Summary of Discussion: Pakistan's Identity and its Ancient Heritage
This is a transcript of a deep, multi-faceted conversation on The Black Hole Podcast about Pakistan's struggle with its national identity. The central thesis is that Pakistan suffers from a severe identity crisis by overwhelmingly focusing on its Islamic history starting from 712 AD (Muhammad bin Qasim) while systematically neglecting, or even disowning, its rich, 5,000+ year pre-Islamic heritage, particularly the Indus Valley Civilization: History and Geography Overview.
The discussion features Anjum Dara (Curator of Taxila Museum and archaeologist) and Raza Rumi (columnist and policy analyst), exploring how reclaiming this ancient past could reshape Pakistan's future.
Key Arguments & Themes
1. The Roots of the Identity Crisis
- A Disconnected Past: Pakistan's official national narrative often begins with the arrival of Islam in 712 AD, creating a rupture with the millennia of civilization that preceded it (Mehrgarh, Indus Valley, Gandhara).
- A Flawed Analogy: The conversation uses the analogy of a Christian converting to Islam: while the convert's identity changes, they cannot deny their biological father or grandfather. Similarly, Pakistan cannot simply erase its pre-Islamic cultural and genetic lineage.
- Shifting Aspirations: The speakers note that Pakistan has struggled to define itself, at times trying to be Arab, Turkic, or Central Asian, unable to firmly ground its identity in its geographic and cultural reality.
2. The Indus Valley Civilization: A Lost Foundation
- Scale & Significance: The Indus Valley Civilization (centered on Mohenjo-Daro, Harappa, and Mehrgarh) was larger than its contemporaries in Egypt and Mesopotamia, covering a vast area from Eastern Afghanistan into modern-day India. For a detailed exploration of its key sites and economy, see this Comprehensive Overview of Harappan Civilization: Key Sites, Economy, and Trade.
- Advanced Features: It was a highly advanced urban civilization with sophisticated sanitation, drainage, and water supply systems, often contrasted with the poor infrastructure in modern Pakistani cities like Karachi. The Harappan Civilization: Art, Architecture, Political Systems, and Decline Explained article delves into these remarkable achievements.
- A 'Peaceful' Culture? The speakers discuss the theory that it was a largely peaceful, non-hierarchical society, though they acknowledge much of this interpretation is still conjectural.
- The Undeciphered Script: A major mystery is the Indus Valley script, which remains undeciphered. The conversation suggests this may be hindered by Western academic hegemony or a 'confidential knowledge' agenda, as decoding it could fundamentally change the narrative of the origins of philosophy and wisdom.
3. Ghazwa-e-Hind & The Politics of History
- State Ambivalence: While Pakistan was initially created, there was a primary school curriculum that taught about Mohenjo-Daro and public holidays existed for Hindu and Buddhist festivals, this inclusivity has systematically eroded over the decades.
- Denial of the Aryan Invasion Theory: The discussion links this to modern Indian politics (Hindutva) where the denial of the Aryan migration is a political tool to establish a continuous, indigenous Vedic civilization. In Pakistan, denying the Indus past serves to create a purely 'Islamic' origin story.
- The Cost of Denial: By cutting off its roots, Pakistan's cultural tree cannot flourish. The speakers argue that nations that deny their complex, diverse pasts become weak, intolerant, and fail to grow.
4. The Tangible Loss: Artifacts & Sites
- The Dancing Girl of Mohenjo-Daro: The famous bronze statue of a dancing girl is a point of contention. Conjectured to have African features, the artifact was lent to India in the 1960s for an exhibition. It was never returned after the 1965 war. Pakistan was left with the 'King Priest' statue, a history which former PM Zulfikar Ali Bhutto lamented in a famous statement.
- Neglect of Living Heritage: The conversation highlights that while archaeology has focused on dead mounds, cities like Multan are among the oldest continuously inhabited cities in the world, but their living heritage is often overlooked. The Origins and Characteristics of the Harappan Civilization Explained article provides foundational knowledge on this civilization's beginnings.
- The Murder of an Archaeologist: The tragic story of R.C. Mujumdar, who was shot and killed in 1938 by locals in Sindh while excavating the post-Mohenjo-Daro site of Jhukar, illustrates the long-standing tensions around this heritage.
5. A Path Forward: Inclusive Nationalism
- Owning All of Our Heritage: The speakers argue that Pakistan must embrace its territorial nationalism. A healthy nation can have multiple identities: religious (Muslim), ethnic (Punjabi, Sindhi, Pashtun), and historical (Indus, Gandhara).
- Learning from Neighbors: The discussion points to examples like Egypt, Turkey, and Iran, which are Muslim-majority but proudly promote and profit from their pre-Islamic civilizations (Pharaonic, Greek/Roman, Zoroastrian). Egypt's new Grand Egyptian Museum is a prime example. For more on the influential sites of this period, see Indus Valley Civilization Part 2: Important Sites and Influences.
- The Potential Benefits: Reclaiming this heritage could lead to:
- Economic Gains: A massive boost in tourism revenue (billions of dollars).
- Social Healing: Fostering a more tolerant and pluralistic society by acknowledging the region's entire history.
- Educational Reform: Changing curricula to teach critical thinking and a complete, unbroken history of the land.
चलिए जी शाम ब खैर द ब्लैक होल की तरफ से सामईन और हाजरीन दोनों का शुक्रिया जैसा कि आपको आज का मौजू नजर आ रहा है कि वादी
सिंध की तहजीब और पाकिस्तान की शनाख्त बल्कि शनाख्त का बोहरान कहा जाए तो ज्यादा मुनासिब होगा और इसका एक सबटाइटल भी थोड़ी
देर पहले यहां पर मौजूद था कि हमारा मुश्तका माजी क्या है? जब हम मु्तका माजी का जिक्र करते हैं तो इसका मतलब है
हिंदुस्तान पाकिस्तान बिलखसूस लेकिन बिल अमूम अगर देखा जाए तो इसमें अफगानिस्तान
नेपाल बांग्लादेश या जूब एशिया के जितने मुालिक इस वक्त हैं पांच के करीब उन सबके हवाले से इस मुश्तका पास्ट का मुश्तका
माजी का जिक्र होता है और शायद इन जितनी भी रियासतें हैं बरे सगीर पाक हिंद जिसे आजकल कहा जाता है। उसमें जिस कदर शनाख्त
के बोहरान का शिकार पाकिस्तान है। शायद ही कोई मुल्क कोई ख्ता इस कदर अपनी बोहरान का शिकार हो। कभी हम अरब बन जाते हैं। कभी हम
वस्त एशियन बन जाते हैं। आजकल हम तुर्क बनने की कोशिश कर रहे हैं। मुस्तकबिल करीब का मुझे नहीं पता कि हम क्या बनने की
कोशिश करेंगे। हो सकता है अमकी बल्कि चीनी बनने की कोशिश तो हमने शुरू कर दी है। हो सकता है कुछ अरसे बाद इतनी मुस्ताकम हो
जाए कि हमें चीनी बनने में फखर महसूस हो। खैर मैं मौजू की तरफ आता हूं। मेरे साथ दो अहबाब मौजूद हैं। एक अंजुम दारा साहब। ये
आर्कियोलॉजिस्ट हैं और मारूफ हैं इस हवाले से। काफी काम है इनका और ऑफिशियली आपका इस वक्त आप
टेक्सला म्यूजियम के क्यूरेटर हैं। रजा रूमी रजा रूमी साहब बुनियादी तौर पर सफी हैं। और बहुत ज्यादा पाकिस्तान में
जाने पहचाने जाते हैं। मैंने कम से कम ज्यादातर सियासी हवाले से इनके प्रोग्राम देखे हैं। आर्कियोलॉजी, आर्कियोलॉजिकल
हिस्ट्री या हिस्ट्री के हवाले से मेरा पहला मुकाशफा है कि आप इस पर दिलचस्पी रखते हैं। चले ये अच्छी बात है।
[गला साफ़ करने की आवाज़] जैसा कि हम पहले जिक्र कर रहे थे कि पाकिस्तान की दर्सी कुतुब में और अब तो उमूमी तौर पर भी ये
बड़ी मारूफ बात है। अगरचे मकबूल आम नहीं है कि पाकिस्तान इस ख्ते की बात कर रहा हूं। इसकी तारीख शायद 712 से शुरू होती
है। अब 712 से पहले कोई 1500, 2000, 4000, 8000, 10000 साल की कोई तारीख है। उसको हम भुला बैठे हैं। उसका हम जिक्र नहीं करना
चाहते। और उसको हम तस्लीम भी नहीं करना चाहते। लेकिन रफ्तार रफ्ता मुझे यह भी कहना चाहिए
कि इसमें तब्दीली हमें नजर आती है। ऐसा कहना बिल्कुल ही दुरुस्त नहीं है कि जी बिल्कुल ही। लेकिन गुस्ता 2025 साल से
हमने हर हवाले से थोड़ी तब्दीली असारे कदीमा उसकी खुदाई उनको तस्लीम करना म्यूजियम्स के हवाले से कुछ नाम दोबारा
तशकील करना कुछ अभी मैंने सुना है कोई 12 अरब के करीब पंजाब हुकूमत ने मुख्तस किए हैं नवादिरात को या कदीम तहजीब को दोबारा
बहाल करने के लिए लेकिन ये बहुत नई बात है और बहुत थोड़ी है [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] तो
ज्यादातर हम बात जो है आजकल अपनी जो पाकिस्तान या पाकिस्तान का जो ख्ता है जिसे वादी सिंध की तहजीब कहते हैं और इसे
एक हमारे अपने जानने वाले मुल्तान से उनका ताल्लुक था इबने हनीफ वो उसे सात दरियाओं की सर जमीन कहते थे कि उसमें तमाम दरिया
जो इस वक्त पाकिस्तान है तकरीबन के तकरीबन हाकड़ा और घाघर को छोड़कर वो या किसी हद तक सतलुज को छोड़कर इसका बड़ा हिस्सा
मौजूदा हिंदुस्तान लेकिन ये सारे के सारे दरिया जो इस वक्त जोराफियाई और सियासी लिहाज से जिसको जिसको पाकिस्तान कहते हैं
इसमें बहते थे। तो उस तारीख से हवाले तारीख के हवाले से है। तो मैं अंजुमदारा साहब से अपनी बात शुरू करूंगा कि 712 से
पहले क्या था? कितना कदीम था? कौन-कौन सी तहजीबे उसमें थी? किस तरह यह इरकाब पजीर हुआ और आज किन चीजों पर तवज्जो देने की या
बहाल करने की या प्रिजर्व करने की जरूरत है और साथ ही साथ आप क्या कर रहे हैं उसका जिक्र कीजिएगा।
असल में जो तारीख है या किसी कौम का विरसा होता है उसमें हम किसी एक इवेंट पे बात शुरू करके
नहीं कह सकते कि इसकी ओवरऑल हिस्ट्री यही है। यह ऐसे है जैसे कोई
क्रिश्चियन बंदा इस्लाम कबूल कर ले। बादशाही मस्जिद में मैं रहा हूं। उधर लाहौर फोर्ट में 20 साल रहा हूं। हर
जुम्मे को क्रिश्चियंस आते थे इस्लाम कबूल करते थे। ये ऐसे ही है कि उस क्रिश्चियन का बच्चा अगला जो है ना वो तो अपने आप को
मुसलमान ही कहेगा ना जो इस्लाम किसी ने कबूल कर लिया। लेकिन वो जो क्रिश्चियन था जिसने इस्लाम को कबूल किया उसका वालिद तो
शायद अभी भी क्रिश्चियन हो। वो यह तो नहीं कह सकता कि यह मेरा बाप नहीं है। भाई ठीक है आपकी एक आईडियोलॉजी है। आपने एक चीज को
नया अपने तौर पर अडॉप किया। आपने बेहतर समझा आपके इल्म ने आपके शूर ने उसको समझा तो आप एक्सेप्ट कर लिया। इस्लाम और आप
मुसलमान अल्हम्दुलिल्लाह हो गए। लेकिन वो इस चीज को डिस्क्लेम नहीं कर सकता कि मेरा फादर कौन था? मेरा ग्रैंड ग्रैंडफादर कौन
था? इस तरह जब हम किसी मुल्क की किसी कौम की हिस्ट्री पर बात करते हैं तो उसमें जितना भी अभी आप अगर इंडस वैली और ये
हिंदुस्तान, नॉर्थ इंडिया और साउथ इंडिया और पाकिस्तान की हिस्ट्री जब बात करते हैं तो इसमें सबसे पहली जो ह्यूमन सेटलमेंट थी
ना जहां पे इंसान ने आके आबाद किया, अपना घर आबाद किया, खेत आबाद किए, जानवर ब्रीडिंग शुरू की उनकी।
वह थी लास्ट स्टोन एज। स्टोन एज टेक्निकली हम देखें तो इसको तीन एज है। पैोललेथिक, मेसोलेथिक और न्यूलेथिक। न्यूलिथिक आखिरी
स्टोन एज है। यह वो स्टोन एज थी जब हंटिंग गैदरिंग से निकल के इंसान ने ना एक जगह पे पड़ाव कर लिया। हंटिंग गैदरिंग में होता
था कि जहां पे फल फ्रूट, कोई सब्जी मिली, कोई खाने पीने की चीज मिली तो वहां पे चले गए। फिर छोड़ दिया। नोमेडिक जिप्सीस की
तरह जिस तरह लाइफ स्टाइल होता है। पहली जो बकायदा अर्बन प्लानिंग के तहत जो टाउन या विलेज बना था ना वह मेहरगढ़ है जो बोलान
पास के पास सीबी डिस्ट्रिक्ट में बलोचिस्तान के अंदर है। तो अभी बचिस्तान गवर्नमेंट उस पर बहुत काम कर रही है और
पिछले 80 साल से वो मेहरगढ़ का कल्चर बड़ा नेगलेक्टेड था। हालांकि उस पे फ्रेंच आर्कियोलॉजिस्ट ने बड़ा काम किया था 70ज
के अंदर। वही जो सेटलमेंट है उन्होंने फिर नीचे आए इंटीरियर सिंध की तरफ कोर्ट आमरी डीजी
कोर्ट डीजी और आमरी और ये जो एरियाज हैं अप टू ये मोहनजोदड़ो मोहनजोदड़ो एक पॉपुलर नाम है आर्कियोलॉजी
में इस तरह के तीन सराउंडिंग एरिया ना में एडजेसेंट उसके शहर थे चोडो और जडेर्जरजोडो तो मोहनजोदाडो जो था ना यह बेसिकली एक
मेन उनका का मेट्रोपॉलिटन सिटी था इंडस वैली सिविलाइजेशन का। इसी तरह का ट्विन कैपिटल इनको बोलते हैं। दूसरा हड़प्पा था
पंजाब का। और अगर हम उस तहजीब की बात करें तो वो उससे नीचे मेहरगढ़ से नीचे उसको अर्ली
हड़प्पन साइट कहते हैं। जो दरमियान में कल्चर है ना मोहजोदड़ो से पहले वाला। अर्ली हड़प्पन, मैच्योर हड़प्पन और लेट
हड़प्पन। ये इसकी क्लासिफिकेशन है। ये मैच्योर हड़प्पन जो टाइम आप अब देखें एक इसमें बड़ी इंटरेस्टिंग चीज है कि आप
इस कल्चर को हड़प्पन कल्चर कहते हैं। हालांकि मोहनजोदड़ो बड़ा शहर है। मोहनजोदड़ो में सबसे पहले जो सेटलमेंट थी
इंडस वैली सिविलाइजेशन की वो मोहनजोदड़ो है। आमरीकोट डीजी और मेहरगढ़ से जब हम नीचे उतरते हैं। लेकिन इसको कहते हैं
हड़प्पन कल्चर है। उसको भी हड़प्पन कल्चर कहते हैं। पूरी दुनिया में इसको हड़प्पन कल्चर कहते हैं। क्योंकि
हड़प्पा जो था ना यह बेसिकली डिस्कवर हुआ था 1842 में चार्ल्स मेसन एक ट्रेवलर था ब्रिटिश वो
गुजर रहा था। तो उसने देखा एक माउंड है रेड कलर का। उसमें ईंटें भी सुर्ख है, मिट्टी भी सुर्ख है। तो उसने इसके मुतलिक
ना कुछ किताब में लिखा कि यह कोई पुरानी तहजीब है जो गर्क हो गई है। उसके बाद 1842 के बाद आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया जो
डिपार्टमेंट था उसके पहले डीजी थे अलेक्जेंडर कनिंघम। उन्होंने इस पे थोड़ा सा काम किया।
[गला साफ़ करने की आवाज़] लेकिन इसकी बकायदा जो खुदाई है ना वो 1920 के अंदर शुरू हुई। हड़प्पा की जो सारी
आर्टिफेक्ट जो म्यूजियम अगर आपने देखा हो तो वो निकाले तो वो
[खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] उस वक्त सर जॉन मार्शल डीजी थे आर्कियोलॉजी के और बड़े जो नामीगरामी उस
वक्त आर्कियोलॉजिस्ट थे वो माधुसूर बाट दियाराम साहनी दियाराम साहनी ने ओरिएंटल कॉलेज से हिस्ट्री में किया था इसमें
पर्शियन में अपना मास्टर और के एन डिक्शट आर डी बनर्जी यह म नामीग्रामी आर्कियोलॉजिस्ट थे। उस वक्त कोई मुसलमान
नामीगरामी इस तरह का नहीं था। इन्होंने बकायदा खुदाई की। अच्छा इसकी खुदाई का सबसे इंटरेस्टिंग एलिमेंट ये है कि जब
ब्रिटिश इंडिया ने नॉर्दर्न रेलवे का ट्रैक बिछ रहा था ना तो
पेशावर से मुल्तान की जो लाइन थी ना रेलवे की वो बिछ रही थी। ये गलबन 18 70ज का दौर था।
तो जो ठेकेदार था ना कांट्रेक्टर जिसने हैं लाहौर से मुल्तान
हां लाहौर से मुल्तान में ओवरऑल तो पेशावर सी चलती है ना डाउन स्ट्रीट तो इधर ही आती है ना नीचे तो उस सेक्शन में ना वो जो
ठेकेदार था ना उसने देखा कि ये एक पहाड़ी सी है छोटी सी इसमें से ना ईंटें निकल रही है बड़ी-बड़ी लंबी-लंबी ईंटें निकल रही है
माउंट के अंदर उसने खुदाई शुरू कर ली और उसने ईंटें जो है ना वो कोई दो 400 ईंट निकाल ली उधर से माउंट से ना तो उसको
ट्रैक जो रेलवे आगे का होता है ना नीचे जो स्लीपर जिस वो लकड़ी के भी स्लीपर बिछाते थे और पहले ईंटें को भी डालते थे उसने वो
ट्रैक के नीचे लगानी शुरू कर दी अच्छा वो ठेकेदार था जाहिर है उसको कुछ ना कुछ तो इल्म होगा उस दौर का उसमें से नई
चीजें निकलनी शुरू हो गई ना माउंट से हड़प्पन माउंट से कुछ चीजें निकलनी शुरू हो गई तो उसने फिर जो डिस्ट्रिक्ट वटगंबरी
था ना उस वक्त साल का डीसी उसको कहा कि ये माउंट से ना कुछ चीजें अजीब अजीब सी निकल रही है मुझे तो इनकी समझ नहीं फिर जो डीसी
थे ना मोंटगमरी के ब्रिटिश पीरियड में उन्होंने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया से बात की
कि यह कोई माउंट है इसमें से चीजें निकल रही हैं और आर्कियोलॉजी के रिलेटेड है। तो आप इसको थोड़ा सा देखें।
उन्होंने फिर बकायदा ना इसको एक प्रोटेक्टेड माउंट के तौर पे एक्सेप्ट कर लिया। लेकिन इसकी क्योंकि पूरा हिंदुस्तान
था आर्कलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया तो उसमें हर जगह पे ये नहीं हो सकता था। हालांकि जो ब्रिटिश रेलवे था ना नॉर्थ वेस्टर्न
रेलवे, सेंट्रल रेलवे, नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे इस रेलवे की बदौलत हमें तकरीबन कोई 30 साइट्स जो हैं आर्कलॉजिकल साइट्स
डिस्कवर हुई हैं। जिस तरह हड़प्पा भी एक्सीडेंटल इसको कहते हैं एक्सीडेंटल डिस्कवरी।
अच्छा मैं एक सवाल दरमियान में करना चाहता हूं। जैसा कि आप कह रहे हैं बुनियादी तौर पर 1850 से लेकर 1926 तक ये खुदायां हुई।
400 के करीब इस वक्त मौजूद हैं। मजमुई तौर पर कोई 1000 के करीब ये साइट्स हैं जो अभी शायद वक्तन फवन डिस्कवर होंगी। मेरा सवाल
एक और है कि आपने मोहजोदड़ो का जिक्र किया। फिर हड़प्पा का जिक्र किया। मैंने थोड़ी देर पहले इब्ने हनीफ की किताब का
जिक्र किया है। सात दरियाओं की सर जमीन उनका थीसिस ये है कि हड़प्पा और मोहजोदड़ो के दरमियान कोई 650 700 किलोमीटर का फासला
है। और ये जब यहां से तिजारत करते थे यानी हड़प्पा और फिर मोहनजोदड़ो और ये पूरा इलाका खासतौर पर मुल्तान या रियासत
मुल्तान कहना चाहे क्योंकि मुल्तान उस वक्त ये शहर नहीं था। बहुत बड़ा ख्ता था। शुमाली
सिंध सिंध यह पूरा इलाका बाज औकात मलोहा कहलाता था और फिर मलोहा जो है यह सुमेरियन और मेसोपोटेमियन दोनों से तजारत करते थे।
मेरा सवाल यह है मुल्तान को अक्सर इस थीसिस में नजरअंदाज कर दिया जाता है। थीसिस यह है कि दरमियान में यह हो ही नहीं
सकता कि आप 650 से 700 कि.मी. का सफर करें। घोड़े पर करें। चल घोड़े बाद में आए या बैलगाड़ी पर करें या पैदल करें और
दरमियान में आपको पड़ाव की जरूरत ना पड़े। तो दरमियान में जहां वो पड़ाव करते थे मजीद तिजारत करते थे तो वो मौजूदा मुल्तान
था जो कि उसी 4000 साल 4500 साला पुराना कदीम शहर है मगर जिंदा है और ये दुनिया के कदीम तरीन जिंदा शहरों में से एक है रूम
की तहजीब के बराबर ये उसका हम अस्र शहर है उसका अक्सर आर्कियोलॉजिस्ट जिक्र नहीं करते तो आप क्योंकि माहिर हैं इस हवाले से
लिखते पढ़ते हैं रोजमर्रा का आपका काम है तो इस आर्क आर्कियोलॉजिकल तारीख में आप मुल्तान को कहां प्लेस करते हैं?
देखिए जी मुल्तान जो है ना मैं अभी आपको एक रेफरेंस दे रहा था। कश मजूब जो दादा साहब की किताब लिखी हुई है 1000 साल पहले
तकरीबन 955 में वो लिखी गई उसमें लाहौर को मजाफात कहा गया है मुल्तान का। लाहौर अजके मजाफात अपना मुल्तान
लाहौर यके अ मजाफात मुल्तान बिल्कुल बिल्कुल मतलब के मजाफात की एक छोटी सी
अगर आप मुल्तान की हिस्ट्री देखें ना तो मुल्तान की हिस्ट्री हमें इंडस वैली से भी शायद ज्यादा पुरानी मिले क्योंकि
आर्कियोलॉजिस्ट जो है ना वो ज्यादा भरी माउंट जो है ना उन पे काम करते हैं। जो लिविंग कंट्री सिटी हो ना उस पे हमारा
ट्रेंड है कि उस पे हम काम नहीं करते ना। इंडिया के अंदर ये ट्रेंड था। अदर वाइज तो जो जैसे डिमास्कस है अभी लिविंग शहर है
पिछले 5000 इयर्स से रोम है और रोम भी है जिसमें अभी तक वो डिस्ट्रॉय
नहीं हुए तो इसकी डिस्ट्रक्शन नहीं हुई ये कंटीन्यूअसली एक लिविंग कंटिन्यूटी में है और अगर आप [गहरी सांस लेने की आवाज़] थोड़ा
सा और बारीक भी नहीं से मुशायदा करें ना तो आपको भगत परहलाद की जो टेंपल है ना मुल्तान के अंदर वो दो चार राइटर हैं,
हिस्टोरियन हैं। उन्होंने बकायदा उसको हजरत इब्राहिम की टेंपल से कोरिलेट किया है। और अगर हजरत इब्राहिम अल सलाम का आप
ओरिजिन देखें ना तो वो उनका ओरिजिन मिडिल ईस्ट से नहीं मिलता आपको। वो सुरयानी थे, माइग्रेटेड थे यहां से। ये हिस्ट्री वो
हिस्ट्री है जो आपको अभी एक्सप्लोर करने में भी 10 साल शायद लगे। आहिस्ताआहिस्ता चीजें जो है ना वो खुलेंगी। तो अभी भी भगत
पर हलाद की जो टेंपल है ना वो उस पे लोग आते हैं। हिंदू ज्यादातर पे आते हैं। इसके साथ एक पुराना एक ट्र है छोटा सा तोलंबा।
तोलंबा का जो कल्चर है ना वो आर्ट म्यूजिक कल्चर इस तरह का जो डांसिंग का कल्चर है ना उसका भी बड़ा एक्सिस्ट करता है। तो चकि
जितने ये लाहौर अगर आप देख लें तो लाहौर 1500 बीसी में एक 1415 लोगों का या 15 15 घरों का एक
छोटा सा पिंड था। 1500 बीसी में यह वह लोग थे हड़प्पन दरिया हड़प्पा के किनारे हड़प्पाई बस्तियां दरिया रावी के किनारे
हड़प्पाई बस्तियां ये एक रेलवे के सिविल सर्विस थे अफसर थे सिविल सर्वेंट जुबेर शफी गौरी साहब वो हमारे दोस्त थे उनकी एक
किताब भी है हड़प्पाई बस्तियां रावी के किनारे उन्होंने भी इस चीज का जिक्र किया है कि यह बेसिकली आर्टिस्ट लोग थे और आज
भी ट्रेंड है कि जैसे कोई पिंड जटों का है। चीमिया है। यह मानावाला है। यह पिंडी पट्टियां है। यह नशहरा विरका है। उस वक्त
के हिसाब से जो ये जो आर्टिस्ट लोग थे ना ये इन्होंने अपना एक अधा छोटा सा ना एक विलेज डेवलप किया था लाहौर। तो लाहौर जो
है ना ये बिल्कुल इसलिए लाहौर का कल्चर और लाहौर की तहजीब बाकी दूसरी तहजीबों से डिफरेंट है।
[गला साफ़ करने की आवाज़] इस पे हमें अगर एविडेंस चाहिए तो शाही किला के अंदर 1927 में ब्रिटिश पीरियड में
आर्कियोलॉजिकल एक्सकबेशन हुई थी। ट्रेंच लगी थी। खुदाई की जो होती है ना वो 50 फीट गहरी ट्र थी और तकरीबन वो 100 फुट चौड़ी
थी दीवान आम के सामने। उसमें से हमें जो लास्ट पीरियड मिलता है ना जो वर्जन साइल तक जाते हैं जब हम तो वो मिलता है इसका
थर्ड सेंचुरी बीसी अशोका का टाइम। रिपोर्ट पब्लिश्ड है। हां जी ब्रिटिश पीरियड की। उसके बाद 1959 में खुदाई
[गला साफ़ करने की आवाज़] हुई डिपार्टमेंट ऑफ आर्कियोलॉजी ने की। वो भी उसी लेयर तक गए। अब देखें थर्ड सेंचुरी बीसी तक अगर
लाहौर का किला जा रहा है तो शहर जो था वो तो किले के डिफेंस के लिए बनाया गया था ना बेसिकली के नॉर्थ जो वेस्टर्न से आते हैं
इन्वेशन आते हैं उनके कंट्रोल के लिए लाहौर के प्रोटेक्शन के लिए टवर्ड नॉर्थ वो एक फोर्ट जो है ना वो बना था।
तो अगर हम उसकी हिस्ट्री थर्ड सेंचुरी बीसी तक अगर चले गए तो बाकी हजार साल रहता है तो उस वक्त लाहौर तो था ना जब शाही
किला बना था तो लाहौर शहर उस वक्त मौजूद था तो आप उसको हजार साल बाद कहे ना तो वही 1500 बीसी का टाइम चला जाता है और ये
आर्टिस्ट लोग थे और ये आर्टिस्ट पर्टिकुलर इनका जो कयाम था ना वो था जो आजकल शाही महल है
शाही जो इसकी एंट्रेंस जो थी ना वो थी उसकी टसाली गेट वो हब था। उसके बाद फिर लाहौर
जाहिर है छोटा फैल गया। फिर 12 दरवाजों के अंदर फैल गया। तो उसमें से जो आर्ट का म्यूजिक का, स्कल्प्चर का, पोएट्री का,
डांस का सारा कल्चर है ना ये उसकी बुनियाद जो है ना ये 1500 बीसी में रख दी गई थी। बाद में ये कहते हैं जी ये तो हीरा सिंह
था महाराजा रणजीत सिंह का ध्यान सिंह का पुत्र और उसके नाम पे बनी थी। कोई कहता था ये ब्रिटिश पीरियड में लाल कुर्ती बाजार
थे। वो हर बड़ी कंटोनमेंट के साथ लाल कुर्ती बाजार होता था। जिस तरह मुल्तान के पास भी है एक लाल कुर्ती बाजार कोहाट में
भी है। पेशावर में भी है। पिंडी में भी है लाल कुर्ती बाजार। अभी भी राजा बाजार के साथ ना एक लाल। ये लाल कुर्ती बाजार लाहौर
में भी था। तो ब्रिटिश पीरियड में क्योंकि ब्रिटिश इसको जो डांसिंग गर्ल्स होती थी ना उनको लाल क्योंकि उनका नेशनल कलर था।
उसमें से वो पहना के कपड़े शपड़े उस तरह तो वो डांसिंग गर्ल जो है ना उनको बकायदा सेटल किया हुआ था। ये ये उसकी कंटिन्यूटी
है। ये उसका ओरिजिन नहीं है। तो लाहौर का जो अच्छा मुझे बड़ी बात भाई मेरे लिए बड़े अजाज की बात है कि आज मैं
इनके सामने बैठा हूं। ये मैं अभी बच्चे को कह रहा था कि ये हुफ साहब को कभी शायद मुलाकात हो तो मैं आपको बुलाऊंगा। तो मेरे
लिए ये बड़ी अजाज की बात है कि मैं आज उनके सामने बैठा हूं। ये जो है ना मेरे बात यकदम क्लिक करके
जेहन से जो मैं करना चाह रहा चलिए मैं जरा उनसे रजा रूमी साहब हम तो खैर सहाफत और सियासत
के हवाले से आपको जानते हैं। मैं चाहूंगा कि आप आसारे कदीमा के हवाले से अगर आपकी दिलचस्पी है बात करें। और खासतौर पर
गुप्ता, मोरया और गंधारा तहजीब इनके दरमियान एक इर्तकाई ताल्लुक भी है। और फिर गंधारा तहजीब कोई 700 साल तक यहां रही। और
गंधारा तहजीब के आसार इस वक्त हमें सवातत में तख्तही में टेक्सला में मिलते हैं। और यही वो दौर है जिस वक्त अशोका ने कलिंगा
में बहुत कत्लो गारत करने के बाद तौबा ताब होकर बुध मत और अमन का दीन एक तरह से अख्तियार किया। तो उसने बहुत कुछ यहां पर
बुध मत के हवाले से स्टूपास बनाए जिनका मैं पहले जिक्र कर रहा था। फिर बहुत सारी अशोका की तहरीर हैं उनके हवाले से।
तो इस ख्ते की तारीख के हवाले से अगर दिलचस्प आप गुफ्तगू करें तो लोगों की दिलचस्पी के लिए काफी अहम होगा। जी
शुक्रिया बहुत मेहरबानी और अंजुम साहब ने इतनी जबरदस्त अंदाज में पूरी 5000 साल की तारीख बल्कि 1500 बीसी से ही स्टार्ट हो
गए हैं। तो मैंने इसलिए इनको दावत भी दी थी क्योंकि यह जब जिक्र हो रहा था जब मुझे नयर ने मुझसे बात कही कि आप आए ब्लैक होल
तो मौजू की तलाश थी तो मैंने उनसे यही कहा कि वो ये पहले बहुत हो चुकी है सियासत पर जो आपने कहा क्योंकि वो इस तरह की फसूदा
बहस जो है बहुत होती है। असल बात ये है कि आज कल के हवाले से जो एक पूरी डिबेट शुरू हुई है। आपने देखा होगा कि इंडियन
गवर्नमेंट ने एक उनकी मिनिस्ट्री ऑफ़ कल्चर ने शायद एक ट्वीट किया जिसमें उन्होंने कहा कि इंडस वैली सिविलाइजेशन की सील जो
है वो दर हकीकत एक हिंदू सील है। और उसके बाद यहां पाकिस्तान से उसका जवाब आया कि नहीं मोहनजोदड़ो तो पाकिस्तान में है।
हड़प्पा भी पाकिस्तान में है। तो वो जिस तरह होता है इंडिया पाकिस्तान राइवलरी में कि कौन? हु ओन्स व्हाट? लेकिन उससे ये एक
अच्छी बात ये हुई कि बहुत सारी एक डिबेट जो है वो ओपन अप हुई है आफ्टर अ लॉन्ग टाइम और वो डिबेट ये हुई है कि क्या
पाकिस्तान जो मौजूदा पाकिस्तान जिसको हम समझते हैं उसकी जो 5000 साल की कम से कम जो तारीख है क्योंकि व्हीलर की किताब थी
5000 इयर्स ऑफ पाकिस्तान जो हमने पढ़ी थी व्हेन आई वास अ स्टूडेंट तो उसको पाकिस्तान जो है वो ओन नहीं किया
पाकिस्तान की सक्सेसिव गवर्नमेंट्स ने स्टेट ने उन्होंने मोहम्मद बिन कासिम या एक खास मजहबी तशखुस जो है उसको उजागर
किया। इसको सेकेंडरी रखा। अगरचे के हमारे ₹1 के नोट के ऊपर भी मोहजोदड़ो था और और करेंसी के ऊपर भी था। अगर आप पीआईए के
पुराने पोस्टर्स देखें तो कहते थे कम फ्लाई टू पाकिस्तान टू विजिट मोहनजोदड़ो और स्टेट ने उसमें थोड़ा वो इन्वेस्ट भी
किया सारा कुछ ले और मैंने ये देखा कि टेक्स्ट बुक्स में भी 70ज तक उसका अच्छा खासा तफसील में जिक्र होता था 80 में वो
बिल्कुल उसको काट दिया गया कम कर दिया गया अब दोबारा से एक हमने देखा है कि जो कुछ टेक्स्ट बुक्स में देखी हैं जहां पे
दोबारा से उसको इंट्रोड्यूस किया जा रहा है तो ये एक बहुत अहम जंक्चर उसकी वजह ये है कि पाकिस्तान की जो यूं तो बहुत सारे
मसाइल है उनका जिक्र होता रहता है। लेकिन एक ये आइडेंटिटी का जो आपने अपनी इदाइ में भी कहा कि शनाख्त का बोहरान जो है वो शदीद
है। और अगर पाकिस्तान को हम समझते हैं कि एक नेशन स्टेट है। तो फिर एक नेशन स्टेट का जो फोकस होता है वो
टेरिटरी पे होता है। टेरिटोरियल नेशन स्टेट अगर आप मॉडर्न नेशन स्टेट का हवाला देखें तो वो तो बनती ही टेरिटरी जमीन से
उस ख्ते से और उन लोगों से जो वहां पे रहते हैं उन लोगों की तारीख से तो अभी जो अंजुम साहब बता रहे हैं कि जो पहली ह्यूमन
सेटलमेंट जो है वो अगर यहां मोहनजोदाड़ो मेहरगढ़ हड़प्पा और दीगर हजार साइट्स जो आपने कही है तो फिर इसका मतलब है कि वी
नीड टू रियली पहली तो बात है उसको ओन करें ओन करें स्टेट की सतह के ऊपर आवाम की सतह के ऊपर और उससे एक मे बी एक नई शनाख्त की
तरफ एक सफर का आगाज हो सके और वो कोई कंट्राडिक्शन भी नहीं है क्योंकि दुनिया भर में सेहतमंद माशरे जो होते हैं वो
मल्टीपल आइडेंटिटीज के साथ एकिस्ट करते हैं। आपका एक मजहब भी होता है। आपकी एक एथनिक बैकग्राउंड भी होती है। आपका एक
शहरी तशखुस भी होता है। आपका एक तारीखी तशखुस भी होता है। तो उसको किस तरह से बैलेंस किया जाए? ये एक बहुत बड़ा चैलेंज
है और ऑब्वियसली इट्स नॉट अ वेरी इजी वन। लेकिन यहां पे जो आपने बात दूसरी तो इंडस वैली सिविलाइजेशन की एक तो ये बड़ी अहम जो
है नुक्ता बनता है। फिर जैसे एतजाज एसन साहब की हम बात कर रहे थे। उन्होंने जो इंडस सागा एक किताब लिखी थी जिसमें कि
उन्होंने आपने कहा कि बाकी जो उससे पहले चीजें लिखी गई थी वहां से उन्होंने माखूस किया। तो वो भी एक उन्होंने कोशिश की थी
कि एक एक्सपोज्ड फैक्टो जिसे कहना चाहिए पाकिस्तान की आइडेंटिटी या टेरिटरी के साथ उसका लिंक जोड़ा है। लेकिन अभी वो और भी
अहम हो गया क्योंकि अब इंडस रिवर जो है जो एक शेयरर्ड रिवर शेयरर्ड है हमारे ऊपर से अगर इंडिया के हमने इंडस वाटर ट्रीटी की
थी और अब वो खतरे में पड़ी हुई है। वो उन्होंने सस्पेंड कर दिया है। हम यहां से कहने नहीं अगर आपने सस्पेंड किया डैम
बनाया तो हम मिसाइल मार देंगे और हकीकत ये है कि एक ही ऐसी ट्रीटी है जो कि पिछले 1960 से अभी तक कितने 50 70 इयर्स होने को
है वो चल रही है और वो जिसने कि कुछ एक एमकेबल किस्म की एक इंडिया पाकिस्तान के दरमियान सेटलमेंट की हुई है और अगर ये
मुश्तिक तहजीब भी है इंडियंस भी उसको क्लेम करते हैं और बिल्कुल करना चाहिए उनकी भी एक कॉमन हेरिटेज है हमारी भी है
तो फिर ये एक पॉइंट एक एक फ्यूचर में एक नुक्ता ये भी बन सकता है कि इंडिया पाकिस्तान की जो एमिटी है अगर हम उसको उस
लेंस से देखें तो इसलिए हेरिटेज बहुत जरूरी है। आपने कहा कि जो कदीम शहर और गंधारा वैली का जिक्र किया और दीगर गंधारा
तहजीब की मुख्तलिफ जो एविडेंस हमें मिलता है। तो देखिए ये हेरिटेज मैं उसको एक अगरचे कि आर्कियोलॉजिस्ट उसको समझते हैं
कि जी अब ये हम इसको हमने उसको डिग करके डिग डिगिंग करके निकालना है। मैं समझता हूं वो एक जिंदा और ऑनगोइंग तहजीब होती
है। जैसे हड़प्पन से बहुत से लोग पंजाबी लैंग्वेज जो है उसका जिक्र करते हैं कि हड़प्पन जो जुबाने बोली जाती थी उस जमाने
में और उसकी बदलते बदलते उसकी साउंड्स तो वो कहीं जाके जो आज की शायद मॉडर्न पंजाबी में भी उसका कुछ रंग हो कुछ लिंकेज हो और
तो इसलिए वो जुबान भी जा रही है। वो लोग अगर आप उसके डीएनए की भी जो देखें जो नई स्टडीज आई हैं तो उसमें भी आपको ये मिलता
है कि जो आर्यन यहां पे आए लोग बसे वो और इंडस वैली के जो यहां के मकामी इंडजीनस लोग थे उनकी अमेजिश से हमारा मेजॉरिटी का
डीएनए जो है वो तरतीब पाया है साइंटिफिक हवाले से भी। तो जब ये कॉमनैलिटीज अगर हम देखें और हम अगर इसको समझे और इसकी उसके
ऊपर बात करें कन्वर्सेशन का आगाज हो तो मैं समझता हूं उसकी आज का जो प्रेजेंट है उसको भी हम रीइमेजिन कर सकते हैं।
ये बुनियादी नुक्ता था मेरा। बात शुरू हुई थी हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सील्स या मोहरों के हवाले से।
अक्सर फाजिल दोस्तों को मालूम है कि यह तहरीर हड़प्पा और मंजोदड़ो की अब तक नहीं पढ़ी गई। करीने कयास यह है कि यह सिर्फ
अलामते हैं। यह कोई उस तरह की जुबान नहीं है जैसे इमोजीस आज के दौर में होती हैं। क्योंकि जुबान को डिसाइफर करने के लिए
आपको कोई पैटर्न एक्सप्रेशन चाहिए। उसका कोई पैटर्न हो, उसमें कोई सीक्वेंस हो और उसमें कोई फ्रीक्वेंसी हो और कुछ वर्ड्स
जो है वह रिपीट हो रहे हो। यह दरअसल मोहरों का जहां तक मामला है यह बहुत पीछे जाता है। इसलिए ये दावा बड़ा नेशनलिस्टिक
हो जाता है। वो चाहे हम करें या सरहद के उस पार करें कि जी वो हिंदू तहजीब थी। इसकी जो माहरीन आसारे कदीमा कहते हैं कि
2800 से 2400 कब मसीह काबिल मसी बस आजकल कामान कहते हैं मुश्तका इला से लेकर 8000 साल पहले तक जाती है। जैसा कि आपने
इब्तदाई वस्तानी और फिर तरक्कीफ्ता तहजीबों का जिक्र किया है। तो यह वो दौर है जिस वक्त इसके मुतवाजी जो है
नील की तहजीब और दजला फुरात की तहजीब और इनका आपस में तजारती रवाबे थे यानी यहां से सुरख पत्थर नीला पत्थर कपास बहुत सारे
अशिया सर्फ और बहुत सारे बर्तन जरूरफ यहां से जाते थे। तो ये एक कदीम तहजीब जो है उसमें बहुत कुछ जैसा कि आप माहिरे आसारे
कदीम है जो कंजेक्चुरल है ना स्पेककुलेटिव है उससे गुरेज करना चाहिए मसन कुछ हमारे यार दोस्त कहते हैं कि हजरत नूह अल सलाम
मुल्तान में पैदा हुए थे जैसा कि आपने जुबान की बात की है ये जुबान ये है ये ये बहुत सारी बातें इसमें कयास है या गुमान
है उससे गुरेज करना चाहिए क्योंकि माहिरी ने सारे कदीमा अंजुमदारा साहब समझते होंगे। उनके बाकायदा टेक्निक्स हैं।
साइंटिफिक मेथड्स हैं। कार्बन डेटिंग के अलावा वो तो बहुत पुरानी बात हो गई है कि अगर आपने कोई चीज रिकंस्ट्रक्ट भी करनी है
तो उसके कौन-कौन से शवाहिद आपके आपके पास मौजूद हैं कि वो रिलीजियस कल्चरल था, वो प्रिस्टरी कल्चर था, वो हरार्किकल कल्चर
था, वो किंगडम का कल्चर था, वो एग्रीकल्चर कल्चर था या कोई और चीज था। तो उसके बाकायदा मेथड्स हैं। उन मेथड्स को अवॉइड
करके हम इस तरह यानी कंजक्चर करके या जनरलाइज नहीं कर सकते। मैं वापस आता हूं जो मैंने यहां जिक्र किया है। एक तो ये
बताइए कि इनके तजारती रवाबत यानी जिसे अब मैंने जिक्र किया कि वादी नील की तहजीब है या सुमारी की तहजीब है। उसके क्या आसार
मिलते हैं? मौजूदा जो वादी सिंध की तहजीब है और उसके बाद जैसेजैसे रफ्तार रफ्ता हम तारीख में पढ़ते हैं कि ये हिंदुस्तान के
शुमाल मशरिक में यानी के उत्तर प्रदेश और फिर महाराष्ट्र यानी के बिहार वगैरह में ये रफ्ता रफ्ता एक यहां से फेज आउट होकर
या डाइल्यूट होकर फिर ये वहां मुंतकिल हो गई या रफ्तार रफ्ता यहीं पर मुंदमिल हो गई। तो दोनों हवालों से मैं चाहूंगा कि आप
जिक्र करें ताकि हम पाकिस्तान के सुनने वाले को पता चले या दिलचस्पी रखने वाले लोगों को पता चले कि ये किस तरह एक
मुश्तका माजी जिसका हमने जिक्र किया वो किस तरह तशकील पाया और आखिर में जो बात आपने की है के टेरिटोरियल स्टेट्स अपनी
जगह लेकिन हिस्ट्री कल्चर लैंग्वेज उसके जो रिलेशनशिप है उस हवाले से यहां के मोहककीन वहां जाएं वहां के मोहककीन यहां
आए मुतालिया हो और अपनी तारीख को और तहजीब को हम पूरी दुनिया में मुतारिफ करवा सकें। जी हां बड़ा अच्छा क्वेश्चन है आपका अमजद
साहब। इसमें ये है कि ये जो कंटेंपरेरी सिविलाइजेशन है ना जैसे इजिप्शन की बात की मेसोपोटेमिया की बात की। बेसिकली तो ये
सारी रिवराइन सिविलाइजेशन है जो रिवर के ऊपर बेस करती थी। ये टिगिस और यूफ्रेटिस की जो तहजीब थी दजला अफराद ये मेसोपटेमिया
बेबिलोनिया असीरिया इसको सीरियन सिविलाइजेशन भी कहते हैं तो इजिपशियन जो है ये बेसिकली इनके जो लिंक थे इंडस वैली
सिविलाइजेशन से ये बकायदा एस्टैब्लिश्ड है क्योंकि मेसोपोटेमिया से बहुत सारी चीजें इंडस सील्स मिल रही हैं। बहुत सारे
रेफरेंस मिल रहे हैं। बहुत सारी ट्रेड एक्टिविटीज इनकी जो है वो साबित होती थी। हो रही हैं अभी रिसर्च में। तो आपको पता
है इजिप्शन ने भी इंडिया को इनवेड किया था 2100 बीसी में। अभी भी साउथ इंडिया में इजिप्शन टेंपल्स बने हुए हैं। जो उनकी
उनके जो रेमिनेंट्स हैं अरब अह इजिप्शन कल्चर के आप साउथ इंडिया में जाएं मालाबार के पास जिस तरह वो उनके टेंपल्स हैं जिस
तरह फेरोज़ बने हुए हैं ना इजिप्शन कल्चर के साउथ इंडिया में है तो 2100 बीसी फिर 1500 बीसी आर्य आ गए फिर
ग्रीक आ गए फिर सीथियन पार्थियन ये जो सारी बार होती थी फिर गौरी कुत ये सारे अरब कर गौरी खिलजी तगलक सैयद लोदी मुगल ये
सारी इन्व इधर से आई सेंट्रल एशिया से कंटेंपरेरी सिविलाइजेशन जो है ना इनके साथ हमारे ताल्लुक बड़े एस्टैब्लिश्ड है और वो
अभी आप देखें के अजिप्टोलॉजी पूरी दुनिया में पढ़ाई जा रही है। असीरियोलॉजी पूरी दुनिया में पढ़ाई जा रही है जो बेबिलोनिया
की तहजीब थी। इंडस का किसी को पता ही नहीं। इंडस वैली सिविलाइजेशन इनसे बड़ी सिविलाइजेशन थी। इंडस वैली का एरिया इनसे
बड़ा था। 20 लाख मुरब्बा मील के एरिया में थी। यह ईस्टर्न अफगानिस्तान से शुरू होके एक मंडी घाक उनका शहर है जिसको बिल्कुल
मौज दौड़ो के वो ना कंपैरेटिव शहर था। मंडी घाक ये फिर इधर आ गया पंजाब। फिर पंजाब से आप
इधर इंडिया में चले जाए। लोथल, कालीबंगन, ढोलावेरा और राखीगिड़ी ये जो शहर हैं इंडिया के अंदर ये ऑन सरस्वती रिवर थे।
अभी आपको पता है ये जो आजकल ट्रेंड चला हुआ है कि जी इंडस वैली कल्चर जो है ये सिर्फ पाकिस्तान के हिस्से में नहीं ये
इंडियन के हिस्से में भी ये आजकल ना मीडिया पे बड़ा आज हॉटस्पॉट चीजें बढ़ी हुई है आजकल। तो हड़प्पा के कंटेंपरेरी जो
शहर थे ना लोथल और कालीबंगन वहां पे भी खुदाइयां हुई। वहां पे भी म्यूजियम बने। वो भी वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स हैं। तो इस
तरह उनमें ये सेम ये चीजें मिल रही हैं जो हमें हड़प्पा से मिली। वही उनकी अर्बन प्लानिंग और उनकी जो डेली यूज़ की चीजें
हैं वो जमीन से निकल रही हैं। बात ये है कि इस सिविलाइजेशन पे काम क्यों नहीं हुआ? वो जो सिविलाइजेशन है उनकी
लैंग्वेज जो है ना वो डिसेफर हो गई। डिकोड हो गई। वो किस तरह डिकोड हो गई? के एक यह आपने लिखा हुआ है ब्लैक बोर्ड पे जिसको
इंग्लिश नहीं आती वो तो इसको नहीं पढ़ सकता। अगर आप इसी का तर्जुमा उर्दू में कर देंगे तो वो बंदा उर्दू पढ़ के कहेगा हां
इंग्लिश में भी ये लिखा है। अगर किसी को उर्दू में भी नहीं आती नीचे आप फारसी लिख देंगे या कोई और लैंग्वेज लिख देंगे जिसको
वो पढ़ता है तो वो कहेगा हां ये ऊपर वाली भी यही कह रही है जो नीचे वाला लिखा हुआ है ना तीन ट्राईंगल जो ट्रांसलेशन है ना
चीजों का मेजर आर्कलॉजिकल डिस्कवरीज जो पूरी दुनिया में हुई ना वो उसमें जो ऑब्जेक्ट है ना जैसे रोजिट स्टोन है और
डेड सी स्क्रॉल्स है इनकी सबकी ट्राइंगुअल ट्रांसलेशंस हुई है इजिपशियन के साथ ग्रीक में भी ट्रांसलेशन हुई है। अगर कोई वो
नहीं डिकोड हो रही तो जिसने ग्रीक डिस्कवर कर लिया वो उसको पढ़ रहा है। तो यह जो वेज शेप लैंग्वेज है इसकी इंडस इसकी
मेसोपोटेमिया की ये डिकोड हो गई है। अगर डिकोड नहीं हुई तो इंडस वैली की नहीं हो रही। मैं तो समझता हूं कि शायद यह
प्लानिंग के तहत ये चीजें क्योंकि ये एंशिएंट सीक्रेट विज़डम है एक बड़ी। ये इसके पीछे बड़ा एक कॉन्फिडेंशियल नॉलेज है
इस लैंग्वेज के अंदर। आप देखें कि पूरी दुनिया में हमें पता चलता है कि जी ये एजिशियन कल्चर है। इसमें डायनेस्टीज के भी
नाम लोगों को पता है। उसमें किंग्स के भी नाम का पता है कि ये तूतन खामून था। ये अखनातन था। यह रेमसेस था। वो भी इंडस वैली
के में भी तो कोई ना कोई इधर होगा ना। ये अगर आप मेसोपोटेमिया में चले जाए ये सारागॉन है ये नबोशड निजर है जिसने वो
हैंगिंग गार्डन बनाए भाई उनके बादशाहओं के नाम भी पता है उनकी डायनेस्टीज के नाम का भी पता है और इंडस का सिवाय ईंटों के
सिवाय वो सीलों के इनको किसी चीज का नहीं पता लगा अभी तक एक इसकी मेजर जो कॉज है वो यह है कि यहां पे इन्वेशन बढ़ी हुई है
डिस्ट्रक्शन बढ़ी हुई है दूसरे इन इलाकों पे जो कंटरी सिविलाइजेशन की बात करें इतनी इतनी डिस्ट्रक्शन नहीं
हुई। आप अगर 4000 साल से एक शहर को एक मुल्क को तबाही किए जा रहे हैं। भाई चाहे वो लूटने के लिए आ रहे हैं या वसाइल के
लिए आ रहे हैं या किसी भी पर्पस के लिए आ रहे हैं। अपनी हुकूमत इस्टैब्लिश करने के लिए आ रहे हैं। तो सबसे पहले जो है ना
यहां पे डिस्ट्रक्शन बढ़ी हुई है। आप देखें ये सारा इलाका जो आपका टेक्सला का गंधारा का है स्वाद का और पेशावर का
गंधारा जो कल्चर सिविलाइजेशन है। इसको वाइट हंस ने पांचवी सदी में इस तरह डिस्ट्रॉय किया था कि कोई चीज रह ही नहीं
गई थी। कोई बुद्धा का स्टैचू जो था ना वो अपना फिजिकल फॉर्म में नहीं था। आपको पता है सारे ये हेड मिलते हैं हमें जमीन से ना
क्योंकि वो हेड तोड़ के गिराए हुए थे जमीन में अंदर खुदाई की तो वो हेड ही निकल रहे हैं। टूटे चीजें निकल रही हैं। तो ये
डिस्ट्रक्शन जो है ना ये हमारे हिस्से में बड़ी इधर आई है। और दूसरी ये के बाहर से इनोवेशन जो है ना वो इधर आई हैं। इंडिया
के अंदर से कभी इन्वज़न बाहर गई नहीं। इनका कल्चर जो है ना चाहे वह इंडस का है या गंधारा का है या दूसरा है। वो कभी बाहर
गया ही नहीं। क्योंकि वो आके इन्वजन करते थे। बेनिफिट लेते थे इधर और अपना कल्चर भी इंट्रोड्यूस करवाते थे।
[गला साफ़ करने की आवाज़] इधर इंडिया की क्योंकि कभी मुहाजरा ही नहीं हुई कि कभी अफ्रीका फतह करने या अमेरिका फतह करने या
सेंट्रल एशिया की तरफ निकल गए हो। हां ओवरऑल यह जो एरियाज हैं लेटर हिस्ट्री के साथ उसमें सेंट्रल एशिया ने इंडिया पे भी
हुकूमत की है। जैसे उसका कनिष्का कनिष्का का दौर है। जो डेरियस का टाइम था परशिया में पर्शिया ने टेक्सला पे भी हुकूमत की
है। टेक्सले वाले कभी परर्शिया तक चले गए हैं। कभी ईरान तक चले ये सेंट्रल एशिया तक चले गए। अफगानिस्तान तक चले गए। तो ये
ओवरऑल इसकी जो जिओपॉलिटिकल स्ट्रक्चर है ना उसमें ये हिस्ट्री में आते हैं। लेकिन ओवरऑल ज्यादा डिस्ट्रक्शन हमारे हिस्से
में आई। ठीक बात है। इकबाल का एक शेर है। फितरत के खजानों की करता है निगबानी या बंदा सेहराई
या मर्दे कोहिस्तानी। शेर असल में यूं होना चाहिए। और तारीख गवाह है इसकी। फितरत के खजानों की करता है राजानी।
या बंदा सेहराई या मर्दे कोहिस्तानी नहीं मैं मजाक नहीं कर रहा यह तारीख गवाह है मैं आपको एक और मिसाल देता हूं शुमाल
मशरके हिंदुस्तान म्यामर लाउस कंबोडिया वियतनाम फिलीपाइन तक आप चले जाए एक पूरा कल्चर है जिसको ज़ों्बिया कल्चर
एंथ्रोपोलॉजी में कहते हैं और आज से कोई 2000 साल पहले यह पूरे तीन सा 3 4000 साल पहले ऊपर से नीचे आते थे वादी वादी के
लोगों को जैसे आप वादी सिंध की बात कर रहे हैं वो चाहे मेसोपोटेमिया की वादी हो सुमेरा की वैदी हो वो चाहे अरब में हो
सेहरा के लोग कोहिस्तान के लोग क्योंकि उनके पास वसाइल बहुत कम होते हैं। कुछ जानवर होते हैं पालते हैं। जंगल में रहते
हैं। वो हमेशा नीचे आकर यलगहार करते हैं। आप भी जिक्र कर रहे थे कि जारियत बहुत हुई है। इसलिए कि ये सिर्फ वादी-ए- सिंध नहीं
है। यह हिंदुस्तान की कई वादियां बरे सवेर पाको हिंद कहें या साबका हिंदुस्तान की कई एक वादियां थी जिनमें जरात है जिनमें फल
है जिनमें सब्जियां हैं जिनमें खुश मेवाजात है जिनके पास पानी है और जो जरुसाजी करते हैं वो घरों में रहते हैं और
वो मुहाजिब होते हैं। तो यह जो सहरा के लोग होते हैं या कोहिस्तान के लोग होते हैं तारीख गवाह है कि वो आकर यहां तबाही
फेरते हैं और फिर वापस चले जाते हैं और फिर उनको ढूंढना और पकड़ना और गिरफ्तार करना क्योंकि वो ऊपर बैठे होते हैं। आजकल
तो बंदूक है। उस दौर में भी ऐसा होता है तीर कमान है। पत्थर मार दो मर जाएगा। या मुझे पता है कि ये कहां से आ रहा है।
रास्ते भी मुझे पता है। तो ये तारीख पूरी यानी सिविलाइजेशन की हिस्ट्री में हमेशा ऐसा हुआ है। तो हमारे यहां वस्त एशिया या
चल आज का अफगानिस्तान वो यही हुआ है। मैं आपकी तरफ दोबारा आऊंगा। ये कहा जाता है एक मुस्तनद थीसिस है अ वो तमाम कंजेक्चरलिज्म
क्योंकि मैं जिक्र करता जाऊं कि नेशनलिज्म जो है वो हिस्ट्री को और आर्कियोलॉजी को या आर्कियोलॉजिकल हिस्ट्री दोनों को
नुकसान पहुंचाती है। मिसाल के तौर पर हिंदुस्तान में बड़ा जोर लगाया जा रहा है कि आर्यन नहीं आए थे। हम क्या पागल थे?
हमें हम मौजूद थे और यही हम ही आर्यन है। खैर वो लंबी बहस है। मैं उस उसके तमाम पहलुओं से और नसेस से वाकिफ हूं। मैं उस
तफसील में नहीं जाता। वादी सिंध की जो तहजीब थी हड़प्पा और मुंजदोड़ो इसके बारे में ये कहा जाता है कि ये एक पुरमन तहजीब
थी। बाकायदा शवाहिद के साथ कहा जाता है। अरबी एक मुझे नाम नहीं याद रहा। किताब का नाम है
याद है हड़प्पन अहिंसा। तो ये एक साहब ने किताब लिखी है। मेरा ख्याल है 2000 दो एक में शाय हुई है। कि ये पुरमन तहजीबें थी।
जी और पुरमन तहजीबें यानी कंपैरेटिवली जब हम करते हैं तो ये जो वादी सिंध की तहजीब थी
इसका पुरमन होना और बाद में रफ्ता रफ्ता इसका बहुत सारे जारियतों का शिकार होना और एक नया कालिब अख्तियार कर लेना जो आजकल
हमने किया हुआ है। तो इस पर जरा त्सरा कीजिएगा। बिल्कुल ये बड़ी अच्छे आपने नुकात इसमें से ढूंढे कि एक तो पुरमन होने
के जो थोड़ा बहुत एविडेंस है लेकिन उसमें भी बहुत कंजेक्चर है क्योंकि वो कहते हैं कि प्रीस्ट किंग और ये जो बाकी फिगर्स हैं
उन्हीं को इंटरप्रेट करते हैं। लेकिन उससे ज्यादा मैं उस पर आता हूं। लेकिन उससे पहली जो बात जिसका भी जिक्र भी हुआ वो ये
कि ये ह्यूमन सेटलमेंट्स उस जमाने में कितनी एडवांस्ड प्लानिंग थी उनकी। सैनिटेशन देखिए, वाटर सप्लाई देखिए,
ड्रेनेज देखिए। और जो स्टोरेज होती है उसकी ग्रेन की ग्रेनरीज थी बकायदा वो अगर पांच और अभी आज
का जो पाकिस्तान है जो अभी हम कह रहे हैं कि जी हम इनहेरिटर्स हैं तो उसमें आप देख लीजिए कि हमने क्या अपनी प्लानिंग का हाल
किया हुआ है। हमारा जो सबसे बड़ा शहर है कराची उसके इंफ्रास्ट्रक्चर की क्या तबाही हाल है। मतलब ये कि कुछ नहीं वो एक तो ये
डिस्कंटिन्यूटी कैसे ये भी एक अलग बहस है। एक तो खैर उसका वो बहुत बड़ा एक फीचर था। लेकिन उससे
ज्यादा जो फीचर ये था कि क्या ये भी अभी तक इसके ऊपर भी बहस है कि क्या इंडस वैली सिविलाइजेशन जो है वो आर्यंस की ले लेट वो
उनकी इन्वेशनंस से वो तबाह हुई या क्लाइमेट चेंज जैसे इवेंट्स जो थे उन्होंने इसको हटा दिया चाहे वो फ्लड्स थे
या दीगर इस तरह की ये भी बकायदा थ्यरीज है और वो भी रेलेवेंट है आज के लिए क्योंकि अब पाकिस्तान जो है वो एक इंतहाई वनरेबल
मुल्क है, हिंदुस्तान भी है। लेकिन पाकिस्तान तो मोर सो आप देखें कि जब ज्यादा तेज यहां पे अभी हालिया 2010 से आप
देख लीजिए जितने सैलाब आए हैं मिलियंस को उन्होंने बेघर किया है और तबाही फेरी है। और क्या उस वक्त भी हो रहा था और यही बहुत
बड़ा ये इसके ऊपर जो वेदर पैटर्न्स का आर्गुमेंट है वो भी है मौजूद। लेकिन इन्वज़ंस का भी और कुछ लोग ये कहते हैं कि
नहीं कोई अंदरूनी मसाइल भी होंगे। शायद इतनी भी पूरा मन नहीं थी जितना कि हम उसको समझ बैठे हैं। लेकिन ज्यादा इंपॉर्टेंट
चीज ये है कि उसको उसकी स्टडी जो है वो ज्यादा एक तो जुबान की डिकोडिंग के ऊपर वो एक तो इन्वेशनंस की डिस्ट्रक्शन की बात की
और मैं समझता हूं कि ये भी वजह है कि अगर देखा जाए तो ये एक्सकवेशन सारी जो है ये 19 सेंचुरी अर्ली 20थ सेंचुरी का काम है।
बल्कि 1920 का ज्यादा काम है। उसके बाद एक रप्चर आ गया पार्टीशन ऑफ इंडिया जिसमें कि वो खाते अलग हो गए, अफसर अलग हो गए,
महक्मे अलग हो गए, टूट गए वो नई रियासत को बनने में और वो सारे होने में तो वो उस तरह से उसके ऊपर फोकस नहीं रहा। शायद ये
भी एक वजह है कि अगर कोई एक हमारी अपनी ख्वाहिश होती या एफर्ट होती, इन्वेस्टमेंट होती कि बाकायदा इसके ऊपर रिसर्च जो है वो
हमारे यहां भी जारी होती। उस अंदाज से जैसे कि होनी चाहिए थी। और मुझे तो ज्यादा इस बात का अफसोस होता है कि देखिए
पाकिस्तान में ये हमेशा ये दुई क्रिएट कर दी जाती है कि जी जो तो आपकी मुस्लिम पास्ट है वो आपका अपना है। कासिम हो,
सलातीने दिल्ली हो, मुगलिया शहंशाह हत्ता के अहमद शाह अब्दाली और नादिर शाह जो है वो भी सीक्रेट फिगर्स
हैं। हालांकि लूट के लूटमार की उन्होंने। लेकिन जो नॉन मुस्लिम पास है उसको बिल्कुल नजरअंदाज करना। तो ये इसका भी एक शाखसाना
है ये बात। लेकिन मैं जो बात इस पे ये कहना चाहता था कि जो पास्ट की वैल्यू और उसकी जो इंटेरोगेशन है वो किस तरह से आपके
प्रेजेंट को भी बदल सकती है। और यही वजह है कि अगर हायर एजुकेशन में अगर टेक्स्ट बुक्स में अगर एक स्टेट के लेवल के ऊपर ये
इस चीज के ऊपर ध्यान दिया जाए तो यकीनन ये एक मुख्तलिफ मुल्क बन सकता है। यह सिर्फ हम पास्ट की इंक्वायरी बिल्कुल जरूरी है
और खूबसूरत है और सोचने के लिए लेकिन आज के हाल और फ्यूचर ये देखिए कि 26 करोड़ जो आवाम है जो कि अभी डबल हो जाएंगे अगले 25
30 साल में अगर यही रफ्तार रही तो उनके लिए भी तो जरूरी है कि टू रिफैशन एंड रीइमेजिन अ कंट्री। अब आप देखिए कि इजिप्ट
जिसका भी जिक्र हुआ अब इजिप्ट भी हमारे जैसे ही मुसलमान है मेजर मुस्लिम मेजॉरिटी कंट्री है। बड़े सोमो सलात के पाबंद है।
लेकिन वो ओन करते हैं। एंशिएंट इजिप्शन सिविलाइजेशन को अभी वहां दुनिया का सबसे बड़ा कायरो में एक आलीशान म्यूजियम तामीर
हुआ है और उसकी इनोगेशन हुई उसकी बुनियाद पे टूरिज्म भी होता है। चलिए मैं तो ये कहता हूं कि टूरिज्म के बहाने ही आपको
अरबों डॉलर तुर्की देख लीजिए तुर्की में अगरचे कि थोड़ा सा ज्यादा वो अर्दन साहब ज्यादा उनकी कोशिश ये है कि अपनी मुसलमान
होने का सबूत दें लेकिन एंशिएंट ग्रीक एंशिएंट रोमन बसेंटाइन सिविलाइजेशन और उसके रेमिनेंट्स जो है वो अभी भी वहां पे
मौजूद हैं। सिनेग्स फंक्शनल मौजूद हैं। डिस्पाइट ऑल द प्रॉब्लम्स दैट मॉडर्न टर्की इस फेसिंग। और उसकी बुनियाद पे
टूरिज्म भी टर्की इज अर्निंग बिलियंस ऑफ डॉलर्स इन टूरिज्म रेवेन्यू। कई मिसाले मैं आपको दे सकता हूं।
जी मले इंडोनेशिया इंडोनेशिया में सबसे पहला मेरा जो जब मैं पहली बार गया था आज से 10-15 साल पहले तो मैं यही चीज दंग के
दंग रह गया था कि भाई वहां पे जो लोग हैं सारे बहुत ही जुम्मे की नमाज भी पढ़ रहे हैं। रोज़ रमजान था। लेकिन साथ में सारी की
सारी जो उनकी एंशिएंट तहजीब है उसमें बहुत सारा हिंदू और बुद्धिस्ट इन्फ्लुएंसेस उससे पहले पेगन इनफ्लुएंसेस उन्होंने उस
चीज को ओन किया हुआ है और बहुत सारे उनका जो कल्चरल जो प्रैक्टिससेस हैं वो उन्होंने अभी तक
बहुत सारी वो जो रसुमात हैं प्री इस्लामिक उनको बहाल रखा हुआ है। तो यह हमारे यहां जो रप्चर आ गया है उस रप्चर ऑब्वियसली एक
तो यह कि जो हमने जिस तरह से पहले 10 सालों में 15 सालों में पाकिस्तान के हुक्मरानों ने जो इमेजिन किया
ब्यूरोक्रेट्स ने कि क्या इसको बनाएंगे अजीब खिचड़ी पका दी। लेकिन उसके बाद से हमने बिल्कुल उसको डिस्कनेक्ट करके और इवन
परशिया को देख लीजिए। ईरान जो है अब हमसे ज्यादा ही मुसलमान है। मेरे ख्याल से जो वहां इस वहालत है। लेकिन वो भी एंशिएंट
ईरानी तहजीब को डिसओन नहीं करते। वो उसको ओन भी करते हैं और ये सारे मुल्ला जो वहां पे हुकूमत है वो भी करती है। नौ रोज वहां
मनाया जाता है। अब नौ रोज इस्लामी तो नहीं है तवा जस्ट टू गिव एन एग्जांपल बट बाकी वहां पे भी तो ये जो ओनरशिप है ये एक
रोबस्ट सोसाइटी और एक नेशन और उसके लिए बहुत जरूरी है और उसके कई फवायद भी हैं। मैंने तो डॉलर टर्म्स में भी कह दिया कि
रेवेन्यू बिलियंस में आपको आ सकता है। अगर आप ये रिलीजियस टूरिज्म को ये इनकी अंजुम साहब की आजकल जिम्मेदारियां कटास राज पर
भी है जो कि एक यूनिक टेंपल है पूरे इस ख्ते में और हिंगलाज का टेंपल है बलचिस्तान में और जो टेंपल्स लाहौर में
रावलपिंडी पूरे का पूरा एक नॉन मुस्लिम हेरिटेज का हमारे बिल्कुल 20 मिनट दूर यहां से मतलब इट इज़ अ इट इज़ अ हेवन फॉर अ
लॉट ऑफ़ पीपल अगर आप हम उसको हमारा कहता है जी उसको तोड़ दो बदल दो कन्वर्ट कर दो ये कर दो डिसओन कर दो और वही चीज़ हमने उसको
आगे कंटिन्यू करा। तो, इसलिए बहुत ज़रूरी है कि हम उसको ओनरशिप लें और वह जब हम ओनरशिप लेंगे, तो फिर यह माशरा भी मज़द
टॉलरेंट उसमें बनने का इमकान हो जाएगा। ये बात है जी बिल्कुल दुरुस्त बात है। जो बात हमें
समझने की जरूरत है। तहजीब या कल्चर एक बड़ा दायराकार है। मजहब उसका हिस्सा होता है। मजहबी कल्चर नहीं होता। मा सिवाय कुछ
वजाइफ़, कुछ इबादत, कुछ कलमात के। यही वजह है कि तुर्की का इस्लाम इंडोनेशिया के इस्लाम से फर्क है। चीन का इस्लाम अरब के
इस्लाम से फर्क है। यूरोप का इस्लाम यहां के इस्लाम से फर्क है। लेकिन वो लोग मुसलमान हैं। तहजीब ज्यादा गालिब होती है
और वो जारी रहती है। यानी जुबान बदल जाता है, मज़ाहिब बदल जाते हैं, लिबास बदल जाते हैं। लेकिन आपका तसलसुल जो है वो उसी तरह
रहता है। अंजुम साहब जैसा कि आपने बात खत्म की। एक आखिरी सवाल और फिर हम सवालात की तरफ से जाएंगे।
कौन-कौन से ऐसे आसार हैं या ऐसे तारीख मुकामात कहना चाहिए या तहजीबे हैं जिन्हें मजीद दरियाफ्त करने की महफूज़ करने की उसके
ऊपर दोबारा बहाल करने की या बजट सर्फ करने की जरूरत है और वो पाकिस्तान में नहीं हो
रहे। जो हो रहे हैं वो उसका भी जिक्र करें। अच्छी बात है। जिनको महफूज करने की और प्रिजर्व करने की जरूरत है उनका भी
जिक्र करें और यह बताइए कि इससे कैसे हमारा मुस्तकबिल बेहतर हो सकता है और इससे हम एक अच्छा जरे मुबादला भी कमा कमा सकते
हैं जो कि पाकिस्तान का मसला रहता है। असल में अगर हम देखें ना पाकिस्तान के अंदर जितने म्यूजियम बने 47 के बाद या
उससे पहले जो ब्रिटिश कॉलोनियल दौर में बने उस सिविलाइजेशन का अभी 10 या 20% हमने
जमीन से चीजें निकाली हैं। 80% ऑब्जेक्ट्स आर्टिफेक्ट जो है ना उस कल्चर के अभी बरीड हैं सिविलाइजेशन के कंधारा की देख लें। नो
डाउट कि अभी हमारे पास 4000 ऑब्जेक्ट हैं टेक्सला म्यूजियम में डिस्प्ले पे और तकरीबन कोई 20,000 ऑब्जेक्ट स्टोरेज में
हैं। लेकिन हमें मजीद चीजों को एक्सप्लोर करना चाहिए। इन्वेस्टिगेट करना चाहिए। फिर उसकी एक्सक्वेशन करनी चाहिए। जिस तरह
चाइनीस मक्स आए थे यहां पे। एक आया 39 में 399 एडी में वाशीन शानजान आया 630 में और आइसिंग आया 675 में। ये 20 20 साल रहे इधर
इन्होंने संस्कृत सीखी प्राकृत सीखी और चाइनीस लैंग्वेज में अपने बुद्धिस्ट जो स्क्रिप्चर थे ना सैक्रेड स्क्रिप्चर
सूत्राज और शास्त्राज उनको ट्रांसलेट किया चाइनीस चाइना ले जाने के लिए अगर सिर्फ उन चाइनीज की रिसर्च जो है ना वेस्टर्न
बुद्धिस्ट किंगडम रिकॉर्ड ऑफ वेस्टर्न बुद्धिस्ट किंगडम का उन्होंने जो लिखा है उसके मुताबिक अगर हम गंधारा की स्टडी कर
ले ना चलो दूसरी दूसरी सिविलाइजेशन का तो उन्होंने इतना जिक्र नहीं किया लेकिन बुद्धिस्ट और हिंदू और ये वो सारा का
जिक्र किया। उसमें बेशुमार साइट्स ऐसी हैं जो वाज़ तौर पर लिखी हैं कि ये अगर स्टेज है तो हमें सिर्फ यही पता है कि ये कुर्सी
इधर पड़ी हुई है। इन दो कुर्सियों का किसी को पता ही नहीं। हालांकि अगर किसी बंदे ने 2000 साल पहले या 1500 साल पहले लिखा है
कि यार स्टेज पे तीन कुर्सियां हैं तो दो कुर्सियां जो है ना वो जमीन के नीचे बरी आ गई है। उनके ऊपर जंगल बन गया है या उनकी
हालत अभी बाजार नहीं है। तो हमारे पास एविडेंस तो है कि यार बंदे ने लिखा है एक नहीं दो बंदे लिख रहे हैं। एक पांचवी सदी
में लिख रहा है। सातवीं सदी में लिख रहा है कि ये चीजें दो इधर पड़ी हुई हैं। तो हम उसी रेफरेंस के तहत ज्यादा
इन्वेस्टिगेट कर सकते हैं एरियाज को ज्यादा उसमें स्टूडेंट्स के लिए एकेडमिया के अंदर जो आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट है
उनकी ज्यादा एक्टिविटीज उसमें पूरी दुनिया में रिसर्च जो होती है ना वो एकेडमिया के अंदर होती है डिपार्टमेंट नहीं रिसर्च
करता अभी देखें कोई भी खुदाई होती है तो बाहर की यूनिवर्सिटी इधर आती है यूनिवर्सिटीियों के स्टूडेंट आते हैं
हमारे यहां डिपार्टमेंट स्टडी का हालांकि एकेडमिया में यूथ जो होती है यंग जनरेशन होती है उनको जरूरत होती है कि उसके आगे
वो अपना एक हिपोथेसिस डेवलप करें। सिंथेसिस डेवलप करें कि इसका हमने क्या आजकल वैसे ये जो है ना जिस तरह इंडस वैली
का है कि जी वो बंटवारा हो गया तो उधर चला गया इधर आ गया हमारे पास जॉन मार्शल ही वाज सर जॉन मार्शल वाज़ द डायरेक्टर जनरल
ऑफ एएसआई तो दो 1902 से 1928 तक अच्छा 1928 तक डीजी थे 1934 तक इन्होंने काम किया इधर टेक्सला
में बैठ के सर जॉन मार्शल ने 1958 तक जब उनकी डेथ हुई है इंग्लैंड के अंदर तो वो यही जो पूरे हिंदुस्तान का वॉल्यूम्स की
रिसर्च थी ना उसको कंपाइल कर रहे थे। 1958 में जब वो डेथ हुई है। उन्होंने लिखा एक इधर कंटेंपरेरी मुस्लिम क्यूरेटर थे। उनके
दौर में ना उनके सब इंजीनियर थे अहमदन सद्दीकी। अहमद्दीन सद्दीकी को जॉन मार्शल ने 47 के बाद एक खत लिखा।
उन्होंने कहा कि यार वो क्या बना? सुना आपका कोई बंटवारा हो गया हिंदुस्तान के अंदर। हम निकल गए हैं तो सारा कुछ ही
बर्बाद हो गया है। आप तो लड़ लड़ मर रहे हो। उसमें लिखा है तो उन्होंने कहा ये इंडिया के हिस्से में कौन-कौन सी साइट आई
है और आपके हिस्से में कौन-कौन सी साइट? ये जान मार्शल उस लोकल पाकिस्तानी को पूछ रहा है। उसके लेटर अभी है वो किसी दिन मैं
आपको शायद दिखा दूं। उन्होंने कहा जी इंडस जो है ना उसके दो शहर जो मेन है वो मोजोदाड़ो और हड़प्पा वो हमारे पास है। तो
इसके बाद दूसरे लेटर में उनका जवाब है कि यार असल इंडिया तो यह है। तो इंडिया के हिस्से में फिर क्या आया? हम तो इंडस वैली
सिविलाइजेशन को ही इंडस कल्चर कहते हैं ना। तो ये तो आपके पास है। तो फिर उनके पास अच्छा जब 47 में मुल्क बन गया तो एक
ट्राइबनल बना था जो कि जिन्होंने एसेट्स डिवाइड करने थे कि ये इनके हिस्से में आया। ये हमारे हिस्से में आया। तो उसमें
आर्कियोलॉजिकल जो आर्टिफेक्ट्स थे ना, वह भी उस ट्रिब्यूनल में केस गया। के जी यह किंग दो मेजर डिस्कवरीज जो है ना
पाकिस्तान की आर्कियोलॉजी में इस यहां के ख्ते की वो दो मेजर एक किंग प्रीस्ट और दूसरा डॉनसिंग ऑफ मजा दौड़ो ये
दोनों मोजादोड़ो से निकले थे 1920 में सर जॉन मार्शल डीजी था और आर डी बनर्जी जो था ना वो इसने निकाला था वो एक
आर्कियोलॉजिस्ट जो था तो उन्होंने कहा कि ये जो है ना ये दोनों इधर इधर पड़े हुए थे दोनों हमारे पास थे ये ट्रेवल उन्होंने
अच्छा उन्होंने कहा जी डांसिंग कर हमें दे दे ये ना अभी डिबेट चल रही थी बहाल इन्होंने नहीं दी उन्होंने कहा नहीं जी ये
मेजर डिस्कवरीज है दो बड़ी अहम चीजें हैं ब्रोंज़ की इतनी सी है वो डांसिंग कर पहुंच तो बाकी ये ये तो मेरे चार्ज में भी रह के
कराची म्यूजियम में ना इसको मैं जाहिर है अलमारी में पड़ा होता था देखा भी कई दफा इसको निकाल के स्टीटाइट स्टोन का है इसका
कोई वजन तकरीबन कोई 3 किलो के करीब है इतना साइज है इसका यह
किंग प्रीस्ट उधर पड़ा हुआ। यह भी हमारे पास थी मजोदड़ो में डांसिंग गर्ल। यह 196 में 63 में एक एग्बिशन हुई थी इंडिया के
अंदर दिल्ली के अंदर तो उन्होंने रिक्वायर की थी डांसिंग गर्ल के हमें दे हम डिस्प्ले करेंगे इधर जरा दुनिया को
दिखाएंगे तो बाद में आपको दे देंगे। अच्छा वो डांसिंग गर्ल उधर गई 63 में। तो बाद में जंग शंग लग गई। हालात हमारे खराब हो
गए। दुश्मनी बढ़ गई ज्यादा। तो उन्होंने कहा भाई एक आपके पास एक हमारे पास आ गया बस यही तो यह आपके वो किंग प्रीस्ट आप
संभाले इसकी एक एक बड़ा जोक है इसके ऊपर बड़ी इंटरेस्टिंग बात है व्हेन जुल्फकार अली भुट्टो वाज़ अ प्राइम मिनिस्टर ऑफ
पाकिस्तान तो क्योंकि लाडकाना था बिल्कुल उनका घर साथ था खुदा उसके अंदर लाडकाना के अंदर घड़ी खुदा बख्श तो एक दफा भुट्टो
साहब बीइंग ए प्राइम मिनिस्टर किसी दोस्त को किसी वो फॉरेन सफीर थे कोई साथ तो वो विजिट करने आए मोहजोदड़ो म्यूजियम।
उन्होंने कई दफा पहले भी देखा हुआ था। किंग प्रीस्ट का भी रेप्लिका उधर पड़ा हुआ है और डांसिंग गर्ल का भी रेप्लिका उधर
मोहनजोदड़ो में पड़ा हुआ है। क्योंकि ओरिजिनल तो हमारे पास नहीं है। ये ओरिजिनल नेशनल म्यूजियम कराची में पड़ा हुआ है।
मोटो साहब को अब जो क्रिएटर है ना हमारे वो हमारे सीनियर कोलीग थे सई जतोई उनका नाम था। ये बात उन्होंने खुद सुनाई है
जतोई साहब ने। उन्होंने कहा मैं ब्रीफ कर रहा था प्राइम मिनिस्टर साहब को कि ये एक मजे दौड़ के ये डिस्कवरी है मेजर जो ना ये
डांसिंग गर्ल और ये किंग प्रीस्ट उन्होंने कहा यार ये डांसिंग गर्ल फिर किधर गई उन्होंने कहा जी डांसिंग गर्ल जो है ना वो
इंडिया गई तो इंडिया वालों ने दी नहीं तो उनका लफ्ज पीएम साहब का पता है क्या लफज़ है उन्होंने कहा यार असल जो चीज थी
डांसिंग गर्ल वो आपने उधर दी ये मौलाना समी हक ये हमारे लिए रख लिया आपने [हंसी] समक उनका जरा था उनके साथ वो क्लशेस थे
सियासत के तो उन्होंने कहा यह हमारे पास रह गया और वो असल चीज जो डांसिंग कर रहा है आपने उनको दे दी है पाकिस्तान वैसे
क्लेम कर रहा है दूसरी बात आप कर रहे थे ना देखिए ये जो किंग प्रीस्ट है ना ये मैं आपको इसकी
टेक्निकल थोड़ी सी वजह बताऊं अगर आप किंग प्रीस्ट का फिजिकली पकड़ के कि स्टैचूस मिल जाते हैं आपको ना
रेप्लिकास मिल जाते हैं। उसमें किंग प्रीस्ट की मूछे मुनी हुई है और दाढ़ी रखी हुई है। और दाढ़ी बकायदा खत की हुई है। यह
देखें खत के साथ जो दाढ़ी थी ना और माथे पे वह बांधा हुआ है। पट्टी ऐसे बंधी हुई है जो
पीछे बाल है ना जो और बाल पीछे पटे थे पटे थे बालों के ना और राइट शोल्डर नंगा है। राइट ये हराम की हालत में ना जैसे कोई
बंदा होता है। राइट शोल्डर नंगा है। और ये जो ऊपर चादर है ना ट्राईफाइल की ये मेसोपोटेमियन है इसके फीचर। यानी कि इसमें
तीन चीजें हैं। एक तो राइट साइड पे अमाम जामन बांधा हुआ है। हां जी। और दूसरा मूछे मुंडी हुई है किंग
ब्रस्ट की और दूसरा खत की दाढ़ी है। देखिए 5000 साल पहले 5000 साल पहले खत का कांसेप्ट आप मुझे बताएं क्या था?
शेविंग। अभी तो हम कहते हैं ना कि इस्लाम ने खत वाली जो दाढ़ी है वो इंट्रोड्यूस कराई। तो
5 साल पहले किंग प्रीस्ट की दाढ़ी क्या? यह जो रेफरेंस है ना यह हमें फिर वही जो बात मैंने पहले की थी क्योंकि किंग
प्रीस्ट हमें एक ही मिला है पूरी वादी सिंध में चाहे उसका अफगानिस्तान भी है, पाकिस्तान भी है, इंडिया भी है, किंग
प्रीस्ट एक है। इसकी इबादत नहीं होती थी इधर। अगर इसकी इबादत होती ना तो ये बुद्धा की तरह हजारों मिलते हमें। हजारों मिलते।
ये कोई बंदा था ना ये इधर से मोजोदड़ो से गया। मेसोपोटेमिया गया। उस वक्त उस वक्त 5000 साल पहले का जो कंटेंरी पीरियड था ना
हजरत इब्राहिम का दौर था उधर उधर बेबोनिया में तो हमने बचपन में भी सुना हुआ था कि हजरत इब्राहिम के लोग स्टचू बना के ना तो
घरों में रख लेते थे लेकिन उन्होंने मुखालफत की क्योंकि बुत शिकनी तो मुखालफ हो गई इस्लाम की इस इस रिलजन की सोेटिक
रिलजन के तहत तो किसी एक बंदे ने ये स्टचू उधर से खरीदा या सुनियर के तौर पे तो वो लेके मंजू दड़ो आ गया [हंसी] इसलिए हमें एक
एग्जांपल मिलती ये इसका अभी तक किसी ने इसको इस इस बात को आइडेंटिफाई नहीं किया। लेकिन क्योंकि एक चीज का मिलना जो है ना
वो या तो है कि ये ना तो किंग था यहां का। अगर किंग होता तो और भी स्टैचू मिलते। अगर प्रीस्ट होता तो फिर और भी स्टचू मिलते।
तो इसका सिंगल होना जो है ना वो ये है कि बाहर से कोई बंदा उधर से आया था। इधर उसने रखा हुआ था तो वो डिस्कवर हो गया।
मतलब है कि प्रीस्ट किंग गलत नाम है। दूसरे लफ्जों में। हां जी। दिलचस्प बात यह है कि गौतम
लुंबिनी में पैदा हुए और बुद्धिगाया वहां पर बिहार में उनको निर्वाण मिला लेकिन चीन से और उसकी सबसे बड़ी तहजीब जो फ्लोरिश
हुई वो वादी सवात में हुई या टेक्सला में हुई और यहीं से चाइना में यहां से वो सारे गाथास जो हैं वो चीन में गए क्योंकि वहां
से बराहेरास्त ये हिमालयान रेंज जो है उनको क्रॉस करना फिजिकली टेक्निकली बहुत मुश्किल है चीन में लिहाजा यहां से सारा
जो हुमत का मजहब है या अकीदा है वो यहां से गया है। अगर अगर अगर इजाजत हो तो सिर्फ दो लफज़ मैं
इस कंक्लूड करते हैं क्योंकि ये जो आपने कहा ना कि सात सवात में लास्ट फॉर्म थी बुद्धिज्म की दैट इज नोन एज विजरायाना
मंत्रायाना डायमंड सुतरा अर्लियस्ट बुद्धिज्म है वो हिनायाना इसको कहते हैं जो थाईलैंड और श्रीलंका में है
ये इलाका हमारे वाला जो है ये महायाना में आता था पेशावर का ये ये लास्ट स्टेज जो है ना इसकी हमें
बुद्धिस्ट आसार छवीं सदी में खत्म हो जाते हैं। टेक्सला में यह फिर आठवीं सदी तक हमें स्वात में मिलते हैं। सवात का जो
बंदा आठवीं सदी का था ना पद्मा संभावा जिसने तिब्बत में जाकर अपनी टेंपल्स बनाई वो ये जो गुरु है ना अभी जो इंडिया में
बैठे हुए हैं तजीन गेस्टो दलाई लामा दलाई लामा का जो 14वा बड़ा फादर था ना ही वास स्वाति
पद्मा संभावा सवा से गए थे और ये सारा कल्चर जो है ना ये इंडिया से फिर आगे तिब्बत से तिब्बत से फिर साउथ ईस्ट एशियन
फिर सेंट्रल एशियन फिर फॉर ईस्टर्न कंट्री चाइना में कोरिया और जापान में ये अल्टीमेट इसका ना जो है
वेरी इंसाइटफुल सवालात आपने बहुत अच्छी बातें की दारा साहब ने कहा कि ये जो
हां ये नहीं हो रही डिसाइफर लैंग्वेज ये एक मिस्ट्री है असल में ये ये कोई मिस्ट्री मिस्ट्री नहीं है। एट द हायर
लेवल अगर इंडस स्क्रिप्ट डिसाइफर हो जाती है। मैं तो समझता हूं हो चुकी है। लेकिन अगर हम उसको मान लेते हैं तो वो सारी
थ्योरी कि ये जो सारा विज़डम है वो वेस्टर्न है। वो यूनान से आया था। वो गलत साबित होती है। ये एक वेस्टर्न हेजिमोनी
है जो कह रही है कि इंडस ये क्या कहती है तहरीर? पूरी दुनिया तो यह कहती है कि नहीं हो रही है।
देखिए ना दुनिया तो यही कहेगी ना। आप कह रहे हैं कि हो चुकी है। मिस्ट्री क्या है वो मैं बता रहा हूं
आपको। एटस्कंस सिविलाइजेशन आपने सुनी होगी इटली में। एट्रस्कंस 1300 से 900 बीसीई में इटली में एक रेप्लिका है मोहनजोदड़ो
का। आप देख सकते हैं अभी भी Google कर लें। बिल्कुल रेप्लिका है। ये वो लोग थे जो जब मोहनजोदड़ो आहिस्ता आहिस्ता मर रहा
था तो वो इटली तक गए। फिर इटली से ग्रीस ग्रीस का जो पहला फिलॉसफर है वो 600 कब मसीह में हमारे सामने आता है। और ये लोग
वहां पे 1300 और 900 कबले मसीह तक पहुंच चुके थे। एंड वो एक आउल की किताब है। डांसिंग शडोस हो सकता है किसी ने पढ़ी हो
अमेरिका से। तो उसमें उसने लिखा है कि द इंडस पीपल दे नॉट ओनली एक्सपोर्टेड गुड्स बट गार्ड्स आल्सो
तो गार्ड का मतलब ये नहीं था कि वो खुदा वो डॉक्टराइन था वो ले जाते थे और हम कहते हैं कि ये जो पूरा का पूरा ये जो आपका
फलसफे की इमारत खड़ी हुई है ना दुनिया की ये इंडस सिविलाइजेशन से ही शुरू हुई थी ना कि ग्रीस से शुरू हुई थी और हम उसको छुपाए
कैसे छुपाए हैं कि उसको हमें पता नहीं ना कि क्या लिखा हुआ है भाई उसकी लैंग्वेज पहली बात तो ये
साइं दारा साहब ने बहुत इस पे वो किया कि ये वहां से आया है वहां से ये ना किंग है ना प्रीस्ट है
आप अगर इसको देखें तो इसका ये जो रिबिन है वो इस तरह से नहीं है ये इस तरह से और यहां पे इसके एक राउंड बटन टाइप है। यह
शिव का तीसरा नेत्र है। यह एक शिव योगी है। सील नंबर 410 जिसको प्रोटो योगी कहते हैं।
जिस पर यह सारा किस्सा चला है ना कि यह हिंदू फलाना और वो है। शिव जो है वो नान वैदिक और प्रोटो वैदिक डायटी है।
वेदों में कोई शिव का किस्सा नहीं है। शिव को जब वेदों में जगह नहीं मिली तो इंडीजीनियस पीपल ने वेदों को एक्सेप्ट
करने से इंकार कर दिया। फिर उन्होंने क्या किया दे मेड अपेंडिसेस टू द वेदास एंड कार्ड देम उपनिषद कि भाई
हमने वो एक्स्ट्रा लगा लिए पीछे से उपनिषद्स आर पोस्ट वैदिक
इन राइटिंग बट प्रोटो वैदिक इन कंटेंट वो शिव की तालीमात है और उनमें पहली बार गुरु और चेले की कथाएं हैं। पूरे वेद में
किसी गुरु का कोई तस्करा नहीं। कि वहां तो इंद्र की देवमाला है ना वो देव है वो सिर्फ लेकिन वो जो उपनिषद है वो गुरु और
चेला है प्रोटो योगी जो है वो शिव है शिव जो है वो किसी रिलीजन का
सवाल क्या कर रहे हैं ना सवाल मैं कोई सवाल नहीं कर रहा मैं आपने जो कहा मैं उसमें इजाफा कर रहा हूं
और उसके बाद आपने व्लाहौर पे बहुत अच्छी वो की लेकिन हमारे यहां ये है कि लाहौर जो था वो कृष्ण का बेटा था लव।
उसने यह शहर आबाद किया था। अब कृष्ण हिस्ट्री में कहां खड़ा होता है उसकी आप वो निकालें। और तीसरा था के मोहनजोदड़ो जब
खत्म हुआ था ना तो उसके थोड़े बाद ही लाडकाना के करीब लाडकाना से 28 कि.मी. है मोहनजोदड़ो। लेकिन 6 कि.मी. पे है जुकर
सिविलाइजेशन। हां दैट इज़ पोस्ट मोहनजोदड़ो जिसप मुजमदार ने थोड़ा बहुत काम किया था लेकिन उसके बाद
उसको गोली मार दी हां उसने कोई काम नहीं किया और जुकर कर रहा था
आरसी मुजमदार और जुकर एक बहुत मजूमदार जो एक आर्कियोलॉजिस्ट था बड़ा
नामीगरामी तो उसने वो खुदाई कर रहा था लोकल सिंधी आए जी ये क्या कर रहे हो उन्होंने कहा जी मैं
खुदाई कर रहा हूं उन्होंने कहा ये क्यों कर रहे हो ये जमीन से खजाना निकाल रहे हो उन्होंने कहा खजाना नहीं है मैं
आर्कियोलॉजिस्ट हूं सारे कदीमा का मैं एक्सपर्ट हूं तो मेरी ड्यूटी लगी है। यह मेरा कार्ड है आर्कियोलॉजिकल सर्वे का। तो
मेरी ड्यूटी है यहां पे सेंध में ड्यूटी काम करने। तो उन्होंने कहा जी यह ड्यूटी-शुटी खत्म करें। ये यहां से निकले
आप तो खजाना ढूंढ रहे हैं। उन्होंने कहा खजाना नहीं आप अपना जाके काम करें। उन्होंने ठाक करके गोली मार के वो और मजूम
डार्फ जो डायरेक्टर था आर्कियोलॉजी का वो बेचारा उधर मर गया। किस साल की बात है?
ये 1938 38 सर जी। उसके बाद उसप काम ही नहीं हुआ। कोई भी काम नहीं हुआ। वो
अच्छा आप आपका आपका नाम क्या है? डॉक्टर सागर अड़ो फ्रॉम लाड़का। अच्छा अच्छा डॉक्टर साहब आप थोड़ा सा
एक सेकंड वो डॉक्टर साहब का भी ले लेते हैं फिर आप बेशक त्सरा कर नहीं मैं एंड करता हूं यहीं पे के एक तो
मुझे इस पे थोड़ा वो बात करनी थी वो मैंने कर ली और उस पे और तीसरी मेरी जो बात रहती थी मेरे ख्याल में मैं भूल गया शायद
ये जो ये जो आप आप बात कर रहे है ना के वैदिक और पोस्ट वैदिक और प्रोटो वैदिक पीरियड जो सारा है
यह बेसिकली जो शिव का जो कांसेप्ट है ना यह हमें मोजोदड़ो की मूर्तियों से मोजोदड़ो की सील से यह मिलता है।
मोहजोदड़ो में हमने शिव लिंगम डिस्कवर किए हैं जमीन से। ये नहीं
ये हमारा भी ख्याल था कि ये 5 6 हजार बरस पहले का कोई शिव का किस्सा है। लेकिन अब ये नहीं
देखिए बात सुने जरा एक मिनट जरा शिव का जो अरर्लियर नाम है ना वो रुद्रा था। शिव के देखिए वो रुद्रा जो था ना रुद्रा वाज वाज
द नेम ऑफ शिवा लॉर्ड शिवा उस वक्त उनका जो नाम था इसलिए यहां से लफ्ज रुद्रक्षा निकला है तो शिवा का जो टाइटल है ना वो इन
बात है वेदों ने भी वेदों ने भी नहीं लिखा लेकिन हमें उनके फिजिकल एविडेंस मिल रहे हैं
शिवाइ चीजों के बंबिकता इज अ केव पेंटिंग नियर बॉम्बे बिंबकता केव पेंटिंग उस पे शिव पशुपति
उसके बाल में बना हुआ है और उसकी कार्बन रेटिंग हुई है। इट इज 35 थाउजेंड इयर्स बीसी।
ठीक डॉक्टर साहब बहुत मजा आया है आप सबकी गुफ्तगू से। आपसे अंजुम साहब मेरा एक
[गला साफ़ करने की आवाज़] छोटा सवाल है। एक बड़ा सवाल है। छोटा सवाल ये है कि सिंधी जबान में
मोहनजोदड़ो नहीं कहते। मोहन जो दड़ो मोहन जो दड़ो यानी के मुर्दा जिधर दफन है तो क्या हड़प्पा भी किसी उस वो भी किसी
हड़प्पा हरि यूपा इसके लफज़ हर यूपा से भी है कि हरी हरी गॉड का नाम है उसकी एक टेंपल उसके हवाले से हड़प्पा जो है ना
बेसिकली डिस्ट्रॉय हो जाना हड़प कर जाना ये बेसिकली लफज़ हड़प्पा ना इसकी जो टाइमोलॉजी है ना हड़प्पा की कि ये किसी तहजीब ने किसी
इन्वजन ने इसको हड़प कर लिया तो यह खत्म हो गया। हड़प करके खत्म हो गया। तो मोहनजोडारो जो है ना मोहनजोडारो सिटी ऑफ़ द
माउंट ऑफ द डेड्स। लेकिन एक दो बंदे और हैं। उन्होंने कहा जी ये मोहनजो डारो जो है ना वो माउंट ऑफ द डेड नहीं है। ये है
मोहन मोहन। मोहन अच्छा मोहनजो डोरो। डेरा जो हम लफ्ज यूज करते
हैं ना आज। मोहनज जो जो है ना किसी का उसका उसकी उसके लिए जो यूज करते हैं सिंधी में ना मोहनज जो मोहन का डेरा
बड़े सवाल तक हां जी हां जी हां तो पपुलेशन जेनेटिक्स हमें ये बताती है कि
अफ्रीका से इंसान चले थे 80 हजार साल पहले आपने तो हाल की तारीख बताई ना 5 6000 साल तो इस इसका कोई सबूत मिलता है हमें कि
देयर इज अ माइग्रेशन आउट ऑफ अफ्रीका 8ाउज इयर्स एगो और क्या सबूत है? तो ये सवाल आपसे है और रजा आपने देखिए हमारा मौजू
पाकिस्तानी आइडेंटिटी है और इंडस सागा का आपने जिक्र किया जो मैंने पढ़ा और मुझे बहुत ही कमजोर आर्गुममेंट लगा एतजाज एसन
का जो कहते हैं कि एक यहां गंगा जमुना तहजीब है। ये इंडस तहजीब है और मुझे तो फर्क
मुझे तो यह काबिले कबूल इसलिए नहीं लगता कि कोई फिजिकल बैरियर नहीं है इंडस और गंगा जमुना में इट दीज़ आर प्लेन लैंड्स
ओवर देयर इंटरलैंड कोई बड़ी पहाड़ी नहीं है। कोई लैंडस्केप में चेंज नहीं है। मैं आपसे ये जानना चाहता हूं कि क्या यह कोशिश
एतजाज एस की काबिल कबूल है आपको? डू यू सी एनी मेरिट इन इट? तो चलिए आपसे शुरू करते हैं। आउट माइग्रेशन आउट ऑफ अफ्रीका।
देखें अफ्रीकन जो रेमिनेंट्स है या जो एविडेंस है फिजिकल एविडेंस वैसे इस पे बड़े कम मिले हैं। लेकिन अगर आप डांसिंग गर्ल
के फीचर देखें ना तो वो सारी अफ्रीकन लेडी है सारी। उसके बाल, उसका नैन नक्ष, उसका नाक, उसके हंठ, डांसिंग गर्ल भी यहां का
अगर कोई बना देता तो जरा ज्यादा क्लियर होता। तो डांसिंग गर्ल जो है ना ये या उससे पहले जो अफ्रीकन लोग थे यहां पे आबाद
हुए तो इनके अभी भी जेनेटिकली अगर देखा जाए ना तो ये जो ओड कबाइल है ना ओड कबाइल जो दरिया रावी के किनारे वो झुगियों में
रह रहे हैं। असल लहरी वो है अगर ना साउथ की तरफ माइग्रेट हो गए थे ना दविडियन इन्वजन आर्यंस ने उनको उधर धकेल दिया तो
वहां पे जो घोंड और भ भेल कबायल है ना भेल और घोंड कबायल साउथ इंडिया में उन्होंने की उनकी लैंग्वेज के अंदर अभी भी ये इंडस
की चीजें बहुत सी आ रही हैं और वो उन्होंने 20% जो है ना वो लफज़ निकाल लिए हैं इंडस स्क्रिप्ट के जो अभी प्रेजेंट 21
सेंचुरी में गोंड और भेल कबाइल जो है साउथ इंडिया में एक टाउन है छोटा सा ना उनके वो कम्युनिटी है एक जिस तरह ओढ़ हमारे हैं जो
ये जो कुगू कौड़े बेचते थे ना या कुगू कौड़ा बेचने वाले बेसिकली असल जो बसनेक है इंडस के वो वो थे। तो अगर हम उसका अफ्रीकन
कॉन्टेक्स्ट में जाना चाहे तो डांसिंग गर्ल का पूरा फीचर ही अफ्रीकन है। इसका मतलब है कि उस तरह के लोग थे उस यहां
पे। उस तरह की जो फेशियल फीचर है लोगों के वो बिल्कुल थे। इसके क्योंकि इंसान का एक इलाके से निकल
के दूसरे इलाके में चले जाना जो गर्म खते में चले गए वो काले हो गए। उनके बाल की शक्ल भी गर्मी शिद्दत से चेंज हो गई। जो
नॉर्मल आ गए ट्रॉपिकल एरिया में आ गए वो हमारी तरह के आ गए स्किन ब्राउन तो जो वाइट सर्द इलाकों में चले गए वो वाइट हो
गए। ये तो एक फिजिकल फीचर है एंथ्रोपोलॉजी के अंदर के लोग किस तरह डिवाइड हुए और किस तरह उन्होंने अपनी नौबाियात बना के
एस्टैब्लिश किया अपने आप को। जी अच्छा डॉक्टर खुद भाई थैंक यू फॉर बीइंग हियर और
बड़ा मुश्किल सवाल है आपका मैं क्या देखिए ऑब्वियसली वो किताब जो है वो एक इट इज वन ऑफ द मेनी एफर्ट्स इससे
पहले मेरी बात हो रही थी इनसे तो कई और इस तरह की जो आर्गुमेंट्स हैं वो लोगों ने लिखे हैं और
डेवलप किए हैं और एतजाज की बुक का मैंने इसलिए जिक्र किया कि देखिए नेशंस आर इमेजिन कम्युनिटीज।
सारी नेशन स्टेट का तसवुर ही जो है उसमें बहुत ज्यादा इमेजिनरी होती है। मसन अमेरिका को ही देख लीजिए। एक तरह से अब जो
नेहरू की डिस्कवरी ऑफ़ वो जो पूरा आईडिया ऑफ़ इंडिया है डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया जो किताब उन्होंने लिखी थी। अब उसको भी चैलेंज किया
जाता है कि उसमें बहुत सारे होल्स हैं और जो कंटेंपररी इंडियन रूलिंग पार्टी है वो तो बिल्कुल उसको चैलेंज करती है कि जी ये
तो बिल्कुल ही उसने एक फेबल लिखी है। तो मेरे ख्याल से मैं तो सिर्फ़ यह कहता हूं कि हमें भी पाकिस्तान जिसको एक वह कहा गया
था रुदी ने कहा था कि इनसफिशिएंटली इमेजिंड देयर कंट्री जो उसके कैसे का नाम है तो वो उस वक्त ये था ख्याल और चौधरी
मोहम्मद अली ने बल्कि चौधरी मोहम्मद अली नहीं मौलाना जो थे क्या नाम था जौहर के जो भाई थे
तो उन लोगों ने भी ये इस तरह के आर्गुमेंट्स डेवलप किए बल्कि 20 और 30 में लिख रहे थे कि जी ये एक जो है
यहां पे सबसे पहले ह्यूमन सेटलमेंट हुई है। ये कल अलग से सिविलाइजेशन एक आईडिया था जो कि एक्सप्लोर किया जा रहा था फॉर सम
सॉर्ट ऑफ़ अ आइडेंटिटेरियन पर्पसेस। सो इज़ाज़ बुक इज़ आल्सो पार्ट ऑफ़ दैट होल। यू नो एंड इट कंटिन्यूस। आज की भी जो हम यह
बात कर रहे हैं वह भी इसीलिए कर रहे हैं कि भाई हाउ कैन वी थिंक ऑफ़ पाकिस्तान एज अ डिफरेंट?
शकील साहब एक मिनट 1 मिनट दो नो बिग ऑल इन दैट। असल में दैट वाज़ अ बिग बिग जी क्योंकि
कदीम आसार उस हवाले से ज्यादा स्पेकुलेशन और कंजेक्चुरलिज्म होता है तो उसमें होल्स या सस्पिशन हमेशा रहती है। लेकिन एक बात
तय है जब आप अपने मौजूदा सियासी और समाजी नजरियात कहें, आदर्श कहें उनकी तकवियत के लिए माजी को घड़ेंगे या तशकील देंगे तो वो
गलत होगा। हिंदुस्तान और पाकिस्तान हिंदुस्तान में कम पाकिस्तान में बहुत ज्यादा यह हो रहा है। जब भी आप ऐसा करेंगे
और उससे आसारे कदीमा को लाएंगे तो वो गलत होगा। यह बात तयशुदा है। लिंग्विस्टिक एटमोलॉजी जो है वो भी प्रॉब्लमैटिक है
जिसे हम कहते हैं साउंड अगर मिलती है। लैंग्वेज हैज़ नो लॉजिक। लैंग्वेज इज़ बेस्ड ऑन कन्वेंशन। मुल्तान के बारे में कहा
जाता है के मल कबाल रहते थे। फिर वो मलोही हो गए। फिर वो मलोहिस्तान हो गया। फिर वो मूलस्तान हो गया फिर वो मुल्तान हो गया।
कभी-कभी वो दुरुस्त होता है। लेकिन कभी-कभी वो दुरुस्त नहीं होता क्योंकि जुबान को हम उस तरह उसका कोई फिजिकल
एविडेंस नहीं होता। ये थरेटिकल और कंजेक्चुरल होते हैं। तो उसमें प्रॉब्लम हमेशा रहता है और रहेगा। जी शकील साहब।
अच्छा रजा साहब एक तो एजाज एसन का जो थीसिस है उस पे क्वेश्चन ये आता है कि क्या इंडस सिविलाइजेशन वाघा पे खत्म हो
जाती थी? कि क्या वो वाघा पे खत्म हो जाती थी? जी। तो दूसरा जो है उन्होंने जो इंडस मैन
इन्वेंट किया है कि वो बड़ा ब्रेव था, प्लूरलिस्टिक था, बड़ा टोलरेंट था, बड़ा रेजिस्टेंस करता था। तो वो भी अब पता नहीं
किस हद तक सही है। कौन उसको रिप्रेजेंट करता है आज के जमाने में। अच्छा सर आपसे मैं अगर पूछूं एक तो ये है कि टेक्सला में
सुना है कि बड़े वो है लैंड गैबर्स हैं, कब्जा ग्रुप्स हैं जो बड़ा डैमेज कर रहे हैं आपके काम को। तो उन पे कोई काबू पाया
गया है? नहीं पाया गया और जलील अब्बास जिलानी ने कुछ अरसा पहले जब वो फॉरेन मिनिस्टर थे केयरटेकर उन्होंने वहां
न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी में खिताब करते हुए कहा था कि हमारा हमारी तारीख 5000 साल पुरानी है। वैसे ये गवर्नमेंट के
लोगों की तरफ से कम ही ऐसी बात सुनने को मिलती है। और ये बताइएगा कि ये जो आर्यन इन्वज़ की थ्यरी है इस पे आपका क्या ख्याल
है? देखिए जी इस पर तो हजारों किताबें लिखी जा चुकी हैं कि आर्यंस ने यह जो वेदास हैं यह
इंट्रोड्यूस करवाई और इनको डिस्ट्रॉय किया इंडस वैली सिविलाइजेशन को तो हमेशा से पूरी दुनिया में आप देख लें कि
कोई एक ख्ता किसी एक तरह के कम्युनिटी से नहीं रहा हमेशा कभी अफ्रीकन आ गए कभी अमेरिकन आ गए कभी सेंट्रल एशियन आ गए उनके
ऊपर डोमिनेट तो जो बंदा अह डोमिनेट होता है ना स्टेट का वारस उसी का फिर मजहब भी उसी का चलता है। चंद्रगुप्त मौर्या एक कटर
हिंदू माइंडसेट का लोग बंदा था। उसका जो बेटा बिंदुसरा है वो अजबिका था। एथिस्ट था। टोटली एथिस्ट था। अजबिका जो चरबाकास
बोलते हैं ना उनको वो 10 साल उसकी हुकूमत थी। लेकिन वो उसका माइंड यह आफ्टर द बैटल ऑफ कलिंगा अशोका जो है ही वाज़ कन्व्टेड टू
बुद्ध बुद्धिज्म। तो जब यह बुद्धिज्म में बन गया तो फिर पूरा स्टेट इसने कहा कि बुद्धिज्म बना दो। 84,000 स्टूबा खड़े कर
दिए और रॉक एडिक्ट्स और कॉन्स्टिट्यूशन जिसकी दो मिसाले हमारे पास हैं। शबाजगढ़ में और जमालगढ़ में उसका जो
कॉन्स्टिट्यूशन लिखा हुआ है तो जो बादशाह होता है ना उसका रिलीजन होता है। ईरान इसी तरह
हां और उसकी राया भी वही इंटरप्ट करती है। तो इसमें ये नहीं होता कि जी ये मतलब बाकी जो बात आप कल्चर की कर रहे हैं ना तो
कल्चर अभी आपने वाघ बॉर्डर की बात की। कल्चर जो है ना वह एक ख्ते में उसका एक नाम नहीं है। जिस तरह पानी है दरियाओं के
हिमालिया से पानी निकलता है। पांच दरियाओं में आता है हमारा सतलुज में झेलम में रावी ब्यास और चनाब फिर ये अरेबियन सी में जाता
है। अब अगर पानी से बंदा पूछे भ तू कौन है? वो एक टाइम में तो वो सतलुज था। एक टाइम में वो झेलम था। वो कहेगा जी मैं तो
झेलम हूं। मैं तो झेलम है। झेलम मेरा नाम है दरिया का। तो जब वो समुंदर में गिर गया तो समुंदर के पानी से पूछा हां तू उनको तो
पता ही नहीं चले मैं जेल कि मैं चेनाब या मैं सतलज तो पता ही नहीं मैं तो अरेबियन सी आ गया इस तरह हिंदुस्तान के जो दरिया
यमुना गंगा गोदावरी सरस्वती ब्रह्मपुत्र ये इंडियन ओशियन में गिरते हैं। तो तहजीबें बस बनती है दरियाओं के
किनारे उसमें अगर इंडिया से पानी इधर आ रहा है तो उस उनका अपना कल्चर था वो पानी इधर आ गया हमारा अपना कल्चर है तो ये इसको
डिवाइड नहीं कर सकते देखिए ये हमारा हेरिटेज है विरसा है हमारा मजहब एक होना एक अलग बात है लेकिन विरसे से आप
डिस्क्लेम नहीं कर सकते अपने आप को कि जी ये कटास राज या बुद्धिस्ट जो स्तूपास हैं ये हमारा इनसे कोई ताल्लुक नहीं भाई विरसा
है आपका। आपके जेनेटिक में है ये यहां का खून। आपके आपकी बॉडी लैंग्वेज में ये चीजें मुस्तरक हैं। आपकी लैंग्वेज में वो
चीजें हैं जो पुरानी खरोश थी, ब्राह्मी, पाली और ये जो लैंग्वेज थी पंजाबी के लफ्ज़ बहुत सारे इसमें हैं। अब हम ये कहें कि
नहीं जी पंजाब पंजाबी भी जो है वो मोहम्मद बिन कासिम लेके आया था। तो महमूद गजनवी ने असल में आके पंजाबी इंट्रोड्यूस की। नहीं
पंजाब का एक अलधा कल्चर है। उसकी लैंग्वेज है। उसके रेमिनेंट्स अभी हम बोलते हैं वो लफज़ जो बहुत सारे हैं। तो इसको एक टाइम
में किसी कल्चर को आप आइडेंटिफाई नहीं कर सकते कि जी ये है बाजी ये कल्चर है। तो डिवीजन भी इसकी नहीं हो सकती। और कोई ये
ज्योग्राफिकल बाउंड्रीज जो होती हैं लाइनें शाने जो होती हैं ये ये कल्चर को तकसीम नहीं कर सकती। लोग वही होते हैं।
उनका जेनेटिक वही है, उनकी लैंग्वेज वही है। उनका खाना पीना उनका इवन मरना जीना हर चीज अब हमारा जो मरना जीना है, हमारी यह
रसुमात है। यह अरब के है, मक्कन लोगों की है। मदीना में लोग ऐसा करते हैं। नहीं करते। हमारा कल्चर डिफरेंट है। हमारा
कल्चर ही इंडियन है सारा। तो गो के नमाज हम इस्लाम के मुताबिक पढ़ते हैं। लेकिन कल्चर हमारा जो है वह पैदाइश से ले मरने
तक और मरने के बाद जो खत्म होते हैं चारचार खत्म होते हैं जो वो सारे इंडियन है। और कहां सऊदी अरब में ये खत्म होते
हैं। तो ये हमारा कल्चर ये लोकल है। भी नहीं है। कुछ नहीं है वहां पे तो।
तो कल्चर को आप आइडेंटिफाई नहीं कर सकते। किसी एक भी कुछ भी नहीं है। [हंसी] ये एडिट कर देना
भाई। सरकारी मुलाजिम है कर सकते हैं। वी लव द ब्लैक होल। [हंसी] देखिए मैं [हंसी]
मैं आपकी बात का हमारे कल्चर की शिनाख्त है। मैं इनकी बात का मुख्तसरन एक रिस्पांस ये
दूंगा कि देखिए नॉन हिस्ट्री में साउथ एशिया या इंडियन सबक्टिनेंट जिसका नाम है ये एक कॉन्टिनेंट की तरह है। 1947 में तो
इंडिया पाकिस्तान बने लेकिन देयर वर ऑलमोस्ट 600 प्रिंसली स्टेट्स और उससे पहले भी जमानों में राजवाड़े, किंगडम्स,
टेरिटरीज़ यह मेरे ख्याल से तीन या चार बार हिस्ट्री में ऐसा हुआ है कि जहां पे एक यूनिफाइड इंडिया का आईडिया इमर्ज हुआ है।
और वो भी पूरा इंडिया जो अभी मौजूद है वो नहीं था। अशोका चंद्रगुप्त मौर्या आप कह सकते हैं। स्टेट्स जो कि कॉलोनियल ब्रिटिश
कॉलोनियल एडमिनिस्ट्रेशन स्टेट्स जो कि कॉलोनियल ब्रिटिश कॉलोनियल एडमिनिस्ट्रेशन की सक्सेस हैं। दे वांट टू रूल लाइक द
ब्रिट्स बट द रियलिटी द कल्चरल लिंग्विस्टिक एथेनिक डायवर्सिटी इज एट ऑड्स एट वेरियंस। इंडिया में भी यही हो
रहा है। वहां पे ज्यादा स्ट्रांग है स्टेट। ज्यादा उसने दबा के रखा हुआ है। पाकिस्तान में देखिए इस वक्त क्या हो रहा
है। चारों तरफ जो है हम उस पे नहीं जाएंगे। चारों तरफ एक अपराइजिंग है, एक मुसीबत पड़ी हुई है। उसकी वजह ये कि आपने
लोगों को एमावर ही नहीं किया। ये सेंट्रलाइज्ड रूल जो है फ्रॉम दिल्ली, इस्लामाबाद और ढाका इज नॉट इन इन सिंक विद
व्हाट द पीपल ऑफ दिस रीजन वांट। बड़ी सिंपल सी बात। मैं मजबूर हूं कि दो हर्फ मैं भी बोलूं। ये सवारकर के पैरोकार और
हिंदुत्व के बानी मुबानी यह साबित करने पर तुले हुए हैं कि आर्या नहीं आए थे। हालांकि ये थ्यरी अभी तक साबित अगर गैर
साबित नहीं हुई तो साबित भी नहीं हुई। उसकी वजह बड़ी सादा है जो मैंने पहले जिक्र किया है। उसकी वजह यह है कि
इन्होंने कहा हिंदू वो है जिसकी पुनिया भीम हिंदुस्तान भारत हो या पुत्री भूमि हो। आबा अजदाद यहां के रहने वाले हो या
उसका दीन यहां पैदा हो। अगर यह थ्यरी हम मान लेते हैं कि आर्य आए और वादी सिंध और गंगा जमुनी तहजीब के लोगों से मिलकर उनसे
शादीवादी करके उनके अकायद और इनके अकायद और वरना जाति का सिस्टम बना और पूरा हिंदू मत का एडिफेस खड़ा हुआ तो सारा हिंदुत्व
धड़ाम से नीचे गिरता है। तो ये थ्योरी इसलिए नहीं गलत साबित कर ली कर की जा रही और किताबों पर किताबें लिखी जा रही हैं कि
जी आए ही नहीं थे। वैसे तो डीएनए और आजकल जेनेटिकली भी साबित हुआ है कि सेंट्रल एशियन ब्लड यहां पर है। लेकिन मज मकसद
क्योंकि सियासी है जो मैं आपको बता रहा हूं। कौम परस्ताना है लिहाजा उसमें लड़खड़ना तो जरूरी है। रशीद साहब
और संस्कृत कहां से आई? ये बहुत संस्कृत कहां से आई? तो उसमें लड़खड़ाते हैं हिंदुस्तानी भी और धराधर किताबें लिखी
जा रही है। मैं उस पूरी बहस से वाकिफ हूं। जी प्लीज सफर रशीद एक तो जाहिर है कि पूरी तारीख को
ओन ना करने के जो मकासिद थे वो हासिल हो चुके। ये यानी कोई गलती नहीं थी ये। ये बड़ी
प्लानिंग के साथ है कि हमें तारीख हमारी कहां से शुरू करनी है। जिस तरह की कौम तैयार हुई है वो वाज़ है। मुमकिन है कल को
वो खुद महसूस करें कि जब अपने कपड़ों को आग लगेगी कि भाई अब तारीख वहां से शुरू करें। तो आप लोगों के पास जब बात पहुंचेगी
कि भाई अब तारीख को हमने निसाब में ऐसे पढ़ाना है तो आप लोगों का वक्त आप जैसे लोगों का वक्त एक आना है लगता यह है आज
नहीं तो चाहे 50 साल के बाद तो अपने पानी आपके करीब बैठे थे टेक्सला के हमने डिसओन किया आप वहां कह सकते थे यूरोप की
यूनिवर्सिटीियों की तरह के कोत 3000 साल पुरानी तारीख है यूनिवर्सिटी है हमारी ये
ठीक है लेकिन हमने टेक्सला की यूनिवर्सिटी को नहीं वो किया
तो सवाल आपसे बस छोटा सा था हम यह माने या ना माने पूरी दुनिया चणकिया को मानती है पिनी को मानती है आरियाबाद को
मानती है कि मैथमेटिक्स काम हो चुका मैथमेटिक्स पे जो रिसर्च हुई थी खत्म करने का भी कहा जा रहा है कोई और
सवाल अगर सवाल आपके साथ जी प्लीज तो सवाल ये है कि एक तो हमारे साहबात में
तालीमी स्कूलों में हमारा ज़ौक नहीं बनता म्यूजियम्स में जाने का यूरोप में या हिंदुस्तान में भी बड़ा ज़ौक
है वहां हमसे बेहतर है हिंदुस्तान इस मामले में तो क्या किया जाए के बचपन से ही निसाब ऐसा तरतीब हो कि बच्चा म्यूजियम में
जाने पर मजबूर हो और तारीख वाली बात ऑस्कर वाइल्ड ने एक ना छोटी सी कोटेशन है के अ सिटी विदाउट ओल्ड बिल्डिंग्स लाइक अ
मैन विदाउट मेमोरी के जिस शहर में पुरानी म्यूजियम या पुरानी इमारात नहीं है वो ऐसे है जैसे एक इंसान जिसकी याददाश्त ना हो तो
जिसकी याददाश्त ना हो हम उसको क्या कहेंगे पागल बाकी ये जो आपका सवाल था ना पहले वाला के
हां हां मैं आप अच्छा जब से 1947 के बाद आप टेक्स्ट बुक देख लें मैं 77 78 में मेरी कला किताब थी टेक्स्ट बुक
पंजाब का टेक्स्ट बुक सियालकोट डिस्ट्रिक्ट में एक स्कूल था मेरा वहां पे माशरते एक सब्जेक्ट होता था उसमें
मोहनजोदड़ो की स्टोरी होती थी पूरी मोहजोदड़ोड़ की स्टोरी होती थी और मैं मोहजोदड़ोड़ की स्टोरी पढ़ता था ये
टेक्स्ट बुक की बात कर रहा हूं ये आम ये ग्रामर और बीन हाउस लेवल की बात नहीं कर रहा जो सरकारी स्कूल स्कूल था ना प्राइमरी
स्कूल उसमें आप अगर 1953 या 52 के हॉलिडेज निकाल के देख ले ना अभी Google पे पाकिस्तान गवर्नमेंट के अंदर हॉलिडेज कौन
से होते थे तो आपको तकरीबन कोई 35 40 छुट्टियां मिलेंगी जो सरकारी छुट्टियां हम करते थे उसमें तमाम जो कम्युनिटीज हैं
हिंदुस्तान पाकिस्तान की हैदर बुद्धिस्ट हैं हिंदू हैं क्रिश्चियंस हैं ये इन इनके दिन बकायदा मनाए जाते थे। छुट्टी होती थी
सरकारी। यह होली और दिवाली की छुट्टी होती थी। आप निकाल के देख लें। सरकारी छुट्टी रिकॉर्ड है। यह किसी को लुगी छुपी कोई बात
नहीं। तो हम अभी जो हम मोजोदड़ो और उससे थोड़ा सा डिस्क्लेम कर रहे हैं। प्राइमरी स्कूल जो है ना एक बुनियाद होती है। ग्रास
रूट लेवल जो होता है ना किसी भी कौम का जनरेशन का एक बुनियाद होती है। हम सबसे जो कम तालीम याफ्ता बंदा होता है ना उसको
प्राइमरी स्कूल पे लगाते हैं। मैट्रिक की स्थानियां होती है। टीचर होते हैं जो मैट्रिक कैफे के होते हैं वो बच्चों को
पढ़ा रहे होते हैं। भाई वहां वहां पे क्वालिफाइड बंदों की जरूरत है। जो बच्चे की ब्रेन वाशिंग करें। उसकी इंप्रूवमेंट
करें। उसको कल्चर, तहजीब और उसके रियल जो एजुकेशन का पर्पस है ना बेसिकली एजुकेशन जो है इट्स नॉट अ कलेक्शन ऑफ़ डाटा। ये
इंफॉर्मेशन डाटा नहीं है कि हम चीजें हमने इकट्ठी कर ली है। इट्स अ इट्स अ ट्रेनिंग ऑफ़ माइंड टू थिंक। ये माइंड की ट्रेनिंग
है कि वो सोचना कैसे है? सोचने के धारे कैसे हैं? क्या चीज किस तरह सोचनी है हमने? ये एजुकेशन है और यहां पे एजुकेशन
हमारे सरकारी स्कूल प्राइवेट दूसरे स्कूल भी ये कांसेप्ट से बहुत दूर है। तो इस तरह आहिस्ताआहिस्ता वैसे ये 21वीं सदी में ये
जनरेशन तक ये चीजें पहुंच रही हैं कि जो तहजीब होती है उसको ऑन करना चाहिए और ये वो बहुत सारे लोग अभी इसलिए नहीं आते
हमारे म्यूजियम में कि ये तो हमारा कल्चर का हिस्सा ही नहीं है। कई लोग टेक्सला म्यूजियम में आके वापस चले जाते हैं। अंदर
तो टिकट ल अंदर [हंसी] तो बहुत ने अच्छा यार आखरी सवाल को पैसे ले टिकट दे अंदर बहा रहे हो [हंसी]
सही आखरी सवाल है मेरा जी इसी इसी बात पे इसी बात के ऊपर आखिरी सवाल करूंगा
जिन्होंने अभी कहा है कि टेक्सला में बुत पड़े और लोग नहीं आते मेरी राय भी है और आप मुझे
कुछ लोग ऐसे जी कुछ लोग मैं मैं भी मैं तो मैं जी मैं राय भी देना चाहता हूं और आप मुझे बता
सकते हैं उसके ऊपर कि क्या यह बात ठीक है यानी जो मेरी जाती राय जो मुझे लगता है कि असल में इस ख्ते की ओनरशिप लेना अहम है।
अगर मैं यहां पे रहता हूं चाहे मेरे मैं 1000 साल पहले कोई मेरे फोर फादर्स आए हैं या 5000 साल पहले आए। मैं यहां की जुबान
बोल रहा हूं। यहां के कल्चर के अंदर मैं रच बस गया हूं। और इसी लोगों के अंदर मेरी अजीजदारियां
है, शादियां है, सब कुछ है। तो मैं यहीं का बासी हूं। मैं बाहर से तो नहीं आया। तो अब एक और जो मुझे लगता है कि ये प्रॉब्लम
किस तरह क्रिएट हुई? जिस तरह हमारे पंजाब में हम किसी को मिलते हैं तो देहातों में कहते हैं हां भाई त पिच्छू कौन हो? ये एक
अगर आप देहाती है क्योंकि मैं एक मेरा बैकग्राउंड एक देहाती है तो वी नो के हम ये पूछते हैं कि भ आप क्योंकि शादी भी
करनी है। किस गोथ पे करनी है और एक मजे की बात बताऊं। मैं आपको अपनी जाती के 1947 से पहले मैं जिस कौम से मेरा ताल्लुक है हम
मुसलमान तो 5 600 साल पहले हो गए थे लेकिन हमारी बिरादरी में एक हिंदूइज़्म की बड़ी रिवायत खालिस थी कि आपने जिस बिरादरी में
बेटी दे दी है वहां से लेनी नहीं है और जिस बिरादरी से बेटी ले ली है वहां पे देनी नहीं है। अबकि मुसलमान तो हम 500 साल
पहले हो गए हैं। लेकिन क्योंकि हम एक खास उस हमारी एक कौम थी और वो जो हमारे उस कौम के हिंदू भी लोग थे वो फिर ब- बड़ा मजाक
उड़ाते थे कि ये कजनें तो आपकी बहने होती है तो ये वो बड़ी बुरी चीज समझी जाती थी तो खैर पार्टीशन के बाद हमने वो चीज छोड़
दी और हम कजन मैरिज भी शुरू हो गई। तो मेरी बात शुरू हुई थी आइडेंटिटी से। क्योंकि मुख्तलिफ कौमों और जातों में हम
बटे हुए हैं। तो जो प्री कॉलोनियल या कॉलोनियल दौर में जब जमीन की आबादकारी ज्यादा हुई तो देहात के अंदर आपको एक लेबर
क्लास की भी जरूरत थी। क्योंकि उस वक्त फूड और ये सब चीजें बड़ी जरूरी थी। तो वो लेबर क्लास भी उस सेटलमेंट में रहती थी।
अब वो बाद में लेबर क्लास को आइडेंटिटी क्लेम करना मुश्किल हो गया क्योंकि हमने उसको बड़ा मौक कर दिया कि तुम तो नीच हो
निचले दर्जे के हो। अब उसने फिर कहीं और तो रास्ता ढूंढना था कि किसी और जगह तो उसने
मुख्तसर कर ले आपने कोई जवाब इस पर देना है या बस खत्म करें? चल जी बहुत शुक्रिया। खुदा हाफिज आपने
इतनी तम है कि उसमें कई क्वेश्चन रे होते हैं। एक क्वेश्चन सर उसमें बस उसमें एक क्वेश्चन करें
आइडेंटिटी किसी वजह से हमको ओनरशिप नहीं हम इसी के वासी है और हम उसकी उसकी बात बेटे वाज़ तौर पे ये है कि
ये एक ऐसा ही है जैसे कोई खूबसूरत दरख्त है उसके ऊपर फल हैं फूल हैं पत्ते हैं बड़े हर मौसम में पत्ते निकलते हैं पत्ते गिर
भी जाते अगर किसी दरख्त की शाख काट के तो उसको कहो भी पत्ते भी दिखा तो फल भी दिखा और फूल भी
दिखा वो नहीं दिखा सकता। जिन कौमों के रूट्स काट दी जाती है ना वो ग्रो नहीं करती। वो फ्लोरिश नहीं करती। वो आबाद ही
नहीं होती और उनको समझ नहीं लगती कि हमारे साथ हो क्या रहा है। थैंक यू। चलो जी। बहुत शुक्रिया।
बहुत शुक्रिया। [प्रशंसा]
The video argues that Pakistan faces a severe identity crisis by focusing its national narrative almost exclusively on Islamic history starting from 712 AD, while neglecting or disowning its rich pre-Islamic heritage, particularly the 5,000-year-old Indus Valley Civilization. This creates a 'disconnected past' that weakens national identity and prevents cultural growth.
The Indus Valley Civilization was larger than its contemporaries in Egypt and Mesopotamia, covering a vast area from Eastern Afghanistan into modern-day India. It featured advanced urban planning, sophisticated sanitation systems, and undeciphered script, with theories suggesting it may have been a largely peaceful, non-hierarchical society.
The 'Dancing Girl' is a famous bronze statue from Mohenjo-Daro, conjectured to have African features. Pakistan lent it to India in the 1960s for an exhibition, but it was never returned after the 1965 war, leaving Pakistan with only the 'King Priest' statue—a loss that former PM Zulfikar Ali Bhutto lamented.
The discussion links this denial to both Indian Hindutva politics, which deny the Aryan invasion theory to claim a continuous Vedic civilization, and Pakistan's attempt to create a purely Islamic origin story. In both cases, denying complex histories serves political agendas but weakens national tolerance and growth.
The speakers point to Egypt, Turkey, and Iran as Muslim-majority countries that proudly promote their pre-Islamic civilizations (Pharaonic, Greek/Roman, Zoroastrian) for tourism and national identity. Egypt's new Grand Egyptian Museum is cited as a prime example of profiting from ancient heritage while maintaining Islamic identity.
The video notes that cities like Multan, among the oldest continuously inhabited cities, have their living heritage overlooked while archaeology focuses on dead mounds. It also recounts the tragic 1938 murder of archaeologist R.C. Mujumdar in Sindh, illustrating long-standing tensions around protecting pre-Islamic heritage.
The speakers advocate for 'territorial nationalism' that embraces all layers of identity—religious (Muslim), ethnic (Punjabi, Sindhi, Pashtun), and historical (Indus, Gandhara). This would involve educational reform to teach critical thinking and complete history, boosting tourism, fostering social tolerance, and healing national identity.
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