपर पर्दा होता है। चर्चिल ने
हम
आयरन कर्टन था ना।
हम
जानते हो ना?
हां हां वो जो
रूस और अमेरिका एक आयरन कर्टन था। दो
दुनिया दो क्या बोलते हैं उसको? दो
ग्रुप्स
हम
या कैंप्स या कोल्ड वॉर में
हां
तो वो आयरन कर्टन मतलब कोई उधर नहीं जा
सकता इधर का आदमी
तो वो आयरन कर्टन सही में होता है
कहां
स्टेज पर जैसे
कपड़े
जहां नाटक होता है ना वहां कपड़े वाले
पर्दे होते हैं। एक एक लोहे का पर्दा होता
है। इन केस ऑफ़ फायर
देखने वालों को दर्शकों को और स्टेज के
बीच में एक आयरन का वह गिर जाता है
ऑटोमेटिकली जो आयरन कर्टेन कहलाता है। वो
सुरक्षा के लिए था। अच्छा
इसलिए नहीं था कि दुनिया दो ध्रुवों में
बटी हुई है और इनके बीच
उसका कोई हां वो यूज़
लोहे का लोहे की दीवार
यहां भी कोई शीत युद्ध चल रहा है।
हां
ऐसा नहीं है पर वो था कि अगर आग ऐसी लगी
बेकाबू तो एक पर्दा ऐसा था जो कि ऐसे बंधा
होता था कि वो जल जाता था।
तो फिर वो दर्शकों के दर्शक दीर्घा और
स्टेज के बीच में एक दीवार खड़ी हो जाती
थी लोहे की जिसमें आग नहीं लगता था। पर
हिंदी पत्रकारिता में पर्दाफाश शब्द शब्द
का इतना ओवर यूज हुआ है कि ऐसा लगता है कि
होता है ना कि अधिकारी ने किया पर्दाफाश
या फला नेता का हुआ पर्दा
जर्नलिस्ट ने किया पर्दाफाश तो ऐसा लगा है
कि कुछ लोग सुबह उठते हैं नाश्ता करते हैं
पर्दाफाश करते हैं फ़श का सही अर्थ क्या है
उठाना
नहीं
कोई और किसी और शब्द में प्रयोग है यहश
हटाना
जैसे
राजफाश
हां
वही पर्दा ही
हम
राजाश करना मतलब राज
रिवील करने का मतलब
रिवील करना फास्ट करना मतलब रिवील करना
जैसे कल्याण बन जी ने वो
हम
फास्ट किया था ना
टेक्स्ट WhatsApp
चैट
नहीं नहीं वो तो
गैस फ़ास्ट किया था उन्होंने
वो
नहीं वो फ़ाश ही था
हां हम
अच्छा वो जो
पर्दा जो है वो राज भी है
पर्दा जो है वो राज भी है ना
राज को छुपाता ही पर्दा है ना
हां तो पर्दे का अर्थ यह है कि राज है।
अच्छा।
अगर पर्दा है
तो राज है
तो राज है
तो सिमरन भी होगी।
तो सिमरन भी होगी।
जय पर्दा भी हो सकती है।
जया पर्दा
हम लोग जय पर्दा ही बुलाते थे। जय पर्दा
पर्दा ही पर्दा बाद में आया पता।
अच्छा
आई थिंक पर्दा ही
जय प्रदा हम तो बाद में सुने कॉमन उसमें
है जया पर्दा।
अच्छा
अमर सिंह तो उसी में छुपे हुए थे।
अरे यार
अमर सिंह ने हमेशा
हम
पर्दे में रह के ही काम किया है।
बॉलीवुड की पर्सनालिटीज को पर्दे के रूप
में इस्तेमाल किया।
हम
अमिताभ बच्चन उनके लिए पर्दा थे। हम
जया जो पर्दा नहीं है
वह भी उनके लिए एक पर्दा थी।
जया पर्दा जो पर्दा थी
वह भी उनके लिए एक पर्दा थी।
मैं इस लिहाज से कह रहा हूं
हम
पर्दा मतलब राज
हम
उनका उनकी बॉलीवुड में पकड़ थी। वो
बॉलीवुड के लोगों को राजनीति में लाते थे।
उसका एक अलग सेलिब्रिटी होती है ना
सेलिब्रिटी की।
राज बब्बर पे भी उनका
राज बब्बर बहुत सारे लोगों को संजय दत्त
तक को उन्होंने राजनीति में इंट्रोड्यूस
किया। मैं इस लिहाज से बोल रहा हूं
कि वो
पर्दे में रहते थे।
रुपहले पर्दे से लोगों को
राजनीतिक पर्दे पे लाते थे।
राजनीति के पर्दे पे लाते थे। राजनीति के
स्टेज पे लाते थे। इस थिएटर में उनकी
एक्टिंग की जो भी कला है, जो भी उनका
ओरा था, उसको भुनाने का काम उन्होंने
विभिन्न पार्टियों के लिए किया।
हम
ऐसे समझो जया पर्दा पर्दे पे आती थी। हम
ठीक है।
फिर राजनीतिक स्टेज पे आई मैं।
हां। कुछ लोग समझते हैं कि औरत पर्दे की
चीज है।
औरत ही पर्दा है।
कुछ लोग समझते हैं कि औरत पर्दे की चीज
है।
हम
दोनों एक ही चीज समझते हैं। पर दोनों
अलग-अलग समझते हैं।
औरत को पर्दे में रहना चाहिए। औरत को
पर्दे पर रहना चाहिए। औरत पर्दे की चीज है
और औरत पर्दे की चीज है।
उस लिहाज से बोला मैं
पर ये जो यह वाला पर्दा है जिसको घूंघट
कहें या चेहरे को ढकना कहें
सबसे खूबसूरत पर्दा है।
खूबसूरत पर्दा है ये।
ऑफ कोर्स एक्साइटमेंट है उसमें।
पर इसकी अपनी भाषा तो होती थी। जैसे लोग
के नजरिए से आप देखिए। मतलब
आज हम कह सकते हैं अरे यार ये क्यों करना
है? ये तो एक दानूसी विचार है। पर जिस दौर
में ये स्वीकार्य था और इससे कोई असहज
नहीं होता था। मान लीजिए 40 साल पहले तो
50 साल पहले तब इस घूंघट की भी एक भाषा
होती थी कि घूंघट कितनी सावधानी से किया
गया है। इस समय कितना सावधान है। माथे के
आंख तक ढका गया है कि थोड़ा और नीचे तिरछा
किया गया है। अभी जल्दबाजी में लिया गया
है कि यहां तक लिया गया है। उससे
परिस्थितियां समझ में आ सकती थी। जैसे अगर
वो पूरा यहां तक का घूंघट है तो इसका मतलब
है ससुर अंदर हैं
या जेठ अंदर हैं। अगर यहीं तक किया है तो
ये है कि बहू नई है अभी। अगर हटा दिया है
तो इसका यह मतलब है कि घर में कोई बड़ा
पुरुष नहीं है या फिर रेवोल्यूशन आ चुकी
है। दो ही अर्थ होते थे उसके कि क्रांति आ
गई है। पर हम उनसे भी अंदाजा लगा लेते थे
कि इस समय घर की महिलाएं कितना स्वतंत्र
फील कर रही हैं या नहीं कर रही हैं।
पुरुषों की उपस्थिति घर में कितनी है या
नहीं कर। वो बड़ी महीन भाषा थी और पढ़
लेते थे। हम बालक भी थे लेकिन पढ़ लेते थे
कि यार अच्छा अभी लगता है मामा बैठे होंगे
तो छुटकी मामी जो हैं। हम
और कई बार होता था वो बड़ी वो तसल्ली से
बैठी हैं नीचे बैठी हैं जमीन
का भी कई अर्थ होता था जैसे आप खाना बना
रही हैं तो कितना नीचे रहेगा जब वो सड़क
पे मतलब घर में चल रही है दिखना चाहिए जब
वो झाड़ू लगा रही हैं जब वो खाना परोस रही
हैं जैसे थोड़ा ऊपर है तो कोई हो सकता है
पड़ोस का आया होदंड होता था
हां जो जो देवर लगता होगा रिश्ते में पर
अचानक से जेठ जी आ गए तो वो तुरंत उठ
जाएंगी और बड़ा कर लेंगी घूंघट
तो वो सावधान की मुद्रा तो
हां एक जैसा घूंघट नहीं होता था वो डिपेंड
कि आपकी सिचुएशन में या किस काम को कर रहे
हैं उस
सर ये डाटा एनालिटिक्स था उस समय का
शुरू के टाइम से जो उच्च वर्ग था उन्होंने
उसको पहले अपनाया
ठीक है कि रानी कर सकती है घूंघट हम
बाकी लोग नहीं कर सकते हम
ठीक है लेकिन फिर जैसे-जैसे जिनकी स्थिति
सुधरी उन्होंने कहा कि हम भी घूंघट करेंगे
हम क्या कम है क्या
हम
और फिर वो धीरे-धीरे परकोलेट होकर समाज
में पूरी तरह से फैल
लेकिन बहुत सारे बहुत सारा बहुत से
समुदायों में समाज के हिस्सों में यह संभव
ही नहीं था क्योंकि उनके यहां महिलाएं भी
काम करती थी। काम करने के लिए
सैक्रिफाइस करना पड़ता था। उनकी भी रहती
थी कि हम भी ढक के रहें।
लेकिन देन यू हैव टू अर्न योर ब्रेड। तो
वह जब मेहनत करती थी तो उनके सर से वह
कोशिश करती थी उस हाल में भी कि सर पे
बोझा ढो रही हैं पर घूंघट रहे।
इस तरह से हमने उसको इस्टैब्लिश किया था।
सदियां लगी होंगी।
इस सिस्टम को इस्टैब्लिश हुए और इसके
डिस्मेंटलिंग के तो कुछ ही साल हुए हैं।
मतलब 100 साल रख लो। है ना? आजादी के पहले
थोड़े पहले से हुआ होगा। नहीं तो
काफी टाइम तक। दूसरी बात यह थी के यह
बहुमूल्य वस्तु थी वस्तु ही थी
है ना घर की लक्ष्मी
तो वो था कि इसको नजरों से
क्या होता है कोई देख लेगा ना तो फिर वो
ध्यान रखेगा इसका
नजर छोड़ के चला जाएगा
फिर हो सकता है किसी दिन लूटने आ जाए जैसे
आप हैं घर में और आपके घर में हीरे का एक
टुकड़ा
किसी ने देख लिया कि इस अलमारी में शीशे
के पीछे रखा हुआ है।
नियत बदल जाएगी।
आपके सामने नहीं ले जाएगा लेकिन उसके
दिमाग में वो टुकड़ा रहेगा। यह भी एक डर
था। पहले के जमाने में ऐसा कोई सिस्टम
पुलिस वाला था नहीं ना कि एफआईआर करवा
देंगे आप।
तो
महिलाएं इसका
शिकार होती थी।
कोई शक्तिशाली आदमी,
कोई राजा का आदमी कोई सुल्तान है तो उसको
कोई चेहरा नहीं देखा है ना चेहरा देखने के
बाद हो सकता है कि वह बोले नहीं इसे हमारे
यहां भेज दो
हर हमले करवा देगा वो
इस तरह से तो धीरे-धीरे
ये इसको नहीं भूलना चाहिए कि ये उस युग की
बातें हैं जब स्त्रियों को
जड़ जोरू और जमीन एक ग्लास होता था
धन
मतलब गोरू भी उसमें में
हम
और
लापता लेडीज में उसकी
घूंघट की वजह से
घूंघट वो मतलब वो पत्नी खो जाती है तो वो
रविकिशन को फोटो देता है
घूंघट वाला ही होता है
घूंघट वाला उसको देख के रवििशन बड़े ध्यान
से देखते हैं कहते हैं बहुत खूबसूरत है बे
याद है वो सीन बढ़िया सीन है वो
क्योंकि यह भी रहता है कभी-कभी पर्दा जो
है सिर्फ खूबसूरती नहीं छिपाता ऐब भी छिपा
लेता
यस जैसे हम देखे थे ऐब
सत्यम शिवम सुंदरम
मतलब कि आप जैसे पान खाती हो कोई महिला
नहीं नहीं वैसा नहीं तुम बहुत डिटेल में
मत जाओ सत्यम शिवम सुंदरम तुमने मूवी देखी
है
हम
उसमें भी यही था ना वो घूंघट ही करके रखती
थी ऋषि शशि कपूर होते थे
लेकिन एक हातिम ताई मूवी थी
हम
उसमें याद है जितेंद्र जाता है मलिका होती
है बहुत खूबसूरत तो खोलता है वो तो उसको
मूज दाढ़ी होता है क्योंकि वो श्रापित
होती है आपको याद होगा तो धोखा हो गया तो
इसी घूंघट के चक्कर में जितेंद्र के साथ
ये खुद हातिम ताऊ हैं।
पर्दा जो है ना वो छुपाता भी है। अच्छी
चीजें भी पर्दा पर्दा होता है।
पर ताऊ यहां एक फिलॉसफिकल प्रश्न है।
पर्दा ढक लेता है ना
जैसे आपने खिड़की में पर्दा पड़ा है।
नहीं नहीं आप ताऊ उम्र इस विचार से जूझते
रहते हैं कि जीवन में कितना प्रदर्शित
करना है
हम
और कितना छिपाना है और यह विचार और कहां
प्रदर्शित करना है और कहां छिपाना है। और
यह भी मतलब यह मैं अह नई जनरेशन की
लैंग्वेज में अह किन लोगों के सामने
इमोशनली वनरेबल होना है या अगर
लेट्स से तीन दिन पहले मिले एक दोस्त के
सामने आप इमोशनली वल्नरेबल हो गए जिसकी एक
व्याख्या यह हो सकती है कि यू वर वीक दैट
यू आर वनरेबल। आपने अपने जीवन का कोई
इमोशनल किस्सा है जिसको लेकर के आप इमोशनल
फील करते हैं वो कह दिया तो अगले दिन आप
गिल्टी फील करते हैं कि यार मैं यू नो
मुझे आई विल हैव टू चूज़ माय फ्रेंड्स
वाइज़ली कि जिनके सामने मैं वनरेबल हो सकूं
पूरी दुनिया मेरा यह साइड नहीं देख सकती
व्हिच इज ट्रू आप हर किसी के सामने नहीं
हो सकते बट इसका सही रास्ता कहां पर खुल
जाएं
और कहां या कहीं भी खुल जाएं या कितना
खुलें और कैसे रोके यह पर्दा यह जो अनकाहा
अनदेखा पर्दा है ना कि थोड़ा खोलो थोड़ा
छोड़ो इसका क्या है रास्ता
पर्दा दो तरह का होता है
पर्दा द क्लॉथ
हम
पर्दा द राज
हम
राज द मिस्ट्री
है ना
आपने अपने बदन पर अभी
हम
पर्दा कर रखा है
शर्ट
आप इस दफ्तर में शर्ट को नहीं उतारेंगे
हम
मैं सपने में उतार चुका हूं बाय द वे मतलब
बिना बिना मैं ऑफिस आ चुका हूं बिना शर्ट
के।
सलमान।
ऐसा होता है ना कि आप आपके वन ऑफ दी फियर
में से ये है।
बट हम
ऐसा कुछ हो जाए
कि उतारना पड़े तो आप यहां पे सभी पुरुष
हैं जिन्हें आप अच्छी तरह से जानते हैं।
आपका मित्रवत व्यवहार है।
हम
तो आप कुर्ता उतार देंगे।
हम्म।
ठीक है। आप
यू विश?
हां।
मैं तो नहीं हूं। मैं नहीं।
अरे आप उतार दोगे।
मुझे नहीं भरोसा इन लोगों पे।
आवश्यकता पड़ जाए तो। हो सकता है ना कभी
आवश्यकता हो जाती है। से आपको कहीं पे
खुजली हो गई बहुत जबरदस्त और वो जानलेवा
टाइप की है तो आप कहोगे यार या वहां पे
कोई महिला नहीं है तो मैं उतार सकता हूं
या अतुल को मान लो आग लग गया तुम अपना
शर्ट
या हम हम स्विमिंग पूल में जाते हैं
शर्ट से मैं आग बुझा दूं
हां अतुल जल रहा है
हम स्विमिंग पूल में जाते हैं तो हम
उतार के
स्विमिंग स्वीट में जाते हैं ना
हां
हां
तो हमने ये देख इतना हमारा पर्दा जो है कम
हो गया है
कि हम एक दूसरे को इतने
करेक्ट करेक्ट करेक्ट
निकटता से जानते हैं कि हम
पर वही उन्हीं कपड़ों में आप क्या कहीं और
जाएंगे?
नहीं।
ऐसे लोग जिनको आप नहीं जानते उनके सामने
उन खड़े रहेंगे।
नहीं नहीं वो तो समय देश काल परिस्थिति के
हिसाब से क्लॉथ वाला कपड़ा
पर्दा
वो रहता है।
तो आपका जो दूसरा पर्दा राज होता है ना
वो भी समय काल परिस्थिति के
के अनुसार किसके सामने मैं कितना नंगा हो
सकता हूं। हम
संजीव कुमार बोलता है
मौसमी चटर्जी को मौसमी चटर्जी को अंगूर
में
हम
वो कहती है ना कि आप कपड़े बदल लीजिए हम
तो बोलता है कपड़े बदल के क्यों बदलने हैं
तो बोलती है कि
अरे मैंने आपको बिना कपड़ों के ऐसा नहीं
आप तो ऐसे कर रहे हैं जैसे मैंने आपको
बिना कपड़ों को नहीं देखा है तो संजय
कुमार कहते हैं तो तुमने मुझे नंगा देखा
है
ऐसा करके नहीं
तो क्योंकि वो एक्सचेंज बदल जाता है ना वो
नया वाला होता है वो होता है कि संजीव
कुमार ही है मौसमी चटर्जी के सामने वो
दूसरा है हम
तो हर आदमी कौन किसके सामने कितना इमोशनली
और फिजिकली पर्दा रिमूव करता है डाउन करता
है अप करता है जैसे लोग कहते हैं ना शर्म
का पर्दा ही नहीं है इसके अंदर हम
शर्म का पर्दा यहां तो अब लड़ाई दूसरी है।
अब लड़ाई
शर्म मिटाने की जैसे जिसे कहते हैं ना कि
अभी यह तो दूसरी तरह की समस्याएं हैं ना
जो लाइफस्टाइल है जो चैलेंजेस हैं इस
जनरेशन के लिए उसमें ये है कि यार मेंटल
हेल्थ इज अ थिंग यू माइट डिसएग्री बट
नहीं नहीं मेंटल हेल्थ इज अ थिंग
तो उसमें
पर्दा क्यों है फिर
हां तो उसमें यह चैलेंज है ना कि कहा जाता
है अरे यार शेयर करो बात करो ना लोगों से
इसका यह मतलब है कि पर्दा हटाओ पर चूज
वाइजली
किसके सामने
हां किसके सामने और कितना और फिर थोड़ा
धीरे-धीरे सो होता यह है कि कई बार शेयर
करते हुए आप थोड़ा कंफर्टेबल कैरिड अवे हो
जाते हैं ना कि
हम
देखो पर्दे मैं मेरे हिसाब से मेरे मानने
में या तो आप पर्दा गिरा के हमेशा रहो एक
बार में पर्दा उठा दो खुली किताब
वो होता है नंगा नहाएगा क्या
अब वो नंगा किताब है
हम
सीरियसली मैं पर्दा में कुछ यकीन नहीं
रखता मेरी बात खुला रखो। मैं बुल्ला सब
कुछ रखता हूं। खुला बेस्ट
हम लोग पूल में रहे हैं साथ में।
हां नहीं पर उसमें ये है
कि देखिए ये बहुत इंपॉर्टेंट है कि अगर
किसी ने कहीं पर अपने राज खोले भी और मैं
जानता हूं कि इसने किसी के सामने वो फलाना
रो चुका है। उसको मैं दोबारा ये नहीं कह
सकता यार तुमको कौन नहीं जानता ये। हम्।
तुम्हारे साथ तो ऐसा हुआ ही है। नहीं, यह
उसका प्रेरिवेटिव है कि वह अगेन वह
तुम्हारे सामने कहना चाहता है। नहीं कहना
चाहता है।
इट्स लाइक कंसेंट कि वो हर बार यस होना ही
मांगता है। उसी का चॉइस है।
शेयरिंग थिंग ना कि यू शुड वेरी प्लीज
शेयर।
ये बहुत आवश्यक नहीं है।
कि मन हल्का हो जाएगा। शेयर कर दोगे तो।
बिल्कुल होता है। होता है।
किसके मैं तुमसे नहीं करना चाहता।
मन हल्का अगर आप शेयर करोगे ना तो मन चिल
चिल मन यस। वो वो जो गाना था ना लाइन यार
से गम कह कर तो खुश हो लेकिन तुम ये क्या
जानो तुम दिल का रोना रोते थे वो दिल में
हंसता होगा
अब क्या सोचे क्या होना है
तो दैट इज
क्या गहरा मारा आपने
बहुत इंपॉर्टेंट है वो सोचना
कि तुम दिल का रोना रो रहे हो उसने तुमको
उकसाया भी
ठीक है शेर शेर हल्का हो जाएगा आपने हल्का
कर लिया
वो उस तब से जो है ना इतना हल्का घूम रहा
है उड़ रहा है
यार
वो खुश है प्रशा परेशान डजंट मैटर फॉर
हिम।
कुलदीप हंस रहा था। इसका परेशानी है या ना
भाई?
ताऊ बड़े मस्ती में रहती है। परेशान हो
जाए। आसिफ बड़ा मस्ती में परेशान हो जाए।
ये भी ये वो दौर भी है जब इंफॉर्मेशन जो
है ना बहुत वैलुएबल चीज है।
हमेशा से रहा है।
पता नहीं है मतलब हां होगा। बट अभी आप
इंफॉर्मेशन को सर्कुलेट करने के मीडियम
बहुत पावरफुल है।
बहुत ज्यादा।
तब मान लो किसी को किसी के बारे में कोई
बात चली। जैसे कि फिल्म फिल्मी दुनिया में
दो लोग एक दूसरे से प्रेम करते हैं। पर ये
छिपी हुई बात है। 70ज की बात मैं कर रहा
हूं। किसी को पता चला कि ऐसा
वो तो तब पता चलता था वो मायापुरी को बोल
देते थे कि हम दोनों अच्छे दोस्त हैं।
इवन नॉट ओनली 50 लोगों में फैलेगी नॉट
ओनली में तो वो एक दिन में आप देखिए
करोड़ों लोगों तक पहुंच रहा है। सोशल
मीडिया नहीं बात है ना इन फिल्में दुनिया
में अफेयर एक-ए साल बाद या दो-दो साल
10-10 साल बाद या शादी होने के बाद पता
चलता था कि इनके पीछे अफेयर था। उस दौर
में फिल्में भी साल दो साल लगता था लोगों
तक पहुंचने में। आज आप एक गलती करो
5 मिनट में पूरी दुनिया में आपकी चीजें
शेयर हो चुकी होती हैं। तो किससे क्या कह
रहे हैं आप? कहां कह रहे हैं आप? हर जगह
डर है।
ताऊ ने एक बात बोली थी कि हम दिन भर में
20 30 बार से ज्यादा कैमरे में कैप्चर हो
रहे हैं। व्हिच इज करेक्ट। हम सीसीटीवी हर
जगह लगे हैं। मैं कोने में पी सिगरेट पी
रहा हूं या किसी को कूट रहा हूं या मैं
बदतमीजी कर रहा हूं। बदमाशी सब कैप्चर हो
रहा है। 1 मिनट में आप एक्सपोज हो जाएंगे
कि अच्छा ये है इसका कररेक्टर।
हम
तो नहीं ये वो पर्दा जो था अब इस दुनिया
में खत्म हो गया है।
सभी आप बाय द वे आप जो कुछ कर रहे हैं वो
पर्दे पे अवेलेबल है।
यस
वो पर्दा हट चुकी है।
आप इतने बेपर्दा हो गए हैं।
हां।
अब आप पर्दे वाली बात मत कीजिए। पर्दा
गया।
मैंने पर्दाशी
बेपर्दा तुझे पर्दाशी देख लिया देख लिया
सबको अब ना कर पर्दा कि यह पर्दाशी देख
लिया
अब आपको लग रहा है कि वो था ना चिना सेठ
जिनके घर शीशे के होते हैं तो पर्दे वो
पत्थर नहीं मारा करते कुछ था ना वो दूसरे
जिनके घर शीशे के होते हैं
वो दूसरे घरों कपड़े
कपड़े बदलने से पहले
लाइट ऑफ करते हैं
वो दौर गया
अभी गया
पर्दा गिर गिरना
शो खत्म द एंड
उनका पर्दा गिर गया
शो खत्म हुआ
इसलिए कि वो पर्दा कर गए या नहीं
पर्दा कर गए मर
पर्दा कर गए तो वो तो चले गए
जीवन के रंगमंच से पर्दा कर गए
हां
पर्दा गिरना होता है कि जब सारे
क्लाइमेक्स हो जाता है थिएटर में
तो उसके बाद सामने वाला पर्दा गिर जाता है
लाल वाला
है ना
लाल
जो भी वो गिर जाता है मतलब
वैसे उसको बोलते हैं पर्दा बंद हो गया
पर्दा लग गया पर्दा एक्चुअली गिरता भी
नहीं पर्दा गिरना नहीं नहीं हां बोलते थे
जो घर घरों में
नहीं देखो पर्दा ऐसे होता था ना
हां पर्दा ऊपर से
गिरता था हां ऐसे आप
तो वो जो घर में आजकल वो पेंच कस के वो
उसमें लगा देते हैं ना लट्टू लट्टू में
वो गिर जाता
कई बार वो उसमें ठुसा रहता है तो वो
सीमेंट सही
नोएडा के घरों में जिसमें दीवार में कुछ
भी मारो भाई यहां तो हैंगर अलग ही पर्दा
गिरता है आम बात है अरे पर्दा गिरा
नोएडा में
फिर वो वाइट सीमेंट लाओ जो है फूंको
इनफैक्ट लोगों को बोलते हैं कि मतलब इट्स
कर्टेंस फॉर हिम्म मतलब उसका करियर खत्म
हो हो गया।
हां
कर्टन रेजर बोलते हैं लोग।
कर्टन रेजर होता है कि व्हेन
शुरू होना
पर्दा उठता है तो फिर स्टेज दिखता है
और कलाकार आते हैं तो व्हेन इट बिगिंस
कर्टेन रेजर
हम
पर ये रामलीला जो गांव में
मैं उसी प्रकार थी
जब पर्दा उसमें गिरता था तो लोग कल्पना
करते थे कि अभी एक दृश्य था। अब दृश्य
चेंज होना है ना। सेटअप चेंज होना है।
तो अब आदमी इमेजिन कर रहा है कि नेक्स्ट
सबका रामायण यहां सबको पता है। तो इमेजिन
कर रहा है कि यार इस समय जो है हनुमान जी
की पूंछ बांधी जा रही होगी पीछे। है ना?
और रावण के जो है वो लगाया जा रहा होगा।
अभी देखना है ना?
सब आदमी इमेजिन कर रहा है कि इस समय
क्या-क्या चेंज होगा।
अभी विभीषण सीता बनेगा।
क्योंकि आर्टिस्ट की कमी है।
वही
मेरा ना स्कूल में
दुधी में थे। तहसील जो दुद्दी का है ना हम
तो एक चबूतरा बना हुआ है तो एनुअल फंक्शन
वहीं होता था तो अपन का एक शो था विश्व
कन्या जिसके डायलॉग बड़े टेढ़े-मेढ़े थे तो
पर्दा उठा हमारा शो शुरू हुआ और डायलॉगवलग
सब हम लोग भूलभाल गए
तो जो गुरुजी लोग थे उनको लगे ये सब
बर्बाद कर दिए तो उन्होंने पर्दा नीचे
किया और पर्दे के पीछे फिर उसी जगह जम के
कुटाई की गई हम लोगों की धड़ाम घुसंड सब
चल अगर वह पर्दा उठा के किए होते ना
सुपरहिट शो वैसे ही हो जाता।
ये घूसा और घुसंड में क्या फर्क है?
घूसा जो होता है मेरे ख्याल से थोड़ा ऊपर
तक मारा। घुसण जो होता है घुसा करके मारा
जाता है। ऐसा मेरा मानना है।
पता नहीं मतलब आई
ये भी मेरा अपना अपना अपनी
आपकी अपनी व्याख्या है ये। हां पर पता
नहीं। पर यह जो मतलब ऐसे स्क्रीन में
देखें हम जो YouTube का थंबनेल है वो भी
एक पर्दा है।
हम
हम
अ
आप उस पे प्ले करते हैं तब खुलता है।
तब खुलता है या स्किप ऐड या स्किप इंट्रो
जो आता है Netflix पे स्किप इंट्रो आएगा
या
वो भी पर्दा है।
या स्किप ऐड YouTube पे आएगा। वो भी एक
पर्दा ही है। क्योंकि आपके मेन उससे पहले
मतलब वीडियो से ठीक पहले वो चल रहा है एक
ऐड। आप उसको हटाना चाहते हैं। आप स्किप
करेंगे। फिर मेन कंटेंट शुरू होगा।
ये आधुनिक पर्दे हैं। इनको पर्दे की तरह
हमने देखा नहीं कभी पर है तो पर्दे ही
हैं।
पर्दे ही हैं। एक
पर्दा जो है अपना टीवी जब था 14 इंच का
पर्दा था वो।
21 इंच का हुआ 32 हुआ, 36 हुआ, 42 हुआ,
55 हुआ, 65 हुआ, 75, 85, 90, 100 110
अब तो प्रोजेक्टर आ गए।
बड़े-बड़े पर्दे आ गए। पर वो पर्दा ही था
ना?
हम
उसको बोलते थे स्माल स्क्रीन। हम
हम छोटा पर्दा छोटा पर्दा
है ना इडियट बॉक्स भी बोलते थे
हां इडियट बॉक्स
उसको हिंदी में क्या बुद्धू बक्सा
याद है
हिंदी अखबारों में कभी-कभी आता था बुद्धू
बक्सा
हम
क्योंकि वो आदमी को इडियट बनाता था
हम
और
था क्यों कह रहे हैं
क्योंकि अब वो बुद्धू बक्सा नहीं कहलाता
है। नोबडी कॉल्स इट इडियट बॉक्स।
क्योंकि अपने मतलब जो बक्सा था उसमें
दूरदर्शन ही आता था।
मतलब लेज़ लेज़नेस की हद थी ना। एक ही चीज
आता था दूरदर्शन
जो कि टेलीविजन का शब्दश है मतलब शब्दश
नहीं अक्षरश अनुवाद
टेलीविजन का दूरदर्शन हां
अनुवाद था ऐसा कोई नाम नहीं रखा इन्होंने
हम
और उसमें जो आता था वो आता था
हम
फिर बाद मेंकि अमेरिका में ना वो मनोरंजन
के लिए बहुत सारे चैनल आ गए और उसमें
ज्यादातर मनोरंजन ही होता था। अपने जैसा
कृषि दर्शन इत्यादि जो है ना वो नहीं तो
इसलिए उन्होंने इडियट बॉक्स कहना शुरू
किया बिकॉज़ उससे आदमी की आईक्यू कम होती
थी। हम
सीरियसली बिकॉज़
रेडियो में ना व्हेन आई मैं जब बोलते हैं
कुछ तो आपको
थिएटर ऑफ़ माइंड एंड यू इमेजिन
हां आपको इमेजिन करना पड़ता है पर टीवी ने
वो दिखाना शुरू कर दिया इसलिए भी बोलने
लगे कि बुद्धू बक्सा है ये
पर वो स्क्रीन जो है
वो लगातार बढ़ता गया वो श्वेत श्याम ब्लैक
एंड वाइट से अभी जो है वो 8K टाइप
क्या 8K आता है ना
हां हम नहीं
के स्क्रीन आता है जो घरों में लग रहा है।
रंगीन चल चलचित्र कुछ होता था ना क्या
बोलते थे उसको ब्लैक एंड वाइट कुछ ऐसे
क्या बोलते थे
रंगीन ही बोलते थे रंगीन
नहीं कुछ था
कलर टीवी आया तो रंगीन टीवी बोलते थे थे
रंगीन टीवी बोलते थे
हां पर वो आप उन बाजारों में गए हैं जहां
पे लिखा होता है पर्दे ही पर्दे
हम
तिवारी टेंट हाउस
गद्दे ही गद्दे पर्दे ही पर्दे
जैसे अह ये दिल्ली में ही होता है वैसे आई
थिंक दिस हैज़ गॉन फ्रॉम दिल्ली टू अदर
सिटीज
हम ही ही वाला पर्दे ही पर्दे बजते ही
बजते
ही गाड़ियां
गाड़ियां ही गाड़ियां
मतलब वो क्योंकि हमारे यहां क्लियर था
पर्दे की दुकान है तो पर्दे ही पर्दे
होंगे मतलब क्या बात हुई
नहीं पहले गांव में
एक पर्दा कौन बेचता है यार पर्दे का मतलब
है कि वैरायटी
थोड़ा ही जाता है ना थोक है
पहले भी गांव में अभी भी बहुत कम होता है
कि पहले स्पेसिफिक दुकानें नहीं होती थी
कि पर्दे की दुकान अलग
सब एक ही में मिलता था उसको गारमेंट शॉप
बोलते थे
कि जाइए वहां पर्दा भी है चद्दर भी है
कपड़े
फर्निशिंग की दुकानें अलग होती थी हर जगह
लेकिन वहां पर्दे नहीं बिकते थे
नहीं नहीं
जो फर्निशिंग की दुकानें होती थी वहां
पर्दे कवर इत्यादि ये सब मिलते थे
नहीं वो मेरी तरफ तो नहीं था वैसा तो
गारमेंट वाले में आपको कपड़े मिलते थे
पर्दे भी व मिल जाते थे
और वो पर्दे का कल्चर क्या होता था पहले
पर्दे तो घर में पुरानी साड़ी फाड़ करके
पुरानी साड़ियों से
पुराना चद्दर टांग देते थे वही पर्दा होता
था कहां इतने पैसे होते थे
बेडशीट ही पर्दा होता था बेडशीट पुराना हो
गया काट के पर्दा बना दिया
इनफैक्ट उस दौर दौर में 90ज में घर की
हैसियत भी कुछ लोग इस बात से जांच आंक
लेते थे कि उनके यहां पर्दे घर में बन के
सिले हुए लगे हैं या खरीदे हुए लगे हैं।
तो तब बाहर से इतना कॉमन नहीं हुआ करता था
खरीदना और अब तो खैर इतनी वैरायटी है
उसमें
उसमें भी पुराने पर्दे
कंप्लीट क्या बोलते हैं जो ब्लैक
हां फुल ब्लैक आउट
फुल ब्लैक आउट पर्दे आ गए हैं
अब तो कॉम्बिनेशन
डिफरेंट लेयर्स होते हैं ना
लेयर्स आ गए हैं
अब तो मैच कराते हैं ना कैमरे में कि
ऐसेसे
हां कॉम्बिनेशन कि आपके वॉल पर क्या है
तीन अलग कलर एक ही डंडी में तीन तरह के
पर्दे लगेंगे तो मैच करेगा ये
अब तो वो रिमोट वाला पर्दे आ गए हैं और
फिर पर्दे भी उस तरह के हो गए हैं कि
लकड़ी की चिक बन गई है जिसको आप खींचिए तो
फिर वो धीरे-धीरे उठेगा।
अब तो आवाज मारो सीटी मारो तब भी उठने
लगता है। वो वाला भी आ गया वॉइस कंट्रोल।
नहीं वो उनके पर्दे भी जो जिस दिल्ली
चुनाव से पहले जो अरविंद केजरीवाल
के सरकारी घर की चर्चा शीश महल करके हुई
उसके पर्दे सुनते हैं। 13.5 लाख के थे तो
आवास थे।
वो भी रिमोट वाले ही थे। बड़े
अब तो यह बड़ा सब कुछ पर्दे पे झूला झूला
है।
पर्दे पे झूला डांट बहुत पड़ती थी क्योंकि
यह था कि पर्दा गिर जाएगा।
झूला कैसे झूलते पहले समझो।
उसको पकड़ लिया
नहीं।
और उसको पकड़ के ऐसे ऐसे
वो वाला नहीं
तो दो पर्दे होते थे। उसको नीचे से बांध
दो।
अच्छा।
फिर उसके बीच में बैठ के दो लोग तुमको ऐसे
गोल-गोल घुमा देते थे।
हां फिर वो चकरी की तरह।
फिर छोड़ते थे चकरी की तरह। क्योंकि पहले
सिकड़ी की तरह होता था आदमी।
सिकिया पहलवान बोलते थे।
हां। तो भारी रहेगा तो गिर जाता।
नोएडा में नहीं टिकेगा।
नोएडा में तो पर्दे नहीं टिक रहे। तुम
कहां टिकोगे?
दीवार गिर जाएगी।
हां।
मुझे अपने घर में बहुत डर लगता है कि कल
को कोई मान लो किसी से हाथापाई हो रहा है।
दीवार में टकरा रहा है। दीवार लेके आप
नीचे चले जाओगे बिल्डिंग के। सिर्फ उनका
वो लिंटर ही सही होता है। बाकी सब कुछ ध
मेरे नोएडा में नौरंगी फ्लैट लिए हैं।
अरे यार बहुत दिनों के बाद आई है।
इंटीरियर डेकोरेशन बहुत जबरदस्त करवाए
हैं। दीवार में जो है
हम
एक दीवार में ही उन्होंने 12 नीचे छह इधर
तीन इधर नौ लिख के
घड़ी
घड़ी दीवार में बड़ा
कांटा नहीं
हम
टाइम कैसे पता चलेगा? अरे वही तो रात में
गया वहां और फुल टाइट हां
टाइट उनके दोस्त भी टाइट
तो उसका दोस्त जो है ना मन ही मन सोचता था
साला इसको पता कैसे चलता है कितना बजा
हम
बहुत लास्ट लास्ट में जब उठा ना पहले उसको
लगा कि अभी उसने बोला थाईलैंड से लाए हैं
ये चिपकाए जो उसने फाइनली रात में जब
निकलने लगा ना उसने बोला कि टाइम क्या हुआ
है भाई साहब
यार ये घड़ी तो अच्छा तुम थाईलैंड से लाए
हो लेकिन पता कैसे चलता है कितना बजा हम
उसने बोला अरे तो वही नीचे में ना एक
हथौड़ा रखा था तो नौरंगी ने कहा अभी बताते
हैं ये देखो उठाया और बीच में ही ढ हथौड़ा
मारा
दीवार पे
हां उधर से नेबर बोलता है अबे रात के 2:00
बज रहे
सो जाओ पागल
यार नरंगी कमाल है भाई अरे ये नोएडा की
दीवार के बारे में है। ये हालत है। इधर
बजाओ तो पड़ोसी उठ जाता है।
एक पूजा घर का पर्दा होता था अलग।
वो भी घर पे ही बनाया जाता था। जैसे आज
बाकी पर्दों में ना ज्यादातर में वो छल्ले
हां पड़े रहते।
हां।
छल्ले होते थे। वो एक तो पहले वो वाला
छल्ले आते थे जो हुक की तरह लगते हां अब
जो है पर्दे के बीच में
अब वो बीच में गोल की तरह लगते हैं। पर
पूजा वाला जो पर्दा होता था ना तो वो
डोरी पड़ी थी
डोरी इस पे ही चलता था और उसको अगर आपको
खोलना है तो ऊपर से सरकाइए
वो अभी भी है यार पता नहीं उसका कैद क्या
मतलब घर के सारे पर्दे जो है एक तरफ तरह
के हैं और वो पूजा वाला सिर्फ
डोरी वाला
पर्दा उसमें स्प्रिंग वाला वो
डोरी है स्प्रिंग वाला
स्प्रिंग वाला कपड़े धागे वाला भी होता है
वो
वो स्प्रिंग वाला है यार दोनों तरफ
कांटियों में लगा हुआ है वो एंड इट इज़कि
वो वुडन है टेंपल मतलब वो जो है उसके अंदर
मार्बल वाली चीजें हैं पर वो बाहर वाला
वुडन है हम
और डेरेबल
पर ये धीरे-धीरे कल्चर मतलब घर की चीजों
पर जो उसको ढक कर या किसी चीज से कवर करके
रखने का वो था कम हो गया। हालांकि धूल और
उसके विकल्प भी धूल कम हो गया है ना
मतलब कम तो नहीं हुआ है। बढ़ा है धूल पता
नहीं मतलब जस्ट आपने लेकिन घरों को सा उस
तरह से डस्टिंग बस्टिंग का कल्चर
पहले क्या था ना पहले घर यूजुअली आदमी
खिड़की खुले रखता था। हां वही वही
क्योंकि अब तो बंद रहता है। हां
तो अब पहले के मुकाबले अब धूल कम आता है।
फ्रिज टीवी और वो जो आपकी ड्रेसिंग टेबल
है ये सब कवर किया जाता था।
सबको पर्दे में रखा जाता था।
रखा जाता था
और उसमें नजर लगने
रिमोट को पर्दे में रखा जाता था। रिमोट का
वो कवर
है ना?
जो आता था प्लास्टिक वाला वो चढ़े रहता
था।
पीला पड़ जाता था। वो
नहीं भाई आपको मार्केट में हर रिमोट के
लिए कवर मिलते थे। जिसमें पीछे एक टिच बटन
भी होता था या
वाला बटन होता था
और उसमें होता था कि ओडा का है
इसमें लगेगा क्या
Philips का है तो Philips वाला चाहिए ओडा
काडा वाला चाहिए
उसके वो सींग निकले रहते थे
अरे पर्दे
चीजें गायब हो रही है यार धीरे-धीरे
वो लेकिन एक बात है आदमी जब जन्म लेता है
अस्पताल में जन्म के समय पर्दा रहता है
पर्दे में जन्म लेता है और अगर उसकी
मृत्यु मृत्यु अस्पताल में हुई हो ओटी में
पर्दा रहता है हम
जी मतलब पर्दा जो है आपके जीवन की शुरुआत
से लेकर आखिर तक किसी ना किसी रूप में
पहला पर्दा तो मां का पेट होता है जिसके
अंदर आप वो वो भी पर्दा है
यस
आप निकलते हैं और पर्दा कर जाते हैं
हम यही है
पर्दा क्या बात कही पर्दे से शुरुआत पर्दा
ही
हम अकबर इलाहाबादी का है वो जो आप कह कह
रहे थे
क्या
मर्द की अक्ल पे पड़ गया
हां
है ना वो ऐसे कि बेपर्दा कल जो आई नजर चंद
बीबियां अकबर जमीन में गैरत कौमी से गढ़
गया पूछा जो मैंने आपका पर्दा वो क्या हुआ
कहने लगी कि अक्ल पे मर्दों के पर्दा गया
ओ हो
मर्द की अकल पे जो पर्दा पड़ा है बहुत
पहले पड़ गया
फिर भी किस किस टाइम में पड़ा होगा कुछ
पता नहीं आप इतने उसे कह रहे हैं बहुत
पहले फिर भी किस टाइम
बहुत पहले
और वो उसी ने फिर उनके शक्ल पे डाला
ये मैंडेट किया कि तुम्हारी शक्ल पे पर्दा
होगा जब उन्होंने ये किया तो फिर क्या हुआ
कि जिस चीज को आपने बचाने की कोशिश की
वो
वो लूटने का सामान हो गया। आपके पास इतनी
बेशकीमती चीज नहीं है। लेकिन आपने उसको ढक
ढक कर बेशकीमती बना दिया ताकि बाकी लोगों
की नजर उस पे पड़े
तो उसको लगे कि कुछ बेशकीमती है।
तो पर्दा जो है उनकी शक्ल पर डाल के आपने
अपनी अकल पर डाल लिया। अगर वो यूं ही जैसे
आप घूम रहे हो वैसे वह घूमती
तो मामला ही नहीं था। आपको दिन रात उसकी
चिंता ही नहीं सताती।
हम
है ना? तो आपने एक आपके जितने भाव की
वस्तु को बहुमूल्य बना दिया। बनाते गए।
हां।
क्या होता है? पर्दा आप डाल लेते हो कि
गर्दा नहीं पड़े।
वाह
यही उद्देश्य होता है ना। जैसे अपनी गाड़ी
के ऊपर डालते हैं। बारिश में नहीं
निकालते।
हम
मसून में इनकी गाड़ी नहीं निकलती।
ये खुद भीगते हैं। तो
गाड़ी नहीं भींगती।
हम
हां। क्योंकि पर्दे में रखा हुआ है।
वैल्यू किसकी है? आपकी। आपने उसको ज्यादा
वैल्यू दे दी। तो आपकी अक्ल पे पर्दा
पर्दा पड़ गया है।
हम
कहने लगी कि मर्द अक्ल पे मर्दों का पड़
गया। हम् मर्द मर्दों और पर्दों में
काफिया भी मिलता है।
भविष्य में कभी गज़ल कही जा सकती है। और
है ना मतलब सर्द
बहुत सारे काफी हैं। मर्द पर्द सर्द
खूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं।
साफ छुपते भी नहीं
सामने आते भी।
आ
गौर से दृश्य दृश्य को। देखिए आप
खूब पर्दा है कि
खूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
वही पर्दा है व बैठे हैं पकड़ के हमने
अरे अरे क्या एक्सप्रेशन दे रहे
अरे मैं खो रहा हूं
क्लोज अप देख साफ छुपते भी नहीं सामने आते
भी नहीं बीच का मामला है
ये जो ए्बग्विटी होती है ना
कि हम हैं भी
और नहीं भी
और नहीं भी
यही तो
हो भी नहीं और हरजा हो
तुम तुम एक गोरख धंधा हो
क्या बात है
तो साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
अगर साफ छुप जाएंगे तो कम से कम आप तो
मुक्त हो जाएंगे ना फ्री हो जाएंगे मैं
दूसरी जगह देख लेता हूं इधर नहीं चल रहा
लेकिन नहीं आपको वहीं पर एक हुक दे दिया
गया है
हम
कि अब आपने सैल्यूट देख लिया है तो आप
इमेजिन कर रहे हो
हम
कहां खो गए पता नहीं बहुत अच्छा था यार
पैसे नहीं है बस
होता यही है जैसे लोकतंत्र है
हम ये इसका वही मतलब है आई लव यू भी ना कह
रही मौसू और बात भी ना करनी छोड़ रही
लोकतंत्र है ना अपने देश में
हम पर साहब छुप भी नहीं रहा है
तो कुछ लोग कह रहे हैं कि नहीं रहा
तानाशाही नहीं चलेगी नहीं चलेगी नहीं
चलेगी
वो कहते हैं हमें तो प्रश्न पूछने का
अधिकार ही नहीं है सारे इंस्टिट्यूशन
कैप्चर हो गए हैं
लेकिन ऐसा नहीं है।
सब कुछ वैसे ही चल रहा है जैसे पहले चल
रहा था।
नेता लोग गाड़ी में पर्दा काहे लगाते थे?
चिलमन से लगे बैठे हैं।
साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं।
इसीलिए नेता लोग गाड़ी में पर्दा लगा के
चलते थे पहले।
क्योंकि फिल्म लगाना गैरकानूनी है।
खाली फिल्म लगाना गैरकानूनी है। आप पर्दा
लगा लेंगे आपको फाइन हो जाएगा। हम पता है
वो पर्दा लगा लेते हैं वाइट वाला क्रोशिया
वाला
क्रोशिया टाइप रहता है उसमें थोड़ा
जालीदार
को पारदर्शी बाकी छिप जाता है उसप सब
पर ये बताइए इसको फिल्म क्यों कहते हैं जो
शीशे पे लगाई जाती है आप लगाते हो फिल्म
नहीं
घर में कभी फिल्म नहीं लगाते आप देखने के
लिए
अब गाड़ी वाली बात करते घर पे कैसे चले गए
वो फिल्म ही होता है वो
हां मैंने गाड़ी को फिल्म चढ़वाया
वो जो रील में वो निकलता है उसको फिल्म
कहते हैं उसी से फिल्म आया है।
हां। हम भी जो ये लगाते हैं वो फिल्म ही
है। हां उसको फिल्म ही बोलते हैं कि
फिल्म जो है वो क्या है? एक जीना सा पर्दा
है।
स्क्रीन है।
पीपीएफ मैंने करा है भाई।
पेंट प्रोटेक्शन फिल्म।
ओ अच्छा मुझे लगा ये प्रोविडेंट फंड
प्राइवेट प्रोविडेंट
पीपीएफ वाला।
फिल्म जो है वो फिल्म क्या है? झिल्ली है।
हम
झिल्ली कितना सही शोध है यार इसके लिए।
हां ऊपर झिल्ली
चलो एक झिल्ली देखने चलें। चलो मैं और तुम
दिल्ली देखने चलें।
बहुत ही वाहियात इतने
अरे बहुत मेरे एक मित्र थे वो कहते थे यार
कौन सी तस्वीर लगी है शारदा में
तस्वीर
हां तो मैं हमेशा
हमेशा जो है ना तस्वीर लगी है समथिंग द
पिक्चर
तस्वीर लगी है
नहीं क्योंकि वो तस्वीर ही बोलते थे
हम
चलचित्र तो सवाल ही नहीं है
पर अगर सिर्फ बोला तो चित्र देखने जा रहा
हूं तो कैसा लगेगा चित्र देखने जा रहा है
तो
चलचित्र कुछ मूवमेंट सिनेमा हॉल में क्यों
जा रहा है
हम मूवमेंट वाले चित्र जो दिखे
नहीं चित्र बोलते हैं ना वो तस्वीर बोलता
था भाई
हां तस्वीर तो गलत बोलना था उनका
नहीं गलत क्यों है आप तो पिक्चर बोलते हो
कौन सी पिक्चर चल रही है
हम पिक्चर बोलते हैं अंग्रेजी
अंग्रेजी बोलो तो सही
नहीं नहीं अब फौरन आप आ जाते हो उसी पे
पिक्चर मतलब भी सही है मतलब
हम
पर्दे में फंस के गिरना बहुत कॉमन होता था
पहले
ऐसा
बचपन में छुटपन में आप दौड़ रहे खेले
पर्दा लगा हुआ है बच्चे होते थे ध्यान
नहीं
धक्के से गिर गए पर्दे में फंस गए पता पैर
भी उसी था आप उसी में गिर भी गए तो ले दे
के
तो पर्दा लेके गिर जाते थे
पर्दा लेके ही गिरता था थे आदमी
और पहले ना अभी भी मेरे पुराने वाले घर
में जो बुद्धि में है तो ताऊ समझेंगे पहले
पर्दे के लकड़ी का डंडा होता था और दो ऐसे
निकले होते थे जिसप वो रखा जाता था उसके
आगे शोपीस बनाया जाता था एक चौड़ा सा
चौकोर मतलब 1ढ़ एक फीट का होता था
जो ऐसे आई डोंट नो किस लिए होता था वो
ताकि वो डंडा ना दिखे या कुछ ऐसा होता था
और परदेस पे
वो डंडे का पैनल होता था एक जिस ऐसे कुंडी
लगी होती थी जिस पे डंडा ऐसे रख देते थे
फिर उसके आगे एक शेप बनता था
उसके आगे एक पैनल होता था
हां यस ताकि वो डंडा ना दिखे
हां इसीलिए होता था वो तुमने नहीं देखा
होगा
नहीं वो यहां भी होता है यहां पे भी सबके
जो वो
अच्छा वो जो मतलब उस रोड के ऊपर जो एक कवर
करने के लिए रहता था
पहले वो काफी चौड़ा होता था घुमा
ऑब्वियसली उसकी डेप्थ होती थी पैनल होता
पूरा
ताकि वो पर्दा कहां तक है यह दिखे नहीं
हम
अच्छा पर्दा उतारना उतारना तो चलिए आसान
है पर उसको लगाना भी है इसके खिलाफ घर में
पर्दे टांगना जो है क्या सलवट पड़ना चाहिए
ना उसमें मतलब एक
सलवट नहीं उसकी साइड
हां मतलब उसको प्लीट्स
उसको उल्टा या सीधा
प्लीट्स हां वो उल्टा सीधा आप जब लगा रहे
होते हैं उस समय आपको आईडिया नहीं आता
हां तो वो गोल पकड़ पकड़ के जैसे सच्चाई
को वो किया जाता है आपने पकड़ लिया फिर
आपने डाला
पहले पूरी रड नीचे नहीं उतारे उतारे बिना
हल्का सा टिल्ट करके टेढ़ा किया फिर डाला
फिर उसमें चूड़ी कस दी।
पहले ना घर में जो पर्दे बनाए थे हाथ से
जो पुरानी साड़ियों से या पुराने बेडशीट के
बनते थे तो हाइट कम होती थी मान लो
हम
तो क्या जुगाड़ होता थे?
नहीं
फिर उसमें ऐसे लंबे से डोर बनाकर नीचे
लटकाया जाता था।
अच्छा हां नीचे एक झालर सीट जाती थी। एक
हाथ तक और फिर वो जो ताऊ ने बोला उसको
बोलते थे। क्या बोलते थे ताऊ?
फॉल हां फॉल।
बेडशीट वाले पर्दे में हमेशा फॉल लगाना
पड़ता था। फॉल क्यों बोलते हैं उसको?
क्योंकि फॉल फॉल है।
फॉल करे सीधा है। फॉल करे नहीं ऊपर मूचड़ा
नहीं रह जाए।
फॉल जो
अपने कुर्तों में होता है या बाजा उसमें
भी फॉल कहते हैं।
साड़ियों में भी
साड़ी में तो होता ही है।
तो पर्दों में लगता था
वो भी कमाल का काम होता है।
वाटरफॉल
वॉटरफॉल
आपका भी
रीसेंट वॉटरफॉल आपने कब विजिट किया? अभी
शीशू में वाटरफॉल
बिजार खबर की ओर बढ़ते हैं।
बिज़ार खबर सबसे बड़े पर्दे की तो बात ही
नहीं हो रही है।
कौन पर्दा
इस पर्दे की
टीए अच्छा फोन ये भी तो एक पर्दा
ये छोटा हो गया है।
बहुत छोटा लेकिन बहुत बड़ा है।
ये हमेशा अब हम जेब में अपने-अपने पर्दे
लिए।
पर्दा छोटा है लेकिन देखने वाले बहुत
ज्यादा हैं इसको।
ये इसने
बेचैन कर देता है ये।
ये इतना छोटा पर्दा है। हम
इसने पूरी दुनिया को छुपा रखा है।
यस
आपसे
हम
बट हम तो देख रहे हैं इसको छुपा क्या रखा
है
आप इसको देख रहे हैं ना
दुनिया को नहीं देख रहे दुनिया आपके सामने
हो रही है
घट रहा है घट रहा है सब कुछ
देख नहीं रहे
आप नहीं देख रहे पर्दे का काम क्या है
छुपाना
यस
तो जब आप पर्दे पे कुछ देख रहे होते हैं
सब कुछ छुप रहा होता है
तो सब कुछ छुप रहा होता है परम ज्ञान
पहले
आदमी
जब दुनिया की
चीजों से उगता जाता था।
अपने जीवन को घटता देखकर अपने चारों तरफ
इतना कुछ होता देखकर थक जाता था। सब कुछ
पॉजिटिव नहीं होता था। तो दो-तीन घंटे के
लिए एक डिस्ट्रैक्शन ढूंढता था। तो पहला
पर्दा नाटक कुछ भी मतलब
कुछ भी थिएटर 3 घंटे वो उसको एंटरटेन होने
के लिए जाता था। वो डिस्ट्रैक्ट करता था।
उसका मन बहलाता था।
उसको भटकाता था। जाओ पिक्चर देखो मन।
तीन घंटे के बाद वह फिर धरातल पर वापस आता
था। उसको अपनी औकात पता चल जाती थी।
ये छोड़वे नहीं कर रहा है। छोटा वाला
पर्दा
खुला है तो खुले है। उठा है तो उठे।
दुनिया डिस्ट्रैक्शन है।
अब आप अपने मन को भटकाने के लिए दुनिया
देख लेते हो।
हां। अगर इससे थोड़ा टाइम मिल जाए। अब सब
कुछ इसी में घटित हो रहा है। खबरें भी,
रिश्ते भी,
मोहब्बतें भी, लजीज खाने का भी खरीदारी
वगैरह सब
सब कुछ यहीं घटित हो रहा है। आपकी जीवन
में कुछ नहीं घट रहा।
एक तो जब आप हमको देख के बोलते हैं, हमको
अपने ऊपर डाउट है।
अरे आपके मोमेंट्स जीवन क्या है?
नहीं तो इनके जीवन में कुछ घट नहीं रहा
है। इनके जीवन में सब बढ़ रहा है।
क्या बढ़ रहा है भाई?
अरे दिन व्याधि भाई व्याधि।
अपना लाइफ मोमेंट्स को जोड़ जोड़ जोड़ करके
बना है। हम
1 + 2 + 3 + 4 ऐसे अनंत इतने कोटा मिला है
हम सबको मोमेंट्स का कुछ अच्छे कुछ बुरे
वो डिस्ट्रैक्शन हो गए
हम
स्क्रीन मेन अट्रैक्शन हो गया
ट्रू
यस
तो आपकी जिंदगी के मोमेंट्स को चुरा रहा
है।
जैसे कि आप दुधी बाजार में जाकर
हम हम
दो प्लास्टिक के बाल्टी
तीन सर्फ एक्सेल
हम
वाला साबुन दो गमछा
एक किलो रसगुल्ला
कॉम्बिनेशन देखो
इत्यादि इत्यादि लेकर शाम में आते थे ना
हम
आपको पांच लोगों से
इंटरेक्शन
करना पड़ता था
और एक हसीन लड़की से
दीदार होता था आपका हम
फिर आप सपने अपने बुनते हुए घर आते थे। दो
आदमी रास्ते में आपको सलाम वालेकुम
कहते थे आप वालेकुम अस्सलाम।
ठीक वो चला गया।
सब गया।
एक बंदा आता है कहता है ओटीपी दीजिएगा बात
खत्म।
हमारे साथ थोड़ी हो रहा है। इसके साथ भी
हो रहा है। आपके साथ भी हो रहा है।
सबकी जिंदगी के मोमेंट चुरा रहा है। जीवन
में चुरा ना ले चेहरे का।
चुराना चेहरे का नूर। अभी जो ताऊ ने बोला
ना एक मूवी थी दिल तो पागल है
तो है ही
दिल दीवाना भी है
सुनो तो उसमें ना शाहरुख खान से प्यार
करती थी करिश्मा कपूर
तो एंड का सीन है कि मतलब वो शाहरुख से
प्यार करे शाहरुख मारो दीक्षित को प्यार
करता था तो शाहरुख खान शातिर आदमी पिक्चर
में शातिर मतलब आशिक आदमी लेकिन क्या झोल
मारा जो ताऊ ने मारा कि बुरा तो वो है
बुरा तुम नहीं हो बुरा मैं नहीं हूं बुरा
हमारा वक्त नहीं है बुरा प्यार नहीं बुरा
तो वो वो है ऊपर वाला जो हमें मिलाता है
जो हमें वो पत्थर उठा के मारने लगती है।
हमको भी लगा इसको उठा के हम फेंक दें
क्योंकि इसने सब कुछ मेरा रखा
फेंकने की बात नहीं है। बात ये है कि
बच्चों को हमारा तो कट गया ना अपने
मोमेंट्स हमने ले लिए।
बहुत कटा है भाई।
बोनस टाइम चल रहा है वो इधर जाए उधर जाए।
अल्लाह लेगा या मुल्ला लेगा?
ठीक है। बच्चों को क्या हो रहा है? मैं
पेरेंट्स को देख रहा हूं।
लगा के दे देते हैं उसको।
ठीक है?
छोटा सा बच्चा है।
बड़ा मजेदार ठीक है।
क्यों?
रटा हुआ है।
क्योंकि उसको लगता है कि इसको ना अभी
थोड़ी देर के लिए चुप करा देंगे
ताकि मैं मोबाइल पे लगा रहूं।
हां। नहीं अपन अपना ही दे देते हैं। ये
नहीं कह रहा हूं मैं। मैं दो दोस्त बात कर
रहे हैं। बच्चा कुछ करने लगा तो उसको थमा
दिया पेपा पे या जो भी होता है वो लगा के
हम मेलन होता है। एक
हां
कोकोमेलन। यस
वो दे दिया जाता है उसको बच्चे को
टेंपरेरीली चुप कराने के लिए
पर्दा
पर्दा दे दिया जाता है छोटा सा उसको
वो हमेशा के लिए चुप हो जाता है
हम
अब तो पेरेंट्स एक्स्ट्रा ही लगते हैं
बच्चों को
बहुत आराम से ना धीरे धीरे धीरे क्योंकि
वो उसका राइट था मेरी मां जब मैं चिल्लाता
था
पीट दिए जाते थे हम लोग
हम
आइदर दैट और अरे बाबू थोड़ा खिला दिया
इनको अभी आप जिसको उसको जिससे चुप कराने
की कोशिश कर रहे हो ना
हम
उससे वो चुप ही हो जाएगा।
हम
बिल्कुल क्योंकि वो बहुत कंफर्टेबल हो
जाता है कि स्क्रीन है। स्क्रीन विल टेक
केयर ऑफ मी।
हम
मुझे जरूरत नहीं है तुम्हारी।
इससे बचना चाहिए। पेरेंट्स क्या कर रहे
हैं? बच्चे उनके आठ साल के पांच साल के
हैं।
तीन
वो कहते हैं गेम दीजिए।
हम
तो वो कह नहीं पाते क्योंकि खुद ही मोबाइल
पे वो खाना खाते हैं। खाना खा रहे होते
हैं। मोबाइल देख रहे होते हैं। तो उनको भी
तो कोई वो मोरली फील नहीं करते ना कैसे
बोले बच्चे को कि यार मोबाइल पे मत रहा
करो इतनी देर तक क्योंकि खुद रह रहे हैं
और फिर एक जनरेशन खड़ी हो रही है जो एक
बिल्कुल छोटे स्क्रीन से जिसका काम आपकी
जिंदगी चुराना है और वो तरह-तरह की
समस्याएं तरह-तरह के अवसाद
घस जाते हैं।
हां क्योंकि एंटरटेनमेंट यहां होना ही
नहीं चाहिए। गाना यहां पे सुनना ही नहीं
चाहिए।
हम सुना है क्या?
बिल्कुल नहीं सुनना चाहिए। यह तो हम लोगों
के लिए है
जो निकल चुके हैं।
यंग लोगों को गाना यहां सुनना ही नहीं
चाहिए। यंग लोगों को क्रिकेट यहां देखना
ही नहीं चाहिए। उनको तो वहां देखना चाहिए
जहां हो रहा है। क्योंकि हमारे सामने इतनी
चीजें हो जा रही हैं। मतलबकि हमने घरों
में पर्दा लगा लिया है। घरों में पर्दा
लगा है।
वो ब्लैक कौन सा? ब्लैक आउट वाला टोटल कि
बाहर की रोशनी
आ ही नहीं सकती।
आ ही नहीं सकती। अंदर की रोशनी बाहर जा
नहीं सकती। दरवाजा टाइटली बंद है। एसी ऑन
है। घर में छोटा से लेके लैपटॉप से लेके
बड़ा वाला स्क्रीन सब स्क्रीन ऑन है। हम
पूरी दुनिया को अपने घर के अंदर पर्दों पर
देख रहे हैं और खिड़कियों पर पर्दा
डाल दे रहे हैं।
लगा हुआ है। बाहर जो कुछ घट रहा है। उसका
उसके शाहिद हम है ही नहीं। शाहिद कपूर
गवाह
वही अच्छा शाहिद मतलब
उसको देख नहीं पा रहे हैं।
हम नहीं देख पा रहे हैं। वो हमको यह लगता
है कि वो भी हमको नहीं देख पा रहे हैं।
ठीक है। कोई किसी को नहीं देख पा रहा है।
क्योंकि हर आदमी पर्दे को देख रहा है।
अगर आप पर्दे पे कुछ देख रहे हैं तो पर्दा
आपसे कुछ छुपा रहा है। इसीलिए जब आप खबरें
पर्दे पर देखते हैं,
हां।
तो खबरें नहीं होती।
यह व्यस्त था आज क्या?
जो बताया जा रहा है वह खबर नहीं है। जो
छुपाया जा रहा है वही ख़बर।
वही खबर है। तो थोड़ा सा पर्दे से बाहर
आइए। चुराने ले चेहरे की नूर। ए मेरे हम।
ए मेरे हुजूर। हुजूर। अच्छा ठीक। कौन है
स्पोंसर?
थर्मोकूल
प्रेजेंटेड बाय
अच्छा प्रेजेंट
प्रेजेंटेड प्रेजेंटेड बाय थर्मोकूल
कूलर्स उसका ये एक बहुत सारे टाइप के
मिलते हैं थर्मोकूल उसका एक वेरिएंट
अवतार ये भी है अवतार प्लस
अवतार प्लस हां यहां रखा हुआ है
जिसमें जो है
USB है भाई दोद कूलरत
वैसे ये बड़ी इंटरेस्टिंग है कूलर की USB
जानते हो
USB है
USB
USB USB है दो ही बहुत बढ़िया झगड़ा ना हो
दो आदमी से हैं। दो इसलिए दिया कि एक है
मालूम तुम्हारे हां कि तुम चार्जिंग पे
लगाओ कि मैं चार्जिंग पे लगाऊं
एक के साथ एक फ्री यही होता है देखिए
दूरदर्शन बस दूरदृष्टि
और इसके हवा भी बहुत दूर तक लग जाती है
लोहियावादी बनिए
वैसे ये लोहियावादी नहीं है
प्लास्टिक वादी है ये
हां
पुराने पुराने कूलर
लोहे में जंग लग जाता था
और उसको पेंट भी करना पड़ता था
ऐसे दूरदर्शन से याद आया ब्रॉडकास्ट
हम
किसानों का दिया हुआ शब्द है
वो ब्रॉडकास्ट
कैसे भैया
अरे वो जब बीज फेंकते थे ना
हम
तो कास्ट जो करते थे वो ब्रॉड करते थे।
ओ
एक तो एक रोपना होता है जो कि आप मिट्टी
खोदते बीज डालते जो छींटते हैं उसको
ब्रॉडकास्टिंग कहते हैं।
बात है।
तो जब ये हुआ कि भाई ये चीज बहुत लोगों तक
जाएगी
तो उसको ब्रॉडकास्टिंग कहने लगे। तो
किसानों ने हमको यही नहीं दिया है।
पर भारत में कास्ट एक ब्रॉड विषय है। बात
करने के लिए इट्स वो तो है।
कई घंटों इस पर बात हो सकती है।
वरना इज द ब्रॉडकास्ट।
इस कूलर में जंग नहीं लगता है।
लेकिन ये कूलर गर्मी से जंग लड़ता है।
इसमें वैसे जंग नहीं लगता है।
हम
अरे यार आप तो ले लेते ना थोड़ा सा दिया।
नहीं अगर हम लोग जंगी बोलते हां जंग लोगों
के लिए दोनों और भैया एक बात देखो जो जंग
होती है ना
उससे उसके बाद जंग ही लगता है
जंगी लगता है भाई साहब हम
जांगिया हो जाता है फिर देखिए ज्यादा जंग
डॉनल्ड ट्रंप फन्ने मियां बन रहे थे वहां
गए देखिए उनके अपने पॉलिटिकल कैपिटल पे
जंग लग गई जंग से
अधर्म में ही है
हम
एक फिलॉसफर होते थे
हम
काल जंग यूंग नाम था उनका वैसे पर जे यू
एन जी लिखते थे
तो हम तो जंग ही पढ़ेंगे उनको हम
हमारे एक दोस्त कहूंगा विजय जंग थापा नाम
थापा
हां विजय जंग थापा
बहुत अच्छे इंसान है थापा साहब
पर ये इसकी कहानी क्या रही होगी कि मतलब
कभी सुनी है जैसे ये जो मेटाफर
क्या आ गया आ गया भाई आ गया आ गया अब पूरा
हो गया कृपा आ गई
दोनों बोल दिए मैंने इस बार देखिए हम याद
दिलाएंगे अगली बार भाई तुम बोलो
इश्तियारा कौन सा यारा
अरे इश्तियारा आप लोग ऐसेसे शब्द कहां से
लाते हो यार
इश्तियारा मतलब
मेटाफर चलो ये टापर रहता था ना
मेटाडोर
ये सबको कहता था मेटापर
मेटापर मेटापर एक्चुअली आई वास या आई नो
सो ये जो है फन्ने खान या फन्ने मियां
वाला
ये कहां जाए आया कोई है कहानी इसकी
फन्ने मियां होते थे ना
फन्ने शेख
हां शेख बग
हां फने फन्ने जैसे हमने मियां नसरुद्दीन
मुल्ला नसरुद्दीन का किस्सा
हां तो अपने आप को जो फन्ने मियां समझते
हैं ना
वो होते हैं कि
आपने वोट दे दिया।
नहीं नन्हे मियां की कहानी सुनी है जो उड़
जाते हैं। उड़ जाते
आपने तो पन्नू की भी सुनी हुई है।
हां
आप लोग तो बहुत लकी आदमी हो।
तो फन्ने मियां की कहानी नहीं सुना।
नहीं
वो क्या है कि फन्ने मियां की गजल सुना
देता हूं।
आहा इरशाद
जो इस बात पे भी है कि भाई हम क्या किसी
पॉलिटिशियन पे भरोसा कर सकते हैं।
हम
तो वो तो मैं आज ही मतलब आप कह रहे थे दिख
रहा है कितना भरोसा है। हम हम कि वो इसलिए
है कि कर भरोसा बाद में पछताओ मत।
कर भरोसा बाद में पछताओ मत।
चुप रहो फनेम मियां चचियाओ मत।
जगह आप पढ़े सुनाए थे ये
थोड़ा सा सुनाए थे।
चुप रहो फन्ने में मियां चचियाओ मत।
और लुर लुराते लार पर राखो लगाम।
ये हम नहीं बोल पाएंगे। लुरल लुराते
लुर लुराते लार पर
राखो लगाम। आप लगाम रखें।
लपलपाते जीभ को दुर्राओ मत।
टंग ट्विस्टर है ये।
लगाते जीभ को दुर्रा
हड़ाते हाड़ को
हड़ाते हाड़ को
हड़ाते हाड़ से कर सामना
हड़ाते हाड़ से कर सामना
कप कपाती का में घुस जाओ मत
तो नहीं आदमी
जब सामना मुसीबत से होता है ना
हाड़ मतलब हड्डी कांप जाना
हम
तो अपने ही का में घुस जाता है
हम चतुरमुर्त की तरह
हड़हड़ाते हाड़ से कर सामना
कपकपाती कांख में घुस जाओ मत कसमसाती रह
गई हर कामना
कसम
कसमसाती रह गई हर कामना
बिलबिलाते बोल बोले जाओ मत
बिलबिलाते बोल बोले जाओ मत
बहुत बढ़िया
क्योंकि आपकी कामना जो थी ना कसमसा के रह
गई है
तो बिलबिला के जो है ज्यादा
ज्यादा बोल मत बोलो
और चरमराती खाट थी
आ चुरचुर
चरमराती खाट थी
स्वय खड़ी
घटिया खड़ी हो गई है चरमराती खाट थी सो है
खड़ी खाड़े खाड़े तुम भी खड़खड़ाओ मत
क्योंकि बैठ तो सकते नहीं आपकी
खटिया खड़ी हो चुकी है तो दिल्ली आके
खड़खड़ाने से कुछ नहीं होगा
ओ खड़खड़ाती खाट थी चरमराती खाट थी सो है
खड़ी खड़ेखड़े तुम भी खड़खड़ाओ मत होते जड़ मत
होता है सुजान हम हम
होते
जड़ मत
जड़ मत होता है सुजान यूं खुजा के खाज को
सुझाओ मत
आ
ये तो खुजली वाले एपिसोड में फिट हो जाता
है
हां और कुलबुलाती कोपलों को कर दफन
कुलकुलाती कुल
कोपल जब निकलती है ना जमीन से
उसको वापस वहीं डाल दो
ओके
कुलबुलाती कोपलों को कर दफन भरभरी भरभराती
भावना भड़काओ मत
हाय हाय भावनाओं को भड़काओ बहुत बढ़िया
भरभराती भावना
भड़काओ मत
भड़काओ मत खलबलाते खून को खौलाते जाओ
वाह
खलबलाते खून कोलाते
खौलाते जाओ
मिन्नतें करते हुए मिमियाओ मत
आय हाय हाय हाय
खलबलाते खून को खौलाते जाओ मिन्नतें करते
हुए मिमियाओ मत
याचिका नहीं है रण होगा याचिका नहीं है रण
होगा और हड़बड़ाते होश में आया है हुस्न
हड़बड़ाते होश में आया है हुस्न
बड़बड़ाते इश्क तुम सो जाओ मत।
मुझे लगा
बहुत बढ़िया
मतलब इसकी
दृश्यात्मकता मैं समझ रहा हूं।
हड़बड़ाते
होश में आया है हुस्न।
बताइए अब इतने समय के बाद
बड़बड़ाते इश्क तुम सो जाओ मत।
यूं खुजा के खाज को सुजाओ मत। बहुत
बढ़िया।
बहुत अच्छे।
तुम्हारी बात भी आ गई। थैंक यू। चुप रहो
पन्ने मियां
मत
बहुत बढ़िया
तो बेजार खबर ये है कि सोशल मीडिया पर
रचना गुर्जर नाम की एक महिला बड़ी चर्चा
में है। वो अपने इन्फ्लुएंसरर
सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरर हैं। वो अपनी
बनाती रहती है।
हां अपने भारीभरकम सोने के गहनों और
लग्जरी लाइफस्ट के वीडियोस की वजह से
वायरल होती हैं। तो उनके कंटेंट में उनका
पारिवारिक माहौल, गांव का माहौल, रोजमर्रा
की गतिविधि और उनकी महंगी ज्वेलरी का
प्रदर्शन यह देखने को मिलता था। तो हाल
में रचना गुर्जर के यहां चोरी की वारदात
हुई।
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में उनका घर
है और वहां से करीब 7 से 8 लाख का सोना
चोरी हो गया है। सोशल मीडिया पर शेयर किए
गए वीडियोस के मुताबिक चोरों ने घर की
बाउंड्री की जाली काट के प्रवेश किया और
परिवार के कमरे को घर बाहर से बंद कर दिया
और उसके बाद जो कैमरा वहां लगा था उसका
एंगल भी बदल दिया जिससे घटना रिकॉर्ड ना
हो सके और सीसी सुबह जब सीसीटीवी में और
सुबह जब परिवार उठा तो उन्हें पता चला कि
दरवाजा तो कमरा तो बाहर से बंद है और घर
से लाखों का सोना उनके सोते हुए चंपत
यह वही बात जी पर्दा उन्होंने पर्दा उठा
दिया था। दिखा दिया था।
हां यही हमने कहा था कि बहुमूल्य चीजों को
पर्दे में रख
पर्दे में रखिए। उन्होंने छोटे पर्दे पे
ला दिया था।
हां तो बस खुल गया मामला।
बड़ा पर्दा खुल गया।
देखिए पुराने जमाने में चोर को कितनी
मेहनत करनी पड़ती थी। पहले रेकी होती थी।
अब आदमी ऑफर कर रहा है भाई।
आदमी वहां पूरा भूगोल लिया हुआ है। यहां
सीसीटीवी कैमरा का मुंह इधर है तो जाके
पहले कैमरा का मुंह घुमा देना है। फिर
अच्छा जितना सोना दिख रहा है। इतनी कीमत
होगी उसकी। देखो स्मार्ट चोर थे वो।
उन्होंने देखा कि एक वीडियो में सब कुछ
दिखा रही है कि कहां से निकला कहां रखा
है। घर का पूरा माहौल दिख रहा है। कैमरे
दिख रहे हैं। बहुत
पहले आपको पान वाले से पूछना पड़ता था
इनके घर में कौन रहता है? भैया घर पे कब
कारपेंटर और इनसे पूछा जाता थे।
अरे इनके घर में है भी कुछ कि नहीं
नहीं है ये मेन बात ये है
लोग दिखाते नहीं थे और दिख गया तो कहते थे
रोल्ड गोल्ड है।
यार बहुत
हम लोग कहां से ले पाएंगे?
रोल्ड गोल्ड सुने हो तुम।
रोल्ड गोल्ड
नहीं देखिए बहुत दिनों बाद। थैंक यू बताओ।
ओल्ड ओल्ड गोल्ड
नहीं नहीं रोल्ड
रोल्ड गोल्ड रोल्ड गोल्ड इज गोल्ड। रोल्ड
गोल्ड इज नॉट गोल्ड।
यस।
रोल्ड
जिसको पानी चढ़ा हुआ बोलते हैं ना।
रोल्ड गोल्ड। अच्छा।
नकली सोने को रोल्ड गोल्ड। नकली सोने के
आभूषणों को रोल्ड गोल्ड बोलते थे। ये
रोल्ड गोल्ड है ये।
पानी चढ़ा।
तो कभी-कभी लोग असली भी पहन लेते थे।
पर उस समय दिखावे का युग नहीं था।
तो कभी-कभी लोग पूछते थे असली है। अरे
नहीं असली रोल्ड कहां से होगा? हम लोग
कहां से कर पाएंगे असली?
पंचवा है।
रोल्ड गोल्ड है।
रोल्ड गोल्ड है। बहुत दिनों बाद।
तो पहले जो है पर्दे में रखी जाती थी
चीजें। अगर दिख जाए तो इंकार कर दिया जाता
था उससे। हम
अब लोग खुलेआम इकरार कर रहे हैं
कि हमने जो हाथ में पहना है वह 2ाई किलो
का है।
हम
आओ ले लो तुम।
मुझे याद आया ओल्ड गोल्ड से
क्या?
मैं बालक था लेकिन वो जो आप कहते हैं ना
होश संभाल चुका था। 10 एक साल
11 साल
10 एक साल मैंने बोला आप चलिए।
हड़बड़ाते होश में आया था उस भाई।
तो तो उसमें क्या हुआ? ट्रेन में जा रहे
थे। अब नींद उसी समय टूट गई और रात हो गई
थी। होता क्या है कि ट्रेन में आदमी जब ना
बैग में अपनी कीमती चीज ले चल रहा हूं।
नींद नहीं आती है। तो उसके लगी रहती है
दुखदुखी। तो अच्छा एक तो यह है कि एक एक
दुखदुखी वाले ये होते हैं कि बैग मेरे पास
है कि नहीं। तो कंधे के पास रख के सोएंगे।
वो नॉर्मल है बहुत सारे लोग अपने
एक ये होते हैं कि बैग के अंदर वो चीज है
कि नहीं जो मैं लेके चला था। वो वाली ना
कि
बार-बार उसको चेक।
मैं बीच में एक बार वाशरूम गया था। तो
क्या हुआ पता नहीं। तो मैंने देखा कि भाई
साहब एक आंटी जी खोल के
निकाल के अपना हार देख रही हैं। बारी-बारी
से सोने का सब सामान। मुझे लगा यार ये
क्या कर रही है महिला? तो यार बड़ी
मूर्खता कर रही है कि मतलब प्लेन में होगा
आपने अगर रखा है गायब कैसे होगा। लेकिन वो
चार चीजें या तीन चीजें थी तो निकाल के
देखी कि नहीं। अब मैं बालक था तो मैंने तो
देख ही लिया। पर कोई चोर होता तो वो भी
देख।
बड़े होते तो क्या ही होता। फिर बालक थे
तो चोर भी थे। हो सकता है मन मचल जाता।
भाई चिनैती का हिम्मत तो बड़े होने पे भी
नहीं आती है।
अवसर अवसर इंसान को सब कुछ बना देता है।
बट इनके साथ सबसे अच्छा है इनको एक रील और
बनानी चाहिए कि सब चला गया।
अब बनाया ही होगा इन्होंने पर वीडियो देख
के नोट्स लिए होंगे चोरों ने हम
कि ये यार ये वाला हार गया पहना था।
ये वाला है ये वाला है क्या? ये वाला जो
दिख रहा है कुछ रह गया है।
हां
कुछ रह तो नहीं गया।
कई बार नहीं देखा चोर घर में घुसा और लिख
के लेटर कि घर में कुछ सामान रखा करो।
मतलब चोरों को दिक्कत होती है भाई मेहनत
करके घुसो कुछ नहीं इनको थैंक यू बोलना
बनता है
कि आपने चोरों को एक अच्छी राह दिखाई
एक समाज में ये भी था ना पहले कि धन
को क्योंकि समाज में आर्थिक विसंगतियां
होती हैं
हम
तो आदमी हमेशा कोशिश ये करता था
हम
कि मैं बराबर दिखूं
हम
हूं नहीं पर दिखूं कि मैं समाज से अलग
नहीं हूं। उनसे ज्यादा नहीं है मेरे पास।
बराबरी में खड़ा हूं मैं। मैं बराबर दिखूं
अब जो है आदमी बराबर नहीं दिखना चाहता।
ऐसा
हां उसने Honda City ले ली तो फिर मैं
डिफेंडर ले लूंगा।
उससे ऊपर उठना है।
मैं बराबर नहीं दिखना चाहता। उसका जितना
दिख रहा है
उससे ज्यादा मेरा दिखे।
जिसके पास पहले होता भी था वो अपना अगर
कुछ ज्यादा है तो वो नहीं दिखाता था। उतना
ही दिखाता था जितना दिख रहा है।
उसका उसका एक बिंब राजू श्रीवास्तव अपने
उसमें देते हैं कि गांव गांव लौट रहा है
ज्यादा तो बीच में तकियावकिया फुला के
ज्यादा दिखाना मत कि बहुत कमा के लौट रहा
है।
कि जो वो वाली तकिया नहीं होती है जो
फोल्डेबल उसमें उसको फुलाने वाले ये माना
जब क्योंकि ₹150 ₹200 की आती होगी। लेकिन
यह माना जाता है कि यह त ये ट्रेन के सफर
के लिए इसने अलग से एक तकिया माना जाता
था।
तो वो फुलाने वाली तकिया लिया है। इसका
मतलब ही हैज़ मनी
है कि नो राइट देयर किसी के पास नहीं है।
हम
तो ये होता था कि उसको ये ना लगे कि मैं
चिढ़ा रहा हूं।
हम
या मैं ऊंचा अब तो पहले धन अभी धन का
प्रदर्शन होता है।
बिल्कुल
ठीक है।
जितना है नहीं उससे ज्यादा।
ये सोचो मेरे इसी देश में इसी नोएडा शहर
में बड़े होर्डिंग लगते हैं जिसमें लिखा
होता है लग्जरी रेजिडेंसेस फ्लैट नहीं
लिखा होता यस
ठीक है स्टार्टिंग फ्रॉम फोर
और 11.6 करोड़ ऑनवर्ड्स
हम
तो आपने हर उस आदमी को बता दिया जिसके पास
रहने को घर नहीं है कि ये 11.6 करोड़
ऑनवर्ड्स का घर है। वो गुजरता तो वहीं से
है ना
बनाया भी उसी ने है।
गार्ड की नौकरी भी वही कर रहा है। डिलीवरी
देने भी वही जा रहा है। तो वह जब आपके
दरवाजे की घंटी बजाता है, उसको यह मालूम
है कि आप आपका यह घर 11.6 करोड़ से ज्यादा
का है तो घर में कितना होगा।
उसको क्या पता सब ईएमआई
और रही सही कसर आप अपनी धस से पूरी कर
देते हो।
आप जो इनकलिटी है इसको पर्दे में रहना था।
आपने पर्दा हटा दिया है।
आपको आप पूरी तरह से नग्न होकर
नुमाइश कर रहे हैं।
नुमाइश कर रहे हैं आप अपनी नंगई का जिसको
आप समझते हैं कि आप सफल हैं समाज में।
ये हमारे संस्कार नहीं थे।
ये संस्कार हमने आयातित किए हैं कि
मैं फ्लैट में नहीं रहता। आई लिव इन अ
रेजिडेंस। हम
नुमाइश की परंपरा अपने यहां नहीं रही।
मतलब वैसे वैसे
क्या बोलते हैं? शो ऑफ की परंपरा।
शो ऑफ की परंपरा।
बिकॉज़
क्योंकि नुमाइश मेले को भी बोलते हैं
इसलिए मैं
बिकॉज़ यू वांटेड टू बिलोंग
हम
अब जो है ना यू डू नॉट वांट यू वांट टू
बिलोंग टू सम अदर क्लास।
हम
जो आपको बिलोंग नहीं करते पर आप उसको
बिलोंग करना चाहते हो।
नहीं नहीं मैं ऊपर है। ऊपर है मैं।
ऊपर है मैं। हम
तो आप जिस जिस आप इनफैक्ट जिस सोसाइटी में
रहते हो यू शुड बिलोंग टू दैट सोसाइटी
11.6 करोड़ ही मान लिया
मान लिया कि वहां पे सब लोगों के घर 11.6
करोड़ के हैं।
आप जैसे सैकड़ों लोग वहां पे
हैं लेकिन वहां रहते हुए फिर वो वहां पर
डिफरेंशिएट करने के लिए
और चीजें ऐड करते हैं।
और चीजें ऐड करता है।
गाड़ी
हां कुछ ऐड कर लिया ऐसा जो कि बाकी के पास
नहीं है। दिस इज कॉल्ड लॉस ऑफ इनोसेंस एंड
मॉडेस्टी। मॉडेस्ट होना ना
मॉडेस्टी एक अच्छी चीज मानी जाती है।
ह्यूमिलिटी खत्म हो जाता है फिर।
तो आप फिर आपके बच्चे बड़े होते हैं उसी
कंपटीशन में। एंड धीरे-धीरे तीन जनरेशन
लगेगा। आपका समाज बिल्कुल अलग हो जाएगा।
ऑलरेडी हो चुका है। मैं इनफैक्ट
हम यह जो लग्जरी शब्द जहां-जहां आता है ना
मुझे थोड़ी सी कोपत होती है
कि थोड़ा और बढ़ ले आगे उसके बाद इस पे
चलें हम
हम
थोड़ा और अभी अभी बहुत गैप है
हम
थोड़ा कुछ लोगों को मिनिमम हो जाए
हम
तो फिर अपन मैक्सिमम वाले पे के बारे में
बात करेंगे
फोकस करेंगे
अभी आप ये लिखो ना कि अच्छे फ्लैट
हम
लग्जरी फ्लैट क्यों लिखते हो
11.6 करोड़ क्यों लिख रहे हो?
हां।
जिसको लेना होगा जाके ले लेगा, पूछ लेगा,
पता कर लेगा।
लेकिन ये लोग चालाक होते हैं। इनके
होर्डिंग हमेशा ऊपर लगे होते हैं।
हां हां।
नीचे लगे हम जैसे लोग पान खा के थूक के
चले जाएंगे। नहीं रहना यहां पे।
तो सब कुछ में ना दिस वर्ल्ड लग
अंदर है। एक सरबहारा
और क्यों छोड़ा रहो? लो।
चलो।
तो जस्ट द वर्ल्ड हमने एक बार तीन साल में
चर्चा। इनका इस वर्ड को ना
अभी हमारे देश में यह बिलोंग नहीं करता
है। लग्जरी नहीं क्योंकि बेसिक नहीं हुआ
है अभी
हम
अगर जिस दिन बेसिक सबका हो जाएगा ना तब ना
आप लग्जरी होंगे
हम
देन यू कैन से कि टू डिफरेंशिएट फ्रॉम यू
मैं देखो लग्जरियस जगह में रहता हूं मैं
लग्जरी वाला खाना खाता हूं आई ड्राइव इन अ
लग्जरी कार
हम
तब चलेगा बट बेसिक सबके पास होना चाहिए
जब बेसिक ही नहीं है
तो बहुतों के पास
किसको जला रहे
बहुतों के मतलब लार्ज मेजॉरिटी के पास
तब फिर आप ये लग्जरी वाला अगर रखो भी ना
तो लिखो को मत
हम
वो ठीक नहीं है।
अरे आप यहां लग्जरी छोड़िए बेसिक वाला है।
उस पे भी हम लिखते हैं प्रधानमंत्री आवास
योजना के तहत यह घर मिला है। वहां पे भी
बोर्ड लगा होता है जिसमें खर्च ₹60000 हुए
और मैं उस मैं उस कम्युनिस्ट ट्रैप पे
नहीं फंसा हूं कि सबको एक जैसा बराबर होना
चाहिए। कभी भी नहीं होगा। समाज में
इक्वलिटी होती नहीं है। कभी थी भी नहीं।
हमारे भी समाज में नहीं थी।
पर व्हाट डिफरशिएटेड अस संस्कार
कि नहीं हमारा संस्कार यह नहीं कहता है कि
हम इसको फ्लंट करें। है तो है इट्स अ
रियलिटी पर वो फ्लटिंग वाला जो कल्चर है
कि मेरे पास मैं अरबपति हूं तो मैं मेरी
शादी जो है वो 90 दिनों तक होगी
और देश के विभिन्न हिस्सों में होगी।
हल्दी उदयपुर में होगी तो संगीत जोधपुर
में होगा।
है ना?
जोधपुर से याद है।
फिर
हम लोग 4 तारीख को जयपुर जा रहे हैं।
4 जुलाई को हम लोग जयपुर में होंगे।
जयपुर जा नहीं रहे हैं। जयपुर में होंगे।
होंगे
4 जुलाई को।
टीटी स्टाफ से मिलेंगे।
घोषणा जो जगह की घोषणा आई थिंक टीटी स्टाफ
जयपुर राजस्थान चैप्टर में हो जाएगी।
हो जाएंगे। विजय महावर जी उसके
पर अभी समय है तो उसके और डिटेल्स साझा कर
दिए जाएंगे।
आगे किए जाएंगे। आई थिंक अगले एपिसोड में
पर हम लोग यह तय हो गया अगले एपिसोड में
अभी टाइम है
4 जुलाई को जयपुर में होंगे तो जयपुर
चैप्टर या जयपुर के आसपास के जिलों के जो
लोग हैं वो तैयार रह सकते हैं
और वो वहां पे कोई एपिसोड नहीं है वो मीट
अप है परफॉर्मेंस नहीं है
कोई मंचवंच टाइप का सीन नहीं है कोई एक
जगह
हां
अपना गलवहिया मिलन का समारोह है बस चाय पे
चुस्की
चाय पे चर्चा जो भी
चाय चुस्की
चाय चुस्की या चाय पे चर्चा जो भी कह ले
चाय
ये जो
आदमी चुस्की नहीं बोलता है।
हां भैया बिलकुल चसकी चसका लग गया है।
ये जो आपने बात की ना कि लोग फ्लॉन्ट करते
हैं। पहले फ्लॉनट करते थे उसका जवाब भी
होता है। अब जवाब भी नहीं है। जैसे
तुम्हारे पास डिफेंडर आ जाए। मेरे पास है
ही नहीं भाई उसके ऊपर की गाड़ी तो मैं
फ्लॉनट कैसे करूं? पहले था मेरे पास बंगला
है, पैसा है, गाड़ी है। तुम्हारे पास क्या
है? मेरे पास मां है। क्या बढ़िया डायलॉग
था वो। दीवार। डोंट बी अपोलजेटिक।
कि मेरे पास यह है। बट डोंट
ब्लंट जस्ट वो रिस्पेक्ट रखो कि नहीं यार
मैं क्या करूं मैं अब इतना आ गया है कि
मेरे पास है पर तुम्हारे पास जो है वो ठीक
है
तब आप जिस तरह से रौंदते हुए चलते हो ना
हम
और बदतमीजी करते हुए वो मत करो उससे आपका
इंप्रेशन जो है ना आपको लग रहा है कि आप
हीरो हैं पर भाई साहब ऑनेस्टली बता रहा
हूं जिस नजर से आपको लोग देख रहे हैं ना
शब्द मैं बोलना नहीं चाहता यहां पर तो डू
नॉट देयर विल नेवर बी इक्वलिटी
कभी भी लोग समान नहीं होते। दुनिया के
इतिहास में कभी भी समानता नहीं आई है।
आर्थिक समानता तो होती नहीं है। और
कंपटीशन का मतलब क्या है? कोई आगे बढ़ेगा
कोई पीछे रह जाएगा।
बिल्कुल।
पर जो आगे बढ़ गया है उसको इतना आगे नहीं
बढ़ जाना चाहिए कि पीछे वाले उसको दिखे ही
नहीं। और जब वो वापस लौटे तो हम
उनका वो क्या बोलते हैं उसको खैर ना पूछे।
दैट्स ऑल। जिंदगी की तलाश में
इस विषय पर आगे कभी बात और करेंगे क्योंकि
इसमें फिर यह प्रश्न आएगा कि क्या जरूरत
से अधिक धन का संचय जैसे खूब सारा धन हो
गया
उसमें ये चरित्र ही है क्या कि आप उसके
साथ गुरुरा जैसे ना पैसा जो है यार थोड़ा
अभिमान लाता ही है
जैसे खुदा जब हुस्न देता है तो नज़ाकत आ
ही जाती है
हां तो जब जैसे मतलब किसी को करोड़ों
हजारों करोड़ों रुपए मिल गए हैं। तो वो जब
सड़क पर चलेगा तो वो इस बात को कैसे भूल
सकता है कि वो हजारों करोड़ का मालिक है
और वो सड़क पर इस समय जितनी दूर तक देख
सकता है उसकी टक्कर में कोई नहीं है। और
जब यह बात वो कई साल तक हर रोज फील करता
है तो वो उसकी
उसकी नसों में
आ सकती है वो। एंड आई मतलब बहुत सारे लोग
मतलब मैं यह कह रहा हूं ग्राउंडेड रह जाते
हैं या ग्रेटफुल होते हैं।
वह बहुत रेयर चीज़ है।
रेयर है
लोग ये नहीं कि लोग नहीं है बट इट इज़ इट
इट उस तरफ होने के बाद हो सकता है कि ये
डिफिकल्ट भी होता हो। वो ह्यूमिलिटी को
मेंटेन रखना और आई डोंट नो
हां जरूर होता होगा।
हां जरूर होता होगा। अब अब जैसे आप अपना
प्राइवेट प्लेन अफोर्ड कर सकते हो
और आपको आवश्यकता भी लगती है उसकी
हम
तो आप खरीद लो
हम
कोई उसमें गलत नहीं है। आप अगर 20 करोड़
के फ्लैट में रह सकते हो तो रहो। मेरा है
कि जो पब्लिक प्रोजेक्शन होता है ना जो ऐड
आते हैं
जो सबको दिखता है अरे आपके पास 10 करोड़
की गाड़ी है
ये सबको थोड़ी ना मालूम है
बताइएगा नहीं लेकिन किसी को
हां वो सबको थोड़ी ना मालूम है आप एंजॉय
करो ना उसकी लग्जरी को पर जो साइकिल पे चल
रहा है उसको क्या मालूम ये 10 करोड़ की है
कि 1 करोड़ की है कि 5 लाख की है कि 10
लाख की है उसके लिए तो बहुत बड़ी चमचमाती
हुई गाड़ी है दैट्स इनफ
पर यहां तो वो वाले लोग हैं ना जो गाड़ी
पे का दाम जो है पेंट करवा दे बॉडी में
हम वो जो गाड़ी अगर छू जाए तो जो उतर के
लड़ने आते हैं तो 1ढ़ करोड़ दी गड्डी है ये
जितने डेंट लगे उतनी तेरी गाड़ी की वैल्यू
नहीं है
दैट इज द इशू
एनीवे
YouTube कमेंट्स
करेंगे सामान इस पे करेंगे हां
उसके साइड इफेक्ट्स पे
विकास सिंह ने लिखा है पिटीशन टू सेंड
खानचा फॉर अ फॉरेन ट्रिप इवन इफ इट इज़
थाईलैंड बाली सिंगापुर प्लीज लेट्स डू आवर
बिट मंगा ले चंदा आपके लिए
कह रहे हैं यार इनको भेज दो इनका पासपोर्ट
पे ठप्पा लगवाओ एक
हां यार कहीं जाना पड़ेगा
नहीं पासपोर्ट तो बनवा लो
बनवा लूंगा आप वादा कीजिए मुझे विदेश
घुमाएंगे एक बार
अरे चलो घुमा देंगे कोई दिक्कत नहीं है
लेट्स गो टू
भूटान
नेपाल चलेगा
पासपोर्ट फिर क्यों करवाना
अरे आधार से जहां जा सकते हो
नहीं यार जल्दी जल्दी मैं सोच रहा हूं
विदेश यात्रा कर लूं। ताऊ जाएंगे ताऊ के
साथ ही जाऊंगा।
अंकुर तिवारी कह रहे हैं फ्रॉम शबे फुरखत
का भूखा हूं।
टू शाम शाम से कांख में नमी सी है। जाएगा
जाएगा और नीचे जाएगा।
बहुत ही बढ़िया था। उन्होंने बोला था मेरे
बहुत ही खराब था वो।
लेकिन बहुत सही था। शाम से आंख में मैंने
कहा नमी सी है। आप बोले नहीं सामने कांक
से। सत्यम सिंह ने लिखा है नाइस
कॉम्बिनेशन विद लिबरल थॉट्स सरदार
कंजर्वेटिव एंड आर्टिकुलेट ताऊ एंड
न्यूट्रल खानचा एव्री काइंड ऑफ
पर्सपेक्टिव यू गेट इन वन प्लेस
थैंक यू
कंजर्वेटिव कह दिया आपको हम
हां मुझे लिबरल कह दिया
मैं तो साइलेंट हूं
अरे बहुत सारे लोग कह देते हैं यार वो
तरह-तरह की
आपको गालियां तो पड़ेंगी ही ना
आप जब जीवन में गालियां पड़ेंगी ही
लेकिन मैं ये कहता हूं सार्वजनिक किरण
कुमार को भी गालियां पड़ी थी।
कैसे?
पूरे जीवन को पड़ी थी तो उसको नहीं पड़ी।
क्या बात है?
अगला कमेंट है ब्लैंक पेपर नाम के यूजर
का। एक कटोरी पीली दाल की कीमत तुम क्या
जानो सरदार बाबू। प्रोटेस्ट में लाठी हमने
भी खाई है। पुरवैया चलती है तो पैर अब भी
हो जाते हैं बेकाबू।
ये बात तो है।
इसको कहते हैं इसको कहते थे भीतर घाई मार।
मेरे भी एड़ी के ठीक ऊपर।
लगातार
टेंडन में अभी भी दुखता है भाई।
अभी भी
जब पुरवाई चलती है
पुरवाई नहीं किसी किसी दिन थोड़ा ज्यादा
चल लो ना उस दिन बस पता चल जाता है
याद आ जाता है वो
आज की बात नहीं है भाई साहब 19
पूरा मंजर याद आता होगा
1991 की पड़ी है
अरे बाप रे
90 की 90 की पड़ी
26 36 साल हो गए
36 साल हो गए
दुर्गा बहन
सीआरपीएफ के डंडे जो होते हैं ना अलग लेवल
के होते
पहले वाले मजबूत भी होते थे ना
हां ये प्लास्टिक वाले बजते ज्यादा है
इसलिए बोलते हैं ना कि तुम लठ बजाओ बजते
हैं यह।
पहले लगते थे।
पहले लगते थे।
आय हाय क्या लगते थे भाई?
बांस का डंडा
तेल पिया हुआ।
उसके आगे एक लकड़ी का गोला
हां।
जो फिट होता था उसमें।
जी हां।
मुझे लकड़ी के गोले से लगा था साहब।
ताकि वो भारी पड़ेगा ना तब तंग ना साहब।
फिर आएगा तब मुझे मजा आएगा।
जिन लोगों को मैं लीड कर रहा था।
हम्म बाद में उनको
नहीं नहीं वो तो बच गए।
हां तो उनको आप जाके देख।
मैंने सबको बचा लिया था। मैं तो खुद फंस
गया था। मतलब वापसी
प्रोटेस्ट का विषय क्या था?
प्रोटेस्ट छात्रों का प्रोटेस्ट क्या होता
है?
नहीं फिर भी कुछ होता है ना कि
क्या तुम बोलते हो
युवा रक्त की घाटी
नहीं
युवा रक्त की गर्मी से बर्फ
हासिल वाले डायलॉग तुम्हारे तो गुड
एजुकेशन
यूनिवर्सिटी के खिलाफ प्रोटेस्ट नीट एंड
यूनिवर्सिटी
अपना भी एक गैंग था छोटा सा अपन उसको लीड
करते हुए शामिल हो गए थे
कोई वैचारिकी नहीं थी उसमें
नहीं थोड़ा सा तोड़फोड़ किया था
जवानी में सब कुछ
पुलिस को एक
टाइम पे अब छोड़ना पड़ता है।
हम
जब देखते हैं हाथ से बाहर निकल गया।
हां तो लाठी का उपयोग करना पड़ता है। अपन
भाग भी लिए थे। फिर जब शांत हो गया तो
स्टेशन की सुरक्षा के लिए पुलिस वाले खड़े
थे। रेलवे स्टेशन पे क्या हुआ कि एक बंदे
ने ना मालगाड़ी खड़ी थी। उसमें कुछ बोरा
रखा था। उसमें आग लगा दिया था। तो दैट इज
आर्सन हम
है ना?
हाथ कंगन
हां आर्सन हो गया था। तो फिर उसके बाद
मैंने कहा कि लेट्स गो एंड सी कि क्या
सिचुएशन है शांति व्यवस्था बहाल होने के
बाद तो मैं गया और वो पुलिस वाले जो हैं
वो डंडावंडा लेके सब खड़े थे अपना वर्दी
में और मैं वहीं पे जहां पे गेट था रेलवे
स्टेशन कंपाउंड का
हम
सड़क पर वहां पे चाय की दुकान थी जो मुझे
जानता था मैं उसे जानता था तो अपन वहां
बैठ गए हमने चाय उसको बोला कि चाय पिलाइए
अच्छा हां ये सुनी कहानी
फिर हमेशा का एक उसी ने रिवील फिर अचानक
एक हमला हुआ
आंखों से इशारा यो है यो है है ना नहीं
दूसरे दिन उसके कुमठी को पलट दिया गया था
आग लगा देना था
वो तो कुछ भी करते रहे
पर वो नहीं पर उन्होंने बच्चों ने जो
लड़के थे हमारे उन्होंने रात में जो है
सेका भी
अच्छा
सिकाई भी की
तो गाना आपको याद आता हूं ये जो ठंडी-ठंडी
औंधी है हवा कि कोई रोवे
भाई साहब कि कोई रौंदा हो
ttaf.in पर जो कमेंट्स आए हैं गबूचा ने
लिखा है अगर होटल में हॉस्पिटिटी होती है
तो हॉस्पिटल में होटिटी क्यों नहीं होती?
हम
वैलिड क्वेश्चन है यार। मतलब राघव चड्डा
को आप दोगे तो मुझे लगता है पार्लियामेंट
में पूछेंगे वो।
हॉस्पिटल में हॉस्पिटिटी वैसे होती है
आजकल।
हां आजकल होटल है।
हॉस्पिटल में होटिटी नहीं होती।
होटिटी नहीं होती। हॉस्पिटल में
हॉस्पिटिटी हो रही है। तो हॉस्पिटल में
होटिटी होनी चाहिए।
अजय यादव ने लिखा है एक सवाल क्या सपने
में आए बुरे और गंदे विचार के कारण खुद को
दोषी मानना चाहिए कि क्या यह मेरे अंदर
बैठे किसी बुरे अंश के बारे में बता रहा
है?
नहीं नहीं सपने तो सपने
सपने नहीं जागने जगे होने पर भी आपके मन
में आए हुए विचार आपके नहीं है। इसलिए
आपकी कोई रिस्पांसिबिलिटी नहीं बनती। आप
इसमें बिल्कुल पूरी तरह से
गिल्टी
निर्दोष हैं।
निर्दोष करार दिए जाते हो। हम
सपने क्या
सपने तो सपने होते हैं।
जागते हुए भी आपके मन में जो विचार आते
हैं वह आप लाते नहीं हो। उसके लिए आपकी
कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। यात्री सिर्फ
अपने सामान के लिए जिम्मेदार होते हैं। हम
अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें।
वैभव दीक्षित तीन ताल लखनऊ के लाल ने लिखा
है ताऊ खांचा सरदार को सादर प्रणाम। तीन
ताल से मेरी भेंट उसके पहले एपिसोड से हो
गई थी। हालांकि जैसा कि आप लोग अक्सर कहते
हैं इंसान आलस्य का पुतला होता है। उसी
आलस्य के कारण मैंने काफी समय तक पुराने
एपिसोड नहीं सुने लेकिन पिछले तीन महीनों
से लगातार सुन रहा हूं। अब महसूस होता है
कि लोग सही कहते हैं। अपने से बड़ों की
बातें ध्यान से सुनो तो जीवन के बारे में
बहुत कुछ जानने को मिलता है। आपकी बातें
इतनी प्रासंगिक और आत्मीय होती हैं कि कभी
लगता है कि आप मुझसे दूर हैं ही नहीं। ऐसा
महसूस होता है जैसे ताऊ मुझे समझा रहे
हैं। खानशाह हंसा रहे हैं। सरदार माहौल को
संतुलित बनाए हुए हैं। जब भी जीवन में कोई
समस्या आती है तो मन में ख्याल आता है इस
पर ताऊ की क्या राय होती? तीन ताल ने मेरे
जीवन में मुस्कुराहट, समझदारी और अपनापन
ये तीनों रंग और गहरे किए हैं। इसके लिए
आपका आभार। सवाल यह है कि देश में बढ़ती
सांप्रदायिकता को कम करने या खत्म करने का
सबसे प्रभावी तरीका क्या हो सकता है? वैभव
दीक्षित
यह तरीका प्रभावी तरीका
हां। बहुत मुश्किल सवाल है। बहुत सारे
तरीके अपनाए जा रहे हैं। अगर संप्रदाय
खत्म हो जाए तो सांप्रदायिकता खत्म हो
जाएगी। लेकिन संप्रदाय खत्म नहीं होंगे।
क्योंकि संप्रदाय की अपनी उपयोगिता है।
राजनीतिक
राजनीति अगर विश्वास से,
फेथ से जिसको धर्म कहते हैं लोग, मजहब से
दूर हो जाए तो खत्म हो जाएगी। और लोग अगर
धार्मिक हो जाए तो खत्म हो जाएगी। लेकिन
लोग धार्मिक नहीं है। लोग पंथिक हो गए
हैं।
लोग मजहबी हो गए। तो सब धर्म जो है वो भूल
गए।
पर ये सब बातें सुनने में बहुत दार्शनिक
वाली लगेंगी। हम
धरातल पर यथार्थ के धरातल पर जो बहुत उबड़
खाबड़ है समतल नहीं है
यह
हर व्यक्ति के करने से होगा
क्योंकि समूह ने ही तो हमको यह थमाया है
और समूह की ताकत समूह की शक्ति जो है वो
उसके आगे सब सर झुकाते हैं। राजनीतिक दल
भी झुकाते हैं। अगर हम यह मान लें कि हम
अकेले हैं, एक हैं और संविधान तो सिर्फ
हमें रिकॉग्नाइज करता है ना। नागरिक को
रिकॉग्नाइज करता है।
तो फिर जा सकता है। पर यह सब सपने हैं।
सपने तो
जाएगा नहीं। इसलिए आपको नेविगेट करना
पड़ता है और कभी नीचे, कभी ऊपर, कभी कम,
कभी ज्यादा।
बैलेंस करके निकालना पड़ेगा क्योंकि साथ
रहना। जैसे हम एक चीज एक शब्द बार-बार
करते हैं। आलोचना के संदर्भ में बहुत सारे
पॉलिटिकल साइंटिस्ट ने लिखा है यार
आइडेंटिटी पॉलिटिक्स पे जो है काबू होना
चाहिए। लेकिन दाऊद देखिए पूरी दुनिया में
कोई भी ऐसा देश है जिसने ये सफल प्रयोग
करके दिखाया हो कि हमारे यहां लोग समाज
द्वारा दी गई आइडेंटिटी या जो ग्रुप
आइडेंटिटी है उसे आइडेंटिफाई नहीं किए
जाते। अमेरिका में देख लीजिए
अमेरिका में इंडिविजुअलिज्म बहुत ज्यादा
है। हां
इसलिए वहां पे आइडेंटिटी पॉलिटिक्स कम
होती थी। हम
लेकिन जब वो होता है ना कि अगर आप उनसे
धर्म ले लोगे तो कोई और बहाना ढूंढ लेगा
वो
हम
लड़ने का वो नई आइडेंटिटीज खोज लेता है और
जब सारे दुनिया में पॉलिटिकल एनालिसिस जब
लिखे जाते हैं कहीं भी इलेक्शंस हो वो
अधिकतर
इसी बात का एनालिसिस कर रहे होते हैं कि
किस आइडेंटिटी का ग्रुप इस समय क्या सोच
रहा है।
सो इट इज ऑलमोस्ट इट लुक्स इंपॉसिबल कि हम
आइडेंटिटी पॉलिटिक्स को खत्म या रिड्यूस
कर सकते हैं। लोग नई आइडेंटिटीज क्रिएट कर
लेंगे और उन उनका झंडा उठा ये झंडा निकाल
देंगे ये गिरा देंगे और एक नया झंडा उठा
लेंगे कि दिस इज व्हाट वी बिलीव इन फिर वो
एक नई आइडेंटिटी बन जाएगी
और ये भी है ना देखो
ज्यादा इसमें एक चीज क्या काम आ सकती है
जैसे
हम ऐसा देखते सोचते हैं किताबों को एक तरफ
करिए किताबें क्या कहती हैं किसकी पर
गेटिंग टू नो ईच अदर गेटिंग टू नो पीपल
फ्रॉम डिफरेंट साइड्स जिनको आप मानते हैं
कि वह दूसरी ओर हैं या वो अन्य हैं और हम
अन्य हैं।
ये खत्म नहीं कर सकता पर क्या किसी भी तरह
की सांप्रदायिक अप्रोच को कम तो कर सकता
है कि आप एटलीस्ट जान गए उनके परिवार को
उनके घरों में रहने वाले लोगों को उनके
मतलब ऑफ कोर्स आप
किसी भी आइडेंटिटी का कोई व्यक्ति हो तो
उसमें अच्छा बुरा दोनों हो सकते हैं। तो
आप चुन करके अपने दोस्त बनाते हैं ना कि
आप यार ये आदमी मुझे ठीक नहीं लगा ये मेरा
दोस्त नहीं है। बट कोई आदमी ठीक लगा तो वो
दोस्त हो सकता है। फिर आइडेंटिटी आड़े
नहीं आनी चाहिए। तो इस तरह से आप अगर
मल्टीपल आइडेंटिटीज के दोस्त बना पाएं तो
आप उनके
साथ एलिनेशन नहीं होता हुआ
देखेंगे।
देखो फियर ऑफ़ द अननोन
अननोन वाली जो बात है हां
तो जब तक हम गेटों में रहते हैं
हां
अलग-अलग रहते हैं तो आप एक दूसरे को
जानेंगे नहीं। हां
जैसे जूस के बारे में देखिए जो कार्टून
बनाए गए कि उनकी नाक बड़ी होती है। मतलब
जो भी सदियों तक उनको इतना विलेनाइज किया
गया कि आज तक उसकी इमेज सुधर नहीं पाई है।
अ एक अब जो है क्रिश्चियंस भी अभी भी जूस
को हेट करते हैं।
थोड़ा एक एनलाइटनमेंट हुआ तो उन्होंने कहा
कि ठीक है चलो रहने दो। पर पिछली सेंचुरी
तक तो जूस ऐसे ही रहते थे।
हम
मतलब वर्ल्ड वॉर टू में क्या हुआ? हम
यूरोप में क्या हुआ? जूस को आज भी बहुत
मुश्किलों का सामना है। पूरे इस्लामिक
वर्ल्ड में उनको एक दुश्मन की तरह ही देखा
जाता है।
और वो पूरे इस्लामिक वर्ल्ड को एक दुश्मन
की तरह देखते हैं। सांप्रदायिकता
जाएगी नहीं क्योंकि सांप्रदायिकता है तभी
तो आप धर्मनिरपेक्षता और
है।
नहीं तो नहीं होगी धर्मनिरपेक्षता। अंधेरा
है तो उजाला है।
सच है तो झूठ है।
भूत है तो भगवान
तो वो एक जो है स पक्ष है पर उसका होना
वैसे ही जरूरी है। दूसरी बात है कि आप ना
एक एम्पैथी से नहीं देखते हो क्योंकि
जिसके साथ आप रहते नहीं उसके साथ एमैथी
होती नहीं है।
हम तो हमेशा अदरिंग में ही लगे रहते हैं
ना कि मैं वो नहीं हूं वो मैं नहीं। तो जब
आप एक साथ थोड़ा टाइम भी बिताते हो
हम
तो देन यू रियलाइज कि नहीं बाकी सब कुछ
ठीक है। देन यू यू विल हैव कि नहीं नहीं
उसका तो उसके बिलीफ अलग है। मेरे बिलीफ
अलग हैं। है ना? मैं जिन चीजों में
विश्वास करता हूं करता हूं वो नहीं करता।
वो जिन चीजों में विश्वास करता मैं नहीं
करता।
वो तो फाइन है। वो तो आपका फेवरेट एक्टर
रणबीर कपूर है। दूसरे का रणवीर सिंह है।
हम
बट यू नेविगेट ना
टुगेदर वो है। पर
मैं
सांप्रदायिकता अगर बढ़ती है तो मुझे
धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता के भी
आसार दिखते हैं कि उसके भी बढ़ने के चांस
हैं।
बैड स्पीकर की चिट्ठी बैड स्पीकर ताऊ को
पांव छुई खानचा को हग कुलदीप को हाईफाई जय
हो जय हो जय हो मैं बैड स्पीकर दिल्ली से
आपका वही पुराना नियमित श्रोता जो आप सब
से दो-तीन बार मिलकर और फोटो खिंचवाकर
सबूत भी जमा कर चुका है ताकि आगे चलकर कोई
मुकर ना सके। कुलदीप मैं बिल्कुल तुम्हारी
ही उम्र का हूं। आज बात मेरी नहीं मेरी 3
साल की बेटी पीहू की है जिसे मैंने बचपन
से ही घुट्टी के साथ आप तीनों की आवाजें
भी पिलाई हैं। गाड़ी में घर पर सफर में
जहां बच्चे बेबी शार्क या नर्सरी रम सुनते
हैं वहां पीहू ने ताऊ, कुलदीप और खानचा के
विश्लेषण, किस्से और ठाके सुने हैं। अब
उसे आप लोगों की बातें कितनी समझ आती है
यह तो भगवान जाने। लेकिन उसके बाल मन पर
आप तीनों के चेहरे ऐसे छपे हैं जैसे राशन
कार्ड पर सरकारी ठप्पा। वाह
हाल यह है कि घर का माहौल पूरी तरह बदल
चुका है। लल्ल एंड टॉपर कुलदीप की एंकरिंग
दिख जाए तो पीहू चिल्लाती है। डैडी देखो
आपके दोस्त आ गए। टीवी पर ताऊ किसी गंभीर
विषय पर देश को दिशा दिखा रहे हैं तो
तुरंत घोषणा करती है। डैडी ये तो आपके
दोस्त हैं। और अगर कहीं तीन ताल का पोस्टर
रील या क्लिप दिख जाए तो उसके अंतर उसके
भीतर का पूरा तीन तालिया जाग जाता है। फिर
पूरे घर को सिर पर उठाकर एक ही बात
दोहराती है कि डैडी आपके दोस्त आ गए। उसने
अपने मन में यह बात पत्थर की लकीर की तरह
बिठा ली है कि आप तीनों मेरे पक्के दोस्त
हो जो हर हफ्ते मेरे साथ बैठकर चाय पानी
पीते हैं। आखिर बाप की दोस्ती पर बच्चे का
पूरा हक होता है। अब समस्या यह है कि
बच्ची जिद पर अड़ गई है। उसका सीधा सवाल
है कि अगर यह डैडी के दोस्त हैं तो यह घर
क्यों नहीं आते?
और अगर घर नहीं आते तो मुझे इनसे मिलवाओ।
अब मैं 3 साल की बच्ची को कैसे समझाऊं कि
बेटा इनसे मिलने के लिए नोएडा ऑफिस का
अपॉइंटमेंट लेना पड़ता है जिसकी चाबी अतुल
जी के पास है।
इसलिए यह छोटी सी गुहार लगा रहा हूं। अगर
किसी दिन आप तीनों नोएडा ऑफिस में एक साथ
एक ही ग्रह नक्षत्र और एक ही टाइम जोन में
मौजूद हो और मूड थोड़ा फुर्सतिया हो तो
कृपया एक संकेत ड्रॉप कर दीजिए। मैं पीहू
को लेकर हाजिर हो जाऊंगा। कम से कम उसका
भरोसा तो नहीं टूटेगा कि उसके डैडी के
दोस्त सचमुच बड़े-बड़े स्टूडियो में बैठकर
न्यूज़ चलाते हैं और केवल मोबाइल की
स्क्रीन में कैद काल्पनिक पात्र नहीं है।
तीन ताल ने मेरी दुनिया में तो रौनक भरी
ही थी लेकिन अब मेरी बिटिया के बचपन का भी
यह खूबसूरत हिस्सा बन गया है। आप तीनों
मुरधन्यों को स्नेह ताऊ को पांव छुई खंचा
को हक कुलदीप को हाईफाई नोएडा बुलाने की
प्रतीक्षा में आपका बैड स्पीकर।
बहुत ही प्यारी चिट्ठी यार। पीहू को ढेर
सारा प्यार
और अतुल के नियंत्रण में है सब कुछ
बिल्कुल नहीं आप कुछ मत करिए बैड स्पीकर
भाई आप एक ईमेल कर दीजिए उस radio ast.com
पर आप जैसे आपकी चिट्ठी मिल गई है तो चाहे
तो अतुल भी अपनी तरफ से खोज के इनको ईमेल
कर लें या आप एक ताजा ईमेल कर दीजिए
हम
radio
rडियो पर अतुल तक वो सीधे ईमेल पहुंचते
हैं और अतुल उसमें आपसे संपर्क साध लेंगे
और एक तारीख वो समय आपको बता बता देंगे कि
आप जब नोएडा ऑफिस आ सकते हैं तो जरूर पीहू
से मिलवाइए हमें।
बिल्कुल बिल्कुल बहुत खुशी होगी।
पीहू बहुत सुंदर नाम है।
बहुत प्यारा नाम है। पीहू
पीहू बोले
तोते को कहते हैं ना
पीहू नहीं
तो पीहू है तो पक्षी ही
पक्षी है।
पीहू पक्षी की आवाज को शायद कुछ बोलते
हैं।
नहीं कुछ ऐसा है।
आई थिंक पीहू एक पक्षी है पर तोता नहीं
है।
अच्छा
मतलब वही देख रहा था मैं। वैसे कुछ
संदर्भों में कहा गया है कि मोरनी छोटी
वाली
पता नहीं मीठी मीठी ध्वनि को वैसे पीहू
बोलते हैं।
वो आवाज मुझे लगता है कि उसको बोलते हैं
किसी को।
अगली चिट्ठी है आतििर अरशद की।
नमस्कार कुलदीप भाई खान और ताऊ बड़े दिनों
बाद चिट्ठी लिखने का मौका मिला। बीते एक
एपिसोड में हाजीपुर वैशाली और केले के
स्टैचू की चर्चा सुनकर खुद को चिट्ठी
लिखने से रोक नहीं पाया। लॉ कॉलेज से पास
आउट होने के बाद मैं अब वकील बन चुका हूं
और वकालत शुरू कर दी है। इसमें मेरा
इंटरेस्ट तो था ही साथ ही कई दशकों का
खानदानी दबाव भी था। दिल्ली में पढ़े हुए
अंग्रेजी मूठकोट के मारे जब हम बिहार के
वैशाली जिला एवं सत्र न्यायालय पहुंचे तो
नए-नए शब्दों से हमारा परिचय हुआ। जैसे
कुटुंब न्यायालय तदर्थ तामिला संपुष्ट
मौसमात गैर मजरूआ आम गैर मजरूआ खास
बास्केटत पर्चा मीम जानब आदि इसी तरह
लोगों के नाम भी कम दिलचस्प नहीं मिले
उनमें सबसे विचित्र नाम मुझे लगे बोलत राय
बोतल राय और झुरझुरी राय सुप्रीम कोर्ट की
लाइव स्ट्रीम में योर लॉर्डशिप सुनने से
लेकर जमीनी अदालतों में जी हुजूर तक सब
कुछ सुन चुका हूं बहुत से वकील साहब तो
याचिका में श्रीमान का इस्तेमाल करते हैं।
चाहे न्यायाधीश महिला ही क्यों ना हो।
कोर्ट में बहस करने के अजीबो अजीब तरीके
भी रोज देखने को मिलते हैं। एक बार एक
वकील साहब ने मेरे सामने जज साहब से कहा
हुजूर रोक नहीं लगा तो दिक्कत हो जाएगा।
धाएधाएं जमीन बेचे जा रहा है। क्लच में ले
लिया है सबको।
ये अच्छा है। क्लच में ले लिया।
ये गांव में बोला जाता है। क्लच में
क्लच में ले लिया है सबको।
बहुत बढ़िया।
निषेधाज्ञा इन जंक्शन के पक्ष में इससे
बेहतर बहस मैंने आज तक नहीं सुनी।
अंत में वैशाली की याद में रामधारी सिंह
दिनकर जी की पंक्तियां वैशाली जन का
प्रतिपालक गण का आदि विधाता जिसे ढूंढता
देश आज उस प्रजातंत्र की माता जय हो जय हो
जय हो आपका तीन तालिया आतििर अरशद
भूतपूर्व क्रांतिकारी
क्लच में ले लिए गुरु क्लच
और न्यायालय के जो गैर मजरवा आम और गैर
मजरवा खास
इस तरह की जो भाषा बाय द वे वो जो लिखा
जाता है ना अभी भी
वो पुराना ही कल्चर चला रहा है
ऑलमोस्ट फारसी में लिखते हैं देवनागरी में
हम हां
देखो जो मुहर्रिर होते हैं हम
वो जब लिखते हैं तो उनकी जो भाषा होती है
वो बिल्कुल
जज भी लेते हैं इनको इतने साल की सजा
मुकर्रर की गई है
मेरे भाई साहब
और ज़ेर जैसे है ना
मेरे ज़ेररे बहस
हम
ये सब मैं बहस के बाहर कहीं नहीं सुनता
हूं या उर्दू चैनलों पे सुन लिया कभी-कभी
तो
लोग अभी कहते हैं जिरे बहस बहुत हुई
हम तो जिरा अलग है
हां
उसमें सब तो यही हुआ ना फिर ना ज़ेर ज़ेर
ज़बर पेश
जैसे आप मेरे ऐसे ना करें अली कौन से ऐसे
जिम चेक है? यहां तक क्या थे तुम? हमारी
भी पे अटक जाते हैं। ये तो जिम पे जाते ही
इसको लगता है।
बहुत बढ़िया था यार। क्लच में ले लिए तुम।
अगली चिट्ठी है बंजारा डोडा की।
क्लच में ले लिए तुमको बोलते थे कि
कंट्रोल में।
हां वो तो है
और डराते गियर बदल देंगे तुम्हारा।
हम
ये हड़काना होता है तुम्हारा। गियर बदल
देंगे।
ले लिया है।
गाड़ी को भी धमकाने में ले आए लोग।
बंजारा डोडा की चिट्ठी। ताऊ खानचा और
सरदार को जय राम जी की देखो एसो है कि
हमने सीजन वन से शुरू करके सीजन टू तक सब
निपटाए दे गए हैं। एपिसोड 138 में किस्से
सुने ब्रश के तो यूरोमाओ किस्सा दांत घिसन
वाले टूथब्रश का। बात अब ऐसे कुछ दिन पहले
की है जब हम किसी दूसरे शहर में एक पीजी
में रह थे। ऑफिस के पास होइबे के कारण
हमने ले लो एक शेयरिंग में पीजी एक 22 23
साल के नए लौंडे के साथ। तो भैया जो हम
रूममेट हतो उनके जाने के समस्या हति साफ
सफाई से भैया ना तो ट्रिमर चलाए के बाद
वाश बेसिन साफ करत हतो और ना ही मल त्याग
के बाद ससुर क्लश करत हत बाजी दायन हमने
कही होसे कि लल्लन नेक साफ साफ सफाई में
क्या समस्या है तो हमेशा कहने लगे भैया
करो तो हतो हमने तीन चार दाइन समझाओ ओके
लेकिन ससुर को नाती मानो नहीं फिर कहा तो
एक दिन हम नहान जा रहते तो देखो फिर इनने
फ्लश नहीं करो है तो हमारी सूझी तरकीब
हमने उठाओ टूथरस जो धरो तो भीतर हमने पहले
साफ करो वास बेसिन फिर साफ करो कमोड और
फिर हमने करो हम प्लस एक बेहतरीन गर्जना
के संग कि प्लस फॉर वन लास्ट टाइम अब जब
हम होके देखत हते शनिवार इतवार को बरस करत
तो लल्ला का बताएं जो खुशी होत हति का
बताएं
बहुत ही गंदा
फिलहाल के लाने यही हम किस्सो अगली द बताई
है कोई और किस्सो रिगार्ड्स बंजारा डोडा
डोडा इससे भयानक बदला मैंने नहीं देखा।
ये सही है यार।
इसका नाम धोधा होना चाहिए कि धो ढाला।
अब आज के बाद मैं डोडा बर्फी नहीं खा
पाऊंगा।
अरे मैं भ्रष्ट खैर
बदला अच्छा था।
हम मुझे पसंद आया। कई होटलों में आपकी
अनुपस्थिति में हम
जब आपके कमरे को सेट किया जाता है
बहुत सारी चीजें इस्तेमाल कर ली जाती है।
तो आपका बेसिन वेसिन बड़ा चकाचक होता है
जब आप जाते हैं।
हम
देखिए
वही एक ग्लास में आपका ब्रश पड़ा होता है।
म कह रहे हैं
कह नहीं आप मत डालिए दिमाग में। मुझे घिन
आने लगता है।
आपको पता है फिर मैं अपना ब्रश जेब में
लेके घूमने लगूं। मैं जहां जा रहा हूं मैं
नहीं छोडूंगा। लेकिन ये मैंने देखा है
होटलों में भी कई बार आपकी चीजें बड़े
होटल में नहीं करते।
किसे आपकी चीजें इस्तेमाल की गई परफ्यूम
यूज़ कर लिया गया है।
हां ये सब तो
ये सब
एक बार ऐसे हुआ था कि मैंने देखा था बड़ा
ही होटल था वो और मैं रूम लॉक था तो मैं
शायद नीचे कहीं गया था। तो अंदर एक महिला
ऑफिस उनके होटल स्टाफ रूम क्लीनिंग सर्विस
से तो वो
थी और मैंने दरवाजा खोला तो
घबरा गई।
नहीं नहीं तो चिप्स बचे हुए थे।
खा रही थी वो आराम से। उसमें तो अच्छी बात
है। कोई बात वैसी नहीं है। लेकिन पर ये जब
चिप्स खाने की घटना हो सकती है तो फिर
परफ्यूम लगाने की भी हो ही सकती है। ठीक
है।
इट इज नॉट अबाउट चिप्स।
हम
इट्स अबाउट द लाइन।
सोबर शराबी का पहला अध्याय।
अगली चीज
भाई साहब नाम हो तो ऐसा ही होगा।
सोबर शराबी। तीन ताल के थ्री मॉस्किटियर्स
को मेरा साष्टांग दंडवत। अब आप लोग
सोचेंगे भला मस्क मॉस्किटियर्स को प्रणाम
क्यों? देखिए ताऊ और खानचा अगर इतना लॉजिक
मेरे पास होता तो मैं आज खुश थोड़ी रहता।
बात जनवरी 2022 की है। कनाडा की हाड़
कपाने वाले स्नोस्टॉर्म का दौर था और मुझे
भारत छोड़े हुए मुश्किल से चार-प महीने
हुए थे। अब नियम तो आप जानते हैं। सूखा
कपड़ा जब पानी में जाता है तो कुछ ज्यादा
ही पानी सोख लेता है। मेरे साथ भी ऐसा ही
ओवर अब्सॉर्प्शन हुआ। सिक्योरिटी की नौकरी
निपटाकर रात 11:00 बजे घर लौटा। लेकिन
हमारे जो बुट लेगर भाई थे गुजरात में
डिलीवरी करने वाले देवदूत को हम यही कहते
हैं। वो रात 1:00 बजे पधारे। फिर क्या था?
पीर बाबा का दम किया हुआ पानी, दो गिलास
और चखना और टीवी पर जिंदगी ना मिलेगी
दोबारा। पारी की शुरुआत बेहद धीमी और
संभलकर हुई जैसे पिच पर विकेट टिकाना
जरूरी हो। अपनी प्राइवेसी के लिए मेरे साथ
बैठे दूसरे साथी को हम यहां नॉन
स्ट्र्राइकर कह देते हैं। करीब एक घंटे और
बेहद सटीक नाप के साथ कहें तो 150 ml के
बाद नॉन स्ट्र्राइकर अपनी धूम्रदंडिका
सुलगाने बालकनी में चला गया। वापस आया और
हॉल में गद्दे पर ऐसे पसरा कि सीधे
कुंभकरण मोड में चला गया। पर भला हो
आधुनिक टेक्नोलॉजी का जिसने सात समंदर पार
भी अकेलेपन का एहसास नहीं होने दिया।
मैंने तुरंत भारत में अपने चार दोस्तों को
वीडियो कॉल खटखटा दिया। कुछ देर बाद मैं
भी अपनी धूमधंदिका थामे बालकनी की ओर
बढ़ा। अब उस बालकनी के दरवाजे की एक बड़ी
जादुई खासियत थी। वो सिर्फ अंदर से बंद
होता था।
ओ
अब मैं उस वक्त होश के मुकाम पर तो था
नहीं कि दरवाजा बाहर से हाथ में पकड़ कर
खड़ा रहता। सो मैं आराम कुर्सी पर धंस गया
और दोस्तों से बतियाते हुए कश लगाने लगा
और फिर जैसे ही सिगरेट बुझाने के लिए झुका
मेरी बत्ती गुल। अगले दिन जब सीधे बेड पर
आंख खुली तो पहला ख्याल फोन का आया। आखिर
अभी उसकी ईएमआई बाकी थी। फोन बाजू में
पड़ा था। सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह था कि
कल रात आखिर हुआ क्या? इसी आत्म मंथन के
बीच मेरे पेट में सबसे पहले वही हलचल हुई
जिसे कहते हैं वोमिटिंग।
तभी उन चार दोस्तों में से एक का फोन आया
जो कनाडा के ही एक दूसरे प्रोविंस में
रहता है। उसने दास्तान सुनाई। उसने बताया
कि रात को जब मैं धूम्रदंडिका बुझा रहा था
तब मैं खुद भी पूरी तरह बुझ चुका था। उस
वक्त बाहर का तापमान था -2 डिग्री। और पीर
बाबा के दमके हुए पानी के प्रभाव का आलम
देखिए कि आपका यह भाई सिर्फ एक टीशर्ट और
ट्रैक पैंट में बाहर अचेत पड़ा था। दोस्त
ने कहा कि अगर 5 मिनट और कॉल लेट हो जाती
तो मैं सीधा 911 पर कॉल घुमा देता। लेकिन
भला उस इंजीनियर का जिसने वह बालकनी का
दरवाजा बनाया था। वीडियो कॉल पर दोस्तों
के चीखने चिल्लाने की आवाज और खुले दरवाजे
से अंदर घुसती बर्फीली हवा ने आखिरकार
हमारे सोते हुए नॉन स्ट्राइकर को जगा
दिया। वो भागता हुआ बालकनी में आया। जैसे
ही मुझे उठाने के लिए पास पहुंचा, मैंने
नशे में ही एक ऐसी करवट ली कि फोन सीधे
नौवीं मंजिल से नीचे फ्री फॉल कर गया। खैर
नॉन स्ट्राइकर ने पहले मुझे घसीट कर बेड
पर डाला। फिर सुबह के 4:00 बजे कड़कती ठंड
में नीचे फोन ढूंढने भागा। ऊपर वाले की
असीम अनुकंपा और यूएजी के मजबूत कवर ने
कमाल कर दिया। फोन नीचे की गीली मिट्टी पर
गिरा था। इसलिए सुरक्षित बच गया। आफत यह
थी कि भारत और दूसरी तरफ लाइन पर बैठे
दोस्तों को यह नहीं पता था कि मैं जिंदा
हूं या नहीं। क्योंकि फोन गिरते ही
वाई-फाई डिस्कनेक्ट हो गया। जैसे ही नॉन
स्ट्र्राइकर फोन ढूंढ कर लाया, वाई-फाई
कनेक्ट हुआ, तड़ातड़ कॉल्स की बाढ़ आ गई,
तब जाकर संदेश दिया गया कि बल्लेबाज अभी
जीवित है। बस रिटायर्ड हर्ट होकर के वापस
पवेलियन लौट आया है। आपका अपना सोबर शराबी
जय हो। खानचा अपने अनुभव बताएं।
अभी हम जिंदा हैं। इसको देख के भाई बहुत
ही
भाई टेस्ट मैच के प्लेयर हैं।
-2 डिग्री है।
टीशर्ट और
बच गए गुरु
सोते रहो सोबर सोते रहो
लेकिन देखिए हम बोल नहीं सकते पर जान
क्यों बची सब जान रहे हैं नहीं नहीं ये सब
स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है उस दिन निकल
नहीं नहीं जान जो सांसद में पड़ी थी ना वो
भी सब जान रहे हैं क्यों पड़ी थी
वो भी बात है फसा है मतलब क्या बोला जाए
तुम ने ही जख्म दिया है तुम्ही सेवा
तुम्ही ने दर्द दिया है तुम ही दवा देना
गरीब जान के हमको ना तुम
दबा देना नहीं
ऐसा नहीं होगा कुछ और होगा दिस डजंट साउंड
ऐसे बिहार में हम लोग दवा ही देते हैं बाय
द वे मर्ज की
दमन का
हर मर्ज की भी दवा होती है
और डॉक्टर भी आपको दवा देते हैं
हम
गांव में कहते हैं दवा दारू चलती रहनी
चाहिए
दवा
वहां चीज हमारे कुत्ते है ही
ये क्यों कहा जाता है ताऊ
क्या
कि बीमार होने की अरे दवा दारू करो सही हो
जाएगा कौन कहते थे?
दारू कहते थे दवा को ही। वही तो बदनाम कर
दिया लोगों ने। आगे चलो।
नहीं वो शेर बहुत अच्छा है। कैसे है वो?
तेरा क्या भरोसा है चारा घर?
हम तेरी नवाजिशें मुख्तसर
तेरा क्या भरोसा है चारा घर। मेरा दर्द और
बढ़ा ना दे।
नहीं वो शुरू कैसे है?
ये चित्रित वाला है ना चित्र।
मुझे छोड़ ना मतलब ये फरीदा।
मुझे छोड़ दे हाल पर तेरा क्या भरोसा है?
चार अगर तेरी नवाजिश मुफ्तर मेरा
मेरा दर्द और बढ़ा ना दे
मतलब कि भैया ऐसा हमको रहने दो जैसे हमें
बहुत ज्यादा दवाई इलाज करने की सहलाने की
मरहम लगाने की जरूरत ना पड़े
ये जो नवाजिश मुख्तसर है
तुम तो अभी 10 मिनट के लिए आए हो बेटा ये
पट्टी कर दे
और बीमार कर दोगे तो
हां इससे जो है जख्म हरा हो जाएगा
बात ना करो जख्म की
दर्द मंदे इश्करा दारू बजुज दीदार नी
चुप रहो
दर्दमंद इश्क रा दारू बजुज दीदार नी
मतलब इश्क का दर्द जिनको हुआ है उनकी दवा
जो है वो दीदार के अलावा कुछ नहीं है
हां ये तो सच है
काफिर इश्कम मुसलमानी मरा दरदा दरकार नी
काफिर इश्कम मुसलमानी मरा दरकार नी
मतलब
कि मैं इश्क में काफिर हो गया हूं। मुझे
मुसलमान की जरूरत नहीं है। हर रग मन तार
गस्ता हाजत जुन्नार नस्त कि मेरे मेरा
जितना रग है ना वो सब में तार
है
तो मुझे जनेयू की जरूरत नहीं है।
वाह
कहां से पढ़ते हैं साहब आप?
अज सरे बालने मन बरखेज ए नादा तबीब
तू अच्छा कर नहीं सकता। मैं अच्छा हो नहीं
सकता। यजी मियां कहते हैं। पर उसकी लाइन
ऐसे है अ सरे बालने मन बरखेज ए नादान तबीब
कि अरे मेरे तकिए से दूर जाओ ये डॉक्टर हम
नादान हो तुम
अज सर बालीने मन मेरे तकिए के सिराहाने से
दूर हटो
दूर हटो ए नादान डॉक्टर दर्द मंदे इश्करा
दारू बजुज दीदार नी
अच्छा लगा
दीदार के अलावा
के इस दर्दमंद का कोई दारू नहीं।
इलाज नहीं है।
दारू नहीं है। दारू तो है भाई।
दवा मतलब
हां वही
दर्दमंद इश्क रहा दारू बज दीदार नहीं।
डॉक्टर को कहा जा रहा है कि दूर हो जाओ
मेरे
मेरे सिरहाने से जाओ यार तुम।
तुम्हें दीदार ही
वही बैठा रहता था ना डॉक्टर।
ओ वक्त बहुत कम बचा है।
हम ये खैर
बहुत बढ़िया था। लेकिन कहां से आपको याद
रहता है इतना उर्दू? ये वो अमीर खुसरो है।
फारसी का है। कौन खुसरो का ही है।
क्योंकि जनेऊने के बारे में और कौन फारसी
में जानता है?
कुणाल मिश्रा की चिट्ठी जय हो। कृपया
एपिसोड की शुरुआत में एक जन
लेकिन ये बहुत अच्छा है कि हर रग जो है ना
मेरा वो तार है वही धागा है। तो हमको जनेऊ
की आवश्यकता नहीं है।
और मुसलमानी की भी जरूरत
नहीं है।
नहीं है क्योंकि मैं इश्क में काफिर।
काफिर इश्क का मुसलमान ही मरा दरकार नहीं।
इट डोंट नीड।
बहुत एंगर था उस आदमी में।
मोहब्बत था। नौबत में हां जो भी है
हम कुणाल मिश्रा ने लिखा है जय हो कृपया
एपिसोड की शुरुआत में एक जनहित सूचना
अवश्य प्रसारित किया करें। जिन श्रोताओं
की हाल फिलहाल में कोई सर्जरी हुई हो वे
पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद ही तीन ताल
सुने। इस पॉडकास्ट में हंसी कई बार
नियंत्रण से बाहर हो सकती है जिसके परिणाम
स्वरूप टांके खुलने की आशंका बनी रहती है।
बाद में जब आप डॉक्टर के पास पहुंचते हैं
और डॉक्टर पूछता है कि हुआ क्या था? तो
तीन ताल सुन रहा था जैसा कारण चिकित्सा
विज्ञान की पुस्तकों में दर्ज नहीं मिलता।
इलाही क्या कयामत है कि वो जब लेते हैं
अंगड़ाई।
इलाही क्या कयामत
क्या कयामत है वो जब लेते हैं अंगड़ाई।
मेरे सीने में जख्मों के सब टांके टूट
जाते हैं।
ओ हो हो
नींद नहीं आएगी आज।
चीर देंगे आप लोग।
टांके टूट गए। खोल दिया। नहीं ये मुझे
बहुत अच्छा लगता है कि अंगड़ाई वो ले रहे
हैं टांके इधर कूट रहे हैं।
बहुत अच्छा है।
तो इसी ये सारी चीज़ इश्क में होती है ताऊ।
हम
दर्द मंदे इश्करा
क्या बात है।
दर्द भरी शायरी
हम
ये यार मुझे
इतने उल्लास के साथ सुनाते हैं।
हां।
मुझे अतुल ने जीजा साली वाली कौन सी है?
टक्कर।
टक्कर वाली एक शायरी की किताब दी है।
यार मैं उसको पढ़ नहीं पाया हूं। मैं उसकी
उसका अध्ययन और उसका विश्लेषण करना चाहता
हूं।
पर आपसे वहां
क्रिटिकल
हां क्रिटिकल करिए और उस पर फिर इसमें
चर्चा करेंगे और उस जमीन पर आई एम श्योर
आप कुछ नया भी कह सकते हैं।
उस जमीन पे मैं अपने पौधे उगाऊंगा।
हां
लेकिन वो बहुत बेतरर्ती है पर हैं पौधे
अच्छे पौधे।
ठीक है।
मैं अपनी गइयां भेजूंगा।
आई लव द ग्रीस।
मैं चाहिए गैया भेजूंगा चरने के लिए वो
पौधों।
क्या है? साली टक्कर।
कहां मिलती है? बस स्टैंड पे।
ठीक है। खली गोरखपुर में तो मिलती होगी।
हां। यू शुड हैव गॉट टू कॉपीज।
तीन
हम वो पढ़ेंगे।
खलिय आई हैव अ कॉपी। आई विल गिव इट टू यू।
खलियर मुन्नू इलाहाबाद से लिखा।
मुन्नू
खलियर मुन्नू। मुन्नू मेरा भी घर का नाम
है। क्या बात कर रहे हैं?
अम्मी मेरी बुलाती थी।
तू आप भी खलियर ही थे।
हां हर आदमी खलिय समय।
तीन ताल के तीनों युवाओं को जय हो। मैं
सड़क निर्माण के क्षेत्र में कार्यरत एक
निजी संस्था का कर्मचारी हूं और दैनिक
कामकाज से संबंधित आंतरिक संचार और
परियोजनाओं के संदर्भ में बाहरी सरकारी
विभाग को भेजे जाने वाले पत्राचार की
ड्राफ्टिंग का कार्य पिछले तीन-चार वर्षों
से काफी हद तक देखता आया हूं। भाई आई एम
ये Google से तो नहीं ट्रांसलेट किया है।
पत्राचार वगैरह। विगत एक वर्ष से मैंने इस
बात का अवलोकन किया है कि मेरी संस्था के
जो लोग पहले ड्राफ्टिंग की प्रक्रिया और
प्रतिबद्धता के साथ सीखने की कोशिश करते
थे वे अब चैट जीपीटी और ग्रामरली जैसे एआई
टूल्स की शरण में पहुंच गए हैं। खराब तो
तब लगा खानचा जब एक बार एक ड्राफ्ट तैयार
करके मैं बॉस के पास ले गया और उन्होंने
उन्होंने भी कहा कि यार चैट जीपीटी पर डाल
कर देखो शायद और अच्छा हो जाए। वापस गया
तो मालूम हुआ कि एक दूसरे साथी जो विगत
वर्षों में मुझसे ड्राफ्टिंग पर सलाह लिया
करते थे। कहा चैट जीपीटी से तैयार किया
हुआ ड्राफ्ट पास हो गया। खराब इसलिए लगा
क्योंकि पहले ऐसा कभी नहीं हुआ करता था।
आमतौर पर मेरे द्वारा तैयार किए गए
ड्राफ्ट पर थोड़ी बहुत हेरफेर या मामूली
संशोधन के बाद उसे मंजूरी दे दी जाती थी।
निवेदन है कि तीनों कभी इस विषय पर बात
करें क्योंकि आप लोग भी जनसंचार के
क्षेत्र से जुड़े हैं। साथ ही मैं चाहता
हूं कि ताऊ क्रिटिकल थिंकिंग में लिखने की
प्रवृत्ति के योगदान और फ्री एसोसिएटिव
राइटिंग के बारे में भी बात करें। मुझे
लगता है कि यह चर्चा आज के समय में
प्रासंगिक होगी जब लिखने और सोचने की
प्रक्रिया धीरे-धीरे मशीनों को सौंपी जा
रही है और कुछ और भी बहुत कुछ लिखना चाहता
हूं। लेकिन आज के लिए इतना ही खलियर
मुन्नू इलाहाबाद जय हो जय हो जय हो
मुन्नू चैटिपटी सभी यूज़ कर रहे हैं यार।
बुराई क्या है?
बुरा बुराई नहीं है पर वही है कि अपन
पीढ़ी दर पीढ़ी ना कमजोर होते जाएंगे।
हम
सृजन
हम एज अ स्किल और
वो उस पर संकट है सृजन पर।
अरे भाई 10,000 वर्ड लिखते थे ना आप। 5000
वर्ड आप लिखते थे ना 2000, 500, 300 लिखना
पड़ता था ना
लिखते थे। अब आप आसान रास्ता चुन लेंगे और
ये होगा कि भाई क्यों नहीं हम चुने?
जब मेरे पास कार है तो मैं बैलगाड़ी से
क्यों जाऊं?
बिल्कुल।
यू नो बट एक्चुअली आपके पास कार थी।
आपके पास बैलगाड़ी ऐसा जरूरी जरूरी नहीं
है।
आपने चलाई नहीं आपको प्रॉब्लम था।
नहीं आपके पास कार थी। आपको ईवी दे दिया
गया। बैटरी से चार्ज होने वाला है।
अरे फिर एथेनॉल पे आएंगे यार।
है ना? नहीं तो आपका हैंड आई कोऑर्डिनेशन
गियर वियर सब भूल गए ना आप।
ऑटोमेटिक गाड़ी चलाने के बाद थोड़े दिनों
में जब आपको गियर वाली गाड़ी पकड़ा देंगे
तो
करके आवाज करेगी।
रुक जाएगी वो।
तीनों के पास वही है। ठीक है ना? तो किसी
नहीं वो बोल रहा हूं। यही होता है। जैसे
आप ये कहते हैं ना कि नहीं भूलेंगे कैसे?
दिक्कत होती है।
तो चलाए हुए हैं। भूलेंगे कैसे? लेकिन एक
दिन बैठ देते हैं आपको
बिल्कुल
ठीक है इट विल टेक एन आवर हाफ एन आवर यस
यस टू अंडरस्टैंड्री
ठीक बात है अगली चिट्ठी है पार्थ वृष्टि
पटेल की प्रिय ककुआ कमलेश कुलदीप आसिफ
पिछले दिनों खुजली पर आपका इतना गहन विचार
विमर्श सुनते हुए मुझे भी एक कहानी याद आ
गई हमारी जो पार्टनर हैं जब हम दोनों
नए-नए प्यार में पड़े थे तब मैंने सोचा कि
उन्हें थोड़ा बहाल करूं। गुजराती में बहाल
करना उस प्यार भरे स्पर्श को कहते हैं जब
हम किसी प्रिय व्यक्ति या वस्तु को स्नेह
से सहलाते हैं। तो मैंने भी उनकी पीठ पर
प्यार से हाथ फेरा। ऐसा जादू हुआ कि आज छ
साल बाद भी अगर मैं रोज उन्हें इस तरह
खुजली ना करूं तो वह उदास हो जाती हैं।
अगर हम दोनों साथ बैठे हो और मेरे हाथ
खाली हो तो बिना कुछ कहे ही यह समझ लिया
जाता है कि तुम्हारे हाथ इसी कर्म के लिए
बने हैं। पार्थ बढ़ाओ हाथ। सप्रेम पार्थ
वृष्टि पटेल। बहुत ही खूबसूरत यार।
ये स्क्रैच में बैक वाला था ना
हां
बस इसमें इतना ही है। आई स्क्रैच यर्स
वाला मामला है। ये प्यार है बहुत
प्यारा सा।
वो कहते हैं ना कि
रोएंगे देखकर वो बिस्तर की हर शिकन को हम
वो हाल लिख चला हूं करवट बदल बदल के।
भाई साहब
आंसू निकल रहे हैं रास्ते बदल बदल के। हां
तो वो एक इबारत तो वो होती है ना जो आपने
नाखून से नहीं
पर अपनी उंगलियों की शिराओं से
किसी पीठ पर उकेरी थी
हम
और वो अगर आपको याद रहता है अगर आप रोज
करते हैं
किसी को भी स्नेह से
हम
यू नो
तो वो जो पहले दिन का एहसास था
वो आज भी जिंदा है अगर
वो जिंदा जिंदा रह सकता है
क्योंकि उन्हीं क्षेत्र को वही क्षेत्र
छुवन से गुजरेंगे
जो पहले गुजर चुके हैं।
छूना स्पर्श जो है ना
वो जानवरों से लेकर सब में
एक फमिलियर बिल्कुल बिल्कुल
वो जो है ना
तो आपका कैट भी है ना वो भी आके आपको छूने
का कोशिश की कोशिश करता है और वो चाहता है
कि आप उसे छूए
सहलाएं बहाल करते रहें
बहाल करते रहें
और मोहब्बत बहाल करते रहें
आ मोहब्बत जिंदाबाद
स्पर्श स्नेह जिंदाबाद
अगर यही हम किए होते तो आप बोलते तुमको
बीम ारी है खुजाने की अपना तो प्रॉब्लम है
भाई
नहीं आदमी हमेशा देखना खुजाता अपना है
दूसरों को खुजली करता है
हम
या फिर तो खुज भी बोलते खुजाता अपना
दूसरों को खुजली करता
आप मुझे नहीं खुजा सकते
आप मेरी खुजली मिटा सकते
हम
यार वो मुझे याद आ गया वो बनाने स्केच
वाले और उससे कि याद है गुलजार साहब नहीं
कहते याद है तुमने मेरी बेस पे बैठे-बैठे
सिगरेट की डिबिया पे स्केच बनाया आया था।
आओ स्केच में पौधे में फूल आया है। आओ
लेकिन आप उसको कविता के भाव से पढ़ना भूल
जाइए। नॉर्मल पढ़ के देखिए एकदम कविता
लगती नहीं है।
जैसे उन्होंने कहा लकीर हैं तो रहने दो।
किसी ने गुस्से में आके खींच दी।
खींच दी होंगी।
आओ बनाए पाला खेलें। कुछ भी गुलजार की
कविताओं को आप भारी आवाज में पढ़ना बंद।
उनकी बहुत अच्छी कविताएं हैं। बहुत शानदार
लिरिस
बल्ली मारा के
अब जैसे वो है चलता हूं वो नहीं घोड़ा
अपना अरबी है। चलता है मेहरौली में पर
घोड़ा अपना अरबी है।
अ ज्योग्राफी के मामले में वो कहीं कुछ भी
सेट कर लेते हैं। बल्ली मारा से दरीबे तलक
तेरी मेरी निशानी दिल्ली में। तो वो बहुत
ज्यादा क्षेत्रीय हो जाते हैं। ऐसे वहां
पेली की जरूरत क्या थी जहां
गजरारे गजरारे का था ना ये
हां है ना
पर आप हाउ विल यू इस्टैब्लिश कि आई हैव एन
अरेबियन हॉर्स क्योंकि चल तो मेहरौली में
रहा है ना
मेहरौली बहुत जैसे चलता है वो दिल्ली में
भी हो सकता था या किसी बड़े शहर का हो
सकता है तो वो मैं कह रहा हूं
वो लोकलाइज कर
लोकलाइज करते हैं जिससे
ये तो हर हर राइटिंग की खूबसूरती होती है
पर उनकी कुछ कविताएं हैं जिनको भारी आवाज
में अगर आप नहीं पढ़ें ऐसे कहने के अंदान
कह दे तो एकदम ना ट्रिविलाइज हो जाती हैं
वो। खैर आई होप वो ना सुने ये मैं उनका
फैन हूं। हां हां नहीं क्योंकि गीली हंसी
जो होती है ना
हम
हम
वो ऐसे तो लगता है कि क्या हंसी सूखी हंसी
क्या होती है पर होती है ना
हम
गीली हंसी होती है
हम
होती है
और गीली हंसी में आंखें जो हैं वो देखने
लायक होती है
हम
क्योंकि आप हां
कैसी होती है बताइए गीली हंसी
क्योंकि और कहां गीला होता है हंसी में आप
खुश हैं
थोड़ा दर्द भी है
तो वहां गीले हो जाते आंख गीली है, हंसी
है। लेकिन हंसी भी है, खुशी है।
अच्छा वो गीली हंसी भी है। ठीक है।
वो गीली हंसी भी हो सकती है। हम
खुशी के जो आंसू निकलते हैं उसमें आप हंसे
तो गीली हंसी उसे कहा जा सकता है।
हम
तो अब लोगों को ऐसे लगता है यार क्या गीली
हंसी
और अगर आपको पी लिया हुआ है उस समय आप
वो नीली हंसी भी पीली हंसी होगी। नीली
हंसी पीली हंसी भी पूछ जाते सांप डस की
आंख नीला पड़ गया हो तो नीली हंसी उसमें
भी अगर आप हंस रहे हैं।
पीली हंसी भी है। पीली
नहीं पर उसका काम यही होता है ना कि जो आप
कल्पना नहीं कर रहे हैं कवि का काम क्या
है? जहां ना पहुंचे रवि
हम वहां पहुंचे कवि।
तो जहां ना पहुंचे रवि का मतलब क्या होता
है?
जल्दी द लेट। हम जहां ना पहुंचे रवि का
मतलब होता है जहां तक सूरज की रोशनी नहीं
पहुंची है
उधर तक पहुंचाना और एक यह मतलब भी है कि
कल्पनाओं से परे
तो आपने नहीं सोचा था
कि ये हो सकता है पर मैंने लिख दिया तो
आपने इमेजिन तो कर लिया ना
मेरा काम हो गया
कभी जिंदगी ने बोला पिंजरे में चांद ला दो
कभी लाल टिन देके बोला आसमा में टांग गई
गुलजारी लिखते थे
हां
नहीं लौटा दे अम्र टिकट टू हॉलीवुड ये
गुलजार का लिखा सामने आए मेरे और देखा और
बात भी की और मुस्कुराए भी किसी पुरानी
पहचान खातिर कल का अखबार था देख लिया रख
दिया अब बताइए कविता भी पर कविता है अभी
इसी को पढ़ दूंगा भारी आवाज में तो आपके
चेहरे पे गीली हंसी आ जाएगी
कमबख्त जो शब्द है वो कमबख्त वैसे गिना
जाता है उसका मोहब्बत से कोई लेना देना
नहीं लेकिन उन्होंने गाना लिखा था कमबख्त
इश्क है जो सारा
कमबख्त इश्क है जो सारा ज
क्या लिखा था यार और ने जो गाया है
मुझे मतलब खैर जीवित लोगों में वैसे तो
साहिर शैलेंद्र
मजरू साहब ये सब मेरे पसंदीदा
बॉलीवुड लिरिसिस्ट हैं
पर
मैं जिनको अपनी पीढ़ी का कहूंगा उसमें तो
गुलजार साहब ही बेस्ट
उसमें कोई गुलजार साहब जावेद अख्तर बट कुछ
ज्यादा साहब
कमबख्त इश्क जब आप कहते हैं ना तो आप इश्क
से एक फमिलियरिटी दर्शाते हैं। हम
इश्क से एक दोस्ताना रिश्ता भी दिखलाते
हैं।
और ये भी कि ये काबू करने इसको क्लच में
नहीं लिया जा सकता साहब।
ये कमबख्त है ये साला थोड़ा फ्री है।
इश्क से मेरी नजदीकियां हैं। मैं उसे
कमबख्त कह रहा हूं। हम
कमबख्त आदमी जनरली उसको कहता है जो उसको
बहुत प्यारा होता है। नहीं तो आप इस
प्यारे को कमबख्त कहने नहीं आउट ऑफ
कंट्रोल
प्यारे को भी नहीं कमबख्त बीच का शब्द है
जो बीच का नहीं मानता नहीं है मेरी
कमबख्त इश्क है जो
अनुशासन नहीं है वक्त खराब होता है वरना
सब कुछ ठीक हो जाता आदमी बोलता
हां
ठीक है अगली चिट्ठी है रोता लकड़बग्घा की
तीन ताल के त्रिस्तंभों को नमस्कार बोलता
बनारस का रहने वाला
क्राइंग हाई है ना क्राइंग वुल्फ होता है
एनीवे
लकड़बग्घा तो हाईना होगा
हाईना होगा
हाई ना
बोलो बुल आपने हाईना देखा है?
आपने तो देखा
इंडिया में स्ट्राइप हना मिलते हैं।
स्पॉटेड नहीं
मैं मूल मूलत बनारस का रहने वाला हूं और
दिसंबर 2022 की बात है। हम लोग भाई की
शादी की खरीदारी में लगे थे। तभी एक ठंडई
की दुकान दिखाई दी।
हम
हालांकि उस दिन तक मैंने किसी प्रकार के
मादक पदार्थ का सेवन नहीं किया था। लेकिन
दिमाग में विचार आया कि बनारस का होने के
नाते एक बार विजया का गोला फकना तो लगभग
राइट ऑफ पैसेज जैसा ही है। बस फिर क्या
था? दो गिलास ठंडाई के साथ दो गोले अंदर
कर लिए।
बस जय भोले।
उस दिन की व्यस्तता इतनी ज्यादा थी कि
शॉपिंग करते-करते हम लोग गोले के बारे में
पूरी तरह भूल गए। करीब एक घंटे बाद जब
सारी खरीदारी निपटाकर गाड़ी में बैठे तो
सर चकराने लगा। तब लगा लो हो ही गए बीमार।
उस समय तक यह ध्यान ही नहीं आया था कि
गोले ने अपना परिचय देना शुरू किया है। घर
पहुंचे तो बिना खाए पिए सो गए। ठंड का
मौसम था और रजाई ऐसी भारी कि जिस अवस्था
में सो जाओ उसी में पड़े रहो। करवट लेने
की संभावना लगभग शून्य थी। कुछ देर बाद
ऐसा प्रतीत हुआ कि इंद्रधनुष ने हमारे घर
में ही डेरा जमा लिया है।
और तो और इंद्रधनुष के रंग भी ऐसे ऐसे थे
जिनका प्रकृति में शायद अस्तित्व ही नहीं
है। तभी याद आया कि यह सब गोले का प्रताप
है। फिर क्या-क्या नहीं देखा। खुद के शरीर
से आत्मा निकलती दिखाई दी। उसके बाद उसे
किसी तरह वापस शरीर में खींचने का प्रयास
किया। यह पूरा घटना घटनाक्रम लगभग एक घंटे
तक चला। घर में किसी को पता नहीं था कि
मैं भांग खाकर आया हूं सिवाय भाई के और वह
भी शायद तब तक भूल चुका था। कुछ देर बाद
भाई ने आकर जगाया और बोला शाम हो गई है
उठो चाय और चूड़ा मटर खा लो। अब दृश्य की
कल्पना कीजिए। सामने वालों को दिख रहा था
कि मेरे बाएं हाथ में चूड़ा मटर की प्लेट
है। दाएं हाथ में चम्मच। लेकिन मुझे दिखाई
दे रहा था कि मेरे दो बाएं हाथ हैं और
दोनों में प्लेट है। इतना ही नहीं तीन
दाएं हाथ भी मौजूद थे और तीनों में चम्मच
था।
अब दुविधा यह थी कि समझ नहीं आ रहा था कि
किस चम्मच वाले हाथ को किस प्लेट में
निशाना साधने भेजूं ताकि चूड़ा मटर सही
तरीके से चम्मच में आए और स्वाद का आनंद
लिया जाए। इसी कशमकश में जिंदगी गुजरी बाद
मरने के मेरी मयत पे लगा है। इसी कशमकश
में लगभग आधा घंटा बीत गया। किसी तरह
स्थिति को छिपाते छिपाते समय निकाला और
शाम को भाइयों के साथ टहलने निकल गया।
इसके बाद जो भी ठेला दिखाई देता वहीं रुक
कर टूट पड़ता। समोसा, जलेबी, मैगी, चाय,
कॉफी, नींबू, चाय, चाउमीन कुछ नहीं छोड़ा।
कहानियां बहुत है। आज के लिए इतना ही। आप
लोगों की सेवा में रोता लकड़बका
मत रो
मेरे दिल याद होता होगा। चुप हो जा हुआ जो
हुआ। यही तो छोड़ दो गुरु जो हुआ अच्छा
हुआ।
बहुत लगभग मेरे
विजया हम
वहां विश्राम भी मिलता है।
क्यों है? हम्म। इसे खाकर तो विजय नहीं
प्राप्त की जा सकती किसी पर। आपका
रिफ्लेक्सेस स्लो हो जाते हैं। इट काइंड
बी विजय। विजया आप पर विजय नहीं सकते।
हावी हो जाएगी।
हम हां तो वही तो विजया है।
नहीं विजया क्यों है वो?
आप होते तो विजेता होते।
हम विजय टॉकीज़ भी बना।
विजया कौन है?
विजय टॉकीज़ भी टॉकीज़ मतलब सिनेमा हॉल
बनारस में। टॉकीज़ टॉकीज़ के
विजया कौन है?
विजया जो
वही जीती है।
जोसेफ विजय
वही जीती है। फर्स्ट एक गोली में ही
ठंडाई याद आ गई यार।
नो नो नो
नहीं नहीं ठंडी मिश्रांबू वाली जो फिगर
उसके भी मिलती है।
व्हाट इज मिश्रामू?
मिश्रांबू एक ब्रांड है।
ठंडाई जो है वो बोतल में आती है।
हां घर में बना सकते हैं उसका वर्जन।
दो ढक्कन नहीं होता।
पर वहां पे घोट करके भी आपको जो है उसमें
दो गोले मारने की जरूरत नहीं है। अगर आप
बनारस में हैं और विजया का आनंद लेना
चाहते हैं जो देवानंद के भाई हम
कोई जान
तो आप जो है उनको बोलिए वो मॉडेस्ट मात्रा
में घोट के ही दे देंगे आपके ठंडाई में ही
आप पी लें ये गोले मारने वाले जो होते हैं
ना
वो जगह है लहरावीर वहां पे कॉर्नर पे
दुकान थी शामू देते थे वो केसर वाली आ हा
पर क्या इसमें ऐसा तो कुछ नहीं है कि कुछ
वॉर वॉर में यूज़ किया जाता हो मतलब कि जो
हां हां हो सकता है कि मतलब जीत
जरूर होता है ना
होता होगा कुछ
राजाओं के समय कि ये विजय क्योंकि युद्ध
उसमें तरह-तरह के पदार्थों का सेवन होता
था। उसमें
वहीं से हो सकता
भांग धतूरा
एनर्जी एनर्जी देता था ना
और दिशासुर
एनर्जी से ज्यादा जरूरी होती है मृत्यु से
भय नहीं होना
हां
हम
आपको अभी जो लगता है ना वॉर ऐसे वॉर नहीं
होते थे।
पहले सामने चाकू लेके खड़े रहते थे। तलवार
लेके खड़े रहते थे।
अब भाई आपका हाथ कट जाता था।
दर्द होता था।
आप तो ये उदाहरें मौजूद थे जब
उसे दर्द नहीं कहते भाई भाई साहब। उसे
दर्द नहीं कहते।
दर्द होता है।
दर्द होता है।
नहीं देखो
दर्द तो होता है पैर में चोट लग गया
उसमें।
उसमें क्या होता था आप मस्त हो। तलवार तुम
लेके आओ। हम लेके आए। आओ साले आओ लगा ही
दिया एक दूसरे को। कट पिट गया तो
हल्काफुल्का दर्द वो पेन किलर का काम करता
था।
अरे मैंने बताया था मेरे चाचा थे मेोरपुर
एक जगह है हमारे घर से करीब। मेरपुर
मेयूरपुर
मेोर
तो ऐसे ही है 16 17 कि.मी. दूरी पे Suzuki
मैक्स बाइक आती थी ताऊ को पता होगा पूरे
वो अपना भांग का सेवन किए हुए थे और सीधा
मेरपे मोड़मोड़ हुए तो मोड़ में मुड़े उनको
मुड़ना दिखाई नहीं दिया पेड़ में लेके हेड
ऑन
ठीक है। पूरा नाक उनके पूरे दांत बाहरकि
वो सेवन किए हुए थे और एक बंदा उनके साथ
और था संतोष नाम था। उसको उठाए उसको बांधे
और हस्पताल दुधी ले चले आए अगर वो सेवन
नहीं हुआ होता तो उनके प्राण पखेड़ो निकल
सकते थे उस समय वो दर्द यही जंग वाली बात
डोंट ट्राई
नहीं नहीं मैं कह रहा हूं बिल्कुल ये गलत
मैं तो किस्सा बता रहा हूं
ऐसा नहीं है कि
हां इसका सेवन करके आप चले पुलिस चालान कर
देगी
नहीं अरे यार चला प्रकृति चालान कर देगी
चला चलाचली की वेला आ जाएगी
दैट इज व्हाई सेवन को थालापुर रीजन कहते
हैं
गुणनिधि शर्मा की चिट्ठी अगली ताऊ खानशाह
सरदार को प्रणाम। हाल में तीन ताल देखना
शुरू किया। रोहित शर्मा वाले एपिसोड में
अंग्रेजों द्वारा भारतीयों से पूछे जाने
वाले अजीबोगरीब सवालों की चर्चा हो रही
थी। तो उससे जुड़ा एक किस्सा। हाल ही में
हमारे पड़ोस में एक अंग्रेज दंपति रहने आए
हैं। उम्र हो गई कोई 50-5 साल। एक दिन
रविवार को उन्हें घर पर दोपहर के लिए खाने
पर बुलाया। रोटी का आटा गूंथते देखकर वह
हैरान हो गए। उन्होंने कहा कि क्या आप लोग
कल के लिए तैयारी कर रहे हैं? क्योंकि
हमारे यहां तो इस तरह का आटा रात भर रखा
जाता है और अगले दिन फिर इस्तेमाल किया
जाता है। जब हमने उन्हें बताया कि यह तो
अभी सब्जी के साथ खाने के लिए रोटियां
बनाने का आटा है तो वह बड़े उत्सुक होकर
देखने लगे कि इससे रोटी यानी उनकी भाषा
में कहें तो ब्रेड कैसे बनेगी। फिर हमने
बताया कि इसी आटे में आलू गोभी जैसी चीजों
की स्टफिंग भरकर पराठे भी बनाए जाते हैं।
लेकिन वह प्रदर्शन किसी और दिन के लिए
बचाकर रखा गया। रोटी और नमक, मिर्च,
अजवाइन वाले पराठे चिकन करी के साथ खाकर
वह बहुत खुश हुए। खाते-खाते बार-बार पूछते
रहे कि इतनी साधारण सामग्री से इतनी
अलग-अलग चीजें कैसे बन जाती हैं? जय हो जय
हो जय हो। गुणनिधि शर्मा तीन तालिया
मेलबर्न से मूल निवासी पंचकूला हरियाणा।
अपना देश का स्वाद ही इतना अच्छा है
मसालों का
कि कोई भी खाए।
रोटी उनके लिए तो अद्भुत चीज होती है ना
कि आपने वहीं पे आटा गदा और वहीं रोटी बना
ली।
वो तो ब्रेड खाते हैं ना।
नहीं तो फर्मेंट होता है वो यीस्ट। हम हम
यीस्ट
यीस्ट राइज करता है
हमारे यहां ईस्ट में जो है राइज करता है
सन
हम उनके यहां
और उसके पहले ही अपन फुला लेते हैं
रोटी
फुल का
तो आज की चिट्ठियां इतनी ही कुछ चिट्ठियां
और रह गई
हां हां हर बार तुम यही करते
अरे भैया इतनी सारी चिट्ठियां चिट्ठी के
एपिसोड से ज्यादा चिट्ठियां ली है आज हमने
चिट्ठी के एपिसोड में तो
चिट्ठी आई है चिट्ठी गरियाया गया है कि जो
है
धोखा कर दिया भाई
तो radio aaj.com पर चिट्ठियां लिखते
रहिए। ttstf.in पोर्टल पर भी अपनी
चिट्ठियां लिखते रहिए। YouTube कमेंट तो
आप करते ही हैं। सबसे आसान इजी तरीका
तुरंत सब लोगों तक पहुंच जाता है। और फिर
से याद दिला देते हैं कि 4 जुलाई को हम
लोग जयपुर में होंगे। कोई ऐसा ऑफिशियल
इवेंट नहीं है। बस एक शहर में होंगे।
हां। और
एक शाम चुरा लूं अगर बुरा ना लगे।
हां हां हां।
पर ये कि उसकी एक्सैक्ट डिटेल्स क्योंकि
जगह पे होंगे।
चुराना तो बहुत मुश्किल है।
बहुत गर्मी है वहां पे।
हां। गर्मी तो होगी। तो जो डिटेल्स होंगी
जहां पर बैठ की होगी वो बता।
अगले एपिसोड्स में वो जाहिर हो जाएगा।
बिल्कुल।
तो फिर तीन ताल के इस एपिसोड में इतना ही।
160 एपिसोड हो गए पूरे।
बाप रे बाप।
160 जो है ना
चलो जल्दी से।
हां।
160 अगले एपिसोड में मुलाकात हो।
जय हो जय हो। जय हो।
पीताल प्रेजेंटेड बाय धर्म मूल।
Full transcript without timestamps
पीताल प्रेजेंटेड बाय धर्म आई लव यू भी ना कह रही मासू बात भी ना करनी छोड़ रही तानाशाही नहीं चलेगी नहीं चलेगी नहीं चलेगी टिटू मेरी बहन कितते है हॉट लोग होते हैं बहुत कूल थैंक्स थैंक यू ताऊ मेरे लिए तारीफ की आपने सर सब सब लोग सबकी साले अपने दिमाग में पिक्चर चल रही है जब तक जनीमा है अगर पर्दा है तो राज है तो राज है तो सिमरन भी होगी तो सिमरन भी होगी जया पर्दा भी हो सकती है जया पर्दा तो तुमने मुझे नंगा देखा है ये घूसा और घूसंड में क्या फर्क है घूसा जो होता है मेरे ख्याल से थोड़ा ऊपर तक मारा घूसण जो होता है घुसा करके मारा जाता है मर्द की अकल पे जो पर्दा पड़ा है बहुत पहले पड़ गया फिर भी किस किस टाइम में पड़ा होगा कुछ पता नहीं आप इतने उसे कह रहे हैं बहुत सही फिर भी किस टाइम खूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं। वहीं पर्दा है। वहीं बैठे हैं पकड़ के समझे। अरे अरे क्या एक्सप्रेशन दे रहे हो? अरे मैं खो रहा हूं। क्लोज अप देके चरमराती खाट थी सो है खड़ी खाड़े खाड़े तुम भी खड़खड़ाओ मत। आपकी जीवन में कुछ नहीं घट रहा। एक तो जब आप हमको देख के बोलते हैं, हमको अपने ऊपर डाउट। अरे आपके मोमेंट्स, जीवन क्या है? नहीं तो इनके जीवन में कुछ घट नहीं रहा है। इनके जीवन में सब बढ़ रहा है। क्या बढ़ रहा है भाई? अरे दिन ब्या भाई ब्या थोड़ा सा पर्दे से बाहर आइए चुराने ले चेहरे की नूर ए मेरे हम नवाज ऐ मेरे हुजूर तीन ताल प्रेजेंटेड बाय धर्म तीन ताल कैसे प्रारंभ हुआ कथा सुनिए तो हुआ यह कि एक आश्रम था जिसमें वे लोग आते थे तो जो जीवन में बहुत दौड़ चुके थे और अब बैठने का कोई वैचारिक कारण खोज रहे थे। आश्रम के मुख्य द्वार पर बड़े अक्षरों में लिखा था अति कर्म से बचो विश्राम ही परम तत्व है। अंदर प्रवेश करते ही बाई ओर झमाझम संहिता का विशाल अदृश्य ग्रंथालय था। वहां साधक किताबों के बीच सिर रखकर के दिन रात ऊंघते थे। सुस्तोपनिषद के पूरा पूरे 18 खंड सोह कर आश्रम के आचार्य समुसकानंद के चेहरे पर ऐसी शांति थी जैसे उन्होंने वर्षों से किसी निर्णय को अंतिम रूप दिया ही ना हो। उनके शिष्य धकेल कांत सुबह शाम खुरखुंद महामंत्र का जाप करवाते थे। खुर्र खुर्र खुरखुंदाय नमः आश्रम में कई विभाग थे जिसमें झन्नाट साधना केंद्र सबसे प्रतिष्ठित था। वहां साधक किसी काम को शुरू करने का संकल्प लेते और फिर वर्षों तक उसी संकल्प की महानता पर विचार करते रहते। दक्षिण दिशा में झौसाचार पीठ था। झौसाचार हां वहां सिखाया जाता था कि व्यस्त दिखने की कला क्या होती है। आश्रम के महंत टुनटुनेश्वर जी ठलुवेंद्र युग के अंतिम ज्ञाता माने जाते थे क्योंकि वह कनबतिया काल की पुरानी इमारत में विद्वान साधुओं के कान में घंटों फुसफुसाते रहते और फिर घोषणा करते कि आज नया ज्ञान प्राप्त हुआ। जब पूछा जाता कि क्या ज्ञान मिला तो वह कहते कि अभी शोधाधीन है। रिसर्च का सब्जेक्ट सब्जेक्ट टू रिसर्च है। आश्रम में एक विचित्र साधु भी था। उसका नाम था झबर घोंच। उसकी जटाएं इतनी विचित्र थी कि तीन कबूतर, दो गिलहरियां और एक खोई हुई पतंग उनमें स्थाई निवास कर जाए। लोग उन्हें चलता फिरता पारिस्थिकी तंत्र भी कहते थे। संध्या होते ही पूरा आश्रम मुख्य प्रांगण में एकत्र होता। समुसकानंद, धकेल कांत और टुनटुनेश्वर महात्मा एक स्वर में घोषणा करते। जो काम आज हो सकता है वह कल भी हो सकता है। जो कल हो सकता है उसके लिए परसों बना ही है और फिर शंखनाद के साथ सभा समाप्त हो जाती। कालांतर में उदारीकरण, वैश्वीकरण, डिजिटलीकरण, स्टार्टअपीकरण, एल्गोरिद्मीकरण और प्रायोजकीकरण की आंधियां चली। बड़े-बड़े आश्रम उखड़े, कई मठ कंटेंट बन गए। अनेक गुरु थंबनेल हो गए और शिष्य नोटिफिकेशन। झमाझम आश्रम भी समय की इस प्रचंड धारा से अछूता ना रहा और झन्नाट साधना केंद्र ने घोषणा की कि अब संकल्प लेने के बजाय उस पर चर्चा की जाएगी। धीरे-धीरे आश्रम की विशाल परिधि लाल दीवारों के बीच समा गई। कन्वतिया काल की पुरानी इमारत अब स्टूडियो कहलाने लगी। घंटों कान में फुसफुसाकर शोधाधीन ज्ञान देने वाले टुनटुनेश्वर जी के स्थान पर माइक के चौंगे आ गए और संध्या सभा का नाम पड़ गया तीन ताल। शुरू करते हैं सीजन दो एपिसोड 160 प्रेजेंटेड बाय थर्माकूल कूलर्स ऋषि कमलेश ताऊ, आचार्य आसिफ खान शाह और महंत कुलदीप सरदार की पावन उपस्थिति में। जय हो जय हो जय हो बहुत खूब यार प्रणाम नमस्कार जीत ये लाल दीवाने थोड़ी सी सिकुड़ गई लेकिन कमफी लगती है हम वैसे थोड़ा सा एक सिकुड़ गई मतलब कम छोटा बड़ा था ना अपनी प्रॉपर्टी पूर्वजों का हां अच्छा वैसे फिर आंधियां चली ना बहुत सारी उदारीकरण वैश्वीकरण अभी भी आंधी चल सकती है चल रही यही हुआ है थर्मोकल है जो खोला गया था उसको कहते हैं ना ओपनिंग अप दी इकॉनमी मी हम जैसे खोला गया ना वैसे सब कुछ बंद होता गया चारों तरफ से थोड़ा कैसा रहा आपका वीक मेरा तो बहुत स्ट्रांग रहा अच्छा 8% नहीं मैंकि एथेनॉल का सेवन ना अपने लिए ना अपनी गाड़ी के लिए अच्छा मानता हूं हम तो मैं पर आपके पास विकल्प ही क्या है अब नहीं पर वीकेंड क्या था कि वीकेंड में जो है दिल्ली में एक हलचल सी हुई हम हम सैटरडे को हां कॉकरोच चों का आगमन हुआ हम जो मुख्य कॉकरोच था सीधा लैंड किया हां अभिजीत दीप के उसका पदार्पण हुआ हमारे दिल्ली के एयरपोर्ट पर और जो गलती प्रधानमंत्री ने की थी उसे गृह मंत्री ने ठीक कर दिया मतलब शिक्षा मंत्री ने की थी प्रधानमंत्री ने की थी पूरे सरकार ने की थी उसको परमिशन दे दी कॉकरोच जनता पार्टी को परमिशन दे दी गई अरे जिस दिन लीक हुआ था क्वेश्चन पेपर नीट का पता चल गया था जिस दिन उस दिन इसको गंभीरता से लेते हुए श्री धर्मेंद्र प्रधान जी को मतलब मंत्री प्रधान को अगर प्रधानमंत्री से नहीं हो तो मंत्री प्रधान को आ जाना था टीवी पर और कहना था कि हम इसको बहुत सीरियसली ले रहे हैं। हद हो गई है हर साल 2 साल में यहां वहां परीक्षा पत्र लीक होते हैं। इसका सॉलिड इंतजाम करेंगे। एक महीना दीजिए। इसके बाद हम ऐसा ठोक बजा के ठीक कर देंगे कि कभी यह शिकायत नहीं आएगी। यह बोलना था जिम्मेदारी लेते हुए रिजाइन करने की जरूरत नहीं थी। पर नहीं ये होता है ना कि कारपेट के अंदर डालो ढको ढको जब तक खींच पाता है खींच लो। बोलने में ही उन्होंने काफी समय ले लिया। पहली बार दो या तीन दिन चक्कर में जो है मंत्री प्रधान के चलते प्रधानमंत्री तक बात पहुंच गई। हम और कॉकरोच आ गए। पर वो अच्छा डिसीजन हुआ कि अलव किया गया उनको कि जाने दो। दिन का टाइम है। ऐसा ही कॉकरोच नहीं निकलेगा। बहुत गर्मी भी थी। गर्मी बहुत ज्यादा थी। पर वहां जैसे ये तो स्पष्ट हुआ एक कि लेफ्ट के छात्र संगठनों ने समर्थन दिया। दीपांकर भट्टाचार्य भी पहुंचे। वहां पे नेता सोनम नफली वाले पहुंचे। जो आजादी मांगते हैं वो पहुंचे। सोनम वांगचुक भी पहुंचे। हालांकि वह किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े नहीं है। पर यह तो स्पष्ट हुआ कि मतलब इस मसले पर लेफ्ट के समर्थन से सीजेपी को गुरेज नहीं है। मतलब वो उनको अछूत नहीं समझती है अपने कॉज के लिए। जैसे और अंबेडकर को ले की वो लेकर के पुस्तक अभिजीत दीप के आए दिखाते हुए उसको ऑटोबायोग्राफी लेके आए। हम जो कभी लिखी नहीं अंबेडकर ने एक बंदा संविधान भी लेके आया हम और उसको खोला तो उसकी डायरी थी उसने कहा ये मैंने लिख रखा है ये मेरा जिसमें मैंने आर्टिकल लिखे हैं कई रंग रूट भी आए थे अच्छे बहुत अच्छे-अच्छे सुंदर कॉपरेज का कपड़ा कोई बाली पहन के टिकिया लगा के वो 90% लोग जैसे देश के युवा हैं 90% क्लूलेस थे हमारा समाज है 10% बहुत शार्प थे उनके विचार बहुत मजबूत थे इस बारे में कि अपने को कुछ तो करना पड़ेगा हम् हम लेकिन दीपके ने ऐसा सोचा नहीं होगा ना कि इतना बड़ा बड़ा नहीं मतलब इतना हालांकि प्रोटेस्ट ये एक बड़ा ये ये एक ऐसा विषय है ना क्या कहा जाए इस प्रोटेस्ट को क्या हम एक सफल और बड़ा प्रोटेस्ट कह सकते हैं या नहीं सफल और छोटा हां शुरुआत तो ठीक ही की उन्होंने नहीं नहीं शुरुआत तो उन्होंने बहुत खराब की उसको कंपेयर उससे कर रहे हैं भारी बेइज्जती का कारण था पर प्रोटेस्ट सफल हुआ सफलता क्या होता है आपका ऑब्जेक्टिव क्या था पहला धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें उसमें नहीं वो तो जो रियल इशू है वो है कि पेपर लीक की तरफ पूरे राष्ट्र का ध्यान आकर्षित करना हो गया ना एक दिन के लिए सारे लोग इसके बारे में बात करने लगे ना कि करना पड़ेगा धर्मेंद्र प्रधान को जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए पर वो अब और भी शहरों में अलग-अलग शहरों में पुणे में करेंगे और जगहों पे नहीं वो तो ऑब्वियसली करना चाहेंगे हम पर दिल्ली में अगर इतना बड़ा पहला वाला नहीं कर पाए तो दूसरा वाला शायद सीक्वल का चलना बहुत मुश्किल होता है। इन्होंने एक एक मुझे लगता था जैसे सोशल मीडिया पे पार्टी शुरू हुई पूरे देश के लोग जुड़ गए। इतने फॉलोअ हो गए। उस दिन मुझे लग रहा था इनको हर शहर में बोलना चाहिए था कि इतने बजे ऑनलाइन जुड़िए। थ्रू वीडियो कॉल वो उससे भी बड़ा हो सकता था। हर शहर से बड़े-बड़े उसको संभालना बड़ा क्या? क्यों? हर जगह पे लोग खड़े रहते हैं यार। उनको डालना था कि हर शहर से जुड़िए। वही तो भारत में इस वही सड़क पर उतरे बिना प्रेशर बनता नहीं है। ऑनलाइन मान लीजिए लोग ऑनलाइन को अपनी जगह पे निर्धारित कीजिए एक जगह जहां जितने लोग इकट्ठा हो सकते हैं युवा वो जुड़े ताकि दिखता कि यहां पूरे एक नेशनल लेवल पे आपका प्रोटेस्ट हुआ सिर्फ जंतरमंतर पे नहीं उतना दुर्गा तो बाहर रहता ही है दिन भर उतना हां उतने जो ये जनरेशन जेंजी जनरेशन है उतना टाइम ऑनलाइन रहती ही है वो Instagram लाइव बेस्ट है सुबह सुबह अगर आप 8:30 9 बजे देखते तो सिर्फ मीडिया वाले ही दिख रहे थे फ्रेम में हम में एक बात है आप बढ़िया से वेल पब्लिसाइज करके कोई भी कार्यक्रम करो 300 आप पहुंचोगे 500 मीडिया पहुंच 800 हो गया भीड़ में काउंट तो वो भी होंगे वो भी आए थे हमारी अच्छा है संख्या बढ़ाने हमारी एक साथी रिपोर्ट ऐसा था यार मीडिया वाले एक दूसरे का इंटरव्यू कर रहे थे मतलब एक यूट्यूबर दूसरे का इंटरव्यू कर रहा था क्योंकि उनको आता ही नहीं था उनको माइलेज चाहिए अपना नंबर चाहिए एक बंदा बहुत गुस्सा था उसने कहा कि हमको जंतरमंतर में परमिशन दिया है फिर भी हमको सड़क से सड़क पे करवा रहे हैं तो उसको रिपोर्टर ने कहा कि यहीं पे करते हैं। उसके अंदर नहीं करते। उसके अंदर नहीं जाते हैं। इतने मतलब इतना ज्ञान लेके लोग आए हुए थे। बहुत सारे मैंने तो देखे ना पहली बार की सर उनका एक्सपोज़र नहीं है। 18 19 साल के बच्चे हैं। पहली बार देख रहे हैं जंतर पहली बार गए होंगे। मतलब उनको भी थोड़ा लेट लेट अस कट देम सम स्लैक। ये नहीं मैं तो चाहता हूं यार क्योंकि अपन ने उस उम्र में जो है प्रोटेस्ट किए हैं मार खाया है। वो सब करना ही चाहिए उस उम्र में। तो वो प्रोसेस ना जब तक अंटिल ट्रायल बाय फायर नहीं हुआ हम हां तो वो धूप में है कोल्ड ड्रिंक पी रहे हैं कोल्ड कॉफी लाते मंगवा रहे हैं आइस्ट उसमें नहीं होता प्रोटेस्ट ये सरकार भी बहुत बेरहम होती है इस बात प्रोटेस्ट जो है आपको एकदम जी जान लगा के करना चाहिए दौड़ना चाहिए फिर जब पहला लाठी बरसता है ना पहले तो पुलिस वाले दोनों में धक्कामुक्की होती है थोड़ी-थोड़ी बैरिकेटिंग लेके उसके बाद जब बजना शुरू होता है ना देन यू रन एंड देन यू फॉल समटाइम्स यू डोंट नो नो व्हाट टू डू तो आप दीवार फाकर पीछे चले जाते हो पता चलो वही पुलिस वाले कभी कभी प्रिटेंड करते हो कि मैं पुलिस के साथ हूं मैं उनके साथ नहीं हूं ये सब कौन सिखाएगा बच्चों को ऑनलाइन है आप नहीं सीख सकते ये मारियो नहीं है भाई साहब वो ग्राउंड पे जाके एक्सपीरियंस करना होता है तो बच्चों को हमेशा प्रोटेस्ट में आगे आना चाहिए कॉलेज के बच्चों को स्कूल के बच्चों को नहीं कॉलेज के बच्चों को आगे आना चाहिए और आपको फिर सीखोगे नहीं तो बड़े हो के जब पुलिस मारेगी तो आपको बेइज्जती भी महसूस होगी और दर्द भी और ऐसे बड़े होकर पुलिस मारती है ना तो आपको दर्द नहीं होता है। बेइज्जती होती है। किसी कॉज में मारा तो आपको दर्द होता है। सिर्फ बेइज़्ज़ती नहीं प्राउड होता है कि हमने खाया था डंडे। बच्चों को बताओगे यार। आई थिंक लेकिन सरकार बहुत बेरहम थी उस दिन। मतलब कैनन वाटर ही मारते यार। मतलब थोड़ा ठंडक मिल जाता। हम गर्मी वहां पे रहता है हमेशा। नहीं मारे इस बार की जान। अरे ये लोग किया नहीं ना कुछ। तड़पाया भी। हां। नहीं तो अरे पीसफुल पीसफुल प्रोटेस्ट रखना भी एक सफलता थी कि यह मेक श्योर करना कि अराजकता है वो असफलता थी। देखो यह पहली बार किया। पीसफुल प्रोटेस्ट रखा नहीं गया था। उनसे हो ही नहीं पाता कुछ। यह देखो हकीकत को मैं मानता हूं यह प्रोटेस्ट सक्सेसफुल रहा क्योंकि इसने देश एक बहुत जरूरी मुद्दे की ओर देश का ध्यान आकर्षित किया। सफल रहे उसमें। ठीक है? धर्म धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें ना दें। क्योंकि इस्तीफा देंगे तो कोई दूसरा बनेगा ना। क्या ही फर्क पड़ता है वो थोड़ी ना परीक्षा लेता है। वो थोड़े पेपर लीक करवाते हैं। पेपर लीक तो कोई शिक्षक करता है ना। हां मतलब या सिस्टम से जुड़ा हुआ कोई व्यक्ति जो कोई जनरली शिक्षा ही करता है। ठीक है? और गुरु जो है देवता भगवान मतलब गुरु गोविंद दो दाऊ काको लागे पाव ताको लागो पाए बलिहारी बलिहारी गुरु आपने गोविंद बताए पेपर दियो ठीक है तो सब धर्मेंद्र प्रधान की ओर बता देते हैं और बलिहारी गुरु तो आपने थे ना जिन्होंने सेट किया उन्होंने लीक किया जो ले रहे हैं वो करवा रहे हैं आप बजट बनाती हैं मैडम उनके पहले भी लोग बनाते थे सारे लोगों को क्योंकि क्योंकि भारत एक 90% वो है। समझ रहे हो ना? नहीं। हां समझ गए। हां। समझ गए ना? हां। जस्टिस काजू। हां। तो वो क्या करते हैं? बजट एक ऐसा डॉक्यूमेंट है जिसको लीक नहीं होना चाहिए। सबको एक बिल्डिंग में ले जाया जाता है। सबके फोन रख लिए जाते हैं। ठीक है? और फिर वो वहीं रहते हैं। वहीं खाना बनता है। वहीं खाते हैं। लास्ट डे में हलवा हलवा बनाते हैं। स्वीट डिश क्यों? फाइनल। अब कहते हैं कि अब हम उधर जा रहे हैं संसद में। तुम लोग जाओ अपने घर। नीट की परीक्षा है। आप जानते हो इतना इंपॉर्टेंट है। कोई ना कोई कहीं ना कहीं विकेंद्रित है सब कुछ। कर ही देगा। सबको बिठाओ एक कमरे में। फोन ले लो। और कहो चलिए सेट कीजिए आप लोग। सेट हो गया आप वहीं रह जब तक एग्जाम नहीं होता आप कहीं नहीं जाएंगे। ठीक है? पूरे देश के सेंटरों में यार बैलेट का पूरा आप बैटरी और क्या है? पूरा इंतजाम ले जाते हो ना विद सीसीटीवी आल्सो हम ईवीएम एंड ऑल इतना बढ़िया टेलीकम्युनिकेशन नेटवर्क है। अभी बस 11:00 बजे परीक्षा है। 10:00 बजे सबको भेज दिया जाए। प्रिंट कमांड यहीं से देना है। सब जगह प्रिंट हो जाएगा। दे दो सब। आईडिया अच्छा है। यह पहुंचेगा ही नहीं। जो जो इतना टाइमली मैनर में पहुंचाना है ना कि 10:00 बजे 11:00 बजे परीक्षा 10:00 बजे भेजना है। हम वो पहुंचने के सिस्टम ही फ्लॉप हो जाएंगे। इतने सेंटर्स हैं। नंबर ऑफ सेंटर्स 25 लाख लोग देते हैं। अरे तो यहां से प्रिंट कमांड दूंगा मैं। अरे हम फिजिकल लेके जा रहे हैं। इतना होने के बाद भी वायु सेना के हेलीकॉप्टर्स हैं। फिजिकल मतलब फिजिकल वही तो बोल रहा हूं। आप तो गलत कर रहे हो ना? हां आप चाहो तो हर सेंटर पे एक प्रिंटिंग मशीन रख दो बस वही कि क्या वो सारे सेंटर्स डिजिटली इंटरनेट से एक वायबल कनेक्शन तो करना पड़ेगा नहीं वही नहीं अब क्या है जहां पर भी मोबाइल फोन का सिग्नल जाता है वो कनेक्टेड है ऐसी जगहों पे एग्जाम ही मत करवाओ और मेरे हिसाब से होता भी नहीं होगा नीट का एग्जाम जहां मोबाइल फोन का सिग्नल नहीं है असंभव सा है हां पर मान लीजिए 1 घंटे पहले टेक्निकल इशू आ जाएगा। नहीं नहीं एक घंटे पहले लीक हो गया। डिजिटल कॉपी को फॉरवर्ड करना बहुत ही आसान है। हार्ड कॉपी मेरे पास एक ही कॉपी है। मैं तो दे ही नहीं रहा हूं ना। मैं हार्ड ही कॉपी दे रहा हूं आपको। प्रिंट कमांड दे रहे हो तो फैक्ट से निकलेगा। नहीं प्रिंट प्रिंटिंग मशीन है। वहां पे दूसरी जगह। हर सेंटर में प्रिंटिंग मशीन। उसके भी ज़ेरॉक्स हो सकता है। अब इतना निकाल तो निकाल ही लेंगे लोग। पौ:45 बजे अगर ज़ेरॉक्स निकाल लिया है तो निकाल लिया है। फिर उसको अवार्ड देना चाहिए। वह तो 11:00 बजे ऐसे भी जब छात्र को देते हो तो लीक हो ही जाता है ना। हम्। 15 मिनट में क्या ही कर लेगा कोई? आप अभी जो ले जा रहे हो हेलीकॉप्टर से क्या हर सेंटर पे हेलीकॉप्टर से लेकर जाओगे? हां वो तो खैर एक बड़े सेंटर पे ले जाएंगे और फिर वहां से अलग-अलग जगहों पे जाते हैं। पर एक बात है। कहीं दंगा हो रहा है आर्मी बुला लो। युद्ध हो रहा है आर्मी बुला लो। बाढ़ आ गई आर्मी बुला लो। एयरफोर्स वाले को रेस्क्यू करने के लिए बुला लो। डिफेंस फर्सेस हमने रखे ही यही है। हम घरेलू इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है। हां खाली बैठे हो। चलो परीक्षा गिर गया है। चलो आर्मी वाला बना दो। मास्टर बना रखा है आपने। हम्। फिर पश्चिम बंगाल में बढ़िया माहौल बना हुआ है। तो लिस्ट अभी तो जब हम लोग यह रिकॉर्ड कर रहे हैं बुधवार को तो एक लिस्ट भी आ गई है उन सांसदों की जिन्होंने सूची बागी सांसद हां फिर साइन करके दिए हैं कि भ हमारा सिंग अरेंजमेंट अलग हो जाए और ये लोग मोस्ट लाइकली एनडीए के पक्ष में जाने वाले हैं। और उसमें कई चौंकाने वाले नाम भी हैं। मसलन शत्रुघ्न सिन्हा जो पहले बीजेपी के साथ ही हुआ करते थे। फिर लंबे समय से टीएमसी में थे और सायुनी घोष जो इस चुनाव में जिनके भाषण और मीडिया इंटरव्यूज बड़े चर्चित रहे और हिंदू मुस्लिम एकता और सेकुलरिज्म की मजबूत मिसाल के तौर पर उनको पेश किया गया था चुनाव से पहले कि देखो ये ना डिगने वाली महिला उनके भी दस्तखत हैं। तो युसूफ पठान युसूफ पठान युसूफ पठान हालांकि कोई आईडियोलॉजिकल अह मतलब युसूफ पठान ने कभी ऐसा जाहिर नहीं किया कि इनमें से किसी ने भी बताने में जैसे आयानी घोष ने जाहिर किया है। पर इतनी बड़ी टूट की अपेक्षा टीएमसी में थी आपको मतलब जैसे क्या आपको यह लगता है कि यह टूट इसलिए हो गई क्योंकि टीएमसी वैचारिक तौर पे कहीं स्टैंड नहीं करती है। एक यह आर्गुमेंट आता है बार-बार कि यार कोई भी पार्टी बने। इसीलिए ठोस वैचारिकी का उसके पीछे होना जरूरी है। आम आदमी पार्टी का इसी आधार पर बड़ा क्रिटिसिज्म होता रहा कि यह पार्टी कभी भी टूट सकती है। इनकी एक आईडियोलॉजी नहीं है। लेफ्ट आज बुरी हालत में पर उसकी एक क्लियर आईडियोलॉजी है। कांग्रेस इसी वजह से उसकी बहुत अच्छी खा हालत नहीं है। लेकिन उसकी एक आईडियोलॉजी है जो ऐसे मौकों पे शायद प्रिवेंट करती होगी इस तरह की सिचुएशन को। पर एक्चुअली कर पाती है या नहीं या यह एक अ क्या बोलते हैं जो सिद्धांतवादी लोग हैं उनका गढ़ा हुआ एक मिथ है कि आईडियोलॉजी कोई शील्ड नहीं है जो इन चीजों से बचा सके क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की अपॉर्चुनिटी अपॉर्चुनिज्म में प्रत्येक व्यक्ति की आस्था जो है वो किसी भी आईडियोलॉजी को ट्रांसेंट कर सकती है। अवसरवादिता जो है वो ज्यादा बड़ी चीज है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपना भविष्य बनाने आया है। व्यक्ति केंद्रित पार्टी में जो व्यक्ति कहे वही सही होता है। उसकी कोई आईडियोलॉजी नहीं होती। तृणमूल जो है ममतावादी पार्टी थी। ममता कहे वही संविधान है। हमारा वचन ही हमारा शासन है। तो ऐसी पार्टियों में यह खतरा हमेशा रहेगा कि जब केंद्र टूट जाएगा तो फिर बिखर जाएगा। भाजपा में लीडर आए गए। नरेंद्र मोदी भी एक दिन लीडर नहीं रहेंगे। भाजपा रहेगी क्योंकि भाजपा विचारधारा के साथ चलती है। एक आईडियोलॉजी है इनकी। कांग्रेस में भी है। कांग्रेस रहेगी। बहुत दिनों से मतलब परिवार के नियंत्रण में हो तो भी कांग्रेस की एक आईडियोलॉजी है। एक इतिहास है। जिन पार्टियों का इतिहास उस व्यक्ति के द्वारा कुछ भी हो। पहले अटल बिहारी वाजपेयी जी के साथ थी। फिर अह दूसरे यूपीए में आ गई। पहले एनडीए में थी, फिर यूपीए में आ गई। फिर वह इंडिया अलायंस बन रहा है तो उसमें थी। फिर नहीं थी। फिर नीतीश कुमार बनने लगे तो उन्होंने विरोध कर दिया। कांग्रेस और वो साथ नहीं लड़ते। कम्युनिस्टों के साथ इंडिया अलायंस में थी। क्योंकि वह था कि ममता बनर्जी डिसाइड करेंगी, पार्टी का क्या होगा। जब वह कमजोर पड़ जाएंगी, वह अपना सीट हार जाएंगी, उनकी पार्टी बुरी तरह से हार जाएगी, तो बाकी लोगों को कोई डर नहीं रहेगा ना। और अभिषेक बनर्जी का जो कहिए का पंजा जो था कस के रख सबको जोड़ के रखा था क्योंकि उस पार्टी में किसी को भी टिकट दे दिया जाता था, वह जीत जाते थे। ऐसी मशीनरी थी उनकी। आपने जिसको टिकट दे दिया, वह जीत जाएंगे। जिनको राज्यसभा भेजना है भेज दो। महाराष्ट्र का एक पुलिस ऑफिसर का बेटा जो तरह-तरह के आरोपों से घिरा हुआ था। उसको उन्होंने कहा कि तू सोशल मीडिया पे पॉपुलर है। इसको एमपी बना देते हैं। तो वो मर्जी वाली बात थी कि मीम तुमको भी बना देते हैं। जून तुमको भी बना देते हैं। जिस चीज को एक्ट्रेस ऐसा तुम भी बन जाओ। तुम भी बन जाओ। तुम लोग खुश रहो। इधर-उधर एंटरटेन करते रहो लोगों को। हमारा भी एंटरटेनमेंट करते रहो। दैट इज ऑल। यही था उनका कीर्ति आजाद हां मतलब क्या है व्हाट इज योर क्लेम टू फेम क्रिकेट 1983 वर्ल्ड कप एक्सक्ट्ली क्योंकि पापा मुख्यमंत्री थे टीम में हम थे बनाया क्या था भाई किया क्या था टीम में रन वगैरह बनाए थे वो ऐसी बात नहीं क्या कितने बनाए थे भाई 14 बनाए होंगे सात रन बनाए होंगे उनका एक पीसी में उन्होंने 14 रन बनाए होंगे हम पूरे टूर्नामेंट में कितने रन बनाए थे मुझे क्रिकेट में कोई इंटरेस्ट नहीं भाई नहीं है ना हम 1983 में वही होता है ना कि भाई सपोज़ करो यार कि 2011 वाले में तेजस्वी उस समय खेलते थे हम खेलते अगर फिट कर दिया गया होता उनको हम और काफी लोग हैं ना जो उठाते हैं वो कप उसमें से सभी थोड़े ना खेलते एक्स्ट्रा जो होते हैं वो भी पकड़ के खड़े हो जाते हैं। कीर्ति आजाद के पापा मुख्यमंत्री थे भाई और उस समय जमाना अलग था उनको वो बीजेपी में रहे उनकी पत्नी आम आदमी पार्टी में रही कांग्रेस में रहे तृणमूल में कहा ठीक है तुमको बना देते हैं पिता के बड़े पद पे होने का फायदा तो मिलता है हां बिल्कुल मिलता है वो तो हमारे यहां एक नॉर्म है ये एक्सेप्शन नहीं है तो और मुझे लगता है ये स्वीकार्य भी हो गया उस जमाने में बहुत होता था अभी तो थोड़ी आवाज भी उठती ना? हां। हालांकि अभी भी वह आवाज उठा के क्या कर लेते हैं। हां, मतलब क्रिकेट प्रशासक के तौर पर जयशा बहुत सफल प्रशासकों में गिने जाएंगे। उनके दौर में कुछ रिफॉर्म्स भी हुए हैं और पद पे होने का कारण तो उनके पिताजी हैं ना। हां। उनके पिताजी जो हैं वो अध्यक्ष थे। गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के। हम यह भी बने। तभी तो आप कम्पीट कर पाते हो। हम तो है तो पर एक बात बताइए जैसे यह जो पार्टी हॉपिंग है एक पार्टी यह हॉप नहीं कर रहे हां मतलब ठीक है स्विच कर रहे हैं स्विच भी नहीं कर रहे एनडीए में तो जा रहे हैं साफ होने नहीं नहीं ये एनडीए को समर्थन देंगे बिल्स पर इनका कहना है कि हम तृणमूल कांग्रेस हम हैं। अब जैसे राज्यसभा का की सांसद हैं सुष्मिता देव ठीक है। उन्होंने इस्तीफा दिया है। राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया है। अब कोई भी वहां से वो पार्टी तय करेगी कि वो किसको खड़ा करेंगे। सुष्मिता को ही खड़ा राज्यसभा में उनके नंबर टूटने वाले नहीं है। वही मैं बता रहा हूं कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उसको अब आप टेक्निकली पार्टी हॉपिंग मत कहिए। बट इट इज स्विचिंग साइड्स। ठीक है? टीएमसी तो छोड़ ही रहे हैं या यूपीए तो छोड़ ही रहे हैं। ये क्लियर है। तो ऐसे में ये थोड़ा सा अजीब कई बार नहीं होता होगा। जैसे पार्टी बीजेपी के कार्यकर्ताओं के लिए उन्होंने साइनी घोष का बहुत क्रिटिसिज्म किया है। उनकी वैचारिकी का उसी चीज का जिससे वह दूसरी तरफ स्टैंड करती थी। या शत्रुघ्न सिन्हा ने के के बारे में बीजेपी के नेता कार्यकर्ताओं ने क्या बोला है? बट अभी वही शत्रुघ्न सिन्हा ने क्या-क्या बोला है। हां हां बट तो ऐसे आदमी को क्या भारतीय जनता पार्टी जब विजय रथ पर सवार है और आप मानते हैं कि यह व्यक्ति हमारी विचारधारा के एकदम उलट काम कर रहा था 5 साल में। आपको आवश्यकता क्या है और क्यों है? तो इसलिए तो नहीं आ रहे हैं बीजेपी में। समर्थन तो देंगे ही बिल पर तो दो इसमें आप यह मत कहिए उसमें आम ट्विस्टिंग शामिल नहीं है। ये तो इस इसमें बीजेपी की जीत है। कि जो आपको परसों तक गरिया रहा था वो दरबान बना बैठा है। और वो उनके लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है पर वो करेंगे क्या? इसमें तो नहीं इसमें इसमें फाइल का ही मसला नहीं है। फाइल का भी दिल्ली में दिल्ली में आपने नहीं सबके लिए फाइल का मसला नहीं है। दिल्ली में आपने उनके घर देखे हैं। उनकी लाइफ स्टाइल एक लेवल पर पहुंच गई है। आप रहेंगे सांसद ही। आप अपने क्षेत्र जाएंगे। आपके क्षेत्र में कोई काम नहीं होगा। हम्म। क्योंकि आपकी पार्टी में आपके जितने गुरे थे कूटे जा चुके हैं बढ़िया से या उधर जा चुके हैं नहीं कूटे जा चुके हैं बहुत बुरी तरह से जो गुरे थे आपके मजबूत आपके क्षेत्र में वहां पर सरकार बदल गई आपको रेलेवेंट रहना है अगर अपने लोकसभा चुनाव क्षेत्र में तो आप कैसे रहेंगे साथ दे के कि भाई हमारा अब उनसे कोई लेना देना नहीं है अब हम हम आपको गाली नहीं देंगे। अब हम आपकी प्रशंसा करेंगे। हमारी सुविधाओं को तभी टिकट की तो गारंटी नहीं है। अगली बार सर्वाइव तो कर जाएगा। टिकट चांस तो है। चांस तो है कि 18 अगर शिफ्ट होते हैं उसमें से चार को मिल जाए। क्योंकि बीजेपी अपने को गरियाने वाले कितने लोगों को टिकट दे चुकी है। बिल्कुल। है ना? कभी गाली दी थी। हेमंता विश्व शर्मा मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा मुख्यमंत्री हैं। क्या दिक्कत है? शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री हैं। एक्सैक्टली तो उनमें से कुछ लोगों को टिकट मिलेगा। कुछ को नहीं मिलेगा पर दो-ती साल आराम से तो गुजर जाएगा। क्योंकि अगर वो तृणमूल में रहते तो तृणमूल उनको टिकट दे देती। वही है कि पर जीतते कैसे? ऐसे में ये भी बात है कि इसमें यू लुक फॉर अ बेटर डील रादर देन इलेक्शन से पहले कही गई आपकी या बातें या जो बातें हैं कि हम यू नो इसके खिलाफ लड़ रहे हैं। देश में ये होना हम इन सिद्धांतों में यकीन रखते हैं। जब कोई नेता ऐसा कहता है ये फिर से वही मिसाल है कि उसके फेस वैल्यू पे कैसे हम ले लें? उसको कैसे उसका यकीन कर लें। चाहे किसी भी पक्ष का हो। अगर वह चुनाव के बाद यह देखेगा कि मेरे करियर के लिए बेटर डील क्या है? है और इस आधार पर फैसले लेगा तो यह एक बड़ा राजनीति का बड़ा वैसा विरोधाभास है कि व्यक्ति राजनी जिसको अपना प्रतिनिधि समझता है चुनना चाहता है उससे वो सम सॉर्ट ऑफ सिद्धांतवादी होने की अपील करता है थोड़ा सा प्रिंसिपल ड्रिवन होने की अपील अपेक्षा करता है कि यार ये आदमी कुछ चीजों पे स्टैंड लेगा या कम से कम जो बोलता है उस पे खरा रहे है ना ये नहीं कि बोले कुछ और करे कुछ थोड़ा बहुत तो सब लोग कुछ लोग हैं जो खरे रहते पर इससे नेताओं के कहे हुए का मान उसकी वैल्यू और कम नहीं होगी क्या? बिल्कुल होगी। मान क्या बोलते कुछ भी रहिए आप करोगे क्या? मान था क्या? जनता के भी तो कहे हुए का मान कहां है? कम मान नहीं है ना? आपने हमको लोकसभा में जिताया और फिर सब बीजेपी को दे दिया वोट। इसका मतलब आप पलट गए। जब आप पलट गए तो मेरी ड्यूटी बनती है ना कि मैं पलटूं। मैं आपकी साइड हूं ना मैं जनता। अरे यार देखो मैं आपने जो है आपने मुझे वोट देकर लोकसभा भेजा। हां। मैं लोकसभा उम्मीदवार के उम्मीदवार नहीं लोकसभा में आपका प्रतिनिधि होने के नाते मैंने चार विधानसभा के लिए चार उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया खूब। यह सोचकर कि पिछली बार आपने मुझे वोट दिया था तो आप इन्हें भी वोट देंगे। आपने उनको नहीं दिया। हमने जिसको नहीं देने के लिए बोला था उसको दे दिया। ठीक? इसका मतलब आपका मन बदल गया है तो मेरा भी बदल सकता। एम आई योर ट्रू रिप्रेजेंट रिप्रेजेंटेटिव नाउ। हम भी बदलेंगे भाई। नहीं हूं ना फिर। आप बदल चुके हो। मैं आप मैं तो पुराना वाला हूं। सपोज़ करो आपने कहा के हमारा फेवरेट रंग पीला है। ठीक? तो मैं पीला लेके चला क्योंकि मैं आपका प्रतिनिधि हूं। मेरी मजबूरी है। मुझे नीला पहचान दो पर मैं पीला लेके चल रहा हूं। कल को अगर आप सब ने नारंगी ये गुलाबी थाम लिया तो मैं पीला ले जाऊंगा तो आप मुझे कूटेंगे ना कि तुम तो पीले यार हम लोग नारंगी हो चुके हैं या गुलाबी हो चुके हैं तो सबसे बड़ी बात है ये वाला जब ये भी डिस्कशन करते हैं ना अपन ये भूल जाते हैं ये सब मनुष्य भी हैं इनके अंदर भी एक दिल धड़कता है नहीं पर ये धड़ ज्यादा दिल विपक्ष वालों का ही क्यों धड़कता है भारतीय जनता पार्टी में किसका दिल धड़क रहा है या कौन मेरा मतलब उस संदर्भ में जिस संदर्भ में आप कह रहे हैं कि चुनाव बाद आपकी लोकसभा से विधानसभा के अच्छे परिणाम नहीं आते जहां से आप सांसद हैं उन सांसद उस सांसद क्षेत्र में आने वाली विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी अच्छा नहीं करती। उत्तर प्रदेश से कितने सांसदों के मन बदल गए? बिकॉज़ द सेंटर होल्ड्स। यही तो है। मुख्य बात तो यही है ना असली। सेंटर से मेरा मतलब केंद्र नहीं है। हम केंद्र सरकार नहीं है। हां हां पार्टी में एक जो सेंटर होल्ड्स हम लीडरशिप सेंटर कोलैप्स करेगा ना सब कुछ भरभरा के चला जाएगा। कोई किसी को नहीं पूछता है। इसीलिए कहता हूं कि मनुष्य हैं सब। हम जब भी इन लोगों को देखो मनुष्य की तरह देखो। इनकी तमन्नाएं, इनकी कुलबुलाहटें वैसी ही होती है जैसे आपके दिल में है। मन मार के बहुत लोग बैठे हुए हैं। बहुत सारे लोग बीजेपी में भी मन मार के बैठे हुए हैं। उनका दिल में आग है। मैं रेफरेंस समझ मैं पूछना चाह रहा हूं उस व्यक्ति तक। एक सवाल मेरा यह हर जगह होता है। एक सवाल मेरा तुमसे भी है कुलदीप और ताऊ से भी कि हर पार्टी में आप देखते हैं जैसे रिसेंटली आम आदमी पार्टी देखो चड्डा साहब छोड़ के चले गए साथ में और भी लोग चले गए हेमंत विश्वा कांग्रेस की थे शिवेंदु अधिकारी बीजेपी में अगर आप पूरे 20 साल उठा के देखिए और उससे पीछे भी तो शायद दो-तीन लोगों भारती गई थी वो भी वापस आ गई शंकर सिंह बघेला थे इसके अलावा कोई नाम नहीं इस पार्टी को छोड़ के गया हो ऐसा क्या है इस पार्टी में शंकर सिंह वाघेला गए थे और अभी भी बाहरी हैं। बाहर ही हैं। मतलब मेरा वही कहने का मतलब है उमा भारती त्याग लगता है भाई उसमें त्याग क्या है ऐसा बीजेपी में? बीजेपी में ऐसा कुछ नहीं है। पार्टी में कुछ तो होगा ना ये तो छोड़ के पावर सत्ता बट कई साल वो पावर से भी दूर रहेंगे। मैं नेता क्यों बनता हूं पावर? पावर के लिए पावर का क्या करता हूं? भोगता है कई लोग। कई लोग दुरुपयोग हां सदुपयोग तो होते कभी नहीं देखा। और जनता की सेवा हम हां मतलब क्योंकि नेता नहीं रहोगे ना खाली दुरुपयोग करोगे तो जनता की सेवा कैसे करूंगा मैं? जनता ने बोला मेरा यहां पे एक टावर लगवा दीजिए। और क्या होता है? सड़कें बनवा दो, पानी दे दो। कैसे बनवाऊंगा मैं? अगर पावर नहीं है तो कैसे करूंगा? बीजेपी के पास पावर है। कांग्रेस के पास भी पावर था। समाजवादी पार्टी के पास पावर था। बहुत सारे लोगों के पास पावर होता है। जिसके पास पावर होता है, लोग उधर जाते हैं। या या ऐसे भी ममता बनर्जी की पार्टी को छोड़कर शुभेंदु गया था ना। हम्म। एक दो लोग ऐसी स्थिति में भी जाते हैं जब उनको उनके हिस्से का माल नहीं मिलता है। उनको उनको लगता है कि मैं ज्यादा डिर्व करता हूं। कम मिल रहा है। बाहर जाऊंगा थोड़ा संघर्ष करूंगा। एक दिन आई विल कम बैक। शुभेंदु सत्ता के लिए नहीं आया था। शुभेंदु इस दिन को देखकर आया था। एक दिन ऐसा आएगा। ऐसे भी लोग संघर्ष करते हैं। कुछ लोगों का वह दिन आता ही नहीं है। शंकर सिंह वाघेला का आया ही नहीं। हम पर एक बात तो है कि पिछले 101 साल में ताऊ ऐसा नहीं है कि दल बदल पार्टी बदलना की घटनाएं बढ़ गई हैं। ज्यादा स्वीकार्य भी हो गया है जनता के बीच। पहले भी होती थी। मैं ये नहीं कह रहा हूं होती नहीं थी। पर उनकी फ्रीक्वेंसी बढ़ गई है। ये ऐसा लगता है हमेशा। जैसे अभी लगता है कि बेरोजगारी बहुत ज्यादा है। महंगाई भी बहुत ज्यादा है। टेंपरेचर भी बहुत हाई है। ऐसा तो कभी दिल्ली में इतना हाई टेंपरेचर इतनी गर्मी कभी पड़ी नहीं यार। हां एक मच्छर बहुत ज्यादा हो गए हैं। मैंने अपने जीतेजीते इतना मच्छर नहीं देखा है। ऐसा ही लगता है। पर दल बदल ये सब भाई आया राम गया राम टाइप था। सुबह इधर शाम उधर एक डाटा है। मैं अभी खोज के निकालता हूं। 300 या 350 से ज्यादा एमएलए प्लस एमपीज स्विच कर चुके हैं बीजेपी की तरफ बीजेपी की तरफ पिछले पांच आठ सालों का वो बात यस यस तो वो कंपेयर करेंगे अगर किसी भी 5 साल के वफे में आई डोंट नो किसी एक पार्टी की ओर इतना स्विच हुआ होगा वैसे जब कांग्रेस पावर में थी तब भी नहीं हुआ होगा इतना जिस तरीके से अब कांग्रेस से बहुत टूट-टूट कर क्षेत्रीय दल थे उस समय लोग छोड़ कर के भी कांग्रेस गए थे आए भी होंगे पर इतनी बड़ी संख्या में नहीं हुआ अभी तो जैसे क्या है ना आप जितने भी अभी ऑर्गेनिक भी नहीं है जैसे जितने भी लोग हैं ना सब कांग्रेस से ही निकले हुए हैं। हां वो तो है। है ना? मतलब कितनी बार टूटे होंगे। कितने जख्म लगे होंगे कांग्रेस के बदन पे कि इतने सारे कमल खिल गए हैं देश में। मतलब एक बीजेपी की बात नहीं कर रहा हूं मैं। तो एक पार्टी थी जनता पार्टी। हम उसके कितनी पार्टियां हुई? जयप्रकाश नारायण ने एक आंदोलन को लीड किया। उससे लालू यादव, शरद यादव, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव यस है ना सब राज्य में हम है ना बीजेपी भी कह लो एक तरह से सब ने पार्टियां बनाई सब नेता निकले नेता ऐसे निकलते हैं और ऐसे निकलना चाहिए अभी आपको लग रहा है कि क्योंकि अपन 10 साल से देख रहे हैं ना देखो नीट में क्या होता है आप एक बच्चे को होश कब आता है छ सात साल राइट हम जो परीक्षा दे रहे हैं नीट का उनकी क्या उम्र होती होगी? 17 20 मान लीजिए 1820 के बीच में है ना उन्होंने अपनी जिंदगी में बीजेपी के अलावा कुछ देखा ही नहीं है। हम वो जब हॉस्पिटल से निकल रहे थे तो सामने मोदी जी की तस्वीर थी। हम स्वच्छ भारत आयुष्मान भारत टाइप से। ठीक है। और अभी परीक्षा देके निकल रहा है। वहां पे भी उनकी तस्वीर है। क्योंकि उन्होंने देखा नहीं। उनको ये लगता है कि यार एक ही पार्टी है, एक ही प्रधानमंत्री है। आपने दो-तीन देखे होंगे। तुमने मैंने थोड़े ज्यादा देख लिए हैं। बट दैट इज अटल बिहारी वाजपेई किस तरह से होश संभा पीछे भी हमने देवगड़ा और आई के गुजराल वगैरह भी देखे हैं। मतलब देखे तो होंगे पर होश नहीं था। तो अटल बिहारी वाजपेयी से होश 14 में पैदा हुए। 98 आठ में पैदा होते मोदी जी देख रहे होते। यह सामान्य है। ऐसा रिएक्शन सामान्य है। दलबदल पहले भी होता था। अभी थोड़ा ज्यादा मोह है क्योंकि एक पार्टी बहुत शक्तिशाली है। बाकी लोगों की शक्तियां क्षीण हो गई हैं। बहुत ज्यादा। आप देख लो मुख्य विपक्ष विपक्षी दल जो है और बाकी लोग हैं वह एक भी नहीं हो पाते हैं। ऐसी हालत में भी डीएमके ने कहा है कि मुझे कांग्रेस से दूर बैठना है। टीएमसी के ये लोग कह रहे हैं कि हम टीएमसी के साथ नहीं बैठेंगे। समाजवादी पार्टी और ये लोग सब एक साथ थे तो दो पुराने वाले नहीं थे। आम आदमी पार्टी नहीं थी। आम आदमी पार्टी जो है वो कांग्रेस के बिल्कुल खिलाफ है क्योंकि पंजाब में इलेक्शन है। है ना? बहुत कॉम्प्लिकेशन है आम आदमी कांग्रेस देखो राहुल गांधी सबसे मजबूत नेता हैं अभी विपक्ष में विपक्ष में हम वो नीड के खिलाफ बोले मैं नहीं मानता हूं कि वोकि मैच्योर पार्टी है उन्होंने ये जायज नहीं समझा कि हम रैली करेंगे और धूप में निकलेंगे। हालांकि एनएसयूआई इत्यादि ने किए हैं प्रदर्शन। राहुल गांधी ने स्वयं डिमांड किया कि धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें। हम एक्चुअली एनएसयूआई के प्रोटेस्ट में वह वाटर कैनन वाटर कैनन भी चला है ना उनके प्रोटेस्ट में इनके प्रोटेस्ट से ज़्यादा लोग थे हम कॉकरोच पार्टी से ज्यादा वो डंडे भी खाए इनको बस ये था कि उनकी सोशल मीडिया का गेम जो है वो कमजोर था इन्होंने सोशल मीडिया गेम किया हम बढ़िया लेकिन क्या आम आदमी आम आदमी पार्टी ने समर्थन दिया उनको मुद्दा तो एक ही था ना नीट धर्मेंद्र प्रधान जी इस्तीफा दें तो आपने सब सपोर्ट किया उसको आपने ने सीजेपी को सपोर्ट किया। आप सभी मिलके अगर राहुल गांधी के डिमांड का सपोर्ट करते तो हो सकता है ना यही प्रेशर ग्रुप बड़ा हो जाता। सब लोग कहने लगे देखो सीजेपी एक प्रेशर ग्रुप बन के आया है। बहती गंगा में हाथ धो लो। क्यों भाई? ये इनको दिखानी पड़ेगी एकता। व्हाट यू से शुड बी व्हाट यू मीन? वो नहीं हो रहा है। हम लोग विपक्षी एकता हम सरकार को हिला देंगे। चूल्हे हिला देंगे इनकी। कैसे हिलाओगे आप? जब पंजाब में अलग-अलग लड़ोगे तो हां, सारा इंतजाम जो पंजाब में लड़ने के लिए हुआ हो रहा है ना तो कल एक दूसरे पे बहुत गंभीर आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस को जो है उल्टा सीधा सुना रहे हैं। कांग्रेस वाले भी आपको उल्टा सीधा सुना रहे हैं। बट दैट इज हाउ इट इज़। बट ये गेम तो चलता रहेगा ना आपके सामने। यह सब कुछ नया नहीं हो रहा है। खानशाह आप पक्ष में हो कि विरोध में? नीट के नीट के। विरोध में रहेगा आदमी यार। नीट अपने आप में तुमको पता है कि कड़वा होता है सच नीट तो नीट पे बात मत करो जाने दो नहीं और लीक के फिर तो बेकार है लीक के भी विरोध में लीक के भी विरोध में बेकार है फिर हां कोई भी चीज लीक हो जाए ना तो खराब मानो उसको तो खराब है वो पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर में बगावत हो रही है तो देखे आपने विजुअल्स वहां जो है पुलिस और उनकी जो है रेंजर्स मिलके गोली चला चला रहे हैं बेकसूर लोगों पे। पूरी दुनिया में ह्यूमन राइट्स का पार्ट पढ़ाने के बाद ब्रिटेन के सांसदों ने चिट्ठी लिखी है अपने प्राइम मिनिस्टर को कि इस पे कुछ कीजिए जो है ये बड़ा अच्छा लगता है यार। नहीं अपने मतलब नहीं चिट्ठी-वट्टी लिखो उठा के। ब्रिटेन को चिंता रहती है ना। वो लोग थोड़ी चिट्ठी-टि मर्मस्पर्शी टाइप के हैं ना एमथी से भरे हुए। वो पिक्चर में किसी बेहोश होश किसी भी चीज पे वो बोलते हैं। हालांकि अपने लिए तो अच्छा ही है। पाकिस्तान के खिलाफ चिट्ठी लिखी जा रही है तो और लिखी जाए। ब्रिटेन में मीरपुर के लोग बहुत रहते हैं। ब्रिटेन में एक बड़ा जो समुदाय है पाकिस्तानी मुसलमानों का जो पाकिस्तानी मुसलमान कहलाते हैं। वो मीरपुरी समुदाय से आते हैं। वो 30 तो नहीं होंगे। एमपी नहीं 30 नहीं होगा। प्रेशर ग्रुप होगा। प्रेशर होता है ना आप ब्रिटेन के एमपी हमारे एमपी जैसे नहीं है हां मतलब वो कि वो बोलेंगे कि कुछ पैसा दो तब व्हाट इज द कॉस्ट माइट सिमरनजीत सिंह ₹400 ले देते तो वो नहीं है वो लोग लिख देते हैं अपना कॉन्स्टिट्यूएंसी का 10 लोग चला जाएगा तो लिख देंगे पर उनका जो पॉलिटिकल स्ट्रक्चर है पीओके का बड़ा अजीब टाइप का मतलब वो कहने को स्वायत्ता ऑटोनोमी टाइप की दे रखी बट जो उनकी विधान उनका अपना प्रधानमंत्री और यह सब होता है। उनकी जो विधानसभा है उसमें रिफ्यूजी सीटें होती हैं 12 या 14 और वो रिफ्यूजी सीटें उनके लिए सुरक्षित हैं जो इंडिया से आए थे। मतलब जो रिफ्यूजी थे। वो किसी जमाने में आए थे 47 में और वो सब अब वो फैमिलीज लाहौर और कराची में शिफ्ट हो के बढ़िया वो कर चुकी हैं। एक्चुअली अब वो रिफ्यूजी सीट्स पर पाकिस्तान किस में इस्लामाबाद में जो गवर्नमेंट है वो अपने लोगों को नॉमिनेट कर देती है। तो इससे क्या है कि वो वहां के पावर स्ट्रक्चर में रीजनल रिप्रेजेंटेशन रहता नहीं है। और आप इसको ऐसे देखेंगे ना जब इस्लामाबाद में पीटीआई की सरकार थी तब पीओजेके में अह की विधानसभा में पीटीआई का बहुमत था। जब इस्लामाबाद में मुस्लिम नून की सरकार थी नवाज शरीफ वाली तब यहां मुस्लिम नून का बहुमत था। जब भुट्टो की सरकार थी तब इनका पीपीपी का यहां पे था। जिसकी केंद्र में रहती है उसी की। इसका यह मतलब है कि वो एक ऑन पेपर ऑटोनोमी है पर वो पूरी तरह से इस्लामाबाद के कंट्रोल में है। भाई वो हमेशा से मिलिट्री कंट्रोल में रहा है। हम और वहां कुछ विकास नहीं। वहां हाइड्रो पावर के प्रोजेक्ट्स हैं। हाइड्रो पावर के प्रोजे उनकी मांग जो है ना उनकी बिजली उनको नहीं दी जाती। जिसकी बिजली नहीं मिलती सारी बिजली भेजते हैं। लाहौर और कराची। उनका आजाद कश्मीर बोलते हैं वो लोग। हां। हम हमारे यहां जिस रफ्तार से विकास हुआ है उस तरफ नहीं हो रहा है। वो करना भी नहीं चाहते। हम एक तो गवर्नमेंट के पास पाकिस्तान में उतना रिसोर्स नहीं है। हम और दूसरा वो चाहते भी नहीं। उनकी जो मांगे हैं ना जिसके लिए इतना बड़ा आंदोलन हुआ है वो एवरेज टाइप मांगे हैं। लेकिन आटा चाहिए। हम यह भी उनकी मांगों में है। आटा है। हम ठीक है। आटा बिजली हां हम बिजली सड़कें हम वो यहां पे देख रहे हैं कि वो जोजिला टनल बन रहा है। हम दुनिया का सबसे ऊंचा पुल बन गया। हम हॉस्पिटल हैं। सारे एजुकेशनल इंस्टट्यूट हैं। श्रीनगर की लाइफ अलग है। तो उनको तो ये लगता है ना कि अपन पीछे तो नहीं छूट रहे। हम हमको आजादी का लॉलीपॉप देके कब तक खुश रखा जा सकता है? दूसरा यह भी है कि हमारे कश्मीर में डेमोग्राफिक चेंज नहीं हुआ है। हम हमने उनके वहां के जनसंख्या पर हावी होने का प्रयास नहीं किया है। वहां के कश्मीर यहां पे यहां के कश्मीर में आप बस नहीं सकते थे। हम और 370 ये सब हटने के बाद भी आप वहां पे ऐसा नहीं है कि आप बच सकते हैं बहुत सारे लोग ऐसा कोई इनकरेज भी नहीं किया गवर्नमेंट ने कश्मीरी पंडित वापस नहीं जा पाए हैं बाकी लोगों की तो छोड़ो हम जबकि पाकिस्तान वाले हिस्से में जो ऑक्यूपाइड है उसमें मिलिट्री के सारे रिटायर्ड लोग घर बनाते हैं वहां क्योंकि मौसम अच्छा है वेदर अच्छा है और सारे पंजाब प्रांत के मुख्यतः लोग वहां जाकर के बस गए हैं और उनकी जो जो आबादी का अनुपात है उस पे भी असर डाल रहे हैं। उससे भी उसका भी उनके अंदर एक उत्साह है। लेकिन डाटा तो बहुत बेसिक चीज़ है। अब तो मतलब उसके दाम और कीमत और उसके उसको लेकर के रोड बिजली 38 मांगे थी उसमें ये भी है आटा बिजली पिटिकल स्ट्रक्चर चेंज करने की बात थी। जेएसी है ना वहां पे वो इनफैक्ट वो जो प्रोटेस्ट हुए जिसमें इन्होंने लोग मारे थे। उस प्रोटेस्ट को ऑर्गेनाइज मतलब वो शुरू ही ऐसे हुआ कि उस उन पर टेररिस्ट वाले जो कानून होते हैं वो लगा दिए और अब वो आरोपियों को ढूंढ रहे उसी हिसाब से खोज रहे हैं जिसको क्या बोलते हैं मैन हंट हम खोज खोज के गोली मार देंगे टाइप पर वहां पर ये पहली बार नहीं हुआ है। हां इसके पहले भी हुआ था 25 में फ्रीक्वेंटली होता है वहां पर और उसका दमन कर दिया जाता है क्योंकि वो खुल के गोलियां मारते हैं। पाकिस्तानी आर्मी अपने लोगों पे काफी क्रूर है। हम वो चाहे वो केपीके हो ऐसे रीजंस में सिंध में भी कभी-कभी बलचिस्तान में भी खुल के खेलते हैं वो कोई राइट्स नहीं होता वहां बलूच से याद आया कि रिवेंज आ गई है धुरंधर की रिवेंज Netflix पे आ गई है Jio स्टार पे हां Jio स्टार पे आई है पर आप अब तो देख चुके हैं ना दो बार और देख लिया अच्छा है पिक्चर मतलब अपेरेंटली एक्सटेंडेड कट टाइप का है हां थोड़ा कुछ-कुछ मैंने डायलॉग जो है ज्यादा बड़े हुए हां कुछ-कुछ बढ़े हुए हैं खुल गाली गलौज भी इसमें गाली में बीप लगा था इसमें बीप हटा दिया तो मैं ज्यादा एंजॉय कर पा रहा हूं। अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा आपकी तो प्रायोरिटीज ही अलग है मतलब गाली धुरंधर में गालियों को बीप बहुत स्मार्टली एंड वाला फस हल्का सा बीप मार नहीं वो पहले पार्ट में जो है हम आधा हमारे गालियों के दो हिस्से होते हैं हम ठीक है हम तो क्या बोलते हैं संधि संधि जो भी है उपसर्ग और प्रत्यय कह लीजिए संधि विच्छेद कर पहले वाले में उन्होंने फर्स्ट पार्ट को किया था दूसरे वाले में सेकंड पार्ट को कंप्लीट किया तो आप दोनों को मिला के हां फर्स्ट सेकंड में मिला के आप जोड़ लो कि क्या बहुत बढ़िया यस ये सोचा नहीं था मैंने नहीं नहीं ये देखना गौर करने की बात ये ताऊ ने मुझे बोला था तो मैंने ध्यान से देखा तो क्योंकि कई सारे जो गाली का जो गाली के दो हिस्सों में एक हिस्सा अह किसी पारिवारिक संबंध का होता है और एक हिस्सा अश्लील होता है। हम्म तो आश्चर्यजनक रूप से अश्लील वाले को छोड़ दिया गया था। अच्छा एक हिस्सा में टारगेट ऑफ द गाली को हटा दिया गया था। पिछले वाले में टारगेट ऑफ द गाली थी। अश्लील वाला हटा दिया था। वाले में दोनों हटा माइंड ब्लोइंग पीक डिटेलिंग बोलते हैं ना अच्छा हां पीक डिटेलिंग घर की वो नहीं सीन घर की याद नहीं आई तुझे जस्सी हां है ना या लेकिन इसका बहुत मीम बने हैं तो पहला यार वो जो उसका रोल किया है सर टिटू मेरी बहन कित है अरे वो जो नाम मेरे बीमारी लग गई है यार समील जमाली नहीं नहीं जो यूपी के गैंगस्टर जिसको अच्छा अतिथी अतीक अहमद क्या एक्टिंग किया उस आदमी ने भाई लहजा अच्छा पकड़ा है। बहुत बढ़िया। चेहरा भी पकड़ा है। चेहरा तो चेहरा बॉडी सब वैसे ही मजा आया। मैं इसको दो बार और देख चुका हूं। मतलब एक बार में नहीं हम जैसे आधे घंटे रात में नींद आ रही लगा लिया हम तो मजा आ रहा है। घर में अलाउड है। अकेला हो ना अभी घर पे लोग है नहीं। सो अलाउड है। क्यों पूछा आपने? नहीं नहीं धुरंधर जैसी पिक्चर देखना जो है हां फैमिली के साथ थोड़ा दिक्कत है। गाली गलौज गाली गलौज से ज्यादा खून खराब है। खून खराब है। बहुत भयानक खैर। अच्छा आप उसमें पर्सनल व्यूइंग उसका पहला ही पर्सनल व्यू नहीं है ना आपके ड्राइंग रूम में ब्लड गिरेगा आपको अच्छा लगेगा सिनेमा हॉल में रहता है कि दूसरे गायब मैं तो निकल जाऊंगा यहां से नहीं तो नहीं इसमें इसमें क्या बोलते हैं टीवी पे थोड़ी देखते होंगे ये लैपटॉप या उस पे देखते होंगे नहीं टीवी पे देखते नहीं लैपटॉप पे सही कह रहे हैं लैपटॉप पे पिक्चरें देखते हो नहीं जैसे अभी आप मेरे घर में मैं टीवी यू फिल्म यूज़ ही नहीं होती है फिल्में देखने के लिए बड़े शौक से लैपटॉप पे कैसे देखते हो देखता हूं मैं हेलीकॉप्टर गिर रहा उतर रहा है एक 52 मंजिला बिल्डिंग पे छोटे से लैपटॉप में कैसे फिगर आउट करते हो कि 52 मंजिला है यह अरे दिया सलाई की तरह होगा वो उसके ऊपर एक नहीं गिर रहा होगा आदत पड़ गई मुझे साइज तो होना चाहिए ना पिक्चर का नहीं वैसे मुझे हेलीकॉप्टर के नीचे उतरते चक्कर आने लगता है तो मैं उसको स्किप मार देता हूं या चेहरा घुमा लेता हूं कुछ लैपटॉप भी हाइट का प्रॉब्लम है मुझे वर्टिगो क्या प्रॉब्लम है लाइफ यू नीड अ रिफिल हम्म चाय कहां है नहीं यार अभी चाय प्लीज ठीक है। तो आज हम लोग पर्दे पर बात करेंगे। पर्दा ऑल काइंड ऑफ़ कर्टेंस एंड स्क्रीन भी एक पर्दा है ना। बड़े पर्दे पर लगी फिल्म छोटे पर्दे पर पर्दों पर बात होगी जो पर्दा उठेगा। हां तो पर्दाफाश भी होगा। तो मतलब जिस-जिस रूप में हमने पर्दे का इस्तेमाल किया देखा। घरों में पर्दा कैसे आया? थिएटर पर्दा क्या होता था? पर्दा कैसे शहर में आके कर्टन बन गया या हां हां चीक वगैरह बन गया हां तो अलग-अलग तरह के पदे भाई साहब तो पहले तो घरों में साड़ियों से सिलेले जाते थे हमें याद है और पूजा घरों के पर्दे अलग होते थे आओ जल्दी अभी यहीं का बता रहे हो उस पे बात होगी और फिर बाजार खबर में सपना गुर्जर जी आएंगी साक्षात मतलब खबर में आएंगी यहां नहीं आएंगी और फिर प्राणों से प्रिय तीन तालियों की चिट्ठियां तो हैं ही पर पहले एक छोटा सा ब्रेक का पायलट्स पड़े थे पानी में और उनको रेस्क्यू किसने किया एक ड्रोन बोट में सेकंड वर्ल्ड वर्ल्ड वॉर में भी ड्रोन दिखते हैं। आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। सरकार के एक बहुत सीनियर ऑफिशियल थे। सिक्योरिटी एडवाइस की वजह से उनके ऑफिस को हटाया गया। वहां से एक अलग जगह पे लगाए क्योंकि उनको यह डर था कि कोई ड्रोन उड़ा के मतलब सीनियर लीडरशिप को टारगेट कर सकते हैं। लीजिए तीन ताल देखो सुन रहे हैं आप। आज तक रेडियो पर ताऊ खानचा सरदार के साथ प्रेजेंटेड बाय थर्मकूल कूलर्स बुजुर्गों की दवा बुजुर्गों की दवा और थर्मोकूल की हवा दिल की यार इस टाइप के मुझसे क्यों नहीं लिखवाते हैं स्लोगन बहुत अच्छा मैं भी लिख सकता हूं मेरे ये एडवरटाइजिंग में जाने का मन था मेरा एक बार ऐसे पंच लाइंस लिखूं यार एक बात मुझे समझ में नहीं आती थर्मोकूल में जो है ना एक चीज है जब भी थर्मो आता है ना तो एक हॉटनेस की की फीलिंग आती है। थर्मल है ना थर्मस आदमी को लगता है कि हां हां ठंड आती है आदमी अपने थर्मल मैं विचार कर रहा था कि यार थर्मोक कूल ये दोनों चीज एक साथ कैसे हो सकता है फिर मुझे लगा कि जो हॉट लोग होते हैं बहुत कूल कूल थैंक्स थैंक यू ताऊ मेरे लिए तारीफ की आपने सर सब लोग सबकी साले अपने दिमाग में पिक्चर चल रही है जब तक जनीमा आए हम तो मुझे लगा कि नहीं दैट इज वै कूल हम हॉट इज कूल हां कूल पहले ये जैसे अब तो ये खैर थर्मोकूल कंपेरेटिवली थोड़ा साइलेंट कम आवाज करने वाला कूलर है हमारे वो वाले जो कूलर हुआ करते थे वाले उनका एक बड़ा फायदा था उस आवाज का कि घर के झगड़े कभी बाहर नहीं आते थे आवाज पड़ोसियों को पता नहीं लगता था कि कूलर चला दिया आपने और फिर आप झगड़िए इसलिए कई झगड़ा शुरू हो जाता था तो हम लोग समझते थे यार घर में झगड़ा हो रहा है माता-पिता के भी तो कूलर चला देते थे जल्दी से लेकिन झगड़े की वजह क्या होती थी दिमाग का गर्म होना थर्मोकूल आपको ठंडा करके रखता है झगड़े की कोई गुंजाइश अरे आवाज जब कूलर कम करता है ना तो आपके घर की तृणमूल के अंदर कल कलह है हम किसी को पता चलता पहले चलता था नहीं हैं आदमी पार्टी तोड़ लेता था तब पता चलता था बिकॉज़ कूलर चल रहा होता था गर्मी लग रही होती थी जैसे-जैसे गर्मी बढ़ी पार्टी के अंदर वैसे-वैसे कूलर हवा तेज तीन से चार चार से पांच पे कर दिया। बाहर किसी को खबर ही नहीं है। पार्टी टूटने वाली है। अच्छा इनकी कूलर की भी कोई विचारधारा नहीं होती। वैसे आप देखो तो कूलर की क्योंकि लेफ्ट और राइट स्विंग होता रहता है। और नहीं पता सेंटर में भी रोक दो आप। हां नहीं रुकता नहीं है। रोक सेंटर में रोक सकते हैं। अच्छा स्विंग को रोक दीजिए। या तो रुकेगा तो सेंटर में वरना कहीं पे भी रोक सकते हैं। आप चाहे तो लेफ्ट राइट भी कर रहे हैं। सेंटर में भी रोक दीजिए। मनुष्य को लेफ्ट और राइट के बीच में स्विंग करते रहना चाहिए। हम यह ध्यान रखना काहे के लिए अगर आप राइट लो हम फिर राइट लो फिर राइट लो तो आप गोल चक्कर घूमते रह जाओगे और आपका डिस्प्लेसमेंट जीरो हो जाएगा डिस्टेंस बढ़ता जाएगा फिजिक्स की बात मूवमेंट इज नॉट ऑलवेज प्रोग्रेस तो क्या करें कभी लेफ्ट लो कभी राइट लो वाह बेसिस मुद्दा राइट है ना कभी भी लेफ्ट जो है 30 30 साल तक लेफ्ट लेते रहो हम फिर राइट राइट ले लो हम आगे से राइट हां फिर लेफ्ट ले लो ओवरऑल एवरेज आपका सेंटर में रहेगा हम कभी भी हां तो मुझे लगता है कमजोर इनका ऐसा नहीं है कि विचारधारा नहीं है मतलब कूलर की ये लोहियावादी हैं लोहे के आते थे ना पहले लोहियावादी और इसीलिए हवा के वितरण में भी समाजवादी हैं। हां वाह पॉइंट और जो ऊपर जाता है ना वही नीचे आता है। मोटर लगा है नीचे। हम्। पानी आ रहा है ऊपर। ठीक है। वही है विचार और धारा। हां। ठीक है? वाह। यह ध्यान रखना। विचारधारा। विचारधारा हमेशा चलायमान रहे। नहीं तो उसमें मच्छर पनप हो जाते हैं। जिससे डेंगू और मलेरिया हो सकता है। हम है ना? तो विचारधारा बनाए रखने के लिए थर्मोकूल में एक मोटर लगाएं। हम हैं। क्या विचार है आपका? इसके बारे में। कमजोर हो गई तृणमूल पावरफुल है थर्मकोल सारा पावर धारा का धारा रह गया पर मुझे अभी भी हनीकॉम बोलते हैं ना इसको ये जो टेक्नोलॉजी गत्ते उसकी जगह जो खस की जगह पर हां मुझे इसके इसके नोमेनक्लेचर पे अभी भी मैं मैंने सोचा था मैं रिसर्च करूंगा पढूंगा है क्या चीज तुम हर बार यही कहता हूं मैं मैं नहीं कर पाया अब मैं क्या है वो जो मधुम उसको बोलते हैं ना वो उसको भी क्यों बोलते हैं नहीं नहीं उस तरह की डिजाइन है इसका कॉम्ब क्या क्या है उसमें? कौम है? कंघी नहीं है ना उसमें? हनी है उसमें। हनी स्टोरेज होता है। में हनी होता है ना। इसका जो डिजाइन है ना गत्ते का वो उस छत्ते की तरह है। वो ये कहते हैं। नहीं वो तो है ही नहीं है। इसमें गत्ता नहीं है। छत्ता है। छत्ता नहीं ये गत्ता है। छत्ता नहीं है। छत्ता है भाई। गत्ता तो गत्ता होता है। गत्ता छत्ते की तरह है। ओरिजिनल छत्ता नहीं है। नहीं समझे तुम। मुझे कुछ पत्ता नहीं है भाई। जो भी है कूलर बहुत जानदार है। सत्ते पे सत्ता है। सत्ते पे सत्ता है। और इस पे शहर में है। कपड़ा लगता है। शहर तोलकाता है। तो तृणमूल वालों का शहर हुआ करता था। अभी भी है। वहां रह तो रहे ना वो। लेकिन कुछ ये जो शहर होता है ना उसमें क्या होता है जब आप उसको वो शहर ना सेंटेंस में रूप बदलता है। जैसे आप कलकत्ते जा रहे हो। हम्म। है ना? आप पटने जा रहे हैं। पटने जा रहे हैं। आप गए हो कभी? पटने? कुछ शहरों में ये है। बोलते बोलते रुक गए कुछ। हां। मैं पटने जा रहा हूं। लेकिन आप दिल्ली में नहीं मैं दिल्ली जा रहा हूं। नहीं कह सकते आप। हम्म। दिल्ली से पटने की सीधी फ्लाइट है। हां। हम्म। लेकिन पटने से दिल्ली गई है। हम आई लव कोलकाता। आई लव कोलकाता। कैसे हो गया? क्या आपका? गालिब ने कहा था यार। अच्छा वो पेंशन लेने जाते थे ना हम दिल्ली से पेंशन लेने जाते थे। कल एक तीन टू ने मारा हाय हाय वो लेकिन वो भी बड़ा ऐसे देखें तो बहुत घटिया पर काफी पोएटिक मैं फोनेटिक्स शब्द इस्तेमाल कर लूं। फिर किया तुमने आज महीना तुम्हारा पूरा नहीं तो वो पटना बहाने वो हो जाएगा एक बार हां पटना बहाने वो चाहेगा सटना हम ये भी बढ़िया वो है इसके गहरे अर्थ हैं मतलब उसमें देखो तो आप बिल्कुल है ना मतलब छोटे बिहार अविभाजित बिहार के छोटे शहर से अगर कोई आपको पटना लेकर के जा रहा हो तो बड़े उसको आपसे हां और सटना शब्द भी बहुत आंचलिक है। मैं तो पहली बार अपने किसी बिहार के रूममेट से एक बार सुना था कि यार पोस्टर साटे हो। हां साटना बोलते हैं। मैंने कहा मतलब बनाए हो बनाने का पोस्टिना। हां आई नो बाद में पता चला। वो साटना जो है हम बढ़िया वो भी शब्द है चिपकाने के लिए। साटना सुपाटा चलो खैर अब बढ़े। पर्दे की ओर बढ़े। इस वैसे जैसे हर एक चीज पर हमने 90ज के मध्यवर्गीय घरों में धूल और इत्यादि गंदगी से बचाने के लिए कवर्स बनाए थे ना फ्रिज कवर आप या तो हम बनाते थे या वो बिकते थे टीवी का कवर इनफैक्ट टीवी का तो पर्दा भी होता था हां टीवी का तो लकड़ी वाला भी होता था लकड़ी वाला पर्दा एक तो होता था इनके यहां वो नहीं होता था तो एक वो रस्सी वाला भी होता था एक पर्दा जिसको बाकायदा खुला घर में बना होता था वो ये मान्यता थी कि स्क्रीन को धूल नहीं जमने देगा वरना स्क्रीन साफ करनी पड़ती। स्क्रीन के आगे एक स्क्रीन होनी चाहिए। हां हां वही वही पर्दे से फीलिंग आती थी। आपने यह पर्दा हटाया। फिर हम देखो सिनेमा हॉल में भी जो जिस पर्दे पे पिक्चर दिखाई जाती थी उसके आगे एक पर्दा पर्दा होता था। हमें हमेशा नाटक या कहानियां देखने की जो आदत रही है वो दो पर्दों के बीच के स्पेस में रही है। तो टीवी कितना भी छोटा रहा ब्लैक एंड वाइट वाला उसमें हमने एक पर्दा लगा लिया आपने सुनाई। वो तो होता है कि घूंघट जो है ना हटता भी है तो दोनों तरफ रहता है। हम हम सर इधर रहता है। साइड में रहता है। तो आप जो देखते हो ना आपको दोनों तरफ जो है पैरेलल एक पर्दा जो कभी भी बंद हो सकता है। का एहसास बना रहना चाहिए। हम ऐसी कोई भी बहुमूल्य चीज सुंदर चीज पर्दा हटने के बाद भी पर्दे का एहसास नहीं हटना वो बना रहता है कि पर्दा है इसीलिए घूंघट के पट खोल तब मिलेगी मुक्ति हम गोपालदास नीरज ने कहा है पट मतलब दरवाजा पर्दा दरवाजा भी होता है नहीं पट मतलब पर्दा और पटना मतलब मतलब पर्दा हो जाना पर्दाना सेट हो जाना यानी पटना यानी खुला शहर है पर्दा अच्छा मुझे पटना मतलब पटाने वाला पाटन था वो पहले पाटन था पाटन मतलब पाट जो है ना वो जहां राज्य का केंद्र होता था वो राजपाट संभालना अच्छा अच्छा अच्छा मतलब राज्य और राजधानी पाटलिपुत्र पाटलिपुत्र जो है वो वो हम उसी से आया पाट पाटन है राजस्थान गुजरात में वो कभी उसकी राजधानी हुआ करती थी हम तो पाटन पटना जो है वो पाटली पुत्र पाटन था फिर पाटना पाटन पटना हो गया पर्दा जो है वो पट हम पर ये चित्रपट चित्रपट हां ये आप सही कहा सिनेमा का पर्दास वो पहला पर्दास सिल्वर स्क्रीन यस अंग्रेजी में उसको सिल्वर स्क्रीन कहते हैं पर पहले कोई सिल्वर होता था कपड़े का नहीं कपड़े नहीं होता था जिसमें लाइट नहीं होती थी इतनी ना सिल्की सिल्की कपड़े होते थे वो प्रोजेक्शन में इतनी लाइट नहीं होती थी तो सिल्वर एलुमिनियम टाइप का कुछ होता था नहीं कपड़े होते थे सिल्की वो तो उसका कलर सिल्वर होता था वाइट नहीं होता था इसलिए उसको सिल्वर स्क्रीन ब्राइटनेस ज्यादा देता था वो पर वो तो चला गया फिर वाइट वाला हो गया लेकिन नाम एक बार रखा जाता है ना सिल्वर स्क्रीन पे देखिए तो फिर रखा जाता पहले अनाउंसमेंट होता था सिल्वर स्क्रीन पे देखिए आज की फिल्म हम जो भी फिल्म का नाम होता था और सिनेमा सिनेमा को हम बोलते हैं ब्लॉकबस्टर सिनेमा है हम ब्लॉकबस्टर युद्ध की चीज है हम जैसे अभी बंकर बस्टर होता है ना हम बंकर को तोड़ देता है वो तो एक बॉम्ब होता था जो ब्लॉकबस्टर मतलब एक ब्लॉक मोहल्ले का एक ब्लॉक को उड़ा देगा भाई एक घर नहीं बल्कि एक ब्लॉक उड़ा देगा सिनेमा में ही नाम क्यों तो उस बॉम्ब को कहते थे ब्लॉकबस्टर हम अरे जो हिला के रख दिया उसको ब्लॉकबस्टर किसी ने कह दिया तो अब जो है वो चला रहा है। ब्लॉकबस्टर हो गया है। हम तो बंकर बस्टर का पूर्वज है वो। पूर्वज है वो। पर जैसे अपने ख्याल का रूपला पर्दा बहुत अच्छा था यार। आई लव दैट ट्रांसलेशन है ना रुपहला पर्दा। रुपह पहले पर्दे पर देखिए। नहीं नहीं रजतप भी बोलते थे। क्या बात कर रहे हैं? हां भाई। रजतपट भी बोलते थे। पत्रिकाओं में यानी जागरण वगैरह नहीं किया था। पत्रिकाओं में सिल्वर स्क्रीन के लिए रजत पट यूज किया जाता था। फिर बाद में वो चित्रपट तो खैर जैसे मुझे एक अनुवाद बड़ा मजेदार लगता था। वैसे आज अनुवाद की चर्चा नहीं है पर एलबीडब्ल्यू का पग बाधा हम सिंपल क्लीन पग बाधा लेकिन पर्दा जो है ना हम उसके पहले का पर्दा है पर्दा प्रथा उसके भी पहले जाइए तो जो कार्विंग गुफा की दीवार पे हमारे पूर्वज कर रहे थे हिरन बना रहे थे केव पेंटिंग बोलते थे उसे नहीं वो तो पेंटिंग नहीं उकेर करके कुछ जो हां चित्र वो तो वो भी एक किस्म का मतलब विजुअल जैसे पर्दा अभी जो स्क्रीन जो है मतलब कैनवस था वो हां हां हां कैनवस कैनवस था हां पर्दा नहीं था पर्दा जो है ना प्रथा है जो आपके सभी समाजों में एक तरह से हम महिलाओं को सुरक्षित रखने के लिए हम क्योंकि महिलाओं को प्रॉपर्टी के रूप में देखा जाता था तो उनको दूसरों से आप जैसे बहुमूल्य चीजें जो होती हैं वो छुपा लेते हो तो उनको छुपाने के लिए था पर्दा घूंघट यहां पे उतना प्रचलित नहीं था बिकॉज़ यहां पे प्रचुर मात्रा में सब कुछ उपलब्ध थी लूट पार्ट जो है उस तरह का नहीं होता था पर जब आपको बाहर से लोग आए खास करके अरब और सेंट्रल एशिया से हम उनके पास ऑलरेडी एक पर्दा दा का सिस्टम था जो बुर्का वगैरह जो होते थे वो सब तो बाद के इनोवेशन है। तरह डिफरेंट संस्कृतियों से आई हैं। कहीं पे बुर्का था, कहीं पे नकाब था, कहीं पे हिजाब था, कहीं पे थोड़ा और भी कम था। पर्दा लेकिन एक था। पर्दा का मतलब क्या बोले? एक दो दो लोगों के बीच में एक स्क्रीन हम स्क्रीन ही है वो और वो एक व्यवस्था थी जो कि यहां पे लोगों ने फिर यहां के राजा लोगों ने खास करके अपने घर में लागू किया कि भाई कोई लोग आएंगे तो रानी साहिबा उनकी सहेलियां जो थी वो जो हैं सहेलियां नहीं दासी दासियां भी इनके फिल इन द ब्लैंक्स में गेस मरते रहते मजा आता है ना रानियां या उनके परिवार के लोग जो है वो एक तो जनाना महिलाओं के लिए जो एक कॉर्नर है उधर रहेंगी अगर सामने आएंगी तो उनके चेहरे पे एक स्क्रीन रहेगा आपके और मेरे बीच में एक स्क्रीन रहेगा वो पर्दा जो है फिर विक्टोरियन टाइम में चेहरा तो खुला था पर और भी बदन जो है वो फुल ढकने का वो भी एक पर्दे का का ही सिस्टम था कि ब्रिटेन में हम हमारे यहां जब इलेक्शन होता हम लोग बोलते हैं उसको मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट हम मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट बोलते हैं। पहली बार वाला जो आपने बोला वो गृह मंत्री जी की तरह बोला एकदम ऐसे ही बोलते हैं। दूसरा वाला तो सही था। पहले वाला एमसीसी लागू होता है हमारे यहां। ब्रिटेन में पर्दा लागू होता है। ब्रिटेन में उसको पर्दा बोलते हैं। कि पर्दा इज एन इफेक्ट। मतलब जिस दिन के बाद से अब जब चुनाव की घोषणा हो गई है और नई सरकार बनने तक पर्दा प्रथा जो है वहां लागू हो जाए। लागू होती है पी ए आर डी ए पी यू आर डी पी यू आर डी डी एच यहीं से गया है वो शब्द हम क्योंकि भारत उनका उनके साम्राज्य का एक बहुत बड़ा हिस्सा ये तो हमारे यहां भी जैसे चुनाव होता है हाथी वाती सबको पर्दा कर देते हैं ना हां हां जितने तो वहां पे पर्दा सिस्टम लागू होता है अब वहां पे इसका विरोध हो रहा है कि भाई सिस्टम का नाम जो है ना कुछ हां आयातित ही नहीं एक ऐसी प्रथा से जुड़ा है जो कंजर्वेटिव मानी जाती है जो जो हां जो सेक्सिस्ट है थोड़ा ओल्ड फैशन है कह लीजिए रिजिड है और फ्रीडम के थोड़ा अगेंस्ट है तो वहां पर कुछ-कुछ जगहों पर उसका नाम कुछ-कुछ डिपार्टमेंट्स ने चेंज कर दिया और उसको पर्दा कहते हैं वो लोग भारतीय प्रेम का आधा इतिहास जो है पर्दा हटाने में ही गया है। जैसे आप देखिए चिलमन जो शब्द है सही जगह लेना चिलमन आपका मन चिल है अभी इस समय कि नहीं ये जो चिलमन है गेसू है क्या है वो आप लोग बताइए ना आपके जमाने में जो दुश्मन है दुश्मन है हमारी हां कितनी सुंदर दुल्हन है हमारी इस टाइप का ही कुछ गाना है ना वो मेरे ख्याल से हैं तो वही है भावार्थ वही है कितनी शर्मीली दुल्हन है हमारी ऐसा ही मोहम्मद रफी का है शायद मोहम्मद रफी साहब ने गाया है और एक वो ये होता था उस समय जो कि इस चिलमन से बिल्कुल पर्दा ही है हम बिल्कुल पर्दा है वो हम हां हां बिल्कुल कि तुम मुझसे जो छुपा रहे हो पर्दा कर रहे हो इस चिलमन से वो झांके और इस चिलमन से वंके इसको चिलमन ही कहते हैं जो घूंघट को ऐसे पकड़ के रखते हैं इस चिलमन से वो झांके और उस चिलमन से वो झांके तो ये एक शायर थे वो तीन बार इसको दोहराते हैं इस चिलमन से वो झांके और उस चिलमन से वो आग झांके तो कोई खड़ा हो के सुनने वालों में से बोलता है लगाओ आग चिलमन को न ये झांके सुना होगा ये तो आपने नहीं सुना है बहुत दिनों पहले हां पर ये चिलमन का कांसेप्ट इंटरेस्टिंग था उसमें आप देखिए कितने गीत लिखे गए हैं इधर प्रेमी खड़ा है इधर प्रेमिका और बीच में चिलमन रूपी दीवार है अब प्रेमी प्रेमिका को झलक देख पा रहा है चिलमन कई बार उस तरह का थोड़ा पारदर्शी होता है कि कोई खड़ा है यह पता चल जाए पर वो झलक ही है चेहरा नहीं देख पा रहा है और फिर वो लिख रहा है या गा रहा छन छन के दीदार होता है ना? हां वही वही यस लाइटिंग अगर अच्छी हो पीछे से तो उसका बहुत छिछला सा वो पर्दा होता है चिलमन जो होता है जिसमें आप हल्का-हल्का दिख रहे हो झनी झनी टाइप होता है ट्रांसपेरेंट टाइप से होता है जिसमें आपको हुस्न छन छन के बाहर निकलता रहे हां आगे अजीज मियां को याद करो सब याद आ जाएगा तो ये छान कर लेते हैं भाई बहुत सारे लोग होते हैं उनको पसंद आता पता है ऐसे ही हम नहीं ये बात सच है वैसे मतलब आप लोग खैर थोड़ा बेहतर बताएंगे पर कलाई देख ली प्रेमिका की तीन दिन तक मस्त है हम है ना वही इश्क होता है कि उस समय चेहरा देखना तो बहुत बड़ी बात थी छत पर उसकी एक झलक मिल गई और यहां आपने देखा और आपने देखा कि Instagram पे डीपी नहीं लगाई है। आप फॉलो रिक्वेस्ट एक्सेप्ट नहीं करते हैं। वो ये इस जनरेशन में वो पेशेंस नहीं है कि झलक अगर सीमित भी है तब भी खूबसूरत है। अधिक की चाह पर पिछली बार बात हुई थी ना कि पूरा देख लेने की जो ऑब्सेशन है ना कि यार दिख जाए एक बार वो चेहरा भी दिख जाए। वो पहले नहीं था। पहले तो हम हमारे पिता माता की जो शादियां हुई हैं तो बिना एक दूसरे का चेहरा देखे हुई हैं। पहले कहते थे ना कि आंखें चार हो गई। बस हां आंख मिल गई बस ठीक है। और वो शर्म इतनी थी ना खिड़की से खिड़की से आंखें चार हो गई। यहां तो वोट डालेंगे। हां। हालांकि खिड़की में हमारे यहां पर्दा भी होता है। हम्म दरवाजों में भी पर्दा होता है। हर जगह पर्दा ही पर्दा था पहले। बल्कि पखानों में पर्दे होते थे। जिनके दरवाजे नहीं होते थे। हां हां। हां अभी भी है क्योंकि वो जो अपना स्वच्छ भारत अभियान है शौचालय वाला दरवाजा लगाना उसमें दरवाजा नहीं आया है पर्दा है तो उसमें जैसे पर्दा बाय द वे बेटर है हवा चल गई तो नहीं हवा चली गई वो अंदर ईंट ऐसे दबा के रखते हैं नीचे ऐसे उसका लेकिन उसका हवा चल गई तो क्या नहीं नहीं वो हो सकता है ना अंदर ईंट रहती अरे भाई वो आदमी खेत में रहता था कल हम हवा ही हवा थी क्या हवा चल गई लेकिन उसका फंडा उसको तो खेत से उसमें किया गया है नहीं वो पर्दा गिरा के कर रहा है। यही काफी है। यही काफी है। और उसमें एक फंडा है। जब वो बिजी होगा वो टॉयलेट तो पर्दा ढका रहेगा। जब वो खाली होगा तो हटा रहेगा। बस समझ गए? उल्टा है। ओ जैसे ओपन क्लोज्ड होता है बाहर विदेश के। नॉक करने की जरूरत नहीं है। करोगे काम। नॉक करने की जरूरत नहीं है। नॉक करने की जगह नहीं है। नहीं तो इमेजिन करो। स्पेस किधर है? इमेजिन करो कि अतुल उस इस वाले टॉयलेट में पर्दे वाले में बैठ के अपना काम कर रहे हो। हम तुम लड़ रहे हैं फिजिकली। हां और बह जाओ उसी में दोनों लोग। सपोर्ट ही नहीं मिलेगा ना तुम्हें। हां पर्दे के साथ तो बाहर आ जाएंगे। खतरनाक है। यार ये टॉयलेट वहां होते हैं जहां दो लोगों के लड़ने की संभावना नहीं होती। क्योंकि जगह ही नहीं होती। दो बैल लड़ सकते हैं। ठीक है? वो हम ऐसा इमेजिन करते हैं ना हम फ्लैट में रहते हैं जिसमें कि अटैच्ड बाथरूम होता है। तो हमको लगता है कि सर वहां पे दूर-दूर तक कुत्ता हो सकता है झांक के गुजर जाए कि क्या हो रहा है इधर? क्वार्टर की जो हम बात करते थे रहने वाले वहां कुछ ऐसे क्वार्टर थे जिनमें टॉयलेट में पर्दे लगते थे। दरवाजे का पैसा ही नहीं था। उसके बाद क्योंकि सस्ता भी था वो ₹300 ₹200 महीने में क्या मिलेगा आपको? हम तो वो भी रहता था। पर चिलमन के साथ आई आई सपोज कि चिलमन का जो दृश्य होता होगा उसके साथ भारी कल्पनाशीलता की जरूरत पहले इमेजिनेशन करके ही आदमी खुश रहता था जीता था प्रेम के लिए इमेजिनेशन की बहुत जरूरत है वही प्रेम वो उर्वर प्रेम माना जाता है जिसमें इमेजिनेशन अनंत हो और टाइम पास भी अच्छा होता हो तसवुर तसवुर तसवुर और तखल तखयु तखयु के करिश्मे हैं बुलंदी है ना बस्ती वो होता था। अब तो आप किसी को देखते हैं। Instagram में प्रोफाइल चेक कर रहे हैं। Facebook पे जाके देख रहे हैं। हर जगह ढूंढ रहे हैं। 36 फोटो 36000 फोटो देख लिया। टैग-वैग करके देख लिया कि कहां-कहां टैग होगा। लेकिन आप मानते थे जैसे दिखा जो हां हां दिखा दिखा। उसकी मां थी। उसकी छोटी बहन थी। बड़ी बहन थी। चाची की लड़की। जैसे हम लोगों को भालू दिखा था और हमने माना कि मानना है। नहीं भालू दिखा था। हां आप मानते ही थे ना। जानते तो नहीं थे कि भालू है। नहीं जानते थे तब आपको कैसे? वो उसी को मानना कहते हैं। किसी दिन भालू आएगा ईश्वर है। ये आप मानते हैं। किसी दिन भालू आएगा बोलेगा हां ताऊ हम इन्हें दिखे थे। आप यकीन मान लो आपने वो सुना है फरीद अयाज वाला सुना ही होगा। हमने बेपर्दा तुझे माह जभी देख लिया। याद है अब ना कर पर्दा के भी देख लिया। फिर क्या है? लोग देखेंगे वहां। हमने यहीं देख लिया। ठीक होता था। ऐसा माना जाता है। तेरे दीदार की थी तमन्ना तब हमको, लोग देखेंगे वहां हमने यहीं देख लिया। ऐसा माना जाता है कि वहां जो अर्श पे बैठे हुए साहब हैं द बिग बॉस उनके और आपके बीच एक पर्दा है। जिसको आप वहां जाकर के देखोगे पर आपने यहां देख लिया। हां। तो कुछ लोग ये कहेंगे हमने तुम्हें स्पिरिचुअल जर्नी जो है वो एक हर लहजा बशक्ले बुते अयार बरामद। हर लहजा बशक्लेर बनाबत और यह के ना तू खुदा है ना मेरा तू खुदा है ना मेरा इश्क फरिश्तों जैसा दोनों इंसान हैं तो हां हां तो इतने क्यों इतने हिजाबों में मिले जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले हां तो हमको ये लगता है कि जो खुदा है और हमारे बीच में एक हिजाब एक पर्दा है हम और वो पर्दे में छुपा हुआ है वह हमको को उस दिन दर्शन देगा जिस दिन हमारा हिसाब करेगा। मतलब ऑर्डर ऑर्डर फिर मतलब मर के जो ऊपर जाएंगे नहीं नहीं मर के ऊपर नहीं जाता कोई तो हिजाब कहां करेंगे हश्र के दिन होगा यहां कबर में अजाब आएगा पहले और वो बिलियंस ऑफ इयर्स हो सकता है बंदे का मूड नहीं सुनने का अभी इतने लोग मर गए नहीं सुन रहे केस जो है उसका नहीं सुनते तो यहीं पे रहोगे अंदर और यहां पे बहुत रोज चलेगा रोज जबकि जजमेंट नहीं हो रहा है। अंडर ट्रायल हो आप। हां, यह यहां पे भी सिस्टम है भाई। जो हिसाब अंडर ट्रायल को जेल में कैदी की तरह रखा जाता है। लेकिन ये गलत है। ये गलत है। आप मर गए आपका हिसाब किताब फ़ौरन करो। नहीं पर ये तो होता नहीं है। एक्चुअली फास्ट ट्रैक चाहते हो आप। मानने की बात है। नहीं नहींस्ट ट्रैक कुछ लोगों ने कहा कि नहीं नहीं अगर तुम किसी को मार के चले जाओगे तो तुमको फास्ट ट्रैक मिल जाएगा। हम ठीक है। इसके चलते बहुत सारे लड़के जो हैं वो घोर वाले चक्कर में हां अरे इतने वतने के चक्कर में लग जाते हैं। वो भी गलत है। कुछ नहीं होता। अभी आपका इनडेफिनेट पीरियड के लिए एप्लीकेशन पेंडिंग है तो उसमें होता है कि आप पर्दा जो है उसी दिन उठेगा एक दिन उठेगा फिर भेद तब तक आप देख नहीं पाओगे उसी दिन भेद खुलेगा हां उसी दिन भेद खुलेगा पर्दा जो उठ गया तो भेद वो खुल जाएगा पूछो हां ये भी तो था पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा आगे अल्लाह मेरी तौबा हां एक पर्दा होता है मर जाना हम हैं पर्दा कर गए पर्दा कर गए हैं? हां। मतलब अब हमारे उनके बीच में एक स्क्रीन है। मतलब मरे नहीं। हो आदमी स्वीकार नहीं कर सकता ना। हमारे वाले मर गए। यह बड़ा अच्छा है वैसे। ये सम्मानजनक भी है। और मतलब ये अरे अंग्रेजी में है ना कि ही पास्ड अवे। हां। ये नहीं बोलेंगे कि ही इज डाइड। पास्ड अवे। मतलब निकले हैं। अभी आ जाएंगे। हां। हां। उर्दू में है इंतकाल। हां। इंतकाल हो गया उनका। इंतकाल का मतलब मर गए ना? ट्रांसफर ओ इंतकाल का मतलब अरे म्यूटेशन करवाते हो जाके वहां पे कागज जमीन वमीन तो इंतकाल होता है ना हां इंतकाल का मतलब होता है कि यहां से उधर चले गए सोचो एक आईएएसएस ऑफिसर का आप जीवन में कितनी बार इंतकाल इंतकाल पे इंतकाल हो रहा है और जो वो जला दिए जाते हैं वो भी कहते हैं कि बैकुंठ चले गए हां हम परलोक की यात्रा परलोक की यात्रा सिधार गए श्री हरि के चरणों में चले गए ठीक है श्री हरि तो यहां बैठे हैं हम मान हम मानने को ही तैयार नहीं है कि हम एक दिन नहीं रहेंगे। ठीक है? नहीं है तब भी मान रहे हैं। हां ये ये पर्दा हमने अपने आंखों पे डाला है। वो कहते हैं ना कि वो क्या हुआ? आपका वो आपका पर्दा क्या हुआ? तो उन्होंने कहा कि अक्ल पे मर्दों को पड़ गया। तो मर्द औरत जा जानवर मतलब जिनको थोड़ी सेंस है। सबका यही पर्दा है कि हम पर्दा कर लेंगे आपसे एक दिन। हम ठीक है। पर हम जाएंगे नहीं। अच्छा मान लो आपके छाती पे मूंग द लेंगे। हम जैसे मान लो कंपनी ट्रांसफर कर दे मेरा मुंबई इंतकाल हुआ वो तो मेरा इंतकाल हो गया लोग तो रोना पीटना मचा देंगे इंतकाल करके लेकिन यह नहीं सोचेंगे खुद बोल रहा है तो वो एक वायरल है क्लिप जिसमें एक बच्चा अपने बाप को फ़ करता है कि अब्बू हां हुए नहीं रहे वो नहीं वो खत्म हो गए वो खत्म हो गए कौन अंगूर अंगूर खत्म हो गए उसके बाद उसके पिताजी उसको सुनाते हैं हां तो ये जो है ना पर्दे का सिस्टम अपना अपना दुनिया में ऐसे ही बना हुआ है। भाई पर्दा है चांद से पर्दा कीजिए कहीं चुरा चुरा ना ले चे सही है। कहीं आता है ये आदमी सही है। इस मामले में यार तुम गाने के कहीं है। अच्छा मुझे लगा कहीं कहीं चुरा ना ले चेहरे पे नूर। ए मेरे हमसफर पर सूरज से पर्दा जरूर कीजिए। अभी जिस समय जिस तरह का नूर सूरज उसके लिए भाई चेहरे का नूर चुरा लेगा। इसीलिए उसको स्क्रीन कहते हैं। हम वो भी एक पर्दा है। वही तो है आपका आपकी चमड़ी जो आपके लिए एक पर्दा है उस पर एक पर्दा है। पर्दा है। वरना रोस्ट हो जाएंगे आप। वो पर्दे के ऊपर पर्दा होता है। चर्चिल ने हम आयरन कर्टन था ना। हम जानते हो ना? हां हां वो जो रूस और अमेरिका एक आयरन कर्टन था। दो दुनिया दो क्या बोलते हैं उसको? दो ग्रुप्स हम या कैंप्स या कोल्ड वॉर में हां तो वो आयरन कर्टन मतलब कोई उधर नहीं जा सकता इधर का आदमी तो वो आयरन कर्टन सही में होता है कहां स्टेज पर जैसे कपड़े जहां नाटक होता है ना वहां कपड़े वाले पर्दे होते हैं। एक एक लोहे का पर्दा होता है। इन केस ऑफ़ फायर देखने वालों को दर्शकों को और स्टेज के बीच में एक आयरन का वह गिर जाता है ऑटोमेटिकली जो आयरन कर्टेन कहलाता है। वो सुरक्षा के लिए था। अच्छा इसलिए नहीं था कि दुनिया दो ध्रुवों में बटी हुई है और इनके बीच उसका कोई हां वो यूज़ लोहे का लोहे की दीवार यहां भी कोई शीत युद्ध चल रहा है। हां ऐसा नहीं है पर वो था कि अगर आग ऐसी लगी बेकाबू तो एक पर्दा ऐसा था जो कि ऐसे बंधा होता था कि वो जल जाता था। तो फिर वो दर्शकों के दर्शक दीर्घा और स्टेज के बीच में एक दीवार खड़ी हो जाती थी लोहे की जिसमें आग नहीं लगता था। पर हिंदी पत्रकारिता में पर्दाफाश शब्द शब्द का इतना ओवर यूज हुआ है कि ऐसा लगता है कि होता है ना कि अधिकारी ने किया पर्दाफाश या फला नेता का हुआ पर्दा जर्नलिस्ट ने किया पर्दाफाश तो ऐसा लगा है कि कुछ लोग सुबह उठते हैं नाश्ता करते हैं पर्दाफाश करते हैं फ़श का सही अर्थ क्या है उठाना नहीं कोई और किसी और शब्द में प्रयोग है यहश हटाना जैसे राजफाश हां वही पर्दा ही हम राजाश करना मतलब राज रिवील करने का मतलब रिवील करना फास्ट करना मतलब रिवील करना जैसे कल्याण बन जी ने वो हम फास्ट किया था ना टेक्स्ट WhatsApp चैट नहीं नहीं वो तो गैस फ़ास्ट किया था उन्होंने वो नहीं वो फ़ाश ही था हां हम अच्छा वो जो पर्दा जो है वो राज भी है पर्दा जो है वो राज भी है ना राज को छुपाता ही पर्दा है ना हां तो पर्दे का अर्थ यह है कि राज है। अच्छा। अगर पर्दा है तो राज है तो राज है तो सिमरन भी होगी। तो सिमरन भी होगी। जय पर्दा भी हो सकती है। जया पर्दा हम लोग जय पर्दा ही बुलाते थे। जय पर्दा पर्दा ही पर्दा बाद में आया पता। अच्छा आई थिंक पर्दा ही जय प्रदा हम तो बाद में सुने कॉमन उसमें है जया पर्दा। अच्छा अमर सिंह तो उसी में छुपे हुए थे। अरे यार अमर सिंह ने हमेशा हम पर्दे में रह के ही काम किया है। बॉलीवुड की पर्सनालिटीज को पर्दे के रूप में इस्तेमाल किया। हम अमिताभ बच्चन उनके लिए पर्दा थे। हम जया जो पर्दा नहीं है वह भी उनके लिए एक पर्दा थी। जया पर्दा जो पर्दा थी वह भी उनके लिए एक पर्दा थी। मैं इस लिहाज से कह रहा हूं हम पर्दा मतलब राज हम उनका उनकी बॉलीवुड में पकड़ थी। वो बॉलीवुड के लोगों को राजनीति में लाते थे। उसका एक अलग सेलिब्रिटी होती है ना सेलिब्रिटी की। राज बब्बर पे भी उनका राज बब्बर बहुत सारे लोगों को संजय दत्त तक को उन्होंने राजनीति में इंट्रोड्यूस किया। मैं इस लिहाज से बोल रहा हूं कि वो पर्दे में रहते थे। रुपहले पर्दे से लोगों को राजनीतिक पर्दे पे लाते थे। राजनीति के पर्दे पे लाते थे। राजनीति के स्टेज पे लाते थे। इस थिएटर में उनकी एक्टिंग की जो भी कला है, जो भी उनका ओरा था, उसको भुनाने का काम उन्होंने विभिन्न पार्टियों के लिए किया। हम ऐसे समझो जया पर्दा पर्दे पे आती थी। हम ठीक है। फिर राजनीतिक स्टेज पे आई मैं। हां। कुछ लोग समझते हैं कि औरत पर्दे की चीज है। औरत ही पर्दा है। कुछ लोग समझते हैं कि औरत पर्दे की चीज है। हम दोनों एक ही चीज समझते हैं। पर दोनों अलग-अलग समझते हैं। औरत को पर्दे में रहना चाहिए। औरत को पर्दे पर रहना चाहिए। औरत पर्दे की चीज है और औरत पर्दे की चीज है। उस लिहाज से बोला मैं पर ये जो यह वाला पर्दा है जिसको घूंघट कहें या चेहरे को ढकना कहें सबसे खूबसूरत पर्दा है। खूबसूरत पर्दा है ये। ऑफ कोर्स एक्साइटमेंट है उसमें। पर इसकी अपनी भाषा तो होती थी। जैसे लोग के नजरिए से आप देखिए। मतलब आज हम कह सकते हैं अरे यार ये क्यों करना है? ये तो एक दानूसी विचार है। पर जिस दौर में ये स्वीकार्य था और इससे कोई असहज नहीं होता था। मान लीजिए 40 साल पहले तो 50 साल पहले तब इस घूंघट की भी एक भाषा होती थी कि घूंघट कितनी सावधानी से किया गया है। इस समय कितना सावधान है। माथे के आंख तक ढका गया है कि थोड़ा और नीचे तिरछा किया गया है। अभी जल्दबाजी में लिया गया है कि यहां तक लिया गया है। उससे परिस्थितियां समझ में आ सकती थी। जैसे अगर वो पूरा यहां तक का घूंघट है तो इसका मतलब है ससुर अंदर हैं या जेठ अंदर हैं। अगर यहीं तक किया है तो ये है कि बहू नई है अभी। अगर हटा दिया है तो इसका यह मतलब है कि घर में कोई बड़ा पुरुष नहीं है या फिर रेवोल्यूशन आ चुकी है। दो ही अर्थ होते थे उसके कि क्रांति आ गई है। पर हम उनसे भी अंदाजा लगा लेते थे कि इस समय घर की महिलाएं कितना स्वतंत्र फील कर रही हैं या नहीं कर रही हैं। पुरुषों की उपस्थिति घर में कितनी है या नहीं कर। वो बड़ी महीन भाषा थी और पढ़ लेते थे। हम बालक भी थे लेकिन पढ़ लेते थे कि यार अच्छा अभी लगता है मामा बैठे होंगे तो छुटकी मामी जो हैं। हम और कई बार होता था वो बड़ी वो तसल्ली से बैठी हैं नीचे बैठी हैं जमीन का भी कई अर्थ होता था जैसे आप खाना बना रही हैं तो कितना नीचे रहेगा जब वो सड़क पे मतलब घर में चल रही है दिखना चाहिए जब वो झाड़ू लगा रही हैं जब वो खाना परोस रही हैं जैसे थोड़ा ऊपर है तो कोई हो सकता है पड़ोस का आया होदंड होता था हां जो जो देवर लगता होगा रिश्ते में पर अचानक से जेठ जी आ गए तो वो तुरंत उठ जाएंगी और बड़ा कर लेंगी घूंघट तो वो सावधान की मुद्रा तो हां एक जैसा घूंघट नहीं होता था वो डिपेंड कि आपकी सिचुएशन में या किस काम को कर रहे हैं उस सर ये डाटा एनालिटिक्स था उस समय का शुरू के टाइम से जो उच्च वर्ग था उन्होंने उसको पहले अपनाया ठीक है कि रानी कर सकती है घूंघट हम बाकी लोग नहीं कर सकते हम ठीक है लेकिन फिर जैसे-जैसे जिनकी स्थिति सुधरी उन्होंने कहा कि हम भी घूंघट करेंगे हम क्या कम है क्या हम और फिर वो धीरे-धीरे परकोलेट होकर समाज में पूरी तरह से फैल लेकिन बहुत सारे बहुत सारा बहुत से समुदायों में समाज के हिस्सों में यह संभव ही नहीं था क्योंकि उनके यहां महिलाएं भी काम करती थी। काम करने के लिए सैक्रिफाइस करना पड़ता था। उनकी भी रहती थी कि हम भी ढक के रहें। लेकिन देन यू हैव टू अर्न योर ब्रेड। तो वह जब मेहनत करती थी तो उनके सर से वह कोशिश करती थी उस हाल में भी कि सर पे बोझा ढो रही हैं पर घूंघट रहे। इस तरह से हमने उसको इस्टैब्लिश किया था। सदियां लगी होंगी। इस सिस्टम को इस्टैब्लिश हुए और इसके डिस्मेंटलिंग के तो कुछ ही साल हुए हैं। मतलब 100 साल रख लो। है ना? आजादी के पहले थोड़े पहले से हुआ होगा। नहीं तो काफी टाइम तक। दूसरी बात यह थी के यह बहुमूल्य वस्तु थी वस्तु ही थी है ना घर की लक्ष्मी तो वो था कि इसको नजरों से क्या होता है कोई देख लेगा ना तो फिर वो ध्यान रखेगा इसका नजर छोड़ के चला जाएगा फिर हो सकता है किसी दिन लूटने आ जाए जैसे आप हैं घर में और आपके घर में हीरे का एक टुकड़ा किसी ने देख लिया कि इस अलमारी में शीशे के पीछे रखा हुआ है। नियत बदल जाएगी। आपके सामने नहीं ले जाएगा लेकिन उसके दिमाग में वो टुकड़ा रहेगा। यह भी एक डर था। पहले के जमाने में ऐसा कोई सिस्टम पुलिस वाला था नहीं ना कि एफआईआर करवा देंगे आप। तो महिलाएं इसका शिकार होती थी। कोई शक्तिशाली आदमी, कोई राजा का आदमी कोई सुल्तान है तो उसको कोई चेहरा नहीं देखा है ना चेहरा देखने के बाद हो सकता है कि वह बोले नहीं इसे हमारे यहां भेज दो हर हमले करवा देगा वो इस तरह से तो धीरे-धीरे ये इसको नहीं भूलना चाहिए कि ये उस युग की बातें हैं जब स्त्रियों को जड़ जोरू और जमीन एक ग्लास होता था धन मतलब गोरू भी उसमें में हम और लापता लेडीज में उसकी घूंघट की वजह से घूंघट वो मतलब वो पत्नी खो जाती है तो वो रविकिशन को फोटो देता है घूंघट वाला ही होता है घूंघट वाला उसको देख के रवििशन बड़े ध्यान से देखते हैं कहते हैं बहुत खूबसूरत है बे याद है वो सीन बढ़िया सीन है वो क्योंकि यह भी रहता है कभी-कभी पर्दा जो है सिर्फ खूबसूरती नहीं छिपाता ऐब भी छिपा लेता यस जैसे हम देखे थे ऐब सत्यम शिवम सुंदरम मतलब कि आप जैसे पान खाती हो कोई महिला नहीं नहीं वैसा नहीं तुम बहुत डिटेल में मत जाओ सत्यम शिवम सुंदरम तुमने मूवी देखी है हम उसमें भी यही था ना वो घूंघट ही करके रखती थी ऋषि शशि कपूर होते थे लेकिन एक हातिम ताई मूवी थी हम उसमें याद है जितेंद्र जाता है मलिका होती है बहुत खूबसूरत तो खोलता है वो तो उसको मूज दाढ़ी होता है क्योंकि वो श्रापित होती है आपको याद होगा तो धोखा हो गया तो इसी घूंघट के चक्कर में जितेंद्र के साथ ये खुद हातिम ताऊ हैं। पर्दा जो है ना वो छुपाता भी है। अच्छी चीजें भी पर्दा पर्दा होता है। पर ताऊ यहां एक फिलॉसफिकल प्रश्न है। पर्दा ढक लेता है ना जैसे आपने खिड़की में पर्दा पड़ा है। नहीं नहीं आप ताऊ उम्र इस विचार से जूझते रहते हैं कि जीवन में कितना प्रदर्शित करना है हम और कितना छिपाना है और यह विचार और कहां प्रदर्शित करना है और कहां छिपाना है। और यह भी मतलब यह मैं अह नई जनरेशन की लैंग्वेज में अह किन लोगों के सामने इमोशनली वनरेबल होना है या अगर लेट्स से तीन दिन पहले मिले एक दोस्त के सामने आप इमोशनली वल्नरेबल हो गए जिसकी एक व्याख्या यह हो सकती है कि यू वर वीक दैट यू आर वनरेबल। आपने अपने जीवन का कोई इमोशनल किस्सा है जिसको लेकर के आप इमोशनल फील करते हैं वो कह दिया तो अगले दिन आप गिल्टी फील करते हैं कि यार मैं यू नो मुझे आई विल हैव टू चूज़ माय फ्रेंड्स वाइज़ली कि जिनके सामने मैं वनरेबल हो सकूं पूरी दुनिया मेरा यह साइड नहीं देख सकती व्हिच इज ट्रू आप हर किसी के सामने नहीं हो सकते बट इसका सही रास्ता कहां पर खुल जाएं और कहां या कहीं भी खुल जाएं या कितना खुलें और कैसे रोके यह पर्दा यह जो अनकाहा अनदेखा पर्दा है ना कि थोड़ा खोलो थोड़ा छोड़ो इसका क्या है रास्ता पर्दा दो तरह का होता है पर्दा द क्लॉथ हम पर्दा द राज हम राज द मिस्ट्री है ना आपने अपने बदन पर अभी हम पर्दा कर रखा है शर्ट आप इस दफ्तर में शर्ट को नहीं उतारेंगे हम मैं सपने में उतार चुका हूं बाय द वे मतलब बिना बिना मैं ऑफिस आ चुका हूं बिना शर्ट के। सलमान। ऐसा होता है ना कि आप आपके वन ऑफ दी फियर में से ये है। बट हम ऐसा कुछ हो जाए कि उतारना पड़े तो आप यहां पे सभी पुरुष हैं जिन्हें आप अच्छी तरह से जानते हैं। आपका मित्रवत व्यवहार है। हम तो आप कुर्ता उतार देंगे। हम्म। ठीक है। आप यू विश? हां। मैं तो नहीं हूं। मैं नहीं। अरे आप उतार दोगे। मुझे नहीं भरोसा इन लोगों पे। आवश्यकता पड़ जाए तो। हो सकता है ना कभी आवश्यकता हो जाती है। से आपको कहीं पे खुजली हो गई बहुत जबरदस्त और वो जानलेवा टाइप की है तो आप कहोगे यार या वहां पे कोई महिला नहीं है तो मैं उतार सकता हूं या अतुल को मान लो आग लग गया तुम अपना शर्ट या हम हम स्विमिंग पूल में जाते हैं शर्ट से मैं आग बुझा दूं हां अतुल जल रहा है हम स्विमिंग पूल में जाते हैं तो हम उतार के स्विमिंग स्वीट में जाते हैं ना हां हां तो हमने ये देख इतना हमारा पर्दा जो है कम हो गया है कि हम एक दूसरे को इतने करेक्ट करेक्ट करेक्ट निकटता से जानते हैं कि हम पर वही उन्हीं कपड़ों में आप क्या कहीं और जाएंगे? नहीं। ऐसे लोग जिनको आप नहीं जानते उनके सामने उन खड़े रहेंगे। नहीं नहीं वो तो समय देश काल परिस्थिति के हिसाब से क्लॉथ वाला कपड़ा पर्दा वो रहता है। तो आपका जो दूसरा पर्दा राज होता है ना वो भी समय काल परिस्थिति के के अनुसार किसके सामने मैं कितना नंगा हो सकता हूं। हम संजीव कुमार बोलता है मौसमी चटर्जी को मौसमी चटर्जी को अंगूर में हम वो कहती है ना कि आप कपड़े बदल लीजिए हम तो बोलता है कपड़े बदल के क्यों बदलने हैं तो बोलती है कि अरे मैंने आपको बिना कपड़ों के ऐसा नहीं आप तो ऐसे कर रहे हैं जैसे मैंने आपको बिना कपड़ों को नहीं देखा है तो संजय कुमार कहते हैं तो तुमने मुझे नंगा देखा है ऐसा करके नहीं तो क्योंकि वो एक्सचेंज बदल जाता है ना वो नया वाला होता है वो होता है कि संजीव कुमार ही है मौसमी चटर्जी के सामने वो दूसरा है हम तो हर आदमी कौन किसके सामने कितना इमोशनली और फिजिकली पर्दा रिमूव करता है डाउन करता है अप करता है जैसे लोग कहते हैं ना शर्म का पर्दा ही नहीं है इसके अंदर हम शर्म का पर्दा यहां तो अब लड़ाई दूसरी है। अब लड़ाई शर्म मिटाने की जैसे जिसे कहते हैं ना कि अभी यह तो दूसरी तरह की समस्याएं हैं ना जो लाइफस्टाइल है जो चैलेंजेस हैं इस जनरेशन के लिए उसमें ये है कि यार मेंटल हेल्थ इज अ थिंग यू माइट डिसएग्री बट नहीं नहीं मेंटल हेल्थ इज अ थिंग तो उसमें पर्दा क्यों है फिर हां तो उसमें यह चैलेंज है ना कि कहा जाता है अरे यार शेयर करो बात करो ना लोगों से इसका यह मतलब है कि पर्दा हटाओ पर चूज वाइजली किसके सामने हां किसके सामने और कितना और फिर थोड़ा धीरे-धीरे सो होता यह है कि कई बार शेयर करते हुए आप थोड़ा कंफर्टेबल कैरिड अवे हो जाते हैं ना कि हम देखो पर्दे मैं मेरे हिसाब से मेरे मानने में या तो आप पर्दा गिरा के हमेशा रहो एक बार में पर्दा उठा दो खुली किताब वो होता है नंगा नहाएगा क्या अब वो नंगा किताब है हम सीरियसली मैं पर्दा में कुछ यकीन नहीं रखता मेरी बात खुला रखो। मैं बुल्ला सब कुछ रखता हूं। खुला बेस्ट हम लोग पूल में रहे हैं साथ में। हां नहीं पर उसमें ये है कि देखिए ये बहुत इंपॉर्टेंट है कि अगर किसी ने कहीं पर अपने राज खोले भी और मैं जानता हूं कि इसने किसी के सामने वो फलाना रो चुका है। उसको मैं दोबारा ये नहीं कह सकता यार तुमको कौन नहीं जानता ये। हम्। तुम्हारे साथ तो ऐसा हुआ ही है। नहीं, यह उसका प्रेरिवेटिव है कि वह अगेन वह तुम्हारे सामने कहना चाहता है। नहीं कहना चाहता है। इट्स लाइक कंसेंट कि वो हर बार यस होना ही मांगता है। उसी का चॉइस है। शेयरिंग थिंग ना कि यू शुड वेरी प्लीज शेयर। ये बहुत आवश्यक नहीं है। कि मन हल्का हो जाएगा। शेयर कर दोगे तो। बिल्कुल होता है। होता है। किसके मैं तुमसे नहीं करना चाहता। मन हल्का अगर आप शेयर करोगे ना तो मन चिल चिल मन यस। वो वो जो गाना था ना लाइन यार से गम कह कर तो खुश हो लेकिन तुम ये क्या जानो तुम दिल का रोना रोते थे वो दिल में हंसता होगा अब क्या सोचे क्या होना है तो दैट इज क्या गहरा मारा आपने बहुत इंपॉर्टेंट है वो सोचना कि तुम दिल का रोना रो रहे हो उसने तुमको उकसाया भी ठीक है शेर शेर हल्का हो जाएगा आपने हल्का कर लिया वो उस तब से जो है ना इतना हल्का घूम रहा है उड़ रहा है यार वो खुश है प्रशा परेशान डजंट मैटर फॉर हिम। कुलदीप हंस रहा था। इसका परेशानी है या ना भाई? ताऊ बड़े मस्ती में रहती है। परेशान हो जाए। आसिफ बड़ा मस्ती में परेशान हो जाए। ये भी ये वो दौर भी है जब इंफॉर्मेशन जो है ना बहुत वैलुएबल चीज है। हमेशा से रहा है। पता नहीं है मतलब हां होगा। बट अभी आप इंफॉर्मेशन को सर्कुलेट करने के मीडियम बहुत पावरफुल है। बहुत ज्यादा। तब मान लो किसी को किसी के बारे में कोई बात चली। जैसे कि फिल्म फिल्मी दुनिया में दो लोग एक दूसरे से प्रेम करते हैं। पर ये छिपी हुई बात है। 70ज की बात मैं कर रहा हूं। किसी को पता चला कि ऐसा वो तो तब पता चलता था वो मायापुरी को बोल देते थे कि हम दोनों अच्छे दोस्त हैं। इवन नॉट ओनली 50 लोगों में फैलेगी नॉट ओनली में तो वो एक दिन में आप देखिए करोड़ों लोगों तक पहुंच रहा है। सोशल मीडिया नहीं बात है ना इन फिल्में दुनिया में अफेयर एक-ए साल बाद या दो-दो साल 10-10 साल बाद या शादी होने के बाद पता चलता था कि इनके पीछे अफेयर था। उस दौर में फिल्में भी साल दो साल लगता था लोगों तक पहुंचने में। आज आप एक गलती करो 5 मिनट में पूरी दुनिया में आपकी चीजें शेयर हो चुकी होती हैं। तो किससे क्या कह रहे हैं आप? कहां कह रहे हैं आप? हर जगह डर है। ताऊ ने एक बात बोली थी कि हम दिन भर में 20 30 बार से ज्यादा कैमरे में कैप्चर हो रहे हैं। व्हिच इज करेक्ट। हम सीसीटीवी हर जगह लगे हैं। मैं कोने में पी सिगरेट पी रहा हूं या किसी को कूट रहा हूं या मैं बदतमीजी कर रहा हूं। बदमाशी सब कैप्चर हो रहा है। 1 मिनट में आप एक्सपोज हो जाएंगे कि अच्छा ये है इसका कररेक्टर। हम तो नहीं ये वो पर्दा जो था अब इस दुनिया में खत्म हो गया है। सभी आप बाय द वे आप जो कुछ कर रहे हैं वो पर्दे पे अवेलेबल है। यस वो पर्दा हट चुकी है। आप इतने बेपर्दा हो गए हैं। हां। अब आप पर्दे वाली बात मत कीजिए। पर्दा गया। मैंने पर्दाशी बेपर्दा तुझे पर्दाशी देख लिया देख लिया सबको अब ना कर पर्दा कि यह पर्दाशी देख लिया अब आपको लग रहा है कि वो था ना चिना सेठ जिनके घर शीशे के होते हैं तो पर्दे वो पत्थर नहीं मारा करते कुछ था ना वो दूसरे जिनके घर शीशे के होते हैं वो दूसरे घरों कपड़े कपड़े बदलने से पहले लाइट ऑफ करते हैं वो दौर गया अभी गया पर्दा गिर गिरना शो खत्म द एंड उनका पर्दा गिर गया शो खत्म हुआ इसलिए कि वो पर्दा कर गए या नहीं पर्दा कर गए मर पर्दा कर गए तो वो तो चले गए जीवन के रंगमंच से पर्दा कर गए हां पर्दा गिरना होता है कि जब सारे क्लाइमेक्स हो जाता है थिएटर में तो उसके बाद सामने वाला पर्दा गिर जाता है लाल वाला है ना लाल जो भी वो गिर जाता है मतलब वैसे उसको बोलते हैं पर्दा बंद हो गया पर्दा लग गया पर्दा एक्चुअली गिरता भी नहीं पर्दा गिरना नहीं नहीं हां बोलते थे जो घर घरों में नहीं देखो पर्दा ऐसे होता था ना हां पर्दा ऊपर से गिरता था हां ऐसे आप तो वो जो घर में आजकल वो पेंच कस के वो उसमें लगा देते हैं ना लट्टू लट्टू में वो गिर जाता कई बार वो उसमें ठुसा रहता है तो वो सीमेंट सही नोएडा के घरों में जिसमें दीवार में कुछ भी मारो भाई यहां तो हैंगर अलग ही पर्दा गिरता है आम बात है अरे पर्दा गिरा नोएडा में फिर वो वाइट सीमेंट लाओ जो है फूंको इनफैक्ट लोगों को बोलते हैं कि मतलब इट्स कर्टेंस फॉर हिम्म मतलब उसका करियर खत्म हो हो गया। हां कर्टन रेजर बोलते हैं लोग। कर्टन रेजर होता है कि व्हेन शुरू होना पर्दा उठता है तो फिर स्टेज दिखता है और कलाकार आते हैं तो व्हेन इट बिगिंस कर्टेन रेजर हम पर ये रामलीला जो गांव में मैं उसी प्रकार थी जब पर्दा उसमें गिरता था तो लोग कल्पना करते थे कि अभी एक दृश्य था। अब दृश्य चेंज होना है ना। सेटअप चेंज होना है। तो अब आदमी इमेजिन कर रहा है कि नेक्स्ट सबका रामायण यहां सबको पता है। तो इमेजिन कर रहा है कि यार इस समय जो है हनुमान जी की पूंछ बांधी जा रही होगी पीछे। है ना? और रावण के जो है वो लगाया जा रहा होगा। अभी देखना है ना? सब आदमी इमेजिन कर रहा है कि इस समय क्या-क्या चेंज होगा। अभी विभीषण सीता बनेगा। क्योंकि आर्टिस्ट की कमी है। वही मेरा ना स्कूल में दुधी में थे। तहसील जो दुद्दी का है ना हम तो एक चबूतरा बना हुआ है तो एनुअल फंक्शन वहीं होता था तो अपन का एक शो था विश्व कन्या जिसके डायलॉग बड़े टेढ़े-मेढ़े थे तो पर्दा उठा हमारा शो शुरू हुआ और डायलॉगवलग सब हम लोग भूलभाल गए तो जो गुरुजी लोग थे उनको लगे ये सब बर्बाद कर दिए तो उन्होंने पर्दा नीचे किया और पर्दे के पीछे फिर उसी जगह जम के कुटाई की गई हम लोगों की धड़ाम घुसंड सब चल अगर वह पर्दा उठा के किए होते ना सुपरहिट शो वैसे ही हो जाता। ये घूसा और घुसंड में क्या फर्क है? घूसा जो होता है मेरे ख्याल से थोड़ा ऊपर तक मारा। घुसण जो होता है घुसा करके मारा जाता है। ऐसा मेरा मानना है। पता नहीं मतलब आई ये भी मेरा अपना अपना अपनी आपकी अपनी व्याख्या है ये। हां पर पता नहीं। पर यह जो मतलब ऐसे स्क्रीन में देखें हम जो YouTube का थंबनेल है वो भी एक पर्दा है। हम हम अ आप उस पे प्ले करते हैं तब खुलता है। तब खुलता है या स्किप ऐड या स्किप इंट्रो जो आता है Netflix पे स्किप इंट्रो आएगा या वो भी पर्दा है। या स्किप ऐड YouTube पे आएगा। वो भी एक पर्दा ही है। क्योंकि आपके मेन उससे पहले मतलब वीडियो से ठीक पहले वो चल रहा है एक ऐड। आप उसको हटाना चाहते हैं। आप स्किप करेंगे। फिर मेन कंटेंट शुरू होगा। ये आधुनिक पर्दे हैं। इनको पर्दे की तरह हमने देखा नहीं कभी पर है तो पर्दे ही हैं। पर्दे ही हैं। एक पर्दा जो है अपना टीवी जब था 14 इंच का पर्दा था वो। 21 इंच का हुआ 32 हुआ, 36 हुआ, 42 हुआ, 55 हुआ, 65 हुआ, 75, 85, 90, 100 110 अब तो प्रोजेक्टर आ गए। बड़े-बड़े पर्दे आ गए। पर वो पर्दा ही था ना? हम उसको बोलते थे स्माल स्क्रीन। हम हम छोटा पर्दा छोटा पर्दा है ना इडियट बॉक्स भी बोलते थे हां इडियट बॉक्स उसको हिंदी में क्या बुद्धू बक्सा याद है हिंदी अखबारों में कभी-कभी आता था बुद्धू बक्सा हम क्योंकि वो आदमी को इडियट बनाता था हम और था क्यों कह रहे हैं क्योंकि अब वो बुद्धू बक्सा नहीं कहलाता है। नोबडी कॉल्स इट इडियट बॉक्स। क्योंकि अपने मतलब जो बक्सा था उसमें दूरदर्शन ही आता था। मतलब लेज़ लेज़नेस की हद थी ना। एक ही चीज आता था दूरदर्शन जो कि टेलीविजन का शब्दश है मतलब शब्दश नहीं अक्षरश अनुवाद टेलीविजन का दूरदर्शन हां अनुवाद था ऐसा कोई नाम नहीं रखा इन्होंने हम और उसमें जो आता था वो आता था हम फिर बाद मेंकि अमेरिका में ना वो मनोरंजन के लिए बहुत सारे चैनल आ गए और उसमें ज्यादातर मनोरंजन ही होता था। अपने जैसा कृषि दर्शन इत्यादि जो है ना वो नहीं तो इसलिए उन्होंने इडियट बॉक्स कहना शुरू किया बिकॉज़ उससे आदमी की आईक्यू कम होती थी। हम सीरियसली बिकॉज़ रेडियो में ना व्हेन आई मैं जब बोलते हैं कुछ तो आपको थिएटर ऑफ़ माइंड एंड यू इमेजिन हां आपको इमेजिन करना पड़ता है पर टीवी ने वो दिखाना शुरू कर दिया इसलिए भी बोलने लगे कि बुद्धू बक्सा है ये पर वो स्क्रीन जो है वो लगातार बढ़ता गया वो श्वेत श्याम ब्लैक एंड वाइट से अभी जो है वो 8K टाइप क्या 8K आता है ना हां हम नहीं के स्क्रीन आता है जो घरों में लग रहा है। रंगीन चल चलचित्र कुछ होता था ना क्या बोलते थे उसको ब्लैक एंड वाइट कुछ ऐसे क्या बोलते थे रंगीन ही बोलते थे रंगीन नहीं कुछ था कलर टीवी आया तो रंगीन टीवी बोलते थे थे रंगीन टीवी बोलते थे हां पर वो आप उन बाजारों में गए हैं जहां पे लिखा होता है पर्दे ही पर्दे हम तिवारी टेंट हाउस गद्दे ही गद्दे पर्दे ही पर्दे जैसे अह ये दिल्ली में ही होता है वैसे आई थिंक दिस हैज़ गॉन फ्रॉम दिल्ली टू अदर सिटीज हम ही ही वाला पर्दे ही पर्दे बजते ही बजते ही गाड़ियां गाड़ियां ही गाड़ियां मतलब वो क्योंकि हमारे यहां क्लियर था पर्दे की दुकान है तो पर्दे ही पर्दे होंगे मतलब क्या बात हुई नहीं पहले गांव में एक पर्दा कौन बेचता है यार पर्दे का मतलब है कि वैरायटी थोड़ा ही जाता है ना थोक है पहले भी गांव में अभी भी बहुत कम होता है कि पहले स्पेसिफिक दुकानें नहीं होती थी कि पर्दे की दुकान अलग सब एक ही में मिलता था उसको गारमेंट शॉप बोलते थे कि जाइए वहां पर्दा भी है चद्दर भी है कपड़े फर्निशिंग की दुकानें अलग होती थी हर जगह लेकिन वहां पर्दे नहीं बिकते थे नहीं नहीं जो फर्निशिंग की दुकानें होती थी वहां पर्दे कवर इत्यादि ये सब मिलते थे नहीं वो मेरी तरफ तो नहीं था वैसा तो गारमेंट वाले में आपको कपड़े मिलते थे पर्दे भी व मिल जाते थे और वो पर्दे का कल्चर क्या होता था पहले पर्दे तो घर में पुरानी साड़ी फाड़ करके पुरानी साड़ियों से पुराना चद्दर टांग देते थे वही पर्दा होता था कहां इतने पैसे होते थे बेडशीट ही पर्दा होता था बेडशीट पुराना हो गया काट के पर्दा बना दिया इनफैक्ट उस दौर दौर में 90ज में घर की हैसियत भी कुछ लोग इस बात से जांच आंक लेते थे कि उनके यहां पर्दे घर में बन के सिले हुए लगे हैं या खरीदे हुए लगे हैं। तो तब बाहर से इतना कॉमन नहीं हुआ करता था खरीदना और अब तो खैर इतनी वैरायटी है उसमें उसमें भी पुराने पर्दे कंप्लीट क्या बोलते हैं जो ब्लैक हां फुल ब्लैक आउट फुल ब्लैक आउट पर्दे आ गए हैं अब तो कॉम्बिनेशन डिफरेंट लेयर्स होते हैं ना लेयर्स आ गए हैं अब तो मैच कराते हैं ना कैमरे में कि ऐसेसे हां कॉम्बिनेशन कि आपके वॉल पर क्या है तीन अलग कलर एक ही डंडी में तीन तरह के पर्दे लगेंगे तो मैच करेगा ये अब तो वो रिमोट वाला पर्दे आ गए हैं और फिर पर्दे भी उस तरह के हो गए हैं कि लकड़ी की चिक बन गई है जिसको आप खींचिए तो फिर वो धीरे-धीरे उठेगा। अब तो आवाज मारो सीटी मारो तब भी उठने लगता है। वो वाला भी आ गया वॉइस कंट्रोल। नहीं वो उनके पर्दे भी जो जिस दिल्ली चुनाव से पहले जो अरविंद केजरीवाल के सरकारी घर की चर्चा शीश महल करके हुई उसके पर्दे सुनते हैं। 13.5 लाख के थे तो आवास थे। वो भी रिमोट वाले ही थे। बड़े अब तो यह बड़ा सब कुछ पर्दे पे झूला झूला है। पर्दे पे झूला डांट बहुत पड़ती थी क्योंकि यह था कि पर्दा गिर जाएगा। झूला कैसे झूलते पहले समझो। उसको पकड़ लिया नहीं। और उसको पकड़ के ऐसे ऐसे वो वाला नहीं तो दो पर्दे होते थे। उसको नीचे से बांध दो। अच्छा। फिर उसके बीच में बैठ के दो लोग तुमको ऐसे गोल-गोल घुमा देते थे। हां फिर वो चकरी की तरह। फिर छोड़ते थे चकरी की तरह। क्योंकि पहले सिकड़ी की तरह होता था आदमी। सिकिया पहलवान बोलते थे। हां। तो भारी रहेगा तो गिर जाता। नोएडा में नहीं टिकेगा। नोएडा में तो पर्दे नहीं टिक रहे। तुम कहां टिकोगे? दीवार गिर जाएगी। हां। मुझे अपने घर में बहुत डर लगता है कि कल को कोई मान लो किसी से हाथापाई हो रहा है। दीवार में टकरा रहा है। दीवार लेके आप नीचे चले जाओगे बिल्डिंग के। सिर्फ उनका वो लिंटर ही सही होता है। बाकी सब कुछ ध मेरे नोएडा में नौरंगी फ्लैट लिए हैं। अरे यार बहुत दिनों के बाद आई है। इंटीरियर डेकोरेशन बहुत जबरदस्त करवाए हैं। दीवार में जो है हम एक दीवार में ही उन्होंने 12 नीचे छह इधर तीन इधर नौ लिख के घड़ी घड़ी दीवार में बड़ा कांटा नहीं हम टाइम कैसे पता चलेगा? अरे वही तो रात में गया वहां और फुल टाइट हां टाइट उनके दोस्त भी टाइट तो उसका दोस्त जो है ना मन ही मन सोचता था साला इसको पता कैसे चलता है कितना बजा हम बहुत लास्ट लास्ट में जब उठा ना पहले उसको लगा कि अभी उसने बोला थाईलैंड से लाए हैं ये चिपकाए जो उसने फाइनली रात में जब निकलने लगा ना उसने बोला कि टाइम क्या हुआ है भाई साहब यार ये घड़ी तो अच्छा तुम थाईलैंड से लाए हो लेकिन पता कैसे चलता है कितना बजा हम उसने बोला अरे तो वही नीचे में ना एक हथौड़ा रखा था तो नौरंगी ने कहा अभी बताते हैं ये देखो उठाया और बीच में ही ढ हथौड़ा मारा दीवार पे हां उधर से नेबर बोलता है अबे रात के 2:00 बज रहे सो जाओ पागल यार नरंगी कमाल है भाई अरे ये नोएडा की दीवार के बारे में है। ये हालत है। इधर बजाओ तो पड़ोसी उठ जाता है। एक पूजा घर का पर्दा होता था अलग। वो भी घर पे ही बनाया जाता था। जैसे आज बाकी पर्दों में ना ज्यादातर में वो छल्ले हां पड़े रहते। हां। छल्ले होते थे। वो एक तो पहले वो वाला छल्ले आते थे जो हुक की तरह लगते हां अब जो है पर्दे के बीच में अब वो बीच में गोल की तरह लगते हैं। पर पूजा वाला जो पर्दा होता था ना तो वो डोरी पड़ी थी डोरी इस पे ही चलता था और उसको अगर आपको खोलना है तो ऊपर से सरकाइए वो अभी भी है यार पता नहीं उसका कैद क्या मतलब घर के सारे पर्दे जो है एक तरफ तरह के हैं और वो पूजा वाला सिर्फ डोरी वाला पर्दा उसमें स्प्रिंग वाला वो डोरी है स्प्रिंग वाला स्प्रिंग वाला कपड़े धागे वाला भी होता है वो वो स्प्रिंग वाला है यार दोनों तरफ कांटियों में लगा हुआ है वो एंड इट इज़कि वो वुडन है टेंपल मतलब वो जो है उसके अंदर मार्बल वाली चीजें हैं पर वो बाहर वाला वुडन है हम और डेरेबल पर ये धीरे-धीरे कल्चर मतलब घर की चीजों पर जो उसको ढक कर या किसी चीज से कवर करके रखने का वो था कम हो गया। हालांकि धूल और उसके विकल्प भी धूल कम हो गया है ना मतलब कम तो नहीं हुआ है। बढ़ा है धूल पता नहीं मतलब जस्ट आपने लेकिन घरों को सा उस तरह से डस्टिंग बस्टिंग का कल्चर पहले क्या था ना पहले घर यूजुअली आदमी खिड़की खुले रखता था। हां वही वही क्योंकि अब तो बंद रहता है। हां तो अब पहले के मुकाबले अब धूल कम आता है। फ्रिज टीवी और वो जो आपकी ड्रेसिंग टेबल है ये सब कवर किया जाता था। सबको पर्दे में रखा जाता था। रखा जाता था और उसमें नजर लगने रिमोट को पर्दे में रखा जाता था। रिमोट का वो कवर है ना? जो आता था प्लास्टिक वाला वो चढ़े रहता था। पीला पड़ जाता था। वो नहीं भाई आपको मार्केट में हर रिमोट के लिए कवर मिलते थे। जिसमें पीछे एक टिच बटन भी होता था या वाला बटन होता था और उसमें होता था कि ओडा का है इसमें लगेगा क्या Philips का है तो Philips वाला चाहिए ओडा काडा वाला चाहिए उसके वो सींग निकले रहते थे अरे पर्दे चीजें गायब हो रही है यार धीरे-धीरे वो लेकिन एक बात है आदमी जब जन्म लेता है अस्पताल में जन्म के समय पर्दा रहता है पर्दे में जन्म लेता है और अगर उसकी मृत्यु मृत्यु अस्पताल में हुई हो ओटी में पर्दा रहता है हम जी मतलब पर्दा जो है आपके जीवन की शुरुआत से लेकर आखिर तक किसी ना किसी रूप में पहला पर्दा तो मां का पेट होता है जिसके अंदर आप वो वो भी पर्दा है यस आप निकलते हैं और पर्दा कर जाते हैं हम यही है पर्दा क्या बात कही पर्दे से शुरुआत पर्दा ही हम अकबर इलाहाबादी का है वो जो आप कह कह रहे थे क्या मर्द की अक्ल पे पड़ गया हां है ना वो ऐसे कि बेपर्दा कल जो आई नजर चंद बीबियां अकबर जमीन में गैरत कौमी से गढ़ गया पूछा जो मैंने आपका पर्दा वो क्या हुआ कहने लगी कि अक्ल पे मर्दों के पर्दा गया ओ हो मर्द की अकल पे जो पर्दा पड़ा है बहुत पहले पड़ गया फिर भी किस किस टाइम में पड़ा होगा कुछ पता नहीं आप इतने उसे कह रहे हैं बहुत पहले फिर भी किस टाइम बहुत पहले और वो उसी ने फिर उनके शक्ल पे डाला ये मैंडेट किया कि तुम्हारी शक्ल पे पर्दा होगा जब उन्होंने ये किया तो फिर क्या हुआ कि जिस चीज को आपने बचाने की कोशिश की वो वो लूटने का सामान हो गया। आपके पास इतनी बेशकीमती चीज नहीं है। लेकिन आपने उसको ढक ढक कर बेशकीमती बना दिया ताकि बाकी लोगों की नजर उस पे पड़े तो उसको लगे कि कुछ बेशकीमती है। तो पर्दा जो है उनकी शक्ल पर डाल के आपने अपनी अकल पर डाल लिया। अगर वो यूं ही जैसे आप घूम रहे हो वैसे वह घूमती तो मामला ही नहीं था। आपको दिन रात उसकी चिंता ही नहीं सताती। हम है ना? तो आपने एक आपके जितने भाव की वस्तु को बहुमूल्य बना दिया। बनाते गए। हां। क्या होता है? पर्दा आप डाल लेते हो कि गर्दा नहीं पड़े। वाह यही उद्देश्य होता है ना। जैसे अपनी गाड़ी के ऊपर डालते हैं। बारिश में नहीं निकालते। हम मसून में इनकी गाड़ी नहीं निकलती। ये खुद भीगते हैं। तो गाड़ी नहीं भींगती। हम हां। क्योंकि पर्दे में रखा हुआ है। वैल्यू किसकी है? आपकी। आपने उसको ज्यादा वैल्यू दे दी। तो आपकी अक्ल पे पर्दा पर्दा पड़ गया है। हम कहने लगी कि मर्द अक्ल पे मर्दों का पड़ गया। हम् मर्द मर्दों और पर्दों में काफिया भी मिलता है। भविष्य में कभी गज़ल कही जा सकती है। और है ना मतलब सर्द बहुत सारे काफी हैं। मर्द पर्द सर्द खूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं। साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी। आ गौर से दृश्य दृश्य को। देखिए आप खूब पर्दा है कि खूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं वही पर्दा है व बैठे हैं पकड़ के हमने अरे अरे क्या एक्सप्रेशन दे रहे अरे मैं खो रहा हूं क्लोज अप देख साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं बीच का मामला है ये जो ए्बग्विटी होती है ना कि हम हैं भी और नहीं भी और नहीं भी यही तो हो भी नहीं और हरजा हो तुम तुम एक गोरख धंधा हो क्या बात है तो साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं अगर साफ छुप जाएंगे तो कम से कम आप तो मुक्त हो जाएंगे ना फ्री हो जाएंगे मैं दूसरी जगह देख लेता हूं इधर नहीं चल रहा लेकिन नहीं आपको वहीं पर एक हुक दे दिया गया है हम कि अब आपने सैल्यूट देख लिया है तो आप इमेजिन कर रहे हो हम कहां खो गए पता नहीं बहुत अच्छा था यार पैसे नहीं है बस होता यही है जैसे लोकतंत्र है हम ये इसका वही मतलब है आई लव यू भी ना कह रही मौसू और बात भी ना करनी छोड़ रही लोकतंत्र है ना अपने देश में हम पर साहब छुप भी नहीं रहा है तो कुछ लोग कह रहे हैं कि नहीं रहा तानाशाही नहीं चलेगी नहीं चलेगी नहीं चलेगी वो कहते हैं हमें तो प्रश्न पूछने का अधिकार ही नहीं है सारे इंस्टिट्यूशन कैप्चर हो गए हैं लेकिन ऐसा नहीं है। सब कुछ वैसे ही चल रहा है जैसे पहले चल रहा था। नेता लोग गाड़ी में पर्दा काहे लगाते थे? चिलमन से लगे बैठे हैं। साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं। इसीलिए नेता लोग गाड़ी में पर्दा लगा के चलते थे पहले। क्योंकि फिल्म लगाना गैरकानूनी है। खाली फिल्म लगाना गैरकानूनी है। आप पर्दा लगा लेंगे आपको फाइन हो जाएगा। हम पता है वो पर्दा लगा लेते हैं वाइट वाला क्रोशिया वाला क्रोशिया टाइप रहता है उसमें थोड़ा जालीदार को पारदर्शी बाकी छिप जाता है उसप सब पर ये बताइए इसको फिल्म क्यों कहते हैं जो शीशे पे लगाई जाती है आप लगाते हो फिल्म नहीं घर में कभी फिल्म नहीं लगाते आप देखने के लिए अब गाड़ी वाली बात करते घर पे कैसे चले गए वो फिल्म ही होता है वो हां मैंने गाड़ी को फिल्म चढ़वाया वो जो रील में वो निकलता है उसको फिल्म कहते हैं उसी से फिल्म आया है। हां। हम भी जो ये लगाते हैं वो फिल्म ही है। हां उसको फिल्म ही बोलते हैं कि फिल्म जो है वो क्या है? एक जीना सा पर्दा है। स्क्रीन है। पीपीएफ मैंने करा है भाई। पेंट प्रोटेक्शन फिल्म। ओ अच्छा मुझे लगा ये प्रोविडेंट फंड प्राइवेट प्रोविडेंट पीपीएफ वाला। फिल्म जो है वो फिल्म क्या है? झिल्ली है। हम झिल्ली कितना सही शोध है यार इसके लिए। हां ऊपर झिल्ली चलो एक झिल्ली देखने चलें। चलो मैं और तुम दिल्ली देखने चलें। बहुत ही वाहियात इतने अरे बहुत मेरे एक मित्र थे वो कहते थे यार कौन सी तस्वीर लगी है शारदा में तस्वीर हां तो मैं हमेशा हमेशा जो है ना तस्वीर लगी है समथिंग द पिक्चर तस्वीर लगी है नहीं क्योंकि वो तस्वीर ही बोलते थे हम चलचित्र तो सवाल ही नहीं है पर अगर सिर्फ बोला तो चित्र देखने जा रहा हूं तो कैसा लगेगा चित्र देखने जा रहा है तो चलचित्र कुछ मूवमेंट सिनेमा हॉल में क्यों जा रहा है हम मूवमेंट वाले चित्र जो दिखे नहीं चित्र बोलते हैं ना वो तस्वीर बोलता था भाई हां तस्वीर तो गलत बोलना था उनका नहीं गलत क्यों है आप तो पिक्चर बोलते हो कौन सी पिक्चर चल रही है हम पिक्चर बोलते हैं अंग्रेजी अंग्रेजी बोलो तो सही नहीं नहीं अब फौरन आप आ जाते हो उसी पे पिक्चर मतलब भी सही है मतलब हम पर्दे में फंस के गिरना बहुत कॉमन होता था पहले ऐसा बचपन में छुटपन में आप दौड़ रहे खेले पर्दा लगा हुआ है बच्चे होते थे ध्यान नहीं धक्के से गिर गए पर्दे में फंस गए पता पैर भी उसी था आप उसी में गिर भी गए तो ले दे के तो पर्दा लेके गिर जाते थे पर्दा लेके ही गिरता था थे आदमी और पहले ना अभी भी मेरे पुराने वाले घर में जो बुद्धि में है तो ताऊ समझेंगे पहले पर्दे के लकड़ी का डंडा होता था और दो ऐसे निकले होते थे जिसप वो रखा जाता था उसके आगे शोपीस बनाया जाता था एक चौड़ा सा चौकोर मतलब 1ढ़ एक फीट का होता था जो ऐसे आई डोंट नो किस लिए होता था वो ताकि वो डंडा ना दिखे या कुछ ऐसा होता था और परदेस पे वो डंडे का पैनल होता था एक जिस ऐसे कुंडी लगी होती थी जिस पे डंडा ऐसे रख देते थे फिर उसके आगे एक शेप बनता था उसके आगे एक पैनल होता था हां यस ताकि वो डंडा ना दिखे हां इसीलिए होता था वो तुमने नहीं देखा होगा नहीं वो यहां भी होता है यहां पे भी सबके जो वो अच्छा वो जो मतलब उस रोड के ऊपर जो एक कवर करने के लिए रहता था पहले वो काफी चौड़ा होता था घुमा ऑब्वियसली उसकी डेप्थ होती थी पैनल होता पूरा ताकि वो पर्दा कहां तक है यह दिखे नहीं हम अच्छा पर्दा उतारना उतारना तो चलिए आसान है पर उसको लगाना भी है इसके खिलाफ घर में पर्दे टांगना जो है क्या सलवट पड़ना चाहिए ना उसमें मतलब एक सलवट नहीं उसकी साइड हां मतलब उसको प्लीट्स उसको उल्टा या सीधा प्लीट्स हां वो उल्टा सीधा आप जब लगा रहे होते हैं उस समय आपको आईडिया नहीं आता हां तो वो गोल पकड़ पकड़ के जैसे सच्चाई को वो किया जाता है आपने पकड़ लिया फिर आपने डाला पहले पूरी रड नीचे नहीं उतारे उतारे बिना हल्का सा टिल्ट करके टेढ़ा किया फिर डाला फिर उसमें चूड़ी कस दी। पहले ना घर में जो पर्दे बनाए थे हाथ से जो पुरानी साड़ियों से या पुराने बेडशीट के बनते थे तो हाइट कम होती थी मान लो हम तो क्या जुगाड़ होता थे? नहीं फिर उसमें ऐसे लंबे से डोर बनाकर नीचे लटकाया जाता था। अच्छा हां नीचे एक झालर सीट जाती थी। एक हाथ तक और फिर वो जो ताऊ ने बोला उसको बोलते थे। क्या बोलते थे ताऊ? फॉल हां फॉल। बेडशीट वाले पर्दे में हमेशा फॉल लगाना पड़ता था। फॉल क्यों बोलते हैं उसको? क्योंकि फॉल फॉल है। फॉल करे सीधा है। फॉल करे नहीं ऊपर मूचड़ा नहीं रह जाए। फॉल जो अपने कुर्तों में होता है या बाजा उसमें भी फॉल कहते हैं। साड़ियों में भी साड़ी में तो होता ही है। तो पर्दों में लगता था वो भी कमाल का काम होता है। वाटरफॉल वॉटरफॉल आपका भी रीसेंट वॉटरफॉल आपने कब विजिट किया? अभी शीशू में वाटरफॉल बिजार खबर की ओर बढ़ते हैं। बिज़ार खबर सबसे बड़े पर्दे की तो बात ही नहीं हो रही है। कौन पर्दा इस पर्दे की टीए अच्छा फोन ये भी तो एक पर्दा ये छोटा हो गया है। बहुत छोटा लेकिन बहुत बड़ा है। ये हमेशा अब हम जेब में अपने-अपने पर्दे लिए। पर्दा छोटा है लेकिन देखने वाले बहुत ज्यादा हैं इसको। ये इसने बेचैन कर देता है ये। ये इतना छोटा पर्दा है। हम इसने पूरी दुनिया को छुपा रखा है। यस आपसे हम बट हम तो देख रहे हैं इसको छुपा क्या रखा है आप इसको देख रहे हैं ना दुनिया को नहीं देख रहे दुनिया आपके सामने हो रही है घट रहा है घट रहा है सब कुछ देख नहीं रहे आप नहीं देख रहे पर्दे का काम क्या है छुपाना यस तो जब आप पर्दे पे कुछ देख रहे होते हैं सब कुछ छुप रहा होता है तो सब कुछ छुप रहा होता है परम ज्ञान पहले आदमी जब दुनिया की चीजों से उगता जाता था। अपने जीवन को घटता देखकर अपने चारों तरफ इतना कुछ होता देखकर थक जाता था। सब कुछ पॉजिटिव नहीं होता था। तो दो-तीन घंटे के लिए एक डिस्ट्रैक्शन ढूंढता था। तो पहला पर्दा नाटक कुछ भी मतलब कुछ भी थिएटर 3 घंटे वो उसको एंटरटेन होने के लिए जाता था। वो डिस्ट्रैक्ट करता था। उसका मन बहलाता था। उसको भटकाता था। जाओ पिक्चर देखो मन। तीन घंटे के बाद वह फिर धरातल पर वापस आता था। उसको अपनी औकात पता चल जाती थी। ये छोड़वे नहीं कर रहा है। छोटा वाला पर्दा खुला है तो खुले है। उठा है तो उठे। दुनिया डिस्ट्रैक्शन है। अब आप अपने मन को भटकाने के लिए दुनिया देख लेते हो। हां। अगर इससे थोड़ा टाइम मिल जाए। अब सब कुछ इसी में घटित हो रहा है। खबरें भी, रिश्ते भी, मोहब्बतें भी, लजीज खाने का भी खरीदारी वगैरह सब सब कुछ यहीं घटित हो रहा है। आपकी जीवन में कुछ नहीं घट रहा। एक तो जब आप हमको देख के बोलते हैं, हमको अपने ऊपर डाउट है। अरे आपके मोमेंट्स जीवन क्या है? नहीं तो इनके जीवन में कुछ घट नहीं रहा है। इनके जीवन में सब बढ़ रहा है। क्या बढ़ रहा है भाई? अरे दिन व्याधि भाई व्याधि। अपना लाइफ मोमेंट्स को जोड़ जोड़ जोड़ करके बना है। हम 1 + 2 + 3 + 4 ऐसे अनंत इतने कोटा मिला है हम सबको मोमेंट्स का कुछ अच्छे कुछ बुरे वो डिस्ट्रैक्शन हो गए हम स्क्रीन मेन अट्रैक्शन हो गया ट्रू यस तो आपकी जिंदगी के मोमेंट्स को चुरा रहा है। जैसे कि आप दुधी बाजार में जाकर हम हम दो प्लास्टिक के बाल्टी तीन सर्फ एक्सेल हम वाला साबुन दो गमछा एक किलो रसगुल्ला कॉम्बिनेशन देखो इत्यादि इत्यादि लेकर शाम में आते थे ना हम आपको पांच लोगों से इंटरेक्शन करना पड़ता था और एक हसीन लड़की से दीदार होता था आपका हम फिर आप सपने अपने बुनते हुए घर आते थे। दो आदमी रास्ते में आपको सलाम वालेकुम कहते थे आप वालेकुम अस्सलाम। ठीक वो चला गया। सब गया। एक बंदा आता है कहता है ओटीपी दीजिएगा बात खत्म। हमारे साथ थोड़ी हो रहा है। इसके साथ भी हो रहा है। आपके साथ भी हो रहा है। सबकी जिंदगी के मोमेंट चुरा रहा है। जीवन में चुरा ना ले चेहरे का। चुराना चेहरे का नूर। अभी जो ताऊ ने बोला ना एक मूवी थी दिल तो पागल है तो है ही दिल दीवाना भी है सुनो तो उसमें ना शाहरुख खान से प्यार करती थी करिश्मा कपूर तो एंड का सीन है कि मतलब वो शाहरुख से प्यार करे शाहरुख मारो दीक्षित को प्यार करता था तो शाहरुख खान शातिर आदमी पिक्चर में शातिर मतलब आशिक आदमी लेकिन क्या झोल मारा जो ताऊ ने मारा कि बुरा तो वो है बुरा तुम नहीं हो बुरा मैं नहीं हूं बुरा हमारा वक्त नहीं है बुरा प्यार नहीं बुरा तो वो वो है ऊपर वाला जो हमें मिलाता है जो हमें वो पत्थर उठा के मारने लगती है। हमको भी लगा इसको उठा के हम फेंक दें क्योंकि इसने सब कुछ मेरा रखा फेंकने की बात नहीं है। बात ये है कि बच्चों को हमारा तो कट गया ना अपने मोमेंट्स हमने ले लिए। बहुत कटा है भाई। बोनस टाइम चल रहा है वो इधर जाए उधर जाए। अल्लाह लेगा या मुल्ला लेगा? ठीक है। बच्चों को क्या हो रहा है? मैं पेरेंट्स को देख रहा हूं। लगा के दे देते हैं उसको। ठीक है? छोटा सा बच्चा है। बड़ा मजेदार ठीक है। क्यों? रटा हुआ है। क्योंकि उसको लगता है कि इसको ना अभी थोड़ी देर के लिए चुप करा देंगे ताकि मैं मोबाइल पे लगा रहूं। हां। नहीं अपन अपना ही दे देते हैं। ये नहीं कह रहा हूं मैं। मैं दो दोस्त बात कर रहे हैं। बच्चा कुछ करने लगा तो उसको थमा दिया पेपा पे या जो भी होता है वो लगा के हम मेलन होता है। एक हां कोकोमेलन। यस वो दे दिया जाता है उसको बच्चे को टेंपरेरीली चुप कराने के लिए पर्दा पर्दा दे दिया जाता है छोटा सा उसको वो हमेशा के लिए चुप हो जाता है हम अब तो पेरेंट्स एक्स्ट्रा ही लगते हैं बच्चों को बहुत आराम से ना धीरे धीरे धीरे क्योंकि वो उसका राइट था मेरी मां जब मैं चिल्लाता था पीट दिए जाते थे हम लोग हम आइदर दैट और अरे बाबू थोड़ा खिला दिया इनको अभी आप जिसको उसको जिससे चुप कराने की कोशिश कर रहे हो ना हम उससे वो चुप ही हो जाएगा। हम बिल्कुल क्योंकि वो बहुत कंफर्टेबल हो जाता है कि स्क्रीन है। स्क्रीन विल टेक केयर ऑफ मी। हम मुझे जरूरत नहीं है तुम्हारी। इससे बचना चाहिए। पेरेंट्स क्या कर रहे हैं? बच्चे उनके आठ साल के पांच साल के हैं। तीन वो कहते हैं गेम दीजिए। हम तो वो कह नहीं पाते क्योंकि खुद ही मोबाइल पे वो खाना खाते हैं। खाना खा रहे होते हैं। मोबाइल देख रहे होते हैं। तो उनको भी तो कोई वो मोरली फील नहीं करते ना कैसे बोले बच्चे को कि यार मोबाइल पे मत रहा करो इतनी देर तक क्योंकि खुद रह रहे हैं और फिर एक जनरेशन खड़ी हो रही है जो एक बिल्कुल छोटे स्क्रीन से जिसका काम आपकी जिंदगी चुराना है और वो तरह-तरह की समस्याएं तरह-तरह के अवसाद घस जाते हैं। हां क्योंकि एंटरटेनमेंट यहां होना ही नहीं चाहिए। गाना यहां पे सुनना ही नहीं चाहिए। हम सुना है क्या? बिल्कुल नहीं सुनना चाहिए। यह तो हम लोगों के लिए है जो निकल चुके हैं। यंग लोगों को गाना यहां सुनना ही नहीं चाहिए। यंग लोगों को क्रिकेट यहां देखना ही नहीं चाहिए। उनको तो वहां देखना चाहिए जहां हो रहा है। क्योंकि हमारे सामने इतनी चीजें हो जा रही हैं। मतलबकि हमने घरों में पर्दा लगा लिया है। घरों में पर्दा लगा है। वो ब्लैक कौन सा? ब्लैक आउट वाला टोटल कि बाहर की रोशनी आ ही नहीं सकती। आ ही नहीं सकती। अंदर की रोशनी बाहर जा नहीं सकती। दरवाजा टाइटली बंद है। एसी ऑन है। घर में छोटा से लेके लैपटॉप से लेके बड़ा वाला स्क्रीन सब स्क्रीन ऑन है। हम पूरी दुनिया को अपने घर के अंदर पर्दों पर देख रहे हैं और खिड़कियों पर पर्दा डाल दे रहे हैं। लगा हुआ है। बाहर जो कुछ घट रहा है। उसका उसके शाहिद हम है ही नहीं। शाहिद कपूर गवाह वही अच्छा शाहिद मतलब उसको देख नहीं पा रहे हैं। हम नहीं देख पा रहे हैं। वो हमको यह लगता है कि वो भी हमको नहीं देख पा रहे हैं। ठीक है। कोई किसी को नहीं देख पा रहा है। क्योंकि हर आदमी पर्दे को देख रहा है। अगर आप पर्दे पे कुछ देख रहे हैं तो पर्दा आपसे कुछ छुपा रहा है। इसीलिए जब आप खबरें पर्दे पर देखते हैं, हां। तो खबरें नहीं होती। यह व्यस्त था आज क्या? जो बताया जा रहा है वह खबर नहीं है। जो छुपाया जा रहा है वही ख़बर। वही खबर है। तो थोड़ा सा पर्दे से बाहर आइए। चुराने ले चेहरे की नूर। ए मेरे हम। ए मेरे हुजूर। हुजूर। अच्छा ठीक। कौन है स्पोंसर? थर्मोकूल प्रेजेंटेड बाय अच्छा प्रेजेंट प्रेजेंटेड प्रेजेंटेड बाय थर्मोकूल कूलर्स उसका ये एक बहुत सारे टाइप के मिलते हैं थर्मोकूल उसका एक वेरिएंट अवतार ये भी है अवतार प्लस अवतार प्लस हां यहां रखा हुआ है जिसमें जो है USB है भाई दोद कूलरत वैसे ये बड़ी इंटरेस्टिंग है कूलर की USB जानते हो USB है USB USB USB है दो ही बहुत बढ़िया झगड़ा ना हो दो आदमी से हैं। दो इसलिए दिया कि एक है मालूम तुम्हारे हां कि तुम चार्जिंग पे लगाओ कि मैं चार्जिंग पे लगाऊं एक के साथ एक फ्री यही होता है देखिए दूरदर्शन बस दूरदृष्टि और इसके हवा भी बहुत दूर तक लग जाती है लोहियावादी बनिए वैसे ये लोहियावादी नहीं है प्लास्टिक वादी है ये हां पुराने पुराने कूलर लोहे में जंग लग जाता था और उसको पेंट भी करना पड़ता था ऐसे दूरदर्शन से याद आया ब्रॉडकास्ट हम किसानों का दिया हुआ शब्द है वो ब्रॉडकास्ट कैसे भैया अरे वो जब बीज फेंकते थे ना हम तो कास्ट जो करते थे वो ब्रॉड करते थे। ओ एक तो एक रोपना होता है जो कि आप मिट्टी खोदते बीज डालते जो छींटते हैं उसको ब्रॉडकास्टिंग कहते हैं। बात है। तो जब ये हुआ कि भाई ये चीज बहुत लोगों तक जाएगी तो उसको ब्रॉडकास्टिंग कहने लगे। तो किसानों ने हमको यही नहीं दिया है। पर भारत में कास्ट एक ब्रॉड विषय है। बात करने के लिए इट्स वो तो है। कई घंटों इस पर बात हो सकती है। वरना इज द ब्रॉडकास्ट। इस कूलर में जंग नहीं लगता है। लेकिन ये कूलर गर्मी से जंग लड़ता है। इसमें वैसे जंग नहीं लगता है। हम अरे यार आप तो ले लेते ना थोड़ा सा दिया। नहीं अगर हम लोग जंगी बोलते हां जंग लोगों के लिए दोनों और भैया एक बात देखो जो जंग होती है ना उससे उसके बाद जंग ही लगता है जंगी लगता है भाई साहब हम जांगिया हो जाता है फिर देखिए ज्यादा जंग डॉनल्ड ट्रंप फन्ने मियां बन रहे थे वहां गए देखिए उनके अपने पॉलिटिकल कैपिटल पे जंग लग गई जंग से अधर्म में ही है हम एक फिलॉसफर होते थे हम काल जंग यूंग नाम था उनका वैसे पर जे यू एन जी लिखते थे तो हम तो जंग ही पढ़ेंगे उनको हम हमारे एक दोस्त कहूंगा विजय जंग थापा नाम थापा हां विजय जंग थापा बहुत अच्छे इंसान है थापा साहब पर ये इसकी कहानी क्या रही होगी कि मतलब कभी सुनी है जैसे ये जो मेटाफर क्या आ गया आ गया भाई आ गया आ गया अब पूरा हो गया कृपा आ गई दोनों बोल दिए मैंने इस बार देखिए हम याद दिलाएंगे अगली बार भाई तुम बोलो इश्तियारा कौन सा यारा अरे इश्तियारा आप लोग ऐसेसे शब्द कहां से लाते हो यार इश्तियारा मतलब मेटाफर चलो ये टापर रहता था ना मेटाडोर ये सबको कहता था मेटापर मेटापर मेटापर एक्चुअली आई वास या आई नो सो ये जो है फन्ने खान या फन्ने मियां वाला ये कहां जाए आया कोई है कहानी इसकी फन्ने मियां होते थे ना फन्ने शेख हां शेख बग हां फने फन्ने जैसे हमने मियां नसरुद्दीन मुल्ला नसरुद्दीन का किस्सा हां तो अपने आप को जो फन्ने मियां समझते हैं ना वो होते हैं कि आपने वोट दे दिया। नहीं नन्हे मियां की कहानी सुनी है जो उड़ जाते हैं। उड़ जाते आपने तो पन्नू की भी सुनी हुई है। हां आप लोग तो बहुत लकी आदमी हो। तो फन्ने मियां की कहानी नहीं सुना। नहीं वो क्या है कि फन्ने मियां की गजल सुना देता हूं। आहा इरशाद जो इस बात पे भी है कि भाई हम क्या किसी पॉलिटिशियन पे भरोसा कर सकते हैं। हम तो वो तो मैं आज ही मतलब आप कह रहे थे दिख रहा है कितना भरोसा है। हम हम कि वो इसलिए है कि कर भरोसा बाद में पछताओ मत। कर भरोसा बाद में पछताओ मत। चुप रहो फनेम मियां चचियाओ मत। जगह आप पढ़े सुनाए थे ये थोड़ा सा सुनाए थे। चुप रहो फन्ने में मियां चचियाओ मत। और लुर लुराते लार पर राखो लगाम। ये हम नहीं बोल पाएंगे। लुरल लुराते लुर लुराते लार पर राखो लगाम। आप लगाम रखें। लपलपाते जीभ को दुर्राओ मत। टंग ट्विस्टर है ये। लगाते जीभ को दुर्रा हड़ाते हाड़ को हड़ाते हाड़ को हड़ाते हाड़ से कर सामना हड़ाते हाड़ से कर सामना कप कपाती का में घुस जाओ मत तो नहीं आदमी जब सामना मुसीबत से होता है ना हाड़ मतलब हड्डी कांप जाना हम तो अपने ही का में घुस जाता है हम चतुरमुर्त की तरह हड़हड़ाते हाड़ से कर सामना कपकपाती कांख में घुस जाओ मत कसमसाती रह गई हर कामना कसम कसमसाती रह गई हर कामना बिलबिलाते बोल बोले जाओ मत बिलबिलाते बोल बोले जाओ मत बहुत बढ़िया क्योंकि आपकी कामना जो थी ना कसमसा के रह गई है तो बिलबिला के जो है ज्यादा ज्यादा बोल मत बोलो और चरमराती खाट थी आ चुरचुर चरमराती खाट थी स्वय खड़ी घटिया खड़ी हो गई है चरमराती खाट थी सो है खड़ी खाड़े खाड़े तुम भी खड़खड़ाओ मत क्योंकि बैठ तो सकते नहीं आपकी खटिया खड़ी हो चुकी है तो दिल्ली आके खड़खड़ाने से कुछ नहीं होगा ओ खड़खड़ाती खाट थी चरमराती खाट थी सो है खड़ी खड़ेखड़े तुम भी खड़खड़ाओ मत होते जड़ मत होता है सुजान हम हम होते जड़ मत जड़ मत होता है सुजान यूं खुजा के खाज को सुझाओ मत आ ये तो खुजली वाले एपिसोड में फिट हो जाता है हां और कुलबुलाती कोपलों को कर दफन कुलकुलाती कुल कोपल जब निकलती है ना जमीन से उसको वापस वहीं डाल दो ओके कुलबुलाती कोपलों को कर दफन भरभरी भरभराती भावना भड़काओ मत हाय हाय भावनाओं को भड़काओ बहुत बढ़िया भरभराती भावना भड़काओ मत भड़काओ मत खलबलाते खून को खौलाते जाओ वाह खलबलाते खून कोलाते खौलाते जाओ मिन्नतें करते हुए मिमियाओ मत आय हाय हाय हाय खलबलाते खून को खौलाते जाओ मिन्नतें करते हुए मिमियाओ मत याचिका नहीं है रण होगा याचिका नहीं है रण होगा और हड़बड़ाते होश में आया है हुस्न हड़बड़ाते होश में आया है हुस्न बड़बड़ाते इश्क तुम सो जाओ मत। मुझे लगा बहुत बढ़िया मतलब इसकी दृश्यात्मकता मैं समझ रहा हूं। हड़बड़ाते होश में आया है हुस्न। बताइए अब इतने समय के बाद बड़बड़ाते इश्क तुम सो जाओ मत। यूं खुजा के खाज को सुजाओ मत। बहुत बढ़िया। बहुत अच्छे। तुम्हारी बात भी आ गई। थैंक यू। चुप रहो पन्ने मियां मत बहुत बढ़िया तो बेजार खबर ये है कि सोशल मीडिया पर रचना गुर्जर नाम की एक महिला बड़ी चर्चा में है। वो अपने इन्फ्लुएंसरर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरर हैं। वो अपनी बनाती रहती है। हां अपने भारीभरकम सोने के गहनों और लग्जरी लाइफस्ट के वीडियोस की वजह से वायरल होती हैं। तो उनके कंटेंट में उनका पारिवारिक माहौल, गांव का माहौल, रोजमर्रा की गतिविधि और उनकी महंगी ज्वेलरी का प्रदर्शन यह देखने को मिलता था। तो हाल में रचना गुर्जर के यहां चोरी की वारदात हुई। मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में उनका घर है और वहां से करीब 7 से 8 लाख का सोना चोरी हो गया है। सोशल मीडिया पर शेयर किए गए वीडियोस के मुताबिक चोरों ने घर की बाउंड्री की जाली काट के प्रवेश किया और परिवार के कमरे को घर बाहर से बंद कर दिया और उसके बाद जो कैमरा वहां लगा था उसका एंगल भी बदल दिया जिससे घटना रिकॉर्ड ना हो सके और सीसी सुबह जब सीसीटीवी में और सुबह जब परिवार उठा तो उन्हें पता चला कि दरवाजा तो कमरा तो बाहर से बंद है और घर से लाखों का सोना उनके सोते हुए चंपत यह वही बात जी पर्दा उन्होंने पर्दा उठा दिया था। दिखा दिया था। हां यही हमने कहा था कि बहुमूल्य चीजों को पर्दे में रख पर्दे में रखिए। उन्होंने छोटे पर्दे पे ला दिया था। हां तो बस खुल गया मामला। बड़ा पर्दा खुल गया। देखिए पुराने जमाने में चोर को कितनी मेहनत करनी पड़ती थी। पहले रेकी होती थी। अब आदमी ऑफर कर रहा है भाई। आदमी वहां पूरा भूगोल लिया हुआ है। यहां सीसीटीवी कैमरा का मुंह इधर है तो जाके पहले कैमरा का मुंह घुमा देना है। फिर अच्छा जितना सोना दिख रहा है। इतनी कीमत होगी उसकी। देखो स्मार्ट चोर थे वो। उन्होंने देखा कि एक वीडियो में सब कुछ दिखा रही है कि कहां से निकला कहां रखा है। घर का पूरा माहौल दिख रहा है। कैमरे दिख रहे हैं। बहुत पहले आपको पान वाले से पूछना पड़ता था इनके घर में कौन रहता है? भैया घर पे कब कारपेंटर और इनसे पूछा जाता थे। अरे इनके घर में है भी कुछ कि नहीं नहीं है ये मेन बात ये है लोग दिखाते नहीं थे और दिख गया तो कहते थे रोल्ड गोल्ड है। यार बहुत हम लोग कहां से ले पाएंगे? रोल्ड गोल्ड सुने हो तुम। रोल्ड गोल्ड नहीं देखिए बहुत दिनों बाद। थैंक यू बताओ। ओल्ड ओल्ड गोल्ड नहीं नहीं रोल्ड रोल्ड गोल्ड रोल्ड गोल्ड इज गोल्ड। रोल्ड गोल्ड इज नॉट गोल्ड। यस। रोल्ड जिसको पानी चढ़ा हुआ बोलते हैं ना। रोल्ड गोल्ड। अच्छा। नकली सोने को रोल्ड गोल्ड। नकली सोने के आभूषणों को रोल्ड गोल्ड बोलते थे। ये रोल्ड गोल्ड है ये। पानी चढ़ा। तो कभी-कभी लोग असली भी पहन लेते थे। पर उस समय दिखावे का युग नहीं था। तो कभी-कभी लोग पूछते थे असली है। अरे नहीं असली रोल्ड कहां से होगा? हम लोग कहां से कर पाएंगे असली? पंचवा है। रोल्ड गोल्ड है। रोल्ड गोल्ड है। बहुत दिनों बाद। तो पहले जो है पर्दे में रखी जाती थी चीजें। अगर दिख जाए तो इंकार कर दिया जाता था उससे। हम अब लोग खुलेआम इकरार कर रहे हैं कि हमने जो हाथ में पहना है वह 2ाई किलो का है। हम आओ ले लो तुम। मुझे याद आया ओल्ड गोल्ड से क्या? मैं बालक था लेकिन वो जो आप कहते हैं ना होश संभाल चुका था। 10 एक साल 11 साल 10 एक साल मैंने बोला आप चलिए। हड़बड़ाते होश में आया था उस भाई। तो तो उसमें क्या हुआ? ट्रेन में जा रहे थे। अब नींद उसी समय टूट गई और रात हो गई थी। होता क्या है कि ट्रेन में आदमी जब ना बैग में अपनी कीमती चीज ले चल रहा हूं। नींद नहीं आती है। तो उसके लगी रहती है दुखदुखी। तो अच्छा एक तो यह है कि एक एक दुखदुखी वाले ये होते हैं कि बैग मेरे पास है कि नहीं। तो कंधे के पास रख के सोएंगे। वो नॉर्मल है बहुत सारे लोग अपने एक ये होते हैं कि बैग के अंदर वो चीज है कि नहीं जो मैं लेके चला था। वो वाली ना कि बार-बार उसको चेक। मैं बीच में एक बार वाशरूम गया था। तो क्या हुआ पता नहीं। तो मैंने देखा कि भाई साहब एक आंटी जी खोल के निकाल के अपना हार देख रही हैं। बारी-बारी से सोने का सब सामान। मुझे लगा यार ये क्या कर रही है महिला? तो यार बड़ी मूर्खता कर रही है कि मतलब प्लेन में होगा आपने अगर रखा है गायब कैसे होगा। लेकिन वो चार चीजें या तीन चीजें थी तो निकाल के देखी कि नहीं। अब मैं बालक था तो मैंने तो देख ही लिया। पर कोई चोर होता तो वो भी देख। बड़े होते तो क्या ही होता। फिर बालक थे तो चोर भी थे। हो सकता है मन मचल जाता। भाई चिनैती का हिम्मत तो बड़े होने पे भी नहीं आती है। अवसर अवसर इंसान को सब कुछ बना देता है। बट इनके साथ सबसे अच्छा है इनको एक रील और बनानी चाहिए कि सब चला गया। अब बनाया ही होगा इन्होंने पर वीडियो देख के नोट्स लिए होंगे चोरों ने हम कि ये यार ये वाला हार गया पहना था। ये वाला है ये वाला है क्या? ये वाला जो दिख रहा है कुछ रह गया है। हां कुछ रह तो नहीं गया। कई बार नहीं देखा चोर घर में घुसा और लिख के लेटर कि घर में कुछ सामान रखा करो। मतलब चोरों को दिक्कत होती है भाई मेहनत करके घुसो कुछ नहीं इनको थैंक यू बोलना बनता है कि आपने चोरों को एक अच्छी राह दिखाई एक समाज में ये भी था ना पहले कि धन को क्योंकि समाज में आर्थिक विसंगतियां होती हैं हम तो आदमी हमेशा कोशिश ये करता था हम कि मैं बराबर दिखूं हम हूं नहीं पर दिखूं कि मैं समाज से अलग नहीं हूं। उनसे ज्यादा नहीं है मेरे पास। बराबरी में खड़ा हूं मैं। मैं बराबर दिखूं अब जो है आदमी बराबर नहीं दिखना चाहता। ऐसा हां उसने Honda City ले ली तो फिर मैं डिफेंडर ले लूंगा। उससे ऊपर उठना है। मैं बराबर नहीं दिखना चाहता। उसका जितना दिख रहा है उससे ज्यादा मेरा दिखे। जिसके पास पहले होता भी था वो अपना अगर कुछ ज्यादा है तो वो नहीं दिखाता था। उतना ही दिखाता था जितना दिख रहा है। उसका उसका एक बिंब राजू श्रीवास्तव अपने उसमें देते हैं कि गांव गांव लौट रहा है ज्यादा तो बीच में तकियावकिया फुला के ज्यादा दिखाना मत कि बहुत कमा के लौट रहा है। कि जो वो वाली तकिया नहीं होती है जो फोल्डेबल उसमें उसको फुलाने वाले ये माना जब क्योंकि ₹150 ₹200 की आती होगी। लेकिन यह माना जाता है कि यह त ये ट्रेन के सफर के लिए इसने अलग से एक तकिया माना जाता था। तो वो फुलाने वाली तकिया लिया है। इसका मतलब ही हैज़ मनी है कि नो राइट देयर किसी के पास नहीं है। हम तो ये होता था कि उसको ये ना लगे कि मैं चिढ़ा रहा हूं। हम या मैं ऊंचा अब तो पहले धन अभी धन का प्रदर्शन होता है। बिल्कुल ठीक है। जितना है नहीं उससे ज्यादा। ये सोचो मेरे इसी देश में इसी नोएडा शहर में बड़े होर्डिंग लगते हैं जिसमें लिखा होता है लग्जरी रेजिडेंसेस फ्लैट नहीं लिखा होता यस ठीक है स्टार्टिंग फ्रॉम फोर और 11.6 करोड़ ऑनवर्ड्स हम तो आपने हर उस आदमी को बता दिया जिसके पास रहने को घर नहीं है कि ये 11.6 करोड़ ऑनवर्ड्स का घर है। वो गुजरता तो वहीं से है ना बनाया भी उसी ने है। गार्ड की नौकरी भी वही कर रहा है। डिलीवरी देने भी वही जा रहा है। तो वह जब आपके दरवाजे की घंटी बजाता है, उसको यह मालूम है कि आप आपका यह घर 11.6 करोड़ से ज्यादा का है तो घर में कितना होगा। उसको क्या पता सब ईएमआई और रही सही कसर आप अपनी धस से पूरी कर देते हो। आप जो इनकलिटी है इसको पर्दे में रहना था। आपने पर्दा हटा दिया है। आपको आप पूरी तरह से नग्न होकर नुमाइश कर रहे हैं। नुमाइश कर रहे हैं आप अपनी नंगई का जिसको आप समझते हैं कि आप सफल हैं समाज में। ये हमारे संस्कार नहीं थे। ये संस्कार हमने आयातित किए हैं कि मैं फ्लैट में नहीं रहता। आई लिव इन अ रेजिडेंस। हम नुमाइश की परंपरा अपने यहां नहीं रही। मतलब वैसे वैसे क्या बोलते हैं? शो ऑफ की परंपरा। शो ऑफ की परंपरा। बिकॉज़ क्योंकि नुमाइश मेले को भी बोलते हैं इसलिए मैं बिकॉज़ यू वांटेड टू बिलोंग हम अब जो है ना यू डू नॉट वांट यू वांट टू बिलोंग टू सम अदर क्लास। हम जो आपको बिलोंग नहीं करते पर आप उसको बिलोंग करना चाहते हो। नहीं नहीं मैं ऊपर है। ऊपर है मैं। ऊपर है मैं। हम तो आप जिस जिस आप इनफैक्ट जिस सोसाइटी में रहते हो यू शुड बिलोंग टू दैट सोसाइटी 11.6 करोड़ ही मान लिया मान लिया कि वहां पे सब लोगों के घर 11.6 करोड़ के हैं। आप जैसे सैकड़ों लोग वहां पे हैं लेकिन वहां रहते हुए फिर वो वहां पर डिफरेंशिएट करने के लिए और चीजें ऐड करते हैं। और चीजें ऐड करता है। गाड़ी हां कुछ ऐड कर लिया ऐसा जो कि बाकी के पास नहीं है। दिस इज कॉल्ड लॉस ऑफ इनोसेंस एंड मॉडेस्टी। मॉडेस्ट होना ना मॉडेस्टी एक अच्छी चीज मानी जाती है। ह्यूमिलिटी खत्म हो जाता है फिर। तो आप फिर आपके बच्चे बड़े होते हैं उसी कंपटीशन में। एंड धीरे-धीरे तीन जनरेशन लगेगा। आपका समाज बिल्कुल अलग हो जाएगा। ऑलरेडी हो चुका है। मैं इनफैक्ट हम यह जो लग्जरी शब्द जहां-जहां आता है ना मुझे थोड़ी सी कोपत होती है कि थोड़ा और बढ़ ले आगे उसके बाद इस पे चलें हम हम थोड़ा और अभी अभी बहुत गैप है हम थोड़ा कुछ लोगों को मिनिमम हो जाए हम तो फिर अपन मैक्सिमम वाले पे के बारे में बात करेंगे फोकस करेंगे अभी आप ये लिखो ना कि अच्छे फ्लैट हम लग्जरी फ्लैट क्यों लिखते हो 11.6 करोड़ क्यों लिख रहे हो? हां। जिसको लेना होगा जाके ले लेगा, पूछ लेगा, पता कर लेगा। लेकिन ये लोग चालाक होते हैं। इनके होर्डिंग हमेशा ऊपर लगे होते हैं। हां हां। नीचे लगे हम जैसे लोग पान खा के थूक के चले जाएंगे। नहीं रहना यहां पे। तो सब कुछ में ना दिस वर्ल्ड लग अंदर है। एक सरबहारा और क्यों छोड़ा रहो? लो। चलो। तो जस्ट द वर्ल्ड हमने एक बार तीन साल में चर्चा। इनका इस वर्ड को ना अभी हमारे देश में यह बिलोंग नहीं करता है। लग्जरी नहीं क्योंकि बेसिक नहीं हुआ है अभी हम अगर जिस दिन बेसिक सबका हो जाएगा ना तब ना आप लग्जरी होंगे हम देन यू कैन से कि टू डिफरेंशिएट फ्रॉम यू मैं देखो लग्जरियस जगह में रहता हूं मैं लग्जरी वाला खाना खाता हूं आई ड्राइव इन अ लग्जरी कार हम तब चलेगा बट बेसिक सबके पास होना चाहिए जब बेसिक ही नहीं है तो बहुतों के पास किसको जला रहे बहुतों के मतलब लार्ज मेजॉरिटी के पास तब फिर आप ये लग्जरी वाला अगर रखो भी ना तो लिखो को मत हम वो ठीक नहीं है। अरे आप यहां लग्जरी छोड़िए बेसिक वाला है। उस पे भी हम लिखते हैं प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत यह घर मिला है। वहां पे भी बोर्ड लगा होता है जिसमें खर्च ₹60000 हुए और मैं उस मैं उस कम्युनिस्ट ट्रैप पे नहीं फंसा हूं कि सबको एक जैसा बराबर होना चाहिए। कभी भी नहीं होगा। समाज में इक्वलिटी होती नहीं है। कभी थी भी नहीं। हमारे भी समाज में नहीं थी। पर व्हाट डिफरशिएटेड अस संस्कार कि नहीं हमारा संस्कार यह नहीं कहता है कि हम इसको फ्लंट करें। है तो है इट्स अ रियलिटी पर वो फ्लटिंग वाला जो कल्चर है कि मेरे पास मैं अरबपति हूं तो मैं मेरी शादी जो है वो 90 दिनों तक होगी और देश के विभिन्न हिस्सों में होगी। हल्दी उदयपुर में होगी तो संगीत जोधपुर में होगा। है ना? जोधपुर से याद है। फिर हम लोग 4 तारीख को जयपुर जा रहे हैं। 4 जुलाई को हम लोग जयपुर में होंगे। जयपुर जा नहीं रहे हैं। जयपुर में होंगे। होंगे 4 जुलाई को। टीटी स्टाफ से मिलेंगे। घोषणा जो जगह की घोषणा आई थिंक टीटी स्टाफ जयपुर राजस्थान चैप्टर में हो जाएगी। हो जाएंगे। विजय महावर जी उसके पर अभी समय है तो उसके और डिटेल्स साझा कर दिए जाएंगे। आगे किए जाएंगे। आई थिंक अगले एपिसोड में पर हम लोग यह तय हो गया अगले एपिसोड में अभी टाइम है 4 जुलाई को जयपुर में होंगे तो जयपुर चैप्टर या जयपुर के आसपास के जिलों के जो लोग हैं वो तैयार रह सकते हैं और वो वहां पे कोई एपिसोड नहीं है वो मीट अप है परफॉर्मेंस नहीं है कोई मंचवंच टाइप का सीन नहीं है कोई एक जगह हां अपना गलवहिया मिलन का समारोह है बस चाय पे चुस्की चाय पे चर्चा जो भी चाय चुस्की चाय चुस्की या चाय पे चर्चा जो भी कह ले चाय ये जो आदमी चुस्की नहीं बोलता है। हां भैया बिलकुल चसकी चसका लग गया है। ये जो आपने बात की ना कि लोग फ्लॉन्ट करते हैं। पहले फ्लॉनट करते थे उसका जवाब भी होता है। अब जवाब भी नहीं है। जैसे तुम्हारे पास डिफेंडर आ जाए। मेरे पास है ही नहीं भाई उसके ऊपर की गाड़ी तो मैं फ्लॉनट कैसे करूं? पहले था मेरे पास बंगला है, पैसा है, गाड़ी है। तुम्हारे पास क्या है? मेरे पास मां है। क्या बढ़िया डायलॉग था वो। दीवार। डोंट बी अपोलजेटिक। कि मेरे पास यह है। बट डोंट ब्लंट जस्ट वो रिस्पेक्ट रखो कि नहीं यार मैं क्या करूं मैं अब इतना आ गया है कि मेरे पास है पर तुम्हारे पास जो है वो ठीक है तब आप जिस तरह से रौंदते हुए चलते हो ना हम और बदतमीजी करते हुए वो मत करो उससे आपका इंप्रेशन जो है ना आपको लग रहा है कि आप हीरो हैं पर भाई साहब ऑनेस्टली बता रहा हूं जिस नजर से आपको लोग देख रहे हैं ना शब्द मैं बोलना नहीं चाहता यहां पर तो डू नॉट देयर विल नेवर बी इक्वलिटी कभी भी लोग समान नहीं होते। दुनिया के इतिहास में कभी भी समानता नहीं आई है। आर्थिक समानता तो होती नहीं है। और कंपटीशन का मतलब क्या है? कोई आगे बढ़ेगा कोई पीछे रह जाएगा। बिल्कुल। पर जो आगे बढ़ गया है उसको इतना आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए कि पीछे वाले उसको दिखे ही नहीं। और जब वो वापस लौटे तो हम उनका वो क्या बोलते हैं उसको खैर ना पूछे। दैट्स ऑल। जिंदगी की तलाश में इस विषय पर आगे कभी बात और करेंगे क्योंकि इसमें फिर यह प्रश्न आएगा कि क्या जरूरत से अधिक धन का संचय जैसे खूब सारा धन हो गया उसमें ये चरित्र ही है क्या कि आप उसके साथ गुरुरा जैसे ना पैसा जो है यार थोड़ा अभिमान लाता ही है जैसे खुदा जब हुस्न देता है तो नज़ाकत आ ही जाती है हां तो जब जैसे मतलब किसी को करोड़ों हजारों करोड़ों रुपए मिल गए हैं। तो वो जब सड़क पर चलेगा तो वो इस बात को कैसे भूल सकता है कि वो हजारों करोड़ का मालिक है और वो सड़क पर इस समय जितनी दूर तक देख सकता है उसकी टक्कर में कोई नहीं है। और जब यह बात वो कई साल तक हर रोज फील करता है तो वो उसकी उसकी नसों में आ सकती है वो। एंड आई मतलब बहुत सारे लोग मतलब मैं यह कह रहा हूं ग्राउंडेड रह जाते हैं या ग्रेटफुल होते हैं। वह बहुत रेयर चीज़ है। रेयर है लोग ये नहीं कि लोग नहीं है बट इट इज़ इट इट उस तरफ होने के बाद हो सकता है कि ये डिफिकल्ट भी होता हो। वो ह्यूमिलिटी को मेंटेन रखना और आई डोंट नो हां जरूर होता होगा। हां जरूर होता होगा। अब अब जैसे आप अपना प्राइवेट प्लेन अफोर्ड कर सकते हो और आपको आवश्यकता भी लगती है उसकी हम तो आप खरीद लो हम कोई उसमें गलत नहीं है। आप अगर 20 करोड़ के फ्लैट में रह सकते हो तो रहो। मेरा है कि जो पब्लिक प्रोजेक्शन होता है ना जो ऐड आते हैं जो सबको दिखता है अरे आपके पास 10 करोड़ की गाड़ी है ये सबको थोड़ी ना मालूम है बताइएगा नहीं लेकिन किसी को हां वो सबको थोड़ी ना मालूम है आप एंजॉय करो ना उसकी लग्जरी को पर जो साइकिल पे चल रहा है उसको क्या मालूम ये 10 करोड़ की है कि 1 करोड़ की है कि 5 लाख की है कि 10 लाख की है उसके लिए तो बहुत बड़ी चमचमाती हुई गाड़ी है दैट्स इनफ पर यहां तो वो वाले लोग हैं ना जो गाड़ी पे का दाम जो है पेंट करवा दे बॉडी में हम वो जो गाड़ी अगर छू जाए तो जो उतर के लड़ने आते हैं तो 1ढ़ करोड़ दी गड्डी है ये जितने डेंट लगे उतनी तेरी गाड़ी की वैल्यू नहीं है दैट इज द इशू एनीवे YouTube कमेंट्स करेंगे सामान इस पे करेंगे हां उसके साइड इफेक्ट्स पे विकास सिंह ने लिखा है पिटीशन टू सेंड खानचा फॉर अ फॉरेन ट्रिप इवन इफ इट इज़ थाईलैंड बाली सिंगापुर प्लीज लेट्स डू आवर बिट मंगा ले चंदा आपके लिए कह रहे हैं यार इनको भेज दो इनका पासपोर्ट पे ठप्पा लगवाओ एक हां यार कहीं जाना पड़ेगा नहीं पासपोर्ट तो बनवा लो बनवा लूंगा आप वादा कीजिए मुझे विदेश घुमाएंगे एक बार अरे चलो घुमा देंगे कोई दिक्कत नहीं है लेट्स गो टू भूटान नेपाल चलेगा पासपोर्ट फिर क्यों करवाना अरे आधार से जहां जा सकते हो नहीं यार जल्दी जल्दी मैं सोच रहा हूं विदेश यात्रा कर लूं। ताऊ जाएंगे ताऊ के साथ ही जाऊंगा। अंकुर तिवारी कह रहे हैं फ्रॉम शबे फुरखत का भूखा हूं। टू शाम शाम से कांख में नमी सी है। जाएगा जाएगा और नीचे जाएगा। बहुत ही बढ़िया था। उन्होंने बोला था मेरे बहुत ही खराब था वो। लेकिन बहुत सही था। शाम से आंख में मैंने कहा नमी सी है। आप बोले नहीं सामने कांक से। सत्यम सिंह ने लिखा है नाइस कॉम्बिनेशन विद लिबरल थॉट्स सरदार कंजर्वेटिव एंड आर्टिकुलेट ताऊ एंड न्यूट्रल खानचा एव्री काइंड ऑफ पर्सपेक्टिव यू गेट इन वन प्लेस थैंक यू कंजर्वेटिव कह दिया आपको हम हां मुझे लिबरल कह दिया मैं तो साइलेंट हूं अरे बहुत सारे लोग कह देते हैं यार वो तरह-तरह की आपको गालियां तो पड़ेंगी ही ना आप जब जीवन में गालियां पड़ेंगी ही लेकिन मैं ये कहता हूं सार्वजनिक किरण कुमार को भी गालियां पड़ी थी। कैसे? पूरे जीवन को पड़ी थी तो उसको नहीं पड़ी। क्या बात है? अगला कमेंट है ब्लैंक पेपर नाम के यूजर का। एक कटोरी पीली दाल की कीमत तुम क्या जानो सरदार बाबू। प्रोटेस्ट में लाठी हमने भी खाई है। पुरवैया चलती है तो पैर अब भी हो जाते हैं बेकाबू। ये बात तो है। इसको कहते हैं इसको कहते थे भीतर घाई मार। मेरे भी एड़ी के ठीक ऊपर। लगातार टेंडन में अभी भी दुखता है भाई। अभी भी जब पुरवाई चलती है पुरवाई नहीं किसी किसी दिन थोड़ा ज्यादा चल लो ना उस दिन बस पता चल जाता है याद आ जाता है वो आज की बात नहीं है भाई साहब 19 पूरा मंजर याद आता होगा 1991 की पड़ी है अरे बाप रे 90 की 90 की पड़ी 26 36 साल हो गए 36 साल हो गए दुर्गा बहन सीआरपीएफ के डंडे जो होते हैं ना अलग लेवल के होते पहले वाले मजबूत भी होते थे ना हां ये प्लास्टिक वाले बजते ज्यादा है इसलिए बोलते हैं ना कि तुम लठ बजाओ बजते हैं यह। पहले लगते थे। पहले लगते थे। आय हाय क्या लगते थे भाई? बांस का डंडा तेल पिया हुआ। उसके आगे एक लकड़ी का गोला हां। जो फिट होता था उसमें। जी हां। मुझे लकड़ी के गोले से लगा था साहब। ताकि वो भारी पड़ेगा ना तब तंग ना साहब। फिर आएगा तब मुझे मजा आएगा। जिन लोगों को मैं लीड कर रहा था। हम्म बाद में उनको नहीं नहीं वो तो बच गए। हां तो उनको आप जाके देख। मैंने सबको बचा लिया था। मैं तो खुद फंस गया था। मतलब वापसी प्रोटेस्ट का विषय क्या था? प्रोटेस्ट छात्रों का प्रोटेस्ट क्या होता है? नहीं फिर भी कुछ होता है ना कि क्या तुम बोलते हो युवा रक्त की घाटी नहीं युवा रक्त की गर्मी से बर्फ हासिल वाले डायलॉग तुम्हारे तो गुड एजुकेशन यूनिवर्सिटी के खिलाफ प्रोटेस्ट नीट एंड यूनिवर्सिटी अपना भी एक गैंग था छोटा सा अपन उसको लीड करते हुए शामिल हो गए थे कोई वैचारिकी नहीं थी उसमें नहीं थोड़ा सा तोड़फोड़ किया था जवानी में सब कुछ पुलिस को एक टाइम पे अब छोड़ना पड़ता है। हम जब देखते हैं हाथ से बाहर निकल गया। हां तो लाठी का उपयोग करना पड़ता है। अपन भाग भी लिए थे। फिर जब शांत हो गया तो स्टेशन की सुरक्षा के लिए पुलिस वाले खड़े थे। रेलवे स्टेशन पे क्या हुआ कि एक बंदे ने ना मालगाड़ी खड़ी थी। उसमें कुछ बोरा रखा था। उसमें आग लगा दिया था। तो दैट इज आर्सन हम है ना? हाथ कंगन हां आर्सन हो गया था। तो फिर उसके बाद मैंने कहा कि लेट्स गो एंड सी कि क्या सिचुएशन है शांति व्यवस्था बहाल होने के बाद तो मैं गया और वो पुलिस वाले जो हैं वो डंडावंडा लेके सब खड़े थे अपना वर्दी में और मैं वहीं पे जहां पे गेट था रेलवे स्टेशन कंपाउंड का हम सड़क पर वहां पे चाय की दुकान थी जो मुझे जानता था मैं उसे जानता था तो अपन वहां बैठ गए हमने चाय उसको बोला कि चाय पिलाइए अच्छा हां ये सुनी कहानी फिर हमेशा का एक उसी ने रिवील फिर अचानक एक हमला हुआ आंखों से इशारा यो है यो है है ना नहीं दूसरे दिन उसके कुमठी को पलट दिया गया था आग लगा देना था वो तो कुछ भी करते रहे पर वो नहीं पर उन्होंने बच्चों ने जो लड़के थे हमारे उन्होंने रात में जो है सेका भी अच्छा सिकाई भी की तो गाना आपको याद आता हूं ये जो ठंडी-ठंडी औंधी है हवा कि कोई रोवे भाई साहब कि कोई रौंदा हो ttaf.in पर जो कमेंट्स आए हैं गबूचा ने लिखा है अगर होटल में हॉस्पिटिटी होती है तो हॉस्पिटल में होटिटी क्यों नहीं होती? हम वैलिड क्वेश्चन है यार। मतलब राघव चड्डा को आप दोगे तो मुझे लगता है पार्लियामेंट में पूछेंगे वो। हॉस्पिटल में हॉस्पिटिटी वैसे होती है आजकल। हां आजकल होटल है। हॉस्पिटल में होटिटी नहीं होती। होटिटी नहीं होती। हॉस्पिटल में हॉस्पिटिटी हो रही है। तो हॉस्पिटल में होटिटी होनी चाहिए। अजय यादव ने लिखा है एक सवाल क्या सपने में आए बुरे और गंदे विचार के कारण खुद को दोषी मानना चाहिए कि क्या यह मेरे अंदर बैठे किसी बुरे अंश के बारे में बता रहा है? नहीं नहीं सपने तो सपने सपने नहीं जागने जगे होने पर भी आपके मन में आए हुए विचार आपके नहीं है। इसलिए आपकी कोई रिस्पांसिबिलिटी नहीं बनती। आप इसमें बिल्कुल पूरी तरह से गिल्टी निर्दोष हैं। निर्दोष करार दिए जाते हो। हम सपने क्या सपने तो सपने होते हैं। जागते हुए भी आपके मन में जो विचार आते हैं वह आप लाते नहीं हो। उसके लिए आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। यात्री सिर्फ अपने सामान के लिए जिम्मेदार होते हैं। हम अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें। वैभव दीक्षित तीन ताल लखनऊ के लाल ने लिखा है ताऊ खांचा सरदार को सादर प्रणाम। तीन ताल से मेरी भेंट उसके पहले एपिसोड से हो गई थी। हालांकि जैसा कि आप लोग अक्सर कहते हैं इंसान आलस्य का पुतला होता है। उसी आलस्य के कारण मैंने काफी समय तक पुराने एपिसोड नहीं सुने लेकिन पिछले तीन महीनों से लगातार सुन रहा हूं। अब महसूस होता है कि लोग सही कहते हैं। अपने से बड़ों की बातें ध्यान से सुनो तो जीवन के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलता है। आपकी बातें इतनी प्रासंगिक और आत्मीय होती हैं कि कभी लगता है कि आप मुझसे दूर हैं ही नहीं। ऐसा महसूस होता है जैसे ताऊ मुझे समझा रहे हैं। खानशाह हंसा रहे हैं। सरदार माहौल को संतुलित बनाए हुए हैं। जब भी जीवन में कोई समस्या आती है तो मन में ख्याल आता है इस पर ताऊ की क्या राय होती? तीन ताल ने मेरे जीवन में मुस्कुराहट, समझदारी और अपनापन ये तीनों रंग और गहरे किए हैं। इसके लिए आपका आभार। सवाल यह है कि देश में बढ़ती सांप्रदायिकता को कम करने या खत्म करने का सबसे प्रभावी तरीका क्या हो सकता है? वैभव दीक्षित यह तरीका प्रभावी तरीका हां। बहुत मुश्किल सवाल है। बहुत सारे तरीके अपनाए जा रहे हैं। अगर संप्रदाय खत्म हो जाए तो सांप्रदायिकता खत्म हो जाएगी। लेकिन संप्रदाय खत्म नहीं होंगे। क्योंकि संप्रदाय की अपनी उपयोगिता है। राजनीतिक राजनीति अगर विश्वास से, फेथ से जिसको धर्म कहते हैं लोग, मजहब से दूर हो जाए तो खत्म हो जाएगी। और लोग अगर धार्मिक हो जाए तो खत्म हो जाएगी। लेकिन लोग धार्मिक नहीं है। लोग पंथिक हो गए हैं। लोग मजहबी हो गए। तो सब धर्म जो है वो भूल गए। पर ये सब बातें सुनने में बहुत दार्शनिक वाली लगेंगी। हम धरातल पर यथार्थ के धरातल पर जो बहुत उबड़ खाबड़ है समतल नहीं है यह हर व्यक्ति के करने से होगा क्योंकि समूह ने ही तो हमको यह थमाया है और समूह की ताकत समूह की शक्ति जो है वो उसके आगे सब सर झुकाते हैं। राजनीतिक दल भी झुकाते हैं। अगर हम यह मान लें कि हम अकेले हैं, एक हैं और संविधान तो सिर्फ हमें रिकॉग्नाइज करता है ना। नागरिक को रिकॉग्नाइज करता है। तो फिर जा सकता है। पर यह सब सपने हैं। सपने तो जाएगा नहीं। इसलिए आपको नेविगेट करना पड़ता है और कभी नीचे, कभी ऊपर, कभी कम, कभी ज्यादा। बैलेंस करके निकालना पड़ेगा क्योंकि साथ रहना। जैसे हम एक चीज एक शब्द बार-बार करते हैं। आलोचना के संदर्भ में बहुत सारे पॉलिटिकल साइंटिस्ट ने लिखा है यार आइडेंटिटी पॉलिटिक्स पे जो है काबू होना चाहिए। लेकिन दाऊद देखिए पूरी दुनिया में कोई भी ऐसा देश है जिसने ये सफल प्रयोग करके दिखाया हो कि हमारे यहां लोग समाज द्वारा दी गई आइडेंटिटी या जो ग्रुप आइडेंटिटी है उसे आइडेंटिफाई नहीं किए जाते। अमेरिका में देख लीजिए अमेरिका में इंडिविजुअलिज्म बहुत ज्यादा है। हां इसलिए वहां पे आइडेंटिटी पॉलिटिक्स कम होती थी। हम लेकिन जब वो होता है ना कि अगर आप उनसे धर्म ले लोगे तो कोई और बहाना ढूंढ लेगा वो हम लड़ने का वो नई आइडेंटिटीज खोज लेता है और जब सारे दुनिया में पॉलिटिकल एनालिसिस जब लिखे जाते हैं कहीं भी इलेक्शंस हो वो अधिकतर इसी बात का एनालिसिस कर रहे होते हैं कि किस आइडेंटिटी का ग्रुप इस समय क्या सोच रहा है। सो इट इज ऑलमोस्ट इट लुक्स इंपॉसिबल कि हम आइडेंटिटी पॉलिटिक्स को खत्म या रिड्यूस कर सकते हैं। लोग नई आइडेंटिटीज क्रिएट कर लेंगे और उन उनका झंडा उठा ये झंडा निकाल देंगे ये गिरा देंगे और एक नया झंडा उठा लेंगे कि दिस इज व्हाट वी बिलीव इन फिर वो एक नई आइडेंटिटी बन जाएगी और ये भी है ना देखो ज्यादा इसमें एक चीज क्या काम आ सकती है जैसे हम ऐसा देखते सोचते हैं किताबों को एक तरफ करिए किताबें क्या कहती हैं किसकी पर गेटिंग टू नो ईच अदर गेटिंग टू नो पीपल फ्रॉम डिफरेंट साइड्स जिनको आप मानते हैं कि वह दूसरी ओर हैं या वो अन्य हैं और हम अन्य हैं। ये खत्म नहीं कर सकता पर क्या किसी भी तरह की सांप्रदायिक अप्रोच को कम तो कर सकता है कि आप एटलीस्ट जान गए उनके परिवार को उनके घरों में रहने वाले लोगों को उनके मतलब ऑफ कोर्स आप किसी भी आइडेंटिटी का कोई व्यक्ति हो तो उसमें अच्छा बुरा दोनों हो सकते हैं। तो आप चुन करके अपने दोस्त बनाते हैं ना कि आप यार ये आदमी मुझे ठीक नहीं लगा ये मेरा दोस्त नहीं है। बट कोई आदमी ठीक लगा तो वो दोस्त हो सकता है। फिर आइडेंटिटी आड़े नहीं आनी चाहिए। तो इस तरह से आप अगर मल्टीपल आइडेंटिटीज के दोस्त बना पाएं तो आप उनके साथ एलिनेशन नहीं होता हुआ देखेंगे। देखो फियर ऑफ़ द अननोन अननोन वाली जो बात है हां तो जब तक हम गेटों में रहते हैं हां अलग-अलग रहते हैं तो आप एक दूसरे को जानेंगे नहीं। हां जैसे जूस के बारे में देखिए जो कार्टून बनाए गए कि उनकी नाक बड़ी होती है। मतलब जो भी सदियों तक उनको इतना विलेनाइज किया गया कि आज तक उसकी इमेज सुधर नहीं पाई है। अ एक अब जो है क्रिश्चियंस भी अभी भी जूस को हेट करते हैं। थोड़ा एक एनलाइटनमेंट हुआ तो उन्होंने कहा कि ठीक है चलो रहने दो। पर पिछली सेंचुरी तक तो जूस ऐसे ही रहते थे। हम मतलब वर्ल्ड वॉर टू में क्या हुआ? हम यूरोप में क्या हुआ? जूस को आज भी बहुत मुश्किलों का सामना है। पूरे इस्लामिक वर्ल्ड में उनको एक दुश्मन की तरह ही देखा जाता है। और वो पूरे इस्लामिक वर्ल्ड को एक दुश्मन की तरह देखते हैं। सांप्रदायिकता जाएगी नहीं क्योंकि सांप्रदायिकता है तभी तो आप धर्मनिरपेक्षता और है। नहीं तो नहीं होगी धर्मनिरपेक्षता। अंधेरा है तो उजाला है। सच है तो झूठ है। भूत है तो भगवान तो वो एक जो है स पक्ष है पर उसका होना वैसे ही जरूरी है। दूसरी बात है कि आप ना एक एम्पैथी से नहीं देखते हो क्योंकि जिसके साथ आप रहते नहीं उसके साथ एमैथी होती नहीं है। हम तो हमेशा अदरिंग में ही लगे रहते हैं ना कि मैं वो नहीं हूं वो मैं नहीं। तो जब आप एक साथ थोड़ा टाइम भी बिताते हो हम तो देन यू रियलाइज कि नहीं बाकी सब कुछ ठीक है। देन यू यू विल हैव कि नहीं नहीं उसका तो उसके बिलीफ अलग है। मेरे बिलीफ अलग हैं। है ना? मैं जिन चीजों में विश्वास करता हूं करता हूं वो नहीं करता। वो जिन चीजों में विश्वास करता मैं नहीं करता। वो तो फाइन है। वो तो आपका फेवरेट एक्टर रणबीर कपूर है। दूसरे का रणवीर सिंह है। हम बट यू नेविगेट ना टुगेदर वो है। पर मैं सांप्रदायिकता अगर बढ़ती है तो मुझे धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता के भी आसार दिखते हैं कि उसके भी बढ़ने के चांस हैं। बैड स्पीकर की चिट्ठी बैड स्पीकर ताऊ को पांव छुई खानचा को हग कुलदीप को हाईफाई जय हो जय हो जय हो मैं बैड स्पीकर दिल्ली से आपका वही पुराना नियमित श्रोता जो आप सब से दो-तीन बार मिलकर और फोटो खिंचवाकर सबूत भी जमा कर चुका है ताकि आगे चलकर कोई मुकर ना सके। कुलदीप मैं बिल्कुल तुम्हारी ही उम्र का हूं। आज बात मेरी नहीं मेरी 3 साल की बेटी पीहू की है जिसे मैंने बचपन से ही घुट्टी के साथ आप तीनों की आवाजें भी पिलाई हैं। गाड़ी में घर पर सफर में जहां बच्चे बेबी शार्क या नर्सरी रम सुनते हैं वहां पीहू ने ताऊ, कुलदीप और खानचा के विश्लेषण, किस्से और ठाके सुने हैं। अब उसे आप लोगों की बातें कितनी समझ आती है यह तो भगवान जाने। लेकिन उसके बाल मन पर आप तीनों के चेहरे ऐसे छपे हैं जैसे राशन कार्ड पर सरकारी ठप्पा। वाह हाल यह है कि घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका है। लल्ल एंड टॉपर कुलदीप की एंकरिंग दिख जाए तो पीहू चिल्लाती है। डैडी देखो आपके दोस्त आ गए। टीवी पर ताऊ किसी गंभीर विषय पर देश को दिशा दिखा रहे हैं तो तुरंत घोषणा करती है। डैडी ये तो आपके दोस्त हैं। और अगर कहीं तीन ताल का पोस्टर रील या क्लिप दिख जाए तो उसके अंतर उसके भीतर का पूरा तीन तालिया जाग जाता है। फिर पूरे घर को सिर पर उठाकर एक ही बात दोहराती है कि डैडी आपके दोस्त आ गए। उसने अपने मन में यह बात पत्थर की लकीर की तरह बिठा ली है कि आप तीनों मेरे पक्के दोस्त हो जो हर हफ्ते मेरे साथ बैठकर चाय पानी पीते हैं। आखिर बाप की दोस्ती पर बच्चे का पूरा हक होता है। अब समस्या यह है कि बच्ची जिद पर अड़ गई है। उसका सीधा सवाल है कि अगर यह डैडी के दोस्त हैं तो यह घर क्यों नहीं आते? और अगर घर नहीं आते तो मुझे इनसे मिलवाओ। अब मैं 3 साल की बच्ची को कैसे समझाऊं कि बेटा इनसे मिलने के लिए नोएडा ऑफिस का अपॉइंटमेंट लेना पड़ता है जिसकी चाबी अतुल जी के पास है। इसलिए यह छोटी सी गुहार लगा रहा हूं। अगर किसी दिन आप तीनों नोएडा ऑफिस में एक साथ एक ही ग्रह नक्षत्र और एक ही टाइम जोन में मौजूद हो और मूड थोड़ा फुर्सतिया हो तो कृपया एक संकेत ड्रॉप कर दीजिए। मैं पीहू को लेकर हाजिर हो जाऊंगा। कम से कम उसका भरोसा तो नहीं टूटेगा कि उसके डैडी के दोस्त सचमुच बड़े-बड़े स्टूडियो में बैठकर न्यूज़ चलाते हैं और केवल मोबाइल की स्क्रीन में कैद काल्पनिक पात्र नहीं है। तीन ताल ने मेरी दुनिया में तो रौनक भरी ही थी लेकिन अब मेरी बिटिया के बचपन का भी यह खूबसूरत हिस्सा बन गया है। आप तीनों मुरधन्यों को स्नेह ताऊ को पांव छुई खंचा को हक कुलदीप को हाईफाई नोएडा बुलाने की प्रतीक्षा में आपका बैड स्पीकर। बहुत ही प्यारी चिट्ठी यार। पीहू को ढेर सारा प्यार और अतुल के नियंत्रण में है सब कुछ बिल्कुल नहीं आप कुछ मत करिए बैड स्पीकर भाई आप एक ईमेल कर दीजिए उस radio ast.com पर आप जैसे आपकी चिट्ठी मिल गई है तो चाहे तो अतुल भी अपनी तरफ से खोज के इनको ईमेल कर लें या आप एक ताजा ईमेल कर दीजिए हम radio rडियो पर अतुल तक वो सीधे ईमेल पहुंचते हैं और अतुल उसमें आपसे संपर्क साध लेंगे और एक तारीख वो समय आपको बता बता देंगे कि आप जब नोएडा ऑफिस आ सकते हैं तो जरूर पीहू से मिलवाइए हमें। बिल्कुल बिल्कुल बहुत खुशी होगी। पीहू बहुत सुंदर नाम है। बहुत प्यारा नाम है। पीहू पीहू बोले तोते को कहते हैं ना पीहू नहीं तो पीहू है तो पक्षी ही पक्षी है। पीहू पक्षी की आवाज को शायद कुछ बोलते हैं। नहीं कुछ ऐसा है। आई थिंक पीहू एक पक्षी है पर तोता नहीं है। अच्छा मतलब वही देख रहा था मैं। वैसे कुछ संदर्भों में कहा गया है कि मोरनी छोटी वाली पता नहीं मीठी मीठी ध्वनि को वैसे पीहू बोलते हैं। वो आवाज मुझे लगता है कि उसको बोलते हैं किसी को। अगली चिट्ठी है आतििर अरशद की। नमस्कार कुलदीप भाई खान और ताऊ बड़े दिनों बाद चिट्ठी लिखने का मौका मिला। बीते एक एपिसोड में हाजीपुर वैशाली और केले के स्टैचू की चर्चा सुनकर खुद को चिट्ठी लिखने से रोक नहीं पाया। लॉ कॉलेज से पास आउट होने के बाद मैं अब वकील बन चुका हूं और वकालत शुरू कर दी है। इसमें मेरा इंटरेस्ट तो था ही साथ ही कई दशकों का खानदानी दबाव भी था। दिल्ली में पढ़े हुए अंग्रेजी मूठकोट के मारे जब हम बिहार के वैशाली जिला एवं सत्र न्यायालय पहुंचे तो नए-नए शब्दों से हमारा परिचय हुआ। जैसे कुटुंब न्यायालय तदर्थ तामिला संपुष्ट मौसमात गैर मजरूआ आम गैर मजरूआ खास बास्केटत पर्चा मीम जानब आदि इसी तरह लोगों के नाम भी कम दिलचस्प नहीं मिले उनमें सबसे विचित्र नाम मुझे लगे बोलत राय बोतल राय और झुरझुरी राय सुप्रीम कोर्ट की लाइव स्ट्रीम में योर लॉर्डशिप सुनने से लेकर जमीनी अदालतों में जी हुजूर तक सब कुछ सुन चुका हूं बहुत से वकील साहब तो याचिका में श्रीमान का इस्तेमाल करते हैं। चाहे न्यायाधीश महिला ही क्यों ना हो। कोर्ट में बहस करने के अजीबो अजीब तरीके भी रोज देखने को मिलते हैं। एक बार एक वकील साहब ने मेरे सामने जज साहब से कहा हुजूर रोक नहीं लगा तो दिक्कत हो जाएगा। धाएधाएं जमीन बेचे जा रहा है। क्लच में ले लिया है सबको। ये अच्छा है। क्लच में ले लिया। ये गांव में बोला जाता है। क्लच में क्लच में ले लिया है सबको। बहुत बढ़िया। निषेधाज्ञा इन जंक्शन के पक्ष में इससे बेहतर बहस मैंने आज तक नहीं सुनी। अंत में वैशाली की याद में रामधारी सिंह दिनकर जी की पंक्तियां वैशाली जन का प्रतिपालक गण का आदि विधाता जिसे ढूंढता देश आज उस प्रजातंत्र की माता जय हो जय हो जय हो आपका तीन तालिया आतििर अरशद भूतपूर्व क्रांतिकारी क्लच में ले लिए गुरु क्लच और न्यायालय के जो गैर मजरवा आम और गैर मजरवा खास इस तरह की जो भाषा बाय द वे वो जो लिखा जाता है ना अभी भी वो पुराना ही कल्चर चला रहा है ऑलमोस्ट फारसी में लिखते हैं देवनागरी में हम हां देखो जो मुहर्रिर होते हैं हम वो जब लिखते हैं तो उनकी जो भाषा होती है वो बिल्कुल जज भी लेते हैं इनको इतने साल की सजा मुकर्रर की गई है मेरे भाई साहब और ज़ेर जैसे है ना मेरे ज़ेररे बहस हम ये सब मैं बहस के बाहर कहीं नहीं सुनता हूं या उर्दू चैनलों पे सुन लिया कभी-कभी तो लोग अभी कहते हैं जिरे बहस बहुत हुई हम तो जिरा अलग है हां उसमें सब तो यही हुआ ना फिर ना ज़ेर ज़ेर ज़बर पेश जैसे आप मेरे ऐसे ना करें अली कौन से ऐसे जिम चेक है? यहां तक क्या थे तुम? हमारी भी पे अटक जाते हैं। ये तो जिम पे जाते ही इसको लगता है। बहुत बढ़िया था यार। क्लच में ले लिए तुम। अगली चिट्ठी है बंजारा डोडा की। क्लच में ले लिए तुमको बोलते थे कि कंट्रोल में। हां वो तो है और डराते गियर बदल देंगे तुम्हारा। हम ये हड़काना होता है तुम्हारा। गियर बदल देंगे। ले लिया है। गाड़ी को भी धमकाने में ले आए लोग। बंजारा डोडा की चिट्ठी। ताऊ खानचा और सरदार को जय राम जी की देखो एसो है कि हमने सीजन वन से शुरू करके सीजन टू तक सब निपटाए दे गए हैं। एपिसोड 138 में किस्से सुने ब्रश के तो यूरोमाओ किस्सा दांत घिसन वाले टूथब्रश का। बात अब ऐसे कुछ दिन पहले की है जब हम किसी दूसरे शहर में एक पीजी में रह थे। ऑफिस के पास होइबे के कारण हमने ले लो एक शेयरिंग में पीजी एक 22 23 साल के नए लौंडे के साथ। तो भैया जो हम रूममेट हतो उनके जाने के समस्या हति साफ सफाई से भैया ना तो ट्रिमर चलाए के बाद वाश बेसिन साफ करत हतो और ना ही मल त्याग के बाद ससुर क्लश करत हत बाजी दायन हमने कही होसे कि लल्लन नेक साफ साफ सफाई में क्या समस्या है तो हमेशा कहने लगे भैया करो तो हतो हमने तीन चार दाइन समझाओ ओके लेकिन ससुर को नाती मानो नहीं फिर कहा तो एक दिन हम नहान जा रहते तो देखो फिर इनने फ्लश नहीं करो है तो हमारी सूझी तरकीब हमने उठाओ टूथरस जो धरो तो भीतर हमने पहले साफ करो वास बेसिन फिर साफ करो कमोड और फिर हमने करो हम प्लस एक बेहतरीन गर्जना के संग कि प्लस फॉर वन लास्ट टाइम अब जब हम होके देखत हते शनिवार इतवार को बरस करत तो लल्ला का बताएं जो खुशी होत हति का बताएं बहुत ही गंदा फिलहाल के लाने यही हम किस्सो अगली द बताई है कोई और किस्सो रिगार्ड्स बंजारा डोडा डोडा इससे भयानक बदला मैंने नहीं देखा। ये सही है यार। इसका नाम धोधा होना चाहिए कि धो ढाला। अब आज के बाद मैं डोडा बर्फी नहीं खा पाऊंगा। अरे मैं भ्रष्ट खैर बदला अच्छा था। हम मुझे पसंद आया। कई होटलों में आपकी अनुपस्थिति में हम जब आपके कमरे को सेट किया जाता है बहुत सारी चीजें इस्तेमाल कर ली जाती है। तो आपका बेसिन वेसिन बड़ा चकाचक होता है जब आप जाते हैं। हम देखिए वही एक ग्लास में आपका ब्रश पड़ा होता है। म कह रहे हैं कह नहीं आप मत डालिए दिमाग में। मुझे घिन आने लगता है। आपको पता है फिर मैं अपना ब्रश जेब में लेके घूमने लगूं। मैं जहां जा रहा हूं मैं नहीं छोडूंगा। लेकिन ये मैंने देखा है होटलों में भी कई बार आपकी चीजें बड़े होटल में नहीं करते। किसे आपकी चीजें इस्तेमाल की गई परफ्यूम यूज़ कर लिया गया है। हां ये सब तो ये सब एक बार ऐसे हुआ था कि मैंने देखा था बड़ा ही होटल था वो और मैं रूम लॉक था तो मैं शायद नीचे कहीं गया था। तो अंदर एक महिला ऑफिस उनके होटल स्टाफ रूम क्लीनिंग सर्विस से तो वो थी और मैंने दरवाजा खोला तो घबरा गई। नहीं नहीं तो चिप्स बचे हुए थे। खा रही थी वो आराम से। उसमें तो अच्छी बात है। कोई बात वैसी नहीं है। लेकिन पर ये जब चिप्स खाने की घटना हो सकती है तो फिर परफ्यूम लगाने की भी हो ही सकती है। ठीक है। इट इज नॉट अबाउट चिप्स। हम इट्स अबाउट द लाइन। सोबर शराबी का पहला अध्याय। अगली चीज भाई साहब नाम हो तो ऐसा ही होगा। सोबर शराबी। तीन ताल के थ्री मॉस्किटियर्स को मेरा साष्टांग दंडवत। अब आप लोग सोचेंगे भला मस्क मॉस्किटियर्स को प्रणाम क्यों? देखिए ताऊ और खानचा अगर इतना लॉजिक मेरे पास होता तो मैं आज खुश थोड़ी रहता। बात जनवरी 2022 की है। कनाडा की हाड़ कपाने वाले स्नोस्टॉर्म का दौर था और मुझे भारत छोड़े हुए मुश्किल से चार-प महीने हुए थे। अब नियम तो आप जानते हैं। सूखा कपड़ा जब पानी में जाता है तो कुछ ज्यादा ही पानी सोख लेता है। मेरे साथ भी ऐसा ही ओवर अब्सॉर्प्शन हुआ। सिक्योरिटी की नौकरी निपटाकर रात 11:00 बजे घर लौटा। लेकिन हमारे जो बुट लेगर भाई थे गुजरात में डिलीवरी करने वाले देवदूत को हम यही कहते हैं। वो रात 1:00 बजे पधारे। फिर क्या था? पीर बाबा का दम किया हुआ पानी, दो गिलास और चखना और टीवी पर जिंदगी ना मिलेगी दोबारा। पारी की शुरुआत बेहद धीमी और संभलकर हुई जैसे पिच पर विकेट टिकाना जरूरी हो। अपनी प्राइवेसी के लिए मेरे साथ बैठे दूसरे साथी को हम यहां नॉन स्ट्र्राइकर कह देते हैं। करीब एक घंटे और बेहद सटीक नाप के साथ कहें तो 150 ml के बाद नॉन स्ट्र्राइकर अपनी धूम्रदंडिका सुलगाने बालकनी में चला गया। वापस आया और हॉल में गद्दे पर ऐसे पसरा कि सीधे कुंभकरण मोड में चला गया। पर भला हो आधुनिक टेक्नोलॉजी का जिसने सात समंदर पार भी अकेलेपन का एहसास नहीं होने दिया। मैंने तुरंत भारत में अपने चार दोस्तों को वीडियो कॉल खटखटा दिया। कुछ देर बाद मैं भी अपनी धूमधंदिका थामे बालकनी की ओर बढ़ा। अब उस बालकनी के दरवाजे की एक बड़ी जादुई खासियत थी। वो सिर्फ अंदर से बंद होता था। ओ अब मैं उस वक्त होश के मुकाम पर तो था नहीं कि दरवाजा बाहर से हाथ में पकड़ कर खड़ा रहता। सो मैं आराम कुर्सी पर धंस गया और दोस्तों से बतियाते हुए कश लगाने लगा और फिर जैसे ही सिगरेट बुझाने के लिए झुका मेरी बत्ती गुल। अगले दिन जब सीधे बेड पर आंख खुली तो पहला ख्याल फोन का आया। आखिर अभी उसकी ईएमआई बाकी थी। फोन बाजू में पड़ा था। सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह था कि कल रात आखिर हुआ क्या? इसी आत्म मंथन के बीच मेरे पेट में सबसे पहले वही हलचल हुई जिसे कहते हैं वोमिटिंग। तभी उन चार दोस्तों में से एक का फोन आया जो कनाडा के ही एक दूसरे प्रोविंस में रहता है। उसने दास्तान सुनाई। उसने बताया कि रात को जब मैं धूम्रदंडिका बुझा रहा था तब मैं खुद भी पूरी तरह बुझ चुका था। उस वक्त बाहर का तापमान था -2 डिग्री। और पीर बाबा के दमके हुए पानी के प्रभाव का आलम देखिए कि आपका यह भाई सिर्फ एक टीशर्ट और ट्रैक पैंट में बाहर अचेत पड़ा था। दोस्त ने कहा कि अगर 5 मिनट और कॉल लेट हो जाती तो मैं सीधा 911 पर कॉल घुमा देता। लेकिन भला उस इंजीनियर का जिसने वह बालकनी का दरवाजा बनाया था। वीडियो कॉल पर दोस्तों के चीखने चिल्लाने की आवाज और खुले दरवाजे से अंदर घुसती बर्फीली हवा ने आखिरकार हमारे सोते हुए नॉन स्ट्राइकर को जगा दिया। वो भागता हुआ बालकनी में आया। जैसे ही मुझे उठाने के लिए पास पहुंचा, मैंने नशे में ही एक ऐसी करवट ली कि फोन सीधे नौवीं मंजिल से नीचे फ्री फॉल कर गया। खैर नॉन स्ट्राइकर ने पहले मुझे घसीट कर बेड पर डाला। फिर सुबह के 4:00 बजे कड़कती ठंड में नीचे फोन ढूंढने भागा। ऊपर वाले की असीम अनुकंपा और यूएजी के मजबूत कवर ने कमाल कर दिया। फोन नीचे की गीली मिट्टी पर गिरा था। इसलिए सुरक्षित बच गया। आफत यह थी कि भारत और दूसरी तरफ लाइन पर बैठे दोस्तों को यह नहीं पता था कि मैं जिंदा हूं या नहीं। क्योंकि फोन गिरते ही वाई-फाई डिस्कनेक्ट हो गया। जैसे ही नॉन स्ट्र्राइकर फोन ढूंढ कर लाया, वाई-फाई कनेक्ट हुआ, तड़ातड़ कॉल्स की बाढ़ आ गई, तब जाकर संदेश दिया गया कि बल्लेबाज अभी जीवित है। बस रिटायर्ड हर्ट होकर के वापस पवेलियन लौट आया है। आपका अपना सोबर शराबी जय हो। खानचा अपने अनुभव बताएं। अभी हम जिंदा हैं। इसको देख के भाई बहुत ही भाई टेस्ट मैच के प्लेयर हैं। -2 डिग्री है। टीशर्ट और बच गए गुरु सोते रहो सोबर सोते रहो लेकिन देखिए हम बोल नहीं सकते पर जान क्यों बची सब जान रहे हैं नहीं नहीं ये सब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है उस दिन निकल नहीं नहीं जान जो सांसद में पड़ी थी ना वो भी सब जान रहे हैं क्यों पड़ी थी वो भी बात है फसा है मतलब क्या बोला जाए तुम ने ही जख्म दिया है तुम्ही सेवा तुम्ही ने दर्द दिया है तुम ही दवा देना गरीब जान के हमको ना तुम दबा देना नहीं ऐसा नहीं होगा कुछ और होगा दिस डजंट साउंड ऐसे बिहार में हम लोग दवा ही देते हैं बाय द वे मर्ज की दमन का हर मर्ज की भी दवा होती है और डॉक्टर भी आपको दवा देते हैं हम गांव में कहते हैं दवा दारू चलती रहनी चाहिए दवा वहां चीज हमारे कुत्ते है ही ये क्यों कहा जाता है ताऊ क्या कि बीमार होने की अरे दवा दारू करो सही हो जाएगा कौन कहते थे? दारू कहते थे दवा को ही। वही तो बदनाम कर दिया लोगों ने। आगे चलो। नहीं वो शेर बहुत अच्छा है। कैसे है वो? तेरा क्या भरोसा है चारा घर? हम तेरी नवाजिशें मुख्तसर तेरा क्या भरोसा है चारा घर। मेरा दर्द और बढ़ा ना दे। नहीं वो शुरू कैसे है? ये चित्रित वाला है ना चित्र। मुझे छोड़ ना मतलब ये फरीदा। मुझे छोड़ दे हाल पर तेरा क्या भरोसा है? चार अगर तेरी नवाजिश मुफ्तर मेरा मेरा दर्द और बढ़ा ना दे मतलब कि भैया ऐसा हमको रहने दो जैसे हमें बहुत ज्यादा दवाई इलाज करने की सहलाने की मरहम लगाने की जरूरत ना पड़े ये जो नवाजिश मुख्तसर है तुम तो अभी 10 मिनट के लिए आए हो बेटा ये पट्टी कर दे और बीमार कर दोगे तो हां इससे जो है जख्म हरा हो जाएगा बात ना करो जख्म की दर्द मंदे इश्करा दारू बजुज दीदार नी चुप रहो दर्दमंद इश्क रा दारू बजुज दीदार नी मतलब इश्क का दर्द जिनको हुआ है उनकी दवा जो है वो दीदार के अलावा कुछ नहीं है हां ये तो सच है काफिर इश्कम मुसलमानी मरा दरदा दरकार नी काफिर इश्कम मुसलमानी मरा दरकार नी मतलब कि मैं इश्क में काफिर हो गया हूं। मुझे मुसलमान की जरूरत नहीं है। हर रग मन तार गस्ता हाजत जुन्नार नस्त कि मेरे मेरा जितना रग है ना वो सब में तार है तो मुझे जनेयू की जरूरत नहीं है। वाह कहां से पढ़ते हैं साहब आप? अज सरे बालने मन बरखेज ए नादा तबीब तू अच्छा कर नहीं सकता। मैं अच्छा हो नहीं सकता। यजी मियां कहते हैं। पर उसकी लाइन ऐसे है अ सरे बालने मन बरखेज ए नादान तबीब कि अरे मेरे तकिए से दूर जाओ ये डॉक्टर हम नादान हो तुम अज सर बालीने मन मेरे तकिए के सिराहाने से दूर हटो दूर हटो ए नादान डॉक्टर दर्द मंदे इश्करा दारू बजुज दीदार नी अच्छा लगा दीदार के अलावा के इस दर्दमंद का कोई दारू नहीं। इलाज नहीं है। दारू नहीं है। दारू तो है भाई। दवा मतलब हां वही दर्दमंद इश्क रहा दारू बज दीदार नहीं। डॉक्टर को कहा जा रहा है कि दूर हो जाओ मेरे मेरे सिरहाने से जाओ यार तुम। तुम्हें दीदार ही वही बैठा रहता था ना डॉक्टर। ओ वक्त बहुत कम बचा है। हम ये खैर बहुत बढ़िया था। लेकिन कहां से आपको याद रहता है इतना उर्दू? ये वो अमीर खुसरो है। फारसी का है। कौन खुसरो का ही है। क्योंकि जनेऊने के बारे में और कौन फारसी में जानता है? कुणाल मिश्रा की चिट्ठी जय हो। कृपया एपिसोड की शुरुआत में एक जन लेकिन ये बहुत अच्छा है कि हर रग जो है ना मेरा वो तार है वही धागा है। तो हमको जनेऊ की आवश्यकता नहीं है। और मुसलमानी की भी जरूरत नहीं है। नहीं है क्योंकि मैं इश्क में काफिर। काफिर इश्क का मुसलमान ही मरा दरकार नहीं। इट डोंट नीड। बहुत एंगर था उस आदमी में। मोहब्बत था। नौबत में हां जो भी है हम कुणाल मिश्रा ने लिखा है जय हो कृपया एपिसोड की शुरुआत में एक जनहित सूचना अवश्य प्रसारित किया करें। जिन श्रोताओं की हाल फिलहाल में कोई सर्जरी हुई हो वे पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद ही तीन ताल सुने। इस पॉडकास्ट में हंसी कई बार नियंत्रण से बाहर हो सकती है जिसके परिणाम स्वरूप टांके खुलने की आशंका बनी रहती है। बाद में जब आप डॉक्टर के पास पहुंचते हैं और डॉक्टर पूछता है कि हुआ क्या था? तो तीन ताल सुन रहा था जैसा कारण चिकित्सा विज्ञान की पुस्तकों में दर्ज नहीं मिलता। इलाही क्या कयामत है कि वो जब लेते हैं अंगड़ाई। इलाही क्या कयामत क्या कयामत है वो जब लेते हैं अंगड़ाई। मेरे सीने में जख्मों के सब टांके टूट जाते हैं। ओ हो हो नींद नहीं आएगी आज। चीर देंगे आप लोग। टांके टूट गए। खोल दिया। नहीं ये मुझे बहुत अच्छा लगता है कि अंगड़ाई वो ले रहे हैं टांके इधर कूट रहे हैं। बहुत अच्छा है। तो इसी ये सारी चीज़ इश्क में होती है ताऊ। हम दर्द मंदे इश्करा क्या बात है। दर्द भरी शायरी हम ये यार मुझे इतने उल्लास के साथ सुनाते हैं। हां। मुझे अतुल ने जीजा साली वाली कौन सी है? टक्कर। टक्कर वाली एक शायरी की किताब दी है। यार मैं उसको पढ़ नहीं पाया हूं। मैं उसकी उसका अध्ययन और उसका विश्लेषण करना चाहता हूं। पर आपसे वहां क्रिटिकल हां क्रिटिकल करिए और उस पर फिर इसमें चर्चा करेंगे और उस जमीन पर आई एम श्योर आप कुछ नया भी कह सकते हैं। उस जमीन पे मैं अपने पौधे उगाऊंगा। हां लेकिन वो बहुत बेतरर्ती है पर हैं पौधे अच्छे पौधे। ठीक है। मैं अपनी गइयां भेजूंगा। आई लव द ग्रीस। मैं चाहिए गैया भेजूंगा चरने के लिए वो पौधों। क्या है? साली टक्कर। कहां मिलती है? बस स्टैंड पे। ठीक है। खली गोरखपुर में तो मिलती होगी। हां। यू शुड हैव गॉट टू कॉपीज। तीन हम वो पढ़ेंगे। खलिय आई हैव अ कॉपी। आई विल गिव इट टू यू। खलियर मुन्नू इलाहाबाद से लिखा। मुन्नू खलियर मुन्नू। मुन्नू मेरा भी घर का नाम है। क्या बात कर रहे हैं? अम्मी मेरी बुलाती थी। तू आप भी खलियर ही थे। हां हर आदमी खलिय समय। तीन ताल के तीनों युवाओं को जय हो। मैं सड़क निर्माण के क्षेत्र में कार्यरत एक निजी संस्था का कर्मचारी हूं और दैनिक कामकाज से संबंधित आंतरिक संचार और परियोजनाओं के संदर्भ में बाहरी सरकारी विभाग को भेजे जाने वाले पत्राचार की ड्राफ्टिंग का कार्य पिछले तीन-चार वर्षों से काफी हद तक देखता आया हूं। भाई आई एम ये Google से तो नहीं ट्रांसलेट किया है। पत्राचार वगैरह। विगत एक वर्ष से मैंने इस बात का अवलोकन किया है कि मेरी संस्था के जो लोग पहले ड्राफ्टिंग की प्रक्रिया और प्रतिबद्धता के साथ सीखने की कोशिश करते थे वे अब चैट जीपीटी और ग्रामरली जैसे एआई टूल्स की शरण में पहुंच गए हैं। खराब तो तब लगा खानचा जब एक बार एक ड्राफ्ट तैयार करके मैं बॉस के पास ले गया और उन्होंने उन्होंने भी कहा कि यार चैट जीपीटी पर डाल कर देखो शायद और अच्छा हो जाए। वापस गया तो मालूम हुआ कि एक दूसरे साथी जो विगत वर्षों में मुझसे ड्राफ्टिंग पर सलाह लिया करते थे। कहा चैट जीपीटी से तैयार किया हुआ ड्राफ्ट पास हो गया। खराब इसलिए लगा क्योंकि पहले ऐसा कभी नहीं हुआ करता था। आमतौर पर मेरे द्वारा तैयार किए गए ड्राफ्ट पर थोड़ी बहुत हेरफेर या मामूली संशोधन के बाद उसे मंजूरी दे दी जाती थी। निवेदन है कि तीनों कभी इस विषय पर बात करें क्योंकि आप लोग भी जनसंचार के क्षेत्र से जुड़े हैं। साथ ही मैं चाहता हूं कि ताऊ क्रिटिकल थिंकिंग में लिखने की प्रवृत्ति के योगदान और फ्री एसोसिएटिव राइटिंग के बारे में भी बात करें। मुझे लगता है कि यह चर्चा आज के समय में प्रासंगिक होगी जब लिखने और सोचने की प्रक्रिया धीरे-धीरे मशीनों को सौंपी जा रही है और कुछ और भी बहुत कुछ लिखना चाहता हूं। लेकिन आज के लिए इतना ही खलियर मुन्नू इलाहाबाद जय हो जय हो जय हो मुन्नू चैटिपटी सभी यूज़ कर रहे हैं यार। बुराई क्या है? बुरा बुराई नहीं है पर वही है कि अपन पीढ़ी दर पीढ़ी ना कमजोर होते जाएंगे। हम सृजन हम एज अ स्किल और वो उस पर संकट है सृजन पर। अरे भाई 10,000 वर्ड लिखते थे ना आप। 5000 वर्ड आप लिखते थे ना 2000, 500, 300 लिखना पड़ता था ना लिखते थे। अब आप आसान रास्ता चुन लेंगे और ये होगा कि भाई क्यों नहीं हम चुने? जब मेरे पास कार है तो मैं बैलगाड़ी से क्यों जाऊं? बिल्कुल। यू नो बट एक्चुअली आपके पास कार थी। आपके पास बैलगाड़ी ऐसा जरूरी जरूरी नहीं है। आपने चलाई नहीं आपको प्रॉब्लम था। नहीं आपके पास कार थी। आपको ईवी दे दिया गया। बैटरी से चार्ज होने वाला है। अरे फिर एथेनॉल पे आएंगे यार। है ना? नहीं तो आपका हैंड आई कोऑर्डिनेशन गियर वियर सब भूल गए ना आप। ऑटोमेटिक गाड़ी चलाने के बाद थोड़े दिनों में जब आपको गियर वाली गाड़ी पकड़ा देंगे तो करके आवाज करेगी। रुक जाएगी वो। तीनों के पास वही है। ठीक है ना? तो किसी नहीं वो बोल रहा हूं। यही होता है। जैसे आप ये कहते हैं ना कि नहीं भूलेंगे कैसे? दिक्कत होती है। तो चलाए हुए हैं। भूलेंगे कैसे? लेकिन एक दिन बैठ देते हैं आपको बिल्कुल ठीक है इट विल टेक एन आवर हाफ एन आवर यस यस टू अंडरस्टैंड्री ठीक बात है अगली चिट्ठी है पार्थ वृष्टि पटेल की प्रिय ककुआ कमलेश कुलदीप आसिफ पिछले दिनों खुजली पर आपका इतना गहन विचार विमर्श सुनते हुए मुझे भी एक कहानी याद आ गई हमारी जो पार्टनर हैं जब हम दोनों नए-नए प्यार में पड़े थे तब मैंने सोचा कि उन्हें थोड़ा बहाल करूं। गुजराती में बहाल करना उस प्यार भरे स्पर्श को कहते हैं जब हम किसी प्रिय व्यक्ति या वस्तु को स्नेह से सहलाते हैं। तो मैंने भी उनकी पीठ पर प्यार से हाथ फेरा। ऐसा जादू हुआ कि आज छ साल बाद भी अगर मैं रोज उन्हें इस तरह खुजली ना करूं तो वह उदास हो जाती हैं। अगर हम दोनों साथ बैठे हो और मेरे हाथ खाली हो तो बिना कुछ कहे ही यह समझ लिया जाता है कि तुम्हारे हाथ इसी कर्म के लिए बने हैं। पार्थ बढ़ाओ हाथ। सप्रेम पार्थ वृष्टि पटेल। बहुत ही खूबसूरत यार। ये स्क्रैच में बैक वाला था ना हां बस इसमें इतना ही है। आई स्क्रैच यर्स वाला मामला है। ये प्यार है बहुत प्यारा सा। वो कहते हैं ना कि रोएंगे देखकर वो बिस्तर की हर शिकन को हम वो हाल लिख चला हूं करवट बदल बदल के। भाई साहब आंसू निकल रहे हैं रास्ते बदल बदल के। हां तो वो एक इबारत तो वो होती है ना जो आपने नाखून से नहीं पर अपनी उंगलियों की शिराओं से किसी पीठ पर उकेरी थी हम और वो अगर आपको याद रहता है अगर आप रोज करते हैं किसी को भी स्नेह से हम यू नो तो वो जो पहले दिन का एहसास था वो आज भी जिंदा है अगर वो जिंदा जिंदा रह सकता है क्योंकि उन्हीं क्षेत्र को वही क्षेत्र छुवन से गुजरेंगे जो पहले गुजर चुके हैं। छूना स्पर्श जो है ना वो जानवरों से लेकर सब में एक फमिलियर बिल्कुल बिल्कुल वो जो है ना तो आपका कैट भी है ना वो भी आके आपको छूने का कोशिश की कोशिश करता है और वो चाहता है कि आप उसे छूए सहलाएं बहाल करते रहें बहाल करते रहें और मोहब्बत बहाल करते रहें आ मोहब्बत जिंदाबाद स्पर्श स्नेह जिंदाबाद अगर यही हम किए होते तो आप बोलते तुमको बीम ारी है खुजाने की अपना तो प्रॉब्लम है भाई नहीं आदमी हमेशा देखना खुजाता अपना है दूसरों को खुजली करता है हम या फिर तो खुज भी बोलते खुजाता अपना दूसरों को खुजली करता आप मुझे नहीं खुजा सकते आप मेरी खुजली मिटा सकते हम यार वो मुझे याद आ गया वो बनाने स्केच वाले और उससे कि याद है गुलजार साहब नहीं कहते याद है तुमने मेरी बेस पे बैठे-बैठे सिगरेट की डिबिया पे स्केच बनाया आया था। आओ स्केच में पौधे में फूल आया है। आओ लेकिन आप उसको कविता के भाव से पढ़ना भूल जाइए। नॉर्मल पढ़ के देखिए एकदम कविता लगती नहीं है। जैसे उन्होंने कहा लकीर हैं तो रहने दो। किसी ने गुस्से में आके खींच दी। खींच दी होंगी। आओ बनाए पाला खेलें। कुछ भी गुलजार की कविताओं को आप भारी आवाज में पढ़ना बंद। उनकी बहुत अच्छी कविताएं हैं। बहुत शानदार लिरिस बल्ली मारा के अब जैसे वो है चलता हूं वो नहीं घोड़ा अपना अरबी है। चलता है मेहरौली में पर घोड़ा अपना अरबी है। अ ज्योग्राफी के मामले में वो कहीं कुछ भी सेट कर लेते हैं। बल्ली मारा से दरीबे तलक तेरी मेरी निशानी दिल्ली में। तो वो बहुत ज्यादा क्षेत्रीय हो जाते हैं। ऐसे वहां पेली की जरूरत क्या थी जहां गजरारे गजरारे का था ना ये हां है ना पर आप हाउ विल यू इस्टैब्लिश कि आई हैव एन अरेबियन हॉर्स क्योंकि चल तो मेहरौली में रहा है ना मेहरौली बहुत जैसे चलता है वो दिल्ली में भी हो सकता था या किसी बड़े शहर का हो सकता है तो वो मैं कह रहा हूं वो लोकलाइज कर लोकलाइज करते हैं जिससे ये तो हर हर राइटिंग की खूबसूरती होती है पर उनकी कुछ कविताएं हैं जिनको भारी आवाज में अगर आप नहीं पढ़ें ऐसे कहने के अंदान कह दे तो एकदम ना ट्रिविलाइज हो जाती हैं वो। खैर आई होप वो ना सुने ये मैं उनका फैन हूं। हां हां नहीं क्योंकि गीली हंसी जो होती है ना हम हम वो ऐसे तो लगता है कि क्या हंसी सूखी हंसी क्या होती है पर होती है ना हम गीली हंसी होती है हम होती है और गीली हंसी में आंखें जो हैं वो देखने लायक होती है हम क्योंकि आप हां कैसी होती है बताइए गीली हंसी क्योंकि और कहां गीला होता है हंसी में आप खुश हैं थोड़ा दर्द भी है तो वहां गीले हो जाते आंख गीली है, हंसी है। लेकिन हंसी भी है, खुशी है। अच्छा वो गीली हंसी भी है। ठीक है। वो गीली हंसी भी हो सकती है। हम खुशी के जो आंसू निकलते हैं उसमें आप हंसे तो गीली हंसी उसे कहा जा सकता है। हम तो अब लोगों को ऐसे लगता है यार क्या गीली हंसी और अगर आपको पी लिया हुआ है उस समय आप वो नीली हंसी भी पीली हंसी होगी। नीली हंसी पीली हंसी भी पूछ जाते सांप डस की आंख नीला पड़ गया हो तो नीली हंसी उसमें भी अगर आप हंस रहे हैं। पीली हंसी भी है। पीली नहीं पर उसका काम यही होता है ना कि जो आप कल्पना नहीं कर रहे हैं कवि का काम क्या है? जहां ना पहुंचे रवि हम वहां पहुंचे कवि। तो जहां ना पहुंचे रवि का मतलब क्या होता है? जल्दी द लेट। हम जहां ना पहुंचे रवि का मतलब होता है जहां तक सूरज की रोशनी नहीं पहुंची है उधर तक पहुंचाना और एक यह मतलब भी है कि कल्पनाओं से परे तो आपने नहीं सोचा था कि ये हो सकता है पर मैंने लिख दिया तो आपने इमेजिन तो कर लिया ना मेरा काम हो गया कभी जिंदगी ने बोला पिंजरे में चांद ला दो कभी लाल टिन देके बोला आसमा में टांग गई गुलजारी लिखते थे हां नहीं लौटा दे अम्र टिकट टू हॉलीवुड ये गुलजार का लिखा सामने आए मेरे और देखा और बात भी की और मुस्कुराए भी किसी पुरानी पहचान खातिर कल का अखबार था देख लिया रख दिया अब बताइए कविता भी पर कविता है अभी इसी को पढ़ दूंगा भारी आवाज में तो आपके चेहरे पे गीली हंसी आ जाएगी कमबख्त जो शब्द है वो कमबख्त वैसे गिना जाता है उसका मोहब्बत से कोई लेना देना नहीं लेकिन उन्होंने गाना लिखा था कमबख्त इश्क है जो सारा कमबख्त इश्क है जो सारा ज क्या लिखा था यार और ने जो गाया है मुझे मतलब खैर जीवित लोगों में वैसे तो साहिर शैलेंद्र मजरू साहब ये सब मेरे पसंदीदा बॉलीवुड लिरिसिस्ट हैं पर मैं जिनको अपनी पीढ़ी का कहूंगा उसमें तो गुलजार साहब ही बेस्ट उसमें कोई गुलजार साहब जावेद अख्तर बट कुछ ज्यादा साहब कमबख्त इश्क जब आप कहते हैं ना तो आप इश्क से एक फमिलियरिटी दर्शाते हैं। हम इश्क से एक दोस्ताना रिश्ता भी दिखलाते हैं। और ये भी कि ये काबू करने इसको क्लच में नहीं लिया जा सकता साहब। ये कमबख्त है ये साला थोड़ा फ्री है। इश्क से मेरी नजदीकियां हैं। मैं उसे कमबख्त कह रहा हूं। हम कमबख्त आदमी जनरली उसको कहता है जो उसको बहुत प्यारा होता है। नहीं तो आप इस प्यारे को कमबख्त कहने नहीं आउट ऑफ कंट्रोल प्यारे को भी नहीं कमबख्त बीच का शब्द है जो बीच का नहीं मानता नहीं है मेरी कमबख्त इश्क है जो अनुशासन नहीं है वक्त खराब होता है वरना सब कुछ ठीक हो जाता आदमी बोलता हां ठीक है अगली चिट्ठी है रोता लकड़बग्घा की तीन ताल के त्रिस्तंभों को नमस्कार बोलता बनारस का रहने वाला क्राइंग हाई है ना क्राइंग वुल्फ होता है एनीवे लकड़बग्घा तो हाईना होगा हाईना होगा हाई ना बोलो बुल आपने हाईना देखा है? आपने तो देखा इंडिया में स्ट्राइप हना मिलते हैं। स्पॉटेड नहीं मैं मूल मूलत बनारस का रहने वाला हूं और दिसंबर 2022 की बात है। हम लोग भाई की शादी की खरीदारी में लगे थे। तभी एक ठंडई की दुकान दिखाई दी। हम हालांकि उस दिन तक मैंने किसी प्रकार के मादक पदार्थ का सेवन नहीं किया था। लेकिन दिमाग में विचार आया कि बनारस का होने के नाते एक बार विजया का गोला फकना तो लगभग राइट ऑफ पैसेज जैसा ही है। बस फिर क्या था? दो गिलास ठंडाई के साथ दो गोले अंदर कर लिए। बस जय भोले। उस दिन की व्यस्तता इतनी ज्यादा थी कि शॉपिंग करते-करते हम लोग गोले के बारे में पूरी तरह भूल गए। करीब एक घंटे बाद जब सारी खरीदारी निपटाकर गाड़ी में बैठे तो सर चकराने लगा। तब लगा लो हो ही गए बीमार। उस समय तक यह ध्यान ही नहीं आया था कि गोले ने अपना परिचय देना शुरू किया है। घर पहुंचे तो बिना खाए पिए सो गए। ठंड का मौसम था और रजाई ऐसी भारी कि जिस अवस्था में सो जाओ उसी में पड़े रहो। करवट लेने की संभावना लगभग शून्य थी। कुछ देर बाद ऐसा प्रतीत हुआ कि इंद्रधनुष ने हमारे घर में ही डेरा जमा लिया है। और तो और इंद्रधनुष के रंग भी ऐसे ऐसे थे जिनका प्रकृति में शायद अस्तित्व ही नहीं है। तभी याद आया कि यह सब गोले का प्रताप है। फिर क्या-क्या नहीं देखा। खुद के शरीर से आत्मा निकलती दिखाई दी। उसके बाद उसे किसी तरह वापस शरीर में खींचने का प्रयास किया। यह पूरा घटना घटनाक्रम लगभग एक घंटे तक चला। घर में किसी को पता नहीं था कि मैं भांग खाकर आया हूं सिवाय भाई के और वह भी शायद तब तक भूल चुका था। कुछ देर बाद भाई ने आकर जगाया और बोला शाम हो गई है उठो चाय और चूड़ा मटर खा लो। अब दृश्य की कल्पना कीजिए। सामने वालों को दिख रहा था कि मेरे बाएं हाथ में चूड़ा मटर की प्लेट है। दाएं हाथ में चम्मच। लेकिन मुझे दिखाई दे रहा था कि मेरे दो बाएं हाथ हैं और दोनों में प्लेट है। इतना ही नहीं तीन दाएं हाथ भी मौजूद थे और तीनों में चम्मच था। अब दुविधा यह थी कि समझ नहीं आ रहा था कि किस चम्मच वाले हाथ को किस प्लेट में निशाना साधने भेजूं ताकि चूड़ा मटर सही तरीके से चम्मच में आए और स्वाद का आनंद लिया जाए। इसी कशमकश में जिंदगी गुजरी बाद मरने के मेरी मयत पे लगा है। इसी कशमकश में लगभग आधा घंटा बीत गया। किसी तरह स्थिति को छिपाते छिपाते समय निकाला और शाम को भाइयों के साथ टहलने निकल गया। इसके बाद जो भी ठेला दिखाई देता वहीं रुक कर टूट पड़ता। समोसा, जलेबी, मैगी, चाय, कॉफी, नींबू, चाय, चाउमीन कुछ नहीं छोड़ा। कहानियां बहुत है। आज के लिए इतना ही। आप लोगों की सेवा में रोता लकड़बका मत रो मेरे दिल याद होता होगा। चुप हो जा हुआ जो हुआ। यही तो छोड़ दो गुरु जो हुआ अच्छा हुआ। बहुत लगभग मेरे विजया हम वहां विश्राम भी मिलता है। क्यों है? हम्म। इसे खाकर तो विजय नहीं प्राप्त की जा सकती किसी पर। आपका रिफ्लेक्सेस स्लो हो जाते हैं। इट काइंड बी विजय। विजया आप पर विजय नहीं सकते। हावी हो जाएगी। हम हां तो वही तो विजया है। नहीं विजया क्यों है वो? आप होते तो विजेता होते। हम विजय टॉकीज़ भी बना। विजया कौन है? विजय टॉकीज़ भी टॉकीज़ मतलब सिनेमा हॉल बनारस में। टॉकीज़ टॉकीज़ के विजया कौन है? विजया जो वही जीती है। जोसेफ विजय वही जीती है। फर्स्ट एक गोली में ही ठंडाई याद आ गई यार। नो नो नो नहीं नहीं ठंडी मिश्रांबू वाली जो फिगर उसके भी मिलती है। व्हाट इज मिश्रामू? मिश्रांबू एक ब्रांड है। ठंडाई जो है वो बोतल में आती है। हां घर में बना सकते हैं उसका वर्जन। दो ढक्कन नहीं होता। पर वहां पे घोट करके भी आपको जो है उसमें दो गोले मारने की जरूरत नहीं है। अगर आप बनारस में हैं और विजया का आनंद लेना चाहते हैं जो देवानंद के भाई हम कोई जान तो आप जो है उनको बोलिए वो मॉडेस्ट मात्रा में घोट के ही दे देंगे आपके ठंडाई में ही आप पी लें ये गोले मारने वाले जो होते हैं ना वो जगह है लहरावीर वहां पे कॉर्नर पे दुकान थी शामू देते थे वो केसर वाली आ हा पर क्या इसमें ऐसा तो कुछ नहीं है कि कुछ वॉर वॉर में यूज़ किया जाता हो मतलब कि जो हां हां हो सकता है कि मतलब जीत जरूर होता है ना होता होगा कुछ राजाओं के समय कि ये विजय क्योंकि युद्ध उसमें तरह-तरह के पदार्थों का सेवन होता था। उसमें वहीं से हो सकता भांग धतूरा एनर्जी एनर्जी देता था ना और दिशासुर एनर्जी से ज्यादा जरूरी होती है मृत्यु से भय नहीं होना हां हम आपको अभी जो लगता है ना वॉर ऐसे वॉर नहीं होते थे। पहले सामने चाकू लेके खड़े रहते थे। तलवार लेके खड़े रहते थे। अब भाई आपका हाथ कट जाता था। दर्द होता था। आप तो ये उदाहरें मौजूद थे जब उसे दर्द नहीं कहते भाई भाई साहब। उसे दर्द नहीं कहते। दर्द होता है। दर्द होता है। नहीं देखो दर्द तो होता है पैर में चोट लग गया उसमें। उसमें क्या होता था आप मस्त हो। तलवार तुम लेके आओ। हम लेके आए। आओ साले आओ लगा ही दिया एक दूसरे को। कट पिट गया तो हल्काफुल्का दर्द वो पेन किलर का काम करता था। अरे मैंने बताया था मेरे चाचा थे मेोरपुर एक जगह है हमारे घर से करीब। मेरपुर मेयूरपुर मेोर तो ऐसे ही है 16 17 कि.मी. दूरी पे Suzuki मैक्स बाइक आती थी ताऊ को पता होगा पूरे वो अपना भांग का सेवन किए हुए थे और सीधा मेरपे मोड़मोड़ हुए तो मोड़ में मुड़े उनको मुड़ना दिखाई नहीं दिया पेड़ में लेके हेड ऑन ठीक है। पूरा नाक उनके पूरे दांत बाहरकि वो सेवन किए हुए थे और एक बंदा उनके साथ और था संतोष नाम था। उसको उठाए उसको बांधे और हस्पताल दुधी ले चले आए अगर वो सेवन नहीं हुआ होता तो उनके प्राण पखेड़ो निकल सकते थे उस समय वो दर्द यही जंग वाली बात डोंट ट्राई नहीं नहीं मैं कह रहा हूं बिल्कुल ये गलत मैं तो किस्सा बता रहा हूं ऐसा नहीं है कि हां इसका सेवन करके आप चले पुलिस चालान कर देगी नहीं अरे यार चला प्रकृति चालान कर देगी चला चलाचली की वेला आ जाएगी दैट इज व्हाई सेवन को थालापुर रीजन कहते हैं गुणनिधि शर्मा की चिट्ठी अगली ताऊ खानशाह सरदार को प्रणाम। हाल में तीन ताल देखना शुरू किया। रोहित शर्मा वाले एपिसोड में अंग्रेजों द्वारा भारतीयों से पूछे जाने वाले अजीबोगरीब सवालों की चर्चा हो रही थी। तो उससे जुड़ा एक किस्सा। हाल ही में हमारे पड़ोस में एक अंग्रेज दंपति रहने आए हैं। उम्र हो गई कोई 50-5 साल। एक दिन रविवार को उन्हें घर पर दोपहर के लिए खाने पर बुलाया। रोटी का आटा गूंथते देखकर वह हैरान हो गए। उन्होंने कहा कि क्या आप लोग कल के लिए तैयारी कर रहे हैं? क्योंकि हमारे यहां तो इस तरह का आटा रात भर रखा जाता है और अगले दिन फिर इस्तेमाल किया जाता है। जब हमने उन्हें बताया कि यह तो अभी सब्जी के साथ खाने के लिए रोटियां बनाने का आटा है तो वह बड़े उत्सुक होकर देखने लगे कि इससे रोटी यानी उनकी भाषा में कहें तो ब्रेड कैसे बनेगी। फिर हमने बताया कि इसी आटे में आलू गोभी जैसी चीजों की स्टफिंग भरकर पराठे भी बनाए जाते हैं। लेकिन वह प्रदर्शन किसी और दिन के लिए बचाकर रखा गया। रोटी और नमक, मिर्च, अजवाइन वाले पराठे चिकन करी के साथ खाकर वह बहुत खुश हुए। खाते-खाते बार-बार पूछते रहे कि इतनी साधारण सामग्री से इतनी अलग-अलग चीजें कैसे बन जाती हैं? जय हो जय हो जय हो। गुणनिधि शर्मा तीन तालिया मेलबर्न से मूल निवासी पंचकूला हरियाणा। अपना देश का स्वाद ही इतना अच्छा है मसालों का कि कोई भी खाए। रोटी उनके लिए तो अद्भुत चीज होती है ना कि आपने वहीं पे आटा गदा और वहीं रोटी बना ली। वो तो ब्रेड खाते हैं ना। नहीं तो फर्मेंट होता है वो यीस्ट। हम हम यीस्ट यीस्ट राइज करता है हमारे यहां ईस्ट में जो है राइज करता है सन हम उनके यहां और उसके पहले ही अपन फुला लेते हैं रोटी फुल का तो आज की चिट्ठियां इतनी ही कुछ चिट्ठियां और रह गई हां हां हर बार तुम यही करते अरे भैया इतनी सारी चिट्ठियां चिट्ठी के एपिसोड से ज्यादा चिट्ठियां ली है आज हमने चिट्ठी के एपिसोड में तो चिट्ठी आई है चिट्ठी गरियाया गया है कि जो है धोखा कर दिया भाई तो radio aaj.com पर चिट्ठियां लिखते रहिए। ttstf.in पोर्टल पर भी अपनी चिट्ठियां लिखते रहिए। YouTube कमेंट तो आप करते ही हैं। सबसे आसान इजी तरीका तुरंत सब लोगों तक पहुंच जाता है। और फिर से याद दिला देते हैं कि 4 जुलाई को हम लोग जयपुर में होंगे। कोई ऐसा ऑफिशियल इवेंट नहीं है। बस एक शहर में होंगे। हां। और एक शाम चुरा लूं अगर बुरा ना लगे। हां हां हां। पर ये कि उसकी एक्सैक्ट डिटेल्स क्योंकि जगह पे होंगे। चुराना तो बहुत मुश्किल है। बहुत गर्मी है वहां पे। हां। गर्मी तो होगी। तो जो डिटेल्स होंगी जहां पर बैठ की होगी वो बता। अगले एपिसोड्स में वो जाहिर हो जाएगा। बिल्कुल। तो फिर तीन ताल के इस एपिसोड में इतना ही। 160 एपिसोड हो गए पूरे। बाप रे बाप। 160 जो है ना चलो जल्दी से। हां। 160 अगले एपिसोड में मुलाकात हो। जय हो जय हो। जय हो। पीताल प्रेजेंटेड बाय धर्म मूल।
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